Anil Narendra Blog
AAJ KI AWAZ आज की आवाज़
Translater
Tuesday, 5 May 2026
आप और ट्रंप लगातार झूठ बोल रहे हैं
Saturday, 2 May 2026
खाड़ी देशों में उभरते मतभेद
Thursday, 30 April 2026
पागलों की दुनिया : मुझे मरने का डर नहीं
Tuesday, 28 April 2026
डील होने की संभावना
पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम से उम्मीद जगी है कि अगले कुछ दिनों में अमेरिका-ईरान में कोई डील हो जाए और युद्ध भविष्य में होने से टल जाए। जिस तरह से ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची 48 घंटे में दो बार इस्लामाबाद गए, वहां से मस्कट (ओमान) गए और वहां से मास्को गए उससे तो लगता है कि ईरान ने डील की शर्तें तय कर ली हैं और ईरान भी अमेरिका से बातचीत करने को तैयार है। दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी थोड़ी नरमी दिखाई और युद्ध विराम को अनिश्चितकाल तक बढ़ा दिया और ईरान के प्रतिनिधिमंडल से इस्लामाबाद में अगले प्रतिनिधिमंडल को भेजने की इजाजत दी उससे साफ है कि ट्रंप इस युद्ध से हर हालत में बाहर निकलना चाहते हैं। वह जानते हैं कि वह यह युद्ध हार चुके हैं। आगे लड़ने के लिए न तो उनमें मादा है और न ही युद्ध लड़ने के संसाधन? ट्रंप की एक बड़ी मजबूरी यह भी है कि उन्हें 2 मई तक अमेरिकी कांग्रेस (संसद) से ईरान युद्ध को जारी रखने के लिए स्वीकृति भी लेनी होगी। जोकि शायद मुश्किल हो। क्योंकि अमेरिका के 63 प्रतिशत नागरिक ट्रंप के इस युद्ध के खिलाफ हैं और वह नहीं चाहते कि अमेरिका इजरायल का युद्ध लड़े। इसके अलावा अमेरिकी सेना ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके पास अब हथियारों का जखीरा आधा हो चुका है और यह वह किसी भविष्य इमरजेंसी के लिए रखना चाहता है। सो मुझे नहीं लग रहा कि ट्रंप में अब मादा है कि यह युद्ध जारी रखें। देखा जाए तो असहमति के भी दो-तीन मुद्दे ही बचे हैं। होर्मुज स्ट्रेट को खोलना, ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कंट्रोल और मिसाइलों को सीमित करना, होर्मुज पर टोल लेना? इत्यादि यही प्रमुख मुद्दे बचे हैं। ईरान के विदेश मंत्री के इतनी बार इस्लामाबाद के चक्कर लगाना यह संकेत देता है कि ईरान भी अब किसी समझौते को चाहता है। ट्रंप को अपने उकसावे वाले फिजूल बयान बंद करने होंगे। खामखां वह उल्टे सीधे बयान देकर माहौल खराब करते हैं। दो दिन पहले हुए जानलेवा हमले का भी ट्रंप पर जरूर असर पड़ा होगा। सैन्य टकराव से दोनों पक्ष जितना हासिल कर सकते थे, कर लिया है। अमेरिका ने जिन तथ्यों को लेकर जंग छेड़ी थी वे अब भी दूर है और पता नहीं वह लड़ाई से इन्हें पूरा कर भी सकते हैं या नहीं? इसी तरह ईरान को भी अंदाजा होगा कि वह ट्रंप की जिद पर एक सीमा तक ही झुक सकता है। ऐसे में एक ही रास्ता बचा है शांति। तेल और नेचुरल गैस को लेकर इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की चेतावनी कि इनकी सप्लाई 2027 तक भी सामान्य नहीं होगी, जंग के गंभीर नतीजों का बस एक पहलू है। गतिरोध लंबा खिंचने से वैश्विक मंदी आ सकती है और इसकी सबसे ज्यादा कीमत आम आदमी को चुकानी पड़ती है। वैसे भी जंग में भी मरता तो आम आदमी है चाहे वह किसी भी देश का हो। इसलिए कुल मिलाकर डील हो जाए तो उसका सारी दुनिया स्वागत करेगी। देखें, यह चमत्कार क्या इस्लामाबाद कर पाएगा?
-अनिल नरेन्द्र
Saturday, 25 April 2026
हारा हुआ कैसे तय कर सकता है युद्ध की शर्तें?
