Translater

Thursday, 7 May 2026

मिनाब स्कूल पर हमले पर पेंटागन की चुप्पी

पूर्व शीर्ष सैन्य वकील समेत अमेरिका के पांच पूर्व अधिकारियों ने इस साल की शुरुआत में ईरान के एक स्कूल पर हुए घातक हमले में संभावित अमेरिकी भूमिका को स्वीकार न रकने पर पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय) की आलोचना की है। इनमें से कुछ ने कहा कि इतने लंबे समय बाद भी हमले की बुनियादी जानकारी तक जारी न करना बेहद असामान्य है। ईरानी अधिकारियों के मुताबिक 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल युद्ध की शुरुआती कार्रवाई के दौरान मिनाब में एक प्राइमरी स्कूल पर मिसाइल गिरी। जिसमें करीब 110 बच्चे समेत 168 लोगों की मौत हुई। इसके बाद बीते दो महीनों में पेंटागन ने सिर्फ इतना कहा है कि इस घटना की जांच जारी है। मार्च की शुरुआत में अमेरिकी मीडिया ने खबर दी थी कि अमेरिकी सैन्य जांचकर्ताओं का मानना है कि शायद अमेरिकी बल अनजाने में स्कूल पर हमले के लिए जिम्मेदार  थे, लेकिन वे अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंचे थे। बीबीसी ने इस हमले की पारदर्शिता की कमी के आरोपों पर कई सवाल पूछे, जिस पर पेंटागन के एक अधिकारी ने कहा, इस घटना की जांच जारी है। लेफ्टिनेंट कर्नल रेचल ई वेनलैंडिंगम कहती हैं कि अमेरिका की मौजूदा स्थिति सामान्य प्रतिक्रिया से साफ तौर पर अलग है। वैनलैंडिंगम अमेरिकी वायुसेना में जज एडवोकेट जनरल रह चुकी हैं। उन्होंने बताया कि पिछली सरकारों ने कम से कम युद्ध कानून के प्रति निष्ठा और प्रतिबद्धता दिखाई थी। मौजूदा प्रशासन के बयानों में जबावदेही की प्रतिबद्धता गायब है। सबसे अहम यह सुनिश्चित करना भी कि ऐसा दोबारा न हो। राष्ट्रपति ट्रंप ने 7 मार्च को कहा था कि उनके विचार में मिनाब हमले के लिए ईरान जिम्मेदार है, लेकिन उन्होंने कोई सुबूत नहीं दिया। कुछ दिन बाद जब उनसे मिनाब स्कूल के पास सैन्य अड्डे पर अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल गिरने का वीडियो दिखाए जाने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहाः मैंने यह नहीं देखा। साथ ही ट्रंप ने बिना किसी सुबूत दावा किया कि ईरान के पास भी टॉमहॉक मिसाइलें थीं। 11 मार्च को जब उनसे उन खबरों के बारे में पूछा गया जिसमें कहा गया था कि शुरुआती सैन्य जांच में पाया गया कि अमेरिका ने स्कूल पर हमला किया था तो ट्रंप ने कहा मुझे इसके बारे में नहीं पता। अमेरिका के रक्षामंत्री पीटहेगसेथ से 4 मार्च को बीबीसी ने इस हमले पर सवाल किया था तो उन्होंने कहा, मैं सिर्फ  इतना कह सकता हूं कि हम इसकी जांच कर रहे हैं। यही नहीं अमेरिकी रक्षा विभाग ने इस हमले पर कई सवालों के जवाब देने से इंकार कर दिया। पिछले महीने बीबीसी ने स्वतंत्र रूप से हमले की वीडियो की पुष्टि की थी जिसमें स्कूल के पास ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के अड्डे पर अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल गिरती दिख रही थी। पेंटागन के एक वरिष्ठ पूर्व सलाहकार वेस ब्रायंट ने बीबीसी से कहा कि शुरुआती सैन्य जांच आमतौर पर दो बातें तय करने के लिए होती है। पहली, क्या नागरिक क्षति वास्तव में हुई? दूसरी क्या उस समय अमेरिका उस इलाके में सक्रिय था या नहीं? जब दोनों शर्तें पूरी हो जाती हैं, तभी औपचारिक जांच शुरू की जाती है। प्रक्रिया के लिहाज से यह और भी साफ संकेत देता है कि वे पहले से जानते हैं कि वह अमेरिका की वजह से हुआ नहीं तो वे जांच नहीं कर रहे होते। वे बस इसे स्वीकार नहीं करना चाहते या इस पर बोलना नहीं चाहते। पिछले साल अमेरिका के रक्षा विभाग ने नौकरियों की कटौती की थी, उसमें ब्रायंट भी शामिल थे। अमेरिका स्वीकार करे या न करे उसने मानवता का कत्ल किया है जिसे कभी माफ नहीं किया जा सकता। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 5 May 2026

