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Thursday, 2 July 2026

ट्रंप और मेलोनी के बीच बिगड़ते रिश्ते

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी से जुड़े कई पोस्ट सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं। इनमें से कुछ में तो ऐसा दिखाया गया है जैसे वो किसी ब्रेक-अप के बाद अपनी जिंदगी बदलने की कोशिश कर रही हों। एक एआई फोटो में उन्हें नए हेयरकट के साथ दिखाया गया है। एक अन्य तस्वीर में उन्हें सिंगल हॉलिडे बुक करते हुए दिखाया गया है। ये सारी तस्वीरें असली नहीं हैं, लेकिन उनका मजाक इसलिए बनाया जा रहा है क्योंकि मेलोनी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच खुले तौर पर विवाद अब सामने आ रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में ट्रंप और मेलोनी का रिश्ता कभी खुले हमलों तक गया, कभी भी निजी तानों तक और फिर थोड़ा ठीक भी हुआ लेकिन इन उठापटक से यूरोप की सबसे चर्चित राजनीतिक दोस्ती ठंडी पड़ गई। कुछ समय पहले तक लोग मेलोनी को ट्रंप की सहयोगी कहते थे। इसकी बानगी जनवरी 2025 में देखने को मिली जब ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह में उन्हें सबसे आगे बैठने की जगह मिली। समारोह में यह अहम जगह पाने वाली वह अकेली यूरोपीय नेता थीं। पिछले अप्रैल में मेलोनी व्हाइट हाउस गई थीं। वहां वह उस उद्देश्य से गई थीं ताकि यूरोपीय सामान पर लगे अमेरिकी ट्रेड टैरिफ को लेकर तनाव कम हो। लेकिन ट्रंप की जैसी आदत है, उनकी अनिश्चितता मेलोनी के लिए मुश्किल भरी साबित हुईं और उनकी साख को देश-विदेश दोनों जगह चोट पहुंची। ट्रंप और मेलोनी में पहली बड़ी दरार मार्च के आखिर में आई। इटली के रक्षा मंत्रालय ने अमेरिकी सैन्य जहाजों को सिसिली के सिगोनेला नाटो एयरबेस इस्तेमाल करने की इजाजत देने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि इसके लिए संसद की मंजूरी जरूरी है। इटली ने ये कदम इसलिए उठाया क्योंकि उनका कानून और जनता दोनों ही ईरान युद्ध के खिलाफ थे। यह विवाद और बढ़ गया। अप्रैल में ट्रंप ने टूथ सोशल पर पोप लियो (14वें) पर हमला करते लिखा, क्योंकि उन्होंने ईरान के खिलाफ युद्ध की चेतावनी व आलोचना की थी। ट्रंप ने उन्हें कमजोर बताया। कैथोलिक देश की नेता मेलोनी ने ट्रंप के बयान को अस्वीकार्य बताया। मेलोनी की सख्त प्रतिक्रिया ट्रंप को पसंद नहीं आई और उन्होंने इटली के अखबार कोरिएरे डेला सेरा से कहा: मैं