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Thursday, 21 March 2019

2019 लोकसभा चुनाव प्रक्रिया का श्रीगणेश हो गया है

होली के पर्व के ठीक तीन दिन पहले लोकसभा चुनाव प्रक्रिया का श्रीगणेश हो गया। लोकसभा 2019 के चुनाव के पहले चरण के तहत 91 सीटों के लिए सोमवार को अधिसूचना जारी होने के साथ ही आम चुनाव की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हो गई। इसके साथ ही तीन राज्योंöआंध्रप्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम की सभी सीटों एवं ओडिशा की 28 विधानसभा सीटों के चुनाव के लिए भी अधिसूचना जारी हो गई है। नामांकन भरने की अंतिम तारीख 25 मार्च होगी, जबकि नामांकन पत्रों की जांच 26 मार्च को होगी और नाम वापस लेने की अंतिम तारीख 28 मार्च होगी। पहले चरण के चुनाव के तहत मतदान 11 अप्रैल को होगा। इसी के साथ सर्वेक्षणों का भी समय हो गया है। दो सर्वेक्षण सामने आए हैं। पहला है टाइम्स नाऊ-वीएमआर का और दूसरा है स्टेरिस्टीशन अनिन्दु चक्रवर्ती का। टाइम्स नाउ-वीएमआर सर्वेक्षण के अनुसार मोदी सरकार की वापसी हो सकती है। सर्वे के मुताबिक एनडीए को 543 में से 283 सीटें मिल सकती हैं। हालांकि सर्वे के मुताबिक सपा-बसपा महागठबंधन के चलते उसे यूपी में काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है। दूसरी ओर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए 135 सीटों के साथ काफी पीछे होगी। अन्य को 125 सीटों पर जीत की संभावना है। वहीं चक्रवर्ती के अनुसार राजनीतिक पंडितों ने 2009 में पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष को गंभीरता से लिया और हाल के विधानसभा चुनावों, लोकसभा उपचुनाव में उन्होंने यह साबित भी कर दिया है। विश्लेषकों ने कहा कि यह कांग्रेस के लिए गेमचेंजर हो सकते हैं। कांग्रेस ने अपनी स्टार प्रियंका गांधी वाड्रा को मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए मैदान में उतार दिया है। इनका मानना है कि प्रियंका और राहुल यूपी में बेकार इस्तेमाल किए जा रहे हैं। केंद्र में बहुदलीय गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने में सक्षम होने के लिए कांग्रेस को लगभग 120-130 सीटें चाहिए और इसके लिए यूपी की जरूरत नहीं है। इसके बजाय राहुल को उन राज्यों पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है जहां उनकी पार्टी भाजपा के साथ सीधे मुकाबले में है और उत्तर प्रदेश जैसे कई विरोधियों के खिलाफ नहीं, जहां कांग्रेस को अखिलेश-मायावती को भाजपा से सीधा निपटने देना चाहिए। शुरुआत राजस्थान से करते हैं। यदि प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में वोट जोड़ते हैं और उन्हें लोकसभा की ओर ले जाते हैं तो राज्य की 25 में से 14 सीटों पर कांग्रेस आगे है। यदि राहुल इन निर्वाचन क्षेत्रों में समय बिताएं तो इनमें इजाफा भी हो सकता है। मध्यप्रदेश की गणना बताती है कि राज्य की 29 लोकसभा सीटों में से 13 पर कांग्रेस आगे है। छत्तीसगढ़ की 11 में से 9 सीटें जीतकर कांग्रेस स्वीप करने की स्थिति में है। राजस्थान और मध्यप्रदेश की संभावित सीटों को जोड़ें और कांग्रेस के पास इन तीन हिन्दी हार्टलैंड राज्यों में 65 में से 44 सीटें जीतने का सीधा मौका है। यह उनती ही सीटें हैं जितनी 2014 में कांग्रेस ने पूरे देश में जीती थीं। चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई है। रोजाना जमीनी स्थिति बदलेगी। आए दिन सर्वेक्षण आएंगे। खैर होली का पर्व है। आप सबको होली की शुभकामनाएं। हम उम्मीद करते हैं कि आप साफ-सुथरे रंगों से होली खेलेंगे।

