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Thursday, 23 July 2026

क्या नेतन्याहू न्यूयार्क में गिरफ्तार हो सकते हैं?

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के गलियारों में इस समय न्यूयार्क से उठी एक आवाज ने हलचल मचा दी है। न्यूयार्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी ने कहा है कि अगर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सितम्बर में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में हिस्सा लेने के लिए न्यूयार्क आते हैं तो उनकी गिरफ्तारी की संभावना पर उनका कार्यालय अब भी विचार कर रहा है। द न्यूयार्क टाइम्स के पॉडकास्ट द इंटरव्यू में ममदानी ने कहा कि उनका कानूनी विभाग नेतन्याहू की संभावित गिरफ्तारी के कानूनी पहलुओं पर सक्रिय रूप से विचार कर रहा है। ममदानी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा करने का वादा भी किया था। ममदानी ने कहा, मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू की जगह हेग में है। वे एक युद्ध अपराधी हैं, जिन पर अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) ने आरोप लगाए हैं कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू की वजह से कई वर्षें में उनके कदमों के कारण जो हालात पैदा हुए हैं, उसे देखते हुए बहुत से लोग यही राय रखते हैं। जब ममदानी से पूछा गया कि कानून उन्हें इस मामले में क्या ऐसा करने की अनुमति देता है तो उन्होंने जवाब दिया, इस पर हमारी कानूनी विभाग के साथ सक्रिय चर्चा चल रही है, लेकिन हमारे राष्ट्रीय स्तर पर कई बार देखा है कि कुछ लोग अपने हिसाब से कानून लिखने या कानूनी दायरे से बाहर जाने की कोशिश करते हैं। हमारी मंशा ऐसा करना नहीं है। बता दें कि अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने 2024 में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और इजरायल के कुछ अन्य नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। उन पर 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद गाजा में युद्ध अपराध के आरोप लगाए गए हैं। यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि गाजा में जारी मानवीय त्रासदी से आहत दुनिया के एक बड़े हिस्से की अंतरात्मा की आवाज है। मेयर ममदानी का संकल्प अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने बेंजामिन नेतन्याहू के अलावा पूर्व रक्षा मंत्री गैलेंट के खिलाफ भी गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं। इन नेताओं पर गाजा में युद्ध के एक तरीके के रूप में भुखमरी का इस्तेमाल करने, भोजन, पानी, ईंधन और दवाओं जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को व्यक्तिगत रूप से रोकने और नागरिकों पर जानबूझकर हमले करने जैसे गंभीर आरोप हैं। ममदानी ने अपनी मंशा स्पष्ट करते हुए कहा कि वे न्यूयार्क शहर के कानून विभाग के साथ लगातार संपर्क में हैं ताकि यह जाना जा सके कि उनके पास एक विदेशी नेता व एक राष्ट्राध्यक्ष को हिरासत में लेने का कितना अधिकार है? उन्होंने कहा न्यूयार्क शहर में कानून मुझे जो कुछ भी करने की अनुमति देगा, हम वही करेंगे। हालांकि कुछ कानूनी जानकारों का मानना है कि अमेरिका आईसीसी का सदस्य नहीं है, इसलिए मेयर के लिए ऐसा करना जटिल हो सकता है। भले लॉ स्कूल के प्रोफेसर हेरोल्ड हौगजू कोह के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर शहर की सड़कों पर चलते समय नेतन्याहू की स्थिति संवेदनशील हो सकती है। इस संभावित कदम पर नेतन्याहू ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने ममदानी पर पलटवार करते हुए उन्हें हमास का समर्थक और गुप्त रूप से अमेरिका से नफरत करने वाला तक कह डाला। नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल अमेरिकी मूल्यों के साथ खड़ा रहने वाला लोकतंत्र है। उधर ममदानी इन आरोपों को खारिज करते हैं। इस बीच ममदानी के बयान पर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। कई लोगों ने इसे ममदानी का बड़बोलापन बताया है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी दूत माइक वाल्ट्स ने इस खबर पर पोस्ट किया। मेयर ममदानी, ये चार वजहें बताती है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान न्यूयार्क में प्रधानमंत्री नेतन्याहू को क्यों नहीं गिरफ्तार किया जा सकता है। पहला-अमेरिका उस संधि का पक्षकार नहीं है, जिस पर अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय की कानूनी-व्यवस्था आधारित है। दूसरा-संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय समझौते के अनुसार बैठकों में आने वाले विदेशी सरकार के प्रमुखों को राजनयिक संरक्षण प्रदान करता है। तीसरा-राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख की कानूनी इम्यूनिटी भी ऐसे मामलों में लागू होती है और चौथा- विदेश नीति ऐसे मामलों में संघीय सरकार का अधिकार स्थानीय प्रशासन से ऊपर होता है। इसलिए न्यूयार्क के मेयर की इच्छा या घोषणा से ऐसा कोई भी कदम उठाया नहीं जा सकता। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 21 July 2026

होर्मुज ईरान का ट्रंप कार्ड

ईरान ने होर्मुज स्टेट बंद कर अमेरिका के सभी रणनीतिक गणित और वैश्विक बाजार को हिला दिया है। यह ईरान का ऐसा तुरुप का पत्ता है जिसने ट्रंप को चारों खाने चित्त कर दिया है। ईरान ने बिना कोई बड़ा परमाणु कदम उठाए सिर्फ एक समुद्री रास्ते की चाबी अपने हाथ में लेकर अमेरिका के पूरे जंग की रणनीति को बदल दिया है। अब अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध का सबसे बड़ा मुद्दा होर्मुज को खोलने, खुलवाने का बन गया है। याद रहे कि 28 फरवरी से पहले यह होर्मुज कभी भी बंद नहीं हुआ था। यह विचार तो ईरान को तब आया जब अमेरिका ने 28 फरवरी को इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमले किए। ईरान ने होर्मुज का ताला लगाकर अमेरिका के सामने यह साफ कर दिया है कि अगर बातचीत करनी है तो शर्तें ईरान की होगी। होर्मुज का बंद होना न सिर्फ मध्य-पूर्व में ही असर डाल रहा है पर इसका प्रभाव अमेरिका में भी सीधा पड़ रहा है। मैं बात कर रहा हूं अमेरिका में होने वाले मिड टर्म चुनाव की जिनमें ट्रंप का राजनीतिक भविष्य कुछ हद तक टिका हुआ है। ईरान ने ठीक उसी समय होर्मुज पर दबाव बनाया है, जब अमेरिकी कूटनीति सबसे कमजोर मोड़ पर है। ईरान से तंग अमेरिकी कूटनीति के लिए एक बड़ा मिस कैलकुलेशन साबित हुआ है। सीजफायर खत्म होने के बाद से ही अमेरिका ईरान पर मिसाइलें बरसा रहा है और ईरान जवाबी हमले कर रहा है। लेकिन ईरान ने फिर अमेरिका को झुकाने के लिए अपने ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया और बारूदी धमाकों के बीच ईरान ने एक बार फिर होर्मुज को बंद कर दिया। ये ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका में मिड-टर्म चुनाव सिर पर हैं और अमेरिकी जनता से पेट्रोल के दाम गिरने का दावा कर रहे थे। ईरान ने ठीक उसी वक्त अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सबसे कमजोर नस यानी कच्चे तेल की सप्लाई पर पैर रख दिया है। अमेरिका-ईरान के बीच हमलों के बाद तेल की कीमतों में 3ज्ञ् से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई है। होर्मुज स्टेट ने तनाव बढ़ने और कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा होने की वजह से नवम्बर में होने वाले अमेरिकी मिड-टर्म चुनावों पर इसका सीधा असर पड़ने वाला है। वॉलिट और वोट समीकरण अमेरिकी राजनीति का कड़वा सच है क्योंकि अमेरिकी राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि राष्ट्रपति चाहे कोई भी वादा करे, लेकिन वोटर अपना फैसला पेट्रोल पंप पर तेल की कीमतों को देखकर ही तय करता है। इससे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उसकी विरोधी पाटी रिपब्लिकन पाटी पर भारी राजनीतिक दबाव बढ़ेगा? राष्ट्रपति ट्रंप के सत्ता में आने के बाद पेट्रोल के दाम 2.50 डॉलर प्रति गैलन तक लाने का वादा किया था, लेकिन होर्मुज संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतें 80 डॉलर से 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जिससे पेट्रोल के दाम घटने के बजाय बढ़ रहे हैं। पेट्रोल महंगा होने का मतलब है आज अमेरिकी परिवार के बजट पर सीधा दबाव पड़ेगा, अमेरिकी जनता की जेब पर सीधी मार होगी। इससे अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी, ट्रांसपोर्टेशन बढ़ने से सुपर मार्केट के सामान से लेकर हवाई टिकट तक सब महंगा होगा। इतिहास गवाह है कि जब भी चुनाव से ठीक पहले अमेरिका में ईंधन के दाम बढ़े हैं। सत्ताधारी दल को चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ा है। जैसे 1979 में जिमी कार्टर के साथ हुआ था। होर्मुज बंद होते ही वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ने लगे हैं। इंटरनेश्नल बेच मार्क ब्रेट क्रूड 3.92ज्ञ् से बढ़कर 78.99 डॉलर प्रति बैरल हो गया और अमेरिकी क्रूड 3.44ज्ञ् से बढ़कर 73.87 डालर प्रति बैरल हो गया है। अगर होर्मुज लंबे समय तक यूं ही बंद रहता है तो इसका असर अमेरिका पर ही नहीं पूरे विश्व पर पड़ेगा और ऐसा होने से रोकने की चाबी सिर्फ ईरान के हाथ में है। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 18 July 2026

ट्रंप: मोजतबा खामेनेई 90 फीसदी खत्म?

ईरान के नए सर्वेच्च नेता मोजतबा अली खामेनेई अपने पिता आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भी नहीं दिखे थे और तब से ही उनकी सेहत को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फॉक्स न्यूज से कहा कि आयतुल्लाह अली खामनेई मारे जा चुके हैं और उनके बेटे मोजतबा खामेनेई भी 90 फीसदी खत्म हो चुके हैं। ट्रंप ने आगे कहा कि उनके पास अब कोई नौसेना नहीं बची है, उनकी वायु सेना भी नहीं बची है, सब कुछ खत्म हो चुका है। उनका एयर डिफेंस सिस्टम भी खत्म हो चुका है। उनके सभी नेता मारे जा चुके हैं। उनके सबसे बेहतरीन नेता मारे जा चुके हैं। इससे पहले मोजतबा खामेनेई के नाम से शनिवार को जारी एक लिखित बयान में पूर्व सर्वेच्च नेता आयतुल्लाह अली खामनेई की हत्या का बदला लेने की कसम खाई। बयान में कहा गया था कि हम अपने पवित्र खून और इन दोनों युद्धों में शहीद हुए सभी लोगों के खून का बदला लेने की कसम खाते हैं। दुनिया भर में ऐसे लोग मौजूद हैं जो बदला लेने को तैयार हैं। इसी साल 23 अप्रैल को अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें बताया गया था कि ईरान के नए सर्वेच्च नेता मोजतबा खामेनेई अमेरिका-इजरायल के उस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसमें उनके पिता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई थी। हालांकि वह मानसिक रूप से पूरी तरह सक्रिय हैं। अखबार ने अधिकारियों के हवाले से कहा था, उनके एक पैर का तीन बार ऑपरेशन किया गया है और अब उन्हें कृत्रिम संक्रमित पैर (प्रोस्येटिक) लगाए जाने का इंतजार है। उनके एक हाथ की भी सर्जरी हुई है और उसकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे वापस आ रही है। उनके चेहरे और होंठ पूरी तरह झुलस गए हैं, जिससे उन्हें बोलने में कठिनाई होती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि आखिरकार उन्हें प्लास्टिक सर्जरी की भी जरूरत होगी। बता दें कि इसी साल 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल हवाई हमलों में आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद मोजतबा खामेनेई को सर्वेच्च नेता नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के बाद से ही वह सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए हैं। उन्होंने कोई वीडियो संदेश भी जारी नहीं किया है। इससे इस बात को लेकर सवाल उठे हैं कि उसी हमले में वह कितने गंभीर रूप से घायल हुए थे? आयतुल्लाह अली खामेनेई के अन्य तीन बेटे मसूद, मुस्तफा और मेमसाम रविवार को आयोजित श्रद्धांजलि सभा में शामिल हुए थे। उनके साथ राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और रिव्यूल्शनरी गार्ड्स के प्रमुख अहमद वहीदी सहित कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। जून में जारी एक बयान में मोजतबा खामेनेई ने कहा था कि सिद्धांत रूप से वह अमेरिका के साथ डील के पक्ष में नहीं थे। लेकिन राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के आश्वासनों के बाद ही उन्होंने इसकी अनुमति देने का फैसला किया। कुवैती अखबार अल जरीदा ने मार्च 2026 में एक रिपोर्ट की थी। इसके मुताबिक मोजतबा खामेनेई को शुरुआत में इलाज के लिए मास्को ले जाया गया था। उसके बाद मोजतबा के स्वास्थ्य को लेकर कोई खबर नहीं आई। इस वक्त मॉस्को खुद असुरक्षित है, वहां लगातार यूव्रेन का हमला हो रहा है, इसलिए इस वक्त चीन को मोजतबा के लिए सुरक्षित माना जाता है। ईरानी जनता चाहती है कि जल्द आयतुल्लाह मोजतबा आवाम के सामने आएं ताकि दुनिया देख सके कि वह ठीक हैं, सुरक्षित हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 16 July 2026

आंख के बदले आंख

मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान ने दावा किया कि उसने आंख के बदले आंख नाम से सैन्य अभियान शुरू करते हुए खाड़ी क्षेत्र में मौजूद ठिकानों पर मिसाइल हमले किए हैं। ईरान का कहना है कि यह कार्रवाई हाल के अमेरिकी हमलों के जवाब में की गई है। इस दावे के बाद पूरे क्षेत्र में युद्ध तेज हो गया है। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब एक बार फिर खुली जंग का रूप ले चुका है। यह संघर्ष अब सिर्फ सीमित क्षेत्रों तक ही नहीं रहा बल्कि पूरे मिडल ईस्ट, वैश्विक तेल बाजार और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार तक फैल चुका है। यह कहना गलत नहीं होगा कि अब यह युद्ध बढ़ता जा रहा है और भयानक रूप अख्तियार कर सकता है। ईरान के सरकारी मीडिया के मुताबिक इस अभियान के तहत खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। ईरान का दावा है कि उसका उद्देश्य उन ठिकानों को जवाब देना था, जहां से उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई की गई थी। ईरान ने इस सैन्य कार्रवाई को आंख के बदले आंख (आई फॉर एन आई) नाम दिया है। इस नाम का सीधा संदेश है कि वह अपने खिलाफ हुई हर सैन्य कार्रवाई का जवाब देगा। ईरान लंबे समय से कहता आ रहा है कि अगर उसकी देश की सुरक्षा या उसके सैन्य ठिकानों पर हमला होगा तो वह जवाबी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। इसी नीति के तहत उसने पहले भी कई बार जवाबी कार्रवाई की घोषणा की है। ईरान की आईआरजीसी ने दावा किया है कि उसने आई फॉर एन आई अभियान के तहत जार्डन, बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। पहले चरण में जार्डन के प्र्रिंस हसन एयरबेस पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए। दूसरे चरण में बहरीन के शेख ईसा एयरबेस पर हमला कर हेलीकॉप्टर और ड्रोन सुविधाओं को निशाना बनाया गया। तीसरे चरण में कुवैत के अली अल-अलेम एयरबेस और अहमद अल-जाबेर एयरबेस पर हमले का दावा किया गया। ईरान ने कहा कि यह कार्रवाई अमेरिकी सैन्य हमलों के जवाब में की गई है। खाड़ी क्षेत्र दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का सबसे अहम केन्द्र माना जाता है। यहीं से दुनिया के बड़े हिस्से में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है। अगर अमेरिका ईरान के बीच यह युद्ध और तेजी पकड़ता है तो इसका सीधा असर होर्मुज स्टेट पर पड़ेगा, बल्कि पड़ना शुरू हो गया है। अमेरिका के लगातार ईरान पर हमलों के जवाब में ईरान ने होर्मूज बंद करने का एलान भी कर दिया है। इसका सीधा असर अंतर्राष्ट्रीय तेल कीमतों, शिपिंग लागत और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ेगा। भारत जैसे देश जो अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी से पूरा करते हैं, वे भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। यह पहली बार नहीं जब ईरान ने बदले के लिए सैन्य कार्रवाई का वादा पूरा करने का प्रयास किया है। जनवरी 2020 में जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद ईरान ने इराक में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें दागी थीं। अप्रैल 2024 में दमिश्क स्थित ईरानी दूतावास पर हमले के बाद भी ईरान ने पहली बार सीधा अपनी जमीन से इजरायल पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए थे। इससे साफ है कि ईरान अपनी सुरक्षा नीति में जवाबी कार्रवाई को महत्वपूर्ण रणनीति मानता है। 

