Saturday, 14 March 2026

नेतन्याहू ने बुरा फंसाया ट्रंप को


ईरान युद्ध के बाद दुनियाभर में एक्सपर्ट अब ये बात कहने लगे हैं कि असल में इजरायल ने अपने हितों के लिए अमेरिका को बुरी तरह फंसा दिया है यानि कि नेतन्याहू ने डोनाल्ड ट्रंप को ऐसा फंसाया है कि अब उन्हें पीछे हटने का बहाना नहीं मिल रहा है। न केवल अमेरिका को ही फंसाया है बल्कि गल्फ के अन्य अरब देशों को भी फंसा दिया है। इससे धीरे-धीरे खाड़ी में अमेरिका के सहयोगी देश भी उससे नाराज हो रहे हैं। अमेरिका में हुए हालिया पोल्स कह रहे हैं कि अमेरिकी जनता इस ईरान युद्ध को अनावश्यक मान रही है, जो अमेरिका पर बुरी तरह आर्थिक बोझ को बढ़ाएगी। अमेरिका और इजरायल द्वारा मिलकर ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध को लेकर कई विश्लेषक सामने आ रहे हैं। युद्ध अब 15वें दिन में प्रवेश कर चुका है। इजरायल ने अमेरिका को ऐसा फंसाया है कि ट्रंप को समझ नहीं आ रहा है कि आगे क्या करें? विश्लेषक कह रहे हैं कि इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी हितों की बजाए इजरायल के विशेष उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अमेरिका को युद्ध में खींच लिया। कई विश्लेषकों का मानना है कि इजरायल ने ईरान के परमाणु कार्पाम को खतरे के रूप में पेश कर ट्रंप को युद्ध में उलझा दिया है। वास्तव में इजरायल के हित कहीं और हैं वे इस युद्ध के जरिए सबको भटकाना चाहता है। वास्तव में इजरायल का इस हमले के जरिए मुख्य उद्देश्य ईरान के साथ अमेरिकी कूटनीति को बाधित करना और गाजा में इजरायली कार्रवाइयों से वैश्विक ध्यान भटकाना था। नेतन्याहू का एक मकसद यह भी है कि उन पर चल रहे भ्रष्टाचार के केसों से इजरायली जनता का ध्यान भटकाना। