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Monday, 7 September 2015

Warning of Army Chief Gen. Dalbeer Singh Suhaag

Pakistan is not going to desist from its actions. It seems in Pakistan neither poverty is a problem nor inflation or disease. It has one and only problem i.e. Kashmir. It sings Kashmir song day and night, and is adopting dual policy to achieve its objective.  The first is to raise Kashmir issue at international forums or by forcibly creating an opportunity and the other is to keep disturbing Kashmir peace through infiltration. Through these jehadis it is waging a proxy war against India. Even the self proclaimed champion of anti-terrorist campaign, US has once again warned Pakistan which is running the terror nursery in harsh words to take strict and effective steps to abolish terrorist camps and jihadist set ups being operated and financed from its territory. The warning was given to Pak Prime Minister and Army Chief by US Security Advisor on her one day visit to Pakistan recently. It has also been reported that Pakistan is preparing muslim youths between in the age group of 18 to 30 years to create terror in India by instigating them in the name of religion. It’s provoking terrorists by showing them fake images and videos of atrocities allegedly committed on Muslims in various countries of the world including Palestine, Kashmir etc.  The groups prepared in terrorist camps are deputed on security duties in the programmes of terrorist organisation Jamaat-ud-Dawa. Recently apprehended Pak terrorist Naved and his co-trainee terrorists were deputed on security duty in the programme of Jamaat-ud-Dawa led by Hafiz Saeed in Meenar-e-Pakistan at Lahore. Indian security agencies have got solid proofs through the disclosure by the captured terrorist Naved about the alliance between different terrorist set ups and their intention to create terror in India. India will share these proofs, if necessary, with US and UN including the countries on whose shoulder Pakistan often cries. Naved informed that terrorists are trained to undergo of 100 round firing from AK-47, 5 round firing from LMG and 10 round firing from pistol at one time. These trainees are of 20 to 30 years of age. Terrorists are also taught map reading, GPS planting, compass reading, radio communication, working on Google Earth. Indian Security agencies have completed mapping of 24 locations of Naved in Pakistan, as such none can raise question over his (Naved’s) being a Pakistani citizen. Jong company phone and mobile numbers of Naved have also been detailed. The level of terrorist training being run in Pakistan is revealed from this information from Naved that 180 terrorists are given 21 days military training in Daur-e-Aam at a time. Fresh disclosures from Naved and reports from across the border by our intelligence agencies make it clear that  Pakistan is preparing a huge army of terrorists whom it wants to infiltrate under the cover of firing on border. India should not expect support from any other country in this war. Especially from US, who has always been playing dual role. On one hand it says that Pakistan is the largest terrorist nursery in the world and shelter place of Osama Bin Laden and Mulla Umar, on the other hand it fully supports Pakistan with financial help and military weapons. When US strictly orders Pakistan why doesn’t Pakistan take note of it? In fact to much extent the double standard of the US is responsible for this. US in its own interest has officially recognized the term good and bad terrorist groups of Pakistan. It chooses to keep silent over the Pakistani misadventure on border and the terror hit territory inside India which is four times more as compared to the terrorist group targeting US forces and establishments in Afghanistan. Terrorists have taken advantage of this US dual policy and have got such a hold over power in association with army and Pakistan intelligence agency ISI that nobody has the might or will to control them.

It is for these reasons the Indian Army Chief Gen. Dalbir Singh Suhaag has told the three armed forces of India (Indian Army, Navy & Air Force) to be prepared for swift, short nature of future wars. Slamming Pakistan for using "new methods" to create unrest in Jammu and Kashmir as well as spread the "arc of violence" to other areas, the Indian Army on Tuesday said it was ready for short wars which could be swiftly unleashed without much warning He said we should always be prepared for a quick and precise war in future. Without naming Pakistan he has said that in the new circumstances, the warning time from the enemy for war will be less. So it is necessary for India to be prepared at all times. In the preview of the ongoing tension with Pakistan on border and continuous violation of the ceasefire, the statement of the army chief gains much importance.

In such circumstances the question also arises as to what is the utility and justification of the proposed meeting between the commanders of BSF and Pak Rangers? Why are we humiliating ourselves again and again? The fresh statement of the Pakistani Prime Minister Nawaz Shareef should be an eye opener for India. The proverb also says: Some people understand only the language of force.

