Translater

Wednesday, 14 January 2015

कहानी दुनिया की सबसे कम उम्र की मोस्ट वांटेड महिला की

फ्रांस में तीन दिन के आतंकी हमले में 10 पत्रकारों समेत 20 लोगों के मारे जाने के बाद पेरिस में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। पेरिस में 800 सैनिकों को भी तैनात किया गया है। फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलोंद ने चेतावनी दी है कि खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है। ओलोंद ने शनिवार को कैबिनेट की इमरजैंसी मीटिंग की। रविवार को पेरिस एकता मार्च हुई जिसमें जर्मनी  की अंगेला मार्केल ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन समेत कई बड़े नेताओं के साथ ही हजारों लोगों ने हिस्सा लिया। सुपर स्टोर में मारे गए अश्वेत आतंकी की गर्लफ्रैंड हयात बोथेदिएन अब भी फरार है। आतंक के इस चेहरे को 88 हजार सुरक्षाकर्मी ढूंढ रहे हैं। हयात बोथेदिएन उम्र 26 साल इस समय दुनिया की सबसे कम उम्र की आतंकी बन गई है। पेरिस के आतंकी हमले में शामिल 32 साल के अमेदी कौली बेली की पत्नी है। अमेदी तो दोनों कुवाची भाइयों के साथ मुठभेड़ में ढेर हो गया, मगर हयात पूरे मुल्क के सुरक्षा बलों को चकमा देने में कामयाब रही। उसके बारे में विरोधाभासी रिपोर्टें आ रही हैं। वह सुपर मार्केट में बंधक बनाए जाते वक्त अमेदी के साथ ही थी। वहीं से बंधकों के बीच से बच निकली। दूसरी वह टर्की होकर सीरिया भाग गई। दो जनवरी को इस्तांबुल का उसका टिकट कटा था। गुरुवार को वह सीरिया पहुंच चुकी थी। 1988 में जन्मी हयात सात भाई बहनों में एक थी। 1994 में उसकी मां की मृत्यु हो गई। बाप मोहम्मद एक डिलीवरी ड्राइवर था। बच्चों की परवरिश की हैसियत नहीं थी। इसलिए बच्चों को एक केयर सेंटर में भेजा। अल्जीरिया मूल की हयात अपना सरनेम ऐसा रखती है जिससे उसकी पहचान फ्रेंची हो। उसने कैशियर की नौकरी की। इसी नौकरी के दौरान वह अमेदी के सम्पर्प में आई। 2009 में दोनों ने धार्मिक रीति-रिवाज से शादी की। मगर शादी का यह तरीका फ्रांस में कानूनन मान्य नहीं है। हयात अब बुर्के में नजर आई। यही नकाब उसकी नौकरी ले डूबा क्योंकि फ्रांस में बुर्का पहनने पर मनाही है। इस्लाम में उसका रुझान अमेदी से रिश्ते के  बाद ही बढ़ा। उसने कई किताबें पढ़ीं और जेहादी गतिविधियों की जानकारी हासिल की। 2010 में अलकायदा से जुड़े एक आतंकी डजमेल वफेल से भी वह मिली। वफेल का दावा था कि वह अफगानिस्तान में ओसामा बिन लादेन से मिला था। एक जंगल में बुर्के में निशानेबाजी करते हुए उसकी सारी तस्वीरें इसी दौरान की हैं। हाल ही में मलेशिया घूमकर आई थीं। उसका पति अमेदी किशोर उम्र से ही आपराधिक प्रवृत्ति का था। 10 बहनों के बीच वह अकेला भाई था। 17 साल की उम्र में ड्रग और डकैती के कारनामों में उसका नाम दर्ज है। 2001 में जेल गया था और कैद के दौरान ही उसने इस्लाम कुबूल किया। वहीं शरीफ कुवाची के सम्पर्प में आया। फ्रांस के चीफ प्रॉसीक्यूटर फ्रांस्कोज मॉलिस ने बताया कि कुवाची की बीवी इजाना से हयात के बीच 500 फोन कॉल्स की डिटेल्स है। हयात अपने पिता से एक ही साल पहले मिली थी। हज के लिए मक्का जाने के वक्त। तीन दिन पहले टीवी पर उसकी तस्वीरें आने से पहले पड़ोसियों को भी उसकी गतिविधियों का कोई अंदाजा नहीं था। यह है फ्रांस की मोस्ट वांटेड आतंकी हयात बोथेदिएन की कहानी।

