Saturday, 4 April 2026

ट्रंप निकलने के प्रयास में फंस गए हैं?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय समयानुसार गुरुवार सुबह साढ़े छह बजे व्हाइट हाउस में ईरान जंग पर भाषण दिया। ट्रंप ने फिर धमकी दी है कि अमेरिका आने वाले हफ्तों में ईरान पर इतनी बमबारी करेगा कि उसे पाषण युग में पहुंचा देगा। 20 मिनट के इस प्राइम टाइम भाषण में ज्यादातर वही बातें दोहराईं जो वो कई बार पहले कह चुके थे। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि हम अगले दो से तीन हफ्तों में उन (ईरान) पर बहुत बड़ा हमला करने जा रहे हैं। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकाöजरायल सैन्य अभियान मुख्य रणनीतिक मकसदों को लेकर लगभग पूरा करने के करीब है। उन्होंने अनुमान लगाया कि यह युद्ध अभी दो से तीन हफ्ते और चल सकता है। अगर आप पिछले एक हफ्ते में ट्रंप के ट्रुथ सोशल पर किए गए पोस्ट पर कॉपी-पोस्ट करें तो वह इस राष्ट्र के नाम उनके संबोधन से काफी मिलता-जुलता पाएंगे। राष्ट्रपति ट्रंप ने इस युद्ध के फायदे अमेरिकी जनता को समझाने की भी कोशिश की। इसकी वजह भी है, क्योंकि अमेरिका के कई सर्वे बताते हैं कि 28 फरवरी को शुरू किए गए इस सैन्य अभियान को लेकर ज्यादातर मतदाता असहमति जता रहे हैं। ट्रंप ने अमेरिकी जनता से इस युद्ध को अपने भविष्य में एक निवेश के रूप में देखने की अपील की और कहा कि यह पिछले एक सदी या उससे भी अधिक समय से इस सैन्य संघर्ष की तुलना में कुछ भी नहीं है, जिनमें अमेरिका कहीं अधिक लंबे समय तक शामिल रहा है। लेकिन ट्रंप के भाषण से अमेरिकी जनता नाराज हुई। वह जानना चाहती थी कि यह युद्ध किस दिशा में जा रहा है या अमेरिका के लिए इससे बाहर निकलने के संभावित रास्ते क्या हो सकते हैं? इसमें कई सवालों के जवाब नहीं मिल पाए। पहला ः इजरायल अभी ईरान पर हमले कर रहा है? साथ ही इजरायल को ईरान के ड्रोन और मिसाइल हमलों का सामना भी करना पड़ रहा है जिसमें बुधवार को तेल अवीव के पास कुछ हमले भी शामिल हैं। एक अहम सवाल यह है कि क्या इजरायली प्रधानमंत्री बेन्जामिन नेतन्याहू की सरकार ट्रंप के बताए गए कुछ हमलों की समय-सीमा से सहमत हैं? फिलहाल इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। कम से कम मौजूदा हालात में तो इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है। फिर इस 15 सूत्रीय शांति योजना का क्या हुआ, जिसे व्हाइट हाउस कुछ दिन पहले ईरान से स्वीकार करने के लिए कह रहा था? अपने संबोधन में ट्रंप ने इसका कोई जिक्र नहीं किया। क्या अब अमेरिका अपनी कई मांगों से पीछे हट रहा है, जिसमें समृद्ध यूरेनियम के भंडार को वापस लेने की मांग भी शामिल थी? इजरायल ने अभी ईरान पर हमले नहीं रोके हैं। अब दुनिया के सबसे तेल शिपिंग मार्गें में से एक होर्मुज स्ट्रेट इस संघर्ष का फोकस बन गया है। ईरान ने इस तेल मार्ग को बंद कर रखा है। हालांकि राष्ट्रपति का इस पर कोई ठोस और तय रुख नजर नहीं आता। अभी वो ईरान से टैंकरों को रास्ता देने की मांग करते हैं और अगले ही पल सहयोगी देशों से कहते हैं कि वह खुद जाकर इसे संभालें। बुधवार को उन्होंने कहा, होर्मुज पर जाओ और बस उसे अपने नियंत्रण में ले लो, उसकी सुरक्षा करो और अपने इस्तेमाल के लिए उसे खोलो। मुश्किल हिस्सा पूरा हो चुका है, इसलिए यह आसान होना चाहिए। उन्होंने ब्रिटेन और फ्रांस जैसे अपने सहयोगियों को होर्मुज खुद जाकर तेल हासिल करने