Thursday, 5 February 2026

मणिकर्णिका घाट पर अहिल्याबाई की मूर्ति पर विवाद


उत्तर प्रदेश का वाराणसी शहर पिछले कई दिनों से सुर्खियों में बना हुआ है। हिन्दुओं की धार्मिक नगरी के रूप में चर्चित वाराणसी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र भी है। वह 2024 के लोकसभा चुनाव में यहां से तीसरी बार निर्वाचित हुए हैं। प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने की वजह से वाराणसी में विकास की कई परियोजनाएं चल रही हैं। इसी कड़ी में ऐतिहासिक मणिकर्णिका घाट का भी पुनर्विकास किया जा रहा है। कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि इसके लिए पहले पुराने ढांचों को तोड़ा गया है। इस तोड़फोड़ को लेकर स्थानीय लोग नाराज भी हैं। काशी के पाल समाज के अध्यक्ष महेंद्र पाल कहते हैं कि जब मूर्ति खंडित की गई तो उन्होंने विरोध किया था। कई लोगों का आरोप है कि वहां मौजूद इंदौर के पूर्व राजघराने की अहिल्याबाई होल्कर की मूर्ति भी टूट गई है। लेकिन वाराणसी के मेयर अशोक तिवारी इससे साफ इंकार करते हैं। उनका कहना है कि मूर्ति सुरक्षित रखी गई है, जिसे बाद में स्थापित कर दिया जाएगा। अहिल्याबाई होल्कर की मूर्ति टूटने के दावों के बाद वहां विरोध प्रदर्शन भी हुए। पुलिस ने इस मामले में कई लोगों को हिरासत में भी लिया। विरोध प्रदर्शन में शामिल काशी के पाल समाज के अध्यक्ष महेंद्र पाल कहते हैं, अहिल्याबाई होल्कर हम लोगों की पूर्वज रही हैं और वो पाल समाज की महिला थीं। उन्होंने दावा किया हम लोग मौके पर पहुंचे थे और तोड़-फोड़ देखी थी। जेसीबी लगाकर मूर्ति को तोड़ा जा रहा था। इसलिए जब उनकी मूर्ति खंडित की गई तो हमने विरोध किया। लेकिन पुलिस ने हमें वहां जाने नहीं दिया। वैसे तो वाराणसी में 80 से अधिक घाट हैं लेकिन मणिकर्णिका घाट को धार्मिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी घाट के पुनर्विकास के लिए काम शुरू हुआ है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पुनर्विकास के नाम पर प्राचीन परंपराओं और स्वरूप से छेड़छाड़ की जा रही है। अजय शर्मा काशी में मूर्तियों की स्थापना का काम करते हैं। उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा यहां जो टूटी है वह मणि टूटी है। मेरा विरोध हमारे पौराणिक विग्रहों के संरक्षण के लिए है। विकास का कोई विरोध नहीं है। नवीनीकरण और सौंदर्यीकरण का भी यहां कोई व्यक्ति विरोध नहीं करता। अजय शर्मा कहते हैं कि अहिल्याबाई की जो मूर्ति थी या गणेश जी की मूर्ति थी या गंगा स्वरूप की जो मूर्ति थी, वे नष्ट नहीं हुई। लेकिन वाराणसी के मेयर अशोक तिवारी ने सभी आरोपों का खंडन किया है। उनका कहना है कि सभी मूर्तियां संरक्षित की गई हैं और घाट के विकास के बाद उन्हें दोबारा स्थापित किया जाएगा। उन्होंने कहा, मणिकर्णिका घाट के पुनर्विकास की योजना पर काम किया जा रहा है ताकि इसे आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया जा सके। इसके अंतर्गत शव जलाने के लिए चिमनीयुक्त 38 प्लेटफार्म बनाए जा रहे हैं, जिससे खासकर बरसात के मौसम में शवदाह में आसानी होगी। अशोक तिवारी ने बताया अंतिम संस्कार के लिए जाने वाले लोगों के लिए अप्रोच रैम्प, प्रतीक्षालय और व्यूइंग गैलरी बनाई जाएगी। लकड़ी ढुलाई के लिए अलग रैम्प, पंजीकरण कार्यालय और स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था भी की जाएगी। अशोक तिवारी का दावा है कि ये काम डोमराजा के कहने पर ही प्रधानमंत्री ने शुरू कराया है। हालांकि इस सब विवाद के बीच पुनर्विकास का काम जारी है। इस जगह पर शवदाह का काम चलता रहता है। मान्यता है कि यहां अंतिम संस्कार होने से मोक्ष प्राप्त होता है।
-अनिल नरेन्द्र