-अनिल नरेन्द्र

दिल्ली में बजी चुनाव की रणभेरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा की लोकप्रियता का बड़ा इम्तिहान अगले महीने दिल्ली में होगा जब विधानसभा की 70 सीटों के लिए सात फरवरी को वोटिंग होगी और 10 फरवरी को नतीजे आएंगे। करीब एक साल से राष्ट्रपति शासन से काम चला रही राजधानी में मुख्य मुकाबला भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच माना जा रहा है। लेकिन सोमवार को दिल्ली कैनटोनमेंट बोर्ड के चुनाव के संकेत मानें तो कांग्रेस को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। यह पहली बार है जब चुनाव आयोग ने चुनाव की तैयारी के लिए सबसे कम वक्त दिया है।  पिछले चुनावों में प्रचार के लिए 40 से 60 दिन मिले थे लेकिन इस बार 25 दिन में ही उम्मीदवारों को जनता का दिल जीतना होगा। आज के हालात के अनुसार आम आदमी पार्टी नम्बर वन पर चल रही है। वह सभी 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर चुकी है। उसके उम्मीदवारों ने कई दिन पहले प्रचार भी करना शुरू कर दिया। दूसरी ओर भाजपा ने अभी तक न तो यह संकेत दिया है कि अगर वह चुनाव जीतती है तो उसका मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार कौन होगा और न ही एक भी प्रत्याशी का नाम घोषित किया है। भाजपा के अंदर इतनी गुटबाजी है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह को खुद कमान संभालनी पड़ेगी और हरियाणा व महाराष्ट्र की तर्ज पर चुनाव लड़ना पड़ेगा। भाजपा के लिए दिल्ली में वह वातावरण नहीं है जो लोकसभा चुनाव के समय था। इसका एक सबूत है कि हाल ही में हुई नरेंद्र मोदी की रैली। इसमें मुश्किल से 25 से 30 हजार आदमी थे और उनकी स्पीच में भी दम नहीं था। रही-सही कसर मोदी ने अरविन्द केजरीवाल पर सीधा हमला करके उन्हें हीरो बना दिया। दिल्ली की जनता भाजपा से हताश है क्योंकि एक साल के करीब राष्ट्रपति शासन में उसकी कोई भी समस्या का समाधान नहीं हो सका। बिजली, पानी, लचर कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य व बेरोजगारी किसी भी मोर्चे पर केंद्र सरकार कामयाब होती नहीं दिखी। पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा बनकर महंगाई आज भी लोगों की चिंता का कारण बनी हुई है। रोजमर्रा की जरूरत की चीजें, खासतौर पर सब्जियों के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं। अगर हम बिजली की बात करें तो आप ने सत्ता में  आने के बाद बिजली के बिल 50 फीसदी तक कम कर दिए थे। हालांकि अरविन्द केजरीवाल के इस्तीफे के बाद बिजली बिलों पर मिलने वाली सब्सिडी को खत्म कर दिया गया। हालांकि केंद्र ने अब 400 यूनिट तक बिजली का उपयोग करने वालों को सब्सिडी देना शुरू किया है। जल आपूर्ति के मोर्चे पर दिल्ली हर रोज 172 एमजीडी पानी की किल्लत झेलती है। द्वारका जैसे इलाकों में यह समस्या विकराल रूप ले चुकी है जहां लोगों को निजी टैंकरों को खरीद कर काम चलाना पड़ रहा है। 2013 में दिल्ली में अपराध 99 प्रतिशत तक बढ़ गए जबकि सिर्प 30 फीसदी मामले ही सुलझ पाए। 2014 में यहां रेप के दो हजार से अधिक मामले दर्ज हुए जो 2013 के मुकाबले में 30 फीसदी ज्यादा हैं। हर तरह के अपराध बढ़े हैं। हालांकि इसका शायद ही दिल्ली चुनाव पर असर पड़े पर भाजपा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में हुए छावनी परिषद चुनाव में करारी हार एक संकेत जरूर माना जाएगा। वाराणसी में भाजपा समर्थित सभी प्रत्याशी हार गए। इसके अलावा आगरा में भी भाजपा को करारा झटका लगा है जहां पार्टी चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा गया था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दिल्ली की जनता को स्पष्ट वोटिंग करनी चाहिए। वह जिस पार्टी को भी चाहें उसको पूर्ण बहुमत दे। दिल्ली में फिर त्रिशंकु चुनाव नहीं होना चाहिए। 1993 में राज्य का दर्जा मिलने के बाद यहां हमेशा पूर्ण बहुमत वाली एक दलीय सरकार ही बनी और उसने हर बार अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। सिर्प पिछले विधानसभा चुनाव में दिल्ली में तिकोना मुकाबला देखने को मिला और नतीजे में एक त्रिशंकु विधानसभा सामने आई। इसका दुष्परिणाम दिल्ली की जनता ने सहा। उम्मीद करते हैं कि सात फरवरी को होने वाले मतदान में दिल्लीवासी बढ़चढ़ कर भाग लेंगे और एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत देंगे।

