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Thursday, 13 August 2026

होर्मूज में अमेरिकी जहाजों की तैनाती

अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाते हुए मिडल ईस्ट में 20 से ज्यादा युद्धपोत तैनात कर दिए हैं और होर्मूज जलडमरूमध्य में नाकाबंदी सख्त कर दी है। ईरान ने जलमार्ग को खोलने के लिए मुआवजा, प्रतिबंध हटाने और ब्लॉकेड खत्म करने जैसी शर्तें रखी हैं। ओमान के साथ संभावित समझौता अंतिम चरण में है, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव अभी भी चरम पर बना हुआ है। अमेरिका ने मिडल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाते हुए 20 से ज्यादा युद्धपोत तैनात कर दिए हैं। यह कदम ईरान पर नाकाबंदी को सख्ती से लागू करने में होर्मूज में बढ़ते तनाव के बीच उठाया गया है, जहां वैश्विक तेल सप्लाई की सबसे अहम लाइन गुजरती है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने सोमवार को एक्स पर एक पोस्ट में बताया कि ये युद्धपोत सीधे तौर पर ईरान के खिलाफ लगाए गए ब्लॉकेड को लागू करने के मिशन में लगे हैं। तैनात जहाजों में अमेरिकी नेवी का डेस्ट्रॉयर यूएसएस रॉस भी शामिल है, जिसके जरिए समुद्री निगरानी और इंटरसेप्शन ऑपरेशन चल रहे हैं। सेंटकॉम ने इसी की तस्वीर शेयर की थी। सेंट्रल कमांड ने दावा किया है कि 9 अगस्त तक 55 कमर्शियल जहाजों को रास्ता बदलने पर मजबूर किया गया, 2 जहाजों को रोका गया और 2 पर चढ़कर जांच की गई। यह साफ संकेत है कि अमेरिका सिर्फ चेतावनी नहीं दे रहा, बल्कि सीधे तौर पर समुद्र में नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। उधर, ईरान-अमेरिका युद्ध में सबसे बड़ी लेकिन अनदेखी मानवीय त्रासदियों में से एक समुद्र के बीच फंसे हजारों नाविक हैं। संयुक्त राष्ट्र की समुद्री एजेंसी (आईएमओ) के मुताबिक करीब 6000 नाविक अब भी फारस की खाड़ी में जहाजों फंसे हैं। कई नाविक तो चार महीने से घर नहीं लौट पाए हैं। मैं यूएसएस अब्राहम लिंकन बाबत एक ऐसी ही रिपोर्ट पढ़ रहा था। उसमें बताया गया था कि पिछले लगभग 200 दिनों से ज्यादा समय से यह समुद्री जहाज समुद्र में हैं। जहाज के अंदर अब तो खाने की कमी हो गई है। दवाएं कम हो गई हैं। टायलेट खराब हो चुके हैं इत्यादि इत्यादि। जहाज के डॉक्टर अब कहने लगे हैं कि अगर जल्द यह सैनिक घर नहीं लौटे तो इनमें से कई मनोवैज्ञानिक शिकार हो जाएंगे। वैसे भी देखा जाए जब लिंकन में ऐसी भयावह स्थिति बनी है तो उस पर तैनात लगभग 5000 सैनिक युद्ध कैसे लड़ेंगे। कई नाविकों का बाहरी संपर्क लगभग टूट चुका है। उन्हें हर कुछ में दिन में सिर्फ 30 मिनट इंटरनेट मिलता है। कुछ जहाजों पर सीमित राशन होने से नाविक दिन में सिर्फ एक बार चावल और दाल खा रहे हैं। लगातार मिसाइल या ड्रोन हमले के खतरे के खौफ में नींद भी पूरी नहीं कर पाते। कई लोग इस तैयारी के साथ सोते हैं कि हमला होते ही भाग सकें। विशेषज्ञों के मुताबिक, नाविक जहाज को नहीं छोड़ सकते हैं। सुरक्षित निकासी बेहद मुश्किल है और कई नाविक अल्पकालिक अनुबंध पर हैं। उन्हें डर है कि यदि वे खतरनाक ड्यूटी छोड़ने की मांग करते हैं तो उन्हें दोबारा नौकरी नहीं मिलेगी। युद्ध के बीच फंसे नाविकों की मानसिक सेहत, नींद और आर्थिक स्थिति पर भी गंभीर असर पड़ा है। युद्ध की शुरुआत में 36-38 भारतीय जहाजों पर 1,100 भारतीय नाविक होर्मूज के आसपास फंस गए थे। बाद में अधिकांश जहाज निकल गए। सूत्रों के मुताबिक 125 भारतीय नाविक अभी भी 6 भारतीय जहाजों पर फारस की खाड़ी में मौजूद हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 11 August 2026