की नसीहत दे डाली। इसके बाद उन्होंने बिना ज्यादा विस्तार से बताए सिर्फ इतना कहा कि युद्ध खत्म होने पर होर्मुज स्वाभाविक रूप से फिर से खुल जाएगा। तेल की कीमतों को लेकर चिंतित लोगों के लिए चार बात शायद ज्यादा भरोसा देने वाली नहीं होगी। व्हाइट हाउस में दिए गए ताजा भाषण में ट्रंप का वो तेवर पूरी तरह गायब था, जबकि ब्रीफिंग में संकेत दिए गए थे कि यह उनके संबोधन का एक अहम हिस्सा होगा। एक और बड़ा अनसुलझा सवाल मैदान में सैनिकों की मौजूदगी को लेकर है। क्षेत्र में लगातार पहुंच रहे हजारों मरीन और पैराट्रूपर्स आखिर वहां क्या कर रहे हैं या क्या करने वाले हैं? ट्रंप के बयान हर अगले दिन बदल रहे हैं या यूं कहें कि सुबह कुछ कहते हैं, शाम को कुछ कहते हैं। इस बीच अमेरिका से गैस की औसत कीमत लगभग चार साल में पहली बार 4 डालर प्रति गैलन से ऊपर चली गई है और ट्रंप की लोकप्रियता रेटिंग तेजी से गिर रही है। -अनिल नरेन्द्र

Thursday, 2 April 2026

दुबई को चुकानी पड़ी सबसे बड़ी कीमत

यूएई यानी संयुक्त अरब अमीरात को बनाने में 40 वर्ष लगे और तबाह होने में मुश्किल से 10 दिन ही लगे। दुबई जो दुनिया के सबसे आधुनिक शहरों में से एक माना जाता था, सुरक्षित माना जाता था जो दुनिया का नया हब बन गया था उसको ईरान ने ऐसा तबाह किया कि वह इतने पीछे चला गया कि अब उसे वर्षें लगेंगे उसी स्थिति में पहुंचने पर। अमेरिका-इजरायल के साथ जंग के बीच ईरान लगातार खाड़ी देशों पर हमला कर रहा है। एक खास बात सामने आई है कि ईरान सबसे ज्यादा यूएई को निशाना बना रहा है। जिस दिन से (29 फरवरी) जंग शुरू हुई तब से ईरान ने 1714 ड्रोन, 334 बैलिस्टिक मिसाइल दागकर तबाही की इबारत लिख दी है। आखिर ईरान दुबई, आबू धाबी पर लगातार हमले क्यों कर रहा है? अमेरिका-इजरायल-ईरान की इस जंग में ईरान ने हमलों में दुबई के आलीशान होटल, रिफाइनरी, एयरपोर्ट और प्रमुख कॉमर्शियल जोन को काफी प्रभावित किया है। आखिर दुबई को तबाह करने के पीछे ईरान की रणनीति क्या है? क्या इसका कारण सिर्फ इतना है कि अमेरिका वहां से अपने सैन्य अ़ड्डे संचालित करता है? या इन हमलों के पीछे ईरान के कुछ और इरादे हैं? तो इसका जवाब हथियारों से ज्यादा इकोनॉमिक्स और इंवेस्टमेंट के आसपास घूमती है। दरअसल दुबई वाशिंगटन की वह कमजोर नस है, जिसे दबाते ही दर्द सीधे ट्रंप को व्हाइट हाउस में बैठे होने लगता है। मागा (मेक अमेरिका ग्रेट आगेन) के नाटो के साथ डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिकी सत्ता में दूसरी बार वापसी हुई। जबसे वे सत्ता में लौटे हैं, उनका पूरा फोकस अमेरिका की अर्थव्यवस्था को बूस्ट करने और बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश खींचने पर रहा है। व्हाइट हाउस के आंकड़ों के मुताबिक 2025 में अमेरिका को अगले दस वर्षों में निवेश के लिए 5.2 ट्रिलियन डॉलर की विदेशी कमिटमेंट्स मिली है तो इस 5.2 ट्रिलियन डॉलर में से सबसे बड़ा हिस्सा यूएई इनवेस्ट कर रहा है। अकेले 1.4 ट्रिलियन डॉलर (यानी कुल निवेश का 27 प्रतिशत) सिर्फ यूएई ने वादा किया है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो यूएई अमेरिका के लिए कमजोर कड़ी बन गया है। ईरान अच्छी तरह जानता है कि अगर दुबई पर मिसाइलें गिरेंगी तो वहां की अर्थव्यवस्था डगमगाएगी और अगर दुबई की अर्थव्यवस्था हिली तो अमेरिका में आने वाले 1.4 ट्रिलियन डॉलर का वह निवेश सीधे तौर पर खतरे में पड़ जाएगा, जिस पर ट्रंप अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। ईरान का निशाना सिर्फ अमेरिका में जाने वाला दुबई का पैसा नहीं है, बल्कि ग्लोबल इंवेस्टमेंट हब के रूप में दुबई और यूएई की पहचान तबाह करना है। दुबई जो आर्थिक, डिजिटल और मीडिया हब रहा है, इस युद्ध में बुरी तरह प्रभावित हुआ है। मुख्य शेयर सूचकांक एडीएक्स जनरल में पिछले महीने में 11.42 प्रतिशत की गिरावट आई है। हवाई क्षेत्र बंद हेने और उड़ानों के रद्द होने से पर्यटन और एविएशन सेक्टर में दुबई को करीब 9 करोड़ डॉलर का नुकसान हुआ है। यूएई सरकार और मीडिया ने देश को सुरक्षित जगह वाली छवि बनाएं रखने की कोशिश की। राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायेद ने लोगों को भरोसा दिलाया है कि सब कुछ नियंत्रण में है और देश हर खतरे से निपटने के लिए तैयार है। साथ ही अटानी जनरल हमाद सैफ अल शम्सी ने हमलों की तस्वीरें और वीडियो साझा करने की सख्त चेतावनी दी। इस आदेश के तहत कई विदेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया गया, जिस पर कम से कम एक साल की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है। ईरान दुनिया को यह कड़ा संदेश दे रहा है कि युद्ध के मैदान से हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी वह अमेरिका की दुखती आर्थिक नस को काट सकता है। हर ड्रोन हमला, मिसाइल स्ट्राइक दुबई और यूएई और खाड़ी देशों की उस सुरक्षित और स्थिर छवि पर एक करारा प्रहार है, जिसे उन्होंने सालों के रिफार्म और शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर के दम पर बनाया है। -अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 31 March 2026

जमीनी जंग की तैयारी कर रहा है अमेरिका?


पश्चिम एशिया में संघर्ष विराम की कोशिशें कमजोर पड़ती जा रही है। अमेरिका और ईरान की युद्ध बंदी की शर्तें ऐसी हैं कि हमें नहीं लगता कि इन पर कोई भी झुकने को तैयार होगा। तो क्या अब अमेरिका मुंह छिपाने के लिए और अमेरिकी जनता को इस हिमाकत युद्ध को जस्टिफाई करने के लिए जमीनी युद्ध पर उतर सकता है? अमेरिका और ईरान दोनों ने ही अपने रुख और कड़े कर लिए हैं। अमेरिका पश्चिम एशिया में और सैनिक भेजकर सैन्य तैनाती बढ़ाता चला जा रहा है। करीब 2500 मरीन कमांडों के साथ अमेरिकी वॉरशिप यूएसएस ट्रिपोली पश्चिम एशिया के करीब पहुंच चुका है। इसी तरह 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के 2000 पैराट्रूपर्स भेजे जा रहे हैं। दूसरा वॉरशिप यूएसएस बॉक्सर भी 2300 मरीन कमांडों के साथ अप्रैल में पहुंच रहा है। इस तरह करीब 7000 अमेरिकी सैनिक इलाके में पहुंच जाएंगे। इसके अलावा 50 हजार सैनिक पहले से ही मध्य-पूर्व में मौजूद हैं। इससे संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका कूटनीति के साथ जमीनी हमले समेत सभी विकल्प खुले रखना चाहता है। जानकारों का कहना है कि अगर कूटनीति नाकाम रहती है तो इन अमेरिकी सैनिकों का इस्तेमाल मुख्य रूप से चार उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है। पहला-ईरान के मुख्य तेल निर्यात केंद्र खार्ग द्वीप पर कब्जा या उसकी नाकाबंदी। इस द्वीप पर हाल में अमेरिकी सेना ने 90 से ज्यादा टारगेट पर हमले किए। दूसराöहोर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित करना और उस रास्ते में जहाजों की आवाजाही को फिर शुरू करना। तीसराöईरान के तटीय इलाकों पर कार्रवाई और चौथाö उसके एटमी ठिकानों को सुरक्षित करना और ईरान के यूरेनियम भंडार को कब्जे में लेना। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जमीनी जंग के मंसूबों के जवाब में ईरान ने बड़ी तैयारी कर ली है। ईरान ने 10 लाख सैनिकों की फौज जुटाई है। साथ ही ईरान ने कसम खाई है कि अगर अमेरिकी सैनिक ईरान की धरती पर युद्ध के लिए उतरते हैं तो उनके लिए हम यह फैसला ऐतिहासिक नरक तैयार कर देंगे। चलिए एक नजर इस बात पर डालते हैं कि अगर अमेरिका ईरान पर अपने सैनिक उतार देता है और खार्ग द्वीप और ईरान के दक्षिणी तेल भंडार पर कब्जा करने में सफल हो जाता है तो इससे ईरान के तेल के निर्यात को लगभग पूरी तरह अलग-थलग किया जा सकता है। शायद इससे होर्मुज जलडमरूमध्य का मुद्दा पूरी तरह हल नहीं हो। अमेरिका इसके कुछ हिस्सों पर कब्जा कर सकता है। लेकिन ईरान असंभावित युद्ध रणनीति (जैसे गुरिल्ला वॉर) का इस्तमाल करके इसके कुछ हिस्सों पर नियंत्रण बनाए रख सकता है। दोनों पक्षों में भारी सैन्य हताहत होते हैं और ईरान में नागरिक हताहत होते हैं तो इसके भयंकर परिणाम होंगे। यह भी संभावना है कि अमेरिकी सेना सीमित या बड़े पैमाने पर ईरान में फंस सकती है। उदाहरण के लिए वियतनाम और अफगानिस्तान सामने हैं। सैन्य अभियान आसान रास्ता नहीं हो सकता है। यह कभी भी साफ-सुथरा अभियान नहीं हो सकता। ऐसे अभियान कभी भी पूरी तरह सफल नहीं होते और यही इस युद्ध की सच्चाई है।
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 28 March 2026

न ट्रंप पर विश्वास न ही पाक की मध्यस्थता मंजूर


पश्चिम एशिया में संघर्ष खत्म करने के लिए अमेरिका के 15 सूत्रीय प्रस्ताव को खारिज करते हुए ईरान ने उल्टा अपनी पांच शर्तें रख दीं। ईरान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 15 सूत्रीय शांति प्रस्ताव को एकतरफा बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया है और युद्ध खत्म करने के लिए अपनी पांच बड़ी शर्तें सामने रख दीं हैं। ईरान ने स्पष्ट कहा कि वह यह युद्ध तब ही खत्म करेगा, जब उसकी मांगे पूरी होंगी। अमेरिका ने अपना प्रस्ताव पाकिस्तान के जरिए ईरान तक पहुंचाया था। ईरान ने दो टूक कहा कि न तो हमें ट्रंप पर विश्वास है और न ही हमें पाकिस्तान की मध्यस्थता मंजूर है। ईरान ने अपनी पांच शर्तें में युद्ध के नुकसान का भारी मुआवजा, टारगेट किलिंग पर रोक और सबसे महत्वपूर्ण स्टेट ऑफ होर्मुज पर पूर्ण संप्रभुता शामिल है। तेहरान का स्पष्ट रुख है कि शांति तभी होगी जब अमेरिका उसकी शर्तें को मानेगा और क्षेत्र के सभी रेजिस्टेंस ग्रुप्स पर हमले बंद करेगा। ईरान और अमेरिका के बीच छिड़ी इस भीषण जंग में अब तेहरान ने भी अपने तेवर कड़े कर लिए हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 15 सूत्रीय प्रस्ताव दिया था। यह कुछ इस प्रकार थाः ईरान अपने तीनों प्रमुख परमाणु ठिकानों को बंद करे। यूरेनियम संवर्धन को पूरी तरह रोके। बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को निलंबित किया जाएगा। विद्रोही समूह जैसे हमास, हिजबुल्लाह, हूती आदि को मदद बंद करें। होर्मुज को पूरी तरह खोला जाए। ईरान ये वादा करे कि वह कभी परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं करेगा। एक प्रमुख मांग यह भी थी कि मौजूदा संवर्धित यूरेनियम को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को सौंपना होगा। बाकी