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Wednesday, 30 October 2013

कहीं गांधी मैदान की यह रैली मोदी को दिल्ली के सिंहासन तक न पहुंचा दे?

हम पटना की जनता को बधाई देना चाहते हैं कि देश को दहलाने वाली आतंकियों की अब तक की सबसे बड़ी साजिशों में से एक को न केवल उन्होंने नाकाम किया बल्कि साहस से उसका मुकाबला भी किया। बिहार की जनता ने यह साबित कर दिया कि मुट्ठीभर यह आतंकवादी कभी भी अपने नापाक इरादों में कामयाब नहीं हो सकते। पटना के गांधी मैदान में लाखों लोगों की मौजूदगी में चारों तरफ बम फटते रहे लोग घायल होकर गिरते रहे लेकिन न तो कोई भगदड़ मची और न ही कोई अपनी जगह से हिला। उल्टा बमों की परवाह न करते हुए लाखों की संख्या में लोग गांधी मैदान आते रहे। मंच पर मौजूद भाजपा नेतृत्व की भी सराहना करनी होगी, यह जानते हुए भी कि बम फट रहे हैं उन्होंने लाखों की एकत्रित भीड़ को इसके बारे में कुछ नहीं बताया। दाद तो नरेन्द्र मोदी को भी देनी होगी जो इतनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद निडर होकर एक घंटे तक बोले। इस घटना से नीतीश कुमार बुरी तरह एक्सपोज हो गए हैं। वे कहते हैं कि हमें आईबी की ओर से कोई अलर्ट जारी नहीं किया गया था। अगर हम उनकी बात मान भी लें तो भी वह अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। आखिर उन्होंने और उनके प्रशासन ने इतनी बड़ी रैली से निपटने के लिए क्या तैयारी की थी? पहला धमाका सुबह हुआ तब भी आप नहीं तैयार हुए। बम लेकर मैदान के अन्दर आतंकवादी इतनी आसानी से कैसे घुस गए? कैसे उन्होंने मैदान के अन्दर विभिन्न स्थानों पर बम प्लांट किए? बम भले ही कम ताकत वाले रहे हों पर इनमें टाइमर लगाकर ऐसी व्यवस्था की गई थी कि एक के बाद एक विस्फोटों से दहशत की प्रचंड लहर फैले और भगदड़ मच जाए। लाखों की उमड़ती लहर के बीच दुर्भाग्य से यदि ऐसा हो गया होता तो इसका नतीजा कितना विनाशकारी होता, यह सोचने भर से घबराहट हो जाती है। नीतीश को नरेन्द्र मोदी की रैली पर इसलिए भी खास ध्यान देना चाहिए था क्योंकि इसमें किसी भी प्रकार की गड़बड़ होने पर सीधा उन पर आरोप लगता कि उन्होंने जानबूझ कर सुरक्षा व्यवस्था में ढील दी। कहीं ऐसा तो नहीं कि अल्पसंख्यक वोटों के चक्कर में नीतीश ने इस रैली पर उतना ध्यान नहीं दिया जितना देना जरूरी था? संवेदनहीनता की हद यह थी कि आपात स्थिति में लोगों को बाहर निकालने की कोई योजना भी प्रशासन के पास नहीं थी। अरुण जेटली ने अपने बयान में यासीन भटकल की गिरफ्तारी का जिक्र किया है। यासीन भटकल को जब रक्सौल में गिरफ्तार किया गया तो नीतीश कुमार ने उसकी न तो गिरफ्तारी दिखाने की हामी भरी और न ही उसके खिलाफ कोई केस दर्ज करने को तैयार हुए। यह सिर्प इसलिए कि अल्पसंख्यक वोट नाराज न हो जाएं। अंत में एनआईए की टीम ने जाकर भटकल की कस्टडी ली, उस बीच उसके कुछ साथी भाग निकले। नीतीश कुमार की इस तुष्टिकरण की नीति का एक नतीजा यह है कि बिहार अब आतंकियों का गढ़ बनता जा रहा है। सात जुलाई को बोध गया में भी इसी तरह के विस्फोट किए गए थे। अभी तक इसका कोई सुराग ढूंढने में बिहार पुलिस नाकाम है। खुफिया सूत्रों के मुताबिक बिहार और झारखंड में लम्बे समय से सक्रिय इंडियन मुजाहिद्दीन जांच एजेंसियों के राडार पर है लेकिन बिहार पुलिस प्रशासन के नाकारापन के चलते चार महीने के भीतर लगातार दूसरी बड़ी वारदात मोदी की रैली के दौरान करने में कामयाब रहे। यही नहीं, बिहार पुलिस के काम करने के तौर-तरीकों पर भी एनआईए ने सवाल उठाए हैं। खासतौर पर मैदान में पाए जिन्दा बमों को निक्रिय करने के तरीके पर उसने एतराज जताया है। क्योंकि जीवित बमों से कई सुराग मिलते पर बिहार पुलिस ने उन्हें बोरी के अन्दर रख कर ब्लास्ट करना बेहतर समझा। सच्चाई तो यह है कि 18 फीसदी अल्पसंख्यक वोट के चक्कर में नीतीश बौखला गए हैं और उनकी सरकार व प्रशासन पर ढील बढ़ती जा रही है। इसी वोट बैंक के चक्कर में नीतीश ने भाजपा से गठबंधन तोड़ा और अकेले अपने दम पर सरकार चलाने का प्रयास किया। जब से उन्होंने नरेन्द्र मोदी को लेकर गठबंधन तोड़ा है तभी से उनकी लोकप्रियता का ग्रॉफ नीचे आ रहा है। रही बात नरेन्द्र मोदी की तो मैं नीतीश जी को वह पुराना किस्सा दोहराना चाहता हूं जब लालू जी ने इसी वोट बैंक के चक्कर में आडवाणी का रथ रोका था और उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। भाजपा को दिल्ली के सिंहासन तक पहुंचने में यह टर्निंग प्वाइंट था। कहीं रविवार की गांधी मैदान की यह मोदी की रैली भी उन्हें दिल्ली  की गद्दी तक न पहुंचा दे? अगर ऐसा होता है तो निसंदेह इसमें भी नीतीश कुमार का उल्लेखनीय योगदान होगा।

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