-        Anil Narendra

Sunday, 6 September 2015

तीन साल के मासूम के शव से हिली दुनिया

तुर्की के तट पर मिले तीन साल के सीरियाई मासूम के शव की चर्मस्पर्शी तस्वीर ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। इस तस्वीर की वजह से दुनिया का ध्यान वैश्विक शरणार्थी समस्या पर गया है। एक ओर जहां पूरी दुनिया में खास तौर पर यूरोप में शरणार्थी समस्या को लेकर जगह-जगह प्रदर्शन हुए हैं तो वहीं दूसरी ओर फ्रांस, जर्मनी और इटली ने यूरोपीय शरणार्थी नियमों के बारे में दोबारा सोचने और विचार करने की अपील की है ताकि 28 सदस्यीय यूरोपीय देशों के बीच शरणार्थियों का बोझ उठाने का साफ तौर पर बंटवारा हो सके। इससे पहले बुधवार को तुर्की के बोरडेम तट पर मिले मासूम बच्चे के शव की पहचान तीन वर्षीय अयलान कुर्दी के रूप में हुई है। तुर्की की मीडिया एजेंसी डोगन की रिपोर्ट के अनुसार अयलान और उसका समूह आईएस (इस्लामिक स्टेट) से बचने के लिए सीरिया के कोबाने से भागकर तुर्की पहुंचा था। इस बच्चे के पांच वर्षीय भाई गालिप और मां रेहान की भी नौका डूबने से मौत हो गई। अयलान की सोशल मीडिया में वायरल हुई इस तस्वीर ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। यह बच्चा उन 12 सीरियाई लोगों में से एक है जो ग्रीस पहुंचने की कोशिश कर रहे थे, मगर नाव डूब जाने से बीच रास्ते में ही उनकी मौत हो गई। दो नावों में सवार 23 लोगों में से महज नौ लोग ही जीवित बच सके, जिसमें उसका पिता अब्दुल्लाह कुर्दी भी है। नौका हादसे में अपने बीवी-बच्चों को गंवाने वाले इस अभागे अब्दुल्लाह ने बताया कि उसकी इच्छा बीवी और बच्चों के शवों के साथ कोबाने लौटने की है, जहां वह उन्हें दफनाने के बाद खुद उनके बगल में दफन होना चाहता है। बीबीसी के एक ट्विट के मुताबिक अब्दुल्लाह कुर्दी ने बताया कि मैंने अपनी बीवी और बच्चों को पानी में पकड़ने की कोशिश की मगर कोई उम्मीद नहीं थी। यूएन मानवाधिकार परिषद के मुताबिक सीरिया में 2011 से जारी गृहयुद्ध के चलते 40 लाख से ज्यादा सीरियाई नागरिक पलायन को मजबूर हो चुके हैं। इस साल अब तक तुर्की में सबसे ज्यादा करीब 17 लाख शरणार्थी पहुंचे हैं। यूरोपीय संघ के बड़े देशों ने इस समस्या से निपटने के लिए कोशिशें तेज तो कर दी हैं मगर इन देशों में मतभेद भी साफ तौर पर उभरकर सामने आ रहे हैं। यूरोपीय देशों का कहना है कि प्रवासियों की समस्या एक खतरा तो है मगर प्रवासियों का बोझ उठाने के लिए यूरोपीय संघ के 28 देशों के पास कोई तय कार्यक्रम नहीं बन सका। उम्मीद की जाती है कि इस दयनीय व मानवीय त्रासदी की समस्या का जल्द कोई हल निकलेगा।

