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Wednesday, 24 December 2014

6000 करोड़ के ड्रग्स रैकेट में मजीठिया को समन

पंजाब में ड्रग्स रैकेट जोरों से फलफूल रहा है। समय-समय पर यह चिंताजनक खबरें आती रहती हैं कि पंजाब में ड्रग्स का इस्तेमाल लगातार बढ़ता जा रहा है। पंजाब के एक कैबिनेट मंत्री विक्रम सिंह मजीठिया को ड्रग्स रैकेट से जुड़े मनी लांड्रिंग मामले की जांच के लिए समन जारी किया गया है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पंजाब के राजस्व मंत्री मजीठिया को ड्रग्स तस्करों के गिरोह के लिए 6000 करोड़ रुपए के कथित मनी लांड्रिंग (धन शोधन) घोटाले में 26 दिसम्बर को पेश होने के लिए समन जारी किया है। बता दें कि बादल परिवार से करीबी रिश्तेदारी हैं मजीठिया की। मजीठिया डिप्टी सीएम सुखबीर सिंह बादल के साले और केंद्रीय राज्यमंत्री हरसिमरत कौर के भाई हैं। केंद्रीय वित्त मंत्रालय के अधीन वित्तीय जांच एजेंसी ईडी ने अंतर्राष्ट्रीय नशा तस्करी में शामिल लोगों से पूछताछ की है जिसका भंडाफोड़ प्रवासी भारतीय अनूप सिंह कहलों की मदद से मार्च 2013 में फतेहगढ़ साहिब थाने में किया गया। इसके बाद हुई जांच में पिछले साल नवम्बर में कथित सरगना जगदीश सिंह भोला की गिरफ्तारी हुई जो पंजाब पुलिस का निलंबित डीएसपी है। अंतर्राष्ट्रीय मनी लांड्रिंग मामले में पिछले साल गिरफ्तार जगदीश भोला ने पुलिस को बयान दिया है कि पूरा ड्रग्स रैकेट मजीठिया की निगरानी में चलता है। इसकी जानकारी पुलिस को भी है। हालांकि मजीठिया ने आरोपों को गलत बताया है। सूत्रों ने कहा कि ईडी ने मजीठिया से पूछताछ के लिए 50 सवालों की सूची तैयार की है। एक अंग्रेजी अखबार ने दावा किया है कि मजीठिया ने स्वीकार किया है कि उन्हें ईडी ने समन जारी किया है। मजीठिया ने यह भी बताया है कि वह इस रैकेट के सामने आने के दिन से ही जांच में सहयोग कर रहे हैं। बताया जाता है कि पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह  बादल की पत्नी और केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर के छोटे भाई विक्रम सिंह मजीठिया का नाम ड्रग तस्करों की उस सूची में भी था जिसे पूर्व डीजीपी जेल शशि कांत ने मुख्यमंत्री को सौंपी थी। विपक्ष इस मामले में सीबीआई जांच की मांग करता रहा है परन्तु राज्य सरकार ने राज्य पुलिस से जांच कराकर मजीठिया को क्लीन चिट दे दी थी। मजीठिया के सत्तासीन बादल परिवार के अति निकट संबंध होने तथा सहयोगी भाजपा के साथ तनावपूर्ण संबंधों के चलते पंजाब की राजनीति में तूफान उठ सकता है। शिवसेना के साथ कुछ समय पहले हुई जोरदार तनातनी के बाद क्या भाजपा अपने एक और सहयोगी अकाली दल से भिड़ने की हालत में पहुंच रही है? भाजपा के तेजतर्रार नेता नवजोत सिंह सिद्धू और अकालियों के बीच पहले से ही तनातनी चल रही है। मजीठिया को समन के पीछे कुछ लोग काफी कुछ पढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। इनकी मानें तो यह भाजपा और अकालियों के बीच खाई बढ़ने की शुरुआत है, इसलिए कि मजीठिया सुखबीर के साले हैं और हरसिमरत कौर के छोटे भाई हैं यानि जांच की दस्तक अप्रत्यक्ष तौर पर बादल परिवार के दर पर है। 6000 करोड़ रुपए के इस ड्रग रैकेट में मजीठिया की जरा-सी भी भूमिका निकलती है तो उन्हें गद्दी छोड़नी पड़ सकती है और इससे भाजपा और बादल परिवार में खटास बढ़ेगी।