Sunday, 1 February 2026

अजित पवार प्लेन क्रैश से जुड़े सवाल


आखिर हम इन हवाई दुर्घटनाओं में कितनी कीमती जानें गंवाएंगे? अगर हाल ही के प्लेन क्रेशों पर नजर डाले तो 2021 में सीडीएस जनरल विपिन रावत, भारत के पहले प्रमुख रक्षा अध्यक्ष का दिसम्बर 2021 तमिलनाडु के कुनूर के पास एयर क्रेश में मृत्य हो गई। दो सितम्बर 2009 को आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी (वाईएसआर) का हेलीकाप्टर नालामाला जंगल में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। 30 अप्रैल 2011 को अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दोइली खांदू को तवांडा से ईटानगर ही रहे हैं हेलीकाप्टर क्रेश हो गया और उनकी मृत्यु हो गई। हाल ही में 2025 (12 जून) को अहमदाबाद में भयंकर एयर क्रेश में पूर्व मुख्यमंत्री विजय रुपाणी सहित 292 यात्रियों की मौत हो गई। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष जीएमसी बालयोगी का निधन भी एक हेलीकाप्टर क्रेश में हुआ। और अब महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित दादा पवार की प्लेन क्रेश में मृत्यु हो गई। पूर्वी जिले के बारामती में हुए इस हादसे की अब कई कोणों से जांच की जा रही है। क्या यह महज दुर्घटना थी, पायलट एटर था या फिर कोई साजिश थी? इसका झराब तो गहन जांत से मिल सकता है। अगर कभी मिला भी? क्योंकि आज तक जितने भी क्रेश हुए हैं आज तक उनमें से किसी का भी संतोषजनक जवाब नहीं मिला, यह नहीं पता चल सका कि दुर्घटना का असल कारण क्या था? अजित दादा पवार के प्लेन क्रेश पर केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय की ओर से जारी बयान के मुताबिक विजिवलिटी कम होने की वजह से बारामती में रनवे नहीं दिखा और लैडिंग की कोशिश नाकाम हो गई। अगर पं. बंगाल की मुख्यमंत्री सहित कई नेताओं ने हादसे पर सवाल उठाए हैं और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की है। हालांकि, अजित पवार के चाचा शरद पवार ने हादसे के पीछे किसी भी तरह की राजनीति होने की बात से इंकार करते हुए कहा कि यह महज एक दुर्घटना थी। हादसे के बाद शुरुआती जानकारियां भी सामने आ चुकी हैं लेकिन अब भी कई ऐसे अहम सवाल हैं जिनके जवाब देश चाहता है। आखिरी