Translater

Tuesday, 1 September 2026

कॉकरोच पीछे नहीं हटेंगे

 
सरकार की ओर से 25 जुलाई को किए गए वादों पर कार्रवाई नहीं होने पर कॉकरोच जनता पाटी ने घोषणा की है कि वह अब पीछे नहीं हटंगे। नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब कॉकरोच जनता पाटी (सीजेपी) ने एक बार फिर सड़कों पर उतरने की घोषण की है। सीजेपी ने बताया कि वो 5 सितम्बर को इंडिया गेट से दिल्ली पुलिस हैडक्वार्टर तक शांतिपूर्ण युवा मार्च करेगी। सीजेपी ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर बयान जारी कर केन्द्र सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ एफआईआर वापस लेने के अपने वादे को पूरा नहीं किया। 25 जुलाई को धर्मेन्द्र प्रधान के शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफे के साथ ही केंद्र सरकर ने सीजेपी को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ एफआईआर वापस लेने समेत कई मांगों पर सहमति दी थी। 20 जुलाई को संसद चलो मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई थी जिसमें कई प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने लाठियां बरसाई थीं और दावा तो यह भी किया जा रहा है कि पैलेट गन तक का इस्तेमाल हुआ था। इसके बाद प्रदर्शनकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। हालांकि ये मामला अब सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच चुका है जहां पर केन्द्र ने माना है कि गैर आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को वापस लिया जा सकता है। सीजेपी प्रवक्ता आशुतोष रांका ने एक्स पर पोस्ट कर कहा है कि सरकार 25 जुलाई को किए गए वादों पर काम करने में नाकाम रही है। 25 जुलाई को सरकार ने सीजेपी प्रतिनिधिमंडल से जो वादे किए थे उनमें एक वादा यह भी था कि इस आंदोलन से जुड़े मृत लोगों के परिवारों को एक करोड़ रुपए का मुआवजा भी दिया जाएगा। कोई मुआवजा नहीं दिया गया। वहीं सीजेपी ने एक्स पर लिखा कि कॉकरोच जनता पाटी केन्द्र सरकार को 25 जुलाई को भारत के युवाओं से किए गए वादों को पूरा न करने की कड़ी निंदा करती है, खासकर स्टूडेंट्स और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ एफआईआर वापस लेने से जुड़े वादों को 15 सितम्बर का प्रस्तावित मार्च इंडिया गेट से शुरू होगा, नई दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक जाएगा। इसमें नीट से जुड़े मृत छात्रों के परिवार, पुलिस कार्रवाई के पीड़ित, छात्र और युवा संगठन शामिल होंगे। संगठन ने कहा है कि प्रदर्शन का उद्देश्य किसी तरह का हिंसक टकराव नहीं, बल्कि सरकार से अपने वादे पूरे करने की मांग करना है। सीजेपी ने युवाओं और छात्र संगठनों से 5 सितम्बर को इंडिया गेट पहुंचने और शांतिपूर्ण तरीके से मार्च में शामिल होने की अपील की है। सीजेपी ने कहा कि युवाओंं के भरोसे को कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए। सीजेपी के मुताबिक एक पूरी पीढ़ी ने सरकार की बात पर भरोसा करके आंदोलन वापस लिया था और अब वह अपने वादों को पूरा करने की मांग कर रही है। संगठन का कहना है कि परिवारों और युवाओं की मौजूदगी इस आंदोलन को अपनी मांगों के प्रति गंभीर बनाएगी। सीजेपी ने कहा कि जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खोया है, वे मार्च की अगली कतार में होंगे और पुलिस कार्रवाई के पीड़ित उनके साथ चलेंगे। संगठन ने युवाओं से बड़ी संख्या में पहुंचने की अपील करते हुए सरकार से 25 जुलाई के आश्वासनों को पूरी तरह लागू करने की मांग की है। उम्मीद की जाती है कि यह प्रदर्शन शांति से गुजर जाए और 20 जुलाई की पुनर्वृत्ति न हो। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 29 August 2026

मोहन भागवत का विरोध

 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत इन दिनों अमेरिका में दौरा कर रहे हैं। 29 अगस्त को श्री भागवत ने न्यूयार्क के मेडिसन स्क्वायर गार्डन में एक विशाल जनसभा को संबोधित करना है। मोहन भागवत का जहां जमकर स्वागत हो रहा है वहीं कुछ विरोध के स्वर भी दिखाई दे रहे हैं। न्यूयार्क की सड़कों पर उनकी यात्रा के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं, लोग सड़कों पर पोस्टर, बैनर इत्यादि लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। सबसे प्रमुख विरोध करने वालों में न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी हैं। उन्होंने कहा कि वह इस कार्यक्रम का समर्थन नहीं करते, हालांकि ममदानी ने यह भी कहा कि किसी निजी कार्यक्रम को रद्द करने का अधिकार नगर प्रशासन के पास है या नहीं, यह उन्हें नहीं पता। भागवत आरएसएस के शताब्दी वर्ष के वैश्विक संपर्क कार्यक्रम के तहत अमेरिका पहुंचे हैं। मेडिसन स्क्वायर गार्डन में उनका एक बड़ा कार्यक्रम होना है। न्यूयार्क प्रवास के दौरान मोहन भागवत यूनिवर्सल वननेस कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे और शनिवार को प्रतिष्ठित मेडिसन स्क्वायर गार्डन में करीब 5000 लोगों की सभा को संबोधित करेंगे। जोहरान ममदानी ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, मैं हमारे शहर के इतिहास में पहला भारतीय-अमेरिकी मेयर भी हूं और मेरी मां का पूरा परिवार अब भी भारत में रहता है। उन्होंने कहा कि भारत के बारे में जो सोच उन्हें अपने परिवार से मिली और जिसे संभालते हुए वह बड़े हुए, वह एक बहुलतावादी समाज और ऐसे धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की है, जहां भारत के हर व्यक्ति को बराबरी से अपनाया जाता है। ममदानी ने कहा और किसी भी देश को लेकर ऐसी सोच वाले आंदोलन का उभार देखना बेहद परेशान करने वाला है, जो कुछ लोगों को अलग रखता है। मैं इसका पुरजोर विराध करता हूं, न केवल एक भारतीय-अमेरिकी के रूप में बल्कि ऐसे शहर के मेयर के तौर पर भी, जो हर व्यक्ति को अपनाने में गहरा विश्वास रखता है। फिर चाहे उसका रंग, नस्ल, धर्म, आस्था या मूल स्थान कुछ भी हो। अमेरिका में भागवत के कार्यक्रम यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन की मेजबानी कर रहा अहेड फोरम ने इंटरनेट मीडिया पोस्ट में कहा कि संघ प्रमुख मोहन भागवत की यात्रा एक कालातीत और सार्वभौमिक संदेश लेकर आती है। दुनिया एक परिवार है। संघ के संयुक्त महासचिव श्री मुकुंद जी ने कहा कि भागवत की विदेश यात्रा का उद्देश्य-भारत हिंदू समाज और संघ पर सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है। वहीं भाजपा ने कहा कि ममदानी का रुख उनके बहुलवाद के विपरीत है। अमेरिकी गायिका मैरी मिलीबेन ने कहा, मेरी सलाह ममदानी व उनके समाजवाद के समूह को है, पूंजीवाद बन पैसे जुटाएं मेडिसन ग्राउंड किराए पर लें और अपनी एंटी-मोदी मूर्खता के लिए अपनी खुद की रैली आयोजित करें। मिलीबेन ने आगे कहा-ममदानी और ये समाजवादी पागल मोहन भागवत के मेडिसन स्क्वायर गार्डन कार्यक्रम का विरोध कर रहे हैं जो कि वे पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी का विरोध करते हैं। देखें सरसंघचालक की अमेरिकी यात्रा जैसे-जैसे आगे बढ़ती है उन्हें कैसा रिस्पांस मिलता है। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 27 August 2026

नृपेंद्र मिश्र बनाम चंपत राय


श्री राम जन्म भूमि ट्रस्ट में चढ़ावा को लेकर की गई चोरी के विवाद में एक नया मोड़ आ गया है। राम मंदिर ट्रस्ट से इस्तीफे के बाद चंपत राय का एक 9 पन्नों का दूसरा पत्र सामने आया है। इसमें उन्होंने मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र की भूमिका को लेकर कई दावे किए हैं। चंपत राय ने आरोप लगाया कि मंदिर निर्माण से जुड़े कई फैसले समिति की बैठक में लिए जाते थे लेकिन बाद में उनमें बदलाव कर नृपेंद्र मिश्र के फैसलों को प्राथमिकता दी जाती थी। उन्होंने यह भी कहा कि कई मामलों में समिति के दूसरे सदस्यों के सुझाव और फैसलों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। चंपत राय ने अपने पत्र में बताया कि राम मंदिर निर्माण के लिए गठित ट्रस्ट में कुल 15 ट्रस्टी थे और नृपेंद्र मिश्र को निर्माण समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। उनके अनुसार नृपेंद्र मिश्र के ही सुझाव पर लार्सन एंड टूब्रो को मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी दी गई। मंदिर और अन्य भवनों के डिजाइन से जुड़े काम के लिए नोएडा की डिजाइन एसोसिएट फर्म का चयन किया गया। चंपत राय ने नृपेंद्र मिश्र पर सीधा आरोप लगाया कि निर्माण समिति में उन्होंने अपने लोगों को ही शामिल किया। उन्होंने दावा किया कि इनमें से कुछ लोग 6 वर्षों के दौरान सिर्फ एक या दो बार ही अयोध्या आए। चंपत राय के अनुसार एनबीसीसी के चेयरमैन अनूप मित्तल लगातार नृपेंद्र मिश्र के साथ निर्माण समिति की बैठकों में शामिल होते थे। बता दें कि चंपत राय ने मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कथित चोरी का मामला सामने आने के बाद 26 जून को महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद 6 जुलाई को ट्रस्ट की बैठक में उनका इस्तीफा मंजूर हो गया था। इसी दिन चंपत राय ने एक पत्र जारी कर ट्रस्टी अनिल मिश्र की भूमिका पर गंभीर आरोप लगाए थे। चंपत राय ने अपने पत्र में आगे कहा कि मंदिर निर्माण के सभी निर्णयों में नृपेंद्र मिश्र ने सदैव अपने को प्रमुख रखा। उन्होंने यह भी बताने की कोशिश की कि मंदिर निर्माण की सबसे पावरफुल मंदिर ट्रस्ट से ऊपर चलकर मंदिर निर्माण समिति रही जिसके चेयरमैन नृपेंद्र मिश्र हैं। चंपत राय जी ने सारा चढ़ावा चोरी प्रकरण में अपने आप को पाक साफ दर्शाने की कोशिश की है। सारा दोष अनिल और नृपेंद्र मिश्र पर मढ़ने की कोशिश की है। आप ट्रस्ट के महासचिव थे, आपकी क्या ड्यूटी थी? नृपेंद्र मिश्र के अनुसार श्री राम जन्म भूमि ट्रस्ट के चढ़ावे की डकैती हो रही थी और आपको पता नहीं चला। बेशक आप अपनी ऊंची पोजीशन और संपर्क से फिलहाल बच जाएं पर भगवान राम आपको कभी माफ नहीं करेंगे। आपने और आपके तमाम साथियों ने करोड़ों हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुंचाई है, वैसे आपको कभी क्षमा नहीं किया जा सकता। रहा सवाल नृपेंद्र मिश्र का तो उन्होंने चंपत राय के आरोपों के जवाब में कहा कि मैंने चंपत राय का कोई भी पत्र नहीं देखा है। उन्होंने साथ ही कहा कि अगर ऐसा कोई पत्र है भी तो उसमें उनके खिलाफ इस तरह की बातें नहीं लिखी गई होंगी। साफ है कि अब चंपत राय बदला लेने के मूड में हैं और यह विवाद अभी और आगे बढ़ेगा। -
अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 25 August 2026

महंगी चीनी : क्या वजह इथेनॉल तो नहीं?



भारत में चीनी के दाम पिछले कुछ महीनों से तेजी से बढ़ रहे हैं। राइटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार केवल इसी महीने भारत में चीनी की कीमतों में 20 फीसदी इजाफा हुआ है। भारत सरकार के उपभोक्ता मामलों के विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार 20 अगस्त को भारत की खुदरा बाजार में चीनी की कीमत 55.7 रुपए प्रति किलोग्राम थी। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, एक महीने पहले चीनी की कीमत 48.18 रुपए प्रति किलोग्राम थी। 20 अगस्त 2025 को इसकी कीमत 46.3 रुपए प्रति किलोग्राम थी। बाजार के जानकारों का कहना है कि चीनी के दाम इससे पहले कभी इतने ऊंचे नहीं गए। सवाल यह भी पूछा जा रहा है कि क्या पेट्रोल में मिलाए जाने वाले इथेनॉल से चीनी महंगी हुई है? कच्चे तेल की खपत के मामले में अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया में तीसरे नंबर पर है। लेकिन भारत में इस्तेमाल होने वाले कच्चे तेल का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है। इस आयात को कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने, आत्मनिर्भरता बढ़ाने और प्रदूषण कम करने के लिए केन्द्र सरकार ने 2018 में पेट्रोल में मिलाए जाने वाले इथेनॉल की मात्रा को 10 फीसदी से बढ़ाकर 20 फीसदी करने का फैसला किया था। यह लक्ष्य 2030 में हासिल किया जाना था लेकिन सरकार ने इसे जुलाई 2025 में ही हासिल कर लिया। भारत में चीनी उद्योग सरकारी नियंत्रण के तहत आता है। चीनी मिलों को किसानों से खरीदे गए गन्ने के लिए कितना एमआरपी देना होगा यह केन्द्र सरकार तय करती है। सरकार यह भी तय करती है कि कौन सी चीनी मिल हर महीने कितनी चीनी बेच सकती है और चीनी का निर्यात किया जा सकता है या नहीं। देश में बड़े पैमाने पर इथेनॉल खरीदने वाला ग्राहक भी सरकार ही है और इस तरह इथेनॉल की कीमत भी अप्रत्यक्ष रूप से सरकार ही तय करती है। राइटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार 2025-26 के चीनी वर्ष में 30 लाख टन चीनी का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने के लिए किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह देश में चीनी के कुल उत्पादन का करीब 10 फीसदी है। गन्ने के रस के अलावा चीनी बनाने के दौरान तैयार होने वाले सिरप, ए-हेवी मोलासिस, बी-हेवी मोलासिस और सी-हेवी मोलासिस से भी इथेनॉल बनाया जा सकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में उत्पादित कुल इथेनॉल का करीब एक तिहाई हिस्सा गन्ने से तैयार किया गया था। दूसरी तरफ सरकार ने शुक्रवार को कहा कि चीनी की बढ़ती कीमतों के लिए पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने के कार्यक्रम को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। सरकार ने कहा कि देश में उत्पादन अनुमान से कम रहने, त्यौहारी सीजन से पहले मांग बढ़ने और इंडस्ट्री के एक हिस्से की ओर से जमाखोरी के चलते चीनी के दाम उछले हैं। हालांकि मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त मात्रा में चीनी उपलब्ध है। मंत्रालय ने इथेनॉल ब्लैडिंग प्रोग्राम के चलते दाम बढ़ने की बात खारिज की। कहा, इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के उपयोग को कीमतों में हालिया बढोत्तरी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उधर सरकार ने चीनी की कीमतों की वृद्धि को देखते हुए 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन गैर-परिष्कृत चीनी के ड्यूटी-फ्री (शुल्क मुक्त) आयात को मंजूरी दे दी है। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि त्यौहारी सीजन में चीनी के बढ़ते दामों की कड़वाहट और न बढ़े। एक दिन पहले, सरकार ने 10 लाख टन से ज्यादा चीनी का इस्तेमाल करने वाले कारोबारियों के लिए चीनी की स्टॉक सीमा 15 दिन तय कर दी थी।

- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 22 August 2026

अमेरिका-ईरान जंग का न्यूक्लियर होने का खतरा


अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अब परमाणु हमले की धमकियों तक पहुंच गया है। इससे सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देशों में हड़कंप मचा हुआ है। दरअसल, अमेरिका की पूर्व कांग्रेस वुमन मार्जेरी टेलर ग्रीन ने दावा किया था कि डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर न्यूक्लियर अटैक की योजना बना रहे हैं। इसके बाद ईरानी सांसद फिदा हुसैन मलेकी ने सख्त चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका ने परमाणु हमला किया तो ईरान भी उसी हथियार और उसी भाषा में पलटवार करेगा। अमेरिका की पूर्व कांग्रेस सुमन मार्जेरी टेलर ग्रीन ने ट्रंप की न्यूक्लियर अटैक वाली प्लानिंग लीक कर दी थी। उनहोंने दावा किया था कि वो ईरान पर परमाणु बम फोड़ने के बारे में विचार कर रहे हैं। इस बीच ईरान ने भी ऐसा ही ऐलान कर दिया है। क्या हम यह मानें कि ईरान ने भी कोई परमाणु हथियार बना लिया है? जिस भाषा का ईरान इस्तेमाल कर रहा है उसका मतलब तो साफ है कि अगर तुमने हम पर परमाणु हमला किया तो हम भी परमाणु हमले से जवाब देंगे। एएनआई के अनुसार, ग्रीन ने भी आरोप लगाया कि ट्रंप प्रशासन अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के उन आकलनों को स्वीकार नहीं कर रहा, जिनके मुताबिक ईरान परमाणु हथियार विकसित करने के मुहाने पर नहीं है। व्हाइट हाउस ने ग्रीन के दावे पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। अमेरिकी सरकार या रक्षा अधिकारियों ने भी सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी योजना की पुष्टि नहीं की। अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग अब उस डरावने मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां परमाणु हमले की धमकियां खुलेआम दी जाने लगी है। अगर डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर एटम बम फोड़ने की बेवकूफी की तो क्या होगा? इस एक सवाल ने न सिर्फ वाशिंगटन और तेहरान में बल्कि पूरे खाड़ी देशों में भी हड़कंप मचा दिया है। सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देश अब थर-थर कांप रहे हैं, क्योंकि ईरान ने साफ कह दिया है कि अगर किसी भी खाड़ी देश ने अमेरिका को मदद की तो उसे भी भस्म होने से कोई नहीं बचा पाएगा। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के सदस्य फिदा हुसैन मलेकी से सीधा सवाल पूछा गया कि अगर ट्रंप ने सच में परमाणु बम फोड़ दिया तो ईरान क्या करेगा? इस पर मलेकी ने बिना झिझक कहा, अगर ऐसा कोई हमला होता है तो ईरान भी उसी भाषा और उसी हथियार से जवाब देगा। हालांकि मलेकी ने खुलकर ये नहीं माना है कि ईरान के पास इस समय परमाणु बम तैयार है या नहीं, लेकिन उनके इस बयान ने अमेरिका और उसके सहयोगियों के पसीने छुड़ा दिए हैं। उन्होंने दावा किया कि ईरान के पास कई ऐसे हथियार हैं जो न केवल खतरनाक हैं, बल्कि आधुनिक हैं जो अभी दुनिया के सामने आए ही नहीं। अगर युद्ध भड़का तो वह सिर्फ मध्य पूर्व में ही नहीं रहेगा वह पूरी दुनिया का अपनी चपेट में ले लेगा। ईरान ने अब केवल अपना बचाव करने के बजाए आक्रामक रणनीति अपना ली है। अगर अमेरिका परमाणु बम जैसा आत्मघाती कदम उठाता है या खाड़ी देश अमेरिका की ऐसा करने में मदद करते हैं, तो यह जंग केवल दो देशों के बीच नहीं रहेगी। खाड़ी देशों के तबाह होने से पूरी दुनिया में कच्चे तेल की सप्लाई ठप्प हो जाएगी। पेट्रोल, डीजल के दाम आसमान छूने लगेंगे और वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी। यही वजह है कि ट्रंप के परमाणु बम और ईरान के जवाबी पलटवार की खबरों ने दुनिया भर के नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 20 August 2026

