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Tuesday, 9 April 2019

क्या चुनाव आयोग अग्निपरीक्षा में खरा उतरेगा?

भारतीय चुनाव आयोग आजकल अग्निपरीक्षा के दौर से गुजर रहा है। उसकी पहली जिम्मेदारी देश में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने की है। इसमें आचार संहिता का सख्ती से पालन शामिल है। दुख से कहना पड़ता है कि 2019 के आम चुनाव के पहले आदर्श आचार संहिता के इतने उल्लंघन हुए हैं कि सवाल पूछे जा रहे हैं कि आखिर चुनाव आयोग कहां है और क्या उसका हाल किसी ऐसी अप्रभावी संस्था या बिना दांत के शेर जैसा तो नहीं जिसकी किसी को भी न परवाह है न डर है? वकील प्रशांत भूषण ने ट्वीट कर पूछा है कि चुनाव आयोग नरेंद्र मोदी पर (कथित) प्रोपेगंडा मूवी की इजाजत देता है, उन्हें दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो पर एंटी सैटेलाइट मिसाइल पर चुनावी भाषण देने की इजाजत देता है, उन्हें रेलवे में चाय के गिलास पर मोदी की तस्वीर बनाने की इजाजत देता है लेकिन राफेल पर छपी किताब पर पाबंदी लगा दी जाती है और उसकी कॉपीज को अपने कब्जे में ले लिया जाता है? कांग्रेस ने अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू के काफिले की एक कार से 1.80 करोड़ रुपए की कथित बरामदगी के मामले में दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा से पहले यह पैसा मतदाताओं को लुभाने के लिए इस्तेमाल होने वाला था और इसके लिए चुनाव आयोग को मोदी, खांडू व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ताफिर गाव के खिलाफ मामला दर्ज करना चाहिए। कांग्रेस ने अपनी शिकायत में कहा है कि अरुणाचल प्रदेश के नोट के बदले वोट लेने के मामले पर आयोग को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। पार्टी ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के चुनाव हलफनामे को भी आयोग के समक्ष मुद्दा बनाते हुए उसे झूठा बताया है। राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने अपने निवास उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में बयान दे दिया कि हम सब भाजपा के कार्यकर्ता हैं, सभी चाहते हैं कि मोदी जी दोबारा प्रधानमंत्री बनें। विडंबना यह है कि संवैधानिक पद पर आसीन एक राज्यपाल खुलेआम भाजपा का समर्थन करता है, उसके हक में बयान देता है और आयोग के पास राज्यपाल जैसे पद पर बैठे किसी व्यक्ति के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई का अधिकार नहीं है। इसलिए उसने राष्ट्रपति से शिकायत करने का फैसला किया तो कुल मिलाकर इस मामले की नियति राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के फैसले पर निर्भर करेगी। राज्यपाल भले ही किसी पार्टी से संबंधित रहा हो पर एक बार संविधान के तहत शपथ लेने के बाद उससे उम्मीद की जाती है कि वह पद पर रहने तक निष्पक्ष रहे। दलित नेता एवं तीन बार के सांसद प्रकाश अंबेडकर अपने उस बयान को लेकर गुरुवार को विवादों में फंस गए जिसमें उन्होंने कहा था कि पुलवामा में आतंकवादी हमले पर बात न करने को लेकर वह ईसी को दो दिन के लिए जेल भेजेंगे। महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में रैली में अंबेडकर के इस बयान पर संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग ने सख्त रवैया अपनाते हुए कहा कि यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी। चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को