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Thursday, 30 July 2026

क्या ईरान के आगे झुका है ट्रंप ?


अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर सीजफायर हो गया है और जंग फिर थम गई है। 13 दिनों में अमेरिका को भारी नुकसान हुआ है क्योंकि ईरान जार्डन और इराक में भी हमले कर रहा है। ईरान ने इस बार सिर्फ अमेरिकी बेस पर मौजूद हथियारों को टारगेट किया बल्कि अगर खबर सही है तो इन हमलों में अमेरिकी सैनिकों के मरने व घायल होने की बात ईरान कर रहा है। ट्रंप की सेना ने फिलहाल हमले रोक दिए हैं, नहीं तो वो लगातार 12-13 दिनों से हर रोज ईरान पर बमबारी कर रहा था। अमेरिका ने तो एक बार फिर भारी बी-1 बाम्बरों का भी इस्तेमाल किया। ईरान ने तो ताबड़तोड़ कई जवाबी हमले किए। जब अमेरिका ने हमले रोके तो ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई रोक दी। कहा जा रहा है कि अमेरिका के एयर डिफेंस मिसाइलों का स्टॉक कम हो चुका है, जिससे अरब क्षेत्र में अमेरिका ठिकानों की सुरक्षा करना मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से ट्रंप को पीछे हटना पड़ा है। दरअसल ईरान ने युद्ध की शुरुआत से ही सस्ते ड्रोन से लगातार हमले करने की रणनीति बनाई थी जिसका परिणाम ये हुआ कि अमेरिका को पैट्रियट मिसाइलों का इस्तेमाल बहुत अधिक करना पड़ा और चंद दिनों में ही मिसाइलों का स्टॉक कम हो गया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका पिछले 13 दिनों से अपने तमाम बेसों की सुरक्षा के लिए पैट्रियट मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहा था। 13 दिनों की जंग के बाद अब कहा जा रहा है कि अमेरिकी सेना के पास सिर्फ 900 से 1000 पैट्रियट मिसाइलें ही बची हैं। दूसरी तरफ अमेरिकी कंपनियां हर महीने सिर्फ 20 मिसाइलों का प्रोडक्शन कर रहा है। दूसरी तरफ ईरान ने अपनी मिसाइलें और ड्रोनों का स्टॉक लगातार बढ़ा लिया है और वह नई मिसाइलों और ड्रोनों का भी बहुत तेजी से निर्माण कर रहा है। अब अगर ईरान की तरफ से और हमले होते हैं तो अमेरिका की बची-खुची मिसाइलें भी खत्म हो जाएंगी। यह चेतावनी अमेरिका की सेटकॉम ने भी ट्रंप को दी है। ऐसे में अमेरिका को अपने बेस की सुरक्षा की फिक्र है। ईरान के