Anil Narendra Blog
AAJ KI AWAZ आज की आवाज़
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Saturday, 19 September 2026
मक्का में हमला: लक्ष्मण रेखा लांघी
Thursday, 17 September 2026
क्या भारत की विदेश नीति बदल रही है?
नई दिल्ली में समाप्त हुए 18वें ब्रिक्स सम्मेलन में जारी संयुक्त घोषणा पत्र में मिडल ईस्ट (मध्य पूर्व) को लेकर अपनाया गया रुख चर्चा का विषय बना हुआ है। इस घोषणा पत्र में बिना किसी देश का नाम लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है जिसकी शायद उम्मीद बहुत कम लोगों को थी और यह चर्चा भी शुरू हो गई कि भारत ने अपनी विदेश नीति में बदलाव करना शुरू कर दिया है। इस घोषणा पत्र में जिस पर सभी संबंधित देशों ने अपनी स्वीकृति दी है और ज्वाइंट डिकलेरेशन साइन किए हैं का मतलब साफ है कि इनमें उनकी सहमति है। घोषणा पत्र में दो-तीन बिन्दु ऐसे हैं जो अब तक कि भारत की विदेश नीति से मेल नहीं खाते। इस घोषणा पत्र में इजरायल और अमेरिका का नाम लिए बिना फलस्तीन और लेबनान का जिक्र किया गया है और मध्य पूर्व के तनावपूर्ण हालात के शांतिपूर्ण हल की अपील की गई है। दिलचस्प ये भी था कि अमेरिका के साथ युद्ध में एक-दूसरे के विपरीत दोनों छोर में खड़े ईरान और यूएई भी मध्य पूर्व के हालात शांतिपूर्ण तरीके से हल करने की अपील करने वाले देशों में शामिल थे। ब्रिक्स घोषणा पत्र में ट्रंप, अमेरिकी टैरिफ का नाम तो नहीं लिया गया पर कहा गया कि कई देशों को अन्यायपूर्ण, एकतरफा संरक्षणवादी कदमों से नुकसान हुआ है। चूंकि घोषणा पत्र में भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं। इसका मतलब साफ है कि पहली बार बिना अमेरिका और ट्रंप का नाम लिए भारत टैरिफ की खुलकर आलोचना कर रहा है। अब इसे भारत की विदेश नीति में माना जाए? यह भी देखना होगा कि ट्रंप का इस पर क्या असर और प्रतिक्रिया होती है। इसी तरह घोषणा पत्र में गाजा और कब्जे वाले फलस्तीनी इलाकों की मानवीय स्थिति पर गंभीर चिंता जताई गई। इसमें गाजा में सीजफायर बनाये रखने और बगैर किसी बाधा के मानवीय मदद पहुंचाने की अपील की गई। इसमें फलस्तीनियों को जबरन विस्थापित किये जाने का भी विरोध किया गया है। इसमें अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून में ऐसे सभी उल्लंघनों की निंदा की गई है। घोषणा पत्र में दक्षिण अफ्रीका की ओर से इजरायल के खिलाफ दायर मामले में अंतर्राष्ट्रीय न्याय अदालत के अंतरिम आदेशों का भी जिक्र किया गया है। घोषणा पत्र में दो-राष्ट्र समाधान (टू नेशन थ्योरी) के समर्थन को दोहराया गया है। इसके तहत 1967 की सीमाओं को सुनिश्चित करना शामिल है। इसमें इजरायल से लेबनान में युद्ध विराम का पालन करने और लेबनान के बचे हुए इलाकों से अपनी सेना वापस बुलाने की भी अपील की गई है। ब्रिक्स के घोषणा पत्र में बेशक इजरायल का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया गया लेकिन फलिस्तीन और लेबनान का जिक्र करते हुए मध्य पूर्व की समस्या के शांतिपूर्ण हल की अपील की गई है। एक विशेषज्ञ ने पूछा कि भारत-इजरायल कितने मजबूत हैं यह किसी से छिपा नहीं। इस घोषणा पत्र के बाद इजरायल और भारत के रिश्तों पर कोई असर होगा या नहीं यह तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा। इसी तरह ट्रंप के टैरिफ और दादागिरी पर ब्रिक्स में लिए गए स्टैंड से भारत और अमेरिका के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा यह भी आने वाले दिनों में पता चलेगा। ईरान-अमेरिका युद्ध पर साफ तौर पर ब्रिक्स घोषणा पत्र में ईरान का पक्ष लिया गया है। ब्रिक्स घोषणा पत्र में अमेरिका का नाम नहीं लिया गया है लेकिन अमेरिका की ओर से एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों और शांतिपूर्ण परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों की आलोचना की गई। कहा गया कि अंतर्राष्ट्रीय कानून के खिलाफ लगाए गए एकतरफा प्रतिबंधों की निंदा की जाती है। इनका व्यापक नकारात्मक असर होता है और इनसे गरीब लोगों पर आसमान रूप से ज्यादा असर पड़ता है। ब्रिक्स के दो सदस्य देशों रूस और ईरान पर भी कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। ट्रंप का ब्रिक्स विरोध जगजाहिर है। वह कई बार ब्रिक्स को अमेरिका विरोधी बता चुके हैं और ब्रिक्स के साथ जुड़ने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की धमकी दे चुके हैं। सवाल यहां यह है कि चूंकि भारत ने भी इस ब्रिक्स घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं तो क्या भारत अब अमेरिका के सामने झुकने को तैयार नहीं और क्या हम यह मानें कि भारत की विदेश नीति में अब भारी परिवर्तन आने वाला है या यह महज एक इवेंट था और फोटो अपील यूनिटी थी?
