Anil Narendra Blog
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Tuesday, 8 September 2026
छात्रा के पिता का हमलावर गिरफ्तार
Saturday, 5 September 2026
पुतिन से युद्ध खत्म करने की अपील
युद्ध मानव सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है और आज एक नहीं कई युद्ध चल रहे हैं। यह जानते हुए भी कि युद्ध से समस्याओं का हल तो दूर उल्टा युद्ध नई जटिलताओं को जन्म देता है। युद्ध के लक्षण जान-माल की भारी क्षति, आर्थिक बर्बादी, विस्थापन और सामाजिक अस्थिरता के रूप में सामने आते हैं। रूस-यूक्रेन और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष इसके उदाहरण हैं। भारत हमेशा वैश्विक शांति का समर्थक रहा है और युद्ध के स्थान पर महात्मा बुद्ध, महात्मा गांधी के शांति मार्ग पर चलने का संदेश देता रहा है। इसी प्रतिबद्धता को दर्शाते हुए किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन के मौके पर रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के साथ बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अंतहीन युद्ध के बजाए इसके अंत की ओर बढ़ने की वकालत की। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध को खत्म करने की अपील की। पीएम मोदी ने सोमवार को कहा, युद्ध में बिताया गया हर दिन मानवता को पीछे धकेलता है और शांति की दिशा में उठाया गया हर कदम मानवता को नई आशा और उत्साह से भर देता है। यूक्रेन में युद्ध खत्म करने पर पीएम मोदी की टिप्पणियां हैरान करने वाली नहीं है और ये भारत की विदेश नीति में किसी भी किस्म के सामरिक बदलाव का संकेत नहीं देती है। दरअसल, संघर्ष शुरू होने के बाद साल 2022 में एक क्षेत्रीय शिखर सम्मेलन के दौरान बोलते हुए, मोदी ने पुतिन से सार्वजनिक रूप से कहा था कि यह युद्ध का समय नहीं है। लेकिन यह कहना बहुत आसान होगा कि युद्ध पर मोदी के अभी या पहले के बयानों को पुतिन या रूस स्ट्रैटजी को जवाब देने के तौर पर देख जा सकता है। पश्चिमी देशों ने मोदी पर स्पष्ट रुख अपनाने के लिए काफी दबाव डाला है लेकिन भारत काफी हद तक तटस्थ रहा है। भारत ने इसके बजाए युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत का आग्रह किया है। बेशक इस रुख से कई पश्चिमी देश खुश नहीं हैं, लेकिन उन्होंने भारत को लुभाना जारी रखा है क्योंकि भारत इतनी बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह पहली बार नहीं है जब किसी विदेशी नेता ने सार्वजनिक रूप से पुतिन से यूक्रेन से युद्ध समाप्त करने का आग्रह किया हो। महज पांच हफ्ते पहले कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कसीम-जोमार्ट टोकायेव ने पुतिन को सुझाव दिया था कि वे संघर्ष को रोक दें और बातचीत की मेज पर लौट आएं। शांति के लिए इन सार्वजनिक अपीलों से पुतिन की रणनीति में कोई बदलाव आने के संकेत नजर नहीं आते। मोदी द्वारा युद्ध विराम के आ"ान पर क्रेमलिन नेता ने जवाब दिया बहुत-बहुत धन्यवाद प्रधानमंत्री जी। हम इसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं। विनम्र, लेकिन मान्यवर और कोई स्पष्ट जवाब नहीं। आखिरकार एक रास्ता छोटा भी हो सकता है, लेकिन यह लंबा भी हो सकता है। सारे सुबूत बताते हैं कि रूस की लीडरशिप को अब भी यकीन है कि वह युद्ध में यूक्रेन से मिलिट्री जीत की राह पर है। इसे शांति के मामले में कहें तो रूस की शर्तें पर मिलिट्री सफलता से तय शांति की ओर आगे बढ़ना। इसलिए, फिलहाल लड़ाई जारी है। इस तथ्य के बावजूद कि साढ़े चार साल से अधिक के युद्ध और भारी सैन्य नुकसान के बाद भी व्रेमलिन को अभी तक जीत हासिल नहीं हुई है और यूक्रेन ने युद्ध को रूसियों के घर तक वापस लाने में सफलता हासिल की है।