हमलों से भी अमेरिकी डिफेंस को भारी नुकसान हुआ है। हमलों के दौरान अमेरिकी बेस पर कमांड एंड कंट्रोल सेंटर नष्ट हो चुके हैं। इसके अलावा 6 पैट्रियट एयर डिफेंस रडार नष्ट हो चुके हैं। अमेरिका हमलों की वजह से 3 ईपीएस रडार सिस्टम गंवा चुका है। हमलों में 5 लांग रेंज रडार भी नष्ट हो गए हैं। एक तरफ हथियारों की कमी है तो दूसरी तरफ नुकसान की वजह से युद्ध का बढ़ता खर्च भी ट्रंप पर दबाव बना रहा है। हमलों के दौरान अमेरिका का एक एफ-15 विमान नष्ट हो गया। एफपी-8 विमान भी नष्ट हो चुका है। ईरानी हमलों की वजह से सी-17 कार्गो विमान जल गया, 8 हवा में तेल भरने वाले रिफ्यूलिंग विमान भी नष्ट हो गए हैं। हमलों के दौरान 4 हेलिकॉप्टर नष्ट हो गए। 13 दिनों में अमेरिका को इसलिए भी भारी नुकसान हुआ है क्योंकि ईरान जार्डन और ईराक में भी हमले करता रहा। ईरान ने इस बार सिर्फ अमेरिकी बेस पर मौजूद हथियारों, विमानों को टारगेट किया बल्कि दावा किया जा रहा है कि चीन की सेटेलाइट्स की मदद से ईरान ने सटीक निशाने से हमला किया। कहा तो यह भी जा रहा है कि केवल एयर डिफेंस सिस्टम पर ही हमले नहीं हुए पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के कई ठिकानों पर भी सीधे हमले किए ताकि जो इंटेलिजेंस कह रहे थे उनको रोका जा सके। ईरान के हमलों में अमेरिका के नुकसान का ग्राफ बढ़ता गया। ईरान ने अमेरिका एयर डिफेंस को खाली करने की राणनीति को आगे बढ़ाया। ईरान ने विमानों के रैंप और हैंगर्स को निशाना बनाया है। बहरीन ने हेलीकॉप्टर चेनटेनस सेंटर को नष्ट किया। ईरान ने अमेरिकी बेस पर 12 तेल डिपो को तहस-नहस कर दिया। सबसे बड़ा दावा तो इराक के इटबिल बेस को लेकर है। ईरानी सेना का दावा है कि लगातार हमलों की वजह से इराक के इटबिल में अमेरिका का पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो चुका है और ईरान के ठिकानों की ऑपरेशनल क्षमता काफी हद तक खत्म हो चुकी है। यूं ही नहीं अमेरिका के राष्ट्रपति ने युद्ध बंद करने की घोषणा की। पर डोनाल्ड ट्रंप की बातों पर अब शायद ही कोई यकीन करे? इस युद्ध को रोकने की पीछे भी कोई नया खेल हो सकता है। पर ईरान हर स्थिति के लिए तैयार है।
- अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 28 July 2026