आप और ट्रंप लगातार झूठ बोल रहे हैं

अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की ईरान युद्ध पर जनता को झूठ बोलने और गुमराह करने व वरिष्ठ सैन्य अफसरों को हटाने के आरोपों को लेकर प्रतिनिधि सभा की सशस्त्र सेवा समिति में सुनवाई हुई। पहली बार युद्ध शुरू होने के बाद रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को ईरान युद्ध पर डेमोक्रेटिक सांसदों का सामना करना पड़ा। गत बुधवार को वो हाउस आर्ड सर्विसिज कमेटी के सामने पेश हुए। उनके साथ ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डेन केन और रक्षा मंत्रालय के मुख्य वित्त अधिकारी जूल्स हर्स्ट भी मौजूद थे। बहस की शुरुआत हेगसेथ ने डेमोक्रेट्स और कुछ रिपब्लिकनों के बयान को निराशावादी करार देते हुए कहा कि इस तरह के कमेंट्स अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन हैं। इस दौरान हेगसेथ और डेमोक्रेट्स सांसदों से तीखी बहस हो गई। छह घंटे की सुनवाई में माहौल गरमा गया। संसद के निचले सदन में ट्रंप प्रशासन के 1500 अरब डॉलर के रक्षा बजट पर चर्चा के दौरान यह नोकझोक हुई। पेंटागन द्वारा युद्ध की लागत 25 अरब डॉलर बताने पर डेमोक्रेट्स भड़क गए और उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप की मानसिक सेहत पर ही सवाल उठा दिए। इस पर हेगसेथ ने पलटवार किया कि ट्रंप सबसे तेज और सूझबूझ वाले कमांडर-इन-चीफ हैं। उन्होंने डेमोक्रेट सदस्यों से उल्टा सवाल किया कि क्या उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति जो बिडेन की क्षमता पर कभी सवाल उठाए? डेमोक्रेटिक सांसदों ने अमेरिका द्वारा शुरू किए ईरान युद्ध को वॉर ऑफ चॉइस बताया, जिसे कांग्रेस की मंजूरी के बिना शुरू किया गया। कैलिफोर्निया के डेमोक्रेट सांसद जॉन गरामेंडी ने कहा, आप और राष्ट्रपति शुरू से ही इस युद्ध के बारे में अमेरिकी जनता से झूठ बोल रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि डोनाल्ड ट्रंप मध्य-पूर्व के एक और युद्ध के दलदल में फंस गए हैं। हेगसेथ ने इस बयान को लापरवाह बताया और