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Thursday, 23 April 2026

बंद-खुला-बंद-होर्मुज पर सस्पेंस


होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर पहुंच रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच पिछले करीब 50 दिनों से जारी तनाव के कारण शांति वार्ता खटाई में पड़ती दिख रही है। इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका में सक्रिय बना हुआ है। होर्मुज की ताजा तनातनी को देखते हुए पाकिस्तानी मध्यस्थता टीम वापस इस्लामाबाद लौट चुकी है। पाकिस्तान में पहले दौर की शांति वार्ता के बाद अमेरिका ने होर्मुज का ब्लॉकेड लागू कर दिया है। वहीं ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बताया है। समुद्र में ईरानी जहाजों तक को भी रोका जा रहा है और तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। दुनिया की नजर अब इस पर है कि इस टकराव का अगला कदम क्या होगा? सवाल यह भी है कि आखिर होर्मुज पर किसका राज है और आगे किसका राज चलेगा? ईरान और अमेरिका के बीच लगभग 40 दिनों तक भीषण युद्ध चला। इसके बाद बड़ी मुश्किल से सीजफायर का ऐलान किया गया और इस्लामाबाद में शांति वार्ता बुलाई गई। लेकिन यह बातचीत बेनतीजा रही। बातचीत फेल होने का सबसे बड़ा कारण होर्मुज रहा। होर्मुज पर किसका दबदबा रहेगा इसका फैसला नहीं हो सका। फिलहाल तो शांति वार्ता के बाद ईरान और अमेरिका के बीच होर्मुज पर कब्जे को लेकर सस्पेंस की आग धधक रही है। अमेरिका और ईरान आमने-सामने खड़े हैं। दुनिया में तेल के इस अहम रास्ते पर किसका कब्जा है, किसके हाथ में है? सवाल हर किसी को परेशान कर रहा है। दोनों खेमे अपने-अपने दावों पर अड़े हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्ती ने माहौल और गरमा दिया है। कई देशों की अर्थव्यवस्था इसी रास्ते पर टिकी हुई है। बता दें कि दुनिया की आधी से ज्यादा तेल सप्लाई इसी रास्ते पर निर्भर है। एक छोटी सी गलती भी ग्लोबल इकॉनामी को हिला सकती है। अमेरिका का ब्लॉकेड कितना कारगर साबित हो रहा है? या ईरान की धमकी में दम है? सस्पेंस हर घंटे बढ़ता जा रहा है। गुरुवार को ईरानी जहाज को अमेरिका ने होर्मुज से वापस लौटाया है इसके बाद तनाव चरम सीमा पर पहुंच गया है। सीजफायर के बावजूद अमेरिका की इस हरकत से ईरान का गुस्सा सातवें आसमान पर है। ईरान ने अमेरिका को जवाबी कार्रवाई की सख्त चेतावनी दी है। डर इसका है कि युद्ध विराम जो 23 अप्रैल को खत्म हो रहा है वह आगे बढ़ेगा या नहीं? होर्मुज के बंद होने से अब यह टकराव सिर्फ दो देशों का नहीं रहा। इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है। तेल बाजार में उथल-पुथल है, शिपिंग कंपनियां सतर्क हो गई हैं। हर देश चाहता है कि यह अहम रास्ता खुला रहे। लेकिन जमीन और समुद्र पर चल रही रणनीतिक चालें इस रास्ते को सबसे बड़ा फ्लैश पाइंट बना रहा है। ट्रंप ने रायटर्स को दिए एक और बयान में दावा किया कि ब्लॉकेड पूरी तरह लागू है और ईरान अब सामान्य व्यापार नहीं कर पा रहा है। सेटकॉम के अनुसार अब तक 10 जहाजों को वापस भेजा जा चुका है। इस बीच खबर यह भी आई है कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने ट्रंप को सुझाव दिया है कि अगर शांति वार्ता आगे बढ़ानी है तो होर्मुज से ब्लॉकेड समाप्त करना होगा। कहा जा रहा है कि ट्रंप ने कहाö मैं विचार करूंगा।
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 21 April 2026

ईरान-अमेरिका, इजरायल युद्ध: आगे क्या होगा?