और अब इस्लामिक नाटो

हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के बीच मक्का पाइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए हैं, जिसके तहत अगर तीनों में से किसी एक देश पर हमला होता है तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। इस समझौते का मकसद रक्षा सहयोग बढ़ाना, साझा सुरक्षा रणनीति बनाना और क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच सामूहिक ताकत दिखाना है। विश्लेषकों का मानना है कि यह गठजोड़ पश्चिम एशिया में बदलते हालात, खासतौर पर ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते टकराव के बीच एक नए पावर ब्लाक के रूप में उभर सकता है। इस्लामिक नाटो मुस्लिम बहुल देशों के बीच एक प्रस्तावित या अनौपचारिक सैन्य गठबंधन को दिया नाम है, जिसकी तुलना पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन नाटो से की जाती है। इस समझौते के पीछे प्रमुख भूमिका सऊदी अरब की है। वह एक तरफ ईरान के हमलों से परेशान है और दूसरी तरफ हाल ही में यमन के हूतियों के साथ जबर्दस्त संघर्ष छिड़ने से। ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों खाड़ी क्षेत्रों में, जहाजरानी में व्यवधान और संघर्ष के पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैलने की आशंकाओं ने सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताएं बढ़ा दी हैं। दशकों तक रियाद अपनी सुरक्षा के लिए मुख्य रूप से अमेरिका पर निर्भर था पर 28 फरवरी के बाद उसने देख लिया कि अमेरिका तो अपने सुरक्षा ठिकानों को बचा नहीं पा रहा है तो वह सऊदी अरब को कैसे बचाएगा। रहा सवाल पाकिस्तान का तो सऊदी अरब का पहले से ही पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता हो रखा है पर क्या पाकिस्तान सऊदी अरब को ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों से बचा सका? क्या पाकिस्तान सऊदी अरब पर हमला होने पर ईरान पर हमला कर सकता है? यह सब नाटकबाजी है। रहा सवाल इजरायल और अमेरिका का तो इजरायइल इस समझौते का जमकर विरोध कर रहा है और इसे अपने लिए खतरा मानता है। सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि अगर इजरायल सऊदी या तुर्किए पर हमला करता है तो क्या जनरल असिम मुनीर में इतनी हिम्मत है कि वह अमेरिका के खिलाफ जाकर इजरायल पर हमला करें? यह सिर्फ पैसे ऐंठने का खेल है। फक्कड़ हुआ पाकिस्तान कहीं से भी भीख मांगने को तैयार है और इसके एवज में जो चाहे वादा करवा लो? रहा सवाल ईरान का तो राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने मुस्लिम एकता की अपील करते हुए कहा कि शिया-सुन्नी को साथ रहना चाहिए। पेजेश्कियन ने कहा है कि अमेरिका और इजरायल मिलकर फारस की खाड़ी के देशों को ईरान के खिलाफ करने की कोशिश कर रहे हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि सऊदी अरब तुर्किए और पाकिस्तान तीनों ही देश सुन्नी बाहुल्य हैं, वहीं ईरान शिया देश है। क्या यह भारत के लिए चिंता की बात है? विश्लेषक कहते हैं कि इस डिफेंसपैक्ट का भारत पर सीधे तौर पर कोई असर नहीं होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि सऊदी अरब पहले भी कहता रहा है कि पाकिस्तान हमारा महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी है, लेकिन कभी उसने भारत से जंग के मौके पर साथ नहीं दिया। जहां तक  तुर्किए का सवाल है वह तो आपरेशन सिंदूर में भी खुलेआम पाकिस्तान के साथ था और आगे भी रहेगा। भारत के लिए चिंता की बात नहीं है क्योंकि भारत डिफेंस क्षमता में तीनों से आगे है। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 8 August 2026