और अब सऊदी-हूतियों में जंग

मध्य-पूर्व एशिया में एक तरफ अमेरिका-ईरान की जंग थम नहीं रही, वहीं अब एक नया मोर्चा खुलता दिख रहा है। यह है सऊदी अरब और यमन के हूतियों के बीच। सऊदी अरब और हूतियों के बीच सीधा टकराव शुरू हो चुका है। शुक्रवार को लाल सागर में एक सऊदी मालवाहक जहाज पर हमला हुआ, जिसके बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया। हमले के कुछ ही देर बाद सऊदी अरब ने हूतियों के नियंत्रण वाले यमन के हुदैदाह शहर पर जबर्दस्त हवाई हमले किए। कहा जा रहा है कि अमेरिकी फाइटर जेट एफ-35 से यह हमले किए गए। इसके जवाब में हूतियों ने सऊदी अरब को बड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि उसने अपने नर्क के दरवाजे खोल दिए हैं। हूती विद्रोहियों ने हालिया हमले में सऊदी अरब की सैन्य कार्रवाई और अपनी घोषित नौसैनिक नाकेबंदी का जवाब बताया है। उनके अनुसार सऊदी से जुड़े जहाजों को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे सऊदी बंदरगाहों के लिए माल ढो रहे थे या हूतियों की घोषित नाकेबंदी का उल्लंघन कर रहे थे। बता दें कि हूती विद्रोही लंबे समय से सऊदी अरब को यमन युद्ध का प्रमुख पक्ष मानते हैं। उनका आरोप है कि सऊदी के सैन्य अभियानों से यमन में भारी तबाही हुई हैं। इसलिए वे सऊदी के आर्थिक और सामरिक हितों को निशाना बना रहे हैं। लाल सागर बता दें कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गें में से एक है। तेल टैंकरों पर हमलों से न केवल सऊदी अरब के निर्यात पर असर पड़ता है, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर ही दबाव बनता है। हालिया हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में भी उछाल देखा गया है। दरअसल, यमन में सक्रिय हूती विद्रोही मुख्य रूप से देश के अल्पंसख्यक जैदी शिया समुदाय से जुड़ा एक सशस्त्र संगठन है। इस संगठन का नाम इसके संस्थापक हुसैन अल-हूती के नाम पर पड़ा। हूती खुद को अंसार उल्लाह यानी ईश्वर के समर्थक भी कहते हैं। साल 2003 में अमेरिका के नेतृत्व में इराक पर हुए हमले के बाद हूती आंदोलन ने अमेरिका और इजरायल विरोधी रुख की ओर मुखर किया। संगठन के समर्थकों के बीच अमेरिका और इजरायल के खिलाफ नारे लगाए गए, जो आज भी उनकी वैचारिक पहचान का हिस्सा माने जाते हैं। हूती संगठन खुद को हमास और हिजबुल्लाह जैसे समूहों के साथ मिलकर ईरान समर्थित एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस यानी प्रतिरोध की धुरी का हिस्सा मानता है। उधर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हूती विद्रोहियों को चेतावनी दी कि अगर जहाजों पर हमले जारी है तो उनके खिलाफ बड़ी सैन्य कार्रवाई की जाएगी। हूती विद्रोहियों के हमले से मध्य-पूर्व एशिया में एक नया मोर्चा खुलने की संभावना बढ़ गई है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को पहले ही झकझोर रखा है। इस ताजा संघर्ष के कारण दुनिया भर में ईरान समेत अन्य वस्तुओं की कीमतों में तेज उछाल आया है। वहीं फारस की खाड़ी में तनाव और गहरा हो गया है। क्येंकि अमेरिका और ईरान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलमार्ग पर प्रभाव और नियंत्रण को लेकर आमने-सामने हैं। एपी के अनुसार साबा न्यूज ने हूतियों के हवाले से कहा कि गुरुवार को लाल सागर में सऊदी के दो जहाजें, एनसीलिया और लामला पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले किए, जिससे दोनों में आग लग गई। हूती का कहना है कि सऊदी अरब ने जो बरसों पुरानी नाकेबंदी लागू कर रखी है। उसके विरोध में सऊदी जहाजों के लिए नाकेबंदी की गई है। उधर दोनों पक्षों में शांति वार्ता की खबरें भी आ रही हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 25 July 2026