हैरान हूं, मुझे लगा था कि उनमें हिम्मत है, लेकिन मैं गलत था। वह अब पहले जैसी नहीं रही और इटली भी पहले जैसा देश नहीं रहा। फ्रांस ने जी-7 सम्मेलन में ट्रंप और मेलोनी को बातचीत करते हुए देखा गया था। दोनों देशों के अधिकारियों ने इस बातचीत को सकारात्मक और सामान्य बताया। लेकिन कुछ ही दिनों बाद ट्रंप ने इतालवी चैनल को कहा मेलोनी ने समिट में उनसे फोटो खिंचवाने के लिए मिन्नत की थी। ट्रंप ने कहा कि वह मेरे साथ तस्वीर चाहती थीं, मैं नहीं लेता, लेकिन मुझे उन पर तरस आ गया। मेलोनी ने तुरंत जबाव दिया, उन्होंने वीडियो जारी कर ट्रंप की बात को पूरी तरह मनगढ़ंत बताया। उन्होंने कहा, मुझे नहीं पता कि अमेरिका के राष्ट्रपति अपने सहयोगियों के साथ ऐसा क्यों करते हैं। मैं बस इतना कह सकती हूं कि अफसोस है कि वह पश्चिम के दुश्मनों के खिलाफ ऐसी मजबूती नहीं दिखाते। लेकिन एक बात याद रखनी चाहिए, न मैं और न ही इटली किसी की मिन्नत करता है। इसके तुरंत बाद इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने अपनी प्रस्तावित अमेरिकी यात्रा रद्द कर दी। इटली के राष्ट्रपति सर्जियो मैटारेला ने मेलोनी को फोन कर उनका समर्थन किया। सरकार के सहयोगियों और सांसदों ने भी ट्रंप की टिप्पणियों को अपमानजनक बताया और माफी की मांग की। विपक्ष ने इसे पूरे देश का अपमान कहा। दूसरी तरफ ट्रंप ने फिर दोहराया कि मेलोनी ने बार-बार तस्वीर खिंचवाने की मांग की थी। मेलोनी पर यह भी आरोप लगाया कि वह अब दोबारा दोस्त बनने की कोशिश कर रही हैं। क्योंकि अमेरिका ने ईरान को सैन्य रूप से हरा दिया है। जैसे ही यह विवाद ठंडा पड़ता दिखा तो सैन्य ठिकानों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया। यह विवाद ईरान युद्ध में आपरेशन फ्यूरी के दौरान इटली के अमेरिकी एयरबेस को लेकर उठा। नाटो के महासचिव मार्क रुटे ने बताया कि लगभग 500 विमान इटली में अमेरिकन ठिकानों से ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में उड़ान भरी। लेकिन इटली को यह बात अच्छी नहीं लगी और उसके रक्षा मंत्रालय ने इसे गलत और भ्रामक बताया। मजेदार बात यह है कि दोनों ट्रंप और मेलोनी को जल्द ही अपने देश में चुनाव का सामना करना पड़ सकता है। इटली में आम चुनाव होने हैं तो अमेरिका में मिड टर्म चुनाव हैं। देखते हैं कि अमेरिका और इटली के रिश्ते सुधरते हैं या और बिगड़ते हैं।
- अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 30 June 2026

