Anil Narendra Blog
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Saturday, 9 May 2026
ईरान ने खाड़ी देशों पर हमला क्यों किया?
Thursday, 7 May 2026
मिनाब स्कूल पर हमले पर पेंटागन की चुप्पी
पूर्व शीर्ष सैन्य वकील समेत अमेरिका के पांच पूर्व अधिकारियों ने इस साल की शुरुआत में ईरान के एक स्कूल पर हुए घातक हमले में संभावित अमेरिकी भूमिका को स्वीकार न रकने पर पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय) की आलोचना की है। इनमें से कुछ ने कहा कि इतने लंबे समय बाद भी हमले की बुनियादी जानकारी तक जारी न करना बेहद असामान्य है। ईरानी अधिकारियों के मुताबिक 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल युद्ध की शुरुआती कार्रवाई के दौरान मिनाब में एक प्राइमरी स्कूल पर मिसाइल गिरी। जिसमें करीब 110 बच्चे समेत 168 लोगों की मौत हुई। इसके बाद बीते दो महीनों में पेंटागन ने सिर्फ इतना कहा है कि इस घटना की जांच जारी है। मार्च की शुरुआत में अमेरिकी मीडिया ने खबर दी थी कि अमेरिकी सैन्य जांचकर्ताओं का मानना है कि शायद अमेरिकी बल अनजाने में स्कूल पर हमले के लिए जिम्मेदार थे, लेकिन वे अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंचे थे। बीबीसी ने इस हमले की पारदर्शिता की कमी के आरोपों पर कई सवाल पूछे, जिस पर पेंटागन के एक अधिकारी ने कहा, इस घटना की जांच जारी है। लेफ्टिनेंट कर्नल रेचल ई वेनलैंडिंगम कहती हैं कि अमेरिका की मौजूदा स्थिति सामान्य प्रतिक्रिया से साफ तौर पर अलग है। वैनलैंडिंगम अमेरिकी वायुसेना में जज एडवोकेट जनरल रह चुकी हैं। उन्होंने बताया कि पिछली सरकारों ने कम से कम युद्ध कानून के प्रति निष्ठा और प्रतिबद्धता दिखाई थी। मौजूदा प्रशासन के बयानों में जबावदेही की प्रतिबद्धता गायब है। सबसे अहम यह सुनिश्चित करना भी कि ऐसा दोबारा न हो। राष्ट्रपति ट्रंप ने 7 मार्च को कहा था कि उनके विचार में मिनाब हमले के लिए ईरान जिम्मेदार है, लेकिन उन्होंने कोई सुबूत नहीं दिया। कुछ दिन बाद जब उनसे मिनाब स्कूल के पास सैन्य अड्डे पर अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल गिरने का वीडियो दिखाए जाने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहाः मैंने यह नहीं देखा। साथ ही ट्रंप ने बिना किसी सुबूत दावा किया कि ईरान के पास भी टॉमहॉक मिसाइलें थीं। 11 मार्च को जब उनसे उन खबरों के बारे में पूछा गया जिसमें कहा गया था कि शुरुआती सैन्य जांच में पाया गया कि अमेरिका ने स्कूल पर हमला किया था तो ट्रंप ने कहा मुझे इसके बारे में नहीं पता। अमेरिका के रक्षामंत्री पीटहेगसेथ से 4 मार्च को बीबीसी ने इस हमले पर सवाल किया था तो उन्होंने कहा, मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि हम इसकी जांच कर रहे हैं। यही नहीं अमेरिकी रक्षा विभाग ने इस हमले पर कई सवालों के जवाब देने से इंकार कर दिया। पिछले महीने बीबीसी ने स्वतंत्र रूप से हमले की वीडियो की पुष्टि की थी जिसमें स्कूल के पास ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के अड्डे पर अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल गिरती दिख रही थी। पेंटागन के एक वरिष्ठ पूर्व सलाहकार वेस ब्रायंट ने बीबीसी से कहा कि शुरुआती सैन्य जांच आमतौर पर दो बातें तय करने के लिए होती है। पहली, क्या नागरिक क्षति वास्तव में हुई? दूसरी क्या उस समय अमेरिका उस इलाके में सक्रिय था या नहीं? जब दोनों शर्तें पूरी हो जाती हैं, तभी औपचारिक जांच शुरू की जाती है। प्रक्रिया के लिहाज से यह और भी साफ संकेत देता है कि वे पहले से जानते हैं कि वह अमेरिका की वजह से हुआ नहीं तो वे जांच नहीं कर रहे होते। वे बस इसे स्वीकार नहीं करना चाहते या इस पर बोलना नहीं चाहते। पिछले साल अमेरिका के रक्षा विभाग ने नौकरियों की कटौती की थी, उसमें ब्रायंट भी शामिल थे। अमेरिका स्वीकार करे या न करे उसने मानवता का कत्ल किया है जिसे कभी माफ नहीं किया जा सकता।