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप डोनाल्ड को इजारयल की कार्रवाई में ाsढडिट लेने की चाहत ने फंसाया है। शुरू में तटस्थ रहने वाले ट्रंप ईरान पर हमले से बचते रहे पर नेतन्याहू के पास पता नहीं ट्रंप की कौन सी गुप्त कुंजी है कि न चाहते हुए भी ट्रंप ने ईरान युद्ध छेड़ दिया। मजबूरी में ट्रंप अब दावे कर रहे हैं कि हम ईरान के आकाश पर पूर्ण नियंत्रण रखते हैं। ऐसे दावे कर रहे हैं, जो इजरायल की आाढामकता को बढ़ावा दे रहा है। वह जबरदस्ती अमेरिका को एक लंबे अभियान में धकेल रहा है। जो अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाएगा। दरअसल अमेरिका ईरान का सही आकलन नहीं कर पाया। इजरायल और अमेरिका ने सोचा था कि ईरान जल्दी टूट जाएगा, लेकिन ईरानी मिसाइलों के हमलों और प्राक्सी समूहों की सािढयता ने संघर्ष को क्षेत्रीय बना दिया। सुप्रीम लीडर और ईरान के रहबर अयातुल्लाह खामेनेई की हत्या जैसे कदमों न सिर्फ दुनिया के शिया मुसलमानों को एक किया बल्कि तमाम सुन्नी भी अमेरिका-इजरायल के खिलाफ हो गए। अमेरिकी ठिकानों पर पूरे मध्य एशिया अरब मुल्को पर ईरान ताबड़तोड़ हमले कर रहा है। अमेरिका के 17 सैनिक अड्डों को तबाह कर दिया है और इजरायल का तो यह हाल है कि वहां के अखबार जेरुस्लम पोस्ट ने स्वीकार किया है कि 11 दिन की लड़ाई में इजरायल पर 9,115 मिसाइल, राकेट हमले हुए हैं और वहां की इंशोरेंस कंपनियों पर जो मुआवजे के दावे हुए हैं उनमें बताया गया है कि ईरानी-हिजबुल्लाह हमलों में 6,586 इमारतें तबाह हुई हैं। अब आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि एक इमारत में कितने लोग रहते होंगे जो या तो मारे गए या फिर घायल हुए। इजरायल में 1485 कारों को नष्ट कर दिया गया है, 1044 इक्विपमेंट तबाह हो चुके हैं। बता दें कि इजरायल में नुकसान की खबरों पर सेंसर लगा हुआ है। इसलिए सही से पता नहीं चल रहा है कि असल में कितना नुकसान हुआ है। यह तो जेरुस्लम पोस्ट के बीमा दावों का हवाला है। ट्रंप अब बाहर निकलने के रास्ते तलाश रहे हैं। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 12 March 2026

