Translater

Tuesday, 6 January 2015

65 साल का योजना आयोग अब नीति आयोग

पिछले पैंसठ साल से विवादास्पद रहे योजना आयोग की विदाई का फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से ऐलान कर दिया था, इसलिए योजना आयोग की असामयिक मौत पर किसी को हैरानी नहीं हुई। हकीकत यह है कि मार्च 1950 में गठित योजना आयोग ने शुरुआती दशकों में निश्चय ही आधारभूत संचना और आर्थिक विकास के मद्देनजर बेहतर काम किया पर कालांतर में वह अपनी प्रासंगिकता खोने लगा था। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को इसकी प्रेरणा तब के सोवियत संघ की पांच वर्षीय योजना प्रणाली से मिली थी। लेकिन नेहरू के जमाने में महज योजना बनाने की जिम्मेदारी तक सीमित इस संगठन ने बाद के दिनों में ऐसी महत्वाकांक्षी उड़ान भरी कि यह केंद्र सरकार के मंत्रालयों और राज्यों तक फंड निर्धारित करने और पहुंचाने वाली ताकतवर संस्था बन गया। राज्यों के मुख्यमंत्री इसके दरवाजे पर दस्तक दर दस्तक देते रहना आम दृश्य बन गया था। योजना आयोग राज्यों पर एक समानांतर केंद्रीय सत्ता की तरह नियंत्रण कर रहा था और उसकी नीतियों और योजनाओं को प्रभावित कर रहा था। भारत के संघीय ढांचे में राज्यों की प्रमुख भूमिका होती है, मगर हालत यह थी कि निर्वाचित मुख्यमंत्रियों को अपने राज्यों के हितों के लिए योजना आयोग के समक्ष याचक बनना पड़ता था। बेशक योजना आयोग ने 12 पंचवर्षीय योजनाएं दीं पर समय के साथ इसके तौर-तरीके में बदलाव नहीं किया गया बल्कि स्थिति यह बन गई थी कि केंद्र और राज्य तथा राज्यों के बीच यह आपसी टकराव का कारण बन गई थी। योजना आयोग का नाम भी प्रधानमंत्री ने बदल दिया है। नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफार्मिंग इंडिया (नीति आयोग) नामक इस संस्था में विभिन्न क्षेत्रों के पांच विशेषज्ञ पूर्णकालिक सदस्य होंगे। चार केंद्रीय मंत्री भी इसमें शामिल होंगे। बहरहाल देखने का असली मुद्दा यह है कि नई संस्था के अस्तित्व में आने से नियोजन प्रक्रिया और विकास की दिशा में क्या फर्प आता है? नई संस्था को स्वरूप देने के मुद्दे पर पिछले महीने मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में प्रधानमंत्री ने टीम इंडिया की भावना पर जोर दिया था। नरेंद्र मोदी की यह बात मुख्यमंत्रियों को रास आई कि विकास योजनाएं बनाने में राज्यों को ज्यादा भूमिका मिलनी चाहिए। इसके बावजूद नई संस्था के ढांचे और कार्यक्षेत्र को लेकर मुख्यमंत्रियों में सहमति नहीं बनी। कई विपक्षी मुख्यमंत्री चाहते थे कि योजना आयोग खत्म करने की बजाय उसके कार्यक्षेत्र व कार्यशैली में बदलाव लाया जाए। नतीजतन नीति आयोग की शुरुआत मतभेदों के बीच हो रही है। अध्यक्ष जहां प्रधानमंत्री खुद होंगे, वहीं उपाध्यक्ष के लिए विश्व प्रख्यात अर्थशास्त्राr खोजा जा रहा है। मोदी की इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हर राज्य को अपनी खास समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है और विकास का एक खांचा हर किसी को रास आ जाए यह मुमकिन नहीं है। इसलिए नीति आयोग में हर राज्य का प्रतिनिधित्व उसकी खास और अनूठी समस्याओं को अलग ढंग से हल करने का उपाय बताएगा। नीति आयोग में टीम इंडिया की झलक तो मिलती है लेकिन सिर्प नाम बदला है या काम का अंदाज भी... यह आने वाला समय बताएगा।