क्या पाकिस्तान अंदर से टूट रहा है?


पाकिस्तान वर्तमान में गंभीर आंतरिक संघर्ष, राजनीतिक अस्थिरता और सूबों में सशस्त्र विद्रोह जैसी गंभीर अंदरूनी चुनौतियों से जूझ रहा है। सेना के बढ़ते दखल, आर्थिक संकट और आतंकवादियों के ताबड़तोड़ हमलों के कारण देश के भीतर गृह युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं। पाकिस्तान के चार सूबे हैं। इनमें से बलूचिस्तान सूबे में अलगाववादी बलूचिस्तान लिबरेशन आमी (बीएलए) ने विद्रोह का झंडा बुलंद किया हुआ है। खैबर पख्तूनख्वां सूबे में अफगान तालिबान का दबदबा बढ़ता जा रहा है। आए दिन तालिबान के हमलों से यहां पाक फौज के पांव उखड़ रहे हैं। पीओके में पाक सेना की बर्बरता पर विद्रोह की स्थिति बनी हुई है। चलिए विस्तार से सारी स्थिति को बताते हैं। बलूचिस्तान पाक का सबसे बड़ा और फैला हुआ (लगभग 45 प्रतिशत) क्षेत्र है। ईरान से इसकी सरहद लगती है। बलूचिस्तान की बीएलए के लड़ाके अलग देश की मांग कर रहे हैं। हालात ये हैं कि बलूच लड़ाकों और पश्तून (पठान) विद्रोहियों का बलूचिस्तान सूबे में लगभग 70ज्ञ् हिस्से में कब्जा हो चुका है। असली सवाल यह है कि क्या पाकिस्तानी सरकार पुलिस स्टेशन खुले रख सकती है, हाईवे पर यातायात चला सकती है, बाजार और कारोबार सामान्य रख सकती है और लोगों को बिना डर के यात्रा करने की सुरक्षा दे सकती है? खैबर पख्तूनख्वां पाकिस्तान का फ्रंटियर यानी सरहदी इलाका है। डूरंड लाइन पाक और अफगानिस्तान को अलग करती है। अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के पांच साल में खैबर के अधिकांश इलाके में इन्हीं का दबदबा है। खैबर में पाक सरकार का कानून नहीं तालिबान का शरिया चलता है। दरअसल, इस इलाके में विभाजन के समय से ही कबिलाई व्यवस्था लागू रही है। स्वात, सैदु, मिंगोरा और मर्दन में लोया जिरगा के जरिए ही कानून चलता है। ये जिरगा असल में शरिया कानून को लागू करती है। अफगान तालिबान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) संगठन को अपने ठिकानों में पनाह देता है। इमरान खान की सरकार ने 2021 में टीटीपी के साथ सुलह की कोशिश की, लेकिन इमरान की गद्दी जाते ही टीटीपी ने खैबर में अपने दबदबे को और बढ़ा लिया है। खैबर के वजीरिस्तान में पाकिस्तान सेना कई सैन्य ऑपरेशन कर चुकी है, लेकिन यहां अब टीटीपी काबिज है। आए दिन टीटीपी के हमलों के कारण स्कूल और कॉलेज बंद रहते हैं। पंजाब और सिंध के मूल निवासी कर्मचारी खैबर में अपनी पोस्टिंग नहीं चाहते। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) और अन्य इलाकों में दमनकारी नीतियों व अधिकारों के हनन को लेकर जनता में भारी असंतोष और विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं। अगर हम राजनीतिक दृश्य की बात करें तो सरकार और सेना के बीच सत्ता के समीकरणों तथा हालिया संवैधानिक संशोधनों को लेकर न्यायपालिका और राजनीतिक गलियारों में तीव्र पतन और बगावत का माहौल है। कुल मिलाकर पाकिस्तान की आंतरिक हालत बहुत खराब हो रही है। अगर यही स्थिति रही तो पाकिस्तान के कई टुकड़ों में बंटने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 6 August 2026