अलविदा अयातुल्ला अली खामेनेई

28 फरवरी इस साल अमेरिका-इजरायल द्वारा किए गए हमले में अयातुल्ला अली खामेनेई शहीद हो गए थे। उन्होंने किसी बंकर में छिपने की बजाय अपने दफ्तर में ही रहकर शहीद होना मंजूर किया ताकि उनकी कौम दुश्मनों से लोहा ले सके और उनकी शहादत हर देशवासी के लिए प्रेरणा बने। यही हुआ अयातुल्ला अली खामेनेई की शहादत ने ईरान की जनता में एक ऐसा जज्बा पैदा किया कि उसने दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका को अंततः झुकने पर मजबूर कर दिया। ईरान से अब खबर आई है कि उनकी मौत के तीन महीने बाद उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। यानी तीन महीने बाद सुपुर्द-ए-खाक होंगे खामेनेई। सरकार ने तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है और देश के कई बडे शहरों में उनका शोक जुलूस निकाला जाएगा। अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम बिदाई के लिए तीन दिन का कार्यक्रम 4 जुलाई से तय हुआ है। तेहरान, कौम और अशहद में होने वाले इस आयोजन में 2 करोड़ लोगों के जुटने की उम्मीद है। उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को ईरान का सुप्रीम लीडर बनाया गया है। यह पहली बार होगा जब 28 फरवरी के हमले के बाद अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई पब्लिक में दिखेंगे। ईरानी मीडिया के मुताबिक राजधानी तेहरान, कौम और अशहद में बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम होंगे। अकेले तेहरान में मुख्य कार्यक्रम 24 घंटे चलेगा। प्रशासन अनुमानित 2 करोड़ लोगों को संभालने व सुरक्षा को लेकर तैयारियां कर रहा है। यह घोषणा खामेनेई की मौत के कई दिनों बाद हुई। इस्लामिक परंपरा के मुताबिक दफनाने का काम तुरंत होना चाहिए था पर युद्ध के कारण और सुरक्षा के कारण इसे टालना पड़ा। अयातुल्ला अली खामेनेई 86 साल के थे। 28 फरवरी के हमले में वे शहीद हो गए और इसके साथ ईरान पर उनका 30 साल से ज्यादा पुराना शासन खत्म हो गया। वे देश के सबसे ताकतवर, दूरदृष्टि के नेता व रणनीतिकार थे। अयातुल्ला अली खामेनेई भारत के दोस्त थे। शहीद अयातुल्ला अली खामेनेई भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लेखन और उनके विचारों के बहुत बड़े प्रशंसक थे। उनके बीच का मुख्य संबंध व इतिहास रहा है। पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक और उपनिवेशवाद पर विचार खामेनेई ने नेहरू द्वारा लिखी आत्मकथा ग्लिम्पस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री की खुलकर प्रशंसा की। उन्होंने अपने भाषणों में अकसर इस बात का जिक्र किया कि कैसे नेहरू ने अपनी पुस्तकों में विस्तार से लिखा कि इंग्लैंड जैसे छोटे देश ने भारत जैसे विशाल देश के संसाधनों का दोहन कर खुद को कैसे मजबूत किया। खामेनेई के अनुसार यह केवल भारत की कहानी नहीं बल्कि उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद ताकतों की सच्चाई 2012 जब तेहरान में गुटनिरपेक्ष आंदोलन (एनएएम) शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री (डा. मनमोहन सिंह) ने अयातुल्ला अली खामेनेई से मुलाकात की थी तो खामेनेई ने स्वयं जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी को भावभीनी श्रद्धांजलि दी थी। अयातुल्ला अली खामेनेई का एक पुराना वीडियो भी दोबारा सामने आया है जिसमें वह जनता से अपील कर रहे हैं: नेहरू की पुस्तक ग्लिम्पस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री जरूर पढ़ें। उन्होंने विस्तार से समझाया है कि अंग्रेजों ने भारत में क्या-क्या किया। अयातुल्ला अली खामेनेई के जाने से केवल ईरान या इस्लामिक दुनिया को ही क्षति नहीं हुई पूरी दुनिया को उनके जाने का, खासकर जिस तरीके से उनकी शहादत हुई भारी नुकसान हुआ। एक नेक बंदा चला गया। हम शहीद अयातुल्ला अली खामेनेई को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देते हैं।
- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 27 June 2026