फिलहाल 23 अप्रैल तक युद्ध विराम चल रहा है। पाकिस्तान दोनों पक्षों के बीच डील करवाने में जुटा हुआ है। आसिम मुनीर तेहरान में हैं और शाहबाज रियाद के चक्कर लगा रहे हैं। उधर इजरायल-लेबनान युद्ध में ट्रंप की बदौलत दस दिन का सीजफायर चल रहा है। उम्मीद की जा रही है कि पाकिस्तान में दूसरे दौर की बातचीत संभव है। पर इसमें अभी कई पेंच फंसे हुए हैं। दोनों पक्ष अपनी-अपनी बड़ी शर्तों पर अड़े हुए हैं। अब सवाल उठता है कि आगे क्या हो सकता है? हमें तो चार संभावित परिदृश्य दिखाई दे रहे हैं। रणनीतिक विराम के रूप में नाजुक युद्ध विराम ः कई हफ्तों की लड़ाई के बाद, अमेरिका-ईरान युद्ध विराम संकट को सीमित करने की इच्छा का संकेत देता दिखा। हालांकि शुरुआत से ही इसके साथ कई तरह की बातें जुड़ी रहीं। युद्ध विराम के प्रावधानों की व्याख्या को लेकर मतभेद सामने आए। इन मतभेदों के कारण कुछ पर्यवेक्षकों ने इसे एक स्थायी ढांचे के बजाए रणनीतिक विराम के रूप में देखना शुरू कर दिया। एक अमेरिकी विश्लेषक के अनुसार संघर्ष शुरू होने के बाद से ही समझौते तक पहुंचने की संभावना लगभग शून्य थी। ये सिद्धांतों, स्थितियों और नीतियों का एक ऐसा समूह है, जिन पर अमेरिका और ईरान सालों से असहमत रहे हैं और युद्ध इन मतभेदों को कम करने में नाकाम रहा है। दोनों पक्षों के परस्पर विरोधी बयानों से स्थिति और बिगड़ गई है। डोनाल्ड ट्रंप की ओर से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकाबंदी की घोषणा से टकराव और बढ़ गया है। हालांकि तनाव बढ़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। दावे से कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि युद्ध रुकेगा या नहीं? एक परिदृश्य जो शायद सबसे अधिक मुमकिन है, वो है टकराव की नियंत्रित तनाव के रूप में वापसी। इसका मतलब होगा कि संघर्ष खुली जंग के स्तर तक नहीं पहुंचेगा और न ही दोनों पक्ष पूरी तरह सैन्य कार्रवाई से परहेज करेंगे। इसमें बुनियादी  ढांचे, सैन्य ठिकानों या आपूर्ति लाइनों पर सीमित हमले जारी रह सकते हैं। इसके बाद प्राक्सी समूहों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी। कुछ विश्लेषक इस स्थिति को शैडो वॉर कहते हैं। जैसे-जैसे तनाव बढ़ता है, गलत आंकलन का खतरा बढ़ता है, और भले ही कोई पक्ष तनाव बढ़ाना न चाहता हो, एक छोटी गलती भी संघर्ष को अनियंत्रित स्तर तक पहुंचा सकता है। पाकिस्तान में वार्ता विफल होने के बावजूद यह निष्कर्ष निकालना अभी संभव नहीं है कि कूटनीति खत्म हो चुकी है या वार्ता पूरी तरह टूट चुकी है। अमेरिका का 15 सूत्रीय प्रस्ताव और ईरान का 10 सूत्रीय जवाबी प्रस्ताव यह जरूर दिखता है कि दोनों पक्ष बजाए किसी मध्य मार्ग पर पहुंचने के अभी भी अपनी-अपनी शर्तों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसलिए भले ही वार्ता का नया दौर संभव हो। लेकिन जल्दी और व्यापक समझौते की उम्मीद करना सही नहीं लगता। अगर अमेरिकी नाकाबंदी जारी रहती है तो ईरानी सेना ने खाड़ी, लाल सागर और ओमान की खाड़ी में शिपिंग की खतरे की चेतावनी दी है। ट्रंप ने घोषणा की है कि देश की नौसेना ईरान पर समुद्री नाकाबंदी जारी रखेगा जिससे वह हर गुजरते जहाज को रोक सकता है और यह ईरान को किसी हालत में स्वीकार नहीं है। ईरान ने यह धमकी दी है कि अंतर्राष्ट्रीय जल क्षेत्र में उन जहाजों को रोका जाएगा जो होर्मुज से गुजरने के लिए ईरान को ट्रांजिट शुल्क नहीं देंगे तो नतीजा अच्छा नहीं होगा। ट्रंप चाहते हैं ईरान की तेल आय को रोकना, उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर करना और ईरान को मजबूर करना कि वह अमेरिका की शर्तों को माने। लेकिन अन्य विश्लेषकों ने इस नीति से अमेरिका को होने वाली भारी लागत की ओर इशारा किया है क्योंकि इससे उसकी सैन्य ताकत भौगोलिक रूप से ईरान के करीब आ जाएगी और हमलों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाएगी। मौजूदा माहौल में रणनीतिक फैसले, सुरक्षा से जुड़े सवाल और जमीनी स्तर पर छोटे घटनाक्रम भी संकट की दिशा पर बड़ा असर डाल सकते हैं।