Tuesday, 13 January 2015

राम रहीम, आसाराम बापू और रामपाल कानूनी शिकंजे में

आजकल फिर इन बाबाओं की चर्चा अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। रामपाल, राम रहीम और आसाराम बापू की लीलाओं का एक-एक करके पर्दाफाश हो रहा है। ताजा मामला डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम का है। अपने भक्तों को नपुंसक बनाने के मामले में सीबीआई ने डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी है। मालूम हो कि पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने डेरे के पुराने अनुयायी हंसराज चौहान की याचिका पर इस मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि राम रहीम के डेरे के अंदर लगभग 400 लोगों को नपुंसक बनाया गया है। याचिका में कहा गया है कि डेरे के अंदर डाक्टर खासकर इस काम के लिए रखे गए हैं और गुरमीत राम रहीम उनकी मदद से अपने अनुयायियों को नपुंसक बनाता है। 400 अनुयायियों को ईश्वर से मिलाने के नाम पर नपुंसक बनाने के आरोप को सीबीआई द्वारा जांच करने को रुकवाने के लिए राम रहीम ने पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी पर एकल जज ने 24 दिसम्बर के हाई कोर्ट के फैसले को निरस्त करने से मना कर दिया और राम रहीम की याचिका को खारिज कर दिया। एक श्रद्धालु युवती से बलात्कार के आरोपी कथावाचक आसाराम बापू को उच्चतम न्यायालय से भी राहत नहीं मिली और उन्हें फिलहाल जेल में ही रहना पड़ेगा। आसाराम सितम्बर 2013 से ही जोधपुर जेल में बंद हैं। एक नाबालिग लड़की ने अगस्त 2013 में आसाराम पर आरोप लगाया था कि कथावाचक ने उसके साथ जोधपुर के आश्रम में  बलात्कार किया था। आसाराम ने अपनी बीमारी का हवाला देकर जोधपुर जेल से जमानत पर रिहा करने का उच्चतम न्यायालय से अनुरोध किया था। उसके बाद अदालत ने याचिकाकर्ता के स्वास्थ्य की जांच एम्स में कराने का आदेश दिया था। एम्स के मैडिकल बोर्ड ने न्यायालय में अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें उसने कहा है कि आसाराम को फिलहाल सर्जरी की जरूरत नहीं है। रोहतक की एक अदालत ने करौथा में हत्या के मामले में जमानत नहीं मिलने के बाद अब धोखाधड़ी के मामले में ही पहले जमानत की याचिका देने वाले राम सिंह ने भी अपनी जमानत से मना कर दिया है। इसके चलते रामपाल की जमानत याचिका खारिज हो गई है। अगली पेशी 21 जनवरी को होगी। गौरतलब है कि वर्ष 2006 में करौथा आश्रम के विवाद के बाद कमला नामक महिला ने कोर्ट में याचिका देकर कहा था कि करौथा सतलोक आश्रम के संचालक रामपाल ने धोखाधड़ी से उसकी जमीन पर कब्जा कर लिया है। इस पर पुलिस ने इस मामले में रामपाल पर केस दर्ज कर लिया था। रामपाल के वकील ने इस मामले को खारिज करने की याचिका लगाई थी जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। धर्म के नाम पर इन बाबाओं ने जो गोरखधंधा चला रखा है उसका पर्दाफाश होना ही चाहिए। पिछले दिनों अदालत ने यहां तक कहा था कि इन डेरों की बारीकी से जांच होनी चाहिए और पुलिस प्रशासन यह पता लगाए कि इन डेरों में कितने और किस किस्म के हथियार छिपा रखे हैं। याद रहे कि रामपाल के सतलोक आश्रम में कई दिनों तक पुलिस और रामपाल के अनुयायियों में संघर्ष चलता रहा। अगर यह बाबा निर्दोष हैं तो अदालत में अपना पक्ष पेश कर निर्दोष साबित होंगे पर तब तक तो यह आरोपी ही हैं।