-अनिल नरेन्द्र

मुलायम के धोबीपाट दांव से नीतीश-लालू चित

कुश्ती में धोबीपाट और चरखा दांव के माहिर समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने अब की सियासी अखाड़े में अपने ही समधी लालू यादव पर दांव आजमाया। बिहार चुनाव के जरिए खुद को मजबूत साबित करने की कोशिश कर रहे लालू से अलग होकर मुलायम ने साबित कर दिया है कि वे सियासत के माहिर खिलाड़ी हैं। बिहार में मोदी मैजिक व भाजपा को रोकने के लिए पहले विलय और फिर महागठबंधन की मुहिम चुनाव के पहले ही तिरोहित होती दिख रही है। सीटों के बंटवारे में सपा की अनदेखी से नाखुश चल रहे पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अपनी पार्टी संसदीय दल की बैठक बुलाकर सपा को महागठबंधन से अलग करने का फैसला कर लिया और यह भी घोषणा कर दी कि वह समान विचारधारा वाले (वामदल) कुछ अन्य दलों के साथ अथवा स्वतंत्र रूप से राज्य की सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। एनसीपी के बाद जिस तरह समाजवादी पार्टी महागठबंधन से बाहर निकली है उसे बिहार की सत्ता बचाने में लगे नीतीश-लालू खेमे के लिए सुखद संकेत नहीं कहा जा सकता है। समाजवादी पार्टी न सिर्प जनता परिवार की सदस्य थी बल्कि उसके मुखिया मुलायम सिंह यादव को जनता परिवार का अध्यक्ष भी घोषित किया गया था। बिहार में महागठबंधन से अलग होने के फैसले से मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी को विधानसभा चुनाव में भले ही कुछ खास फायदा न हो, लेकिन इससे नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव को झटका जरूर लगेगा। वास्तव में बिहार में सपा के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है, इसके बावजूद जद (यू), राजद और कांग्रेस के गठबंधन ने उसे पांच सीटें दी थीं, लेकिन पार्टी की यह नाराजगी वाजिब है कि टिकट बंटवारे पर होने वाली चर्चा में उसके नेता को विश्वास में नहीं लिया गया। फिर भूलना नहीं चाहिए कि इसी वर्ष अप्रैल में ही जनता पार्टी के छह पुराने धड़ों को मिलाकर जनता परिवार की एकजुटता की घोषणा की गई थी और बिना नाम वाली इस प्रस्तावित नई पार्टी का मुखिया भी तो मुलायम को बनाया गया था। जनता दल (यू) के नेता शरद यादव ने नेताजी को मना लेने की उम्मीद जताई है, लेकिन सपा नेता सियासत के ऐसे माहिर खिलाड़ी हैं कि वह कोई भी दांव बिना सोचे-समझे नहीं चलते। यह भी कम रोचक नहीं कि नाता तोड़ने वाले मुलायम सिंह एक समय जनता परिवार की एकता के प्रयासों के केंद्र में थे। जनता परिवार की एकता और बिखराव का यह पहला वाकया नहीं है। लेकिन इस बार बिहार से प्रयोग कर देशभर में भाजपा और कांग्रेस विरोधी गोलबंदी की जो पहल मुलायम सिंह ने की थी, उसमें उनके साथियों ने निजी स्वार्थ और अहंकारवश पहला झटका उन्हें दे ही डाला। बिहार में भाजपा और नरेंद्र मोदी को मिलती दिख रही बढ़त से बौखलाए नीतीश कुमार मुलायम सिंह की चौखट चूमते-चूमते जिस तरह सोनिया गांधी की गोद में जा बैठे, वह नागवार तो राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को भी लगा किन्तु मुलायम इसे पचा नहीं सके। अनदेखी की इंतिहा भी हुई कि महागठबंधन के प्रेरक और सूत्रधार नेताजी से सीटों के बंटवारे से पहले बात तक करनी जरूरी नहीं समझी गई और सोनिया गांधी की पार्टी को 40 सीटें थमा दीं जबकि पिछले चुनाव में उसे आधा दर्जन से भी कम सीटों पर विजय मिली थी। कांटे की लड़ाई में एक-एक वोट कीमती साबित होने वाला है। यह नौबत तब है जबकि गठबंधन के दलों को टिकट बंटवारे का काम करना अभी बाकी है। अंदेशा है कि राजद और जद (यू) के लिए टिकट बंटवारा करना आसान नहीं होगा क्योंकि वर्षों बाद दोनों इतनी कम सीटों पर लड़ रहे हैं। इस सवाल को सुलझाने में यदि असंतोष उभरा या कार्यकर्ताओं में समन्वय की कमी आई तो इसका खामियाजा पहले से कमजोर पड़े महागठबंधन को भुगतना पड़ सकता है। फिलहाल भाजपा बिहार के हो रहे तमाशे को देख रही है और मन ही मन में उसके लड्डू फूट रहे होंगे।