जिंदा पकड़ो या मारो: मिलेंगे 30000

 
ईरान की हुकूमत ने अब अपनी अवाम को जमीनी लड़ाई के लिए लगता है तैयार करना शुरू कर दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते (पीस डील) अब लगभग समाप्त हो गए हैं और फिर से पूरी जंग की तैयारी शुरू हो गई है। तभी तो ईरान को अब लगता है कि अमेरिका-इजरायल का अगला हमला जमीन पर होगा। इसी खतरे को देखते हुए ईरानी हुकूमत ने ऐलान कर दिया है कि अमेरिकी सैनिकों को मारने या पकड़ने पर 30 हजार डॉलर इनाम की घोषणा की गई है। महिलाआंs के लिए ईनाम दोगुना होगा। ईरान की सेना ने रविवार को ऐलान किया कि वह अमेरिकी सैनिकों को मारने या पकड़ने पर 30000 डॉलर के बराबर ईनाम देगी। सेना की ओर से कहा गया है कि अगर यह काम कोई महिला करती है तो ईनाम दोगुना हो जाएगा। यह ऐलान पश्चिमी एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच लगातार तनाव के बीच हुआ है। जहां दोनों एक-दूसरे पर हमला करते रहे हैं। 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से होर्मूज स्टेट को फिर से खोलना किसी भी शांति समझौते में लगातार रुकावट रहा है। ईरान की सरकारी एजेंसी ईरना की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के आमी चीफ आमिर हतामी ने कहा कि वित्तीय मदद में हिस्सा लेने के लिए बड़ी संख्या में रिक्वेस्ट मिलने के बाद यह प्लान बनाया गया था। हतामी ने इस बारे में कोई डिटेल नहीं दी कि अमेरिकी सैनिकों को कहां और कब मारा या पकड़ा जाएगा। पश्चिम एशिया युद्ध के दौरान ईरान में अमेरिकी ग्राउंड फोर्स की फिलहाल कोई तैनाती नहीं हुई है, सिवाय अप्रैल में एक मारे गए अमेरिकी पायलट के रेस्क्यू मिशन के। ईरना ने हतामी के हवाले से कहा जो कोई हमलावर अमेरिकी मिलिट्री के किसी आदमी को मारेगा या पकड़कर सौंपेगा उसे इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की आमी की तरफ से 30000 डॉलर या पांच बिलियन तोमन के बराबर इनाम मिलेगा। उन्होंने 10000 ईरानी रियाल के बराबर की एक इनफार्मल यूनिट का इस्तेमाल किया। इस घोषणा को ट्रंप की उस चेतावनी से जोड़कर देखा जा रहा है जिसमें उन्होंने अमेरिकी सैनिकों को ईरान में उतारने की संभावना जताई थी। यरूशलम पोस्ट के अनुसार ईनाम पाने वाले को सिर्फ इतना ही नहीं मिलेगा बल्कि हतामी ने कहा कि अमेरिकी सैनिक को मारने के लिए इस्तेमाल किए गए हथियार को दोगुनी कीमत पर खरीदा जाएगा और उसे खास म्यूजियम में भी रखा जाएगा। यही नहीं ईरान अपने सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की हत्या का बदला लेने के लिए भी बेताब हैं। ईरान ने एक टारगेट लिस्ट भी बनाई है जिसमें डोनाल्ड ट्रंप, इजरायली पीएम नेतन्याहू और अमेरिका के सहयोगी देशों के राष्ट्राध्यक्षों के नाम भी शामिल हैं। ईरान पर हमले के लिए अमेरिका ने सबसे अधिक अरब देशों की जमीन पर एयरफोर्स का इस्तेमाल किया। अब मांग उठ रही है कि अरब देशों के राष्ट्राध्यक्षों को भी इस लिस्ट में शामिल किया जाए। क्येंकि अमेरिका के मददगार भी पूर्व सुप्रीम लीडर की हत्या में बराबरी के गुनहगार हैं। ईरान ने अब अपनी नीति बदली है। पड़ोसी अरब मुल्कों में अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाया ही गया पर उनकी टॉप लीडरशिप को खत्म करने की सौगंध ले रहा है। ईरान के सांसद अमीर हुसैन सबेती ने सरकार से मांग की है कि हिट लिस्ट में खाड़ी देशों के शासकों को भी जोड़ा जाए। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 18 August 2026

जिंदा हैं मुजतबा खामेनेई


पिछले 28 फरवरी से जब से अमेरिका इजरायल ने ईरान पर हमला किया था जिसमें आयतुल्लाह अली खामेनेई और उनके परिवार वालों की शहादत हुई थी जिसमें एक 14 महीने की बच्ची भी शामिल थी। कहा जा रहा था कि इस हमले में मुजतबा खामेनेई या तो मारे गए हैं या बुरी तरह से जख्मी हुए हैं। यह भी कहा गया था कि वो मास्को में आईसीयू में हैं। 28 फरवरी के हमले के बाद से मुजतबा खामेनेई कभी जनता के सामने भी नहीं आए थे। पर कुछ दिन पहले उनका एक वीडियो सामने आया। हाल ही में इजरायल ने दावा किया था कि उनकी हालत बेहद गंभीर है और उनको अस्पताल में भती कराया गया है। यहां तक कहा गया था कि उनकी मौत की खबर सामने आए तो हैरानी नहीं होगी। इन दावों के बीच ईरान की मेहर-न्यूज एजेंसी ने मुजतबा खामेनेई का 12 सेकंड का एक वीडियो जारी किया है। वीडियो में वह लोगों से बातचीत करते हुए नजर आ रहे हैं। हालांकि यह वीडियो कब का है यह साफ नहीं किया गया है। इसलिए सवाल अभी भी बरकरार है। वीडियो ने बीमारी की खबरों पर उठाए सवाल मेहर न्यूज एजेंसी की ओर से जारी वीडियो में मुजतबा खामेनेई लोगों के बीच चंगे भले नजर आ रहे हैं और बातें कर रहे हैं। पहली नजर में यह वीडियो उनकी गंभीर बीमारी से जुड़ी खबरों का जवाब माना जा रहा है। हालांकि यह बड़ा सवाल इसकी तारीख को लेकर भी है। एजेंसी ने यह नहीं बताया कि वीडियो कब रिकार्ड किया गया था। ऐसे में सिर्फ 12 सेकंड के इस वीडियो के आधार पर उनकी मौजूदा सेहत के बारे में कोई पुख्ता निष्कर्ष निकालना मुश्किल है। फरवरी में सर्वेच्च नेता की जिम्मेदारी मुजतबा खामेनेई ने संभाली थी। इसके बाद से उनकी सार्वजनिक मौजूदगी बेहद सीमित रही है। उनकी तरफ से ज्यादातर लिखित बयान ही सामने आए। इसी वजह से उनकी सेहत और गतिविधियों को लेकर लगातार अटकलें लगती रहीं हैं। मुजतबा खामेनेई की सेहत को लेकर चल रही अफवाहों के बीच ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि इस वक्त सुप्रीम लीडर (मुजतबा खामेनेई) से डायरेक्ट बात करना बेहद मुश्किल है। उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि वह मुजतबा खामेनेई से मिल चुके हैं। जानकारी के मुताबिक यह मुलाकात मई के महीने में हुई थी। राष्ट्रपति ने व्यापार संघ के प्रतिनिधियें से एक मीटिंग के दौरान कहा था कि वो और मुजतबा खामेनेई करीब ढाई घंटा साथ थे और यह मुलाकात काफी अच्छी रही। सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रपति को खामेनेई से मिलने का सुनहरा मौका एक रियायत के तौर पर मिला था। कहा जा रहा है कि पेजेश्कियान बार-बार मुजतबा से मिलने की गुजारिश कर रहे थे और यहां तक कि धमकी दे रहे थे कि अगर उनसे मिलने नहीं दिया गया तो वो अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। खामेनेई के कार्यालय को आखिर इस मुलाकात के लिए हामी भरनी पड़ी, लेकिन ये मुलाकात कहा जा रहा है कि नार्मल नहीं थी। अमेरिका-इजरायल ने लगातार ये दिखाने की कोशिश की कि मुजतबा को गंभीर चोटें लगी हैं, वह बुरी तरह जख्मी हुए हैं, उनका चेहरा जल गया है और पैरों में गंभीर चोटें आई हैं। जिसके बाद उनके पैर की सर्जरी भी हुई है और अब यह वीडियो। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 15 August 2026

भाग ट्रंप भाग

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पुष्टि की है कि पिछले महीने तुर्किए में नाटो सम्मेलन से रवाना होते समय उन्होंने चुपचाप जेम्स बांड स्टाइल में विमान बदल लिया था। ऐसा संभावित खतरे की वजह से किया गया था। ट्रंप ने मंगलवार को पत्रकारों से कहा कि मैं सीक्रेट सर्विस और सेना की बात मानता हूं। वह चाहते थे कि मैं दूसरी उड़ान और दूसरे विमान से जाऊं। मुझे वही करना था, जो उन्होंने कहा। ट्रंप ने यह भी स्वीकार किया कि वह छिपकर अपने विमान एयरफोर्स वन से भागकर एक दूसरे विमान से निकले। यह बताना जरूरी है कि छिपकर भागने से पहले उन्होंने न तो मार्को रूबियो, अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को विमान बदलने का प्लान बताया और न ही उनके साथ गए पत्रकारों को। यह दर्शाता है कि उनकी नजरों में इनकी कीमत क्या है। खैर, मैं आपको पूरी कहानी बताता हूं कि हुआ क्या। डोनाल्ड ट्रंप पिछले महीने तुर्किए में नाटो शिखर सम्मेलन में गए थे। नाटो सम्मेलन से निकलते समय ईरान के संभावित खतरे को देखते हुए ट्रंप ने गुपचुप तरीके से विमान बदल लिया। वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति टेलीविजन कैमरों की मौजूदगी में एयरफोर्स वन में सवार हुए, फिर उन्हें चुपके से एक ऊंचे एयरपोर्ट केटरिंग (खाने के) ट्रफ में ले जाया गया और एक अन्य सैन्य विमान में पहुंचाया गया। इस दौरान एयरफोर्स वन विमान में सवार पत्रकारों और व्हाइट हाउस के कुछ कर्मचारियों व मंत्री मार्को रुबियो को इसकी जानकारी तक नहीं मिली। अधिकारियों ने सीबीएस न्यूज व बीबीसी को बताया कि अमेरिका ने विमान पर मिसाइल दागने की ईरान की विश्वसनीय धमकी का पता लगाया था। हालांकि व्हाइट हाउस ने इस गुप्त तरीके से विमान बदलने की पुष्टि नहीं की। हालांकि बाद में खुद ट्रंप ने इसकी पुष्टि कर दी। आखिरी समय में विमान बदलने के इस फैसले से सवाल उठे हैं कि क्या जिस विमान को दिखावे के लिए इस्तेमाल किया गया था, उसमें मौजूद लोगों को खतरे में ही छोड़ दिया गया था। विमान में सवार पत्रकारों और व्हाइट हाउस के अधिकारियों को पता नहीं था कि संभावित ईरानी खतरे के जवाब में एक योजना के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को वहां से चुपचाप निकाल लिया गया था। ट्रंप पहले कह चुके हैं कि अंकारा में हुए सम्मेलन के दौरान वह ईरान के टारगेट नम्बर वन थे। ट्रंप ने मंगलवार को कहा, मेरा अनुमान है कि कोई खतरा था। मैंने इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मांगी। मुझे बहुत सारी धमकियां मिलती हैं, जिनके बारे में आपको शायद पता भी नहीं हो। पिछले महीने की यह गुप्त कार्रवाई तब हुई जब युद्ध खत्म करने की बातचीत टूटने के बाद अमेरिका ने ईरान पर फिर से हमले शुरू किए थे। इसके एक दिन बाद ट्रंप ने विमान बदला था। ट्रंप कतर की ओर से दिए गए विमान नया बोईंग 747-8 से तुर्किए पहुंचे थे। लेकिन उन्होंने कहा था कि वह पुराने समय की याद में पुराने एयरफोर्स वन से वापस जाएंगे। 8 जुलाई को उन्होंने कैसे डर के मारे विमान बदला यह सबने देखा ही है। अखबार के मुताबिक रक्षामंत्री पीर हेगसेथ भी अलग से बाहरी सीढ़ियों के जरिए सी-32ए में सवार हुए। उधर एयरफोर्स वन पर बैठे पत्रकारों से कहा गया कि वह खिड़कियों के पर्दे बंद रखें। शायद इसलिए कि वह बाहर का दृश्य न देख सकें। वह यह न देख सकें कि राष्ट्रपति ट्रंप विमान के गुप्त दरवाजे से विमान छोड़ चुके हैं। इसलिए कहा, भाग ट्रंप भाग।  

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 13 August 2026

होर्मूज में अमेरिकी जहाजों की तैनाती

अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाते हुए मिडल ईस्ट में 20 से ज्यादा युद्धपोत तैनात कर दिए हैं और होर्मूज जलडमरूमध्य में नाकाबंदी सख्त कर दी है। ईरान ने जलमार्ग को खोलने के लिए मुआवजा, प्रतिबंध हटाने और ब्लॉकेड खत्म करने जैसी शर्तें रखी हैं। ओमान के साथ संभावित समझौता अंतिम चरण में है, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव अभी भी चरम पर बना हुआ है। अमेरिका ने मिडल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाते हुए 20 से ज्यादा युद्धपोत तैनात कर दिए हैं। यह कदम ईरान पर नाकाबंदी को सख्ती से लागू करने में होर्मूज में बढ़ते तनाव के बीच उठाया गया है, जहां वैश्विक तेल सप्लाई की सबसे अहम लाइन गुजरती है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने सोमवार को एक्स पर एक पोस्ट में बताया कि ये युद्धपोत सीधे तौर पर ईरान के खिलाफ लगाए गए ब्लॉकेड को लागू करने के मिशन में लगे हैं। तैनात जहाजों में अमेरिकी नेवी का डेस्ट्रॉयर यूएसएस रॉस भी शामिल है, जिसके जरिए समुद्री निगरानी और इंटरसेप्शन ऑपरेशन चल रहे हैं। सेंटकॉम ने इसी की तस्वीर शेयर की थी। सेंट्रल कमांड ने दावा किया है कि 9 अगस्त तक 55 कमर्शियल जहाजों को रास्ता बदलने पर मजबूर किया गया, 2 जहाजों को रोका गया और 2 पर चढ़कर जांच की गई। यह साफ संकेत है कि अमेरिका सिर्फ चेतावनी नहीं दे रहा, बल्कि सीधे तौर पर समुद्र में नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। उधर, ईरान-अमेरिका युद्ध में सबसे बड़ी लेकिन अनदेखी मानवीय त्रासदियों में से एक समुद्र के बीच फंसे हजारों नाविक हैं। संयुक्त राष्ट्र की समुद्री एजेंसी (आईएमओ) के मुताबिक करीब 6000 नाविक अब भी फारस की खाड़ी में जहाजों फंसे हैं। कई नाविक तो चार महीने से घर नहीं लौट पाए हैं। मैं यूएसएस अब्राहम लिंकन बाबत एक ऐसी ही रिपोर्ट पढ़ रहा था। उसमें बताया गया था कि पिछले लगभग 200 दिनों से ज्यादा समय से यह समुद्री जहाज समुद्र में हैं। जहाज के अंदर अब तो खाने की कमी हो गई है। दवाएं कम हो गई हैं। टायलेट खराब हो चुके हैं इत्यादि इत्यादि। जहाज के डॉक्टर अब कहने लगे हैं कि अगर जल्द यह सैनिक घर नहीं लौटे तो इनमें से कई मनोवैज्ञानिक शिकार हो जाएंगे। वैसे भी देखा जाए जब लिंकन में ऐसी भयावह स्थिति बनी है तो उस पर तैनात लगभग 5000 सैनिक युद्ध कैसे लड़ेंगे। कई नाविकों का बाहरी संपर्क लगभग टूट चुका है। उन्हें हर कुछ में दिन में सिर्फ 30 मिनट इंटरनेट मिलता है। कुछ जहाजों पर सीमित राशन होने से नाविक दिन में सिर्फ एक बार चावल और दाल खा रहे हैं। लगातार मिसाइल या ड्रोन हमले के खतरे के खौफ में नींद भी पूरी नहीं कर पाते। कई लोग इस तैयारी के साथ सोते हैं कि हमला होते ही भाग सकें। विशेषज्ञों के मुताबिक, नाविक जहाज को नहीं छोड़ सकते हैं। सुरक्षित निकासी बेहद मुश्किल है और कई नाविक अल्पकालिक अनुबंध पर हैं। उन्हें डर है कि यदि वे खतरनाक ड्यूटी छोड़ने की मांग करते हैं तो उन्हें दोबारा नौकरी नहीं मिलेगी। युद्ध के बीच फंसे नाविकों की मानसिक सेहत, नींद और आर्थिक स्थिति पर भी गंभीर असर पड़ा है। युद्ध की शुरुआत में 36-38 भारतीय जहाजों पर 1,100 भारतीय नाविक होर्मूज के आसपास फंस गए थे। बाद में अधिकांश जहाज निकल गए। सूत्रों के मुताबिक 125 भारतीय नाविक अभी भी 6 भारतीय जहाजों पर फारस की खाड़ी में मौजूद हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 11 August 2026