-अनिल नरेन्द्र

जम्मू-कश्मीर में बम्पर वोटिंग राज्यपाल शासन के लिए नहीं हुई थी

जम्मू-कश्मीर में शुक्रवार को राज्यपाल शासन लागू कर दिया गया। राज्य में कोई भी पार्टी सरकार बनाने में कामयाब नहीं रही, ऐसे में केंद्र सरकार ने राज्यपाल शासन लागू करने का फैसला किया। जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन नहीं होता वहां राज्यपाल शासन होता है। राज्यपाल एनएन वोहरा ने इसकी औपचारिकताएं पूर्ण कर राज्य के प्रशासनिक ढांचे की कमान संभाल ली। राज्यपाल शासन के लागू होने से जम्मू में खासतौर पर मायूसी हुई है। राजनीतिक दलों पर सवालिया निशान लगने स्वाभाविक ही हैं। हालांकि गत माह सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में सूबे के तीनों संभाग में रिकार्ड तोड़ मतदान हुआ था। इसके बावजूद राजनीतिक दलों के अहम एवं एजेंडे के कारण गठबंधन सरकार की स्थापना नहीं हो पाई। सभी दल राज्यपाल शासन को लेकर एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। गौरतलब है कि इन विधानसभा चुनाव में 87 सदस्यीय विधानसभा में पीडीपी 28 निर्वाचित विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। उसके बाद भाजपा 25 विधायकों के साथ दूसरे नम्बर की पार्टी रही। नेशनल कांफ्रेंस को 15, कांग्रेस को 12 तथा अन्य को सात सीटें मिलीं। राज्यपाल शासन की स्थिति बड़े ही नाटकीय ढंग से बनी। इसे लेकर उमर अब्दुल्ला पर पीडीपी ने गंभीर आरोप लगाए हैं। पीडीपी के प्रवक्ता नईम अख्तर ने कहा है कि राजनीतिक संकट के लिए उमर अब्दुल्ला जिम्मेदार हैं। उधर उमर ने कहा कि चुनाव नतीजे आए तीन सप्ताह होने वाले थे, बावजूद इसके पीडीपी सरकार बनाने के लिए आगे नहीं आई। इस बीच पीपुल्स कांफ्रेंस के चेयरमैन सज्जाद लोन का कहना है कि राज्यपाल शासन से बेहतर है कि फिर से चुनाव हों। मालूम हो कि कांग्रेस वाले गठबंधन ने पीडीपी को बिना शर्त सरकार बनाने के लिए अपना समर्थन देने का ऐलान भी किया, लेकिन ऊहापोह में फंसी पीडीपी फैसला नहीं ले पाई। उधर मुख्यधारा से जुड़े नेताओं का कहना है कि राज्यपाल शासन के अनुभव कश्मीरियों के लिए कभी अच्छे नहीं रहे, इसलिए जरूरी है कि यहां लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना हो। जम्मू-कश्मीर में बेशक किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला लेकिन राज्य के लोगों द्वारा तमाम तरह के जोखिमों के बीच भारी मतदान राज्य में गवर्नर रूल के लिए नहीं बल्कि नई सरकार के लिए किया गया था। लेकिन दूरगामी अंतर्राष्ट्रीय महत्व रखने वाले इस जनादेश पर जीते प्रमुख दलों के सियासी हित और महत्वाकांक्षाएं हावी रहीं। पीडीपी और भाजपा दोनों ने जनादेश का सम्मान नहीं किया और राज्य को केंद्र के शासन में झोंक दिया। जैसा मैंने कहा कि देश के अन्य राज्यों से अलग जम्मू-कश्मीर में इस प्रकार लगाए गए शासन को राष्ट्रपति शासन नहीं राज्यपाल का शासन कहा जाता है और ऐसा जम्मू-कश्मीर के संविधान की धारा 92 के तहत किया जाता है। इस प्रावधान के अंतर्गत राज्यपाल स्वयं ही राज्य में राज्यपाल शासन लागू कर सकते हैं और इसकी अवधि छह महीने की होती है और बाद में राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता है। जम्मू-कश्मीर में एक स्थिर सरकार व प्रशासन की सख्त जरूरत है। मैं समझता हूं कि खंडित जनादेश आने के बाद जब गठबंधन सरकार नहीं बन रही तो राज्यपाल शासन ही फिलहाल सबसे बेहतर विकल्प है और राज्यपाल शासन के लिए तीनों प्रमुख दल जिम्म्मेदार हैं।

