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Saturday, 7 November 2026

ट्रंप की पाटी ने भी उन्हें हार के लिए दोषी ठहराया

रिपब्लिकन पाटी (ट्रंप की अपनी पाटी) के भीतर मंगलवार रात (स्थानीय समय मुताबिक) चुनाव के चौंकाने वाले नतीजों से शुरुआती हैरानी जल्द ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ गुस्से में बदल गई। टेक्सास, कंसास और साउथ कैरोलाइना जैसे उन राज्यों में भी डेमोक्रेटिक पाटी ने एक के बाद एक अप्रत्याशित जीत दर्ज की, जिन्हें रिपब्लिकन पाटी का मजबूत गढ़ माना जाता है। इसके बाद कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने हार के लिए ट्रंप को जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना था कि ट्रंप का ध्यान अपनी विरासत बनाने पर रहा और उन्होंने मतदाताओं की चिंताओं को नजरअंदाज किया। इसकी कीमत पाटी को चुकानी पड़ी। टेक्सास के वरिष्ठ रिपब्लिकन लाबिस्टबिल मिलर ने बीबीसी से कहा, इसकी जिम्मेदारी उन्हीं की है, किसी और की नहीं। यह राष्ट्रपति ट्रंप के पूरी तरह और साफ तौर पर खारिज किया जाना है। यह बहुत बड़े स्तर की तबाही है। किसी ने नहीं सोचा था कि नतीजे ऐसे होंगे। ज्यादातर रिपब्लिकन नेताओं को पहले से ही अंदेशा था कि वे प्रतिनिधि सभा हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में अपना बहुमत खो देंगे। उन्हें यह भी अंदाजा हो गया था कि मुश्किल चुनावी माहौल में सीनेट में बहुमत बचाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा। कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने कहा कि ट्रंप की अलोकप्रिय नीतियों, उनकी कम अप्रूवल रेटिंग और वाशिंगटन में भी निर्माण परियोजनाओं को लेकर उनके जुनून ने पाटी की मुश्किलें बढ़ा दीं। सिनेसोटा के रिपब्लिकन रणनीतिकार ग्रेग पैपिन ने कहा, एक के बाद एक गलती होती गई। साफ है कि अलग-अलग राज्यों में लोगों को राष्ट्रपति की नीतियां पसंद नहीं आईं। व्हाइट हाउस के एक सहयोगी ने कहा कि ईरान युद्ध, टैरिफ और प्रशासन की सख्त इमिग्रेशन नीति को लेकर ट्रंप के प्रति लोगों की नाराजगी ने पाटी के लिए मुश्किलें बढ़ा दीं। उन्होंने कहा, पाटी के भीतर इस बात को लेकर साफ नाराजगी है कि यह सब कैसे हुआ? इस नाराजगी का बड़ा हिस्सा ट्रंप की ओर है और उनके खिलाफ गुस्सा बहुत ज्यादा है। इन नतीजों पर ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पाटी दोनों का बहुत कुछ दांव पर लगा था। अगर राष्ट्रपति की पाटी ने बेहतर प्रदर्शन किया होता, जैसा कि 2022 में हुआ था, तो साल 2028 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले उसे कुछ बढ़त मिल सकती थी। अब ट्रंप को संसद में डेमोक्रेटिक पाटी के ऐसे बहुमत का सामना करना पड़ेगा, जो प्रशासन की जांच करने, उनके न्यायिक नियुक्तियों को रोकने और मनमानी एजेंडे में अड़चन डालने के लिए तैयार है। मिडटर्म चुनावों के नतीजों ने ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में एक अनियमित नया दौर शुरू कर दिया है। इससे रिपब्लिकन पाटी को ट्रंप के बाद के अपने भविष्य पर भी विचार करना पड़ सकता है। चुनाव की रात ट्रंप ज्यादातर समय खामोश रहे। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सीनेट में डेमोक्रेटिक पाटी की जीत घोषित होने के बाद उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट किया। ट्रंप ने लिखा, मैं चुनाव मैदान में नहीं नहीं था। अगर मैं होता तो हम भारी बहुमत से जीतते। बाद में उन्होंने न्यूयार्क टाइम्स और फॉक्स न्यूज के इंटरव्यू में कहा कि वह चुनाव के नतीजे स्वीकार करेंगे। उन्होंने कहा कि नतीजों से उन्हें थोड़ी हैरानी जरूर हुई। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 5 November 2026