Sunday, 4 January 2015

अमेरिकी इतिहास का सर्वाधिक लम्बा युद्ध समाप्त

अमेरिका और नाटो ने आखिरकार अफगानिस्तान में 13 वर्षों से तालिबान चरमपंथियों के खिलाफ अपने अभियान को गत रविवार को आधिकारिक रूप से खत्म घोषित कर दिया। रविवार को एक समारोह में इंटरनेशनल सिक्यूरिटी असिस्टेंट फोर्स (आईएसएफ) के कमांडर जनरल जॉन कैंपबेल ने सैन्य संगठन के झंडे को उतार कर अभियान का समापन किया। अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 11 सितम्बर 2001 में हुए चरमपंथी हमले के बाद अमेरिका के नेतृत्व में नाटो ने तालिबान सरकार के खिलाफ युद्ध घोषित कर दिया था। एक जनवरी 2015 से अब अफगानिस्तान के एक अंतर्राष्ट्रीय मिशन के तहत आईएसएएफ के केवल 12,500 सैनिक अफगान सुरक्षा बलों के  प्रशिक्षण और मदद के लिए रुके रहेंगे, जिनमें 11000 अमेरिकी सैनिक हैं। करीब 50 देशों के सैनिकों ने जब 2001 में अफगानिस्तान में युद्ध शुरू किया था तो आईएसएएफ का गठन किया गया था। अफगान युद्ध में करीब 3500 अंतर्राष्ट्रीय सैनिक मारे गए थे, जिसमें दो-तिहाई अमेरिकी सैनिक थे। वर्ष 2011 में अंतर्राष्ट्रीय सैनिकों की संख्या बढ़कर सर्वाधिक 1,40,000 हो गई थी, जिसमें 1,01,000 अमेरिकी सैनिक थे। अमेरिका और नाटो सैनिकों के हटने के बाद अफगानिस्तान सरकार के खिलाफ तालिबान हमलों के बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। वैसे भी पिछले एक साल से तालिबानियों के हमले बहुत बढ़ गए हैं। 13 वर्षों के अफगान युद्ध में जितने अंतर्राष्ट्रीय सैनिक मारे गए उससे ज्यादा पिछले 10 महीने में तालिबानों के हमले से अफगान सुरक्षा बलों के जवान मारे गए हैं। अफगान तालिबान ने यह घोषणा करके आने वाले दिनों में टकराव की नई आशंकाओं को हवा दी है कि विदेशी सेनाओं के जाने के बाद अफगानिस्तान में शुद्ध इस्लामी प्रणाली लागू करेगा। रविवार को अंतर्राष्ट्रीय सहायता सुरक्षा बल के युद्धक मिशन को खत्म करने की घोषणा पर शाम को तालिबान ने कहा कि नाटो बल हार गए हैं और बीते 13 सालों में कुछ हासिल किए बिना ही उन्होंने अपना झंडा लपेट लिया है। तालिबान का कहना है कि वो बाकी बचे हमलावरों को खदेड़ कर एक शुद्ध इस्लामी राज्य की स्थापना करेगा। ऐसे में यह सबसे बड़ा सवाल है कि क्या अफगानिस्तान में फिर से तालिबान का कब्जा होगा? लगातार युद्ध ने अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया है। तालिबान हमलों ने उसके इस संकट को और बढ़ा दिया है। गनीमत यही है कि पाकिस्तान के पेशावर स्थित आर्मी स्कूल पर हमले के बाद से तालिबान ताकतों के खिलाफ पाक सेना गंभीर हुई है। अभी तक तो यह था कि पाकिस्तान की सेना अफगानिस्तान के खिलाफ छद्म युद्ध के लिए तालिबानों को मदद दे रही थी। पिछले 20 सालों से अफगानिस्तान में विद्रोह एवं कत्लेआम के लिए पाकिस्तानी सेना ही जिम्मेदार रही। पाक सेना लश्कर और अन्य खूंखार जेहादी संगठनों के जरिये भारत के खिलाफ जिस तरह से खूनी खेल को अंजाम दे रही थी, ठीक वैसा ही खेल वह तालिबान आतंकियों के जरिये अफगानिस्तान में खेल रही थी। यदि अफगानिस्तान में तालिबान मजबूत होता है तो इसका भारत और पाकिस्तान दोनों पर असर पड़ेगा। अफगान सरकार और भारत सरकार को आने वाले दिनों में और चौकस रहना होगा।
-अनिल नरेन्द्र