 -अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 14 July 2026

ट्रंप की हत्या की साजिश


इजरायल ने अमेरिका के साथ ऐसी नई जानकारी देने का दावा किया है, जिसमें ईरान पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया है। अमेरिकी मीडिया में यह दावा किया गया है। ट्रंप इस पर भड़क गए और अपना आपा खो बैठे हैं। अमेरिका का प्रतिष्ठित समाचार पत्र द वॉल स्ट्रीट जर्नल में एक रिपोर्ट छपी है, जिसके मुताबिक इजरायल ने अमेरिका को बताया है कि उसके पास खुफिया रिपोर्ट है। खुफिया जानकारी है जिसके अनुसार तेहरान ट्रंप की हत्या की नई योजना बना रहा है। मोसाद ने ये इंटेल शेयर की है और ट्रंप से कहा है कि वे ईरान के टारगेट नंबर वन पर है। इसका नतीजा यह हुआ कि नाटो के समिट के बाद ट्रंप ने डर कर अपना नया एयर फोर्स वन बदल डाला और अमेरिका से पूरा एयर फोर्स वन मंगवाया और उसमें वापस अमेरिका पहुंचे। उधर ट्रंप ने दावा किया कि अगर ईरान उनकी हत्या करने में सफल होता है तो उन्होंने पहले ही एक आदेश दे रखा है कि अगर ईरान अमेरिका पर हमला करता है, जैसा दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा होगा ऐसा जवाब दिया जाएगा। ट्रंप ने कहा है कि 1000 मिसाइलें ईरान को अपने निशाने पर लिए हुए हैं। उन्होंने कहा कि अगर ईरान उनकी हत्या करने में सफल होता है तो उन्होंने पहले से ही एक आदेश दे रखा है। न्यूयार्क पोस्ट को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि इस आदेश के मुताबिक ईरान पर इतना बड़ा जवाबी हमला करे जैसा दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा होगा। सवाल उठता है कि क्या ट्रंप ऐसा कोई आदेश दे भी सकते हैं या फिर इतिहास में किसी नेता ने ऐसा आदेश दिया था। अमेरिकी संविधान के तहत कोई भी राष्ट्रपति ऐसा आदेश नहीं छोड़ सकता कि उसकी मौत के बाद अपने आप किसी देश पर हमला कर दिया जाए। किसी भी बड़े सैन्य अभियान का फैसला उस समय जो राष्ट्रपति होगा वही तय करेगा। क्योंकि कमांडर इन चीफ के आदेश पर ही अमेरिकी सेना ऐसा कुछ कर सकती है। ट्रंप का यह बयान सिर्फ ईरान के लिए नहीं बल्कि अमेरिकी जनता के लिए भी एक राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। एक तरफ वह अपने समर्थकों के सामने यह छवि बनाना चाहते हैं कि वह निडर हैं और सख्त नेता हैं जो किसी भी धमकी के आगे नहीं झुकेंगे, दूसरी तरफ ईरान को यह संदेश देना चाहते हैं कि अगर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई हुई तो जवाब पूरे देश को मिलेगा। सभी जानते हैं कि इजरायल अमेरिका-ईरान के शांति-वार्ता से परेशान है और इसे हर हालत में तोड़ना चाहता है। वह ट्रंप कितने बहादुर हैं यह भी जानती है। इससे बेहतर क्या हो सकता है कि यह खबर चला दो कि आप ईरान के टारगेट नंबर वन हैं। इससे ट्रंप मजबूरन ईरान पर हमला कर देंगे और एक बार फिर युद्ध शुरू हो जाएगा। हुआ भी यही। अमेरिका ने ईरान पर ताबड़तोड़ हमले कर दिए और ईरान ने भी जबर्दस्त जवाबी कार्रवाई कर दी। एक बार फिर मध्य-पूर्व जंग की आग में धकेल दिया गया। वैसे हम ट्रंप और नेतन्याहू से पूछना चाहते हैं कि जब आपने 28 फरवरी को अयातुल्ला अली खामेनेई और उनके लगभग पूरे परिवार को निशाना बनाया था, जिसमें उनकी 14 महीने की पोती भी शामिल थी, 40 से अधिक टॉप के मिलिट्री कमांडरों को निशाना बनाया था तब आपको यह ख्याल नहीं आया था कि ईरान भी ऐसा कर सकता है और अपने सुप्रीम लीडर की हत्या का बदला ले सकता है? अब जब अपने पर पड़ी तो आप को नानी याद आ गई। वैसे भी इजरायल के मंत्री ने खुलेआम ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई की हत्या करने की खुली धमकी दी थी। शहीद अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में आपने देखा होगा कि किस तरह करोड़ों लोगों ने अपने रहबर की हत्या का बदला लेने की कसम खाई थी। ईरान आपसे बदला ले सकता है और ले भी रहा है पर इस तरह नहीं जैसे नेतन्याहू और मोसाद आपको बेवकूफ बनाकर अपने हित साध रहा है।
- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 11 July 2026

20 दिन भी नहीं टिक पाया युद्ध-विराम

 
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम पर बनी सहमति कायम हुए 20 दिन भी नहीं हुए कि दोनों देश न केवल फिर से आमने-सामने आ गए, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी कह दिया कि मेरे हिसाब से अब युद्ध विराम खत्म हो चुका है। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए। यह तो होना ही था। यह युद्ध विराम ही अविश्वास के साथ शुरू हुआ था। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते थे। अमेरिका यह युद्ध विराम इसलिए चाहता था कि ट्रंप अमेरिकी जनता के दबाव को झेलने में मुश्किल का सामना कर रहे थे और वह किसी भी हालत में इस युद्ध को रोकना चाहते थे। चाहते तो वो ये भी थे कि किसी सम्मानजनक तरीके से वह इससे बाहर निकलें। दूसरी ओर ईरान इसलिए तैयार हुआ था कि उसने सोचा कि 20 दिन की जंग में जो उसे नुकसान हुआ है उसकी भरपाई कर सके और इतना दबाव अमेरिका पर बना सके कि वो उसकी शर्तें पर समझौता कर ले। हालांकि वह जानता था कि ट्रंप युद्ध-विराम की शर्तों का आदर नहीं करेंगे पर फिर भी उन्होंने जुआ खेला। अमेरिका और ईरान के बीच फिर से जंग छिड़ गई है। ट्रंप शायद अब इस निष्कर्ष पर पहुंच गए हैं कि यह संघर्ष अब एक निर्णायक मोड पर पहुंच सकता है। अब वह आशावादी काफी कम हो गए हैं और ट्रंप ने लंबे समय तक फिर से हमले शुरू कर दिए हैं। ट्रंप के ऐलान के बाद अमेरिकी सेना ने ईरान पर हमले शुरू कर दिए हैं। सेना ने खुद बयान जारी कर इसकी जानकारी दी है। ईरान के अलग-अलग इलाकों में हमले किए जा रहे हैं। अबू मूसाआइलैंड, बंदर अब्बास जैसे ईरानी महत्वपूर्ण ठिकानों पर अमेरिका धमाके कर रहा है। चाबहार में भी हमले हुए हैं जिससे एवं यहां बिजली सप्लाई कट गई है। अमेरिका का कहना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में हुए जहाजों पर अटैक का यह बदला है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने होर्मुज स्टेट में आवाजाही को खतरे में डालने को ईरान की क्षमता को और कमजोर करने के लिए उसके खिलाफ अतिरिक्त हमले शुरू कर दिए हैं। अब अमेरिका, महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय जलमार्ग पर स्वतंत्र रूप से आवागमन कर रहे जहाजों और नागरिक दल के खिलाफ हाल ही में किए गए हमलों के लिए ईरान को जवाबदेह ठहरा रहा है। जवाब में ईरान ने बहरीन और कुवैत में 85 जगह मिसाइलें और ड्रोन दागे। ज्यादातर हमले बहरीन-कुवैत में अमेरिकी बेस पर हुए। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजेश्कियान ने कहा कि धोखा देना अमेरिका की फितरत में है, लेकिन ईरान अपना हक लेकर रहेगा। अमेरिका के हमलों के बाद पजेश्कियान अफरा-तफरी में इराक के कर्बला से तेहरान लौट गए। इस बीच देर रात ईरान ने चेतावनी दी है कि अमेरिका यदि हमला करता है तो होर्मुज को पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा। इस बीच अमेरिका ने डील के तहत ईरान को तेल बेचने की छूट की फूट दी थी। 2019 के बाद पहली बार ईरान को डॉलर के बदले तेल बेचने की मंजूरी मिली थी। तुर्किये में नाटो समिट में ट्रंप ने कहा ईरानी लोग बीमार मानसिकता के लोग हैं। उनके साथ आगे बातचीत करते वक्त की बर्बादी है। मैंने शांति लाने की कोशिश की लेकिन अब जल्द ही कहर फैलेगा। ट्रंप के बयान के तुरन्त बाद बुधवार तड़के ईरान के अहम पोर्ट बंदर अब्बास समेत 80 ठिकानों पर ताबड़तोड़ एयर स्ट्राइक की। ईरान के 8 फौजी मारे गए जबकि 60 पावर प्लांट्स तबाह हो गई। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बेगर गालिबाफ ने इन हमलों पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, अमेरिका ने अब तक यह नहीं सीखा है कि धमकाने और खुद वादे तोड़ने की कीमत अब चुकानी पड़ेगी। मैं साफ शब्दों में कहता हूं अगर आप हमले करेंगे तो जवाबी हमले भी झेलेंगे। यह मानने के अपने-अपने कारण हैं कि जैसे ईरान होर्मुज पर आधिपत्य जमाने की कोशिश कर रहा है। वैसे ही अमेरिकी राष्ट्रपति भी दुनिया और अपने देशवासियों को यह दिखाने को आतुर हैं कि वे ईरान को अपनी शर्तें पर झुकने के लिए बाध्य कर सकते हैं। अब यह युद्ध लम्बा खिंचने की पूरी संभावना है। शायद इजरायल भी यही चाहता है कि युद्ध-विराम टूटे और एक बार फिर ईरान पर मुकम्मिल हमला हो। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 9 July 2026

ट्रंप का तंज:आंसू नकली हैं

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि ईरान में इतनी बड़ी संख्या में लोग अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में रो रहे थे। एक्सियोस को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि उन्हें लगा था कि ईरान की जनता खामेनेई से नफरत करती है। इस पर उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि शायद यह आंसू नकली हों। जनाजे में ईरान के शीर्ष नेतृत्व के मौजूद होने के सवाल पर ट्रंप ने दावा किया है कि यदि अमेरिका चाहे तो एक ही हमले में ईरान के मौजूदा नेतृत्व को खत्म कर सकता है। उन्होंने कहा कि वे सभी वहां मौजूद हैं। एक ही हमले में हम सभी खत्म कर सकते हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि फिर हमारे पास बातचीत करने के लिए कोई नहीं बचेगा। ईरान ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका खामेनेई की मौत के बाद छाए गहरे शोक को समझ नहीं पाएगा, क्योंकि न तो उसकी कोई सभ्यता है, न ही इतिहास और न ही सम्मान। उधर, ट्रंप के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए आर्मेनिया स्थित ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया पर कहा, लोगों को मारा जा सकता है पर आदर्शों को नहीं। आपने अयातुल्ला अली खामेनेई को मार डाला पर असल में आपने इत्र की एक ऐसी शीशी तोड़ दी जिसकी खुशबू हर जगह फैल गई। बता दें कि ईरान में 36 साल तक सत्ता में रहे खामेनेई की 28 फरवरी को अमेरिकी इजराइली हमले मौत हो गई थी। 97 वर्ष के शिया धर्मगुरु अयातुल्ला जाफर सोमानी ने तेहरान की ग्रैंड मोसाला में अयातुल्ला अली खामेनेई, व उनके परिवार के दिवंगत सदस्यों के लिए प्रार्थना कराई। यहां अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे मसूद, मेयसाम व मुस्तफा भी मौजूद थे। इन्हें युद्ध शुरू होने के बाद से नहीं देखा गया था। मौजूदा सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई नहीं देखे गए। रिव्यूशनरी गार्ड के प्रमुख जनरल अहमद वाहिदी भी युद्ध के बाद पहली बार दिखे। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, संसद के स्पीकर मो. बाघेर गालिबाफ व कुदस बलों का नेतृत्व करने वाले इस्माइल थानी भी मौजूद थे। ग्रैंड मोसाला में लगे पोस्टरों व दीवारों पर लिखे संदेशों में ट्रंप व इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को मारने की मांग की गई। कवि रासोली ने प्रार्थना से पूर्व कार्यक्रम का संचालन किया और अमेरिका-इजरायली मुर्दाबाद के नारे लगवाए। उधर, ईरान के सीनियर सैन्य अधिकारी अली शादमानी ने अमेरिका और इजरायल को चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई का उसकी सशस्त्र सेनाएं कड़ा जवाब देंगी। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास आराघची ने भी दोहराया कि देश की जनता या नेतृत्व किसी भी खतरे का तत्काल और मजबूत जवाब दिया जाएगा। यह बयान इजरायल के रक्षामंत्री की ईरानी सुप्रीम लीडर को मारने की धमकी से जुड़ी टिप्पणी के बाद आया। बता दें कि शहीद अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में उनके अंतिम दीदार करने करोडों लोग सडकों पर उतरे। ऐसी अंतिम यात्रा दुनिया में पहले कही भी नहीं देखी गई। अंतिम संस्कार में भारत समेत 70 से अधिक देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। विदेश मंत्री अब्बास आराघची ने कहा कि 70 से अधिक देशों के प्रतिनिधि सर्वोच्च नेता ग्रैट अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल हुए। इनमें हमारे वफादार अरब भाई भी शामिल हैं।

- अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 7 July 2026

खामेनेई के अंतिम विदाई की रस्में शुरू

बीते 28 फरवरी को अमेरिकी इजरायली हमले में शहीद हुए ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई का अंतिम संस्कार चार महीने बाद चार जुलाई से तेहरान में शुरू हो गया है। ईरानी अधिकारी इसे सदी का अंतिम संस्कार बता रहे है। उनके अनुसार 1.2 करोड़ से दो करोड़ लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। इन तैयारियों की अगुवाई तेहरान स्थित मोहम्मद रसूल्लाह कोर कर रहा है। यह इस्मामिक रिवाल्यूशनरी गार्ड कोर की प्रमुख इकाई है। करीब 800 विदेशी पत्रकार इस कार्यक्रम की कवरेज के लिए तेहरान में मौजूद हैं। अयातुल्ला खामेनेई का अंतिम संस्कार कई दिनों तक चलने वाली अंतिम विदाई की रस्में शुक्रवार को शुरू हो गई। तेहरान में जगह-जगह बैनर लगाए गए हैं, जिसमें लोगों से अपील की गई है कि वे इस विनाशकारी युद्ध के बाद इस्लामिक रिपब्लिक के समर्थन में एकजुट हों। उनके जनाजे को ईरानी शहरों और पड़ोसी देश इराक में ले जाया जाएगा। खामेनेई और उनके परिवार के सदस्यों के ताबूत ईरानी झंडे में लपेटकर तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला मस्जिद में रखे गए है। मृतकों में उनके दामाद, उनकी सबसे बड़ी बेटी और एक छोटा ताबूत उनकी 14 महीने की पोती का है जिसे देकर सभी का दिल दहल गया। ताबूतों में अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई की पत्नी भी शामिल है। कार्यक्रम में शामिल होने के लिए लगभग 50 देशों के प्रतिनिधिमंडल तेहरान पहुंचे हैं। भारत और सउदी अरब का प्रतिनिधिमंडल भी इनमें शामिल है। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान सामने आया है। उन्होंने ईरान पर तीखा तंज कसा है तो वहीं दूसरी तरफ ईरानी लोगों ने अमेरिका मुर्दाबाद के नारे लगाए और खामेनेई के कातिलों से बदला लेने की कस्में खाई। ट्रंप ने तेहरान पर कटाक्ष करते हुए कहा कि अमेरिका ने ईरान को अंतिम सरकार के लिए एक हफ्ते का समय इसलिए दिया क्योंकि वाशिंगटन अच्छा देश है। उन्होंने अमेरिकी प्रशासन की कार्रवाई को सही ठहराते हुए कहा कि युद्ध में ईरान की बुरी तरह हार हुई है। ईरानी अधिकारियों ने अंतिम संस्कार का नारा वी मस्ट राइज रखा है जिसके साथ मुट्ठी भींचे हुए हाथ का प्रतीक जोड़ा गया है। खामेनेई का ताबूत एक ऊंचे मंच पर रखा गया है। भीड़ प्रबंधन इस तरह से किया गया है कि लोग 15-20 मिनट के भीतर अंदर जाकर बाहर निकल सकें। बुधवार को खामेनेई का पार्थिव शरीर नजफ से लाया जाएगा। वहां शिया इस्लाम के पहले इमाम अली की दरगाह पर जुलूस निकाला जाएगा इसके बाद श्रद्धांजलि समारोह कर्बला में जारी रहेगा, फिर पार्थिव शरीर वापस, ईरान लाया जाएगा। एक बड़ा सवाल यह कि जनाजे की नमाज कौन पढ़ाएगा। शिया परंपरा में यह भूमिका धार्मिक और राजनीतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है। ईरान के सर्वोच्च नेता बनने के बाद से मोजतबा खामेनेई जो कि अब ईरान के सुप्रीम लीडर है को अभी तक सार्वजनिक रूप से देखा नहीं गया है। अभी तक यह भी नहीं कहा जा सकता कि वह अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होंगे या नहीं? अमेरिका- इजरायल युद्ध के बीच यह एक अपने प्रकार का अनूठा अंतिम संस्कार है। ईरानी खुफिया एजेंसियों ने मोजतबा से अंतिम संस्कार में शामिल होने से मना किया है। क्योंकि इजरायल के एक मंत्री ने खुलेआम धमकी दी है कि मोजतबा को हम मार कर रहेंगे। हालांकि मोजतबा खामेनेई डरने वालों में से नहीं है। यह भी सम्भव है कि इतने दिन चलने वाली इस अंतिम विदाई में कहीं न कहीं बगैर शोर मचाए मोजतबा अपने पिता को श्रद्धांजली देने पहुंच जाएं। हालांकि भारत में ईरान के अधिकारिक प्रतिनिधि अयातुल्ला हकीम इलाही ने खुलासा किया है कि मोजतबा खुद समर्थकों और देशवासियों के बीच जाने के लिए बेहद उत्सुक है, पर ईरान की टॉप खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों ने इस पर वीटो लगा दिया है। मौजूदा हालातों में मोजतबा का सार्वजनिक रूप से समाने आना किसी बड़े खतरे से खाली नहीं माना जा सकता है। दरअसल, इस वक्त ईरान और इजरायल के बीच दुश्मनी अपने चरम पर है और खुफिया इनपुट्स है कि इस बड़े जमावड़े का फायदा उठाकर दुश्मन देश ईरान के बीच नए शीर्ष नेतृत्व को निशाना बना सकता है। इसी खतरे के माहौल की वजह से मोजतबा को नजरों से दूर रखने की रणनीति अपनाई जा रही है।
- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 4 July 2026

कहां है ईरान की 100 अरब डॉलर जब्त संपत्तियां?

विदेशों में ईरान की कुल जब्त या प्रतिबंधित संपत्ति का अनुमान लगभग 100 अरब डॉलर है। इस प्रतिबंधित खातों में तेल से होने वाली कमाई, विदेशी मुद्रा भंडार, बैंकिंग संपत्ति व अन्य दावे शामिल हैं। पहली बार बड़े पैमाने पर संपत्ति तब फ्रीज की गई, जब ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई और अमरीरिकी दूतावास में बंधक संकट पैदा हुआ। 14 नवम्बर 1979 को ईरानी क्रांतिकारियों द्वारा तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा करने के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने अमेरिकी अधिकार क्षेत्र में मौजूद ईरानी सरकार की संपत्ति को ब्लॉक कर दिया। 1980 में ईरान सरकार की लगभग 12 अरब डॉलर की संपत्ति जब्त की गई थी जो ज्यादातर अमेरिकी बैंकों में थी। इसमें नकद, सोना, कई अन्य होल्डिंग्स शामिल थी। इसमें से अधिकांश संपत्ति 1981 के अल्जीयर्स समझौते के तहत जारी कर दी गई थी, जिससे बंधक संकट समाप्त हुआ था। लगभग 4 महीने के युद्ध के बाद अमेरिका-ईरान शांति समझौते की रूपरेखा पर सहमत हुए हैं। इसके बावजूद ईरान की जब्त संपत्तियों पर अड़चन बनी हुई है। एक तरफ ईरान ने 14 सूत्री समझौते के हवाले से रिपोर्ट दी है कि अमेरिका बातचीत शुरू होने से पहले जब्त संपत्ति जारी करने पर सहमत हो। पर ट्रंप के कई बार विरोधाभासी बयानों ने स्थिति को असमंजस में डाल रखा है।
- अनिल नरेन्द्र

ईरान को जल्द मिलेंगे 6 अरब डॉलर

ईरान-अमेरिका के युद्ध में कितनी तबाही हुई है, बताने की जरूरत नहीं है लेकिन संभव है कि ईरान को वास्तव में इस युद्ध से लाभ हो सकता है। यह मैं इसलिए कहा रहा हूं कि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने हाल ही में बड़ा ऐलान किया। दावा किया गया कि कतर में फंसी ईरान की 12 अरब डॉलर की राशि में से 6 अरब डॉलर जल्द जारी कर दिए जाएंगे। कुम शहर में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि ऐसा ईरान-अमेरिका डील के तहत असेट रिलीज करने की पहली किश्त होगी जो उसे कतर से मिलेगी। उन्होंने यह महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि स्विट्जरलैंड में हुई वार्ता और इस्लामाबाद में हुए समझौते के तहत यह राशि रिलीज हो रही है। बाकी 6 अरब डॉलर की वापसी के लिए भी सरकार लगातार कोशिशें कर रही है। पेजेशकियन ने बताया कि शांति समझौते के तहत ईरान के तेल और पेट्रोकैमिकल क्षेत्र पर लगे प्रतिबंध हटा दिए गए है। उन्होंने इसे ईरानी जनता की बड़ी जीत बताया। उन्होंने कहा कि इन प्रतिबंधों के हटने से देश की अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिलेगी। ईरान की अर्द्ध सरकारी न्यूज एजेंसी मेहर ने राष्ट्रपति के बयान को प्रमुखता से प्रकाशित किया है। राष्ट्रपति ने हाल के संघर्ष का जिक्र करते हुए ईरानी जनता की सराहना की। उन्होंने कहा कि सुप्रीम लीडर, मंत्री, सेना कमांडर, बुद्धिजीवी और आम नागरिक भी संकट के समय एकजुट रहे। राष्ट्रपति ने बताया कि संघर्ष के बाद सरकार पुनर्निमाण कार्य शुरू कर चुकी है। आम लोगों को रहात देने के लिए खाद्य सब्सिडी बढ़ाने और अतिरिक्त वित्तीय सहायता देने की योजनाएं भी लागू की जा रही है। ईरान के इस दावे से उम्मीद है कि देश की अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिलेगी। कतर में फंसा पैसा रिलीज होने से तेल निर्यात और अन्य क्षेत्रों में सुधार आ सकता है। यह घटनातम ईरान की विदेश नीति और आर्थिक रणनीतिक में नई दिशा दिखाता है, हालांकि अब तक ईरान में होने वाले 300 बिलियन डॉलर के निवेश को लेकर कोई बात साफ नहीं हुई है। ये फंड कहां से आएगा, कब आएगा इस पर कुछ नहीं कहा गया।
अनिल नरेंद्र 

Thursday, 2 July 2026

ट्रंप और मेलोनी के बीच बिगड़ते रिश्ते

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी से जुड़े कई पोस्ट सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं। इनमें से कुछ में तो ऐसा दिखाया गया है जैसे वो किसी ब्रेक-अप के बाद अपनी जिंदगी बदलने की कोशिश कर रही हों। एक एआई फोटो में उन्हें नए हेयरकट के साथ दिखाया गया है। एक अन्य तस्वीर में उन्हें सिंगल हॉलिडे बुक करते हुए दिखाया गया है। ये सारी तस्वीरें असली नहीं हैं, लेकिन उनका मजाक इसलिए बनाया जा रहा है क्योंकि मेलोनी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच खुले तौर पर विवाद अब सामने आ रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में ट्रंप और मेलोनी का रिश्ता कभी खुले हमलों तक गया, कभी भी निजी तानों तक और फिर थोड़ा ठीक भी हुआ लेकिन इन उठापटक से यूरोप की सबसे चर्चित राजनीतिक दोस्ती ठंडी पड़ गई। कुछ समय पहले तक लोग मेलोनी को ट्रंप की सहयोगी कहते थे। इसकी बानगी जनवरी 2025 में देखने को मिली जब ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह में उन्हें सबसे आगे बैठने की जगह मिली। समारोह में यह अहम जगह पाने वाली वह अकेली यूरोपीय नेता थीं। पिछले अप्रैल में मेलोनी व्हाइट हाउस गई थीं। वहां वह उस उद्देश्य से गई थीं ताकि यूरोपीय सामान पर लगे अमेरिकी ट्रेड टैरिफ को लेकर तनाव कम हो। लेकिन ट्रंप की जैसी आदत है, उनकी अनिश्चितता मेलोनी के लिए मुश्किल भरी साबित हुईं और उनकी साख को देश-विदेश दोनों जगह चोट पहुंची। ट्रंप और मेलोनी में पहली बड़ी दरार मार्च के आखिर में आई। इटली के रक्षा मंत्रालय ने अमेरिकी सैन्य जहाजों को सिसिली के सिगोनेला नाटो एयरबेस इस्तेमाल करने की इजाजत देने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि इसके लिए संसद की मंजूरी जरूरी है। इटली ने ये कदम इसलिए उठाया क्योंकि उनका कानून और जनता दोनों ही ईरान युद्ध के खिलाफ थे। यह विवाद और बढ़ गया। अप्रैल में ट्रंप ने टूथ सोशल पर पोप लियो (14वें) पर हमला करते लिखा, क्योंकि उन्होंने ईरान के खिलाफ युद्ध की चेतावनी व आलोचना की थी। ट्रंप ने उन्हें कमजोर बताया। कैथोलिक देश की नेता मेलोनी ने ट्रंप के बयान को अस्वीकार्य बताया। मेलोनी की सख्त प्रतिक्रिया ट्रंप को पसंद नहीं आई और उन्होंने इटली के अखबार कोरिएरे डेला सेरा से कहा: मैं हैरान हूं, मुझे लगा था कि उनमें हिम्मत है, लेकिन मैं गलत था। वह अब पहले जैसी नहीं रही और इटली भी पहले जैसा देश नहीं रहा। फ्रांस ने जी-7 सम्मेलन में ट्रंप और मेलोनी को बातचीत करते हुए देखा गया था। दोनों देशों के अधिकारियों ने इस बातचीत को सकारात्मक और सामान्य बताया। लेकिन कुछ ही दिनों बाद ट्रंप ने इतालवी चैनल को कहा मेलोनी ने समिट में उनसे फोटो खिंचवाने के लिए मिन्नत की थी। ट्रंप ने कहा कि वह मेरे साथ तस्वीर चाहती थीं, मैं नहीं लेता, लेकिन मुझे उन पर तरस आ गया। मेलोनी ने तुरंत जबाव दिया, उन्होंने वीडियो जारी कर ट्रंप की बात को पूरी तरह मनगढ़ंत बताया। उन्होंने कहा, मुझे नहीं पता कि अमेरिका के राष्ट्रपति अपने सहयोगियों के साथ ऐसा क्यों करते हैं। मैं बस इतना कह सकती हूं कि अफसोस है कि वह पश्चिम के दुश्मनों के खिलाफ ऐसी मजबूती नहीं दिखाते। लेकिन एक बात याद रखनी चाहिए, न मैं और न ही इटली किसी की मिन्नत करता है। इसके तुरंत बाद इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने अपनी प्रस्तावित अमेरिकी यात्रा रद्द कर दी। इटली के राष्ट्रपति सर्जियो मैटारेला ने मेलोनी को फोन कर उनका समर्थन किया। सरकार के सहयोगियों और सांसदों ने भी ट्रंप की टिप्पणियों को अपमानजनक बताया और माफी की मांग की। विपक्ष ने इसे पूरे देश का अपमान कहा। दूसरी तरफ ट्रंप ने फिर दोहराया कि मेलोनी ने बार-बार तस्वीर खिंचवाने की मांग की थी। मेलोनी पर यह भी आरोप लगाया कि वह अब दोबारा दोस्त बनने की कोशिश कर रही हैं। क्योंकि अमेरिका ने ईरान को सैन्य रूप से हरा दिया है। जैसे ही यह विवाद ठंडा पड़ता दिखा तो सैन्य ठिकानों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया। यह विवाद ईरान युद्ध में आपरेशन फ्यूरी के दौरान इटली के अमेरिकी एयरबेस को लेकर उठा। नाटो के महासचिव मार्क रुटे ने बताया कि लगभग 500 विमान इटली में अमेरिकन ठिकानों से ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में उड़ान भरी। लेकिन इटली को यह बात अच्छी नहीं लगी और उसके रक्षा मंत्रालय ने इसे गलत और भ्रामक बताया। मजेदार बात यह है कि दोनों ट्रंप और मेलोनी को जल्द ही अपने देश में चुनाव का सामना करना पड़ सकता है। इटली में आम चुनाव होने हैं तो अमेरिका में मिड टर्म चुनाव हैं। देखते हैं कि अमेरिका और इटली के रिश्ते सुधरते हैं या और बिगड़ते हैं।
- अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 30 June 2026