पलों में क्या हुआ? लैडिंग के दौरान किन हालात ने खतरा बढ़ाया और क्या सुरक्षा प्रोटोकाल का पूरी तरह पालन हुआ ये वो सवाल है जो इस पूरे मामले को और गंभीर बना रहे हैं। हमें इन सवालों का जवाब चाहिए उनमें प्रमुख हैं ः खराब विजिविलिटी में लैडिंग की कोशिश क्यों की गई? क्या यह संभव था कि विमान वापस चला जाता (अगर उसमें ईंधन काफी था)? लैडिंग व्लीटेंस के बाद अचानक क्या हुआ? कितना सुरक्षित है लियर जेट-45 विमान? नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अनुसार वीटी-एसएस थे - एलजे 45 चार्टर विमान माध्यम आकार का बिजनेस जेट है। जिन्हें कनाडा की कंपनी बम्बारडियर एटोस्योन ने बनाया है इसमें 8 यात्रियों के बैठने की जगह है। ये विमान छोटे रनवे वाले हवाई अड्डे पर भी आसानी से उतर सकता है। यह भी पता चला है कि इससे पहले 14 सितम्बर 2023 को, ऐसा ही विमान मुंबई में लैडिंग के बाद रनवे से फिसल गया था और दो हिस्सों में टूट गया था। बुधवार के हादसे के बाद एक बार फिर से सवाल खड़ा हो गया है कि ये विमान कितना सुरक्षित है? क्या लैडिंग एप्रोच सुरक्षित थी? हादसे के चश्मदीदों ने बताया कि विमान को हवा में देखकर ही लग रहा था कि वे लैंड नहीं कर पाएगा। एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि जब विमान नीचे आ रहा था, ऐसा लग रहा था कि वह क्रेश हो जाएगा। तभी तो क्रेश हो गया। डीजीसीए के बयान में ये बताया गया है कि विमान के पायलट ने पहले रनवे न दिखाई की सूचना दी और बाद में ये सूचना दी गई कि रनवे दिख रहा है। सोशल मीडिया पर सामने आया है कि जिसमें विमान हवा में ही पलटते हुए दिख रहा है। किसी भी विमान हादसे के बाद मे ये शब्द का इस्तेमाल कई बार होता है। ये शब्द एबिएशन और मैरिटरपून इमरजेंसी के लिहाज से बहुत अहम है। एक अन्य पायलट ने कहा कि मेडे कॉल न किया जाना इस ओर इशारा करता है कि आखिरी वक्त तक पायलट का विमान नियंत्रण में था। उन्होंने कहा कि अगर विमान के इंजन फलियर हुआ होता या कोई और समस्या होती तो पायलटों ने मेडे वाल दी होती। इन सवालों का जवाब देश चाहता है। पर पता नहीं कभी मिले या यह भी इतिहास का एक पन्ना बनकर रह जाएगा?
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 31 January 2026