फिर पलटे ट्रंप ईरान से मानसिक युद्ध

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर बड़े हमले की धमकी के बाद एक बार फिर पलट गए हैं। ट्रंप की यह तो पलटने की आदत बन गई है। यह नौवीं बार है जब ट्रंप धमकी देकर पलटे हैं। यही वजह है कि अब उनकी धमकी को कोई गंभीरता से नहीं लेता बल्कि उनका खुलेआम मजाक उड़ाया जाता है। ट्रंप ने दावा किया कि पश्चिम एशिया के सहयोगी देशों ने ईरान के साथ जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए एक समझौते की रूपरेखा पर सहमति बना ली है। फिलहाल वह पांच महीने से जारी इस संघर्ष में ईरान पर नए सैन्य हमले का आदेश नहीं देंगे। उधर, ईरान ने ट्रंप की धमकियों को मानसिक युद्ध बताया है। ट्रंप ने शनिवार को कहा कि ईरान के साथ समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य को तत्काल व पूरी तरह खोलना व उसके परमाणु खतरे का अंत शामिल होगा। उन्होंने कहा कि इस अनुरोध के आधार पर मैंने दुनिया के भविष्य के हित में फिलहाल हमलों को रोकने पर सहमति दी है। बशर्ते कि शीघ्र ही कोई समझौता हो सके। ट्रंप ने समझौते में इजरायल की सहमति की बात कही। क्या ट्रंप ईरान पर परमाणु हमला करने की सोच रहे हैं? जब ट्रंप यह कहते हैं कि मैंने दुनिया के भविष्य को खतरे में डालने से बचाने के लिए फिलहाल ईरान पर हमले रोकने का फैसला किया है तो इसका मतलब हम यह निकालें कि ट्रंप ईरान पर एटम बम मारने की सोच रहे हैं? वैसे भी ट्रंप इतनी बार अपने बयानों से पलटे हैं कि अब उन्हें शायद ही कोई गंभीरता से लेता हो? ईरान ने ट्रंप के हमलों को टालने के फैसले का मजाक उड़ाया है। ईरानी मीडिया ने ट्रंप के दावों को झूठ बताते हुए कहा कि तेहरान ने कभी हमले रोकने की अपील नहीं की। ईरानी मीडिया ने ट्रंप के दावों को झूठ बताते हुए कहा कि अमेरिका की मिसाइलों की कमी और बढ़ते दबाव के कारण ट्रंप पीछे हटे हैं। ट्रंप के दावों को खारिज करते हुए कहा कि अमेरिका ने अपनी कमजोरी छिपाने के लिए पूरी कहानी गढ़ी है। ट्रंप की हवा एक बार फिर ईरान ने निकाल दी। यह पहली बार नहीं है। पहले भी 5 बार ट्रंप धमकी देकर अपने कदम पीछे कर चुके हैं। ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी फार्म ने ट्रंप पर तंज कसते हुए लिखा कि मूर्ख ट्रंप की सारी हवा निकल गई। वहीं मेहर न्यूज एजेंसी ने कहा कि ट्रंप ने एक बार फिर अपनी खोखली धमकियों से पीछे हटकर उसे दुनिया के सामने एहसान की तरह पेश करने की कोशिश की है। मेहर ने सैन्य सूत्रों के हवाले से दावा किया कि ईरानी सेना पूरी तरह सतर्क है और किसी भी स्थिति का जवाब देने के लिए तैयार है। एजेंसी ने ट्रंप के दावों को एक और झूठ बताया। ईरान ने अमेरिका को एक बार फिर चेतावनी दी है। ईरान ने कहा कि अगर अमेरिकी सेना ने ईरानी ठिकानों पर नए हमले किए तो वह इसका कड़ा जवाब देगा। इससे पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ जाएगा। ये चेतावनी ट्रंप के उस बयान के बाद आई है, जिसमें ट्रंप ने कहा था कि तेहरान के साथ बातचीत से उनका भरोसा कम हो रहा है। ट्रंप ने कहा कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका उन पर हमला करेगा। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर, तकीय के विदेश मंत्री हाकन फिदान और सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान के साथ अलग-अलग फोन पर बातचीत के जरिए इसकी जानकारी दी। ट्रंप एक बार फिर पलटे। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 4 August 2026