अमेरिका-सऊदी परमाणु करार

ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच खाड़ी से एक ऐसी खबर आई है जो न सिर्फ मध्य-पूर्व को बल्कि पूरी दुनिया को चौंका देगी। जिस यूरेनियम संवर्धन को लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की धरती कंपा रखा है, वहीं वो एक डील के तहत सऊदी अरब को देने वाला है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने बुधवार को घोषणा की कि उसने सऊदी अरब के साथ एक अभूतपूर्व समझौता किया है। इस समझौते के तहत सऊदी अरब अमेरिकी सहयोग से अपने असैन्य परमाणु कार्यक्रम को विकसित कर सकेगा। अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान ने शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु सहयोग से जुड़े एग्रीमेंट 123 पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच परमाणु सुरक्षा उपायों से संबंधित एक द्विपक्षीय समझौते पर भी हस्ताक्षर हुए। व्हाइट हाउस ने कहा, दोनों समझौते मिलकर कई दशकों तक चलने वाली और अरबों डॉलर की साझेदारी के लिए कानूनी आधार तैयार करते हैं। इस समझौते को अब समीक्षा के लिए अमेरिकी कांग्रेस के पास भेजा जाएगा। अधिकारिक घोषणा के बाद अमेरिका और दुनिया के कई देशों में इस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। इजरायल के अर्थ व्यवस्था मंत्री नीर बरकात ने कहा कि यदि सऊदी अरब परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों और बिजली उत्पादन तक सीमित रखता है, तो उनके देश को इसमें कोई आपत्ति नहीं है। अगर वे इसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने के लिए करता है तो इजरायल इसे कभी स्वीकार नहीं कर सकता। वहीं इजरायल के पूर्व रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री अविग्दोर लिबरमैन ने इसका विरोध करते हुए लिखा, सऊदी अरब का असैन्य परमाणु कार्यक्रम आखिरकार परमाणु हथियार कार्यक्रम में बदल जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे पूरे मध्य पूर्व में परमाणु हथियारों की होड़ तेज हो सकती है, जिसे उन्होंने एक पागलपन भरी हथियारों की दौड़ करार दिया। इस समझौते के तहत सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिल सकती है और अमेरिकी कंपनियों के लिए अरबों डॉलर की कमाई हो सकती है। द वाल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक समझौते को इस तरह से तैयार किया गया है कि अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब के उभरते न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर के केन्द्र में कई विदेशी कंपनियां इससे बाहर हैं। ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि सीधे अमेरिकी दखल से सऊदी न्यूक्लियर प्रोग्राम पर वाशिंगटन का असर बढ़ेगा। तर्क है कि अमेरिका की भागीदारी से न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी को सैन्य मकसद के लिए इस्तेमाल होने से रोकने में भी मदद मिलेगी। ये मामला पाकिस्तान की टेंशन भी बढ़ाने वाला है क्योंकि अब तक मुस्लिम देशों में सिर्फ पाकिस्तान ही है, जिसके पास परमाणु हथियार है। इसी के दम पर पाकिस्तान इस्लामिक नाटो बनाने के ख्वाब देखता है। सऊदी अरब ने भी उसके साथ डिफेंस डील इसीलिए की थी। ऐसे में अगर वो खुद इन हथियारों तक पहुंच रख सकेगा तो उसके लिए पाकिस्तान की प्रासंगिकता भी खत्म हो जाएगी। इस डील का अमेरिका के अंदर भी विरोध हो रहा है। अमेरिका में लोगों का कहना है कि क्या ट्रंप ये भूल गए हैं कि 9/11 हमले में जो 19 आतंकी थे उनमें से 15 सऊदी अरब से आए थे। अब आप उन्हीं से इतना खतरनाक समझौता करना चाहते हो। इससे न केवल मध्य-पूर्व में ही परमाणु हथियार बनाने की होड़ मचेगी बल्कि पूरी दुनिया में भी ऐसी कोशिश होगी। वैसे डोनाल्ड ट्रंप कब अपनी बात से पलट जाएं कहा नहीं जा सकता। हमने ईरान के साथ शांति समझौते का हाल देखा है। समझौता होने के बाद हस्ताक्षर होने के बावजूद ट्रंप ऐसी-ऐसी नई शर्तें जोड़ देते हैं जिससे वह समझौता खटाई में पड़ जाए। कल को यह भी संभव है कि इजरायल के दबाव में वह ऐसी नई शर्तें जोड़ दे जिससे ये समझौता खटाई में पड़ जाए। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 23 July 2026

क्या नेतन्याहू न्यूयार्क में गिरफ्तार हो सकते हैं?