भी प्रकाश अंबेडकर के खिलाफ मामला दर्ज करने को कहा है। उत्तर प्रदेश में एसपी नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री आजम खान ने चुनाव आयोग को आड़े हाथों लेते हुए शुक्रवार को कहा कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के खिलाफ क्या कार्रवाई की, जिन्होंने भारतीय सेना को `मोदी की सेना' कहकर संबोधित किया? आजम खान ने कहाöयोगी जी ने कहा मोदी की फौज है। मुख्तार अब्बास नकवी ने भी यह कहा कि मोदी की फौज है लेकिन चुनाव आयोग ने कुछ नहीं कहा, कोई कार्रवाई नहीं हुई। कल्याण सिंह के खिलाफ भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। लेकिन जैसे ही मैंने कहा कि बॉर्डर की रक्षा के लिए हम अपने खून की एक-एक बूंद बहा देंगे तो आयोग ने मेरी आवाज दबा दी। यह कैसा न्याय है? आखिर भाजपा के नेताओं पर चुनाव आयोग क्यों नहीं है करता कार्रवाई? कहानियां कई हैं इसलिए उनकी पूरी बयानी तो नहीं करते पर कुछ उदाहरण जरूर देते हैं। ऐसे वक्त जब आदर्श आचार संहिता लागू हो, नरेंद्र मोदी की महिमामंडन करने वाली एक फिल्म रिलीज के लिए तैयार है। 31 मार्च को भाजपा की ओर से प्रोपेगंडा टीवी चैनल `नमो टीवी' लांच किया लेकिन चैनल की कानूनी स्थिति, इसके लाइसेंस पर गंभीर सवाल है। केबल ऑपरेटर टाटा स्काई ने कहा कि आप इस चैनल को अपने चुने हुए चैनलों के ग्रुप से डिलीट भी नहीं कर सकते। राजस्थान के चूरू में नरेंद्र मोदी की रैली में उनके पीछे पुलवामा में मारे गए लोगों की तस्वीरें थीं जिससे मृत सैनिकों का कथित राजनीतिक इस्तेमाल किया गया। आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन पर आयोग उम्मीदवार से अप्रसन्नता व्यक्त कर सकता है, उसकी निन्दा, निर्देश (सेंसर) कर सकता है और अगर मामला आपराधिक हो तो उचित अधिकारी से एफआईआर दर्ज करने को कह सकता है, लेकिन आज के राजनीतिक माहौल में जब चुनावी जीत के लिए कुछ भी करना कई जगह जायज बताया या माना जाता है, चुनाव आयुक्त के अप्रसन्नता जताने और निन्दा करने से किसी को कोई फर्प नहीं पड़ रहा है। अमित शाह ने शामली और बिजनौर में कथित तौर पर सांप्रदायिकता भड़काने वाले भाषण दिए थे पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। एक पूर्व चुनाव आयुक्त के मुताबिक जरूरी है कि चुनाव आयोग एक या दो महत्वपूर्ण नेताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे ताकि यह संदेश हर जगह जाए कि आदर्श चुनाव संहिता को गंभीरता से लेना जरूरी है, पूर्व चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णामूर्ति कहते हैं कि हमारी कुछ सीमाएं हैं, हमने कई बदलाव प्रस्तावित किए हैं, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल की उसमें रुचि नहीं, किसी भी राजनीतिक दल ने अपने घोषणा पत्र में चुनाव सुधार तक का जिक्र भी नहीं किया है। आप पूरी तरह से चुनाव आयोग को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते क्योंकि उसकी सीमाएं हैं। एक पूर्व कानूनी सलाहकार मानते हैं कि राजनीतिक दल चुनाव सुधार को लेकर कुछ करने वाले नहीं। वो कहते हैं कि राजनीतिक दलों के रवैये पर कोई सीमा नहीं है। उम्मीदवार के खर्च पर सीमा है। एक राजनीतिक दल 500 करोड़ रुपए खर्च करे कोई फर्प नहीं पड़ता है, वो चुनावी बांड्स पर पारदर्शिता आ जाए तो वह एक चुनावी सुधार जरूर होगा। चुनाव आयोग की अग्निपरीक्षा है, देखें, क्या वह इसमें खरा उतरता है या नहीं?
-अनिल नरेन्द्र