Tuesday, 23 December 2014

जेहादी आतंकी संगठनों ने महिलाओं व बच्चों पर कहर बरपाया

आजकल पूरी दुनिया में आतंक की खबरें पढ़कर दिल दहल जाता है। बच्चे, महिलाएं भी अब इन आतंकी संगठनों के निशाने पर आ चुके हैं। आए दिन महिलाओं पर आतंकियों के कहर की खबरें पढ़ने को मिल रही हैं। सीरिया और इराक में आतंक का साम्राज्य स्थापित करने की चाह रखने वाले बर्बर आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने कथित रूप से इराक के फल्लुजाह में 150 लड़कियों और महिलाओं को सिर्प इसलिए मौत के घाट उतार दिया कि उन्होंने एक आतंकी संगठन के जेहादियों से निकाह करने से इंकार कर दिया था। डेली मेल अखबार की गत बृहस्पतिवार को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार इराक के मानवाधिकार मंत्रालय ने एक विज्ञप्ति में यह जानकारी दी है कि अबु अनस अल लिबी नामक संगठन के खूंखार हत्यारों ने अल अनवर प्रांत में हिंसा का यह तांडव मचाया। अबु अनस ने इन महिलाओं को जेहादियों से पहले निकाह करने को कहा। इन महिलाओं ने जब निकाह से इंकार कर दिया तो लाइन में लगाकर इनकी हत्या कर दी गई। मारी जाने वाली महिलाओं में अधिकतर यजीदी कबीले की थीं। कई महिलाएं गर्भवती भी थीं। महिलाओं पर आईएस का यह अत्याचार कोई नया नहीं है। उसके लिए महिलाएं एक वस्तु की तरह हैं जिन्हें समयानुसार इस्तेमाल करना चाहता है। आईएस जिन इलाकों पर कब्जा करता है वहां की महिलाओं को गुलाम बनाकर बेच देता है। मारने के बाद उनके शव फल्लुजाह में सामूहिक कब्र में दफन कर दिए जाते हैं। विज्ञप्ति के अनुसार आईएस के लड़ाकों ने फल्लुजाह की एक मस्जिद को जेल में तब्दील कर दिया है, जहां वह सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों को बंदी  बनाकर रखते हैं। उधर हजारों मील दूर नाइजीरिया में सक्रिय बोको हरम नामक आतंकी जेहादी संगठन ने देश के उत्तर-पूर्वी इलाके से कम से कम 185 महिलाओं और बच्चों को अगवा कर लिया। इससे पहले उन्होंने 33 लोगों की हत्या कर दी थी। एक स्थानीय अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया कि आतंकियों ने गुमसुरी गांव पर अचानक धावा बोला। वह ट्रकों पर सवार होकर आए थे। उन्होंने  पुरुषों को गोलियों से पहले भूना और गांव की महिलाओं और बच्चों को ट्रकों में बिठाकर ले गए। इससे पहले उन्होंने गांव को पेट्रोल बम से जला दिया। इलाके में संचार की कमी है, इस कारण यह खबर घटना के कई दिनों  बाद ही सामने आ सकी। क्षेत्र के दूरसंचार टॉवरों को आतंकियों ने पहले ही उड़ा दिया था। स्थानीय अधिकारियों को रविवार के हमले की खबर गुमसुरी के उन ग्रामीणों से मिली जो वहां से किसी तरह भागकर 70 किलोमीटर का सफर तय करके मैदागुरी पहुंचे। मैदागुरी नाइजीरिया के वार्नो प्रांत की राजधानी है। पश्चिमी शिक्षा का घोर विरोधी बोको हरम साल 2009 से नाइजीरिया में कहर बरपाता आ रहा है। उसने स्कूलों, गांवों, पुलिस, चर्च और आम नागरिकों पर कई हमले किए हैं जिनमें बड़ी तादाद में लोग मारे गए हैं। उसने सरकारी इमारतों पर भी बम फेंके हैं। इस महीने मैदागुरी में बोको हरम की एक महिला आत्मघाती के हमले में पांच लोग मारे गए थे। यह अत्यंत चिंताजनक है कि इन जेहादी दहशतगर्दों ने न तो बच्चों को  बख्शा है और न ही महिलाओं को।
-अनिल नरेन्द्र