आसिम मुनीर की हत्या की साजिश?

जो लोग भी इजरायल और उसकी कुख्यात खुफिया एजेंसी मोसाद से वाकिफ हैं वह जानते हैं कि मोसाद राजनीतिक हत्याएं करवाने में माहिर है। इजरायल के इतिहास में ऐसे दर्जनों केस हैं जहां उसने अपने दुश्मनों के लीडरों को मौत के घाट उतारा है। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है, 28 फरवरी को जब अमेरिका-इजरायल ने ईरान पर हमला किया था तो सबसे पहला काम मोसाद ने यह किया था कि उसने ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई व ईरान टॉप मिलिट्री कमांडरों की हत्या कर दी थी। यह भी किसी से छिपा नहीं कि इजरायल अमेरिका-ईरान के युद्ध विराम से बहुत निराश है और इन एमओयू को तुड़वाने की पूरी कोशिश कर रहा है। मध्य पूर्व में कई देशों में रहस्यमय हमले हो रहे हैं, यह कौन कर रहा है पता नहीं चल रहा है। मुझे हैरानी नहीं हुई जब एक ताजा खबर आई कि मोसाद आसिम मुनीर और पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की जेनेवा में हत्या का प्लान बना रहा था। मैंने अपने 18 जून के सम्पादकीय में जिसका शीर्षक था ः कागजों पर दस्तखत ः जमीन पर धुआं की अंतिम लाइन में लिखा था ः अंत में इजरायल-मोसाद कुछ भी कर सकता है। समझौता तुड़वाने के लिए ईरानी लीडरशिप की हत्या भी करवा सकता है ताकि यह युद्ध विराम टूट जाए। मेरी भविष्यवाणी इस मायने में सफल हुई, हालांकि थोड़ा फर्क यह रहा कि मोसाद ईरानी लीडरों को तो निशाने पर नहीं ले पाया पर उसने पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल पर निशाना साधने की कोशिश जरूर की। बता दें कि ब्राजील के एक वरिष्ठ और जाने-माने पत्रकार पेपे एस्कोबार के इस सनसनीखेज दावे ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा कर दिया है। एस्कोबार ने दावा किया कि इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और स्विट्जरलैंड दौरे पर गए पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की हत्या की साजिश रची थी। एस्कोबार ने दावा किया कि यह प्लान तब फेल हो गया जब पाकिस्तान की सेना को बेहद विश्वसनीय खुफिया जानकारी मिली थी कि इजरायल के प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के निर्देश पर मोसाद जनरल आसिम मुनीर और पूरे पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल को निशाना बनाने की तैयारी कर दी थी। एस्कोबार ने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान ने ओमान के माध्यम से इजराइल को कड़ा संदेश भेजा था कि यदि पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल या जनरल आसिम मुनीर को नुकसान पहुंचाया गया तो उसका गंभीर जवाब दिया जाएगा। यह भी याद दिलाया गया कि पाकिस्तान एक परमाणु संपन्न देश है। इसका मतलब साफ था। इन दावों के सामने आते ही पाकिस्तान ने यह सिरे से खारिज कर दिया। एआरवाई न्यूज के चेयरमैन कामरान खान ने एक वरिष्ठ पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारी के हवाले से कहा कि यह रिपोर्ट पूरी तरह बकवास और निराधार है। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री शाहवाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर का स्विट्जरलैंड दौरा पूरी तरह सुरक्षित और बिना किसी सुरक्षा खतरे के पूरा हुआ। हत्या की साजिश का दावा वास्तविकता से कोई संबंध नहीं रखता और पूरी तरह काल्पनिक है। कटु सत्य तो यह है कि कोई भी एजेंसी ऐसी खबरों की कभी पुष्टि नहीं करता और उन्हें काल्पनिक ही बताता है। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 25 June 2026