और अब इस्लामिक नाटो

हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के बीच मक्का पाइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए हैं, जिसके तहत अगर तीनों में से किसी एक देश पर हमला होता है तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। इस समझौते का मकसद रक्षा सहयोग बढ़ाना, साझा सुरक्षा रणनीति बनाना और क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच सामूहिक ताकत दिखाना है। विश्लेषकों का मानना है कि यह गठजोड़ पश्चिम एशिया में बदलते हालात, खासतौर पर ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते टकराव के बीच एक नए पावर ब्लाक के रूप में उभर सकता है। इस्लामिक नाटो मुस्लिम बहुल देशों के बीच एक प्रस्तावित या अनौपचारिक सैन्य गठबंधन को दिया नाम है, जिसकी तुलना पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन नाटो से की जाती है। इस समझौते के पीछे प्रमुख भूमिका सऊदी अरब की है। वह एक तरफ ईरान के हमलों से परेशान है और दूसरी तरफ हाल ही में यमन के हूतियों के साथ जबर्दस्त संघर्ष छिड़ने से। ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों खाड़ी क्षेत्रों में, जहाजरानी में व्यवधान और संघर्ष के पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैलने की आशंकाओं ने सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताएं बढ़ा दी हैं। दशकों तक रियाद अपनी सुरक्षा के लिए मुख्य रूप से अमेरिका पर निर्भर था पर 28 फरवरी के बाद उसने देख लिया कि अमेरिका तो अपने सुरक्षा ठिकानों को बचा नहीं पा रहा है तो वह सऊदी अरब को कैसे बचाएगा। रहा सवाल पाकिस्तान का तो सऊदी अरब का पहले से ही पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता हो रखा है पर क्या पाकिस्तान सऊदी अरब को ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों से बचा सका? क्या पाकिस्तान सऊदी अरब पर हमला होने पर ईरान पर हमला कर सकता है? यह सब नाटकबाजी है। रहा सवाल इजरायल और अमेरिका का तो इजरायइल इस समझौते का जमकर विरोध कर रहा है और इसे अपने लिए खतरा मानता है। सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि अगर इजरायल सऊदी या तुर्किए पर हमला करता है तो क्या जनरल असिम मुनीर में इतनी हिम्मत है कि वह अमेरिका के खिलाफ जाकर इजरायल पर हमला करें? यह सिर्फ पैसे ऐंठने का खेल है। फक्कड़ हुआ पाकिस्तान कहीं से भी भीख मांगने को तैयार है और इसके एवज में जो चाहे वादा करवा लो? रहा सवाल ईरान का तो राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने मुस्लिम एकता की अपील करते हुए कहा कि शिया-सुन्नी को साथ रहना चाहिए। पेजेश्कियन ने कहा है कि अमेरिका और इजरायल मिलकर फारस की खाड़ी के देशों को ईरान के खिलाफ करने की कोशिश कर रहे हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि सऊदी अरब तुर्किए और पाकिस्तान तीनों ही देश सुन्नी बाहुल्य हैं, वहीं ईरान शिया देश है। क्या यह भारत के लिए चिंता की बात है? विश्लेषक कहते हैं कि इस डिफेंसपैक्ट का भारत पर सीधे तौर पर कोई असर नहीं होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि सऊदी अरब पहले भी कहता रहा है कि पाकिस्तान हमारा महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी है, लेकिन कभी उसने भारत से जंग के मौके पर साथ नहीं दिया। जहां तक  तुर्किए का सवाल है वह तो आपरेशन सिंदूर में भी खुलेआम पाकिस्तान के साथ था और आगे भी रहेगा। भारत के लिए चिंता की बात नहीं है क्योंकि भारत डिफेंस क्षमता में तीनों से आगे है। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 8 August 2026

क्या पाकिस्तान अंदर से टूट रहा है?


पाकिस्तान वर्तमान में गंभीर आंतरिक संघर्ष, राजनीतिक अस्थिरता और सूबों में सशस्त्र विद्रोह जैसी गंभीर अंदरूनी चुनौतियों से जूझ रहा है। सेना के बढ़ते दखल, आर्थिक संकट और आतंकवादियों के ताबड़तोड़ हमलों के कारण देश के भीतर गृह युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं। पाकिस्तान के चार सूबे हैं। इनमें से बलूचिस्तान सूबे में अलगाववादी बलूचिस्तान लिबरेशन आमी (बीएलए) ने विद्रोह का झंडा बुलंद किया हुआ है। खैबर पख्तूनख्वां सूबे में अफगान तालिबान का दबदबा बढ़ता जा रहा है। आए दिन तालिबान के हमलों से यहां पाक फौज के पांव उखड़ रहे हैं। पीओके में पाक सेना की बर्बरता पर विद्रोह की स्थिति बनी हुई है। चलिए विस्तार से सारी स्थिति को बताते हैं। बलूचिस्तान पाक का सबसे बड़ा और फैला हुआ (लगभग 45 प्रतिशत) क्षेत्र है। ईरान से इसकी सरहद लगती है। बलूचिस्तान की बीएलए के लड़ाके अलग देश की मांग कर रहे हैं। हालात ये हैं कि बलूच लड़ाकों और पश्तून (पठान) विद्रोहियों का बलूचिस्तान सूबे में लगभग 70ज्ञ् हिस्से में कब्जा हो चुका है। असली सवाल यह है कि क्या पाकिस्तानी सरकार पुलिस स्टेशन खुले रख सकती है, हाईवे पर यातायात चला सकती है, बाजार और कारोबार सामान्य रख सकती है और लोगों को बिना डर के यात्रा करने की सुरक्षा दे सकती है? खैबर पख्तूनख्वां पाकिस्तान का फ्रंटियर यानी सरहदी इलाका है। डूरंड लाइन पाक और अफगानिस्तान को अलग करती है। अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के पांच साल में खैबर के अधिकांश इलाके में इन्हीं का दबदबा है। खैबर में पाक सरकार का कानून नहीं तालिबान का शरिया चलता है। दरअसल, इस इलाके में विभाजन के समय से ही कबिलाई व्यवस्था लागू रही है। स्वात, सैदु, मिंगोरा और मर्दन में लोया जिरगा के जरिए ही कानून चलता है। ये जिरगा असल में शरिया कानून को लागू करती है। अफगान तालिबान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) संगठन को अपने ठिकानों में पनाह देता है। इमरान खान की सरकार ने 2021 में टीटीपी के साथ सुलह की कोशिश की, लेकिन इमरान की गद्दी जाते ही टीटीपी ने खैबर में अपने दबदबे को और बढ़ा लिया है। खैबर के वजीरिस्तान में पाकिस्तान सेना कई सैन्य ऑपरेशन कर चुकी है, लेकिन यहां अब टीटीपी काबिज है। आए दिन टीटीपी के हमलों के कारण स्कूल और कॉलेज बंद रहते हैं। पंजाब और सिंध के मूल निवासी कर्मचारी खैबर में अपनी पोस्टिंग नहीं चाहते। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) और अन्य इलाकों में दमनकारी नीतियों व अधिकारों के हनन को लेकर जनता में भारी असंतोष और विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं। अगर हम राजनीतिक दृश्य की बात करें तो सरकार और सेना के बीच सत्ता के समीकरणों तथा हालिया संवैधानिक संशोधनों को लेकर न्यायपालिका और राजनीतिक गलियारों में तीव्र पतन और बगावत का माहौल है। कुल मिलाकर पाकिस्तान की आंतरिक हालत बहुत खराब हो रही है। अगर यही स्थिति रही तो पाकिस्तान के कई टुकड़ों में बंटने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 6 August 2026

फिर पलटे ट्रंप ईरान से मानसिक युद्ध

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर बड़े हमले की धमकी के बाद एक बार फिर पलट गए हैं। ट्रंप की यह तो पलटने की आदत बन गई है। यह नौवीं बार है जब ट्रंप धमकी देकर पलटे हैं। यही वजह है कि अब उनकी धमकी को कोई गंभीरता से नहीं लेता बल्कि उनका खुलेआम मजाक उड़ाया जाता है। ट्रंप ने दावा किया कि पश्चिम एशिया के सहयोगी देशों ने ईरान के साथ जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए एक समझौते की रूपरेखा पर सहमति बना ली है। फिलहाल वह पांच महीने से जारी इस संघर्ष में ईरान पर नए सैन्य हमले का आदेश नहीं देंगे। उधर, ईरान ने ट्रंप की धमकियों को मानसिक युद्ध बताया है। ट्रंप ने शनिवार को कहा कि ईरान के साथ समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य को तत्काल व पूरी तरह खोलना व उसके परमाणु खतरे का अंत शामिल होगा। उन्होंने कहा कि इस अनुरोध के आधार पर मैंने दुनिया के भविष्य के हित में फिलहाल हमलों को रोकने पर सहमति दी है। बशर्ते कि शीघ्र ही कोई समझौता हो सके। ट्रंप ने समझौते में इजरायल की सहमति की बात कही। क्या ट्रंप ईरान पर परमाणु हमला करने की सोच रहे हैं? जब ट्रंप यह कहते हैं कि मैंने दुनिया के भविष्य को खतरे में डालने से बचाने के लिए फिलहाल ईरान पर हमले रोकने का फैसला किया है तो इसका मतलब हम यह निकालें कि ट्रंप ईरान पर एटम बम मारने की सोच रहे हैं? वैसे भी ट्रंप इतनी बार अपने बयानों से पलटे हैं कि अब उन्हें शायद ही कोई गंभीरता से लेता हो? ईरान ने ट्रंप के हमलों को टालने के फैसले का मजाक उड़ाया है। ईरानी मीडिया ने ट्रंप के दावों को झूठ बताते हुए कहा कि तेहरान ने कभी हमले रोकने की अपील नहीं की। ईरानी मीडिया ने ट्रंप के दावों को झूठ बताते हुए कहा कि अमेरिका की मिसाइलों की कमी और बढ़ते दबाव के कारण ट्रंप पीछे हटे हैं। ट्रंप के दावों को खारिज करते हुए कहा कि अमेरिका ने अपनी कमजोरी छिपाने के लिए पूरी कहानी गढ़ी है। ट्रंप की हवा एक बार फिर ईरान ने निकाल दी। यह पहली बार नहीं है। पहले भी 5 बार ट्रंप धमकी देकर अपने कदम पीछे कर चुके हैं। ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी फार्म ने ट्रंप पर तंज कसते हुए लिखा कि मूर्ख ट्रंप की सारी हवा निकल गई। वहीं मेहर न्यूज एजेंसी ने कहा कि ट्रंप ने एक बार फिर अपनी खोखली धमकियों से पीछे हटकर उसे दुनिया के सामने एहसान की तरह पेश करने की कोशिश की है। मेहर ने सैन्य सूत्रों के हवाले से दावा किया कि ईरानी सेना पूरी तरह सतर्क है और किसी भी स्थिति का जवाब देने के लिए तैयार है। एजेंसी ने ट्रंप के दावों को एक और झूठ बताया। ईरान ने अमेरिका को एक बार फिर चेतावनी दी है। ईरान ने कहा कि अगर अमेरिकी सेना ने ईरानी ठिकानों पर नए हमले किए तो वह इसका कड़ा जवाब देगा। इससे पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ जाएगा। ये चेतावनी ट्रंप के उस बयान के बाद आई है, जिसमें ट्रंप ने कहा था कि तेहरान के साथ बातचीत से उनका भरोसा कम हो रहा है। ट्रंप ने कहा कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका उन पर हमला करेगा। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर, तकीय के विदेश मंत्री हाकन फिदान और सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान के साथ अलग-अलग फोन पर बातचीत के जरिए इसकी जानकारी दी। ट्रंप एक बार फिर पलटे। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 4 August 2026

अमेरिका में 7 जगह हमले किसने करे?

अमेरिका के 7 राज्यों में एक के बाद एक तगड़े अटैक हुए हैं। ये हमले सीधे उस लाइफलाइन पर हुए हैं, जिसके दर्द से आम जनता कराह उठी। इस हमले के बाद ट्रंप का ऐसा हाल हो गया है कि वो ईरान का नाम भी नहीं ले पा रहे हैं। ट्रंप उल्टा अपने ही लोगें को बदनाम करने में जुट गए हैं लेकिन अपने सबसे बड़े दुश्मन की चालाकी दुनिया के सामने यह एक्सेप्ट नहीं कर पा रहे हैं। ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका में अचानक कुछ ऐसा हो गया है जिसने डोनाल्ड ट्रंप के पसीने छुड़ा दिए हैं। दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क की धरती पर एक-दो नहीं, बल्कि एक के बाद एक पूरे सात बड़े अटैक हुए हैं। यह वार किसी और जगह नहीं, बल्कि अमेरिकी जनता की लाइफलाइन पर हुआ है। शक है कि इस पूरे खेल के पीछे अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन ईरान ही है, लेकिन ट्रंप खुलेआम उसका नाम ले नहीं रहे हैं। अगर ट्रंप ने दुनिया के सामने यह मान लिया कि हमला ईरान ने ही किया है तो साबित हो जाएगा कि तकनीक के मामले में वह अमेरिका से आगे निकल चुका है। दरअसल ये हमले अमेरिका की पानी की सप्लाई करने वाली सबसे अहम पाइपलाइनों और प्लांट्स पर हुए हैं। इस सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर पर 7 जगहों से साइबर अटैक किए गए। हालात इतने खराब हो गए कि कई राज्यें में वॉटर सिस्टम को बनाने के लिए ऑटोमैटिक सिस्टम बंद करके हाथों से काम संभालना पड़ा। अब इस पूरे खेल में सबसे बड़ा झटका अमेरिकी राजनीति और डोनाल्ड ट्रंप को लगा है। क्योंकि जब दुनिया की नजरें ईरान पर टिक रही हैं, तब ट्रंप सीधे तौर पर ईरान का नाम तक लेने से बच रहे हैं। इस बड़े सनसनीखेज साइबर हमले की पहली भनक मिनेसोटा राज्य से लगी 26 और 27 जुलाई के बीच यहां के 30 से ज्यादा कम्युनिटी वॉटर सिस्टम को हैकर्स ने अपना निशाना बनाया। मिनेसोटा आईटी सर्विसेज ने जब आनन-फानन में जांच शुरू की तो पता चला कि किसी ने जान बूझकर पानी की सप्लाई कंट्रोल करने वाले सिस्टम का एक्सेस हथिया लिया था। प्रवक्ता एमिली जिमर का कहना है कि मामले की जांच बहुत तेजी से चल रही है। जिस तरीके से इस मामले को अंजाम दिया गया है, वो ठीक वैसा ही है जैसा हमारे फेडरल पार्टनर्स ने पहले क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमलों में देखा था। हैकर्स ने बहुत ही चालाकी से पानी के प्लांट्स में लगे पोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर्स को अपना शिकार बनाया। अमेरिका की जांच एजेंसियां यह मान रही है कि हमले का पैटर्न ईरान के पुराने साइबर हमलों से काफी मिलता-जुलता है। लेकिन सबसे बड़ा ड्रामा तब शुरू हुआ जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान सामने आया। ट्रंप ने इस भयंकर अटैक का दोष सीधे ईरान पर डालने की बजाय अपनी ही व्यवस्था पर फोड़ दिया। कैबिनेट मीटिंग के दौरान ट्रंप ने ईरान का बचाव करने जैसा बयान दिया और कहा कि लोग कह रहे हैं कि मिनेसोटा के 30 वॉटर प्लांट्स पर जो हमला हुआ उसके पीछे ईरान है। मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता है। मैं इसके लिए मिनेसोटा के नाकाम प्रशासन और वहां के भ्रष्ट गवर्नर को जिम्मेदार मानता हूं। ईरान के पास मिनेसोटा के बारे में सोचने से बहुत बड़े मुद्दे हैं। ट्रंप के इस रवैये से हर कोई हैरान है। जहां एक्सपर्ट्स इसे सीधे तौर पर ईरान से जोड़ रहे हैं वहीं ट्रंप ईरान का नाम लेने से कतरा रहे हैं और अपने ही अधिकारियों को कसूरवार ठहरा रहे हैं। इस पर मिनेसोटा के गवर्नर ने पलटवार करते हुए कहा ट्रंप को अच्छी तरह पता है कि हमलावर कौन है, वह सच्चाई से भाग रहे हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 1 August 2026

...और अब ईरान बनाम यूक्रेन


दुनिया के दो बड़े संघर्ष अब एक-दूसरे से जुड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ पिछले कई महीनों से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और सैन्य कार्रवाई चल रही है, वहीं अब दूसरी तरफ रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध पांचवें साल में प्रवेश कर चुका है। अब एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने दोनों संघर्षों को आपस में जोड़ दिया है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। ताजा विवाद कैस्पियन सागर में एक ईरानी जहाज पर हुए हमले से शुरू हुआ है। यूक्रेन पर आरोप है कि उसने कैस्पियन सागर में एक ईरानी कमर्शियल जहाज को निशाना बनाया। यूक्रेन के राष्ट्रपति बेलादिमीर जेलेंस्की का दावा है कि यह जहाज रूस और ईरान के बीच हथियारों और सैन्य सामानों की सप्लाई में इस्तेमाल किया जा रहा था। इसी वजह से इस पर हमला किया गया। इस घटना के बाद ईरान ने कड़ी नाराजगी जताई है। तेहरान ने यूक्रेन के राजदूत को तलब किया और गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलिस से भी बात की और इस हमले के खिलाफ अपना विरोध जताया। उन्होंने यूक्रेन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग भी की। कैस्पियन सागर में किसी जहाज पर इस तरह हमला पहली बार हुआ है। कैस्पियन सागर एक ऐसा समुद्री क्षेत्र है जो चारों ओर जहां जमीन से घिरा हुआ है। इसके उत्तर-पश्चिम में रूस, दक्षिण में ईरान, पूर्व में कजाखस्तान और तुर्कमेन्तिान तथा पश्चिम में अजरबैजान स्थित हैं। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस और ईरान के संबंध और मजबूत हुए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, तकनीकी सहयोग और रक्षा क्षेत्र में संपर्क बढ़ा है। इसी कारण लंबे समय से यह चर्चा होती रही है कि कैस्पियन सागर के रास्ते रूस और ईरान के बीच सैन्य सामग्री का आदान-प्रदान भी होता है। हालांकि इस बारे में कभी सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्ट स्वीकारोक्ति नहीं हुई थी। ईरान का कहना है कि जिस जहाज पर हमला हुआ वह एक सामान्य कमर्शियल जहाज था। ईरानी अधिकारियों के अनुसार इस हमले में एक नाविक की मौत हो गई जबकि एक अन्य नाविक घायल हो गया। हमले के बाद राष्ट्रपति जेलेंस्की ने सोशल मीडिया पर बयान जारी करते हुए कहा कि जहाज रूस और ईरान के बीच सैन्य सामग्री पहुंचाने का काम कर रहा था। उन्होंने दावा किया कि रूस लंबे समय से ईरान की तरफ से उपलब्ध कराए गए शहीद ड्रोन का इस्तेमाल यूक्रेन के खिलाफ कर रहा है। युद्ध के शुरुआती चरण में रूस ने बड़ी संख्या में ईरानी ड्रोन का उपयोग किया था, जिससे उसे युद्ध में बढ़त हासिल करने में मदद मिली थी। जेलेंस्की ने केवल जहाज पर हमले का बचाव ही नहीं किया, बल्कि रूस पर एक और गंभीर आरोप भी लगाया। उन्होंने दावा किया कि रूस ने ईरान को खाड़ी में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों की उपग्रह तस्वीरें और खुफिया जानकारी उपलब्ध कराई हैं। उनके अनुसार जुलाई महीने में रूसी उपग्रह बहरीन जार्डन और कुवैत में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों की निगरानी भी कर रहे हैं। जेलेंस्की का आरोप है कि ईरान द्वारा अमेरिकी ठिकानों पर किए गए कुछ सटीक हमलों के पीछे भी रूस की ओर से दी गई खुफिया जानकारी की भूमिका हो सकती है। यूक्रेन का मानना है कि रूस केवल यूक्रेन से युद्ध नहीं लड़ रहा, बल्कि वह पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
- अनिल नरेन्द्र

Thursday, 30 July 2026

क्या ईरान के आगे झुका है ट्रंप ?


अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर सीजफायर हो गया है और जंग फिर थम गई है। 13 दिनों में अमेरिका को भारी नुकसान हुआ है क्योंकि ईरान जार्डन और इराक में भी हमले कर रहा है। ईरान ने इस बार सिर्फ अमेरिकी बेस पर मौजूद हथियारों को टारगेट किया बल्कि अगर खबर सही है तो इन हमलों में अमेरिकी सैनिकों के मरने व घायल होने की बात ईरान कर रहा है। ट्रंप की सेना ने फिलहाल हमले रोक दिए हैं, नहीं तो वो लगातार 12-13 दिनों से हर रोज ईरान पर बमबारी कर रहा था। अमेरिका ने तो एक बार फिर भारी बी-1 बाम्बरों का भी इस्तेमाल किया। ईरान ने तो ताबड़तोड़ कई जवाबी हमले किए। जब अमेरिका ने हमले रोके तो ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई रोक दी। कहा जा रहा है कि अमेरिका के एयर डिफेंस मिसाइलों का स्टॉक कम हो चुका है, जिससे अरब क्षेत्र में अमेरिका ठिकानों की सुरक्षा करना मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से ट्रंप को पीछे हटना पड़ा है। दरअसल ईरान ने युद्ध की शुरुआत से ही सस्ते ड्रोन से लगातार हमले करने की रणनीति बनाई थी जिसका परिणाम ये हुआ कि अमेरिका को पैट्रियट मिसाइलों का इस्तेमाल बहुत अधिक करना पड़ा और चंद दिनों में ही मिसाइलों का स्टॉक कम हो गया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका पिछले 13 दिनों से अपने तमाम बेसों की सुरक्षा के लिए पैट्रियट मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहा था। 13 दिनों की जंग के बाद अब कहा जा रहा है कि अमेरिकी सेना के पास सिर्फ 900 से 1000 पैट्रियट मिसाइलें ही बची हैं। दूसरी तरफ अमेरिकी कंपनियां हर महीने सिर्फ 20 मिसाइलों का प्रोडक्शन कर रहा है। दूसरी तरफ ईरान ने अपनी मिसाइलें और ड्रोनों का स्टॉक लगातार बढ़ा लिया है और वह नई मिसाइलों और ड्रोनों का भी बहुत तेजी से निर्माण कर रहा है। अब अगर ईरान की तरफ से और हमले होते हैं तो अमेरिका की बची-खुची मिसाइलें भी खत्म हो जाएंगी। यह चेतावनी अमेरिका की सेटकॉम ने भी ट्रंप को दी है। ऐसे में अमेरिका को अपने बेस की सुरक्षा की फिक्र है। ईरान के हमलों से भी अमेरिकी डिफेंस को भारी नुकसान हुआ है। हमलों के दौरान अमेरिकी बेस पर कमांड एंड कंट्रोल सेंटर नष्ट हो चुके हैं। इसके अलावा 6 पैट्रियट एयर डिफेंस रडार नष्ट हो चुके हैं। अमेरिका हमलों की वजह से 3 ईपीएस रडार सिस्टम गंवा चुका है। हमलों में 5 लांग रेंज रडार भी नष्ट हो गए हैं। एक तरफ हथियारों की कमी है तो दूसरी तरफ नुकसान की वजह से युद्ध का बढ़ता खर्च भी ट्रंप पर दबाव बना रहा है। हमलों के दौरान अमेरिका का एक एफ-15 विमान नष्ट हो गया। एफपी-8 विमान भी नष्ट हो चुका है। ईरानी हमलों की वजह से सी-17 कार्गो विमान जल गया, 8 हवा में तेल भरने वाले रिफ्यूलिंग विमान भी नष्ट हो गए हैं। हमलों के दौरान 4 हेलिकॉप्टर नष्ट हो गए। 13 दिनों में अमेरिका को इसलिए भी भारी नुकसान हुआ है क्योंकि ईरान जार्डन और ईराक में भी हमले करता रहा। ईरान ने इस बार सिर्फ अमेरिकी बेस पर मौजूद हथियारों, विमानों को टारगेट किया बल्कि दावा किया जा रहा है कि चीन की सेटेलाइट्स की मदद से ईरान ने सटीक निशाने से हमला किया। कहा तो यह भी जा रहा है कि केवल एयर डिफेंस सिस्टम पर ही हमले नहीं हुए पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के कई ठिकानों पर भी सीधे हमले किए ताकि जो इंटेलिजेंस कह रहे थे उनको रोका जा सके। ईरान के हमलों में अमेरिका के नुकसान का ग्राफ बढ़ता गया। ईरान ने अमेरिका एयर डिफेंस को खाली करने की राणनीति को आगे बढ़ाया। ईरान ने विमानों के रैंप और हैंगर्स को निशाना बनाया है। बहरीन ने हेलीकॉप्टर चेनटेनस सेंटर को नष्ट किया। ईरान ने अमेरिकी बेस पर 12 तेल डिपो को तहस-नहस कर दिया। सबसे बड़ा दावा तो इराक के इटबिल बेस को लेकर है। ईरानी सेना का दावा है कि लगातार हमलों की वजह से इराक के इटबिल में अमेरिका का पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो चुका है और ईरान के ठिकानों की ऑपरेशनल क्षमता काफी हद तक खत्म हो चुकी है। यूं ही नहीं अमेरिका के राष्ट्रपति ने युद्ध बंद करने की घोषणा की। पर डोनाल्ड ट्रंप की बातों पर अब शायद ही कोई यकीन करे? इस युद्ध को रोकने की पीछे भी कोई नया खेल हो सकता है। पर ईरान हर स्थिति के लिए तैयार है।
- अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 28 July 2026

और अब सऊदी-हूतियों में जंग

मध्य-पूर्व एशिया में एक तरफ अमेरिका-ईरान की जंग थम नहीं रही, वहीं अब एक नया मोर्चा खुलता दिख रहा है। यह है सऊदी अरब और यमन के हूतियों के बीच। सऊदी अरब और हूतियों के बीच सीधा टकराव शुरू हो चुका है। शुक्रवार को लाल सागर में एक सऊदी मालवाहक जहाज पर हमला हुआ, जिसके बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया। हमले के कुछ ही देर बाद सऊदी अरब ने हूतियों के नियंत्रण वाले यमन के हुदैदाह शहर पर जबर्दस्त हवाई हमले किए। कहा जा रहा है कि अमेरिकी फाइटर जेट एफ-35 से यह हमले किए गए। इसके जवाब में हूतियों ने सऊदी अरब को बड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि उसने अपने नर्क के दरवाजे खोल दिए हैं। हूती विद्रोहियों ने हालिया हमले में सऊदी अरब की सैन्य कार्रवाई और अपनी घोषित नौसैनिक नाकेबंदी का जवाब बताया है। उनके अनुसार सऊदी से जुड़े जहाजों को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे सऊदी बंदरगाहों के लिए माल ढो रहे थे या हूतियों की घोषित नाकेबंदी का उल्लंघन कर रहे थे। बता दें कि हूती विद्रोही लंबे समय से सऊदी अरब को यमन युद्ध का प्रमुख पक्ष मानते हैं। उनका आरोप है कि सऊदी के सैन्य अभियानों से यमन में भारी तबाही हुई हैं। इसलिए वे सऊदी के आर्थिक और सामरिक हितों को निशाना बना रहे हैं। लाल सागर बता दें कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गें में से एक है। तेल टैंकरों पर हमलों से न केवल सऊदी अरब के निर्यात पर असर पड़ता है, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर ही दबाव बनता है। हालिया हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में भी उछाल देखा गया है। दरअसल, यमन में सक्रिय हूती विद्रोही मुख्य रूप से देश के अल्पंसख्यक जैदी शिया समुदाय से जुड़ा एक सशस्त्र संगठन है। इस संगठन का नाम इसके संस्थापक हुसैन अल-हूती के नाम पर पड़ा। हूती खुद को अंसार उल्लाह यानी ईश्वर के समर्थक भी कहते हैं। साल 2003 में अमेरिका के नेतृत्व में इराक पर हुए हमले के बाद हूती आंदोलन ने अमेरिका और इजरायल विरोधी रुख की ओर मुखर किया। संगठन के समर्थकों के बीच अमेरिका और इजरायल के खिलाफ नारे लगाए गए, जो आज भी उनकी वैचारिक पहचान का हिस्सा माने जाते हैं। हूती संगठन खुद को हमास और हिजबुल्लाह जैसे समूहों के साथ मिलकर ईरान समर्थित एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस यानी प्रतिरोध की धुरी का हिस्सा मानता है। उधर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हूती विद्रोहियों को चेतावनी दी कि अगर जहाजों पर हमले जारी है तो उनके खिलाफ बड़ी सैन्य कार्रवाई की जाएगी। हूती विद्रोहियों के हमले से मध्य-पूर्व एशिया में एक नया मोर्चा खुलने की संभावना बढ़ गई है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को पहले ही झकझोर रखा है। इस ताजा संघर्ष के कारण दुनिया भर में ईरान समेत अन्य वस्तुओं की कीमतों में तेज उछाल आया है। वहीं फारस की खाड़ी में तनाव और गहरा हो गया है। क्येंकि अमेरिका और ईरान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलमार्ग पर प्रभाव और नियंत्रण को लेकर आमने-सामने हैं। एपी के अनुसार साबा न्यूज ने हूतियों के हवाले से कहा कि गुरुवार को लाल सागर में सऊदी के दो जहाजें, एनसीलिया और लामला पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले किए, जिससे दोनों में आग लग गई। हूती का कहना है कि सऊदी अरब ने जो बरसों पुरानी नाकेबंदी लागू कर रखी है। उसके विरोध में सऊदी जहाजों के लिए नाकेबंदी की गई है। उधर दोनों पक्षों में शांति वार्ता की खबरें भी आ रही हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 25 July 2026

अमेरिका-सऊदी परमाणु करार

ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच खाड़ी से एक ऐसी खबर आई है जो न सिर्फ मध्य-पूर्व को बल्कि पूरी दुनिया को चौंका देगी। जिस यूरेनियम संवर्धन को लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की धरती कंपा रखा है, वहीं वो एक डील के तहत सऊदी अरब को देने वाला है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने बुधवार को घोषणा की कि उसने सऊदी अरब के साथ एक अभूतपूर्व समझौता किया है। इस समझौते के तहत सऊदी अरब अमेरिकी सहयोग से अपने असैन्य परमाणु कार्यक्रम को विकसित कर सकेगा। अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान ने शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु सहयोग से जुड़े एग्रीमेंट 123 पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच परमाणु सुरक्षा उपायों से संबंधित एक द्विपक्षीय समझौते पर भी हस्ताक्षर हुए। व्हाइट हाउस ने कहा, दोनों समझौते मिलकर कई दशकों तक चलने वाली और अरबों डॉलर की साझेदारी के लिए कानूनी आधार तैयार करते हैं। इस समझौते को अब समीक्षा के लिए अमेरिकी कांग्रेस के पास भेजा जाएगा। अधिकारिक घोषणा के बाद अमेरिका और दुनिया के कई देशों में इस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। इजरायल के अर्थ व्यवस्था मंत्री नीर बरकात ने कहा कि यदि सऊदी अरब परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों और बिजली उत्पादन तक सीमित रखता है, तो उनके देश को इसमें कोई आपत्ति नहीं है। अगर वे इसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने के लिए करता है तो इजरायल इसे कभी स्वीकार नहीं कर सकता। वहीं इजरायल के पूर्व रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री अविग्दोर लिबरमैन ने इसका विरोध करते हुए लिखा, सऊदी अरब का असैन्य परमाणु कार्यक्रम आखिरकार परमाणु हथियार कार्यक्रम में बदल जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे पूरे मध्य पूर्व में परमाणु हथियारों की होड़ तेज हो सकती है, जिसे उन्होंने एक पागलपन भरी हथियारों की दौड़ करार दिया। इस समझौते के तहत सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिल सकती है और अमेरिकी कंपनियों के लिए अरबों डॉलर की कमाई हो सकती है। द वाल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक समझौते को इस तरह से तैयार किया गया है कि अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब के उभरते न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर के केन्द्र में कई विदेशी कंपनियां इससे बाहर हैं। ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि सीधे अमेरिकी दखल से सऊदी न्यूक्लियर प्रोग्राम पर वाशिंगटन का असर बढ़ेगा। तर्क है कि अमेरिका की भागीदारी से न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी को सैन्य मकसद के लिए इस्तेमाल होने से रोकने में भी मदद मिलेगी। ये मामला पाकिस्तान की टेंशन भी बढ़ाने वाला है क्योंकि अब तक मुस्लिम देशों में सिर्फ पाकिस्तान ही है, जिसके पास परमाणु हथियार है। इसी के दम पर पाकिस्तान इस्लामिक नाटो बनाने के ख्वाब देखता है। सऊदी अरब ने भी उसके साथ डिफेंस डील इसीलिए की थी। ऐसे में अगर वो खुद इन हथियारों तक पहुंच रख सकेगा तो उसके लिए पाकिस्तान की प्रासंगिकता भी खत्म हो जाएगी। इस डील का अमेरिका के अंदर भी विरोध हो रहा है। अमेरिका में लोगों का कहना है कि क्या ट्रंप ये भूल गए हैं कि 9/11 हमले में जो 19 आतंकी थे उनमें से 15 सऊदी अरब से आए थे। अब आप उन्हीं से इतना खतरनाक समझौता करना चाहते हो। इससे न केवल मध्य-पूर्व में ही परमाणु हथियार बनाने की होड़ मचेगी बल्कि पूरी दुनिया में भी ऐसी कोशिश होगी। वैसे डोनाल्ड ट्रंप कब अपनी बात से पलट जाएं कहा नहीं जा सकता। हमने ईरान के साथ शांति समझौते का हाल देखा है। समझौता होने के बाद हस्ताक्षर होने के बावजूद ट्रंप ऐसी-ऐसी नई शर्तें जोड़ देते हैं जिससे वह समझौता खटाई में पड़ जाए। कल को यह भी संभव है कि इजरायल के दबाव में वह ऐसी नई शर्तें जोड़ दे जिससे ये समझौता खटाई में पड़ जाए। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 23 July 2026

क्या नेतन्याहू न्यूयार्क में गिरफ्तार हो सकते हैं?

