Translater
Tuesday, 1 September 2026
कॉकरोच पीछे नहीं हटेंगे
Saturday, 29 August 2026
मोहन भागवत का विरोध
Thursday, 27 August 2026
नृपेंद्र मिश्र बनाम चंपत राय
Tuesday, 25 August 2026
महंगी चीनी : क्या वजह इथेनॉल तो नहीं?
Saturday, 22 August 2026
अमेरिका-ईरान जंग का न्यूक्लियर होने का खतरा
Thursday, 20 August 2026
जिंदा पकड़ो या मारो: मिलेंगे 30000
Tuesday, 18 August 2026
जिंदा हैं मुजतबा खामेनेई
Saturday, 15 August 2026
भाग ट्रंप भाग
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पुष्टि की है कि पिछले महीने तुर्किए में नाटो सम्मेलन से रवाना होते समय उन्होंने चुपचाप जेम्स बांड स्टाइल में विमान बदल लिया था। ऐसा संभावित खतरे की वजह से किया गया था। ट्रंप ने मंगलवार को पत्रकारों से कहा कि मैं सीक्रेट सर्विस और सेना की बात मानता हूं। वह चाहते थे कि मैं दूसरी उड़ान और दूसरे विमान से जाऊं। मुझे वही करना था, जो उन्होंने कहा। ट्रंप ने यह भी स्वीकार किया कि वह छिपकर अपने विमान एयरफोर्स वन से भागकर एक दूसरे विमान से निकले। यह बताना जरूरी है कि छिपकर भागने से पहले उन्होंने न तो मार्को रूबियो, अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को विमान बदलने का प्लान बताया और न ही उनके साथ गए पत्रकारों को। यह दर्शाता है कि उनकी नजरों में इनकी कीमत क्या है। खैर, मैं आपको पूरी कहानी बताता हूं कि हुआ क्या। डोनाल्ड ट्रंप पिछले महीने तुर्किए में नाटो शिखर सम्मेलन में गए थे। नाटो सम्मेलन से निकलते समय ईरान के संभावित खतरे को देखते हुए ट्रंप ने गुपचुप तरीके से विमान बदल लिया। वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति टेलीविजन कैमरों की मौजूदगी में एयरफोर्स वन में सवार हुए, फिर उन्हें चुपके से एक ऊंचे एयरपोर्ट केटरिंग (खाने के) ट्रफ में ले जाया गया और एक अन्य सैन्य विमान में पहुंचाया गया। इस दौरान एयरफोर्स वन विमान में सवार पत्रकारों और व्हाइट हाउस के कुछ कर्मचारियों व मंत्री मार्को रुबियो को इसकी जानकारी तक नहीं मिली। अधिकारियों ने सीबीएस न्यूज व बीबीसी को बताया कि अमेरिका ने विमान पर मिसाइल दागने की ईरान की विश्वसनीय धमकी का पता लगाया था। हालांकि व्हाइट हाउस ने इस गुप्त तरीके से विमान बदलने की पुष्टि नहीं की। हालांकि बाद में खुद ट्रंप ने इसकी पुष्टि कर दी। आखिरी समय में विमान बदलने के इस फैसले से सवाल उठे हैं कि क्या जिस विमान को दिखावे के लिए इस्तेमाल किया गया था, उसमें मौजूद लोगों को खतरे में ही छोड़ दिया गया था। विमान में सवार पत्रकारों और व्हाइट हाउस के अधिकारियों को पता नहीं था कि संभावित ईरानी खतरे के जवाब में एक योजना के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को वहां से चुपचाप निकाल लिया गया था। ट्रंप पहले कह चुके हैं कि अंकारा में हुए सम्मेलन के दौरान वह ईरान के टारगेट नम्बर वन थे। ट्रंप ने मंगलवार को कहा, मेरा अनुमान है कि कोई खतरा था। मैंने इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मांगी। मुझे बहुत सारी धमकियां मिलती हैं, जिनके बारे में आपको शायद पता भी नहीं हो। पिछले महीने की यह गुप्त कार्रवाई तब हुई जब युद्ध खत्म करने की बातचीत टूटने के बाद अमेरिका ने ईरान पर फिर से हमले शुरू किए थे। इसके एक दिन बाद ट्रंप ने विमान बदला था। ट्रंप कतर की ओर से दिए गए विमान नया बोईंग 747-8 से तुर्किए पहुंचे थे। लेकिन उन्होंने कहा था कि वह पुराने समय की याद में पुराने एयरफोर्स वन से वापस जाएंगे। 8 जुलाई को उन्होंने कैसे डर के मारे विमान बदला यह सबने देखा ही है। अखबार के मुताबिक रक्षामंत्री पीर हेगसेथ भी अलग से बाहरी सीढ़ियों के जरिए सी-32ए में सवार हुए। उधर एयरफोर्स वन पर बैठे पत्रकारों से कहा गया कि वह खिड़कियों के पर्दे बंद रखें। शायद इसलिए कि वह बाहर का दृश्य न देख सकें। वह यह न देख सकें कि राष्ट्रपति ट्रंप विमान के गुप्त दरवाजे से विमान छोड़ चुके हैं। इसलिए कहा, भाग ट्रंप भाग।
-अनिल नरेन्द्र
Thursday, 13 August 2026
होर्मूज में अमेरिकी जहाजों की तैनाती
अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाते हुए मिडल ईस्ट में 20 से ज्यादा युद्धपोत तैनात कर दिए हैं और होर्मूज जलडमरूमध्य में नाकाबंदी सख्त कर दी है। ईरान ने जलमार्ग को खोलने के लिए मुआवजा, प्रतिबंध हटाने और ब्लॉकेड खत्म करने जैसी शर्तें रखी हैं। ओमान के साथ संभावित समझौता अंतिम चरण में है, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव अभी भी चरम पर बना हुआ है। अमेरिका ने मिडल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाते हुए 20 से ज्यादा युद्धपोत तैनात कर दिए हैं। यह कदम ईरान पर नाकाबंदी को सख्ती से लागू करने में होर्मूज में बढ़ते तनाव के बीच उठाया गया है, जहां वैश्विक तेल सप्लाई की सबसे अहम लाइन गुजरती है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने सोमवार को एक्स पर एक पोस्ट में बताया कि ये युद्धपोत सीधे तौर पर ईरान के खिलाफ लगाए गए ब्लॉकेड को लागू करने के मिशन में लगे हैं। तैनात जहाजों में अमेरिकी नेवी का डेस्ट्रॉयर यूएसएस रॉस भी शामिल है, जिसके जरिए समुद्री निगरानी और इंटरसेप्शन ऑपरेशन चल रहे हैं। सेंटकॉम ने इसी की तस्वीर शेयर की थी। सेंट्रल कमांड ने दावा किया है कि 9 अगस्त तक 55 कमर्शियल जहाजों को रास्ता बदलने पर मजबूर किया गया, 2 जहाजों को रोका गया और 2 पर चढ़कर जांच की गई। यह साफ संकेत है कि अमेरिका सिर्फ चेतावनी नहीं दे रहा, बल्कि सीधे तौर पर समुद्र में नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। उधर, ईरान-अमेरिका युद्ध में सबसे बड़ी लेकिन अनदेखी मानवीय त्रासदियों में से एक समुद्र के बीच फंसे हजारों नाविक हैं। संयुक्त राष्ट्र की समुद्री एजेंसी (आईएमओ) के मुताबिक करीब 6000 नाविक अब भी फारस की खाड़ी में जहाजों फंसे हैं। कई नाविक तो चार महीने से घर नहीं लौट पाए हैं। मैं यूएसएस अब्राहम लिंकन बाबत एक ऐसी ही रिपोर्ट पढ़ रहा था। उसमें बताया गया था कि पिछले लगभग 200 दिनों से ज्यादा समय से यह समुद्री जहाज समुद्र में हैं। जहाज के अंदर अब तो खाने की कमी हो गई है। दवाएं कम हो गई हैं। टायलेट खराब हो चुके हैं इत्यादि इत्यादि। जहाज के डॉक्टर अब कहने लगे हैं कि अगर जल्द यह सैनिक घर नहीं लौटे तो इनमें से कई मनोवैज्ञानिक शिकार हो जाएंगे। वैसे भी देखा जाए जब लिंकन में ऐसी भयावह स्थिति बनी है तो उस पर तैनात लगभग 5000 सैनिक युद्ध कैसे लड़ेंगे। कई नाविकों का बाहरी संपर्क लगभग टूट चुका है। उन्हें हर कुछ में दिन में सिर्फ 30 मिनट इंटरनेट मिलता है। कुछ जहाजों पर सीमित राशन होने से नाविक दिन में सिर्फ एक बार चावल और दाल खा रहे हैं। लगातार मिसाइल या ड्रोन हमले के खतरे के खौफ में नींद भी पूरी नहीं कर पाते। कई लोग इस तैयारी के साथ सोते हैं कि हमला होते ही भाग सकें। विशेषज्ञों के मुताबिक, नाविक जहाज को नहीं छोड़ सकते हैं। सुरक्षित निकासी बेहद मुश्किल है और कई नाविक अल्पकालिक अनुबंध पर हैं। उन्हें डर है कि यदि वे खतरनाक ड्यूटी छोड़ने की मांग करते हैं तो उन्हें दोबारा नौकरी नहीं मिलेगी। युद्ध के बीच फंसे नाविकों की मानसिक सेहत, नींद और आर्थिक स्थिति पर भी गंभीर असर पड़ा है। युद्ध की शुरुआत में 36-38 भारतीय जहाजों पर 1,100 भारतीय नाविक होर्मूज के आसपास फंस गए थे। बाद में अधिकांश जहाज निकल गए। सूत्रों के मुताबिक 125 भारतीय नाविक अभी भी 6 भारतीय जहाजों पर फारस की खाड़ी में मौजूद हैं।