राष्ट्रपति ट्रंप की साख दांव पर

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव के नतीजे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए महज चुनावी झटका नहीं, बल्कि उनकी सत्ता, नीतियों और राजनीतिक दबदबे पर जनता के बदलते मिजाज का संकेत हैं। जिस जनसमर्थन के भरोसे ट्रंप अमेरिका की राजनीति को अपनी शर्तें पर चलाने का दावा कर रहे थे, चुनावी नतीजे उसी भरोसे में दरार का इशारा करते हैं। यह नतीजे उनके लिए चेतावनी है कि सत्ता की ताकत और आक्रामक राजनीतिक बयानबाजी के दम पर जनमत को हमेशा अपने पक्ष में नहीं रखा जा सकता। ईरान पर हुए हमलों के बाद अमेरिका में जिस तरह पेट्रोल-डीजल, खाने-पीने की वस्तुओं के दाम बढ़े थे उससे जनता में काफी नाराजगी थी। पिछले कई महीनों से आ रहे पोल, सर्वे भी इसी तरह के नतीजे के संकेत दे रहे थे। सर्वे के मुताबिक, अमेरिकी संसद के निचले सदन या प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिवस) पर नियंत्रण हासिल करने के लिए जरूरी 218 सीटों से कहीं ज्यादा सीटों पर डेमोक्रेट्स उम्मीदवार बढ़त बनाए हुए हैं। हाल ही में आए न्यूयार्क टाइम्स के एक सर्वेक्षण में साउथ कैरोलाइना की सीनेट सीट पर मुकाबला बराबर का दिखाया गया था और नतीजे भी अनुमान के मुताबिक ही आए। यह वही राज्य है जहां डोनाल्ड ट्रंप ने 2024 में 18 प्रतिशत अंकों के अंतर से जीत दर्ज की थी। वैसे हाल के वर्षें में कई ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं, जब जनमत सर्वेक्षण (पोल सर्वे) चुनाव नतीजों का सटीक अनुमान नहीं लगा सके। ये मध्यावधि चुनाव डोनाल्ड ट्रंप के लिए अग्नि परीक्षा है। इनका नतीजा तय करेगा कि ट्रंप को अपने कार्यकाल के अगले दो वर्षें में संसद (कांग्रेस) का कितना समर्थन मिलेगा। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनावों की तरह मध्यावधि चुनाव भी हर चार साल में होते हैं। यह चुनाव राष्ट्रपति के ठीक आधे कार्यकाल के दौरान होते हैं। चुनाव वैलेट पेपर के जरिए कराए जाते हैं। इस वजह से अमेरिका में मध्यावधि चुनाव का बहुत ही महत्व होता है। अमेरिका के निचले सदन को प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिवस) में दो साल के कार्यकाल वाले इन प्रतिनिधियों की सभी 435 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। जनसंख्या के आधार पर सीटें तय की जाती है। ऊपरी सदन के सांसदों का कार्यकाल छह साल का होता है। सीनेट में 100 सीटें होती हैं। हर प्रांत के लिए दो सीटें हैं। 50 प्रांतों की कुल 100 सीटें हुईं। इस चुनाव में सीनेट की 35 सीटों के लिए मतदान हो रहा है। इस बार चुनाव में ट्रंप को कई मुद्दों पर चुनौतियां मिल रही हैं। इसमें महंगाई, बढ़ती पेट्रोल-डीजल की कीमतों के अलावा ईरान से जारी जंग बड़ा मुद्दा है। वहीं व्यापार, स्वास्थ्य, इमिग्रेशन सेवाएं, शिक्षा और लोकतंत्र का भविष्य प्रमुख मुद्दे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर हुए कई जनमत सर्वेक्षणों में डेमोक्रेट की बढ़त हासिल हुई थी। संभावित वोटरों के बीच डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को 52 से 53 प्रतिशत तक समर्थन है। जबकि ट्रंप की पाटी रिपब्लिकन उम्मीदवार 44 प्रतिशत के आसपास माने जा रहे हैं। डीसीजन डेस्क एमक्यू के सर्वेक्षण में डेमोक्रेट्स की जीत की 79 प्रतिशत की संभावना है। 16-18 करोड़ (लगभग) पंजीकृत मतदाता वोट डालने के लिए पात्र हैं। अमेरिका में 4 नवम्बर की सुबह लगभग 6 बजे से रुझान और शुरुआती नतीजे आने शुरू हो गए थे (भारतीय समयानुसार)। यह चुनाव भारत के लिए इसलिए मायने रखता है, क्योंकि अमेरिकी संसद के फैसले भारतीय निर्यात, अमेरिका में कार्यरत भारतीय पेशेवरों को सीधा प्रभावित कर सकते हैं। इन चुनावों के परिणाम न केवल अमेरिकी नीतियों को प्रभावित कर सकता है बल्कि पूरी दुनिया पर इसका असर देखने को मिल सकता है। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 3 November 2026

