पीएम मोदी के पिछले चुनावी वादों को लेकर लगातार
हमलावर रही कांग्रेस ने मंगलवार को अपना घोषणा पत्र जारी किया जिसमें नई नौकरियों के
जरिए अगले 5 साल में बेरोजगारी को लगभग आधा करने,
किसानों की स्थिति सुधारने, जीएसटी का सिंगल रेट
और गरीबों को 72 हजार रुपए सालाना देने जैसे वादे किए गए। मेनिफेस्टो
जारी कर जहां पार्टी ने व्यावहारिक वादों और योजनाआंs का जिक्र
करते हुए जनता के बीच उन्हें जमीन पर उतारने का भरोसा जगाया, वहीं देश का नेगेटिव राष्ट्रवाद और हिंदू-मुस्लिम से
हराकर जमीनी मुद्दों पर लाने का प्रयास किया है। राहुल गांधी यह साबित करते नजर आए
कि बीजेपी राष्ट्रवाद, सम्प्रदायवाद, एयर
स्ट्राइक जैसे मुद्दों के जरिए किसानों, रोजगार, अर्थव्यवस्था की बदहाली जैसे मुद्दों से लोगों का ध्यान भटका रही है। कांग्रेस
की कोशिश रही है कि उसकी इमेज कल्याणकारी योजनाओं को देने वाली पार्टी और सरकार ही
रहे। पहली नजर में मेनिफेस्टो को काफी सोच-विचारकर चुनाव की दृष्टि
से तैयार किया गया आधिकारिक दस्तावेज कहा जा सकता है। घोषणा पत्र में मूल बातें वही
हैं जो पिछले कुछ समय से पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी बार-बार
उठाते रहे हैं। यह न्याय योजना, रोजगार, किसान, शिक्षा और स्वास्थ्य तथा सुरक्षा जैसे पांच मूल
तत्वों पर टिकी हुई है। 20 प्रतिशत गरीबों के खाते में प्रतिवर्ष
72 हजार रुपए डालने वाली न्याय योजना को राहुल पहले ही प्रस्तुत कर चुके
थे, इसलिए घोषणा पत्र में इसका होना स्वाभाविक ही है। जुलाई
1951 में बेंगलुरु में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में
देश के पहले आम चुनावों के लिए कांग्रेस का घोषणा पत्र जारी करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री
पं. जवाहर लाल नेहरू ने कहा था ः किसी भी तरीके अथवा व्यक्ति
के माध्यम से कोई चुनाव जीतने से बेहतर है कि हम अपनी आत्मा को बचाकर रखें,
मरने न दें। किसी भी राष्ट्र का इतिहास किसी एक चुनाव से नहीं बनता,
वह बनता है वहां के लोगों के जीवन मूल्यों से। इस बात को बीते
68 साल हो गए हैं। इस दौरान कांग्रेस के नेतृत्व की चार पीड़ियां बदल
चुकी हैं। कांग्रेस ने 2019 के अपने घोषणा पत्र में बेशक जनता
से सीधे मुद्दांs पर फोकस किया है पर कुछ वादों में उंगुलियां
भी उठ रही हैं। उदाहरण के तौर पर कहा गया है कि देशद्रोह की धारा 124ए को हटाया जाएगा। अफस्पा कानून में संशोधन करने के वादे से लग रहा है कि पार्टियों
के एजेंडे में चुनावी जीत सर्वोपरि है भले ही इससे देश को नुकसान हो। सरकार आने पर
आईपीसी की धारा 124ए को समाप्त करने का वादा करते हुए राहुल गांधी
ने तर्क दिया कि इसका गलत इस्तेमाल हो रहा है और बाद में आए कानूनों की वजह से यह बेकार
भी हो गया है। क्या यह खतरनाक चुनावी वादा नहीं है? अफस्पा कानून
में संशोधन की बात भी कही गई है। वर्तमान में कश्मीर और कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में
यह कानून लागू है। इन दोनों मुद्दों को लेकर पिछले कई सालों से देश में एक लंबी बहस
चल रही है और कुछ मानवाधिकार संगठन इनको हटाने की मांग भी कर रहे हैं। कुछ समय पहले
पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने भी इस कानून पर पुनर्विचार करने की जरूरत बताई थी।