मुझे तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था, मेरी किश्ती वहां डूबी जहां पानी कम था

हिन्दुत्व और धर्म परिवर्तन, घर वापसी समेत तमाम मामलों पर पार्टी और आरएसएस परिवार से जुड़े नेताओं के विवादित बयानों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काफी आहत हैं। उन्होंने संघ और पार्टी के शीर्ष नेताओं को संकेत दिया कि यदि यही स्थिति बनी रहती है तो वह अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। उन्होंने संघ के नेताओं से बैठक में कहा कि मुझे पद का मोह नहीं है। हिन्दी फिल्म की यह मशहूर पंक्तियांöमुझे तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था, मेरी किश्ती वहां डूबी जहां पानी कम था, मोदी पर बिल्कुल सटीक बैठ रही है। मोदी सरकार को केंद्र में आए छह महीने भी नहीं हुए, लेकिन इस समय जितनी आलोचना संघ और उससे जुड़े संगठनों ने की उतनी तो खुद विपक्षी दल भी नहीं कर पाए। और तो और सरकार की किरकिरी या कहें विपक्ष को मोदी सरकार पर हमले करने का औजार, मुद्दा भी भाजपा के पावर हाउस माने जाने वाले संघ के लोग उपलब्ध करा रहे हैं। अमूमन किसी भी सरकार का पहला साल हनीमून पीरियड कहा जाता है क्योंकि इस समयावधि में खुद विपक्ष भी सत्ताधारी दल की नीतियों और उनके द्वारा की जाने वाली गलतियों का इंतजार करता है। इसके बाद ही सरकार के कामकाज के आधार पर उसकी आलोचना शुरू होती है परन्तु यहां तो स्थितियां बिल्कुल उलटी ही हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े विभिन्न संगठनों ने घर वापसी के नाम पर जैसी हड़बड़ी और दिखावे का प्रदर्शन किया है उससे देश-दुनिया को एक गलत संदेश तो गया ही है,  साथ ही भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों को दुप्रचार करने का मौका भी मिला है। जब उचित तरीके से किए गए धर्मांतरण या फिर घर वापसी पर किसी तरह की पाबंदी नहीं तब फिर किसी भी संगठन के लिए यह उचित नहीं कि वह इस मामले पर लक्ष्य करता और अभियान छेड़ता नजर आए। कथित घर वापसी के सन्दर्भ में इस तरह की घोषणाएं तो घोर आपत्तिजनक हैं कि हम अमुक वर्ष तक सबको हिन्दू बना देंगे। ऐसी घोषणाएं