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Friday, 19 December 2014

यह आतंकवाद का सबसे खौफनाक चेहरा है

इधर एकाएक जेहादी आतंकवादियों के हमलों में वृद्धि हुई है। आस्ट्रेलिया के सिडनी में, बेल्जियम में और अब पेशावर में। कश्मीर में तो आए दिन आतंकी हमले होते ही रहते हैं। क्या यह हमले एक संगठन करवा रहा है? क्या सिडनी और पेशावर के हमलों में कोई संबंध है? वैसे तो हमारे कश्मीर में पिछले 26 साल में आतंकवाद 50 हजार से ज्यादा लोगों को लील चुका है पर पाकिस्तान के पेशावर आर्मी स्कूल में जिस तरह घुसकर बच्चों को लाइन में लगाकर गोलियों से भूना गया वह रौंगटे खड़ा करने वाला था। कुछ बच्चों के सिर भी काट दिए गए। घटना के वक्त स्कूल में 1100 से ज्यादा बच्चे थे। बच्चों को मारने वाला यह वही संगठन है जिसने मलाला यूसुफजई के सिर में गोली मारी थी। बुजदिली की पराकाष्ठा लांघते हुए तालिबान ने कहा कि पाक सेना ने हमारे परिवारों को उजाड़ दिया है, इसलिए हमने पाक सेना के बच्चों पर यह हमला किया है ताकि वे जान सकें कि उन्होंने हमें कितना तड़पाया है। पाकिस्तानी इतिहास में किसी भी स्कूल पर हुए हमले में यह सबसे बड़ा और बर्बर हमला था। इसने न सिर्प पाकिस्तान को बल्कि पूरी दुनिया को झकझोर डाला है। पाकिस्तानी सेना ने पाकिस्तानी तालिबान और उत्तरी वजीरिस्तान के आतंकियों के खिलाफ जर्ब-ए-अज्ब नाम का ऑपरेशन चलाया हुआ है। इसी साल जून में शुरू हुए इस ऑपरेशन के तहत अब तक 1600 से ज्यादा आतंकी मारे जा चुके हैं। इसी के जवाब में पाकिस्तानी तालिबान ने इस नरसंहार को अंजाम दिया है। पाक सेना के ऑपरेशन से आतंकियों में बौखलाहट थी। खासतौर से सेना से बदला लेने की फिराक में थे, लेकिन सेना के कैंप पर हमला करने के लिए उन्हें ज्यादा तैयारी के साथ जाना पड़ता, इसलिए उन्होंने पेशावर के इस आर्मी स्कूल में पढ़ रहे सैनिकों व आम लोगों के बच्चों को निशाना बनाया। वैसे भी बच्चे सॉफ्ट टारगेट होते हैं और इस आर्मी स्कूल में कोई मजबूत सुरक्षा प्रबंध भी नहीं थे। केवल दो-तीन सिक्यूरिटी गार्ड थे वह भी निहत्थे। पाकिस्तान में आतंकवादी घटनाओं पर नजर रखने वाले जानकारों का कहना है कि पेशावर में हमले मलाला यूसुफजई को 2014 का नोबेल पुरस्कार दिए जाने का बदला भी हो सकता है। बच्चियों की स्कूली शिक्षा के लिए मुहिम चलाने वाली मलाला पर 2012 में पाकिस्तानी तालिबान ने हमला किया था। हाल में तालिबान ने मलाला को नोबेल पुरस्कार दिए जाने का विरोध भी किया था। बता दें कि पेशावर खैबर पख्तूनख्वा प्रांत की राजधानी है। इस प्रांत में पाकिस्तान के विपक्षी दल तहरीके  इंसाफ का शासन है, जिसके सुप्रीमो क्रिकेटर से नेता बने इमरान खान हैं। इमरान ने सितम्बर में नवाज सरकार से कहा था कि वह तालिबान के साथ संघर्ष विराम करे और पाकिस्तान में उन्हें अपना दफ्तर खोलने की इजाजत दे। पाकिस्तान में तालिबान के प्रति