अब कांग्रेस ने इस दिशा में पहल कर दी है। लेकिन नागरिक अधिकारों के नाम पर देश की
सुरक्षा के साथ समझौता करना कहां तक न्याय संगत है? अगर कानून
में कहीं कुछ गलत हो रहा है तो सही करने के लिए सुप्रीम कोर्ट बैठा है। काबिले गौर
है कि 1870 में देशद्रोह का कानून अंग्रेजों ने भारतीयों के लिए
बनाया था। लेकिन देश में आतंकवाद तेजी से पढ़ने के कारण ऐसे कानून होने के अपने मायने
हैं। ऐसे दौर में जब पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए हमले और फिर बालाकोट में
आतंकी शिविर पर की गई कार्रवाई के बाद जब भाजपा ने राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनावी मुद्दा
बना दिया है, देशद्रोह से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा
124ए को खत्म करने और विवादित अफस्पा (सशस्त्र
बल विशेषाधिकार अधिनियम) में संशोधन करने का वादा कर कांग्रेस ने उसे अपने खिलाफ एक बड़ा मुद्दा भाजपा
को दे दिया है। कुल मिलाकर चुनावी दृष्टि से कांग्रेस ने सपने बेहतर fिदखाए हैं परंतु इस सबके साकार होने पर संदेह जरूर है। कांग्रेस की जनता के
स्वाभिमान व आत्म सम्मान की बात जनता को जरूर छूती है। मीfिडया
की स्वायत्तता से लेकर एससी/एसटी समुदाय, देश के अल्पसंख्यकों के हितों से लेकर लेस्वियन व ट्रासजेंडर से जुड़े मुद्दों
को मेनिफेस्टो में जगह दी गई है।
Translater
Friday, 5 April 2019
Thursday, 4 April 2019
मसला वीवीपैट को 50 प्रतिशत पर्चियों से मिलाने का
निर्वाचन
आयोग ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में इलैक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) और वीवीपैट
मिलान का वर्तमान तरीका सबसे अधिक उपयुक्त बताया। आयोग ने प्रति विधानसभा क्षेत्र के
एक मतदान केंद्र से वीवीपैट की पर्चियों की गणना की प्रणाली को न्यायोचित ठहराते हुए
कहा कि अगर यह संख्या बढ़ाई गई तो इससे नतीजे देरी से आएंगे। आयोग ने कहा कि हर लोकसभा
या विधानसभा क्षेत्र के एक मतदान केंद्र में 50 प्रतिशत वीवीपैट
पर्चियों के औचक निरीक्षण करने से मतगणना में कम से कम छह दिनों का वक्त लगेगा। आयोग
ने हलफनामा दायर कर कहा कि वीवीपैट पर्चियों के मिलान की मौजूदा व्यवस्था सबसे उपयुक्त
और संतोषजनक है। आयोग ने आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू
नायडू के नेतृत्व में 21 विपक्षी दलों के नेताओं की याचिका का
जिक्र करते हुए कहा कि इसमें इस समय वर्तमान प्रणाली में बदलाव के लिए कोई वजह नहीं
बताई गई। विपक्षी नेता चाहते हैं कि होने वाले लोकसभा चुनाव में प्रत्येक विधानसभा
क्षेत्र में वोटिंग मशीनों की कम से कम 50 प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों
की गणना की जाए। कोर्ट ने 25 मार्च को इस मामले की सुनवाई करते
हुए आयोग से इसे लेकर रिपोर्ट देने को कहा था। साथ ही यह टिप्पणी करते हुए कहा था कि
किसी भी संस्था को सुधार से जुड़े सुझावों से परहेज नहीं करना चाहिए। इनमें खुद न्यायपालिका
भी शामिल है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को दिए गए हलफनामे में बताया कि एक वीवीपैट
के मतों की गिनती में कम से कम एक घंटे का समय लगता है। ऐसे में यदि 50 प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों की गिनती कराई गई तो छह से नौ घंटे तक समय लगेगा।