Saturday, 5 September 2015

सेनाध्यक्ष जनरल दलबीर सिंह सुहाग की चेतावनी

पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज आने वाला नहीं है। पाकिस्तान के अंदर लगता है कि न तो गरीबी की समस्या है, न महंगाई की, न बीमारी की। एक ही समस्या है वह है कश्मीर। दिन-रात वह कश्मीर का राग अलापता रहता है। इसमें वह दोतरफा नीति पर चल रहा है। पहला तो उसका हर मौके पर या जबरदस्ती मौका बनाकर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाना और दूसरा है कि घुसपैठ कराकर कश्मीर में आग लगाते रहना। भारत के खिलाफ उसने इन जेहादियों के माध्यम से छद्म युद्ध छेड़ रखा है। अब तो दुनियाभर में आतंकवाद विरोधी मुहिम में चौधराहटों की कमान थामे अमेरिका ने भी एक बार फिर आतंकी नर्सरी चला रहे पाकिस्तान को बहुत कड़े अंदाज में खबरदार किया है कि वह अपने यहां से संचालित और पोषित आतंकी शिविरों और जेहादी संगठनों को खत्म करने के लिए कड़ी और प्रभावी कार्रवाई करे। एक दिन के दौरे पर पाकिस्तान गईं व्हाइट हाउस की सुरक्षा सलाहकार ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख को यह तस्दीक दी। खबर यह भी आई है कि पाकिस्तान धर्म के नाम पर भड़काकर 18 से 30 साल की उम्र के बीच में मुस्लिम युवाओं को भारत में आतंक परोसने के लिए तैयार कर रहा है। फिलस्तीन, कश्मीर सहित दुनिया के अलग-अलग देशों में मुसलमानों पर कथित अत्याचार की फर्जी तस्वीरें और वीडियो दिखाकर आतंकियों को बरगला रहा है। आतंकी कैंपों में तैयार होने वाली फौज को आतंकी संगठन जमात-उद-दावा के कार्यक्रमों में सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात किया जाता है। हाल ही में पकड़े गए पाक आतंकी नावेद और उसके साथ प्रशिक्षण लेने वाले आतंकियों को लाहौर के मीनार-ए-पाकिस्तान में हाफिज सईद की अगुवाई वाले जमात-उद-दावा के कार्यक्रम में सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात किया गया था। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को जिंदा पकड़े गए आतंकी नावेद के खुलासे पर पाकिस्तान के विभिन्न आतंकी संगठनों के बीच गठजोड़ और भारत में आतंक परोसने की उनकी मंशा पर पुख्ता सबूत मिले हैं। जरूरी होने पर भारत इन सबूतों को अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र सहित उन देशों से भी साझा करेगा जिनके आगे पाकिस्तान रोना रोता रहता है। नावेद ने जानकारी दी कि आतंकियों को एके-47 से 100 राउंड, एलएमजी से पांच राउंड और पिस्टल से एक बार 10 राउंड फायरिंग का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षकों की उम्र भी 20 से 30 साल के बीच होती है। आतंकियों को मैप रीडिंग, जीपीएस प्लांटिंग, कम्पास रीडिंग, रेडियो कम्युनिकेशन, गूगल अर्थ पर काम करना भी सिखाया जाता है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने नावेद की पाकिस्तान में 24 लोकेशन की पूरी मैपिंग की है। इससे कोई भी उसके (नावेद) पाकिस्तानी होने पर सवाल नहीं उठा सकता। नावेद के जोंग कंपनी के फोन और मोबाइल नम्बरों का ब्यौरा भी दिया गया है। पाकिस्तान कितने बड़े स्तर पर आतंकी ट्रेनिंग चला रहा है नावेद की इस जानकारी से मिलता है कि एक साथ 180 आतंकियों को 21 दिन की मिलिट्री ट्रेनिंग दौर-ए-आम में मिलती है। नावेद की ताजा जानकारियों व हमारी गुप्तचर एजेंसियों के पास सीमा पार की रिपोर्टों से यह तय है कि पाकिस्तान एक बहुत बड़ी आतंकियों की फौज तैयार कर रहा है जिन्हें समय-समय पर सीमा पर फायरिंग करके भारत के अंदर घुसेड़ना चाहता है। भारत को इस लड़ाई में किसी और देश से समर्थन की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। खासतौर पर अमेरिका से। अमेरिका ने हमेशा दोहरा खेल खेला है। एक सांस में कहता है कि पाकिस्तान दुनिया की सबसे बड़ी आतंकी नर्सरी है और ओसामा बिन लादेन व मुल्ला उमर की शरणस्थली है वहीं दूसरे हाथ से पाकिस्तान की दबाकर आर्थिक व सैनिक हथियारों से मदद करता है। जब अमेरिका इतनी सख्त हिदायतें पाकिस्तान को देता है तो पाक उसकी परवाह क्यों नहीं करता? दरअसल इसके लिए काफी हद तक अमेरिका का खुद दोहरा नजरिया जिम्मेदार है। अमेरिका ने अपने निजी स्वार्थ में पाकिस्तान की अच्छे-बुरे आतंकवादी गुटों की व्याख्या को मान्यता प्रारंभिक तौर पर दे रखी है। जो आतंकी संगठन अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य बलों और प्रतिष्ठानों को निशाना बनाते हैं उससे चार गुना ज्यादा आतंकी उत्पात झेल रहे भारत के भीतर और सीमा पर पाकिस्तानी करतूतों पर वह चुप्पी साधे रहता है। अमेरिका की इस दोहरी नीति का फायदा उठाकर आतंकियों ने सेना और पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई से मिलकर सत्ता प्रतिष्ठान पर ऐसी पकड़ बना ली है कि उन्हें रोकने की सामर्थ्य  किसी में नहीं। इन्हीं कारणों से भारत के सेना अध्यक्ष दलबीर सिंह सुहाग ने तीनों सेनाओं (भारतीय थल सेना, जल सेना और वायुसेना) से तेज और छोटे युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा है। उन्होंने कहा कि भविष्य में हमें छोटे और त्वरित युद्ध के लिए हमेशा तैयार रहने की जरूरत है। उन्होंने पाक का नाम लिए बिना आगाह किया है कि नए हालात में छोटे युद्ध के लिए दुश्मन की ओर से चेतावनी का वक्त कम मिलेगा। इसलिए जरूरी है कि भारत हमेशा तैयार रहे। सीमा पर पाक के साथ जारी मौजूदा तनाव और सीजफायर में लगातार हो रहे उल्लंघन के मद्देनजर सेना प्रमुख का यह बयान काफी अहम माना जा सकता है। इन परिस्थितियों में सवाल यह भी उठता है कि प्रस्तावित भारत की बीएसएफ और पाक रेंजर्स कमांडरों की बैठक का औचित्य क्या है? क्यों हम बार-बार जलील होते हैं? पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के ताजा बयान से तो भारत की आंखें खुलनी चाहिए। वह कहावत है न लातों के भूत बातों से नहीं मानते।