देश के साथ-साथ हिन्दू धर्म की बदनामी का कारण बन रही हैं, जो अपनी उदारता और सहिष्णुता के लिए अधिक जाना जाता है। मोदी का सिरदर्द सिर्प संघ में ही नहीं बल्कि उनके घर में  बैठे लोग भी पैदा कर रहे हैं। इस कड़ी में पहला नाम साध्वी निरंजन ज्योति का है तो दूसरा साक्षी महाराज का। अभी मोदी सांसदों पर नियंत्रण कर ही रहे थे कि भाजपा के बुजुर्गवार उत्तर प्रदेश के महामहिम ने राम मंदिर का राग छेड़कर सरकार के सामने नई मुसीबत पैदा कर दी। इतने बवाल के बाद भी लगता है कि संघ के लोगों ने अभी कोई सबक नहीं लिया है, कम से कम संघ प्रमुख मोहन भागवत के कोलकाता में धर्म परिवर्तन पर दिए गए बयान को देखते हुए तो नहीं लगता। मोदी ने संघ के नेताओं से कहा कि इस तरह के बयानों से सरकार की छवि धूमिल हो रही है। भाजपा का तर्प है कि सरकार गुड गवर्नेंस के मुद्दे पर जीत कर आई है और इस तरह की बयानबाजी से मोदी सरकार की कट्टर छवि बनने का खतरा है। सूत्रों के मुताबिक पार्टी की संसदीय दल की बैठक में भी मोदी ने कड़े शब्दों में इस तरह के बयानों से बचने के लिए कहा था लेकिन उसके फौरन बाद ही योगी आदित्यनाथ ने फिर विवादित बयान दे दिया। पार्टी नेताओं का कहना है कि संघ को यह भी बताया गया कि अगर इसी तरह से विवाद चलते रहे तो किसी भी समय दिल्ली विधानसभा के चुनाव की घोषणा और 2017 में यूपी का मिशन फेल हो सकता है। इससे संघ की योजनाओं को भी धक्का लगेगा। धारणा यह बन रही है कि मोदी सरकार के सत्ता में आते ही संघ का कब्जा हो रहा है। वैसे यह संदेश अकारण नहीं कि धर्मांतरण अथवा घर वापसी में कहीं न कहीं लोभ-लालच की भी भूमिका होती है। इन स्थितियों में यह अब आवश्यक हो गया है कि धर्मांतरण संबंधी कानून को दुरुस्त किया जाए। इससे भी कहीं अधिक आवश्यक यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे संबंधित संगठन यह समझें कि यदि वह मोदी सरकार के शुभचिंतक हैं तो घर वापसी व अन्य ऐसे मुद्दों का परित्याग करें। मोदी सरकार को मोदी के विकास एजेंडे पर चलने दें और बेवजह उसे उलझाए न रखें। यह सब विवादित मुद्दे बाद में भी उठाए जा सकते हैं, सरकार को सही मायनों में जमने तो दें।