खामेनेई कभी मरते नहीं हैं


ईरान ने अपना सुप्रीम लीडर चुन लिया है। अयातुल्लाह अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई ईरान के नए सुप्रीम लीडर चुने गए हैं। दुनिया के स्वयंभू बादशाह सलामत डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की थी कि अयातुल्लाह अली खामेनेई की शहादत के बाद ईरान का अगला सुप्रीम लीडर कौन होगा यह मैं चुनूंगा। ईरान ने ट्रंप को मुंहतोड़ जवाब दिया है और साफ बता दिया है कि ईरान ट्रंप-नेतन्याहू के सामने झुकने वाला नहीं है। ईरान के सरकारी मीडिया ने बताया कि असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स 88 सदस्यीय धार्मिक संस्था है जिसकी जिम्मेदारी सुप्रीम लीडर को चुनने की है। संस्था द्वारा जारी एक बयान को ईरानी टीवी पर एंकर ने पढ़कर सुनाया। बयान में कहा गया कि युद्ध में बेहद गंभीर हालात और हमारी संस्था के खिलाफ दुश्मनों की सीधी धमकियों के बावजूद और असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के सचिवालय के दफ्तरों पर बमबारी से उसके कई कर्मचारियों और सुरक्षा टीम के सदस्यों के शहीद हो जाने के बावजूद ईरानी व्यवस्था के नेतृत्व के चयन और उसकी घोषणा की प्रािढया एक पल के लिए भी नहीं रूकी। इसके बाद एंकर ने नारा लगाया-अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर खामेनेई ही रहबर। अमेरिकी-इजरायल के हवाई हमलों में अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद कई लोगों को आशंका थी कि उनके बेटे मोजतबा खामेनेई भी मारे गए हैं। कई दिनों तक मोजतबा के बारे में कोई खबर नहीं आई। लेकिन तीन मार्च को ईरान की सरकारी मीडिया ने बताया कि मोजतबा जिंदा हैं और उन्हें ईरान का सर्वोच्च नेता चुन लिया गया है। बता दें कि मोजतबा खामेनेई ने तो कभी कोई सार्वजनिक भाषण दिया ही नहीं, न कोई सरकारी पद संभाला, न कोई साक्षात्कार दिया और उनकी बहुत कम तस्वीरें और वीडियो प्रकाशित हुए हैं। अमेरिकी राजनयिक दस्तावेजों में उन्हें पर्दे के पीछे असली ताकत बताया गया था। उनको शासन के भीतर एक सक्षम और दृढ़ नेता माना जाता है। 8 सितम्बर 1969 को ईरान के उत्तर पूर्वी शहर माशहद में जन्मे मोजतबा इमाम अली खामेनेई के 6 बच्चों में दूसरे स्थान पर हैं। मीडिया के मुताबिक 17 साल की उम्र में मोजतबा ने ईरान-इराक युद्ध के दौरान सेना में सेवा दी थी। मदरसों की व्यवस्था में अयातुल्लाह के पदवी का होना और धार्मिक कक्षाओं को पढ़ाना किसी व्यक्ति की विद्वत क्षमता और ज्ञान का प्रमाण माना जाता है। ये भविष्य में नेता चुने जाने की आवश्यक शर्तों में से एक है। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक जैसे ही नाम की घोषणा हुई, ईरान की सेना, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) और राजनीतिक नेताओं ने तुरन्त मोजतबा खामेनेई के प्रति निष्ठा की शपथ ली। आईआरजीसी ने बयान जारी करते हुए कहा हम नए नेता आयतुल्लाह सैय्यद मोजतबा खामेनेई के हुक्म का पालन करने और खुद को कुर्बान करने के लिए तैयार हैं। सेना के शीर्ष नेतृत्व ने भी अपनी पूरी वफादारी का वादा किया है। ईरान के नए सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह मोजतबा खामेनेई के सबसे शक्तिशाली पद संभालते ही ईरान ने इजरायल पर मिसाइलों से हमला किया। मानों यह संकेत था कि अयातुल्लाह अली खामेनेई की शहादत से भी उसकी रणनीति में कोई बदलाव नहीं आया बल्कि यूं कहें कि ईरान अब और शक्ति से हमला करेगा। यह इससे साबित होता है कि अयातुल्लाह मोजतबा खामेनेई के नेतृत्व में इस युद्ध में जबरदस्त नई मिसाइलों से हमला किया। देखना यह है कि क्या अयातुल्लाह मोजतबा खामेनेई अपने पिता अयातुल्लाह अली खामेनेई के उस फतवे को बदलेंगे जिसमें कहा गया था कि ईरान कोई परमाणु हथियार नहीं बनाएगा? 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 10 March 2026