-अनिल नरेन्द्र

Friday, 4 September 2015

Condemning the suppression cycle over Egyptian reporters

Egypt has started a suppression cycle on the media. An Egyptian court has punished three reporters of TV channel Al-Jazira with three years imprisonment. All these were punished for working without press license and telecasting news harmful for Egypt by the court of Judge Haroon Fareed.  Reporters having been punished in second hearing of the case are Mohd. Fahmi, Bahar Mohammed and Peter Grest. Mohd. Fahmi is presently a Canadian citizen quitting Egyptian citizenship, Bahar Mohammed belongs to Egypt and Peter Grest is an Australian citizen repatriated to Australia. Earlier all the three had been imprisoned for seven to ten years but now it has been reduced to three years. Judge Haroon Fareed said that they are neither members of Press Syndicate nor a telecaster syndicate.  They were working without a license. The trio have refuted the charges framed against them.  US has urged the Egyptian Government to stop this suppression and expressed its deep concern and despair.  External Affairs spokesperson John Kerry stated that US is deeply concerned and despaired by the judgement of the Egyptian court regarding the three reporters of Al Jazira. He said that we urge the Egyptian Government to take all possible steps to revise this judgement. He said that the judgement weakens the liberty to expression essential for stability and progress.

On the other hand, the Egyptian President Abdel Fateh Al Sisi has approved the controversial anti-terrorist law. Now no reporter or media will be able to report against the government stated release regarding the terrorist attacks. The reporter violating this law may be booked under the anti-terrorist law. Provisions have been made to save army and policemen from the legal fallout of their action. The new law has been implemented by publishing it in the gazette. According to this law, broadcasting of false information against the official statement may lead to two years’ imprisonment, besides fine of 2 to 5 lac Egyptian pound may be imposed. Media has strongly opposed it. Special courts have also been established. Legal provisions to save their judges, police and army personnel from strictness during judgements or while on duty have also been included in this law.  Moreover, provision has been made for death sentence for forming terrorist group or joining such group. We oppose the steps of Egyptian Government to suppress the reporters and condemn the efforts to ban the freedom of expression of speech.