भी कुछ मांगे थीं, मैंने प्रमुख अमेरिकी मांगों का जिक्र किया है, ईरान और अमेरिका एक-दूसरे से जो चाहते हैं, मुझे तो उन पर सहमति होना मुश्किल लगता है। कमोबेश इन्हीं मामलों पर फरवरी में भी बातचीत हुई थी। इन बिंदुओं को वह रेड लाइन कह सकते हैं, जिस पार करना दोनों देशों के लिए असंभव है। वहीं, ईरान के विदेशी मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि उनका देश संघर्ष का स्थायी अंत चाहता है। उन्होंने कहा कि युद्ध विराम के प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है, लेकिन ईरान की अमेरिका से वार्ता की कोई इच्छा नहीं है। उन्होंने कहा, अमेरिका मध्यस्थों के जरिए संदेश भेज रहा है। ऐसे संदेशों के आदान-प्रदान का मतलब वार्ता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ने जिस मकसद से युद्ध छेड़ा था, उसे हासिल नहीं कर पाया। अमेरिका युद्ध में जीत और ईरान में सत्ता परिवर्तन चाहता था, जो दोनों ही नहीं हुए। वहीं ईरान के संयुक्त सैन्य कमान के प्रवक्ता इब्राहिम जोल्फकारी ने कहा जिस अमेरिकी रणनीतिक ताकत का ट्रंप शेखी बघारते थे, वह अब रणनीतिक हार में बदल गई। आज कोई भी अमेरिका के झूठे प्रचार से भ्रमित नहीं होगा। इससे पहले, अमेरिका ने पाकिस्तान के जरिए भेजे प्रस्ताव में युद्ध विराम के लिए ईरान को पाकिस्तान, तुर्किए में से किसी जगह वार्ता का सुझाव दिया था जिसे ईरान ने सिरे से खारिज कर दिया। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बेघाई ने कहा कि पिछले साल जब परमाणु वार्ता हो रही थी उसी बीच अमेरिका ने ईरान पर हमला किया था। उन्होंने उसे कूटनीतिक विश्वासघात बताते हुए कहा, हमें अमेरिका पर कोई भरोसा नहीं है। ट्रंप दो बार धोखा दे चुके हैं और अब हम ऐसा नहीं होने देंगे। हमारी राय में ताकत कोई समाधान नहीं है। बातचीत पर आगे बढ़ने के लिए यह भी जरूरी है कि पहले ईरान पर हमले बंद हों। यह नहीं हो सकता कि आप एक तरफ शांति प्रस्ताव भेजें और संघर्ष विराम की एक तरफा घोषणा करके हमले जारी रखें? यही नहीं अमेरिका लगातार अपनी थल सेना के सैनिक बढ़ाता जा रहा है। नए-नए युद्ध पोत, फाइटर विमान भेजे जा रहा है और दूसरी ओर शांति की बात करता है। यह दोगुलापन नहीं तो और क्या है? क्या आप ईरान को दोष दे सकते हो अगर वो यह कहता है कि हमें ट्रंप पर कतई विश्वास नहीं है।
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 26 March 2026

डिमोना : इजरायल का सीक्रेट न्यूक्लियर रिएक्टर


ईरान-इजरायल युद्ध का एक-दूसरे के परमाणु केंद्रों तक पहुंच जाना बेहद भयावह है। शनिवार की सुबह अमेरिका-इजरायल ने संयुक्त कार्रवाई में ईरान के नतांज परमाणु केंद्र को निशाना बनाया तो तेहरान ने पलटवार करते हुए अराद के साथ-साथ डिमोना शहर पर भी मिसाइलें दागी। डिमोना इजरायल का वह दक्षिणी हिस्सा है, जहां से महज 13 किलोमीटर दूर उसका मुख्य परमाणु केंद्र है। तेल अवीव की मानें तो यह हमला दरअसल उसके परमाणु ठिकाने को केंद्र में रखकर ही किया गया था। इस हमले में 180 से अधिक लोग घायल होने की बात की जा रही है। इजरायली सेना ने बताया कि वह इस बात की भी जांच कर रही है कि ईरानी बैलिस्टिक मिसाइल को रोका क्यों नहीं जा सका। इससे इस बात को भी बल मिलता है कि ईरान के दावे में कुछ सच्चाई है कि उसकी मिसाइलों ने इजरायली एयर डिफेंस सिस्टम को तबाह कर दिया है। इजरायली सेना के अनुसार वायु रक्षा प्रणाली ने मिसाइल को रोकने की कोशिश की, लेकिन इंटरसेप्टर उसे मार गिराने में सफल नहीं हो सके। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने इन हमलों के कारण (पा है) किसी तरह के रेडिएशन यानि विकिरण से इंकार किया है, जो यकीनन सुखद बात है लेकिन दोनों जगहों पर जान-माल का भारी नुकसान हुआ है। डिमोना, दक्षिणी इजरायल के नेगेव रेगिस्तान में स्थित है और यहां एक प्रमुख परमाणु संयंत्र है। इजरायल की अपने परमाणु कार्पाम को लेकर कोई साफ नीति नहीं है और आधिकारिक तौर पर उसका कहना है कि डिमोना रिएक्टर केवल रिसर्च के लिए है। हालांकि स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार उसके पास लगभग 90 परमाणु वॉरहैड है, जिससे वह मध्य-पूर्व का एक मात्र परमाणु शक्ति संपन्न देश बन जाता है। डिमोना रिएक्टर को शिमोन पेरेस नेगेव न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर कहा जाता है। यह इजरायल के परमाणु कार्पाम की रीढ़ माना जाता है। परिसर करीब 36 वर्ग किलोमीटर में फैला है। करीब 2700 वैज्ञानिक और तकनीशियन यहां काम करते हैं। डिमोना को इजरायल के लिटिल इंडिया के नाम से जाना जाता है। यहां बड़ी संख्या में भारतीय-यहूदी समुदाय रहता है। करीब 30 प्रतिशत आबादी भारतीय मूल की है और मराठी आम भाषा इस्तेमाल होती है। दुकानों में सोन पापड़ी, गुलाब जामुन, पापड़ी चाट और भेलपुरी मिल जाती है। अमेरिका-ईरान-इजरायल की यह जंग जैसी घातक रूप अख्तियार कर रही है, वह न सिर्फ पश्चिम एशिया बल्कि पूरे विश्व के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। डिमोना और ईरानी परमाणु केंद्रों में यूरेनियम और प्लूटोनियम के भंडार हैं। अगर इनमें रिसाव हुआ तो न सिर्फ आस-पास के लोग शिकार होंगे, बल्कि पूरा मध्य-पूर्व इससे प्रभावित हो सकता है। परमाणु विकिरण किस हद तक खतरनाक होते हैं, इसकी पीड़ा दायक नजीरें मौजूद हैं। जब दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापानी शहर हिरोशिमा व नागासाकी पर अमेरिका ने परमाणु बम गिराए थे। लिटिर बॉय (यूरेनियम) और फैटमैन (प्लूटोनियम) नामक इन बमों ने करीब 2 लाख लोगों की जिंदगी खत्म कर दी थी और जापान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया था। आज इनकी तुलना में कहीं अधिक विनाशक बम कई देशें के पास हैं। ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध को और फैलने से रोकने के लिए दुनिया को सामने आना पड़ेगा। स्वहित नहीं, विश्व हित को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। भारत इन पर लगातार जोर देता रहा है और कहता रहा है कि समस्या का हल युद्ध नहीं मेज पर बैठकर समझौता करना होगा। इसका हल युद्ध से नहीं बातचीत से करना होगा। यह काम जितनी जल्दी हो, यह युद्ध रुके, विश्व का इसी में कल्याण है। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 24 March 2026

4000 किलोमीटर दूर ईरान के हमले ने चौंका दिया


