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Saturday, 19 September 2026

मक्का में हमला: लक्ष्मण रेखा लांघी


पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव पूरी दुनिया के लिए खतरे का संकेत है। यह युद्ध अब ऐसे स्टेज पर पहुंच गया है जहां अगर इस पर रोक नहीं लगी तो अनर्थ हो सकता है। सऊदी अरब ने दावा किया है कि ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोहियों ने इस्लाम के सबसे पवित्र शहर पर हमला करने की कोशिश की। सऊदी अरब ने ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों पर मक्का की ओर ड्रोन भेजने की कोशिश का आरोप लगाया है। सऊदी अरब ने मक्का में हमले को अपनी रेड लाइन बताया है। लेकिन हूती विद्रोहियों ने हमले से इंकार किया है। कहा, हमने कोई ऐसा हमला नहीं किया है। सऊदी अरब वही पुराना घिसा-पिटा इल्जाम हम पर लगा रहा है। हूती विद्रोहियों की समाचार एजेंसी साबा के मुताबिक संगठन से मक्का या अन्य किसी पवित्र स्थलों को कोई खतरा नहीं है। सऊदी अधिकारियों के मुताबिक ड्रोन को मक्का के एयर स्पेस में प्रवेश करने से पहले ही नष्ट कर दिया गया। सऊदी अरब ने मंगलवार को मक्का और देश के दूसरे सबसे बड़े शहर जेद्दाह समेत कई इलाकों के लिए सुरक्षा एलर्ट जारी किया। मक्का बता दें वह शहर है जहां मुसलमानों के लिए पवित्र धार्मिक स्थल काबा मौजूद है। काबा की तरफ ही मुंह करके दुनिया भर का मुसलमान रोजाना पांच वक्त की नमाज अदा करता है। यह ही वजह है कि 57 से ज्यादा मुस्लिम देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले आर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन ने भी पवित्र स्थलों की पवित्रता के उल्लंघन की कोशिश की निंदा की है। मक्का ड्रोन विवाद के बीच हूती सैन्य प्रवक्ता याहया सारी ने एक्स पर दावा किया कि पिछले 24 घंटे में सऊदी अरब के लड़ाकू विमानों ने यमन के 5 प्रांतों में 52 हवाई हमले किए हैं। एफ-15 और टाइफून लड़ाकू विमानों ने ताइज, अलजौफ, अलबेद, सादा और अमरान में हमले किए। स्कूलों, पुलों, सड़कों और दूसरे नागरिक ढांचों को निशाना गया गया। हूती समूह ने इस हमलों का जवाब देने की चेतावनी भी दी है। चूंकि हूतियों ने मक्का को निशाना बनाने से इंकार किया है। इसलिए इस घटना की जांच जरूरी है। अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान भी ऐसी परिस्थितियां बन चुकी हैं। इस पूरे क्षेत्र में ऐसी ताकतें मौजूद हैं जो संघर्ष को बढ़ाए रखना चाहती हैं। ऐसे में किसी भी तरह के गलत आकलन का परिणाम भयावह हो सकता है। ध्यान रहे कि यमन के करीब 20 प्रतिशत इलाके में हूतियों का कब्जा है। इनके संगठन का नाम अंसारुल्लाह अर्थात अल्लाह के मददगार हैं और यह शिया बहुल संगठन है और यमन में अपना अलग हिस्सा मांग रहा है। अमेरिका इस संगठन को आतंकी मानता है लेकिन भारत सहित ज्यादातर मुस्लिम मुल्क भी इसे आतंकी नहीं मानते हैं। हूतियों को तत्काल काबू में करने की क्षमता सऊदी अरब में नहीं लगती। बहुतों को अचंभा होगा, लेकिन चर्चा है कि सऊदी अरब मदद इजरायल की खुफिया सूचनाओं के जरिए कर रहा है। हर युद्ध की कीमत आखिरकार जनता को ही चुकानी पड़ती है। हमारे सामने अमेरिका-ईरान, इजरायल और लेबनान युद्ध है। साढ़े छह महीने बाद भी कोई सुलह की राह नजर नहीं आ रही। इससे पहले कि सऊदी-हूतियों का युद्ध निहायत खतरनाक दौर पर पहुंचे इसमें बीच-बचाव करके रोकना जरूरी है और किसी भी कीमत पर पवित्र धार्मिक स्थलों की रक्षा होनी चाहिए। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 17 September 2026

क्या भारत की विदेश नीति बदल रही है?

