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Tuesday, 26 March 2019

अंतत भगोड़ा नीरव मोदी लंदन में धरा गया

पंजाब नेशनल बैंक के साथ 14,357 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी कर भागा नीरव मोदी बुधवार को लंदन में गिरफ्तार कर लिया गया। वह नया बैंक खाता खोलने पहुंचा था। बैंक स्टाफ की सूचना के बाद पुलिस पहुंची और उसे धर लिया गया। वेस्टमिंस्टर कोर्ट ने मोदी की जमानत अर्जी खारिज करते हुए उसे 29 मार्च तक हिरासत में भेज दिया। उसके प्रत्यर्पण के लिए भारत की अर्जी पर 29 मार्च को सुनवाई होगी। गिरफ्तारी के वक्त नीरव का खत्म हो चुका पासपोर्ट जब्त कर लिया गया। नीरव की जमानत अर्जी खारिज करते हुए वेस्टमिंस्टर कोर्ट की जज मैरी चैलन ने कहा कि मामला जालसाजी का है व आरोपी के भागने का डर भी है, इसलिए जमानत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने बचाव की दलीलें व पांच लाख पाउंड सिक्युरिटी का प्रस्ताव भी नामंजूर कर दिया। नीरव ने कोर्ट में जमानत याचिका दायर करते हुए कहा कि वह ब्रिटेन सरकार को पूरा टैक्स देता है। 18 लाख रुपए महीने की सैलरी देता है। यात्रा के दस्तावेज भी जमा करवा दिए हैं। इसलिए जमानत दी जाए। लेकिन कोर्ट ने उसकी दलील नहीं मानी। कोर्ट ने नीरव की भागने की आशंका जताते हुए कहा कि उसे जेल में रखना जरूरी है। लंदन के पॉश इलाके वेस्ट एंड में 72 करोड़ रुपए के आलीशान अपार्टमेंट में रह रहा नीरव मोदी होली की पूर्व संध्या पर जेल की काली कोठरी में पहुंचा दिया गया। नीरव मोदी की गिरफ्तारी भारत सरकार, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), सीबीआई सहित अन्य जांच एजेंसियों के लिए एक राहत भरी खबर इसलिए है कि वह कहां है इसकी किसी को हवा तक नहीं थी, जैसा कि अब तक दावा किया जाता रहा कि नीरव मोदी आखिर गायब कहां हो गया? इंटरपोल भी उसे पकड़ने में नाकाम रहा। कभी पता चलता कि वह सिंगापुर में है तो कभी न्यूयार्क में होने की बात सामने आई। खैर, अभी कहानी यह है कि नीरव मोदी को एक बैंक कर्मचारी की तत्परता से पकड़ा गया। अब वेस्टमिंस्टर अदालत नीरव मोदी के भारत प्रत्यर्पण के मामले में सुनवाई करेगा। गौर करने की बात है कि अदालत द्वारा वारंट जारी किए जाने के बाद उसके पास आत्मसमर्पण का विकल्प था, लेकिन उसने वह विकल्प नहीं चुना। हुलिया बदल कर महंगे इलाके में रहने और फिर से हीरे का कारोबार शुरू करने की अपनी कोशिशों से वह पहले ही जता चुका है कि ब्रिटेन के कानून का लाभ उठाते हुए ज्यादा से ज्यादा समय तक अपने प्रत्यर्पण की कोशिशों को टालता रहेगा। वैसे भी किसी आरोपी के प्रत्यर्पण की कानूनी प्रक्रिया में समय लगता है। आर्थिक अपराध कर ब्रिटेन भाग जाने वाले एक दूसरे भगोड़े विजय माल्या का उदाहरण हमारे सामने है, जिसके प्रत्यर्पण की प्रक्रिया चल रही है। नीरव मोदी की अचानक गिरफ्तारी से सत्तारूढ़ मोदी सरकार को ऐन चुनाव के समय एक महत्वपूर्ण मुद्दा जरूर मिल गया है जिसे वह पूरी तरह से भुनाने की कोशिश करेगी। सरकार व जांच एजेंसियां आज जितनी सक्रियता दिखा रही हैं, अगर उतनी निगरानी पहले करती, सतर्कता बरतती तो नीरव मोदी या फिर कोई भी अपराधी इतनी आसानी से न तो देश से भाग सकता था और न ही दूसरे मुल्क में शरण ले पाता। नीरव मोदी, मेहुल चोकसी और विजय माल्या जिस तरह से भाग निकले, उससे आम जन के मन में यह शंका तो पैदा हुई है कि ऐसी कोई मिलीभगत जरूर है जिसकी मदद से घोटालेबाज इतनी आसानी से निकल गए।

