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Thursday, 25 June 2026

वार्ता को दिया मीनाब 168 नाम

 
स्विट्जरलैंड में रविवार को अमेरिका के साथ शांति वार्ता के लिए ईरानी प्रतिनिधिमंडल को मीनाब 168 नाम दिया गया। मानना पड़ेगा कि नैरेटिव सेट करने में ईरानियों का जवाब नहीं है। वह कैसे अपने शहीदों को न तो भूलते हैं और न ही दुनिया को भूलने देते हैं। ईरान चाहता है कि पूरी दुनिया ईरान पर अमेरिका और इजरायल के अत्याचारों की दास्तां देखें और सुनें। ईरानी प्रेस टीवी के अनुसार ये नाम मीनाब स्कूल पर अमेरिकी-इजरायली टॉमहॉक मिसाइल हमले में मारी गई 168 स्कूल बच्चियों के सम्मान में दिया गया। इस स्कूल (मीनाब) पर 28 फरवरी को युद्ध के पहले दिन ही हमला हुआ था। दरअसल, ईरान पिछले तीन महीने से एक कैंपेन मीनाब 168 चला रहा है और इसे खूब प्रसारित कर रहा है। हर मंच पर ईरान उस कैंपेन के साथ नजर आता है। स्विट्जरलैंड और यहां तक की फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल में भी यह नजर आया। आइए इसके पीछे की कहानी भी जानते हैं... स्विट्जरलैंड में अमेरिका के साथ समझौता वार्ता से पहले ईरान ने फैसला लेकर पूरी दुनिया को चौंका दिया। दरअसल, ईरान और स्विट्जरलैंड में अमेरिका के साथ शांति समझौता वार्ता को मीनाब 168 नाम दिया है। अमेरिका से वार्ता के लिए ईरान का प्रतिनिधिमंडल उसी जहाज में पहुंचा जिस पर मीनाब 168 लिखा था। फीफा वर्ल्ड कप 2026 में बेल्जियम के खिलाफ मैच खेलने के लिए मैदान में उतरे ईरान के फुटबाल खिलाड़ियों की जसी पर मीनाब 168 लिखा था। हमले में मारी गई बच्चियों के सम्मान में ईरान दुनिया को उनकी शहादत को भूलने नहीं दे रहा है। पिछले तीन महीने से ईरान पूरी दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि लड़ाई के पहले दिन ही किस तरह अमेरिका-इजरायल ने मानवता की सारी हदें पार करते हुए निर्देष मीनाब स्कूल की बच्चियों को मार डाला। हमले में मारी गई 168 स्कूली बच्चियों के सम्मान में और उन्हें इंसाफ दिलाने के लिए मीनाब 168 अभियान चलाया जा रहा है। आईआरजीसी के