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 18 April 2026

ट्रंप के डाकिया आसिम मुनीर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आजकल आंख और कान पाकिस्तान सेना अध्यक्ष आसिम मुनीर बने हुए हैं या यूं कहें कि ट्रंप की नाक के बाल बने हुए हैं। ट्रंप मुनीर पर इतना विश्वास करते हैं कि उसे व्हाइट हाउस में लंच पर बुलाते हैं। वन टू वन मीटिंग करते हैं। शायद इस समय आसिम मुनीर दुनिया के एक मात्र सेनाध्यक्ष होंगे जिन्हें व्हाइट हाउस में बुलाकर ट्रंप उनके साथ बाकायदा लंच करते हैं। इन परिस्थितियों में हमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ जब इस्लामाबाद में पहले राउंड की वार्ता विफल हो गई तो दोबारा वार्ता करने के लिए ट्रंप ने मुनीर को अपना डाकिया चुना और उन्हें ईरानी नेतृत्व से बातचीत करने और दोबारा इस्लामाबाद में शांति वार्ता में शामिल होने के लिए खासतौर पर भेजा। मजेदार बाद यह भी है कि आसिम मुनीर जहां ट्रंप के विश्वासपात्र हैं वहीं चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी भरोसेमंद हैं। खैर! हम बात कर रहे थे मुनीर के ईरान पहुंचने की। ईरान और अमेरिका के बीच जारी जंग को लेकर 2 हफ्ते का संघर्ष विराम चल रहा है। दोनों  देशों के बीच जारी जंग को खत्म करने के लिए पहला दौर इस्लामाबाद में आयोजित किया गया। लेकिन यह बैठक कामयाब नहीं रही थी। अब दोनों फिर से बातचीत के टेबल पर आने की कवायद में लगे हैं। बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का संदेश लेकर ईरान पहुंचे। सूत्रों का कहना है कि ईरान-अमेरिका की अगली बैठक पर आसिम मुनीर द्वारा दी गई रिपोर्ट के बाद ही ट्रंप फैसला करेंगे। तस्नीम न्यूज एजेंसी के अनुसार पाकिस्तानी सेना प्रमुख मुनीर की अगुवाई वाले पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की ईरानी अधिकारियों के साथ मुलाकात के बाद, ईरानी पक्ष मामले की जारी समीक्षा करेगा और फिर वह अमेरिका के बीच बातचीत के अगले दौर को लेकर कोई फैसला करेगा। ट्रंप इस यात्रा को महत्व दे रहे हैं कि उन्होंने यहां तक कहा है कि यह संभव है कि अगले दौर की शांति वार्ता के लिए मैं खुद भी इस्लामाबाद जा सकता हूं। मुनीर के इस दौरे का मकसद ईरानी नेतृत्व तक अमेरिका का संदेश पहुंचाना और बातचीत के अगले दौर की योजना बनाना है। सोशल मीडिया पर अटकलें लगाई जा रही हैं कि मुनीर की इस यात्रा के पीछे असली मकसद क्या है? कहा जा रहा है कि ट्रंप यह जानना चाहते हैं कि ईरान का शासन आखिर चला कौन रहा है? क्या आयतुल्लाह मुजतबा खामेनेई चला रहे हैं? उनकी हालत क्या है? क्या वह घायल हैं और फैसले लेने में असमर्थ हैं? ट्रंप जानना चाहते हैं कि वह शांति वार्ता आखिर ईरान में किससे कर रहे हैं? मुनीर ने ईरान के सभी दिग्गज नेताओं से बातचीत की है। वह आईआरजीसी के वरिष्ठ अधिकारियों से भी मिले हैं। तेहरान पहुंचने पर पाकिस्तानी डेलीगेशन को लेने हवाई अड्डे पर खुद विदेश मंत्री अब्बास अराघची पहुंचे थे। इससे पता चलता है कि ईरान भी इस पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की यात्रा को कितना महत्व देता है। आसिम मुनीर ट्रंप का संदेश तो लेकर गए ही हैं साथ ही यह भी संभव है कि वह शी जिनपिंग का भी कोई संदेश लेकर गए हैं। अभी डिटेल्स नहीं आई, जल्द पता चल जाएगा कि मुनीर की यात्रा सफल रही या नाकाम रही।