ईरान पर हमले की कीमत?

 
डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ तो नेतन्याहू के उकसावे पर युद्ध तो शुरू कर दिया पर उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि यह लड़ाई लम्बी और महंगी पड़ सकती है। जो संघर्ष चार दिन में खत्म होने की भविष्यवाणी की जा रही थी वह आज दसवें दिन भी खत्म होना तो दूर की बात वह बढ़ती जा रही है। अमेरिका को सैनिकों की मौत और आर्थिक मार मार झेलनी पड़ रही है जिसका उसने कभी अनुमान भी नहीं लगाया होगा। डोनाल्ड ट्रंप ने अब संकेत दिया है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल की यह लड़ाई 4-5 हफ्ते तक चल सकती है। वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक सीएसआईएस और ािढस पार्क द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार ईरान के खिलाफ ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत जंग के पहले 100 घंटों में अमेरिका को लगभग 3.7 अरब डॉलर (करीब 31,000 करोड़ रुपए) खर्च उठाना प़ड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार युद्ध के शुरूआती 100 घंटों में अमेरिका का औसत खर्च लगभग 891 मिलियन डॉलर प्रतिदिन यानि करीब 90 करोड़ डॉलर रोज रहा है। शुरुआती चरण में सबसे अधिक खर्च महंगी मिसाइलों, हथियारों और बमों के इस्तेमाल पर हुआ है, इसलिए शुरुआती दिनों में लागत सबसे अधिक है। थिंक टैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि 1.7 अरब डॉलर पैट्रियट जैसे एयर डिफेंस इंटरसेप्टर सिस्टम पर खर्च किए गए हैं जबकि 1.5 अरब डॉलर मिसाइलों और अन्य आाढामक हथियारों पर किए गए हैं। इसके अलावा 125 मिलियन डॉलर लड़ाकू विमानों और हवाई अभियानों के परिचालन पर खर्च किए गए हैं। सीएसआईएस के मुताबिक खर्च में से केवल लगभग 200 बिलियन डॉलर ही पहले से अमेरिकी रक्षा बजट में शामिल था जबकि करीब 3.5 अरब डालर का खर्च अतिरिक्त है, जिसके लिए अलग से फंड की जरूरत पड़ सकती है। इसका मतलब है कि अमेरिकी रक्षा मंत्रालय को जल्द ही युद्ध जारी रखने के लिए अतिरिक्त बजट की मांग करनी पड़ सकती है। इसके अलावा कतर, जार्डन, यूएई में जो एयर डिफेंस के रडार व अन्य यंत्र जो तबाह हुए हैं जिनकी कीमत अरबों डॉलर रही है का तो हिसाब ही नहीं है। रिपोर्ट का अनुमान है कि युद्ध के पहले 100 घंटों में अमेरिका के 2000 से अधिक प्रकार के हथियार और मिसाइलों का इस्तेमाल किया है। इन हथियारों के स्टाक को दो बार भरने में लगभग 3.1 अरब डॉलर खर्च हो सकते हैं। थिंक टैंक ने अपने आंकलन में कहा है कि युद्ध का मानवीय नुकसान भी तेजी से बढ़ रहा है। ईरान में ही लगभग 1500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें 180 छोटी बच्चियां भी शामिल हैं जिनके स्कूल पर अमेरिका ने बहरीन से बम मारा। अमेरिका के कितने सैनिक मरे हैं यह संख्या भी बहुत हो सकती है। अमेरिका ने फिलहाल 6-7 सैनिकों के मरने की पुष्टि की है। पर ईरानी दावा कर रहे हैं कि यह संख्या सैंकड़ों में है। खर्च के अलावा, कुवैत में फ्रेंडली फायर की घटना में तीन अमेरिकी एफ-15 लड़ाकू विमान गिर गए। बता दें कि एक एफ-15 अत्याधुनिक फाइटर जेट की कीमत लगभग 800 करोड़ रुपए है। ईरान पर हमला करते वक्त अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप ने शायद यह सोचा भी नहीं होगा कि यह जंग उसे कितनी महंगी पड़ेगी। लड़ाई लंबी खिंचने और ईरानी जवाबी कार्रवाई ने ट्रंप की नींद उड़ा रखी है। आए दिन वह धमकियों पर उतर आए हैं। ट्रंप फंस तो गए हैं पर बाहर कैसे निकलें ये उन्हें समझ नहीं आ रहा है। खर्च के अलावा अंदरूनी राजनीतिक दबाव, एपस्टीन फाइल, सहयोगी अरब मुल्कों का दबाव यह सब अमेरिका और ट्रंप पर भारी पड़ रहा है। हताश होकर ट्रंप कोई ऐसा कदम न उठा लें जिससे पूरी दुनिया सकते में आ जाए? 
-अनिल नरेन्द्र

