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Friday, 19 April 2019

एनडीए को 263-283, यूपीए को 115-135 सीटें

चुनाव का समय है। अपनी पार्टी की हवा बनाने के लिए हर सियासी दल अपनी ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है। अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए कई पार्टियों के नेता तरह-तरह के फंडे लगा रहे हैं। इनमें सर्वे का फंडा भी शामिल है। इसके लिए न तो उन्हें कार्यकर्ताओं की टीम चाहिए और न ही उन्हें कहीं जाना होगा। बस ऑफिस में बैठकर मनचाहा सर्वे रिपोर्ट तैयार हो जाती है। बस नेताजी को इस फर्जी सर्वे को बेचना आना चाहिए। जो बेच लिया, उसकी बल्ले-बल्ले। कुछ नेता यह काम करने में माहिर भी हैं। पार्टियां अपना मनपसंद सर्वे करवाती हैं और मतदाताओं को इसके माध्यम से प्रभावित भी करना चाहती हैं। ऐसा नहीं कि सभी सर्वे फर्जी होते हैं। कुछ संगठन ऐसे जरूर है जो अपनी तरफ से मेहनत करके, कुछ सैम्पल सर्वे करते हैं। पर इनकी कमी यह रहती है कि यह कुछ चुनिन्दा संसदीय क्षेत्रों में, गिने-चुने मतदाताओं से सवाल पूछते हैं। उससे उन क्षेत्रों का अंदाजा जरूर हो जाता है पर भारत  जैसे विशाल फैले हुए देश की हवा बताने में वह कभी-कभी असफल हो जाते हैं। यही वजह है कि सर्वे और फाइनल रिजल्ट मेल नहीं खाते। इन चुनावों के बारे में एक चीज तो स्पष्ट लगती है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में न तो कोई हवा है और न ही कोई विशेष राष्ट्रीय मुद्दा। कोई राष्ट्रीय मुद्दा प्रमुख भूमिका नहीं निभा रहा है। कोई ऐसी लहर या मुद्दा नहीं है जो सभी राज्यों में प्रभावी हो। 2014 में जरूर मोदी समर्थक और कांग्रेस विरोधी लहर थी। इसी वजह से भाजपा ने 11 राज्योंöउत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और झारखंड की 216 सीटें यानि 90 प्रतिशत सीटें जीती थीं। लेकिन इस बार संकेत है कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली और झारखंड में जमीन गंवा दी है। अगर हम यह कहें कि भाजपा इन राज्यों में अपनी 50 प्रतिशत सीटें दोबारा जीत ले तो भी उसकी 85 सीटें कम हो सकती हैं। कई आर्थिक कारणों, (नोटबंदी-जीएसटी) को मिलाकर एंटी इनकम्बेंसी और जातियों के गठबंधन ने नई राजनीतिक स्थिति उत्पन्न कर दी