नई दिल्ली में समाप्त हुए 18वें ब्रिक्स सम्मेलन में जारी संयुक्त घोषणा पत्र में मिडल ईस्ट (मध्य पूर्व) को लेकर अपनाया गया रुख चर्चा का विषय बना हुआ है। इस घोषणा पत्र में बिना किसी देश का नाम लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है जिसकी शायद उम्मीद बहुत कम लोगों को थी और यह चर्चा भी शुरू हो गई कि भारत ने अपनी विदेश नीति में बदलाव करना शुरू कर दिया है। इस घोषणा पत्र में जिस पर सभी संबंधित देशों ने अपनी स्वीकृति दी है और ज्वाइंट डिकलेरेशन साइन किए हैं का मतलब साफ है कि इनमें उनकी सहमति है। घोषणा पत्र में दो-तीन बिन्दु ऐसे हैं जो अब तक कि भारत की विदेश नीति से मेल नहीं खाते। इस घोषणा पत्र में इजरायल और अमेरिका का नाम लिए बिना फलस्तीन और लेबनान का जिक्र किया गया है और मध्य पूर्व के तनावपूर्ण हालात के शांतिपूर्ण हल की अपील की गई है। दिलचस्प ये भी था कि अमेरिका के साथ युद्ध में एक-दूसरे के विपरीत दोनों छोर में खड़े ईरान और यूएई भी मध्य पूर्व के हालात शांतिपूर्ण तरीके से हल करने की अपील करने वाले देशों में शामिल थे। ब्रिक्स घोषणा पत्र में ट्रंप, अमेरिकी टैरिफ का नाम तो नहीं लिया गया पर कहा गया कि कई देशों को अन्यायपूर्ण, एकतरफा संरक्षणवादी कदमों से नुकसान हुआ है। चूंकि घोषणा पत्र में भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं। इसका मतलब साफ है कि पहली बार बिना अमेरिका और ट्रंप का नाम लिए भारत टैरिफ की खुलकर आलोचना कर रहा है। अब इसे भारत की विदेश नीति में माना जाए? यह भी देखना होगा कि ट्रंप का इस पर क्या असर और प्रतिक्रिया होती है। इसी तरह घोषणा पत्र में गाजा और कब्जे वाले फलस्तीनी इलाकों की मानवीय स्थिति पर गंभीर चिंता जताई गई। इसमें गाजा में सीजफायर बनाये रखने और बगैर किसी बाधा के मानवीय मदद पहुंचाने की अपील की गई। इसमें फलस्तीनियों को जबरन विस्थापित किये जाने का भी विरोध किया गया है। इसमें अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून में ऐसे सभी उल्लंघनों की निंदा की गई है। घोषणा पत्र में दक्षिण अफ्रीका की ओर से इजरायल के खिलाफ दायर मामले में अंतर्राष्ट्रीय न्याय अदालत के अंतरिम आदेशों का भी जिक्र किया गया है। घोषणा पत्र में दो-राष्ट्र समाधान (टू