कहा कि ट्रंप किसी दलदल में नहीं हैं। आगे कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप के प्रति आपकी नफरत आपको अंधा कर रही है। हालांकि कमेटी के कई रिपब्लिकन सदस्यों ने पेंटागन का समर्थन किया। फ्लोरिडा के सांसद कार्लोस जिमेनेज ने कहा कि ईरान से अमेरिका के अस्तित्व को खतरा है। उन्होंने कहा-अगर कोई 47 साल से कह रहा है कि वह हमें मारना चाहता है तो मैं उसकी बात को गंभीरता से लूंगा। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और उसकी वजह से सामानों की कीमतों पर असर पर एक सांसद ने कहा आपको शर्म आनी चाहिए कि आपने मीनाब में हुए इस हमले में 168 लोग मारे गए, जिनमें करीब 110 बच्चे भी शामिल थे। आज हर अमेरिकन बढ़ती महंगाई से परेशान है। तेल की कीमतें बेतहाशा बढ़ रही हैं और इसके जिम्मेदार आप के राष्ट्रपति और आप जैसे सलाहाकार हैं। कमेटी के वरिष्ठ डेमोक्रेट सदस्य एडम स्मिथ ने कहा- हमसे गलती हुई और युद्ध में ऐसा होता है, लेकिन दो महीने तक चुप रहकर हमने दुनिया को यह संदेश दिया कि हमें परवाह नहीं है। कैलिफोर्निया के भारत मूल के सांसद रो खन्ना ने इस हमले की लागत पर सवाल उठाया। इस पर हेगसेथ न कहा कि यह मामला अभी जांच के दायरे में है और वह इसकी लगात पर टिप्पणी नहीं करेंगे। इसके अलावा डेमोक्रेट सांसद सारा जैकब्स ने रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मानसिक सेहत पर सवाल किया। इस सवाल पर पीट हेगसेथ और सारा जैकब्स के बीच तीखी बहस हुई। खबर है कि विपक्षी डेमोक्रेट्स सदस्यों ने हेगसेथ के खिलाफ हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में महाभियोग प्रस्ताव भी लाने का फैसला किया है। इस प्रस्ताव के आने के बाद ईरान जंग में ट्रंप और हेगसेथ की मुसीबतें बढ़ सकती है। हाउस ऑफ डेमोक्रेट्स ने 5 गंभीर आरोप लगाते हुए हेगसेथ के खिलाफ महाभियोग लाने का फैसला किया है। रक्षा मंत्री को कैबिनेट से हटाने के लिए सीनेट और हाउस में 2 तिहाई सांसदों की जरूरत होगी।
- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 2 May 2026