है। मोदी इससे निपटने के लिए आतंकवाद के खिलाफ बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक और राष्ट्रवाद को सामने रखकर अपनी वकालत कर रहे हैं। भाजपा की बौखलाहट इससे भी पता चलती है कि हर ऐरी-गैरी सियासी दल से किसी भी कीमत पर गठबंधन कर रही है। इससे लगता है कि भाजपा नेतृत्व को भी लग रहा है कि शायद वह अपने दम-खम पर सरकार न बना सकें। ऐसी स्थिति में अपने सहयोगियों की मदद लेनी पड़ सकती है। भाजपा की सबसे बड़ी चिन्ता सपा-बसपा का गठजोड़ है। दूसरी ओर जिस तरह से पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी उच्च जाति के वोटरों को आकर्षित कर रही हैं, उसने भी भाजपा की चिन्ता बढ़ाई है। डॉ. मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं की नाराजगी से कुछ ब्राह्मण वोटर कांग्रेस के पास लौट सकता है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड और दिल्ली में भाजपा 2014 की तुलना में कई सीटें गंवा सकती है। दिल्ली में आप और कांग्रेस के बीच गठबंधन पर लगभग सहमति बन चुकी है और भाजपा सभी सात सीटें हार सकती है। गुजरात की सभी सीटें जीतने वाली भाजपा से इस बार कांग्रेस पांच से छह सीटें छीन सकती है। हाल ही में सीएसडी-लोकनीति दैनिक भास्कर और द हिन्दू का चुनाव पूर्व सर्वे आया था। वोट शेयर बढ़ने के बावजूद कई सीटों पर विपक्ष के गठबंधन की वजह से भाजपा की सीटों में कमी आ रही है। 2014 में कांग्रेस को 44 सीटें, सहयोगियों को 15, भाजपा-सहयोगियों को 283+53, लेफ्ट को 12 और अन्य को 136 सीटें मिली थीं। चुनाव पूर्व 2019 में सीटेंöकांग्रेस 74-84, सहयोगियों को 41-51 सीटें, भाजपा को 222-232 सीटें सहयोगियों को 41-51, लेफ्ट को 5-15 और अन्य को 88-98 सीटें मिलने की संभावना दिखाई गई है। सर्वे में एक रोचक तथ्य और निकलकर आया है। 40 प्रतिशत भारतीय मानते हैं कि देश सही दिशा में है। लेकिन दक्षिणी राज्यों में स्थिति उलट है। 45 प्रतिशत लोग कहते हैं कि देश गलत दिशा में जा रहा है। पहली बार के वोटर्स की पहली पसंद के रूप में प्रधानमंत्री मोदी (45 प्रतिशत) उभरकर आए हैं। इस सर्वे से यह स्पष्ट संकेत मिल रहा है कि एनडीए का वोट शेयर 2014 से लगातार घटता जा रहा है और यूपीए का बढ़ता जा रहा है। बाकी तो डिब्बे खुलने पर ही पता लगेगा।