-अनिल नरेन्द्र
Tuesday, 11 August 2026
और अब इस्लामिक नाटो
हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के बीच मक्का पाइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए हैं, जिसके तहत अगर तीनों में से किसी एक देश पर हमला होता है तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। इस समझौते का मकसद रक्षा सहयोग बढ़ाना, साझा सुरक्षा रणनीति बनाना और क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच सामूहिक ताकत दिखाना है। विश्लेषकों का मानना है कि यह गठजोड़ पश्चिम एशिया में बदलते हालात, खासतौर पर ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते टकराव के बीच एक नए पावर ब्लाक के रूप में उभर सकता है। इस्लामिक नाटो मुस्लिम बहुल देशों के बीच एक प्रस्तावित या अनौपचारिक सैन्य गठबंधन को दिया नाम है, जिसकी तुलना पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन नाटो से की जाती है। इस समझौते के पीछे प्रमुख भूमिका सऊदी अरब की है। वह एक तरफ ईरान के हमलों से परेशान है और दूसरी तरफ हाल ही में यमन के हूतियों के साथ जबर्दस्त संघर्ष छिड़ने से। ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों खाड़ी क्षेत्रों में, जहाजरानी में व्यवधान और संघर्ष के पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैलने की आशंकाओं ने सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताएं बढ़ा दी हैं। दशकों तक रियाद अपनी सुरक्षा के लिए मुख्य रूप से अमेरिका पर निर्भर था पर 28 फरवरी के बाद उसने देख लिया कि अमेरिका तो अपने सुरक्षा ठिकानों को बचा नहीं पा रहा है तो वह सऊदी अरब को कैसे बचाएगा। रहा सवाल पाकिस्तान का तो सऊदी अरब का पहले से ही पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता हो रखा है पर क्या पाकिस्तान सऊदी अरब को ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों से बचा सका? क्या पाकिस्तान सऊदी अरब पर हमला होने पर ईरान पर हमला कर सकता है? यह सब नाटकबाजी है। रहा सवाल इजरायल और अमेरिका का तो इजरायइल इस समझौते का जमकर विरोध कर रहा है और इसे अपने लिए खतरा मानता है। सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि अगर इजरायल सऊदी या तुर्किए पर हमला करता है तो क्या जनरल असिम मुनीर में इतनी हिम्मत है कि वह अमेरिका के खिलाफ जाकर इजरायल पर हमला करें? यह सिर्फ पैसे ऐंठने का खेल है। फक्कड़ हुआ पाकिस्तान कहीं से भी भीख मांगने को तैयार है और इसके एवज में जो चाहे वादा करवा लो? रहा सवाल ईरान का तो राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने मुस्लिम एकता की अपील करते हुए कहा कि शिया-सुन्नी को साथ रहना चाहिए। पेजेश्कियन ने कहा है कि अमेरिका और इजरायल मिलकर फारस की खाड़ी के देशों को ईरान के खिलाफ करने की कोशिश कर रहे हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि सऊदी अरब तुर्किए और पाकिस्तान तीनों ही देश सुन्नी बाहुल्य हैं, वहीं ईरान शिया देश है। क्या यह भारत के लिए चिंता की बात है? विश्लेषक कहते हैं कि इस डिफेंसपैक्ट का भारत पर सीधे तौर पर कोई असर नहीं होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि सऊदी अरब पहले भी कहता रहा है कि पाकिस्तान हमारा महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी है, लेकिन कभी उसने भारत से जंग के मौके पर साथ नहीं दिया। जहां तक तुर्किए का सवाल है वह तो आपरेशन सिंदूर में भी खुलेआम पाकिस्तान के साथ था और आगे भी रहेगा। भारत के लिए चिंता की बात नहीं है क्योंकि भारत डिफेंस क्षमता में तीनों से आगे है।
-अनिल नरेन्द्र
Saturday, 8 August 2026
क्या पाकिस्तान अंदर से टूट रहा है?
Thursday, 6 August 2026
फिर पलटे ट्रंप ईरान से मानसिक युद्ध
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर बड़े हमले की धमकी के बाद एक बार फिर पलट गए हैं। ट्रंप की यह तो पलटने की आदत बन गई है। यह नौवीं बार है जब ट्रंप धमकी देकर पलटे हैं। यही वजह है कि अब उनकी धमकी को कोई गंभीरता से नहीं लेता बल्कि उनका खुलेआम मजाक उड़ाया जाता है। ट्रंप ने दावा किया कि पश्चिम एशिया के सहयोगी देशों ने ईरान के साथ जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए एक समझौते की रूपरेखा पर सहमति बना ली है। फिलहाल वह पांच महीने से जारी इस संघर्ष में ईरान पर नए सैन्य हमले का आदेश नहीं देंगे। उधर, ईरान ने ट्रंप की धमकियों को मानसिक युद्ध बताया है। ट्रंप ने शनिवार को कहा कि ईरान के साथ समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य को तत्काल व पूरी तरह खोलना व उसके परमाणु खतरे का अंत शामिल होगा। उन्होंने कहा कि इस अनुरोध के आधार पर मैंने दुनिया के भविष्य के हित में फिलहाल हमलों को रोकने पर सहमति दी है। बशर्ते कि शीघ्र ही कोई समझौता हो सके। ट्रंप ने समझौते में इजरायल की सहमति की बात कही। क्या ट्रंप ईरान पर परमाणु हमला करने की सोच रहे हैं? जब ट्रंप यह कहते हैं कि मैंने दुनिया के भविष्य को खतरे में डालने से बचाने के लिए फिलहाल ईरान पर हमले रोकने का फैसला किया है तो इसका मतलब हम यह निकालें कि ट्रंप ईरान पर एटम बम मारने की सोच रहे हैं? वैसे भी ट्रंप इतनी बार अपने बयानों से पलटे हैं कि अब उन्हें शायद ही कोई गंभीरता से लेता हो? ईरान ने ट्रंप के हमलों को टालने के फैसले का मजाक उड़ाया है। ईरानी मीडिया ने ट्रंप के दावों को झूठ बताते हुए कहा कि तेहरान ने कभी हमले रोकने की अपील नहीं की। ईरानी मीडिया ने ट्रंप के दावों को झूठ बताते हुए कहा कि अमेरिका की मिसाइलों की कमी और बढ़ते दबाव के कारण ट्रंप पीछे हटे हैं। ट्रंप के दावों को खारिज करते हुए कहा कि अमेरिका ने अपनी कमजोरी छिपाने के लिए पूरी कहानी गढ़ी है। ट्रंप की हवा एक बार फिर ईरान ने निकाल दी। यह पहली बार नहीं है। पहले भी 5 बार ट्रंप धमकी देकर अपने कदम पीछे कर चुके हैं। ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी फार्म ने ट्रंप पर तंज कसते हुए लिखा कि मूर्ख ट्रंप की सारी हवा निकल गई। वहीं मेहर न्यूज एजेंसी ने कहा कि ट्रंप ने एक बार फिर अपनी खोखली धमकियों से पीछे हटकर उसे दुनिया के सामने एहसान की तरह पेश करने की कोशिश की है। मेहर ने सैन्य सूत्रों के हवाले से दावा किया कि ईरानी सेना पूरी तरह सतर्क है और किसी भी स्थिति का जवाब देने के लिए तैयार है। एजेंसी ने ट्रंप के दावों को एक और झूठ बताया। ईरान ने अमेरिका को एक बार फिर चेतावनी दी है। ईरान ने कहा कि अगर अमेरिकी सेना ने ईरानी ठिकानों पर नए हमले किए तो वह इसका कड़ा जवाब देगा। इससे पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ जाएगा। ये चेतावनी ट्रंप के उस बयान के बाद आई है, जिसमें ट्रंप ने कहा था कि तेहरान के साथ बातचीत से उनका भरोसा कम हो रहा है। ट्रंप ने कहा कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका उन पर हमला करेगा। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर, तकीय के विदेश मंत्री हाकन फिदान और सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान के साथ अलग-अलग फोन पर बातचीत के जरिए इसकी जानकारी दी। ट्रंप एक बार फिर पलटे।
-अनिल नरेन्द्र
Tuesday, 4 August 2026
अमेरिका में 7 जगह हमले किसने करे?