अलविदा अयातुल्ला अली खामेनेई

28 फरवरी इस साल अमेरिका-इजरायल द्वारा किए गए हमले में अयातुल्ला अली खामेनेई शहीद हो गए थे। उन्होंने किसी बंकर में छिपने की बजाय अपने दफ्तर में ही रहकर शहीद होना मंजूर किया ताकि उनकी कौम दुश्मनों से लोहा ले सके और उनकी शहादत हर देशवासी के लिए प्रेरणा बने। यही हुआ अयातुल्ला अली खामेनेई की शहादत ने ईरान की जनता में एक ऐसा जज्बा पैदा किया कि उसने दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका को अंततः झुकने पर मजबूर कर दिया। ईरान से अब खबर आई है कि उनकी मौत के तीन महीने बाद उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। यानी तीन महीने बाद सुपुर्द-ए-खाक होंगे खामेनेई। सरकार ने तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है और देश के कई बडे शहरों में उनका शोक जुलूस निकाला जाएगा। अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम बिदाई के लिए तीन दिन का कार्यक्रम 4 जुलाई से तय हुआ है। तेहरान, कौम और अशहद में होने वाले इस आयोजन में 2 करोड़ लोगों के जुटने की उम्मीद है। उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को ईरान का सुप्रीम लीडर बनाया गया है। यह पहली बार होगा जब 28 फरवरी के हमले के बाद अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई पब्लिक में दिखेंगे। ईरानी मीडिया के मुताबिक राजधानी तेहरान, कौम और अशहद में बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम होंगे। अकेले तेहरान में मुख्य कार्यक्रम 24 घंटे चलेगा। प्रशासन अनुमानित 2 करोड़ लोगों को संभालने व सुरक्षा को लेकर तैयारियां कर रहा है। यह घोषणा खामेनेई की मौत के कई दिनों बाद हुई। इस्लामिक परंपरा के मुताबिक दफनाने का काम तुरंत होना चाहिए था पर युद्ध के कारण और सुरक्षा के कारण इसे टालना पड़ा। अयातुल्ला अली खामेनेई 86 साल के थे। 28 फरवरी के हमले में वे शहीद हो गए और इसके साथ ईरान पर उनका 30 साल से ज्यादा पुराना शासन खत्म हो गया। वे देश के सबसे ताकतवर, दूरदृष्टि के नेता व रणनीतिकार थे। अयातुल्ला अली खामेनेई भारत के दोस्त थे। शहीद अयातुल्ला अली खामेनेई भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लेखन और उनके विचारों के बहुत बड़े प्रशंसक थे। उनके बीच का मुख्य संबंध व इतिहास रहा है। पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक और उपनिवेशवाद पर विचार खामेनेई ने नेहरू द्वारा लिखी आत्मकथा ग्लिम्पस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री की खुलकर प्रशंसा की। उन्होंने अपने भाषणों में अकसर इस बात का जिक्र किया कि कैसे नेहरू ने अपनी पुस्तकों में विस्तार से लिखा कि इंग्लैंड जैसे छोटे देश ने भारत जैसे विशाल देश के संसाधनों का दोहन कर खुद को कैसे मजबूत किया। खामेनेई के अनुसार यह केवल भारत की कहानी नहीं बल्कि उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद ताकतों की सच्चाई 2012 जब तेहरान में गुटनिरपेक्ष आंदोलन (एनएएम) शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री (डा. मनमोहन सिंह) ने अयातुल्ला अली खामेनेई से मुलाकात की थी तो खामेनेई ने स्वयं जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी को भावभीनी श्रद्धांजलि दी थी। अयातुल्ला अली खामेनेई का एक पुराना वीडियो भी दोबारा सामने आया है जिसमें वह जनता से अपील कर रहे हैं: नेहरू की पुस्तक ग्लिम्पस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री जरूर पढ़ें। उन्होंने विस्तार से समझाया है कि अंग्रेजों ने भारत में क्या-क्या किया। अयातुल्ला अली खामेनेई के जाने से केवल ईरान या इस्लामिक दुनिया को ही क्षति नहीं हुई पूरी दुनिया को उनके जाने का, खासकर जिस तरीके से उनकी शहादत हुई भारी नुकसान हुआ। एक नेक बंदा चला गया। हम शहीद अयातुल्ला अली खामेनेई को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देते हैं।
- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 27 June 2026

आसिम मुनीर की हत्या की साजिश?

जो लोग भी इजरायल और उसकी कुख्यात खुफिया एजेंसी मोसाद से वाकिफ हैं वह जानते हैं कि मोसाद राजनीतिक हत्याएं करवाने में माहिर है। इजरायल के इतिहास में ऐसे दर्जनों केस हैं जहां उसने अपने दुश्मनों के लीडरों को मौत के घाट उतारा है। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है, 28 फरवरी को जब अमेरिका-इजरायल ने ईरान पर हमला किया था तो सबसे पहला काम मोसाद ने यह किया था कि उसने ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई व ईरान टॉप मिलिट्री कमांडरों की हत्या कर दी थी। यह भी किसी से छिपा नहीं कि इजरायल अमेरिका-ईरान के युद्ध विराम से बहुत निराश है और इन एमओयू को तुड़वाने की पूरी कोशिश कर रहा है। मध्य पूर्व में कई देशों में रहस्यमय हमले हो रहे हैं, यह कौन कर रहा है पता नहीं चल रहा है। मुझे हैरानी नहीं हुई जब एक ताजा खबर आई कि मोसाद आसिम मुनीर और पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की जेनेवा में हत्या का प्लान बना रहा था। मैंने अपने 18 जून के सम्पादकीय में जिसका शीर्षक था ः कागजों पर दस्तखत ः जमीन पर धुआं की अंतिम लाइन में लिखा था ः अंत में इजरायल-मोसाद कुछ भी कर सकता है। समझौता तुड़वाने के लिए ईरानी लीडरशिप की हत्या भी करवा सकता है ताकि यह युद्ध विराम टूट जाए। मेरी भविष्यवाणी इस मायने में सफल हुई, हालांकि थोड़ा फर्क यह रहा कि मोसाद ईरानी लीडरों को तो निशाने पर नहीं ले पाया पर उसने पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल पर निशाना साधने की कोशिश जरूर की। बता दें कि ब्राजील के एक वरिष्ठ और जाने-माने पत्रकार पेपे एस्कोबार के इस सनसनीखेज दावे ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा कर दिया है। एस्कोबार ने दावा किया कि इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और स्विट्जरलैंड दौरे पर गए पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की हत्या की साजिश रची थी। एस्कोबार ने दावा किया कि यह प्लान तब फेल हो गया जब पाकिस्तान की सेना को बेहद विश्वसनीय खुफिया जानकारी मिली थी कि इजरायल के प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के निर्देश पर मोसाद जनरल आसिम मुनीर और पूरे पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल को निशाना बनाने की तैयारी कर दी थी। एस्कोबार ने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान ने ओमान के माध्यम से इजराइल को कड़ा संदेश भेजा था कि यदि पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल या जनरल आसिम मुनीर को नुकसान पहुंचाया गया तो उसका गंभीर जवाब दिया जाएगा। यह भी याद दिलाया गया कि पाकिस्तान एक परमाणु संपन्न देश है। इसका मतलब साफ था। इन दावों के सामने आते ही पाकिस्तान ने यह सिरे से खारिज कर दिया। एआरवाई न्यूज के चेयरमैन कामरान खान ने एक वरिष्ठ पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारी के हवाले से कहा कि यह रिपोर्ट पूरी तरह बकवास और निराधार है। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री शाहवाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर का स्विट्जरलैंड दौरा पूरी तरह सुरक्षित और बिना किसी सुरक्षा खतरे के पूरा हुआ। हत्या की साजिश का दावा वास्तविकता से कोई संबंध नहीं रखता और पूरी तरह काल्पनिक है। कटु सत्य तो यह है कि कोई भी एजेंसी ऐसी खबरों की कभी पुष्टि नहीं करता और उन्हें काल्पनिक ही बताता है। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 25 June 2026

वार्ता को दिया मीनाब 168 नाम

 
स्विट्जरलैंड में रविवार को अमेरिका के साथ शांति वार्ता के लिए ईरानी प्रतिनिधिमंडल को मीनाब 168 नाम दिया गया। मानना पड़ेगा कि नैरेटिव सेट करने में ईरानियों का जवाब नहीं है। वह कैसे अपने शहीदों को न तो भूलते हैं और न ही दुनिया को भूलने देते हैं। ईरान चाहता है कि पूरी दुनिया ईरान पर अमेरिका और इजरायल के अत्याचारों की दास्तां देखें और सुनें। ईरानी प्रेस टीवी के अनुसार ये नाम मीनाब स्कूल पर अमेरिकी-इजरायली टॉमहॉक मिसाइल हमले में मारी गई 168 स्कूल बच्चियों के सम्मान में दिया गया। इस स्कूल (मीनाब) पर 28 फरवरी को युद्ध के पहले दिन ही हमला हुआ था। दरअसल, ईरान पिछले तीन महीने से एक कैंपेन मीनाब 168 चला रहा है और इसे खूब प्रसारित कर रहा है। हर मंच पर ईरान उस कैंपेन के साथ नजर आता है। स्विट्जरलैंड और यहां तक की फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल में भी यह नजर आया। आइए इसके पीछे की कहानी भी जानते हैं... स्विट्जरलैंड में अमेरिका के साथ समझौता वार्ता से पहले ईरान ने फैसला लेकर पूरी दुनिया को चौंका दिया। दरअसल, ईरान और स्विट्जरलैंड में अमेरिका के साथ शांति समझौता वार्ता को मीनाब 168 नाम दिया है। अमेरिका से वार्ता के लिए ईरान का प्रतिनिधिमंडल उसी जहाज में पहुंचा जिस पर मीनाब 168 लिखा था। फीफा वर्ल्ड कप 2026 में बेल्जियम के खिलाफ मैच खेलने के लिए मैदान में उतरे ईरान के फुटबाल खिलाड़ियों की जसी पर मीनाब 168 लिखा था। हमले में मारी गई बच्चियों के सम्मान में ईरान दुनिया को उनकी शहादत को भूलने नहीं दे रहा है। पिछले तीन महीने से ईरान पूरी दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि लड़ाई के पहले दिन ही किस तरह अमेरिका-इजरायल ने मानवता की सारी हदें पार करते हुए निर्देष मीनाब स्कूल की बच्चियों को मार डाला। हमले में मारी गई 168 स्कूली बच्चियों के सम्मान में और उन्हें इंसाफ दिलाने के लिए मीनाब 168 अभियान चलाया जा रहा है। आईआरजीसी के कथित ठिकाने पर हमले की आड़ में मिसाइल एक बच्चों के स्कूल पर जा गिरी। अमेरिका इससे इंकार करता रहा। पहले तो उसने कहना शुरू कर दिया कि यह मिसाइल खुद ईरान ने गलती से मार दी पर फिर अमेरिकी मीडिया ने इसका पर्दाफाश करते हुए साबित किया कि यह मिसाइल अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल थी जो बहरीन के एयरबेस से मारी गई थी। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए बहरीन के इस अमेरिकी बेस को निशाना बनाया और तबाह किया। ईरानी प्रतिनिधिमंडल पहले राउंड में इस्लामाबाद पहुंचा था तो जिस विमान में वे आए थे उसकी कुर्सियों पर शहीद हुई बच्चियों के स्कूल बैग, किताबें, खाने के टिफिन इत्यादि रखे हुए थे ताकि सारी दुनिया इस हुए जुल्म को देख सके। ईरान चाहता है कि पूरी दुनिया ईरान पर अमेरिका और इजरायल के अत्याचारों की दास्तां सुने और देखें कि यह दोनों देश अपने फायदे के लिए किस हद तक जा सकते हैं। इसलिए फीफा वर्ल्ड कप 2026 में अमेरिकी शहर लॉसएंजिल्स में ईरान और बेल्जियम के बीच हुए मैच के दौरान कई ईरानी प्रशंसकों ने मीनाब हमले में मारे गए बच्चों को श्रद्धांजलि देने वाली तस्वीरें और जसी लहराई। ईरान के खिलाड़ी भी मीनाब 168 स्टिकर वाली जसी पहने दिखे। एक समर्थक ने एक स्टिकर दिखाया जिस पर एक स्कूल बैग बना था और उस पर 168 लिखा था। हैशटेग एंजल ऑफ मीनाब भी था और संदेश था कि इजरायल और अमेरिका के हमले में मारे गए मीनाब स्कूल के 168 बच्चों को याद रखें। बता दें कि भारत में अप्रैल में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में भी ईरान मीनाब 168 लिखे विमान में भारत आया था। अमेरिका से शांति वार्ता के लिए पाकिस्तान की यात्रा से पहले ईरानी संसद के स्पीकर बगेर गालिबफ ने ईरान के मिजाज का संकेत देते हुए समय पर तस्वीरें शेयर की जिसमें मीनाब हमले में मारी गई स्कूली बच्चियों की फोटो हवाई जहाज की सीटों पर चिपकी हुई थीं और वे उनके सामने खड़े होकर यानी कह रहे हों, इस फ्लाइट में मेरे सहयात्री। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 23 June 2026

शांति व अमन का दुश्मन नेतन्याहू

जब भी पिछले 80 वर्षें का दुनिया का इतिहास लिखा जाएगा उसमें दो नामों का विशेष उल्लेख होगा। जब भी मानवता के नरसंहार का वर्णन आएगा उसमें पहला नाम जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर का होगा और दूसरा नाम इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का होगा। नेतन्याहू इस सदी के नंबर वन विलेन बन कर उभरे हैं। जब भी मध्य-पूर्व में शांति की बात होती है तो उसमें नेतन्याहू कोई न कोई अड़ंगा लगा देते हैं। आप ताजा उदाहरण ही देख लें। अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता चल रही है, एमओयू भी साइन हो गया है पर नेतन्याहू अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे और अब तो वह अपने इकलौते मित्र देश अमेरिका को भी खुलकर गाली दे रहे हैं। यही वजह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कहना पड़ा कि तुम पागल हो चुके हो और मैं अगर तुम्हें न बचाता तो आज तुम जेल में होते। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजरायली कैबिनेट मंत्रियों को लताड़ते हुए कहा कि उन्हें उस ताकतवर सहयोगी पर हमला नहीं करना चाहिए क्योंकि अमेरिका के अलावा उसके साथ आज कोई नहीं है। वेंस ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व्यक्तिगत हमलों से परेशान हैं। उन्होंने ट्रंप को पूरी दुनिया में इजरायल के प्रति सहानुभूति रखने वाला एक मात्र राष्ट्राध्यक्ष कहा है, उन्हें यह भूलना नहीं चाहिए। आखिर नेतन्याहू क्यों किसी भी शांति समझौते का विरोध करते हैं? इसके पीछे नेतन्याहू का राजनीतिक अस्तित्व, सरवाइवल प्रमुख कारण है। नेतन्याहू अपनी गद्दी सुरक्षित रखने के लिए कभी गाजा पर हमले कर रहे हैं, कभी लेबनान पर तो कभी ईरान पर। उनके इस आचरण पर ट्रंप सख्ती से बोलते भी नहीं। इसके पीछे एक कारण हो सकता है एपस्टीन फाइल्स! दुनिया जानती है कि इजरायल के पास वह बदनाम, ब्लैकमेल करने वाली एपस्टीन फाइल्स है जिनमें ट्रंप समेत दर्जनों राष्ट्राध्यक्ष फंसे हुए हैं। यह बात ट्रंप समझते हैं तभी तो इजरायल को रोक नहीं पा रहे हैं। नेतन्याहू की एक मजबूरी है वह है उनके खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के केस। नेतन्याहू के खिलाफ आपराधिक और दीवानी मामलों के साथ नियमित अदालती कार्यवाही चल  रही है। नेतन्याहू ने इसे आगे बढ़ने से यह कहकर रोक रखा है कि इजरायल इस समय युद्ध लड़ रहा है और यह पहली प्राथमिकता है, इसलिए इसे फिलहाल टाला जाए। नेतन्याहू इससे इतने परेशान हैं कि उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप से बाकायदा इजरायल के राष्ट्रपति से गुजरिश की थी कि नेतन्याहू के खिलाफ केसों को खत्म कर दें, वह माफी दे दें पर इजरायली राष्ट्रपति नहीं माने। इन केसों से बचने के लिए और संभावित जेल की सजा से बचने के लिए नेतन्याहू कहीं न कहीं लड़ाई जारी रखते हैं। अब जब अमेरिका-ईरान में शांति वार्ता जेनेवा में चल रही है और एमओयू पर आगे बातचीत चल रही है। नेतन्याहू ने इसमें भाजी मारने के लिए लेबनान पर युद्ध छेड़ रखा है। नेतन्याहू का तो अब इजरायल के अंदर भी विरोध होना शुरू हो गया है। इसी साल के अंत में इजरायल में आम चुनाव होने हैं जिसमें नेतन्याहू की सरकार जा सकती है। बेंजामिन नेतन्याहू पर पिछले कई वर्षें से रिश्वत खोरी, धोखाधड़ी और विश्वासघात के गंभीर आरोप लगे हैं। इजरायल के इतिहास में नेतन्याहू पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो पद पर रहते हुए अदालती कार्यवाही का सामना कर रहे हैं। फरवरी के अंत में ईरान के साथ संघर्ष चरम पर था और इजरायल-अमेरिका एयर स्ट्राइक के बाद नेतन्याहू ने देश में इमरजेंसी लगा दी थी। इस दौरान सुरक्षा कारणों से अदालती कार्यवाही को भी टाल दिया गया था और यह अब भी टाली जा रही है। जब तक इजरायल किसी से लड़ाई बंद नहीं करता। नेतन्याहू इसी बहाने अदालती कार्यवाही टालते रहेंगे। जैसे मैंने कहा कि दिलचस्प बात यह भी है कि डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में इजरायली राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग से नेतन्याहू को माफी देने की वकालत की थी। हर्जोग ने स्पष्ट किया कि इजरायल एक कानून से चलने वाला संप्रभु राष्ट्र है और वह बिना किसी बाहरी दबाव के अपने न्यायिक फैसले खुद लेगा।  