नेशन थ्योरी) के समर्थन को दोहराया गया है। इसके तहत 1967 की सीमाओं को सुनिश्चित करना शामिल है। इसमें इजरायल से लेबनान में युद्ध विराम का पालन करने और लेबनान के बचे हुए इलाकों से अपनी सेना वापस बुलाने की भी अपील की गई है। ब्रिक्स के घोषणा पत्र में बेशक इजरायल का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया गया लेकिन फलिस्तीन और लेबनान का जिक्र करते हुए मध्य पूर्व की समस्या के शांतिपूर्ण हल की अपील की गई है। एक विशेषज्ञ ने पूछा कि भारत-इजरायल कितने मजबूत हैं यह किसी से छिपा नहीं। इस घोषणा पत्र के बाद इजरायल और भारत के रिश्तों पर कोई असर होगा या नहीं यह तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा। इसी तरह ट्रंप के टैरिफ और दादागिरी पर ब्रिक्स में लिए गए स्टैंड से भारत और अमेरिका के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा यह भी आने वाले दिनों में पता चलेगा। ईरान-अमेरिका युद्ध पर साफ तौर पर ब्रिक्स घोषणा पत्र में ईरान का पक्ष लिया गया है। ब्रिक्स घोषणा पत्र में अमेरिका का नाम नहीं लिया गया है लेकिन अमेरिका की ओर से एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों और शांतिपूर्ण परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों की आलोचना की गई। कहा गया कि अंतर्राष्ट्रीय कानून के खिलाफ लगाए गए एकतरफा प्रतिबंधों की निंदा की जाती है। इनका व्यापक नकारात्मक असर होता है और इनसे गरीब लोगों पर आसमान रूप से ज्यादा असर पड़ता है। ब्रिक्स के दो सदस्य देशों रूस और ईरान पर भी कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। ट्रंप का ब्रिक्स विरोध जगजाहिर है। वह कई बार ब्रिक्स को अमेरिका विरोधी बता चुके हैं और ब्रिक्स के साथ जुड़ने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की धमकी दे चुके हैं। सवाल यहां यह है कि चूंकि भारत ने भी इस ब्रिक्स घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं तो क्या भारत अब अमेरिका के सामने झुकने को तैयार नहीं और क्या हम यह मानें कि भारत की विदेश नीति में अब भारी परिवर्तन आने वाला है या यह महज एक इवेंट था और फोटो अपील यूनिटी थी? 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 15 September 2026