कथित ठिकाने पर हमले की आड़ में मिसाइल एक बच्चों के स्कूल पर जा गिरी। अमेरिका इससे इंकार करता रहा। पहले तो उसने कहना शुरू कर दिया कि यह मिसाइल खुद ईरान ने गलती से मार दी पर फिर अमेरिकी मीडिया ने इसका पर्दाफाश करते हुए साबित किया कि यह मिसाइल अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल थी जो बहरीन के एयरबेस से मारी गई थी। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए बहरीन के इस अमेरिकी बेस को निशाना बनाया और तबाह किया। ईरानी प्रतिनिधिमंडल पहले राउंड में इस्लामाबाद पहुंचा था तो जिस विमान में वे आए थे उसकी कुर्सियों पर शहीद हुई बच्चियों के स्कूल बैग, किताबें, खाने के टिफिन इत्यादि रखे हुए थे ताकि सारी दुनिया इस हुए जुल्म को देख सके। ईरान चाहता है कि पूरी दुनिया ईरान पर अमेरिका और इजरायल के अत्याचारों की दास्तां सुने और देखें कि यह दोनों देश अपने फायदे के लिए किस हद तक जा सकते हैं। इसलिए फीफा वर्ल्ड कप 2026 में अमेरिकी शहर लॉसएंजिल्स में ईरान और बेल्जियम के बीच हुए मैच के दौरान कई ईरानी प्रशंसकों ने मीनाब हमले में मारे गए बच्चों को श्रद्धांजलि देने वाली तस्वीरें और जसी लहराई। ईरान के खिलाड़ी भी मीनाब 168 स्टिकर वाली जसी पहने दिखे। एक समर्थक ने एक स्टिकर दिखाया जिस पर एक स्कूल बैग बना था और उस पर 168 लिखा था। हैशटेग एंजल ऑफ मीनाब भी था और संदेश था कि इजरायल और अमेरिका के हमले में मारे गए मीनाब स्कूल के 168 बच्चों को याद रखें। बता दें कि भारत में अप्रैल में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में भी ईरान मीनाब 168 लिखे विमान में भारत आया था। अमेरिका से शांति वार्ता के लिए पाकिस्तान की यात्रा से पहले ईरानी संसद के स्पीकर बगेर गालिबफ ने ईरान के मिजाज का संकेत देते हुए समय पर तस्वीरें शेयर की जिसमें मीनाब हमले में मारी गई स्कूली बच्चियों की फोटो हवाई जहाज की सीटों पर चिपकी हुई थीं और वे उनके सामने खड़े होकर यानी कह रहे हों, इस फ्लाइट में मेरे सहयात्री। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 23 June 2026