Sunday, 21 December 2014

ऑडिटोरियम में तो बच्चों को मार डाला है, अगला फरमान क्या है?

कभी-कभी शब्द वाकई बेमानी हो जाते हैं। हम खौफ के साये में चुपचाप अपनी बेबसी को ताकते रह जाते हैं और हमारे भीतर जो भावनाएं उबल रही होती हैं उनको अभिव्यक्त करने के लिए हमें माकूल शब्द नहीं सूझते और फिर हम हमदर्दी के बोलों की निरर्थकता को समझते हुए खामोश हो जाते हैं। वह भी तालिबान ने पेशावर के मासूम बच्चों पर हमला करके हमें एक ऐसे ही मोड़ पर ला खड़ा किया है। पेशावर के स्कूल हमले की योजना मुल्ला फजलुल्लाह समेत तालिबान के शीर्ष 16 आतंकियों ने दिसम्बर की शुरुआत में अफगानिस्तान में हुई एक बैठक के दौरान बनाई थी। यह जानकारी पाकिस्तान के अधिकारियों ने शुक्रवार को दी। पाक अधिकारियों ने कहा कि शुरुआती जांच से पता चला है कि तालिबान प्रमुख मुल्ला फजलुल्लाह, तालिबान कमांडर सईद, हाफिज दौलत समेत कई अन्य लोगों ने इस योजना बनाई। उन्होंने बताया कि खैबर जिले में सक्रिय  लश्कर-ए-इस्लाम का प्रमुख मंगल बाग भी यह साजिश का हिस्सा था। सात आतंकियों को पेशावर के पास खैबर इलाके में प्रशिक्षण दिया गया था। आतंकियों के आका अफगानिस्तान में थे और हमले के दौरान आतंकियों के साथ सम्पर्प बनाए हुए थे। हमने ऑडिटोरियम में मौजूद सभी बच्चों को मार डाला है। अब हमारे लिए अगला फरमान क्या है? वहीं ठहरो, सेना के लोगों को आने दो। खुद को उड़ाने से पहले उन्हें भी मार डालो। सुरक्षा एजेंसियों के अफसरों के मुताबिक पाकिस्तान के आर्मी स्कूल पर हमला करने वाले फिदायिनों की अपने आकाओं से यह आखिरी बातचीत थी। इस हमले से हमें मुंबई के 26/11 के हमले की याद ताजा हो जाती है। मुंबई में भी कसाब एंड कंपनी भी हमले के दौरान अपने आकाओं से सीधे सम्पर्प में थी। आखिरी बात करने के बाद बच गए दो आतंकी फिदायीन स्कूल के बाहर तैनात स्पेशल ऑपरेशन के जवानों की ओर बढ़ गए थे। आतंकवादियों और उनके आकाओं के बीच इस तरह की बातचीत का खुलासा उस खुफिया डोजियर में हुआ है जिसे पाक सेना के प्रमुख जनरल राहिल शरीफ ने बुधवार को अफगानिस्तान सरकार के अफसरों से साझा किया था। स्कूल में घुसते ही फिदायीन हमलावर सीधे मुख्य ऑडिटोरियम की ओर बढ़ गए थे जहां सीनियर सेक्शन के बच्चों को प्राथमिक उपचार के गुर सिखाए जा रहे थे। अफसरों के बीच इस बात पर माथापच्ची चल रही है कि क्या हमलावरों को ऑडिटोरियम में मौजूद बच्चों के जमावड़े की पहले से जानकारी थी? क्या उन्हें कोई मुखबिर पूरी जानकारी दे रहा था? खुफिया सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान के  पास हमलावरों के नाम और उनकी बातचीत की ट्रांक्रिप्ट है। उनमें एक हमलावर का नाम उबुजार था जबकि उसे निर्देश देने वाले का नाम कमांडर उमर के तौर पर सामने आया है। पेशावर के हमले ने यह साफ कर दिया है कि तालिबान का सफाया पाकिस्तान की हकूमत के लिए हिमालय से कम बड़ी चुनौती नहीं है। तालिबान के गुनाहों को देखते हुए पाक फौज को तालिबान के खिलाफ अपने सारे हथियार इस्तेमाल करने चाहिए और हकूमत को तब तक चैन से नहीं बैठना चाहिए जब तक उसकी धरती से दुश्मन का पूरी तरह सफाया न हो जाए पर क्या पाक ऐसा करेगा?