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 20 June 2026

बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

करीब 4 महीने तक चले अमेरिका-ईरान के युद्ध के बाद समझौते पर सहमति बनी है। इस चार महीने चले संघर्ष में कौन जीता, कौन हारा? हमें तो लगता है कि इस युद्ध में ईरान की भव्य जीत हुई है। यह हम इसलिए कह रहे हैं कि जिन उद्देश्यों को लेकर अमेरिका-इजरायल ने मिलकर 28 फरवरी को युद्ध शुरू किया था उसमें से कोई भी उद्देश्य वह पूरा नहीं कर सका और अंत में तेरे कूचे से हम बे-आबरू होकर निकले। अमेरिका-इजरायल ने अपने पहले ही हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को शहीद कर दिया। उसी दिन ट्रंप ने कहा- ईरान के महान लोगों, आपकी आजादी का समय आ गया है... जब हम अपना काम पूरा कर लेंगे तो आप अपनी सरकार पर कब्जा कर लीजिए यानी हम रेजीम चेंज कर देंगे। ताकि ईरान में वह रेजीम बदल सके? एक उद्देश्य था ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल कार्यक्रम को समाप्त करना। इसमें ईरान के एनरिच्ड यूरेनियम पर भी कब्जा करना था या उसे खत्म करना था। न तो ईरान में रेजीम चेंज हो सकी, न परमाणु कार्यक्रम बंद हुआ और न ही मिसाइल कार्यक्रम पर पाबंदी ही लगा सके। अब बात करते हैं हेर्मुज स्ट्रेट को खोलने की। पहली बात तो 28 फरवरी से पहले होर्मुज खुला हुआ था कभी भी बंद नहीं था। उल्टा आपने ईरान को एक ऐसा हथियार दे दिया जिसके बारे में उसने पहले कभी भी नहीं सोचा होगा। अब ईरान और ओमान मिलकर होर्मुज स्ट्रेट को अपनी मिल्कियत मान रहे हैं और हर गुजरते जहाज से सर्विस चार्ज ले रहे हैं। यह थे प्रमुख उद्देश्य जिनको लेकर अमेरिका-इजरायल ने 28 फरवरी से हमले शुरू किए थे।  अब ट्रंप खुद देख सकते हैं कि इनकी प्रवृत्ति में इन्हें कितनी सफलता मिली। ईरान की मुकम्मल जीत हुई। अब बात करते हैं अमेरिका को इस अभियान की कितनी भारी कीमत उठानी पड़ी। उनके गल्फ राष्ट्रों में 14 बेस तबाह हो गए। 40 से ज्यादा लड़ाकू विमान नष्ट या डेमैज हो गए, राडार और एयर डिफेंस सिस्टम तबाह हो गए। अमेरिका ने ईरान जंग में अब तक 113 बिलियन डॉलर यानी 10 लाख करोड़ रुपए स्वाह कर दिए। ऐसा नहीं कि ईरान को इसकी कीमत चुकानी नहीं पड़ी। ईरान सरकार के मुताबिक हमलों के पहले 40 दिनों में उन्हें 270 बिलियन डॉलर यानी करीब 25 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। 1 लाख 22 हजार इमारतें तबाह हुई हैं। 3 अप्रैल 2026 तक ईरान के 307 अस्पताल बर्बाद हुए। दवाओं की कीमतें 50 प्रतिशत तक बढ़ गई, जिससे 60 लाख से ज्यादा मरीज प्रभावित हुए। मिनाब के बच्चों के स्कूल पर सीधा हमला हुआ जिसमें 160 से ज्यादा लोग मारे गए जिनमें 130 से ज्यादा छोटी बच्चियां शहीद हुईं। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत दर्जनों टाप के लीडरशिप शहीद हो गई। इस लड़ाई में गल्फ के अन्य देश भी इसकी चपेट में आ गए। यूएई, कतर, सउदी, बहरीन, इराक इत्यादि बीच में फंस गए। इस  जंग में निर्दोष लोगों को भी भारी कीमत चुकानी पड़ी। अनुमान है कि जंग में 7000 से ज्यादा निर्दोष सैनिक मारे गए और 40 हजार से ज्यादा लोग घायल हुए। ईरान ने साबित कर दिया कि वे अमेरिका-इजरायल के सामने झुकने वाला नहीं है। ट्रंप बड़े गर्व से कह रहे हैं कि अब ईरान परमाणु बम कभी नहीं बन सकेगा। उन्हें हम याद करवाना चाहते हैं कि ईरान ने कभी परमाणु बम बना ही नहीं था। शहीद अयातुल्लाह अली खामेनेई ने बकायदा एक फतवा जारी किया था कि इस्लाम में ऐसा हथियार बनाना मना है जिसमें निर्दोष लोग मारे जाएं। ट्रंप अब अपनी जीत दिखाने के चलते ही कुछ भी कहें पर सारी दुनिया जानती है कि आप की हार हुई है। आपने अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाया है और आप बड़े बे-आबरू होकर ईरान के कूचे से निकले हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 18 June 2026

कागजों पर दस्तखत: जमीन पर धुआं

दुनिया ने राहत की सांस ली जब यह घोषणा हुई कि अमेरिका-ईरान युद्ध में युद्ध बंदी हो गई है। पर मैं इसे सिर्फ युद्ध विराम ही कहता हूं, यह जंग की समाप्ति नहीं मानी जा सकती क्योंकि अभी सही मायनों में तो दोनों तरफों की शर्तें माननी बची हैं। फिलहाल तो इससे सिर्फ  अमेरिका और ईरान के बीच बमबारी रुकी है। जंग रोकने के लिए अभी बहुत से पेंच फंसे हैं। मैं सबसे पहले अयातुल्लाह मोजतबा खामेनेई, राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, विदेश मंत्री अब्बास अरागची और स्पीकर बागेर गालिबफ को बधाई देना चाहता हूं कि युद्ध में भारी पड़ने के बावजूद उन्होंने इस युद्ध विराम (सीजफायर) को रोकने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। मैं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इसके लिए बधाई नहीं देना चाहता क्योंकि उन्होंने ही यह जंग शुरू की थी। जिसे बिना वजह जंग को शुरू किया था उसमें युद्ध विराम करके उन्होंने अपनी जान ही छुड़ाई है, किसी पर एहसान नहीं किया। उनके समर्थक उपराष्ट्रपति जेडी वेन्स कह रहे हैं कि ट्रंप अब नोबल पुरस्कार के हकदार हैं? क्यों भाई ! कैसे हुए हकदार? पहले शुरू करो, फिर पिटो और अब बिना शर्तों के बमबारी रोकने की घोषणा करो? यह जो एमओयू पर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं वह कितने कारगर सिद्ध होते हैं यह देखना बाकी है क्योंकि सबसे बड़ा पेंच तो नेतन्याहू बने हुए हैं। इजरायल ने साफ घोषणा कर दी है कि वह इस समझौते को नहीं मानता और न ही वह लेबनान पर लड़ाई बंद करेगा। जबकि ईरान की शर्तों पर यह शामिल है। ट्रंप की धमकियों के बावजूद, गाली-गलौच की परवाह न करते हुए इजरायल अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है और इस पूरी कोशिश में लगा हुआ है कि यह समझौता न हों। ईरान ने 14 बिंदुओं की मांग रखी है। ट्रंप ने भी दो बड़ी शर्तें रखी हैं। ईरान ने मांग की है कि शांति समझौते से पहले 24 अरब डालर की जब्त संपत्ति अमेरिका ईरान को दे। इस राशि का आधा हिस्सा यानी 12 अरब डालर बातचीत शुरू होने से पहले ही ईरान को दी जाए। वहीं अमेरिका ने इस दावे पर अलग रुख अपनाया है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरान को किसी प्रकार की वित्तीय राहत तभी मिलेगी जब वह समझौते के तहत अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी विवाद है। बेशक ईरान ने होर्मुज को खोल दिया है पर अभी सिर्फ तय रास्तों से ही समुद्री जहाजों का आना शुरू हुआ है। होर्मुज को पूरी तरह से खोलने में समय लगेगा क्योंकि ईरान ने होर्मुज में बारुदी सुरंगें बिछा रखी हैं। जिन्हें हटाने में समय लग सकता है। ईरान हर जहाज से टोल भी वसूल कर रहा है। जिसे कर सर्विस चार्ज कह रहा है। अमेरिका ऐसा करने पर ऐतराज कर रहा है। खैर, होर्मुज के खुलने से पूरी दुनिया ने राहत की सांस जरूर ली है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और एनज्डि यूरोनियम के मुद्दे पर भी अभी सहमति बननी बाकी है। ईरान द्वारा उसके मिसाइल कार्यक्रम पर भी अमेरिका और इजरायल को आपत्ति है। इस मुद्दे पर दोनों पक्ष 60 दिनों की बातचीत में कोई निर्णय करेंगे। ईरान के उपविदेश मंत्री काजेम धरीबाबादी ने तस्लीन न्यूज एजेंसी से कहा कि अंतिम समझौते को लेकर अगले 6ˆ दिनों के भीतर बातचीत जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका अपने वादों पर किस हद तक टिका रहता है और पूरा करता है? ई&रान की प्रमुख मार्गों में सैन्य गतिविधियों को रोकना यानी की हर जंग को पूरी तरह रोकना, आर्थिक नाकाबंदी समाप्त करना और विदेशों में जमे हुए ईरानी फंडस को जारी करना शामिल है। समझौते में लेबनान में युद्ध विराम का भी प्रावधान शामिल है। वित्तीय मुद्दों पर मतभेदों के बावजूद व्यापक समझौते को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली हैं। ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, फ्रांस और भारत ने इसका स्वागत किया है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य मध्य-पूर्व में स्थायी शांति स्थापित करना है। ऐसे में अगर समझौता सफल रहता है तो वैश्विक बाजारों को भी बड़ी राहत मिल सकती है। बस यह टिका रहे? अंत में इजरायल-मोसाद कुछ भी कर सकता है। ईरानी लीडरशिप की हत्या भी करवा सकता है ताकि यह युद्ध विराम टूट जाए। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 16 June 2026

अब फुटबाल का जादू

ऐसे वक्त पर जब पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान में भंयकर युद्ध छिड़ा हुआ है और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की समस्या बनी हुई है। जब सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल हो रही है उसी समय खेल प्रेमियों के लिए जबरदस्त राहत का आयोजन हो रहा है। मैं विश्व कप फुटबाल 2026 की बात कर रहा हूं। अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको की संयुक्त मेजबानी में आयोजित अब तक का सबसे बड़ा फुटबाल विश्व कप चल रहा है। फीफा विश्व कप 2026 के पहले उद्घाटन समारोह ने बृहस्पतिवार को एस्टाडियो एज्टेका स्टेडियम में 85000 दर्शकों के सामने अनूठा रंग बरपा दिया। इस बार तीन उद्घाटन समारोह हुए हैं जिनमें दो समारोह शुक्रवार को कनाडा के टोरंटो और अमेरिका के लॉस एंजिल्स में आयोजित हुए। 39 दिन तक चलने वाले इस सबसे लंबे प्रख्यात महाकुंभ में रिकार्ड मैचों के साथ रिकार्ड दर्शकों के आने से फुटबाल की शीर्ष संस्था को वित्तीय रूप से भारी मुनाफा होने वाला है। फीफा की कमाई कई तरीकों से होगी जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा प्रसारण अधिकारों का होगा। इसके अलावा प्रायोजन, टिकटों की बिक्री, आतिथ्य सत्कार, पर्यटन आदि से भारी कमाई होगी। इस बार 48 टीमों के टूर्नामेंट में हिस्सा लेने से भी कमाई उम्मीद से ज्यादा हो सकती है और यह आंकड़ा 76 हजार करोड़ रुपए (8.9 अरब डॉलर) से भी ज्यादा पहुंच सकता है। असल में 104 मुकाबले तीन देशों के 16 शहरों में होने से कमाई में कई तरह की बढ़ोतरी होगी। बता दें कि तीन बार विश्व कप की मेजबानी करने वाला मैक्सिको दुनिया का पहला देश है। मैक्सिको ने अपने यहां हुए उद्घाटन में अपनी देसी संस्कृति की झलक दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ा। फीफा ने इस समारोह के लिए दुनिया भर से कलाकार बुलाए थे, लेकिन असली समां शकीरा के दाई-दाई गाने से बांधा, जिस पर दर्शक झूम उठे। सवाल यह भी है कि क्या यह खेल की उस शक्ति को साबित कर पाएगा, जो मतभेदों के बीच संवाद व तनावों के बीच उम्मीद की गुजांइश पेश करती है? फुटबाल विश्व कप का इतिहास देखें तो उम्मीद की जा सकती है। बता दें कि इटली के डिक्टेटर मुसोलिनी के शासन के दौरान 1934 में इटली में हुआ विश्वकप हो या फिर 1938 की प्रतिस्पर्धा, जब  जर्मनी, आस्ट्रिया पर कब्जा कर चुका था, इस खेल ने दर्द से कराहते देशों को जरूर कुछ राहत तो दी थी। हिटलर ने भी विश्वकप हाकी का आयोजन किया था जिसमें भारत के मेजर ध्यानचंद सबसे बड़े सितारे के रूप में उभरे थे। दिलचस्प यह है कि ईरान की टीम को भी मेजबान अमेरिका में खेलने का मौका मिलेगा। हालांकि ईरान को वीजा देने में भी विवाद हुआ। उल्लेखनीय है कि ईरानी खिलाड़ी जब मैक्सिको पहुंचे तो उन्होंने वह प्रतीक चिह्न पहना था जो मिनाब के बच्चियों के स्कूल पर अमेरिका ने मिसाइल मारा था और 138 छोटी बच्चियां शहीद हो गई थीं। अपेक्षा की जाती है कि इस आयोजन से देशों में प्रेम व एक-दूसरे का सम्मान बढ़ेगा, भाई चारा बढ़ेगा और दुनिया में अशांति के माहौल में कमी आएगी। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 13 June 2026

क्यूबा है ट्रंप का अगला टारगेट?