-अनिल नरेन्द्र

दिग्गी राजा पर भाजपा का साध्वी हमला

भाजपा ने कई दिनों की माथापच्ची के बाद चौंकाते हुए भोपाल में अपने प्रत्याशी का चयन कर लिया है। भाजपा भोपाल सीट से लगातार 30 साल से जीतती आ रही है। लेकिन इस बार 10 साल मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह मैदान में हैं। उनसे टक्कर लेने के लिए भाजपा ने मालेगांव ब्लास्ट की आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को मैदान में उतारा है। प्रज्ञा ने बुधवार को ही भाजपा की सदस्यता ली और कुछ घंटे बाद ही पार्टी ने उन्हें टिकट दे दिया। प्रज्ञा और दिग्विजय सिंह एक-दूसरे के धुरविरोधी माने जाते हैं। दिग्विजय कांग्रेस के उन चुनिन्दा नेताओं में से हैं, जिन्होंने यूपीए सरकार के दौर में भगवा आतंकवाद का मुद्दा उठाया था। दिग्विजय सिंह के खिलाफ ताल ठोकने वाली प्रज्ञा ठाकुर कट्टर हिन्दुवादी नेता मानी जाती हैं। वह राजपूत परिवार से आती हैं। 2008 में 29 सितम्बर को महाराष्ट्र के मालेगांव में बम धमाका हुआ था जिसमें सात लोगों की मौत हो गई थी। इस मामले में 23 अक्तूबर 2008 को साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की गिरफ्तारी हुई तब उनका नाम पहली बार चर्चा में आया। प्रज्ञा ठाकुर मालेगांव धमाके मामले में नौ साल तक जेल में रहीं। उन पर आरोप था कि धमाके में जिस मोटरबाइक में विस्फोटक लगाकर मस्जिद के पास रखा गया था वह प्रज्ञा ठाकुर की थी। हालांकि प्रज्ञा का कहना था कि वह इस बाइक को बेच चुकी थीं। 2017 में 25 अप्रैल को कोई सुबूत नहीं मिलने पर मालेगांव धमाके केस में प्रज्ञा सिंह को पांच लाख के निजी मुचलके पर जमानत मिली। प्रज्ञा ठाकुर ने आरोप लगाया है कि पूछताछ के दौरान एटीएस ने 23 दिनों तक उन्हें काफी प्रताड़ित किया। वह उन दिनों की प्रताड़ना को याद करके आज भी रो देती हैं, उन्हें इतनी बुरी तरह से पीटा गया, प्रताड़ित किया गया। प्रज्ञा आरएसएस के प्रचारक सुनील जोशी हत्याकांड में भी आरोपी थीं। सुनील जोशी की 2007 में देवास के पास गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में प्रज्ञा की फरवरी 2011 में गिरफ्तारी हुई थी। पर इस मामले में प्रज्ञा समेत आठ आरोपियों को 2017 में बरी कर दिया गया था। हमें प्रज्ञा ठाकुर से पूरी हमदर्दी है क्योंकि जो उनके साथ हुआ वह किसी के साथ नहीं होना चाहिए था। पर चुनाव में खड़ा होना अलग मुद्दा है। कांग्रेस सहित कई विपक्षी नेता प्रज्ञा को उम्मीदवार बनाने पर आपत्ति कर रहे हैं। उनका कहना है कि बेशक प्रज्ञा को जमानत मिल गई हो पर आज भी वह आरोपी तो हैं ही। एक बम ब्लास्ट केस के आरोपी को टिकट देकर भाजपा क्या संदेश देना चाहती है? दरअसल मालेगांव में 2008 में हुए धमाके की आरोपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल से उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने अपने हिन्दुत्व के एजेंडे का संदेश कोर वोटरों को देने की कोशिश की है। विवाद और चर्चा का विषय बन रहीं साध्वी की उम्मीदवारी से पार्टी न सिर्प भोपाल में कांग्रेस दिग्गज दिग्विजय सिंह को बड़ी टक्कर पेश करेगी, बल्कि इससे मध्यप्रदेश सहित 100 सीटों से ज्यादा पर असर डालने का प्रयास करती दिख रही हैं। बेशक भोपाल तीन दशक तक भाजपा का गढ़ माना जाता रहा हो, पर पिछले विधानसभा में कांग्रेस ने यहां शानदार प्रदर्शन किया था। सीट पर करीब साढ़े चार लाख मुस्लिम वोटर की मौजूदगी के मद्देनजर कांग्रेस ने अपने दिग्गज दिग्विजय को उतारा है। 16 साल बाद कोई चुनाव लड़ रहे दिग्विजय को बाकी वोट मिलने की भी उम्मीद है। चार लाख ओबीसी, 4.75 लाख ब्राह्मण, 1.75 लाख कायस्थ और 1.50 लाख राजपूत वोटों में विभाजन होने की संभावना है। साध्वी प्रज्ञा ने कहा है कि मैं लड़ूंगी और जीतूंगी भी। मैं भगवा को सम्मान दिलाकर रहूंगी।