Friday, 6 March 2026

जंग तुम शुरू करोगे खत्म हम करेंगे


यह चेतावनी दी थी अयातुल्लाह अली खामेनेई ने शहीद होने से पहले। उन्होंने एक बार नहीं बार-बार यह चेतावनी दी और साथ ही कहा था कि अगर अमेरिका-इसरायल ईरान पर हमला करते हैं तो हम मुंह तोड़ जवाब देंगे। ऐसा जवाब देंगे जिसकी अमेरिका ने कभी कल्पना भी नहीं की हो। इतना ही नहीं अयातुल्लाह खामेनेई ने भी चेताया था कि अगर ईरान पर हमला होगा तो जवाबी कार्रवाई पूरे मध्य एशिया के देशों पर अमेरिकी सैन्य अड्डों पर भी होगी और यह क्षेत्रीय युद्ध में बदल जाएगा। इसके जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि हम 4 दिन में ईरान को घुटनों पर ला देंगे और नई सत्ता स्थापित कर देंगे। अब जंग के 7-8 दिन बाद वहीं ट्रंप अब यह कह रहे हैं कि यह जंग चार-पांच सप्ताह खिच सकती है। दरअसल अमेरिका फंस गया है। तालिबान अगर 20 साल बाद भी लड़ाई के बाद जिंदा रहा तो उसके पीछे उसकी रणनीति और अफगानिस्तान के भौगोलिक हालात थे। ईरान भी अमेरिका के लिए ऐसी ही चुनौती पेश करने वाला है। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में अपनी सेना भेजने से इंकार नहीं किया है। लेकिन यकीन मानिए अगर अमेरिकी सैनिक ईरान पहुंचते हैं तो वियतनाम और अफगानिस्तान की तरह उसे जलील होकर भागना पड़ सकता है। दशकों से खाड़ी देशों को अमेरिकी सुरक्षा को लेकर भ्रम बना हुआ था। लेकिन आसमान से बरसती ईरानी मिसाइलों ने उस भरोसे को तोड़ दिया है। ईरान ने खाड़ी के देशों यूएई, सऊदी अरब, कुवैत और बहरीन में जमकर मिसाइले मारी हैं और अमेरिकी टारगेट्स को नष्ट किया है। ईरानी हमलों का मकसद और संदेश साफ था कि जो देश अमेरिकी सेना को हमले के लिए अपनी जमीन दे रहे हैं उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराधची ने कहा है कि तेहरान ने इस इलाके में दुश्मनों के मिलिट्री बेस पर हमला करके शुरुआत की है। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि युद्ध अगले 4-5 हफ्तों तक और चल सकता है। जिससे मध्य-पूर्व में और तबाही फैलने की आशंका बढ़ गई है। अयातुल्लाह खामेनेई की हत्या के बाद मध्य-पूर्व के कई देशों में स्थित अमेरिकी ठिकाने पर ताबड़तोड़ ईरानी हमले हो रहे हैं। इनमें सऊदी अरब में अमेरिकी दूतावास, कतर के अल उदीद एयरबेस, बहरीन में अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े के मुख्यालय और दुबई के कई होटलों और महत्वपूर्ण सैन्य इमारतों पर हमले यह दर्शाते हैं कि अब जंग पूरे मध्य-पूर्व में फैल चुकी है। अमेरिकी-सऊदी के आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए ईरान ने वहां की सबसे बड़ी अरामको रिफाइनरी पर बम बरसाए। ये हमले इतने खतरनाक है कि अमेरिका ने मध्य-पूर्व में अपने दूतावासों को बंद कर दिया है। इसके अलावा अमेरिका ने इजरायल से अपने नागरिकों को निकालने को लेकर हाथ खड़े कर दिए हैं। अमेरिका और इजरायल ने पहले ही हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई को मार दिया था और ट्रंप को उम्मीद थी कि सिर काटने से सिस्टम गिर जाएगा लेकिन हुआ उल्टा। सड़कों पर बगावत नहीं, खामेनेई के लिए लाखों मातम करते दिखे। सड़कों पर बगावत नहीं, उल्टा सरकार का बढ़ता समर्थन दिखा और इंतकाम लेने के इरादे दिखे। सत्ता ढही नहीं, बल्कि ईरान ने पूरे मध्य-पूर्व को हिला दिया। अब ट्रंप भी समझ गए हैं कि जंग लम्बी चलेगी। कुछ विशेषज्ञों का दावा है कि इस जंग की तैयारी ईरान पिछले 40 सालों से कर रहा था और वह लम्बी लड़ाई लड़ने की क्षमता रखता है। वहीं दूसरी ओर अमेरिकी सैनिकों के बॉडी बैग अमेरिका पहुंचने शुरू हो चुके हैं। देखना यह होगा कि अब यह जंग क्या रूप अख्तियार करती है? संकेत साफ हैं कि यह आग और फैलने वाली है और विनाशकारी होगी। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 3 March 2026