खाड़ी देशों में उभरते मतभेद


अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद से खाड़ी देशों में आपसी मतभेद तेजी से बढ़ते नजर आने लगे हैं। होर्मूज स्ट्रेट के बंद होने से स्थिति विस्फोटक होती जा रही है। इस रास्ते के बंद होने से खाड़ी के बड़े देश जिनकी अर्थव्यवस्था तेल के निर्यात पर निर्भर है वह खासे उत्तेजित हैं। इसका एक नतीजा संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का प्रमुख तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक और ओपेक प्लस से बाहर जाने का फैसला। यह फैसला ईरान जंग की वजह से ऐतिहासिक रूप से दुनियाभर में ऊर्जा को लेकर एक बड़ा संकट पैदा हुआ है और जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। यूएई ने कहा है कि यह फैसला उसकी दीर्घकालिक रणनीति इकोनॉमिक विजन और बदलती एनजी प्रोफाइल को दर्शाती है। यूएई के ऊर्जा मंत्री सुहैल मोहम्मद अल मजरूई ने कहा है कि इस समूहों के तहत किसी बाध्यता से मुक्त होने पर देश को ज्यादा लचीलापन मिलेगा। ओपेक को 60 साल बाद छोड़ने का फैसला यूएई ने अचानक नहीं लिया, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से पनप रहा असंतोष है। अबू धाबी को लगातार यह खटक रहा था कि सऊदी अरब ओपेक के जरिए तेल उत्पादन को नियंत्रित करता है और यूएई को अपनी क्षमता के हिसाब से ज्यादा तेल निकालने नहीं देता। जब यूएई ज्यादा उत्पादन करना चाहता था, तब सऊदी कम उत्पादन पर जोर देता रहा, जिससे दोनों देशों में तनाव बढ़ता चला गया। इस तनाव को हवा और तब मिली जब पाकिस्तान की भूमिका सामने आई। यूएई को पाकिस्तान का रवैया बिल्कुल पसंद नहीं आया, खासकर तब जब अमेरिका और ईरान के बीच वह मध्यस्थ बनने की कोशिश कर रहा था। एमएसटी फाइनेंशियल में ऊर्जा अनुसंधान के प्रमुख शाऊल कावर्निक ने कहा कि यह गठबंधन के अंत की शुरुआत हो सकती है। यूएई के जाने के साथ ओपेक अपनी क्षमता का लगभग 15 प्रतिशत खो देगा। इस फैसले को ओपेक के साथ-साथ इस गुट के सर्वेसर्वा माने जाने वाले सऊदी अरब के लिए झटका माना जा रहा है। यूएई का बाहर जाना अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक जीत माना जा रहा है जिन्होंने पहले ओपेक पर दुनिया का शोषण करने का आरोप लगाया था। जनवरी में उन्होंने सऊदी अरब और अन्य ओपेक देशों से तेल की कीमत कम करने को कहा था और टैरिफ लगाने की अपनी धमकी को भी दोहराया था। यूएई का ओपेक से अलग होने का निर्णय सिर्फ एक सदस्य देश का प्रस्थान नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक अहम मोड़ है। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, होर्मूज जलडमरूमध्य पर अनिश्चितता और वैश्विक मुद्रास्फीति पहले से ही तेल बाजार को अस्थिर बनाए हुए है। यूएई ओपेक का तीसरा बड़ा उत्पादक सदस्य देश था और समूह के उत्पादन में करीब 12 फीसदी का योगदान करता था। ऐसे में उसका बाहर निकलना ओपेक की आपूर्ति क्षमता को प्रभावित जरूर करेगा। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। अगर ओपेक की शर्तें से मुक्त यूएई वैश्विक तेल बाजार को अतिरिक्त आपूर्ति करता है तो इससे तेल की कीमतों में कमी आ सकती है। यह स्थिति भारत जैसे उन देशों के लिए विशेष तौर पर फायदेमंद है जो ऊर्जा के आयात पर ही निर्भर है। गौरतलब है कि भारत अपने ऊर्जा सुरक्षा संबंधी तथ्यों से निपटने के लिए लंबे समय से ओपेक देशों से तेल के उत्पादन में बढ़ोतरी करने की मांग करता रहा है। भारत का कुल तेल जरूरतों का लगभग 40 फीसदी हिस्सा ओपेक देशों से आता है। हालांकि यह देखते हुए कि वैश्विक ऊर्जा बाजार कभी स्थिर नहीं रहता, वह निरंतर भू-राजनीतिक, आर्थिक, पर्यावरणीय बदलावों से प्रभावित होता रहता है। सऊदी अरब के लिए अब बाकी ओपेक देशों को एकजुट रखना बड़ी चुनौती बन गया है। यूएई ने शुरुआत कर दी है, अब देखना होगा कि और कौन-कौन से देश इसके नक्शे-कदम पर चलते हैं। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 30 April 2026