वार्ता को दिया मीनाब 168 नाम

 
स्विट्जरलैंड में रविवार को अमेरिका के साथ शांति वार्ता के लिए ईरानी प्रतिनिधिमंडल को मीनाब 168 नाम दिया गया। मानना पड़ेगा कि नैरेटिव सेट करने में ईरानियों का जवाब नहीं है। वह कैसे अपने शहीदों को न तो भूलते हैं और न ही दुनिया को भूलने देते हैं। ईरान चाहता है कि पूरी दुनिया ईरान पर अमेरिका और इजरायल के अत्याचारों की दास्तां देखें और सुनें। ईरानी प्रेस टीवी के अनुसार ये नाम मीनाब स्कूल पर अमेरिकी-इजरायली टॉमहॉक मिसाइल हमले में मारी गई 168 स्कूल बच्चियों के सम्मान में दिया गया। इस स्कूल (मीनाब) पर 28 फरवरी को युद्ध के पहले दिन ही हमला हुआ था। दरअसल, ईरान पिछले तीन महीने से एक कैंपेन मीनाब 168 चला रहा है और इसे खूब प्रसारित कर रहा है। हर मंच पर ईरान उस कैंपेन के साथ नजर आता है। स्विट्जरलैंड और यहां तक की फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल में भी यह नजर आया। आइए इसके पीछे की कहानी भी जानते हैं... स्विट्जरलैंड में अमेरिका के साथ समझौता वार्ता से पहले ईरान ने फैसला लेकर पूरी दुनिया को चौंका दिया। दरअसल, ईरान और स्विट्जरलैंड में अमेरिका के साथ शांति समझौता वार्ता को मीनाब 168 नाम दिया है। अमेरिका से वार्ता के लिए ईरान का प्रतिनिधिमंडल उसी जहाज में पहुंचा जिस पर मीनाब 168 लिखा था। फीफा वर्ल्ड कप 2026 में बेल्जियम के खिलाफ मैच खेलने के लिए मैदान में उतरे ईरान के फुटबाल खिलाड़ियों की जसी पर मीनाब 168 लिखा था। हमले में मारी गई बच्चियों के सम्मान में ईरान दुनिया को उनकी शहादत को भूलने नहीं दे रहा है। पिछले तीन महीने से ईरान पूरी दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि लड़ाई के पहले दिन ही किस तरह अमेरिका-इजरायल ने मानवता की सारी हदें पार करते हुए निर्देष मीनाब स्कूल की बच्चियों को मार डाला। हमले में मारी गई 168 स्कूली बच्चियों के सम्मान में और उन्हें इंसाफ दिलाने के लिए मीनाब 168 अभियान चलाया जा रहा है। आईआरजीसी के कथित ठिकाने पर हमले की आड़ में मिसाइल एक बच्चों के स्कूल पर जा गिरी। अमेरिका इससे इंकार करता रहा। पहले तो उसने कहना शुरू कर दिया कि यह मिसाइल खुद ईरान ने गलती से मार दी पर फिर अमेरिकी मीडिया ने इसका पर्दाफाश करते हुए साबित किया कि यह मिसाइल अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल थी जो बहरीन के एयरबेस से मारी गई थी। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए बहरीन के इस अमेरिकी बेस को निशाना बनाया और तबाह किया। ईरानी प्रतिनिधिमंडल पहले राउंड में इस्लामाबाद पहुंचा था तो जिस विमान में वे आए थे उसकी कुर्सियों पर शहीद हुई बच्चियों के स्कूल बैग, किताबें, खाने के टिफिन इत्यादि रखे हुए थे ताकि सारी दुनिया इस हुए जुल्म को देख सके। ईरान चाहता है कि पूरी दुनिया ईरान पर अमेरिका और इजरायल के अत्याचारों की दास्तां सुने और देखें कि यह दोनों देश अपने फायदे के लिए किस हद तक जा सकते हैं। इसलिए फीफा वर्ल्ड कप 2026 में अमेरिकी शहर लॉसएंजिल्स में ईरान और बेल्जियम के बीच हुए मैच के दौरान कई ईरानी प्रशंसकों ने मीनाब हमले में मारे गए बच्चों को श्रद्धांजलि देने वाली तस्वीरें और जसी लहराई। ईरान के खिलाड़ी भी मीनाब 168 स्टिकर वाली जसी पहने दिखे। एक समर्थक ने एक स्टिकर दिखाया जिस पर एक स्कूल बैग बना था और उस पर 168 लिखा था। हैशटेग एंजल ऑफ मीनाब भी था और संदेश था कि इजरायल और अमेरिका के हमले में मारे गए मीनाब स्कूल के 168 बच्चों को याद रखें। बता दें कि भारत में अप्रैल में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में भी ईरान मीनाब 168 लिखे विमान में भारत आया था। अमेरिका से शांति वार्ता के लिए पाकिस्तान की यात्रा से पहले ईरानी संसद के स्पीकर बगेर गालिबफ ने ईरान के मिजाज का संकेत देते हुए समय पर तस्वीरें शेयर की जिसमें मीनाब हमले में मारी गई स्कूली बच्चियों की फोटो हवाई जहाज की सीटों पर चिपकी हुई थीं और वे उनके सामने खड़े होकर यानी कह रहे हों, इस फ्लाइट में मेरे सहयात्री। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 23 June 2026