-अनिल नरेन्द्र

लोकपाल ः देर आए दुरुस्त आए

लंबी प्रतीक्षा के बाद देश को लोकपाल अंतत मिल ही गया। उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति पिनाकी चन्द्र घोष को मंगलवार को देश का पहला लोकपाल नियुक्त किया गया है। एक आधिकारिक आदेश के अनुसार सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) की पूर्व प्रमुख अर्चना रामसुंदरम, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव दिनेश कुमार जैन, महेन्द्र सिंह और इंद्रजीत प्रसाद गौतम को लोकपाल का गैर न्यायिक सदस्य नियुक्त किया गया है। न्यायमूर्ति दिलीप वी भौंसले, न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार मोहंती और न्यायमूर्ति अजय कुमार त्रिपाठी को भ्रष्टाचार निरोधक निकाय का न्यायिक सदस्य नियुक्त किया गया है। यह नियुक्तियां उस तारीख से प्रभावित होंगी, जिस दिन वह अपने-अपने पद का कार्यभार संभालेंगे। लोकसभा चुनाव की घोषणा के तुरन्त बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने लोकपाल नियुक्त करके विपक्ष के हाथ से एक प्रमुख मुद्दा छीन लिया है। लोकपाल का पद उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार की शिकायत सुनने एवं उस पर कार्रवाई करने वाली एक ताकतवर संस्था है। आपत्तियों को एक तरफ रख दें तो कहा जा सकता है कि अब से कोई सात साल पहले शुरू हुआ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन लोकपाल के गठन के साथ ही अपने मुकाम पर पहुंचा है। लेकिन इस आंदोलन से जुड़े लोग संतुष्ट नहीं हैं। पहली बात कि केंद्र सरकार ने लोकपाल की नियुक्ति में पांच साल की देरी की फिर इसकी चयन प्रक्रिया में विपक्ष को बाहर रखा गया। लोकपाल की भूमिका सर्वोच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों पर निगरानी रखने की है। इस पद की महत्ता के अनुरूप इसके चयन को भी गरिमापूर्ण रखने की जरूरत थी, लेकिन सरकार ने इसे एक सामान्य संस्था की तरह ही देखा। कानून के मुताबिक लोकपाल का चयन पांच सदस्यीय समिति को करना होता है जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा भेजे गए प्रतिनिधि मिलकर एक प्रख्यात कानूनविद का चयन करते हैं। इसके बाद पांच सदस्यीय समिति लोकपाल चुनती है। लेकिन लोकसभा में पर्याप्त संख्या न होने की वजह से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के प्रतिनिधि मल्लिकार्जुन खड़गे को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता नहीं दी गई। दरअसल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने विशेष आमंत्रित के रूप में शामिल होने के आमंत्रण के बाद लोकपाल के लिए चयन समिति की बैठक का बहिष्कार किया था। रही बात लोकपाल पिनाकी चन्द्र घोष की तो उनकी छवि बेदाग रही है, लेकिन उनकी चयन प्रक्रिया को देखते हुए कल कोई उनके फैसले को मौजूदा सत्तारूढ़ दल से जोड़कर भी देख सकता है। बहरहाल जस्टिस घोष को अपनी बेदाग छवि को बरकरार रखने के लिए सारे मामलों को निष्पक्ष होकर देखना, परखना होगालोकपाल को सफल बनाने के लिए सारी पार्टियों के सहयोग की आवश्यकता पड़ेगी। कहने को कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक ठोस कदम है और उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में यह संस्था सही मायनों में निष्पक्षता और न्याय करने का सबूत देगी। देर आए, दुरुस्त आए।

Wednesday, 20 March 2019

एक दर्जन राज्यों में भाजपा-कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला

2019 के लोकसभा चुनाव में अब मुश्किल से 24-25 fिदन बचे हैं जबकि अधकचरे विपक्षी गठबंधन व कांग्रेस जहां अपने हथियारों को तेज कर रहे हैं वहां भाजपा भी लावलश्कर से तैयारी में जुटी है। किंतु फिर भी भाजपा के लिए कुछ राज्यों में क्षत्रपों से और कुछ राज्यों में सीधी कांग्रेस से टक्कर होगी। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में दो बड़े क्षेत्रीय दलें, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी गठबंधन से जूझ रही भाजपा को अब कांग्रेस में प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में आने से जटिल समीकरणों का भी सामना करना पड़ रहा है। भाजपा की चिंता लगभग एक दर्जन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को लेकर है। यहां पर उसके व कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होने की संभावना है। इनकी 112 लोकसभा सीटों में से भाजपा ने 2014 में 109 सीटें जीती थी, जबकि कांग्रेस के पास कुल तीन सीटें हैं। नई चुनौतियों से निपटने के लिए भाजपा अन्य तैयारियों के साथ अपने कार्यकर्ता व पुराने नेताओं की पूछ परख में जुट गई है। देश के 11 राज्य व केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं जिनमें कांग्रेस व भाजपा में सीधा मुकाबला होता रहा है। इनमें गोवा (2), गुजरात (26), हिमाचल प्रदेश (4), मध्य प्रदेश (29), राजस्थान (25), छत्तीसगढ़(11), उत्तराखंड (5), दिल्ली(7), अंडमान निकोबार (1), दादर नगर हवेली (1) और दमन द्वीप (1) है। 2014 में भाजपा बीते तीन दशक में अकेले दम पर लोकसभा में बहुमत वाली पहली पार्टी बनी थी। 2019 में क्या पार्टी अपना पुराना प्रदर्शन दोहरा पाएगी? यह प्रश्न आज सभी पूछ रहे हैं। फर्स्ट-फास्ट--पोस्ट चुनाव प्रणाली में आज कुछ भी कहना मुश्किल है। हालांकि नौ बड़े राज्यों में उसका प्रदर्शन मायने रखेगा। इनमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान शामिल हैं। लोकसभा की 543 सीटों में से आधी से ज्यादा 278 सीटें इन राज्यों में आती हैं। भाजपा के लिए ये राज्य कितने अहम हैं, यह बताने की जरूरत नहीं है। यह मानना पड़ेगा कि पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले कांग्रेस की स्थिति बदली हुई है। कांग्रेस के खिलाफ पांच साल पहले जैसा माहौल था वह आज नही है। वहीं 2014 में जो मोदी लहर थी वह आज नहीं है। कांग्रेस विपक्ष में है और भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और कृषि संकट के मुद्दे पर मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर रही है। वर्ष 2014 के चुनावों में शहरी और ग्रामीण मतदाताओं ने कांग्रेस को छोड़ दिया था। लेकिन हाल ही में हुए तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों और लोकसभा उपचुनाव में जीत से साफ है कि ग्रामीण मतदाता कांग्रेस की ओर वापस लौटा है। राहुल गांधी के लिए भी पार्टी अध्यक्ष के तौर पर यह पहला लोकसभा चुनाव है और उनके सामने खुद को साबित करने की चुनौती है। पिछले पांच सालों में राहुल ने अपनी छवि बदली है। कई राज्यों के चुनावों में हार के बावजूद वह मैदान में डटे रहे। अध्यक्ष के रूप में पार्टी पर पकड़ मजबूत करने के साथ उन्होंने खुद को आक्रामक, स्पष्ट और तर्कशील नेता के तौर पर पेश किया है। गुजरात विधानसभा चुनाव राहुल के लिए निर्णायक मोड़ साबित हुआ। कर्नाटक में हारी बाजी पलटकर जेजीएम के साथ गठबंधन सरकार बनाने और तीन राज्यों की जीत से उत्साहित राहुल केंद्र पर रोजाना आक्रामक हमले कर रहे हैं। भाजपा के लिए इस बार कांग्रेस का सूपड़ा साफ करना इतना आसान नहीं होगा।

