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Friday, 4 September 2015

हर घंटे देश में 15 लोग आत्महत्या कर रहे हैं?

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में पढ़ने वाली छात्रा का छात्रावास में खुदकुशी करना, हैदराबाद में एक छात्र का खुदकुशी करना चिंता का विषय है। देश में आत्महत्याओं की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। देश में हर घंटे 15 लोग आत्महत्या कर लेते हैं। पिछले साल (2014) में एक लाख 31 हजार से ज्यादा लोगों ने अपनी जान दी। इस मामले में राज्यों में महाराष्ट्र और शहरों में चेन्नई शीर्ष पर है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ओर से जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार साल 2014 के दौरान जिन लोगों ने आत्महत्या की उनमें से 69.7 फीसद की सालाना कमाई एक लाख रुपए से कम थी। दूसरे शब्दों में गरीबी का कारण। गरीबी जीवन को किस तरह प्रभावित करती है इसी से पता चलता है कि पिछले साल खुदकुशी करने वालों में करीब 70 फीसदी वह थे जिनकी आय एक लाख रुपए (वार्षिक) से कम थी। जबकि अपनी जिंदगी खत्म करने वाले 26.9 फीसद सालाना एक लाख से पांच लाख रुपए कमाते थे। इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल राष्ट्रीय दर की तुलना में शहरों में आत्महत्या की दर ज्यादा थी। राष्ट्रीय दर 10.6 फीसद के मुकाबले शहरी दर 12.8 फीसद थी। जहां तक आत्महत्याओं की वजहों की बात है तो उसमें पारिवारिक समस्याओं (शादी से इतर) का योगदान 21.7 फीसद रही, जबकि जान देने के पीछे 18 फीसद बीमारी वजह थी। इस आंकड़े से यह भी पता चलता है कि आत्महत्या के प्रत्येक छह मामले में एक गृहणी शामिल थी और कुल पुरुष व महिला का अनुपात 68.32 था। 2014 में आत्महत्या करने वालों में सर्वाधिक 19.7 फीसद स्वरोजगार करने वाले लोग थे। इसके अलावा 12 फीसद मजदूर, 7.4 फीसद वेतनभोगी, 6.1 फीसद छात्र और 0.7 फीसद सेवानिवृत्त लोग शामिल हैं। जहां तक आत्महत्या के तरीके का सवाल है तो 41.8 फीसदी लोगों ने फांसी लगाकर आत्महत्या की। जबकि 26 फीसद ने जहरीले पदार्थ का सेवन किया, 6.9 फीसद ने आत्मदाह किया, 5.6 फीसद ने डूबकर और 1.1 फीसद ने इमारत से छलांग लगाकर अपनी जान दी। आत्महत्या करने वालों में 20.2 फीसद मैट्रिक पास थे, जबकि 19 फीसद ने प्राइमरी तक की पढ़ाई की थी। पिछले साल आत्महत्या करने वालों में 14.3 फीसद अनपढ़ और 11 फीसद 12वीं कक्षा तक ही पढ़ने वाले थे। छात्रावास और स्कूलों में इस तरह का माहौल बनाना जरूरी है जिससे देश के कोने-कोने से आए छात्र खुद को सुरक्षित और एक ही परिवार का हिस्सा समझें। हम उन आत्महत्याओं को तो रोकने का प्रयास करें जो बच्चों में हो रही हैं। बच्चों से समय-समय पर बातचीत कर उनकी परेशानियों के बारे में जानना भी जरूरी है। एम्स प्रशासन और हैदराबाद के कॉलेज को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इन छात्रों के साथ कुछ भी गलत न हो। छात्रों को भी समझना चाहिए कि आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है।