शांति व अमन का दुश्मन नेतन्याहू

जब भी पिछले 80 वर्षें का दुनिया का इतिहास लिखा जाएगा उसमें दो नामों का विशेष उल्लेख होगा। जब भी मानवता के नरसंहार का वर्णन आएगा उसमें पहला नाम जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर का होगा और दूसरा नाम इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का होगा। नेतन्याहू इस सदी के नंबर वन विलेन बन कर उभरे हैं। जब भी मध्य-पूर्व में शांति की बात होती है तो उसमें नेतन्याहू कोई न कोई अड़ंगा लगा देते हैं। आप ताजा उदाहरण ही देख लें। अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता चल रही है, एमओयू भी साइन हो गया है पर नेतन्याहू अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे और अब तो वह अपने इकलौते मित्र देश अमेरिका को भी खुलकर गाली दे रहे हैं। यही वजह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कहना पड़ा कि तुम पागल हो चुके हो और मैं अगर तुम्हें न बचाता तो आज तुम जेल में होते। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजरायली कैबिनेट मंत्रियों को लताड़ते हुए कहा कि उन्हें उस ताकतवर सहयोगी पर हमला नहीं करना चाहिए क्योंकि अमेरिका के अलावा उसके साथ आज कोई नहीं है। वेंस ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व्यक्तिगत हमलों से परेशान हैं। उन्होंने ट्रंप को पूरी दुनिया में इजरायल के प्रति सहानुभूति रखने वाला एक मात्र राष्ट्राध्यक्ष कहा है, उन्हें यह भूलना नहीं चाहिए। आखिर नेतन्याहू क्यों किसी भी शांति समझौते का विरोध करते हैं? इसके पीछे नेतन्याहू का राजनीतिक अस्तित्व, सरवाइवल प्रमुख कारण है। नेतन्याहू अपनी गद्दी सुरक्षित रखने के लिए कभी गाजा पर हमले कर रहे हैं, कभी लेबनान पर तो कभी ईरान पर। उनके इस आचरण पर ट्रंप सख्ती से बोलते भी नहीं। इसके पीछे एक कारण हो सकता है एपस्टीन फाइल्स! दुनिया जानती है कि इजरायल के पास वह बदनाम, ब्लैकमेल करने वाली एपस्टीन फाइल्स है जिनमें ट्रंप समेत दर्जनों राष्ट्राध्यक्ष फंसे हुए हैं। यह बात ट्रंप समझते हैं तभी तो इजरायल को रोक नहीं पा रहे हैं। नेतन्याहू की एक मजबूरी है वह है उनके खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के केस। नेतन्याहू के खिलाफ आपराधिक और दीवानी मामलों के साथ नियमित अदालती कार्यवाही चल  रही है। नेतन्याहू ने इसे आगे बढ़ने से यह कहकर रोक रखा है कि इजरायल इस समय युद्ध लड़ रहा है और यह पहली प्राथमिकता है, इसलिए इसे फिलहाल टाला जाए। नेतन्याहू इससे इतने परेशान हैं कि उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप से बाकायदा इजरायल के राष्ट्रपति से गुजरिश की थी कि नेतन्याहू के खिलाफ केसों को खत्म कर दें, वह माफी दे दें पर इजरायली राष्ट्रपति नहीं माने। इन केसों से बचने के लिए और संभावित जेल की सजा से बचने के लिए नेतन्याहू कहीं न कहीं लड़ाई जारी रखते हैं। अब जब अमेरिका-ईरान में शांति वार्ता जेनेवा में चल रही है और एमओयू पर आगे बातचीत चल रही है। नेतन्याहू ने इसमें भाजी मारने के लिए लेबनान पर युद्ध छेड़ रखा है। नेतन्याहू का तो अब इजरायल के अंदर भी विरोध होना शुरू हो गया है। इसी साल के अंत में इजरायल में आम चुनाव होने हैं जिसमें नेतन्याहू की सरकार जा सकती है। बेंजामिन नेतन्याहू पर पिछले कई वर्षें से रिश्वत खोरी, धोखाधड़ी और विश्वासघात के गंभीर आरोप लगे हैं। इजरायल के इतिहास में नेतन्याहू पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो पद पर रहते हुए अदालती कार्यवाही का सामना कर रहे हैं। फरवरी के अंत में ईरान के साथ संघर्ष चरम पर था और इजरायल-अमेरिका एयर स्ट्राइक के बाद नेतन्याहू ने देश में इमरजेंसी लगा दी थी। इस दौरान सुरक्षा कारणों से अदालती कार्यवाही को भी टाल दिया गया था और यह अब भी टाली जा रही है। जब तक इजरायल किसी से लड़ाई बंद नहीं करता। नेतन्याहू इसी बहाने अदालती कार्यवाही टालते रहेंगे। जैसे मैंने कहा कि दिलचस्प बात यह भी है कि डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में इजरायली राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग से नेतन्याहू को माफी देने की वकालत की थी। हर्जोग ने स्पष्ट किया कि इजरायल एक कानून से चलने वाला संप्रभु राष्ट्र है और वह बिना किसी बाहरी दबाव के अपने न्यायिक फैसले खुद लेगा।  