Sunday, 11 January 2015

कलम से डरने वाले इन जेहादियों का बर्बर, निंदनीय कृत्य

इस्लाम का शाब्दिक अर्थ है `शांति।' लेकिन इस धरती पर सर्वाधिक खूनखराबा इस्लाम के नाम पर इसके कट्टरपंथियों द्वारा ही हुआ है। इस्लाम के स्वयंभू जेहादियों ने एक बार फिर पैगम्बर के अपमान का बदला लेने के लिए फ्रांस की राजधानी पेरिस में 10 निहत्थे पत्रकारों को मौत के घाट उतार दिया। अभी दुनिया पाकिस्तान के पेशावर के आर्मी स्कूल के बच्चों के कत्लेआम की घटना से उभर भी नहीं सकी थी कि पेरिस में भी ऐसी ही घटना घट गई। फ्रांस के अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले में आतंकियों के शार्ली एब्दो पत्रिका के दफ्तर पर गोलीबारी की जिसमें मैगजीन के सम्पादक समेत 10 पत्रकार और दो पुलिसकर्मी मारे गए। पहली बार किसी एक घटना में इतने पत्रकार मारे गए हैं। हमले में 20 लोग घायल भी हुए हैं। शार्ली एब्दो एक साप्ताहिक मैगजीन है। यह व्यंग्य और कार्टून के लिए मशहूर है। 2006 में इसने पैगम्बर मोहम्मद साहब का कार्टून छापा था। इसके बाद से ही पत्रिका के सम्पादक को धमकी मिल रही थी। फ्रांस के मुस्लिम संगठनों ने इसके खिलाफ केस दर्ज कराया था। लेकिन वह हार गए थे। अदालत ने अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर मैगजीन के पक्ष में फैसला सुनाया था। इसी हफ्ते मैगजीन ने आतंकी संगठन आईएस प्रमुख बगदादी का भी कार्टून छापा था। शार्ली एब्दो अपने जन्म से ही विवादों में रही है। पत्रिका में प्रकाशित कार्टून, रिपोर्ट और चुटकलों को लेकर कई बार विरोध प्रदर्शन हुए और हिंसक घटनाएं भी हुईं। यहां तक कि पत्रिका के सम्पादक स्टीफन कार्विनियर को जान से मारने तक की धमकी तक दी गई। लेकिन इन सबसे बेपरवाह शार्ली एब्दो अपनी नीति के अनुरूप विभिन्न मुद्दों पर अपने व्यंग्यात्मक कार्टून और रिपोर्ट प्रकाशित करती रही। शार्ली एब्दो के 47 वर्षीय सम्पादक स्टीफन कार्विनियर शानदार कार्टूनिस्ट तो थे ही, उकसाने वाले मुद्दे उठाने में भी माहिर थे। ला मोंड को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि वह हमले से नहीं डरते। यह भले ही  बढ़ाचढ़ा कर करने वाला दावा लगता हो लेकिन उन्होंने कहा कि मैं झुकने के बजाय मरना पसंद करूंगा। वर्ष 2011 में पेट्रोल बम से पत्रिका के कार्यालय पर हुए हमले पर उन्होंने कहा था कि यह फ्रांस के मुस्लिमों का काम नहीं है बल्कि यह कुछ बेवकूफों का काम है। उनके बयान के बाद अलकायदा ने उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़ने का फतवा जारी किया था। शार्ली एब्दो मैगजीन पर हमला करने वाले दो भाइयों ने पूरा आपरेशन बड़ी बारीकी से प्लान किया था। उनके निशाने पर पत्रिका के सम्पादक सहित चार प्रतिष्ठित कार्टूनिस्ट थे। उन्होंने बाकायदा इन कार्टूनिस्टों की हत्या से पहले इनका नाम पूछकर इसकी तसल्ली की थी। इन कार्टूनिस्टों का नाम पैगम्बर मोहम्मद साहब के कार्टून विवाद से भी जुड़ा हुआ था। फ्रांस मीडिया में आई रिपोर्ट में कहा गया कि जब बंदूकधारी गोलाबारी करते हुए पत्रिका के दफ्तर में घुसे तो उन्होंने अन्य स्टाफ से शार्ली एब्दो के सम्पादक स्टीफन कार्विनियर उर्प शार्व, जार्ज वोलिएंकी, जीन केबू और बनीड टिगनस वर्लहैक के बारे में पूछा। जहां पर सम्पादकीय टीम