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Saturday, 31 October 2026

बुरे भंवर में फंसे नेतन्याहू

लोकतंत्र शासन का सबसे बुरा रूप है, सिवाय उन सभी अन्य रूपों के जिन्हें पहले आजमाया जा चुका है, यह बात विंस्टन चर्चिल ने 1949 में ब्रिटेन के निचले सदन हाउस ऑफ कॉमन्स में कही थी। गत मंगलवार रात इजरायल के चुनाव नतीजे सामने आने लगे तो चर्चिल का यह कथन याद आ गया। इजरायल के संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की स्थिति कमजोर दिख रही है। विपक्ष से मिल रही तगड़ी चुनौती ने फिर त्रिशंकु संसद के आसार बढ़ा दिए हैं। अंतिम नतीजे 4 नवम्बर को घोषित किए जाएंगे। यह लिखे जाने तक करीब 95 प्रतिशत वोटों की गिनती हो चुकी है। इजरायली सेंट्रल इलेक्शन कमेटी के मुताबिक, प्रधानमंत्री नेतन्याहू और विपक्षी गठबंधन के नेता गादी आइजनकोट दोनों ही बहुमत से दूर हैं। नेतन्याहू गठबंधन को 53 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि गादी आइजनकोट गठबंधन को 48 सीटें मिलने का अनुमान है। अरब गठबंधन को 19 सीटें मिल सकती हैं। 120 सीटों वाली संसद (नेसेट) में 1973 के बाद सबसे ज्यादा मतदान हुआ। इस चुनाव ने मध्य पूर्व के सबसे स्थापित लोकतंत्र में नई सरकार के गठन का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं दिखाया। नतीजे अनिर्णायक रहे और संसद में किसी भी गुट को बहुमत नहीं मिला। बता दें कि इजरायल में कभी भी एक दलीय सरकार नहीं रही। वहां की चुनाव व्यवस्था ऐसी है कि अलग-अलग पार्टियों को मिलकर गठबंधन सरकार बनानी पड़ती है। 7 अक्टूबर 2023 के घातक हमलों का जवाब कैसे दिया जाए, इसे लेकर भी मतभेद उभरे कि इससे कैसे बचा जाए या हमास को नष्ट किया जाए इसके बाद गाजा युद्ध में बड़ी संख्या में इजरायली रिजर्व सैनिक मारे गए। ऐसे में अति रुढ़िवादी यहूदी युवाओं को सेना में भती से मिली छूट को लेकर विवाद और गहरा गया था। बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पाटी को भारी नुकसान हुआ है। फिर भी वह इजरायली संसद में सबसे बड़ी पाटी बनने की राह पर है। यह सब ऐसे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हो