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Friday, 9 January 2015

आंतरिक सुरक्षा पर अनर्गल बयानबाजी

देश पर आतंकवाद का खतरा जबरदस्त तरीके से मंडरा रहा है। उत्तरी सीमा पर पाकिस्तान युद्ध जैसे हालात पैदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। भारत के सीमावर्ती गांवों के नागरिकों को हर पल मौत का सामना करना पड़ रहा है। कई जानें जा चुकी हैं और इधर पाक की आतंकी नाव को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच सियासी बयानबाजी शुरू हो गई है। कांग्रेस ने केंद्र की भाजपा सरकार पर इस मामले को जबरन सनसनीखेज बनाने का आरोप लगाया है। मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए कांग्रेस प्रवक्ता अजय कुमार का कहना है कि मोदी सरकार इस मामले को बढ़ाचढ़ा कर पेश कर रही है। मामले में अब तक कई पहलू सामने आ चुके हैं और ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे साबित हो सके कि गुजरात के पोरबंदर में समुद्री सीमा में संदिग्ध नाव एक बड़े आतंकी हमले का हिस्सा थी। उन्होंने भारतीय तटरक्षक बल के ऑपरेशन पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि अभी तक किसी तरह की बरामदगी नहीं हुई है। उन्होंने सरकार से इस ऑपरेशन के बारे में और संदिग्ध नाव के पीछे शामिल आतंकी संगठन के नाम का खुलासा करने की मांग की है। क्या यह नाव मछुआरों की नाव थी जिसे आतंकी नाव बता दिया गया? वहीं कांग्रेस के आरोपों पर पलटवार करते हुए भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि कांग्रेस एक बार फिर पाक को ऑक्सीजन दे रही है। जब 26/11 आतंकी हमला हुआ था, उस वक्त भी कांग्रेसी नेता अजीबोगरीब बयान दे रहे थे। वे संघ की ओर इशारा कर रहे थे। जब बटला हाउस मामला सामने आया तो आतंकवादियों की मौत पर सोनिया जी आंसू बहा रही थीं, ऐसा खुद उनके नेता सलमान खुर्शीद ने कहा था। कांग्रेस-भाजपा में जिस तरह आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल रहा है वह किसी भी दृष्टि से सही नहीं। आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला यही बता रहा है कि हमारे देश में किस तरह आंतरिक सुरक्षा के मामले में भी संकीर्ण स्वार्थों की राजनीति करने से बचा नहीं जाता। सबसे गंभीर बात यह है कि ऐसा यह जानते हुए भी किया जाता है कि इससे उन तत्वों को ही बल मिलेगा जो भारत के लिए खतरा बने हुए हैं। निश्चित रूप से ये आरोप-प्रत्यारोप बहुत गंभीर हैं। ऐसे नाजुक दौर में जब पाकिस्तान चौतरफा भारत पर हमला बोलने में लगा हुआ है, वह आतंकियों को खुलेआम पनाह दिए हुए है, तो भारतीय सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर सवाल उठाना राष्ट्र विरोधी ताकतों को बढ़ावा देने जैसा होगा। थोड़ी देर के लिए यदि इस तर्प को मान भी लिया जाए कि उस नाव के आतंकियों से संबंध नहीं थे, तो भी उसकी हरकतें संदिग्ध थीं ही। इस बात को स्वीकार करने में किसी को हिचक नहीं होनी चाहिए। समुद्र के बीच अपने को विस्फोटों से उड़ा लेने की घटना किसी आत्मघाती आतंकी ग्रुप का ही काम है। एक ड्रग्स से भरी नाव को ड्रग तस्कर उड़ाने से रहे? चाहे थल हो या जल, आत्मघाती दस्तों को पकड़ना लगभग असंभव होता है। इसलिए कांग्रेस का यह कहना कि आतंकियों को पकड़ना चाहिए था, बचकाना तर्प लगता है। देश की सुरक्षा, हमारे सुरक्षा बलों के मनोबल को ध्यान में रखते हुए इस तरह की अनर्गल बयानबाजी से बचना चाहिए।