ईवीएम की विश्वसनीयता को दिखाने के लिए वह पहले से ही प्रत्येक विधानसभा के एक बूथ
के वीवीपैट पर्चियों का मिलान कराता है। आयोग ने कहा कि सत्यापन के आधार में किसी भी
तरह की वृद्धि से विश्वास स्तर पर बहुत मामूली फर्क पड़ेगा। विश्वास का वर्तमान स्तर
99.9936 प्रतिशत से अधिक है। उसने कहा कि अब तक 1500 मतदान केंद्रों के वीवीपैट का औचक निरीक्षण किया जा चुका है। हालांकि आयोग
ने यह भी कहा कि वह किसी भी ऐसे सुझाव पर विचार के लिए तैयार है जिससे देश में स्वतंत्र
और निष्पक्ष तरीके से चुनाव कराने के सुधार में मदद मिलती है। आयोग ने यह जवाब
21 विपक्षी दलों के नेताओं की उस याचिका पर दिया जिसमें लोकसभा चुनाव
में इस्तेमाल होने वाली ईवीएम और वीवीपैट में से 50 प्रतिशत का
औचक निरीक्षण करने की मांग की गई है। अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या फैसला
देता है। ईवीएम की विश्वसनीयता पर केवल हमारे राजनीतिक दल ही आपत्ति कर रहे हैं बल्कि
दुनिया के कई विकासशील देशों ने भी ईवीएम रिजैक्ट कर दी है। अमेरिका, जर्मनी, इंग्लैंड, आयरलैंड,
इटली व नीदरलैंड जैसे एडवांस देशों ने ईवीएम से चुनाव कराने के बाद उसमें
पाई गई खामियों के कारण इससे वोटिंग न कराने का फैसला किया और वह पर्चियों से चुनाव
कराते हैं। बेशक आज भी बेल्जियम, कनाडा, स्विट्जरलैंड व एस्टोनिया जैसे देश ईवीएम से ही चुनाव करवा रहे हैं।
-अनिल नरेन्द्र
दिल्ली में लोकसभा चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबला लगभग तय
दिल्ली की सातों सीटों पर लोकसभा चुनाव के छठे चरण यानि 12 मई को चुनाव होगा। दिल्ली के सवा
सौ करोड़ से ज्यादा मतदाताओं को अब तय करना है कि उनका कीमती वोट भाजपा को जाएगा,
कांग्रेस को जाएगा या फिर आम आदमी पार्टी (आप)
को जाएगा। अब यह लगभग तय हो गया है कि दिल्ली में कांग्रेस-आप के बीच गठबंधन की संभावना खत्म हो गई है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी
ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन की संभावनाओं पर पूरी तरह विराम लगा दिया
है। दिल्ली कांग्रेस के बूथ अध्यक्षों के सम्मेलन में उन्होंने कहा कि पार्टी लोकसभा
की सभी सातों सीटों पर लड़ेगी और विजय हासिल करेगी। कांग्रेस में गठबंधन को लेकर भारी
विवाद था क्योंकि एक गुट चाहता था कि भाजपा को हराने के लिए गठबंधन इसलिए जरूरी है
ताकि वोट न बंटें। पर दिल्ली प्रदेशाध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का स्पष्ट
यह मत था कि दिल्ली में कांग्रेस को अपने दम-खम पर लड़ना चाहिए।
इसके पीछे उनका सोचना था कि दिल्ली में कांग्रेस जीरो से लड़ाई लड़े तो उसके लिए बेहतर
होगा। इससे निराश बैठे कांग्रेस कार्यकर्ता फिर से सक्रिय होंगे। कांग्रेस ग्रासरूट
लेवल पर मजबूत होगी। कांग्रेस थिंक टैंक की नजर 2020 के दिल्ली
विधानसभा चुनाव पर ज्यादा है। वह सोचती है कि भले ही कांग्रेस लोकसभा चुनाव में अपने
दम-खम पर इतना अच्छा प्रदर्शन न भी करे तब भी उसे अपनी पार्टी
को पुन खड़ा करने में मदद मिलेगी। दूसरी ओर कांग्रेस अगर आम आदमी पार्टी से गठबंधन
कर लेती तो इसका ज्यादा फायदा आप को होता। आम आदमी पार्टी विधानसभा चुनाव में मजबूत