रहा है, जिन पर भ्रष्टाचार और अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए देश को जंग में धकेलने के आरोप हैं। अरब लोगों की इजरायल की कुल जनसंख्या का करीब 20 प्रतिशत है। उनका प्रतिनिधित्व करने वाली अरब पार्टियों को भी बड़ी सफलता मिली है। उन्हें करीब 15 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है। वहीं विपक्षी गुट में गादी आइजनकोट के नेतृत्व में मध्यमागी, वामपंथी और दक्षिणपंथी दलों के सदस्य शामिल थे। लेकिन वे अपनी इच्छा के मुताबिक बदलाव लाने में नाकाम रहे। इतने अलग-अलग विचारों और राजनीतिक हितों को एक सरकार के रूप में साथ लाना अब इजरायल की राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। क्या नेतन्याहू अपने धार्मिक सहयोगियों को छोड़कर विपक्षी गुट के दक्षिणपंथी नेताओं के साथ गठबंधन बनाने को राजी होंगे? और क्या वे नेता, जो लंबे समय से नेतन्याहू के विरोधी रहे हैं, उनके साथ सरकार में शामिल होने के लिए तैयार होंगे? देखना यह भी होगा कि फिलिस्तीनी नेतृत्व वाले अरब दल किंगमेकर बन सकते हैं? रुझानों से इन्हें 19 सीटें मिलने का अनुमान है। प्रचार के दोनों ही गठबंधनों ने अरब दलों का समर्थन लेने की संभावना खारिज कर दी थी। अरब दलों की बढ़ती शक्ति ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। इजरायल के इतिहास में यह पहली बार है जब अरब पार्टियों को इतनी भारी सफलता मिली है। अब प्रयास यह हो रहे हैं कि नेतन्याहू और आइजनकोट मिलकर सरकार बनाएं। आधे-आधे टर्म के लिए सत्ता में रहें। इस सियासी गुत्थी को सुलझाने में थोड़ा वक्त लग सकता है और इससे ट्रंप को भी भारी झटका लगा है। ऐसा पहली बार हुआ है जब अमेरिका के किसी राष्ट्रपति ने इतना खुलकर किसी प्रधानमंत्री का समर्थन किया हो, जैसा ट्रंप ने नेतन्याहू का किया है। ट्रंप ने तो यहां तक दावा किया है कि उनकी वजह से नेतन्याहू यहां तक पहुंचे हैं नहीं तो वह चुनाव हार चुके थे। खैर, अब देखना यह होगा कि इजरायल में कोई सरकार बनती है या नहीं और क्या फिर से चुनाव कराने होंगे? 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 29 October 2026