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 3 September 2015

मिस्र के पत्रकारों पर दमन चक की निंदा करते हैं

मिस्र में पत्रकारों पर दमन का दौर शुरू हो गया है। मिस्र की एक अदालत ने अल जजीरा टेलिविजन चैनल के तीन पत्रकारों को तीन वर्ष के कारावास की सजा सुनाई है। तीनों को बिना पेस लाइसेंस के काम करने और मिस्र के लिए हानिकारक सामग्री को पसारित करने के लिए जज हसन फरीद की अदालत ने सजा सुनाई। मामले की दुबारा सुनवाई में सजा पाने वाले पत्रकार मोहम्मद फाहमी, बहर मोहम्मद तथा पीटर ग्रेस्ट हैं। मोहम्मद फाहमी मिस्र की नागरिकता छोड़ चुके कनाडा के तटस्थ नागरिक, बहर मोहम्मद मिस्र और पीटर ग्रेस्ट आस्ट्रेलिया के नागरिक हैं। जिनका आस्ट्रेलिया पत्यार्पण हो चुका था। तीनों को पहले सात से 10 वर्ष की सजा मिली थी, किन्तु अब उन्हें तीन वर्ष के कारावास की सजा दी गई है। जज हारुन फरीद ने कहा कि तीनों व्यक्ति न तो पेस सिंडिकेट के सदस्य हैं और न ही पसारक। तीनों बिना लाइसेंस के काम कर रहे थे। तीनों पत्रकारों ने अपने विरुद्ध आरोपों से इंकार किया है। अमेरिका ने पत्रकारें की इस सजा पर गहरी चिंता और निराशा पकट करते हुए वहां कि सरकार से इसमें सुधार का आग्रह किया है। विदेश विभाग के पवक्ता जॉन कर्वी ने एक बयान में कहा ः अल जजीरा के तीनों पत्रकारों को लेकर मिस्र की एक अदालत द्वारा दिए गए फैसले से अमेरिका को गहरी निराशा और चिंता हुई है। उन्होंने कहा कि हम लोग मिस्र की सरकार से इस फैसले में सुधार के लिए सभी संभव कदम उठाने का आग्रह करते हैं। उन्होंने कहा कि यह फैसला स्थिरता और विकास के लिए जरूरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कमजोर करता है। उधर मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल मिसी ने विवादस्पद आतंकरोधी कानून को मंजूरी दे दी है। अब कोई पत्रकार या मीडिया आतंकी हमले के सिलसिले में सरकारी बयान के विपरीत खबर नहीं दे सकेगा। इस कानून का उल्लंघन करने वाले पत्रकार पर भी आतंकरोधी कानून लगाया जा सकता है। इस कानून में सेना व पुलिस के जवानों को कानूनी पचड़ों से बचाने का इंतजाम भी किया गया है। नए कानून के गजट में पकाशित कर लागू कर दिया गया है। इसके अनुसार आधिकारिक बयानों से विपरीत कोई झूठी जानकारी पसारित करने के लिए दो साल तक की जेल हो सकती है। इसके अलावा दो से पांच लाख तक मिस्री पाउंढड तक का जुर्माना भी हो सकता है। मीडिया ने इसका कड़ा विरोध किया है। विशेष कोर्ट भी बनाए गए हैं। उनके जजों, पुलिस और सेना के जवानों को ड्यूटी के समय दिए फैसलों या ड्यूटी पर की गई सख्ती से बचाने के कानूनी इंतजाम भी इसी कानून में हैं। इसके साथ ही आतंकी समूह बनाने वाले या किसी आतंकी समूह में शामिल होने वालों को मौत की सजा का पावधान है। मिस्र सरकार द्वारा पत्रकारों पर दमन के इस कदमों का हम विरोध करते हैं और पत्रकारों की स्वतंत्रता पर पतिबंध लगाने के पयास की निंदा करते हैं।