चुनाव की जांच मोसाद करेगी


इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद हाल ही में संपन्न हुए चुनाव में विदेशी दखल के आरोपों की जांच करेगी। इजरायली न्यूज चैनल 12 की रिपोर्ट के मुताबिक इस चुनाव की जांच में आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट भी शामिल होगी। आरोप है कि कतर और कुछ दूसरे देशों ने मंगलवार को हुए नेसेट के चुनाव में अरब वोटर्स को पैसा देकर ज्यादा से ज्यादा वोट डलवाने की कोशिश की। इस चुनाव में अरब पार्टियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए रिकार्ड 19 सीटें जीती हैं। यह इतिहास में उनका सबसे अच्छा प्रदर्शन है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी पार्टी के नेताओं ने भी अरब पार्टियों पर चुनाव में गड़बड़ी के आरोप लगाए हैं। हालांकि इजरायल के केन्द्रीय चुनाव आयोग ने साफ किया है कि जांच का दायरा सीमित है। आयोग के मुताबिक इस मामले से चुनाव के नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ा है और न ही नतीजों पर सवाल उठता है। जैसा आपको मालूम ही है कि इजरायल के इस चुनाव में त्रिशंकु परिणाम आए हैं। किसी को भी बहुमत नहीं मिला है। बेंजामिन नेतन्याहू सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं हैं और तरह-तरह के सत्ता में बने रहने के हथकंडे और सुझाव दे रहे हैं। नेतन्याहू की चालबाजियों को फेल करने के लिए नेतन्याहू विरोधी दल सरकार बनाने का रास्ता निकालने के लिए प्रधानमंत्री का सीधा चुनाव कराने के प्रस्ताव पर विचार कर रहे हैं। इस व्यवस्था के तहत जनता अलग से प्रधानमंत्री चुनेगी और इससे अरब पार्टियों के समर्थन के बिना अल्पमत सरकार बनाने का रास्ता खुल सकता है। द टाइम्स ऑफ इजरायल के मुताबिक हिब्रू मीडिया ने बताया कि विपक्षी गठबंधन इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए कानून लाने पर विचार कर रहा है। सभी वोटों की गिनती के बाद अरब जांईट लिस्ट गठबंधन को 11 सीटें मिली हैं। यह इजरायल के अरब आबादी के अधिकारों की बात करने वाला राजनीतिक गठबंधन है। इनमें तीन अलग-अलग पार्टियां शामिल हैं। गठबंधन में अरब नेताओं के साथ यहूदी नेता भी हैं। उधर प्रधानमंत्री नेतन्याहू के सहयोगी दल यूनाइटेड तोराह जुटाइज्म ने विपक्षी नेता गादी आइजनकोट को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया है। पार्टी को 7 सीटें मिली हैं। चैनल 12 की रिपोर्ट के मुताबिक पार्टी ने समर्थन के बदले हरेदी समुदाय के लोगों को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट देने की मांग की है। इजरायल में आमतौर पर नागरिकों के लिए सेना में सेवा क्षेत्र अनिवार्य है। इजरायल में सरकार बनाने के लिए चुने गए नेता को शुरुआत में 20 दिन का समय मिलता है। जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति इसे 14 दिन और बढ़ा सकते हैं। यानी सरकार बनाने के लिए कुल 42 दिन मिल सकते हैं। इस दौरान नेता को दूसरी पार्टियों से समर्थन जुटाना होता है। अगर नेता 61 सीटों का समर्थन नहीं जुटा पाते तो वह छोटी पार्टियों के सहयोग से अल्पमत सरकार बनाने या दो नेताओं के बीच बारी-बारी से प्रधानमंत्री बनाने का समझौता करने की कोशिश कर सकते हैं। अगर कोई भी गठबंधन सरकार बनाने में सफल नहीं होता तो 90 दिनों के भीतर नए चुनाव कराए जा सकते हैं। इससे नेतन्याहू को एक और मौका मिल सकता है। क्योंकि नए चुनाव होने तक वह कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे। इजरायल में नई संसद के गठन से पहले पार्टियों ने अपने संसदीय दलों के नेताओं के नाम तय करने शुरू कर दिए हैं। गादी आइजनकोट ने अपनी यशार पार्टी से चुने गए सांसद रॉय फौरुमैन को संसदीय दल का नेता चुना है। नई संसद का शपथ ग्रहण 10 नवम्बर को होगा। द टाइम्स ऑफ इजरायल के मुताबिक इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद चुनाव में विदेशी दखल के आरोपों की जांच करेगी। शक है कि कतर और कुछ अन्य देशों ने नेतन्याहू को हराने के उद्देश्य से इजरायल की अरब पार्टियों को आर्थिक मदद की और कहा कि इजरायल में बसे अरब ज्यादा से ज्यादा घरों से निकलकर नेतन्याहू को हराने की कोशिश करें। अगर विदेशी हस्तक्षेप की बात करें तो क्या नेतन्याहू की अमेरिकी राष्ट्रपति ने खुलकर मदद करने की अपील नहीं की? जांच तो अमेरिकी हस्तक्षेप की भी मोसाद और शिन बेट को करनी चाहिए।

- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 31 October 2026

बुरे भंवर में फंसे नेतन्याहू

लोकतंत्र शासन का सबसे बुरा रूप है, सिवाय उन सभी अन्य रूपों के जिन्हें पहले आजमाया जा चुका है, यह बात विंस्टन चर्चिल ने 1949 में ब्रिटेन के निचले सदन हाउस ऑफ कॉमन्स में कही थी। गत मंगलवार रात इजरायल के चुनाव नतीजे सामने आने लगे तो चर्चिल का यह कथन याद आ गया। इजरायल के संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की स्थिति कमजोर दिख रही है। विपक्ष से मिल रही तगड़ी चुनौती ने फिर त्रिशंकु संसद के आसार बढ़ा दिए हैं। अंतिम नतीजे 4 नवम्बर को घोषित किए जाएंगे। यह लिखे जाने तक करीब 95 प्रतिशत वोटों की गिनती हो चुकी है। इजरायली सेंट्रल इलेक्शन कमेटी के मुताबिक, प्रधानमंत्री नेतन्याहू और विपक्षी गठबंधन के नेता गादी आइजनकोट दोनों ही बहुमत से दूर हैं। नेतन्याहू गठबंधन को 53 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि गादी आइजनकोट गठबंधन को 48 सीटें मिलने का अनुमान है। अरब गठबंधन को 19 सीटें मिल सकती हैं। 120 सीटों वाली संसद (नेसेट) में 1973 के बाद सबसे ज्यादा मतदान हुआ। इस चुनाव ने मध्य पूर्व के सबसे स्थापित लोकतंत्र में नई सरकार के गठन का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं दिखाया। नतीजे अनिर्णायक रहे और संसद में किसी भी गुट को बहुमत नहीं मिला। बता दें कि इजरायल में कभी भी एक दलीय सरकार नहीं रही। वहां की चुनाव व्यवस्था ऐसी है कि अलग-अलग पार्टियों को मिलकर गठबंधन सरकार बनानी पड़ती है। 7 अक्टूबर 2023 के घातक हमलों का जवाब कैसे दिया जाए, इसे लेकर भी मतभेद उभरे कि इससे कैसे बचा जाए या हमास को नष्ट किया जाए इसके बाद गाजा युद्ध में बड़ी संख्या में इजरायली रिजर्व सैनिक मारे गए। ऐसे में अति रुढ़िवादी यहूदी युवाओं को सेना में भती से मिली छूट को लेकर विवाद और गहरा गया था। बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पाटी को भारी नुकसान हुआ है। फिर भी वह इजरायली संसद में सबसे बड़ी पाटी बनने की राह पर है। यह सब ऐसे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हो