अमेरिका के 7 राज्यों में एक के बाद एक तगड़े अटैक हुए हैं। ये हमले सीधे उस लाइफलाइन पर हुए हैं, जिसके दर्द से आम जनता कराह उठी। इस हमले के बाद ट्रंप का ऐसा हाल हो गया है कि वो ईरान का नाम भी नहीं ले पा रहे हैं। ट्रंप उल्टा अपने ही लोगें को बदनाम करने में जुट गए हैं लेकिन अपने सबसे बड़े दुश्मन की चालाकी दुनिया के सामने यह एक्सेप्ट नहीं कर पा रहे हैं। ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका में अचानक कुछ ऐसा हो गया है जिसने डोनाल्ड ट्रंप के पसीने छुड़ा दिए हैं। दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क की धरती पर एक-दो नहीं, बल्कि एक के बाद एक पूरे सात बड़े अटैक हुए हैं। यह वार किसी और जगह नहीं, बल्कि अमेरिकी जनता की लाइफलाइन पर हुआ है। शक है कि इस पूरे खेल के पीछे अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन ईरान ही है, लेकिन ट्रंप खुलेआम उसका नाम ले नहीं रहे हैं। अगर ट्रंप ने दुनिया के सामने यह मान लिया कि हमला ईरान ने ही किया है तो साबित हो जाएगा कि तकनीक के मामले में वह अमेरिका से आगे निकल चुका है। दरअसल ये हमले अमेरिका की पानी की सप्लाई करने वाली सबसे अहम पाइपलाइनों और प्लांट्स पर हुए हैं। इस सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर पर 7 जगहों से साइबर अटैक किए गए। हालात इतने खराब हो गए कि कई राज्यें में वॉटर सिस्टम को बनाने के लिए ऑटोमैटिक सिस्टम बंद करके हाथों से काम संभालना पड़ा। अब इस पूरे खेल में सबसे बड़ा झटका अमेरिकी राजनीति और डोनाल्ड ट्रंप को लगा है। क्योंकि जब दुनिया की नजरें ईरान पर टिक रही हैं, तब ट्रंप सीधे तौर पर ईरान का नाम तक लेने से बच रहे हैं। इस बड़े सनसनीखेज साइबर हमले की पहली भनक मिनेसोटा राज्य से लगी 26 और 27 जुलाई के बीच यहां के 30 से ज्यादा कम्युनिटी वॉटर सिस्टम को हैकर्स ने अपना निशाना बनाया। मिनेसोटा आईटी सर्विसेज ने जब आनन-फानन में जांच शुरू की तो पता चला कि किसी ने जान बूझकर पानी की सप्लाई कंट्रोल करने वाले सिस्टम का एक्सेस हथिया लिया था। प्रवक्ता एमिली जिमर का कहना है कि मामले की जांच बहुत तेजी से चल रही है। जिस तरीके से इस मामले को अंजाम दिया गया है, वो ठीक वैसा ही है जैसा हमारे फेडरल पार्टनर्स ने पहले क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमलों में देखा था। हैकर्स ने बहुत ही चालाकी से पानी के प्लांट्स में लगे पोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर्स को अपना शिकार बनाया। अमेरिका की जांच एजेंसियां यह मान रही है कि हमले का पैटर्न ईरान के पुराने साइबर हमलों से काफी मिलता-जुलता है। लेकिन सबसे बड़ा ड्रामा तब शुरू हुआ जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान सामने आया। ट्रंप ने इस भयंकर अटैक का दोष सीधे ईरान पर डालने की बजाय अपनी ही व्यवस्था पर फोड़ दिया। कैबिनेट मीटिंग के दौरान ट्रंप ने ईरान का बचाव करने जैसा बयान दिया और कहा कि लोग कह रहे हैं कि मिनेसोटा के 30 वॉटर प्लांट्स पर जो हमला हुआ उसके पीछे ईरान है। मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता है। मैं इसके लिए मिनेसोटा के नाकाम प्रशासन और वहां के भ्रष्ट गवर्नर को जिम्मेदार मानता हूं। ईरान के पास मिनेसोटा के बारे में सोचने से बहुत बड़े मुद्दे हैं। ट्रंप के इस रवैये से हर कोई हैरान है। जहां एक्सपर्ट्स इसे सीधे तौर पर ईरान से जोड़ रहे हैं वहीं ट्रंप ईरान का नाम लेने से कतरा रहे हैं और अपने ही अधिकारियों को कसूरवार ठहरा रहे हैं। इस पर मिनेसोटा के गवर्नर ने पलटवार करते हुए कहा ट्रंप को अच्छी तरह पता है कि हमलावर कौन है, वह सच्चाई से भाग रहे हैं।
-अनिल नरेन्द्र
Saturday, 1 August 2026
...और अब ईरान बनाम यूक्रेन
Thursday, 30 July 2026
क्या ईरान के आगे झुका है ट्रंप ?
Tuesday, 28 July 2026
और अब सऊदी-हूतियों में जंग
मध्य-पूर्व एशिया में एक तरफ अमेरिका-ईरान की जंग थम नहीं रही, वहीं अब एक नया मोर्चा खुलता दिख रहा है। यह है सऊदी अरब और यमन के हूतियों के बीच। सऊदी अरब और हूतियों के बीच सीधा टकराव शुरू हो चुका है। शुक्रवार को लाल सागर में एक सऊदी मालवाहक जहाज पर हमला हुआ, जिसके बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया। हमले के कुछ ही देर बाद सऊदी अरब ने हूतियों के नियंत्रण वाले यमन के हुदैदाह शहर पर जबर्दस्त हवाई हमले किए। कहा जा रहा है कि अमेरिकी फाइटर जेट एफ-35 से यह हमले किए गए। इसके जवाब में हूतियों ने सऊदी अरब को बड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि उसने अपने नर्क के दरवाजे खोल दिए हैं। हूती विद्रोहियों ने हालिया हमले में सऊदी अरब की सैन्य कार्रवाई और अपनी घोषित नौसैनिक नाकेबंदी का जवाब बताया है। उनके अनुसार सऊदी से जुड़े जहाजों को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे सऊदी बंदरगाहों के लिए माल ढो रहे थे या हूतियों की घोषित नाकेबंदी का उल्लंघन कर रहे थे। बता दें कि हूती विद्रोही लंबे समय से सऊदी अरब को यमन युद्ध का प्रमुख पक्ष मानते हैं। उनका आरोप है कि सऊदी के सैन्य अभियानों से यमन में भारी तबाही हुई हैं। इसलिए वे सऊदी के आर्थिक और सामरिक हितों को निशाना बना रहे हैं। लाल सागर बता दें कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गें में से एक है। तेल टैंकरों पर हमलों से न केवल सऊदी अरब के निर्यात पर असर पड़ता है, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर ही दबाव बनता है। हालिया हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में भी उछाल देखा गया है। दरअसल, यमन में सक्रिय हूती विद्रोही मुख्य रूप से देश के अल्पंसख्यक जैदी शिया समुदाय से जुड़ा एक सशस्त्र संगठन है। इस संगठन का नाम इसके संस्थापक हुसैन अल-हूती के नाम पर पड़ा। हूती खुद को अंसार उल्लाह यानी ईश्वर के समर्थक भी कहते हैं। साल 2003 में अमेरिका के नेतृत्व में इराक पर हुए हमले के बाद हूती आंदोलन ने अमेरिका और इजरायल विरोधी रुख की ओर मुखर किया। संगठन के समर्थकों के बीच अमेरिका और इजरायल के खिलाफ नारे लगाए गए, जो आज भी उनकी वैचारिक पहचान का हिस्सा माने जाते हैं। हूती संगठन खुद को हमास और हिजबुल्लाह जैसे समूहों के साथ मिलकर ईरान समर्थित एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस यानी प्रतिरोध की धुरी का हिस्सा मानता है। उधर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हूती विद्रोहियों को चेतावनी दी कि अगर जहाजों पर हमले जारी है तो उनके खिलाफ बड़ी सैन्य कार्रवाई की जाएगी। हूती विद्रोहियों के हमले से मध्य-पूर्व एशिया में एक नया मोर्चा खुलने की संभावना बढ़ गई है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को पहले ही झकझोर रखा है। इस ताजा संघर्ष के कारण दुनिया भर में ईरान समेत अन्य वस्तुओं की कीमतों में तेज उछाल आया है। वहीं फारस की खाड़ी में तनाव और गहरा हो गया है। क्येंकि अमेरिका और ईरान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलमार्ग पर प्रभाव और नियंत्रण को लेकर आमने-सामने हैं। एपी के अनुसार साबा न्यूज ने हूतियों के हवाले से कहा कि गुरुवार को लाल सागर में सऊदी के दो जहाजें, एनसीलिया और लामला पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले किए, जिससे दोनों में आग लग गई। हूती का कहना है कि सऊदी अरब ने जो बरसों पुरानी नाकेबंदी लागू कर रखी है। उसके विरोध में सऊदी जहाजों के लिए नाकेबंदी की गई है। उधर दोनों पक्षों में शांति वार्ता की खबरें भी आ रही हैं।
-अनिल नरेन्द्र
Saturday, 25 July 2026
अमेरिका-सऊदी परमाणु करार
ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच खाड़ी से एक ऐसी खबर आई है जो न सिर्फ मध्य-पूर्व को बल्कि पूरी दुनिया को चौंका देगी। जिस यूरेनियम संवर्धन को लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की धरती कंपा रखा है, वहीं वो एक डील के तहत सऊदी अरब को देने वाला है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने बुधवार को घोषणा की कि उसने सऊदी अरब के साथ एक अभूतपूर्व समझौता किया है। इस समझौते के तहत सऊदी अरब अमेरिकी सहयोग से अपने असैन्य परमाणु कार्यक्रम को विकसित कर सकेगा। अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान ने शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु सहयोग से जुड़े एग्रीमेंट 123 पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच परमाणु सुरक्षा उपायों से संबंधित एक द्विपक्षीय समझौते पर भी हस्ताक्षर हुए। व्हाइट हाउस ने कहा, दोनों समझौते मिलकर कई दशकों तक चलने वाली और अरबों डॉलर की साझेदारी के लिए कानूनी आधार तैयार करते हैं। इस समझौते को अब समीक्षा के लिए अमेरिकी कांग्रेस के पास भेजा जाएगा। अधिकारिक घोषणा के बाद अमेरिका और दुनिया के कई देशों में इस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। इजरायल के अर्थ व्यवस्था मंत्री नीर बरकात ने कहा कि यदि सऊदी अरब परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों और बिजली उत्पादन तक सीमित रखता है, तो उनके देश को इसमें कोई आपत्ति नहीं है। अगर वे इसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने के लिए करता है तो इजरायल इसे कभी स्वीकार नहीं कर सकता। वहीं इजरायल के पूर्व रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री अविग्दोर लिबरमैन ने इसका विरोध करते हुए लिखा, सऊदी अरब का असैन्य परमाणु कार्यक्रम आखिरकार परमाणु हथियार कार्यक्रम में बदल जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे पूरे मध्य पूर्व में परमाणु हथियारों की होड़ तेज हो सकती है, जिसे उन्होंने एक पागलपन भरी हथियारों की दौड़ करार दिया। इस समझौते के तहत सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिल सकती है और अमेरिकी कंपनियों के लिए अरबों डॉलर की कमाई हो सकती है। द वाल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक समझौते को इस तरह से तैयार किया गया है कि अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब के उभरते न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर के केन्द्र में कई विदेशी कंपनियां इससे बाहर हैं। ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि सीधे अमेरिकी दखल से सऊदी न्यूक्लियर प्रोग्राम पर वाशिंगटन का असर बढ़ेगा। तर्क है कि अमेरिका की भागीदारी से न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी को सैन्य मकसद के लिए इस्तेमाल होने से रोकने में भी मदद मिलेगी। ये मामला पाकिस्तान की टेंशन भी बढ़ाने वाला है क्योंकि अब तक मुस्लिम देशों में सिर्फ पाकिस्तान ही है, जिसके पास परमाणु हथियार है। इसी के दम पर पाकिस्तान इस्लामिक नाटो बनाने के ख्वाब देखता है। सऊदी अरब ने भी उसके साथ डिफेंस डील इसीलिए की थी। ऐसे में अगर वो खुद इन हथियारों तक पहुंच रख सकेगा तो उसके लिए पाकिस्तान की प्रासंगिकता भी खत्म हो जाएगी। इस डील का अमेरिका के अंदर भी विरोध हो रहा है। अमेरिका में लोगों का कहना है कि क्या ट्रंप ये भूल गए हैं कि 9/11 हमले में जो 19 आतंकी थे उनमें से 15 सऊदी अरब से आए थे। अब आप उन्हीं से इतना खतरनाक समझौता करना चाहते हो। इससे न केवल मध्य-पूर्व में ही परमाणु हथियार बनाने की होड़ मचेगी बल्कि पूरी दुनिया में भी ऐसी कोशिश होगी। वैसे डोनाल्ड ट्रंप कब अपनी बात से पलट जाएं कहा नहीं जा सकता। हमने ईरान के साथ शांति समझौते का हाल देखा है। समझौता होने के बाद हस्ताक्षर होने के बावजूद ट्रंप ऐसी-ऐसी नई शर्तें जोड़ देते हैं जिससे वह समझौता खटाई में पड़ जाए। कल को यह भी संभव है कि इजरायल के दबाव में वह ऐसी नई शर्तें जोड़ दे जिससे ये समझौता खटाई में पड़ जाए।
-अनिल नरेन्द्र
Thursday, 23 July 2026
क्या नेतन्याहू न्यूयार्क में गिरफ्तार हो सकते हैं?
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के गलियारों में इस समय न्यूयार्क से उठी एक आवाज ने हलचल मचा दी है। न्यूयार्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी ने कहा है कि अगर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सितम्बर में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में हिस्सा लेने के लिए न्यूयार्क आते हैं तो उनकी गिरफ्तारी की संभावना पर उनका कार्यालय अब भी विचार कर रहा है। द न्यूयार्क टाइम्स के पॉडकास्ट द इंटरव्यू में ममदानी ने कहा कि उनका कानूनी विभाग नेतन्याहू की संभावित गिरफ्तारी के कानूनी पहलुओं पर सक्रिय रूप से विचार कर रहा है। ममदानी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा करने का वादा भी किया था। ममदानी ने कहा, मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू की जगह हेग में है। वे एक युद्ध अपराधी हैं, जिन पर अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) ने आरोप लगाए हैं कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू की वजह से कई वर्षें में उनके कदमों के कारण जो हालात पैदा हुए हैं, उसे देखते हुए बहुत से लोग यही राय रखते हैं। जब ममदानी से पूछा गया कि कानून उन्हें इस मामले में क्या ऐसा करने की अनुमति देता है तो उन्होंने जवाब दिया, इस पर हमारी कानूनी विभाग के साथ सक्रिय चर्चा चल रही है, लेकिन हमारे राष्ट्रीय स्तर पर कई बार देखा है कि कुछ लोग अपने हिसाब से कानून लिखने या कानूनी दायरे से बाहर जाने की कोशिश करते हैं। हमारी मंशा ऐसा करना नहीं है। बता दें कि अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने 2024 में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और इजरायल के कुछ अन्य नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। उन पर 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद गाजा में युद्ध अपराध के आरोप लगाए गए हैं। यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि गाजा में जारी मानवीय त्रासदी से आहत दुनिया के एक बड़े हिस्से की अंतरात्मा की आवाज है। मेयर ममदानी का संकल्प अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने बेंजामिन नेतन्याहू के अलावा पूर्व रक्षा मंत्री गैलेंट के खिलाफ भी गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं। इन नेताओं पर गाजा में युद्ध के एक तरीके के रूप में भुखमरी का इस्तेमाल करने, भोजन, पानी, ईंधन और दवाओं जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को व्यक्तिगत रूप से रोकने और नागरिकों पर जानबूझकर हमले करने जैसे गंभीर आरोप हैं। ममदानी ने अपनी मंशा स्पष्ट करते हुए कहा कि वे न्यूयार्क शहर के कानून विभाग के साथ लगातार संपर्क में हैं ताकि यह जाना जा सके कि उनके पास एक विदेशी नेता व एक राष्ट्राध्यक्ष को हिरासत में लेने का कितना अधिकार है? उन्होंने कहा न्यूयार्क शहर में कानून मुझे जो कुछ भी करने की अनुमति देगा, हम वही करेंगे। हालांकि कुछ कानूनी जानकारों का मानना है कि अमेरिका आईसीसी का सदस्य नहीं है, इसलिए मेयर के लिए ऐसा करना जटिल हो सकता है। भले लॉ स्कूल के प्रोफेसर हेरोल्ड हौगजू कोह के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर शहर की सड़कों पर चलते समय नेतन्याहू की स्थिति संवेदनशील हो सकती है। इस संभावित कदम पर नेतन्याहू ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने ममदानी पर पलटवार करते हुए उन्हें हमास का समर्थक और गुप्त रूप से अमेरिका से नफरत करने वाला तक कह डाला। नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल अमेरिकी मूल्यों के साथ खड़ा रहने वाला लोकतंत्र है। उधर ममदानी इन आरोपों को खारिज करते हैं। इस बीच ममदानी के बयान पर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। कई लोगों ने इसे ममदानी का बड़बोलापन बताया है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी दूत माइक वाल्ट्स ने इस खबर पर पोस्ट किया। मेयर ममदानी, ये चार वजहें बताती है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान न्यूयार्क में प्रधानमंत्री नेतन्याहू को क्यों नहीं गिरफ्तार किया जा सकता है। पहला-अमेरिका उस संधि का पक्षकार नहीं है, जिस पर अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय की कानूनी-व्यवस्था आधारित है। दूसरा-संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय समझौते के अनुसार बैठकों में आने वाले विदेशी सरकार के प्रमुखों को राजनयिक संरक्षण प्रदान करता है। तीसरा-राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख की कानूनी इम्यूनिटी भी ऐसे मामलों में लागू होती है और चौथा- विदेश नीति ऐसे मामलों में संघीय सरकार का अधिकार स्थानीय प्रशासन से ऊपर होता है। इसलिए न्यूयार्क के मेयर की इच्छा या घोषणा से ऐसा कोई भी कदम उठाया नहीं जा सकता।