-अनिल नरेन्द्र
Tuesday, 5 May 2026
आप और ट्रंप लगातार झूठ बोल रहे हैं
Saturday, 2 May 2026
खाड़ी देशों में उभरते मतभेद
Thursday, 30 April 2026
पागलों की दुनिया : मुझे मरने का डर नहीं
Tuesday, 28 April 2026
डील होने की संभावना
पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम से उम्मीद जगी है कि अगले कुछ दिनों में अमेरिका-ईरान में कोई डील हो जाए और युद्ध भविष्य में होने से टल जाए। जिस तरह से ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची 48 घंटे में दो बार इस्लामाबाद गए, वहां से मस्कट (ओमान) गए और वहां से मास्को गए उससे तो लगता है कि ईरान ने डील की शर्तें तय कर ली हैं और ईरान भी अमेरिका से बातचीत करने को तैयार है। दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी थोड़ी नरमी दिखाई और युद्ध विराम को अनिश्चितकाल तक बढ़ा दिया और ईरान के प्रतिनिधिमंडल से इस्लामाबाद में अगले प्रतिनिधिमंडल को भेजने की इजाजत दी उससे साफ है कि ट्रंप इस युद्ध से हर हालत में बाहर निकलना चाहते हैं। वह जानते हैं कि वह यह युद्ध हार चुके हैं। आगे लड़ने के लिए न तो उनमें मादा है और न ही युद्ध लड़ने के संसाधन? ट्रंप की एक बड़ी मजबूरी यह भी है कि उन्हें 2 मई तक अमेरिकी कांग्रेस (संसद) से ईरान युद्ध को जारी रखने के लिए स्वीकृति भी लेनी होगी। जोकि शायद मुश्किल हो। क्योंकि अमेरिका के 63 प्रतिशत नागरिक ट्रंप के इस युद्ध के खिलाफ हैं और वह नहीं चाहते कि अमेरिका इजरायल का युद्ध लड़े। इसके अलावा अमेरिकी सेना ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके पास अब हथियारों का जखीरा आधा हो चुका है और यह वह किसी भविष्य इमरजेंसी के लिए रखना चाहता है। सो मुझे नहीं लग रहा कि ट्रंप में अब मादा है कि यह युद्ध जारी रखें। देखा जाए तो असहमति के भी दो-तीन मुद्दे ही बचे हैं। होर्मुज स्ट्रेट को खोलना, ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कंट्रोल और मिसाइलों को सीमित करना, होर्मुज पर टोल लेना? इत्यादि यही प्रमुख मुद्दे बचे हैं। ईरान के विदेश मंत्री के इतनी बार इस्लामाबाद के चक्कर लगाना यह संकेत देता है कि ईरान भी अब किसी समझौते को चाहता है। ट्रंप को अपने उकसावे वाले फिजूल बयान बंद करने होंगे। खामखां वह उल्टे सीधे बयान देकर माहौल खराब करते हैं। दो दिन पहले हुए जानलेवा हमले का भी ट्रंप पर जरूर असर पड़ा होगा। सैन्य टकराव से दोनों पक्ष जितना हासिल कर सकते थे, कर लिया है। अमेरिका ने जिन तथ्यों को लेकर जंग छेड़ी थी वे अब भी दूर है और पता नहीं वह लड़ाई से इन्हें पूरा कर भी सकते हैं या नहीं? इसी तरह ईरान को भी अंदाजा होगा कि वह ट्रंप की जिद पर एक सीमा तक ही झुक सकता है। ऐसे में एक ही रास्ता बचा है शांति। तेल और नेचुरल गैस को लेकर इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की चेतावनी कि इनकी सप्लाई 2027 तक भी सामान्य नहीं होगी, जंग के गंभीर नतीजों का बस एक पहलू है। गतिरोध लंबा खिंचने से वैश्विक मंदी आ सकती है और इसकी सबसे ज्यादा कीमत आम आदमी को चुकानी पड़ती है। वैसे भी जंग में भी मरता तो आम आदमी है चाहे वह किसी भी देश का हो। इसलिए कुल मिलाकर डील हो जाए तो उसका सारी दुनिया स्वागत करेगी। देखें, यह चमत्कार क्या इस्लामाबाद कर पाएगा?