-अनिल नरेन्द्र

बिना भीष्म पितामह के महाभारत 2019

भारतीय जनता पार्टी ने होली की शाम लोकसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों की पहली लिस्ट जारी की। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि लिस्ट में भाजपा के संस्थापक और चार चुनाव में भाजपा अध्यक्ष रहे लाल कृष्ण आडवाणी का नाम नहीं है। उनकी जगह गांधी नगर से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह चुनाव लड़ेंगे। यह पहली बार है कि 14 साल की उम्र से संघ से जुड़े 91 वर्षीय आडवाणी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। आडवाणी के अलावा 75 पार कर चुके बीएस खंडूरी, भगत सिंह कोशयारी और बिजॉय चक्रवर्ती का भी टिकट काट दिया गया है। वर्तमान भाजपा के सभी प्रमुख चेहरे आडवाणी की ही देन हैं। स्थापना के बाद वर्ष 1984 के पहले चुनाव में महज दो सीटें हासिल करने वाली भाजपा को 182 सीटें जिता कर सत्ता का स्वाद चखाने का श्रेय भी आडवाणी जी को ही जाता है। आडवाणी जी ने वर्ष 1990 में राम मंदिर निर्माण के लिए रथ यात्रा निकाल कर पार्टी को नई ऊंचाइयां दीं। राम मंदिर आंदोलन ने पूरे देश में भाजपा को आधार दिया। कलराज मिश्र ने माहौल देखकर खुद ही चुनाव न लड़ने की घोषणा की है, जबकि हुकूम देव नारायण यादव अपनी सीट पर पुत्र को टिकट दिए जाने से संतुष्ट हैं। बाकी बचे डॉ. मुरली मनोहर जोशी और शांता कुमार। शांता कुमार ने खुद चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। वहीं जोशी जी की कानपुर सीट से राज्य संगठन ने सतीश महाना को उतारने की सलाह दी है। एक समय आडवाणी की पार्टी में छवि हिन्दू सम्राट की थी। मगर 2005 में पाकिस्तान दौरे में जिन्ना विवाद की छाया ने पार्टी में उनकी छवि कमजोर कर दी। रही-सही कसर 2009 में पीएम पद का उम्मीदवार बनने के बाद पार्टी को मिली करारी हार ने पूरी कर दी। उन्हें पार्टी का लौह पुरुष माना जाता था। आडवाणी की टिकट कटने पर हमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ। पिछले पांच साल में पार्टी और लोकसभा में उनकी राजनीतिक सक्रियता को शक्ति शून्य और निक्रिय बनाते हुए उन्हें मार्गदर्शक मंडल का सदस्य बनाकर जैसे सम्मानित किया गया, उसकी परिणति यही थी। कहा जा रहा है कि भाजपा ने उनकी 91 साल की उम्र पर विचार करते हुए उन्हें इस बार टिकट नहीं दिया। लेकिन 16वीं लोकसभा में उनकी हाजिरी 15वीं लोकसभा की तुलना मे एक प्रतिशत अधिक रही है। सदन की अगली कतार में  बैठने के बावजूद उनका भाषण सुनाई नहीं दिया। 92 प्रतिशत हाजिरी के बाद भी गत पांच वर्षों में वह मात्र 356 शब्द ही बोल पाए। सच तो यह है कि विगत लोकसभा में उन्हें बोलने ही नहीं दिया गया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें देवत्व का स्थान देकर उनसे बोलने का हक छीन लिया। राजनीति में खासकर भारतीय राजनीति में कुछ व्यक्ति ऐसे हैं जो जिस पेड़ पर चढ़ते हैं सबसे पहले उसकी शाखा को काटते हैं। गुजरात दंगों के बाद एक समय ऐसा आया था जब मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पद से हटाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सलाह दी थी। उस वक्त यही आडवाणी जी थे जिन्होंने नरेंद्र मोदी को बचाया था। आज मोदी उसका कैसे शुक्रिया करते हैं और कितने कृतज्ञ हैं ताजा घटनाक्रम से पता चलता है। एक मौका ऐसा भी आया था जब सभी उम्मीद कर रहे थे कि शायद आडवाणी जी को देश का राष्ट्रपति बना दिया जाए पर इस गौरव से भी उन्हें वंचित कर दिया गया। लाल कृष्ण आडवाणी अपने जीवन का शतक लगाने से कुछ ही दूर हैं। वह सत्ता के शिखर पर भले ही न पहुंचे हों, लेकिन उससे बहुत दूर भी नहीं रहे। उनकी गिनती देश के सबसे सुलझे हुए नेताओं में होती रही है। अगर हम राजनीति में रहने वाले या सार्वजनिक जीवन जीने वाले किसी आदर्श व्यक्ति का मॉडल बनाएं तो बहुत संभव है कि वह आडवाणी के व्यक्तित्व के आसपास ही कहीं होगा।

