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Tuesday, 25 August 2026

महंगी चीनी : क्या वजह इथेनॉल तो नहीं?



भारत में चीनी के दाम पिछले कुछ महीनों से तेजी से बढ़ रहे हैं। राइटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार केवल इसी महीने भारत में चीनी की कीमतों में 20 फीसदी इजाफा हुआ है। भारत सरकार के उपभोक्ता मामलों के विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार 20 अगस्त को भारत की खुदरा बाजार में चीनी की कीमत 55.7 रुपए प्रति किलोग्राम थी। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, एक महीने पहले चीनी की कीमत 48.18 रुपए प्रति किलोग्राम थी। 20 अगस्त 2025 को इसकी कीमत 46.3 रुपए प्रति किलोग्राम थी। बाजार के जानकारों का कहना है कि चीनी के दाम इससे पहले कभी इतने ऊंचे नहीं गए। सवाल यह भी पूछा जा रहा है कि क्या पेट्रोल में मिलाए जाने वाले इथेनॉल से चीनी महंगी हुई है? कच्चे तेल की खपत के मामले में अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया में तीसरे नंबर पर है। लेकिन भारत में इस्तेमाल होने वाले कच्चे तेल का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है। इस आयात को कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने, आत्मनिर्भरता बढ़ाने और प्रदूषण कम करने के लिए केन्द्र सरकार ने 2018 में पेट्रोल में मिलाए जाने वाले इथेनॉल की मात्रा को 10 फीसदी से बढ़ाकर 20 फीसदी करने का फैसला किया था। यह लक्ष्य 2030 में हासिल किया जाना था लेकिन सरकार ने इसे जुलाई 2025 में ही हासिल कर लिया। भारत में चीनी उद्योग सरकारी नियंत्रण के तहत आता है। चीनी मिलों को किसानों से खरीदे गए गन्ने के लिए कितना एमआरपी देना होगा यह केन्द्र सरकार तय करती है। सरकार यह भी तय करती है कि कौन सी चीनी मिल हर महीने कितनी चीनी बेच सकती है और चीनी का निर्यात किया जा सकता है या नहीं। देश में बड़े पैमाने पर इथेनॉल खरीदने वाला ग्राहक भी सरकार ही है और इस तरह इथेनॉल की कीमत भी अप्रत्यक्ष रूप से सरकार ही तय करती है। राइटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार 2025-26 के चीनी वर्ष में 30 लाख टन चीनी का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने के लिए किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह देश में चीनी के कुल उत्पादन का करीब 10 फीसदी है। गन्ने के रस के अलावा चीनी बनाने के दौरान तैयार होने वाले सिरप, ए-हेवी मोलासिस, बी-हेवी मोलासिस और सी-हेवी मोलासिस से भी इथेनॉल बनाया जा सकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में उत्पादित कुल इथेनॉल का करीब एक तिहाई हिस्सा गन्ने से तैयार किया गया था। दूसरी तरफ सरकार ने शुक्रवार को कहा कि चीनी की बढ़ती कीमतों के लिए पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने के कार्यक्रम को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। सरकार ने कहा कि देश में उत्पादन अनुमान से कम रहने, त्यौहारी सीजन से पहले मांग बढ़ने और इंडस्ट्री के एक हिस्से की ओर से जमाखोरी के चलते चीनी के दाम उछले हैं। हालांकि मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त मात्रा में चीनी उपलब्ध है। मंत्रालय ने इथेनॉल ब्लैडिंग प्रोग्राम के चलते दाम बढ़ने की बात खारिज की। कहा, इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के उपयोग को कीमतों में हालिया बढोत्तरी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उधर सरकार ने चीनी की कीमतों की वृद्धि को देखते हुए 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन गैर-परिष्कृत चीनी के ड्यूटी-फ्री (शुल्क मुक्त) आयात को मंजूरी दे दी है। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि त्यौहारी सीजन में चीनी के बढ़ते दामों की कड़वाहट और न बढ़े। एक दिन पहले, सरकार ने 10 लाख टन से ज्यादा चीनी का इस्तेमाल करने वाले कारोबारियों के लिए चीनी की स्टॉक सीमा 15 दिन तय कर दी थी।

- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 22 August 2026

अमेरिका-ईरान जंग का न्यूक्लियर होने का खतरा


अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अब परमाणु हमले की धमकियों तक पहुंच गया है। इससे सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देशों में हड़कंप मचा हुआ है। दरअसल, अमेरिका की पूर्व कांग्रेस वुमन मार्जेरी टेलर ग्रीन ने दावा किया था कि डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर न्यूक्लियर अटैक की योजना बना रहे हैं। इसके बाद ईरानी सांसद फिदा हुसैन मलेकी ने सख्त चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका ने परमाणु हमला किया तो ईरान भी उसी हथियार और उसी भाषा में पलटवार करेगा। अमेरिका की पूर्व कांग्रेस सुमन मार्जेरी टेलर ग्रीन ने ट्रंप की न्यूक्लियर अटैक वाली प्लानिंग लीक कर दी थी। उनहोंने दावा किया था कि वो ईरान पर परमाणु बम फोड़ने के बारे में विचार कर रहे हैं। इस बीच ईरान ने भी ऐसा ही ऐलान कर दिया है। क्या हम यह मानें कि ईरान ने भी कोई परमाणु हथियार बना लिया है? जिस भाषा का ईरान इस्तेमाल कर रहा है उसका मतलब तो साफ है कि अगर तुमने हम पर परमाणु हमला किया तो हम भी परमाणु हमले से जवाब देंगे। एएनआई के अनुसार, ग्रीन ने भी आरोप लगाया कि ट्रंप प्रशासन अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के उन आकलनों को स्वीकार नहीं कर रहा, जिनके मुताबिक ईरान परमाणु हथियार विकसित करने के मुहाने पर नहीं है। व्हाइट हाउस ने ग्रीन के दावे पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। अमेरिकी सरकार या रक्षा अधिकारियों ने भी सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी योजना की पुष्टि नहीं की। अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग अब उस डरावने मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां परमाणु हमले की धमकियां खुलेआम दी जाने लगी है। अगर डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर एटम बम फोड़ने की बेवकूफी की तो क्या होगा? इस एक सवाल ने न सिर्फ वाशिंगटन और तेहरान में बल्कि पूरे खाड़ी देशों में भी हड़कंप मचा दिया है। सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देश अब थर-थर कांप रहे हैं, क्योंकि ईरान ने साफ कह दिया है कि अगर किसी भी खाड़ी देश ने अमेरिका को मदद की तो उसे भी भस्म होने से कोई नहीं बचा पाएगा। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के सदस्य फिदा हुसैन मलेकी से सीधा सवाल पूछा गया कि अगर ट्रंप ने सच में परमाणु बम फोड़ दिया तो ईरान क्या करेगा? इस पर मलेकी ने बिना झिझक कहा, अगर ऐसा कोई हमला होता है तो ईरान भी उसी भाषा और उसी हथियार से जवाब देगा। हालांकि मलेकी ने खुलकर ये नहीं माना है कि ईरान के पास इस समय परमाणु बम तैयार है या नहीं, लेकिन उनके इस बयान ने अमेरिका और उसके सहयोगियों के पसीने छुड़ा दिए हैं। उन्होंने दावा किया कि ईरान के पास कई ऐसे हथियार हैं जो न केवल खतरनाक हैं, बल्कि आधुनिक हैं जो अभी दुनिया के सामने आए ही नहीं। अगर युद्ध भड़का तो वह सिर्फ मध्य पूर्व में ही नहीं रहेगा वह पूरी दुनिया का अपनी चपेट में ले लेगा। ईरान ने अब केवल अपना बचाव करने के बजाए आक्रामक रणनीति अपना ली है। अगर अमेरिका परमाणु बम जैसा आत्मघाती कदम उठाता है या खाड़ी देश अमेरिका की ऐसा करने में मदद करते हैं, तो यह जंग केवल दो देशों के बीच नहीं रहेगी। खाड़ी देशों के तबाह होने से पूरी दुनिया में कच्चे तेल की सप्लाई ठप्प हो जाएगी। पेट्रोल, डीजल के दाम आसमान छूने लगेंगे और वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी। यही वजह है कि ट्रंप के परमाणु बम और ईरान के जवाबी पलटवार की खबरों ने दुनिया भर के नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 20 August 2026