की बैठक हो रही थी वहां पर भी बंदूकधारियों ने बाकायदा नाम से इन कार्टूनिस्टों के बारे में पूछा और फिर गोली मारी। गौरतलब है कि इन कार्टूनिस्टों की हत्या करने की धमकी पहले से ही अलकायदा ने दे रखी थी। अलकायदा का आरोप है कि यह कार्टूनिस्ट इस्लाम और पैगम्बर साहब का मजाक उड़ाते हैं। इस हत्याकांड से पूरा विश्व समुदाय स्तब्ध है। वहीं कुछ साल पहले कार्टूनिस्ट का सिर कलम करने वाले को 57 करोड़ रुपए का इनाम देने के बयान से सुर्खियां बटोरने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री याकूब कुरैशी ने बुधवार को एक और विवादित बयान दे दिया। कुछ साल पहले डेनमार्प के एक समाचार पत्र में पैगम्बर मोहम्मद साहब का आपत्तिजनक कार्टून छापने पर मुस्लिम समुदाय में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। अब कुरैशी ने कहा है कि पूर्व में आपत्तिजनक कार्टून बनाने वाला तो मर चुका है। लेकिन पेरिस की मैगजीन में पैगम्बर का आपत्तिजनक कार्टून बनाने वाले कार्टूनिस्ट के हत्यारे को वह 57 करोड़ की इनाम राशि देने को तैयार है। वैसे अपना मानना है कि किसी भी धर्म या उसके भगवान का मजाक नहीं उड़ाया जाना चाहिए। व्यक्ति की आजादी इस बात की इजाजत नहीं देती कि आप किसी दूसरे मजहब का मजाक उड़ाएं। निसंदेह पत्रिका की गलती थी और उसके इस कार्य को उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन साथ-साथ यह भी कहना पड़ेगा कि आज के इस दौर में बौद्धिक आक्रमण का जवाब गोलीबारी से देना भी कहीं से जायज नहीं ठहराया जा सकता। संचार प्रधान वर्तमान दौर में उस अखबार के कृत्यों के खिलाफ एक जनमत खड़ा किया जा सकता था। उसके पत्रकारों को असहिष्णु और दूसरे धर्मों का आदर न करने वाला घोषित किया जा सकता था। बहुत से रास्ते थे लेकिन निहत्थे लोगों पर अचानक बंदूक की गोलियों से बौछार, नितांत कायराना हरकत है। आखिर इन हमलों के पीछे कौन है और उनके इरादे क्या हैं? हमले में पहले अलकायदा का नाम सामने आया। आईएस कट्टरता और आतंक का नया नाम है, जिसने सीरिया और इराक में अपनी समानांतर सत्ता कायम कर ली है। इस हमले के बाद ईरान से आई प्रतिक्रिया चिंता का कारण बन सकती है। वहां के मीडिया का एक तबका मानता है कि यह हमला फ्रांस द्वारा सीरिया में सशस्त्र विपक्ष का साथ देने और आईएस के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन सेना द्वारा किए गए हवाई हमले के विरोध में किया गया है। धार्मिक कट्टरता को आतंकी मंसूबों से जोड़ने के इस खतरनाक खेल का विरोध होना चाहिए। दरअसल स्वतंत्र विचारों से न लड़ सकने वाले लोग ही कट्टरता और हिंसा का सहारा लेते हैं, जिसका विरोध होना चाहिए। मगर यह विरोध किसी धर्म के विरुद्ध नहीं बल्कि हिंसक मानसिकता के प्रति है। अत बात है मूलभूत मान्यताओं में सुधारों की, अपने से अलग धार्मिक मान्यताओं और विश्वासों को सहन करने, उनका सम्मान करने की। जब तक पश्चिम और इस्लामिक जगत यह नहीं सीखता तब तक ऐसी घटनाएं रोकना असंभव है। साथियों की मौत से गमजदा शार्ली एब्दो के पत्रकार और कार्टूनिस्ट पत्रिका का नया अंक लेकर आ रहे हैं। वास्तव में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हुए इस हमले के पुरजोर विरोध का इससे बेहतर और कोई दूसरा तरीका हो भी नहीं सकता।