-अनिल नरेन्द्र

एक बार फिर अमेरिका का आतंकवाद पर दोहरा चेहरा बेनकाब

पाकिस्तान से भारत में हो रही आतंकी वारदातों से नजरें फेरते हुए, उसे नजरअंदाज करते हुए एक बार फिर अमेरिका ने आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई पर सर्टीफिकेट दे पाक को आर्थिक इमदाद बढ़ाने का रास्ता साफ कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे से दो हफ्ते पहले वाशिंगटन के इस रुख का तीखा विरोध भारत ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाक की पीठ ठोंके जाने पर भारत को कोई अचम्भा नहीं हुआ। अमेरिका दूसरे आतंकवादी संगठनों और खासकर अलकायदा, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद को प्रमाण पत्र देने के फैसले से खुद बेनकाब हुआ है। उसके दोहरे मापदंड का सबूत है। आश्चर्य नहीं कि अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी की आगामी इस्लामाबाद यात्रा तक अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पाक को डेढ़ अरब डॉलर की राशि देने की घोषणा भी कर दी। आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई के पाकिस्तान के ढोंग को मान्यता देकर अमेरिका एक बार फिर मुगालते का शिकार हुआ है, यह जानते हुए कि यह इमदाद पाकिस्तान भारत के खिलाफ ही इस्तेमाल करेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति की प्रस्तावित भारत यात्रा के पूर्व विदेश मंत्री जॉन कैरी का पाकिस्तान को अलकायदा, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद सरीखे आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई का प्रमाण पत्र जारी करना पाकिस्तानी आतंकवाद की नित नई साजिशें झेल रहे भारत के जले पर नमक छिड़कने जैसा है, अमेरिका अपनी ही उन रिपोर्टों को नजरअंदाज कर रहा है जिनमें साफ कहा गया कि पाकिस्तान दुनिया में आतंकवाद का सबसे  बड़ा अड्डा है और अपनी जमीन पर आतंकवादी नर्सरी चलाकर केवल भारत के लिए ही नहीं बल्कि विश्व शांति के लिए गंभीर चुनौती बन रहा है। अमेरिका पाकिस्तान को जिन आतंकी संगठनों के खिलाफ लड़ाई लड़ते देख रहा है वे तो वहां पर फल-फूल रहे हैं। कम से कम लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के बारे में तो यह पक्का कहा जा सकता है। क्या अमेरिका यह नहीं जानता कि लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। अमेरिका अपने स्वार्थ के लिए किसी भी दोस्त को नजरअंदाज कर सकता है। चूंकि अमेरिका अफगानिस्तान से भागने की तैयारी कर रहा है और इसमें पाकिस्तान की उसे जरूरत है, इसलिए वह पाकिस्तान में फल-फूल रहे भारत विरोधी आतंकी संगठनों को नजरअंदाज कर रहा है और उलटा इन जेहादी संगठनों को ही बढ़ावा दे रहा है। भारत के खिलाफ अपनी जमीन से युद्ध छेड़े आतंकियों को पाकिस्तानी प्रश्रय के लिए किसी साक्ष्य की जरूरत नहीं है। क्योंकि भारत में हुए 26/11 हमले का मास्टर माइंड हाफिज सईद और 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट का खलनायक दाउद इब्राहिम पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के संरक्षण में ही न केवल फल-फूल रहे हैं बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुंच कर भारत को अशांत और अस्थिर करने की हर साजिश में जुटे हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि अमेरिका का वास्तविक एजेंडा दुनिया में हथियारों की होड़ बनाए रखकर हथियार निर्माता कंपनियों को लाभ पहुंचाने का अधिक है और आतंकवाद से लड़ना कम।