नरम रुख रखने के आरोप में इमरान को तालिबान खान भी कहा जाता है। यह हमला आतंकवाद का सबसे खौफनाक चेहरा है जिसने मासूम बच्चों को भी नहीं बख्शा। इन आतंकियों के लिए बच्चों और महिलाओं में कोई फर्प नहीं है। फिर वह आईएस हो, बोको हरम हो, अलकायदा हो या फिर तालिबान। यह घटना पाकिस्तान के पूरे तंत्र की नाकामी को भी उजागर करती है, जिसने तालिबान को फलने-फूलने का पूरा मौका दिया है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने इस हमले को राष्ट्रीय आपदा बताया है, लेकिन इसके साथ ही हमारे इस पड़ोसी देश को आतंकवाद के मुद्दे पर आत्ममंथन भी करना चाहिए। वह खुद भी आतंकवाद से जूझ रहा है, लेकिन भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने वालों को संरक्षण भी देता आया है। वास्तव में पेशावर में हुए हमले से दो दिन पहले सिडनी में एक सिरफिरे द्वारा एक कैफे में कुछ लोगों को बंधक बनाने की घटना बताती है कि कैसे आतंकवाद एक वैश्विक खतरा बन गया है। कैसे एक अकेला आतंकी भी लाखों लोगों की जान सांसत में डाल सकता है। 26 साल पहले कश्मीर में जो हिंसा आरम्भ हुई थी वह 50 हजार लोगों को लील चुकी है। यह आंकड़ा आधिकारिक आंकड़ा है और गैर सरकारी आंकड़ा यह संख्या एक लाख से अधिक बताता है। चाहे कुछ भी हो यह तो स्पष्ट है कि कश्मीर में और देश के अन्य भागों में आतंकियों का यह मौत का तांडव जारी रहेगा और इसके लिए सिर्प पाकिस्तान जिम्मेदार है। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि आतंकवाद का यह अरसा जिसमें अभी तक कोई कमी नहीं आई है 7000 से ज्यादा हमारे सुरक्षाकर्मियों की कुर्बानी ले चुका है और 15000 से अधिक घायल भी हुए हैं। सबसे दुखद पहलू इस वैश्विक आतंकवाद का यह है कि यह सभी संगठन इस आतंक को इस्लाम के नाम पर चलाए हुए हैं। ऐसे तो कोई भेड़-बकरियों को भी नहीं मारता जैसे तालिबान आतंकियों ने पेशावर आर्मी स्कूल में मासूम बच्चों को मारा। ऐसे भयावह और बर्बर आतंकी हमले की कल्पना करना मुश्किल है। यह अच्छी बात है कि पाकिस्तानी सेना ने इस भयावह घटना के बाद आतंकियों के खिलाफ अपना अभियान जारी रखने की बात कही है, लेकिन इसमें संदेह है कि पाकिस्तानी सेना और वहां की सरकार अब आतंकियों के  बीच अच्छे-बुरे का भेद करना बंद कर देगी। यह जगजाहिर है कि पाक सेना और सरकार तालिबान आतंकियों के खिलाफ तो सक्रिय है लेकिन अन्य तमाम जेहादी गुटों को संरक्षण देने में जुटी हुई है। पाकिस्तान को आतंकी संगठनों के प्रति अपनी रीति-नीति के साथ सोच-विचार में व्यापक परिवर्तन लाने की जरूरत है और पाकिस्तान को अपनी इन नीतियों को बदलने की सख्त जरूरत है। बेहतर हो कि राष्ट्रीय शोक से गुजर रहा पाकिस्तान उन भूलों का अहसास करे जिसके चलते वह एक अस्थिर, अशांत और खतरनाक राष्ट्र में तब्दील हो चुका है। पाकिस्तान आज एक फेल स्टेट बन गया है जिसकी राष्ट्रीय नीति आतंकवाद पर आधारित है।