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के गलियारों में इस समय न्यूयार्क से उठी एक आवाज ने हलचल मचा दी है। न्यूयार्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी ने कहा है कि अगर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सितम्बर में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में हिस्सा लेने के लिए न्यूयार्क आते हैं तो उनकी गिरफ्तारी की संभावना पर उनका कार्यालय अब भी विचार कर रहा है। द न्यूयार्क टाइम्स के पॉडकास्ट द इंटरव्यू में ममदानी ने कहा कि उनका कानूनी विभाग नेतन्याहू की संभावित गिरफ्तारी के कानूनी पहलुओं पर सक्रिय रूप से विचार कर रहा है। ममदानी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा करने का वादा भी किया था। ममदानी ने कहा, मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू की जगह हेग में है। वे एक युद्ध अपराधी हैं, जिन पर अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) ने आरोप लगाए हैं कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू की वजह से कई वर्षें में उनके कदमों के कारण जो हालात पैदा हुए हैं, उसे देखते हुए बहुत से लोग यही राय रखते हैं। जब ममदानी से पूछा गया कि कानून उन्हें इस मामले में क्या ऐसा करने की अनुमति देता है तो उन्होंने जवाब दिया, इस पर हमारी कानूनी विभाग के साथ सक्रिय चर्चा चल रही है, लेकिन हमारे राष्ट्रीय स्तर पर कई बार देखा है कि कुछ लोग अपने हिसाब से कानून लिखने या कानूनी दायरे से बाहर जाने की कोशिश करते हैं। हमारी मंशा ऐसा करना नहीं है। बता दें कि अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने 2024 में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और इजरायल के कुछ अन्य नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। उन पर 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद गाजा में युद्ध अपराध के आरोप लगाए गए हैं। यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि गाजा में जारी मानवीय त्रासदी से आहत दुनिया के एक बड़े हिस्से की अंतरात्मा की आवाज है। मेयर ममदानी का संकल्प अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने बेंजामिन नेतन्याहू के अलावा पूर्व रक्षा मंत्री गैलेंट के खिलाफ भी गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं। इन नेताओं पर गाजा में युद्ध के एक तरीके के रूप में भुखमरी का इस्तेमाल करने, भोजन, पानी, ईंधन और दवाओं जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को व्यक्तिगत रूप से रोकने और नागरिकों पर जानबूझकर हमले करने जैसे गंभीर आरोप हैं। ममदानी ने अपनी मंशा स्पष्ट करते हुए कहा कि वे न्यूयार्क शहर के कानून विभाग के साथ लगातार संपर्क में हैं ताकि यह जाना जा सके कि उनके पास एक विदेशी नेता व एक राष्ट्राध्यक्ष को हिरासत में लेने का कितना अधिकार है? उन्होंने कहा न्यूयार्क शहर में कानून मुझे जो कुछ भी करने की अनुमति देगा, हम वही करेंगे। हालांकि कुछ कानूनी जानकारों का मानना है कि अमेरिका आईसीसी का सदस्य नहीं है, इसलिए मेयर के लिए ऐसा करना जटिल हो सकता है। भले लॉ स्कूल के प्रोफेसर हेरोल्ड हौगजू कोह के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर शहर की सड़कों पर चलते समय नेतन्याहू की स्थिति संवेदनशील हो सकती है। इस संभावित कदम पर नेतन्याहू ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने ममदानी पर पलटवार करते हुए उन्हें हमास का समर्थक और गुप्त रूप से अमेरिका से नफरत करने वाला तक कह डाला। नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल अमेरिकी मूल्यों के साथ खड़ा रहने वाला लोकतंत्र है। उधर ममदानी इन आरोपों को खारिज करते हैं। इस बीच ममदानी के बयान पर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। कई लोगों ने इसे ममदानी का बड़बोलापन बताया है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी दूत माइक वाल्ट्स ने इस खबर पर पोस्ट किया। मेयर ममदानी, ये चार वजहें बताती है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान न्यूयार्क में प्रधानमंत्री नेतन्याहू को क्यों नहीं गिरफ्तार किया जा सकता है। पहला-अमेरिका उस संधि का पक्षकार नहीं है, जिस पर अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय की कानूनी-व्यवस्था आधारित है। दूसरा-संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय समझौते के अनुसार बैठकों में आने वाले विदेशी सरकार के प्रमुखों को राजनयिक संरक्षण प्रदान करता है। तीसरा-राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख की कानूनी इम्यूनिटी भी ऐसे मामलों में लागू होती है और चौथा- विदेश नीति ऐसे मामलों में संघीय सरकार का अधिकार स्थानीय प्रशासन से ऊपर होता है। इसलिए न्यूयार्क के मेयर की इच्छा या घोषणा से ऐसा कोई भी कदम उठाया नहीं जा सकता। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 21 July 2026

होर्मुज ईरान का ट्रंप कार्ड

ईरान ने होर्मुज स्टेट बंद कर अमेरिका के सभी रणनीतिक गणित और वैश्विक बाजार को हिला दिया है। यह ईरान का ऐसा तुरुप का पत्ता है जिसने ट्रंप को चारों खाने चित्त कर दिया है। ईरान ने बिना कोई बड़ा परमाणु कदम उठाए सिर्फ एक समुद्री रास्ते की चाबी अपने हाथ में लेकर अमेरिका के पूरे जंग की रणनीति को बदल दिया है। अब अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध का सबसे बड़ा मुद्दा होर्मुज को खोलने, खुलवाने का बन गया है। याद रहे कि 28 फरवरी से पहले यह होर्मुज कभी भी बंद नहीं हुआ था। यह विचार तो ईरान को तब आया जब अमेरिका ने 28 फरवरी को इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमले किए। ईरान ने होर्मुज का ताला लगाकर अमेरिका के सामने यह साफ कर दिया है कि अगर बातचीत करनी है तो शर्तें ईरान की होगी। होर्मुज का बंद होना न सिर्फ मध्य-पूर्व में ही असर डाल रहा है पर इसका प्रभाव अमेरिका में भी सीधा पड़ रहा है। मैं बात कर रहा हूं अमेरिका में होने वाले मिड टर्म चुनाव की जिनमें ट्रंप का राजनीतिक भविष्य कुछ हद तक टिका हुआ है। ईरान ने ठीक उसी समय होर्मुज पर दबाव बनाया है, जब अमेरिकी कूटनीति सबसे कमजोर मोड़ पर है। ईरान से तंग अमेरिकी कूटनीति के लिए एक बड़ा मिस कैलकुलेशन साबित हुआ है। सीजफायर खत्म होने के बाद से ही अमेरिका ईरान पर मिसाइलें बरसा रहा है और ईरान जवाबी हमले कर रहा है। लेकिन ईरान ने फिर अमेरिका को झुकाने के लिए अपने ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया और बारूदी धमाकों के बीच ईरान ने एक बार फिर होर्मुज को बंद कर दिया। ये ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका में मिड-टर्म चुनाव सिर पर हैं और अमेरिकी जनता से पेट्रोल के दाम गिरने का दावा कर रहे थे। ईरान ने ठीक उसी वक्त अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सबसे कमजोर नस यानी कच्चे तेल की सप्लाई पर पैर रख दिया है। अमेरिका-ईरान के बीच हमलों के बाद तेल की कीमतों में 3ज्ञ् से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई है। होर्मुज स्टेट ने तनाव बढ़ने और कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा होने की वजह से नवम्बर में होने वाले अमेरिकी मिड-टर्म चुनावों पर इसका सीधा असर पड़ने वाला है। वॉलिट और वोट समीकरण अमेरिकी राजनीति का कड़वा सच है क्योंकि अमेरिकी राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि राष्ट्रपति चाहे कोई भी वादा करे, लेकिन वोटर अपना फैसला पेट्रोल पंप पर तेल की कीमतों को देखकर ही तय करता है। इससे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उसकी विरोधी पाटी रिपब्लिकन पाटी पर भारी राजनीतिक दबाव बढ़ेगा? राष्ट्रपति ट्रंप के सत्ता में आने के बाद पेट्रोल के दाम 2.50 डॉलर प्रति गैलन तक लाने का वादा किया था, लेकिन होर्मुज संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतें 80 डॉलर से 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जिससे पेट्रोल के दाम घटने के बजाय बढ़ रहे हैं। पेट्रोल महंगा होने का मतलब है आज अमेरिकी परिवार के बजट पर सीधा दबाव पड़ेगा, अमेरिकी जनता की जेब पर सीधी मार होगी। इससे अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी, ट्रांसपोर्टेशन बढ़ने से सुपर मार्केट के सामान से लेकर हवाई टिकट तक सब महंगा होगा। इतिहास गवाह है कि जब भी चुनाव से ठीक पहले अमेरिका में ईंधन के दाम बढ़े हैं। सत्ताधारी दल को चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ा है। जैसे 1979 में जिमी कार्टर के साथ हुआ था। होर्मुज बंद होते ही वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ने लगे हैं। इंटरनेश्नल बेच मार्क ब्रेट क्रूड 3.92ज्ञ् से बढ़कर 78.99 डॉलर प्रति बैरल हो गया और अमेरिकी क्रूड 3.44ज्ञ् से बढ़कर 73.87 डालर प्रति बैरल हो गया है। अगर होर्मुज लंबे समय तक यूं ही बंद रहता है तो इसका असर अमेरिका पर ही नहीं पूरे विश्व पर पड़ेगा और ऐसा होने से रोकने की चाबी सिर्फ ईरान के हाथ में है। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 18 July 2026

ट्रंप: मोजतबा खामेनेई 90 फीसदी खत्म?

ईरान के नए सर्वेच्च नेता मोजतबा अली खामेनेई अपने पिता आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भी नहीं दिखे थे और तब से ही उनकी सेहत को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फॉक्स न्यूज से कहा कि आयतुल्लाह अली खामनेई मारे जा चुके हैं और उनके बेटे मोजतबा खामेनेई भी 90 फीसदी खत्म हो चुके हैं। ट्रंप ने आगे कहा कि उनके पास अब कोई नौसेना नहीं बची है, उनकी वायु सेना भी नहीं बची है, सब कुछ खत्म हो चुका है। उनका एयर डिफेंस सिस्टम भी खत्म हो चुका है। उनके सभी नेता मारे जा चुके हैं। उनके सबसे बेहतरीन नेता मारे जा चुके हैं। इससे पहले मोजतबा खामेनेई के नाम से शनिवार को जारी एक लिखित बयान में पूर्व सर्वेच्च नेता आयतुल्लाह अली खामनेई की हत्या का बदला लेने की कसम खाई। बयान में कहा गया था कि हम अपने पवित्र खून और इन दोनों युद्धों में शहीद हुए सभी लोगों के खून का बदला लेने की कसम खाते हैं। दुनिया भर में ऐसे लोग मौजूद हैं जो बदला लेने को तैयार हैं। इसी साल 23 अप्रैल को अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें बताया गया था कि ईरान के नए सर्वेच्च नेता मोजतबा खामेनेई अमेरिका-इजरायल के उस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसमें उनके पिता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई थी। हालांकि वह मानसिक रूप से पूरी तरह सक्रिय हैं। अखबार ने अधिकारियों के हवाले से कहा था, उनके एक पैर का तीन बार ऑपरेशन किया गया है और अब उन्हें कृत्रिम संक्रमित पैर (प्रोस्येटिक) लगाए जाने का इंतजार है। उनके एक हाथ की भी सर्जरी हुई है और उसकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे वापस आ रही है। उनके चेहरे और होंठ पूरी तरह झुलस गए हैं, जिससे उन्हें बोलने में कठिनाई होती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि आखिरकार उन्हें प्लास्टिक सर्जरी की भी जरूरत होगी। बता दें कि इसी साल 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल हवाई हमलों में आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद मोजतबा खामेनेई को सर्वेच्च नेता नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के बाद से ही वह सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए हैं। उन्होंने कोई वीडियो संदेश भी जारी नहीं किया है। इससे इस बात को लेकर सवाल उठे हैं कि उसी हमले में वह कितने गंभीर रूप से घायल हुए थे? आयतुल्लाह अली खामेनेई के अन्य तीन बेटे मसूद, मुस्तफा और मेमसाम रविवार को आयोजित श्रद्धांजलि सभा में शामिल हुए थे। उनके साथ राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और रिव्यूल्शनरी गार्ड्स के प्रमुख अहमद वहीदी सहित कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। जून में जारी एक बयान में मोजतबा खामेनेई ने कहा था कि सिद्धांत रूप से वह अमेरिका के साथ डील के पक्ष में नहीं थे। लेकिन राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के आश्वासनों के बाद ही उन्होंने इसकी अनुमति देने का फैसला किया। कुवैती अखबार अल जरीदा ने मार्च 2026 में एक रिपोर्ट की थी। इसके मुताबिक मोजतबा खामेनेई को शुरुआत में इलाज के लिए मास्को ले जाया गया था। उसके बाद मोजतबा के स्वास्थ्य को लेकर कोई खबर नहीं आई। इस वक्त मॉस्को खुद असुरक्षित है, वहां लगातार यूव्रेन का हमला हो रहा है, इसलिए इस वक्त चीन को मोजतबा के लिए सुरक्षित माना जाता है। ईरानी जनता चाहती है कि जल्द आयतुल्लाह मोजतबा आवाम के सामने आएं ताकि दुनिया देख सके कि वह ठीक हैं, सुरक्षित हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 16 July 2026

आंख के बदले आंख

मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान ने दावा किया कि उसने आंख के बदले आंख नाम से सैन्य अभियान शुरू करते हुए खाड़ी क्षेत्र में मौजूद ठिकानों पर मिसाइल हमले किए हैं। ईरान का कहना है कि यह कार्रवाई हाल के अमेरिकी हमलों के जवाब में की गई है। इस दावे के बाद पूरे क्षेत्र में युद्ध तेज हो गया है। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब एक बार फिर खुली जंग का रूप ले चुका है। यह संघर्ष अब सिर्फ सीमित क्षेत्रों तक ही नहीं रहा बल्कि पूरे मिडल ईस्ट, वैश्विक तेल बाजार और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार तक फैल चुका है। यह कहना गलत नहीं होगा कि अब यह युद्ध बढ़ता जा रहा है और भयानक रूप अख्तियार कर सकता है। ईरान के सरकारी मीडिया के मुताबिक इस अभियान के तहत खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। ईरान का दावा है कि उसका उद्देश्य उन ठिकानों को जवाब देना था, जहां से उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई की गई थी। ईरान ने इस सैन्य कार्रवाई को आंख के बदले आंख (आई फॉर एन आई) नाम दिया है। इस नाम का सीधा संदेश है कि वह अपने खिलाफ हुई हर सैन्य कार्रवाई का जवाब देगा। ईरान लंबे समय से कहता आ रहा है कि अगर उसकी देश की सुरक्षा या उसके सैन्य ठिकानों पर हमला होगा तो वह जवाबी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। इसी नीति के तहत उसने पहले भी कई बार जवाबी कार्रवाई की घोषणा की है। ईरान की आईआरजीसी ने दावा किया है कि उसने आई फॉर एन आई अभियान के तहत जार्डन, बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। पहले चरण में जार्डन के प्र्रिंस हसन एयरबेस पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए। दूसरे चरण में बहरीन के शेख ईसा एयरबेस पर हमला कर हेलीकॉप्टर और ड्रोन सुविधाओं को निशाना बनाया गया। तीसरे चरण में कुवैत के अली अल-अलेम एयरबेस और अहमद अल-जाबेर एयरबेस पर हमले का दावा किया गया। ईरान ने कहा कि यह कार्रवाई अमेरिकी सैन्य हमलों के जवाब में की गई है। खाड़ी क्षेत्र दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का सबसे अहम केन्द्र माना जाता है। यहीं से दुनिया के बड़े हिस्से में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है। अगर अमेरिका ईरान के बीच यह युद्ध और तेजी पकड़ता है तो इसका सीधा असर होर्मुज स्टेट पर पड़ेगा, बल्कि पड़ना शुरू हो गया है। अमेरिका के लगातार ईरान पर हमलों के जवाब में ईरान ने होर्मूज बंद करने का एलान भी कर दिया है। इसका सीधा असर अंतर्राष्ट्रीय तेल कीमतों, शिपिंग लागत और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ेगा। भारत जैसे देश जो अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी से पूरा करते हैं, वे भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। यह पहली बार नहीं जब ईरान ने बदले के लिए सैन्य कार्रवाई का वादा पूरा करने का प्रयास किया है। जनवरी 2020 में जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद ईरान ने इराक में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें दागी थीं। अप्रैल 2024 में दमिश्क स्थित ईरानी दूतावास पर हमले के बाद भी ईरान ने पहली बार सीधा अपनी जमीन से इजरायल पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए थे। इससे साफ है कि ईरान अपनी सुरक्षा नीति में जवाबी कार्रवाई को महत्वपूर्ण रणनीति मानता है। 

 -अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 14 July 2026

ट्रंप की हत्या की साजिश


इजरायल ने अमेरिका के साथ ऐसी नई जानकारी देने का दावा किया है, जिसमें ईरान पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया है। अमेरिकी मीडिया में यह दावा किया गया है। ट्रंप इस पर भड़क गए और अपना आपा खो बैठे हैं। अमेरिका का प्रतिष्ठित समाचार पत्र द वॉल स्ट्रीट जर्नल में एक रिपोर्ट छपी है, जिसके मुताबिक इजरायल ने अमेरिका को बताया है कि उसके पास खुफिया रिपोर्ट है। खुफिया जानकारी है जिसके अनुसार तेहरान ट्रंप की हत्या की नई योजना बना रहा है। मोसाद ने ये इंटेल शेयर की है और ट्रंप से कहा है कि वे ईरान के टारगेट नंबर वन पर है। इसका नतीजा यह हुआ कि नाटो के समिट के बाद ट्रंप ने डर कर अपना नया एयर फोर्स वन बदल डाला और अमेरिका से पूरा एयर फोर्स वन मंगवाया और उसमें वापस अमेरिका पहुंचे। उधर ट्रंप ने दावा किया कि अगर ईरान उनकी हत्या करने में सफल होता है तो उन्होंने पहले ही एक आदेश दे रखा है कि अगर ईरान अमेरिका पर हमला करता है, जैसा दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा होगा ऐसा जवाब दिया जाएगा। ट्रंप ने कहा है कि 1000 मिसाइलें ईरान को अपने निशाने पर लिए हुए हैं। उन्होंने कहा कि अगर ईरान उनकी हत्या करने में सफल होता है तो उन्होंने पहले से ही एक आदेश दे रखा है। न्यूयार्क पोस्ट को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि इस आदेश के मुताबिक ईरान पर इतना बड़ा जवाबी हमला करे जैसा दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा होगा। सवाल उठता है कि क्या ट्रंप ऐसा कोई आदेश दे भी सकते हैं या फिर इतिहास में किसी नेता ने ऐसा आदेश दिया था। अमेरिकी संविधान के तहत कोई भी राष्ट्रपति ऐसा आदेश नहीं छोड़ सकता कि उसकी मौत के बाद अपने आप किसी देश पर हमला कर दिया जाए। किसी भी बड़े सैन्य अभियान का फैसला उस समय जो राष्ट्रपति होगा वही तय करेगा। क्योंकि कमांडर इन चीफ के आदेश पर ही अमेरिकी सेना ऐसा कुछ कर सकती है। ट्रंप का यह बयान सिर्फ ईरान के लिए नहीं बल्कि अमेरिकी जनता के लिए भी एक राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। एक तरफ वह अपने समर्थकों के सामने यह छवि बनाना चाहते हैं कि वह निडर हैं और सख्त नेता हैं जो किसी भी धमकी के आगे नहीं झुकेंगे, दूसरी तरफ ईरान को यह संदेश देना चाहते हैं कि अगर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई हुई तो जवाब पूरे देश को मिलेगा। सभी जानते हैं कि इजरायल अमेरिका-ईरान के शांति-वार्ता से परेशान है और इसे हर हालत में तोड़ना चाहता है। वह ट्रंप कितने बहादुर हैं यह भी जानती है। इससे बेहतर क्या हो सकता है कि यह खबर चला दो कि आप ईरान के टारगेट नंबर वन हैं। इससे ट्रंप मजबूरन ईरान पर हमला कर देंगे और एक बार फिर युद्ध शुरू हो जाएगा। हुआ भी यही। अमेरिका ने ईरान पर ताबड़तोड़ हमले कर दिए और ईरान ने भी जबर्दस्त जवाबी कार्रवाई कर दी। एक बार फिर मध्य-पूर्व जंग की आग में धकेल दिया गया। वैसे हम ट्रंप और नेतन्याहू से पूछना चाहते हैं कि जब आपने 28 फरवरी को अयातुल्ला अली खामेनेई और उनके लगभग पूरे परिवार को निशाना बनाया था, जिसमें उनकी 14 महीने की पोती भी शामिल थी, 40 से अधिक टॉप के मिलिट्री कमांडरों को निशाना बनाया था तब आपको यह ख्याल नहीं आया था कि ईरान भी ऐसा कर सकता है और अपने सुप्रीम लीडर की हत्या का बदला ले सकता है? अब जब अपने पर पड़ी तो आप को नानी याद आ गई। वैसे भी इजरायल के मंत्री ने खुलेआम ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई की हत्या करने की खुली धमकी दी थी। शहीद अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में आपने देखा होगा कि किस तरह करोड़ों लोगों ने अपने रहबर की हत्या का बदला लेने की कसम खाई थी। ईरान आपसे बदला ले सकता है और ले भी रहा है पर इस तरह नहीं जैसे नेतन्याहू और मोसाद आपको बेवकूफ बनाकर अपने हित साध रहा है।
- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 11 July 2026