वोट दो डॉलर लो



भारत में सरकारों द्वारा रेवडियां बांटने का प्रचलन अब अमेरिका में भी फैल चुका है। दुनिया के सबसे पुराने और विकसित लोकतांत्रिक देश अमेरिका में भी लोगों को सीधे नकदी या मुफ्त उपहार देने की राजनीति चल निकली है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अगर नवम्बर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में उनकी रिपब्लिकन पार्टी जीत हासिल कर लेती है तो वह हर वयस्क अमेरिकी नागरिक को 5000 डॉलर का भुगतान करेंगे। यह एक बहुत महंगी योजना है, जिसमें एक ट्रिलियन डॉलर से भी अधिक खर्च आएगा। ट्रंप ने कहा है कि अगर रिपब्लिकन पार्टी प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों पर अपना नियंत्रण बरकरार रखती है तो हर वयस्क अमेरिकी नागरिक को 5000 डॉलर का भुगतान किया जाएगा। ट्रंप ने इसे ट्रंप डिविडेंट नाम दिया है। उन्होंने कहा अमेरिका की आर्थिक ताकत और सफलता को देखते हुए वह प्रत्येक वयस्क नागरिक को यह भुगतान करेंगे। बशर्ते नवम्बर के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी दोनों हाउस में जीते। ट्रंप ने भुगतान की एक शर्त भी बताई। उन्होंने कहा इस रकम को अमेरिका के भीतर ही खर्च करना होगा। यानी लाभार्थी इन पैसों को देश के बाहर खर्च नहीं कर सकता। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि योजना को किस तरह लागू किया जाएगा और इसके लिए पैसा कहां से आएगा? अमेरिका में नवम्बर में होने वाले मिडटर्म चुनाव के नतीजे ट्रंप के लिए बड़ा इम्तिहान होने वाला है। इसीलिए अब वह रेवड़ियां बांटने पर उतर आए हैं। लगता है कि उन्होंने भी भारत में चली रेवड़ी प्रथा को अपनाने का फैसला किया है। कुछ समय पहले उन्होंने भारत की चुनावी प्रणाली की भी सराहना की थी। कहीं अब यह न करें कि भारत के चुनाव आयोग को अमेरिका में चनाव करवाने के लिए बुला लें और कहें कि यहां भी एसआरआई करवा दो? 5000 डॉलर देने की रेवड़ी के पीछे दो प्रमुख कारण नजर आते हैं। पहला-ट्रंप की लोकप्रियता अपने निचले स्तर पर है, अनसोर्स राइटर्स/सीएनएन / एसएसआरएस व एनवाईटी सर्वे के औसत में ट्रंप के खिलाफ 60 प्रतिशत अमेरिकियों ने वोट दिया। लोकप्रियता की गिरावट की वजह बढ़ती महंगाई, घटते रोजगार और ईरान जंग में हार है। दूसरा - विपक्षी डेमोक्रेट्स जीते तो दोनों सदन में बहुमत पाने के बाद वह ट्रंप के खिलाफ महाभियान लाएंगे। ऐसे में ट्रंप को सत्ता गंवाने का खतरा है। इससे पहले ट्रंप जीत की कोशिश में एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) की तर्ज पर वोटर लिस्ट की जांच और वोटर बेस बनाने का ऐलान कर चुके हैं। सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में मुफ्त योजनाओं की पुरानी परम्परा है। अगर ऐसे ही परंपरा अमेरिका में शुरू हो रही है तो असर पूरी दुनिया पर होगा। सवाल यह भी है कि क्या इसके लिए अमेरिकी संसद मंजूरी देगी? क्या यह वहां की अदालतों में चैलेंज नहीं किया जाएगा? सबसे बड़ी बात है कि क्या वोटर इसके झांसे में आएंगे। यह राशि अमेरिकी बजट का 17 प्रतिशत है। बता दें कि ईरान युद्ध की वजह से पहले ही हर अमेरिकी परिवार पर लगभग 3000 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ चुका है।

- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 12 September 2026

क्या मक्का समझौता लागू है?