-अनिल नरेन्द्र
Thursday, 3 September 2026
त्रासदी के पीछे चीन जिम्मेदार
नेपाल में फ्लैश फ्लड में मरने वालों की संख्या 1000 से ज्यादा हो गई है, 4000 से ज्यादा लापता हैं, जिसमें 287 भारतीय भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक नेपाल की सेना ने अब तक 12000 लोगों को सुरक्षित बचाया है। लापता लोगों में 517 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। नेपाल में चीन के रवैये को लेकर भारी असंतोष है और सवाल उठने लगे हैं। बुधवार को तिब्बत में बनी बैरियर लेक टूटने के बाद चीन ने नेपाल से सूचना साझा करने में लापरवाही बरती, जिससे नेपाली नागरिकों में आक्रोश फैल गया है। तिब्बत में 20 लाख घन पानी जमा हो गया था, लेकिन अलर्ट तब भेजा गया, जब झील टूट चुकी थी। रसुवा के प्रमुख जिला अधिकारी नरेन्द्र परियार ने बताया कि उन्हें झील टूटने की जानकारी नेपाली सेना के माध्यम से मिली। चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने कोई सूचना साझा नहीं की। झील भरने के बाद ओवर फ्लो शुरू हुआ और शाम को चीन ने तिब्बत में बचाव अभियान शुरू किया। बुधवार सुबह 8.40 बजे भोटेकोशी नदी में जल स्तर का आंकड़ा भेजा गया। इसी बीच तिब्बत से आया तेज बहाव नेपाल में प्रवेश कर गया। नेपाल को इसकी जानकारी 16 मिनट बाद जब मिली जब सैलाब तबाही मचाने लगा। आरोप लगाए जा रहे हैं कि चीन की ओर से नेपाल में जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता था। हालांकि नेपाल स्थित चीनी दूतावास ने इन आरोपों और सोशल मीडिया पर वायरल हो रही खबरों का खंडन किया है। इस बीच अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भी चीन की भूमिका को लेकर चर्चा हो रही है। नेपाली न्यूज आउटलेट्स से लेकर चीनी मीडिया ने इस मुद्दे को रिपोर्ट किया है। नेपाली अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने मई में ही चीन से ग्लेशियर, पानी के स्तर और अन्य संभावित खतरों की जानकारी समय रहते साझा करने का आग्रह किया था। उनका मानना है कि सीमा पार से मिलने वाली नियमित चेतावनी कई जानें बचाने में मदद कर सकती थी। इस साल 27 मई को काठमांडू में नेपाल और चीन के पर्यावरण विशेषज्ञों की बैठक हुई थी। बैठक में ग्लेशियर झीलों की सूची तैयार करने और पूर्व चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने पर भी जोर दिया गया। हालांकि, नेपाली अधिकारियों के मुताबिक बैठक के बाद उन्हें चीन से अपेक्षित स्तर पर ग्लेशियर और जल स्तर संबंधी जानकारी नहीं मिल सकी। चीनी विश्व मौसम विज्ञान केन्द्र ने आपदा से पहले नेपाली अधिकारियों को ई-मेल से 14 और 19 अगस्त के बीच भारी बारिश और भूस्खलन की आशंका जताई थी। लेकिन नेपाली अधिकारियों का कहना है कि ऐसी चेतावनियां ग्लेशियर टूटने जैसी संकेत नहीं देती। नेपाल के लोगों का कहना है कि मौत का ये सैलाब चीन से आया। वहां ग्लेशियर फटा, वो हिस्सा नेपाल से 50 किलोमीटर दूर है। बाढ़ के पानी को नेपाल तक पहुंचने में 30 से 40 मिनट लगे। अगर चीन ने ये सूचना समय रहते नेपाल को दी होती तो हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती थी। लोगों को सुरक्षित ठिकानों तक पहुंचाया जाने के लिए आधा घंटा काफी था, लेकिन चीन ने ये सूचना शेयर नहीं की। पानी के बहाव का परिणाम और पानी के साथ आया मलबा इतना भयानक था कि रास्ते में जो कुछ आया जैसे इमारतें, पुल, सड़कें सब कुछ बहाकर ले गया। लेकिन खतरा अभी भी टला नहीं। अगर चीन का डैम टूटा तो वहां से दूसरा फ्लैश फ्लड आ सकता है। चीन से भेजी गई इस तबाही को नेपाली कभी भूलेंगे नहीं।
-अनिल नरेन्द्र