Sunday, 7 April 2019

कांग्रेस सही मायनों में राष्ट्रीय दल है

अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न सिन्हा कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात के बाद उनकी बेटी व अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा ने कहा कि उनके पिता को बहुत पहले ही भाजपा से अलग हो जाना चाहिए था। यदि आप किसी जगह पर खुश नहीं हैं, जहां आपको पार्टी इज्जत न दे तो आपको निश्चित रूप से उस पार्टी व जगह को बदल लेना चाहिए। मैं उम्मीद करती हूं कि कांग्रेस के साथ जुड़कर वह बहुत अच्छा काम करेंगे और कभी दबाव का अनुभव नहीं करेंगे। अब समय आ गया था कि उनके पिता भाजपा छोड़ दें। एचटी मोस्ट स्टाइलिश अवार्ड से इतर बातचीत में सोनाक्षी ने कहा कि उनके पिता एक वरिष्ठ नेता और विस्तृत ज्ञान के साथ ही वह जय प्रकाश नारायण जी, अटल जी, लाल कृष्ण आडवाणी जी के समय से पार्टी के सदस्य रहे हैं। उन्होंने जब भाजपा को ज्वाइंन किया था तब फिल्म इंडस्ट्री में उनका मजाक उड़ाया जाता था। फिल्मी दुनिया में शत्रुघ्न उन पहले अभिनेताओं में थे जो भाजपा में शामिल हुए थे। उन्होंने दावा किया कि उनके पिता पटना साहिब से ही लड़ेंगे। वहीं खुद शत्रुघ्न सिन्हा ने रविवार को कहा कि उन्होंने यह फैसला इसलिए किया क्योंकि देश की सबसे पुरानी पार्टी ही सही मायनों में राष्ट्रीय पार्टी है। कांग्रेस में शामिल होने के फैसले पर शत्रु ने रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि उन्होंने यह फैसला राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के सुझाव के बाद लिया। उन्होंने यह दावा भी किया कि तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी, सपा नेता अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल ने भी अपनी-अपनी पार्टियों में शामिल होने का न्यौता दिया था, लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया था कि पस्थितियां जो भी हों वह पटना साहिब से ही लोकसभा चुनाव लड़ेंगे। अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न (73) से जब पूछा गया कि उन्होंने कांग्रेस में शामिल होने का फैसला क्यों किया तो उन्होंने कहा कि इसकी कई वजह हैं। कांग्रेस में महात्मा गांधी, बल्लभ भाई पटेल, जवाहर लाल नेहरू जैसे महान नेता रहे हैं और इसमें नेहरू-गांधी परिवार है। पार्टी की स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि हमारे पारिवारिक मित्र लालू प्रसाद यादव ने सलाह दी थी। उन्होंने मुझ से कहा कि मैं आपके साथ हूं और राजनीतिक रूप से भी साथ रहूंगा। उन्होंने कहा कि उनके लिए भाजपा छोड़ना तकलीफदायक था, जिसके साथ  उनका एक लंबा नाता था। साथ ही यह भी कहा कि वह शीर्ष नेतृत्व द्वारा पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा के प्रति जो रवैया अपनाया गया, उससे वह आहत थे। शत्रुघ्न औपचारिक रूप से कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। अगर शत्रु भाजपा छोड़ने पर मजबूर हुए हैं तो इसका दोष भाजपा नेतृत्व जोड़ी पर जाता है। इनके तुगलकशाही में काम करने का अंदाज शत्रु को स्वीकार्य नहीं था। इनकी नीतियों पर टिप्पणी करना कोई अनुशासनहीनता नहीं है। शत्रु समेत कई भाजपा नेता व कार्यकर्ता मोदी-शाह की जोड़ी से परेशान हैं। आडवाणी जी जैसे भाजपा के भीष्म पितामह को जो गांधीनगर से छह बार जीतते आ रहे हैं उनका टिकट काट कर खुद अमित शाह वहां से चुनाव लड़ें, यह कौन-सा तरीका है? अगर शत्रु कांग्रेस में जा रहे हैं तो उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा था।
-अनिल नरेन्द्र