जिंदा पकड़ो या मारो: मिलेंगे 30000

 
ईरान की हुकूमत ने अब अपनी अवाम को जमीनी लड़ाई के लिए लगता है तैयार करना शुरू कर दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते (पीस डील) अब लगभग समाप्त हो गए हैं और फिर से पूरी जंग की तैयारी शुरू हो गई है। तभी तो ईरान को अब लगता है कि अमेरिका-इजरायल का अगला हमला जमीन पर होगा। इसी खतरे को देखते हुए ईरानी हुकूमत ने ऐलान कर दिया है कि अमेरिकी सैनिकों को मारने या पकड़ने पर 30 हजार डॉलर इनाम की घोषणा की गई है। महिलाआंs के लिए ईनाम दोगुना होगा। ईरान की सेना ने रविवार को ऐलान किया कि वह अमेरिकी सैनिकों को मारने या पकड़ने पर 30000 डॉलर के बराबर ईनाम देगी। सेना की ओर से कहा गया है कि अगर यह काम कोई महिला करती है तो ईनाम दोगुना हो जाएगा। यह ऐलान पश्चिमी एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच लगातार तनाव के बीच हुआ है। जहां दोनों एक-दूसरे पर हमला करते रहे हैं। 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से होर्मूज स्टेट को फिर से खोलना किसी भी शांति समझौते में लगातार रुकावट रहा है। ईरान की सरकारी एजेंसी ईरना की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के आमी चीफ आमिर हतामी ने कहा कि वित्तीय मदद में हिस्सा लेने के लिए बड़ी संख्या में रिक्वेस्ट मिलने के बाद यह प्लान बनाया गया था। हतामी ने इस बारे में कोई डिटेल नहीं दी कि अमेरिकी सैनिकों को कहां और कब मारा या पकड़ा जाएगा। पश्चिम एशिया युद्ध के दौरान ईरान में अमेरिकी ग्राउंड फोर्स की फिलहाल कोई तैनाती नहीं हुई है, सिवाय अप्रैल में एक मारे गए अमेरिकी पायलट के रेस्क्यू मिशन के। ईरना ने हतामी के हवाले से कहा जो कोई हमलावर अमेरिकी मिलिट्री के किसी आदमी को मारेगा या पकड़कर सौंपेगा उसे इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की आमी की तरफ से 30000 डॉलर या पांच बिलियन तोमन के बराबर इनाम मिलेगा। उन्होंने 10000 ईरानी रियाल के बराबर की एक इनफार्मल यूनिट का इस्तेमाल किया। इस घोषणा को ट्रंप की उस चेतावनी से जोड़कर देखा जा रहा है जिसमें उन्होंने अमेरिकी सैनिकों को ईरान में उतारने की संभावना जताई थी। यरूशलम पोस्ट के अनुसार ईनाम पाने वाले को सिर्फ इतना ही नहीं मिलेगा बल्कि हतामी ने कहा कि अमेरिकी सैनिक को मारने के लिए इस्तेमाल किए गए हथियार को दोगुनी कीमत पर खरीदा जाएगा और उसे खास म्यूजियम में भी रखा जाएगा। यही नहीं ईरान अपने सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की हत्या का बदला लेने के लिए भी बेताब हैं। ईरान ने एक टारगेट लिस्ट भी बनाई है जिसमें डोनाल्ड ट्रंप, इजरायली पीएम नेतन्याहू और अमेरिका के सहयोगी देशों के राष्ट्राध्यक्षों के नाम भी शामिल हैं। ईरान पर हमले के लिए अमेरिका ने सबसे अधिक अरब देशों की जमीन पर एयरफोर्स का इस्तेमाल किया। अब मांग उठ रही है कि अरब देशों के राष्ट्राध्यक्षों को भी इस लिस्ट में शामिल किया जाए। क्येंकि अमेरिका के मददगार भी पूर्व सुप्रीम लीडर की हत्या में बराबरी के गुनहगार हैं। ईरान ने अब अपनी नीति बदली है। पड़ोसी अरब मुल्कों में अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाया ही गया पर उनकी टॉप लीडरशिप को खत्म करने की सौगंध ले रहा है। ईरान के सांसद अमीर हुसैन सबेती ने सरकार से मांग की है कि हिट लिस्ट में खाड़ी देशों के शासकों को भी जोड़ा जाए। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 18 August 2026