-अनिल नरेन्द्र

Sunday, 14 December 2014

रेव पार्टीज के लिए 8 करोड़ के ड्रग्स पकड़े

यह चौंकाने वाली बात है कि राजधानी दिल्ली में सम्पन्न युवा पीढ़ी में ड्रग्स का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है। आए दिन करोड़ों रुपए के ड्रग्स पकड़े जाते हैं। हाल ही में नए साल की रेव पार्टियों में इस्तेमाल होने वाले ड्रग्स की एक बड़ी खेप पकड़ी गई है। न्यू ईयर इवेंट से पहले ही ड्रग्स के सौदागरों ने रेव पार्टियों की तैयारी शुरू कर दी है। इसी कड़ी में पूर्वी जिला डिस्ट्रिक्ट की पुलिस ने एलएसडी (लाइसर्जिक एसिड डायथैला माइंड) स्टाम्प पेपर की बड़ी खेप के साथ एक विदेशी समेत दो लोगों को दबोचा है। आरोपियों की पहचान नीदरलैंड निवासी पैडरो मारिया तोबर गारसिया (37) और कृष्णा अपार्टमेंट गार्डन, इंदिरापुरम निवासी सन्नी खन्ना (38) के रूप में हुई है। इनके पास से 1200 एलएसडी स्टाम्प पेपर बरामद हुए हैं। पुलिस की मानें तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत आठ करोड़ रुपए से अधिक है। पुलिस दोनों से पूछताछ कर मामले की छानबीन कर रही है। पूर्वी जिला पुलिस आयुक्त अजय कुमार ने बताया कि टीम को सूचना मिली थी कि अंतर्राष्ट्रीय ड्रग्स तस्कर पैडरो मारिया छह दिसम्बर को ड्रग्स सप्लाई के लिए दिल्ली आया है। यहां वह अपने एक सदस्य से मिलकर ड्रग्स सप्लाई करेगा। इसके बाद एएटीएस इंस्पेक्टर संजीव पाहवा के नेतृत्व में एक टीम बनाई गई। टीम ने पैडरो और सन्नी को यमुना स्पोर्ट्स काम्प्लैक्स के पास से दबोच लिया। तलाशी में दोनों के पास से 1200 एलएसडी स्टाम्प पेपर मिले। पैडरो ने बताया कि नीदरलैंड से ड्रग्स भारत लेकर आया था। भारत में रेव पार्टियों में एलएसडी की खूब डिमांड है। मुंह मांगे दामों में इसको बेचा जाता है। पैडरो का दिल्ली, गोवा, मुंबई, हिमाचल प्रदेश समेत अन्य राज्यों में नेटवर्प फैला हुआ है। पुलिस की माने तो न्यू ईयर पर होने वाली रेव पार्टियों के लिए इस ड्रग्स को भारत लाया गया था। जांच में  पुलिस को यह भी पता चला है कि पैडरो भारत से ड्रग्स लाकर यहां से चरस ले जाता था। इसके लिए गैंग के सदस्य उसकी मदद करते थे। वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि भारत में एलएसडी की इतनी बड़ी खेप दूसरी बार पकड़ी गई है। अब आपको बताते हैं कि क्या है एलएसडी और कैसे करते हैं इसका नशा। एलएसडी बेहद हाई लिक्विड या स्टाम्प पेपर (एलएसडी में डूबा हुआ पेपर) की शक्ल में होता है। अधिक उत्तेजना पैदा करने के लिए इसका नशा किया जाता है। अधिकतर हाई प्रोफाइल पार्टीज में इसका इस्तेमाल किया जाता है। जीभ पर एलएसडी की ड्राप या स्टाम्प पेपर को रखा जाता है। बाद में पेपर को चबा लिया जाता है। ड्राप डालने या पेपर चबाने के बाद लम्बे समय तक एलएसडी का नशा रहता है। जानकारों की माने तो इस नशे की ओवर डोज से कई बार मौत भी हो जाती है। एलएसडी हाई प्रोफाइल लिक्विड या स्टाम्प पेपर बेहद कीमती होने के चलते इसका इस्तेमाल हाई प्रोफाइल के बिगड़ैल युवा रेव पार्टियों में करते हैं। भारत में ड्रग्स का बढ़ता  प्रचलन हमारे समाज के लिए खतरे की घंटी है। मुश्किल यह है कि आजकल की युवा पीढ़ी बड़ों की बात मानने को भी तैयार नहीं होती।