रहा है, जिन पर भ्रष्टाचार और अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए देश को जंग में धकेलने के आरोप हैं। अरब लोगों की इजरायल की कुल जनसंख्या का करीब 20 प्रतिशत है। उनका प्रतिनिधित्व करने वाली अरब पार्टियों को भी बड़ी सफलता मिली है। उन्हें करीब 15 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है। वहीं विपक्षी गुट में गादी आइजनकोट के नेतृत्व में मध्यमागी, वामपंथी और दक्षिणपंथी दलों के सदस्य शामिल थे। लेकिन वे अपनी इच्छा के मुताबिक बदलाव लाने में नाकाम रहे। इतने अलग-अलग विचारों और राजनीतिक हितों को एक सरकार के रूप में साथ लाना अब इजरायल की राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। क्या नेतन्याहू अपने धार्मिक सहयोगियों को छोड़कर विपक्षी गुट के दक्षिणपंथी नेताओं के साथ गठबंधन बनाने को राजी होंगे? और क्या वे नेता, जो लंबे समय से नेतन्याहू के विरोधी रहे हैं, उनके साथ सरकार में शामिल होने के लिए तैयार होंगे? देखना यह भी होगा कि फिलिस्तीनी नेतृत्व वाले अरब दल किंगमेकर बन सकते हैं? रुझानों से इन्हें 19 सीटें मिलने का अनुमान है। प्रचार के दोनों ही गठबंधनों ने अरब दलों का समर्थन लेने की संभावना खारिज कर दी थी। अरब दलों की बढ़ती शक्ति ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। इजरायल के इतिहास में यह पहली बार है जब अरब पार्टियों को इतनी भारी सफलता मिली है। अब प्रयास यह हो रहे हैं कि नेतन्याहू और आइजनकोट मिलकर सरकार बनाएं। आधे-आधे टर्म के लिए सत्ता में रहें। इस सियासी गुत्थी को सुलझाने में थोड़ा वक्त लग सकता है और इससे ट्रंप को भी भारी झटका लगा है। ऐसा पहली बार हुआ है जब अमेरिका के किसी राष्ट्रपति ने इतना खुलकर किसी प्रधानमंत्री का समर्थन किया हो, जैसा ट्रंप ने नेतन्याहू का किया है। ट्रंप ने तो यहां तक दावा किया है कि उनकी वजह से नेतन्याहू यहां तक पहुंचे हैं नहीं तो वह चुनाव हार चुके थे। खैर, अब देखना यह होगा कि इजरायल में कोई सरकार बनती है या नहीं और क्या फिर से चुनाव कराने होंगे? 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 29 October 2026