ANIL NARENDRA

सिर्फ आतंकवादी और देशद्रोह मामलों में मौत की सजा की सिफारिश

फांसी की सजा के मामले में विधि आयोग की सिफारिश उस बहस को लेकर उस समाधान की ओर हम जा सकते हैं जो केवल अपने ही देश में नहीं दुनिया के कई अन्य देशों में भी छिड़ी हुई है। सवाल है फांसी देने की सजा? यह कब दी जाए, किसको दी जाए? विधि आयोग ने जो सिफारिश की है उसके अनुसार केवल आतंकवाद और राष्ट्रद्रोह के मामलों में फांसी की सजा दिए जाने की पैरवी है। आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एपी शाह ने कहा कि कमीशन के नौ में से छह सदस्य रिपोर्ट से सहमत हैं। तीन असहमत सदस्यों में दो सरकार के प्रतिनिधि हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि आंख के बदले आंख का सिद्धांत हमारे संविधान की बुनियादी भावना के खिलाफ है। बदले की भावना से न्यायिक तंत्र नहीं चल सकता। रिपोर्ट इस मुद्दे पर केंद्रित है कि भारत में मौत की सजा होनी चाहिए या नहीं? रिपोर्ट की एक प्रति कानून मंत्री को सौंपी जाएगी। पैनल के प्रावधानों में बदलाव की मांग पर संसद में ही विचार होगा। यह रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मुंबई सीरियल बम ब्लास्ट के दोषी याकूब मेमन को फांसी दिए जाने के बाद अब इस पर बहस शुरू हो गई है। आयोग के कुछ प्रमुख निष्कर्ष यह हैं। कानून में उम्रकैद का मतलब उम्रकैद होता है। एक तय समय के बाद रिहाई राज्य सरकार करती है। कई राज्यों में अलग-अलग तरह के मामलों में उम्रकैद की सीमा अलग-अलग तय की गई है। सारा जोर फांसी पर होने की वजह से पुलिस और न्यायिक तंत्र और खुद अपराधी के सुधार जैसी बातों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने रेयरेस्ट ऑफ द रेयर मामलों में फांसी दिए जाने का फैसला दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट खुद कई बार निचली अदालतों में मनमाने तरीके से दी गई फांसी की सजा पर चिंता जता चुका है। राष्ट्रपति और राज्यपाल को मिले माफी के अधिकार के बावजूद गलत शख्स को फांसी मिल जाने की आशंका पूरी तरह से दूर नहीं होती। फांसी की सजा अकसर आर्थिक-सामाजिक रूप से कमजोर लोगों को ही मिलती है। हमारी सिफारिश है कि फिलहाल सिर्प आतंकवाद और राष्ट्रद्रोह के मामलों में फांसी दी जाए। हम उम्मीद करते हैं कि एक दिन हर तरह के अपराध के लिए फांसी की सजा बंद हो जाएगी। यह तो विधि आयोग का कहना है। हालांकि विधि आयोग ने फांसी की सजा को लेकर अपनी जो सिफारिश की है उस पर खुद आयोग के सदस्य एकमत नहीं थे, लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि फांसी की सजा को पूरी तरह से समाप्त करने की सिफारिश नहीं की गई। आतंकवाद और राजद्रोह के मामले में फांसी की सजा बरकरार रखने की जो सिफारिश की गई वह सर्वथा उचित है। भारत आतंकवाद के जैसे खतरे का सामना कर रहा है उसे देखते हुए इस सजा को बिल्कुल समाप्त करने से देश की सुरक्षा को नुकसान हो सकता है। वैसे भी यह तर्प भी है कि फांसी की सजा उन आतंकियों के लिए प्रतिरोध का काम नहीं कर सकती जो मरने-मारने पर आमादा हैं। यह एक हद तक सही है, लेकिन इसका भी कोई औचित्य नहीं बनता कि जो आतंकी खूनखराबे पर आमादा हो अथवा जिन्होंने खुद को आत्मघाती हमलावर के रूप में बदल लिया हो उन्हें फांसी की सजा से मुक्त रखा जाए। रेयरेस्ट ऑफ द रेयर केसों में भी फांसी देना सही है। निर्भया कांड जैसे केसों में जहां कि बर्बरता, कूरता से हत्या की जाए वहां फांसी ही देना उचित होगा। अपराधियों में भय भी पैदा करना जरूरी है। बिना भय के कानून-शासन नहीं चल सकता। चूंकि पूरा मुद्दा ही बहस का है जो देश में छिड़ी हुई है इसलिए देखें कि क्या निष्कर्ष निकलता है?