शांति व अमन का दुश्मन नेतन्याहू

जब भी पिछले 80 वर्षें का दुनिया का इतिहास लिखा जाएगा उसमें दो नामों का विशेष उल्लेख होगा। जब भी मानवता के नरसंहार का वर्णन आएगा उसमें पहला नाम जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर का होगा और दूसरा नाम इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का होगा। नेतन्याहू इस सदी के नंबर वन विलेन बन कर उभरे हैं। जब भी मध्य-पूर्व में शांति की बात होती है तो उसमें नेतन्याहू कोई न कोई अड़ंगा लगा देते हैं। आप ताजा उदाहरण ही देख लें। अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता चल रही है, एमओयू भी साइन हो गया है पर नेतन्याहू अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे और अब तो वह अपने इकलौते मित्र देश अमेरिका को भी खुलकर गाली दे रहे हैं। यही वजह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कहना पड़ा कि तुम पागल हो चुके हो और मैं अगर तुम्हें न बचाता तो आज तुम जेल में होते। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजरायली कैबिनेट मंत्रियों को लताड़ते हुए कहा कि उन्हें उस ताकतवर सहयोगी पर हमला नहीं करना चाहिए क्योंकि अमेरिका के अलावा उसके साथ आज कोई नहीं है। वेंस ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व्यक्तिगत हमलों से परेशान हैं। उन्होंने ट्रंप को पूरी दुनिया में इजरायल के प्रति सहानुभूति रखने वाला एक मात्र राष्ट्राध्यक्ष कहा है, उन्हें यह भूलना नहीं चाहिए। आखिर नेतन्याहू क्यों किसी भी शांति समझौते का विरोध करते हैं? इसके पीछे नेतन्याहू का राजनीतिक अस्तित्व, सरवाइवल प्रमुख कारण है। नेतन्याहू अपनी गद्दी सुरक्षित रखने के लिए कभी गाजा पर हमले कर रहे हैं, कभी लेबनान पर तो कभी ईरान पर। उनके इस आचरण पर ट्रंप सख्ती से बोलते भी नहीं। इसके पीछे एक कारण हो सकता है एपस्टीन फाइल्स! दुनिया जानती है कि इजरायल के पास वह बदनाम, ब्लैकमेल करने वाली एपस्टीन फाइल्स है जिनमें ट्रंप समेत दर्जनों राष्ट्राध्यक्ष फंसे हुए हैं। यह बात ट्रंप समझते हैं तभी तो इजरायल को रोक नहीं पा रहे हैं। नेतन्याहू की एक मजबूरी है वह है उनके खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के केस। नेतन्याहू के खिलाफ आपराधिक और दीवानी मामलों के साथ नियमित अदालती कार्यवाही चल  रही है। नेतन्याहू ने इसे आगे बढ़ने से यह कहकर रोक रखा है कि इजरायल इस समय युद्ध लड़ रहा है और यह पहली प्राथमिकता है, इसलिए इसे फिलहाल टाला जाए। नेतन्याहू इससे इतने परेशान हैं कि उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप से बाकायदा इजरायल के राष्ट्रपति से गुजरिश की थी कि नेतन्याहू के खिलाफ केसों को खत्म कर दें, वह माफी दे दें पर इजरायली राष्ट्रपति नहीं माने। इन केसों से बचने के लिए और संभावित जेल की सजा से बचने के लिए नेतन्याहू कहीं न कहीं लड़ाई जारी रखते हैं। अब जब अमेरिका-ईरान में शांति वार्ता जेनेवा में चल रही है और एमओयू पर आगे बातचीत चल रही है। नेतन्याहू ने इसमें भाजी मारने के लिए लेबनान पर युद्ध छेड़ रखा है। नेतन्याहू का तो अब इजरायल के अंदर भी विरोध होना शुरू हो गया है। इसी साल के अंत में इजरायल में आम चुनाव होने हैं जिसमें नेतन्याहू की सरकार जा सकती है। बेंजामिन नेतन्याहू पर पिछले कई वर्षें से रिश्वत खोरी, धोखाधड़ी और विश्वासघात के गंभीर आरोप लगे हैं। इजरायल के इतिहास में नेतन्याहू पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो पद पर रहते हुए अदालती कार्यवाही का सामना कर रहे हैं। फरवरी के अंत में ईरान के साथ संघर्ष चरम पर था और इजरायल-अमेरिका एयर स्ट्राइक के बाद नेतन्याहू ने देश में इमरजेंसी लगा दी थी। इस दौरान सुरक्षा कारणों से अदालती कार्यवाही को भी टाल दिया गया था और यह अब भी टाली जा रही है। जब तक इजरायल किसी से लड़ाई बंद नहीं करता। नेतन्याहू इसी बहाने अदालती कार्यवाही टालते रहेंगे। जैसे मैंने कहा कि दिलचस्प बात यह भी है कि डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में इजरायली राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग से नेतन्याहू को माफी देने की वकालत की थी। हर्जोग ने स्पष्ट किया कि इजरायल एक कानून से चलने वाला संप्रभु राष्ट्र है और वह बिना किसी बाहरी दबाव के अपने न्यायिक फैसले खुद लेगा।  