है पर लोकसभा चुनाव अलग चीज है। अब दिल्ली में त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिलेगा।
दिल्ली में भाजपा की लोकप्रियता अब वह नहीं है जो 2014 में मोदी
लहर के समय थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को
46.39 प्रतिशत वोट मिला था और उसने सातों सीटें जीती थीं। आप को
33.1 प्रतिशत वोट मिला था और शून्य सीट जीती थी। कांग्रेस को तब भी
15.2 प्रतिशत वोट मिला था। यह ठीक है कि अगर आप को 33.1 और कांग्रेस के 15.2 प्रतिशत वोटों को जोड़ा जाए तो यह
48.3 प्रतिशत वोट बनता है जो भाजपा के 46.39 प्रतिशत
वोट से ज्यादा है। इस लिहाज से देखा जाए तो त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा को फायदा मिल
सकता है। 2014 के वोट आंकड़े पर नजर डालें तो पश्चिमी दिल्ली
की सीट को छोड़कर बाकी छह में यह बात साबित हो जाती है कि दोनों पार्टियों का वोट भाजपा
से ज्यादा था। हालांकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चुनाव के गणित से ज्यादा कैमिस्ट्री
का असर होता है, इसलिए सिर्फ वोट के आंकड़े जोड़ने भर से बात
बनेगी, यह कहना मुश्किल होता है। अगर पूरी दिल्ली में गठबंधन
के असर पर गौर करें तो 2014 के बाद दिल्ली में दो और चुनाव हुए।
2015 में विधानसभा चुनाव हुआ जिसमें आप को 54.33 प्रतिशत वोट मिले थे और कांग्रेस को 9.66 प्रतिशत। इस
चुनाव में आप को 50 प्रतिशत वोट और 67 विधानसभा
सीटों पर ऐतिहासिक जीत मिली थी। 2017 के दिल्ली नगर निगम चुनाव
में आप का वोट शेयर घटकर 26.13 प्रतिशत आ गया और कांग्रेस का
बढ़कर 21.20 प्रतिशत हो गया। यह कहना गलत न होगा कि दिल्ली में
कांग्रेस का वोट बढ़ रहा है और आप का घट रहा है। चुनाव में स्थितियां बदलती रहती हैं।
अभी भी कुछ लोग गठबंधन की आस लगाए बैठे हैं। कांग्रेस ने अभी तक अपने उम्मीदवारों के
नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं।
Wednesday, 3 April 2019
पटनायक के सामने रोल तलाशती भाजपा
राजग और महागठबंधन की लड़ाई के बीच कई ऐसे दल
खड़े हैं जिनकी मुट्ठी अभी भी बंद है। इनमें से एक है ओडिशा के बीजू जनता दल (बीजद)। ओडिशा बीजद प्रमुख और राज्य के
मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने अभी तक अपनी मुट्ठी खोली नहीं है। बीजद जरूर एक बार भाजपा
के साथ रहेगा अन्यथा उसे दूर-दूर रहना भी आता है। ओडिशा इन दिनों
लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों की सरगर्मियों से गुजर रहा है। यहां लगभग पिछले दो
दशक से राज्य की कमान संभाल रहे नवीन पटनायक प्रदेश के निर्विवाद नेता हैं,
जिन्हें प्यार से लोग नवीन बाबू कहते हैं। साल 2000 में प्रदेश का सीएम बनने के बाद पटनायक यहां लगातार अपनी पार्टी बीजेडी को
मजबूत करते रहे हैं। यहां प्रमुख मुकाबला बीजेडी, भाजपा और कांग्रेस
के बीच है। लेकिन अगर जमीनी हकीकत की बात की जाए तो असली मुकाबला बीजेडी और भाजपा के
बीच है। ओडिशा एक हिन्दू बहुल राज्य हैं, जहां मुस्लिमों की आबादी
महज तीन प्रतिशत है। प्रदेश की राजनीति पर गहरी नजर रखने वालों का कहना है कि राजनीति
में हिन्दू-मुस्लिम वाला मामला और जातिगत राजनीति मौजूद नहीं
है। यहां टिकट का फैसला चेहरे, काम और जनाधार व दूसरे आधार पर