 
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि सऊदी अरब पर किसी भी हमले की स्थिति में मक्का अलायंस सक्रिय हो सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि किसी एक सदस्य के खिलाफ आक्रामकता को मक्का समझौते में शामिल तीनों देशों पर हमले के रूप में लिया जाएगा। उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब सऊदी अरब को अपने दक्षिण हिस्से में कई एनजी सेंटर को बंद करने पर मजबूर होना पड़ा है। यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर नए हमले करने का दावा किया है। हूती विद्रोहियों के ये हमले ऐसे समय में हुए हैं, जब ईरान ने अमेरिका के प्रति और आक्रामक रुख अपनाने की चेतावनी दी है। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने जियो न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में कहाः हम इस समझौते की शर्तें और नियमों से बंधे हैं और इंशाअल्लाह हूतियों को यह समझना चाहिए कि उनके कदम इस समझौते को सक्रिय कर सकते हैं। बता दें कि तुर्किये, सऊदी अरब और पाक के बीच त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर पिछले महीने मक्का में हस्ताक्षर हुए थे। आसिफ ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान से संपर्क किया है या नहीं, लेकिन उन्होंने दोहराया कि समझौते के मुताबिक मदद करना या प्रतिक्रिया देना हमारी जिम्मेदारी है। उन्होंने हूती विद्रोहियों से सऊदी अरब को यमन के संघर्ष में और ज्यादा खींचने से बचने की अपील की। हम सऊदी अरब की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति अपना समर्थन दोहराते हैं। वहीं सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद ने कहा, हूती विद्रोहियों ने अपने लिए ऐसी स्थिति पैदा कर ली है, जिसे वे झेल नहीं पाएंगे। इसलिए मैं यही कहूंगा कि अब कूटनीति का दरवाजा बंद हो रहा है। अब लोग पूछ रहे हैं कि मक्का समझौता आखिर किन देशों के लिए है? पाकिस्तान की विदेश नीति पर गहरी नजर रखने वाले एक विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी हमले को हमेश एक निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर देखा जाता है। मिसाल के तौर पर सीरिया में तुकी पर हुए हमले को मक्का समझौते के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जाएगा। हालांकि अभी हमला सऊदी अरब के भीतर हुआ है। इसलिए कम से कम इस शर्त को पूरा करता है। थिंक टैंक अरब सेंटर वाशिंगटन डीसी ने 19 अगस्त को प्रकाशित एक आर्टिकल में लिखा है कि मक्का समझौते से वास्तविक सैन्य प्रतिक्रिया होने की संभावना कम है। बेशक, मक्का समझौता सऊदी अरब के लिए अमेरिका की सुरक्षा गारंटी की जगह नहीं लौटा। सऊदी जिन देशों को अपने साथ लेकर आया है। वे पहले से ही अमेरिका के सहयोगी हैं। यही वजह है कि अमेरिका ने इस समझौते को लेकर कोई चिंता नहीं जताई है। तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने स्पष्ट रूप से कहा था कि इस समझौते में किसी साझा दुश्मन की पहचान नहीं की गई है और यह ईरान के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा था कि इसकी तैयारियां दो साल से भी ज्यादा से चल रही थी। इसका मकसद इस समझौते को मौजूदा युद्ध से अलग दिखाना था। विश्लेषकों का मानना है कि मक्का समझौते को चिंता के संकेत के तौर पर देखना सबसे उचित होगा। इसके पीछे यह सोच है कि किसी एक सुरक्षा गारंटर पर निर्भर रहना अब समझदारी नहीं है। खास करके सऊदी का अमेरिका पर भरोसा कम हुआ है। पाक दुनिया का एक मात्र मुस्लिम बहुल परमाणु संपन्न देश है। अभी स्पष्ट नहीं है कि नया गठबंधन किसी हमले के जवाब में किस तरह की कार्रवाई करेगा? हमने हाल में हूती हमले के खिलाफ पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब की कोई संयुक्त या अकेले जवाबी कार्रवाई नहीं देखी। हुसैन हक्कानी ने एक्स पर लिखा हैः ज्वाइंट डिफेंस आमतौर पर किसी साझा दुश्मन के खिलाफ होता है, अगर कोई साझा दुश्मन नहीं है तो डिफेंस का आपरेशन हो सकता है, लेकिन ज्वाइंट डिफेंस पैक्ट नहीं। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 10 September 2026