पागलों की दुनिया : मुझे मरने का डर नहीं



यह कहना था अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर में एक फायरिंग की घटना के बाद। ट्रंप ने घटना के बाद सीबीएस न्यूज को दिए इंटरव्यू में बताया कि जब फायरिंग हुई तो मैं जमीन पर गिर गया और फर्स्ट लेडी भी। सिक्योरिटी फोर्सेस के तुरन्त एक्टिव होने पर ट्रंप ने कहा कि मैं देखना चाहता था कि आखिर हो क्या रहा है? ट्रंप से पूछा गया कि क्या आपको पता है कि आप शूटर के निशाने पर थे? इसके जवाब में उन्होंने कहा- मुझे नहीं पता। मैंने एक मैनिफेस्टो पढ़ा। वह रेडिकलाइज्ड है। वह एक क्रिश्चियन विश्वासी था और फिर वह एंटी क्रिश्चियन बन गया और उसमें बहुत बदलाव आया। व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर के दौरान हुई फायरिंग में निशाने पर ट्रंप और उनके अधिकारी ही थे। यह बात एक्टिंग यूएस अटार्नी जनरल टॉड ब्लेंच ने कही। संदिग्ध की पहचान 31 साल के कोल टॉमस एलन के रूप में की गई है। उधर गोलीबारी के मामले में गिरफ्तार संदिग्ध कोल एलन ने कथित घोषणा पत्र में कई गंभीर आरोप लगाए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एलन ने घटना से कुछ मिनट पहले अपने परिवार के एक सदस्य को एक कथित घोषणा पत्र भेजा था। जिसमें उसने अपने इरादों और विचारों का जिक्र किया। इस कथित दस्तावेज में एलन ने दावा किया कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन से जुड़े लोगों को निशाना बनाने की योजना बना रहा था। हालांकि उसने एफबीआई डायरेक्टर श्री पटेल को छोडने की बात भी कही। उसने लिखा कि प्रशासन के अधिकारियों को वह प्राथमिकता के आधार पर तथ्य बनाएगा, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि उसके शब्दों का पूरा अर्थ क्या है? घोषणा पत्र में एलन ने बेहद गंभीर भाषा का इस्तेमाल करते हुए कहा कि वह ऐसे लोगों को स्वीकार नहीं कर सकता जिन्हें वह अपराधी या देशद्रोही मानता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उसने कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग भी किया जिसमें उसने ट्रंप प्रशासन से जुड़े विवादों और आरोपों का जिक्र किया। उसने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी टिप्पणियां कीं और दावा किया कि आयोजन स्थल पर सुरक्षा का ध्यान मुख्य रूप से प्रदर्शनकारियों और सामान्य आगंतुकों पर था, न कि किसी संभावित खतरे पर। इस हादसे से यह तो साफ हो जाता है कि सिक्योरिटी की कमी थी। किसी हथियारबंद व्यक्ति का राष्ट्रपति के कार्यक्रम के इतने करीब पहुंचना भी बेहद गंभीर लापरवाही है। वहां ट्रंप ही नहीं, उनके प्रशासन से जुड़े सभी महत्वपूर्ण लोग मौजूद थे जो निशाना बन सकते थे। कथित हमलावर भी कोई अनपढ़, गंवार, भाड़े का हत्यारा नहीं है वह मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ा सम्मानजनक टीचर था। विडम्बना यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति पद जितना ताकतवर माना जाता है उससे जुड़े खतरे उतने ही बड़े हैं। अब्राहम लिंकन से लेकर जॉन एफ. कैनेडी तक अमेरिका के चार राष्ट्रपतियों की हत्या हो चुकी है। ट्रंप पर यह तीसरा असफल हमला है। संयोग या कुछ और? व्हाइट हाउस की स्पोक्समैन लेविट के बयान के बाद से सोशल मीडिया पर नई बहस छिड़ गई है। लोग हैरान हैं कि आखिर उन्होंने ऐसे शब्दों का इस्तेमाल क्यों किया जो बाद में हकीकत बन गई। हालांकि उनके समर्थकों का कहना है कि लेविट का मतलब ट्रंप की तीखी बयानबाजी से था, न कि असली गोलियों से। सोशल मीडिया में कुछ लोग इसे स्टेज्ड ड्रामा भी बता रहे हैं। उनका कहना है कि चारों तरफ से घिरे डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी जनता की सहानुभूति लेने के लिए यह ड्रामा करवाया है। सम्भव है कि इस घटना के बाद इस बार भी कुछ मोर्चे पर चुनौती झेल रहे ट्रंप प्रशासन को थोड़ी राहत मिल जाए। बाकी सत्य कभी निकलेगा या नहीं यह नहीं कहा जा सकता। ऐसी घटनाओं का सत्य शायद ही सामने आता है।
- अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 28 April 2026