आईपीएल का चस्का भारी पड़ रहा है चुनाव प्रचार पर : जाम की दिक्कत अलग

पूरा देश आईपीएल फीवर का शिकार हो गया है। शाम आठ बजे सब अपने टीवी के सामने बैठ कर लगभग तीन घंटे मैच का लुत्फ उठाते हैं। आईपीएल लगभग दो महीने चलेगा यानि 12 मई को फाइनल मैच खेले जाने तक क्रिकेटप्रेमी इन मैचों की दीवानगी में खोये रहेंगे। यहां तक कि पता नहीं चल रहा, आईपीएल से कहीं बड़ा मैच लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। क्रिकेटप्रेमियों का ज्यादा ध्यान आईपीएल पर है। खास बात यह है कि इन्हीं दो महीनों में लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्यौहार यानि भारत का आम चुनाव भी सात चरणों में सम्पन्न होना है। पहले चरण की वोटिंग को मुश्किल से चार दिन बचे हैं, 11 अप्रैल को पहला मतदान होगा। आईपीएल के इतिहास में यह पहला मौका है जब भारत में आईपीएल मैच और चुनाव दोनों साथ-साथ हो रहे हैं। स्वाभाविक है कि चुनाव प्रचार तेज होने के साथ ही देश का तापमान भी बढ़ेगा। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि जब दिल्ली की सातों सीटों के लिए नामों की घोषणा होगी उसके बाद क्रिकेट के प्रति लोगों की दीवानगी चुनावी माहौल को किस रूप से प्रभावित करेगी। प्रभावित होने की बात से फिरोज शाह कोटला स्टेडियम में हो रहे आईपीएल मैच के दौरान पूरा आईटीओ जाम के हालात से गुजरने पर मजबूर हो जाता है। दफ्तरों में आने-जाने वाले लोगों के लिए मैच बड़ी मुसीबत बन गए हैं। खासतौर से बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्टेडियम से सटे दफ्तरों में आने-जाने वालों को इसके चलते खासी परेशानी उठानी पड़ रही है। स्टेडियम के आसपास पार्किंग को रोकने के लिए बहादुर शाह जफर मार्ग की सर्विस लेन के दोनों ओर बैरिकेड लगाकर सर्विस लेन में गाड़ियों की एंट्री बंद कर दी जाती है। मैं खुद इसका शिकार हो चुका हूं। एक मैच के दौरान मुझे इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग से पैदल चलकर अपने दफ्तर प्रताप भवन जाना पड़ा। जाम में मैच देखने वालों की भीड़ से एम्बुलेंस तक के फंसने का भी खतरा बना रहता है। वजह यह है कि कुछ ही मीटर के फासले पर दो बड़े अस्पताल हैं। मैच की वजह से शाम के समय नई दिल्ली, इंडिया गेट, आईटीओ, विकास मार्ग, राजघाट और दिल्ली गेट के आसपास ट्रैफिक बाधित रहता है। बाधित होने से एक और मुश्किल बहादुर शाह जफर मार्ग से आने-जाने वालों को होती है। खासतौर से जब से भाजपा का नया मुख्यालय डीडीयू मार्ग पर आया है। यहां एक तरफ भाजपा का नया मुख्यालय है तो उसी के नजदीक आम आदमी पार्टी और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी का दफ्तर भी है। यहां आजकल दिनभर चहल-पहल रहती है। इससे डीडीयू मार्ग और उसके आसपास के रास्तों पर भी असर पड़ता है। लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी तब होती है जब प्रधानमंत्री भाजपा मुख्यालय आते हैं। उनके आने-जाने से पहले दिल्ली पुलिस और ट्रैफिक पुलिस को पूरे इलाके में सुरक्षा के कड़े इंतजाम करने पड़ते हैं। मीटिंग ज्यादातर शाम को होती है और इसकी जानकारी पब्लिक को नहीं होती। इससे पीक आवर में पीएम की मूवमेंट के लिए वीआईपी रूट लगाने से काफी देर के लिए ट्रैफिक रोकना पड़ता है। अगर आपको इस रास्ते से जरूरी जाना पड़े तो आपको बहुत समय तक इंतजार करना पड़ेगा। उन पुलिस वालों के साथ हमारी पूरी हमदर्दी है जो घंटों सड़कों के दोनों कोनों में खड़े रहने पर मजबूर होते हैं इस वीआईपी मूवमेंट पर।

Saturday, 6 April 2019

उत्तर प्रदेश के मुसलमान इस बार किसके साथ जाएंगे?

लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार करने में तमाम सियासी दल कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं और देश के सबसे बड़े राज्य जहां 80 लोकसभा सीटें हैं वहां आगामी 11 अप्रैल को प्रथम चरण में आठ सीटों पर होने वाले मतदान में कई दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर होगी। प्रथम चरण में सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फर नगर, बिजनौर, मेरठ, बागवत, गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर सीटों के लिए मतदान होगा। इनमें से अधिकतर सीटों पर अल्पसंख्यक वोटरों की काफी संख्या है और इनका मतदान महत्वपूर्ण होगा। पर लगता है कि उत्तर प्रदेश का मुसलमान मतदाता अभी भी दुविधा में है कि अपना वोट किसको दे? समाजवादी पार्टी का पारंपरिक मतदाता माने जाने वाली इस बिरादरी के सामने पसंद के लिए सप-बसपा और रालोद का गठबंधन है। साथ ही कांग्रेस भी उसको अपने पाले में करने की पुरजोर कोशिश में है। ऐसे में वह अब तक यह तय नहीं कर पाया है कि खड़ा किस सियासी दल के साथ हो? 16वीं लोकसभा के चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से किसी पर एक भी मुस्लिम उम्मीदवार ने जीत दर्ज नहीं की थी। जबकि 15वीं लोकसभा के चुनाव में यूपी से सात नुमाइंदे संसद में चुनकर पहुंचे थे। ऐसे में इस बार के लोकसभा चुनाव में जाएं तो कहां? 16वीं लोकसभा के चुनाव में जिस बसपा ने सपा के इस पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश की थी वो इस बार लगता है कि सपा के साथ खड़ी है। राष्ट्रीय लोकदल भी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन का हिस्सा है। बसपा के प्रति मुसलमान मतदाताओं की अनमनस्क भाव की बड़ी वजह सिर्प एक है। भाजपा का बहुजन समाज पार्टी का भी रहा था साथ। जिसके बल पर मायावती ने उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बनाई थी। उन्हें डर है कि कहीं इस बार भी बहन जी चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ सरकार बनाने के चक्कर में न आ जाएं। यूपी के लगभग 20 प्रतिशत मुसलमान 17वीं लोकसभा के चुनाव में अपनी भूमिका बेहद गंभीर मान रहे हैं। उनकी बड़ी वजह 16वीं लोकसभा का वह परिणाम है जिसमें उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं बन सका था। अब तक समाजवादी पार्टी के पाले में खड़ी मतदाताओं की इस बिरादरी को कांग्रेस लुभाने की कोशिश में है। कांग्रेस के नेता इस बात को बाखूबी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश की 35 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमान हार-जीत का फैसला करने की कुव्वत रखते हैं। इन सीटों पर मुसलमान मतदाताओं का प्रतिशत 20 या इससे अधिक है। जाहिर है कि यह प्रतिशत किसी पार्टी की तरफ मुड़ा तो उसकी सीटों पर बड़ा फर्प पैदा कर सकता है। मुसलमानों को एक और बात सता रही है कि देश में हुए पहले लोकसभा चुनाव से अब तक उत्तर प्रदेश की संख्या में मुसलमान सांसदों की संख्या में गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ है। एक बात यह भी है कि मुसलमान वोट बंट भी जाते हैं। कांग्रेस, सपा और बसपा तीनों को वोट जाते हैं इसलिए मुसलमानों को अपने मनमाफिक परिणाम भी नहीं मिलते। फिर मुस्लिम नेताओं का भी अभाव है। ऐसे नेता कम हैं जिनकी बात सभी मुस्लिम बिरादरी माने। इसमें कोई शक नहीं कि तमाम मुसलमान मोदी के खिलाफ हैं और वह उन्हें हराना चाहते हैं पर यह तभी हो सकता है जब मुसलमान वोट बंटे नहीं।
-अनिल नरेन्द्र