अमित शाह को क्लीन चिट से बौखला गए कथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को सोहराबुद्दीन शेख और तुलसी प्रजापति की फर्जी मुठभेड़ मामले में सीबीआई अदालत ने बरी कर एक बड़ी राहत दी है। यह फैसला अमित शाह के सियासी कैरियर के लिए एक अहम फैसला है। अध्यक्ष बनने के बाद से एक के बाद एक सियासी सफलताओं के बीच कानूनी मोर्चे पर मिली राहत से अमित शाह ने बड़ी राहत महसूस की होगी। सीबीआई की कोर्ट ने मंगलवार को अमित शाह को राहत देते हुए कहा कि गवाहों के जो बयान दर्ज किए गए हैं वह इतने मजबूत नहीं हैं कि शाह के खिलाफ मुकदमा चलाया जा सके। अदालत ने माना कि सीबीआई इस मामले में सभी कॉल रिकार्ड नहीं जुटा सकी। उसकी जांच बातचीत के विषय के बिना ही चलती रही। स्पेशल सीबीआई जज एमबी गोसवी ने कहा कि सीबीआई इस केस में रुबाबुद्दीन शेख, नईमुद्दीन और अन्य के बयानों पर ही भरोसा करती रही पर उनके बयान इस मामले में अमित शाह को फंसाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। जज ने आगे कहा कि इस मामले में एडीजीपी रायगर का बयान कि उन्होंने बैठक में गैर कानूनी निर्देशों को मानने से इंकार कर दिया भी शाह को फंसाने के लिए पर्याप्त नहीं है। आरोप था कि अमित शाह के गुजरात के गृहमंत्री रहते सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति की साजिशन फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी गई थी। हालांकि गुजरात की पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां शुरू से ही कह रही थीं कि दोनों ही कानून व्यवस्था के लिए खतरा थे। पुलिस के साथ मुठभेड़ में उनको मार गिराया था। लेकिन कांग्रेस और विदेशी पैसों से एनजीओ चलाने के आरोपों से घिरी तीस्ता शीतलवाड़ा जैसे लोग नरेंद्र मोदी और अमित शाह को कठघरे में खड़ा करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे थे। मोदी को तो मौत का सौदागर कहकर उनको मुस्लिमों का दुश्मन और सांप्रदायिकता का प्रतीक ठहराने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। कोर्ट के फैसले के बाद इन सबका झूठ उजागर हो गया। अदालत के फैसले के  बाद यह तय हो गया है कि मोदी और शाह पर जो भी आरोप लगाए गए  वह सोची-समझी रणनीति के तहत राजनीतिक दुराग्रह से लगाए गए थे। एक बार फिर इन कथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं का झूठ उजागर हुआ है पर यह लोग बाज आने वाले नहीं। सोहराबुद्दीन के परिवार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है तो कांग्रेस, वामदलों, तृणमूल कांग्रेस और आप ने अमित शाह को क्लीन चिट मिलने के लिए जांच एजेंसी की कमजोर पैरवी को जिम्मेदार ठहराया और उस पर मोदी सरकार के दबाव में काम करने का आरोप लगाया। कांग्रेस नेता संजय निरूपम ने कहा है कि जो भाजपा सीबीआई पर यह आरोप लगाती थी कि वह कांग्रेस की गोद में बैठी है, वही भाजपा आज सीबीआई का दुरुपयोग कर रही है। जिस सीबीआई ने अमित शाह पर फर्जी मुठभेड़ का मामला चलाया था उसके वकील ने मामले पर महज 15 मिनट ही बहस की। वहीं बचाव पक्ष के वकील ने तीन घंटे तक बहस की। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की ओर से सीबीआई के वकील को मौन रहने का निर्देश था। माकपा नेता सीताराम येचुरी ने भी सीबीआई की विश्वसनीयता पर संदेह जताया। टीएमसी सांसद डैरेक ओ ब्राइन ने कहा कि हम तो पहले से ही कह चुके हैं कि सीबीआई की विश्वसनीयता खत्म हो रही है। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने खुलासा करते हुए कहा कि बिना किसी सबूत और आधार के अमित शाह के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी। ऐसा यूपीए सरकार के दबाव में सीबीआई ने किया था। इसका खुलासा सीबीआई की फाइल में की गई टिप्पणी से स्पष्ट है। इसमें कहा गया था कि अमित शाह पर चार्जशीट दाखिल करना जरूरी है ताकि नरेंद्र मोदी को इस मामले में फंसाया जा सके। हालांकि विरोधी अब सीबीआई पर केस कमजोर करने का आरोप लगा रहे हैं जबकि मामला संप्रग सरकार के समय ही जांच एजेंसी को दिया गया था। उसने गहन जांच-पड़ताल कर अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया। कानून ने अपना काम किया। कम से कम कांग्रेस को तो सीबीआई पर सवाल दागने का हक नहीं है। उसकी सरकार के समय सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को कई बार कड़ी फटकार लगाई, यहां तक कि उसे अदालत ने पिंजरे में बंद तोता तक कहा।