राम मंदिर चंदा चोरी कैसे रुके?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव 2014 अभियान के रणनीतिकार रह चुके किशोर से, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के पद पर एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति हो गई है। भारतीय वायुसेना के पूर्व अधिकारी मिश्रा ट्रस्ट के पहले सीईओ बनाए गए हैं। उनकी यह नियुक्ति मंदिर प्रबंधन में भ्रष्टाचार चंदा चोरी के आरोपों के बाद हुई है। सवाल यह है कि केवल सीईओ नियुक्त कर देने से क्या होगा। यदि पहले प्रबंधन संभालने वाले लोगों को बिना जवाबदेही के छोड़ दिया जाए? भ्रष्टाचार के आरोपों से करोड़ों राम भक्तों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई है। सरकार को अब तक हुई कथित अनियमितताओं पर श्वेत पत्र लाना चाहिए। राम मंदिर के पहले सीईओ नियुक्त एयर मार्शल जितेन्द्र मिश्रा गुरुवार को अयोध्या पहुंचे। यहां से सीधे रामघाट स्थित कार्यशाला में निर्मित राम मंदिर ट्रस्ट के एकाउंट कार्यालय में अपना योगदान दिया। फिलहाल उन्होंने किसी पंजिका पर हस्ताक्षर नहीं किया है। जितेन्द्र मिश्रा ने राम मंदिर में सामने आए चढ़ावा चोरी प्रकरण पर पहली बार अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि अतीत की घटनाओं से सबक लेना चाहिए लेकिन अतीत के बोझ को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। उधर अयोध्या की एक अदालत ने राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मामले में गिरफ्तार सभी आठ आरोपियों की न्यायिक हिरासत शनिवार को 18 सितम्बर तक बढ़ा दी। मंदिर में चढ़ावे की गिनती की प्रक्रिया से जुड़े इन 8 आरोपियों को राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) की प्राथमिक रिपोर्ट के बाद 25 जून को दर्ज प्राथमिकी के आधार पर गिरफ्तार किया गया था। श्री राम मंदिर में चढ़ावा चोरी मामले में नई एसआईटी की जांच भी निर्णायक मोड़ पर पहुंच रही है। सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई से पहले नई एसआईटी ने ट्रस्ट के पूर्व लेखा प्रभारी महिपाल सिंह का बयान दर्ज किया है। नई एसआईटी उनके बयान को अपनी जांच का आधार बनाएगी। क्षेत्राधिकारी अयोध्या आशुतोष तिवारी ने शुक्रवार को वीडियो कांफ्रेंस के जरिए महिपाल का बयान लिया, जिसमें उन्होंने 2021 से अब तक की चोरी की घटनाओं और अनियमितताओं का उल्लेख किया। महिपाल ने पूर्व महासचिव चंपतराय, सदस्य डा. अनिल मिश्र और टिन्नू यादव सहित इस ट्रस्ट और बैंक कर्मियों के नाम लिए हैं जिनके खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। मालूम हो कि चढ़ावा चोरी मामला उजागर होने के समय ही महिपाल ने कई आरोप लगाए थे। उन्होंने सीधे तौर पर चंपतराय, अनिल मिश्र और गोपाल राव पर अनजान बने रहने का आरोप लगाया। पहले गठित एसआईटी ने भी महिपाल का बयान दर्ज किया था, जिसकी फाइनल रिपोर्ट अब ट्रस्ट को सौंप दी गई है। कई भक्तों का कहना है कि दान से जुड़ा विवाद बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत हो सके। इस घटना से करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत हुई हैं और कुछ लोगों के मन में दान को लेकर संकोच भी पैदा हुआ है। फिर भी भगवान राम के प्रति उनकी आस्था में कमी नहीं आई है। उम्मीद है कि ट्रस्ट के नए अधिकारी इस चंदा चोरी को रोकने में सख्त कदम उठाएंगे और इसे हर हालत में रोकेंगे। पुराने ढांचे को पूरी तरह बदलना होगा। पुराने कर्मचारियों को या तो हटाया जाए या उनकी ड्यूटी बदली जाए। बेहतर होगा कि चढ़ावे के रुपयों की मशीनों से गिनती हो। आभूषणों का अलग विभाग हो और हर कदम पर पारदर्शिता हो। सीसीटीवी की निगरानी हर जगह हो। नए नेतृत्व को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह करोड़ों की आस्था का सवाल है सिर्फ चंदा चोरी का नहीं। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 8 September 2026