अंतत भाजपा के लौह पुरुष ने चुप्पी तोड़ी

भाजपा के संस्थापक और पार्टी के भीष्म पितामह लाल कृष्ण आडवाणी ने लंबे अंतराल के बाद गुरुवार को आखिर अपनी चुप्पी तोड़ ही दी। कभी कमल के फूल वाली पार्टी की आत्मा समझे जाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा कि उनकी पार्टी ने राजनीतिक रूप से असहमत होने वाले को कभी राष्ट्र विरोधी नहीं माना है। कभी भाजपा के लौह पुरुष माने जाने वाले आडवाणी ने ब्लॉग लिखकर कहा कि भाजपा ने कभी भी राजनीतिक असहमति रखने वालों को दुश्मन या राष्ट्र विरोधी नहीं कहा, पार्टी ने उन्हें हमेशा विपक्षी माना। भाजपा हमेशा से हर नागरिक की व्यक्तिगत और राजनीतिक स्तर पर पसंद की स्वतंत्रता को लेकर प्रतिबद्ध है। गांधीनगर से छह बार चुनाव जीतने वाले आडवाणी के टिकट कटने के बाद पहली बार लाल कृष्ण आडवाणी ने सार्वजनिक रूप से अपने दिल की बात जो अब तक वह दबाए बैठे थे, को जनता व भाजपा के कार्यकर्ताओं, नेताओं के सामने रखी। पार्टी के स्थापना दिवस छह अप्रैल का जिक्र करते हुए आडवाणी ने कहा कि मेरे जीवन का मार्गदर्शक सिद्धांत हैöसबसे पहले देश, फिर पार्टी और अंत में मैं। नेशन फर्स्ट, पार्टी नेक्स्ट सेल्फ लास्ट शीर्षक से अपने ब्लॉग में आडवाणी ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र का सार विविधता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए सम्मान है। अपनी स्थापना के समय से ही भाजपा ने राजनीतिक रूप से असहमत होने वालों को कभी दुश्मन नहीं माना बल्कि प्रतिद्वंद्वी ही माना। आडवाणी ने अपना यह ब्लॉग ऐसे समय में लिखा है जब छह अप्रैल को भाजपा का स्थापना दिवस मनाया जाएगा और 11 अप्रैल को लोकसभा चुनाव के पहले चरण के लिए मतदान होना है। लाल कृष्ण आडवाणी को टिकट कटने पर भारी दुख पहुंचा है। उनकी पारंपरिक सीट गांधीनगर से इस बार खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह लड़ रहे हैं जबकि उन्हीं की नीति थी कि प्रदेशाध्यक्ष और पार्टी अध्यक्ष कभी चुनाव नहीं लड़ेंगे। अपने आपको अमित शाह आडवाणी का उत्तराधिकारी पता नहीं किस हैसियत से बता रहे हैं? बस आडवाणी का किसी बहाने टिकट काटना था तो काट दिया, नहीं तो जो व्यक्ति छह बार से सीट जीतता आ रहा है उसका टिकट कटे? समझ से बाहर है। दबे शब्दों में जब भाजपा देशभक्ति को मुद्दा बनाने में जुटी है, तब आडवाणी के ब्लॉग को सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पर हमला माना जाएगा। उन्होंने साफ शब्दों में मोदी-शाह जोड़ी के रवैये पर कटाक्ष किया है। उनका यह कहना कि पार्टी के भीतर और बाहर सत्य, निष्ठा और लोकतंत्र के तीन स्तम्भ संघर्ष से मेरी पार्टी के उद्धव मार्गदर्शक रहे हैं का सीधा मतलब है कि पार्टी नेतृत्व इन मूल्यों से भटका है। इसी प्रकार उनका यह कहना कि राष्ट्रवाद की हमारी धारणा में हमने राजनीतिक रूप से असहज होने वालों को राष्ट्र विरोधी नहीं माना, उनका मतलब साफ है कि मोदी-शाह जो भी उनके खिलाफ नीतिगत तबाही के खिलाफ बोलता है उस पर राष्ट्र विरोधी तमगा लगाया जा रहा है। आडवाणी जी के इस ताजा बयान से सियासी हलचल होनी स्वाभाविक है। भाजपा में जो मोदी-शाह जोड़ी के हिटलरशाही अंदाज से दुखी हैं अब ज्यादा मुखर हो सकते हैं। विपक्ष तो इनको जोर से उछालेगा ही।