-अनिल नरेन्द्र
Saturday, 25 April 2026
हारा हुआ कैसे तय कर सकता है युद्ध की शर्तें?
सीजफायर की समय-सीमा अनिश्चितता समय बढ़ाने की घोषणा करते हुए ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेना पूरी तरह से तैयार है और युद्ध विराम केवल तब तक है जब तक चर्चा किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच जाती। इसे ईरान ने न केवल ठुकरा दिया, बल्कि उन्हें अमेरिका की कमजोरी बताया। ईरानी संसद के अध्यक्ष के सलाहकार मेहदी मोहम्मदी ने कड़े शब्दों में कहा कि युद्ध के मैदान में हारा देश अपनी शर्तें नहीं थोप सकता। पिछड़ने वाला देश कैसे शर्तें तय कर सकता है? उन्होंने लिखा, ट्रंप के युद्ध विराम विस्तार का कोई मतलब नहीं है। बंदरगाहों की घेराबंदी जारी रखना बमबारी करने से अलग नहीं है। कटु सत्य तो यह है कि ईरान युद्ध में अमेरिका के बुरी तरह से फ्लाप होने के सुबूत सामने आने लगे हैं। जंग में सफलता न दिलाने की वजह से अमेरिका में पिछले 25 दिनों में सेना के चार बड़े अफसरों को बर्खास्त कर दिया गया है। लिस्ट में ताजा नाम नेवल सेकेट्री जॉन फेलन का है। होर्मूज में ईरानी नाकाबंदी को ध्वस्त न कर पाने की वजह से पेंटागन ने केवल फेलन को बर्खास्त ही नहीं किया बल्कि फेलन से पहले आमी चीफ जनरल रैंडी, मेजर जनरल डेविड होंडले और मेजर जनरल विलियम ग्रीन जूनियर को बर्खास्त किया जा चुका है। फेलन राष्ट्रपति ट्रंप के बेहद करीबी अफसर माने जाते हैं। फेलन पर कमांड को दरकिनार करने और युद्ध में अपेक्षित सफलता नहीं दिलाने का आरोप है। हालांकि आधिकारिक बयान में कहा गया है कि फेलन ने खुद ही इस्तीफे की पेशकश की है। उधर फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक होर्मूज के बाहर अमेरिका नाकाबंदी करने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है। सेटकॉम के बयान के उलट 22 अप्रैल को 34 ईरानी जहाज होर्मूज से गुजर गए। इन जहाजों को अमेरिका रोक नहीं पाया। उधर सेटकॉम का कहना है कि उसने होर्मूज में 10 हजार सैनिक लगा रखे हैं। मंगलवार 21 अप्रैल को इस्लामाबाद में ईरान-अमेरिका के बीच शांति वार्ता को लेकर प्रस्तावित बैठक में ईरान ने शामिल होने से मना कर दिया। सीएनएन के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप ईरान जंग से बाहर निकलना चाहते हैं। इसकी एक वजह संभावित मिड टर्म इलेक्शन हैं। ट्रंप को लगता है कि मिड टर्म इलेक्शन तक अगर युद्ध जारी रहता है तो उनकी पार्टी को काफी ज्यादा नुकसान हो सकता है। इसलिए ट्रंप ने ईरान से बिना बात किए सीजफायर को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया है। होर्मूज अभी जल्द खुलने वाला भी नहीं है, बेशक ट्रंप कितना भी चाहें। अमेरिकी थिंक टैंक का मानना है कि होर्मूज स्ट्रेट के बिछी माइंस हटाने में छह महीने तक का समय लग सकता है। इससे तेल सप्लाई, वैश्विक व्यापार लंबे समय तक प्रभावित रहेगा। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम नहीं हुआ है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करे। संवर्धित यूरेनियम सौंप दे और होर्मूज को पूरी तरह खोल दे। दूसरी तरफ ईरान ने कहा है कि जब तक अमेरिका उसकी नाकाबंदी खत्म नहीं करेगा, वह बातचीत नहीं करेगा। जैसा मेहदी मोहम्मद ने कहा है हारे युद्ध में बुरी तरह फ्लाप हुए अमेरिका युद्ध की शर्तें कैसे तय कर सकता है?
-अनिल नरेन्द्र