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के गलियारों में इस समय न्यूयार्क से उठी एक आवाज ने हलचल मचा दी है। न्यूयार्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी ने कहा है कि अगर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सितम्बर में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में हिस्सा लेने के लिए न्यूयार्क आते हैं तो उनकी गिरफ्तारी की संभावना पर उनका कार्यालय अब भी विचार कर रहा है। द न्यूयार्क टाइम्स के पॉडकास्ट द इंटरव्यू में ममदानी ने कहा कि उनका कानूनी विभाग नेतन्याहू की संभावित गिरफ्तारी के कानूनी पहलुओं पर सक्रिय रूप से विचार कर रहा है। ममदानी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा करने का वादा भी किया था। ममदानी ने कहा, मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू की जगह हेग में है। वे एक युद्ध अपराधी हैं, जिन पर अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) ने आरोप लगाए हैं कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू की वजह से कई वर्षें में उनके कदमों के कारण जो हालात पैदा हुए हैं, उसे देखते हुए बहुत से लोग यही राय रखते हैं। जब ममदानी से पूछा गया कि कानून उन्हें इस मामले में क्या ऐसा करने की अनुमति देता है तो उन्होंने जवाब दिया, इस पर हमारी कानूनी विभाग के साथ सक्रिय चर्चा चल रही है, लेकिन हमारे राष्ट्रीय स्तर पर कई बार देखा है कि कुछ लोग अपने हिसाब से कानून लिखने या कानूनी दायरे से बाहर जाने की कोशिश करते हैं। हमारी मंशा ऐसा करना नहीं है। बता दें कि अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने 2024 में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और इजरायल के कुछ अन्य नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। उन पर 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद गाजा में युद्ध अपराध के आरोप लगाए गए हैं। यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि गाजा में जारी मानवीय त्रासदी से आहत दुनिया के एक बड़े हिस्से की अंतरात्मा की आवाज है। मेयर ममदानी का संकल्प अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने बेंजामिन नेतन्याहू के अलावा पूर्व रक्षा मंत्री गैलेंट के खिलाफ भी गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं। इन नेताओं पर गाजा में युद्ध के एक तरीके के रूप में भुखमरी का इस्तेमाल करने, भोजन, पानी, ईंधन और दवाओं जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को व्यक्तिगत रूप से रोकने और नागरिकों पर जानबूझकर हमले करने जैसे गंभीर आरोप हैं। ममदानी ने अपनी मंशा स्पष्ट करते हुए कहा कि वे न्यूयार्क शहर के कानून विभाग के साथ लगातार संपर्क में हैं ताकि यह जाना जा सके कि उनके पास एक विदेशी नेता व एक राष्ट्राध्यक्ष को हिरासत में लेने का कितना अधिकार है? उन्होंने कहा न्यूयार्क शहर में कानून मुझे जो कुछ भी करने की अनुमति देगा, हम वही करेंगे। हालांकि कुछ कानूनी जानकारों का मानना है कि अमेरिका आईसीसी का सदस्य नहीं है, इसलिए मेयर के लिए ऐसा करना जटिल हो सकता है। भले लॉ स्कूल के प्रोफेसर हेरोल्ड हौगजू कोह के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर शहर की सड़कों पर चलते समय नेतन्याहू की स्थिति संवेदनशील हो सकती है। इस संभावित कदम पर नेतन्याहू ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने ममदानी पर पलटवार करते हुए उन्हें हमास का समर्थक और गुप्त रूप से अमेरिका से नफरत करने वाला तक कह डाला। नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल अमेरिकी मूल्यों के साथ खड़ा रहने वाला लोकतंत्र है। उधर ममदानी इन आरोपों को खारिज करते हैं। इस बीच ममदानी के बयान पर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। कई लोगों ने इसे ममदानी का बड़बोलापन बताया है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी दूत माइक वाल्ट्स ने इस खबर पर पोस्ट किया। मेयर ममदानी, ये चार वजहें बताती है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान न्यूयार्क में प्रधानमंत्री नेतन्याहू को क्यों नहीं गिरफ्तार किया जा सकता है। पहला-अमेरिका उस संधि का पक्षकार नहीं है, जिस पर अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय की कानूनी-व्यवस्था आधारित है। दूसरा-संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय समझौते के अनुसार बैठकों में आने वाले विदेशी सरकार के प्रमुखों को राजनयिक संरक्षण प्रदान करता है। तीसरा-राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख की कानूनी इम्यूनिटी भी ऐसे मामलों में लागू होती है और चौथा- विदेश नीति ऐसे मामलों में संघीय सरकार का अधिकार स्थानीय प्रशासन से ऊपर होता है। इसलिए न्यूयार्क के मेयर की इच्छा या घोषणा से ऐसा कोई भी कदम उठाया नहीं जा सकता। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 21 July 2026