Friday, 5 April 2019

चार स्टार महिलाएं जो लड़ेंगीं नहीं लड़वाएंगी

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने ऐलान किया  है कि वह 2019 लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगीं पर पार्टी के लिए पूरे देश में प्रचार करेंगीं। इस बार मायावती समेत चार ऐसी महिलाएं हैं जिनका आम चुनाव में दम देखने को मिलेगा। यह महिलाएं चुनाव लड़ेंगीं नहीं पर लड़वाएंगी। पार्टी प्रत्याशी उतारेंगी, उनके लिए कैंपेन करेंगीं और नई सरकार के गठन में भी अहम भूमिका अदा करेंगी। इनमें से तीन महिलाएं अलग-अलग राज्यों में पार्टी प्रमुख भी हैं। पश्चिम बंगाल देश का यूपी और महाराष्ट्र के बाद तीसरा सबसे बड़ा राज्य है। यहां की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी आम चुनाव नहीं लड़ रही हैं। राज्य में पार्टी का पूरा प्रसार-प्रचार उन्हीं के इर्दगिर्द रहेगा। जम्मू-कश्मीर की पूर्व सीएम और पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती सईद भी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रही हैं। महबूबा पिता मुफ्ती मुहम्मद सईद के निधन के बाद से पार्टी का नेतृत्व कर रही हैं। अभी हाल तक वह राज्य में भाजपा के साथ गठबंधन कर राज कर रही थीं। महबूबा का पूरा फोकस प्रचार कैंपेन पर है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती  तो अपनी पार्टी की आंख-नाक जैसी हैं। वह भी पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में प्रचार करेंगीं। समाजवादी पार्टी के साथ यूपी में गठबंधन करने से मायावती पर गठबंधन को जिताने का ज्यादा भार रहेगा। चूंकि यूपी में 80 लोकसभा सीटें हैं इसलिए सपा-बसपा गठबंधन को ज्यादा से ज्यादा सीटें जिताने का दायित्व मायावती पर होगा। वहीं अपना दलित वोट बैंक को पार्टनर सपा के लिए ट्रांसफर कराना भी उनकी जिम्मेदारी होगी। अपने काडर को निचले लेवल तक गठबंधन के लिए तैयार करना भी आवश्यक होगा। वहीं यूपी में गंगा की बोट यात्रा पर निकलीं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी चुनाव नहीं लड़ रही हैं। उन्हें पूर्वी यूपी की 35 सीटों की जिम्मेदारी मिली है। वह पूरे यूपी और देश के अन्य हिस्सों में पार्टी के लिए प्रचार प्रसार भी करेंगी। प्रियंका गांधी वाड्रा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बाद नम्बर दो की स्टार कैंपेनर हैं। प्रियंका का स्टाइल मतदाताओं को लगातार प्रभावित कर रहा है। उनका मतदाता से डायरेक्ट कनेक्ट भाजपा के लिए चिंता का सबब बन रहा है। उत्तर प्रदेश में मायावती व प्रियंका दोनों मिलकर कुछ भी करा सकती हैं। 5 राज्यों में, 5 क्षेत्रीय दलों में नम्बर दो नेता व स्टार कैंपेनर महिला हैं। तेलंगाना में भी टीआरएस के चुनाव कैंपेनर को सीएम केसीआर और उनकी बेटी कविता लीड कर रही हैं। कविता खुद भी प्रत्याशी हैं। महाराष्ट्र में एनसीपी में शरद पवार के बाद उनकी बेटी सुप्रिया सुले स्टार कैंपेनर हैं। तमिलनाडु में द्रमुक के स्टार कैंपेनर स्टालिन व उनकी बहन कनिमोझी हैं। पंजाब में अकाली दल से हरमनप्रीत कौर हैं। मेघालय में एनसीपी से अगाथा संगमा नंबर 2 स्टार प्रचारक हैं। खास बात, 2014 में महिला नेतृत्व वाली पार्टियों को महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा वोट दिया था। 2019 लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी के लिए सबसे बड़ा खतरा यही महिलाएं हैं।