-अनिल नरेन्द्र
Tuesday, 15 September 2026
वोट दो डॉलर लो
Saturday, 12 September 2026
क्या मक्का समझौता लागू है?
Thursday, 10 September 2026
राम मंदिर चंदा चोरी कैसे रुके?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव 2014 अभियान के रणनीतिकार रह चुके किशोर से, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के पद पर एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति हो गई है। भारतीय वायुसेना के पूर्व अधिकारी मिश्रा ट्रस्ट के पहले सीईओ बनाए गए हैं। उनकी यह नियुक्ति मंदिर प्रबंधन में भ्रष्टाचार चंदा चोरी के आरोपों के बाद हुई है। सवाल यह है कि केवल सीईओ नियुक्त कर देने से क्या होगा। यदि पहले प्रबंधन संभालने वाले लोगों को बिना जवाबदेही के छोड़ दिया जाए? भ्रष्टाचार के आरोपों से करोड़ों राम भक्तों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई है। सरकार को अब तक हुई कथित अनियमितताओं पर श्वेत पत्र लाना चाहिए। राम मंदिर के पहले सीईओ नियुक्त एयर मार्शल जितेन्द्र मिश्रा गुरुवार को अयोध्या पहुंचे। यहां से सीधे रामघाट स्थित कार्यशाला में निर्मित राम मंदिर ट्रस्ट के एकाउंट कार्यालय में अपना योगदान दिया। फिलहाल उन्होंने किसी पंजिका पर हस्ताक्षर नहीं किया है। जितेन्द्र मिश्रा ने राम मंदिर में सामने आए चढ़ावा चोरी प्रकरण पर पहली बार अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि अतीत की घटनाओं से सबक लेना चाहिए लेकिन अतीत के बोझ को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। उधर अयोध्या की एक अदालत ने राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मामले में गिरफ्तार सभी आठ आरोपियों की न्यायिक हिरासत शनिवार को 18 सितम्बर तक बढ़ा दी। मंदिर में चढ़ावे की गिनती की प्रक्रिया से जुड़े इन 8 आरोपियों को राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) की प्राथमिक रिपोर्ट के बाद 25 जून को दर्ज प्राथमिकी के आधार पर गिरफ्तार किया गया था। श्री राम मंदिर में चढ़ावा चोरी मामले में नई एसआईटी की जांच भी निर्णायक मोड़ पर पहुंच रही है। सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई से पहले नई एसआईटी ने ट्रस्ट के पूर्व लेखा प्रभारी महिपाल सिंह का बयान दर्ज किया है। नई एसआईटी उनके बयान को अपनी जांच का आधार बनाएगी। क्षेत्राधिकारी अयोध्या आशुतोष तिवारी ने शुक्रवार को वीडियो कांफ्रेंस के जरिए महिपाल का बयान लिया, जिसमें उन्होंने 2021 से अब तक की चोरी की घटनाओं और अनियमितताओं का उल्लेख किया। महिपाल ने पूर्व महासचिव चंपतराय, सदस्य डा. अनिल मिश्र और टिन्नू यादव सहित इस ट्रस्ट और बैंक कर्मियों के नाम लिए हैं जिनके खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। मालूम हो कि चढ़ावा चोरी मामला उजागर होने के समय ही महिपाल ने कई आरोप लगाए थे। उन्होंने सीधे तौर पर चंपतराय, अनिल मिश्र और गोपाल राव पर अनजान बने रहने का आरोप लगाया। पहले गठित एसआईटी ने भी महिपाल का बयान दर्ज किया था, जिसकी फाइनल रिपोर्ट अब ट्रस्ट को सौंप दी गई है। कई भक्तों का कहना है कि दान से जुड़ा विवाद बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत हो सके। इस घटना से करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत हुई हैं और कुछ लोगों के मन में दान को लेकर संकोच भी पैदा हुआ है। फिर भी भगवान राम के प्रति उनकी आस्था में कमी नहीं आई है। उम्मीद है कि ट्रस्ट के नए अधिकारी इस चंदा चोरी को रोकने में सख्त कदम उठाएंगे और इसे हर हालत में रोकेंगे। पुराने ढांचे को पूरी तरह बदलना होगा। पुराने कर्मचारियों को या तो हटाया जाए या उनकी ड्यूटी बदली जाए। बेहतर होगा कि चढ़ावे के रुपयों की मशीनों से गिनती हो। आभूषणों का अलग विभाग हो और हर कदम पर पारदर्शिता हो। सीसीटीवी की निगरानी हर जगह हो। नए नेतृत्व को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह करोड़ों की आस्था का सवाल है सिर्फ चंदा चोरी का नहीं।