-अनिल नरेन्द्र

जुटे चार, मोदी पर वार लड़ाई आर-पार की

पटना में इस रविवार को जदूय-राजद, कांग्रेस और सपा महागठबंधन ने स्वाभिमान रैली में हुंकार भरी। इसमें नीतीश कुमार और लालू पसाद यादव के साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की मौजूदगी खास मायने रखती है। साफ है कि बिहार विधानसभा चुनाव अब महज एक राज्य का चुनाव नहीं रह गया है। इसमें केंद्र की बीजेपी सरकार और विपक्ष दोनों ने ही अपना सब कुछ झोंक दिया है। अब यह दोनों के लिए ही आर-पार की लड़ाई बन गई है। यही वजह है कि संसद में सरकार के पति नरम रवैया अपनाने वाली समाजवादी पाटी ने भी शिवपाल यादव को इसमें शिरकत करने के लिए भेजा, बावजूद इसके कि टिकट बंटवारे में पाटी की उपेक्षा हुई है। सभी विपक्षी नेताओं ने पधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर निशाना साधा और कहा कि मोदी ने सिर्फ झूठे वादे किए हैं और अब तक कुछ भी नहीं दिया है जिसके कारण लोगों का उनसे विश्वास उठ चुका है। नीतीश ने कहा कि पहले वाले पीएम कम बोलते थे और ये बोलते रहते हैं (मोदी) सुनते नहीं। मोदी चले थे बिहार को ललकारने पर भूमि बिल पर घुटने टेक दिए। जो हमारे डीएनए पर सवाल उठाते हैं वे बताएं कि उनके पूर्वजों ने क्या किया? लालू पसाद यादव ने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा ः बिहार में जंगल राज पार्ट-2 की बात करने वालों को पता होना चाहिए कि अब यहां मंडलराज पार्ट-2 है। मोदी जी ने दो रैलियों में सिर्फ यहां के लोगों  को गालियां ही दीं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहाः मोदी सरकार का चौथाई कार्यकाल पूरा हो गया है। अब तक शो बाजी के अलावा उसने कुछ नहीं किया। आप लोग यह बात मुझसे बेहतर जानते हैं। सोनिया ने कहा कि पधानमंत्री ने बार-बार बिहार का अपमान किया है। वे जब भी मौका पाते हैं बिहार के डीएनए और संस्कृति के बारे में टिप्पणी करते हैं। लालू ने यह भी कहा कि नरेंद्र मोदी हमें बेवकूफ न समझें। हम गरीब हैं लेकिन स्वाभिमान की रक्षा करना जानते हैं। सपा के शिवपाल सिंह यादव ने कहा कि मोदी जादू अब फेल हो चुका है। भाजपा ने भी पलटवार किया। भाजपा नेता रविशंकर पसाद ने कहा रैली में सोनिया सपोर्टिंग रोल में थीं, नीतीश मुखौटा हैं। असली सूत्रधार लालू हैं। लालू पहले मंडल राज-1 का हिसाब दें, फिर पार्ट-2 को बात करें। रैली में भीड़ के लिहाज से काफी लोग पहुंचे। पर कुछ जानकारों का मानना है कि इस स्वाभिमान रैली को लेकर जिस तरह से चार दलों, राजद, जदयू-कांग्रेस और सपा ने लोगों को एकत्र करने के लिए एड़ी-चोटी का पयास किया वह भीड़ बिहार की राजधानी के ऐतिहासिक गांधी मैदान में उम्मीद के अनुरूप नहीं एकत्र हो पाई। नीतीश कुमार की अधिकार रैली में ज्यादा भीड़ थी। बिहार की नजर से देखें तो इस रैली का संदेश यह था जो लालू और नीतीश ने दिया। भाषणों का कम चार घंटे से ज्यादा चला। नीतीश कुमार तो आम सभा के पहले से ही मोदी विरोधी राजनीति के सूत्रधार बन गए थे। इसका अगला चरण यह रहा कि अपने सबसे पबल विरोधी लालू पसाद यादव से हाथ मिलाकर व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को जोड़कर साझा विपक्ष के लिए एक नई जमीन तैयार करने की कोशिश में जुटे। इससे दूसरी पार्टियों को भी बल मिला और वे भी साथ आ खड़ी हुईं। उनकी यह एकजुटता संसद में भी दिखी। गठबंधन नेताओं के अपने-अपने एजेंडे जरूर हैं लेकिन उन्हें पता है कि अगर वे अभी भी एक साथ नहीं आते तो कल को शायद खड़े होने की जमीन ही नहीं बचेगी। दूसरी तरफ भाजपा के लिए भी यह चुनाव जीवन मरण का पश्न बन गया है। बिहार में मोदी ऐसे समय में इस चुनाव का सामना करने जा रहे हैं। जब उनका हनीमून पीरियड बीत चुका है, उनकी लोकपियता का ग्राफ गिरता जा रहा है और जनता ने उनकी नीतियों का मूल्यांकन शुरू कर दिया है। बिहार चुनाव अब सभी पक्षों के लिए पतिष्ठा और सियासी भविष्य का सवाल बन गया है।