-अनिल नरेन्द्र
Tuesday, 21 July 2026
होर्मुज ईरान का ट्रंप कार्ड
ईरान ने होर्मुज स्टेट बंद कर अमेरिका के सभी रणनीतिक गणित और वैश्विक बाजार को हिला दिया है। यह ईरान का ऐसा तुरुप का पत्ता है जिसने ट्रंप को चारों खाने चित्त कर दिया है। ईरान ने बिना कोई बड़ा परमाणु कदम उठाए सिर्फ एक समुद्री रास्ते की चाबी अपने हाथ में लेकर अमेरिका के पूरे जंग की रणनीति को बदल दिया है। अब अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध का सबसे बड़ा मुद्दा होर्मुज को खोलने, खुलवाने का बन गया है। याद रहे कि 28 फरवरी से पहले यह होर्मुज कभी भी बंद नहीं हुआ था। यह विचार तो ईरान को तब आया जब अमेरिका ने 28 फरवरी को इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमले किए। ईरान ने होर्मुज का ताला लगाकर अमेरिका के सामने यह साफ कर दिया है कि अगर बातचीत करनी है तो शर्तें ईरान की होगी। होर्मुज का बंद होना न सिर्फ मध्य-पूर्व में ही असर डाल रहा है पर इसका प्रभाव अमेरिका में भी सीधा पड़ रहा है। मैं बात कर रहा हूं अमेरिका में होने वाले मिड टर्म चुनाव की जिनमें ट्रंप का राजनीतिक भविष्य कुछ हद तक टिका हुआ है। ईरान ने ठीक उसी समय होर्मुज पर दबाव बनाया है, जब अमेरिकी कूटनीति सबसे कमजोर मोड़ पर है। ईरान से तंग अमेरिकी कूटनीति के लिए एक बड़ा मिस कैलकुलेशन साबित हुआ है। सीजफायर खत्म होने के बाद से ही अमेरिका ईरान पर मिसाइलें बरसा रहा है और ईरान जवाबी हमले कर रहा है। लेकिन ईरान ने फिर अमेरिका को झुकाने के लिए अपने ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया और बारूदी धमाकों के बीच ईरान ने एक बार फिर होर्मुज को बंद कर दिया। ये ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका में मिड-टर्म चुनाव सिर पर हैं और अमेरिकी जनता से पेट्रोल के दाम गिरने का दावा कर रहे थे। ईरान ने ठीक उसी वक्त अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सबसे कमजोर नस यानी कच्चे तेल की सप्लाई पर पैर रख दिया है। अमेरिका-ईरान के बीच हमलों के बाद तेल की कीमतों में 3ज्ञ् से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई है। होर्मुज स्टेट ने तनाव बढ़ने और कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा होने की वजह से नवम्बर में होने वाले अमेरिकी मिड-टर्म चुनावों पर इसका सीधा असर पड़ने वाला है। वॉलिट और वोट समीकरण अमेरिकी राजनीति का कड़वा सच है क्योंकि अमेरिकी राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि राष्ट्रपति चाहे कोई भी वादा करे, लेकिन वोटर अपना फैसला पेट्रोल पंप पर तेल की कीमतों को देखकर ही तय करता है। इससे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उसकी विरोधी पाटी रिपब्लिकन पाटी पर भारी राजनीतिक दबाव बढ़ेगा? राष्ट्रपति ट्रंप के सत्ता में आने के बाद पेट्रोल के दाम 2.50 डॉलर प्रति गैलन तक लाने का वादा किया था, लेकिन होर्मुज संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतें 80 डॉलर से 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जिससे पेट्रोल के दाम घटने के बजाय बढ़ रहे हैं। पेट्रोल महंगा होने का मतलब है आज अमेरिकी परिवार के बजट पर सीधा दबाव पड़ेगा, अमेरिकी जनता की जेब पर सीधी मार होगी। इससे अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी, ट्रांसपोर्टेशन बढ़ने से सुपर मार्केट के सामान से लेकर हवाई टिकट तक सब महंगा होगा। इतिहास गवाह है कि जब भी चुनाव से ठीक पहले अमेरिका में ईंधन के दाम बढ़े हैं। सत्ताधारी दल को चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ा है। जैसे 1979 में जिमी कार्टर के साथ हुआ था। होर्मुज बंद होते ही वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ने लगे हैं। इंटरनेश्नल बेच मार्क ब्रेट क्रूड 3.92ज्ञ् से बढ़कर 78.99 डॉलर प्रति बैरल हो गया और अमेरिकी क्रूड 3.44ज्ञ् से बढ़कर 73.87 डालर प्रति बैरल हो गया है। अगर होर्मुज लंबे समय तक यूं ही बंद रहता है तो इसका असर अमेरिका पर ही नहीं पूरे विश्व पर पड़ेगा और ऐसा होने से रोकने की चाबी सिर्फ ईरान के हाथ में है।
-अनिल नरेन्द्र
Saturday, 18 July 2026
ट्रंप: मोजतबा खामेनेई 90 फीसदी खत्म?
ईरान के नए सर्वेच्च नेता मोजतबा अली खामेनेई अपने पिता आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भी नहीं दिखे थे और तब से ही उनकी सेहत को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फॉक्स न्यूज से कहा कि आयतुल्लाह अली खामनेई मारे जा चुके हैं और उनके बेटे मोजतबा खामेनेई भी 90 फीसदी खत्म हो चुके हैं। ट्रंप ने आगे कहा कि उनके पास अब कोई नौसेना नहीं बची है, उनकी वायु सेना भी नहीं बची है, सब कुछ खत्म हो चुका है। उनका एयर डिफेंस सिस्टम भी खत्म हो चुका है। उनके सभी नेता मारे जा चुके हैं। उनके सबसे बेहतरीन नेता मारे जा चुके हैं। इससे पहले मोजतबा खामेनेई के नाम से शनिवार को जारी एक लिखित बयान में पूर्व सर्वेच्च नेता आयतुल्लाह अली खामनेई की हत्या का बदला लेने की कसम खाई। बयान में कहा गया था कि हम अपने पवित्र खून और इन दोनों युद्धों में शहीद हुए सभी लोगों के खून का बदला लेने की कसम खाते हैं। दुनिया भर में ऐसे लोग मौजूद हैं जो बदला लेने को तैयार हैं। इसी साल 23 अप्रैल को अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें बताया गया था कि ईरान के नए सर्वेच्च नेता मोजतबा खामेनेई अमेरिका-इजरायल के उस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसमें उनके पिता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई थी। हालांकि वह मानसिक रूप से पूरी तरह सक्रिय हैं। अखबार ने अधिकारियों के हवाले से कहा था, उनके एक पैर का तीन बार ऑपरेशन किया गया है और अब उन्हें कृत्रिम संक्रमित पैर (प्रोस्येटिक) लगाए जाने का इंतजार है। उनके एक हाथ की भी सर्जरी हुई है और उसकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे वापस आ रही है। उनके चेहरे और होंठ पूरी तरह झुलस गए हैं, जिससे उन्हें बोलने में कठिनाई होती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि आखिरकार उन्हें प्लास्टिक सर्जरी की भी जरूरत होगी। बता दें कि इसी साल 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल हवाई हमलों में आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद मोजतबा खामेनेई को सर्वेच्च नेता नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के बाद से ही वह सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए हैं। उन्होंने कोई वीडियो संदेश भी जारी नहीं किया है। इससे इस बात को लेकर सवाल उठे हैं कि उसी हमले में वह कितने गंभीर रूप से घायल हुए थे? आयतुल्लाह अली खामेनेई के अन्य तीन बेटे मसूद, मुस्तफा और मेमसाम रविवार को आयोजित श्रद्धांजलि सभा में शामिल हुए थे। उनके साथ राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और रिव्यूल्शनरी गार्ड्स के प्रमुख अहमद वहीदी सहित कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। जून में जारी एक बयान में मोजतबा खामेनेई ने कहा था कि सिद्धांत रूप से वह अमेरिका के साथ डील के पक्ष में नहीं थे। लेकिन राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के आश्वासनों के बाद ही उन्होंने इसकी अनुमति देने का फैसला किया। कुवैती अखबार अल जरीदा ने मार्च 2026 में एक रिपोर्ट की थी। इसके मुताबिक मोजतबा खामेनेई को शुरुआत में इलाज के लिए मास्को ले जाया गया था। उसके बाद मोजतबा के स्वास्थ्य को लेकर कोई खबर नहीं आई। इस वक्त मॉस्को खुद असुरक्षित है, वहां लगातार यूव्रेन का हमला हो रहा है, इसलिए इस वक्त चीन को मोजतबा के लिए सुरक्षित माना जाता है। ईरानी जनता चाहती है कि जल्द आयतुल्लाह मोजतबा आवाम के सामने आएं ताकि दुनिया देख सके कि वह ठीक हैं, सुरक्षित हैं।