होर्मुज ईरान का ट्रंप कार्ड

ईरान ने होर्मुज स्टेट बंद कर अमेरिका के सभी रणनीतिक गणित और वैश्विक बाजार को हिला दिया है। यह ईरान का ऐसा तुरुप का पत्ता है जिसने ट्रंप को चारों खाने चित्त कर दिया है। ईरान ने बिना कोई बड़ा परमाणु कदम उठाए सिर्फ एक समुद्री रास्ते की चाबी अपने हाथ में लेकर अमेरिका के पूरे जंग की रणनीति को बदल दिया है। अब अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध का सबसे बड़ा मुद्दा होर्मुज को खोलने, खुलवाने का बन गया है। याद रहे कि 28 फरवरी से पहले यह होर्मुज कभी भी बंद नहीं हुआ था। यह विचार तो ईरान को तब आया जब अमेरिका ने 28 फरवरी को इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमले किए। ईरान ने होर्मुज का ताला लगाकर अमेरिका के सामने यह साफ कर दिया है कि अगर बातचीत करनी है तो शर्तें ईरान की होगी। होर्मुज का बंद होना न सिर्फ मध्य-पूर्व में ही असर डाल रहा है पर इसका प्रभाव अमेरिका में भी सीधा पड़ रहा है। मैं बात कर रहा हूं अमेरिका में होने वाले मिड टर्म चुनाव की जिनमें ट्रंप का राजनीतिक भविष्य कुछ हद तक टिका हुआ है। ईरान ने ठीक उसी समय होर्मुज पर दबाव बनाया है, जब अमेरिकी कूटनीति सबसे कमजोर मोड़ पर है। ईरान से तंग अमेरिकी कूटनीति के लिए एक बड़ा मिस कैलकुलेशन साबित हुआ है। सीजफायर खत्म होने के बाद से ही अमेरिका ईरान पर मिसाइलें बरसा रहा है और ईरान जवाबी हमले कर रहा है। लेकिन ईरान ने फिर अमेरिका को झुकाने के लिए अपने ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया और बारूदी धमाकों के बीच ईरान ने एक बार फिर होर्मुज को बंद कर दिया। ये ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका में मिड-टर्म चुनाव सिर पर हैं और अमेरिकी जनता से पेट्रोल के दाम गिरने का दावा कर रहे थे। ईरान ने ठीक उसी वक्त अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सबसे कमजोर नस यानी कच्चे तेल की सप्लाई पर पैर रख दिया है। अमेरिका-ईरान के बीच हमलों के बाद तेल की कीमतों में 3ज्ञ् से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई है। होर्मुज स्टेट ने तनाव बढ़ने और कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा होने की वजह से नवम्बर में होने वाले अमेरिकी मिड-टर्म चुनावों पर इसका सीधा असर पड़ने वाला है। वॉलिट और वोट समीकरण अमेरिकी राजनीति का कड़वा सच है क्योंकि अमेरिकी राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि राष्ट्रपति चाहे कोई भी वादा करे, लेकिन वोटर अपना फैसला पेट्रोल पंप पर तेल की कीमतों को देखकर ही तय करता है। इससे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उसकी विरोधी पाटी रिपब्लिकन पाटी पर भारी राजनीतिक दबाव बढ़ेगा? राष्ट्रपति ट्रंप के सत्ता में आने के बाद पेट्रोल के दाम 2.50 डॉलर प्रति गैलन तक लाने का वादा किया था, लेकिन होर्मुज संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतें 80 डॉलर से 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जिससे पेट्रोल के दाम घटने के बजाय बढ़ रहे हैं। पेट्रोल महंगा होने का मतलब है आज अमेरिकी परिवार के बजट पर सीधा दबाव पड़ेगा, अमेरिकी जनता की जेब पर सीधी मार होगी। इससे अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी, ट्रांसपोर्टेशन बढ़ने से सुपर मार्केट के सामान से लेकर हवाई टिकट तक सब महंगा होगा। इतिहास गवाह है कि जब भी चुनाव से ठीक पहले अमेरिका में ईंधन के दाम बढ़े हैं। सत्ताधारी दल को चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ा है। जैसे 1979 में जिमी कार्टर के साथ हुआ था। होर्मुज बंद होते ही वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ने लगे हैं। इंटरनेश्नल बेच मार्क ब्रेट क्रूड 3.92ज्ञ् से बढ़कर 78.99 डॉलर प्रति बैरल हो गया और अमेरिकी क्रूड 3.44ज्ञ् से बढ़कर 73.87 डालर प्रति बैरल हो गया है। अगर होर्मुज लंबे समय तक यूं ही बंद रहता है तो इसका असर अमेरिका पर ही नहीं पूरे विश्व पर पड़ेगा और ऐसा होने से रोकने की चाबी सिर्फ ईरान के हाथ में है। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 18 July 2026

ट्रंप: मोजतबा खामेनेई 90 फीसदी खत्म?