Thursday, 8 January 2015

विवादित फिल्म पीके पर गहराते संकट के बादल

निर्माता राज कुमार हिरानी की फिल्म पीके पर विवाद बढ़ता जा रहा है। भारत के विभिन्न शहरों में इस फिल्म के विरोध में धरने, पदर्शन, सिनेमा हॉलों में तोड़फोड़ हो रही है। उत्तर पदेश उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने पीके के विरुद्ध दायर एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जानकारी तलब की है कि वह एक सप्ताह के अंदर अपना पक्ष पस्तुत करे। यह आदेश न्यायमूर्ति इम्तियाज मुर्तजा व न्यायमूर्ति रितुराज अवस्थी की खंडपीठ ने हिंदू पंट फॉर जस्टिस की ओर से दायर जनहित याचिका पर दिया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि फिल्म पीके में धर्म विशेष की भावनाओं को आहत करने संबंधी दृश्य दिखाए गए हैं। कहा गया है कि फिल्म सेंसर बोर्ड ने गैरकानूनी तरीके से इस फिल्म के पदर्शन की इजाजत दी है। याचिका में मांग की गई है कि पीके के पदर्शन पर रोक लगाई जाए तथा इसके पदर्शन के लिए जारी पमाण पत्र को खारिज किया जाए। मैंने पीके फिल्म देखी है। अपनी-अपनी राय हो सकती है। बहुतों को फिल्म एक अच्छी एंटरटेनमेंट फिल्म लगी तभी तो यह रिकॉर्ड तोड़ बिजनेस कर रही है। 19 दिसंबर को रिलीज हुई इस फिल्म ने 300 करोड़ से ऊपर बिजनेस कर लिया है। अब तक का रिकॉर्ड आमिर खान की ही फिल्म धूम-3 का था जो कि 271.82 करोड़ का धंधा कर सकी थी। मेरा मानना है कि यह फिल्म सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए बनाई गई। इसमें पैसे कमाने के लिए हिंदू धर्म, रीति रिवाजों, भावनाओं, परंपराओं का भद्दा मजाक किया गया है। फिल्म के बारे में यह कहना कि यह सभी धर्मों के आडम्बरों को निशाने पर लेती है इसलिए सही नहीं है कि यह दूसरे धर्मों को इस पकार अंदर घुस कर नहीं कुरेदती जिस पकार हिंदू धर्म को निशाने पर लेती है। क्या कारण है कि जब धार्मिक आडम्बरों की चर्चा किसी मंच या फिल्मों में होती है तो चोट सदैव ही हिंदू धार्मिक भावनाओं पर होती है। इससे पहले एक फिल्म ओ माई गॉड भी इसी लाइन पर थी। मैं फिल्म के कई दृश्यों का उदाहरण दे सकता हूं। फिल्म में शिव जी का अपमान किया गया है। शिव जी पुराणों एवं सनातन धर्म की कथाओं में इस तरह घटिया और कायर मजाक का विषय कभी नहीं रहे जिसने हाथ जोड़ कर अपने दो पुत्रों की दुहाई दी हो और जो पीके से डर के मारे छिपता रहे। पीके का यह कहना कि गणेश और कार्तिकेय इतने छोटे भी नहीं हैं बिल्कुल आपत्तिजनक है। गणेश और कार्तिकेय दोनों ही सनातन धर्म के अराध्य देवता हैं। इस फिल्म में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि लोग डर और लालच के लिए ही मंदिर जाते हैं। उम्मीद बहुत बड़ी चीज होती है और इस उम्मीद पर ही लोग जीते है और जीवन की कठिन यात्रा को पार करते हैं। लोग मंदिर इसी उम्मीद की खातिर जाते हैं ताकि उनके संकट दूर हों इसलिए नहीं कि वह किसी डर या लालच के मारे होते हैं। पान की एक पत्थर पर लगाकर मूर्ति बनाकर मंदिरों में देवी देवताओं पर कटाक्ष करने का पयास