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 20 June 2026

बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

करीब 4 महीने तक चले अमेरिका-ईरान के युद्ध के बाद समझौते पर सहमति बनी है। इस चार महीने चले संघर्ष में कौन जीता, कौन हारा? हमें तो लगता है कि इस युद्ध में ईरान की भव्य जीत हुई है। यह हम इसलिए कह रहे हैं कि जिन उद्देश्यों को लेकर अमेरिका-इजरायल ने मिलकर 28 फरवरी को युद्ध शुरू किया था उसमें से कोई भी उद्देश्य वह पूरा नहीं कर सका और अंत में तेरे कूचे से हम बे-आबरू होकर निकले। अमेरिका-इजरायल ने अपने पहले ही हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को शहीद कर दिया। उसी दिन ट्रंप ने कहा- ईरान के महान लोगों, आपकी आजादी का समय आ गया है... जब हम अपना काम पूरा कर लेंगे तो आप अपनी सरकार पर कब्जा कर लीजिए यानी हम रेजीम चेंज कर देंगे। ताकि ईरान में वह रेजीम बदल सके? एक उद्देश्य था ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल कार्यक्रम को समाप्त करना। इसमें ईरान के एनरिच्ड यूरेनियम पर भी कब्जा करना था या उसे खत्म करना था। न तो ईरान में रेजीम चेंज हो सकी, न परमाणु कार्यक्रम बंद हुआ और न ही मिसाइल कार्यक्रम पर पाबंदी ही लगा सके। अब बात करते हैं हेर्मुज स्ट्रेट को खोलने की। पहली बात तो 28 फरवरी से पहले होर्मुज खुला हुआ था कभी भी बंद नहीं था। उल्टा आपने ईरान को एक ऐसा हथियार दे दिया जिसके बारे में उसने पहले कभी भी नहीं सोचा होगा। अब ईरान और ओमान मिलकर होर्मुज स्ट्रेट को अपनी मिल्कियत मान रहे हैं और हर गुजरते जहाज से सर्विस चार्ज ले रहे हैं। यह थे प्रमुख उद्देश्य जिनको लेकर अमेरिका-इजरायल ने 28 फरवरी से हमले शुरू किए थे।  अब ट्रंप खुद देख सकते हैं कि इनकी प्रवृत्ति में इन्हें कितनी सफलता मिली। ईरान की मुकम्मल जीत हुई। अब बात करते हैं अमेरिका को इस अभियान की कितनी भारी कीमत उठानी पड़ी। उनके गल्फ राष्ट्रों में 14 बेस तबाह हो गए। 40 से ज्यादा लड़ाकू विमान नष्ट या डेमैज हो गए, राडार और एयर डिफेंस सिस्टम तबाह हो गए। अमेरिका ने ईरान जंग में अब तक 113 बिलियन डॉलर यानी 10 लाख करोड़ रुपए स्वाह कर दिए। ऐसा नहीं कि ईरान को इसकी कीमत चुकानी नहीं पड़ी। ईरान सरकार के मुताबिक हमलों के पहले 40 दिनों में उन्हें 270 बिलियन डॉलर यानी करीब 25 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। 1 लाख 22 हजार इमारतें तबाह हुई हैं। 3 अप्रैल 2026 तक ईरान के 307 अस्पताल बर्बाद हुए। दवाओं की कीमतें 50 प्रतिशत तक बढ़ गई, जिससे 60 लाख से ज्यादा मरीज प्रभावित हुए। मिनाब के बच्चों के स्कूल पर सीधा हमला हुआ जिसमें 160 से ज्यादा लोग मारे गए जिनमें 130 से ज्यादा छोटी बच्चियां शहीद हुईं। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत दर्जनों टाप के लीडरशिप शहीद हो गई। इस लड़ाई में गल्फ के अन्य देश भी इसकी चपेट में आ गए। यूएई, कतर, सउदी, बहरीन, इराक इत्यादि बीच में फंस गए। इस  जंग में निर्दोष लोगों को भी भारी कीमत चुकानी पड़ी। अनुमान है कि जंग में 7000 से ज्यादा निर्दोष सैनिक मारे गए और 40 हजार से ज्यादा लोग घायल हुए। ईरान ने साबित कर दिया कि वे अमेरिका-इजरायल के सामने झुकने वाला नहीं है। ट्रंप बड़े गर्व से कह रहे हैं कि अब ईरान परमाणु बम कभी नहीं बन सकेगा। उन्हें हम याद करवाना चाहते हैं कि ईरान ने कभी परमाणु बम बना ही नहीं था। शहीद अयातुल्लाह अली खामेनेई ने बकायदा एक फतवा जारी किया था कि इस्लाम में ऐसा हथियार बनाना मना है जिसमें निर्दोष लोग मारे जाएं। ट्रंप अब अपनी जीत दिखाने के चलते ही कुछ भी कहें पर सारी दुनिया जानती है कि आप की हार हुई है। आपने अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाया है और आप बड़े बे-आबरू होकर ईरान के कूचे से निकले हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 18 June 2026