अमेरिका में 7 जगह हमले किसने करे?

अमेरिका के 7 राज्यों में एक के बाद एक तगड़े अटैक हुए हैं। ये हमले सीधे उस लाइफलाइन पर हुए हैं, जिसके दर्द से आम जनता कराह उठी। इस हमले के बाद ट्रंप का ऐसा हाल हो गया है कि वो ईरान का नाम भी नहीं ले पा रहे हैं। ट्रंप उल्टा अपने ही लोगें को बदनाम करने में जुट गए हैं लेकिन अपने सबसे बड़े दुश्मन की चालाकी दुनिया के सामने यह एक्सेप्ट नहीं कर पा रहे हैं। ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका में अचानक कुछ ऐसा हो गया है जिसने डोनाल्ड ट्रंप के पसीने छुड़ा दिए हैं। दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क की धरती पर एक-दो नहीं, बल्कि एक के बाद एक पूरे सात बड़े अटैक हुए हैं। यह वार किसी और जगह नहीं, बल्कि अमेरिकी जनता की लाइफलाइन पर हुआ है। शक है कि इस पूरे खेल के पीछे अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन ईरान ही है, लेकिन ट्रंप खुलेआम उसका नाम ले नहीं रहे हैं। अगर ट्रंप ने दुनिया के सामने यह मान लिया कि हमला ईरान ने ही किया है तो साबित हो जाएगा कि तकनीक के मामले में वह अमेरिका से आगे निकल चुका है। दरअसल ये हमले अमेरिका की पानी की सप्लाई करने वाली सबसे अहम पाइपलाइनों और प्लांट्स पर हुए हैं। इस सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर पर 7 जगहों से साइबर अटैक किए गए। हालात इतने खराब हो गए कि कई राज्यें में वॉटर सिस्टम को बनाने के लिए ऑटोमैटिक सिस्टम बंद करके हाथों से काम संभालना पड़ा। अब इस पूरे खेल में सबसे बड़ा झटका अमेरिकी राजनीति और डोनाल्ड ट्रंप को लगा है। क्योंकि जब दुनिया की नजरें ईरान पर टिक रही हैं, तब ट्रंप सीधे तौर पर ईरान का नाम तक लेने से बच रहे हैं। इस बड़े सनसनीखेज साइबर हमले की पहली भनक मिनेसोटा राज्य से लगी 26 और 27 जुलाई के बीच यहां के 30 से ज्यादा कम्युनिटी वॉटर सिस्टम को हैकर्स ने अपना निशाना बनाया। मिनेसोटा आईटी सर्विसेज ने जब आनन-फानन में जांच शुरू की तो पता चला कि किसी ने जान बूझकर पानी की सप्लाई कंट्रोल करने वाले सिस्टम का एक्सेस हथिया लिया था। प्रवक्ता एमिली जिमर का कहना है कि मामले की जांच बहुत तेजी से चल रही है। जिस तरीके से इस मामले को अंजाम दिया गया है, वो ठीक वैसा ही है जैसा हमारे फेडरल पार्टनर्स ने पहले क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमलों में देखा था। हैकर्स ने बहुत ही चालाकी से पानी के प्लांट्स में लगे पोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर्स को अपना शिकार बनाया। अमेरिका की जांच एजेंसियां यह मान रही है कि हमले का पैटर्न ईरान के पुराने साइबर हमलों से काफी मिलता-जुलता है। लेकिन सबसे बड़ा ड्रामा तब शुरू हुआ जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान सामने आया। ट्रंप ने इस भयंकर अटैक का दोष सीधे ईरान पर डालने की बजाय अपनी ही व्यवस्था पर फोड़ दिया। कैबिनेट मीटिंग के दौरान ट्रंप ने ईरान का बचाव करने जैसा बयान दिया और कहा कि लोग कह रहे हैं कि मिनेसोटा के 30 वॉटर प्लांट्स पर जो हमला हुआ उसके पीछे ईरान है। मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता है। मैं इसके लिए मिनेसोटा के नाकाम प्रशासन और वहां के भ्रष्ट गवर्नर को जिम्मेदार मानता हूं। ईरान के पास मिनेसोटा के बारे में सोचने से बहुत बड़े मुद्दे हैं। ट्रंप के इस रवैये से हर कोई हैरान है। जहां एक्सपर्ट्स इसे सीधे तौर पर ईरान से जोड़ रहे हैं वहीं ट्रंप ईरान का नाम लेने से कतरा रहे हैं और अपने ही अधिकारियों को कसूरवार ठहरा रहे हैं। इस पर मिनेसोटा के गवर्नर ने पलटवार करते हुए कहा ट्रंप को अच्छी तरह पता है कि हमलावर कौन है, वह सच्चाई से भाग रहे हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 1 August 2026