-अनिल नरेंद्र

सादगी पसंद गली ब्वॉय थे मनोहर पर्रिकर

भारतीय राजनीति में मिस्टर क्लीन के रूप में पहचाने जाने वाले गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर हमारे बीच नहीं रहे। उनका रविवार शाम निधन हो गया, वह 63 वर्ष के थे। पर्रिकर ने 14 फरवरी 2018 को पेट में दर्द की शिकायत की थी। इसके बाद उन्हें मुम्बई के लीलावती अस्पताल भेजा गया। शुरुआत में बताया गया कि फूड प्वाइजनिंग से ग्रसित हैं। फिर पता चला कि उन्हें अग्नाशय कैंसर है। अग्नाशय कैंसर यानि कि पैंक्रियाटिक कैंसर बहुत ही गंभीर रोग है। उनका गोवा, मुंबई, दिल्ली और न्यूयार्क के अस्पतालों में इलाज हुआ। उन्हें 31 जनवरी 2019 को एम्स में भर्ती कराया गया था। पर बीमारी इतनी खतरनाक थी कि देखते-देखते ही उनका स्वर्गवास हो गया। मनोहर पर्रिकर एक सादगी पसंद टेक्नोक्रेट सीएम थे। गोवा में कांग्रेस में विभाजन के बाद अक्टूबर 2000 में जब पहली बार राज्य में भाजपा का मुख्यमंत्री बना तो कमान सादगी और टेक्नोक्रेट मनोहर पर्रिकर को सौंपी गई। तब से लेकर अंतिम सांसों तक पर्रिकर दो दशक तक सियासत में छाए रहे। मनोहर पर्रिकर की गोवा में ही नहीं पूरे देश में छवि एक सीधे-सादे, सौम्य और मृदुभाषी व्यक्ति की रही, लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक हमले ने दिखाया कि देश हित में वह कठोर फैसलों से भी नहीं हिचकते। राजनीति में प्रतिद्वंद्वी भी उनकी बेदाग छवि के कायल रहे। 63 वर्षीय पर्रिकर ने चार बार गोवा के मुख्यमंत्री के रूप में काम किया और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में रक्षा मंत्री के तौर पर तीन वर्ष सेवाएं दीं। उन्हीं के कार्यकाल में भारतीय सेना ने पीओके में घुसकर आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी। आधी बाजू की कमीज और लैदर सैंडल उनकी पहचान थी। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी पर्रिकर ने अपने रहन-सहन में जरा सा भी बदलाव नहीं किया। कहा जाता है कि वह अपने राज्य की विधानसभा खुद स्कूटर चलाकर जाया करते थे, इतना ही नहीं उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अपने घर को नहीं छोड़ा और सरकार द्वारा दिए गए घर में नहीं गए। मनोहर पर्रिकर को गोवा का गली ब्वॉय भी कहा जाता था। 2013 में गोवा में अधिवेशन हुआ था और देश में बहस छिड़ी हुई थी कि नरेन्द्र मोदी पीएम पद के उम्मीदवार होंगे या नहीं? पर भाजपा की ओर से मोदी का नाम कोई खुलकर आगे बढ़ाने को तैयार नहीं था। इसी अधिवेशन के मंच से पहली बार मनोहर पर्रिकर ने नरेंद्र मोदी के नाम की पीएम पद के उम्मीदवार पद के लिए प्रस्तावित किया। मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने पर्रिकर से रक्षामंत्री का पद संभालने को कहा। शुरुआत में पर्रिकर राजी नहीं थे, फिर उन्होंने 2 महीने का समय मांगा और फिर दिल्ली आ गए। पर्रिकर के कार्यकाल में ही 28-29 सितम्बर 2016 को सेना ने पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक की थी। सार्वजनिक जीवन के प्रfित समर्पण के मिसाल भी थे पर्रिकर। बीमारी के बावजूद उन्होंने ढाई महीने बाद इस साल दो जनवरी को अचानक मुख्यमंत्री दफ्तर पहुंच कर सबको हैरान कर दिया था। वह ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे। नाक में नली लगी थी लेकिन जनसेवा करने में उनका जज्बात कम नहीं हुआ था। वे वीआईपी रेस्तरां की बजाए फुटपाथ पर आम नाश्ता किया करते थे। यहीं से मोहल्ले की खबर जुटा लिया करते थे। वह कहते थे कि चाय स्टॉल पर सभी नेताओं को चाय पीना चाहिए, राज्य की सारी जानकारी यहीं से मिल जाती है। आखिरी समय तक वह अपनी घातक बीमारी से लड़ते रहे। ऐसे नेता कम ही आते हैं। हम उनको अपनी श्रद्धांजलि देते हैं।