अयातुल्लाह खामेनेई की शहादत


मैं सबसे पहले ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को अपनी श्रद्धांजलि पेश करना चाहता हूं। दुनिया अयातुल्लाह खामेनेई की शहादत को याद रखेगी। उनकी बहादुरी की मिसाल शहादत के हर पा में अव्वल रहेगी। वह यह जानते थे कि वह अमेरिका और इजरायल के निशाने पर हैं और उन पर किसी भी क्षण हमला हो सकता है। फिर भी वह तेहरान छोड़कर नहीं भागे। न तो किसी बने शैल्टर में गए और न ही किसी गुप्त स्थान पर। उन्होंने अपने दफ्तर में काम करते हुए शहादत को गले लगाना चुना। वह अपने देश के लिए कुर्बान हो गए पर दुश्मन के सामने पीठ नहीं दिखाई। बेशक आज डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू खामेनेई को मारकर विजेता होने का दावा कर रहे हैं। लेकिन उन्होंने खामेनेई की हत्या करके बड़ा जोखिम मोल ले लिया है। खामेनेई की शहादत ने सारे ईरान व इस्लामी जगत को अमेरिका और इसरायल के खिलाफ खड़ा कर दिया है। उसके नतीजे सामने आने भी लगे हैं। कुवैत, यूएई, कतर, बहरीन पर ईरानी मिसाइलें गिर रही हैं। यूएई पर तो इस लेख लिखने तक 167 मिसाइलें गिर चुकी हैं। ईरानी पलटवार का कहर सबसे ज्यादा यूएई पर टूटा है। यूएई के रक्षा मंत्रालय ने कहा, ईरान की तरफ से देश के कई हिस्सों में अब तक 165 बैलिस्टिक मिसाइल, 2 ाtढज मिसाइल और 541 ईरानी ड्रोन से हमला किया जा चुका है। इनमें से 506 को हवा में रोककर नष्ट कर दिया गया, जबकि 35 देश के अन्य इलाके में गिरी। दुबई विशेष टारगेट पर है क्योंकि यहां अमेरिकी कंपनियों के मुख्यालय हैं और ईरान अमेरिका की आर्थिक ताकत को भारी नुकसान पहुंचाता है। इसलिए वह ऐसे स्थानों पर हमले कर रहा है जहां अमेरिका की सबसे बड़ी कंपनियां हैं। अयातुल्लाह अली खामेनेई मारे कैसे गए? यह प्रश्न सब पूछ रहे हैं। क्या कोई मोसाद-सीआईए का स्लीपर एजेंट था जिसने सटीक जानकारी दी थी कि खामेनेई किस समय कहां होंगे और मीटिंग में कौन-कौन होगा? बिना इस सटीक जानकारी के यह हमला संभव ही नहीं था। फिर सवाल यह भी उठता है कि ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम क्या कर रहे थे? वह इस मिसाइल या बमों को इंटरसेप्ट क्यों नहीं कर सके? क्या अमेरिका ने ईरान के राडार हमले से पहले जाम कर दिए थे? इसरायल के एफ-35 फाइटर जेट्स ने ईरान एयर डिफेंस को भेदते हुए तेहरान में खामेनेई बेत-ए-रहबरी पैलेस पर दो हजार किलो के 40 बंकर बस्टर बम गिराए। ये लेजर गाइडेड पैनिट्रेटर है यानि पैलेस के अंडरग्राउंड में भी छिपे खामेनेई को मार गिराया जा सके। इजरायली सेना ने कई तरह की मिसाइलों से भी हमला किया। हमले में रक्षा मंत्री अजीज नासिरजादेह, आर्मी चीफ आमिर हातामी और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के चीफ मोहम्मद पाकपुर समेत लगभग 40 आला अफसर और धार्मिक नेता मारे गए। सूत्रों के अनुसार इनमें से लगभग 15 खामेनेई के पैलेस में एक मीटिंग के लिए जमा हुए थे। अमेरिका और इजरायल चाहता है कि ईरान में निजाम यानि रजीम चेंज हो। देखना यह होगा कि वह अपने इस उद्देश्य में कितना कामयाब रहता है। फिलहाल तो ईरान की बदले की कार्रवाई से बचने का प्रयास हो रहा है। तेहरान ने बड़ी जवाबी कार्रवाई में कुवैत, कतर और बहरीन में अमेरिका के कई बड़े मिलिट्री बैस पर बैलिस्टिक मिसाइल दागी हैं। इनमें नुकसान की खबर भी आई है। सऊदी अरब और जार्डन में भी हमले की खबर है। अयातुल्लाह खामेनेई मरने से पहले ही दूसरी पंक्ति खड़ी करके गए थे। ईरान ने हमले के तुरन्त बाद ही जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी है। देखें, यह जंग आगे कितनी बढ़ती है, कहीं यह तीसरे विश्व युद्ध की शक्ल तो नहीं लेता? 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 28 February 2026