मार्को रुबियो सीधा जामनगर क्यों गए

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो हाल ही में भारत आए। पर वह हालांकि औपचारिक यात्रा पर आए थे पर वह प्रोटोकॉल के अनुसार राजधानी नई दिल्ली नहीं आए और न ही जैसे आमतौर पर होता है, न तो प्रधानमंत्री से मिले और न ही विदेश मंत्री एस. जयशंकर से। वह सीधे मुंबई गए और वहां वह उद्योगपति मुकेश अंबानी से मिले और उनके साथ जामनगर अंबानी की ऑयल रिफाइनरी देखने चले गए। जामनगर जाना अमेरिका के प्लान का बड़ा हिस्सा है। अमेरिका रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) के इस विशाल रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स की क्षमता को बहुत अच्छे से समझता है। वेनेजुएला के क्रूड को दुनिया में पहुंचाने के लिए यह कॉम्प्लेक्स बहुत बड़ा किरदार निभा सकता है। ऐसे में मार्को रुबियो का जामनगर का दौरा यूं ही नहीं है। रुबियो का यह दौरान ऐसे समय में हुआ जब अमेरिका वेनेजुएला के कच्चे तेल (व्रूड) के लिए नए बाजार तलाश रहा है। अमेरिका भारत से जोर देने में लगा है कि वह रूस से ऊर्जा आयात को कम करके अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाए। मार्को ने जामनगर में मुकेश अंबानी और मुंबई में टाटा और अडानी समूह से भी मुलाकात की। हमें लगता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में पूंजीपति अब अहम हिस्सा बन रहे हैं। जामनगर भारत की ऊर्जा से जुड़ी पेचिदा सियासत की एक खिड़की है। इसी सियासत ने हाल में अमेरिका, रूस और ईरान के साथ भारत के रिश्तों को आकार दिया है। बहस से कहीं आगे जामनगर भारत की ऊर्जा से जुड़ी पेचीदा सियासत की एक खिड़की है। रुबियो की अंबानी, टाटा और अडानी से वार्ता करना यह जरूर दिखाता है कि भारतीय पूंजी और देश की विदेश नीति के बीच रिश्ता गहरा होता जा रहा है। भारतीय कंपनियों का आर्थिक वजन बढ़ रहा है। उनकी पहुंच दुनिया भर में फैल रही है। ऐसे में वह भारत की कूटनीति के तरकश का एक अहम तीर बनती जा रही है। अमेरिकी कारोबार और विदेश नीति के रिश्ते को एक पुरानी कहावत बखूबी बयान करती है। जो जनरल मोटर्स के लिए अच्छा है वो अमेरिका के लिए भी अच्छा है। यानी जो भी अमेरिकी कंपनी अच्छी है वह अमेरिका के लिए भी अच्छी है। दुनिया के नेताओं के साथ मुकेश अंबानी को देखना भारतीय लोगों को शायद अजीब लगता हो। पर ये एक लम्बे बदलाव का नतीजा है। कुछ साल पहले भारत आने वाले विदेशी नेता अक्सर बेंगलूरू में इन्फोसिस कैंपस जाते थे। पर अब सीन शिफ्ट हो गया है। अब लगता है कि विदेशी मेहमानों का ज्यादा फोकस जामनगर व गुजरात पर है। जामनगर में हाईड्रोकार्बन की पुरानी अर्थव्यवस्था है। हाईड्रोकार्बन यानी तेल और गैस जैसे ईंधन। यह दुनिया का सबसे बड़ा रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स है। यहां अलग-अलग किस्म के कच्चे तेल को साफ किया जा सकता है और तैयार इं&धन दुनिया भर के बाजारों में भेजा जा सकता है। 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद जामनगर की अहमियत बढ़ी है। होर्मूज स्ट्रेट से होने वाली तेल सप्लाई में रुकावट ने भी इसकी अहमियत बढ़ाई है। अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था सिर्फ देश ने नहीं बनाई। पूंजी और तकनीक लम्बे समय से सरकारों के पास मौजूद विकल्पों पर असर डालती आई है। समझदार देश अपने यहां पूंजी को कुछ हाथों में जरूरत से ज्यादा सिमटने नहीं देते और दुनिया में इसकी भूमिका की शर्तें खुद तय करते हैं। भारतीय कंपनियां अब सरहदों के पार काम करने और भू-राजनीतिक उथल-पुथल से निपटने का पैमाना हासिल कर रही हैं। ऐसे में वो भारत के विदेशी रिश्तों में ज्यादा अहम खिल़ाड़ी बनेंगी। रुबियो का जामनगर दौरा याद दिलाता है कि आज की भारतीय विदेश नीति को समझने के लिए पूंजीवाद और आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय रिश्तों के उलझे हुए और कभी न टूटने वाले रिश्तों को बेहतर समझना होगा और इसका मतलब है कि दिल्ली की उलझी हुई विदेश नीति वाली बहसों में मुंबई का कारोबारी तर्क और बेंगलूरू की तकनीकी जरूरत भी घोली जाए। अमेरिका की विदेश नीति साफ है, सवाल यह है कि हमारी विदेश नीति क्या साफ है।   