Thursday, 18 April 2019

पैसा इकट्ठा करने का नया तरीका चुनावी बाँड

ऐन चुनावों के बीच चुनावी बाँड को लेकर विवाद तेजी से बढ़ता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने एक एनजीओ की याचिका पर सभी राजनीतिक पार्टियों को चुनावी बाँड और चन्दे की जानकारी देने के लिए 30 मई की डेडलाइन तय कर दी है। वर्ष 2017-18 में कुछ 231 करोड़ रुपए के चुनावी बाँड में से अकेले 210 करोड़ रुपए पाने वाली भाजपा केंद्र सरकार में है और इस बाँड का पूरा समर्थन कर रही है। बाँड को लेकर एनजीओ व चुनाव आयोग ने आशंकाएं जताई हैं कि यह भारत की स्वायत्तता के लिए खतरा है और इससे लोकतंत्र को नुकसान पहुंच सकता है। सबसे पहले जानते हैं कि क्या है चुनावी बाँड। केंद्र सरकार ने 2017 में एक वित्त विधेयक पास किया, जिसमें चुनावी बाँड शुरू किए गए। ये बाँड एसबीआई की निर्धारित शाखाओं से लिए जा सकते थे। इनकी कीमत एक हजार से एक करोड़ रुपए तक रखी गई थी। आम नागरिकों से लेकर कारपोरेट घराने तक अपनी पसंद की पार्टी को दान के लिए एक हजार, एक लाख, 10 लाख और एक करोड़ रुपए के बाँड्स खरीद सकते थे। बाँड्स खरीदते समय बैंक केवाईसी यानि ग्राहक की जानकारी लेता है, लेकिन जिस दल को यह दिए जा रहे हैं, उसके लिए अनिवार्य नहीं है कि वह बाँड देने वाले का नाम उजागर करे। बाँड हर समय बिकते भी नहीं हैं। इन्हें हर तिमाही में 10 दिन के लिए शाखाओं पर बेचा जाता है। एक बार खरीदने के बाद 15 दिन में इनमें संबंधित पार्टी के नाम भुगतान करना होता है वरना ये निरस्त हो जाते हैं। चुनावी बाँड पर सख्त रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी दलों को 15 मई तक मिलने वाले चन्दे की जानकारी सीलबंद लिफाफे में चुनाव आयोग को देने को कहा है। चन्दा देने वाले की पूरी जानकारी इसमें मांगी गई है। शुक्रवार को कोर्ट ने इस चर्चित और विवादित बाँड पर तत्काल रोक तो नहीं लगाई लेकिन इसकी गोपनीयता को अंधेरे से उजाले में लाने का संकेत जरूर दे दिया है। हालांकि गोपनीयता के नाम पर यह अंधेरा जनता के लिए अभी भी कायम रहने वाला है, लेकिन तमाम सियासी पार्टियों को बंद लिफाफे में बाँड से प्राप्त दान और दानदाता दोनों की सूचना चुनाव आयोग को 30 मई तक देनी पड़ेगी। गौर करने की बात है कि इन बंद लिफाफों को खोलने का हक सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को भी नहीं दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया है कि सत्ताधारी पार्टी इस बाँड से ज्यादा फायदा उठा रही है। अनुमान इशारा करते हैं कि कुल इलैक्ट्रोल बाँड का 95.5 प्रतिशत से 97 प्रतिशत हिस्सा केवल सत्ताधारी पार्टी के खाते में गया है। बाँड प्रयोग के पहले ही यह सिद्ध हो जाता है कि जो भी सत्ता में रहेगा, वह इसके फायदे ज्यादा लेगा। अदालत में सरकार का पक्ष रखते हुए अटार्नी जनरल ने जो तर्प दिए, वे बताते हैं कि राजनीतिक पार्टियां चन्दे में पारदर्शिता लाने की पक्षधर नहीं है। पहले तो सरकार की तरफ से कहा गया कि शीर्ष अदालत चुनाव तक इस पर फैसला न दे। फिर अटार्नी जनरल ने यहां तक कहा कि मतदाताओं को इससे कोई मतलब नहीं होना चाहिए कि पार्टियों के पास पैसा आता कहां से है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कम से कम इतना तो होगा कि यह बाँड कितने के खरीदे गए और किसने खरीदे।
-अनिल नरेन्द्र
��के प्रयास क्या रंग लाते हैं?