20 दिन भी नहीं टिक पाया युद्ध-विराम

 
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम पर बनी सहमति कायम हुए 20 दिन भी नहीं हुए कि दोनों देश न केवल फिर से आमने-सामने आ गए, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी कह दिया कि मेरे हिसाब से अब युद्ध विराम खत्म हो चुका है। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए। यह तो होना ही था। यह युद्ध विराम ही अविश्वास के साथ शुरू हुआ था। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते थे। अमेरिका यह युद्ध विराम इसलिए चाहता था कि ट्रंप अमेरिकी जनता के दबाव को झेलने में मुश्किल का सामना कर रहे थे और वह किसी भी हालत में इस युद्ध को रोकना चाहते थे। चाहते तो वो ये भी थे कि किसी सम्मानजनक तरीके से वह इससे बाहर निकलें। दूसरी ओर ईरान इसलिए तैयार हुआ था कि उसने सोचा कि 20 दिन की जंग में जो उसे नुकसान हुआ है उसकी भरपाई कर सके और इतना दबाव अमेरिका पर बना सके कि वो उसकी शर्तें पर समझौता कर ले। हालांकि वह जानता था कि ट्रंप युद्ध-विराम की शर्तों का आदर नहीं करेंगे पर फिर भी उन्होंने जुआ खेला। अमेरिका और ईरान के बीच फिर से जंग छिड़ गई है। ट्रंप शायद अब इस निष्कर्ष पर पहुंच गए हैं कि यह संघर्ष अब एक निर्णायक मोड पर पहुंच सकता है। अब वह आशावादी काफी कम हो गए हैं और ट्रंप ने लंबे समय तक फिर से हमले शुरू कर दिए हैं। ट्रंप के ऐलान के बाद अमेरिकी सेना ने ईरान पर हमले शुरू कर दिए हैं। सेना ने खुद बयान जारी कर इसकी जानकारी दी है। ईरान के अलग-अलग इलाकों में हमले किए जा रहे हैं। अबू मूसाआइलैंड, बंदर अब्बास जैसे ईरानी महत्वपूर्ण ठिकानों पर अमेरिका धमाके कर रहा है। चाबहार में भी हमले हुए हैं जिससे एवं यहां बिजली सप्लाई कट गई है। अमेरिका का कहना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में हुए जहाजों पर अटैक का यह बदला है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने होर्मुज स्टेट में आवाजाही को खतरे में डालने को ईरान की क्षमता को और कमजोर करने के लिए उसके खिलाफ अतिरिक्त हमले शुरू कर दिए हैं। अब अमेरिका, महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय जलमार्ग पर स्वतंत्र रूप से आवागमन कर रहे जहाजों और नागरिक दल के खिलाफ हाल ही में किए गए हमलों के लिए ईरान को जवाबदेह ठहरा रहा है। जवाब में ईरान ने बहरीन और कुवैत में 85 जगह मिसाइलें और ड्रोन दागे। ज्यादातर हमले बहरीन-कुवैत में अमेरिकी बेस पर हुए। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजेश्कियान ने कहा कि धोखा देना अमेरिका की फितरत में है, लेकिन ईरान अपना हक लेकर रहेगा। अमेरिका के हमलों के बाद पजेश्कियान अफरा-तफरी में इराक के कर्बला से तेहरान लौट गए। इस बीच देर रात ईरान ने चेतावनी दी है कि अमेरिका यदि हमला करता है तो होर्मुज को पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा। इस बीच अमेरिका ने डील के तहत ईरान को तेल बेचने की छूट की फूट दी थी। 2019 के बाद पहली बार ईरान को डॉलर के बदले तेल बेचने की मंजूरी मिली थी। तुर्किये में नाटो समिट में ट्रंप ने कहा ईरानी लोग बीमार मानसिकता के लोग हैं। उनके साथ आगे बातचीत करते वक्त की बर्बादी है। मैंने शांति लाने की कोशिश की लेकिन अब जल्द ही कहर फैलेगा। ट्रंप के बयान के तुरन्त बाद बुधवार तड़के ईरान के अहम पोर्ट बंदर अब्बास समेत 80 ठिकानों पर ताबड़तोड़ एयर स्ट्राइक की। ईरान के 8 फौजी मारे गए जबकि 60 पावर प्लांट्स तबाह हो गई। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बेगर गालिबाफ ने इन हमलों पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, अमेरिका ने अब तक यह नहीं सीखा है कि धमकाने और खुद वादे तोड़ने की कीमत अब चुकानी पड़ेगी। मैं साफ शब्दों में कहता हूं अगर आप हमले करेंगे तो जवाबी हमले भी झेलेंगे। यह मानने के अपने-अपने कारण हैं कि जैसे ईरान होर्मुज पर आधिपत्य जमाने की कोशिश कर रहा है। वैसे ही अमेरिकी राष्ट्रपति भी दुनिया और अपने देशवासियों को यह दिखाने को आतुर हैं कि वे ईरान को अपनी शर्तें पर झुकने के लिए बाध्य कर सकते हैं। अब यह युद्ध लम्बा खिंचने की पूरी संभावना है। शायद इजरायल भी यही चाहता है कि युद्ध-विराम टूटे और एक बार फिर ईरान पर मुकम्मिल हमला हो। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 9 July 2026

ट्रंप का तंज:आंसू नकली हैं

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि ईरान में इतनी बड़ी संख्या में लोग अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में रो रहे थे। एक्सियोस को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि उन्हें लगा था कि ईरान की जनता खामेनेई से नफरत करती है। इस पर उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि शायद यह आंसू नकली हों। जनाजे में ईरान के शीर्ष नेतृत्व के मौजूद होने के सवाल पर ट्रंप ने दावा किया है कि यदि अमेरिका चाहे तो एक ही हमले में ईरान के मौजूदा नेतृत्व को खत्म कर सकता है। उन्होंने कहा कि वे सभी वहां मौजूद हैं। एक ही हमले में हम सभी खत्म कर सकते हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि फिर हमारे पास बातचीत करने के लिए कोई नहीं बचेगा। ईरान ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका खामेनेई की मौत के बाद छाए गहरे शोक को समझ नहीं पाएगा, क्योंकि न तो उसकी कोई सभ्यता है, न ही इतिहास और न ही सम्मान। उधर, ट्रंप के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए आर्मेनिया स्थित ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया पर कहा, लोगों को मारा जा सकता है पर आदर्शों को नहीं। आपने अयातुल्ला अली खामेनेई को मार डाला पर असल में आपने इत्र की एक ऐसी शीशी तोड़ दी जिसकी खुशबू हर जगह फैल गई। बता दें कि ईरान में 36 साल तक सत्ता में रहे खामेनेई की 28 फरवरी को अमेरिकी इजराइली हमले मौत हो गई थी। 97 वर्ष के शिया धर्मगुरु अयातुल्ला जाफर सोमानी ने तेहरान की ग्रैंड मोसाला में अयातुल्ला अली खामेनेई, व उनके परिवार के दिवंगत सदस्यों के लिए प्रार्थना कराई। यहां अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे मसूद, मेयसाम व मुस्तफा भी मौजूद थे। इन्हें युद्ध शुरू होने के बाद से नहीं देखा गया था। मौजूदा सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई नहीं देखे गए। रिव्यूशनरी गार्ड के प्रमुख जनरल अहमद वाहिदी भी युद्ध के बाद पहली बार दिखे। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, संसद के स्पीकर मो. बाघेर गालिबाफ व कुदस बलों का नेतृत्व करने वाले इस्माइल थानी भी मौजूद थे। ग्रैंड मोसाला में लगे पोस्टरों व दीवारों पर लिखे संदेशों में ट्रंप व इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को मारने की मांग की गई। कवि रासोली ने प्रार्थना से पूर्व कार्यक्रम का संचालन किया और अमेरिका-इजरायली मुर्दाबाद के नारे लगवाए। उधर, ईरान के सीनियर सैन्य अधिकारी अली शादमानी ने अमेरिका और इजरायल को चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई का उसकी सशस्त्र सेनाएं कड़ा जवाब देंगी। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास आराघची ने भी दोहराया कि देश की जनता या नेतृत्व किसी भी खतरे का तत्काल और मजबूत जवाब दिया जाएगा। यह बयान इजरायल के रक्षामंत्री की ईरानी सुप्रीम लीडर को मारने की धमकी से जुड़ी टिप्पणी के बाद आया। बता दें कि शहीद अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में उनके अंतिम दीदार करने करोडों लोग सडकों पर उतरे। ऐसी अंतिम यात्रा दुनिया में पहले कही भी नहीं देखी गई। अंतिम संस्कार में भारत समेत 70 से अधिक देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। विदेश मंत्री अब्बास आराघची ने कहा कि 70 से अधिक देशों के प्रतिनिधि सर्वोच्च नेता ग्रैट अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल हुए। इनमें हमारे वफादार अरब भाई भी शामिल हैं।

- अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 7 July 2026

खामेनेई के अंतिम विदाई की रस्में शुरू

बीते 28 फरवरी को अमेरिकी इजरायली हमले में शहीद हुए ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई का अंतिम संस्कार चार महीने बाद चार जुलाई से तेहरान में शुरू हो गया है। ईरानी अधिकारी इसे सदी का अंतिम संस्कार बता रहे है। उनके अनुसार 1.2 करोड़ से दो करोड़ लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। इन तैयारियों की अगुवाई तेहरान स्थित मोहम्मद रसूल्लाह कोर कर रहा है। यह इस्मामिक रिवाल्यूशनरी गार्ड कोर की प्रमुख इकाई है। करीब 800 विदेशी पत्रकार इस कार्यक्रम की कवरेज के लिए तेहरान में मौजूद हैं। अयातुल्ला खामेनेई का अंतिम संस्कार कई दिनों तक चलने वाली अंतिम विदाई की रस्में शुक्रवार को शुरू हो गई। तेहरान में जगह-जगह बैनर लगाए गए हैं, जिसमें लोगों से अपील की गई है कि वे इस विनाशकारी युद्ध के बाद इस्लामिक रिपब्लिक के समर्थन में एकजुट हों। उनके जनाजे को ईरानी शहरों और पड़ोसी देश इराक में ले जाया जाएगा। खामेनेई और उनके परिवार के सदस्यों के ताबूत ईरानी झंडे में लपेटकर तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला मस्जिद में रखे गए है। मृतकों में उनके दामाद, उनकी सबसे बड़ी बेटी और एक छोटा ताबूत उनकी 14 महीने की पोती का है जिसे देकर सभी का दिल दहल गया। ताबूतों में अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई की पत्नी भी शामिल है। कार्यक्रम में शामिल होने के लिए लगभग 50 देशों के प्रतिनिधिमंडल तेहरान पहुंचे हैं। भारत और सउदी अरब का प्रतिनिधिमंडल भी इनमें शामिल है। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान सामने आया है। उन्होंने ईरान पर तीखा तंज कसा है तो वहीं दूसरी तरफ ईरानी लोगों ने अमेरिका मुर्दाबाद के नारे लगाए और खामेनेई के कातिलों से बदला लेने की कस्में खाई। ट्रंप ने तेहरान पर कटाक्ष करते हुए कहा कि अमेरिका ने ईरान को अंतिम सरकार के लिए एक हफ्ते का समय इसलिए दिया क्योंकि वाशिंगटन अच्छा देश है। उन्होंने अमेरिकी प्रशासन की कार्रवाई को सही ठहराते हुए कहा कि युद्ध में ईरान की बुरी तरह हार हुई है। ईरानी अधिकारियों ने अंतिम संस्कार का नारा वी मस्ट राइज रखा है जिसके साथ मुट्ठी भींचे हुए हाथ का प्रतीक जोड़ा गया है। खामेनेई का ताबूत एक ऊंचे मंच पर रखा गया है। भीड़ प्रबंधन इस तरह से किया गया है कि लोग 15-20 मिनट के भीतर अंदर जाकर बाहर निकल सकें। बुधवार को खामेनेई का पार्थिव शरीर नजफ से लाया जाएगा। वहां शिया इस्लाम के पहले इमाम अली की दरगाह पर जुलूस निकाला जाएगा इसके बाद श्रद्धांजलि समारोह कर्बला में जारी रहेगा, फिर पार्थिव शरीर वापस, ईरान लाया जाएगा। एक बड़ा सवाल यह कि जनाजे की नमाज कौन पढ़ाएगा। शिया परंपरा में यह भूमिका धार्मिक और राजनीतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है। ईरान के सर्वोच्च नेता बनने के बाद से मोजतबा खामेनेई जो कि अब ईरान के सुप्रीम लीडर है को अभी तक सार्वजनिक रूप से देखा नहीं गया है। अभी तक यह भी नहीं कहा जा सकता कि वह अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होंगे या नहीं? अमेरिका- इजरायल युद्ध के बीच यह एक अपने प्रकार का अनूठा अंतिम संस्कार है। ईरानी खुफिया एजेंसियों ने मोजतबा से अंतिम संस्कार में शामिल होने से मना किया है। क्योंकि इजरायल के एक मंत्री ने खुलेआम धमकी दी है कि मोजतबा को हम मार कर रहेंगे। हालांकि मोजतबा खामेनेई डरने वालों में से नहीं है। यह भी सम्भव है कि इतने दिन चलने वाली इस अंतिम विदाई में कहीं न कहीं बगैर शोर मचाए मोजतबा अपने पिता को श्रद्धांजली देने पहुंच जाएं। हालांकि भारत में ईरान के अधिकारिक प्रतिनिधि अयातुल्ला हकीम इलाही ने खुलासा किया है कि मोजतबा खुद समर्थकों और देशवासियों के बीच जाने के लिए बेहद उत्सुक है, पर ईरान की टॉप खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों ने इस पर वीटो लगा दिया है। मौजूदा हालातों में मोजतबा का सार्वजनिक रूप से समाने आना किसी बड़े खतरे से खाली नहीं माना जा सकता है। दरअसल, इस वक्त ईरान और इजरायल के बीच दुश्मनी अपने चरम पर है और खुफिया इनपुट्स है कि इस बड़े जमावड़े का फायदा उठाकर दुश्मन देश ईरान के बीच नए शीर्ष नेतृत्व को निशाना बना सकता है। इसी खतरे के माहौल की वजह से मोजतबा को नजरों से दूर रखने की रणनीति अपनाई जा रही है।
- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 4 July 2026

कहां है ईरान की 100 अरब डॉलर जब्त संपत्तियां?