होता है। अगर चेहरों की बात की जाए तो यहां जहां बीजेडी नवीन पटनायक के नाम पर उतर
रही है तो वही भाजपा पीएम मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय
मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के नाम पर मैदान में है। इन चुनावों में बीजेडी ने लोकसभा
के लिए अपने ज्यादातर चेहरों को बदला है, वहीं विधानसभा में ज्यादातर
अपने मौजूदा चेहरों पर ही भरोसा जताया है। ओडिशा में लोकसभा की 21 और विधानसभा की 143 सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं।
2014 लोकसभा चुनाव में बीजेडी ने 20 लोकसभा और
117 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी। कांग्रेस ने सिर्फ 16
विधानसभा सीटें जीती थीं। भाजपा के हिस्से एक लोकसभा और 10 विधानसभा सीटें आई थीं। अन्य के खाते में सिर्फ चार विधानसभा सीटें आई थीं।
ओडिशा पूर्वी भारत के उन राज्यों में एक है जहां पर भाजपा को 2019 के चुनाव में बढ़त बनाने की उम्मीद है। 2009 में बीजद
एनडीए से अलग हो गई थी तब से भाजपा राज्य में लगातार अपनी स्थिति मजबूत करने में लगी
हुई है। भाजपा का राज्य के अपेक्षाकृत अधिक पिछड़े और आदिवासी बहुल पश्चिमी जिलों पर
प्रभाव है। 2014 के चुनाव में भाजपा को सबसे अधिक बढ़त इन्हीं
इलाकों में मिली थी। वहीं कांग्रेस पारंपरिक रूप से तटीय इलाकों में मजबूत है। बीजद
को सबसे अधिक चुनौती गैर-तटीय आंतरिक सीटों पर मिल रही है। यह
सीटें हैंöकालाहांडी, बागढ़, संबलपुर और सुंदरगढ़। वर्ष 2014 में राज्य की 21 में से 13 सीटों
पर भाजपा और कांग्रेस को मिले कुल मत बीजद के मुकाबले अधिक थे। लेकिन त्रिकोणीय मुकाबला
होने के कारण बीजद 20 सीटों पर जीत दर्ज कराने में सफल रहा। इसका
मतलब यह है कि वोटों में बिखराव की वजह से बीजद को फायदा हुआ था। इस बार भी वह यही
उम्मीद कर रहा है कि कांग्रेस-भाजपा में मतों का बंटवारा उसके
हक में जाएगा। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक।
-अनिल नरेन्द्र
आखिर राहुल ने वायनाड ही को क्यों चुना
कांग्रेस अध्यक्ष
राहुल गांधी उत्तर प्रदेश की अमेठी लोकसभा सीट के अलावा केरल की वायनाड लोकसभा सीट
से भी चुनाव लड़ेंगे। रविवार को इस सस्पैंस से पर्दा उठ गया। कांग्रेस नेता एके एंटनी
ने रविवार को यह घोषणा की। इस घोषणा के बाद वायनाड में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जमकर
जश्न मनाया। पटाखे फोड़े गए और कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे का मुंह मीठा करवाया। कांग्रेस ने सोच-समझकर राहुल
गांधी के ]िलए केरल की वायनाड सीट को चुना है। पिछले दो बार से
कांग्रेस यहां से चुनाव जीतती आ रही है। वायनाड सीट भले ही केरल में हो, लेकिन यह तीन राज्यों का जंक्शन है। यह क्षेत्र तमिलनाडु और कर्नाटक से घिरा
हुआ है यानि एक सीट से लड़कर राहुल तीन राज्यों को कवर कर लेंगे। कांग्रेस को लगता
है कि इससे दक्षिण भारत में पार्टी का जनाधार मजबूत होगा। वायनाड से केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक की 87 सीटें कवर होंगी। केरल में
20 लोकसभा सीटें हैं। 2014 में कांग्रेस की आठ
सीटें थीं। कर्नाटक की 28 सीट में से 13 भाजपा और नौ कांग्रेस के पास थीं। तमिलनाडु में 39 में
से 37 अन्नाद्रमुक और 11 सीटें भाजपा ने