किया गया है। पूरी फिल्म लगभग ढाई घंटे की है और उसमें 90 पतिशत फिल्म मंदिर के साधु-संतों एवं मूर्तियों का उपहास उड़ाया गया है जबकि सिर्फ कुछ देर अन्य की बात की गई है। एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के अनुसार जिस कला राम मंदिर नासिक में आमिर खान को लेटते हुए दिखाया गया है वहां मंदिर वालों ने मना कर दिया था। फिर फिल्म के निर्माताओं ने ट्रस्ट को 25000 रुपए दान दिए तब जाकर यह सीन शूट हो सका। इसी तरह एक सीन में आमिर खान एक चर्च में जाते हैं और अपने साथ पूजा की थाली और एक नारियल ले जाते हैं जिससे वह जीसस की पतिमा के सामने फोड़ना चाहते थे। यह सीन जयपुर के आल सेट्स चर्च में शूट हुआ था। चर्च वालों ने आमिर को चर्च के ऊपर नारियल फोड़ने के लिए साफ मना कर दिया था। फिर समझौता यह हुआ कि वह थाली -नारियल के साथ चर्च में जाएगा पर नारियल फोड़ेगा नहीं। अगर आप सीन को गौर से देखें तो नारियल को चर्च के उढपर फोड़ते नहीं दिखाया गया। बस फोड़ने का एक्शन किया गया। और मजेदार बात यह है कि निर्माता राज कुमार हिरानी मुंबई से एक जीसस का कास बना कर लाए थे जो उन्होंने उस चर्च को भेंट किया। पैसा देकर शूट करने वाले हिरानी और आमिर खान ने यह फिल्म सिर्फ पैसा कमाने के लिए बनाई है, जो वर्ग आज पीके के समर्थन में खड़ा है वो बताए कि यदि इस फिल्म में मुस्लिम समाज या ईसाई समाज के पति कोई अंश होते तो क्या इस फिल्म को वह चलने देते या इस फिल्म को इसी पकार टैक्स फी किया जाता और बिना संपादन के चलने दिया जाता? जो लोग पीके के विरोध को समाज की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए बड़ा खतरा मान रहे हैं वो मात्र एक बात बता दें कि भारत में सलमान रुश्दी और तसलीमा नसरीन की पुस्तकों को पतिबंधित क्यों कर रखा है? क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं है? इससे भी आगे जाकर जब लेखक तसलीमा नसरीन ने भारत में शरण मांगी थी तो उन्हें भारत में रहने तक की अनुमति नहीं मिली। तब भी भारत की आधुनिकता को कोई हानि नहीं हुई थी। इसी पकार सलमान रुश्दी को 2010 में जयपुर के साहित्य सम्मेलन में आने से रोक दिया गया और भारी विरोध के कारण वो कोलकाता भी नहीं जा सके। सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म में दोबारा किसी भी कांट-छांट से साफ इंकार कर दिया है परंतु कितनी ही फिल्में हैं जिनके पदर्शन को भी पतिबंधित किया गया था। हाल ही में दक्षिण भारतीय फिल्म शिवम में से 4 मिनट के दृश्य सेंसर बोर्ड ने हटाए हैं जिनमें दिखाया गया है कि किस पकार मुस्लिम शिक्षकों द्वारा हिंदू मंदिरों को तोड़ा गया था। क्योंकि फिल्म के इन दृश्यों पर मुस्लिम समाज को काफी आपत्ति थी। पीके फिल्म का विरोध तो मुस्लिम धार्मिक नेता तक कर रहे हैं। यह बहुत दुख की बात है कि महज पैसा कमाने के लिए यह फिल्म वाले हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ही टारगेट करते हैं। मुझे तो यह आमिर खान की अब तक की सबसे खराब फिल्म लगी है। जैसा मैंने कहा, अपनी-अपनी राय हो सकती है।