...और अब ईरान बनाम यूक्रेन


दुनिया के दो बड़े संघर्ष अब एक-दूसरे से जुड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ पिछले कई महीनों से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और सैन्य कार्रवाई चल रही है, वहीं अब दूसरी तरफ रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध पांचवें साल में प्रवेश कर चुका है। अब एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने दोनों संघर्षों को आपस में जोड़ दिया है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। ताजा विवाद कैस्पियन सागर में एक ईरानी जहाज पर हुए हमले से शुरू हुआ है। यूक्रेन पर आरोप है कि उसने कैस्पियन सागर में एक ईरानी कमर्शियल जहाज को निशाना बनाया। यूक्रेन के राष्ट्रपति बेलादिमीर जेलेंस्की का दावा है कि यह जहाज रूस और ईरान के बीच हथियारों और सैन्य सामानों की सप्लाई में इस्तेमाल किया जा रहा था। इसी वजह से इस पर हमला किया गया। इस घटना के बाद ईरान ने कड़ी नाराजगी जताई है। तेहरान ने यूक्रेन के राजदूत को तलब किया और गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलिस से भी बात की और इस हमले के खिलाफ अपना विरोध जताया। उन्होंने यूक्रेन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग भी की। कैस्पियन सागर में किसी जहाज पर इस तरह हमला पहली बार हुआ है। कैस्पियन सागर एक ऐसा समुद्री क्षेत्र है जो चारों ओर जहां जमीन से घिरा हुआ है। इसके उत्तर-पश्चिम में रूस, दक्षिण में ईरान, पूर्व में कजाखस्तान और तुर्कमेन्तिान तथा पश्चिम में अजरबैजान स्थित हैं। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस और ईरान के संबंध और मजबूत हुए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, तकनीकी सहयोग और रक्षा क्षेत्र में संपर्क बढ़ा है। इसी कारण लंबे समय से यह चर्चा होती रही है कि कैस्पियन सागर के रास्ते रूस और ईरान के बीच सैन्य सामग्री का आदान-प्रदान भी होता है। हालांकि इस बारे में कभी सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्ट स्वीकारोक्ति नहीं हुई थी। ईरान का कहना है कि जिस जहाज पर हमला हुआ वह एक सामान्य कमर्शियल जहाज था। ईरानी अधिकारियों के अनुसार इस हमले में एक नाविक की मौत हो गई जबकि एक अन्य नाविक घायल हो गया। हमले के बाद राष्ट्रपति जेलेंस्की ने सोशल मीडिया पर बयान जारी करते हुए कहा कि जहाज रूस और ईरान के बीच सैन्य सामग्री पहुंचाने का काम कर रहा था। उन्होंने दावा किया कि रूस लंबे समय से ईरान की तरफ से उपलब्ध कराए गए शहीद ड्रोन का इस्तेमाल यूक्रेन के खिलाफ कर रहा है। युद्ध के शुरुआती चरण में रूस ने बड़ी संख्या में ईरानी ड्रोन का उपयोग किया था, जिससे उसे युद्ध में बढ़त हासिल करने में मदद मिली थी। जेलेंस्की ने केवल जहाज पर हमले का बचाव ही नहीं किया, बल्कि रूस पर एक और गंभीर आरोप भी लगाया। उन्होंने दावा किया कि रूस ने ईरान को खाड़ी में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों की उपग्रह तस्वीरें और खुफिया जानकारी उपलब्ध कराई हैं। उनके अनुसार जुलाई महीने में रूसी उपग्रह बहरीन जार्डन और कुवैत में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों की निगरानी भी कर रहे हैं। जेलेंस्की का आरोप है कि ईरान द्वारा अमेरिकी ठिकानों पर किए गए कुछ सटीक हमलों के पीछे भी रूस की ओर से दी गई खुफिया जानकारी की भूमिका हो सकती है। यूक्रेन का मानना है कि रूस केवल यूक्रेन से युद्ध नहीं लड़ रहा, बल्कि वह पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
- अनिल नरेन्द्र

Thursday, 30 July 2026

क्या ईरान के आगे झुका है ट्रंप ?


अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर सीजफायर हो गया है और जंग फिर थम गई है। 13 दिनों में अमेरिका को भारी नुकसान हुआ है क्योंकि ईरान जार्डन और इराक में भी हमले कर रहा है। ईरान ने इस बार सिर्फ अमेरिकी बेस पर मौजूद हथियारों को टारगेट किया बल्कि अगर खबर सही है तो इन हमलों में अमेरिकी सैनिकों के मरने व घायल होने की बात ईरान कर रहा है। ट्रंप की सेना ने फिलहाल हमले रोक दिए हैं, नहीं तो वो लगातार 12-13 दिनों से हर रोज ईरान पर बमबारी कर रहा था। अमेरिका ने तो एक बार फिर भारी बी-1 बाम्बरों का भी इस्तेमाल किया। ईरान ने तो ताबड़तोड़ कई जवाबी हमले किए। जब अमेरिका ने हमले रोके तो ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई रोक दी। कहा जा रहा है कि अमेरिका के एयर डिफेंस मिसाइलों का स्टॉक कम हो चुका है, जिससे अरब क्षेत्र में अमेरिका ठिकानों की सुरक्षा करना मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से ट्रंप को पीछे हटना पड़ा है। दरअसल ईरान ने युद्ध की शुरुआत से ही सस्ते ड्रोन से लगातार हमले करने की रणनीति बनाई थी जिसका परिणाम ये हुआ कि अमेरिका को पैट्रियट मिसाइलों का इस्तेमाल बहुत अधिक करना पड़ा और चंद दिनों में ही मिसाइलों का स्टॉक कम हो गया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका पिछले 13 दिनों से अपने तमाम बेसों की सुरक्षा के लिए पैट्रियट मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहा था। 13 दिनों की जंग के बाद अब कहा जा रहा है कि अमेरिकी सेना के पास सिर्फ 900 से 1000 पैट्रियट मिसाइलें ही बची हैं। दूसरी तरफ अमेरिकी कंपनियां हर महीने सिर्फ 20 मिसाइलों का प्रोडक्शन कर रहा है। दूसरी तरफ ईरान ने अपनी मिसाइलें और ड्रोनों का स्टॉक लगातार बढ़ा लिया है और वह नई मिसाइलों और ड्रोनों का भी बहुत तेजी से निर्माण कर रहा है। अब अगर ईरान की तरफ से और हमले होते हैं तो अमेरिका की बची-खुची मिसाइलें भी खत्म हो जाएंगी। यह चेतावनी अमेरिका की सेटकॉम ने भी ट्रंप को दी है। ऐसे में अमेरिका को अपने बेस की सुरक्षा की फिक्र है। ईरान के हमलों से भी अमेरिकी डिफेंस को