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 16 April 2026

मेलानिया ने अमेरिका में नई जंग छेड़ दी


ईरान युद्ध में सीजफायर होते ही अमेरिका के अंदर एक और जंग शुरू हो गई है। आप हैरान होंगे कि यह कौन सी जंग है? बता दें कि एपस्टीन फाइल्स की यह जंग फिर शुरू हो गई है। एपस्टीन फाइल्स का जिन्न फिर बाहर आया है और उसे बाहर निकाला है (चौंकिए मत) अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीवी मेलानिया ट्रंप ने। अमेरिका की फर्स्ट लेडी मेलानिया ने एपस्टीन फाइल्स पर धमाकेदार खुलासा किया है जिससे व्हाइट हाउस में खलबली मचनी स्वाभाविक ही है। जेफरी एपस्टीन से जुड़ी अफवाहों पर हमला बोलते हुए मेलानिया ने पीड़ितों की सुनवाई की मांग कर डाली है। मेलानिया ने 9 अप्रैल 2026 को व्हाइट हाउस से अचानक एक सनसनीखेज बयान जारी किया। उन्होंने जेफरी एपस्टीन से जुड़ी सभी झूठी खबरों, अफवाहों को साफ तौर पर खारिज कर दिया। एपस्टीन दोषी यौन अपराधी था। मेलानिया ने कहा कि ये अफवाहों को मैं साफतौर पर खारिज करती हूं। ये अफवाहें मुझे बदनाम करने की कोशिश हैं और इन्हें अब तुरन्त रोकना चाहिए। मेलानिया ने साफ शब्दों में कहा, जेफरी एपस्टीन से मेरे नाम को जोड़ने वाली झूठी बातें आज ही खत्म होनी चाहिए। मैं एपस्टीन की दोस्त कभी नहीं रही। डोनाल्ड और मैं कभी-कभी उसी पार्टी में जाते थे जहां एपस्टीन भी होता था। क्योंकि न्यूयार्क और पाम बीच के सोशल सर्कल में ऐसा आम है। लेकिन मैंने एपस्टीन या उसकी साथी घिस्लेन मैक्सवेल के साथ कभी कोई रिश्ता नहीं रखा। उन्होंने कहा- मैं कांग्रेस से कहती हूं कि इन पीड़ित महिलाओं को शपथ लेकर अपनी कहानी बताने का मौका दें। हर महिलाओं, अगर वह चाहे, अपनी बात सार्वजनिक रूप से कहने का अधिकार है। जेफरी एपस्टीन पर मेलानिया की प्रेस काफ्रेंस से बहस फिर तेज हो गई है। जुलियट ब्रायंट ने मेलानिया को सीधी चुनौती देते हुए कहाः मैं शपथ लेकर सच बोलने को तैयार हूं। जुलियट ब्रायंट के वीडियो मैसेज से अमेरिका में हड़कंप मच गया। कुख्यात यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन से जुड़ा मामला एक बार फिर वैश्विक राजनीति और न्याय व्यवस्था के केंद्र में आ गया है। मेलानिया की टिप्पणी के बाद सर्वाइवर्स ने इसे पीड़ितों पर जिम्मेदारी डालने की कोशिश बताते हुए अपना विरोध जताया। इस बीच एपस्टीन सवीवर जूलियट ब्रायंट का एक वीडियो मैसेज तेजी से वायरल हो रहा है। उन्होंने मेलानिया ट्रंप को सीधे संबोधित करते हुए कहा कि अगर शपथ के तहत गवाही देने की बात है तो मैं खुद इसके लिए तैयार हूं और जो कुछ उन्होंने कहा है, वह सच है यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका में इस मामले पर संभावित सुनवाई की चर्चा भी हो रही है। जूलियट ब्रायंट पहले भी गंभीर आरोप लगा चुकी हैं। उनका दावा है कि उन्हें माडलिंग के झांसे में विदेश ले जाया गया, जहां उनका यौन शोषण किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें एपस्टीन के निजी द्वीप पर ले जाया गया और उनका पासपोर्ट छीन लिया गया। वीडियो में ब्रायंट ने यह भी दावा किया कि इस मामले में गवाही देने वाली कई लड़कियां अब जीवित नहीं हैं। वीडियो के अंत में ब्रायंट ने ट्रंप और मेलानिया से भी शपथ के तहत गवाही देने की मांग की। उनका कहना है कि देश के सामने प्रभावशाली लोगों के असली चेहरे सामने आएं।
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 14 April 2026