ईरान की ट्रंप को धमकी

 
जिस तरह से अमेरिका ने ईरान को चारो तरफ से जंगी उपकरणों व अत्याधुनिक हथियारों से इस समय घेर रखा है ऐसा जमावड़ा हमने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कभी नहीं देखा। एयराफ्ट कैरियरों, 500 लड़ाकू विमानों, हजारों सैनिकों से इस टाइम ट्रंप ने आयतुल्ला खामनेई को घेर रखा है। ट्रंप ने ईरान पर परमाणु समझौता वार्ता के लिए दबाव बनाने के उद्देश्य से यह जंगी बेड़ा भेजा है। ट्रंप ने ईरान को सीधी धमकी दी है कि वह परमाणु समझौता कर ले वरना उस पर अगला हमला और भीषण होगा। उधर ईरान ने चेतावनी दी कि उसकी सेना किसी भी अमेरिकी भी सैन्य ऑपरेशन का जोरदार जवाब देगी। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने सोशल प्लेटफार्म एक्स पर लिखा कि उनकी सेना तैयार है और देश पर किसी भी हमले का जोरदार जवाब देने के लिए ट्रिगर पर उंगली रखे हुए हैं। अरागची की टिप्पणी ट्रंप के धमकी के बाद आई है। जिसमें ट्रंप ने कहा था कि इस विवादित परमाणु कार्पाम पर अमेरिका के साथ डील करे वरना उसे बड़े पैमाने पर अमेरिकी हमले का सामना करना पड़ेगा। उधर ट्रंप ने अपनी बात रखते हुए कहा, ईरान के पास हमारा बड़ा जंगी बेड़ा है, वेनेजुएला से भी बड़ा तेहरान में मौजूद अधिकारी लगातार संकेत दे रहे हैं कि ईरान वार्ता के लिए तैयार है। ट्रंप ने कहा वे समझौता करना चाहते हैं मुझे पता है। उन्होंने कई बार कॉल भी किया है। ट्रंप ने आगे कहा उम्मीद है कि ईरान जल्द ही बातचीत के लिए तैयार होगा और एक निष्पक्ष और बराबरी का समझौता करेगा। कोई परमाणु हथियार नहीं... जो सभी पक्षों के लिए अच्छा हो। समय कम है और यह सच में बहुत जरूरी है। अगला हमला और भीषण होगा। इसे मत होने दो। ट्रंप की धमकियों के बीच मध्य-पूर्व के अरब देशों में भी हलचल बहुत तेज हो गई है। सऊदी अरब, तुर्किए, कतर इत्यादि देशों के अध्यक्ष व राजा अपनी पूरी ताकत लगा रखे हैं कि जंग टल जाए। सऊदी बादशाह सलमान ने तो पूरी ताकत झोंक दी है। यह इसलिए भी है कि ईरान ने खुली धमकी दी है कि अगर अमेरिका और इजरायल की तरफ से कोई हमला होता है तो ईरान, अरब देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर मिसाइल मार देगा और उन्हें तबाह कर देगा। बता दें कि सऊदी अरब सहित तमाम अरब देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं। जहां हजारों अमेरिकी सैनिक तैनात हैं और सैकड़ों लड़ाकू विमान इत्यादि रखे हुए हैं। अगर लड़ाई छिड़ती है तो एक तरफ ईरान इजरायल को तबाह कर देगा और दूसरी तरफ मध्य-पूर्व में तमाम अमेरिकी सैन्य अड्डों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। ईरान खुद जंग के लिए पूरी तरह तैयार है। वह पिछले 20 साल से इस दिन का इंतजार कर रहा है। इस दौरान उसने दुनिया की सबसे प्रभावी मिसाइलों का निर्माण कर लिया है। उसने ऐसी-ऐसी मिसाइलें तैयार कर ली हैं जो 10 हजार प्रति घंटा की स्पीड से बहुत दूरी तक मार कर सकती है। दुनिया ने पिछले साल बारह दिन की जंग में ईरान ने इजरायल का क्या हाल किया था, सभी ने देखा था। इस बीच खबर ये भी आई है कि सऊदी अरब ने स्पष्ट कहा है कि अगर ईरान पर अमेरिका हमला करता है तो सऊदी हमले के लिए अपनी जमीन नहीं देगा। सऊदी अरब के युवराज व प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान बिन अब्दुलअजीज अल सउद ने कहा है कि उनका देश ईरान के खिलाफ कार्रवाई के लिए अपनी जमीन या हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देगा। मध्य-पूर्व एशिया में इस समय जंगी बादल मंडरा रहे हैं और किसी भी छोटी चिंगारी से अचानक युद्ध छिड़ सकता है। हम ऊपर वाले से प्रार्थना करते हैं कि यह जंग टल जाए और बातचीत से मसला हल हो जाए और पूरी दुनिया जंग की तबाही से बच जाए। 
-अनिल नरेन्द्र