-अनिल नरेन्द्र

आत्महत्या की कोशिश अपराध नहीं, हटेगी धारा 309

आत्महत्या का प्रयास अब दंडनीय अपराध नहीं रहेगा क्योंकि सरकार ने भारतीय दंड संहिता की धारा 309 को हटाने का फैसला किया है। विधि आयोग की सिफारिश के मद्देनजर सरकार ने यह फैसला किया है। इस धारा को हटाने के बारे में 22 राज्यों एवं चार केंद्र शासित प्रदेशों ने सहमति जताई है। गृह राज्यमंत्री हरिभाई परथीभाई चौधरी ने एक सवाल के लिखित जवाब में राज्यसभा को यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि भारतीय विधि आयोग ने अपनी 210वीं रिपोर्ट में यह सिफारिश की है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 309 (आत्महत्या का प्रयास) को कानून की पुस्तक से हटा देना चाहिए। भारतीय दंड संहिता से इस धारा को समाप्त करने की सिफारिश लम्बे समय से की जा रही है। 44 साल पहले भी विधि आयोग ने इस कानून को हटाने का प्रस्ताव दिया था। अभी तक आत्महत्या का प्रयास करने वालों के खिलाफ जुर्माना और एक साल कैद की सजा का प्रावधान है। इस मुद्दे के दो पहलू हैं। तमाम न्यायविद मानते रहे हैं कि खुदकुशी करने में नाकाम रहने वाले व्यक्ति के लिए यह दोहरी प्रताड़ना जैसा है। ऐसा करने में जो सफल हो गया यानि जिसने स्वेच्छा से मौत को गले लगा लिया, कानून उसके खिलाफ तो कुछ नहीं कर सकता पर जो बच गया उसे प्रताड़ित करता है। अनेक मानसिक यंत्रणाओं से गुजरने के बाद ही कोई व्यक्ति आत्महत्या का रास्ता अपनाता है, इसलिए उसे मानसिक रोगी की श्रेणी में रखा जाना चाहिए न कि अपराध की। ऐसे व्यक्ति को सहानुभूति और चिकित्सीय मदद की दरकार होती है, सजा की नहीं। विधि आयोग ने वस्तुत इसी अमानवीयता को खत्म करने की सिफारिश की थी जिस पर 18 राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों की सहमति के बाद केंद्र सरकार ने मुहर लगाने का फैसला लिया है। इस प्रसंग में विधि आयोग की सदिच्छा और केंद्र सरकार की मानवीय पहल स्वागत योग्य तो है, पर यह आत्महत्या को जायज ठहराने का प्रयास कदापि नहीं लगना चाहिए बल्कि धारा 309 को खत्म करने के दूसरे खतरे भी हैं। आत्महत्या के प्रयास को अपराध की श्रेणी से हटाए जाने से इसके पीछे के कारणों की तलाश भी मुश्किल हो सकती है। इसका विशेष रूप से कर्ज की वजह से खुदकुशी करने वाले किसानों और दहेज हत्याओं पर असर पड़ सकता है। बिहार, मध्यप्रदेश, सिक्किम जैसे राज्यों ने इसे खत्म करने का इस आधार पर विरोध किया है कि इससे राज्य सरकारों को ब्लैकमेल करने वालों, आमरण अनशन और आत्मदाह की बात करने वालों के हौसले बुलंद हो सकते हैं लिहाजा कानूनी ऐसी कोई व्यवस्था होनी ही चाहिए ताकि ऐसे लोगों को नियंत्रण में रखा जा सके। आत्मघाती हमलावरों की विश्वव्यापी पैठ के इस दौर में भी आत्महत्या की कोशिश को अपराध न मानने के खतरे होंगे। देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाले ये लोग सबूत मिटाने की कोशिश में भी आत्महत्या का प्रयास करते हैं। ऐसे में धारा 309 को खत्म करते हुए सरकार को ऐसे कानूनी प्रावधानों के बारे में भी सोचना ही होगा जिससे अपराधी, समाज विरोधी तत्वों और आतंकवादियों को इसका लाभ न मिले।