सीजफायर की समय-सीमा अनिश्चितता समय बढ़ाने की घोषणा करते हुए ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेना पूरी तरह से तैयार है और युद्ध विराम केवल तब तक है जब तक चर्चा किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच जाती। इसे ईरान ने न केवल ठुकरा दिया, बल्कि उन्हें अमेरिका की कमजोरी बताया। ईरानी संसद के अध्यक्ष के सलाहकार मेहदी मोहम्मदी ने कड़े शब्दों में कहा कि युद्ध के मैदान में हारा देश अपनी शर्तें नहीं थोप सकता। पिछड़ने वाला देश कैसे शर्तें तय कर सकता है? उन्होंने लिखा, ट्रंप के युद्ध विराम विस्तार का कोई मतलब नहीं है। बंदरगाहों की घेराबंदी जारी रखना बमबारी करने से अलग नहीं है। कटु सत्य तो यह है कि ईरान युद्ध में अमेरिका के बुरी तरह से फ्लाप होने के सुबूत सामने आने लगे हैं। जंग में सफलता न दिलाने की वजह से अमेरिका में पिछले 25 दिनों में सेना के चार बड़े अफसरों को बर्खास्त कर दिया गया है। लिस्ट में ताजा नाम नेवल सेकेट्री जॉन फेलन का है। होर्मूज में ईरानी नाकाबंदी को ध्वस्त न कर पाने की वजह से पेंटागन ने केवल फेलन को बर्खास्त ही नहीं किया बल्कि फेलन से पहले आमी चीफ जनरल रैंडी, मेजर जनरल डेविड होंडले और मेजर जनरल विलियम ग्रीन जूनियर को बर्खास्त किया जा चुका है। फेलन राष्ट्रपति ट्रंप के बेहद करीबी अफसर माने जाते हैं। फेलन पर कमांड को दरकिनार करने और युद्ध में अपेक्षित सफलता नहीं दिलाने का आरोप है। हालांकि आधिकारिक बयान में कहा गया है कि फेलन ने खुद ही इस्तीफे की पेशकश की है। उधर फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक होर्मूज के बाहर अमेरिका नाकाबंदी करने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है। सेटकॉम के बयान के उलट 22 अप्रैल को 34 ईरानी जहाज होर्मूज से गुजर गए। इन जहाजों को अमेरिका रोक नहीं पाया। उधर सेटकॉम का कहना है कि उसने होर्मूज में 10 हजार सैनिक लगा रखे हैं। मंगलवार 21 अप्रैल को इस्लामाबाद में ईरान-अमेरिका के बीच शांति वार्ता को लेकर प्रस्तावित बैठक में ईरान ने शामिल होने से मना कर दिया। सीएनएन के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप ईरान जंग से बाहर निकलना चाहते हैं। इसकी एक वजह संभावित मिड टर्म इलेक्शन हैं। ट्रंप को लगता है कि मिड टर्म इलेक्शन तक अगर युद्ध जारी रहता है तो उनकी पार्टी को काफी ज्यादा नुकसान हो सकता है। इसलिए ट्रंप ने ईरान से बिना बात किए सीजफायर को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया है। होर्मूज अभी जल्द खुलने वाला भी नहीं है, बेशक ट्रंप कितना भी चाहें। अमेरिकी थिंक टैंक का मानना है कि होर्मूज स्ट्रेट के बिछी माइंस हटाने में छह महीने तक का समय लग सकता है। इससे तेल सप्लाई, वैश्विक व्यापार लंबे समय तक प्रभावित रहेगा। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम नहीं हुआ है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करे। संवर्धित यूरेनियम सौंप दे और होर्मूज को पूरी तरह खोल दे। दूसरी तरफ ईरान ने कहा है कि जब तक अमेरिका उसकी नाकाबंदी खत्म नहीं करेगा, वह बातचीत नहीं करेगा। जैसा मेहदी मोहम्मद ने कहा है हारे युद्ध में बुरी तरह फ्लाप हुए अमेरिका युद्ध की शर्तें कैसे तय कर सकता है?
-अनिल नरेन्द्र
Thursday, 23 April 2026
बंद-खुला-बंद-होर्मुज पर सस्पेंस
Tuesday, 21 April 2026
ईरान-अमेरिका, इजरायल युद्ध: आगे क्या होगा?