Saturday, 3 January 2015

मलेशिया से जुड़े विमानों का नौ महीने में तीसरा हादसा

मलेशियन एयरलाइंस से जुड़े विमानों का नौ महीने में तीसरा हादसा हो गया है। इंडोनेशिया के सुरवामा शहर से सिंगापुर के लिए उड़ान भरी विमान ने पर पहुंचा नहीं। विमान में 17 बच्चों सहित 162 लोग सवार थे। इंडोनेशियाई एयर ट्रैफिक कंट्रोल से विमान का सम्पर्प उड़ान भरने के 42 मिनट के भीतर ही टूट गया। पायलट ने एटीसी से खराब मौसम के कारण रास्ता बदलने और 38 हजार फुट ऊंचाई पर उड़ने की इजाजत मांगी थी। तब वह 32 हजार फुट की ऊंचाई पर था। इसी दौरान उसका सम्पर्प टूट गया। पिछले नौ महीनों में यह तीसरा हादसा था मलेशिया से जुड़े विमानों का। आठ मार्च को एमएच-370 लापता हुआ था। आज तक पता नहीं चला कि विमान का क्या हुआ। विमान में 239 लोग सवार थे। 17 जुलाई को दूसरा हादसा हुआ जब 298 लोगों को ले जा रहे एमएच-17 पर यूकेन में मिसाइल हमला हुआ था। तीसरा यह है जो 28 दिसम्बर को गायब हुआ विमान मलेशियाई कंपनी एयर एशिया का था। एमएच-370 के गायब होने का रहस्य सुलझा नहीं कि एक और विमान हादसा हो गया। एयर एशिया के विमान का मंगलवार को मलबा मिल गया। इसके साथ ही यात्रियों के शव मिलना भी शुरू हो गए हैं। शुरुआती खबरों में 40 शव मिलने की बात कही गई है। तीन दिन के गहन खोज अभियान के बाद इंडोनेशिया के जावा तट से विमान का मलबा मिला। एयर एशिया-इंडोनेशिया के विमान का उड़ान भरने के दो से ढाई घंटे के बाद एयर ट्रैफिक कंट्रोल से सम्पर्प कटना काफी वैसा ही था जैसे इस वर्ष आठ मार्च को एमएच-370 गायब हो गया था। एयर एशिया-इंडोनेशिया किफायती विमान यात्रा की सेवा देने वाली मलेशियाई कंपनी एयर एशिया का हिस्सा है। एयर एशिया की उड़ानों की हिफाजत, इंतजामों को लेकर पहले से सवाल उठ रहे हैं। 2007 में यूरोपीय संघ ने अपने यहां इसकी उड़ान पर रोक लगा दी थी, इसलिए यह सवाल गंभीरता से उठा है कि क्या ताजा घटना सुरक्षा संबंधी लापरवाही का नतीजा है? अगर इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिला तो मलेशियन एयरलाइंस से यात्रा से पहले मुसाफिरों को कई बार सोचना होगा। बड़ा मुद्दा यह है कि क्या वायुसेवाएं अधिक से अधिक किफायती सेवा देने की होड़ में हिफाजत के बुनियादी इंतजामों पर समझौता तो नहीं कर रही हैं, खासकर विकासशील देशों में, क्या यह विचित्र संयोग है कि इस वर्ष के तीन बड़े हवाई हादसे मलेशियन एयरलाइंस विमानों के साथ ही हुए। इंडोनेशिया और मलेशिया में जेहादी संगठन भी मौजूद हैं। क्या यह हादसे आतंकी घटना तो नहीं? ताजा घटना को अगर हम पहले की दो घटनाओं के साथ जोड़कर देखें तो 2014-15 में यह धारणा बनती है कि विमान यात्रा लगातार असुरक्षित होती जा रही है। विशेषकर इंडोनेशिया और मलेशिया से उड़ने वाले विमानों की। तकनीकी नाकामी की आशंका, सुरक्षा संबंधी लापरवाही तथा अशांत क्षेत्रों के ऊपर से गुजरने की मजबूरी ने उड़ानों के लिए जोखिम बढ़ा दिया है। दुनियाभर की सरकारों व विमानन कंपनियों के आगे इस धारणा को तोड़ने की कठिन चुनौती है वरना विमान सफर से यात्री कतराने लगेंगे।