छात्रा के पिता का हमलावर गिरफ्तार

 
कॉकरोच जनता पाटी (सीजेपी) के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान एक दलित नाबालिग छात्रा के पिता पर जानलेवा हमला करने के आरोप में कथाकथित अपने आपको हिंदूवादी कार्यकर्ता बताने वाला आरोपी स्वतंत्र भारद्वाज को दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार को वेस्ट उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से गिरफ्तार कर लिया। स्वतंत्र के खिलाफ पॉस्को एक्ट के तहत नई एफआईआर दर्ज की गई है। कुछ घंटे पहले ही आरोपी की गिरफ्तारी की मांग पर कॉकरोच जनता पाटी और यूथ कांग्रेस ने दिल्ली के संसद मार्ग थाने में प्रदर्शन किया था। पुलिस के 72 घंटे में कार्रवाई के भरोसे के बाद धरना खत्म हुआ। छात्रा का आरोप था कि 23 जून को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान पिता से मारपीट की गई थी। इस बीच आरोपी का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वह कथित तौर पर उनके सिर पर हमले की बात कबूल करते नजर आया। 3 सितम्बर को स्वतंत्र भारद्वाज के एक पॉडकास्ट की क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुई। इस वीडियो में वह कथित तौर पर एक व्यक्ति पर हमला करने की बात करते दिखाई दिया। उसमें दावा किया कि उसने उस व्यक्ति के सिर पर कड़े से वार किया था, जिसके बाद उस घायल व्यक्ति के सिर पर 7 टांके लगे थे। भारद्वाज ने यह भी दावा किया कि उसे दिल्ली के मंत्री कपिल मिश्रा के एक फोन पर पुलिस ने उसके खिलाफ सारी कार्रवाई रोक दी और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान उनके भाई समान हैं और मोदी जी उनके बड़े भाई हैं। यह भी दावा किया कि मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। विपक्षी दलों और सीजेपी से जुड़े लोगों ने आरोप लगाया कि स्वतंत्र भारद्वाज को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है। हालांकि चिराग पासवान ने स्वतंत्र भारद्वाज से संबंधों को खारिज कर दिया और भारद्वाज के खिलाफ उनके नाम का गलत इस्तेमाल करने के आरोप में एफआईआर भी दर्ज करा दी। इस कथित हिंदुत्व समर्थक इंफ्लुएंसर ने शेखी के चक्कर में ऐसा बहुत कुछ कह दिया, जो सरासर अपराध की स्वीकारोक्ति ही है। इस बड़बोले युवक के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज हो गया है और मुमकिन है कि हत्या के प्रयास का मुकदमा भी दर्ज हो जाए। धर्म के नाम पर उद्गार अपनी जगह है। पर धर्म ऐसे आचरण को कतई स्वीकार नहीं करता है। युवक जो खुलकर चैनलों में दावे करता रहा है। उसकी अवश्य जांच होनी चाहिए और कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। पर सवाल यहां यह उठता है कि इस युवा में ऐसी बेहूदा बातें करने की हिम्मत कहां से आई? इसको किसकी राय है? 20 जुलाई को जंतर-मंतर प्रदर्शन में कई कथित गुंडे प्रवृत्ति के लोग प्रदर्शन में कैसे शामिल हुए? इंडियन एक्सप्रेस की एक सनसनीखेज रिपोर्ट में यह बताया गया है कि फेस रिकॉग्नाइज सहयोग सिस्टम से 25 ऐसे अपराधियों के नाम सामने आए हैं जो उस समय में तिहाड़ जेल में बताए जाते हैं। अगर यह सच है तो यह कई गंभीर सवाल उठाते हैं। यह अपराधी जंतर-मंतर में कैसे आये। सवाल तो यह भी किया जा रहा है कि सफेद कपड़ों में हाथ में डंडे लिए वह कैसे लोग थे जो छात्रों पर लाठियां बरसा रहे थे। उन्हीं में यह स्वतंत्र भारद्वाज भी एक था। अब कानून अपना काम करेगा और उम्मीद की जाती है कि कोई राजनीतिक हस्तक्षेप उसमें नहीं होगा। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 5 September 2026