Friday, 30 January 2026

महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा


महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार की बुधवार को विमान दुर्घटना में मौत से जहां पूरा देश स्तब्ध है, शोक में डूबा हुआ है वहीं यह भी प्रश्न उठ रहा है कि उनकी अकस्मात मृत्यु से महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा? 66 साल के अजीत पवार का निजी विमान महाराष्ट्र के बारामती में लैंड करते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया। बता दें कि अजीत पवार ने जुलाई 2023 में अपने चाचा शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) से बगावत कर दी थी। 2023 में 2 जुलाई को वे अपनी पार्टी के 8 सदस्यों के साथ महाराष्ट्र सरकार में शामिल हो गए थे और सरकार में उपमुख्यमंत्री बने। शरद पवार से बगावत कर एकनाथ शिंदे सरकार में शामिल होने के अपने फैसले पर अजीत पवार ने कहा था, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत प्रगति कर रहा है, इसलिए भाजपा के साथ कुछ मतभेद होने के बावजूद एनसीपी ने महाराष्ट्र की प्रगति के लिए सरकार के साथ हाथ मिलाने का फैसला किया है। नवम्बर 2024 में महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हुए और अजीत पवार अपने चाचा पर भारी पड़े। हालांकि छह महीने पहले ही लोकसभा चुनाव में अजीत पवार की पार्टी को केवल एक सीट पर ही जीत मिली थी। तब अजीत पवार को महाराष्ट्र की सत्तारुढ़ भाजपा नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी कहा जा रहा था। लेकिन विधानसभा चुनाव में अजीत पवार सबसे मजबूत खिलाड़ी के रूप में उभरे। उन्होंने 41 विधानसभा सीटें हासिल की और लगभग अपने चाचा के विद्रोही गुट एनसीपी (एसपी) को खत्म कर दिया। जो केवल 10 सीटें ही जीत सकी। अजीत पवार ने 5 दिसम्बर 2024 को रिकार्ड छठी बार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। विश्लेषक कहते हैं कि शरद पवार की छाया में 20 साल बिताने के बाद अजीत पवार को लगा कि चाचा उनके रास्ते में बाधा बन रहे हैं इसलिए उन्होंने अपना रास्ता ढूंढ़ लिया। 5 फरवरी से महाराष्ट्र जिला परिषद पंचायत समिति के चुनाव होने जा रहे हैं। इसी के प्रचार के लिए अजीत दादा पवार बारामती जा रहे थे। एनसीपी का पूरा दायित्व अजीत पवार के ऊपर ही था। अजीत पवार का निधन तब हुआ है, जब शरद पवार राजनीतिक रूप से बहुत कमजोर हो गए हैं। जिला परिषद के चुनाव में अजीत अपने चाचा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले थे। अब मुझे लग रहा है कि पूरी सहानुभूति शरद पवार के साथ जाएगी। भाजपा के उभार के बाद से महाराष्ट्र में मराठा नेताओं की हैसियत कमजोर हुई है और इसका अहसास प्रदेश में सबको है। मराठा जाति का वर्चस्व खेती, शिक्षा और बैंकिंग पर खत्म हो चुका है। शरद पवार के साथ अब मराठा जाति की सहानुभूति आएगी। ग्रामीण महाराष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था पर अब भी मराठा जाति की पकड़ है और इन्हें अब लग रहा है कि भाजपा के आने से उनकी पकड़ कमजोर पड़ रही है। देवेन्द्र फडणवीस की सरकार में एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना और अजीत पवार की अगुवाई वाली एनसीपी है। अजीत पवार के निधन के बाद एनसीपी अगर इस सरकार से हट जाती है तब भी सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। भले सरकार सत्ता में बनी रहेगी लेकिन फर्क दूसरी तरह से पड़ेगा। मराठा जाति अजीत पवार के निधन के बाद सोचेगी कि अब उनके पास कौन है? शरद पवार खुद ही जीवन के सांध्य काल में हैं। पूरा मराठा तबका अब सोचेगा कि उन्हें किस तरफ रुख करना है? एक विश्लेषक का कहना है कि अजीत पवार महाराष्ट्र की राजनीति में हिन्दुत्व के बढ़ते प्रभाव के बीच अपनी ताकत बनाए हुए थे और यह बड़ी बात थी। भाजपा और शिवसेना दोनों हिन्दुत्व की राजनीति करते हैं। भाजपा की अगुवाई वाली सरकार स्थिर रहेगी लेकिन मराठा राजनीतिक का उभार हो सकता है। एनसीपी फिर से शरद पवार के नेतृत्व में एकजुट हो सकती है और यह भाजपा की मजबूती के हक में नहीं होगी। अजीत पवार को देवेन्द्र फडणवीस सरकार में एकनाथ शिंदे की शक्ति संतुलन करने के रूप में भी देखा जाता था। कहा जाता है कि अगर अजीत दादा पवार का साथ नहीं होता तो नवम्बर 2024 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बनने के लिए अड़ सकते थे। ऐसे में भाजपा के पास विकल्प था वह अजीत पवार के साथ सरकार बना ले। हम अजीत पवार को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं कि उनके परिवार को इस भारी क्षति से उभरने का साहस दें। 
-अनिल नरेन्द्र