भारत में एक कहावत है विनाश काले विपरीत बुद्धि यानी जब आप पर विपत्ति आती है तो आपकी सबसे पहले बुद्धि भ्रष्ट होती है। यही हाल है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उसके रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ का। पीट हेगसेथ ने ताजा बयान दिया है जिससे लगता है कि ट्रंप का अगला निशाना क्यूबा है। पीट हेगसेथ ने हाल ही में गुआंतानामो बे का दौरा किया और क्यूबा को कई शब्दों में चेतावनी दी। हेगसेथ ने क्यूबा को स्पष्ट किया कि अमेरिका के खिलाफ किसी भी तरह की धमकी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने साफ किया कि ईरान के बाद या साथ-साथ क्यूबा भी ट्रंप के निशाने पर है। लगता है कि ट्रंप अपने पड़ोसी देश क्यूबा के खिलाफ जंग छेड़ने के मूड में है। जबकि ईरान युद्ध में बुरी तरह फंसे हुए हैं और बाहर निकलने के लिए बेताब हैं और अब क्यूबा को कब्जाने की धमकी दे रहे हैं। उन्होंने क्यूबा की एनजी सप्लाई काटने के बाद अब एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस निमित्ज को पूरे कैरियर ग्रुप के साथ तैनात कर दिया है। यह तैनाती ठीक उसी तरह की है जिस तरह उन्होंने वेनेजुअला पर हमला करने से पहले वहां के राष्ट्रपति निकोलास मादुरो को हटाने के लिए चारों और तैनात किया था। क्यूबा पर हमले की तैनाती में अमेरिका ने क्यूबा के 94 वषीय पूर्व राष्ट्रपति राउल कास्त्राs पर हत्या का आरोप भी लगाया है। इसके बाद अटकलें तेज हो गई हैं कि अमेरिका की तख्ता पलट सूची में अगला नाम क्यूबा का हो सकता है। अमेरिका की मैक्सिमम प्रैशर की वजह से क्यूबा में दशकों का सबसे बड़ा ईंधन और बिजली संकट पैदा हो गया है। इसी बीच ट्रंप और उनके अधिकारी लगातार यह कह रहे हैं कि 66 साल से सत्ता में मौजूद कम्युनिस्ट सरकार का अंत होना चाहिए। व्हाइट हाउस ने यह भी चेतावनी दी है कि वह अमेरिका के तट से सिर्फ 144 किलोमीटर किसी दागी राष्ट्र को बर्दाश्त नहीं करेगा। अब ये चर्चा है कि राउल कास्त्राs को कोई सैन्य अभियान चलाकर मादुरो की तरह गिरफ्तार करके अमेरिका लाया जा सकता है। उन्हें अमेरिका लाकर उन पर मुकदमा चला सकता है। इस साल की शुरुआत में एक कार्यकारी आदेश में ट्रंप ने दावा किया था कि क्यूबा में रूस का सबसे बड़ा विदेशी जासूसी केंद्र मौजूद है। बिडेन प्रशासन ने चीन पर भी आरोप लगाया था कि उसने अमेरिका के तटों से सिर्फ 90 मील दूर स्थित इन कम्युनिस्ट द्वीप पर जासूसी केंद्र खोल रखा है। यही नहीं ट्रंप प्रशासन ने करीब 30 साल पुराने एक मामले को अचानक जिंदा करके क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति राउल कास्त्राs पर गंभीर आरोप लगा दिया। असल में 1996 में समुद्र में फंसे लोगों और क्यूबा से भागकर अमेरिका आने वाले शरणार्थियों की मदद करने वाला एक संगठन छोटे नागरिक विमानों के जरिए रेस्क्यू मिशन चला रहा था। उसके दो नागरिक विमानों को क्यूबा के सैन्य विमानों ने मार गिरया। इसमें चार अमेरिकी नागरिकों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद दोनों देशों के रिश्तों में और ज्यादा तनाव बढ़ गया था। अब तीन दशक बाद अमेरिकी अधिकारियों ने पूर्व क्यूबाई राष्ट्रपति राउल कास्त्राs पर हत्या, साजिश रचने और विमान गिराने से जुड़े आरोप लगाए हैं। राउल कास्त्राs क्यूबा की राजनीति के सबसे ताकतवर चेहरों में से एक हैं। उन्होंने अपने भाई फिदल कास्त्राs के बाद देश की राजनीति संभाली थी। अब सवाल है कि आखिर 30 साल बाद अमेरिका इस मामले को क्यों उठाना चाहता है? 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 11 June 2026

क्या इजरायल अमेरिका की जासूसी कर रहा है?

ईरान युद्ध को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन  नेतन्याहू के बीच टकराव व बढ़ती रणनीतिक दूरियों ने पेंटागन की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी रक्षा मुख्यालय को इजरायली जासूसी का भय लगने लगा है। उसने चेतावनी दी है कि वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी कड़ी इजरायली निगरानी का निशाना बन सकते हैं? एनबीसी न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के दो मौजूदा व एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि पेंटागन की डिफैंस इंटेलिजेंस एजेंसी (डीआईए) ने हाल ही में इजरायल के लिए काउंटर इंटेलिजेंस खतरे के स्तर को क्रिटिकल यानी गंभीर कर दिया है। यह उनका सबसे ऊंचा आंतरिक मूल्यवान स्तर है। एक मौजूदा अधिकारी ने अमेरिकी पत्रकार को बताया कि अमेरिका पहले से ही इजरायल की आधिकारिक यात्राओं के दौरान सुरक्षा उपाय बरतता है क्योंकि इजरायली जासूसी एजेंसियों को जानकारी जुटाने के मामले में बहुत आक्रामक माना जाता रहा है। पेंटागन की नई चिंताओं से पता चलता है कि इजरायल पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के संबंध में अमेरिकी रणनीतिक चर्चाओं व फैसलों की जानकारी हासिल करने की कोशिश कर रहा है। इजरायली जासूसी नेटवर्क खासकर उनकी खुफिया एजेंसी ऐसे कामों के लिए दुनिया में बदनाम है। चौंकाने वाली बात यह है कि मोसाद ने अपने सबसे भरोसेमंद साथी अमेरिका को भी नहीं बक्शा है? 

-अनिल नरेन्द्र

पत्रकार को कहा: बेईमान और बेवकूफ

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्राध्यक्षों से तो बदतमीजी से पेश आते ही हैं पर अपने देश के पत्रकारों खासकर महिला पत्रकारों से कैसे पेश आते हैं ताजा घटना से पता चलता है। ट्रंप ने एनबीसी जैसी बड़ी टीवी नेटवर्क से एक इंटरव्यू के दौरान अचानक बातचीत बीच में ही खत्म कर दी। कार्यक्रम की होस्ट क्रिस्टन वेल्कर बार-बार उनके (ट्रंप के) कई दावों पर सवाल उठा रही थीं। रविवार को प्रसारित हुए कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस' में ट्रंप ने दावा किया कि कैलिफोर्निया में चल रहे प्राइमरी चुनाव और साल 2020 का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव दोनों ही धांधली पूर्ण थे। जब वेल्कर ने चुनावों में धांधली के दावे के समर्थन में सुबूत मांगे तो ट्रंप ने कहा, ‘मुझे बस देखना और सुनना भर है।' इस पर वेल्कर ने कहा यह सुबूत नहीं है। इसके बाद ट्रंप ने मीडिया पर बेईमान होने का आरोप लगाया और इंटरव्यू समाप्त करते हुए कहा, माफ कीजिए, अब इसे यहीं खत्म करते हैं। मेरे लिए बहुत हो गया यह इंटरव्यू अब खत्म है। इंटरव्यू शुरू होने के लगभग 50 मिनट बाद इसे छोड़ दिया। वेल्कर के सवालों के जवाब में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए कार्रवाई करनी जरूरी थी और यह अंतहीन युद्ध नहीं होगा। हम वहां कुछ महीनों के लिए रहेंगे और उसके बाद खतरा काफी हद तक समाप्त हो जाएगा। इसके बाद बातचीत उस दंगे पर पहुंची और जब ट्रंप ने साल 2020 के चुनाव में धांधली का अपना पुराना, बिना सुबूत वाला दावा दोहराया तो क्रिस्टन वेल्कर ने उन्हें  चुनौती दी। ट्रंप ने फिर कैलिफोर्निया  के प्राथमिक चुनावों का जिक्र किया, जहां गवर्नर सहित कई पदों के लिए नवम्बर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में कौन से दो उम्मीदवार होंगे। यह तय करने के लिए वोटों की गिनती जारी थी। उन्होंने फिर आरोप लगाया, वे चुनाव में धांधली कर रहे हैं, पलटकर वेल्कर ने पूछा: क्या आपके पास इसके समर्थन में कोई सुबूत है? ट्रंप ः मुझे सिर्फ देखना और सुनना है। वेल्कर ने बीच में टोका, लेकिन यह कोई सुबूत नहीं हैं। ट्रंप ने आगे कहा वे बेईमान हैं बिल्कुल आपकी तरह। इस पर वेल्कर ने जवाब दिया निष्पक्षता की बात करें तो मैं बेईमान नहीं हूं। लेकिन बातचीत जारी रखें, इस पर ट्रंप ने उनसे कहा या तो आप बेईमान हैं या फिर बेवकूफ और यह कहते हुए ट्रंप उठ गए  और कहा इसे यहीं खत्म करते हैं। मेरे लिए बहुत हो गया। शुक्रिया डार्लिंग, आपको अपने प्रेस को सुधारना चाहिए क्योंकि एक देश कभी महान नहीं बन सकता अगर उसकी प्रेस बेईमान है। हम इस महान पत्रकार को सलाम करते हैं जिन्होंने अपनी बेइज्जती सही पर डटी रहीं। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 9 June 2026

युद्ध विराम के नाम पर धोखा?

क्या अमेरिका ईरान पर जमीनी हमले की तैयारी कर रहा है और सीजफायर के नाम पर ईरान को बेवकूफ बना रहा है? अमेरिकी वारशिप यूएसएस त्रिपोली की तैनाती के बाद  सवाल फिर यह उठ गया है कि अमेरिका की असल नीयत क्या है? त्रिपोली की तैनाती के बाद यह सवाल उठाना लाजमी है। अमेरिकी सेना ने शनिवार को ईरान की ओर से लांच किए गए ड्रोन को तबाह कर देने का दावा किया। वहीं अब होर्मूज में यूएसएस त्रिपोली की तैनाती की ताजा खबर आई है। सवाल उठता है कि क्या ईरान पर अब जमीनी हमला होने जा रहा है? अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता कहने को तो अभी जारी है। लेकिन जमीन और समुद्र पर जो स्थिति दिख रही है वे कुछ और ही कहानी की ओर इशारा कर रही है। पिछले 72 घंटों में हुई कई सैन्य कार्रवाईयों ने पश्चिम एशिया में नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका सिर्फ  ईरान पर दबाव बना रहा है या फिर होर्मूज जलडमरूमध्य पर निर्णायक बढ़त हासिल करने की तैयारी कर रहा है?  क्योंकि जो तैनाती अमेरिका कर रहा है, उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि ट्रंप अब ईरान के आइलैंड पर कब्जा करने जा रहा है?  घटनाओं की शुरुआत उस खबर से हुई जिसमें बताया गया कि ईरानी झंडे वाले चार तेल टैंकर होर्मूज पार करने में सफल रहे। ये जहाज कथित तौर पर करीब 70 लाख बैरल तेल लेकर निकले थे और प्रतिबंधों के बावजूद आगे बढ़ गए। लेकिन इसके कुछ ही घंटों बाद अमेरिकी इंडो-पैसेफिक कमांड ने घोषणा की कि उसने हिंद महासागर में प्रतिबंधित तेल टैंकर एमटी डेविना को रोककर इस पर कब्जा कर लिया है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि कब्जे में लिया गया जहाज उन्हीं चार टैंकरों में से एक था या नहीं। लेकिन टाइमिंग ने कई अटकलों को जन्म दिया है। इसे मसले पर संभल ही रहा था कि उस पर अमेरिका ने हमला कर दिया। शनिवार को ही अमेरिकी सैंट्रल कमांड ने दावा किया कि उसने होर्मूज की ओर बढ़ रहे चार ईरानी हमलावर ड्रोन मार गिराए। इसके तुरंत बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के गोसक और केशम द्वीप पर मौजूद तटीय रडार ठिकानों पर हमले किए। पहली बार नहीं है जब केशम को निशाना बनाया गया है। लेकिन मौजूदा हालात में इस द्वीप का नाम बार-बार सामने आना सैन्य विश्लेषकों का ध्यान खींच रहा है। जवाब में ईरान ने भी कुवैत और बहरीन की ओर सात मिसाइलें दागी। इनमें से 6 को अमेरिका ने रोकने का दावा किया। इस बीच अमेरिका ने यूएसएस त्रिपोली की अरब सागर और होर्मूज क्षेत्र में तैनाती की है। यूएसएस त्रिपोली कोई साधारण युद्ध पोत नहीं है। यह एक उभयचर हमलावर जहाज है, जिसका मतलब है कि ये जहाज पानी से तो हमला कर ही सकता है, जरूरत पड़ने पर जमीन के बेहद करीब जाकर सैनिकों को उतार भी सकता है। ऐसे जहाज समुद्र से सीधे सैन्य अभियान चलाए जाने के लिए बनाए जाते हैं। उधर केशम ईरान का सबसे बड़ा द्वीप है और होर्मूज के मुहाने पर मौजूद है। इसे न डूबने वाला एयरक्राफ्ट कैरियर भी कहा जाता है। ईरान ने यहां वर्षों से रडार सिस्टम, ड्रोन बेस, एंटी शिप मिसाइलें, अंडरग्राउंड सुरंगे और नौ सैनिक अड्डे बनाए हुए हैं। अगर अमेरिका इस द्वीप पर कब्जा कर लेता है तो उसे  कई बड़े स्ट्रेटिजिक फायदे मिल सकते हैं। वैसे अमेरिका के लिए केशम पर कब्जा बिल्कुल भी आसान नहीं होने वाला है। इसका मतलब होगा सीधे अंगारों को हाथ में लेना। केशम ईरानी जमीन से बेहद करीब है। अगर अमेरिका अपने सैनिकों को यहां उतारता है तो उसे ईरान की मिसाइलों, ड्रोन, नौ सैनिक हमलों और संभावित गुरिल्ला प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है। यूएसएस त्रिपोली की मौजूदगी, केशम पर लगातार हमले और टैंकरों को रोकने जैसी कार्रवाईयों ने यह बहस तेज कर दी है कि अमेरिका होर्मूज पर रणनीतिक बढ़त लेने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि शांति वार्ता चलने के बावजूद पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की बजाए और बढ़ता दिखाई दे रहा है। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 6 June 2026

अयातुल्लाह अली खामेनेई को अंतिम विदाई

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के लिए तीन दिन के राजकीय अंतिम संस्कार का ऐलान किया गया है। तीन महीने बाद अयातुल्लाह अली खामेनेई को दी जाएगी अंतिम विदाई, मशहद में होंगे सुपुर्द-ए-खाक। ईरान सरकार ने पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के लिए तीन दिन के राजकीय अंतिम संस्कार का ऐलान किया है। फिलहाल तारीख घोषित नहीं हुई है। अंतिम संस्कार और श्रद्धांजलि कार्यक्रम इस्लामिक कैलेंडर के अखिरी महीने जिलहिज्जा के अंत में हो सकता है। यानी 15 जून के आसपास। अधिकारियों ने बताया कि खामेनेई की इच्छा के अनुसार उन्हें मशहद के इमाम रजा दरगाह में दफनाया जाएगा। तेहरान, कोम और मशहद में अंतिम कार्यक्रम होंगे। इन शहरों में बड़े पैमाने पर शोभा यात्राएं और श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की जाएंगी। ईरान के सरकारी टीवी चैनल आईआरआईबी से बातचीत में तवाकोली-जादेह ने कहा कि तीनों शहरों में करोड़ों लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। तेहरान के डिप्टी मेयर मोहम्मद अमीन तवाकोली-जादेह ने कहा कि ईरान के कई अन्य प्रांत भी श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित करना चाहते हैं। बताया जा रहा है कि तेहरान में होने वाला मुख्य कार्यक्रम कम से कम 24 घंटे चलेगा। सिर्फ तेहरान में ही 1.5 करोड़ से दो करोड़ लोग अपने शहीद सुप्रीम लीडर को अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंच सकते हैं। इतनी बड़ी भीड़ को संभालने के लिए प्रशासन सुरक्षा, यातायात और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं की तैयारी कर रहा है। यह फैसला अयातुल्लाह अली खामेनेई की शहादत के 3 महीने बाद लिया गया है। आमतौर पर इस्लामी परम्परा के अनुसार किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार मौत के कुछ दिनों के भीतर कर दिया जाता है, लेकिन ईरानी अधिकारियों ने पहले इस कार्यक्रम को टाल दिया था। पहले क्यों नहीं हुआ अंतिम संस्कार? अयातुल्लाह अली खामेनेई 23 फरवरी को अमेरिकी-इजरायली हमले में मारे गए थे। उनकी शहादत के बाद मार्च में ईरान के अधिकारियों ने बयान दिया था कि भारी भीड़ और व्यवस्थाओं को लेकर आ रही चुनौतियों की वजह से अंतिम संस्कार तुरंत करना संभव नहीं है। ईरान की सरकारी एजेंसी ईरना के मुताबिक राजकीय अंतिम संस्कार जून के मध्य में आयोजित किया जाएगा। हालांकि इसकी सटीक तारीख और समय की अभी अधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। अंतिम संस्कार बहुत बड़े स्तर पर होगा और इसमें ईरान के साथ-साथ कई मुस्लिम देशों से भी बड़ी संख्या में लोग शामिल होंगे। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत, बांग्लादेश से भी बड़ी संख्या में लोगों के मशहद पहुंचने की उम्मीद है। अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में करोड़ों लोग एक साथ इकट्ठे होंगे। यह भी खतरा है कि मौके का फायदा उठाकर कहीं इजरायल कोई उल्टी-सीधी हरकत न कर दे। अमेरिका भी इस मौके का फायदा उठा सकता है। ऊपर वाला ऐसा होने से बचाए। उम्मीद करते हैं कि इस पवित्र मौके का इजरायल-अमेरिका कोई नाजायज फायदा नहीं उठाएगा और अयातुल्लाह अली खामेनेई की अंतिम विदाई में कोई बाधा नहीं डालेगा। खामेनेई 86 साल के थे। वह तीन दशक से ज्यादा समय तक ईरान के सुप्रीम लीडर रहे। आज जो ईरान है उसके पीछे अयातुल्लाह अली खामेनेई की दूरदृष्टि और प्लानिंग ही थी। हम अयातुल्लाह अली खामेनेई को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 4 June 2026

अमेरिकी एफ-15 गिराने में चीनी मिसाइल

पिछले महीने दक्षिण-पश्चिमी ईरान के ऊपर मार गिराए अमेरिकी एफ-15 ई स्ट्राईक ईगल को चीन निर्मित मिसाइल से निशाना बनाया गया था। अमेरिका की एनबीसी न्यूज ने सूत्रों के हवाले से बताया कि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि ईरान ने जिस मिसाइल से एफ-15 को गिराया, वह हाल ही में मिली थी या ईरान के पुराने जखीरे में से थी। अमेरिकी अधिकारी अप्रैल में हुई इस घटना की अभी भी जांच कर रहे हैं। दशकों में पहली बार किसी अमेरिकी लड़ाकू विमान को दुश्मन की गोलीबारी से मार गिराया गया। उस समय ट्रंप ने कहा था कि विमान कंधे पर रखकर दागी जाने वाली मिसाइल से हमला किया गया। इन हथियारों को आमतौर पर मैन-पोर्टबल एयर डिफैंस सिस्टम के नाम से जाना जाता है, ये करीब 7 फीट लंबी और इसमें लगभग 40 पाउंड वजन होता है। ईरान के चीन से बने सैन्य उपकरणों के इस्तेमाल से अमेरिका-चीन संबंधों में एक नया आयाम जोड़ दिया है। 

-अनिल नरेन्द्र

कुवैत पर क्यों कोहराम मचा रहा ईरान?