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 27 October 2026

अब भी चीन से झड़पें हो रही हैं

आईटीबीपी के जवानों के लिए हर साल आयोजित होने वाले सम्मान समारोह हिमवीर सम्मान में गुरुवार को आईटीबीपी के डीजी शत्रुजीत कपूर ने चौकाने वाला रहस्योद्घाटन किया कि अरुणाचल प्रदेश सीमा पर अब भी झड़पें जारी हैं। टकराव के दौरान आईटीबीपी के बहादुर कमांडो ने चीनी सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब दिया। जनरल शत्रुजीत सिंह कपूर ने खुलासा किया है कि अरुणाचल प्रदेश में पिछले कुछ महीनों में भारत और चीन के सैनिकों का आमना-सामना हुआ। कई जगह टकराव की स्थिति भी बनी। पिछले कुछ दिनों में ऐसी स्थिति बनी, जब कई जगहों पर भारत-चीन आमने-सामने आ गए। उन्होंने शौर्य कमांडो के असाधारण काम की सराहना की। उन्होंने यह भी कहा कि आईटीबीपी परंपरागत हथियारों का इस्तेमाल करती है। ड्रोन और ड्रोन रोधी तकनीक में निवेश करने और उसे विकसित करने पर उन्होंने जोर दिया और चेतावनी भी दी कि अब परंपरागत हथियारों से चीन का मुकाबला शायद सम्भव न हो क्योंकि चीन ने अपने सुरक्षा बलों को आधुनिक बनाने में भारी निवेश किया है। यह पहली बार है, जब अधिकारिक तौर पर इन झड़पों की पुष्टि हुई है। जनरल कपूर के बयान को लेकर कांग्रेस और विपक्ष ने केन्द्र सरकार को घेरा है। बता दें कि नेता विपक्ष राहुल गांधी ने पहले से ही यह चेतावनी दे दी थी कि चीन सीमा पर अतिक्रमण बढ़ रहा है। इस पर प्रधानमंत्री ने जवाब दिया था कि न तो कोई घुसा है औ न ही कोई आया है। आज राहुल गांधी की चेतावनी सही साबित हुई है। जहां अरुणाचल में भारत-चीन सेना टकरा रही है वहीं भारत सरकार ने आईटीबीपी के जवानों को दिल्ली के जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस में प्रदर्शनकारियों को रोकने में लगा दिया। यह अजीब स्थिति है। खैर, कांग्रेस ने कहा है, इस साल जुलाई से ही चीनी सैनिकों के साथ झड़प की खबरें आ रही हैं, लेकिन मोदी सरकार इन खबरों को दबाने में लगी रही। यहां तक कि चीन को लाल आंख दिखाने की जगह नरेन्द्र मोदी चीन के राष्ट्रपति शी जिन फिंग के साथ हंसी-ठिठोली करते नजर आए। ब्रिक्स सम्मेलन में एक तरफ चीन हमारे सैनिकों के साथ झड़प कर रहा था, दूसरी तरफ मोदी चीन के राष्ट्रपति का स्वागत कर रहे थे। ये हमारे सैनिकों के जख्मों पर नमक झिड़कने जैसा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा एलएसी से जुड़े मुद्दों को सुलझाने के लिए भारत और चीन लगातार बातचीत कर रहे हैं। जैसा कि हमने पहले भी कहा है, भारत-चीन बार्डर पर हालात समय-समय पर बिगड़ जाते हैं। जब चीन सैनिक अपने तय रास्ते से अलग गश्त (पेट्रोलिंग) करने लगते हैं। एलओसी पर बचे हुए युद्धों को सुलझाने, गलतफहमियों को दूर करने और किसी भी गड़बड़ी से बचने के लिए दोनों पक्ष लगातार बातचीत सैन्य रास्तों का इस्तेमाल कर रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे ने कहा कि पीएम मोदी देश और संसद को सीमा की वास्तविक स्थिति बताएं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या डोकलाम और गलवान के बाद एक और गंभीर टकराव की स्थिति बन रही है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि गलवान के बाद चीन को दी गई क्लीनचिट का खामियाजा देश भुगत रहा है। कटु सत्य तो यह है कि चीन की पीएलए हमसे बहुत आगे है। हम उसका मुकाबला नहीं कर रहे हैं। आईटीबीपी के जनरल के इस बयान के बाद, लाल आंखं दिखाने की बातें कहां रह गई ? खोखले दावे और 2020 में चीन को दी गई इस विवादित क्लीन चिट के पीछे की सच्चाई साफ है। द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार पीएलए उँचाई वाले इलाके में भारत की धारणा के मुताबिक भारत के 6-7 किलोमीटर अंदर घुस चुकी है। आईटीबीपी के महानिदेशक के बयान ने पहले ही मुश्किलों में घिरी भारत की सेना का आधुनिकरण होना अति आवश्यक है। सैन्य ताकत केवल लड़ने के लिए नहीं, वार्ता के जरिए मेज पर अपना पक्ष मतजबूती से रखना भी जरूरी है।