जिसका डर था वही हुआ

अमेरिका-ईरान के बीच शांति वार्ता विफल हो गई है। वार्ता बेनतीजा ही खत्म हो गई है। पाकिस्तान के इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच पहले दो राउंड में 21 घंटे से ज्यादा शांति को लेकर बातचीत चली, लेकिन यह बेनतीजा रही। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अपनी टीम के साथ अमेरिका के लिए रवाना भी हो गए। वेंस जाने से पहले बोले- समझौता न होने के लिए बुरी खबर ः वेंस ने एक प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि समझौता न होना अमेरिका से ज्यादा ईरान के लिए बुरी खबर है। उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका बिना किसी डील के ही लौट रहा है। किसी भी समझौते के लिए जरूरी है कि ईरान ये वादा करे कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। सीजफायर डील में अमेरिका की ओर से जेडी वेंस (उपराष्ट्रपति), स्टीव विटकॉफ (विशेष दूत), जेरेड कुशकर (सीनियर एडवाइजर और ट्रंप के दामाद) और ब्रैड कूपर (सैन्य अधिकारी शामिल हुए। ईरान की तरफ से मोहम्मद बागेर गालिबाफ (संसद अध्यक्ष), अब्बास अराघची (विदेश मंत्री) और मजीद तख्त खांची (उप-विदेश मंत्री) शामिल हुए। वार्ता में पाकिस्तान की ओर से प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सेना प्रमुख आसिम मुनीर, विदेश मंत्री इशाक डार व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार आसिम मलिक शामिल हुए। ईरान से 71 सदस्यीय डेलिगेशन पाकिस्तान पहुंचा। इस टीम में सिर्फ बातचीत करने वाले लोग ही नहीं थे बल्कि एक्सपर्ट सलाहकार, मीडिया प्रतिनिधि, डिप्लोमेट और सुरक्षा से जुड़े अधिकारी भी शामिल थे। ईरानी संसद के स्पीकर बागेर गलिबाफ जिस विमान से आए, वह बहुत खास था। वह पूरी दुनिया को अमेरिका का सितम दिखाने के लिए पाकिस्तान सुबूत लेकर आए थे। उनके साथ ऐसे यात्री भी आए जो इस दुनिया में अब नहीं हैं। दरअसल, इस विमान में बागेर गालिबाफ के साथ पाकिस्तान आने वाले दो बच्चे हैं। जो अमेरिकी-इजरायली हवाई हमले में अपनी जान गंवा चुके हैं। प्लेन की सीटों पर उन नन्हें बच्चों की तस्वीर रखी हुई थी। गालिबाफ ने वार्ता से पहले यह तस्वीर शेयर की जिसमें विमान की सीटों पर चार बच्चों की तस्वीरें रखी दिखाई देती थी, जिसके साथ एक-एक स्कूल बैग और फूल भी रखा गया था। ईरानी शहर मिनाब के स्कूल में 28 फरवरी को एक प्राइमरी स्कूल पर हमला हुआ था। इसमें 168 लोगों की मौत हो गई थी, जिसमें 160 स्कूली लड़कियां थीं। गालिबाफ ने वार्ता से पहले दिए बयान में कहा था कि उनका देश बातचीत और समझौते के लिए तैयार है। लेकिन इसके लिए अमेरिका को ईमानदारी से समझौते की पेशकश करनी होगी और ईरान के अधिकारों को स्वीकार करना होगा। उन्होंने साफ कहा कि ईरान के पास सद्भावना है, लेकिन अमेरिका पर भरोसा नहीं। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वार्ता शुरू होने से पहले ही कहा कि वाशिंगटन ईरान को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों पर रोक लगाने की इजाजत नहीं देगा। ट्रंप ने आगे कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य जल्द ही फिर से खुल जाएगा, चाहे ईरान सहयोग करे या न करे। ट्रंप ने आगे कहा कि ईरान के साथ किसी भी समझौते में उनका मुख्य ध्यान तेहरान की परमाणु क्षमताओं को सीमित करने पर होगा। उन्होंने कहा, कोई परमाणु हथियार नहीं। यही 99 प्रतिशत बात है। वार्ता तो फेल होनी ही थी। दोनों पक्षों की मांगों में बहुत बड़ा फासला था जिसे पाटना मुश्किल ही नहीं असंभव था।