Wednesday, 2 September 2015

चक दे इंडिया ः 36 साल बाद ओलंपिक का टिकट

भारतीय महिला खिलाड़ियों के अच्छे दिन आरंभ हो गए हैं। इधर टेनिस स्टार सानिया मिर्जा को राष्ट्रपति भवन में भव्य समारोह में प्रतिष्ठित राजीव गांधी खेल रत्न से सम्मानित किया गया तो उधर खबर आई कि भारतीय महिला हॉकी टीम को 36 साल बाद ओलंपिक में खेलने का मौका मिलेगा। लिएंडर पेस के बाद सानिया देश का सर्वोच्च खेल पुरस्कार पाने वाली दूसरी टेनिस खिलाड़ी हैं। सानिया ने कहाöखेल रत्न मेरे लिए बहुत बड़ा सम्मान है। अप्रैल 2015 में महिला युगल में नम्बर-एक रैंकिंग हासिल करने वाली पहली महिला हैं सानिया मिर्जा। अपनी जोड़ीदार मार्टिना हिंगिस के साथ लगातार तीन महिला युगल खिताब जीत चुकी हैं। विंबलडन जैसे अति प्रतिष्ठित टेनिस टूर्नामेंट का भी युगल फाइनल जीतने का श्रेय सानिया को जाता है। हम सानिया को उनकी उपलब्धियों पर बधाई देते हैं। उधर 36 साल बाद अगले साल ब्राजील में होने वाले ओलंपिक के लिए भारतीय महिला हॉकी टीम ने क्वालीफाई कर लिया है। 1980 के मॉस्को ओलंपिक के बाद पहली बार भारतीय महिला टीम खेलों के इस महापुंभ में खेलेगी। मॉस्को ओलंपिक में भी इसलिए भारतीय टीम को खेलने का मौका मिला था क्योंकि कुछ देशों ने ओलंपिक का बायकाट कर दिया था। दक्षिण कोरिया, अर्जेंटीना, ब्रिटेन, चीन, जर्मनी, नीदरलैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और अमेरिका पहले ही ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर चुके हैं। रियो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने के साथ ही भारतीय महिला हॉकी टीम इतिहास में दूसरी बार ओलंपिक में शिरकत करने वाली है। यह ठीक है कि ऐसा यूरो हॉकी चैंपियनशिप में इंग्लैंड और हॉलैंड की टीमों के फाइनल में पहुंच जाने के कारण हुआ है, लेकिन जुलाई में खेली गई हॉकी वर्ल्ड लीग में पांचवें स्थान पर रहना भी इस टीम के लिए मामूली उपलब्धि नहीं थी। यह स्थान उसने जापान को हराकर हासिल किया था। यह सही है कि मौजूदा भारतीय महिला हॉकी टीम उतनी तगड़ी नहीं है कि इसे लेकर `चक दे इंडिया' जैसे सपने देखे जा सकें। लेकिन अपने स्तर के हिसाब से इसकी हालत उतनी भी बुरी नहीं है। इससे पहले टीम ने सिर्प एक बार 1980 में मॉस्को ओलंपिक में भागीदारी की थी पर उसके कारण का मैं उल्लेख ऊपर कर चुका हूं। यह अलग बात है कि टीम ने किस्मत से मिले इस मौके का पूरा फायदा उठाया और मॉस्को ओलंपिक में चौथा स्थान हासिल किया। अभी हालत यह है कि विभिन्न टूर्नामेंटों के जरिए क्वालीफाई करके आई नौ टीमों में 10वीं टीम के रूप में टीम इंडिया का नाम जुड़ गया है। जल्द ही अफ्रीका और ओसीनिया टूर्नामेंट से निकल कर दो और टीमें ओलंपिक टूर्नामेंट का हिस्सा बनेंगी। चीफ कोच मथियास अहरेंस की देखरेख में 48 भारतीय महिला खिलाड़ी पूरे दम-खम के साथ अभ्यास शिविर में जुटी हैं। इनमें से 33 खिलाड़ियों का ओलंपिक के लिए चयन होगा। हम उम्मीद करते हैं कि टीम का चयन केवल खेल काबालियत पर होगा और इसमें कोई राजनीति नहीं होगी। चक दे इंडिया।