जिंदा हैं मुजतबा खामेनेई


पिछले 28 फरवरी से जब से अमेरिका इजरायल ने ईरान पर हमला किया था जिसमें आयतुल्लाह अली खामेनेई और उनके परिवार वालों की शहादत हुई थी जिसमें एक 14 महीने की बच्ची भी शामिल थी। कहा जा रहा था कि इस हमले में मुजतबा खामेनेई या तो मारे गए हैं या बुरी तरह से जख्मी हुए हैं। यह भी कहा गया था कि वो मास्को में आईसीयू में हैं। 28 फरवरी के हमले के बाद से मुजतबा खामेनेई कभी जनता के सामने भी नहीं आए थे। पर कुछ दिन पहले उनका एक वीडियो सामने आया। हाल ही में इजरायल ने दावा किया था कि उनकी हालत बेहद गंभीर है और उनको अस्पताल में भती कराया गया है। यहां तक कहा गया था कि उनकी मौत की खबर सामने आए तो हैरानी नहीं होगी। इन दावों के बीच ईरान की मेहर-न्यूज एजेंसी ने मुजतबा खामेनेई का 12 सेकंड का एक वीडियो जारी किया है। वीडियो में वह लोगों से बातचीत करते हुए नजर आ रहे हैं। हालांकि यह वीडियो कब का है यह साफ नहीं किया गया है। इसलिए सवाल अभी भी बरकरार है। वीडियो ने बीमारी की खबरों पर उठाए सवाल मेहर न्यूज एजेंसी की ओर से जारी वीडियो में मुजतबा खामेनेई लोगों के बीच चंगे भले नजर आ रहे हैं और बातें कर रहे हैं। पहली नजर में यह वीडियो उनकी गंभीर बीमारी से जुड़ी खबरों का जवाब माना जा रहा है। हालांकि यह बड़ा सवाल इसकी तारीख को लेकर भी है। एजेंसी ने यह नहीं बताया कि वीडियो कब रिकार्ड किया गया था। ऐसे में सिर्फ 12 सेकंड के इस वीडियो के आधार पर उनकी मौजूदा सेहत के बारे में कोई पुख्ता निष्कर्ष निकालना मुश्किल है। फरवरी में सर्वेच्च नेता की जिम्मेदारी मुजतबा खामेनेई ने संभाली थी। इसके बाद से उनकी सार्वजनिक मौजूदगी बेहद सीमित रही है। उनकी तरफ से ज्यादातर लिखित बयान ही सामने आए। इसी वजह से उनकी सेहत और गतिविधियों को लेकर लगातार अटकलें लगती रहीं हैं। मुजतबा खामेनेई की सेहत को लेकर चल रही अफवाहों के बीच ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि इस वक्त सुप्रीम लीडर (मुजतबा खामेनेई) से डायरेक्ट बात करना बेहद मुश्किल है। उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि वह मुजतबा खामेनेई से मिल चुके हैं। जानकारी के मुताबिक यह मुलाकात मई के महीने में हुई थी। राष्ट्रपति ने व्यापार संघ के प्रतिनिधियें से एक मीटिंग के दौरान कहा था कि वो और मुजतबा खामेनेई करीब ढाई घंटा साथ थे और यह मुलाकात काफी अच्छी रही। सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रपति को खामेनेई से मिलने का सुनहरा मौका एक रियायत के तौर पर मिला था। कहा जा रहा है कि पेजेश्कियान बार-बार मुजतबा से मिलने की गुजारिश कर रहे थे और यहां तक कि धमकी दे रहे थे कि अगर उनसे मिलने नहीं दिया गया तो वो अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। खामेनेई के कार्यालय को आखिर इस मुलाकात के लिए हामी भरनी पड़ी, लेकिन ये मुलाकात कहा जा रहा है कि नार्मल नहीं थी। अमेरिका-इजरायल ने लगातार ये दिखाने की कोशिश की कि मुजतबा को गंभीर चोटें लगी हैं, वह बुरी तरह जख्मी हुए हैं, उनका चेहरा जल गया है और पैरों में गंभीर चोटें आई हैं। जिसके बाद उनके पैर की सर्जरी भी हुई है और अब यह वीडियो। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 15 August 2026