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 11 April 2026

मिट जाएंगे पर झुकेंगे नहीं


जंगे हथियारों से नहीं जीती जाती, यह जज्बातों से जीती जाती है। ईरानी आवाम ने यह साबित कर दिया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी थी कि आज रात हम ईरान की सभ्यता को ही मिटा देंगे। इसके जवाब में ईरानी आवाम सड़कों पर उतर आई। अपने देश के अस्तित्व और ट्रंप की धमकी के जवाब में ईरानी आवाम अपने देश के पुलों और पावर प्लांटों को बचाने के लिए अमेरिका के सामने सीना तानकर खड़ी हो गई। ईरान के अहवाज, तबरीज, ईलाम सहित कई शहरों में हजारों लोगों ने बिजली संयंत्रों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों के चारों ओर लंबी मानव श्रृंखला बना ली। ईरानी समाचार एजेंसी तसनीम के अनुसार पुरुषों, महिलाओं और यहां तक कि बच्चों सहित बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए और ह्यूमन चेन बनाकर डट गए। प्रतिभागियों के हाथों में ईरानी झंडे और राष्ट्रीय नेताओं की तस्वीरों वाले पोस्टर थे और कई लोग मुख्य मार्ग पर एक-दूसरे का हाथ पकड़कर लंबी कतार में खड़े थे। ईरान के अ"ाज में व्हाइट ब्रिज में पावर प्लांट सहित कई स्थानों पर मानव श्रृंखला बनाई गई। यह मानव श्रृंखला वाशिंगटन की ओर से बढ़ती आक्रामक बयानबाजी का सीधा जवाब था। ईलाम के लोगों ने देश को निशाना बनाने वाली किसी भी सैन्य कार्रवाई का विरोध करने के लिए इस मानव श्रृंखला का सहारा लिया। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रीय एकता दिखाने के लिए देश भक्ति का यह जबरदस्त प्रदर्शन किया। इसका सीधा असर वाशिंगटन पर पड़ा। शायद उसको सद्बुद्धि आई कि ईरानी जनता जो सड़कों पर मानव श्रृंखला बनाकर खड़ी है उस पर हम हमला करेंगे तो सारी दुनिया में हमारी थू-थू हो जाएगी। इसीलिए ईरान की सभ्यता को खत्म करने की धमकी देने वाले डोनाल्ड ट्रंप आखिरी क्षणों में पीछे हट गए। ईरान का मौजूदा सैन्य रुख स्पष्ट संकेत देता है कि उसकी प्राथमिकता अपने शासन और सेना ढांचे को बचाए रखना है। इस्लामिक रिपब्लिक के नेतृत्व और सैन्य कमांडरों ने पिछले 3-4 दशकों से ऐसे ही संभावित टकराव की तैयारी की है। शहीद अयातुल्लाह अली खामेनेई ने कई वर्षें पहले ही यह देख लिया था कि किसी न किसी दिन यह स्थिति आएगी और अमेरिका-इजरायल हम पर हमला करेगा। आज अगर ईरान की इस जंग में जीत हुई है तो इसका असल हकदार शहीद अयातुल्लाह खामेनेई ही है। दरअसल मोसाद और नेतन्याहू ने ट्रंप को यह आश्वासन दिया था कि अगर हम अयातुल्लाह खामेनेई और ईरान कि वरिष्ठतम सैन्य कमांडरों को मार देंगे तो ईरान में अंदरूनी विद्रोह हो जाएगा और हम अपने समर्थक को सत्ता में बिठा देंगे पर उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि अयातुल्लाह खामेनेई की शहादत का ईरान की आवाम पर क्या असर होगा। असर उल्टा हुआ जो ईरानी इस्लामी सत्ता के खिलाफ भी थे वे भी अयातुल्लाह खामेनेई की शहादत के बाद सरकार के समर्थन में आ गए और इस जंग में ईरान का पलड़ा भारी हो गया। जैसे मैंने कहा कि गैर परमाणु युद्ध में जीत हथियारों से नहीं होती, जीत जज्बे से होती है, जिसका प्रदर्शन ईरानी जनता ने बाखूबी किया। दरअसल ईरान अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 9 April 2026