-अनिल नरेन्द्र

अब औरंगजेब नहीं, एपीजे अब्दुल कलाम रोड

हिन्दुस्तान के बदनाम बादशाह अबुल मुज्जफर मुहिउद्दीन मोहम्मद औरंगजेब के नाम पर बने मार्ग का नाम बदलना बिल्कुल सही है। हाल में उठी मांग के बाद लुटियन की दिल्ली की शानदार रोड औरंगजेब रोड अब एपीजे अब्दुल कलाम रोड के नाम से जानी जाएगी। नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) ने शुक्रवार को इस नाम-बदलाव को अपनी मंजूरी दे दी। एनडीएमसी उपाध्यक्ष करण सिंह तंवर ने कहा कि समाज के कुछ प्रबुद्ध वर्गों ने पूर्व राष्ट्रपति के प्रति श्रद्धांजलि के तौर पर इस सड़क का नाम बदलने का अनुरोध किया था। यह मामला शुक्रवार को परिषद के सामने रखा गया, जिसने सर्वसम्मति से इस पर अपनी सहमति दे दी। उन्होंने बताया कि एनडीएमसी अंतिम प्राधिकार है और फिर से नामांकरण के लिए और किसी संवैधानिक मंजूरी की जरूरत नहीं है। भाजपा सांसद महेश गिरी ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इतिहास की गलतियों को सुधारने के लिए औरंगजेब रोड का नाम बदलकर कलाम के नाम पर रखने पर विचार करने का अनुरोध किया था। गिरी ने कहा था कि यह कलाम के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। औरंगजेब रोड इंडिया गेट के समीप ताज मान सिंह होटल से लेकर सफदरजंग रोड तक है और इसे राजधानी के सबसे धनी इलाकों में शुमार किया जाता है। देश के इतिहास में औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान और हिन्दू रियाया पर अत्याचार के लिए जाना जाता है। वह इतना कट्टर था कि उसने अपने परिवार वालों को भी नहीं बख्शा, उसने अपने पिता को कैद किया, भाई को मारा, दर्जनों करीबी रिश्तेदारों को मारा, हिन्दुओं पर जजिया और प्रमुख मंदिरों को ध्वस्त कर उन पर मस्जिदें बनाईं, शियाओं को मारा और यहां तक कि सहयोगियों तक को नहीं बख्शा और यह सब इस्लाम के नाम पर किया गया। सिख गुरुओं के प्रति उसके कूर बर्ताव के कारण भी उसे खलनायक माना जाता रहा है। पर एक तबका ऐसा भी है जिसमें ओवैसी सरीखा नेता शामिल है जो इसे गलत बता रहा है और आरोप लगा रहा है कि इसे इतिहास की हकीकत बदलने का कदम मानते हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पहले तो ट्विट करके इसका स्वागत किया पर बाद में किसी दबाव के चलते उन्होंने इसको वापस ले लिया। अरविंद केजरीवाल ने रोड का नए नाम रखने के लिए केंद्र सरकार की तारीफ की। शाम चार बजकर 50 मिनट पर ट्विटर पर ग्रेट लिखकर केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय को शुक्रिया तक कहा। मोदी सरकार के विरोध के बावजूद केजरीवाल द्वारा केंद्र सरकार की तारीफ करने पर भाजपा सांसद महेश गिरी ने शाम साढ़े पांच बजे ट्विट कर उन्हें जवाबी बधाई दी। साथ ही गिरी ने लिखा कि अरविंद जी यह जानकारी साझा करने के लिए शुक्रिया। पर केजरीवाल बैक मार गए। खैर, हम डाक्टर अब्दुल कलाम के नाम पर इस रोड का नाम रखने का स्वागत करते हैं।

Tuesday, 1 September 2015

26/11 के बदले पर आधारित फिल्म फैंटम पाक में बैन?