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 20 June 2026

बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

करीब 4 महीने तक चले अमेरिका-ईरान के युद्ध के बाद समझौते पर सहमति बनी है। इस चार महीने चले संघर्ष में कौन जीता, कौन हारा? हमें तो लगता है कि इस युद्ध में ईरान की भव्य जीत हुई है। यह हम इसलिए कह रहे हैं कि जिन उद्देश्यों को लेकर अमेरिका-इजरायल ने मिलकर 28 फरवरी को युद्ध शुरू किया था उसमें से कोई भी उद्देश्य वह पूरा नहीं कर सका और अंत में तेरे कूचे से हम बे-आबरू होकर निकले। अमेरिका-इजरायल ने अपने पहले ही हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को शहीद कर दिया। उसी दिन ट्रंप ने कहा- ईरान के महान लोगों, आपकी आजादी का समय आ गया है... जब हम अपना काम पूरा कर लेंगे तो आप अपनी सरकार पर कब्जा कर लीजिए यानी हम रेजीम चेंज कर देंगे। ताकि ईरान में वह रेजीम बदल सके? एक उद्देश्य था ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल कार्यक्रम को समाप्त करना। इसमें ईरान के एनरिच्ड यूरेनियम पर भी कब्जा करना था या उसे खत्म करना था। न तो ईरान में रेजीम चेंज हो सकी, न परमाणु कार्यक्रम बंद हुआ और न ही मिसाइल कार्यक्रम पर पाबंदी ही लगा सके। अब बात करते हैं हेर्मुज स्ट्रेट को खोलने की। पहली बात तो 28 फरवरी से पहले होर्मुज खुला हुआ था कभी भी बंद नहीं था। उल्टा आपने ईरान को एक ऐसा हथियार दे दिया जिसके बारे में उसने पहले कभी भी नहीं सोचा होगा। अब ईरान और ओमान मिलकर होर्मुज स्ट्रेट को अपनी मिल्कियत मान रहे हैं और हर गुजरते जहाज से सर्विस चार्ज ले रहे हैं। यह थे प्रमुख उद्देश्य जिनको लेकर अमेरिका-इजरायल ने 28 फरवरी से हमले शुरू किए थे।  अब ट्रंप खुद देख सकते हैं कि इनकी प्रवृत्ति में इन्हें कितनी सफलता मिली। ईरान की मुकम्मल जीत हुई। अब बात करते हैं अमेरिका को इस अभियान की कितनी भारी कीमत उठानी पड़ी। उनके गल्फ राष्ट्रों में 14 बेस तबाह हो गए। 40 से ज्यादा लड़ाकू विमान नष्ट या डेमैज हो गए, राडार और एयर डिफेंस सिस्टम तबाह हो गए। अमेरिका ने ईरान जंग में अब तक 113 बिलियन डॉलर यानी 10 लाख करोड़ रुपए स्वाह कर दिए। ऐसा नहीं कि ईरान को इसकी कीमत चुकानी नहीं पड़ी। ईरान सरकार के मुताबिक हमलों के पहले 40 दिनों में उन्हें 270 बिलियन डॉलर यानी करीब 25 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। 1 लाख 22 हजार इमारतें तबाह हुई हैं। 3 अप्रैल 2026 तक ईरान के 307 अस्पताल बर्बाद हुए। दवाओं की कीमतें 50 प्रतिशत तक बढ़ गई, जिससे 60 लाख से ज्यादा मरीज प्रभावित हुए। मिनाब के बच्चों के स्कूल पर सीधा हमला हुआ जिसमें 160 से ज्यादा लोग मारे गए जिनमें 130 से ज्यादा छोटी बच्चियां शहीद हुईं। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत दर्जनों टाप के लीडरशिप शहीद हो गई। इस लड़ाई में गल्फ के अन्य देश भी इसकी चपेट में आ गए। यूएई, कतर, सउदी, बहरीन, इराक इत्यादि बीच में फंस गए। इस  जंग में निर्दोष लोगों को भी भारी कीमत चुकानी पड़ी। अनुमान है कि जंग में 7000 से ज्यादा निर्दोष सैनिक मारे गए और 40 हजार से ज्यादा लोग घायल हुए। ईरान ने साबित कर दिया कि वे अमेरिका-इजरायल के सामने झुकने वाला नहीं है। ट्रंप बड़े गर्व से कह रहे हैं कि अब ईरान परमाणु बम कभी नहीं बन सकेगा। उन्हें हम याद करवाना चाहते हैं कि ईरान ने कभी परमाणु बम बना ही नहीं था। शहीद अयातुल्लाह अली खामेनेई ने बकायदा एक फतवा जारी किया था कि इस्लाम में ऐसा हथियार बनाना मना है जिसमें निर्दोष लोग मारे जाएं। ट्रंप अब अपनी जीत दिखाने के चलते ही कुछ भी कहें पर सारी दुनिया जानती है कि आप की हार हुई है। आपने अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाया है और आप बड़े बे-आबरू होकर ईरान के कूचे से निकले हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 18 June 2026