मार्को रुबियो सीधा जामनगर क्यों गए

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो हाल ही में भारत आए। पर वह हालांकि औपचारिक यात्रा पर आए थे पर वह प्रोटोकॉल के अनुसार राजधानी नई दिल्ली नहीं आए और न ही जैसे आमतौर पर होता है, न तो प्रधानमंत्री से मिले और न ही विदेश मंत्री एस. जयशंकर से। वह सीधे मुंबई गए और वहां वह उद्योगपति मुकेश अंबानी से मिले और उनके साथ जामनगर अंबानी की ऑयल रिफाइनरी देखने चले गए। जामनगर जाना अमेरिका के प्लान का बड़ा हिस्सा है। अमेरिका रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) के इस विशाल रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स की क्षमता को बहुत अच्छे से समझता है। वेनेजुएला के क्रूड को दुनिया में पहुंचाने के लिए यह कॉम्प्लेक्स बहुत बड़ा किरदार निभा सकता है। ऐसे में मार्को रुबियो का जामनगर का दौरा यूं ही नहीं है। रुबियो का यह दौरान ऐसे समय में हुआ जब अमेरिका वेनेजुएला के कच्चे तेल (व्रूड) के लिए नए बाजार तलाश रहा है। अमेरिका भारत से जोर देने में लगा है कि वह रूस से ऊर्जा आयात को कम करके अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाए। मार्को ने जामनगर में मुकेश अंबानी और मुंबई में टाटा और अडानी समूह से भी मुलाकात की। हमें लगता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में पूंजीपति अब अहम हिस्सा बन रहे हैं। जामनगर भारत की ऊर्जा से जुड़ी पेचिदा सियासत की एक खिड़की है। इसी सियासत ने हाल में अमेरिका, रूस और ईरान के साथ भारत के रिश्तों को आकार दिया है। बहस से कहीं आगे जामनगर भारत की ऊर्जा से जुड़ी पेचीदा सियासत की एक खिड़की है। रुबियो की अंबानी, टाटा और अडानी से वार्ता करना यह जरूर दिखाता है कि भारतीय पूंजी और देश की विदेश नीति के बीच रिश्ता गहरा होता जा रहा है। भारतीय कंपनियों का आर्थिक वजन बढ़ रहा है। उनकी पहुंच दुनिया भर में फैल रही है। ऐसे में वह भारत की कूटनीति के तरकश का एक अहम तीर बनती जा रही है। अमेरिकी कारोबार और विदेश नीति के रिश्ते को एक पुरानी कहावत बखूबी बयान करती है। जो जनरल मोटर्स के लिए अच्छा है वो अमेरिका के लिए भी अच्छा है। यानी जो भी अमेरिकी कंपनी अच्छी है वह अमेरिका के लिए भी अच्छी है। दुनिया के नेताओं के साथ मुकेश अंबानी को देखना भारतीय लोगों को शायद अजीब लगता हो। पर ये एक लम्बे बदलाव का नतीजा है। कुछ साल पहले भारत आने वाले विदेशी नेता अक्सर बेंगलूरू में इन्फोसिस कैंपस जाते थे। पर अब सीन शिफ्ट हो गया है। अब लगता है कि विदेशी मेहमानों का ज्यादा फोकस जामनगर व गुजरात पर है। जामनगर में हाईड्रोकार्बन की पुरानी अर्थव्यवस्था है। हाईड्रोकार्बन यानी तेल और गैस जैसे ईंधन। यह दुनिया का सबसे बड़ा रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स है। यहां अलग-अलग किस्म के कच्चे तेल को साफ किया जा सकता है और तैयार इं&धन दुनिया भर के बाजारों में भेजा जा सकता है। 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद जामनगर की अहमियत बढ़ी है। होर्मूज स्ट्रेट से होने वाली तेल सप्लाई में रुकावट ने भी इसकी अहमियत बढ़ाई है। अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था सिर्फ देश ने नहीं बनाई। पूंजी और तकनीक लम्बे समय से सरकारों के पास मौजूद विकल्पों पर असर डालती आई है। समझदार देश अपने यहां पूंजी को कुछ हाथों में जरूरत से ज्यादा सिमटने नहीं देते और दुनिया में इसकी भूमिका की शर्तें खुद तय करते हैं। भारतीय कंपनियां अब सरहदों के पार काम करने और भू-राजनीतिक उथल-पुथल से निपटने का पैमाना हासिल कर रही हैं। ऐसे में वो भारत के विदेशी रिश्तों में ज्यादा अहम खिल़ाड़ी बनेंगी। रुबियो का जामनगर दौरा याद दिलाता है कि आज की भारतीय विदेश नीति को समझने के लिए पूंजीवाद और आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय रिश्तों के उलझे हुए और कभी न टूटने वाले रिश्तों को बेहतर समझना होगा और इसका मतलब है कि दिल्ली की उलझी हुई विदेश नीति वाली बहसों में मुंबई का कारोबारी तर्क और बेंगलूरू की तकनीकी जरूरत भी घोली जाए। अमेरिका की विदेश नीति साफ है, सवाल यह है कि हमारी विदेश नीति क्या साफ है।   