कागजों पर दस्तखत: जमीन पर धुआं

दुनिया ने राहत की सांस ली जब यह घोषणा हुई कि अमेरिका-ईरान युद्ध में युद्ध बंदी हो गई है। पर मैं इसे सिर्फ युद्ध विराम ही कहता हूं, यह जंग की समाप्ति नहीं मानी जा सकती क्योंकि अभी सही मायनों में तो दोनों तरफों की शर्तें माननी बची हैं। फिलहाल तो इससे सिर्फ  अमेरिका और ईरान के बीच बमबारी रुकी है। जंग रोकने के लिए अभी बहुत से पेंच फंसे हैं। मैं सबसे पहले अयातुल्लाह मोजतबा खामेनेई, राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, विदेश मंत्री अब्बास अरागची और स्पीकर बागेर गालिबफ को बधाई देना चाहता हूं कि युद्ध में भारी पड़ने के बावजूद उन्होंने इस युद्ध विराम (सीजफायर) को रोकने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। मैं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इसके लिए बधाई नहीं देना चाहता क्योंकि उन्होंने ही यह जंग शुरू की थी। जिसे बिना वजह जंग को शुरू किया था उसमें युद्ध विराम करके उन्होंने अपनी जान ही छुड़ाई है, किसी पर एहसान नहीं किया। उनके समर्थक उपराष्ट्रपति जेडी वेन्स कह रहे हैं कि ट्रंप अब नोबल पुरस्कार के हकदार हैं? क्यों भाई ! कैसे हुए हकदार? पहले शुरू करो, फिर पिटो और अब बिना शर्तों के बमबारी रोकने की घोषणा करो? यह जो एमओयू पर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं वह कितने कारगर सिद्ध होते हैं यह देखना बाकी है क्योंकि सबसे बड़ा पेंच तो नेतन्याहू बने हुए हैं। इजरायल ने साफ घोषणा कर दी है कि वह इस समझौते को नहीं मानता और न ही वह लेबनान पर लड़ाई बंद करेगा। जबकि ईरान की शर्तों पर यह शामिल है। ट्रंप की धमकियों के बावजूद, गाली-गलौच की परवाह न करते हुए इजरायल अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है और इस पूरी कोशिश में लगा हुआ है कि यह समझौता न हों। ईरान ने 14 बिंदुओं की मांग रखी है। ट्रंप ने भी दो बड़ी शर्तें रखी हैं। ईरान ने मांग की है कि शांति समझौते से पहले 24 अरब डालर की जब्त संपत्ति अमेरिका ईरान को दे। इस राशि का आधा हिस्सा यानी 12 अरब डालर बातचीत शुरू होने से पहले ही ईरान को दी जाए। वहीं अमेरिका ने इस दावे पर अलग रुख अपनाया है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरान को किसी प्रकार की वित्तीय राहत तभी मिलेगी जब वह समझौते के तहत अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी विवाद है। बेशक ईरान ने होर्मुज को खोल दिया है पर अभी सिर्फ तय रास्तों से ही समुद्री जहाजों का आना शुरू हुआ है। होर्मुज को पूरी तरह से खोलने में समय लगेगा क्योंकि ईरान ने होर्मुज में बारुदी सुरंगें बिछा रखी हैं। जिन्हें हटाने में समय लग सकता है। ईरान हर जहाज से टोल भी वसूल कर रहा है। जिसे कर सर्विस चार्ज कह रहा है। अमेरिका ऐसा करने पर ऐतराज कर रहा है। खैर, होर्मुज के खुलने से पूरी दुनिया ने राहत की सांस जरूर ली है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और एनज्डि यूरोनियम के मुद्दे पर भी अभी सहमति बननी बाकी है। ईरान द्वारा उसके मिसाइल कार्यक्रम पर भी अमेरिका और इजरायल को आपत्ति है। इस मुद्दे पर दोनों पक्ष 60 दिनों की बातचीत में कोई निर्णय करेंगे। ईरान के उपविदेश मंत्री काजेम धरीबाबादी ने तस्लीन न्यूज एजेंसी से कहा कि अंतिम समझौते को लेकर अगले 6ˆ दिनों के भीतर बातचीत जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका अपने वादों पर किस हद तक टिका रहता है और पूरा करता है? ई&रान की प्रमुख मार्गों में सैन्य गतिविधियों को रोकना यानी की हर जंग को पूरी तरह रोकना, आर्थिक नाकाबंदी समाप्त करना और विदेशों में जमे हुए ईरानी फंडस को जारी करना शामिल है। समझौते में लेबनान में युद्ध विराम का भी प्रावधान शामिल है। वित्तीय मुद्दों पर मतभेदों के बावजूद व्यापक समझौते को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली हैं। ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, फ्रांस और भारत ने इसका स्वागत किया है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य मध्य-पूर्व में स्थायी शांति स्थापित करना है। ऐसे में अगर समझौता सफल रहता है तो वैश्विक बाजारों को भी बड़ी राहत मिल सकती है। बस यह टिका रहे? अंत में इजरायल-मोसाद कुछ भी कर सकता है। ईरानी लीडरशिप की हत्या भी करवा सकता है ताकि यह युद्ध विराम टूट जाए। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 16 June 2026