Saturday, 13 December 2014

अमेरिकी सीनेट ने खड़ा किया सीआईए को कठघरे में

यह किसी से छिपा नहीं है कि 9/11 के बाद अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए ने ग्वांतानामो बे नामक जेल में  बहुत बर्बर तरीके से गिरफ्तार कथित आतंकियों से पूछताछ की। इस पर कई फिल्में भी बन गई हैं, मैंने ऐसी फिल्में देखी हैं और देखने पर रौंगटे खड़े हो जाते हैं। अब अमेरिकी सीनेट ने सीआईए को 9/11 के बाद बर्बर तरीकों से पूछताछ का दोषी ठहराया है। अमेरिकी सीनेट की गुप्तचर सेवाओं से संबंधित संसदीय समिति ने उस संदेह की पुष्टि कर दी है, जिसके बारे में काफी आरोप लग रहे थे। समिति ने कहा कि पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल में सीआईए ने आतंकवाद के आरोप में पकड़े गए लोगों को पूछताछ के दौरान यातनाएं दीं और उसके कुछ तरीके बहुत ही कूर थे। चौंकाने वाला पहलू यह भी है कि सीआईए ने अमेरिकी संसद और सरकार दोनों से यह बात छिपाई और हमेशा यही दावा किया कि उसके तरीके पूरी तरह मानवीय थे। सीनेट की रिपोर्ट में कहा गया है कि सीआईए ने देश को बर्बर तरीकों से पूछताछ के बारे में गुमराह किया। रिपोर्ट में कहा गया कि पूछताछ बहुत ही खराब ढंग से की गई और इसके जरिये जो जानकारी जुटाई भी गई वो भरोसे काबिल नहीं थी। 9/11 के बाद शुरू गिरफ्तारियों और पूछताछ के कार्यक्रम की जब बहुत ज्यादा निंदा हुई तो राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उसको बंद करने का आदेश दिया। अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति डिक चेनी ने सीआईए के समर्थन में कहा कि देश की सुरक्षा के लिए कुछ सख्ती बरतना जरूरी है और इस सख्ती से बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां हासिल हुईं। इसी जानकारी की वजह से ओसामा बिन लादेन को भी खत्म किया जा सका था। हालांकि सीनेट की संसदीय समिति ने इस बात को गलत करार दिया है और ज्यादतियां करने से महत्वपूर्ण जानकारी हाथ लगी है या लादेन तक पहुंचने में ऐसे तरीकों का कोई योगदान है। रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया में संयुक्त राष्ट्र ने अमेरिका से कहा है कि दोषी अधिकारियों पर मुकदमा चलाया जाए। संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिनिधि बेन एमरसन ने कहा कि रिपोर्ट से साफ है कि बुश प्रशासन के दौरान नीतियां इस तरह से बनाई गईं जिससे मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ। उधर सीआईए के निदेशक जॉन ब्रेनन ने  जोर देकर कहा गलतियों के  बावजूद अलकायदा के संदिग्धों के खिलाफ इस्तेमाल किए गए तरीकों से हमले रुके और अमेरिकियों की जानें बचीं। ओबामा ने राष्ट्रपति बनने के बाद 2009 में इस तरह की पूछताछ कार्यक्रमों पर रोक लगा दी थी और ग्वांतानामो बे को  बंद करने के आदेश दे दिए थे। इस पूछताछ में कैदियों के सिर को पानी में डुबोना, उन्हें बेइज्जत करना और सोने न देने जैसे तरीके शामिल थे। डेमोकेट सदस्यों के बहुमत वाली सीनेट इंटेलीजेंस कमेटी ने कई सालों के अध्ययन के  बाद इस रिपोर्ट को तैयार किया है। अमेरिका में भी इस रिपोर्ट को  लेकर काफी बवाल हो रहा है। हालांकि दूसरी तरफ हमारे सामने आईएस जैसे संगठन भी हैं जो खुलेआम बंधकों का सिर कलम कर रहे हैं और उन्हें दिखा भी रहे हैं। जब आतंकवादी लोगों के सिर काटने का वीडियो प्रसारित कर रहे हैं तो हो सकता है कि सीआईए की ज्यादतियों के प्रति भी लोगों में समर्थन भाव पैदा हो। पर अमेरिका एक सभ्य देश है और आईएस एक बर्बर आतंकी संगठन। पूछताछ के तरीके भी सभ्य होने चाहिए कम से कम अमेरिका से तो यही उम्मीद की जाती है।