Monday, 25 March 2019

गठबंधन की राजनीति

लोकसभा चुनाव के लिए सभी पार्टियां अपने प्रत्याशियों के नाम पर अंतिम मुहर लगाने में जुटी हैं। सभी छोटी-बड़ी पार्टियां अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार गठबंधनों और महागठबंधनों में जुगाड़ भिड़ाने में लगी हैं। सभी गठबंधनों में सहयोगी सौदेबाजी में व्यस्त रहे। शनिवार के दिन बिहार में जहां एनडीए गठबंधन की तीनों पार्टियां भाजपा, जदयू और लोजपा ने अपने-अपने प्रत्याशियों के नामों की घोषणा कर दी वहीं लालू प्रसाद के नेतृत्व वाली राजद की अगुआई में बने महागठबंधन ने सीटों के बंटवारे को अंतिम रूप दे दिया।
बिहार की 40 सीटों में राजद ने अपने पास 20 रखी बाकी 20 सीटें उसने अपने सहयोगी पार्टियों में बांट दी। कांग्रेस को 9, उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को 5, जीतन राम मांझी की हिन्दुस्तान अवाम पार्टी (हम) को 3 और मुकेश सहनी की विकासशील इंसाफ पार्टी को 3 सीटें दीं।
एनडीए में भाजपा जिसने बिहार में 2014 में 22 सीटें अकेले जीत कर वह सबसे बड़ी पार्टी बनी थी उसने जदयू और लोजपा के साथ समझौता करके खुद को 17 सीटें, जदयू को 17 सीटें और लोजपा को 6 सीटें दी हैं, भाजपा ने संकेत दिया था समझौते में खोना पड़ता है। यही कारण है कि भाजपा जिन सीटों पर जीती हुई थी। उनमें से भी 5 सीटें खाली कर सहयोगियों को दे दी इसका परिणाम यह हुआ कि उसे अपने वरिष्ठ नेताओं की सीटें बदलने पर मजबूर होना पड़ा। चूंकि पार्टी सिर्प 17 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है इसलिए उसे अपने शीर्ष नेताओं को भी सीट देने में मुश्किल हुई। 2014 में भाजपा ने कुल 30 सीटों पर चुनाव लड़ा था। उस वक्त कुछ बड़े नेता चुनाव हार गए थे। इनमें प्रमुख नाम शाहनवाज हुसैन का है। पार्टी के लिए मुश्किल है कि वह जीते हुए पांच नेताओं को तो सीटें दे नहीं पा रही है अब हारे हुए नेताओं को कौन-सी सीटें दे।
लालू के महागठबंधन में भी यही हुआ। अपने स्थापना काल से लेकर 2014 के चुनाव तक राजद ने कभी भी इतनी कम सीटों पर चुनाव नहीं लड़ा था। यह पहला अवसर है जब उसने आधी सीटें अपनी सहयोगी पार्टियों के लिए छोड़ी हैं। लालू ने जिस तरह अपने छोटे सहयोगियों को सीटें बांटने में सदाशयता दिखाई है इसकी चर्चा स्वाभाविक है क्योंकि जो पार्टियां लालू के साथ गठबंधन में शामिल हैं उनमें कांग्रेस को छोड़कर कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है जिसका कोई खास प्रभाव हो।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस अकेले लड़ रही हैं जबकि वाममोर्चा और कांग्रेस में भी बात नहीं बनी इसलिए सभी अलग-अलग ही लड़ रहे हैं। ममता की राजनीति स्पष्ट है। वे पश्चिम बंगाल के मुस्लिम वोटरों पर अपना एकाधिकार मानती हैं। इसलिए कांग्रेस के साथ किसी तरह का गठबंधन नहीं चाहतीं। कांग्रेस वाममोर्चे से गठबंधन जरूर करना चाहती थी किन्तु स्थानीय कांग्रेस नेता लाल झंडे के साथ लड़ने के लिए तैयार नहीं थे। ममता को उम्मीद है कि उनकी सीटें ज्यादा आएंगी तो वे केंद्र में गठबंधन की सरकार में अहम भूमिका निभा सकेंगी। किन्तु साथ वे यह भी चाहती हैं कि कांग्रेस व भाजपा की भी सीटें कम हों या वे एक भी सीट न जीत पाएं।