अब फुटबाल का जादू

ऐसे वक्त पर जब पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान में भंयकर युद्ध छिड़ा हुआ है और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की समस्या बनी हुई है। जब सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल हो रही है उसी समय खेल प्रेमियों के लिए जबरदस्त राहत का आयोजन हो रहा है। मैं विश्व कप फुटबाल 2026 की बात कर रहा हूं। अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको की संयुक्त मेजबानी में आयोजित अब तक का सबसे बड़ा फुटबाल विश्व कप चल रहा है। फीफा विश्व कप 2026 के पहले उद्घाटन समारोह ने बृहस्पतिवार को एस्टाडियो एज्टेका स्टेडियम में 85000 दर्शकों के सामने अनूठा रंग बरपा दिया। इस बार तीन उद्घाटन समारोह हुए हैं जिनमें दो समारोह शुक्रवार को कनाडा के टोरंटो और अमेरिका के लॉस एंजिल्स में आयोजित हुए। 39 दिन तक चलने वाले इस सबसे लंबे प्रख्यात महाकुंभ में रिकार्ड मैचों के साथ रिकार्ड दर्शकों के आने से फुटबाल की शीर्ष संस्था को वित्तीय रूप से भारी मुनाफा होने वाला है। फीफा की कमाई कई तरीकों से होगी जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा प्रसारण अधिकारों का होगा। इसके अलावा प्रायोजन, टिकटों की बिक्री, आतिथ्य सत्कार, पर्यटन आदि से भारी कमाई होगी। इस बार 48 टीमों के टूर्नामेंट में हिस्सा लेने से भी कमाई उम्मीद से ज्यादा हो सकती है और यह आंकड़ा 76 हजार करोड़ रुपए (8.9 अरब डॉलर) से भी ज्यादा पहुंच सकता है। असल में 104 मुकाबले तीन देशों के 16 शहरों में होने से कमाई में कई तरह की बढ़ोतरी होगी। बता दें कि तीन बार विश्व कप की मेजबानी करने वाला मैक्सिको दुनिया का पहला देश है। मैक्सिको ने अपने यहां हुए उद्घाटन में अपनी देसी संस्कृति की झलक दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ा। फीफा ने इस समारोह के लिए दुनिया भर से कलाकार बुलाए थे, लेकिन असली समां शकीरा के दाई-दाई गाने से बांधा, जिस पर दर्शक झूम उठे। सवाल यह भी है कि क्या यह खेल की उस शक्ति को साबित कर पाएगा, जो मतभेदों के बीच संवाद व तनावों के बीच उम्मीद की गुजांइश पेश करती है? फुटबाल विश्व कप का इतिहास देखें तो उम्मीद की जा सकती है। बता दें कि इटली के डिक्टेटर मुसोलिनी के शासन के दौरान 1934 में इटली में हुआ विश्वकप हो या फिर 1938 की प्रतिस्पर्धा, जब  जर्मनी, आस्ट्रिया पर कब्जा कर चुका था, इस खेल ने दर्द से कराहते देशों को जरूर कुछ राहत तो दी थी। हिटलर ने भी विश्वकप हाकी का आयोजन किया था जिसमें भारत के मेजर ध्यानचंद सबसे बड़े सितारे के रूप में उभरे थे। दिलचस्प यह है कि ईरान की टीम को भी मेजबान अमेरिका में खेलने का मौका मिलेगा। हालांकि ईरान को वीजा देने में भी विवाद हुआ। उल्लेखनीय है कि ईरानी खिलाड़ी जब मैक्सिको पहुंचे तो उन्होंने वह प्रतीक चिह्न पहना था जो मिनाब के बच्चियों के स्कूल पर अमेरिका ने मिसाइल मारा था और 138 छोटी बच्चियां शहीद हो गई थीं। अपेक्षा की जाती है कि इस आयोजन से देशों में प्रेम व एक-दूसरे का सम्मान बढ़ेगा, भाई चारा बढ़ेगा और दुनिया में अशांति के माहौल में कमी आएगी। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 13 June 2026