-अनिल नरेन्द्र

50 साल का अलगाव खत्म हुआ अमेरिका और क्यूबा के बीच करार

कम्युनिस्ट क्यूबा के प्रति 50 साल से अधिक अलगाव को खत्म करने के लिए और राजनीतिक संबंध बहाल करने की दिशा में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने साहसी, ऐतिहासिक व आश्चर्यजनक कदम उठाकर नया इतिहास लिख दिया है। इसे तमाम विश्व समुदाय ने एक ऐतिहासिक मोड़ बताया है। यह करार और दोनों देशों के कैदियों की रिहाई की घोषणा कनाडा और वैटिकन में एक साल से अधिक गुप्त वार्ता के चलते संभव हो सकी है जिसमें पोप भी शामिल थे। क्यूबा और अमेरिका के बीच रिश्तों के निर्वासन की ऐतिहासिक समाप्ति की खबर दुनिया को भले ही एकाएक लगी हो, लेकिन पर्दे के पीछे इसकी लंबी कोशिशें लंबे वक्त से चल रही थीं। लगभग 53 साल से एक-दूसरे के विरोधी रहे दोनों मुल्कों के रिश्ते सामान्य करना वास्तव में इतना आसान नहीं था। इसके पीछे बड़ी भूमिका दोनों देशों के राष्ट्रपतियों, पोप फ्रांसिस और जासूसों की रही। रिश्तों को सामान्य करने की कोशिश राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 2009 में सत्ता संभालने के बाद शुरू कर दी थी। तब उन्होंने अमेरिका में रहने वाले क्यूबाई मूल के लोगों को अपने रिश्तेदारों से मिलने और उन्हें धन भेजने में लगी पाबंदी में ढील देने की घोषणा की थी। हालांकि इसमें तेजी बीते एक साल के दौरान देखने को मिली। इस दौरान क्यूबा और अमेरिकी अधिकारियों के बीच कनाडा और वैटिकन में नौ मुलाकातें हुईं। अमेरिका की मांग एक-दूसरे के कैदियों की अदला बदली की थी। अमेरिका अपनी जेल में बंद तीन हजार क्यूबाई एजेंटों के बदले में क्यूबा में 20 साल से बंद एक अमेरिकी खुफिया अधिकारी की रिहाई चाहता था। दरअसल ग्रोस नामक यह खुफिया अधिकारी एक एनजीओ के लिए काम करता था और 2009 में उसकी गिरफ्तारी के बाद ही अमेरिका ने रिश्तों को सामान्य करने की दिशा में गंभीरता से सोचना शुरू किया। पोप की भूमिका क्यूबाई राष्ट्रपति राउल कास्त्राs को मनाने में महत्वपूर्ण रही। दरअसल पोप फ्रांसिस अर्जेंटीना में पैदा हुए थे, ऐसी स्थिति में उन्हें इस काम को अंजाम देने में आसानी रही। क्यूबा के राष्ट्रपति राउल कास्त्राs ने पांच दशक के बाद इस देश के साथ संबंध बनाने के अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के फैसले और बंदियों की अदलाबदली का स्वागत किया है। अमेरिका ने क्यूबा के तीन जासूस सजायाफ्ता कैदियों को रिहा कर दिया है। इसके साथ ही क्यूबा ने भी 2009 में बंदी बनाए गए अमेरिकी राहत कर्मी अलन ग्रोस तथा एक गुप्तचर एजेंट को रिहा किया है। अमेरिकी गुप्तचर एजेंट 20 साल से क्यूबा में बंद था। संयुक्त राष्ट्र महासचिव व तमाम यूरोपीय देशों ने संबंधों के सामान्य होने के फैसले का स्वागत किया है। यह कदम दोनों राष्ट्रों के नागरिकों के बीच सम्पर्प बढ़ाने में मदद करेगा। हम अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और क्यूबा के राष्ट्रपति राउल कास्त्राs को इस साहसी, ऐतिहासिक समझौते के लिए बधाई देते हैं।

Saturday, 20 December 2014

कब तक पाकिस्तान दोहरा रुख अपनाएगा?