जीती थीं। कांग्रेस का यहां खाता भी नहीं खुला था। 1991 में राजीव
गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी ने पीएम बनने से इंकार कर दिया। कांग्रेस के हालात
बिगड़ते गए। 1996 में कांग्रेस आम चुनाव हार गई। कई वरिष्ठ नेताओं
ने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी का विरोध किया तो पार्टी कई धड़ों में
बंट रही थी। 1997 के कांग्रेस अधिवेशन में सोनिया गांधी को प्राथमिक
सदस्यता दी गई, जिसके विरोध में शरद पवार, पीए संगमा व तारिक अनवर को निकाल दिया गया। 1998 में
सोनिया गांधी अध्यक्ष बनीं। तब सोनिया 1999 के आम चुनाव में बेल्लारी
और अमेठी दोनों जगहों से जीतीं। बेल्लारी में भाजपा की सुषमा स्वराज को 3.38
लाख के मुकाबले 4.14 लाख वोट से हराया। बाद में
उन्होंने यह सीट छोड़ दी। हालांकि इन चुनाव में भाजपा गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिला।
लेकिन पांच वर्ष बाद कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की और अगले एक दशक तक बनी रही। इसका
असर यह हुआ कि 2004 में कांग्रेस ने केरल, आंध्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में 47 सीटें जीतीं। मैंने इस प्रकरण का इसलिए उल्लेख किया है कि कांग्रेस में दक्षिण
भारत से चुनाव लड़ने की परंपरा पहले से मौजूद है। इंदिरा गांधी ने भी लोकसभा चुनाव
में कर्नाटक की चिकमंगलूर सीट से जनता पार्टी के वीरेंद्र पाटिल को 70 हजार वोटों से हराया था। वायनाड लोकसभा क्षेत्र में कुल सवा 13 लाख वोटरों में करीब 56 प्रतिशत मुस्लिम हैं।
10 प्रतिशत ईसाई हैं और बाकी हिन्दू और जनजातीय के लोग हैं। कांग्रेस
को यह भी उम्मीद है कि राहुल के उतरने की वजह से उसे बाकी राज्यों में भी अल्पसंख्यकों
के वोट एकतरफा रूप से मिलेंगे। केरल से लड़कर कांग्रेस यह भी संदेश देना चाहती है कि
उसकी लड़ाई सिर्फ भाजपा से नहीं है। वह लेफ्ट और बाकी छोटी पार्टियों से भी सीधा मुकाबला
करने के लिए उतरी है ताकि उसके पास नम्बर ज्यादा हों और चुनाव बाद कोई परेशानी नहीं
आए। सीट एक है पर निशाने तीन हैं। पहलाöकेरल, तमिलनाडु, कर्नाटक
का जंक्शन है वायनाड, इससे कांग्रेस ने तीनों राज्यों में बैलेंस
बिठाने का प्रयास किया है। दूसराöविरासत को आगे
बढ़ाते हुए साउथ पहुंचे राहुल गांधी जनाधार मजबूत करने की कोशिश में हैं। तीसराöज्यादा से ज्यादा सीटें बढ़ाने की कोशिश में है कांग्रेस ताकि दूसरी पार्टियों
पर निर्भरता कम हो। कल सर्वे सामने आए हैं कि राहुल गांधी दक्षिण भारत में पीएम मोदी
से ज्यादा लोकप्रिय हैं। एक सर्वे के अनुसार साउथ में तीन प्रतिशत ज्यादा लोगों ने
मोदी के ऊपर राहुल को चुना है। नवम्बर 2018 में
इंडिया टुडे के सर्वे के अनुसार आंध्र में 44 प्रतिशत लोगों ने
पीएम के रूप में राहुल को चुना, वहीं 38 प्रतिशत लोगों ने मोदी को चुना। तमिलनाडु में 36 प्रतिशत
ने राहुल और 29 प्रतिशत ने मोदी को चुना। केरल में 38
प्रतिशत ने राहुल और 31 प्रतिशत ने पीएम मोदी को
चुना।
Tuesday, 2 April 2019
साक्ष्यों के अभाव में सभी समझौता एक्सप्रेस आरोपी बरी
पंचकूला की विशेष एनआईए कोर्ट ने
समझौता एक्सप्रेस विस्फोट केस में 12 साल बाद असीमानंद समेत चारों आरोपियों