-अनिल नरेन्द्र

धर्मांतरण ने भाजपा को धर्म संकट में डाला

आगरा में घर वापसी के नाम पर जो कुछ हुआ उसने तूल तो पकड़ना ही था खासकर इसलिए कि जो मुस्लिम कथित रूप से हिन्दू धर्म में लौटे वे ही सवाल खड़े कर रहे हैं। संसद से लेकर सड़क तक इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं। राज्यसभा में इस बात पर इतना हंगामा हुआ कि केंद्र सरकार ने इससे पल्ला झाड़ते हुए कहा कि यह राज्य सरकार का मामला है। गौरतलब है कि आगरा में सोमवार को घर वापसी के नाम पर करीब 60 मुस्लिम परिवारों का धर्म परिवर्तन कराया गया। ऐसा लगता है कि घर वापसी का यह आयोजन जल्दबाजी में और दिखावे के लिए किया गया। आरएसएस और  बजरंग दल ने दावा किया कि ये स्वेच्छा से हिन्दू बने हैं। लेकिन अगले ही दिन मीडिया में उन परिवारों के कुछ सदस्यों ने कहा कि धर्म परिवर्तन का यह नाटक उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर कराया गया है। कुछ का कहना था कि उन्हें आधार कार्ड और प्लाट जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने का वादा किया गया था। जो भी हो यह भी एक तथ्य है कि भारत में एक समय बहुत से लोगों को जोर-जबरदस्ती से इस्लाम का अनुयायी बनाया गया और यही कारण है कि आज भी तमाम मुस्लिम यह स्वीकार करते हैं कि उनके पूर्वज हिन्दू थे, लेकिन उनकी घर वापसी कभी भी आसान नहीं रही। एक कटु सत्य यह भी है कि गरीबों की सेवा के नाम पर सक्रिय ईसाई मिशनरियों ने बड़े पैमाने पर लोगों को तरह-तरह के लालच देकर ईसाई बनाया। यह काम तो अभी भी पूर्वोत्तर राज्यों में चल रहा है। इन तथ्यों के बावजूद हिन्दू संगठन घर वापसी के नाम पर ऐसा कुछ करें जिससे विवाद पैदा हो सही नहीं माना जा सकता। उपासना पद्धति एक व्यक्तिगत मामला है जहां न तो जोर-जबरदस्ती चलनी चाहिए और न ही प्रलोभन इत्यादि। इससे भाजपा को कोई फायदा नहीं होने वाला है उलटा नुकसान ही होगा। विकास के नारे पर अपनी पहचान बनाने में जुटी भाजपा को धर्मांतरण के मामले में ज्यादा फायदा नहीं होने वाला। पार्टी को लग रहा है कि इससे उसका एजेंडा पटरी से उतर सकता है। यही वजह है कि पार्टी की कोशिश है कि यह मामला जल्द निपटना चाहिए। धर्मांतरण का एक ऐसा ही कार्यक्रम 25 दिसम्बर को अलीगढ़ में आयोजित किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि वहां कई ईसाई परिवार स्वेच्छा से हिन्दू धर्म अपनाएंगे। धर्म परिवर्तन बेहद संवेदनशील मामला है। हमारे देश में किसी भी व्यक्ति को कोई भी धर्म मानने की स्वतंत्रता संविधान से मिली हुई है। कोई चाहे तो वह अपना धर्म बदल सकता है, लेकिन इसके लिए कुछ कानूनी प्रावधान किए गए हैं। धर्म बदलने से पहले इस बात की सूचना बाकायदा प्रशासन को देनी होती है। दबाव या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराना कानून के विरुद्ध है। उत्तर प्रदेश में चूंकि चुनाव होने वाले हैं ऐसे में राज्य की कुछ विपक्षी पार्टियों को लगता है कि उन्हें राजनीतिक तौर पर इससे फायदा होगा। हमारा तो बस इतना कहना है कि जो कुछ हो वह देश के कानून के तहत ही हो।