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 27 October 2026

अब भी चीन से झड़पें हो रही हैं

आईटीबीपी के जवानों के लिए हर साल आयोजित होने वाले सम्मान समारोह हिमवीर सम्मान में गुरुवार को आईटीबीपी के डीजी शत्रुजीत कपूर ने चौकाने वाला रहस्योद्घाटन किया कि अरुणाचल प्रदेश सीमा पर अब भी झड़पें जारी हैं। टकराव के दौरान आईटीबीपी के बहादुर कमांडो ने चीनी सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब दिया। जनरल शत्रुजीत सिंह कपूर ने खुलासा किया है कि अरुणाचल प्रदेश में पिछले कुछ महीनों में भारत और चीन के सैनिकों का आमना-सामना हुआ। कई जगह टकराव की स्थिति भी बनी। पिछले कुछ दिनों में ऐसी स्थिति बनी, जब कई जगहों पर भारत-चीन आमने-सामने आ गए। उन्होंने शौर्य कमांडो के असाधारण काम की सराहना की। उन्होंने यह भी कहा कि आईटीबीपी परंपरागत हथियारों का इस्तेमाल करती है। ड्रोन और ड्रोन रोधी तकनीक में निवेश करने और उसे विकसित करने पर उन्होंने जोर दिया और चेतावनी भी दी कि अब परंपरागत हथियारों से चीन का मुकाबला शायद सम्भव न हो क्योंकि चीन ने अपने सुरक्षा बलों को आधुनिक बनाने में भारी निवेश किया है। यह पहली बार है, जब अधिकारिक तौर पर इन झड़पों की पुष्टि हुई है। जनरल कपूर के बयान को लेकर कांग्रेस और विपक्ष ने केन्द्र सरकार को घेरा है। बता दें कि नेता विपक्ष राहुल गांधी ने पहले से ही यह चेतावनी दे दी थी कि चीन सीमा पर अतिक्रमण बढ़ रहा है। इस पर प्रधानमंत्री ने जवाब दिया था कि न तो कोई घुसा है औ न ही कोई आया है। आज राहुल गांधी की चेतावनी सही साबित हुई है। जहां अरुणाचल में भारत-चीन सेना टकरा रही है वहीं भारत सरकार ने आईटीबीपी के जवानों को दिल्ली के जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस में प्रदर्शनकारियों को रोकने में लगा दिया। यह अजीब स्थिति है। खैर, कांग्रेस ने कहा है, इस साल जुलाई से ही चीनी सैनिकों के साथ झड़प की खबरें आ रही हैं, लेकिन मोदी सरकार इन खबरों को दबाने में लगी रही। यहां तक कि चीन को लाल आंख दिखाने की जगह नरेन्द्र मोदी चीन के राष्ट्रपति शी जिन फिंग के साथ हंसी-ठिठोली करते नजर आए। ब्रिक्स सम्मेलन में एक तरफ चीन हमारे सैनिकों के साथ झड़प कर रहा था, दूसरी तरफ मोदी चीन के राष्ट्रपति का स्वागत कर रहे थे। ये हमारे सैनिकों के जख्मों पर नमक झिड़कने जैसा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा एलएसी से जुड़े मुद्दों को सुलझाने के लिए भारत और चीन लगातार बातचीत कर रहे हैं। जैसा कि हमने पहले भी कहा है, भारत-चीन बार्डर पर हालात समय-समय पर बिगड़ जाते हैं। जब चीन सैनिक अपने तय रास्ते से अलग गश्त (पेट्रोलिंग) करने लगते हैं। एलओसी पर बचे हुए युद्धों को सुलझाने, गलतफहमियों को दूर करने और किसी भी गड़बड़ी से बचने के लिए दोनों पक्ष लगातार बातचीत सैन्य रास्तों का इस्तेमाल कर रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे ने कहा कि पीएम मोदी देश और संसद को सीमा की वास्तविक स्थिति बताएं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या डोकलाम और गलवान के बाद एक और गंभीर टकराव की स्थिति बन रही है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि गलवान के बाद चीन को दी गई क्लीनचिट का खामियाजा देश भुगत रहा है। कटु सत्य तो यह है कि चीन की पीएलए हमसे बहुत आगे है। हम उसका मुकाबला नहीं कर रहे हैं। आईटीबीपी के जनरल के इस बयान के बाद, लाल आंखं दिखाने की बातें कहां रह गई ? खोखले दावे और 2020 में चीन को दी गई इस विवादित क्लीन चिट के पीछे की सच्चाई साफ है। द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार पीएलए उँचाई वाले इलाके में भारत की धारणा के मुताबिक भारत के 6-7 किलोमीटर अंदर घुस चुकी है। आईटीबीपी के महानिदेशक के बयान ने पहले ही मुश्किलों में घिरी भारत की सेना का आधुनिकरण होना अति आवश्यक है। सैन्य ताकत केवल लड़ने के लिए नहीं, वार्ता के जरिए मेज पर अपना पक्ष मतजबूती से रखना भी जरूरी है।