मोदी की इजरायल यात्रा और अरब मीडिया


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इजरायल यात्रा, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ उनके करीबी रिश्ते और इजरायली संसद में दिया गया उनका भाषण इन सबकी चर्चा अरब मीडिया में खूब हो रही है। अरब मीडिया इस यात्रा को सिर्फ भारत-इजरायल संबंधों के तौर पर नहीं बल्कि बड़े क्षेत्रीय समीकरणों के तौर पर पेश कर रहे हैं। कई अरब विश्लेषकों ने पा किया है कि जहां ऐतिहासिक रूप से भारत टू नेशन थ्योरी की बात कहता है और फिलस्तीनी क्षेत्र में शांति प्रयासों का समर्थन करता है, वहीं मोदी की लीडरशिप में वो इजरायल के बेहद नजदीक आ चुका है। अरब मीडिया इस बात पर भी फोकस कर रहा है कि भारत का मौजूदा स्टैंड इजरायल और फिलस्तिनियों के संबंध में उसके पारम्परिक स्टैंड से अलग दिशा में जा रहा है। जहां पहले भारत की विदेश नीति में इस बात पर जोर था कि इजरायल और फिलस्तीनी महत्वकांक्षा, दोनों से ही समान दूरी बनाए रखेगा, वहीं अब भारत की विदेश नीति के केंद्र में हित आधारित संबंध ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। अरब मीडिया के मुताबिक भारत अपने पड़ोसियों से तनावपूर्ण रिश्तों और अपनी सैन्य जरूरतों के मद्देनजर आज वो इजरायल के ज्यादा नजदीक जा रहा है। अरब मीडिया ने प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा के पा के साथ-साथ गाजा में इजरायल पर लगे नरसंहार के आरोपों को भी हाइलाइट किया। साथ ही भारत के विपक्षी नेताओं की उन टिप्पणियों को भी अपनी कवरेज में शामिल किया है जिनमें वो इजरायल पर लगे इन आरोपों के मद्देनजर पीएम की यात्रा का विरोध कर रहे हैं। अल जजीरा के इजरायल-फिलस्तीन मामलों के जानकार अन्जाम अबु अल अदस कहते हैं कि भारतीय प्रधानमंत्री की ये यात्रा गहरे रणनीतिक बदलाव का प्रतीक है। भारत-इजरायल साझेदारी इस क्षेत्र में एक नए क्षेत्रीय ध्रुवीकरण को जन्म देगी। आने वाले समय में मध्य पूर्व और एशिया की राजनीति में भारत-इजरायल की अहम भूमिका होगी। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी अपने भाषण में भारत के साथ सैन्य साझेदारी का संकेत दिया। इससे साफ है कि इस क्षेत्र में पाकिस्तान, तुर्की व सउदी अरब के संभावित गठबंधन को चुनौती पेश करने के लिए भारत और इजरायल सहयोगी देशों के रूप में नजदीक आ रहे हैं। भारत इजरायल के साथ इस गठबंधन को पाकिस्तान के साथ अपने क्षेत्रीय संघर्ष और एशिया में अपनी सैन्य, कूटनीतिक स्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। वहीं अल जजीरा ने मोदी के इजरायली संसद में दिए गए संबोधन पर लिखा ः गाजा में इजरायल पर नरसंहार के गंभीर आरोपों के बावजूद भारत ने इजरायल से एकजुटता दिखाई और प्रधानमंत्री मोदी ने गाजा में इजरायल के विनाशकारी युद्ध का बचाव करते हुए कहा कि इजरायल के साथ खड़ा है। भारत में अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने के लिए मोदी सरकार हिंदू राष्ट्रवाद का सहारा ले रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हमास के हमले का पा करते हुए कहा, हम आपका दर्द महसूस करते हैं, आपका दुख समझते हैं। कारण कोई भी हो नागरिकों की हत्या को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। गल्फ न्यूज ने भारत में नरेन्द्र मोदी की इस यात्रा की जिन विपक्षी नेताओं ने विरोध किया उसे भी कवर किया है और कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी के उस बयान को जगह दी है जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी इजरायली संसद में इजरायल के गाजा में किए गए नरसंहार का भी पा करेंगे। लंदन बेस्ड द न्यू अरब लिखता है कि मोदी एक कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी नेता है। जिन्होंने 7 अक्टूबर के हमले के बाद सबसे पहले इजरायल के साथ एकजुटता दिखाई थी। लेकिन भारत उन 100 से ज्यादा देशों में भी शामिल है जिन्होंने हाल ही में इजरायल के वेस्ट बैंक पर नियंत्रण के प्रयासों की और फिलस्तीनी प्राधिकरण के सीमित शक्तियों को कमजोर करने के इजरायल के इजरायल के प्रयासों की निंदा भी की है। इस समय यात्रा का क्या यह मतलब निकाला जाए कि भारत की विदेश नीति में भारी परिवर्तन आ रहा है। भारत को अब अरब देशों के रिएक्शन की कोई चिंता नहीं है? 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 26 February 2026