-अनिल नरेन्द्र

बढ़ने लगी हैं रॉबर्ट वाड्रा की मुश्किलें

सोनिया गांधी के दामाद और प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा भूमि घोटाले में फंसते जा रहे हैं। दोनों हरियाणा सरकार और केंद्र सरकार उन पर शिकंजा कसने लगी है। उनकी जमीन से जुड़े मामले की जांच कर रहे हरियाणा सरकार के दो अधिकारियों की समिति ने पाया है कि जिस समय वाड्रा को गुड़गांव के शिकोहपुर में विवादित जमीन मिली थी उस समय उनकी कंपनी स्काई लाइट हॉस्पिटेलिटी के पास सीमा से अधिक भूमि थी। हरियाणा के लैंड रिकार्ड्स एंड कंसोलिडेशन ऑफ होल्डिंग्स के निदेशक और राजस्व विभाग के अतिरिक्त सचिव ने सरकार को बताया कि रॉबर्ट वाड्रा के पास वर्ष 2008 में 79 एकड़ जमीन थी। हरियाणा सीलिंग एक्ट 1972 के अनुसार एक परिवार या व्यक्ति अधिकतम 53.8 एकड़ जमीन ही अपने पास रख सकता है। अब राजस्व विभाग ने मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से अनुमति मांगी है ताकि वाड्रा के खिलाफ कार्रवाई की जा सके। सरकार को जो रिपोर्ट सौंपी गई है उसमें दोनों अधिकारियों ने एक जैसी बातें कही हैं। यह रिपोर्ट हरियाणा राजस्व मंत्री कैप्टन अभिमन्यु सिंह को सौंपी गई है। यदि इन अफसरों की सिफारिशों को स्वीकार किया जाता है तो रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ कानून के उल्लंघन का मामला बन सकता है और उन्हें दो साल की सजा तक हो सकती है। उधर मोदी सरकार ने रॉबर्ट वाड्रा के विवादित जमीन सौदों और आर्थिक लेन-देन की जांच की दिशा में पहला कदम उठाया है। आयकर विभाग ने इससे जुड़ी पड़ताल शुरू कर दी है। एक अंग्रेजी अखबार ने सूत्रों के हवाले से खबर दी है कि आयकर विभाग ने स्काई लाइट हॉस्पिटेलिटी के मुख्य अधिकारी को नोटिस भेजा है और उन्हें शुक्रवार को बुलाया है। स्काई लाइट हॉस्पिटेलिटी रॉबर्ट वाड्रा की फर्म है। इस फर्म के नाम डीएलएफ के साथ लेन-देन और कार्मिशयल लाइसेंस हासिल करने से जुड़े विवाद के केंद्र में है। फर्म से 2005-06 के बाद से उसकी आयकर सम्पत्तियों की खरीद या बिक्री के एग्रीमेंट का  ब्यौरा देने को कहा गया है। रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि आईटी डिपार्टमेंट ने स्काई लाइट और डीएलएफ के बीच हुई डील, फर्म और ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज के संबंध और हरियाणा में कार्मिशयल कॉलोनी लाइसेंस हासिल करने में खर्च की जानकारी मांगी है। स्काई लाइट हॉस्पिटेलिटी के पास हरियाणा में मानेसर में 3.5 एकड़ और राजस्थान के बीकानेर में 470 एकड़ जमीन है। रिपोर्ट के अनुसार फर्म से अचल सम्पत्ति की खरीद-बिक्री की डिटेल्स के अलावा लोन की डिटेल, बोर्ड मीटिंग के मिनट्स, डायरेक्टरों (जिनमें वाड्रा शामिल हैं) के बारे में जानकारी और फर्म से जुड़े अन्य पक्षों के बारे में जानकारी मांगी है। फर्म से डीएलएफ के लिए लोन के बारे में जानकारी देने और ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज के संबंधों को समझाने को कहा गया है। आईएस अशोक खेमका की आपत्ति के बाद वाड्रा लैंड डील मामले से गायब पन्नों का अलग मामला चल रहा है। इस मामले में जांच के लिए गठित कमेटी को 10 दिन का समय दिया गया था। सोमवार को यह समय पूरा हो गया है, लेकिन रिपोर्ट नहीं आई है। इन सब आरोपों, कार्रवाइयों के बीच कांग्रेस ने रॉबर्ट वाड्रा से संबंधित मामलों को उठाते हुए कहा है कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद के खिलाफ किश्तों में मानहानि अभियान चलाया जा रहा है। पार्टी प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि हम पहले ही पूरी तरह से सब दिखा चुके हैं और कुछ भी नहीं बल्कि किश्तों में चलाया जा रहा मानहानि अभियान है.... यह कुछ नहीं बल्कि एक मुद्दे को खींचने वाली बात है जिसमें उच्चाधिकारियों की तीन सदस्यीय समिति को  कोई अनियमितता नहीं मिली है। सिंघवी ने कहा कि हरियाणा सरकार द्वारा गठित समिति ने कोई अनियमितता नहीं पाई थी। अब एक नई सरकार और नए मुख्यमंत्री ने प्रदेश की कमान संभाली है और उसके बाद पहले वाली तीन अधिकारियों की जगह एक नई समिति का गठन किया गया है। यह कतई उचित नहीं है।