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 24 October 2026

जलता फ्रांस

फ्रांस में पिछले कई दिनों से हिंसात्मक आंदोलन हो रहा है। देश भर में इस प्रदर्शनों के दौरान 23,00 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है। आंदोलन में करीब 1000 सुरक्षाकमी घायल हुए हैं। कई शहरों में दुकानों में लूटपाट, आगजनी और सार्वजनिक इमारतों को नुकसान पहुंचाया गया है। महंगाई से शुरू हुआ आंदोलन करीब चार हफ्ते पहले तब शुरू हुआ जब स्कूलों की खराब स्थिति के खिलाफ छात्रों ने प्रदर्शन शुरू किया। यानी की फ्रांस में भी जेन-जी द्वारा आंदोलन शुरू किया गया। बाद में महंगाई, ईंधन, खाद्य पदार्थें की बढ़ती कीमतों के खिलाफ जनता की नाराजगी भी इसमें जुड़ गई। शनिवार को करीब 5 लाख लोग सड़कों पर उतरे थे। इस बीच प्रदर्शनकारियों ने पेरिस के मशहूर लूब्र म्यूजियम का प्रवेश द्वार रोक दिया, जिसके चलते म्यूजियम नहीं खुल सका। फ्रांस के पेरिस, मार्सिले, लियोन और लिमोस समेत शहरों में रात के कर्फ्यू से हालात कुछ शांत हुए हैं। रात में पुलिस हेलीकाप्टरों से गश्त करती रही। पेरिस के आंदोलन में सबसे ज्यादा प्रभावित प्लेस डी ला रिपब्लिकन इलाके में क्रेन की मदद से लगी प्रतिमा से पीली जैकेट हटाई गई। इस आंदोलन में प्रदर्शनकारियों ने जमकर लूटपाट की। लूई विटन, एपल स्टोर सहित कई अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों के शोरूम लूट लिए गए। इस राजनीतिक संकट से राष्ट्रपति मैक्रों ने करीब एक दशक पहले पुरानी राजनीतिक व्यवस्था बदलने, आर्थिक सुधारों को तेजी से लागू करने और देश में व्यवस्था ठीक करने का वादा किया था। लेकिन कार्यकाल के सिर्फ 6 महीने बाकी रहते, प्रदर्शनों ने उन्हें कमजोर राष्ट्रपति साबित कर दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि हिंसा दिखाती है कि अब सरकारी तंत्र का असर कितना कम रह गया है। एक ऐसे नेता की लाचारी खुलकर सामने आई है जो न तो जनता के गुस्से को थाम पा रहा है, जिसके पास खर्च करने के लिए पैसा नहीं बचा है। राजनीतिक समर्थन कमजोर हो चुका है और कानून-व्यवस्था पर पकड़ लगातार ढीली होती जा रही है। फ्रांस की बढ़ती हिंसा के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की आलोचना की है। ट्रंप ने दावा किया कि पेरिस जल्द ही एक मुस्लिम शहर बन जाएगा। उन्होंने फ्रांस में जारी हिंसा के लिए इमिग्रेशन को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि मैक्रों को काफी पहले ही देश की सीमाएं बंद कर देनी चाहिए थी। मैंने उनसे ऐसा करने को कहा भी था। प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस में 46 प्रतिशत लोग ईसाई हैं और करीब 43 प्रतिशत लोग किसी धर्म को नहीं मानते। मुस्लिम आबादी करीब 9 प्रतिशत है। फाक्स न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार कम्युनिस्ट, समाजवादी, मुस्लिम छात्र और फलस्तीन समर्थक समेत कई समूहों ने प्रदर्शन को बढ़ावा दिया है। रिपोर्ट के अनुसार इन 54 संगठनों में 16 छात्र या युवा समूह हैं। बाकी में वामपंथी, राजनीतिक दल, मजदूर संघ, किसान संगठन, नागरिक अधिकार समूह और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया मंच शामिल है। इनमें से कुछ ने प्रदर्शनों में भाग लिया, जबकि अन्य ने इंटरनेट मीडिया या समाचार कवरेज के जरिए आंदोलन का समर्थन किया। 28 कम्युनिस्ट, समाजवादी युवा गठबंधन 12 यूरोपीय देशों में प्रदर्शनों की तैयारी कर रहे हैं। फ्रांस के अलावा इटली अन्य देशों में भी आंदोलन हो रहा है। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 22 October 2026