डील होने की संभावना

पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम से उम्मीद जगी है कि अगले कुछ दिनों में अमेरिका-ईरान में कोई डील हो जाए और युद्ध भविष्य में होने से टल जाए। जिस तरह से ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची 48 घंटे में दो बार इस्लामाबाद गए, वहां से मस्कट (ओमान) गए और वहां से मास्को गए उससे तो लगता है कि ईरान ने डील की शर्तें तय कर ली हैं और ईरान भी अमेरिका से बातचीत करने को तैयार है। दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी थोड़ी नरमी दिखाई और युद्ध विराम को अनिश्चितकाल तक बढ़ा दिया और ईरान के प्रतिनिधिमंडल से इस्लामाबाद में अगले प्रतिनिधिमंडल को भेजने की इजाजत दी उससे साफ है कि ट्रंप इस युद्ध से हर हालत में बाहर निकलना चाहते हैं। वह जानते हैं कि वह यह  युद्ध हार चुके हैं। आगे लड़ने के लिए न तो उनमें मादा है और न ही युद्ध लड़ने के संसाधन? ट्रंप की एक बड़ी मजबूरी यह भी है कि उन्हें 2 मई तक अमेरिकी कांग्रेस (संसद) से ईरान युद्ध को जारी रखने के लिए स्वीकृति भी लेनी होगी। जोकि शायद मुश्किल हो। क्योंकि अमेरिका के 63 प्रतिशत नागरिक ट्रंप के इस युद्ध के खिलाफ हैं और वह नहीं चाहते कि अमेरिका इजरायल का युद्ध लड़े। इसके अलावा अमेरिकी सेना ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके पास  अब हथियारों का जखीरा आधा हो चुका है और यह वह किसी भविष्य इमरजेंसी के लिए रखना चाहता है। सो मुझे नहीं लग रहा कि ट्रंप में अब मादा है कि यह युद्ध जारी रखें। देखा जाए तो असहमति के भी दो-तीन मुद्दे ही बचे हैं। होर्मुज स्ट्रेट को खोलना, ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कंट्रोल और मिसाइलों को सीमित करना, होर्मुज पर टोल लेना? इत्यादि यही प्रमुख मुद्दे बचे हैं। ईरान के विदेश मंत्री के इतनी बार इस्लामाबाद के चक्कर लगाना यह संकेत देता है कि ईरान भी अब किसी समझौते को चाहता है। ट्रंप को अपने उकसावे वाले फिजूल बयान  बंद करने होंगे। खामखां वह उल्टे सीधे बयान देकर माहौल खराब करते हैं। दो दिन पहले हुए जानलेवा हमले का भी ट्रंप पर जरूर असर पड़ा होगा। सैन्य टकराव से दोनों पक्ष जितना हासिल कर सकते थे, कर लिया है। अमेरिका ने जिन तथ्यों को लेकर जंग छेड़ी थी वे अब भी दूर है और पता नहीं वह लड़ाई से इन्हें पूरा कर भी सकते हैं या नहीं? इसी तरह ईरान को भी अंदाजा होगा कि वह ट्रंप की जिद पर एक सीमा तक ही झुक सकता है। ऐसे में एक ही रास्ता बचा है शांति। तेल और नेचुरल गैस को लेकर इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की चेतावनी कि इनकी सप्लाई 2027 तक भी सामान्य नहीं होगी, जंग के गंभीर नतीजों का बस एक पहलू है। गतिरोध लंबा खिंचने से वैश्विक मंदी आ सकती है और इसकी सबसे ज्यादा कीमत आम आदमी को चुकानी पड़ती है। वैसे भी जंग में भी मरता तो आम आदमी है चाहे वह किसी भी देश का हो। इसलिए कुल मिलाकर डील हो जाए तो उसका सारी दुनिया स्वागत करेगी। देखें, यह चमत्कार क्या इस्लामाबाद कर पाएगा?

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 25 April 2026

हारा हुआ कैसे तय कर सकता है युद्ध की शर्तें?