Friday, 2 January 2015

मजीठिया से ड्रग्स तस्करी में पूछताछ, मामला गंभीर है

ड्रग्स के धंधे में कथित लिप्तता को लेकर पंजाब के राजस्व मंत्री विक्रम सिंह मजीठिया से प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की पूछताछ से इतना तो साफ हो गया है कि पंजाब में ड्रग्स की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है। पंजाब के फतेहगढ़ साहिब में मार्च 2013 में कनाडा के एक एनआरआई अनूप सिंह कहलों की गिरफ्तारी से छह हजार करोड़ के अंतर्राष्ट्रीय ड्रग तस्करी का खुलासा हुआ था। ड्रग तस्करी में गिरफ्तार बर्खास्त डीएसपी जगदीश भोला ने नवम्बर में इस ड्रग रैकेट में विक्रम सिंह मजीठिया के शामिल होने का आरोप लगाया था। भोला के खुलासे के आधार पर अमृतसर के फार्मा कंपनी चलाने वाले नेता बिट्टू औलख और जगदीश सिंह चहल को भी पूछताछ कर गिरफ्तार किया गया था। विक्रम सिंह मजीठिया अकाली दल के कद्दावर नेता हैं। मोदी सरकार में मंत्री हरसिमरत कौर के छोटे भाई हैं और डिप्टी सीएम सुखबीर सिंह बादल के साले। पंजाब सरकार में महत्वपूर्ण राजस्व विभाग के मंत्री हैं। चहल के अनुसार मजीठिया ने भारत यात्रा के दौरान एनआरआई सत्ता को दो सुरक्षाकर्मी और एक ड्राइवर मुहैया कराया था। सूत्रों के मुताबिक मजीठिया को हवाला के जरिये 70 लाख रुपए दिए जाने के आरोप सामने आए हैं। चहल मादक पदार्थ बनाने के लिए एफेड्रिन और स्यूडोफिड्रेन कैमिकल की आपूर्ति करता था। रेडियो पर मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंजाब में नशे के फैलते जाल का मुद्दा उठाया था। लोकसभा चुनाव के दौरान पंजाब में मादक पदार्थ तस्करी को रोकने का भी मोदी ने वादा किया था और सत्ता में आने के बाद इस पर तेजी भी दिखाई है। आज पंजाब की स्थिति यह है कि हर 10 व्यक्तियों में चार पुरुष नशे के शिकार हैं। 50 फीसदी नशैड़ियों में युवा वर्ग और किसान हैं। 15  फीसदी करते हैं भुक्की का सेवन। 550 से 600 किलो तक हेरोइन का उत्पादन अफगानिस्तान में, 10 टन हेरोइन की तस्करी होती है भारत में। यहां से पाकिस्तान से लगी सीमा पर अंतर्राष्ट्रीय ड्रग्स तस्कर सक्रिय हैं। तीन से चार लाख पंजाब में, आठ-दस लाख हेरोइन की कीमत दिल्ली में है और यही कीमत 16-20 लाख हो जाती है मुंबई पहुंच कर हेरोइन की। अब तक यह कहा जाता रहा है कि जानलेवा नशों की जकड़ जिस तरह से समाज में बढ़ रही है, वह किसी किस्म के राजनीतिक संरक्षण के बिना संभव नहीं है। लेकिन इस संबंध में सरकारी तौर पर बाकायदा किसी राजनेता से सवाल पूछे जाने का यह पहला मौका है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले चुनावों के दारन इसे मुद्दा बनाने की कोशिश की तो सभी उन पर ऐसे टूट पड़े जैसे उन्होंने पंजाब का घोर अपमान कर दिया हो। उस समय उनसे सार्वजनिक माफी की मांग करने वालों में भाजपा और अकाली दल के लोग सबसे आगे थे। यह भी दिलचस्प है कि उधर ईडी ने मजीठिया से पूछताछ शुरू की इधर भाजपा ने उनके खिलाफ कमर कस ली। एबीवीपी ने सड़क पर उतरकर मजीठिया से इस्तीफे की मांग शुरू कर दी। अगले ही महीने की 12 तारीख से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ड्रग्स के इस्तेमाल के खिलाफ वहां राज्यव्यापी अभियान शुरू करने वाले हैं। भाजपा की इन गतिविधियों की अहमियत इस बात से बढ़ जाती है पार्टी उस प्रांतीय सरकार में शामिल है जिसमें मजीठिया आज भी राजस्व मंत्री हैं। मजेदार बात यह भी है कि भाजपा की सहयोगी पार्टी शिरोमणि अकाली दल ने पाकिस्तान से मादक पदार्थों की तस्करी रोकने हेतु बीएसएफ पर दबाव बनाने के लिए पांच जनवरी से अंतर्राष्ट्रीय सीमा  पर धरना देने की घोषणा की है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि अकाली सारा दोष केंद्र पर मढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि भाजपा अगला चुनाव अकाली दल के साथ लड़ेगी या उसके खिलाफ?
-अनिल नरेन्द्र