Tuesday, 19 March 2019

वीवीपैट पर्चियों की गिनती की मांग

लोकसभा चुनाव में 50 प्रतिशत ईवीएम और वीवीपैट के औचक निरीक्षण की मांग को लेकर 21 विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इन दलों का कहना है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए ऐसा करना जरूरी है। आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल सहित शरद पवार, केसी वेणुगोपाल, डेरेक ओब्राइन, शरद यादव, अखिलेश यादव, सतीश चन्द्र मिश्रा, एमके स्टालिन, फारुक अब्दुल्ला, अजीत सिंह तमाम विपक्षी नेताओं का कहना है कि ईवीएम और वीवीपैट की विश्वसनीयता पर सवाल हैं, ऐसे में कम से कम 50 प्रतिशत ईवीएम और वीवीपैट का औचक निरीक्षण होना चाहिए। याचिका में कहा गया है कि लोकसभा चुनाव के परिणाम घोषित करने से पहले यह औचक निरीक्षण करने की सख्त जरूरत है। यह कदम तब उठाया गया जब विपक्षी दलों ने राकांपा प्रमुख शरद पवार के घर पर एक बैठक की। इन दलों ने 70-75 प्रतिशत जनता के प्रतिनिधित्व का दावा करते हुए कहा कि उन्हें ईवीएम की विश्वसनीयता पर गंभीर संशय है। हाल ही में चुनाव आयोग ने निर्वाचन तिथियों का ऐलान करते हुए कहा था कि लोकसभा के हर एक संसदीय क्षेत्र में एक मतदान स्थल पर अनिवार्य रूप से ईवीएम और वीवीपैट की चैकिंग की जाएगी। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और जस्टिस गुप्ता और संजीव खन्ना की खंडपीठ ने शुक्रवार को विपक्षी दलों की मतदान की प्रक्रिया पर संशय प्रकट करने वाली इस याचिका की सुनवाई के लिए 25 मार्च को सूचीबद्ध किया है। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने दो हफ्ते में चुनाव आयोग से इस पर जवाब मांगा है। आयोग को इस मामले में उसकी सहायता देने के लिए अपना एक चुनाव अधिकारी देने को भी कहा है। लोकसभा सामान्य निर्वाचन पारदर्शिता के साथ ईवीएम एवं वीवीपैट के माध्यम से करवाने की घोषणा चुनाव आयोग पहले से ही कर चुका है। मत डालने के बाद मतदाता वीवीपैट मशीन में प्रदर्शित पर्ची में देख सकेंगे कि उनका मत उसी प्रत्याशी को गया है जिसे उन्होंने दिया है। यह पर्ची मशीन पर सात सैकेंड तक रहेगी। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला ने आगामी आम चुनावों में उपयोग की जाने वाली इलैक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को सही बताते हुए कहा कि ईवीएम को न तो कोई हैक कर सकता है और न ही इनसे किसी प्रकार की छेड़छाड़ की जा सकती है। उन्होंने दावा किया कि किसी बाहरी मशीन से ईवीएम से सम्पर्क नहीं किया जा सकता और यह प्रशसान के वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में रखी जाती हैं, इसलिए इनके साथ छेड़छाड़ या हैक करना संभव नहीं है। हमारी राय में तो विपक्ष की मांग जायज है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हमारे लोकतंत्र की जड़ है। इन्हें पूरी तरह से पारदर्शी बनाने में चुनाव आयोग को भी कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए। ईवीएम में कई बार पिछले चुनावों में खराब आई है। कभी कहा गया कि गर्मी की वजह से खराबी हुई हैं तो कई बार तकनीकी खराबी की आड़ ली गई। हम उम्मीद करते हैं कि माननीय सुप्रीम कोर्ट देश के लोकतंत्र की खातिर उचित फैसला लेगा।
-अनिल नरेन्द्र
कार की हो उसका विरोध होना चाहिए।