-अनिल नरेन्द्र
Tuesday, 8 September 2026
छात्रा के पिता का हमलावर गिरफ्तार
Saturday, 5 September 2026
पुतिन से युद्ध खत्म करने की अपील
युद्ध मानव सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है और आज एक नहीं कई युद्ध चल रहे हैं। यह जानते हुए भी कि युद्ध से समस्याओं का हल तो दूर उल्टा युद्ध नई जटिलताओं को जन्म देता है। युद्ध के लक्षण जान-माल की भारी क्षति, आर्थिक बर्बादी, विस्थापन और सामाजिक अस्थिरता के रूप में सामने आते हैं। रूस-यूक्रेन और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष इसके उदाहरण हैं। भारत हमेशा वैश्विक शांति का समर्थक रहा है और युद्ध के स्थान पर महात्मा बुद्ध, महात्मा गांधी के शांति मार्ग पर चलने का संदेश देता रहा है। इसी प्रतिबद्धता को दर्शाते हुए किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन के मौके पर रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के साथ बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अंतहीन युद्ध के बजाए इसके अंत की ओर बढ़ने की वकालत की। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध को खत्म करने की अपील की। पीएम मोदी ने सोमवार को कहा, युद्ध में बिताया गया हर दिन मानवता को पीछे धकेलता है और शांति की दिशा में उठाया गया हर कदम मानवता को नई आशा और उत्साह से भर देता है। यूक्रेन में युद्ध खत्म करने पर पीएम मोदी की टिप्पणियां हैरान करने वाली नहीं है और ये भारत की विदेश नीति में किसी भी किस्म के सामरिक बदलाव का संकेत नहीं देती है। दरअसल, संघर्ष शुरू होने के बाद साल 2022 में एक क्षेत्रीय शिखर सम्मेलन के दौरान बोलते हुए, मोदी ने पुतिन से सार्वजनिक रूप से कहा था कि यह युद्ध का समय नहीं है। लेकिन यह कहना बहुत आसान होगा कि युद्ध पर मोदी के अभी या पहले के बयानों को पुतिन या रूस स्ट्रैटजी को जवाब देने के तौर पर देख जा सकता है। पश्चिमी देशों ने मोदी पर स्पष्ट रुख अपनाने के लिए काफी दबाव डाला है लेकिन भारत काफी हद तक तटस्थ रहा है। भारत ने इसके बजाए युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत का आग्रह किया है। बेशक इस रुख से कई पश्चिमी देश खुश नहीं हैं, लेकिन उन्होंने भारत को लुभाना जारी रखा है क्योंकि भारत इतनी बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह पहली बार नहीं है जब किसी विदेशी नेता ने सार्वजनिक रूप से पुतिन से यूक्रेन से युद्ध समाप्त करने का आग्रह किया हो। महज पांच हफ्ते पहले कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कसीम-जोमार्ट टोकायेव ने पुतिन को सुझाव दिया था कि वे संघर्ष को रोक दें और बातचीत की मेज पर लौट आएं। शांति के लिए इन सार्वजनिक अपीलों से पुतिन की रणनीति में कोई बदलाव आने के संकेत नजर नहीं आते। मोदी द्वारा युद्ध विराम के आ"ान पर क्रेमलिन नेता ने जवाब दिया बहुत-बहुत धन्यवाद प्रधानमंत्री जी। हम इसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं। विनम्र, लेकिन मान्यवर और कोई स्पष्ट जवाब नहीं। आखिरकार एक रास्ता छोटा भी हो सकता है, लेकिन यह लंबा भी हो सकता है। सारे सुबूत बताते हैं कि रूस की लीडरशिप को अब भी यकीन है कि वह युद्ध में यूक्रेन से मिलिट्री जीत की राह पर है। इसे शांति के मामले में कहें तो रूस की शर्तें पर मिलिट्री सफलता से तय शांति की ओर आगे बढ़ना। इसलिए, फिलहाल लड़ाई जारी है। इस तथ्य के बावजूद कि साढ़े चार साल से अधिक के युद्ध और भारी सैन्य नुकसान के बाद भी व्रेमलिन को अभी तक जीत हासिल नहीं हुई है और यूक्रेन ने युद्ध को रूसियों के घर तक वापस लाने में सफलता हासिल की है।
-अनिल नरेन्द्र