टीम इंडिया के कैप्टन कूल का टेस्ट से संन्यास

कहा जाता है कि क्रिकेट अनिश्चिंताओं का खेल है और जिस तरह टीम इंडिया के कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धोनी ने टेस्ट से रिटायरमेंट की घोषणा की है इसे साबित करता है। भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे सफल टेस्ट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने मंगलवार शाम टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने का ऐलान कर अपने फैंस को ही नहीं बल्कि खुद साथी खिलाड़ियों व बीसीसीआई को हैरान कर दिया। किसी मैच में टीम इंडिया जब जीत की दहलीज तक पहुंचती थी तब दर्शकों को बस एक ही चीज का इंतजार रहता था कि कप्तान धोनी का विजय दिलाने वाला हेलीकाप्टर शॉट का। छह वर्षों से भारत का नौजवान आक्रामक क्रिकेट पीढ़ी का चेहरा बनकर चमकते धोनी टीम के बुरे वक्त में ऐसे अचानक साथ छोड़ जाएंगे यह किसी की कल्पना में भी नहीं रहा होगा। धोनी की बारी बेशक तीसरे टेस्ट मैच के बाद आई जिसमें भारतीय टीम बमुश्किल हार टाल पाई थी, लेकिन दो जीतों के साथ आस्ट्रेलिया बाकायदा चार मैचों की यह श्रृंखला जीत चुका है और बचा हुआ एक मैच तो औपचारिकता भर रह गया है। क्या बेहतर नहीं होता कि आखिरी मैच की यह औपचारिकता पूरी होने तक महेंद्र सिंह धोनी अपनी टीम के साथ उसकी नियति साझा करते? आज सभी अटकलें लगा रहे हैं कि धोनी ने संन्यास लेने का यूं आखिर क्यों फैसला किया। विदाई की छह संभावित वजहें हो सकती हैं। धोनी ने टीम के साथियों को दी भावुक स्पीच में बताया कि वह टीम पर बोझ नहीं बनना चाहते थे। धोनी ने कहा कि तीनों फार्मेट (टेस्ट, वन डे और टी-20) में खेलना उनके लिए मुश्किल हो रहा है। तीसरी वजह यह हो सकती है कि धोनी की कप्तानी में टीम ने विदेशों में 30 टेस्ट खेले, जिनमें महज छह में जीत मिली और 15 हार गए। पिछले कुछ समय से धोनी अच्छी बल्लेबाजी का प्रदर्शन नहीं कर पा रहे थे। लंबे समय से वापसी को जूझते दिखे। पांचवीं वजह ः चर्चा है कि टीम में विराट कोहली के बढ़ते कद ने भी धोनी को रिटायरमेंट के लिए मजबूर किया होगा और अंतिम वजह यह भी हो सकती है कि आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग में बार-बार