नमाजियों पर अंधाधुंध फायरिंग

शुक्रवार को जब न्यूजीलैंड की दो मस्जिदों में जब लोग नमाज अदा करने की तैयारी कर रहे थे, वहां अंधाधुंध गोलाबारी करके दर्जनों लोगों को मारने की घटना निन्दनीय ही नहीं है, इससे जुड़े कई और आयाम भी उतने ही चिन्ताजनक हैं। शुक्रवार को न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च शहर की अल नूर मस्जिद और लिन वुड मस्जिद में नमाज पढ़ने गए लोगों पर हथियारबंद हमलावरों ने अंधाधुंध गोलीबारी की जिसमें 50 के आसपास लोग मारे गए और कई घायल हो गए। अल नूर मस्जिद में जुम्मे की नमाज के वक्त आतंकी हमले के मंजर के गवाह बने बांग्लादेशी क्रिकेट टीम के भारतीय प्रदर्शन विश्लेषक श्रीनिवास चन्द्रशेखर ने बताया कि शुरुआत में हमें पता ही नहीं चला कि यह आतंकी हमला था। न तो खिलाड़ी और न ही मैं समझ पाया कि क्या हो रहा है। तभी एक महिला सड़क पर बेसुध होकर गिर गई। हमें लगा कि कोई मैडिकल इमरजेंसी है, इसलिए कुछ खिलाड़ी उसकी मदद करने के लिए बस से उतरे। तभी अहसास हुआ कि हम जो समझ रहे हैं, यह उससे बड़ा है। लोग खून से लथपथ अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे। बांग्लादेश क्रिकेट टीम के मैनेजर खालिद मसूफ खौफनाक मंजर को याद कर सिहर उठते हैं। उन्होंने बताया कि टीम अल नूर मस्जिद में 1.30 बजे नमाज अदा करने जाने वाली थी लेकिन कप्तान महमूदुल्ला की प्रेस कांफ्रेंस सात मिनट देर से खत्म हुई। इससे हम मौत से बच गए। खून से लथपथ लोग मस्जिद से बाहर भाग रहे थे। हम बस में 8-10 मिनट लेटे रहे, लेकिन फिर हमें लगा कि आतंकी वापस आकर हमें बस में निशाना बना सकते हैं तो हमने फैसला किया कि पार्क के रास्ते से स्टेडियम तक जाएंगे। यह वारदातें एक ऐसे देश के ऐसे शहर में हुईं, जो आतंकवाद की ताजा काली आंधी के कहर से बहुत कुछ बचा रहा है। इस वारदात ने यह साबित कर दिया है कि जब तक नफरत, उन्माद और उनके आसपास चलने वाली सक्रियता इस दुनिया में है, कोई भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। किसने सोचा था कि न्यूजीलैंड के दक्षिणी द्वीप का वह खूबसूरत शहर भी आतंकवाद की वजह से सुर्खियों में आ जाएगा, जिसका जिक्र हमारे मीडिया में अकसर क्रिकेट मैच के समय ही होता है। इस सामूहिक हत्याकांड को अंजाम देने वाले शख्स धुर दक्षिणपंथी हैं तथा कुख्यात दक्षिणपंथी एंडर्स ब्रीवीक के सम्पर्क में रहा बताया जाता है, जिस पर 2011 में नार्वे के उटोया द्वीप पर हुए 69 लोगों तथा ओसलो कार बम के जरिये कुछ लोगों की जान लेने का आरोप है। कार में हथियार लेकर दोनों मस्जिदों तक जाने, वहां इबादत में झुके बंदों को निशाना बनाने, गोली खत्म हो जाने पर कार तक जाकर दूसरी बंदूक लाने के ब्यौरे बेहद खौफनाक हैं, जो बताते हैं कि विधर्मियों और अश्वतों के प्रति उसके मन में कैसी घृणा थी। हत्यारे के पास सिर्फ बंदूक नहीं, मोबाइल भी था, जिससे कुछ निहत्थे लोगों के खिलाफ एकतरफा घृणा और हिंसा का वीडियो वह फेसबुक के जरिये पूरी दुनिया में पहुंचा रहा था। हत्यारे के पास से बरामद मैनिफेस्टो में डोनाल्ड ट्रंप को आदर्श बताया जाना और मारे गए लोगों को आक्रमणकारी कहकर संबोधित करना बताता है कि दुनियाभर में इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ नाराजगी किस हद तक पहुंच गई है। आज आतंकवाद से चाहे वह किसी के माध्यम से हो, किसी के खिलाफ क्यों न हो पूरी दुनिया प्रभावित है। हम इस कायराना हमले की कड़े शब्दों में निन्दा करते हैं और इसके शिकार हुए लोगों को श्रद्धांजलि देते हैं। हिंसा चाहे किसी प्रकार की हो उसका विरोध होना चाहिए।