उत्तर प्रदेश की स्थिति लगभग स्पष्ट हो गई है। सपा-बसपा और आरएलडी ने अपने गठबंधन से कांग्रेस को बाहर रखा है। इसलिए कांग्रेस सभी 80 सीटों पर लड़ने के लिए स्वतंत्र है। गठबंधन को डर है कि कांग्रेस उसके मुस्लिम वोट काटेगी जबकि भाजपा विरोधी सवर्ण वोट जो सपा-बसपा को मिल सकते थे, कांग्रेस उसमें भी सेंध लगाएगी, यही कारण है कि अब सपा-बसपा की तल्खी कांग्रेस के खिलाफ बढ़नी शुरू हो गई है।
बहरहाल गठबंधन वाले राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों ने अपनी सीटें बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय पार्टियों से गठबंधन किया है। उनको अपने अस्तित्व एवं प्रासंगिकता की चिन्ता है जबकि राष्ट्रीय पार्टियों के लिए केंद्र में सत्ता प्राप्त करने का लक्ष्य है। क्षेत्रीय पार्टियां जानती हैं कि यदि उनकी सीटें कम रह गईं तो उनकी सहयोगी राष्ट्रीय पार्टी उनको महत्व नहीं देगी। लालू प्रसाद के साथ यही तो हुआ था। 2004 में 24 सीट लेकर आए राजद के नेता को रेल मंत्रालय, उनके साथी रघुवंश प्रसाद को ग्रामीण विकास मंत्रालय और प्रेम चन्द गुप्ता को कारपोरेट मंत्रालय तथा राज्य मंत्रालय भी मिले किन्तु 2009 में जब लालू 4 सीट पर आ गए तो उन्हें मंत्रिपरिषद में अकेले भी जगह नहीं मिली। अलग-अलग राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियां अपने-अपने जातीय जनाधार के आधार पर चुनाव लड़ती हैं जबकि राष्ट्रीय पार्टियां मुद्दों और नारों पर ज्यादा बल देती हैं। देश की सभी राजनीतिक पार्टियां चाहे वे राष्ट्रीय हों या क्षेत्रीय अपने अनुसार मुद्दे और नारे गढ़ने की कोशिश करती हैं किन्तु कौन-सा नारा कब फिट हो जाए और कब बेकार साबित हो यह प्रभावशाली नेतृत्व पर निर्भर करता है। 1960 के दशक में कम्युनिस्ट पार्टियां, भारतीय जनसंघ और सोशलिस्ट पार्टियां कई राज्यों में संविद सरकारें चला रही थीं। सभी ने 1971 के आम चुनाव में नारा दिया कि देश में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महंगाई और गरीबी के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है इसे सत्ता से बाहर करना होगा। सभी पार्टियां अपने-अपने स्तर पर गठबंधन करके चुनाव लड़ रही थीं। किन्तु इंदिरा जी ने नारा दिया कि `मैं गरीबी हटाना चाहती हूं और विपक्ष मुझे हटाना चाहता है।' उनका एक ही नारा था `गरीबी हटाओ।' देश की जनता ने इंदिरा जी के गरीबी हटाओ के नारे पर भरोसा किया और सारे विपक्षी सिमट गए। समय का चक्र देखिए 1976 में फिर इंदिरा जी ने गरीबी हटाओ की बात की किन्तु जनता ने विपक्ष के इस नारे पर ज्यादा भरोसा किया कि `बेटा कार बनाता है मां बेकार बनाती है।' इस बार इंदिरा जी का गरीबी हटाओ का नारा नहीं चला।
आज भी यही हो रहा है कि विपक्ष का कोई संयुक्त घोषणा पत्र नहीं, कोई सर्वमान्य नेता नहीं, कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम नहीं, उसका एक ही नारा और लक्ष्य है मोदी हराओ। इसलिए वह अपने मतभेदों को भुलाकर इस उम्मीद से गठबंधन कर रहे हैं कि वे भाजपा और एनडीए की सीटों को कम करने में सफल होंगे। भाजपा मानती है कि उसके नेता पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है इसलिए विपक्ष उनके नेता को जितना गालियां देगा उसके समर्थन में उतनी ही वृद्धि होगी। भाजपा का नारा `मोदी है तो मुमकिन है' की चाहे जितनी आलोचना करे विपक्ष किन्तु जब तक तार्पिक आधार पर जनता को सहमत नहीं कर पाएगी तब तक वह इस नारे को निष्फल भी नहीं कर पाएगी। बालाकोट एयर स्ट्राइक पर अंड बंड बोलने वाले विपक्षी नेताओं की समझ में यह बात आनी चाहिए कि वे अपने खिलाफ भाजपा को हथियार थमा रहे हैं।