-अनिल नरेंद्र

Wednesday, 7 January 2015

ओबामा की यात्रा से पहले हमलों की खतरनाक आतंकी साजिशें

पाकिस्तान में स्थित आतंकी संगठन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा से पहले देश में  बड़ा हमला करने की फिराक में है। इसी के चलते सीमा पर पाकिस्तान की ओर से लगातार फायरिंग की जा रही है। खुफिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि एलओसी और अंतर्राष्ट्रीय सीमा समेत कुल आठ स्थानों पर आतंकी बड़ा हमला करने की साजिश रच रहे हैं। इस साजिश में पाक सेना भी इन जेहादी संगठनों का साथ दे रही है। मालूम हो कि बराक ओबामा 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस समारोह में भाग लेने भारत आ रहे हैं। पाकिस्तान की इसी नीति का एक नतीजा था 26/11 जैसे आतंकी हमले की साजिश। एक जनवरी को तड़के भारतीय कोस्ट गार्ड ने पोरबंदर से 365 किलोमीटर दूर भारतीय समुद्री सीमा में घुसी एक पाकिस्तानी नाव को रोका। इसमें विस्फोटक थे। कोस्ट गार्ड की घेराबंदी की वजह से नाव में सवार चार आतंकियों ने विस्फोट कर नाव को उड़ा दिया जिससे वह समुद्र में डूब गई। बढ़ते आतंकी खतरे के बावजूद नरेंद्र मोदी सरकार पिछले सात महीनों में आतंकी मंसूबे को रोकने में फिलहाल कामयाब रही है। सुरक्षा विशेषज्ञ इसका श्रेय एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल और बेहतर जवाबी कार्रवाई को देते हैं। कराची से विस्फोटकों से लदे जहाज के चलने की छोटी खुफिया सूचना को विकसित कर तटरक्षक बल को ठोस कार्रवाई के लायक पुख्ता जानकारी मुहैया कराना इसका ताजा उदाहरण है। अरब सागर में मौजूद सैकड़ों जहाजों के बीच आतंकी व विस्फोटकों से लदी नौका की पहचान कर उसे रोकने की सफलता हैरत की बात है और हम सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों को इस कामयाबी पर बधाई देना चाहते हैं। आंतरिक सुरक्षा से जुड़े गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि मोदी सरकार आने के बाद आतंकी खतरे में कई गुना इजाफा हुआ है। मोदी सरकार के आने के  बाद पुणे और बेंगलुरु में सिमी आतंकियों के कम क्षमता वाले विस्फोटों के अलावा कोई बड़ा आतंकी हमला नहीं हुआ है। यहां तक कि जम्मू-कश्मीर में भी सेना के कैंप पर हमले के अलावा लश्कर के मंसूबे भी कामयाब नहीं हो पाए हैं। गुजरात के करीब पाकिस्तानी नौका से आ रहे आतंकी मंसूबों को नाकाम करने में बड़ी भूमिका मुंबई हमले से मिले सबक की भी है। 26/11 के बाद देश की समुद्री सीमा पर निगरानी के लिए बड़े पैमाने पर इंतजाम किए गए। भारत ने पिछले छह सालों में नौसेना और तटरक्षक बल के 51 स्टेशनों को जोड़ा है, साथ ही भारतीय तट रेखा पर 36 रॉडारों का नेटवर्प भी तैयार किया है। इसके अलावा बड़े पैमाने पर तटीय पुलिस केंद्र बनाए गए हैं। मानवीय सूचना तंत्र को मजबूत करने के लिए नौसेना और तटरक्षक बल के साथ ही जहाजरानी मंत्रालय ने तटीय इलाकों में भारतीय मछुआरों से जानकारी हासिल करने का इंतजाम भी दुरुस्त किया है। भारतीय खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलों के लिए आगामी दिन चुनौतीपूर्ण हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा पर यह जेहादी संगठन अपनी हरकतों से बाज आने वाले नहीं। हमें पूरी तैयारी रखनी होगी।