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 10 January 2015

भारत में तो 7000 साल पहले ही उड़ते थे विमान

इतिहास में भले ही राइट बंधुओं का नाम दुनिया का पहला विमान उड़ाने वालों के रूप में दर्ज हो जिन्होंने 1904 में पहला विमान उड़ाया था। मगर भारत में तो 7000 साल पहले ही विमान उड़ा करते थे। यह विमान न सिर्प एक देश से दूसरे देश तक जाने में सक्षम थे बल्कि एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जाने की भी क्षमता इनमें थी। यह दावा कैप्टन आनंद जे बोडस ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस में किया है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में रविवार को वेदों में प्राचीन विमान तकनीक से जुड़े विवादास्पद व्याख्यान में यह दावा किया गया। पायलट प्रशिक्षण संस्थान के सेवानिवृत्त प्राचार्य कैप्टन आनंद जे बोडस के व्याख्यान को लेकर कुछ वैज्ञानिकों ने आलोचना की और कहा कि यह उन प्रयोग आधारित साक्ष्यों की प्रमुखता की अनदेखी करता है जिन पर 102 साल पुरानी भारतीय विज्ञान कांग्रेस की स्थापना की गई थी। विज्ञान कांग्रेस में संस्कृत के माध्यम से प्राचीन विज्ञान विषय पर परिचर्चा के दौरान कैप्टन बोदास ने वैदिक ग्रंथों का हवाला देते हुए दावा किया कि प्राचीन भारत में विमानन तकनीक मौजूद थी। उन्होंने कहा कि ऋग्वेद में प्राचीन विमानन तकनीक का जिक्र है। महर्षि भारद्वाज ने सात हजार साल पहले ऐसे विमान की मौजूदगी की बात कही थी, जो एक देश से दूसरे देश जा सकता था। यही नहीं, वह एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप, यहां तक कि एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक भी जाने में सक्षम था। उन्होंने विमानन तकनीक के संबंध में 97 किताबें लिखी हैं। रामायण में रावण के पुष्पक विमान का जिक्र है जिसमें वह सीता का हरण कर लंका ले गया था। यह विमान नहीं था तो और क्या था? प्राचीन भारत में विमान बहुत ही बड़े हुआ करते थे। विमान का आधारभूत ढांचा 60 गुणा 60 फुट का होता था और कई मामलों में तो यह 200 फुट से भी ऊंचा होता था। वैदिक विमानों में छोटे-छोटे 40 इंजन हुआ करते थे। रॉडार सिस्टम भी था जिसे स्पाकर रहस्य कहा जाता था। बोडस के बयान पर बहस छिड़ना स्वाभाविक ही था। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा कि मैं आज भी सुबह की शुरुआत संस्कृत में खबरें देखकर ही करता हूं। सारी पुरानी चीजें काम की न हों लेकिन सारी चीजें बेकार भी नहीं  हैं। वैज्ञानिक संस्कृत में मौजूद ज्ञान का मानवता की बेहतरी के लिए इस्तेमाल करें। जब जर्मनी हम भारतीयों के कान्सेप्ट का इस्तेमाल कर दुनियाभर को चमत्कृत करने वाले आविष्कार दे सकते हैं तो यह काम हम क्यों नहीं कर सकते हैं। केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि बीज गणित और पाइथागोरस थियरम की खोज भारत में हुई थी, लेकिन इसका श्रेय दूसरे लोगों को मिला। पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर का कहना था कि हिन्दुत्व ब्रिगेड की अतिश्योक्ति से भरी बातों के चलते प्राचीन भारतीय विज्ञान की वास्तविक उपलब्धियों को खारिज नहीं किया जाना चाहिए। हर्षवर्धन का मजाक उड़ाने वाले आधुनिकतावादियों को जान लेना चाहिए कि वह सही नहीं हैं। एक अन्य पेपर में दावा किया गया है कि भारतीयों ने सर्जरी के लिए 20 तरह के तेज और 101 मोथरे औजार बनाए थे। सर्जरी के बाद त्वचा की असली रंगत लौटाने के लिए ऑपरेशन के बाद एक ट्रीटमेंट होता था जो आज के सर्जिकल दौर में आम इस्तेमाल में नहीं है।
-अनिल नरेन्द्र