ईरान ने अमेरिका के जवाबी हमले के विरोध में कुवैत को निशाने पर लिया है। कुवैत पर 72 घंटे में दो बड़े हमले किए गए। कुवैत में अमेरिका के कम से कम 7 बड़े बेस हैं। वहीं करीब 13 हजार अमेरिकी जवानों को कुवैत में रखा गया है। यूएई को छोड़कर कुवैत क्यों ईरान के निशाने पर आ गया इसके पीछे भी कारण है। ईरान इस कदर कुवैत से नाराज है कि महज 72 घंटों में उसने कुवैत पर ड्रोनों और मिसाइलों से बड़े हमले किए। ईरान का कहना है कि यह हमले बदला लेने के लिए किए गए हैं। ईरान ने स्पष्ट किया कि यह हमले कुवैत के रिहाइशी इलाकों पर नहीं बल्कि कुवैत स्थित अमेरिकी बेसों पर किए जा रहे हैं। बता दें कि अब तक अमेरिका से बदला लेने के लिए यूएई ईरान के निशाने पर था और ईरान ने यूएई पर सबसे ज्यादा हमले किए। फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक ईरान जंग के दौरान तेहरान से यूएई पर करीब 2400 हमले किए थे। हालांकि वर्तमान में ईरान कुवैत के ठिकानों पर ही हमला कर रहा है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि यूएई को छोड़कर ईरान कुवैत को क्यों निशाने पर ले रहा है? इसके पीछे कई कारण नजर आते हैं। कुवैत फारस की खाड़ी के एक छोर पर स्थित है। यह ईरान के पड़ोस में है, जो अमेरिका का सहयोगी मुल्क है। यहां पर अमेरिका के कई बड़े सैन्य बेस हैं। इनमें कैंप अरिफिजान, कैंप बुहिरिंग और अल सलेम  एयरबेस प्रमुख हैं। द हिल की रिपोर्ट के मुताबिक कुवैत में अमेरिका के 13 हजार जवान तैनात हैं। यूएई के मुकाबले कुवैत कूटनीति तौर पर काफी कमजोर है। मई के मध्य में ईरान ने कुवैत के एक द्वीप पर कब्जा करने का प्रयास किया था। हालांकि तेहरान को असफलता मिली थी। यूएई ईरान पर हमले करने में सक्षम है। अगर अमेरिका के बदले ईरान यूएई पर हमला करता है तो अबू धाबी पलटवार कर सकता है, इससे खाड़ी युद्ध में तेजी आ सकती है। बातचीत के बीच ईरान नो-रिस्क मोड में है। सबसे बड़ा कारण है कि हाल ही में ईरान पर जो हमले हुए वह कुवैत के अमेरिकी बेसों से ही हुए थे। इसीलिए जवाबी कार्रवाई में ईरान ने कुवैत को निशाने पर लिया है। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 2 June 2026

अगर रूबियो इतिहास जानते तो फोटो नहीं खिंचवाते?

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्के रूबियो जब भारत के चार दिवसीय दौरे पर आए थे तो वह भारत के प्रधानमंत्री व शीर्ष राजनयिकों से तो मिले ही थे, साथ ही कई भारतीय मशहूर पर्यटन स्थलों पर भी गए। इन्हीं में से एक आगरा के ताजमहल की यात्रा सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बनी। अमेरिकी विदेश मंत्री ने ताजमहल के सामने अपनी पत्नी के साथ यादगार फोटो सोशल मीडिया पर साझा की। ये फोटो जल्दी ही सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बन गई। इस मामले ने उस समय एक अलग मोड़ लिया जब हैदराबाद में स्थित ईरानी दूतावास ने रूबियो के ताजमहल दौरे पर खुलेतौर पर व्यंग्य किया। ईरानी वाणिज्य दूतावास ने अपने बयान में याद दिलाया कि उनके अनुसार, ताजमहल मुगल बादशाह (शाहजहां) की ईरानी मूल की बेगम मुमताज महल की मोहब्बत की निशानी है और इसके निर्माण में फारसी वास्तुकारों की कुशलता शामिल थी। बयान में अमेरिका की भी आलोचना की गई और अमेरिकी सरकार पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया गया। दूतावास ने लिखा ः अगर मार्के रूबियो को इतिहास और वास्तुकला की समझ होती तो वो यहां तस्वीर खिंचवाने के लिए खड़े नहीं होते। यह स्मारक एक बादशाह की ईरानी पत्नी के प्रेम में बनाया गया था और इसे ईरानी वास्तुकारों की प्रतिभा ने गढ़ा था। आज उनकी सरकार ईरानी सभ्यता को मिटाने की धमकी दे रही है और दूसरी सभ्यताओं का अपमान करती है। ईरानी व्यंग्य के बाद यह मामला सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो गया। कुछ उपयोगकर्ताओं ने रूबियो को व्यंग्य का निशाना बनाते हुए कहा कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझे बिना ऐसे स्थानों पर तस्वीरें खिंचवाना उचित नहीं है। कुछ टिप्पणियां इससे भी आगे बढ़ गई और अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के संदर्भ में देखा जाने लगा। एक उपयोगकर्ता ने कहा कि यह इमारत एक ईरानी मल्लिका के लिए फारसी वास्तुकारों ने बनाई थी और यह एक ऐसी संस्कृति का प्रतीक है जिसे उनकी सरकारें इस समय में खतरे में डाल रही हैं और उनका सम्मान नहीं कर रही हैं। बता दें कि संगमरमर जो राजस्थान के मकराने से आया था। इससे बना ताजमहल दुनिया के अजूबों में से एक है, जिसे मुगल सम्राट शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की प्रेम स्मृति में 1632 ईसवीं में बनवाना शुरू किया था जो 1653 ईसवीं में ही पूरा हुआ था। इसके निर्माण में हिन्दू, इस्लामिक, मुगल समेत कई भारतीय वास्तुकला का समावेश किया गया है। इस भव्य और शानदार इमारत को करीब 20 हजार मजदूरों ने मुगल शिल्पीकार उस्ताद अहमद लाहौरी के नेतृत्व में बनाया था। इस मकबरे को बनाने में उस समय करीब 20 लाख रुपए खर्च किए गए थे। आज के हिसाब से यह लागत करीब 827 मिलियन डॉलर लगभग 52.8 अरब रुपए है। इस इमारत के निर्माण में करीब 28 अलग-अलग तरह के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है, जो हमेशा चमकते रहते हैं। इनकी दीवारों पर बेहद खूबसूरत नक्काशी की गई है। ताजमहल को 1983 में यूनेस्को ने विश्व विरासत स्थल घोषित किया था। 

-अनिल नरेन्द्र

Monday, 1 June 2026

📣 Thrilled to Announce My Latest Publication!

I am incredibly honored to share that my latest article has been officially published in Echo of Islam, a prestigious, internationally circulated magazine based in Tehran.

Since the early 1980s, Echo of Islam has served as a vital global platform for geopolitics, philosophy, and strategic discourse. Because it is distributed worldwide to international libraries, academic institutions, and embassies, it holds a unique and highly influential space in global media.

Being selected for a publication of this caliber is an absolute privilege.

Why this article matters right now:🎯 The Core Focus: It analyzes the highly critical question of succession in Iran, examining the strategic case for stability and political continuity.

🌐 Global Relevance: Understanding the future leadership of the Islamic Republic is vital for navigating regional stability and shifting Middle Eastern geopolitics.

💡 The Main Takeaway: It offers a detailed perspective on why Ayatollah Sayyid Mojtaba Hosseini Khamenei represents the logical choice for Supreme Leader.This piece represents deep analysis and dedication to a subject that carries immense weight in global current affairs today.

📖 Read the full piece in Issue No. 295 (2026).

Thank you to everyone who follows my work and supports these deep-dive analyses. I would love to hear your thoughts on the piece—let's discuss in the comments below! 👇#AcademicPublication #GlobalPolitics #Iran #Tehran #InternationalRelations #EchoOfIslam #Research #AuthorLife #CurrentAffairs #MiddleEastPolitics







Saturday, 30 May 2026

अब्राहम समझौते पर फंसे अरब मुल्क

 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से साबित कर दिया कि अमेरिका ईरान पर जो युद्ध कर रहा है वह दरअसल उसका अपना युद्ध नहीं। यह सब कुछ ट्रंप इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के कहने पर कर रहे हैं। यह युद्ध ट्रंप ने अमेरिका के हितों के लिए नहीं बल्कि इजरायल के हितों की रक्षा करने के लिए किया है। यह किसी से छिपा नहीं कि ट्रंप को नेतन्याहू ब्लैकमेल कर रहे हैं और वह सब कुछ कहने और करने पर करवा रहे हैं जो वो और शक्तिशाली यहूदी लॉबी करवा रही है। सभी जानते हैं कि ट्रंप ऐसा क्यों कर रहे हैं? इसके पीछे एपस्टीन फाइल्स का भूत है। अगर ऐसा नहीं होता तो ट्रंप ये नई शर्त क्यों डालते। ट्रंप ने हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब, कतर, तुर्किए, मिस्र और जार्डन से ईरान शांति समझौते में शामिल होने की अपील करते हुए इन अरब देशों से कहा कि ईरान से समझौता तभी पूरा माना जाएगा, जब सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किए, मिस्र और जार्डन और बहरीन से अरब मुस्लिम देश अब्राहम अकॉर्ड में शामिल हों। यानि इजरायल को मान्यता दें और उससे रिश्ते जोड़ें। ट्रंप ने आगे चेताया कि जो देश ऐसा नहीं करेंगे, उन्हें अमेरिका-ईरान डील का हिस्सा नहीं होना चाहिए। ट्रंप ने सऊदी व कतर से तुरंत इजरायल से संबंध जोड़ने को कहा। ट्रंप ने आगे कहा, डील के बाद ईरान को भी अब्राहम अकॉर्डस में शामिल करना सम्मान की बात होगी। अब्राहम अकॉर्ड की शुरुआत सितम्बर 2020 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान हुई थी। यह एक कूटनीतिक समझौता था जिसके तहत यूएई और बहरीन ने अधिकारिक तौर पर इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे। बाद में मोरक्को और सूडान भी इस फ्रेमवर्क में शामिल हो गए। दशकों तक अधिकांश अरब मुल्कों का रुख यह था कि जब तक फिलिस्तीन मुद्दे का समाधान नहीं होगा, तब तक वे इजरायल को मान्यता नहीं देंगे। लेकिन इस समझौते ने उस नीति को बदलने की कोशिश की। इस समझौते की सबसे बड़ी आलोचना यह रही कि इसमें फिलिस्तीन मुद्दे को नजरअंदाज कर दिया गया। न तो फिलिस्तीन राज्य को लेकर कोई स्पष्ट रोडमैप दिया गया और न ही इजरायली बस्तियों पर रोम की बात हुई। सभी जानते हैं कि इजरायल एक ग्रेटर इजरायल की भावना पाले बैठा है जिसमें कुछ अरब मुल्कों की जमीनें लेकर एक ग्रेटर (बड़ा इजरायल) बनाना चाहता है और उसमें अब ट्रंप खुलकर बेशमी से मदद कर रहे हैं। पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव को तुरंत खारिज कर दिया। पाकिस्तान ने आज तक इजरायल को अधिकारिक मान्यता नहीं दी है। हालांकि, यह बात पाकिस्तान के लिए इतनी आसान नहीं है, क्योंकि ट्रंप जिस तरह के शख्स हैं और अपनी बात मनवाने के लिए जिस तरह से गैर-राजनीतिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, उससे माना जा रहा है कि हो सकता है कि पाकिस्तान विदेश नीति के सामने आने वाले समय में यह मुद्दा बड़ी चुनौती बनकर सामने आए। सऊदी अरब ने भी इस प्रस्ताव को यह कहकर रद्द कर दिया है कि पहले 1967 की वह स्थिति बहाल करो जब इजरायल जबरन फिलिस्तीन की जमीन काटकर बसाया गया था। तुर्किए ने तो साफ कह दिया कि हमारी तो नीति स्पष्ट है, हम तो इजरायल की मौजूदगी को मानते ही नहीं, इसलिए हमारा इजरायल को मान्यता देने का सवाल ही नहीं उठता। सवाल यह उठता है कि ट्रंप ने आखिर में दांव क्यों चला? ट्रंप ईरान डील को सिर्फ युद्ध रोकने वाला समझौता नहीं रखना चाहते। वे इसे पश्चिम एशिया की नई राजनीतिक व्यवस्था बनाना चाहते हैं। इसलिए सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किए जैसे देशों पर जुड़ने का दबाव दे रहा है। अगर ऐसा होता है तो सबसे बड़ी सफलता इजरायल को मिलेगी। इजरायल को गल्फ में मान्यता मिलेगी।  
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 28 May 2026

ईरान की फ्रीज पड़ी संपत्ति


पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता में तेहरान का फ्रीज छह अरब डॉलर की संपत्ति को जारी करना एक अहम मुद्दा है। यह संपत्ति अभी कतर में जमा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एक ईरानी सूत्र ने बताया कि कतर समेत विदेश में फ्रीज संपत्तियों को जारी करना, हार्मूज से सुरक्षित आवाजाही तय करने से सीधे तौर पर जुड़ा है। छह अरब डालर की यह राशि सबसे पहले 2018 में रोकी गई थी। वाशिंगटन तथा तेहरान के बीच कैदियों की अदला-बदली के समझौते के तहत इसे 2023 में जारी किया जाना था, पर 7 अक्टूबर, 2023 को इजरायल पर हमास के हमले के बाद बिडेन प्रशासन ने संपत्तियों को फिर से फ्रीज कर दिया। उधर, अमेरिका ने ईरान की इस दावे को खारिज कर दिया है जिसमें कहा गया था कि इस्लामाबाद वार्ता में जब्त संपत्तियों को छोड़ेगा। अमेरिका ने स्पष्ट कहा कि वह ईरानी संपत्तियों को वापस नहीं करेगा। इससे पहले ईरान ने दावा किया था कि अमेरिका इस बात पर सहमत हो गया है कि जब्त संपत्तियों को छोड़ेगा। पिछले कुछ दिनों में एक बार फिर युद्ध विराम और शांति वार्ता की बात हो रही है। देखें, अमेरिका और ईरान में किन-किन मुद्दों पर समझौता होता है, अगर होता भी है? 
-अनिल नरेन्द्र