ईरान और अमेरिका-इजरायल जंग खतरनाक मेड़ पर पहुंच गई है। अमेरिका-इजरायल की वायुसेना ने शनिवार सुबह ईरानी न्यूक्लियर हार्ट नतांज परमाणु संवर्धन केंद्र पर भीषण हमला किया। ईरानी परमाणु ऊर्जा संगठन ने इसे आपराधिक हमला करार दिया। हालांकि प्लांट से किसी रेडियोधर्मी रिसाव की खबर नहीं है। अमेरिका-इजरायल के इस हमले का असर अब वैश्विक जंग फैलने का खतरा हो गया है। नतांज पर हमले के कुछ ही घंटों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई (आपरेशन टू प्रामिस-4) में हिंद महासागर स्थित अमेरिका ब्रिटेन के एयरबेस डिएगो गार्सिया पर दो बैलिस्टिक मिसाइलें दाग कर दुनिया को चौंका दिया। ईरान ने पहली बार पूर्व घोषित 2000 किमी की रेंज की लिमिट तोड़ 4000 किमी दूर प्रहार की क्षमता दिखाई। रिपोर्ट के मुताबिक एक मिसाइल उड़ान के दौरान विफल हो गई, जबकि दूसरी को रोकने के लिए अमेरिकी युद्धपोत ने एसएम-3 इंटरसेप्टर का इस्तेमाल किया, हालांकि इसकी सफलता की पुष्टि नहीं हुई है। यह हमला इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि डिएगो गार्सिया ईरान से करीब 4000 किलोमीटर दूर है, जो ईरान की घोषित 2000 किलोमीटर की रेंज से दोगुना है। यदि यह रिपोर्ट सही है तो ईरान की मिसाइल क्षमता को लेकर बनी पुरानी धारणाएं टूट चुकी हैं। ईरान को लेकर धारणा थी कि उसके पास 2000 किलोमीटर तक की रेंज की क्षमता है। लेकिन इस हमले से दुनिया सन्न रह गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक 4000 किलोमीटर की रेंज ईरान को इंटरमीडिएट रेंज मिसाइल क्षमता के करीब ले जाती है। इसका मतलब है कि अब यूरोप के कई बड़े शहर जैसे पेरिस, बर्लिन और रोम भी संभावित दायरे में आ सकते हैं। जबकि लंदन भी खतरे से बाहर नहीं है। यह बदलाव बताता है कि खतरा अब सिर्फ खाड़ी देशों या इजरायल तक सीमित नहीं रहा। यदि इसकी पुष्टि होती है तो यह हमला केवल सैन्य कार्रवाई नहीं बल्कि एक बड़ा रणनीतिक संदेश भी माना जाएगा। सेंटर फॉर स्ट्रेटिजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के अनुसार ईरान के पास पश्चिम एशिया में सबसे बड़े और सबसे विविध मिसाइल का जखीरा है। इस जखीरे में कई लंबी दूरी की मिसाइलें शामिल हैं, जो इजरायल तक पहुंचने में सक्षम है। इनमें सेजिल, खुर्रमशहर और गद्र शामिल है। एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी मिसाइलें इजरायल तक तो तबाही मचा ही रही हैं पर अब यह दायरा बढ़ भी सकता है। ईरान के पास अलग-अलग प्रांतों में कम से कम 5 भूमिगत मिसाइल शहर भी हैं। ईरान के मिसाइल जखीरे में मोर्टार, रॉकेट, ड्रोन बैलिस्टिक और ाtढज मिसाइलें शामिल हैं। बता दें कि डिएगो गार्सिया ईरान से लगभग 4000 किलोमीटर दूर मध्य हिंद महासागर में भारत के दक्षिण और श्रीलंका के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। यह चोगास द्वीप समूह का सबसे बड़ा द्वीप हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थित दो महत्वपूर्ण अमेरिकी बमवर्षक लड़ाकू विमानों के बेस में से एक है। दूसरा अड्डा, गुआम में स्थित एंडरसैन वायुसेना अड्डा है। अमेरिका-ब्रिटेन संचालित किए जाने वाला सबसे ज्यादा रणनीतिक महत्व वाले बेहद गोपनीय मिलिट्री ठिकानों में से एक है। ईरान अगर यहां तक पहुंचा है तो यह एक बहुत महत्वपूर्ण घटपाम है। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 21 March 2026

नेतन्याहू की साजिशों का नतीजा

 