कागजों पर दस्तखत: जमीन पर धुआं

दुनिया ने राहत की सांस ली जब यह घोषणा हुई कि अमेरिका-ईरान युद्ध में युद्ध बंदी हो गई है। पर मैं इसे सिर्फ युद्ध विराम ही कहता हूं, यह जंग की समाप्ति नहीं मानी जा सकती क्योंकि अभी सही मायनों में तो दोनों तरफों की शर्तें माननी बची हैं। फिलहाल तो इससे सिर्फ  अमेरिका और ईरान के बीच बमबारी रुकी है। जंग रोकने के लिए अभी बहुत से पेंच फंसे हैं। मैं सबसे पहले अयातुल्लाह मोजतबा खामेनेई, राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, विदेश मंत्री अब्बास अरागची और स्पीकर बागेर गालिबफ को बधाई देना चाहता हूं कि युद्ध में भारी पड़ने के बावजूद उन्होंने इस युद्ध विराम (सीजफायर) को रोकने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। मैं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इसके लिए बधाई नहीं देना चाहता क्योंकि उन्होंने ही यह जंग शुरू की थी। जिसे बिना वजह जंग को शुरू किया था उसमें युद्ध विराम करके उन्होंने अपनी जान ही छुड़ाई है, किसी पर एहसान नहीं किया। उनके समर्थक उपराष्ट्रपति जेडी वेन्स कह रहे हैं कि ट्रंप अब नोबल पुरस्कार के हकदार हैं? क्यों भाई ! कैसे हुए हकदार? पहले शुरू करो, फिर पिटो और अब बिना शर्तों के बमबारी रोकने की घोषणा करो? यह जो एमओयू पर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं वह कितने कारगर सिद्ध होते हैं यह देखना बाकी है क्योंकि सबसे बड़ा पेंच तो नेतन्याहू बने हुए हैं। इजरायल ने साफ घोषणा कर दी है कि वह इस समझौते को नहीं मानता और न ही वह लेबनान पर लड़ाई बंद करेगा। जबकि ईरान की शर्तों पर यह शामिल है। ट्रंप की धमकियों के बावजूद, गाली-गलौच की परवाह न करते हुए इजरायल अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है और इस पूरी कोशिश में लगा हुआ है कि यह समझौता न हों। ईरान ने 14 बिंदुओं की मांग रखी है। ट्रंप ने भी दो बड़ी शर्तें रखी हैं। ईरान ने मांग की है कि शांति समझौते से पहले 24 अरब डालर की जब्त संपत्ति अमेरिका ईरान को दे। इस राशि का आधा हिस्सा यानी 12 अरब डालर बातचीत शुरू होने से पहले ही ईरान को दी जाए। वहीं अमेरिका ने इस दावे पर अलग रुख अपनाया है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरान को किसी प्रकार की वित्तीय राहत तभी मिलेगी जब वह समझौते के तहत अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी विवाद है। बेशक ईरान ने होर्मुज को खोल दिया है पर अभी सिर्फ तय रास्तों से ही समुद्री जहाजों का आना शुरू हुआ है। होर्मुज को पूरी तरह से खोलने में समय लगेगा क्योंकि ईरान ने होर्मुज में बारुदी सुरंगें बिछा रखी हैं। जिन्हें हटाने में समय लग सकता है। ईरान हर जहाज से टोल भी वसूल कर रहा है। जिसे कर सर्विस चार्ज कह रहा है। अमेरिका ऐसा करने पर ऐतराज कर रहा है। खैर, होर्मुज के खुलने से पूरी दुनिया ने राहत की सांस जरूर ली है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और एनज्डि यूरोनियम के मुद्दे पर भी अभी सहमति बननी बाकी है। ईरान द्वारा उसके मिसाइल कार्यक्रम पर भी अमेरिका और इजरायल को आपत्ति है। इस मुद्दे पर दोनों पक्ष 60 दिनों की बातचीत में कोई निर्णय करेंगे। ईरान के उपविदेश मंत्री काजेम धरीबाबादी ने तस्लीन न्यूज एजेंसी से कहा कि अंतिम समझौते को लेकर अगले 6ˆ दिनों के भीतर बातचीत जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका अपने वादों पर किस हद तक टिका रहता है और पूरा करता है? ई&रान की प्रमुख मार्गों में सैन्य गतिविधियों को रोकना यानी की हर जंग को पूरी तरह रोकना, आर्थिक नाकाबंदी समाप्त करना और विदेशों में जमे हुए ईरानी फंडस को जारी करना शामिल है। समझौते में लेबनान में युद्ध विराम का भी प्रावधान शामिल है। वित्तीय मुद्दों पर मतभेदों के बावजूद व्यापक समझौते को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली हैं। ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, फ्रांस और भारत ने इसका स्वागत किया है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य मध्य-पूर्व में स्थायी शांति स्थापित करना है। ऐसे में अगर समझौता सफल रहता है तो वैश्विक बाजारों को भी बड़ी राहत मिल सकती है। बस यह टिका रहे? अंत में इजरायल-मोसाद कुछ भी कर सकता है। ईरानी लीडरशिप की हत्या भी करवा सकता है ताकि यह युद्ध विराम टूट जाए। 

-अनिल नरेन्द्र