-अनिल नरेन्द्र
Thursday, 16 July 2026
आंख के बदले आंख
मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान ने दावा किया कि उसने आंख के बदले आंख नाम से सैन्य अभियान शुरू करते हुए खाड़ी क्षेत्र में मौजूद ठिकानों पर मिसाइल हमले किए हैं। ईरान का कहना है कि यह कार्रवाई हाल के अमेरिकी हमलों के जवाब में की गई है। इस दावे के बाद पूरे क्षेत्र में युद्ध तेज हो गया है। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब एक बार फिर खुली जंग का रूप ले चुका है। यह संघर्ष अब सिर्फ सीमित क्षेत्रों तक ही नहीं रहा बल्कि पूरे मिडल ईस्ट, वैश्विक तेल बाजार और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार तक फैल चुका है। यह कहना गलत नहीं होगा कि अब यह युद्ध बढ़ता जा रहा है और भयानक रूप अख्तियार कर सकता है। ईरान के सरकारी मीडिया के मुताबिक इस अभियान के तहत खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। ईरान का दावा है कि उसका उद्देश्य उन ठिकानों को जवाब देना था, जहां से उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई की गई थी। ईरान ने इस सैन्य कार्रवाई को आंख के बदले आंख (आई फॉर एन आई) नाम दिया है। इस नाम का सीधा संदेश है कि वह अपने खिलाफ हुई हर सैन्य कार्रवाई का जवाब देगा। ईरान लंबे समय से कहता आ रहा है कि अगर उसकी देश की सुरक्षा या उसके सैन्य ठिकानों पर हमला होगा तो वह जवाबी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। इसी नीति के तहत उसने पहले भी कई बार जवाबी कार्रवाई की घोषणा की है। ईरान की आईआरजीसी ने दावा किया है कि उसने आई फॉर एन आई अभियान के तहत जार्डन, बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। पहले चरण में जार्डन के प्र्रिंस हसन एयरबेस पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए। दूसरे चरण में बहरीन के शेख ईसा एयरबेस पर हमला कर हेलीकॉप्टर और ड्रोन सुविधाओं को निशाना बनाया गया। तीसरे चरण में कुवैत के अली अल-अलेम एयरबेस और अहमद अल-जाबेर एयरबेस पर हमले का दावा किया गया। ईरान ने कहा कि यह कार्रवाई अमेरिकी सैन्य हमलों के जवाब में की गई है। खाड़ी क्षेत्र दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का सबसे अहम केन्द्र माना जाता है। यहीं से दुनिया के बड़े हिस्से में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है। अगर अमेरिका ईरान के बीच यह युद्ध और तेजी पकड़ता है तो इसका सीधा असर होर्मुज स्टेट पर पड़ेगा, बल्कि पड़ना शुरू हो गया है। अमेरिका के लगातार ईरान पर हमलों के जवाब में ईरान ने होर्मूज बंद करने का एलान भी कर दिया है। इसका सीधा असर अंतर्राष्ट्रीय तेल कीमतों, शिपिंग लागत और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ेगा। भारत जैसे देश जो अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी से पूरा करते हैं, वे भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। यह पहली बार नहीं जब ईरान ने बदले के लिए सैन्य कार्रवाई का वादा पूरा करने का प्रयास किया है। जनवरी 2020 में जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद ईरान ने इराक में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें दागी थीं। अप्रैल 2024 में दमिश्क स्थित ईरानी दूतावास पर हमले के बाद भी ईरान ने पहली बार सीधा अपनी जमीन से इजरायल पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए थे। इससे साफ है कि ईरान अपनी सुरक्षा नीति में जवाबी कार्रवाई को महत्वपूर्ण रणनीति मानता है।
-अनिल नरेन्द्र
Tuesday, 14 July 2026
ट्रंप की हत्या की साजिश
Saturday, 11 July 2026
20 दिन भी नहीं टिक पाया युद्ध-विराम
Thursday, 9 July 2026
ट्रंप का तंज:आंसू नकली हैं
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि ईरान में इतनी बड़ी संख्या में लोग अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में रो रहे थे। एक्सियोस को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि उन्हें लगा था कि ईरान की जनता खामेनेई से नफरत करती है। इस पर उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि शायद यह आंसू नकली हों। जनाजे में ईरान के शीर्ष नेतृत्व के मौजूद होने के सवाल पर ट्रंप ने दावा किया है कि यदि अमेरिका चाहे तो एक ही हमले में ईरान के मौजूदा नेतृत्व को खत्म कर सकता है। उन्होंने कहा कि वे सभी वहां मौजूद हैं। एक ही हमले में हम सभी खत्म कर सकते हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि फिर हमारे पास बातचीत करने के लिए कोई नहीं बचेगा। ईरान ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका खामेनेई की मौत के बाद छाए गहरे शोक को समझ नहीं पाएगा, क्योंकि न तो उसकी कोई सभ्यता है, न ही इतिहास और न ही सम्मान। उधर, ट्रंप के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए आर्मेनिया स्थित ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया पर कहा, लोगों को मारा जा सकता है पर आदर्शों को नहीं। आपने अयातुल्ला अली खामेनेई को मार डाला पर असल में आपने इत्र की एक ऐसी शीशी तोड़ दी जिसकी खुशबू हर जगह फैल गई। बता दें कि ईरान में 36 साल तक सत्ता में रहे खामेनेई की 28 फरवरी को अमेरिकी इजराइली हमले मौत हो गई थी। 97 वर्ष के शिया धर्मगुरु अयातुल्ला जाफर सोमानी ने तेहरान की ग्रैंड मोसाला में अयातुल्ला अली खामेनेई, व उनके परिवार के दिवंगत सदस्यों के लिए प्रार्थना कराई। यहां अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे मसूद, मेयसाम व मुस्तफा भी मौजूद थे। इन्हें युद्ध शुरू होने के बाद से नहीं देखा गया था। मौजूदा सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई नहीं देखे गए। रिव्यूशनरी गार्ड के प्रमुख जनरल अहमद वाहिदी भी युद्ध के बाद पहली बार दिखे। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, संसद के स्पीकर मो. बाघेर गालिबाफ व कुदस बलों का नेतृत्व करने वाले इस्माइल थानी भी मौजूद थे। ग्रैंड मोसाला में लगे पोस्टरों व दीवारों पर लिखे संदेशों में ट्रंप व इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को मारने की मांग की गई। कवि रासोली ने प्रार्थना से पूर्व कार्यक्रम का संचालन किया और अमेरिका-इजरायली मुर्दाबाद के नारे लगवाए। उधर, ईरान के सीनियर सैन्य अधिकारी अली शादमानी ने अमेरिका और इजरायल को चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई का उसकी सशस्त्र सेनाएं कड़ा जवाब देंगी। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास आराघची ने भी दोहराया कि देश की जनता या नेतृत्व किसी भी खतरे का तत्काल और मजबूत जवाब दिया जाएगा। यह बयान इजरायल के रक्षामंत्री की ईरानी सुप्रीम लीडर को मारने की धमकी से जुड़ी टिप्पणी के बाद आया। बता दें कि शहीद अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में उनके अंतिम दीदार करने करोडों लोग सडकों पर उतरे। ऐसी अंतिम यात्रा दुनिया में पहले कही भी नहीं देखी गई। अंतिम संस्कार में भारत समेत 70 से अधिक देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। विदेश मंत्री अब्बास आराघची ने कहा कि 70 से अधिक देशों के प्रतिनिधि सर्वोच्च नेता ग्रैट अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल हुए। इनमें हमारे वफादार अरब भाई भी शामिल हैं।
Tuesday, 7 July 2026
खामेनेई के अंतिम विदाई की रस्में शुरू
Saturday, 4 July 2026
कहां है ईरान की 100 अरब डॉलर जब्त संपत्तियां?
ईरान को जल्द मिलेंगे 6 अरब डॉलर
Thursday, 2 July 2026
ट्रंप और मेलोनी के बीच बिगड़ते रिश्ते
Tuesday, 30 June 2026
अलविदा अयातुल्ला अली खामेनेई
Saturday, 27 June 2026
आसिम मुनीर की हत्या की साजिश?