निशाने पर बॉलीवुड सितारे

बॉलीवुड को एक बार फिर लारेंस बिश्नोई गैंग ने हिलाकर रख दिया है। अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर कातिलाना हमले ने बॉलीवुड को एक बार फिर याद करा दिया कि अंडरवर्ल्ड की दहशत अभी खत्म नहीं हुई है। 2018 में लॉरेंस बिश्नोई की पहली धमकी के बाद आठ साल से वह फिल्म जगत से जुड़ी हस्तियों के लिए खौफ और दहशत का सबब बना हुआ है। अभिनेता सलमान खान को धमकी से शुरू हुआ यह सिलसिला कई अभिनेताओं, गायकों पर हमले हुए हैं, जबकि सलमान के मददगार माने जाने वाले एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी की हत्या भी हो चुकी है। हर वारदात में बिश्नोई गिरोह का जुड़ाव होने से बॉलीवुड सितारे खौफजदा बताए जा रहे हैं। बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर रविवार शाम करीब 7.30 बजे मुंबई में जानलेवा हमला हुआ। जुहू पुलिस स्टेशन से महज 350 मीटर दूर तीन बदमाशों ने उनकी कार पर 5 गोलियां चलाईं। शुक्र है कि गोलियां कार के ग्लास पर लगीं इसलिए टाइगर श्रॉफ बाल-बाल बच गए। हालांकि उनके ड्राइवर फिरदौस के बाएं हाथ में चोट आई। जबकि पास ही वीडियो बना रहे एक फैन योगेश चव्हाण घायल हो गए। पुलिस की 15 टीमों ने हमलावरों की तलाश कर ली है। इस मामले में एक अपडेट सामने आया है। राजस्थान पुलिस की एंटी गैंगस्टर टास्क फोर्स और कोटा पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए 19 अक्टूबर को 3 आरोपियों को कोटा रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक तीनों आरोपी मुंबई से दिल्ली जा रही टेन में सवार थे। पुलिस ने कोटा रेलवे स्टेशन पर उन्हें पकड़ लिया। जानकारी के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों में दो हरियाणा और एक बिहार का रहने वाला है। तीनों में से दो हमलावरों की पहचान बेगुसराय निवासी ऋतिक कुमार और सोनीपत के रेहान के रूप में हुई है, जबकि एक अन्य तीसरा नाबालिग आरोपी भी सोनीपत से है। बता दें कि पिछले 4 साल में लॉरेंस गैंग ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली है। सिद्धू मूसेवाला, मई 2022, सलमान खान अप्रैल 2024, एपी ढिल्लो (गायक) सितम्बर 2024, एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी, अक्टूबर 2024 और रोहित शेट्टी (डायरेक्टर) फरवरी 2026। अभिनेता सलमान खान को धमकी से शुरू सिलसिले में जो हमले शुरू हुए वह थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। सलमान के मददगार माने जाने वाले बाबा सिद्दीकी से लेकर टाइगर श्रॉफ सभी निशाने पर रहे। बॉलीवुड से लॉरेंस बिश्नोई गिरोह की अदावत की शुरुआत 2018 में तब हुई थी, जब लॉरेंस ने जोधपुर कोर्ट में पेशी के दौरान खुले तौर पर सलमान खान को जान से मारने की धमकी दे डाली थी। बताया जाता है कि उसने तब अपने एक गुर्गे को मुंबई भेज दिया था, जो सलमान के घर की रेकी भी कर चुका था। इसके बाद सलमान के घर पर फायरिंग से लेकर सारी बॉलीवुड की हस्तियों और खासतौर पर सलमान खान से जुड़े लोगों को धमकियां देना शुरू कर दी। अप्रैल 2024 में सलमान के बांद्रा स्थित आवास गेलेक्सी अपार्टमेंट के बाहर पांच राउंड फायर करवाई थी। टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग के बाद विपक्ष राज्य सरकार पर हमलावर है। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि मुंबई और पूरे महाराष्ट्र में कानून व्यवस्था बिगड़ गई है। कांग्रेस नेता सचिन रावत ने कहा कि मुंबई अराजकता की चपेट में आ गई है। उन्होंने मुख्यमंत्री और गृहमंत्री देवेन्द्र फडनवीस पर आरोप लगाया कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखने में पूरी तरह विफल हो गए हैं। मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष वर्षा गायकवाड ने महाराष्ट्र के लिए अलग गृहमंत्री की मांग की और इस स्थिति के लिए फडनवीस को जिम्मेदार ठहराया। एनसीपी विधायक रोहित पवार ने कहा कि मुख्यमंत्री हालात नहीं संभाल पा रहे हैं तो गृह विभाग किसी अन्य मंत्री को सौंप दें। उधर बॉलीवुड में पूरी तरह दहशत का माहौल बन गया है। सबको अब अपनी जान-माल का खतरा हो गया है। एक बार फिर मुंबई अंडरवर्ल्ड के कब्जे में न आ जाए? 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 20 October 2026