-अनिल नरेन्द्र

कांग्रेस द्वारा जमीनी मुद्दों पर स्ट्राइक करने की कोशिश है घोषणा पत्र

पीएम मोदी के पिछले चुनावी वादों को लेकर लगातार हमलावर रही कांग्रेस ने मंगलवार को अपना घोषणा पत्र जारी किया जिसमें नई नौकरियों के जरिए अगले 5 साल में बेरोजगारी को लगभग आधा करने, किसानों की स्थिति सुधारने, जीएसटी का सिंगल रेट और गरीबों को 72 हजार रुपए सालाना देने जैसे वादे किए गए। मेनिफेस्टो जारी कर जहां पार्टी ने व्यावहारिक वादों और योजनाआंs का जिक्र करते हुए जनता के बीच उन्हें जमीन पर उतारने का भरोसा जगाया, वहीं देश का नेगेटिव राष्ट्रवाद और हिंदू-मुस्लिम से हराकर जमीनी मुद्दों पर लाने का प्रयास किया है। राहुल गांधी यह साबित करते नजर आए कि बीजेपी राष्ट्रवाद, सम्प्रदायवाद, एयर स्ट्राइक जैसे मुद्दों के जरिए किसानों, रोजगार, अर्थव्यवस्था की बदहाली जैसे मुद्दों से लोगों का ध्यान भटका रही है। कांग्रेस की कोशिश रही है कि उसकी इमेज कल्याणकारी योजनाओं को देने वाली पार्टी और सरकार ही रहे। पहली नजर में मेनिफेस्टो को काफी सोच-विचारकर चुनाव की दृष्टि से तैयार किया गया आधिकारिक दस्तावेज कहा जा सकता है। घोषणा पत्र में मूल बातें वही हैं जो पिछले कुछ समय से पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी बार-बार उठाते रहे हैं। यह न्याय योजना, रोजगार, किसान, शिक्षा और स्वास्थ्य तथा सुरक्षा जैसे पांच मूल तत्वों पर टिकी हुई है। 20 प्रतिशत गरीबों के खाते में प्रतिवर्ष 72 हजार रुपए डालने वाली न्याय योजना को राहुल पहले ही प्रस्तुत कर चुके थे, इसलिए घोषणा पत्र में इसका होना स्वाभाविक ही है। जुलाई 1951 में बेंगलुरु में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में देश के पहले आम चुनावों के लिए कांग्रेस का घोषणा पत्र जारी करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने कहा था ः किसी भी तरीके अथवा व्यक्ति के माध्यम से कोई चुनाव जीतने से बेहतर है कि हम अपनी आत्मा को बचाकर रखें, मरने न दें। किसी भी राष्ट्र का इतिहास किसी एक चुनाव से नहीं बनता, वह बनता है वहां के लोगों के जीवन मूल्यों से। इस बात को बीते 68 साल हो गए हैं। इस दौरान कांग्रेस के नेतृत्व की चार पीड़ियां बदल चुकी हैं। कांग्रेस ने 2019 के अपने घोषणा पत्र में बेशक जनता से सीधे मुद्दांs पर फोकस किया है पर कुछ वादों में उंगुलियां भी उठ रही हैं। उदाहरण के तौर पर कहा गया है कि देशद्रोह की धारा 124ए को हटाया जाएगा। अफस्पा कानून में संशोधन करने के वादे से लग रहा है कि पार्टियों के एजेंडे में चुनावी जीत सर्वोपरि है भले ही इससे देश को नुकसान हो। सरकार आने पर आईपीसी की धारा 124ए को समाप्त करने का वादा करते हुए राहुल गांधी ने तर्क दिया कि इसका गलत इस्तेमाल हो रहा है और बाद में आए कानूनों की वजह से यह बेकार भी हो गया है। क्या यह खतरनाक चुनावी वादा नहीं है? अफस्पा कानून में संशोधन की बात भी कही गई है। वर्तमान में कश्मीर और कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में यह कानून लागू है। इन दोनों मुद्दों को लेकर पिछले कई सालों से देश में एक लंबी बहस चल रही है और कुछ मानवाधिकार संगठन इनको हटाने की मांग भी कर रहे हैं। कुछ समय पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने भी इस कानून पर पुनर्विचार करने की जरूरत बताई थी। अब कांग्रेस ने इस दिशा में पहल कर दी है। लेकिन नागरिक अधिकारों के नाम पर देश की सुरक्षा के साथ समझौता करना कहां तक न्याय संगत है? अगर कानून में कहीं कुछ गलत हो रहा है तो सही करने के लिए सुप्रीम कोर्ट बैठा है। काबिले गौर है कि 1870 में देशद्रोह का कानून अंग्रेजों ने भारतीयों के लिए बनाया था। लेकिन देश में आतंकवाद तेजी से पढ़ने के कारण ऐसे कानून होने के अपने मायने हैं। ऐसे दौर में जब पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए हमले और फिर बालाकोट में आतंकी शिविर पर की गई कार्रवाई के बाद जब भाजपा ने राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनावी मुद्दा बना दिया है, देशद्रोह से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए को खत्म करने और विवादित अफस्पा (सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियममें संशोधन करने का वादा कर कांग्रेस ने उसे अपने खिलाफ एक बड़ा मुद्दा भाजपा को दे दिया है। कुल मिलाकर चुनावी दृष्टि से कांग्रेस ने सपने बेहतर fिदखाए हैं परंतु इस सबके साकार होने पर संदेह जरूर है। कांग्रेस की जनता के स्वाभिमान व आत्म सम्मान की बात जनता को जरूर छूती है। मीfिडया की स्वायत्तता से लेकर एससी/एसटी समुदाय, देश के अल्पसंख्यकों के हितों से लेकर लेस्वियन व ट्रासजेंडर से जुड़े मुद्दों को मेनिफेस्टो में जगह दी गई है।