बहरहाल सत्तापक्ष और विपक्ष 2019 के लिए हर तरह के तरीके अपना रहे हैं कौन कहां किस पर भारी पड़ता है इसका फैसला 23 मई को ही होगा लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान नेताओं द्वारा मतदाताओं को समझाने-बुझाने और भ्रमित करने का सिलसिला चलता रहेगा। लेकिन सच यही है कि गठबंधनों के बावजूद मोदी के खिलाफ विपक्ष का कोई सर्वमान्य चेहरा घोषित नहीं है।

Sunday, 24 March 2019

2019 लोकसभा चुनाव के गेमचेंजर कौन-कौन होंगे?

2014 के लोकसभा चुनाव में अमित शाह, लालू प्रसाद यादव, एम. करुणानिधि, जे. जयललिता को गेमचेंजर कहा जा सकता था। यह गेमचेंजर की भूमिका में थे। 2019 में अमित शाह को छोड़कर तीन नहीं होंगे। इनकी जगह प्रियंका गांधी, तेजस्वी यादव, एम. स्टालिन ने ली है और 2019 में इनकी परीक्षा होगी। जेपी आंदोलन से उभरे लालू प्रसाद यादव की 2014 में महत्वपूर्ण भूमिका थी। चारा घोटाले में सजा होने से उन्होंने चुनाव तो नहीं लड़ा लेकिन कांग्रेस और राजद के स्टार कैंपेनर के तौर पर बिहार में आज भी एक फैक्टर हैं। इस बार वह जेल में हैं और उनके छोटे बेटे तेजस्वी पार्टी को लीड कर रहे हैं। पार्टी 20 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। क्रिप्ट राइटर से राजनेता बने एम. करुणानिधि पांच बार तमिलनाडु के सीएम रहे। पिछले चुनाव में डीएमके 35 सीटों पर लड़ी, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। करुणानिधि के निधन के बाद डीएमके की कमान छोटे बेटे स्टालिन के पास है। वह कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ रहे हैं। तमिल फिल्मों की सफल अभिनेत्री जयललिता छह बार तमिलनाडु की सीएम रहीं। 2014 में उनकी पार्टी अन्नाद्रमुक ने तमिलनाडु की 39 और पुडुचेरी की एक सीट पर चुनाव लड़ा था और 37 सीटें जीती थीं। अन्नाद्रमुक ने भाजपा से इस बार गठबंधन किया है। अब यह 27 सीटों पर लड़ेगी। जयललिता अब नहीं रहीं और उनकी पार्टी अन्नाद्रमुक में भी दो धड़े हो गए हैं। राहुल गांधी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की 42 सीटों के लिए प्रियंका गांधी को महासचिव बनाया है। इसमें अमेठी और रायबरेली भी शामिल हैं। इस चुनाव में प्रियंका की महत्वपूर्ण भूमिका है। टिकट बांटने, प्रचार करने से लेकर उम्मीदवार को जिताने तक की जिम्मेदारी उनके पास है। एम. स्टालिन ने केंद्र में सत्ता की भागीदारी करने के लिए यूपीए से गठबंधन किया है। द्रमुक तमिलनाडु में 30 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। जबकि कांग्रेस नौ पर। 2014 में द्रमुक का खाता नहीं खुला था। इस बार करुणानिधि नहीं हैं और पार्टी को जिताने की सारी जिम्मेदारी स्टालिन पर है। नतीजा आने पर पता चलेगा कि स्टालिन पिता करुणानिधि की जगह ले पाए हैं या नहीं? बिहार में राजद कांग्रेस से गठबंधन है। यहां की 40 लोकसभा सीट में से 20 सीट पर राजद के लड़ने की संभावना है। पिता लालू प्रसाद यादव के जेल में होने से राजद को जिताने की सारी जिम्मेदारी तेजस्वी यादव पर आ गई है। तेजस्वी को उम्मीदवार तय करने, गठबंधन निभाने से लेकर एनडीए को बिहार में रोकने की जिम्मेदारी आ गई है। 2019 लोकसभा चुनाव में जहां तक बिहार का सवाल है तेजस्वी यादव की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। गुजरात में सभी की नजर युवा नेताओं की तिकड़ी पर टिकी हुई है। यह चुनाव राजनीतिक दलों के साथ पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल, ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर और दलित नेता व विधायक जिग्नेश मेवाणी का सियासी भविष्य तय करेगी। विधानसभा चुनाव की तर्ज पर इन नेताओं की तिकड़ी लोकसभा में भाजपा और एनडीए से आधी सीटें भी छीनने में सफल रही है तो तीन साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए सत्ता का रास्ता आसान हो जाएगा। विधानसभा चुनाव में हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर की तिकड़ी ने भाजपा को 99 सीट पर लाने में अहम भूमिका निभाई थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने गुजरात से सभी 26 सीटें जीती थीं। देखें कि क्या यह युवा नेता 2019 लोकसभा चुनाव में गेमचेंजर साबित हो सकते हैं।