नाम आने से भी धोनी की इमेज थोड़ी धुंधली हुई। वह चेन्नई सुपर किंग्स की कप्तानी छोड़ने का प्रस्ताव भी रख चुके हैं। धोनी अभी 33 वर्ष के हैं और बढ़ती उम्र के साथ तो अमूमन क्रिकेटर एक दिवसीय जैसे छोटे फार्मेट वाले खेल से संन्यास लेता है ताकि टेस्ट क्रिकेट खेल सकें। इसके बावजूद यह कहना होगा कि रांची जैसे छोटे से शहर और बेहद मामूली पृष्ठभूमि से निकलकर भारतीय टीम का कप्तान बनने तक का धोनी का सफर युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणादायी रहा है। वह उस वक्त टीम इंडिया से जुड़े जब टीम में सचिन तेंदुलकर, सौरभ गांगुली, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण और अनिल पुंबले जैसे दिग्गजों के साथ ही वीरेंद्र सहवाग जैसे समकालीन की मौजूदगी थी। इसके बावजूद कम समय में ही धोनी ने न सिर्प अपनी जगह ही बनाई बल्कि जल्द ही चयनकर्ताओं का भरोसा भी हासिल किया। वास्तव में एक दिवसीय और टी-20 में विश्व कप दिलाने जैसी उनकी चमकीली उपलब्धियों को टेस्ट मैचों में दिलाई गई सर्वाधिक जीतों के साथ जोड़कर देखें तो धोनी की जोड़ का कोई दिखता नहीं है। बेशक सौरभ गांगुली ने टीम इंडिया में लड़ने का जज्बा पैदा किया, मगर यह धोनी थे जिनकी अगुवाई में भारतीय क्रिकेट टीम दुनिया में नम्बर वन टेस्ट टीम बन सकी। लेकिन आईपीएल क्रिकेट फिक्सिंग विवादों में पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में जब विवादित बीसीसीआई अध्यक्ष श्रीनिवासन पर फिक्सिंग के आरोप खुलकर लगे साथ-साथ धोनी का नाम भी उछला, तभी से आशंका गहराने लगी थी। धोनी पर फिक्सिंग के आरोप तो खुलकर नहीं लगे लेकिन उन पर प्रभाव में आने की आशंका तो गहराती गईöआखिरकार वह श्रीनिवासन की ही कंपनी में वरिष्ठ अधिकारी थे और उन्हीं की टीम की कप्तानी भी संभाल रहे थे। क्रिकेट आंकड़ों का खेल है और पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि धोनी टीम में वह जज्बा पैदा नहीं कर पा रहे थे जिससे जीत मिलती। लगता है कि अब टीम इंडिया की टेस्टों में विराट कोहली कप्तानी संभालेंगे। बेशक विराट कोहली के रूप में टीम इडिया को धोनी का उत्तराधिकारी जरूर मिल गया है मगर मैदान में महेंद्र सिंह धोनी और कैप्टन कूल की कमी जरूर खलेगी।