Anil Narendra Blog
AAJ KI AWAZ आज की आवाज़
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Saturday, 3 October 2026
ज्ञानेश कुमार का सुरक्षा कवच?
Thursday, 1 October 2026
चुनाव आयोग और स्पष्टीकरण?
चुनाव आयोग (ईसी) ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को लेकर उठे विवाद के बीच शनिवार को बैठक की। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी शामिल हुए। बैठक के बाद ईसी ने कहा कि एसआईआर से जुड़े सभी बड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग ने एसआईआर की प्रक्रिया में कुछ बदलाव का भी ऐलान किया है। लेकिन बावजूद इसके कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों के सवाल खत्म नहीं हुए हैं। हालांकि दूसरी ओर भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने आयोग के स्पष्टीकरण का स्वागत किया है। ऐसे में सवाल है कि विवाद किस दिशा में जाएगा। यह बैठक इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के बाद हुई है जिसमें चुनाव आयुक्तों के बीच एसआईआर वोटर, डाटा और फार्म-6 से जुड़े मुद्दों पर मतभेद का दावा किया गया था। आयोग ने यह भी कहा कि दो चुनाव आयुक्तों की कैबिनेट सचिव को भेजी गई चिट्ठियां आयोग की किसी नीति या एसआईआर के फैसले से जुड़ी नहीं थी। लेकिन कांग्रेस ने आयोग के बयान को टाल-मटोल वाला बताते हुए कहा कि इससे उसके ही उठाए मूल सवालों के जवाब नहीं मिले हैं। पार्टी ने एसआईआर रोकने और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग दोहराई है। वहीं, भाजपा का कहना है कि आयोग के बयान से साफ हो गया है कि एसआईआर को लेकर लगाए गए आरोपों का कोई आधार नहीं है। भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने विपक्ष पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि चुनाव आयोग अपने पर लगे आरोपों का संतोषजनक जवाब नहीं दे सका। कांग्रेस का कहना है कि अगर दो चुनाव आयुक्तों ने फार्म-6 में बदलाव को अनधिकृत और गैर-कानूनी कहा था, तो इस पर कोई स्पष्ट जवाब क्यों नहीं दिया गया? पवन खेड़ा ने एक्स पर आयोग के प्रेस नोट को “टू लेम, टू लिटिल, टू लेट'' बताया। उन्होंने कहा कि प्रेस नोट ने तीन बड़े सवालों के जवाब नहीं दिए। फार्म-6 में बदलाव, युवा मतदाताओं का सवाल और ईसीआईएनईटी। पवन खेड़ा ने लिखाः जब तक चुनाव आयोग खास कानूनी आपत्तियों का जवाब नहीं देता, तब तक कितने भी लम्बे प्रेस नोट जारी कर दिए जाएं, सर्वसम्मति का कितना भी दावा कर लिया जाए या कोई और तमाशा कर लिया जाए, इससे ज्ञानेश कुमार गुप्ता की मुfिश्कले खत्म नहीं होंगी। अभी भी उनके लिए देर नहीं हुई है। उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए और सरकारी गवाह बन जाना चाहिए, वरना जेल जाने के लिए तैयार रहना चाहिए। सवाल यह भी है कि जिन राज्यों में एसआईआर के बाद चुनाव हो चुके हैं, वहां युवा मतदाताओं का क्या होगा? पवन खेड़ा ने खासतौर पर पूछा कि बिहार और पश्चिम बंगाल में एसआईआर के बाद मतदाताओं का क्या होगा? उन्होंने यह भी पूछा कि जवनरी 2024 के बाद एसआईआर नहीं हुआ तो पुराने फार्म-6 की प्रासंगिकता क्या है? उधर देश के 2000 से ज्यादा नागरिकों ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर एसआईआर पर रोक लगाने की मांग की है। साथ ही निर्वाचन आयोग पर स्वत संज्ञान लेकर कार्रवाई शुरू करने की अपील की है। पत्र में कहा गया है कि एसआईआर की वैधता, प्रक्रिया की समीक्षा होने तक इसे रोका जाए। वोटर रजिस्ट्रेशन साफ रवैया और फार्म में कथित अनधिकृत बदलावों की कोर्ट की निगरानी में जांच होनी चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और ईसीआईनेट का सुप्रीम कोर्ट की नियुक्त स्वतंत्र विशेष समिति से सिक्युरिटी और लीगल ऑडिट कराने की मांग भी की गई है। पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल विष्णु भागवत, पूर्व आरएएस अधिकारी अदिति मेहता, वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, इतिहासकार आदित्य मुखर्जी और अभिनेता प्रकाश राज सहित कई शिक्षाविद्, वकील, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल है। वैसे भी सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं लगी हुई हैं। देखना होगा कि इस प्रकरण में आगे क्या-क्या होता है। 2 अक्टूबर से कॉकरोच जनता पार्टी ने नए आंदोलन की भी घोषणा की है।
-अनिल नरेन्द्र
Tuesday, 29 September 2026
मीडिया में छाए ज्ञानेश कुमार