विदेशों में ईरान की कुल जब्त या प्रतिबंधित संपत्ति का अनुमान लगभग 100 अरब डॉलर है। इस प्रतिबंधित खातों में तेल से होने वाली कमाई, विदेशी मुद्रा भंडार, बैंकिंग संपत्ति व अन्य दावे शामिल हैं। पहली बार बड़े पैमाने पर संपत्ति तब फ्रीज की गई, जब ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई और अमरीरिकी दूतावास में बंधक संकट पैदा हुआ। 14 नवम्बर 1979 को ईरानी क्रांतिकारियों द्वारा तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा करने के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने अमेरिकी अधिकार क्षेत्र में मौजूद ईरानी सरकार की संपत्ति को ब्लॉक कर दिया। 1980 में ईरान सरकार की लगभग 12 अरब डॉलर की संपत्ति जब्त की गई थी जो ज्यादातर अमेरिकी बैंकों में थी। इसमें नकद, सोना, कई अन्य होल्डिंग्स शामिल थी। इसमें से अधिकांश संपत्ति 1981 के अल्जीयर्स समझौते के तहत जारी कर दी गई थी, जिससे बंधक संकट समाप्त हुआ था। लगभग 4 महीने के युद्ध के बाद अमेरिका-ईरान शांति समझौते की रूपरेखा पर सहमत हुए हैं। इसके बावजूद ईरान की जब्त संपत्तियों पर अड़चन बनी हुई है। एक तरफ ईरान ने 14 सूत्री समझौते के हवाले से रिपोर्ट दी है कि अमेरिका बातचीत शुरू होने से पहले जब्त संपत्ति जारी करने पर सहमत हो। पर ट्रंप के कई बार विरोधाभासी बयानों ने स्थिति को असमंजस में डाल रखा है।
- अनिल नरेन्द्र

ईरान को जल्द मिलेंगे 6 अरब डॉलर

ईरान-अमेरिका के युद्ध में कितनी तबाही हुई है, बताने की जरूरत नहीं है लेकिन संभव है कि ईरान को वास्तव में इस युद्ध से लाभ हो सकता है। यह मैं इसलिए कहा रहा हूं कि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने हाल ही में बड़ा ऐलान किया। दावा किया गया कि कतर में फंसी ईरान की 12 अरब डॉलर की राशि में से 6 अरब डॉलर जल्द जारी कर दिए जाएंगे। कुम शहर में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि ऐसा ईरान-अमेरिका डील के तहत असेट रिलीज करने की पहली किश्त होगी जो उसे कतर से मिलेगी। उन्होंने यह महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि स्विट्जरलैंड में हुई वार्ता और इस्लामाबाद में हुए समझौते के तहत यह राशि रिलीज हो रही है। बाकी 6 अरब डॉलर की वापसी के लिए भी सरकार लगातार कोशिशें कर रही है। पेजेशकियन ने बताया कि शांति समझौते के तहत ईरान के तेल और पेट्रोकैमिकल क्षेत्र पर लगे प्रतिबंध हटा दिए गए है। उन्होंने इसे ईरानी जनता की बड़ी जीत बताया। उन्होंने कहा कि इन प्रतिबंधों के हटने से देश की अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिलेगी। ईरान की अर्द्ध सरकारी न्यूज एजेंसी मेहर ने राष्ट्रपति के बयान को प्रमुखता से प्रकाशित किया है। राष्ट्रपति ने हाल के संघर्ष का जिक्र करते हुए ईरानी जनता की सराहना की। उन्होंने कहा कि सुप्रीम लीडर, मंत्री, सेना कमांडर, बुद्धिजीवी और आम नागरिक भी संकट के समय एकजुट रहे। राष्ट्रपति ने बताया कि संघर्ष के बाद सरकार पुनर्निमाण कार्य शुरू कर चुकी है। आम लोगों को रहात देने के लिए खाद्य सब्सिडी बढ़ाने और अतिरिक्त वित्तीय सहायता देने की योजनाएं भी लागू की जा रही है। ईरान के इस दावे से उम्मीद है कि देश की अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिलेगी। कतर में फंसा पैसा रिलीज होने से तेल निर्यात और अन्य क्षेत्रों में सुधार आ सकता है। यह घटनातम ईरान की विदेश नीति और आर्थिक रणनीतिक में नई दिशा दिखाता है, हालांकि अब तक ईरान में होने वाले 300 बिलियन डॉलर के निवेश को लेकर कोई बात साफ नहीं हुई है। ये फंड कहां से आएगा, कब आएगा इस पर कुछ नहीं कहा गया।
अनिल नरेंद्र 

Thursday, 2 July 2026

ट्रंप और मेलोनी के बीच बिगड़ते रिश्ते

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी से जुड़े कई पोस्ट सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं। इनमें से कुछ में तो ऐसा दिखाया गया है जैसे वो किसी ब्रेक-अप के बाद अपनी जिंदगी बदलने की कोशिश कर रही हों। एक एआई फोटो में उन्हें नए हेयरकट के साथ दिखाया गया है। एक अन्य तस्वीर में उन्हें सिंगल हॉलिडे बुक करते हुए दिखाया गया है। ये सारी तस्वीरें असली नहीं हैं, लेकिन उनका मजाक इसलिए बनाया जा रहा है क्योंकि मेलोनी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच खुले तौर पर विवाद अब सामने आ रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में ट्रंप और मेलोनी का रिश्ता कभी खुले हमलों तक गया, कभी भी निजी तानों तक और फिर थोड़ा ठीक भी हुआ लेकिन इन उठापटक से यूरोप की सबसे चर्चित राजनीतिक दोस्ती ठंडी पड़ गई। कुछ समय पहले तक लोग मेलोनी को ट्रंप की सहयोगी कहते थे। इसकी बानगी जनवरी 2025 में देखने को मिली जब ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह में उन्हें सबसे आगे बैठने की जगह मिली। समारोह में यह अहम जगह पाने वाली वह अकेली यूरोपीय नेता थीं। पिछले अप्रैल में मेलोनी व्हाइट हाउस गई थीं। वहां वह उस उद्देश्य से गई थीं ताकि यूरोपीय सामान पर लगे अमेरिकी ट्रेड टैरिफ को लेकर तनाव कम हो। लेकिन ट्रंप की जैसी आदत है, उनकी अनिश्चितता मेलोनी के लिए मुश्किल भरी साबित हुईं और उनकी साख को देश-विदेश दोनों जगह चोट पहुंची। ट्रंप और मेलोनी में पहली बड़ी दरार मार्च के आखिर में आई। इटली के रक्षा मंत्रालय ने अमेरिकी सैन्य जहाजों को सिसिली के सिगोनेला नाटो एयरबेस इस्तेमाल करने की इजाजत देने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि इसके लिए संसद की मंजूरी जरूरी है। इटली ने ये कदम इसलिए उठाया क्योंकि उनका कानून और जनता दोनों ही ईरान युद्ध के खिलाफ थे। यह विवाद और बढ़ गया। अप्रैल में ट्रंप ने टूथ सोशल पर पोप लियो (14वें) पर हमला करते लिखा, क्योंकि उन्होंने ईरान के खिलाफ युद्ध की चेतावनी व आलोचना की थी। ट्रंप ने उन्हें कमजोर बताया। कैथोलिक देश की नेता मेलोनी ने ट्रंप के बयान को अस्वीकार्य बताया। मेलोनी की सख्त प्रतिक्रिया ट्रंप को पसंद नहीं आई और उन्होंने इटली के अखबार कोरिएरे डेला सेरा से कहा: मैं हैरान हूं, मुझे लगा था कि उनमें हिम्मत है, लेकिन मैं गलत था। वह अब पहले जैसी नहीं रही और इटली भी पहले जैसा देश नहीं रहा। फ्रांस ने जी-7 सम्मेलन में ट्रंप और मेलोनी को बातचीत करते हुए देखा गया था। दोनों देशों के अधिकारियों ने इस बातचीत को सकारात्मक और सामान्य बताया। लेकिन कुछ ही दिनों बाद ट्रंप ने इतालवी चैनल को कहा मेलोनी ने समिट में उनसे फोटो खिंचवाने के लिए मिन्नत की थी। ट्रंप ने कहा कि वह मेरे साथ तस्वीर चाहती थीं, मैं नहीं लेता, लेकिन मुझे उन पर तरस आ गया। मेलोनी ने तुरंत जबाव दिया, उन्होंने वीडियो जारी कर ट्रंप की बात को पूरी तरह मनगढ़ंत बताया। उन्होंने कहा, मुझे नहीं पता कि अमेरिका के राष्ट्रपति अपने सहयोगियों के साथ ऐसा क्यों करते हैं। मैं बस इतना कह सकती हूं कि अफसोस है कि वह पश्चिम के दुश्मनों के खिलाफ ऐसी मजबूती नहीं दिखाते। लेकिन एक बात याद रखनी चाहिए, न मैं और न ही इटली किसी की मिन्नत करता है। इसके तुरंत बाद इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने अपनी प्रस्तावित अमेरिकी यात्रा रद्द कर दी। इटली के राष्ट्रपति सर्जियो मैटारेला ने मेलोनी को फोन कर उनका समर्थन किया। सरकार के सहयोगियों और सांसदों ने भी ट्रंप की टिप्पणियों को अपमानजनक बताया और माफी की मांग की। विपक्ष ने इसे पूरे देश का अपमान कहा। दूसरी तरफ ट्रंप ने फिर दोहराया कि मेलोनी ने बार-बार तस्वीर खिंचवाने की मांग की थी। मेलोनी पर यह भी आरोप लगाया कि वह अब दोबारा दोस्त बनने की कोशिश कर रही हैं। क्योंकि अमेरिका ने ईरान को सैन्य रूप से हरा दिया है। जैसे ही यह विवाद ठंडा पड़ता दिखा तो सैन्य ठिकानों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया। यह विवाद ईरान युद्ध में आपरेशन फ्यूरी के दौरान इटली के अमेरिकी एयरबेस को लेकर उठा। नाटो के महासचिव मार्क रुटे ने बताया कि लगभग 500 विमान इटली में अमेरिकन ठिकानों से ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में उड़ान भरी। लेकिन इटली को यह बात अच्छी नहीं लगी और उसके रक्षा मंत्रालय ने इसे गलत और भ्रामक बताया। मजेदार बात यह है कि दोनों ट्रंप और मेलोनी को जल्द ही अपने देश में चुनाव का सामना करना पड़ सकता है। इटली में आम चुनाव होने हैं तो अमेरिका में मिड टर्म चुनाव हैं। देखते हैं कि अमेरिका और इटली के रिश्ते सुधरते हैं या और बिगड़ते हैं।
- अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 30 June 2026

अलविदा अयातुल्ला अली खामेनेई

28 फरवरी इस साल अमेरिका-इजरायल द्वारा किए गए हमले में अयातुल्ला अली खामेनेई शहीद हो गए थे। उन्होंने किसी बंकर में छिपने की बजाय अपने दफ्तर में ही रहकर शहीद होना मंजूर किया ताकि उनकी कौम दुश्मनों से लोहा ले सके और उनकी शहादत हर देशवासी के लिए प्रेरणा बने। यही हुआ अयातुल्ला अली खामेनेई की शहादत ने ईरान की जनता में एक ऐसा जज्बा पैदा किया कि उसने दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका को अंततः झुकने पर मजबूर कर दिया। ईरान से अब खबर आई है कि उनकी मौत के तीन महीने बाद उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। यानी तीन महीने बाद सुपुर्द-ए-खाक होंगे खामेनेई। सरकार ने तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है और देश के कई बडे शहरों में उनका शोक जुलूस निकाला जाएगा। अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम बिदाई के लिए तीन दिन का कार्यक्रम 4 जुलाई से तय हुआ है। तेहरान, कौम और अशहद में होने वाले इस आयोजन में 2 करोड़ लोगों के जुटने की उम्मीद है। उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को ईरान का सुप्रीम लीडर बनाया गया है। यह पहली बार होगा जब 28 फरवरी के हमले के बाद अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई पब्लिक में दिखेंगे। ईरानी मीडिया के मुताबिक राजधानी तेहरान, कौम और अशहद में बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम होंगे। अकेले तेहरान में मुख्य कार्यक्रम 24 घंटे चलेगा। प्रशासन अनुमानित 2 करोड़ लोगों को संभालने व सुरक्षा को लेकर तैयारियां कर रहा है। यह घोषणा खामेनेई की मौत के कई दिनों बाद हुई। इस्लामिक परंपरा के मुताबिक दफनाने का काम तुरंत होना चाहिए था पर युद्ध के कारण और सुरक्षा के कारण इसे टालना पड़ा। अयातुल्ला अली खामेनेई 86 साल के थे। 28 फरवरी के हमले में वे शहीद हो गए और इसके साथ ईरान पर उनका 30 साल से ज्यादा पुराना शासन खत्म हो गया। वे देश के सबसे ताकतवर, दूरदृष्टि के नेता व रणनीतिकार थे। अयातुल्ला अली खामेनेई भारत के दोस्त थे। शहीद अयातुल्ला अली खामेनेई भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लेखन और उनके विचारों के बहुत बड़े प्रशंसक थे। उनके बीच का मुख्य संबंध व इतिहास रहा है। पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक और उपनिवेशवाद पर विचार खामेनेई ने नेहरू द्वारा लिखी आत्मकथा ग्लिम्पस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री की खुलकर प्रशंसा की। उन्होंने अपने भाषणों में अकसर इस बात का जिक्र किया कि कैसे नेहरू ने अपनी पुस्तकों में विस्तार से लिखा कि इंग्लैंड जैसे छोटे देश ने भारत जैसे विशाल देश के संसाधनों का दोहन कर खुद को कैसे मजबूत किया। खामेनेई के अनुसार यह केवल भारत की कहानी नहीं बल्कि उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद ताकतों की सच्चाई 2012 जब तेहरान में गुटनिरपेक्ष आंदोलन (एनएएम) शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री (डा. मनमोहन सिंह) ने अयातुल्ला अली खामेनेई से मुलाकात की थी तो खामेनेई ने स्वयं जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी को भावभीनी श्रद्धांजलि दी थी। अयातुल्ला अली खामेनेई का एक पुराना वीडियो भी दोबारा सामने आया है जिसमें वह जनता से अपील कर रहे हैं: नेहरू की पुस्तक ग्लिम्पस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री जरूर पढ़ें। उन्होंने विस्तार से समझाया है कि अंग्रेजों ने भारत में क्या-क्या किया। अयातुल्ला अली खामेनेई के जाने से केवल ईरान या इस्लामिक दुनिया को ही क्षति नहीं हुई पूरी दुनिया को उनके जाने का, खासकर जिस तरीके से उनकी शहादत हुई भारी नुकसान हुआ। एक नेक बंदा चला गया। हम शहीद अयातुल्ला अली खामेनेई को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देते हैं।
- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 27 June 2026

आसिम मुनीर की हत्या की साजिश?

जो लोग भी इजरायल और उसकी कुख्यात खुफिया एजेंसी मोसाद से वाकिफ हैं वह जानते हैं कि मोसाद राजनीतिक हत्याएं करवाने में माहिर है। इजरायल के इतिहास में ऐसे दर्जनों केस हैं जहां उसने अपने दुश्मनों के लीडरों को मौत के घाट उतारा है। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है, 28 फरवरी को जब अमेरिका-इजरायल ने ईरान पर हमला किया था तो सबसे पहला काम मोसाद ने यह किया था कि उसने ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई व ईरान टॉप मिलिट्री कमांडरों की हत्या कर दी थी। यह भी किसी से छिपा नहीं कि इजरायल अमेरिका-ईरान के युद्ध विराम से बहुत निराश है और इन एमओयू को तुड़वाने की पूरी कोशिश कर रहा है। मध्य पूर्व में कई देशों में रहस्यमय हमले हो रहे हैं, यह कौन कर रहा है पता नहीं चल रहा है। मुझे हैरानी नहीं हुई जब एक ताजा खबर आई कि मोसाद आसिम मुनीर और पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की जेनेवा में हत्या का प्लान बना रहा था। मैंने अपने 18 जून के सम्पादकीय में जिसका शीर्षक था ः कागजों पर दस्तखत ः जमीन पर धुआं की अंतिम लाइन में लिखा था ः अंत में इजरायल-मोसाद कुछ भी कर सकता है। समझौता तुड़वाने के लिए ईरानी लीडरशिप की हत्या भी करवा सकता है ताकि यह युद्ध विराम टूट जाए। मेरी भविष्यवाणी इस मायने में सफल हुई, हालांकि थोड़ा फर्क यह रहा कि मोसाद ईरानी लीडरों को तो निशाने पर नहीं ले पाया पर उसने पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल पर निशाना साधने की कोशिश जरूर की। बता दें कि ब्राजील के एक वरिष्ठ और जाने-माने पत्रकार पेपे एस्कोबार के इस सनसनीखेज दावे ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा कर दिया है। एस्कोबार ने दावा किया कि इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और स्विट्जरलैंड दौरे पर गए पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की हत्या की साजिश रची थी। एस्कोबार ने दावा किया कि यह प्लान तब फेल हो गया जब पाकिस्तान की सेना को बेहद विश्वसनीय खुफिया जानकारी मिली थी कि इजरायल के प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के निर्देश पर मोसाद जनरल आसिम मुनीर और पूरे पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल को निशाना बनाने की तैयारी कर दी थी। एस्कोबार ने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान ने ओमान के माध्यम से इजराइल को कड़ा संदेश भेजा था कि यदि पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल या जनरल आसिम मुनीर को नुकसान पहुंचाया गया तो उसका गंभीर जवाब दिया जाएगा। यह भी याद दिलाया गया कि पाकिस्तान एक परमाणु संपन्न देश है। इसका मतलब साफ था। इन दावों के सामने आते ही पाकिस्तान ने यह सिरे से खारिज कर दिया। एआरवाई न्यूज के चेयरमैन कामरान खान ने एक वरिष्ठ पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारी के हवाले से कहा कि यह रिपोर्ट पूरी तरह बकवास और निराधार है। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री शाहवाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर का स्विट्जरलैंड दौरा पूरी तरह सुरक्षित और बिना किसी सुरक्षा खतरे के पूरा हुआ। हत्या की साजिश का दावा वास्तविकता से कोई संबंध नहीं रखता और पूरी तरह काल्पनिक है। कटु सत्य तो यह है कि कोई भी एजेंसी ऐसी खबरों की कभी पुष्टि नहीं करता और उन्हें काल्पनिक ही बताता है। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 25 June 2026