पेशावर के स्कूल में जघन्य आतंकी हमले के बाद वाली सुबह निश्चित रूप से पाकिस्तानियों को रात से भी ज्यादा काली महसूस हुई होगी। 100 से ज्यादा स्कूली बच्चों को जिस दिन दफनाना पड़े, वह दिन किसी भी देश के लिए कभी न भूलने वाली घटना होगी। इस कांड ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। पाकिस्तान के साथ कैसे भी संबंध हों लेकिन आज हम सभी पाकिस्तान के दुख में शरीक हैं। लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या इस घटना के बाद पाकिस्तान इन आतंकी संगठनों के प्रति अपने विचार व नीति बदलेगा? क्या यह दुख, यह जुड़ाव पाकिस्तान की धरती से उन आतंकी तत्वों को खत्म करने में मददगार हो सकता है जो गाहे-बगाहे पाकिस्तान ही नहीं बाहर के भी बेकसूर नागरिकों को मारते रहते हैं? अभी बच्चों के कत्लेआम को 24 घंटे भी नहीं बीते थे कि पाकिस्तान का आतंकवाद को लेकर दोहरा चेहरा बेनकाब हो गया। पाकिस्तान की एक अदालत ने गुरुवार को लश्कर-ए-तैयबा के ऑपरेशन कमांडर और मुंबई हमलों के मास्टर माइंड जकीउर रहमान लखवी को इसलिए जमानत पर रिहा कर दिया क्योंकि वकीलों की हड़ताल के चलते सरकारी वकील केस की सुनवाई के लिए अदालत नहीं पहुंचे। विडम्बना देखिए कि वकील पेशावर के स्कूल में आतंकियों द्वारा 148 लोगों की हत्या के विरोध में हड़ताल पर थे। 54 वर्षीय लखवी और छह अन्य ने वकीलों की हड़ताल के बीच जमानत आवेदन दिया था। पेशावर के हमले को 1947 में पाकिस्तान के गठन के बाद की सबसे भीषण राष्ट्रीय आपदा बताया जा रहा है, जिससे वहां आम लोगों की सियासी दलों से नाराजगी और नाउम्मीदी को सहज ही समझा जा सकता है। इसी दबाव का नतीजा है कि पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके घनघोर प्रतिद्वंद्वी इमरान खान सहित सभी सियासी दलों को एक साथ आकर इस हमले की न केवल निंदा ही करनी पड़ी है बल्कि उन्हें पाकिस्तान की सरजमी से दहशतगर्दों को पूरी तरह से खत्म करने का वादा भी करना पड़ा है। पाकिस्तान के लिए यह वाकई परीक्षा की घड़ी है। लेकिन क्या पाकिस्तान सचमुच आतंकवाद को पूरी तरह से खत्म करने के लिए तैयार है? नवाज शरीफ ने हमले के तुरन्त बाद आतंकवाद संबंधी मामलों में फांसी की सजा पर लगी रोक हटाने का ऐलान किया। फांसी न देने का छह साल पुराना फैसला पलट दिया। ऐसे आतंकियों के खिलाफ डैथ वारंट दो दिन में जारी होंगे। 800 आतंकियों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। सरकार ने अच्छे-बुरे तालिबान का फर्प भी खत्म कर दिया है। यह भी कहा गया है कि तालिबान से बातचीत नहीं होगी, सिर्प कार्रवाई होगी और तब तक जारी रहेगी  जब तक एक भी आतंकी जिंदा रहेगा। नवाज और पाक सेना आतंकियों पर कार्रवाई करना चाहते हैं या सिर्प तालिबान पर? क्योंकि आज भी दुनिया के दो सबसे बड़े आतंकी हाफिज सईद और दाउद इब्राहिम उसी की सरपरस्ती में पल रहे हैं। पाक सरकार आज भी उन्हें जनसेवक मानती है। अगर वाकई पाकिस्तान की सरकार और सेना आतंकवाद से मुक्ति चाहती है तो पहले उसे हाफिज सईद, दाउद इब्राहिम और लखवी जैसे सरगनाओं से मुक्त होना होगा। यदि पाक सरकार और सेना हाफिज सईद इत्यादि के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती तो फिर इसका सीधा मतलब होगा कि अच्छे-बुरे आतंकियों में भेद न करने का जो भरोसा दिलाया जा रहा है उसका कोई मूल्य-महत्व नहीं। विडम्बना देखिए कि नवाज शरीफ आतंकियों के सफाए का वादा करते हैं और मुंबई के आतंकी हमले के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले आतंकी सरगना हाफिज सईद भारत को धमकाने में लगा हुआ है। हाफिज सईद पर कार्रवाई तो दूर की बात है उसने इस हमले के बाद एक बार फिर से भारत को धमकी दी है और पाकिस्तान उसे रोक भी नहीं रहा है। क्या पाकिस्तान यह स्वीकार करने को तैयार है कि आतंकी हमला कहीं भी हो, उससे फर्प नहीं पड़ता। बार-बार पाकिस्तान के दोहरे चेहरे के सबूत मिले हैं। उम्मीद की जाती है कि पाकिस्तान अपने दोहरे चेहरे को बदलेगा और जो वादा किया है उसे निभाएगा भी?