अगर ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध फैलता जा रहा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह नेतन्याहू की साजिशें हैं। यह सारी करी कराई नेतन्याहू की है। 28 फरवरी को सबसे पहला काम नेतन्याहू ने यह किया कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई और सर्वोच्च सैन्य कमांडरों, गुप्तचर प्रमुख इत्यादि को शहीद कर दिया। नेतन्याहू यही नहीं रूके। उन्होंने अगला निशाना बनाया ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारिजानी को मार डाला। यह इसलिए भी किया गया ताकि उस नेता को रास्ते से हटा दिया जाए जो एक उदारवादी, लायक और बीच-बचाव करके इस युद्ध को किसी तरह से रोकने में मदद कर सकता था और यही नेतन्याहू नहीं चाहते थे। लारिजानी ईरान के नंबर 2 नेता थे। यह ट्रांजिशनल काउंसिल के जरिए देश चला रहे थे। ईरान के संविधान के अनुच्छेद 111 के अनुसार सर्वोच्च नेता की मृत्यु या अक्षमता की स्थिति में एक परिषद देश चलाती है। लेकिन लारिजानी इन सबसे ऊपर थे। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर यानि सेना भी उनके आदेश मानती थी। संसद के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नीति सलाहकार के तौर पर अली लारिजानी को ट्रंप प्रशासन के साथ परमाणु वार्ता की रणनीति पर दिवंगत अयातुल्लाह खामेनेई को सलाह देने के लिए नियुक्त किया गया था। अली लारिजानी की हत्या के साथ-साथ नेतन्याहू ने जनरल गुलाम रजा सुलेमानी को भी मार डाला। रिवोल्यूशनरी गार्ड की वसीज सेना के वे प्रमुख थे। दरअसल नेतन्याहू ने सोचा था कि अगर वह ईरान की टॉप लीडरशिप को खत्म कर देंगे तो युद्ध जीतने में आसानी हो जाएगी, ईरान बिखर जाएगा। पर हुआ इसका उलटा। ईरानी आवाम हमदर्दी में सड़कों पर उतर आई। जो अयातुल्लाह निजाम से नाराज भी था वह भी निजाम के समर्थन में उतर गया। नेतन्याहू को शायद यह अंदाजा भी नहीं था कि ईरान का टॉप नेतृत्व अगर खत्म हो जाएगा तो इतनी जल्दी उसका विकल्प सामने आकर मोर्चा संभाल लेगा। जब इजरायल ने देखा कि यह तो मामला उलटा हो गया तो उसने नई साजिश रची। इस बीच यह संकेत भी आने लगे कि अमेरिकी राष्ट्रपति घरेलू दबाव के कारण इस युद्ध से हटने की तैयारी कर रहा है तो नेतन्याहू परेशान हो गए। याद रहे कि पिछले साल जब 12 दिनों तक युद्ध हुआ था तो सबसे पहले इजरायल ने ही हमला किया था। बाद में उसने अमेरिका को जबरदस्ती इस युद्ध में शामिल होने पर मजबूर किया था। जब बाजी हाथ से निकलते देख नेतन्याहू ने एक नई और निहायत खतरनाक चाल चली। उसने बिना अमेरिका से पूछे ईरान के सबसे बड़े ऊर्जा प्रतिष्ठानों में से एक बुराहट स्थित असलुयेह गैस प्लांट (साउथ पार्स) पर हमला कर दिया। इस कार्रवाई से ईरान का भड़कना स्वाभाविक ही था। उसने खाड़ी में मौजूद तेल और गैस ठिकानों की सैटेलाइट इमेज जारी कर चेतावनी दी कि इन इलाकों को तत्काल खाली करें। इजरायली हमले के जवाब में कतर के रास लफान की एलएनजी गैस फील्ड पर हमला कर दिया। यह कतर की मुख्य एलएनजी प्रोसेसिंग साइट है और देश के ऊर्जा नेटवर्क का अहम केंद्र है। सऊदी अरब ने कहा कि हालांकि उन्होंने कई ईरानी मिसाइलों को नष्ट कर दिया पर उसकी तेल भंडार के स्टारेज पर भी कुछ नुकसान हुआ है। रही सही कसर ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट को बंद करके पूरी कर दी। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापारिक रास्तों में से एक है। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी माना है कि उन्हें इस हमले (साउथ पार्स गैस फील्ड) के बारे में कुछ पता नहीं था। उन्होंने लिखा इजरायल इस बहुत जरूरी और कीमती साउथ पार्स फील्ड पर कोई और हमला नहीं करेगा। क्या यह बयान ट्रंप ने बेंजामिन नेतन्याहू को सुनाने के लिए दिया था? इससे साबित होता है कि जंग को आगे बढ़ाने के लिए नेतन्याहू अपनी साजिशों से बाज नहीं आ रहे हैं। 
-अनिल नरेन्द्र