भाग ट्रंप भाग

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पुष्टि की है कि पिछले महीने तुर्किए में नाटो सम्मेलन से रवाना होते समय उन्होंने चुपचाप जेम्स बांड स्टाइल में विमान बदल लिया था। ऐसा संभावित खतरे की वजह से किया गया था। ट्रंप ने मंगलवार को पत्रकारों से कहा कि मैं सीक्रेट सर्विस और सेना की बात मानता हूं। वह चाहते थे कि मैं दूसरी उड़ान और दूसरे विमान से जाऊं। मुझे वही करना था, जो उन्होंने कहा। ट्रंप ने यह भी स्वीकार किया कि वह छिपकर अपने विमान एयरफोर्स वन से भागकर एक दूसरे विमान से निकले। यह बताना जरूरी है कि छिपकर भागने से पहले उन्होंने न तो मार्को रूबियो, अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को विमान बदलने का प्लान बताया और न ही उनके साथ गए पत्रकारों को। यह दर्शाता है कि उनकी नजरों में इनकी कीमत क्या है। खैर, मैं आपको पूरी कहानी बताता हूं कि हुआ क्या। डोनाल्ड ट्रंप पिछले महीने तुर्किए में नाटो शिखर सम्मेलन में गए थे। नाटो सम्मेलन से निकलते समय ईरान के संभावित खतरे को देखते हुए ट्रंप ने गुपचुप तरीके से विमान बदल लिया। वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति टेलीविजन कैमरों की मौजूदगी में एयरफोर्स वन में सवार हुए, फिर उन्हें चुपके से एक ऊंचे एयरपोर्ट केटरिंग (खाने के) ट्रफ में ले जाया गया और एक अन्य सैन्य विमान में पहुंचाया गया। इस दौरान एयरफोर्स वन विमान में सवार पत्रकारों और व्हाइट हाउस के कुछ कर्मचारियों व मंत्री मार्को रुबियो को इसकी जानकारी तक नहीं मिली। अधिकारियों ने सीबीएस न्यूज व बीबीसी को बताया कि अमेरिका ने विमान पर मिसाइल दागने की ईरान की विश्वसनीय धमकी का पता लगाया था। हालांकि व्हाइट हाउस ने इस गुप्त तरीके से विमान बदलने की पुष्टि नहीं की। हालांकि बाद में खुद ट्रंप ने इसकी पुष्टि कर दी। आखिरी समय में विमान बदलने के इस फैसले से सवाल उठे हैं कि क्या जिस विमान को दिखावे के लिए इस्तेमाल किया गया था, उसमें मौजूद लोगों को खतरे में ही छोड़ दिया गया था। विमान में सवार पत्रकारों और व्हाइट हाउस के अधिकारियों को पता नहीं था कि संभावित ईरानी खतरे के जवाब में एक योजना के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को वहां से चुपचाप निकाल लिया गया था। ट्रंप पहले कह चुके हैं कि अंकारा में हुए सम्मेलन के दौरान वह ईरान के टारगेट नम्बर वन थे। ट्रंप ने मंगलवार को कहा, मेरा अनुमान है कि कोई खतरा था। मैंने इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मांगी। मुझे बहुत सारी धमकियां मिलती हैं, जिनके बारे में आपको शायद पता भी नहीं हो। पिछले महीने की यह गुप्त कार्रवाई तब हुई जब युद्ध खत्म करने की बातचीत टूटने के बाद अमेरिका ने ईरान पर फिर से हमले शुरू किए थे। इसके एक दिन बाद ट्रंप ने विमान बदला था। ट्रंप कतर की ओर से दिए गए विमान नया बोईंग 747-8 से तुर्किए पहुंचे थे। लेकिन उन्होंने कहा था कि वह पुराने समय की याद में पुराने एयरफोर्स वन से वापस जाएंगे। 8 जुलाई को उन्होंने कैसे डर के मारे विमान बदला यह सबने देखा ही है। अखबार के मुताबिक रक्षामंत्री पीर हेगसेथ भी अलग से बाहरी सीढ़ियों के जरिए सी-32ए में सवार हुए। उधर एयरफोर्स वन पर बैठे पत्रकारों से कहा गया कि वह खिड़कियों के पर्दे बंद रखें। शायद इसलिए कि वह बाहर का दृश्य न देख सकें। वह यह न देख सकें कि राष्ट्रपति ट्रंप विमान के गुप्त दरवाजे से विमान छोड़ चुके हैं। इसलिए कहा, भाग ट्रंप भाग।  