रिजीम चेंज बनाम तख्ता पलट

सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील प्रशांत भूषण ने गुरुवार को दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित कॉकरोज जनता पाटी (सीजेपी) की प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि वह अब रिजीम चेंज यानी सत्ता परिवर्तन चाहते हैं। इसके बाद हंगामा हो गया। मुझे लगता है कि प्रशांत भूषण ने देवेन्द्र यादव के इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक लेख में यह लिखा था कि हम रिजीम चेंज नहीं चाहते हम चुनाव प्रक्रिया में सुधार चाहते हैं। यादव के इस बयान पर आंदोलनकारियों को बहुत बुरा लगा और अपनी स्थिति साफ करने के उद्देश्य से प्रशांत भूषण ने रिजीम चेंज की बात कही। इसके पहले कि मैं बीजेपी का इस पर क्या जवाब आया मैं पहले बताना चाहता हूं कि रिजीम चेंज का मतलब क्या होता है और क्यों वह लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। मैंने गूगल पर इनका मतलब सर्च किया और जवाब आया ः रिजीम चेंज का हिंदी में सामान्य अर्थ ः शासन परिवर्तन या सत्ता परिवर्तन होता है। इसका मतलब किसी देश की मौजूदा शासन व्यवस्था, सरकार या नेतृत्व को हटाकर उसकी जगह नया नेतृत्व लाना है। इसका मतलब कतई तख्ता पलटना नहीं होता। तख्ता पलटने का आमतौर पर मतलब होता है जब सेना चुनी हुई सरकार को जबरन हटाकर खुद शासन संभाल लेती है। यह हमने कई बार पाकिस्तान में देखा है, अफ्रीका के कई देशों में देख है। लोकतंत्र में सरकार या शासन परिवर्तन लोकतंत्र का मूल हिस्सा है। अन्ना आंदोलन के बाद जनता ने सत्ता परिवर्तन किया था और भाजपा को बाद में शासन मिला। जब रिजीम चेंज की बात करते हैं तो वर्तमान सरकार को चुनाव में हराकर सत्ता परिवर्तन होता है। अगर ऐसा न हो और एक ही सरकार बिना चुनाव जीते सत्ता में सालों-साल बनी रहती है तो वह तो तानाशाही हो जाएगी। इसलिए यह कहना कि रिजीम चेंज का मतलब तख्त पलटना है तो यह सही नहीं है। खैर, इस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पलटवार करते हुए कहा कि विपक्ष का आंदोलन चुनाव सुधारों के लिए नहीं है इनका मकसद अराजकता फैलाना है। वहीं भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि प्रेस कांफ्रेंस से साफ हो चुका है कि इन लोगों की मंशा है देश में तख्ता पलट करना ऐर बिना चुनाव लड़े अपनी सरकार बनाना है। विपक्ष का आंदोलन चुनाव सुधारों के लिए नहीं है, बल्कि सत्ता परिवर्तन के लिए बांग्लादेश की तर्ज पर देश में हिंसा और अराजकता फैलाना है। इस पर कांग्रेस ने राजनाथ सिंह के बयान पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि विपक्ष का तथ्य साफ है और हम चुनाव के जरिए सरकार को हटाना चाहते हैं। कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने अराजकता के सहारे सत्ता परिवर्तन के राजनाथ के आरोप को भाजपा का पाखंड बताया। प्रेस कांफ्रेंस में पवन खेड़ा ने रक्ष मंत्री के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि हमें इस सरकार को हटाना है और इस व्यवस्था को बदलना है। खेड़ा ने कहा चुनावों के माध्यम से सरकार बदलना लोकतंत्र की एक सामान्य प्रक्रिया है। खेड़ा ने 1977 का जिक्र करते हुए कहा-हम तो कह रहे हैं कि रिजीम चेंज करना है। 77 में क्या हुआ था? हर बार जब विपक्ष सड़क पर आता है, कोई भी आंदोलन होता है तो सत्ता परिवर्तन होता है। चुनाव के जरिए ही रिजीम चेंज होता है। खेड़ा ने कहा, भाजपा लोकतंत्र का पालन करने की आदत भूल चुकी है। प्रशांत भूषण ने कहा, अब सरकार कह रही है कि यह तो विपक्ष का रिजीम चेंज का ऑपरेशन है। हम तो अभी चुनावी लोकतंत्र ठीक करने की गुहार लगा रहे थे, लेकिन सरकार की ऐसी बर्बरता चलेगी तो जरूर रिजीम चेंज होगा। रिजीम चेंज के आरोपों पर उन्होंने कहा ः हां हम रिजीम चेंज चाहते हैं, क्या इसमें गलती है? भाजपा रिजीम चेंज के लिए बार-बार आंदोलन करती है और कहती है कि ये लोग तो रिजीम चेंज की साजिश रच रहे हैं। उन्होंने कहा, रिजीम चेंज कराना हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। हमारे संविधान में सरकार के खिलाफ विरोध करना कोई अपराध नहीं है। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 17 October 2026