-अनिल नरेन्द्र

पहले चायवाला और अब चौकीदार, देश वाकई बदल रहा है

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनाव प्रचार को धार देते हुए मैं भी चौकीदार हूंअभियान शुरू किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ट्विटर हैंडल पर एक वीडियो जारी कर मैं भी चौकीदार से चुनावी मुहिम की शुरुआत की। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कई बार अपने भाषणों में कटाक्ष करते हुए चौकीदार चोर है कहा था। अब विपक्ष के इसी हमले को भाजपा ने अपने चुनावी प्रचार में शामिल कर लिया है। याद रहे कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर के चायवाला टिप्पणी को भी भाजपा ने चुनाव अभियान का हिस्सा बनाया था। प्रधानमंत्री ने वीडियो के साथ अपने ट्वीट में कहा कि आपका यह चौकीदार राष्ट्र की सेवा में मजबूती से खड़ा है। लेकिन मैं अकेला नहीं हूं। उन्होंने कहा कि हर कोई जो भ्रष्टाचार, गंदगी, सामाजिक बुराइयों से लड़ रहा है, वह एक चौकीदार है। मोदी ने कहा कि हर कोई जो भारत की प्रगति के लिए कठिन परिश्रम कर रहा है, वह एक चौकीदार है। प्रधानमंत्री के इस अभियान को अब तमाम भाजपा नेताओं ने अपना लिया है और सभी मैं भी चौकीदार हूंके इस अभियान में शामिल हो चुके हैं। विपक्ष भी इसका जवाब अपने ढंग से देने में जुट गया है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने तंज कसते हुए कहा कि पिछले चुनाव में चायवाला और अब चौकीदार... देश वाकई बदल रहा है। मायावती ने ट्वीट कियाöसादा जीवन उच्च विचार के विपरीत शाही अंदाज में जीने वाले जिस व्यक्ति ने पिछले लोकसभा चुनाव के समय वोट की खातिर अपने आपको चायवाला प्रचारित किया था, वह अब एक वोट के लिए ही बड़े तामझाम और शान के साथ अपने आपको चौकीदार घोषित कर रहा है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने तंज कसते हुए कहा कि चौकीदार अमीरों के होते हैं, किसान तो अपनी फसलों की चौकीदारी खुद ही करते हैं। पूर्व मंत्री एमजे अकबर ने भी मैं भी चौकीदार हैशटैग के साथ ट्वीट किया, जिस पर बॉलीवुड एक्सट्रेस रेणुका राहाणे ने तंज भरा जवाब देते हुए कहा कि अगर आप भी चौकीदार हैं तो कोई महिला सुरक्षित नहीं है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) महासचिव सीताराम येचुरी ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे चौकीदार हैं जो जागकर नहीं सो कर नौकरी कर रहे हैं और ऐसे चौकीदार को हटाने का समय आ गया है। मोदी ऐसे चौकीदार हैं जिनके राज में देश को दोनों हाथों से लूटा जा रहा है, हर रोज सीमा पर नौजवान सैनिकों की शहादत हो रही है, बेरोजगारी बढ़ रही है, महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं और चारों ओर सांप्रदायिकता का बोलबाला है लेकिन अगर उनसे कोई सवाल करता है तो भारतीय जनता पार्टी वाले उन्हें देशद्रोही कहते हैं। भाजपा के मैं भी चौकीदार अभियान पर तंज कसते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि अगर लोग चाहते हैं कि उनके बच्चे चौकीदार बनें तो उन्हें प्रधानमंत्री मोदी को वोट देना चाहिए। उधर केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि मैं भी चौकीदार अभियान ने जनांदोलन का रूप ले लिया है। जिनका परिवार जमानत पर बाहर है उन्हें इस अभियान से परेशानी है। कुछ लोग कह रहे हैं कि चौकीदार अमीरों के होते हैं, यह वही लोग हैं जिन्होंने गरीबों के 12 लाख करोड़ रुपए लूटे, वही लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं।