एटमी प्लांटों पर चौथा हमला कितना खतरनाक है


ईरान के बुशहर परमाणु केन्द्र के पास चौथी बार अमेरिकी-इजरायली हमला हुआ है। इस हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई। शनिवार को ईरान के बेहद महत्वपूर्ण बुशहर परमाणु पर से जानलेवा विकिरण का सीधा खतरा तो नहीं है लेकिन हवाओं के जरिए रेडियोधर्मी धूल गल्फ राज्यों और यहां तक कि भारत के पश्चिमी राज्यों तक पहुंचने का खतरा है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की चर्चा होने लगी है। अगर ईरान-इजरायल के बीच जंग खतरनाक स्तर पर पहुंचती है और ईरान की धरती पर परमाणु धमाका होता है, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है? क्या ईरान से उड़ने वाली रेडियोएक्टिव धूल हमारे शहरों तक पहुंचकर तबाही मचा सकती हैं? वैधानिक और रणनीतिक नजरिए से यह समझना जरूरी है कि हवा का रुख और दूरी इस खतरे को कैसे तय करती हैं? ईरान में अगर कोई परमाणु घटना होती है, तो सबसे ज्यादा तबाही उसके पड़ोसी देशों में देखने को मिलेगी। ईरान के 500 से 1000 किलोमीटर के दायरे में आने वाले इराक, तुर्किए, आर्मिनिया, अजरबैजान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देशों को बेहद घातक रेडिएशन का सामना करना पड़ेगा। इन देशों में रेडियोधर्मी धूल (फॉलआउट) सीधे तौर पर लोगों की सेहत और पर्यावरण को बर्बाद कर सकती है। हवा का बहाव के आधार पर इन देशों की सुरक्षा पूरी तरह दांव पर लगी होगी। ईरान के दक्षिण में स्थित खाड़ी देश जैसे सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, कतर और यूएई भी इस खतरे की चपेट में हैं। अगर ईरान के बुशहर जैसे तटीय परमाणु बिजली संयंत्रों को निशाना बनाया गया तो रेडियो एक्टिव रिसाव सीधे फारस की खाड़ी और अरब सागर के पानी को जहरीला बना सकता है। इससे समुद्री जीव-जंतुओं के साथ-साथ इन देशों की पेयजल व्यवस्था और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ेगा। समुद्री लहरें इस प्रदूषण को भारतीय तटों तक भी पहुंचा सकती हैं। विज्ञान के मुताबिक किसी भी परमाणु विस्फोट के बाद निकलने वाले सबसे खतरनाक और भारी रेडियोधर्मी कण धमाके वाले नगर से कुछ सौ किलोमीटर के दायरे में ही जमीन पर गिर जाते हैं। इतनी लंबी दूरी तय करते समय रेडिएशन का असर काफी हद तक कम हो जाता है। इसलिए तकनीकी रूप से भारत में तत्काल एक्यूट रेडिएशन सिकनेस यानि विकिरण से होने वाली गंभीर बीमारी का सीधा खतरा कम नजर आता है। भले ही भारत ईरान से काफी दूर है, लेकिन वायुमंडल में घुले रेडियोधर्मी कणों को हवाएं दूर तक ले जा सकती हैं। अगर हवा का रुख पश्चिम से पूर्व की ओर रहता है तो परमाणु बादल 48 से 72 घंटों के भीतर भारतीय आसमान तक पहुंच सकते हैं। ऐसी स्थिति में गुजरात, राजस्थान, पंजाब और दिल्ली जैसे राज्यों में रेडियो एक्टिव कणों की मौजूदगी दर्ज की जा सकती है। हालांकि भारत तक पहुंचते-पहुंचते ये कण इतने फैल और हल्के हो चुके होंगे कि इनसे जानलेवा खतरा होने की आशंका बहुत ही कम रहती है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि खाड़ी देशों और ईरान के आसपास बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं। हम ऊपर वाले से प्रार्थना करते हैं कि ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध में परमाणु केंद्रों पर सीधे हमले से बचें। अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा असर पूरी कायनात पर पड़ेगा।
-अनिल नरेन्द्र