सीजफायर की समय-सीमा अनिश्चितता समय बढ़ाने की घोषणा करते हुए ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेना पूरी तरह से तैयार है और युद्ध विराम केवल तब तक है जब तक चर्चा किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच जाती। इसे ईरान ने न केवल ठुकरा दिया, बल्कि उन्हें अमेरिका की कमजोरी बताया। ईरानी संसद के अध्यक्ष के सलाहकार मेहदी मोहम्मदी ने कड़े शब्दों में कहा कि युद्ध के मैदान में हारा देश अपनी शर्तें नहीं थोप सकता। पिछड़ने वाला देश कैसे शर्तें तय कर सकता है? उन्होंने लिखा, ट्रंप के युद्ध विराम विस्तार का कोई मतलब नहीं है। बंदरगाहों की घेराबंदी जारी रखना बमबारी करने से अलग नहीं है। कटु सत्य तो यह है कि ईरान युद्ध में अमेरिका के बुरी तरह से फ्लाप होने के सुबूत सामने आने लगे हैं। जंग में सफलता न दिलाने की वजह से अमेरिका में पिछले 25 दिनों में सेना के चार बड़े अफसरों को बर्खास्त कर दिया गया है। लिस्ट में ताजा नाम नेवल सेकेट्री जॉन फेलन का है। होर्मूज में ईरानी नाकाबंदी को ध्वस्त न कर पाने की वजह से पेंटागन ने केवल फेलन को बर्खास्त ही नहीं किया बल्कि फेलन से पहले आमी चीफ जनरल रैंडी, मेजर जनरल डेविड होंडले और मेजर जनरल विलियम ग्रीन जूनियर को बर्खास्त किया जा चुका है। फेलन राष्ट्रपति ट्रंप के बेहद करीबी अफसर माने जाते हैं। फेलन पर कमांड को दरकिनार करने और युद्ध में अपेक्षित सफलता नहीं दिलाने का आरोप है। हालांकि आधिकारिक बयान में कहा गया है कि फेलन ने खुद ही इस्तीफे की पेशकश की है। उधर फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक होर्मूज के बाहर अमेरिका नाकाबंदी करने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है। सेटकॉम के बयान के उलट 22 अप्रैल को 34 ईरानी जहाज होर्मूज से गुजर गए। इन जहाजों को अमेरिका रोक नहीं पाया। उधर सेटकॉम का कहना है कि उसने होर्मूज में 10 हजार सैनिक लगा रखे हैं। मंगलवार 21 अप्रैल को इस्लामाबाद में ईरान-अमेरिका के बीच शांति वार्ता को लेकर प्रस्तावित बैठक में ईरान ने शामिल होने से मना कर दिया। सीएनएन के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप ईरान जंग से बाहर निकलना चाहते हैं। इसकी एक वजह संभावित मिड टर्म इलेक्शन हैं। ट्रंप को लगता है कि मिड टर्म इलेक्शन तक अगर युद्ध जारी रहता है तो उनकी पार्टी को काफी ज्यादा नुकसान हो सकता है। इसलिए ट्रंप ने ईरान से बिना बात किए सीजफायर को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया है। होर्मूज अभी जल्द खुलने वाला भी नहीं है, बेशक ट्रंप कितना भी चाहें। अमेरिकी थिंक टैंक का मानना है कि होर्मूज स्ट्रेट के बिछी माइंस हटाने में छह महीने तक का समय लग सकता है। इससे तेल सप्लाई, वैश्विक व्यापार लंबे समय तक प्रभावित रहेगा। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम नहीं हुआ है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करे। संवर्धित यूरेनियम सौंप दे और होर्मूज को पूरी तरह खोल दे। दूसरी तरफ ईरान ने कहा है कि जब तक अमेरिका उसकी नाकाबंदी खत्म नहीं करेगा, वह बातचीत नहीं करेगा। जैसा मेहदी मोहम्मद ने कहा है हारे युद्ध में बुरी तरह फ्लाप हुए अमेरिका युद्ध की शर्तें कैसे तय कर सकता है?