Sunday, 17 March 2019

मोदी हैं तो मुमकिन है ः लोक पर्व 2019 ...(अंतिम)

2014 के चुनाव में भाजपा अकेले 282 सीट जीतने में कामयाब हुई थी। यह उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। अब जबकि 2019 के चुनाव का ऐलान हो गया है तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि पार्टी क्या 2019 में फिर से 2014 का इतिहास दोहरा पाएगी? खुद के या फिर एनडीए के बूते भाजपा के लिए सत्ता की राह आसान है या फिर विपक्षी गठबंधन उसे सत्ता से बेदखल करने में कामयाब हो पाएगा? भाजपा तो यह मानकर  बैठी है कि मौजूदा माहौल उसके पक्ष में है, लेकिन कई ऐसे मुद्दे हैं जो उसकी राह में रोड़ा साबित हो सकते हैं। भाजपा ही नहीं, बल्कि विपक्ष भी यह मान रहा है कि इस वक्त देश में सबसे मजबूत पार्टियों में भाजपा सबसे ऊपर है। उसकी प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस फिलहाल जोर-आजमाइश करने के बावजूद यह दावा करने की स्थिति में नहीं है कि वह सत्ता में लौटेगी। भाजपा के पक्ष में सबसे मजबूत और महत्वपूर्ण पहलू उसके नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। भाजपा का दावा है कि पांच वर्ष सत्ता में बिताने और कई कड़े व विवादास्पद फैसलों के बावजूद उनके नेता की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। अभी भी यह देश में किसी भी विपक्षी नेता के मुकाबले कहीं अधिक लोकप्रिय हैं। 2014 में भी इसी लीडरशिप के बूते भाजपा अपने बल पर पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई थी। विपक्ष भले ही अलग-अलग राज्यों में गठबंधन कर रहा हो लेकिन भाजपा की लीडरशिप में एनडीए के पास सबसे अधिक पार्टियां हैं। फिलहाल एनडीए में 40 पार्टियां हैं जो 2014 के मुकाबले कहीं अधिक हैं। महाराष्ट्र, पंजाब, बिहार में पुराने साथियों को एकजुट रखने में सफल रही भाजपा अब सुदूर दक्षिण से लेकर देश के पूर्वोत्तर छोर तक नए साथियों के साथ विपक्ष की हर चुनौती का जवाब देने को तैयार है। ऐसे में एकजुट और पहले से बड़े राजग के सामने फिलहाल बिखरा हुआ विपक्ष कितनी चुनौती दे पाएगा, यह देखना दिलचस्प होगा। आज शिवसेना, अकाली दल समेत कई दल अपने राज्यों में बेहद मजबूती के साथ भाजपा का साथ दे रहे हैं। पार्टी को लग रहा है कि देशभर में उसके यह सहयोगी दलों का वोट भी उसे मिलेगा। शायद भाजपा को यह भी अहसास होने लगा है कि तमाम पार्टियों के बावजूद वह 2014 को शायद न दोहरा पाए? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र में मजबूत व पूर्ण बहुमत वाली सरकार पर जोर देते हुए कहा कि पिछले तीन दशकों में त्रिशंकु संसद ने देश की प्रगति बाधित की थी। सूरत की एक सभा को संबोधित करते हुए मोदी ने नोटबंदी के अपनी सरकार के फैसले का बचाव किया और कहा कि नोटबंदी के कारण मकानों की कीमतों में कमी आई और आकांक्षी युवाओं के लिए किफायती दरों पर अपना मकान खरीदना संभव हो सका। प्रधानमंत्री मोदी ने कहाöजैसा कि आप सभी जानते हैं, त्रिशंकु संसदों के कारण भारत को 30 सालों तक अस्थिरता का सामना करना पड़ा, क्योंकि किसी पार्टी को बहुमत हासिल नहीं हुआ। इससे देश का विकास बाधित हुआ और इस स्थिति के कारण देश कई मोर्चों पर पीछे भी गया। आंकड़े बताते