हर घंटे देश में 15 लोग आत्महत्या कर रहे हैं?

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में पढ़ने वाली छात्रा का छात्रावास में खुदकुशी करना, हैदराबाद में एक छात्र का खुदकुशी करना चिंता का विषय है। देश में आत्महत्याओं की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। देश में हर घंटे 15 लोग आत्महत्या कर लेते हैं। पिछले साल (2014) में एक लाख 31 हजार से ज्यादा लोगों ने अपनी जान दी। इस मामले में राज्यों में महाराष्ट्र और शहरों में चेन्नई शीर्ष पर है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ओर से जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार साल 2014 के दौरान जिन लोगों ने आत्महत्या की उनमें से 69.7 फीसद की सालाना कमाई एक लाख रुपए से कम थी। दूसरे शब्दों में गरीबी का कारण। गरीबी जीवन को किस तरह प्रभावित करती है इसी से पता चलता है कि पिछले साल खुदकुशी करने वालों में करीब 70 फीसदी वह थे जिनकी आय एक लाख रुपए (वार्षिक) से कम थी। जबकि अपनी जिंदगी खत्म करने वाले 26.9 फीसद सालाना एक लाख से पांच लाख रुपए कमाते थे। इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल राष्ट्रीय दर की तुलना में शहरों में आत्महत्या की दर ज्यादा थी। राष्ट्रीय दर 10.6 फीसद के मुकाबले शहरी दर 12.8 फीसद थी। जहां तक आत्महत्याओं की वजहों की बात है तो उसमें पारिवारिक समस्याओं (शादी से इतर) का योगदान 21.7 फीसद रही, जबकि जान देने के पीछे 18 फीसद बीमारी वजह थी। इस आंकड़े से यह भी पता चलता है कि आत्महत्या के प्रत्येक छह मामले में एक गृहणी शामिल थी और कुल पुरुष व महिला का अनुपात 68.32 था। 2014 में आत्महत्या करने वालों में सर्वाधिक 19.7 फीसद स्वरोजगार करने वाले लोग थे। इसके अलावा 12 फीसद मजदूर, 7.4 फीसद वेतनभोगी, 6.1 फीसद छात्र और 0.7 फीसद सेवानिवृत्त लोग शामिल हैं। जहां तक आत्महत्या के तरीके का सवाल है तो 41.8 फीसदी लोगों ने फांसी लगाकर आत्महत्या की। जबकि 26 फीसद ने जहरीले पदार्थ का सेवन किया, 6.9 फीसद ने आत्मदाह किया, 5.6 फीसद ने डूबकर और 1.1 फीसद ने इमारत से छलांग लगाकर अपनी जान दी। आत्महत्या करने वालों में 20.2 फीसद मैट्रिक पास थे, जबकि 19 फीसद ने प्राइमरी तक की पढ़ाई की थी। पिछले साल आत्महत्या करने वालों में 14.3 फीसद अनपढ़ और 11 फीसद 12वीं कक्षा तक ही पढ़ने वाले थे। छात्रावास और स्कूलों में इस तरह का माहौल बनाना जरूरी है जिससे देश के कोने-कोने से आए छात्र खुद को सुरक्षित और एक ही परिवार का हिस्सा समझें। हम उन आत्महत्याओं को तो रोकने का प्रयास करें जो बच्चों में हो रही हैं। बच्चों से समय-समय पर बातचीत कर उनकी परेशानियों के बारे में जानना भी जरूरी है। एम्स प्रशासन और हैदराबाद के कॉलेज को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इन छात्रों के साथ कुछ भी गलत न हो। छात्रों को भी समझना चाहिए कि आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है।

-अनिल नरेन्द्र