ईरान के नए सर्वेच्च नेता मोजतबा अली खामेनेई अपने पिता आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भी नहीं दिखे थे और तब से ही उनकी सेहत को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फॉक्स न्यूज से कहा कि आयतुल्लाह अली खामनेई मारे जा चुके हैं और उनके बेटे मोजतबा खामेनेई भी 90 फीसदी खत्म हो चुके हैं। ट्रंप ने आगे कहा कि उनके पास अब कोई नौसेना नहीं बची है, उनकी वायु सेना भी नहीं बची है, सब कुछ खत्म हो चुका है। उनका एयर डिफेंस सिस्टम भी खत्म हो चुका है। उनके सभी नेता मारे जा चुके हैं। उनके सबसे बेहतरीन नेता मारे जा चुके हैं। इससे पहले मोजतबा खामेनेई के नाम से शनिवार को जारी एक लिखित बयान में पूर्व सर्वेच्च नेता आयतुल्लाह अली खामनेई की हत्या का बदला लेने की कसम खाई। बयान में कहा गया था कि हम अपने पवित्र खून और इन दोनों युद्धों में शहीद हुए सभी लोगों के खून का बदला लेने की कसम खाते हैं। दुनिया भर में ऐसे लोग मौजूद हैं जो बदला लेने को तैयार हैं। इसी साल 23 अप्रैल को अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें बताया गया था कि ईरान के नए सर्वेच्च नेता मोजतबा खामेनेई अमेरिका-इजरायल के उस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसमें उनके पिता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई थी। हालांकि वह मानसिक रूप से पूरी तरह सक्रिय हैं। अखबार ने अधिकारियों के हवाले से कहा था, उनके एक पैर का तीन बार ऑपरेशन किया गया है और अब उन्हें कृत्रिम संक्रमित पैर (प्रोस्येटिक) लगाए जाने का इंतजार है। उनके एक हाथ की भी सर्जरी हुई है और उसकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे वापस आ रही है। उनके चेहरे और होंठ पूरी तरह झुलस गए हैं, जिससे उन्हें बोलने में कठिनाई होती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि आखिरकार उन्हें प्लास्टिक सर्जरी की भी जरूरत होगी। बता दें कि इसी साल 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल हवाई हमलों में आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद मोजतबा खामेनेई को सर्वेच्च नेता नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के बाद से ही वह सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए हैं। उन्होंने कोई वीडियो संदेश भी जारी नहीं किया है। इससे इस बात को लेकर सवाल उठे हैं कि उसी हमले में वह कितने गंभीर रूप से घायल हुए थे? आयतुल्लाह अली खामेनेई के अन्य तीन बेटे मसूद, मुस्तफा और मेमसाम रविवार को आयोजित श्रद्धांजलि सभा में शामिल हुए थे। उनके साथ राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और रिव्यूल्शनरी गार्ड्स के प्रमुख अहमद वहीदी सहित कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। जून में जारी एक बयान में मोजतबा खामेनेई ने कहा था कि सिद्धांत रूप से वह अमेरिका के साथ डील के पक्ष में नहीं थे। लेकिन राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के आश्वासनों के बाद ही उन्होंने इसकी अनुमति देने का फैसला किया। कुवैती अखबार अल जरीदा ने मार्च 2026 में एक रिपोर्ट की थी। इसके मुताबिक मोजतबा खामेनेई को शुरुआत में इलाज के लिए मास्को ले जाया गया था। उसके बाद मोजतबा के स्वास्थ्य को लेकर कोई खबर नहीं आई। इस वक्त मॉस्को खुद असुरक्षित है, वहां लगातार यूव्रेन का हमला हो रहा है, इसलिए इस वक्त चीन को मोजतबा के लिए सुरक्षित माना जाता है। ईरानी जनता चाहती है कि जल्द आयतुल्लाह मोजतबा आवाम के सामने आएं ताकि दुनिया देख सके कि वह ठीक हैं, सुरक्षित हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 16 July 2026