क्यूबा है ट्रंप का अगला टारगेट?

भारत में एक कहावत है विनाश काले विपरीत बुद्धि यानी जब आप पर विपत्ति आती है तो आपकी सबसे पहले बुद्धि भ्रष्ट होती है। यही हाल है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उसके रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ का। पीट हेगसेथ ने ताजा बयान दिया है जिससे लगता है कि ट्रंप का अगला निशाना क्यूबा है। पीट हेगसेथ ने हाल ही में गुआंतानामो बे का दौरा किया और क्यूबा को कई शब्दों में चेतावनी दी। हेगसेथ ने क्यूबा को स्पष्ट किया कि अमेरिका के खिलाफ किसी भी तरह की धमकी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने साफ किया कि ईरान के बाद या साथ-साथ क्यूबा भी ट्रंप के निशाने पर है। लगता है कि ट्रंप अपने पड़ोसी देश क्यूबा के खिलाफ जंग छेड़ने के मूड में है। जबकि ईरान युद्ध में बुरी तरह फंसे हुए हैं और बाहर निकलने के लिए बेताब हैं और अब क्यूबा को कब्जाने की धमकी दे रहे हैं। उन्होंने क्यूबा की एनजी सप्लाई काटने के बाद अब एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस निमित्ज को पूरे कैरियर ग्रुप के साथ तैनात कर दिया है। यह तैनाती ठीक उसी तरह की है जिस तरह उन्होंने वेनेजुअला पर हमला करने से पहले वहां के राष्ट्रपति निकोलास मादुरो को हटाने के लिए चारों और तैनात किया था। क्यूबा पर हमले की तैनाती में अमेरिका ने क्यूबा के 94 वषीय पूर्व राष्ट्रपति राउल कास्त्राs पर हत्या का आरोप भी लगाया है। इसके बाद अटकलें तेज हो गई हैं कि अमेरिका की तख्ता पलट सूची में अगला नाम क्यूबा का हो सकता है। अमेरिका की मैक्सिमम प्रैशर की वजह से क्यूबा में दशकों का सबसे बड़ा ईंधन और बिजली संकट पैदा हो गया है। इसी बीच ट्रंप और उनके अधिकारी लगातार यह कह रहे हैं कि 66 साल से सत्ता में मौजूद कम्युनिस्ट सरकार का अंत होना चाहिए। व्हाइट हाउस ने यह भी चेतावनी दी है कि वह अमेरिका के तट से सिर्फ 144 किलोमीटर किसी दागी राष्ट्र को बर्दाश्त नहीं करेगा। अब ये चर्चा है कि राउल कास्त्राs को कोई सैन्य अभियान चलाकर मादुरो की तरह गिरफ्तार करके अमेरिका लाया जा सकता है। उन्हें अमेरिका लाकर उन पर मुकदमा चला सकता है। इस साल की शुरुआत में एक कार्यकारी आदेश में ट्रंप ने दावा किया था कि क्यूबा में रूस का सबसे बड़ा विदेशी जासूसी केंद्र मौजूद है। बिडेन प्रशासन ने चीन पर भी आरोप लगाया था कि उसने अमेरिका के तटों से सिर्फ 90 मील दूर स्थित इन कम्युनिस्ट द्वीप पर जासूसी केंद्र खोल रखा है। यही नहीं ट्रंप प्रशासन ने करीब 30 साल पुराने एक मामले को अचानक जिंदा करके क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति राउल कास्त्राs पर गंभीर आरोप लगा दिया। असल में 1996 में समुद्र में फंसे लोगों और क्यूबा से भागकर अमेरिका आने वाले शरणार्थियों की मदद करने वाला एक संगठन छोटे नागरिक विमानों के जरिए रेस्क्यू मिशन चला रहा था। उसके दो नागरिक विमानों को क्यूबा के सैन्य विमानों ने मार गिरया। इसमें चार अमेरिकी नागरिकों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद दोनों देशों के रिश्तों में और ज्यादा तनाव बढ़ गया था। अब तीन दशक बाद अमेरिकी अधिकारियों ने पूर्व क्यूबाई राष्ट्रपति राउल कास्त्राs पर हत्या, साजिश रचने और विमान गिराने से जुड़े आरोप लगाए हैं। राउल कास्त्राs क्यूबा की राजनीति के सबसे ताकतवर चेहरों में से एक हैं। उन्होंने अपने भाई फिदल कास्त्राs के बाद देश की राजनीति संभाली थी। अब सवाल है कि आखिर 30 साल बाद अमेरिका इस मामले को क्यों उठाना चाहता है? 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 11 June 2026