Wednesday, 28 January 2026

ट्रंप को उसी की भाषा में जवाब


बड़बोले और बेलगाम बोलने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अगर उन्हीं की भाषा में जवाब दिया है तो वह हैं कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी। दरअसल हुआ यह कि कार्नी स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में बोल रहे थे। मार्क कार्नी के दिए भाषण को अमेरिकी दबदबे वाले वर्ल्ड आर्डर को आईना दिखाने के रूप में देखा जा रहा है। कहा जा रहा है कि दुनिया के लगभग हर देश ट्रंप की नीतियों से परेशान है लेकिन इस तरह बोलने का जोखिम मार्क कार्नी ने उठाया। मंगलवार को स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम को संबोधित करते हुए मार्क कार्नी ने कहा कि ताकतवर देशों की प्रतिद्वंद्विता में मिडिल पावर वाले देशों के सामने दो विकल्प हैं... या तो समर्थन पाने के लिए आपस में होड़ करें या साहस के साथ एक तीसरा रास्ता बनाएं और ऐसा करने के लिए साथ आएं। भारत समेत दुनिया के बाकी को लग रहा है कि अभी चुप रहना ज्यादा बेहतर है। दूसरी तरफ कनाडा के प्रधानमंत्री को लग रहा है कि मौजूदा विश्व व्यवस्था में कोई संक्रमण नहीं बल्कि विध्वंस की स्थिति है और झूठ का पर्दा हट रहा है। मार्क कार्नी खुलेआम कह रहे हैं कि पुरानी व्यवस्था वापस नहीं आएगी और इसका शोक नहीं मनाना चाहिए बल्कि नई और इंसाफ सुनिश्चित करने वाली वैश्विक व्यवस्था के लिए काम शुरू कर देना चाहिए। कार्नी कह रहे हैं कि मध्यम शक्ति वाले देशों को भ्रम की दुनिया से बाहर आना चाहिए। कार्नी को पता है कि ट्रंप की नीतियों की आलोचना करने का जोखिम भी है। कनाडा की अर्थव्यवस्था बहुत हद तक व्यापार पर निर्भर है और 2024 में कनाडा के कुल निर्यात का 75 प्रतिशत व्यापार अमेरिका में हुआ था। ट्रंप ने अमेरिका के प्रति कृतज्ञता न दिखाने का आरोप लगाते हुए मार्क कार्नी की आलोचना करते हुए कहा, वैसे कनाडा हमसे बहुत-सी मुफ्त सुविधाएं पाता है। उन्हें आभार व्यक्त करना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं कर रहे हैं। मैंने मंगलवार को मार्क कार्नी को देखा और वह ज्यादा कतृज्ञ नहीं थे। कनाडा अमेरिका की वजह से ही अस्तित्व में है। अगली बार जब मार्क कार्नी बयान देंगे तो उन्हें... यह बात याद रखनी चाहिए। इससे पहले ट्रंप कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात कह चुके हैं। इतनी धमकियों के और दबाव के बावजूद कनाडा ने ट्रंप को दो टूक जवाब दिया। ऐसे में यह सवाल पूछा जा रहा है कि ट्रंप की नीतियों, धमकियों के बावजूद अमेरिका भारत के हितों को चोट पहुंचा रहा है फिर भी भारत कनाडा की तरह ट्रंप को उन्हीं की भाषा में जवाब आखिर क्यों नहीं दे रहा है? ट्रंप ईरान से तेल खरीदने, रूस से तेल खरीदने, 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने से लेकर 70 बार से ज्यादा भारत-पाक युद्ध रोकने की बात कह चुके हैं, अमेरिका ने वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन किया, ईरान में भी सत्ता परिवर्तन करवाने की बात कर रहा है। सवाल यह है कि भारत कनाडा की तरह ट्रंप की नीतियों पर क्यों नहीं बोल पा रहा है?
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 24 January 2026

मैं ही हूं शंकराचार्य!