-अनिल नरेन्द्र

मायावती दलित की नहीं, दौलत की बेटी हैं

पार्टी में इन दिनों हाशिये पर डाले गए कभी मायावती के बेहद भरोसेमंद लोगों में शुमार जुगुल किशोर ने बहन जी पर धन लेकर टिकट बेचने का आरोप लगाया है। बसपा से सभी तरह की जिम्मेदारियों से हटाए जाते ही राज्यसभा सांसद जुगुल किशोर ने पार्टी सुप्रीमो के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। जुगुल किशोर ने रविवार को कहा कि माया दलित की नहीं, दौलत की बेटी हैं। पार्टी में कोई काम बिना पैसे के नहीं होता। चुनावों में टिकट भी जेब ढीली करने पर ही मिलता है। जैसा उम्मीदवार वैसी कीमत। विधानसभा चुनाव के लिए 50 लाख रुपए से दो करोड़ रुपए तक लिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि मैंने वसूली का विरोध किया तो मुझे पार्टी की जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया। मायावती के स्वजातीय जुगुल किशोर की अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि वे बिहार व दिल्ली के प्रभारी थे। इससे पहले वे गोरखपुर, फैजाबाद, देवीपाटन और बस्ती मंडल के चीफ को-आर्डिनेटर रहे हालांकि लोकसभा चुनाव से ऐन पहले उनसे यह जिम्मेदारी छीन ली गई थी। जुगुल किशोर के इस आरोप के जवाब में बहन जी ने कहा कि जुगुल किशोर अपने बेटे के लिए विधानसभा की टिकट मांग रहे थे। मैंने तय किया हुआ है कि पार्टी में परिवारवाद नहीं चलेगा। उन्हें मना किया तो पार्टी विरोधी गतिविधियों में लग गए। वह अपना रास्ता अलग बना रहे हैं। अब उनसे कोई बात नहीं करेगा। यह बात मायावती ने रविवार को पार्टी के पदाधिकारियों की बैठक में कही। गत मई में बसपा के पूर्वी उत्तर प्रदेश के जोनल समन्वयक पद से और शनिवार को दिल्ली तथा बिहार के पार्टी प्रभारी पद से हटाए गए जुगुल किशोर ने यह भी दावा किया कि अगर निष्पक्ष जांच हो तो बसपा के कई विधायक मायावती द्वारा चुनाव टिकट बेचे जाने की गवाही देकर उन्हें बेनकाब कर सकते हैं। मायावती को दुनिया की सबसे धनी राजनेता बताते हुए किशोर ने कहा कि पिछले कुछ समय से दलित मिशन को किनारे करके मनी मिशन शुरू कर दिया गया है। लखनऊ, नोएडा तथा दिल्ली में बहुजन प्रेरणा केंद्रों की स्थापना में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों के आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि दलितों के खून-पसीने की कमाई से बने इन केंद्रों को बाद में ट्रस्ट में तब्दील कर दिया गया। खुद मायावती, उनके भाई आनंद तथा करीबी विश्वास पात्र सतीश चन्द्र मिश्र उसके ट्रस्टी बन गए। मायावती पर पहले भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं। वैसे बसपा अकेली नहीं जिस पर टिकटों को बेचने के आरोप लगे हों, दोनों कांग्रेस और भाजपा पर भी ऐसे ही आरोप लगे हैं। भारत की सियासत में अब पैसे का बहुत जोर हो चुका है। बिना पैसे के अब कुछ नहीं होता। बसपा पिछले कुछ दिनों से भारत की राजनीति में थोड़ा हाशिये पर चली गई है। मायावती से पार्टी के सांसद व पूर्व सांसद अब संभल नहीं रहे। बहुजन समाज पार्टी को नए सिरे से अपने वोट बैंक को जोड़ने का गंभीर प्रयास करना होगा ताकि उत्तर प्रदेश के अगले विधानसभा चुनाव में वह एक सियासी शक्ति के रूप में उभर सके।