रविवार शाम को मैंने बहुचर्चित कबीर खान की फिल्म फैंटम देखी। डायरेक्टर कबीर खान आतंकवाद के मुद्दे को लेकर फिल्में बनाते रहते हैं। अकसर उनकी हर फिल्म में दो देशों (भारत और पाकिस्तान) की कहानी बयान की जाती है। अभी ईद के मौके पर आई उनकी फिल्म बजरंगी भाईजान को दोनों मुल्कों के दर्शकों ने काफी पसंद भी किया। लेकिन सैफ अली खान और कैटरीना कैफ को लेकर उनकी इस फिल्म फैंटम पर पाकिस्तान ने बैन लगा दिया है। पाकिस्तान की एक अदालत ने मुंबई के 26/11 हमलों के मास्टर माइंड हाफिज सईद जो लश्कर-ए-तैयबा के मुखिया भी हैं, की याचिका की सुनवाई करते हुए बॉलीवुड फिल्म फैंटम की रिलीज पर रोक लगा दी है। लश्कर व जमात-उद-दावा के सरगना हाफिज सईद ने याचिका में कहा था कि फिल्म में उसके और संगठन के खिलाफ दुप्रचार दिखाया गया है। सईद की याचिका पर सुनवाई करते हुए लाहौर हाई कोर्ट के जज जस्टिस शाहिद बिलाल हसन ने इस फिल्म को पाक के सिनेमाघरों में दिखाने पर रोक लगा दी। पाक में यह फिल्म 28 अगस्त को रिलीज होनी थी। दुखद पहलू यह है कि पाकिस्तान के सैंसर बोर्ड तक ने फिल्म को देखे बगैर ही इस पर प्रतिबंध लगा दिया। हम समझते हैं कि पाकिस्तान इस फिल्म की कहानी से बौखला गया है। यह फिल्म लेखक हुसैन जैदी के उपन्यास मुंबई एवेजर्स पर आधारित है। फैंटम मुंबई के 26/11 आतंकी हमले के बाद के हालात पर बनी है। इस हमले के जो चार मास्टर माइंड थे हाफिज सईद, जकीउर्रहमान लखवी, डेविड हैडली और साजिद मीर को भारत का एक सैनिक अधिकारी किस तरह उनके घरों में जाकर मारता है दर्शाया गया है। फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह भारत ने 26/11 के मास्टर माइंड्स को मार कर बदला लिया है। फिल्म की कहानी कुछ ऐसी है। सेना के पूर्व अधिकारी डैनियल खान (सैफ) की जिस पर कायरता दिखाने और अपनी टीम को खतरे में डालने का आरोप है। इसे लेकर उसके पिता भी उससे नाराज हैं। सरकार की मंजूरी के बिना ही इंडियन सीकेट सर्विस के हैड रॉय (सव्यसांची मुखर्जी) ऐसे खतरनाक मिशन को ग्रीन सिग्नल दे देते हैं। इसे सीकेट मिशन के लिए डैनियल खान को चुनते हैं। रॉ एजेंट समित मिश्रा एक प्लान तैयार करता है जिसमें एक कोर्बटा एक्शन के जरिए आतंकियों को सबक सिखाने की ठान लेता है। ऐसे में याद आती है कि डैनियल खान की और उसे ढूंढकर इस मिशन के लिए मनाया जाता है। बाकी कहानी मैं नहीं  बताऊंगा क्योंकि अगर बता दी तो आपका सस्पेंस ही खत्म हो जाएगा। फिल्म का एक्शन गजब का है। फिल्म देखते समय ऐसा लगता है कि आप कोई विदेशी फिल्म देख रहे हो। सैफ अली खान ने बहुत जोरदार भूमिका निभाई है। कैटरीना कैफ ने अपनी तरफ से अच्छी कोशिश की है। फिल्म की शूटिंग विदेश के कई शहरों में हुई है। लड़ाई के कुछ सीन बेरुत में शूट हुए हैं। वह असल लड़ाई के सीन हैं। एक्शन सीन्स के लिए यकीनन सैफ ने जबरदस्त मेहनत की है। कुछ सीन कबीर खान की पहली फिल्म एक था टाइगर की याद भी दिलाते हैं। सीकेट सर्विस के हैड रॉय के किरदार में सव्यसांची मुखर्जी ने बेहतरीन एक्टिंग की है। शाहनवाज प्रधान जो फिल्म में हाफिज सईद की भूमिका निभा रहे हैं इतने बढ़िया लगे कि उनकी भूमिका पाकिस्तान में फिल्म पर बैन लगने का एक कारण था। पाकिस्तान इस बात से भी घबरा गया कि इस फिल्म से यह भी एक तरह से साबित हो जाएगा कि 26/11 हमलों का जिम्मेदार पाकिस्तान था, उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई थी और इस प्लान को अमली जामा पहनाया लश्कर-ए-तैयबा के 10 लड़ाकों ने। याद रहे कि अजमल कसाब इनमें से ही एक था जिसे जिंदा पकड़ लिया गया था और बाद में फांसी पर चढ़ा दिया गया था। इस फिल्म ने यह भी दर्शाया है कि किस तरह भारत आतंकवाद के गढ़ पाकिस्तान में घुसकर इन आतंकी सरगनाओं को ठिकाने लगा सकता है। जवाबी कार्रवाई का एक रास्ता यह भी है। आप सब इस फिल्म को जरूर देखें।