हैं कि जब-जब केंद्र में मजबूत सरकार रही है तब-तब लोगों का तुलनात्मक रूप से ज्यादा कल्याण हुआ है। मजबूत सरकार का मतलब स्पष्ट जनादेश वाली निर्णायक सरकार। जब दो समान विचारधारा वाले दल चुनाव से पहले या बाद में मिलकर सरकार बनाते हैं तो इस प्रकार के गठबंधन में सरकार के सहज रूप से काम करने की संभावना थोड़ी अधिक होती है। जब दल केवल सत्ता के लिए गठबंधन बनाते हैं और उनका कोई कॉमन मिनिमम प्रोग्राम नहीं होता तो देश कई वर्ष पीछे चला जाता है। बेशक गृहमंत्री राजनाथ सिंह मजबूत नेतृत्व और संगठन के बूते 300 सीटें जीतने का दावा कर रहे हों पर कहीं न कहीं भाजपा नेतृत्व इस बात से बेखबर नहीं है कि शायद वह उस आंकड़े तक न पहुंच पाएं जिन पर वह 2014 में पहुंचे थे। भाजपा की सीटें घटने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। टाइम्स नाऊöवीएमआर के ओपिनियन पोल में कई अहम बातें सामने आई हैं। इसके मुताबिक नॉर्थ ईस्ट, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, उत्तराखंड के नतीजे एनडीए के लिए खुशखबरी ला सकते हैं। वहीं उत्तर प्रदेश में महागठबंधन को बड़ी कामयाबी मिलती दिख रही है। महागठबंधन को जहां 57 सीटें मिलने का अनुमान है, वहीं एनडीए को 27 सीटों पर सिमटने का खतरा दिख रहा है। वहीं यूपीए को मात्र दो सीटें मिलने का अनुमान सर्वे में लगाया गया है। एनडीए का वोटर शेयर 4.4 प्रतिशत तक घटकर 38.9 प्रतिशत हो सकता है, जबकि यूपीए के वोट शेयर में 4.1 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी देखने को मिल सकती है। पिछली बार 543 में से 336 सीटें जीतने वाली एनडीए को इस बार 252 सीटें मिल सकती हैं, जबकि यूपीए को 147 सीटें मिलती दिख रही हैं। वहीं अन्य के खाते में 144 सीटें जा सकती हैं। इससे साफ है कि एनडीए बहुमत (272) से दूर रहने वाला है। राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि ऐसा नहीं है कि भाजपा को सीधे वॉकओवर मिलने जा रहा है। उसकी सबसे बड़ी चिन्ता यह है कि 2014 में उसके पक्ष में जो माहौल था, मोदी की जो लहर थी वह अब उतनी नजर नहीं आ रही। दूसरी बड़ी चिन्ता उसका 2004 का इतिहास है। उस वक्त की वाजपेयी सरकार के पक्ष में भारत उदय जैसे कैंपेन चल रहे थे, लेकिन जब नतीजे आए तो पता चला कि भाजपा के हाथ से सत्ता चली गई। यूपी जैसे राज्य में भाजपा ने पिछली बार रिकॉर्ड तोड़ सीटें इसलिए जीती थीं, क्योंकि पूरा विपक्ष बिखरा हुआ था पर इस बार उसे सपा-बसपा गठबंधन से कड़ी चुनौती मिलने वाली है। इसी तरह बिहार में भी कांग्रेस-आरजेडी मजबूत गठबंधन है। यही नहीं, राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में जहां उसने 90 से लेकर 100 प्रतिशत तक सीटें जीती थीं उनमें से गुजरात को छोड़कर बाकी राज्यों में अब कांग्रेस सत्ता में आ चुकी है। ऐसे में इन राज्यों में उसे जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई कैसे होगी, यह उसके लिए सबसे बड़ी चिन्ता है। अन्य राज्यों में भी कांग्रेस से भले ही नहीं सही लेकिन तृणमूल कांग्रेस, डीएमके-कांग्रेस गठबंधन, चन्द्रबाबू नायडू समेत मजबूत विपक्षी क्षेत्रीय दलों से उसे कड़ी चुनौती मिलेगी। देखें, ऊंट किस करवट बैठता है? (समाप्त)

-अनिल नरेन्द्र