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 24 October 2026

जलता फ्रांस

फ्रांस में पिछले कई दिनों से हिंसात्मक आंदोलन हो रहा है। देश भर में इस प्रदर्शनों के दौरान 23,00 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है। आंदोलन में करीब 1000 सुरक्षाकमी घायल हुए हैं। कई शहरों में दुकानों में लूटपाट, आगजनी और सार्वजनिक इमारतों को नुकसान पहुंचाया गया है। महंगाई से शुरू हुआ आंदोलन करीब चार हफ्ते पहले तब शुरू हुआ जब स्कूलों की खराब स्थिति के खिलाफ छात्रों ने प्रदर्शन शुरू किया। यानी की फ्रांस में भी जेन-जी द्वारा आंदोलन शुरू किया गया। बाद में महंगाई, ईंधन, खाद्य पदार्थें की बढ़ती कीमतों के खिलाफ जनता की नाराजगी भी इसमें जुड़ गई। शनिवार को करीब 5 लाख लोग सड़कों पर उतरे थे। इस बीच प्रदर्शनकारियों ने पेरिस के मशहूर लूब्र म्यूजियम का प्रवेश द्वार रोक दिया, जिसके चलते म्यूजियम नहीं खुल सका। फ्रांस के पेरिस, मार्सिले, लियोन और लिमोस समेत शहरों में रात के कर्फ्यू से हालात कुछ शांत हुए हैं। रात में पुलिस हेलीकाप्टरों से गश्त करती रही। पेरिस के आंदोलन में सबसे ज्यादा प्रभावित प्लेस डी ला रिपब्लिकन इलाके में क्रेन की मदद से लगी प्रतिमा से पीली जैकेट हटाई गई। इस आंदोलन में प्रदर्शनकारियों ने जमकर लूटपाट की। लूई विटन, एपल स्टोर सहित कई अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों के शोरूम लूट लिए गए। इस राजनीतिक संकट से राष्ट्रपति मैक्रों ने करीब एक दशक पहले पुरानी राजनीतिक व्यवस्था बदलने, आर्थिक सुधारों को तेजी से लागू करने और देश में व्यवस्था ठीक करने का वादा किया था। लेकिन कार्यकाल के सिर्फ 6 महीने बाकी रहते, प्रदर्शनों ने उन्हें कमजोर राष्ट्रपति साबित कर दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि हिंसा दिखाती है कि अब सरकारी तंत्र का असर कितना कम रह गया है। एक ऐसे नेता की लाचारी खुलकर सामने आई है जो न तो जनता के गुस्से को थाम पा रहा है, जिसके पास खर्च करने के लिए पैसा नहीं बचा है। राजनीतिक समर्थन कमजोर हो चुका है और कानून-व्यवस्था पर पकड़ लगातार ढीली होती जा रही है। फ्रांस की बढ़ती हिंसा के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की आलोचना की है। ट्रंप ने दावा किया कि पेरिस जल्द ही एक मुस्लिम शहर बन जाएगा। उन्होंने फ्रांस में जारी हिंसा के लिए इमिग्रेशन को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि मैक्रों को काफी पहले ही देश की सीमाएं बंद कर देनी चाहिए थी। मैंने उनसे ऐसा करने को कहा भी था। प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस में 46 प्रतिशत लोग ईसाई हैं और करीब 43 प्रतिशत लोग किसी धर्म को नहीं मानते। मुस्लिम आबादी करीब 9 प्रतिशत है। फाक्स न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार कम्युनिस्ट, समाजवादी, मुस्लिम छात्र और फलस्तीन समर्थक समेत कई समूहों ने प्रदर्शन को बढ़ावा दिया है। रिपोर्ट के अनुसार इन 54 संगठनों में 16 छात्र या युवा समूह हैं। बाकी में वामपंथी, राजनीतिक दल, मजदूर संघ, किसान संगठन, नागरिक अधिकार समूह और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया मंच शामिल है। इनमें से कुछ ने प्रदर्शनों में भाग लिया, जबकि अन्य ने इंटरनेट मीडिया या समाचार कवरेज के जरिए आंदोलन का समर्थन किया। 28 कम्युनिस्ट, समाजवादी युवा गठबंधन 12 यूरोपीय देशों में प्रदर्शनों की तैयारी कर रहे हैं। फ्रांस के अलावा इटली अन्य देशों में भी आंदोलन हो रहा है। 

-अनिल नरेन्द्र