चुनाव आयोग के भीतर से जो खबरें लीक हुई हैं और इंडियन एक्सप्रेस में छपी हैं वह बेहद चिंताजनक तो है ही पर उससे कहीं अधिक गंभीर इसलिए है क्योंकि वह देश की उस संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है जिस पर स्वतंत्र, निष्पक्ष व पारदर्शी चुनाव कराने और लोकतंत्र में जनता का भरोसा बनाए रखने की भी अहम जिम्मेदारी है। भारत में चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद की रिपोर्ट की चर्चा पूरे देश में तो हो ही रही है पर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भी यह छाई हुई है। इस रिपोर्ट के बाद पूरे देश में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार चर्चा में भी आ गए र्हं। पूरे देश में उनके खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। वहीं अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में इस पर टिप्पणियां छप रही हैं। अमेरिकन मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए लिखाः एसआईआर में योग्य मतदाताओं के नाम हटाने और इससे चुनावी नतीजों पर असर पड़ने की पूरी-पूरी आशंका है। लूमबर्ग ने लिखाः सितंबर के अंत में इस मुद्दे पर फिर सवाल उठे, जब अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने खबर दी कि तीन चुनाव आयुक्तों में से दो ने 10 महीने की अवधि में कम से कम 14 बार इस प्रक्रिया को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के सामने चिंता जताई थी। चुनाव आयोग ने इस खबर का बहरहाल खंडन किया है। कfिथत चुनाव आयुक्तों की असहमति ने चुनाव की निगरानी करने वाली संस्था पर और सवाल खड़े किए हैं। पिछले एक साल में राज्य विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी की लगातार जीत के बाद मतदाता सूची में सफाई का मुद्दा राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील हो गया है। अप्रैल में पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले मतदाता सूची से करीब लाखों नाम हटाए गए थे। इसके बाद बीजेपी ने पहली बार यहां बड़ी जीत हासिल की। पिछले साल बिहार में भी लाखों नाम काटे गए थे। पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव से पहले इसी तरह मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया गया था। मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने के साथ मतदाता सूची के प्रबंधन वाले सिस्टम के बढ़ते केंद्रीयकरण को लेकर चिंताओं पर ब्लूमबर्ग ने लिखाः दोनों आयुक्तों ने यह भी कहा कि कुछ फैलसे लिए गए और आदेश जारी किए गए, लेकिन इसकी जानकारी उन्हें नहीं दी गई। रिपोर्ट के अनुसार एसआईआर के दौरान करीब 13 करोड़ लोगों के नाम शुरुआती वोटर लिस्ट से हटा दिए गए। इनमें से कई लोगों के नाम हटाए जाने के खिलाफ अपील की गई जो अधिकतर अभी भी पेंडिंग है। अखबार ने लिखाः प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को 2029 तक लोकसभा चुनाव में वोट डालने वाले मतदाताओं का सामना नहीं करना पड़ेगा। लेकिन कुछ ही महीने बाद भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गृह राज्य गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव उनकी लोकप्रियता के लिए अहम राजनीतिक टेस्ट होगा। कतर के न्यूज आउटलेट अल-जजीरा ने चुनाव आयोग से जुड़ी खबर प्रकाशित होने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन का जिक्र करते हुए लिखाः कॉकरोच जनता पार्टी के युवा आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर देश के मुख्य चुनाव आयुक्त शनिवार तक इस्तीफा नहीं देते हैं तो वह देश भर में विरोध प्रदर्शन शुरू करेंगे। अखबार न्यूयार्क टाइम्स ने भी इस मुद्दे पर विस्तृत खबर छापी है। एसआईआर से लेकर विपक्षी पार्टियों में विभाजन व चुनावी सिंबल फ्रीज करने और उन्हें मान्यता होने के मुद्दे तक, हर जगह विपक्ष को चुनाव आयोग पर सवाल उठाने का एक मौका बैठे-बिठाए मिल गया है। यह मुद्दा हमें लगता है कि थमने वाला नहीं है और अभी कई आंदोलन देखने को मिलेंगे। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने जो आरोप लगाए हैं वह भी स्पष्टीकरण की मांग करते हैं। यहां सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता की टिप्पणी भी बेहद अहम है। एक संवैधानिक संस्था पर इस प्रकार के आरोप बेहद चिंताजनक हैं, जो सवाल उठ रहे हैं उनका जवाब मिलना ही चाहिए, क्योंकि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पूरे लोकतांत्रिक तंत्र के भरोसे का प्रश्न भी है।
- अनिल नरेन्द्र