Friday, 12 December 2014

अफसोस निर्भया कांड से कोई सबक नहीं लिया गया

यह दूसरी निर्भया है जिसकी जान बच गई वरना 16 दिसम्बर 2012 की उस खौफनाक रात की तरह इस निर्भया के साथ भी रौंगटे खड़े कर देने वाली हैवानियत होने वाली थी। रूह को कंपा देने वाला यह सच निकल कर अब सामने आया है। पुलिस के आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक गुड़गांव की फाइनेंस कम्पनी में जॉब करने वाली यह युवती जरा-सी होशियारी से बच गई। यह खुलासा जांच के दौरान सामने आया है। कैब में बलात्कार की वारदात को अंजाम देने से पहले आरोपी शिव कुमार यादव ने युवती को इस कदर पीटा था कि उसका मुंह सूज गया। आरोपी ने 16 दिसम्बर 2012 की उस रात निर्भया जैसा हाल बनाने की युवती को धमकी देते हुए कहा था कि उसके शरीर में लोहे का सरिया डाल देगा। आरोपी शिव कुमार ने युवती की हत्या करने की कोशिश की मगर लड़की ने होशियारी दिखाई और उस वक्त उसके चंगुल से निकलने के लिए रोते-बिलखते हुए जैसे-तैसे झांसा देकर कूदने में कामयाब हो गई। यह घटना बताती है कि दो वर्ष पूर्व राजधानी में ही चलती बस में निर्भया के साथ हुई बर्बर घटना के बाद बने कड़े कानून के बावजूद कुछ भी नहीं बदला है। इस शर्मनाक घटना के बाद बेशक पुलिस ने 48 घंटों के भीतर ही आरोपी को पकड़ लिया मगर असली मुद्दा तो महिलाओं की सुरक्षा का है जिसे लेकर पुलिस, प्रशासन व हमारा समाज फेल हो रहा है। दिल्ली में क्राइम अंगेस्ट विमन के मामलों में उलटा वृद्धि ही हुई है। दिल्ली पुलिस रोज ऐसे 40 मुकदमे दर्ज कर रही है। पुलिस स्टेशनों में हर दिन कम से कम चार रेप केस पहुंच रहे हैं जबकि छेड़छाड़, सेक्सुअल हेरेसमेंट, घरेलू हिंसा में भी बढ़ोतरी हुई है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक इस साल 15 नवम्बर तक क्राइम अंगेस्ट विमन के 13,230 केस दर्ज हुए जबकि इसी दौरान पिछले साल दर्ज मामलों की संख्या 11,479 थी। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हरिभाई चौधरी ने राज्यसभा में उठे सवाल के जवाब में इन आंकड़ों को जारी किया है। इस लिहाज से अगर दिल्ली को रेप कैपिटल कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा। जब भी कोई भयानक घटना घटती है खासकर रेप की तो आम लोग ही नहीं जिम्मेदार सरकारी पदों पर बैठे लोग भी उखाड़-पछाड़ की मुद्रा में आ जाते हैं। निर्भया गैंगरेप कांड में जो गुस्सा बलात्कार के आरोपियों के खिलाफ दिख रहा था, कुछ वैसा ही गुस्सा आज आरोपी कैब ड्राइवर और कैब कम्पनी उबर के खिलाफ भी दिख रहा है। लेकिन कम ही लोगों का ध्यान इस तरफ गया है कि दो साल की इस अवधि में सड़कों को लड़कियों के लिए सुरक्षित बनाने की दृष्टि से कोई ठोस काम नहीं किया जा सका है। पुलिस और प्रशासन तंत्र का रुख उलटा बिगड़ा हुआ दिखता है। हैरानी की बात है कि कई देशों में अपनी सेवाएं देने वाली उबर कम्पनी की जिस टैक्सी में उस युवती के साथ बर्बरता की गई उसमें जीपीएस सिस्टम तो छोड़ें, उसके पास दिल्ली में टैक्सी चलाने का  परमिट तक नहीं था। इस युवती के साथ कथित तौर पर दुष्कर्म करने वाला शिव कुमार यादव इससे पहले भी अपनी टैक्सी में दुष्कर्म के मामले में जेल जा चुका है, इसके बावजूद कैसे उसे इस नामी कम्पनी ने अपनी सेवा में  रख लिया था? बेशक ट्रांसपोर्ट विभाग ने उबर की टैक्सियों पर दिल्ली में रोक लगा दी है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि वह अब तक नेशनल परमिट के नाम से कारोबार करती रही है। पिछले एक दशक में राजधानी में चलते वाहन में दुष्कर्म की कई घटनाएं हो  चुकी हैं जिनमें 2010 का चर्चित धौलाकुआं कांड भी है, जिसमें इसी वर्ष अक्तूबर में पांच लोगों को सजा सुनाई गई है। इस घटना का दूसरा अहम पहलू यह है कि दुष्कर्म के मामले में मृत्युदंड के प्रावधान वाला कड़ा कानून भी महिलाओं के लिए सुरक्षा कवच नहीं बन सका है पर केवल पुलिस, प्रशासन को दोष देने से, कड़े से कड़े कानून बनाने से यह मामला रुकने वाला नहीं। जब तक समाज इसे रोकने के लिए आगे नहीं बढ़ेगा तब तक यह मामला चलता रहेगा। कुछ ठोस करना होगा क्योंकि अकेले दिल्ली में ही नहीं बल्कि तमाम महानगरों में महिलाएं नौकरी के सिलसिले में रातों में भी अकेले सफर करने पर मजबूर होती हैं। दुख से कहना पड़ता है कि निर्भया कांड से भी कुछ बदला नहीं।