आंख के बदले आंख

मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान ने दावा किया कि उसने आंख के बदले आंख नाम से सैन्य अभियान शुरू करते हुए खाड़ी क्षेत्र में मौजूद ठिकानों पर मिसाइल हमले किए हैं। ईरान का कहना है कि यह कार्रवाई हाल के अमेरिकी हमलों के जवाब में की गई है। इस दावे के बाद पूरे क्षेत्र में युद्ध तेज हो गया है। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब एक बार फिर खुली जंग का रूप ले चुका है। यह संघर्ष अब सिर्फ सीमित क्षेत्रों तक ही नहीं रहा बल्कि पूरे मिडल ईस्ट, वैश्विक तेल बाजार और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार तक फैल चुका है। यह कहना गलत नहीं होगा कि अब यह युद्ध बढ़ता जा रहा है और भयानक रूप अख्तियार कर सकता है। ईरान के सरकारी मीडिया के मुताबिक इस अभियान के तहत खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। ईरान का दावा है कि उसका उद्देश्य उन ठिकानों को जवाब देना था, जहां से उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई की गई थी। ईरान ने इस सैन्य कार्रवाई को आंख के बदले आंख (आई फॉर एन आई) नाम दिया है। इस नाम का सीधा संदेश है कि वह अपने खिलाफ हुई हर सैन्य कार्रवाई का जवाब देगा। ईरान लंबे समय से कहता आ रहा है कि अगर उसकी देश की सुरक्षा या उसके सैन्य ठिकानों पर हमला होगा तो वह जवाबी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। इसी नीति के तहत उसने पहले भी कई बार जवाबी कार्रवाई की घोषणा की है। ईरान की आईआरजीसी ने दावा किया है कि उसने आई फॉर एन आई अभियान के तहत जार्डन, बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। पहले चरण में जार्डन के प्र्रिंस हसन एयरबेस पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए। दूसरे चरण में बहरीन के शेख ईसा एयरबेस पर हमला कर हेलीकॉप्टर और ड्रोन सुविधाओं को निशाना बनाया गया। तीसरे चरण में कुवैत के अली अल-अलेम एयरबेस और अहमद अल-जाबेर एयरबेस पर हमले का दावा किया गया। ईरान ने कहा कि यह कार्रवाई अमेरिकी सैन्य हमलों के जवाब में की गई है। खाड़ी क्षेत्र दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का सबसे अहम केन्द्र माना जाता है। यहीं से दुनिया के बड़े हिस्से में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है। अगर अमेरिका ईरान के बीच यह युद्ध और तेजी पकड़ता है तो इसका सीधा असर होर्मुज स्टेट पर पड़ेगा, बल्कि पड़ना शुरू हो गया है। अमेरिका के लगातार ईरान पर हमलों के जवाब में ईरान ने होर्मूज बंद करने का एलान भी कर दिया है। इसका सीधा असर अंतर्राष्ट्रीय तेल कीमतों, शिपिंग लागत और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ेगा। भारत जैसे देश जो अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी से पूरा करते हैं, वे भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। यह पहली बार नहीं जब ईरान ने बदले के लिए सैन्य कार्रवाई का वादा पूरा करने का प्रयास किया है। जनवरी 2020 में जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद ईरान ने इराक में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें दागी थीं। अप्रैल 2024 में दमिश्क स्थित ईरानी दूतावास पर हमले के बाद भी ईरान ने पहली बार सीधा अपनी जमीन से इजरायल पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए थे। इससे साफ है कि ईरान अपनी सुरक्षा नीति में जवाबी कार्रवाई को महत्वपूर्ण रणनीति मानता है। 

 -अनिल नरेन्द्र