जो लोग भी इजरायल और उसकी कुख्यात खुफिया एजेंसी मोसाद से वाकिफ हैं वह जानते हैं कि मोसाद राजनीतिक हत्याएं करवाने में माहिर है। इजरायल के इतिहास में ऐसे दर्जनों केस हैं जहां उसने अपने दुश्मनों के लीडरों को मौत के घाट उतारा है। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है, 28 फरवरी को जब अमेरिका-इजरायल ने ईरान पर हमला किया था तो सबसे पहला काम मोसाद ने यह किया था कि उसने ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई व ईरान टॉप मिलिट्री कमांडरों की हत्या कर दी थी। यह भी किसी से छिपा नहीं कि इजरायल अमेरिका-ईरान के युद्ध विराम से बहुत निराश है और इन एमओयू को तुड़वाने की पूरी कोशिश कर रहा है। मध्य पूर्व में कई देशों में रहस्यमय हमले हो रहे हैं, यह कौन कर रहा है पता नहीं चल रहा है। मुझे हैरानी नहीं हुई जब एक ताजा खबर आई कि मोसाद आसिम मुनीर और पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की जेनेवा में हत्या का प्लान बना रहा था। मैंने अपने 18 जून के सम्पादकीय में जिसका शीर्षक था ः कागजों पर दस्तखत ः जमीन पर धुआं की अंतिम लाइन में लिखा था ः अंत में इजरायल-मोसाद कुछ भी कर सकता है। समझौता तुड़वाने के लिए ईरानी लीडरशिप की हत्या भी करवा सकता है ताकि यह युद्ध विराम टूट जाए। मेरी भविष्यवाणी इस मायने में सफल हुई, हालांकि थोड़ा फर्क यह रहा कि मोसाद ईरानी लीडरों को तो निशाने पर नहीं ले पाया पर उसने पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल पर निशाना साधने की कोशिश जरूर की। बता दें कि ब्राजील के एक वरिष्ठ और जाने-माने पत्रकार पेपे एस्कोबार के इस सनसनीखेज दावे ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा कर दिया है। एस्कोबार ने दावा किया कि इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और स्विट्जरलैंड दौरे पर गए पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की हत्या की साजिश रची थी। एस्कोबार ने दावा किया कि यह प्लान तब फेल हो गया जब पाकिस्तान की सेना को बेहद विश्वसनीय खुफिया जानकारी मिली थी कि इजरायल के प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के निर्देश पर मोसाद जनरल आसिम मुनीर और पूरे पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल को निशाना बनाने की तैयारी कर दी थी। एस्कोबार ने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान ने ओमान के माध्यम से इजराइल को कड़ा संदेश भेजा था कि यदि पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल या जनरल आसिम मुनीर को नुकसान पहुंचाया गया तो उसका गंभीर जवाब दिया जाएगा। यह भी याद दिलाया गया कि पाकिस्तान एक परमाणु संपन्न देश है। इसका मतलब साफ था। इन दावों के सामने आते ही पाकिस्तान ने यह सिरे से खारिज कर दिया। एआरवाई न्यूज के चेयरमैन कामरान खान ने एक वरिष्ठ पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारी के हवाले से कहा कि यह रिपोर्ट पूरी तरह बकवास और निराधार है। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री शाहवाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर का स्विट्जरलैंड दौरा पूरी तरह सुरक्षित और बिना किसी सुरक्षा खतरे के पूरा हुआ। हत्या की साजिश का दावा वास्तविकता से कोई संबंध नहीं रखता और पूरी तरह काल्पनिक है। कटु सत्य तो यह है कि कोई भी एजेंसी ऐसी खबरों की कभी पुष्टि नहीं करता और उन्हें काल्पनिक ही बताता है।
-अनिल नरेन्द्र
Thursday, 25 June 2026
वार्ता को दिया मीनाब 168 नाम
Tuesday, 23 June 2026
शांति व अमन का दुश्मन नेतन्याहू
जब भी पिछले 80 वर्षें का दुनिया का इतिहास लिखा जाएगा उसमें दो नामों का विशेष उल्लेख होगा। जब भी मानवता के नरसंहार का वर्णन आएगा उसमें पहला नाम जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर का होगा और दूसरा नाम इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का होगा। नेतन्याहू इस सदी के नंबर वन विलेन बन कर उभरे हैं। जब भी मध्य-पूर्व में शांति की बात होती है तो उसमें नेतन्याहू कोई न कोई अड़ंगा लगा देते हैं। आप ताजा उदाहरण ही देख लें। अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता चल रही है, एमओयू भी साइन हो गया है पर नेतन्याहू अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे और अब तो वह अपने इकलौते मित्र देश अमेरिका को भी खुलकर गाली दे रहे हैं। यही वजह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कहना पड़ा कि तुम पागल हो चुके हो और मैं अगर तुम्हें न बचाता तो आज तुम जेल में होते। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजरायली कैबिनेट मंत्रियों को लताड़ते हुए कहा कि उन्हें उस ताकतवर सहयोगी पर हमला नहीं करना चाहिए क्योंकि अमेरिका के अलावा उसके साथ आज कोई नहीं है। वेंस ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व्यक्तिगत हमलों से परेशान हैं। उन्होंने ट्रंप को पूरी दुनिया में इजरायल के प्रति सहानुभूति रखने वाला एक मात्र राष्ट्राध्यक्ष कहा है, उन्हें यह भूलना नहीं चाहिए। आखिर नेतन्याहू क्यों किसी भी शांति समझौते का विरोध करते हैं? इसके पीछे नेतन्याहू का राजनीतिक अस्तित्व, सरवाइवल प्रमुख कारण है। नेतन्याहू अपनी गद्दी सुरक्षित रखने के लिए कभी गाजा पर हमले कर रहे हैं, कभी लेबनान पर तो कभी ईरान पर। उनके इस आचरण पर ट्रंप सख्ती से बोलते भी नहीं। इसके पीछे एक कारण हो सकता है एपस्टीन फाइल्स! दुनिया जानती है कि इजरायल के पास वह बदनाम, ब्लैकमेल करने वाली एपस्टीन फाइल्स है जिनमें ट्रंप समेत दर्जनों राष्ट्राध्यक्ष फंसे हुए हैं। यह बात ट्रंप समझते हैं तभी तो इजरायल को रोक नहीं पा रहे हैं। नेतन्याहू की एक मजबूरी है वह है उनके खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के केस। नेतन्याहू के खिलाफ आपराधिक और दीवानी मामलों के साथ नियमित अदालती कार्यवाही चल रही है। नेतन्याहू ने इसे आगे बढ़ने से यह कहकर रोक रखा है कि इजरायल इस समय युद्ध लड़ रहा है और यह पहली प्राथमिकता है, इसलिए इसे फिलहाल टाला जाए। नेतन्याहू इससे इतने परेशान हैं कि उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप से बाकायदा इजरायल के राष्ट्रपति से गुजरिश की थी कि नेतन्याहू के खिलाफ केसों को खत्म कर दें, वह माफी दे दें पर इजरायली राष्ट्रपति नहीं माने। इन केसों से बचने के लिए और संभावित जेल की सजा से बचने के लिए नेतन्याहू कहीं न कहीं लड़ाई जारी रखते हैं। अब जब अमेरिका-ईरान में शांति वार्ता जेनेवा में चल रही है और एमओयू पर आगे बातचीत चल रही है। नेतन्याहू ने इसमें भाजी मारने के लिए लेबनान पर युद्ध छेड़ रखा है। नेतन्याहू का तो अब इजरायल के अंदर भी विरोध होना शुरू हो गया है। इसी साल के अंत में इजरायल में आम चुनाव होने हैं जिसमें नेतन्याहू की सरकार जा सकती है। बेंजामिन नेतन्याहू पर पिछले कई वर्षें से रिश्वत खोरी, धोखाधड़ी और विश्वासघात के गंभीर आरोप लगे हैं। इजरायल के इतिहास में नेतन्याहू पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो पद पर रहते हुए अदालती कार्यवाही का सामना कर रहे हैं। फरवरी के अंत में ईरान के साथ संघर्ष चरम पर था और इजरायल-अमेरिका एयर स्ट्राइक के बाद नेतन्याहू ने देश में इमरजेंसी लगा दी थी। इस दौरान सुरक्षा कारणों से अदालती कार्यवाही को भी टाल दिया गया था और यह अब भी टाली जा रही है। जब तक इजरायल किसी से लड़ाई बंद नहीं करता। नेतन्याहू इसी बहाने अदालती कार्यवाही टालते रहेंगे। जैसे मैंने कहा कि दिलचस्प बात यह भी है कि डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में इजरायली राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग से नेतन्याहू को माफी देने की वकालत की थी। हर्जोग ने स्पष्ट किया कि इजरायल एक कानून से चलने वाला संप्रभु राष्ट्र है और वह बिना किसी बाहरी दबाव के अपने न्यायिक फैसले खुद लेगा।
-अनिल नरेन्द्र
Saturday, 20 June 2026
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