फिलहाल 23 अप्रैल तक युद्ध विराम चल रहा है। पाकिस्तान दोनों पक्षों के बीच डील करवाने में जुटा हुआ है। आसिम मुनीर तेहरान में हैं और शाहबाज रियाद के चक्कर लगा रहे हैं। उधर इजरायल-लेबनान युद्ध में ट्रंप की बदौलत दस दिन का सीजफायर चल रहा है। उम्मीद की जा रही है कि पाकिस्तान में दूसरे दौर की बातचीत संभव है। पर इसमें अभी कई पेंच फंसे हुए हैं। दोनों पक्ष अपनी-अपनी बड़ी शर्तों पर अड़े हुए हैं। अब सवाल उठता है कि आगे क्या हो सकता है? हमें तो चार संभावित परिदृश्य दिखाई दे रहे हैं। रणनीतिक विराम के रूप में नाजुक युद्ध विराम ः कई हफ्तों की लड़ाई के बाद, अमेरिका-ईरान युद्ध विराम संकट को सीमित करने की इच्छा का संकेत देता दिखा। हालांकि शुरुआत से ही इसके साथ कई तरह की बातें जुड़ी रहीं। युद्ध विराम के प्रावधानों की व्याख्या को लेकर मतभेद सामने आए। इन मतभेदों के कारण कुछ पर्यवेक्षकों ने इसे एक स्थायी ढांचे के बजाए रणनीतिक विराम के रूप में देखना शुरू कर दिया। एक अमेरिकी विश्लेषक के अनुसार संघर्ष शुरू होने के बाद से ही समझौते तक पहुंचने की संभावना लगभग शून्य थी। ये सिद्धांतों, स्थितियों और नीतियों का एक ऐसा समूह है, जिन पर अमेरिका और ईरान सालों से असहमत रहे हैं और युद्ध इन मतभेदों को कम करने में नाकाम रहा है। दोनों पक्षों के परस्पर विरोधी बयानों से स्थिति और बिगड़ गई है। डोनाल्ड ट्रंप की ओर से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकाबंदी की घोषणा से टकराव और बढ़ गया है। हालांकि तनाव बढ़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। दावे से कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि युद्ध रुकेगा या नहीं? एक परिदृश्य जो शायद सबसे अधिक मुमकिन है, वो है टकराव की नियंत्रित तनाव के रूप में वापसी। इसका मतलब होगा कि संघर्ष खुली जंग के स्तर तक नहीं पहुंचेगा और न ही दोनों पक्ष पूरी तरह सैन्य कार्रवाई से परहेज करेंगे। इसमें बुनियादी ढांचे, सैन्य ठिकानों या आपूर्ति लाइनों पर सीमित हमले जारी रह सकते हैं। इसके बाद प्राक्सी समूहों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी। कुछ विश्लेषक इस स्थिति को शैडो वॉर कहते हैं। जैसे-जैसे तनाव बढ़ता है, गलत आंकलन का खतरा बढ़ता है, और भले ही कोई पक्ष तनाव बढ़ाना न चाहता हो, एक छोटी गलती भी संघर्ष को अनियंत्रित स्तर तक पहुंचा सकता है। पाकिस्तान में वार्ता विफल होने के बावजूद यह निष्कर्ष निकालना अभी संभव नहीं है कि कूटनीति खत्म हो चुकी है या वार्ता पूरी तरह टूट चुकी है। अमेरिका का 15 सूत्रीय प्रस्ताव और ईरान का 10 सूत्रीय जवाबी प्रस्ताव यह जरूर दिखता है कि दोनों पक्ष बजाए किसी मध्य मार्ग पर पहुंचने के अभी भी अपनी-अपनी शर्तों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसलिए भले ही वार्ता का नया दौर संभव हो। लेकिन जल्दी और व्यापक समझौते की उम्मीद करना सही नहीं लगता। अगर अमेरिकी नाकाबंदी जारी रहती है तो ईरानी सेना ने खाड़ी, लाल सागर और ओमान की खाड़ी में शिपिंग की खतरे की चेतावनी दी है। ट्रंप ने घोषणा की है कि देश की नौसेना ईरान पर समुद्री नाकाबंदी जारी रखेगा जिससे वह हर गुजरते जहाज को रोक सकता है और यह ईरान को किसी हालत में स्वीकार नहीं है। ईरान ने यह धमकी दी है कि अंतर्राष्ट्रीय जल क्षेत्र में उन जहाजों को रोका जाएगा जो होर्मुज से गुजरने के लिए ईरान को ट्रांजिट शुल्क नहीं देंगे तो नतीजा अच्छा नहीं होगा। ट्रंप चाहते हैं ईरान की तेल आय को रोकना, उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर करना और ईरान को मजबूर करना कि वह अमेरिका की शर्तों को माने। लेकिन अन्य विश्लेषकों ने इस नीति से अमेरिका को होने वाली भारी लागत की ओर इशारा किया है क्योंकि इससे उसकी सैन्य ताकत भौगोलिक रूप से ईरान के करीब आ जाएगी और हमलों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाएगी। मौजूदा माहौल में रणनीतिक फैसले, सुरक्षा से जुड़े सवाल और जमीनी स्तर पर छोटे घटनाक्रम भी संकट की दिशा पर बड़ा असर डाल सकते हैं।
-अनिल नरेन्द्र