पुतिन से युद्ध खत्म करने की अपील

युद्ध मानव सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है और आज एक नहीं कई युद्ध चल रहे हैं। यह जानते हुए भी कि युद्ध से समस्याओं का हल तो दूर उल्टा युद्ध नई जटिलताओं को जन्म देता है। युद्ध के लक्षण जान-माल की भारी क्षति, आर्थिक बर्बादी, विस्थापन और सामाजिक अस्थिरता के रूप में सामने आते हैं। रूस-यूक्रेन और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष इसके उदाहरण हैं। भारत हमेशा वैश्विक शांति का समर्थक रहा है और युद्ध के स्थान पर महात्मा बुद्ध, महात्मा गांधी के शांति मार्ग पर चलने का संदेश देता रहा है। इसी प्रतिबद्धता को दर्शाते हुए किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन के मौके पर रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के साथ बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अंतहीन युद्ध के बजाए इसके अंत की ओर बढ़ने की वकालत की। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध को खत्म करने की अपील की। पीएम मोदी ने सोमवार को कहा, युद्ध में बिताया गया हर दिन मानवता को पीछे धकेलता है और शांति की दिशा में उठाया गया हर कदम मानवता को नई आशा और उत्साह से भर देता है। यूक्रेन में युद्ध खत्म करने पर पीएम मोदी की टिप्पणियां हैरान करने वाली नहीं है और ये भारत की विदेश नीति में किसी भी किस्म के सामरिक बदलाव का संकेत नहीं देती है। दरअसल, संघर्ष शुरू होने के बाद साल 2022 में एक क्षेत्रीय शिखर सम्मेलन के दौरान बोलते हुए, मोदी ने पुतिन से सार्वजनिक रूप से कहा था कि यह युद्ध का समय नहीं है। लेकिन यह कहना बहुत आसान होगा कि युद्ध पर मोदी के अभी या पहले के बयानों को पुतिन या रूस स्ट्रैटजी को जवाब देने के तौर पर देख जा सकता है। पश्चिमी देशों ने मोदी पर स्पष्ट रुख अपनाने के लिए काफी दबाव डाला है लेकिन भारत काफी हद तक तटस्थ रहा है। भारत ने इसके बजाए युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत का आग्रह किया है। बेशक इस रुख से कई पश्चिमी देश खुश नहीं हैं, लेकिन उन्होंने भारत को लुभाना जारी रखा है क्योंकि भारत इतनी बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह पहली बार नहीं है जब किसी विदेशी नेता ने सार्वजनिक रूप से पुतिन से यूक्रेन से युद्ध समाप्त करने का आग्रह किया हो। महज पांच हफ्ते पहले कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कसीम-जोमार्ट टोकायेव ने पुतिन को सुझाव दिया था कि वे संघर्ष को रोक दें और बातचीत की मेज पर लौट आएं। शांति के लिए इन सार्वजनिक अपीलों से पुतिन की रणनीति में कोई बदलाव आने के संकेत नजर नहीं आते। मोदी द्वारा युद्ध विराम के आ"ान पर क्रेमलिन नेता ने जवाब दिया बहुत-बहुत धन्यवाद प्रधानमंत्री जी। हम इसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं। विनम्र, लेकिन मान्यवर और कोई स्पष्ट जवाब नहीं। आखिरकार एक रास्ता छोटा भी हो सकता है, लेकिन यह लंबा भी हो सकता है। सारे सुबूत बताते हैं कि रूस की लीडरशिप को अब भी यकीन है कि वह युद्ध में यूक्रेन से मिलिट्री जीत की राह पर है। इसे शांति के मामले में कहें तो रूस की शर्तें पर मिलिट्री सफलता से तय शांति की ओर आगे बढ़ना। इसलिए, फिलहाल लड़ाई जारी है। इस तथ्य के बावजूद कि साढ़े चार साल से अधिक के युद्ध और भारी सैन्य नुकसान के बाद भी व्रेमलिन को अभी तक जीत हासिल नहीं हुई है और यूक्रेन ने युद्ध को रूसियों के घर तक वापस लाने में सफलता हासिल की है। 

-अनिल नरेन्द्र