शायद अब सामने आए सुनंदा की मौत की असल कहानी

सुनंदा पुष्कर की रहस्यमय मौत का मामला अब हत्या में दर्ज होने के बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। सुनंदा पुष्कर के रिश्तेदारों को लगने लगा है हत्यारा जल्द कानून की पकड़ में होगा। जम्मू में रहने वाले सुनंदा के भाई अशोक कुमार का कहना है कि अब उन्हें न्याय की उम्मीद बंधी है। उन्होंने दावा किया कि अब शशि थरूर की असलियत सामने आएगी। सुनंदा के भाई का दावा है कि उनकी बहन की मौत के पीछे शशि थरूर का हाथ है। सुनंदा पुष्कर की मौत के तकरीबन एक साल बाद पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया है। एम्स ने 29 दिसम्बर को जो अंतिम पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस को सौंपी थी उसके मुताबिक पुष्कर की मौत स्वाभाविक नहीं थी, उसकी वजह जहर था। इस रिपोर्ट को आधार बनाकर पुलिस ने हत्या का केस दर्ज किया है। दिल्ली पुलिस आयुक्त भीम सेन बस्सी ने मंगलवार को कहा कि पुष्कर को इंजैक्शन के जरिये जहर देने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। जहर की मात्रा व प्रकृति का पता लगाने के लिए विसरे की जांच के लिए विदेश भेजा जाएगा क्योंकि यह जांच भारत में संभव नहीं। रिपोर्ट में पहली बार इंजैक्शन से जहर की बात सामने आई है। मैडिकल बोर्ड ने तो पहली रिपोर्ट में भी सुनंदा की मौत जहर से होने की बात कही थी। इस रिपोर्ट को दिल्ली पुलिस ने उस समय स्वीकार नहीं किया था। तब बोर्ड ने दिल्ली पुलिस पर सहयोग न करने का भी आरोप लगाया था। उल्लेखनीय है कि 17 जनवरी 2014 को पांच सितारा होटल लीला में सुनंदा की संदिग्ध मौत के समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और शशि थरूर मंत्री थे। उस समय भी पुलिस पर दबाव था कि वह कार्रवाई आराम-आराम से करे। तब यह बात सामने आई थी कि थरूर की पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार से नजदीकी रिश्तों के कारण सुनंदा व थरूर के रिश्तों में तनाव आ गया था। सुनंदा का कातिल तलाशने में पुलिस भले ही विदेश में फोरेंसिक जांच की बात कर रही हो लेकिन शशि थरूर का कहना था कि मैं यह सुनकर स्तब्ध हूं कि दिल्ली पुलिस ने मेरी पत्नी की मौत के मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया है। यह कहने की जरूरत नहीं कि जिस तरह से इस मामले की जांच हुई है उससे मैं बेचैन हूं। मैं पुलिस को पूरा सहयोग करूंगा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राशिद अल्वी ने पुलिस से निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए एक साल बाद हत्या का मुकदमा दर्ज करने पर सवाल खड़े किए हैं। सुनंदा पुष्कर की मौत का मामला ऐसे सवालों से घिर चुका है कि अब सिर्प तेज रफ्तार एवं विश्वनीय जांच ही दिल्ली पुलिस के केस में दम ला सकती है। शशि थरूर ने यह भी आरोप लगाया है कि उनके कुछ पूर्व कर्मियों को मोहरा बनाकर उन्हें फंसाने की कोशिश हो रही है। दरअसल इस प्रकरण का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यही है कि यह मामला राजनीतिक रंग लेता लग रहा है। अत दिल्ली पुलिस के सामने यह बड़ी चुनौती है कि वह नेताओं की बयानबाजियों से जांच को न सिर्प अप्रभावित रखे बल्कि आमजन के बीच इस भरोसे को कायम रखे कि उसने जांच पर कोई बेजा असर नहीं पड़ने दिया। उम्मीद की जाती है कि दिल्ली पुलिस मामले की जड़ तक जाएगी और सुनंदा के कातिल या कातिलों का पर्दाफाश करेगी।