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 13 August 2026

होर्मूज में अमेरिकी जहाजों की तैनाती

अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाते हुए मिडल ईस्ट में 20 से ज्यादा युद्धपोत तैनात कर दिए हैं और होर्मूज जलडमरूमध्य में नाकाबंदी सख्त कर दी है। ईरान ने जलमार्ग को खोलने के लिए मुआवजा, प्रतिबंध हटाने और ब्लॉकेड खत्म करने जैसी शर्तें रखी हैं। ओमान के साथ संभावित समझौता अंतिम चरण में है, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव अभी भी चरम पर बना हुआ है। अमेरिका ने मिडल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाते हुए 20 से ज्यादा युद्धपोत तैनात कर दिए हैं। यह कदम ईरान पर नाकाबंदी को सख्ती से लागू करने में होर्मूज में बढ़ते तनाव के बीच उठाया गया है, जहां वैश्विक तेल सप्लाई की सबसे अहम लाइन गुजरती है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने सोमवार को एक्स पर एक पोस्ट में बताया कि ये युद्धपोत सीधे तौर पर ईरान के खिलाफ लगाए गए ब्लॉकेड को लागू करने के मिशन में लगे हैं। तैनात जहाजों में अमेरिकी नेवी का डेस्ट्रॉयर यूएसएस रॉस भी शामिल है, जिसके जरिए समुद्री निगरानी और इंटरसेप्शन ऑपरेशन चल रहे हैं। सेंटकॉम ने इसी की तस्वीर शेयर की थी। सेंट्रल कमांड ने दावा किया है कि 9 अगस्त तक 55 कमर्शियल जहाजों को रास्ता बदलने पर मजबूर किया गया, 2 जहाजों को रोका गया और 2 पर चढ़कर जांच की गई। यह साफ संकेत है कि अमेरिका सिर्फ चेतावनी नहीं दे रहा, बल्कि सीधे तौर पर समुद्र में नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। उधर, ईरान-अमेरिका युद्ध में सबसे बड़ी लेकिन अनदेखी मानवीय त्रासदियों में से एक समुद्र के बीच फंसे हजारों नाविक हैं। संयुक्त राष्ट्र की समुद्री एजेंसी (आईएमओ) के मुताबिक करीब 6000 नाविक अब भी फारस की खाड़ी में जहाजों फंसे हैं। कई नाविक तो चार महीने से घर नहीं लौट पाए हैं। मैं यूएसएस अब्राहम लिंकन बाबत एक ऐसी ही रिपोर्ट पढ़ रहा था। उसमें बताया गया था कि पिछले लगभग 200 दिनों से ज्यादा समय से यह समुद्री जहाज समुद्र में हैं। जहाज के अंदर अब तो खाने की कमी हो गई है। दवाएं कम हो गई हैं। टायलेट खराब हो चुके हैं इत्यादि इत्यादि। जहाज के डॉक्टर अब कहने लगे हैं कि अगर जल्द यह सैनिक घर नहीं लौटे तो इनमें से कई मनोवैज्ञानिक शिकार हो जाएंगे। वैसे भी देखा जाए जब लिंकन में ऐसी भयावह स्थिति बनी है तो उस पर तैनात लगभग 5000 सैनिक युद्ध कैसे लड़ेंगे। कई नाविकों का बाहरी संपर्क लगभग टूट चुका है। उन्हें हर कुछ में दिन में सिर्फ 30 मिनट इंटरनेट मिलता है। कुछ जहाजों पर सीमित राशन होने से नाविक दिन में सिर्फ एक बार चावल और दाल खा रहे हैं। लगातार मिसाइल या ड्रोन हमले के खतरे के खौफ में नींद भी पूरी नहीं कर पाते। कई लोग इस तैयारी के साथ सोते हैं कि हमला होते ही भाग सकें। विशेषज्ञों के मुताबिक, नाविक जहाज को नहीं छोड़ सकते हैं। सुरक्षित निकासी बेहद मुश्किल है और कई नाविक अल्पकालिक अनुबंध पर हैं। उन्हें डर है कि यदि वे खतरनाक ड्यूटी छोड़ने की मांग करते हैं तो उन्हें दोबारा नौकरी नहीं मिलेगी। युद्ध के बीच फंसे नाविकों की मानसिक सेहत, नींद और आर्थिक स्थिति पर भी गंभीर असर पड़ा है। युद्ध की शुरुआत में 36-38 भारतीय जहाजों पर 1,100 भारतीय नाविक होर्मूज के आसपास फंस गए थे। बाद में अधिकांश जहाज निकल गए। सूत्रों के मुताबिक 125 भारतीय नाविक अभी भी 6 भारतीय जहाजों पर फारस की खाड़ी में मौजूद हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 11 August 2026

