लोकतंत्र शासन का सबसे बुरा रूप है, सिवाय उन सभी अन्य रूपों के जिन्हें पहले आजमाया जा चुका है, यह बात विंस्टन चर्चिल ने 1949 में ब्रिटेन के निचले सदन हाउस ऑफ कॉमन्स में कही थी। गत मंगलवार रात इजरायल के चुनाव नतीजे सामने आने लगे तो चर्चिल का यह कथन याद आ गया। इजरायल के संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की स्थिति कमजोर दिख रही है। विपक्ष से मिल रही तगड़ी चुनौती ने फिर त्रिशंकु संसद के आसार बढ़ा दिए हैं। अंतिम नतीजे 4 नवम्बर को घोषित किए जाएंगे। यह लिखे जाने तक करीब 95 प्रतिशत वोटों की गिनती हो चुकी है। इजरायली सेंट्रल इलेक्शन कमेटी के मुताबिक, प्रधानमंत्री नेतन्याहू और विपक्षी गठबंधन के नेता गादी आइजनकोट दोनों ही बहुमत से दूर हैं। नेतन्याहू गठबंधन को 53 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि गादी आइजनकोट गठबंधन को 48 सीटें मिलने का अनुमान है। अरब गठबंधन को 19 सीटें मिल सकती हैं। 120 सीटों वाली संसद (नेसेट) में 1973 के बाद सबसे ज्यादा मतदान हुआ। इस चुनाव ने मध्य पूर्व के सबसे स्थापित लोकतंत्र में नई सरकार के गठन का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं दिखाया। नतीजे अनिर्णायक रहे और संसद में किसी भी गुट को बहुमत नहीं मिला। बता दें कि इजरायल में कभी भी एक दलीय सरकार नहीं रही। वहां की चुनाव व्यवस्था ऐसी है कि अलग-अलग पार्टियों को मिलकर गठबंधन सरकार बनानी पड़ती है। 7 अक्टूबर 2023 के घातक हमलों का जवाब कैसे दिया जाए, इसे लेकर भी मतभेद उभरे कि इससे कैसे बचा जाए या हमास को नष्ट किया जाए इसके बाद गाजा युद्ध में बड़ी संख्या में इजरायली रिजर्व सैनिक मारे गए। ऐसे में अति रुढ़िवादी यहूदी युवाओं को सेना में भती से मिली छूट को लेकर विवाद और गहरा गया था। बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पाटी को भारी नुकसान हुआ है। फिर भी वह इजरायली संसद में सबसे बड़ी पाटी बनने की राह पर है। यह सब ऐसे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हो रहा है, जिन पर भ्रष्टाचार और अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए देश को जंग में धकेलने के आरोप हैं। अरब लोगों की इजरायल की कुल जनसंख्या का करीब 20 प्रतिशत है। उनका प्रतिनिधित्व करने वाली अरब पार्टियों को भी बड़ी सफलता मिली है। उन्हें करीब 15 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है। वहीं विपक्षी गुट में गादी आइजनकोट के नेतृत्व में मध्यमागी, वामपंथी और दक्षिणपंथी दलों के सदस्य शामिल थे। लेकिन वे अपनी इच्छा के मुताबिक बदलाव लाने में नाकाम रहे। इतने अलग-अलग विचारों और राजनीतिक हितों को एक सरकार के रूप में साथ लाना अब इजरायल की राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। क्या नेतन्याहू अपने धार्मिक सहयोगियों को छोड़कर विपक्षी गुट के दक्षिणपंथी नेताओं के साथ गठबंधन बनाने को राजी होंगे? और क्या वे नेता, जो लंबे समय से नेतन्याहू के विरोधी रहे हैं, उनके साथ सरकार में शामिल होने के लिए तैयार होंगे? देखना यह भी होगा कि फिलिस्तीनी नेतृत्व वाले अरब दल किंगमेकर बन सकते हैं? रुझानों से इन्हें 19 सीटें मिलने का अनुमान है। प्रचार के दोनों ही गठबंधनों ने अरब दलों का समर्थन लेने की संभावना खारिज कर दी थी। अरब दलों की बढ़ती शक्ति ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। इजरायल के इतिहास में यह पहली बार है जब अरब पार्टियों को इतनी भारी सफलता मिली है। अब प्रयास यह हो रहे हैं कि नेतन्याहू और आइजनकोट मिलकर सरकार बनाएं। आधे-आधे टर्म के लिए सत्ता में रहें। इस सियासी गुत्थी को सुलझाने में थोड़ा वक्त लग सकता है और इससे ट्रंप को भी भारी झटका लगा है। ऐसा पहली बार हुआ है जब अमेरिका के किसी राष्ट्रपति ने इतना खुलकर किसी प्रधानमंत्री का समर्थन किया हो, जैसा ट्रंप ने नेतन्याहू का किया है। ट्रंप ने तो यहां तक दावा किया है कि उनकी वजह से नेतन्याहू यहां तक पहुंचे हैं नहीं तो वह चुनाव हार चुके थे। खैर, अब देखना यह होगा कि इजरायल में कोई सरकार बनती है या नहीं और क्या फिर से चुनाव कराने होंगे?
-अनिल नरेन्द्र