वार्ता को दिया मीनाब 168 नाम

 
स्विट्जरलैंड में रविवार को अमेरिका के साथ शांति वार्ता के लिए ईरानी प्रतिनिधिमंडल को मीनाब 168 नाम दिया गया। मानना पड़ेगा कि नैरेटिव सेट करने में ईरानियों का जवाब नहीं है। वह कैसे अपने शहीदों को न तो भूलते हैं और न ही दुनिया को भूलने देते हैं। ईरान चाहता है कि पूरी दुनिया ईरान पर अमेरिका और इजरायल के अत्याचारों की दास्तां देखें और सुनें। ईरानी प्रेस टीवी के अनुसार ये नाम मीनाब स्कूल पर अमेरिकी-इजरायली टॉमहॉक मिसाइल हमले में मारी गई 168 स्कूल बच्चियों के सम्मान में दिया गया। इस स्कूल (मीनाब) पर 28 फरवरी को युद्ध के पहले दिन ही हमला हुआ था। दरअसल, ईरान पिछले तीन महीने से एक कैंपेन मीनाब 168 चला रहा है और इसे खूब प्रसारित कर रहा है। हर मंच पर ईरान उस कैंपेन के साथ नजर आता है। स्विट्जरलैंड और यहां तक की फीफा वर्ल्ड कप फुटबाल में भी यह नजर आया। आइए इसके पीछे की कहानी भी जानते हैं... स्विट्जरलैंड में अमेरिका के साथ समझौता वार्ता से पहले ईरान ने फैसला लेकर पूरी दुनिया को चौंका दिया। दरअसल, ईरान और स्विट्जरलैंड में अमेरिका के साथ शांति समझौता वार्ता को मीनाब 168 नाम दिया है। अमेरिका से वार्ता के लिए ईरान का प्रतिनिधिमंडल उसी जहाज में पहुंचा जिस पर मीनाब 168 लिखा था। फीफा वर्ल्ड कप 2026 में बेल्जियम के खिलाफ मैच खेलने के लिए मैदान में उतरे ईरान के फुटबाल खिलाड़ियों की जसी पर मीनाब 168 लिखा था। हमले में मारी गई बच्चियों के सम्मान में ईरान दुनिया को उनकी शहादत को भूलने नहीं दे रहा है। पिछले तीन महीने से ईरान पूरी दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि लड़ाई के पहले दिन ही किस तरह अमेरिका-इजरायल ने मानवता की सारी हदें पार करते हुए निर्देष मीनाब स्कूल की बच्चियों को मार डाला। हमले में मारी गई 168 स्कूली बच्चियों के सम्मान में और उन्हें इंसाफ दिलाने के लिए मीनाब 168 अभियान चलाया जा रहा है। आईआरजीसी के कथित ठिकाने पर हमले की आड़ में मिसाइल एक बच्चों के स्कूल पर जा गिरी। अमेरिका इससे इंकार करता रहा। पहले तो उसने कहना शुरू कर दिया कि यह मिसाइल खुद ईरान ने गलती से मार दी पर फिर अमेरिकी मीडिया ने इसका पर्दाफाश करते हुए साबित किया कि यह मिसाइल अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल थी जो बहरीन के एयरबेस से मारी गई थी। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए बहरीन के इस अमेरिकी बेस को निशाना बनाया और तबाह किया। ईरानी प्रतिनिधिमंडल पहले राउंड में इस्लामाबाद पहुंचा था तो जिस विमान में वे आए थे उसकी कुर्सियों पर शहीद हुई बच्चियों के स्कूल बैग, किताबें, खाने के टिफिन इत्यादि रखे हुए थे ताकि सारी दुनिया इस हुए जुल्म को देख सके। ईरान चाहता है कि पूरी दुनिया ईरान पर अमेरिका और इजरायल के अत्याचारों की दास्तां सुने और देखें कि यह दोनों देश अपने फायदे के लिए किस हद तक जा सकते हैं। इसलिए फीफा वर्ल्ड कप 2026 में अमेरिकी शहर लॉसएंजिल्स में ईरान और बेल्जियम के बीच हुए मैच के दौरान कई ईरानी प्रशंसकों ने मीनाब हमले में मारे गए बच्चों को श्रद्धांजलि देने वाली तस्वीरें और जसी लहराई। ईरान के खिलाड़ी भी मीनाब 168 स्टिकर वाली जसी पहने दिखे। एक समर्थक ने एक स्टिकर दिखाया जिस पर एक स्कूल बैग बना था और उस पर 168 लिखा था। हैशटेग एंजल ऑफ मीनाब भी था और संदेश था कि इजरायल और अमेरिका के हमले में मारे गए मीनाब स्कूल के 168 बच्चों को याद रखें। बता दें कि भारत में अप्रैल में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में भी ईरान मीनाब 168 लिखे विमान में भारत आया था। अमेरिका से शांति वार्ता के लिए पाकिस्तान की यात्रा से पहले ईरानी संसद के स्पीकर बगेर गालिबफ ने ईरान के मिजाज का संकेत देते हुए समय पर तस्वीरें शेयर की जिसमें मीनाब हमले में मारी गई स्कूली बच्चियों की फोटो हवाई जहाज की सीटों पर चिपकी हुई थीं और वे उनके सामने खड़े होकर यानी कह रहे हों, इस फ्लाइट में मेरे सहयात्री। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 23 June 2026

शांति व अमन का दुश्मन नेतन्याहू

जब भी पिछले 80 वर्षें का दुनिया का इतिहास लिखा जाएगा उसमें दो नामों का विशेष उल्लेख होगा। जब भी मानवता के नरसंहार का वर्णन आएगा उसमें पहला नाम जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर का होगा और दूसरा नाम इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का होगा। नेतन्याहू इस सदी के नंबर वन विलेन बन कर उभरे हैं। जब भी मध्य-पूर्व में शांति की बात होती है तो उसमें नेतन्याहू कोई न कोई अड़ंगा लगा देते हैं। आप ताजा उदाहरण ही देख लें। अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता चल रही है, एमओयू भी साइन हो गया है पर नेतन्याहू अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे और अब तो वह अपने इकलौते मित्र देश अमेरिका को भी खुलकर गाली दे रहे हैं। यही वजह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कहना पड़ा कि तुम पागल हो चुके हो और मैं अगर तुम्हें न बचाता तो आज तुम जेल में होते। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजरायली कैबिनेट मंत्रियों को लताड़ते हुए कहा कि उन्हें उस ताकतवर सहयोगी पर हमला नहीं करना चाहिए क्योंकि अमेरिका के अलावा उसके साथ आज कोई नहीं है। वेंस ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व्यक्तिगत हमलों से परेशान हैं। उन्होंने ट्रंप को पूरी दुनिया में इजरायल के प्रति सहानुभूति रखने वाला एक मात्र राष्ट्राध्यक्ष कहा है, उन्हें यह भूलना नहीं चाहिए। आखिर नेतन्याहू क्यों किसी भी शांति समझौते का विरोध करते हैं? इसके पीछे नेतन्याहू का राजनीतिक अस्तित्व, सरवाइवल प्रमुख कारण है। नेतन्याहू अपनी गद्दी सुरक्षित रखने के लिए कभी गाजा पर हमले कर रहे हैं, कभी लेबनान पर तो कभी ईरान पर। उनके इस आचरण पर ट्रंप सख्ती से बोलते भी नहीं। इसके पीछे एक कारण हो सकता है एपस्टीन फाइल्स! दुनिया जानती है कि इजरायल के पास वह बदनाम, ब्लैकमेल करने वाली एपस्टीन फाइल्स है जिनमें ट्रंप समेत दर्जनों राष्ट्राध्यक्ष फंसे हुए हैं। यह बात ट्रंप समझते हैं तभी तो इजरायल को रोक नहीं पा रहे हैं। नेतन्याहू की एक मजबूरी है वह है उनके खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के केस। नेतन्याहू के खिलाफ आपराधिक और दीवानी मामलों के साथ नियमित अदालती कार्यवाही चल  रही है। नेतन्याहू ने इसे आगे बढ़ने से यह कहकर रोक रखा है कि इजरायल इस समय युद्ध लड़ रहा है और यह पहली प्राथमिकता है, इसलिए इसे फिलहाल टाला जाए। नेतन्याहू इससे इतने परेशान हैं कि उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप से बाकायदा इजरायल के राष्ट्रपति से गुजरिश की थी कि नेतन्याहू के खिलाफ केसों को खत्म कर दें, वह माफी दे दें पर इजरायली राष्ट्रपति नहीं माने। इन केसों से बचने के लिए और संभावित जेल की सजा से बचने के लिए नेतन्याहू कहीं न कहीं लड़ाई जारी रखते हैं। अब जब अमेरिका-ईरान में शांति वार्ता जेनेवा में चल रही है और एमओयू पर आगे बातचीत चल रही है। नेतन्याहू ने इसमें भाजी मारने के लिए लेबनान पर युद्ध छेड़ रखा है। नेतन्याहू का तो अब इजरायल के अंदर भी विरोध होना शुरू हो गया है। इसी साल के अंत में इजरायल में आम चुनाव होने हैं जिसमें नेतन्याहू की सरकार जा सकती है। बेंजामिन नेतन्याहू पर पिछले कई वर्षें से रिश्वत खोरी, धोखाधड़ी और विश्वासघात के गंभीर आरोप लगे हैं। इजरायल के इतिहास में नेतन्याहू पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो पद पर रहते हुए अदालती कार्यवाही का सामना कर रहे हैं। फरवरी के अंत में ईरान के साथ संघर्ष चरम पर था और इजरायल-अमेरिका एयर स्ट्राइक के बाद नेतन्याहू ने देश में इमरजेंसी लगा दी थी। इस दौरान सुरक्षा कारणों से अदालती कार्यवाही को भी टाल दिया गया था और यह अब भी टाली जा रही है। जब तक इजरायल किसी से लड़ाई बंद नहीं करता। नेतन्याहू इसी बहाने अदालती कार्यवाही टालते रहेंगे। जैसे मैंने कहा कि दिलचस्प बात यह भी है कि डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में इजरायली राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग से नेतन्याहू को माफी देने की वकालत की थी। हर्जोग ने स्पष्ट किया कि इजरायल एक कानून से चलने वाला संप्रभु राष्ट्र है और वह बिना किसी बाहरी दबाव के अपने न्यायिक फैसले खुद लेगा।  

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 20 June 2026

बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

करीब 4 महीने तक चले अमेरिका-ईरान के युद्ध के बाद समझौते पर सहमति बनी है। इस चार महीने चले संघर्ष में कौन जीता, कौन हारा? हमें तो लगता है कि इस युद्ध में ईरान की भव्य जीत हुई है। यह हम इसलिए कह रहे हैं कि जिन उद्देश्यों को लेकर अमेरिका-इजरायल ने मिलकर 28 फरवरी को युद्ध शुरू किया था उसमें से कोई भी उद्देश्य वह पूरा नहीं कर सका और अंत में तेरे कूचे से हम बे-आबरू होकर निकले। अमेरिका-इजरायल ने अपने पहले ही हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को शहीद कर दिया। उसी दिन ट्रंप ने कहा- ईरान के महान लोगों, आपकी आजादी का समय आ गया है... जब हम अपना काम पूरा कर लेंगे तो आप अपनी सरकार पर कब्जा कर लीजिए यानी हम रेजीम चेंज कर देंगे। ताकि ईरान में वह रेजीम बदल सके? एक उद्देश्य था ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल कार्यक्रम को समाप्त करना। इसमें ईरान के एनरिच्ड यूरेनियम पर भी कब्जा करना था या उसे खत्म करना था। न तो ईरान में रेजीम चेंज हो सकी, न परमाणु कार्यक्रम बंद हुआ और न ही मिसाइल कार्यक्रम पर पाबंदी ही लगा सके। अब बात करते हैं हेर्मुज स्ट्रेट को खोलने की। पहली बात तो 28 फरवरी से पहले होर्मुज खुला हुआ था कभी भी बंद नहीं था। उल्टा आपने ईरान को एक ऐसा हथियार दे दिया जिसके बारे में उसने पहले कभी भी नहीं सोचा होगा। अब ईरान और ओमान मिलकर होर्मुज स्ट्रेट को अपनी मिल्कियत मान रहे हैं और हर गुजरते जहाज से सर्विस चार्ज ले रहे हैं। यह थे प्रमुख उद्देश्य जिनको लेकर अमेरिका-इजरायल ने 28 फरवरी से हमले शुरू किए थे।  अब ट्रंप खुद देख सकते हैं कि इनकी प्रवृत्ति में इन्हें कितनी सफलता मिली। ईरान की मुकम्मल जीत हुई। अब बात करते हैं अमेरिका को इस अभियान की कितनी भारी कीमत उठानी पड़ी। उनके गल्फ राष्ट्रों में 14 बेस तबाह हो गए। 40 से ज्यादा लड़ाकू विमान नष्ट या डेमैज हो गए, राडार और एयर डिफेंस सिस्टम तबाह हो गए। अमेरिका ने ईरान जंग में अब तक 113 बिलियन डॉलर यानी 10 लाख करोड़ रुपए स्वाह कर दिए। ऐसा नहीं कि ईरान को इसकी कीमत चुकानी नहीं पड़ी। ईरान सरकार के मुताबिक हमलों के पहले 40 दिनों में उन्हें 270 बिलियन डॉलर यानी करीब 25 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। 1 लाख 22 हजार इमारतें तबाह हुई हैं। 3 अप्रैल 2026 तक ईरान के 307 अस्पताल बर्बाद हुए। दवाओं की कीमतें 50 प्रतिशत तक बढ़ गई, जिससे 60 लाख से ज्यादा मरीज प्रभावित हुए। मिनाब के बच्चों के स्कूल पर सीधा हमला हुआ जिसमें 160 से ज्यादा लोग मारे गए जिनमें 130 से ज्यादा छोटी बच्चियां शहीद हुईं। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत दर्जनों टाप के लीडरशिप शहीद हो गई। इस लड़ाई में गल्फ के अन्य देश भी इसकी चपेट में आ गए। यूएई, कतर, सउदी, बहरीन, इराक इत्यादि बीच में फंस गए। इस  जंग में निर्दोष लोगों को भी भारी कीमत चुकानी पड़ी। अनुमान है कि जंग में 7000 से ज्यादा निर्दोष सैनिक मारे गए और 40 हजार से ज्यादा लोग घायल हुए। ईरान ने साबित कर दिया कि वे अमेरिका-इजरायल के सामने झुकने वाला नहीं है। ट्रंप बड़े गर्व से कह रहे हैं कि अब ईरान परमाणु बम कभी नहीं बन सकेगा। उन्हें हम याद करवाना चाहते हैं कि ईरान ने कभी परमाणु बम बना ही नहीं था। शहीद अयातुल्लाह अली खामेनेई ने बकायदा एक फतवा जारी किया था कि इस्लाम में ऐसा हथियार बनाना मना है जिसमें निर्दोष लोग मारे जाएं। ट्रंप अब अपनी जीत दिखाने के चलते ही कुछ भी कहें पर सारी दुनिया जानती है कि आप की हार हुई है। आपने अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाया है और आप बड़े बे-आबरू होकर ईरान के कूचे से निकले हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 18 June 2026

कागजों पर दस्तखत: जमीन पर धुआं

दुनिया ने राहत की सांस ली जब यह घोषणा हुई कि अमेरिका-ईरान युद्ध में युद्ध बंदी हो गई है। पर मैं इसे सिर्फ युद्ध विराम ही कहता हूं, यह जंग की समाप्ति नहीं मानी जा सकती क्योंकि अभी सही मायनों में तो दोनों तरफों की शर्तें माननी बची हैं। फिलहाल तो इससे सिर्फ  अमेरिका और ईरान के बीच बमबारी रुकी है। जंग रोकने के लिए अभी बहुत से पेंच फंसे हैं। मैं सबसे पहले अयातुल्लाह मोजतबा खामेनेई, राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, विदेश मंत्री अब्बास अरागची और स्पीकर बागेर गालिबफ को बधाई देना चाहता हूं कि युद्ध में भारी पड़ने के बावजूद उन्होंने इस युद्ध विराम (सीजफायर) को रोकने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। मैं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इसके लिए बधाई नहीं देना चाहता क्योंकि उन्होंने ही यह जंग शुरू की थी। जिसे बिना वजह जंग को शुरू किया था उसमें युद्ध विराम करके उन्होंने अपनी जान ही छुड़ाई है, किसी पर एहसान नहीं किया। उनके समर्थक उपराष्ट्रपति जेडी वेन्स कह रहे हैं कि ट्रंप अब नोबल पुरस्कार के हकदार हैं? क्यों भाई ! कैसे हुए हकदार? पहले शुरू करो, फिर पिटो और अब बिना शर्तों के बमबारी रोकने की घोषणा करो? यह जो एमओयू पर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं वह कितने कारगर सिद्ध होते हैं यह देखना बाकी है क्योंकि सबसे बड़ा पेंच तो नेतन्याहू बने हुए हैं। इजरायल ने साफ घोषणा कर दी है कि वह इस समझौते को नहीं मानता और न ही वह लेबनान पर लड़ाई बंद करेगा। जबकि ईरान की शर्तों पर यह शामिल है। ट्रंप की धमकियों के बावजूद, गाली-गलौच की परवाह न करते हुए इजरायल अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है और इस पूरी कोशिश में लगा हुआ है कि यह समझौता न हों। ईरान ने 14 बिंदुओं की मांग रखी है। ट्रंप ने भी दो बड़ी शर्तें रखी हैं। ईरान ने मांग की है कि शांति समझौते से पहले 24 अरब डालर की जब्त संपत्ति अमेरिका ईरान को दे। इस राशि का आधा हिस्सा यानी 12 अरब डालर बातचीत शुरू होने से पहले ही ईरान को दी जाए। वहीं अमेरिका ने इस दावे पर अलग रुख अपनाया है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरान को किसी प्रकार की वित्तीय राहत तभी मिलेगी जब वह समझौते के तहत अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी विवाद है। बेशक ईरान ने होर्मुज को खोल दिया है पर अभी सिर्फ तय रास्तों से ही समुद्री जहाजों का आना शुरू हुआ है। होर्मुज को पूरी तरह से खोलने में समय लगेगा क्योंकि ईरान ने होर्मुज में बारुदी सुरंगें बिछा रखी हैं। जिन्हें हटाने में समय लग सकता है। ईरान हर जहाज से टोल भी वसूल कर रहा है। जिसे कर सर्विस चार्ज कह रहा है। अमेरिका ऐसा करने पर ऐतराज कर रहा है। खैर, होर्मुज के खुलने से पूरी दुनिया ने राहत की सांस जरूर ली है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और एनज्डि यूरोनियम के मुद्दे पर भी अभी सहमति बननी बाकी है। ईरान द्वारा उसके मिसाइल कार्यक्रम पर भी अमेरिका और इजरायल को आपत्ति है। इस मुद्दे पर दोनों पक्ष 60 दिनों की बातचीत में कोई निर्णय करेंगे। ईरान के उपविदेश मंत्री काजेम धरीबाबादी ने तस्लीन न्यूज एजेंसी से कहा कि अंतिम समझौते को लेकर अगले 6ˆ दिनों के भीतर बातचीत जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका अपने वादों पर किस हद तक टिका रहता है और पूरा करता है? ई&रान की प्रमुख मार्गों में सैन्य गतिविधियों को रोकना यानी की हर जंग को पूरी तरह रोकना, आर्थिक नाकाबंदी समाप्त करना और विदेशों में जमे हुए ईरानी फंडस को जारी करना शामिल है। समझौते में लेबनान में युद्ध विराम का भी प्रावधान शामिल है। वित्तीय मुद्दों पर मतभेदों के बावजूद व्यापक समझौते को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली हैं। ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, फ्रांस और भारत ने इसका स्वागत किया है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य मध्य-पूर्व में स्थायी शांति स्थापित करना है। ऐसे में अगर समझौता सफल रहता है तो वैश्विक बाजारों को भी बड़ी राहत मिल सकती है। बस यह टिका रहे? अंत में इजरायल-मोसाद कुछ भी कर सकता है। ईरानी लीडरशिप की हत्या भी करवा सकता है ताकि यह युद्ध विराम टूट जाए। 

-अनिल नरेन्द्र