Tuesday, 6 January 2015

पाकिस्तान भारत को पूरक युद्ध की ओर धकेल रहा है

नव वर्ष की पूर्व संध्या पर जब सारी दुनिया में नए साल आने की खुशियां मनाई जा रही थीं तब पाकिस्तानी सैनिक जम्मू-कश्मीर में हमारे सैनिकों पर गोलियों की बौछार कर रहे थे। जम्मू-कश्मीर चुनाव में अलगाववादियों को ठेंगा दिखाकर कश्मीर की अवाम की चुनाव में सफल हिस्सेदारी और घाटी में लोकतंत्र की मजबूत होती जड़ से परेशान पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई अपनी कश्मीर नीति में  लगता है बड़ा बदलाव कर रही है। भारतीय खुफिया एजेंसियों ने सरकार को सतर्प किया है कि इस सफल चुनाव के बाद राज्य में ठोस और स्थायी सरकार नहीं बन पाई तो पाकिस्तान को घाटी में नए जटिल हालात पैदा करने में काफी मदद मिलेगी। आईबी के उच्चपदस्थ सूत्र ने बताया कि जम्मू-कश्मीर में 1987 के चुनाव में धांधली के आरोपों और लोकतंत्र के असफल प्रयोग ने पाकिस्तान को घाटी में आतंकवाद की जड़ जमाने का मौका दे दिया था। अब इतनी मशक्कत के  बाद 2014 के निर्भीक, निष्पक्ष और जबरदस्त उत्साह में हुए चुनाव ने घाटी में नई उम्मीद पैदा की है। आतंकवाद और अलगाववाद से ऊब चुके लोगों ने फिर से बुलैट की जगह बैलेट का सहारा लिया है। यह भारतीय लोकतंत्र, चुनाव आयोग  और खुफिया एजेंसियों की बड़ी जीत है। अब अगर राज्य और केंद्र सरकार के धोखे का अहसास हुआ तो फिर बैलेट की जगह बुलैट लाने की पाकिस्तान हर संभव कोशिश करेगा। पाकिस्तान की नीति साफ है, वह न खुद चैन से रहना चाहता है और न ही औरों को रहने देना चाहता है। या तो उसने मान लिया है कि सीमा पर तनाव बरकरार रखकर वह अपनी समस्याओं से लोगों का ध्यान बंटाने में सफल हो सकता है या फिर उसे यह समझ नहीं आ रहा कि भारत से कैसे पार पाए? सच जो भी हो, सीमा पार रह-रहकर फायरिंग करना निरा पागलपन और बौखलाहट का नतीजा है। एक तरफ सीमा पर निरंतर फायरिंग और दूसरी तरफ 26/11 जैसा आतंकी हमला दोहराने की खतरनाक साजिश दर्शाती है कि पाकिस्तान लगता है भारत को पूरे युद्ध की तरफ ले जाना चाहता है। यह तो भारतीय कास्ट गार्ड ने आतंकी हमले की साजिश को नाकाम कर दिया और उस मछुआरी नौका जिसमें आतंकी गोला बारूद था ने मजबूर होकर अपनी नाव को उड़ा दिया नहीं तो पता नहीं क्या होता? एलओसी और जम्मू-कश्मीर में सीजफायर लागू होने के बावजूद बार-बार भयानक हमले हो रहे हैं, उनका स्पष्ट अर्थ है कि भारत को पाकिस्तान के साथ एक और युद्ध लड़ने के लिए तैयार रहना होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि विकल्पों को सुझाने वालों का यह कहना है कि इनमें से किसी भी विकल्प को इस्तेमाल करने के साथ ही भारत को पाकिस्तान की तरफ से छेड़ दी जाने वाली भरपूर लड़ाई का सामना करना होगा। हालांकि अगर भारत-पाक का पूर्ण युद्ध होता है तो दोनों देशों को भारी क्षति उठानी होगी। लेकिन समझ नहीं आ रहा कि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज क्यों नहीं आ रहा है? भारत के समक्ष इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं कि वह पाकिस्तान द्वारा छेड़े गए अघोषित युद्ध का मुंह तोड़ जवाब दे। इस मामले में संयम का परिचय देने का अब कोई मतलब नहीं रह गया है।