-अनिल नरेन्द्र

वैश्विक आतंकवादी किताब में नया अध्याय, स्कूलों को निशाना बनाना

वैश्विक आतंकवाद की किताब में एक नया अध्याय जुड़ गया है। यह है आतंकवादियों द्वारा स्कूलों को निशाना बनाना। हम प्रार्थना करते हैं ऊपर वाले से कि पेशावर के आर्मी स्कूल में जो कत्लेआम हुआ वह फिर कहीं भी नहीं दोहराया जाएगा पर इसमें हमें संदेह है कि इन जेहादियों की नजरों में यह कोई गलत नहीं है क्योंकि हमलावर तालिबान को इस पर कोई अफसोस नहीं है। उलटा वह इसे जस्टिफाई कर रहे हैं। खैर! हम अपनी बात करें। क्या भारत ऐसे हमले के लिए तैयार है? पाकिस्तान के पेशावर में लीक से हटकर स्कूल और स्कूली बच्चों को निशाना बनाए जाने से भारत सकते में है। गृह मंत्रालय ने स्कूलों और अस्पतालों की सुरक्षा का जायजा लेने की कवायद शुरू कर दी है, वहीं विशेषज्ञों ने आतंकी संगठनों के हमला करने के बदलते तरीके पर सरकार और जनता को सावधान किया है। दुख से स्वीकार करना पड़ता है कि अभी तक भारत की इस दिशा में कोई खास तैयारी नहीं दिखती। स्कूलों में सुरक्षा नाम की कोई चीज ही नहीं। न तो वहां ढंग से सुरक्षा गार्ड्स होते हैं और न ही आने-जाने वालों की कोई चैकिंग ही होती है। सरकारी स्कूलों में तो यह भी नहीं चैक किया जाता कि बच्चों को जो व्यक्ति लेने आया है वह वाकई ही उनके माता-पिता या करीबी रिश्तेदार हैं? विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में कुछ संगठन ऐसे हैं जो कि पाकिस्तानी आतंकी-जेहादी संगठनों की तर्ज पर इस तरह के हमले को अंजाम दे सकते हैं। बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह कहते हैं कि बढ़ते आतंकी खतरे से निपटने का उपाय महज खुफिया तंत्र की चुस्ती और आधुनिक पुलिस तंत्र है। आप सभी स्कूलों-अस्पतालों में सुरक्षा उपलब्ध नहीं करा सकते। दुर्भाग्य की बात यह है कि मोदी सरकार भी आंतरिक सुरक्षा के मामले में यूपीए सरकार के ही ढर्रे पर चल रही है और जुबानी जमा खर्च ही कर रही है। स्मार्ट पुलिस की बात करने वाली सरकार ने पुलिस आधुनिकीकरण और खुफिया तंत्र की मजबूती की दिशा में इतने महीनों से सत्ता में आने के बाद भी एक भी कदम आगे नहीं बढ़ाया है। सेवानिवृत्त मेजर जनरल अफसर करीम का मानना है कि भारत में कुछ जेहादी संगठन ऐसे हैं जो इस तरह की कार्रवाई को अंजाम दे सकते हैं। हालांकि भारत में सक्रिय ऐसे संगठनों के पास अत्याधुनिक हथियार और बड़ी ताकत नहीं है, मगर यह संगठन स्कूलों और अस्पतालों में छोटे स्तर पर ऐसी घटनाओं को अंजाम देने में सक्षम हैं। करीम का यह भी मानना है कि आतंकवाद जिस प्रकार बड़ी चुनौती बन रहा है, उस हिसाब से उससे निपटने की तैयारी नहीं है। उधर गृह मंत्रालय के सूत्रों ने माना कि सरकार ने स्कूलों-अस्पतालों की सुरक्षा का जायजा लेने की पहल शुरू कर दी है। हजारों पुलिसकर्मी वीआईपी की सुरक्षा में लगे हुए हैं। इनको कम करके पुलिसकर्मियों को स्कूलों और अस्पतालों में तैनात करना चाहिए। स्कूलों के प्रशासन को चुस्त करना होगा और जो स्कूल मोटी फीस लेते हैं उन्हें अपने खर्चे पर सिक्यूरिटी गार्ड्स रखने होंगे। इस गंभीर चुनौती पर अविलम्ब कदम उठाने की जरूरत है।