-अनिल नरेन्द्र

शीना, इंद्राणी और मर्डर मिस्ट्री

सनसनीखेज शीना बोरा हत्याकांड वैसे तो आपराधिक घटना है मगर इसने हमारे आज के फाइव स्टार संस्कृति समाज को हिलाकर रख दिया है। इस घटना ने आधुनिक जीवनशैली का एक अत्यंत काला पक्ष सामने लाकर रख दिया है। शीना बोरा हत्याकांड को लेकर हो रहे ताजा खुलासों के बाद स्वाभाविक ही है एक बार फिर मानवीय रिश्तों की दरकती जमीन पर चिंता जताई जाने लगी है। एक मां अपने ही बच्चों को इसलिए भाई-बहन के रूप में पेश करती रही और उन्हें डरा-धमका कर अपने रिश्तों को उजागर करने से रोकती रही कि उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा और आलीशान जिंदगी पर आंच न आए। वह खुद तो शानो-शौकत और चमक-दमक की जिंदगी बिताती रही पर पहले विवाह से पैदा हुए दो बच्चों को परदे की ओट में रखकर उन्हें अपने रहमोंकरम पर पलने को मजबूर करती रही। महत्वाकांक्षा व्यक्ति को इतना कूर भी बना सकती है कि अपनी ही औलाद का गला घोंटने में उसके हाथ नहीं कांपते। इंद्राणी मुखर्जी इसका ताजा उदाहरण है। पुलिस की छानबीन में पता चला कि इंद्राणी मुखर्जी ने अपने तीसरे पति पीटर मुखर्जी और आसपास के तमाम लोगों से यह बात छिपाए रखी कि 21-22 साल की उम्र में उसकी पहली शादी हुई थी, जिससे दो बच्चे शीना और मिखाइल हैं। इन दोनों बच्चों को वह छोटी उम्र में ही अपने माता-पिता के पास छोड़कर अपनी महत्वाकांक्षाओं के पर लगाकर घर से निकल गई थी। फिर उसने कोलकाता के एक व्यापारी से विवाह किया। बाद में एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी चैनल के कार्यकारी अधिकारी पीटर मुखर्जी से मेलजोल बढ़ाया और उनसे विवाह करके साथ रहने लगी। पहले विवाह से पैदा हुई बेटी शीना को मुंबई तो ले गई पर उसे अपनी बहन बताकर रखा। जब पीटर मुखर्जी की पहली शादी से पैदा हुए बड़े बेटे से शीना का प्रेम हो गया तो इंद्राणी को नागवार गुजरा और उसने शीना की हत्या कर दी। कहीं न कहीं इसके पीछे पैसों का मामला भी जुड़ सकता है। रोज-रोज नए खुलासे हो रहे हैं। हालांकि यह घटना इतनी उलझी और इतने सवालों में लिपटी हुई है कि किसी के भी बारे में साफ-साफ कुछ भी कहना फिलहाल मुश्किल है। पर जाहिर है कि इस पढ़े-लिखे, पांच तारा संस्कृति के समाज में पैसा, पद, प्रतिष्ठा और चमक-दमक वाली जिंदगी का मोह इतना भारी है कि उनकी मानवीय संवेदनाएं पुंद होती जा रही हैं। आज के इस दौर में रिश्ते कितने खोखले, स्वार्थपूरक और छद्म हो गए हैं, यह घटना इसकी मिसाल बन गई है। इससे तो यह भी लगता है कि आरुषि हत्याकांड में मां-बाप का हाथ होना भी अब संभव ही लगता है। उस समय यह मानना मुश्किल लग रहा था कि कोई मां-बाप अपनी ही औलाद का कत्ल कर सकते हैं? मगर जब ऐसे संबंध झूठ और निहायत खुदगर्जी के आधार पर बनने लगें और सच्चाई छिपाने के लिए अपनी ही संतान की हत्या किसी सामान्य गतिविधि की तरह कर दी जाए तो यही समझना चाहिए कि मानव सभ्यता की यात्रा उल्टी दिशा में यानि बर्बरता की तरफ मुड़ गई है।