करीब 4 महीने तक चले अमेरिका-ईरान के युद्ध के बाद समझौते पर सहमति बनी है। इस चार महीने चले संघर्ष में कौन जीता, कौन हारा? हमें तो लगता है कि इस युद्ध में ईरान की भव्य जीत हुई है। यह हम इसलिए कह रहे हैं कि जिन उद्देश्यों को लेकर अमेरिका-इजरायल ने मिलकर 28 फरवरी को युद्ध शुरू किया था उसमें से कोई भी उद्देश्य वह पूरा नहीं कर सका और अंत में तेरे कूचे से हम बे-आबरू होकर निकले। अमेरिका-इजरायल ने अपने पहले ही हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को शहीद कर दिया। उसी दिन ट्रंप ने कहा- ईरान के महान लोगों, आपकी आजादी का समय आ गया है... जब हम अपना काम पूरा कर लेंगे तो आप अपनी सरकार पर कब्जा कर लीजिए यानी हम रेजीम चेंज कर देंगे। ताकि ईरान में वह रेजीम बदल सके? एक उद्देश्य था ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल कार्यक्रम को समाप्त करना। इसमें ईरान के एनरिच्ड यूरेनियम पर भी कब्जा करना था या उसे खत्म करना था। न तो ईरान में रेजीम चेंज हो सकी, न परमाणु कार्यक्रम बंद हुआ और न ही मिसाइल कार्यक्रम पर पाबंदी ही लगा सके। अब बात करते हैं हेर्मुज स्ट्रेट को खोलने की। पहली बात तो 28 फरवरी से पहले होर्मुज खुला हुआ था कभी भी बंद नहीं था। उल्टा आपने ईरान को एक ऐसा हथियार दे दिया जिसके बारे में उसने पहले कभी भी नहीं सोचा होगा। अब ईरान और ओमान मिलकर होर्मुज स्ट्रेट को अपनी मिल्कियत मान रहे हैं और हर गुजरते जहाज से सर्विस चार्ज ले रहे हैं। यह थे प्रमुख उद्देश्य जिनको लेकर अमेरिका-इजरायल ने 28 फरवरी से हमले शुरू किए थे। अब ट्रंप खुद देख सकते हैं कि इनकी प्रवृत्ति में इन्हें कितनी सफलता मिली। ईरान की मुकम्मल जीत हुई। अब बात करते हैं अमेरिका को इस अभियान की कितनी भारी कीमत उठानी पड़ी। उनके गल्फ राष्ट्रों में 14 बेस तबाह हो गए। 40 से ज्यादा लड़ाकू विमान नष्ट या डेमैज हो गए, राडार और एयर डिफेंस सिस्टम तबाह हो गए। अमेरिका ने ईरान जंग में अब तक 113 बिलियन डॉलर यानी 10 लाख करोड़ रुपए स्वाह कर दिए। ऐसा नहीं कि ईरान को इसकी कीमत चुकानी नहीं पड़ी। ईरान सरकार के मुताबिक हमलों के पहले 40 दिनों में उन्हें 270 बिलियन डॉलर यानी करीब 25 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। 1 लाख 22 हजार इमारतें तबाह हुई हैं। 3 अप्रैल 2026 तक ईरान के 307 अस्पताल बर्बाद हुए। दवाओं की कीमतें 50 प्रतिशत तक बढ़ गई, जिससे 60 लाख से ज्यादा मरीज प्रभावित हुए। मिनाब के बच्चों के स्कूल पर सीधा हमला हुआ जिसमें 160 से ज्यादा लोग मारे गए जिनमें 130 से ज्यादा छोटी बच्चियां शहीद हुईं। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत दर्जनों टाप के लीडरशिप शहीद हो गई। इस लड़ाई में गल्फ के अन्य देश भी इसकी चपेट में आ गए। यूएई, कतर, सउदी, बहरीन, इराक इत्यादि बीच में फंस गए। इस जंग में निर्दोष लोगों को भी भारी कीमत चुकानी पड़ी। अनुमान है कि जंग में 7000 से ज्यादा निर्दोष सैनिक मारे गए और 40 हजार से ज्यादा लोग घायल हुए। ईरान ने साबित कर दिया कि वे अमेरिका-इजरायल के सामने झुकने वाला नहीं है। ट्रंप बड़े गर्व से कह रहे हैं कि अब ईरान परमाणु बम कभी नहीं बन सकेगा। उन्हें हम याद करवाना चाहते हैं कि ईरान ने कभी परमाणु बम बना ही नहीं था। शहीद अयातुल्लाह अली खामेनेई ने बकायदा एक फतवा जारी किया था कि इस्लाम में ऐसा हथियार बनाना मना है जिसमें निर्दोष लोग मारे जाएं। ट्रंप अब अपनी जीत दिखाने के चलते ही कुछ भी कहें पर सारी दुनिया जानती है कि आप की हार हुई है। आपने अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाया है और आप बड़े बे-आबरू होकर ईरान के कूचे से निकले हैं।
-अनिल नरेन्द्र
Thursday, 18 June 2026
कागजों पर दस्तखत: जमीन पर धुआं
दुनिया ने राहत की सांस ली जब यह घोषणा हुई कि अमेरिका-ईरान युद्ध में युद्ध बंदी हो गई है। पर मैं इसे सिर्फ युद्ध विराम ही कहता हूं, यह जंग की समाप्ति नहीं मानी जा सकती क्योंकि अभी सही मायनों में तो दोनों तरफों की शर्तें माननी बची हैं। फिलहाल तो इससे सिर्फ अमेरिका और ईरान के बीच बमबारी रुकी है। जंग रोकने के लिए अभी बहुत से पेंच फंसे हैं। मैं सबसे पहले अयातुल्लाह मोजतबा खामेनेई, राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, विदेश मंत्री अब्बास अरागची और स्पीकर बागेर गालिबफ को बधाई देना चाहता हूं कि युद्ध में भारी पड़ने के बावजूद उन्होंने इस युद्ध विराम (सीजफायर) को रोकने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। मैं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इसके लिए बधाई नहीं देना चाहता क्योंकि उन्होंने ही यह जंग शुरू की थी। जिसे बिना वजह जंग को शुरू किया था उसमें युद्ध विराम करके उन्होंने अपनी जान ही छुड़ाई है, किसी पर एहसान नहीं किया। उनके समर्थक उपराष्ट्रपति जेडी वेन्स कह रहे हैं कि ट्रंप अब नोबल पुरस्कार के हकदार हैं? क्यों भाई ! कैसे हुए हकदार? पहले शुरू करो, फिर पिटो और अब बिना शर्तों के बमबारी रोकने की घोषणा करो? यह जो एमओयू पर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं वह कितने कारगर सिद्ध होते हैं यह देखना बाकी है क्योंकि सबसे बड़ा पेंच तो नेतन्याहू बने हुए हैं। इजरायल ने साफ घोषणा कर दी है कि वह इस समझौते को नहीं मानता और न ही वह लेबनान पर लड़ाई बंद करेगा। जबकि ईरान की शर्तों पर यह शामिल है। ट्रंप की धमकियों के बावजूद, गाली-गलौच की परवाह न करते हुए इजरायल अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है और इस पूरी कोशिश में लगा हुआ है कि यह समझौता न हों। ईरान ने 14 बिंदुओं की मांग रखी है। ट्रंप ने भी दो बड़ी शर्तें रखी हैं। ईरान ने मांग की है कि शांति समझौते से पहले 24 अरब डालर की जब्त संपत्ति अमेरिका ईरान को दे। इस राशि का आधा हिस्सा यानी 12 अरब डालर बातचीत शुरू होने से पहले ही ईरान को दी जाए। वहीं अमेरिका ने इस दावे पर अलग रुख अपनाया है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरान को किसी प्रकार की वित्तीय राहत तभी मिलेगी जब वह समझौते के तहत अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी विवाद है। बेशक ईरान ने होर्मुज को खोल दिया है पर अभी सिर्फ तय रास्तों से ही समुद्री जहाजों का आना शुरू हुआ है। होर्मुज को पूरी तरह से खोलने में समय लगेगा क्योंकि ईरान ने होर्मुज में बारुदी सुरंगें बिछा रखी हैं। जिन्हें हटाने में समय लग सकता है। ईरान हर जहाज से टोल भी वसूल कर रहा है। जिसे कर सर्विस चार्ज कह रहा है। अमेरिका ऐसा करने पर ऐतराज कर रहा है। खैर, होर्मुज के खुलने से पूरी दुनिया ने राहत की सांस जरूर ली है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और एनज्डि यूरोनियम के मुद्दे पर भी अभी सहमति बननी बाकी है। ईरान द्वारा उसके मिसाइल कार्यक्रम पर भी अमेरिका और इजरायल को आपत्ति है। इस मुद्दे पर दोनों पक्ष 60 दिनों की बातचीत में कोई निर्णय करेंगे। ईरान के उपविदेश मंत्री काजेम धरीबाबादी ने तस्लीन न्यूज एजेंसी से कहा कि अंतिम समझौते को लेकर अगले 6ˆ दिनों के भीतर बातचीत जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका अपने वादों पर किस हद तक टिका रहता है और पूरा करता है? ई&रान की प्रमुख मार्गों में सैन्य गतिविधियों को रोकना यानी की हर जंग को पूरी तरह रोकना, आर्थिक नाकाबंदी समाप्त करना और विदेशों में जमे हुए ईरानी फंडस को जारी करना शामिल है। समझौते में लेबनान में युद्ध विराम का भी प्रावधान शामिल है। वित्तीय मुद्दों पर मतभेदों के बावजूद व्यापक समझौते को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली हैं। ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, फ्रांस और भारत ने इसका स्वागत किया है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य मध्य-पूर्व में स्थायी शांति स्थापित करना है। ऐसे में अगर समझौता सफल रहता है तो वैश्विक बाजारों को भी बड़ी राहत मिल सकती है। बस यह टिका रहे? अंत में इजरायल-मोसाद कुछ भी कर सकता है। ईरानी लीडरशिप की हत्या भी करवा सकता है ताकि यह युद्ध विराम टूट जाए।
-अनिल नरेन्द्र