Saturday, 23 March 2019

आखिर क्यों हो रही हैं मायावती कांग्रेस पर इतना हमलावर

लोकसभा का समर सामने है। प्रत्याशियों की घोषणा शुरू हो चुकी है। चुनावी प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। पूरे देश के लिए रणनीति और जोड़-तोड़ हो रही है। लेकिन हमेशा की तरह इस बार भी सबसे ज्यादा सुर्खियां उत्तर प्रदेश बटोर रहा है। इसलिए नहीं कि यहां भाजपा को सपा-बसपा के गठबंधन से कड़ी चुनौती मिल रही है। न ही इसलिए कि उत्तर प्रदेश नरेंद्र मोदी का वॉटर लू साबित हो सकता है, बल्कि यहां पार्टियों में यह होड़ मची है कि खुद को भाजपा का सबसे प्रमुख विरोधी साबित करें भले ही ऐसा करने में आपस में तू-तू, मैं-मैं होने लगे। पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस, सपा और बसपा के बड़े नेताओं के बयानों और रणनीतियों पर नजर डालें तो दिलचस्प तस्वीर उभरती है। कांग्रेस पार्टी यह दिखाना चाहती है कि वह अपने दम-खम पर चुनाव लड़ रही है जरूर, लेकिन उसकी सद्भावना सपा-बसपा-आरएलडी गठबंधन के साथ है। लेकिन मायावती की स्थिति अलग उभर रही है। वह जितना हमला भाजपा पर नहीं कर रहीं, उससे ज्यादा हमला कांग्रेस पर करती नजर आ रही हैं। शुरू में तो लगा कि कांग्रेस पर सीधा हमला सधा हुआ राजनीतिक अभिनय हो सकता है, लेकिन अब लग रहा है कि इसमें कुछ वजूद है। मायावती के ताजा बयान कांग्रेस को अपमानित करने जैसे लगते हैं। बसपा सुप्रीमो अपने समर्थकों समेत किसी के भी मन में यह भ्रम नहीं आने देना चाहतीं कि वह प्रधानमंत्री पद की दावेदार नहीं हैं। राजनीति के गणित में हमेशा दो और दो चार नहीं होते। राजनीति में दो और दो पांच भी हो सकते हैं। मायावती शायद इसी गणित के आधार पर काम कर रही हैं। जहां अखिलेश यादव कांग्रेस के मामले में संयम से पेश आ रहे हैं वहीं सवाल यह है कि आखिर बहन जी इतनी मुखर क्यों हो रही हैं? क्योंकि अगर कांग्रेस की रणनीति देखें तो पार्टी ने मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश पर फोकस किया है। प्रियंका गांधी को इसी इलाके के लिए महासचिव बनाया है। उनकी चुनावी नौका यात्रा भी इसी इलाके में हो रही है। बसपा के पास मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीटें हैं तो मायावती के कांग्रेस के साये से बचने की वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में छिपी हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमान वोट निर्णायक होता है। यहां की कम से कम 20 सीटें स्पष्ट तौर पर मुस्लिम वोटों से तय होती हैं। अगर कांग्रेस चुनाव मैदान में खुलकर उतरती है तो मुस्लिम वोटों का रूझान कांग्रेस की तरफ हो सकता है। अगर यह वोट कांग्रेस को जाता है तो इसका सीधा नुकसान बसपा और सपा गठबंधन को होगा। मायावती को यह डर अखिलेश की तुलना में इसलिए भी ज्यादा सता रहा है कि बसपा अतीत में भाजपा के साथ सरकार बना चुकी है। भाजपा के खिलाफ राजनीति में बसपा का खूंटा सपा की तुलना में कमजोर माना जा सकता है। शायद यही वह कुछ वजहें हैं जिनसे मायावती अभी से यह स्पष्ट करने में जुट गई हैं कि कांग्रेस से उसका कोई वास्ता नहीं है। वास्तविक सियासी स्थिति यह है कि तमाम कटुता के बावजूद बसपा और कांग्रेस को आगे चलकर आपसी समर्थन की जरूरत पड़ सकती है। अगर मायावती प्रधानमंत्री बनने का सपना पाल रही हैं और राहुल गांधी भी यह सपना पाल रहे हैं तो चुनाव के बाद एक-दूसरे की जरूरत पड़ सकती है।