ट्रंप के पास तीसरी बार फायरिंग

 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आधिकारिक आवास एवं कार्यालय व्हाइट हाउस की सुरक्षा जांच चौकी के पास एक व्यक्ति ने गोली बारी कर दी। सुरक्षा कर्मियों ने जवाबी कार्रवाई में संदिग्ध हमलावर को ढेर कर दिया। पिछले एक महीने में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आसपास गोलीबारी की यह तीसरी घटना थी। इससे पहले अप्रैल में व्हाइट हाउस संवाददाता संघ रात्रि भोज और मई की शुरुआत में वाशिंगटन मॉन्यूमेंट के पास घटनाएं हुईं। कानून प्रर्वतन एजेंसी ने सोशल मीडिया पर जारी एक बयान में बताया कि 17वीं स्ट्रीट और पेंसिल्वेनिया एवेन्यू में मौजूद हमलावर ने शनिवार शाम छह बजे अपने बैग से हथियार निकाला और गोलीबारी शुरू कर दी। सीक्रेट सर्विस जवानों की जवाबी कार्रवाई में यह घायल हो गया और बाद में उसकी मौत हो गई। बताया जाता है कि हमलावर ने 30 राउंड गोलियां चलाईं। शनिवार को हुई घटना के दौरान एक राहगीर को भी गोली लगी है लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि वह संदिग्ध द्वारा शुरू में चलाई गोलियों से घायल हुआ या अधिकारियों द्वारा जवाबी कार्रवाई में उसे गोली लगी? ट्रंप घटना के समय व्हाइट हाउस में मौजूद थे। एक कानून प्रवर्तन अधिकारी ने अपनी पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि संदिग्ध की पहचान 21 वर्षीय नासिरे बेस्ट के रूप में हुई है। बेस्ट को पहले भी गिरफ्तार किया गया था। वह जब उसने बिना अनुमति के व्हाइट हाउस की एक अन्य जांच चौकी में प्रवेश करने की कोशिश की थी। बेस्ट को जुलाई 2025 में इस सिलसिले में गिरफ्तार भी किया गया था। बेस्ट खुद को भगवान यीशु मसीह का मॉर्डन अवतार मानता था। डोनाल्ड ट्रंप पर तीन बार गोली बारी हो चुकी है। एक बार तो बाल-बाल बचे जब गोली उनके कान के पास से निकली। कुछ आलोचकों का मानना है कि इन हमलों के पीछे सहानुभूति लेने की और अमेरिकी जनता का ज्वलंत मुद्दों से ध्यान हटाने का नाटक शामिल है। खैर, जो भी हो एक बात तो साफ लगती है कि ट्रंप की जान को खतरा है और उन्हें अपनी सुरक्षा में किसी प्रकार की ढील नहीं देनी चाहिए। 
अनिल नरेंद्र 

Tuesday, 26 May 2026

ट्रंप पर आगबबूला हुए नेतन्याहू

अमेरिका-इजरायल ने मिलकर ईरान के खिलाफ जंग शुरू की थी, लेकिन अब इस जंग को रोकने के लिए दोनों देश आपस में सहमत नहीं हो रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू में भारी मतभेद सामने आ रहे हैं। नेतन्याहू एक बार फिर से ईरान पर हवाई हमले शुरू करना चाहते हैं, वहीं ट्रंप हथियार से पहले कूटनीति के जरिए मामले को शांत करना चाह रहे हैं और अमेरिका को इस युद्ध से बाहर निकालने के लिए ईरान से कोई डील करने के चक्कर में हैं। बताया जा रहा है कि इस मुद्दे पर दोनों नेताओं के बीच लगभग एक घंटे तक बातचीत हुई। लेकिन दोनों एक मत नहीं हो पाए। नेतन्याहू का कहना था कि ईरान की सैन्य क्षमता जब तक पूरी तरह बर्बाद न हो जाए, उनके यूरेनियम पर कब्जा न हो जाए हमले जारी रहने चाहिए। राष्ट्रपति ट्रंप ने नेतन्याहू से कहा कि मध्यस्थ कतर और पाकिस्तान एक लेटर ऑफ इंटेंट पर काम कर रहे हैं ताकि युद्ध को औपचारिक रूप से खत्म किया जा सके। इस पर दस्तख्त होने के बाद 30 दिनों की बातचीत का दौर शुरू होगा। नेतन्याहू ट्रंप की नीति से सहमत नहीं थे। अब देखना यह होगा कि क्या ईरान युद्ध रुकेगा और क्या नेतन्याहू अकेले ही ईरान युद्ध को आगे बढ़ाएंगे या फिर ट्रंप की चलेगी। 

-अनिल नरेन्द्र 


संसद में ही अपनों ने घेरा ट्रंप को

अमेरिका की कांग्रेस (संसद) ने ईरान युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना व देश को हुए भारी नुकसान पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है जिसमें कहा गया है कि लड़ाई के दौरान 42 अमेरिकी विमान नष्ट हुए हैं या क्षतिग्रस्त हो गए हैं। ऐसी खबरें पहले भी मीडिया में आईं थी पर ट्रंप प्रशासन ने कभी इसकी पुष्टि नहीं की थी। यह रिपोर्ट अमेरिकी कांग्रेस की कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस (सीआरएस) ने संकलित की है और यह अमेरिकी कांग्रेस की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है। सीआरएस किसी भी राजनीतिक दल से संबंध की परवाह किए बिना अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों को नीतिगत मुद्दों पर विश्लेषण मुहैया करता है। रिपोर्ट में अमेरिकी रक्षा विभाग, पेंटागन, सेंट्रल कमांड (सेटकॉम) और समाचार लेखों का हवाला दिया गया है। जिनके अनुसार क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए विमानों में मानवरहित हवाई वाहन, लड़ाकू जेट और ड्रोन शामिल थे। ईरान से युद्ध अमेरिका के लिए काफी भारी पड़ रहा है। विश्लेषकों का दावा है कि इस युद्ध में अमेरिका ने एक लाख करोड़ (एक ट्रिलियन) डॉलर के करीब पूंक चुका है। हालांकि सरकार ने इसे काफी कम करके दिखाया है। पेंटागन के एक वरिष्ठ बजट अधिकारी ने संसद को बताया कि युद्ध में  अमेरिका को अब तक 29 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है जबकि बजट 25 अरब डॉलर का था। ईरान युद्ध के कारण भारी खर्च और हथियार भंडार में आई कमी के मुद्दे पर ट्रंप के विपक्ष के साथ-साथ अपनी पार्टी के सांसदों के भी भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर ईरान ने अभी तक युद्ध में हुए नुकसान का विवरण जारी नहीं किया है और अब भी दावा करता है कि वह अमेरिका के खिलाफ युद्ध जारी रखने में सक्षम है। राष्ट्रपति ट्रंप अब ईरान युद्ध को लेकर घर के अंदर ही बुरी तरह घिरते जा रहे हैं। जहां एक तरफ अमेरिकी जनता सड़कों पर उतर रही है वहीं अमेरिकी सेना और संसद सभी जगह ट्रंप को अपने ही उन्हें घेर रहे हैं। 

-अनिल नरेन्द्र 


Saturday, 23 May 2026

इमरान का तख्ता पलट अमेरिका की साजिश थी

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार गिराने को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। लीक दस्तावेजों के आधार पर दावा किया गया है कि इमरान की कुसी सिर्फ अविश्वास के प्रस्ताव से नहीं गिरी थी। इसके पीछे अमेरिकी साजिश और पाक सेना की भूमिका थी। दरअसल, इमरान ने 24 फरवरी 2022 को रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से मॉस्को में मुलाकात की थी। ठीक उसी दिन रूस ने यूव्रेन पर हमले शुरू किए थे। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका इमरान की इस यात्रा से नाराज था। वह चाहता था कि पाकिस्तान यूक्रेन युद्ध पर रूस की खुलकर आलोचना करे, लेकिन इमरान सरकार ने तटस्थ रुख अपनाया। 7 मार्च 2022 को वाशिंगटन में पाक के तत्कालीन राजदूत असद मजीद खान और अमेरिकी सहायक विदेशी मंत्री डोनाल्ड लू के बीच बातचीत हुई। लू ने मजीद से कहा, यदि इमरान अविश्वास प्रस्ताव में टूट जाते हैं तो अमेरिका ‘सब माफ' कर देगा। इसके 33 दिन बाद, 9 अप्रैल 2022 को इमरान सरकार गिर गई। वाशिंगटन के एक होटल में लू ने मजीद को लंच पर इमरान को हटाने का दबाव दिया था। इमरान के हटने के अगले दिन ही शाहबाज ने सत्ता संभाल ली। नवम्बर 2022 में जनरल बाजवा पद से सेवानिवृत हुए और आमी चीफ आसिम मुनीर का उदय हुआ। इमरान ने आरोप लगाया था कि मुनीर की नियुक्ति पूर्व पीएम नवाज शरीफ से परामर्श के बाद हुई थी। बाकी तो इतिहास है। अमेरिका किसी भी ऐसी सरकार को बर्दाश्त नहीं करता जो उसका विरोध करे और जिसकी रूस से नजदीकी हो।

-अनिल नरेन्द्र

ट्रंप ने कैसे ईरान जंग में कमाए पैसे?

डोनाल्ड ट्रंप पर पहली बार किसी अमेरिकी राष्ट्रपति पर जंग से कमाई करने पर सवाल उठने लगे हैं। अब ट्रंप ट्रेडिंग वॉर में घिर गए हैं। नए वित्तीय खुलासों के अनुसार 2026 की पहली तिमाही यानी जनवरी से मार्च 2026 के बीच ट्रंप या उनके सलाहकारों की मंडली ने 3700 से ज्यादा शेयर सौदे किए। रोज लगभग 40 शेयर सौदे हुए। इनमें ट्रंप को लगभग 800 करोड़ रुपए यानी लगभग 83 मिलियन डॉलर से ज्यादा की कमाई हुई। ये शेयर एनवीडिया, बोइंग, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, अमेजन, ओरेकल और कॉस्टको जैसी कंपनियों के थे। ट्रंप विवादों में इसलिए हैं क्योंकि ये कंपनियां रक्षा सौदों, एआई नियमों और चिप और सेमीकंडक्टर आयात या फिर निर्यात से जुड़ी हुई हैं। वॉल स्ट्रीट की कंपनी एरिक प्रिंस के मुताबिक अमेरिका के इतिहास में ये पहली बार है जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति वित्तीय लेन-देन और हितों के टकराव के मुद्दे पर सवालों के घेरे में है। उधर व्हाइट हाउस ने एक बयान जारी कर शेयर ट्रेडिंग को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर लगे आरोपों से इंकार किया है। ट्रंप आर्गेनाइजेशन पूरे कारोबार को संभालता है। बेटे जूनियर ट्रंप के पास अमेरिका और यूरोप से निवेश लाने की जिम्मेदारी है। जबकि दामाद जेरेड कुशनर की कंपनी एफिनिटी पार्टनर्स सउदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के सरकारी वेल्थ फंड से मिले अरबों डालर के निवेश को संभालती है। इस रकम को शेयरों में डायवर्ड करते हैं। ट्रंप के पोर्टफोलियो में पिछले साल के अंतिम तीन महीनों में कई सौ शेयर ट्रेडिंग के रिकार्ड हैं। जबकि इस साल 10 फरवरी को ही ट्रंप ने माइक्रोसॉफ्ट, मेटा और अमेजन में अपने शेयरों की हिस्सेदारी को बेचकर लगभग 350 करोड़ रुपए की कमाई की। इससे कुछ दिन पहले ही ट्रंप ने एंटी ट्रस्ट और एआई रेगुलेशन और डाटा नीतियों से संबंधित बड़े फैसले किए। ईरान युद्ध के दौरान ट्रंप के कभी युद्ध तो कभी वार्ता के बयानों से तेल और स्टॉक वायदा बाजारों में तेज उथल-पुथल रही। जब भी ट्रंप युद्ध का बयान देते तो तेल के दाम उछल जाते, जबकि वार्ता वाले बयान से शेयर बाजारों में तेजी आ जाती।

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 21 May 2026

यूएई के बराकाह न्यूक्लियर प्लांट पर हमला

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के अल दफरा क्षेत्र में स्थित बराकाह न्यूक्लियर पावर प्लांट के परिसर में रविवार को एक ड्रोन हमला हुआ और उसके बाद आग लग गई। हालांकि किसी के घायल होने की सूचना नहीं है। ईरान और यूएई अब जानी दुश्मन बन चुके हैं। ड्रोन से बराकाह न्यूक्लियर प्लांट को निशाना बनाया गया। इस अटैक को यूएई ने बिना किसी कारण के आतंकी हमला बताया। बहरहाल इस हमले की जिम्मेदारी  फिलहाल किसी भी समूह ने नहीं ली है। मगर यूएई का आरोप ईरान की तरफ ही है। यूएई का मानना है कि यह हमला ईरान ने ही ड्रोन के जरिए किया है। पिछले कई दिनों से ईरान-यूएई में तनातनी चल रही है। ईरान का मानना है कि यूएई खुलकर अमेरिका और इजरायल की मदद कर रहा है और उसकी भूमि से ही अमेरिकी हमले हो रहे हैं। खबर तो यहां तक है कि वर्तमान जंग के दौरान ही इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके मोसाद  प्रमुख ने यूएई का गुप्त दौरा किया था। ड्रोन हमले से बराकाह संयंत्र के बाहरी क्षेत्र में स्थित एक इलैक्ट्रिक जेनेरेटर में आग लग गई। यह आग संयंत्र की भीतरी परिधि के बाहर लगी थी। संघीय परमाणु नियामक प्राधिकरण (एफएएनआर) ने भी इस हमले की पुष्टि की कि आगे से संयंत्र की सुरक्षा या उसके जरूरी सिस्टम पर कोई असर नहीं पड़ा है और सभी यूनिट सामान्य रूप से काम कर रही है। सभी जरूरी एहतियाती कदम उठा लिए गए हैं और लोगों से अपील की गई है कि वे सिर्फ आधिकारिक स्रोतों से ही जानकारी लें और अफवाहों से बचें। बयान में ड्रोन हमले के स्त्राs के बारे में कोई भी जानकारी नहीं दी गई। ईरानी सूत्रों का कहना है कि हमने कोई हमला नहीं किया है तो फिर हमला किसने किया? क्या कोई तीसरी शक्ति अपना खेल तो नहीं खेल रही जो दोनों मुल्कों को लड़वा कर अपना उल्लू सीधा करना चाहती है। इससे पहले भी 5 मई को यूएई ने कहा था कि उसके कुछ क्षेत्रों पर ईरान से दागी गई मिसाइलों और ड्रोन से हमला किया गया, लेकिन ईरान की सैन्य कमान ने इस आरोप से इंकार किया था। ईरानी अधिकारियों ने यूएई के उन आरोपों को भी खारिज किया था जिसमें ईरान पर हमला करने का दावा किया गया था। दरअसल यूएई को ईरान इसलिए अपना दुश्मन मान रहा है, क्योंकि उसे लगता है कि यूएई की धरती का इस्तेमाल करके ही अमेरिका ने उस पर अटैक किए हैं। बहरहाल इस हमले ने ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच चल रहे नाजुक संघर्ष विराम को लेकर चिंताओं को और बढ़ा दिया है। ऐसा लग रहा है कि कूटनीतिक प्रयास भी अब काफी तनावपूर्ण होते जा रहे हैं। संयुक्त अरब अमीरात ने इस हमले के पीछे के लोगों पर बिना किसी उकसावे के आतंकवादी हमला करने का आरोप लगाया और चेतावनी दी कि वह अपनी देश की संप्रभुता पर किसी भी तरह के खतरे को बर्दाश्त नहीं करेगा। दक्षिण कोरिया की मदद से बने और 2020 से चालू बराकाह  परमाणु संयंत्र अरब दुनिया का एक मात्र परमाणु ऊर्जा संयंत्र है। 20 अरब डालर की लागत से बना यह संयंत्र यूएई की लगभग एक चौथाई ऊर्जा जरूरतों को पूरा करता है।

-अनिल नरेन्द्र