क्या इजरायल अमेरिका की जासूसी कर रहा है?

ईरान युद्ध को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन  नेतन्याहू के बीच टकराव व बढ़ती रणनीतिक दूरियों ने पेंटागन की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी रक्षा मुख्यालय को इजरायली जासूसी का भय लगने लगा है। उसने चेतावनी दी है कि वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी कड़ी इजरायली निगरानी का निशाना बन सकते हैं? एनबीसी न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के दो मौजूदा व एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि पेंटागन की डिफैंस इंटेलिजेंस एजेंसी (डीआईए) ने हाल ही में इजरायल के लिए काउंटर इंटेलिजेंस खतरे के स्तर को क्रिटिकल यानी गंभीर कर दिया है। यह उनका सबसे ऊंचा आंतरिक मूल्यवान स्तर है। एक मौजूदा अधिकारी ने अमेरिकी पत्रकार को बताया कि अमेरिका पहले से ही इजरायल की आधिकारिक यात्राओं के दौरान सुरक्षा उपाय बरतता है क्योंकि इजरायली जासूसी एजेंसियों को जानकारी जुटाने के मामले में बहुत आक्रामक माना जाता रहा है। पेंटागन की नई चिंताओं से पता चलता है कि इजरायल पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के संबंध में अमेरिकी रणनीतिक चर्चाओं व फैसलों की जानकारी हासिल करने की कोशिश कर रहा है। इजरायली जासूसी नेटवर्क खासकर उनकी खुफिया एजेंसी ऐसे कामों के लिए दुनिया में बदनाम है। चौंकाने वाली बात यह है कि मोसाद ने अपने सबसे भरोसेमंद साथी अमेरिका को भी नहीं बक्शा है? 

-अनिल नरेन्द्र