को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। बता दें कि इस धमाके में 68 लोगों की मौत हो गई थी। यह हादसा रात 11.30 बजे दिल्ली
से करीब 80 किलोमीटर दूर पानीपत के दिवाना रेलवे स्टेशन के पास
हुआ था। धमाकों की वजह से ट्रेन में आग लग गई थी और इनमें महिलाओं और बच्चों समेत कुल
68 लोगों की मौत हो गई थी और 12 लोग घायल हो गए
थे। 19 फरवरी को जीआरपी (एसआईटी)
हरियाणा पुलिस ने मामले में केस दर्ज किया था और करीब ढाई साल बाद इस
घटना की जांच की जिम्मेदारी 29 जुलाई 2010 को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपी गई थी। भारत-पाकिस्तान के बीच एक सप्ताह में
दो बार च लने वाली समझौता एक्सप्रेस में 18 फरवरी
2007 को धमाका हुआ था। एनआईए ने 26 जून
2011 को पांच लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। चार्जशीट दाखिल होने
के बाद मामले में 224 गवाहों के बयान दर्ज हुए थे। इसमें कुल
299 गवाह बनाए गए थे। कोर्ट ने सुनवाई में वकील मोमिन मलिक की ओर से
सीआरपीसी की धारा 311 के तहत गवाही के लिए लगाई गई याचिका को
भी खारिज कर दिया। केस में 11 मार्च को ही फैसला आने के कयास
लगाए जा रहे थे पर अंतिम क्षण में नया मोड़ आ गया था। पाक की एक महिला वकील राहिला
के मेल को आधार बताते हुए वकील मोमिन ने याचिका लगाई थी कि वह इस केस में कुछ प्रत्यक्षदर्शियों
की गवाही करवाना चाहती हैं, क्योंकि हादसे में उनके पिता की मौत
हुई थी। कोर्ट ने याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि 12 साल तक
यह लोग कहां थे? फैसले के वक्त याचिका मायने नहीं रखती। इस बम
धमाके मामले में स्वामी असीमानंद और तीन अन्य आरोपियों को बरी करने वाली एनआईए की विशेष
अदालत ने कहा कि विश्वसनीय और स्वीकार्य साक्ष्य के अभाव की वजह से हिंसा के इस नृशंस
कृत्य में किसी गुनहगार को सजा नहीं मिल पाई है। अदालत ने चारों आरोपियोंöस्वामी असीमानंद, लोकेश शर्मा, कमल चौहान और रजिंदर चौधरी को
20 मार्च को बरी कर दिया था। एनआईए अदालत के न्यायाधीश जगदीप सिंह ने
अपने फैसले में कहा, ‘मुझे गहरे दर्द और पीड़ा के साथ फैसले का
समापन करना पड़ रहा है, क्योंकि विश्वसनीय और स्वीकार्य साक्ष्यों
के अभाव की वजह से हिंसा के इस नृशंस कृत्य में किसी को भी गुनहगार नहीं ठहराया जा
सकता है। अभियोजन के साक्ष्यों में निरंतरता का अभाव था और आतंकवाद का मामला अनसुलझा
रह गया। उन्होंने 28 मार्च को सार्वजनिक किए विस्तृत फैसले में
कहा, अदालत को लोकप्रिय या प्रभावी सार्वजनिक धारणा अथवा राजनीतिक
भाषणों के तहत आगे नहीं बढ़ना चाहिए। अंतत उसे मौजूदा साक्ष्यों को तवज्जो देते हुए
प्रासंगिक वैधानिक प्रावधानों और इसके साथ तय कानूनों के आधार पर अंतिम निष्कर्ष पर
पहुंचना चाहिए।’ निस्संदेह
यह हैरानी की बात है कि इतनी गंभीर घटना में किसी को सजा नहीं दी जा सकी। छानबीन में
कहां कमी रही? अगर हम आतंकी घटना को भी अदालत में साबित नहीं
कर पाते तो आतंकवाद से लड़ने का दावा कैसे कर सकते हैं? इस मामले
में एनआईए का ट्रेक रिकॉर्ड निराशाजनक रहा है।
-अनिल नरेन्द्र
पहले चरण में कई दिग्गजों की वोट आजमाइश होगी
लोकसभा
चुनाव के पहले चरण को अब मुश्किल से नौ दिन बचे हैं। पहले चरण में 11 अप्रैल को 20 राज्यों की कुल 91 सीटों पर वोट पड़ेंगे। आंध्र (25), अरुणाचल (2),
असम (5), बिहार (4), छत्तीसगढ़