ट्रंप की धमकी, रमजान की रौनक


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हमले की लगातार धमकियों के बीच ईरान में रमजान को लेकर उत्साह में कोई कमी नहीं दिख रही है। स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार ईरान के भीतर सार्वजनिक जीवन नियमित रूप से चल रहा है। उधर ईरान से सटे इलाके में अमेरिकी सेना की लगातार बढ़ती तैनाती अब सिर्फ संकेत देने तक सीमित नहीं लगती बल्कि ये वास्तविक जंग के स्पष्ट संकेत हैं। अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस अब्राहिम लिंकन और यूएसएस फोर्ड के ईरानी जल क्षेत्र के पास पहुंचने से स्थिति बहुत गंभीर बनी हुई है। इसके अलावा सैकड़ों अमेरिकी फाइटर जेट व अन्य साजोसामान भी इस इलाके में पिछले कुछ दिनों में लाए गए हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका-इजराइल यहां कई स्तरों पर सैन्य कार्रवाई के लिए विकल्प तैयार कर रहे हैं। ईरान में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि ट्रंप अपनी बात मनवाने के लिए सैन्य दबाव बढ़ा रहा है। जंग की आहट के बावजूद ईरान में सब सामान्य दिख रहा है। मस्जिदों में विशेष नमाज, बड़े इफ्तार आयोजन और सदका-फितर प्रमुखता से हो रही है। इस्लामिक रिपब्लिकन न्यूज एजेंसी ने रमजान के अवसर पर राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन का संदेश प्रकाशित किया है। इसमें उन्होंने इस महीनों को आत्मचिंतन और एकजुटता का समय बताया। उन्होंने कहा कि दुनिया की शक्तियां हमें अपना सिर झुकाने के लिए साजिश कर रही है... लेकिन वे हमारे लिए जो भी समस्याएं पैदा करें, हम अपना सिर नहीं झुकाएंगे। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई ने अमेरिका को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि अगर अमेरिका हमला करता है तो इससे पश्चिम एशिया में एक क्षेत्रीय (रीजनल) युद्ध छिड़ सकता है, तनाव और अधिक बढ़ सकता है। खामनेई ने कहा कि ईरान उकसाने की नीति नहीं अपनाता लेकिन उन्होंने साफ किया कि ईरानी राष्ट्र पर अगर कोई हमला या उत्पीड़न किया गया तो ईरान ऐसा कडा जवाब देगा जिसका अमेरिका-इजराइल को अंदाजा नहीं। हम पर कोई भी स्ट्राइक हो चाहे वह लिमिटेड स्ट्राइक ही क्यों न हो पर उसका पूरी ताकत से जवाब देंगे। मध्यपूर्व के तमाम अमेरिकी सैन्य बेसों सहित उनके युद्धपोत भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार अपनी शर्तें बदल रहे हैं। पहले उन्होंने तीन शर्तें रखी थीं: ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम खत्म करे, अपनी मिसाइलों की प्रोडक्शन और क्षमता कम करे। ईरान से अमेरिका की इस सिलसिले में दो बार जेनेवा में वार्ता विफल हो चुकी है। अब तीसरे और अंतिम राउंड की बात हो रही है। इस बीच डोनाल्ड ट्रंप ने अब कहा है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। अमेरिका इन तरीकों से ईरान को घेरने की युद्ध नीति पर काम कर रहा है। जंगी जहाजों की तैनाती, अरब सागर में तैनात अमेरिका के विशाल विमान वाहक पोतों को घेरने की है। पहले बड़ी संख्या में टैंक से जहाजों के सुरक्षा सिस्टम को उलझाएंगे, ताकि वे मिसाइल को रोकने में कामयाब रहें। दूसरीः खाड़ी देशों के मौजूद अमेरिका के 19 ठिकानों पर करीब 50,000 सैनिक किसी भी समय हमले में भाग ले सकते हैं। हालांकि यही सैनिक ईरान के निशाने पर होंगे। तीसरीः तेल सप्लाई रोकना। अमेरिका इस प्रयास में है कि ईरान किसी भी देश को अपने यहां से तेल सप्लाई न कर सके ताकि उसकी आर्थिक स्थिति बिगड़े। उसने भारत पर भी दबाव डाला है कि भारत ईरान से तेल लेना बंद करे। इस बीच इजराइल से एक अपुष्ट खबर सोशल मीडिया पर चल रही है कि इजराइल ने अब चेतावनी दी है कि अगर उसके अस्तित्व पर खतरा हुआ तो वह ऐसे हथियार चलाएगा जो अभी तक इस्तेमाल नहीं हुए। इशारा साफ है कि परमाणु बम का इस्तेमाल भी कर सकता है। कुल मिलाकर बड़ी विस्फोटक स्थिति बनी हुई है। उम्मीद की जाती है कि जंग टले क्योंकि अगर यह होती है तो इसका असर पूरे विश्व पर पड़ सकता है।
- अनिल नरेन्द्र