पिछले कुछ दिनों से भाजपा प्रशासन और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज में भयंकर विवाद छिड़ा हुआ है। एक तरफ शंकराचार्य जी और अन्य साधु-संत हैं तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनका मेला प्रशासन है। सारा मामला शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के प्रयागराज में गंगा स्नान न करने को लेकर शुरू हुआ। प्रयागराज में चल रहे माघ मेले में मौनी अमावस्या के अवसर पर होने वाले पारंपरिक शाही स्नान को लेकर ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच स्वामी जी के पालकी पर सवार होकर स्नान को लेकर शुरू हुआ। प्रशासन ने स्वामी जी की पालकी पर स्नान करने से रोका, इस पर प्रशासन और स्वामी जी के समर्थकों में हाथापाई तक हो गई। स्वामी जी का कहना है कि प्रशासन के अधिकारियों ने न केवल स्वामी जी की पालकी को तोड़ने का प्रयास किया बल्कि उनके समर्थक साधु-भक्तों को जटा से पकड़कर मारा-पीटा और जेल में ठूंस दिया। इसके विरोध में शंकराचार्य जी ने धरना शुरू कर दिया जो अब भी जारी है। स्वामी जी का कहना है कि प्रशासन की माफी के बिना वे अपने आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे और मौके पर ही धरने पर बैठ गए। इस बीच मेला प्रशासन ने उन्हें नोटिस जारी करते हुए 24 घंटे में ये साबित करने को कहा है कि वे शंकराचार्य कैसे हैं? मेला प्रशासन ने शंकराचार्य जी से पूछा है कि उन्होंने अपने नाम के साथ शंकराचार्य की उपाधि क्यों जोड़ी? नोटिस में ये भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन एक मामला अभी तक समाप्त नहीं हुआ है, ऐसे में किसी भी धर्माचार्य को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य की मान्यता प्राप्त नहीं है। बावजूद इसके, स्वामी जी ने मेला क्षेत्र में बोर्डों पर अपने नाम के आगे ये शीर्षक लिखवा दिया। बता दें कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उनके गुरू स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद शंकराचार्य बनाया गया था। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का पट्टा अभिषेक भी शंकराचार्य ने किया था। अब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता एके मिश्रा के माध्यम से प्राधिकरण को आठ पन्नों का जवाब भेजा है। अपने जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मेला प्राधिकरण के आरोपों को सिरे से नकार दिया और कहा कि वे शंकराचार्य हैं। स्वामी जी ने 15 बिंदुओं में प्रयागराज मेला प्राधिकरण को जवाब दिया है। उन्होंने लिखा, सोमवार को आपकी (मेला प्राधिकरण) ओर से नोटिस सम्मानित अविमुक्तेश्वरानंद को बदनाम और अपमानित करने के बुरे इरादे से जारी किया गया। जो मनमाना, द्वेषपूर्ण और भेदभावपूर्ण है। शारदा मठ द्वारका के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज की वसीयत का भी जिक्र दिया गया है। त्रिवेणी मार्ग शिविर के बाहर प्रेसवार्ता में मेला प्राधिकरण के नोटिस पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के जिस आदेश का हवाला दिया गया है वो 14 अक्टूबर 2022 का है जबकि 11 सितम्बर 2022 को शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के अगले दिन 12 सितम्बर को स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के आश्रम में शंकराचार्य के तौर पर उनका पट्टाभिषेक हो चुका था। जिस तरह से मेला प्रशासन ने शंकराचार्य और उनके अनुयायियों के साथ व्यवहार किया। उनकी उपेक्षा नहीं की जाती। धर्म गुरुओं को इस तरीके से अपमानित करना शर्मनाक है और साधुओं को जटाओ से पकड़ कर पीटना उससे भी ज्यादा निंदनीय है। अब तो शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के पक्ष में अन्य शंकराचार्य और संत खड़े हो गए हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जो खुद भी चाहते हैं कि मामले को निपटाने का प्रयास करना चाहिए। मेला प्रशासन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी से माफी मांगे और उन्हें बाइज्जत गंगा स्नान करवा दे तो विवाद समाप्त हो सकता है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह विवाद बढ़ता जाएगा और तमाम साधु समाज मैदान में उतर आएंगे।
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 22 January 2026

