अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाते हुए मिडल ईस्ट में 20 से ज्यादा युद्धपोत तैनात कर दिए हैं और होर्मूज जलडमरूमध्य में नाकाबंदी सख्त कर दी है। ईरान ने जलमार्ग को खोलने के लिए मुआवजा, प्रतिबंध हटाने और ब्लॉकेड खत्म करने जैसी शर्तें रखी हैं। ओमान के साथ संभावित समझौता अंतिम चरण में है, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव अभी भी चरम पर बना हुआ है। अमेरिका ने मिडल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाते हुए 20 से ज्यादा युद्धपोत तैनात कर दिए हैं। यह कदम ईरान पर नाकाबंदी को सख्ती से लागू करने में होर्मूज में बढ़ते तनाव के बीच उठाया गया है, जहां वैश्विक तेल सप्लाई की सबसे अहम लाइन गुजरती है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने सोमवार को एक्स पर एक पोस्ट में बताया कि ये युद्धपोत सीधे तौर पर ईरान के खिलाफ लगाए गए ब्लॉकेड को लागू करने के मिशन में लगे हैं। तैनात जहाजों में अमेरिकी नेवी का डेस्ट्रॉयर यूएसएस रॉस भी शामिल है, जिसके जरिए समुद्री निगरानी और इंटरसेप्शन ऑपरेशन चल रहे हैं। सेंटकॉम ने इसी की तस्वीर शेयर की थी। सेंट्रल कमांड ने दावा किया है कि 9 अगस्त तक 55 कमर्शियल जहाजों को रास्ता बदलने पर मजबूर किया गया, 2 जहाजों को रोका गया और 2 पर चढ़कर जांच की गई। यह साफ संकेत है कि अमेरिका सिर्फ चेतावनी नहीं दे रहा, बल्कि सीधे तौर पर समुद्र में नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। उधर, ईरान-अमेरिका युद्ध में सबसे बड़ी लेकिन अनदेखी मानवीय त्रासदियों में से एक समुद्र के बीच फंसे हजारों नाविक हैं। संयुक्त राष्ट्र की समुद्री एजेंसी (आईएमओ) के मुताबिक करीब 6000 नाविक अब भी फारस की खाड़ी में जहाजों फंसे हैं। कई नाविक तो चार महीने से घर नहीं लौट पाए हैं। मैं यूएसएस अब्राहम लिंकन बाबत एक ऐसी ही रिपोर्ट पढ़ रहा था। उसमें बताया गया था कि पिछले लगभग 200 दिनों से ज्यादा समय से यह समुद्री जहाज समुद्र में हैं। जहाज के अंदर अब तो खाने की कमी हो गई है। दवाएं कम हो गई हैं। टायलेट खराब हो चुके हैं इत्यादि इत्यादि। जहाज के डॉक्टर अब कहने लगे हैं कि अगर जल्द यह सैनिक घर नहीं लौटे तो इनमें से कई मनोवैज्ञानिक शिकार हो जाएंगे। वैसे भी देखा जाए जब लिंकन में ऐसी भयावह स्थिति बनी है तो उस पर तैनात लगभग 5000 सैनिक युद्ध कैसे लड़ेंगे। कई नाविकों का बाहरी संपर्क लगभग टूट चुका है। उन्हें हर कुछ में दिन में सिर्फ 30 मिनट इंटरनेट मिलता है। कुछ जहाजों पर सीमित राशन होने से नाविक दिन में सिर्फ एक बार चावल और दाल खा रहे हैं। लगातार मिसाइल या ड्रोन हमले के खतरे के खौफ में नींद भी पूरी नहीं कर पाते। कई लोग इस तैयारी के साथ सोते हैं कि हमला होते ही भाग सकें। विशेषज्ञों के मुताबिक, नाविक जहाज को नहीं छोड़ सकते हैं। सुरक्षित निकासी बेहद मुश्किल है और कई नाविक अल्पकालिक अनुबंध पर हैं। उन्हें डर है कि यदि वे खतरनाक ड्यूटी छोड़ने की मांग करते हैं तो उन्हें दोबारा नौकरी नहीं मिलेगी। युद्ध के बीच फंसे नाविकों की मानसिक सेहत, नींद और आर्थिक स्थिति पर भी गंभीर असर पड़ा है। युद्ध की शुरुआत में 36-38 भारतीय जहाजों पर 1,100 भारतीय नाविक होर्मूज के आसपास फंस गए थे। बाद में अधिकांश जहाज निकल गए। सूत्रों के मुताबिक 125 भारतीय नाविक अभी भी 6 भारतीय जहाजों पर फारस की खाड़ी में मौजूद हैं।
-अनिल नरेन्द्र