और अब इस्लामिक नाटो

हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के बीच मक्का पाइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए हैं, जिसके तहत अगर तीनों में से किसी एक देश पर हमला होता है तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। इस समझौते का मकसद रक्षा सहयोग बढ़ाना, साझा सुरक्षा रणनीति बनाना और क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच सामूहिक ताकत दिखाना है। विश्लेषकों का मानना है कि यह गठजोड़ पश्चिम एशिया में बदलते हालात, खासतौर पर ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते टकराव के बीच एक नए पावर ब्लाक के रूप में उभर सकता है। इस्लामिक नाटो मुस्लिम बहुल देशों के बीच एक प्रस्तावित या अनौपचारिक सैन्य गठबंधन को दिया नाम है, जिसकी तुलना पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन नाटो से की जाती है। इस समझौते के पीछे प्रमुख भूमिका सऊदी अरब की है। वह एक तरफ ईरान के हमलों से परेशान है और दूसरी तरफ हाल ही में यमन के हूतियों के साथ जबर्दस्त संघर्ष छिड़ने से। ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों खाड़ी क्षेत्रों में, जहाजरानी में व्यवधान और संघर्ष के पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैलने की आशंकाओं ने सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताएं बढ़ा दी हैं। दशकों तक रियाद अपनी सुरक्षा के लिए मुख्य रूप से अमेरिका पर निर्भर था पर 28 फरवरी के बाद उसने देख लिया कि अमेरिका तो अपने सुरक्षा ठिकानों को बचा नहीं पा रहा है तो वह सऊदी अरब को कैसे बचाएगा। रहा सवाल पाकिस्तान का तो सऊदी अरब का पहले से ही पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता हो रखा है पर क्या पाकिस्तान सऊदी अरब को ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों से बचा सका? क्या पाकिस्तान सऊदी अरब पर हमला होने पर ईरान पर हमला कर सकता है? यह सब नाटकबाजी है। रहा सवाल इजरायल और अमेरिका का तो इजरायइल इस समझौते का जमकर विरोध कर रहा है और इसे अपने लिए खतरा मानता है। सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि अगर इजरायल सऊदी या तुर्किए पर हमला करता है तो क्या जनरल असिम मुनीर में इतनी हिम्मत है कि वह अमेरिका के खिलाफ जाकर इजरायल पर हमला करें? यह सिर्फ पैसे ऐंठने का खेल है। फक्कड़ हुआ पाकिस्तान कहीं से भी भीख मांगने को तैयार है और इसके एवज में जो चाहे वादा करवा लो? रहा सवाल ईरान का तो राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने मुस्लिम एकता की अपील करते हुए कहा कि शिया-सुन्नी को साथ रहना चाहिए। पेजेश्कियन ने कहा है कि अमेरिका और इजरायल मिलकर फारस की खाड़ी के देशों को ईरान के खिलाफ करने की कोशिश कर रहे हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि सऊदी अरब तुर्किए और पाकिस्तान तीनों ही देश सुन्नी बाहुल्य हैं, वहीं ईरान शिया देश है। क्या यह भारत के लिए चिंता की बात है? विश्लेषक कहते हैं कि इस डिफेंसपैक्ट का भारत पर सीधे तौर पर कोई असर नहीं होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि सऊदी अरब पहले भी कहता रहा है कि पाकिस्तान हमारा महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी है, लेकिन कभी उसने भारत से जंग के मौके पर साथ नहीं दिया। जहां तक  तुर्किए का सवाल है वह तो आपरेशन सिंदूर में भी खुलेआम पाकिस्तान के साथ था और आगे भी रहेगा। भारत के लिए चिंता की बात नहीं है क्योंकि भारत डिफेंस क्षमता में तीनों से आगे है। 

-अनिल नरेन्द्र