-अनिल नरेन्द्र

65 साल का योजना आयोग अब नीति आयोग

पिछले पैंसठ साल से विवादास्पद रहे योजना आयोग की विदाई का फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से ऐलान कर दिया था, इसलिए योजना आयोग की असामयिक मौत पर किसी को हैरानी नहीं हुई। हकीकत यह है कि मार्च 1950 में गठित योजना आयोग ने शुरुआती दशकों में निश्चय ही आधारभूत संचना और आर्थिक विकास के मद्देनजर बेहतर काम किया पर कालांतर में वह अपनी प्रासंगिकता खोने लगा था। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को इसकी प्रेरणा तब के सोवियत संघ की पांच वर्षीय योजना प्रणाली से मिली थी। लेकिन नेहरू के जमाने में महज योजना बनाने की जिम्मेदारी तक सीमित इस संगठन ने बाद के दिनों में ऐसी महत्वाकांक्षी उड़ान भरी कि यह केंद्र सरकार के मंत्रालयों और राज्यों तक फंड निर्धारित करने और पहुंचाने वाली ताकतवर संस्था बन गया। राज्यों के मुख्यमंत्री इसके दरवाजे पर दस्तक दर दस्तक देते रहना आम दृश्य बन गया था। योजना आयोग राज्यों पर एक समानांतर केंद्रीय सत्ता की तरह नियंत्रण कर रहा था और उसकी नीतियों और योजनाओं को प्रभावित कर रहा था। भारत के संघीय ढांचे में राज्यों की प्रमुख भूमिका होती है, मगर हालत यह थी कि निर्वाचित मुख्यमंत्रियों को अपने राज्यों के हितों के लिए योजना आयोग के समक्ष याचक बनना पड़ता था। बेशक योजना आयोग ने 12 पंचवर्षीय योजनाएं दीं पर समय के साथ इसके तौर-तरीके में बदलाव नहीं किया गया बल्कि स्थिति यह बन गई थी कि केंद्र और राज्य तथा राज्यों के बीच यह आपसी टकराव का कारण बन गई थी। योजना आयोग का नाम भी प्रधानमंत्री ने बदल दिया है। नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफार्मिंग इंडिया (नीति आयोग) नामक इस संस्था में विभिन्न क्षेत्रों के पांच विशेषज्ञ पूर्णकालिक सदस्य होंगे। चार केंद्रीय मंत्री भी इसमें शामिल होंगे। बहरहाल देखने का असली मुद्दा यह है कि नई संस्था के अस्तित्व में आने से नियोजन प्रक्रिया और विकास की दिशा में क्या फर्प आता है? नई संस्था को स्वरूप देने के मुद्दे पर पिछले महीने मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में प्रधानमंत्री ने टीम इंडिया की भावना पर जोर दिया था। नरेंद्र मोदी की यह बात मुख्यमंत्रियों को रास आई कि विकास योजनाएं बनाने में राज्यों को ज्यादा भूमिका मिलनी चाहिए। इसके बावजूद नई संस्था के ढांचे और कार्यक्षेत्र को लेकर मुख्यमंत्रियों में सहमति नहीं बनी। कई विपक्षी मुख्यमंत्री चाहते थे कि योजना आयोग खत्म करने की बजाय उसके कार्यक्षेत्र व कार्यशैली में बदलाव लाया जाए। नतीजतन नीति आयोग की शुरुआत मतभेदों के बीच हो रही है। अध्यक्ष जहां प्रधानमंत्री खुद होंगे, वहीं उपाध्यक्ष के लिए विश्व प्रख्यात अर्थशास्त्राr खोजा जा रहा है। मोदी की इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हर राज्य को अपनी खास समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है और विकास का एक खांचा हर किसी को रास आ जाए यह मुमकिन नहीं है। इसलिए नीति आयोग में हर राज्य का प्रतिनिधित्व उसकी खास और अनूठी समस्याओं को अलग ढंग से हल करने का उपाय बताएगा। नीति आयोग में टीम इंडिया की झलक तो मिलती है लेकिन सिर्प नाम बदला है या काम का अंदाज भी... यह आने वाला समय बताएगा।