-अनिल नरेन्द्र

रूस से भारत की विशेष सामरिक साझेदारी, स्वागत है पुतिन का

भारत के साथ संबंधों को विशेष सामरिक साझेदारी करार देते हुए रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने मंगलवार को अपनी भारत यात्रा से पहले भारत-रूस संबंधों में गर्मजोशी खत्म होने को गलत साबित करने के इरादे से भारत यात्रा आरंभ की। हम राष्ट्रपति पुतिन का स्वागत करते हैं। रूस एक विश्वसनीय और समय पर खरा उतरने वाला देश है जिसने भारत को कभी भी निराश नहीं किया। हां, पिछले कुछ दिनों से दोनों देशों के दशकों पुराने रिश्तों पर संकट के बादल जरूर आ गए हैं। दो दशकों बाद भारत की धरती पर कदम रखते वक्त राष्ट्रपति पुतिन को एक अहम जिम्मेदारी के बोझ का अहसास हो रहा होगा कि दोनों देशों के दशकों पुराने रिश्तों पर संशय के बादलों को कैसे दूर किया जाए? यूकेन मामले में अमेरिका सहित पश्चिमी देशों ने रूस पर जो आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं वे चुभने वाले हैं। पेट्रोल की कीमत में भारी गिरावट ने इस चुभन को ऐसे दर्द में तब्दील कर दिया है जिससे राहत का रास्ता तत्काल खोजना पुतिन के लिए जरूरी बन गया है। चुनौतियों की इन घड़ियों में नजर अपनों को ही खोजती है और भारत से परखा और पुराना दोस्त कौन हो सकता है रूस के लिए। रूस न केवल भारत के रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा बाजार है बन गया बल्कि विकास की पंचवर्षीय योजना तक हमने उसके अनुभवों से हासिल की। इस रिश्ते की असली परीक्षा वर्ष 1971 में पाकिस्तान से  जंग के वक्त हुई थी जब हमें डराने के लिए अमेरिका के भेजे नौसैनिक बेड़े सेवेंच फ्लीट के जवाब में रूस ने अपने जंगी जहाज उतारने की घोषणा कर दी थी। रूस से अब तक के हमारे रिश्तों की बुनियाद का खम्भा रक्षा उपकरणों, जंगी विमानों और जहाजों की खरीद पर टिका था। वह निर्माता था और हम उसके सबसे बड़े खरीददार हुआ करते थे। लेकिन हालात बदल गए हैं और हम अब खरीददार से उत्पादक की हैसियत चढ़ना चाहते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने `मेक इन इंडिया' अभियान से इसकी शुरुआत भी कर दी है। राष्ट्रपति पुतिन ने इसे भांप लिया है और इस संक्षिप्त प्रवास में वह संयुक्त रक्षा उत्पादन को आगे बढ़ाएंगे। रूस पेट्रोल और गैस के विशाल भंडार पर बैठा है और भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है। एटॉमिक रिएक्टरों के सौदे में सुरक्षा संबंधी हमारे कानून पर अमेरिका व पश्चिमी देशों को भले ही परेशानी हो लेकिन रूस को कभी भी चिंता नहीं हुई। पुतिन भारत में परमाणु बिजली की श्रृंखला बनाने का इच्छुक है। रूस के सहयोग से बने पुंडनकुलम बिजली घर की एक यूनिट से उत्पादन चल रहा है जबकि दूसरी से शुरू होने वाला है। प्रधानमंत्री मोदी को पुतिन की यात्रा के दौरान इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि 26 जनवरी को अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भी आ रहे हैं। रूस और अमेरिका में भारत के रिश्तों को संतुलित बनाने की चुनौती होगी। वैसे हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अमेरिका पर हम इतना विश्वास नहीं कर सकते जितना रूस पर। स्वागत है पुतिन साहब का।