ग्रीनलैंड लेकर रहेंगे: ट्रंप


पिछले कई दिनों से ग्रीनलैंड को लेकर भयंकर रस्साकशी चल रही है।  इस नाटक के तीन प्रमुख किरदार हैं। पहले हैं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जो कह रहे हैं कि अब वक्त आ चुका है, ग्रीनलैंड लेकर हम रहेंगे। ट्रंप झुकने के मूड में नहीं लगते। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अपनी नाक का सवाल बना लिया है। वो कभी ग्रीनलैंड की सेना का मजाक उड़ाते हैं तो कभी वहां सैन्य हमले की बात करते हैं। ट्रंप ने यूरोपीय देशों को खुलकर धमकी दी है कि जो देश ग्रीनलैंड से जुड़े अमेरिकी इरादों का समर्थन नहीं करेंगे। उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने अब तो 8 यूरोपीय देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी भी दे डाली है। ट्रंप किसी भी कीमत पर ग्रीनलैंड हासिल करना चाहते हैं। वह यह भी दावा करते हैं कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर अपना कब्जा नहीं किया तो रूस या चीन इस पर अपना कब्जा कर लेगा। तो पहला किरदार तो डोनाल्ड ट्रंप हैं। दूसरा किरदार यूरोपीय देश हैं। ग्रीनलैंड मुद्दे पर ट्रंप ने यूरोप के 8 देशों पर टैरिफ बढ़ाने की चेतावनी पर यूरोपीय यूनियन ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि अगर अमेरिकी दबाव बनाने के लिए टैरफ लगाएगा तो ईयू भी जवाबी काउंटर टैरिफ लगाएगा। यूरोप का कहना है कि वह अपने हितों और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा। हालांकि ईयू ने अभी जवाबी टैरिफ का प्रतिशत तय नहीं किया है। ईयू में ट्रंप के ग्रीनलैंड बयान और टैरिफ दबाव से ईयू-यूएस ट्रेड एग्रीमेंट भी संकट में पड़ गया है। यूरोप के नेता इस कदम को दबाव की राजनीति बता रहे हैं। इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी ने संकेत दिए कि यूरोप ब्लैकमेल के आगे नहीं झुकेगा। वहीं फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल पों ने कहा कि कोई भी धमकी यूरोप का रास्ता नहीं बदल सकती। वहीं तीसरा किरदार ग्रीनलैंड के लोग हैं और उनके समर्थक। ग्रीनलैंड की राजधानी नुउक में शनिवार को हजारों लोग बर्फ से ढकी सड़कों पर मार्च करते दिखे। यह मार्च ग्रीनलैंड पर कब्जे को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान के खिलाफ था। रणनीतिक और खनिज संपन्न आर्कटक द्वीप ग्रीनलैंड पर अमेरिका ने कंट्रोल की बात दोहराई है। प्रदर्शनकारियों ने ग्रीनलैंड का राष्ट्रीय झंडा लहराया, हाथों में तख्तियां उठाई और नारे लगाएö ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। अमेरिका द्वारा यह कहना कि ग्रीनलैंड उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है मानना आतार्किक नहीं कहा जा सकता। ऐसा मानने वाले ट्रंप कोई पहले राष्ट्रपति नहीं हैं। उनसे पहले भी कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने ऐसा ही तर्क दिया था। यह दीगर बात है कि वह आगे नहीं बढ़ सके। ट्रंप विशुद्ध व्यापारी सोच वाले व्यक्ति हैं। लेकिन व्यापार आदर्शवाद से नहीं चलता। यह सही है कि व्यापार और अर्थव्यवस्था हमेशा से ही कूटनीतिक औजार रही है पर इस प्रकार से सारे कायदे-कानून, परंपरा ताक पर रख जबरदस्ती किसी अन्य देश पर कब्जा करने की धमकी कहां तक सही है। जिस तरह से अमेरिका और यूरोपीय देश आमने-सामने आ गए हैं उससे एक नया खतरा पैदा हो गया है। ट्रंप एक के बाद एक नया फ्रंट खोले जा रहे हैं। इस बार उनके निशाने पर उनके नाटो के देश हैं। 
-अनिल नरेन्द्र