विपक्ष का सुप्रीम मार्च

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत से मिलने का समय मांगा था। लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने मुलाकात से इंकार कर दिया। विपक्षी नेताओं ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजकर कहा कि वे उनसे मिलकर चुनाव आयोग और कथित वोट चोरी समेत कई मुद्दों पर अपनी चिंताएं उनके सामने रखना चाहते हैं। मुख्य न्यायाधीश ने इस मुलाकात को ठुकराते हुए कहा कि जिन मुद्दों को लेकर मुलाकात का अनुरोध किया गया है, उनसे जुड़े मामले पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। ऐसे मामलों पर अलग बैठक करना न्यायिक मर्यादाओं के अनुकूल नहीं होगा। मुख्य न्यायाधीश ने विपक्षी नेताओं को सुझाव दिया कि वह एक याचिका दायर कर दें। उस पर वह सुनवाई करेंगे। मुख्य न्यायाधीश के सुझाव पर अमल करते हुए तमाम विपक्षी नेता सोमवार को एक मार्च करते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। 12 अक्टूबर को यह मार्च निकाला गया। इत्तेफाक से मुझे इन जुलूस को देखने का अवसर मिला। हुआ यूं कि मैं लगभग 3 बजे अपने कार्यालय प्रताप भवन बहादुर शाह जफर मार्ग जा रहा था। जब हम इंडिया गेट पहुंचे तो तिलक मार्ग का रास्ता बंद था। मजबूरन हमें कॉपरनिक्स मार्ग से मंडी हाउस के रास्ते से जाना पड़ा। मंडी हाउस पहुंचने पर मैंने देखा कि वह पूरी तरह भरा हुआ है। वहां सैकड़ों प्रदर्शनकारी पहुंचे हुए थे। वहां से लेडी इरविन कॉलेज वाला रोड तिलक ब्रिज तक का ब्लाक था। मजबूरन हम बाराखंभा रोड से जाने लगे। बाराखंभा रोड पर सैकड़ों लोग सड़क पर थे। इनमें ज्यादातर वकील थे। वह शांतिपर्वूक खड़े थे या सड़क पर बैठे थे। उन्होंने मेरी गाड़ी को रास्ता दिया और भीड़ में मैं ललित होटल होते हुए कार्यालय पहुंचा। मैंने अपने जीवन में इतनी भीड़ सिर्फ एक बार पहले देखी थी जब रामलीला ग्राउंड में अन्ना आंदोलन हुआ था। पर बाद में मैंने टीवी पर भीड़ देखी तो मैं हैरान हो गया। दिल्ली में वर्षें बाद ऐसी भीड़ देखी। यह भीड़ कोई किराए पर लाए लोग नहीं थे, जो बसों में दबाव के चलते आने पर मजबूर हुए। भीड़ में बुजुर्ग, अन्य उम्र के लोग, लड़के, लड़कियां सभी तरह के लोग थे जो अपने पैसों से अपनी मजी से इस मार्च में शामिल हुए। पुलिस ने भी इस बात पर बहुत नियंत्रण, समझदारी से काम किया। उन्होंने कहीं भी किसी प्रकार की जोर-जबर्दस्ती नहीं की। भीड़ इतनी थी कि राहुल गांधी, प्रियंका की जान को खतरा हो सकता था। हालांकि उनको जेड प्लस की सुरक्षा मिली हुई है जिसमें 45-50 सुरक्षा गार्ड होते हैं, उस दिन मुश्किल से चार-पांच ही नजर आए। राहुल, प्रियंका को थोड़ा अपनी सुरक्षा पर ध्यान देना जरूरी है। ऐसी अनियंत्रित भीड़ में कुछ भी हो सकता है। खैर 11 विपक्षी नेताओं ने एसआईआर में बड़े स्तर पर नाम काटने और गड़बड़ी के आरोप लगाते हुए संयुक्त याचिका दायर की। इसमें निर्वाचन आयोग, सीईसी ज्ञानेश कुमार और दोनों निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधु व विवेक जोशी पक्षकार बनाए गए हैं। वोट चोरी को लेकर दिल्ली की सड़कों पर 7 दिन से लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। इससे पहले बाराखंभा रोड से विपक्ष का सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च शुरू हुआ तो राहुल गांधी ने अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और सुप्रिया सुले समेत कई दूसरे नेताओं को भी बुलाया। एआईएसए (आईसा) की नेहा वोरा भी गाड़ी में मौजूद थीं। मार्च के दौरान जब राहुल गांधी पहले आगे बढ़ने के लिए निकले तो उनके आसपास लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई। इससे कुछ देर तक धक्का-मुक्की जैसी स्थिति बन गई। भीड़ को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो गया। इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि दोनों में एक अहम मुद्दे पर लोगों को सड़कों पर आने के लिए मजबूर होना पड़े। और जब कोई जवाबदेही को तैयार न रहे तो एक ही रास्ता न्याय के लिए बचता है वह है सुप्रीम कोर्ट का द्वार और यही विपक्ष ने किया। न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 

-अनिल नरेन्द्र