(1), जेके (2), महाराष्ट्र (7),
मणिपुर (1), मेघालय (2), मिजोरम (1), नगालैंड (1), उड़ीसा
(4), सिक्किम (1), तेलंगाना (17),
त्रिपुरा (1), उप्र (8), उत्तराखंड (5), पश्चिम बंगाल (2), अंडमान और लक्षद्वीप
में एक-एक सीट पर वोट पड़ेंगे। इस तरह 11 अप्रैल को 91 सीटों पर मतदान होगा। एक चुनावी सर्वे में
कहा गया है कि इस आम चुनाव में भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए को 261 सीटें मिल सकती हैं। जो बहुत से 11 कम हैं। इससे पहले
10 मार्च के सी-वोटर जनमत सर्वे में यह संख्या
264 बताई गई थी। दूसरा सर्वे बताता है कि भाजपा अपने बूते पर 241 सीटें पा सकती है। इस आम चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को
42 प्रतिशत और कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए को 30.4 प्रतिशत वोट मिल सकते हैं। आईएनएस-सी-वोटर स्टेट ऑफ द नेशन मार्च 2019 वैव-2 में कहा गया है कि यह दूसरा सर्वेक्षण 10,280 नमूना सर्वेक्षण
पर आधारित है। 543 लोकसभा सीटों के करीब 70,000 मतदाताओं की राय इस सर्वे में जानी गई है। चूंकि अभी चुनाव में समय है और रोज
तस्वीर बदलेगी इसलिए इस सर्वे को हम अंतिम नहीं मान सकते। यह तो बस एक संकेत है। पहले
चरण में भाजपा के कद्दावर नेता नितिन गडकरी समेत सात केंद्रीय मंत्री चुनाव मैदान में
हैं। यही नहीं, तीन पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज नेताओं के बेटे-बेटी भी अपनी किस्मत आजमाएंगे। पहले चरण में जहां यूपी की आठ और बिहार की चार
सीटों पर वोट डाले जाएंगे वहीं उत्तराखंड की सभी पांच सीटों पर मतदान होगा। नितिन गडकरी
इस बार फिर से नागपुर की लोकसभा सीट से मैदान में हैं। कांग्रेस के नेता नाना पटोले
से होगा उनका मुकाबला। 2014 में नितिन गडकरी ने यह सीट
2.84 लाख वोटों से जीती थी। पर्यटन मंत्री महेश शर्मा गौतमबुद्ध नगर
से इस बार सपा-बसपा के सतबीर नागर और कांग्रेस के डॉ.
अरविन्द चौहान से भिड़ेंगे। जनरल वीके सिंह फिर गाजियाबाद से उम्मीदवार
होंगे। 2014 में उन्होंने राज बब्बर को हराया था। इस बार मुकाबला
सपा-बसपा के सुरेश बंसल और कांग्रेस की डॉली शर्मा में है। उत्तराखंड
की नैनीताल-उधम सिंह नगर सीट से मैदान में हैं, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत। उनका मुकाबला भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष
अजय भट्ट से है। महाराष्ट्र के पूर्व सीएम और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे
शोलापुर से मैदान में हैं। शिंदे के खिलाफ भाजपा के अलावा प्रकाश आंबेडकर भी मैदान
में हैं। उत्तराखंड की हरिद्वार सीट से भाजपा प्रत्याशी, पूर्व
मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का मुकाबला कांग्रेस के अंबरीश कुमार से है। मुजफ्फरनगर
सीट पर रालोद प्रमुख अजीत सिंह की टक्कर भाजपा में केंद्रीय मंत्री रह चुके संजीव बालयान
से है। अरुणाचल के रिजिजू मोदी सरकार में गृह राज्यमंत्री इस बार भी अरुणाचल पश्चिम
सीट से उम्मीदवार हैं। 2014 में कांग्रेस के ताकम संजौय को रिजिजू
ने 41,738 वोटों से हराया था। आंध्रप्रदेश और अरुणाचल विधानसभा
सीटों (175 और 56) में भी 11 अप्रैल को वोट पड़ेंगे।
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