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 23 April 2026

बंद-खुला-बंद-होर्मुज पर सस्पेंस


होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर पहुंच रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच पिछले करीब 50 दिनों से जारी तनाव के कारण शांति वार्ता खटाई में पड़ती दिख रही है। इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका में सक्रिय बना हुआ है। होर्मुज की ताजा तनातनी को देखते हुए पाकिस्तानी मध्यस्थता टीम वापस इस्लामाबाद लौट चुकी है। पाकिस्तान में पहले दौर की शांति वार्ता के बाद अमेरिका ने होर्मुज का ब्लॉकेड लागू कर दिया है। वहीं ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बताया है। समुद्र में ईरानी जहाजों तक को भी रोका जा रहा है और तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। दुनिया की नजर अब इस पर है कि इस टकराव का अगला कदम क्या होगा? सवाल यह भी है कि आखिर होर्मुज पर किसका राज है और आगे किसका राज चलेगा? ईरान और अमेरिका के बीच लगभग 40 दिनों तक भीषण युद्ध चला। इसके बाद बड़ी मुश्किल से सीजफायर का ऐलान किया गया और इस्लामाबाद में शांति वार्ता बुलाई गई। लेकिन यह बातचीत बेनतीजा रही। बातचीत फेल होने का सबसे बड़ा कारण होर्मुज रहा। होर्मुज पर किसका दबदबा रहेगा इसका फैसला नहीं हो सका। फिलहाल तो शांति वार्ता के बाद ईरान और अमेरिका के बीच होर्मुज पर कब्जे को लेकर सस्पेंस की आग धधक रही है। अमेरिका और ईरान आमने-सामने खड़े हैं। दुनिया में तेल के इस अहम रास्ते पर किसका कब्जा है, किसके हाथ में है? सवाल हर किसी को परेशान कर रहा है। दोनों खेमे अपने-अपने दावों पर अड़े हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्ती ने माहौल और गरमा दिया है। कई देशों की अर्थव्यवस्था इसी रास्ते पर टिकी हुई है। बता दें कि दुनिया की आधी से ज्यादा तेल सप्लाई इसी रास्ते पर निर्भर है। एक छोटी सी गलती भी ग्लोबल इकॉनामी को हिला सकती है। अमेरिका का ब्लॉकेड कितना कारगर साबित हो रहा है? या ईरान की धमकी में दम है? सस्पेंस हर घंटे बढ़ता जा रहा है। गुरुवार को ईरानी जहाज को अमेरिका ने होर्मुज से वापस लौटाया है इसके बाद तनाव चरम सीमा पर पहुंच गया है। सीजफायर के बावजूद अमेरिका की इस हरकत से ईरान का गुस्सा सातवें आसमान पर है। ईरान ने अमेरिका को जवाबी कार्रवाई की सख्त चेतावनी दी है। डर इसका है कि युद्ध विराम जो 23 अप्रैल को खत्म हो रहा है वह आगे बढ़ेगा या नहीं? होर्मुज के बंद होने से अब यह टकराव सिर्फ दो देशों का नहीं रहा। इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है। तेल बाजार में उथल-पुथल है, शिपिंग कंपनियां सतर्क हो गई हैं। हर देश चाहता है कि यह अहम रास्ता खुला रहे। लेकिन जमीन और समुद्र पर चल रही रणनीतिक चालें इस रास्ते को सबसे बड़ा फ्लैश पाइंट बना रहा है। ट्रंप ने रायटर्स को दिए एक और बयान में दावा किया कि ब्लॉकेड पूरी तरह लागू है और ईरान अब सामान्य व्यापार नहीं कर पा रहा है। सेटकॉम के अनुसार अब तक 10 जहाजों को वापस भेजा जा चुका है। इस बीच खबर यह भी आई है कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने ट्रंप को सुझाव दिया है कि अगर शांति वार्ता आगे बढ़ानी है तो होर्मुज से ब्लॉकेड समाप्त करना होगा। कहा जा रहा है कि ट्रंप ने कहाö मैं विचार करूंगा।
-अनिल नरेन्द्र