भारी नुकसान हुआ है। हमलों के दौरान अमेरिकी बेस पर कमांड एंड कंट्रोल सेंटर नष्ट हो चुके हैं। इसके अलावा 6 पैट्रियट एयर डिफेंस रडार नष्ट हो चुके हैं। अमेरिका हमलों की वजह से 3 ईपीएस रडार सिस्टम गंवा चुका है। हमलों में 5 लांग रेंज रडार भी नष्ट हो गए हैं। एक तरफ हथियारों की कमी है तो दूसरी तरफ नुकसान की वजह से युद्ध का बढ़ता खर्च भी ट्रंप पर दबाव बना रहा है। हमलों के दौरान अमेरिका का एक एफ-15 विमान नष्ट हो गया। एफपी-8 विमान भी नष्ट हो चुका है। ईरानी हमलों की वजह से सी-17 कार्गो विमान जल गया, 8 हवा में तेल भरने वाले रिफ्यूलिंग विमान भी नष्ट हो गए हैं। हमलों के दौरान 4 हेलिकॉप्टर नष्ट हो गए। 13 दिनों में अमेरिका को इसलिए भी भारी नुकसान हुआ है क्योंकि ईरान जार्डन और ईराक में भी हमले करता रहा। ईरान ने इस बार सिर्फ अमेरिकी बेस पर मौजूद हथियारों, विमानों को टारगेट किया बल्कि दावा किया जा रहा है कि चीन की सेटेलाइट्स की मदद से ईरान ने सटीक निशाने से हमला किया। कहा तो यह भी जा रहा है कि केवल एयर डिफेंस सिस्टम पर ही हमले नहीं हुए पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के कई ठिकानों पर भी सीधे हमले किए ताकि जो इंटेलिजेंस कह रहे थे उनको रोका जा सके। ईरान के हमलों में अमेरिका के नुकसान का ग्राफ बढ़ता गया। ईरान ने अमेरिका एयर डिफेंस को खाली करने की राणनीति को आगे बढ़ाया। ईरान ने विमानों के रैंप और हैंगर्स को निशाना बनाया है। बहरीन ने हेलीकॉप्टर चेनटेनस सेंटर को नष्ट किया। ईरान ने अमेरिकी बेस पर 12 तेल डिपो को तहस-नहस कर दिया। सबसे बड़ा दावा तो इराक के इटबिल बेस को लेकर है। ईरानी सेना का दावा है कि लगातार हमलों की वजह से इराक के इटबिल में अमेरिका का पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो चुका है और ईरान के ठिकानों की ऑपरेशनल क्षमता काफी हद तक खत्म हो चुकी है। यूं ही नहीं अमेरिका के राष्ट्रपति ने युद्ध बंद करने की घोषणा की। पर डोनाल्ड ट्रंप की बातों पर अब शायद ही कोई यकीन करे? इस युद्ध को रोकने की पीछे भी कोई नया खेल हो सकता है। पर ईरान हर स्थिति के लिए तैयार है।
- अनिल नरेन्द्र