-अनिल नरेन्द्र

चौकीदार अमीरों के होते हैं, इस सरकार की एक्सपायरी डेट पूरी हो चुकी है

पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश) का सियासी चक्रव्यूह भेदने के लिए निकली कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने प्रयागराज से वाराणसी तक गंगा यात्रा शुरू कर दी है। प्रियंका ने प्रयागराज में हनुमान जी के दर्शन कर अपनी यह गंगा यात्रा शुरू की। संगम तट पर पहुंचकर उन्होंने मां गंगा की पूजा की और लोकसभा चुनाव के ठीक पहले प्रियंका इस सियासी यात्रा के जरिये पूर्वी यूपी में कई समीकरणों को एक साथ साधने की कोशिश कर रही हैं। प्रियंका ने हनुमान जी के दर्शन के साथ गंगा यात्रा की शुरुआत कर अपनी हिन्दू विरोधी छवि को तोड़ने की कोशिश की। भाजपा और अन्य दक्षिणपंथी संगठन अकसर उन्हें ईसाई बताकर उन पर निशाना साधते रहे हैं। प्रियंका ने हनुमान जी की पूजा करके भाजपा की इस धारणा को तोड़ने का प्रयास किया है। यही नहीं, पूरी यात्रा के दौरान वह कई मंदिरों में जाएंगी। प्रियंका रास्ते में मां विंध्यवासिनी, शीतला माता, सीता जी और भगवान शिव के मंदिर भी जाएंगी। यात्रा के दौरान प्रियंका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला किया। मोदी के चौकीदार अभियान पर प्रियंका बोलींöचौकीदार तो अमीरों के होते हैं, किसानों को अपनी फल की चौकीदारी खुद ही करनी पड़ती है। प्रियंका ने भाजपा के मैं भी चौकीदार अभियान पर तंज कसते हुए कहा कि उनकी (मोदी) मर्जी है, वह अपने नाम के आगे क्या लगाते हैं, लेकिन मुझ से एक किसान भाई ने कहा था कि चौकीदार तो अमीरों के होते हैं। हम किसान अपनी चौकीदारी खुद करते हैं। प्रियंका ने आगे कहा कि चुनाव बहुत बड़े निर्णय की घड़ी है। मौजूदा समय में देश की जो स्थिति है, वैसी पिछले 45 वर्षों में कभी नहीं थी। इस सरकार ने देश की ही सार्वजनिक संस्थाओं को कमजोर किया है। सरकार किसी की जागीर नहीं है, लेकिन कुछ लोग ऐसा मानने लगे हैं। इसके लिए सहज होकर खड़े होने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग देशभक्ति की बात करते हैं, लेकिन इससे बड़ी देशभक्ति कुछ नहीं हो सकती कि आप जागरूक बनें। फिजूल के मुद्दे नहीं उठाने चाहिए। सिर्फ देश और विकास की बात होनी चाहिए। गोपीगंज में रोड शो के बाद पत्रकारों से प्रियंका ने कहा कि दरअसल यह सरकार की एक्सपायरी डेट हो गई है। इसके बड़े-बड़े दावों की जमीनी हकीकत मुझे तो शून्य नजर आ रही है। कांग्रेस लगातार मोदी पर उद्योगपतियों, पूंजीपतियों के पक्ष में काम करने वाला प्रधानमंत्री होने का आरोप लगाती है। संकेतों की भाषा सभी लोग नहीं समझते। चुनाव में सीधे-सीधे बात करना ही सही रणनीति है। इसलिए बात ऐसी होनी चाहिए जिससे भाजपा की कमजोरियां, कमियां झलकें और मतदाता कांग्रेस को वोट देने का मन बनाएं। प्रियंका को देखने भारी भीड़ उमड़ रही है। देखना यह होगा कि कांग्रेस अपनी खोई जमीन वापस हासिल कर सकेगी। प्रियंका फिजूल के मुद्दों से हटकर उन मुद्दों पर बात कर रही हैं जिससे जनता सीधी जुड़ती है। बालाकोट से उत्पन्न राष्ट्रवाद रोटी, कपड़ा और मकान से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं, यही प्रियंका का लोगों को समझाने का प्रयास है। उन्होंने मिर्जापुर में वकीलों से मुलाकात की ओर आश्वस्त किया कि कांग्रेस की सरकार आते ही उनकी सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार ने अपना जो रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत किया है उसका जोरदार प्रचार भी किया है लेकिन हकीकत में यह सरकार पूरी तरह फ्लॉप है।