दीदी के दर पर मोदी की दस्तक

पश्चिम बंगाल की 42 सीटों पर लोकसभा चुनाव दोनों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी के लिए नाक का सवाल बन गया है। यहां सात चरणों में मतदान होगा। 11 अप्रैल पहला चरण, 18 अप्रैल दूसरा चरण, 23 अप्रैल तीसरा चरण, 29 अप्रैल चौथा चरण, छह मई पांचवां चरण, 12 मई छठा चरण और अंतिम सातवां चरण 19 मई। 2014 लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 34 प्रतिशत वोटें और 34 सीटें जीती थीं। माकपा को 29.71 प्रतिशत वोट मिले पर सिर्प दो सीटों पर ही जीत मिल पाई थी। भाजपा को 17.02 प्रतिशत वोट और दो सीटें मिली थीं जबकि कांग्रेस को 9.58 प्रतिशत और चार सीटें मिली थीं। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा वोट प्रतिशत की कसौटी पर तीसरे नम्बर पर थी। मोदी लहर में 10.88 प्रतिशत के इजाफे के साथ उसके वोटों का प्रतिशत 17.02 प्रतिशत पहुंच गया था। इस बार तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे सुकून की बात यह है कि कहीं भी सरकार विरोधी जैसा माहौल नजर नहीं आ रहा, जिसे लहर कहा जा सके। सड़क, बिजली, सिंचाई और गांवों तक जल पहुंचाने के क्षेत्र में हुए काम ममता सरकार की ताकत है। इस बार राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण पश्चिम बंगाल में बड़ा मुद्दा है। बांग्लादेश से राज्य में घुसपैठ कर आए लोगों ने अब वर्षों से यहां पूरी तरह अपने आपको सुरक्षित कर लिया है। केंद्र सरकार और भाजपा नागरिकता संशोधन विधेयक के तहत घुसपैठियों को वापस भेजना चाहती है। दोनों भाजपा अध्यक्ष और प्रधानमंत्री ने अपनी सभाओं में हर घुसपैठी को राज्य से निकालने का वादा किया है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपनी चुनावी रैलियों में कई बार कह चुके हैं कि सत्ता में आने पर राज्य में एनआरसी लागू करेंगे। वहीं ममता इसका जमकर विरोध कर रही हैं। रोजगार सृजन अल्पसंख्यकों को रिझाना, भ्रष्टाचार, केंद्र में अगली सरकार बनाने में तृणमूल कांग्रेस की भूमिका, बालाकोट हवाई हमले की सच्चाई भी महत्वपूर्ण मुद्दे बनकर सामने आए हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा ने मुद्दा खड़ा करने की अपनी महारथ से ममता बनर्जी को घेरने की जमीन तैयार कर ली है। पंचायत चुनाव में हिंसा और तृणमूल कांग्रेस पर जोर-जबरदस्ती का आरोप भाजपा का बड़ा मुद्दा है। इसे बाकी बचे चरणों में भाजपा भुनाने में जुटी हुई है। स्टालों पर चाय बनाने और परोसने का काम कर रहे युवकों की अब भी पहली पसंद नरेंद्र मोदी हैं। खड़गपुर हाइवे हो या कोटई का बस अड्डा, दोनों जगहों पर ऐसे युवाओं ने साफ कहा कि मोदी को फिर आना चाहिए। खड़गपुर में नौकरी करने वाले एक युवक का तर्प है कि पश्चिम बंगाल में बदलाव की बयार आंधी में बदलने के लिए वक्त लेती है। कांग्रेस ने आजादी के बाद करीब ढाई दशक तो वामदल ने करीब साढ़े तीन दशक तक यहां राज किया। आज दोनों वामदल और कांग्रेस हाशिये पर हैं। ममता का अभी एक दशक हुआ है और अब भाजपा की आहट सुनाई दे रही है। हालांकि तृणमूल ने काफी काम किया है। यहां लोग बदलाव की बात क्यों करें? अच्छा काम हो रहा है। अगर ममता अगला प्रधानमंत्री बनने का सपना ले रही हैं तो उन्हें पश्चिम बंगाल की अधिकतर सीटें जीतनी होंगी। भाजपा भी बहुत जोर लगा रही है। देखें, इनके प्रयास क्या रंग लाते हैं?

बढ़ती असहिष्णुता अभिव्यक्ति की आजादी पर गंभीर खतरा

कला का उद्देश्य `सवाल उठाना और ललकारना' होता है, लेकिन समाज में असहिष्णुता बढ़ रही है और संग"ित समूह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं। यह सख्त टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चिन्ता जताते हुए कहा कि कला-साहित्य, असहिष्णुता का शिकार होते रहेंगे, अगर राज्य कलाकारों के अधिकारों का संरक्षण न करें। जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़ और जस्टिस हेमंत गुप्ता की पीठ एक बंगला फिल्म `भविष्योत्तर भूत' पर लगे प्रतिबंध के खिलाफ सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा कि समकालीन घटनाओं से पता चलता है कि समाज में एक तरह की असहिष्णुता बढ़ रही है। यह असहिष्णुता समाज में दूसरों के अधिकारों को अस्वीकार कर रही है, उनके विचारों को स्वतंत्र रूप से चित्रित करने और उन्हें प्रिन्ट, थियेटर या सेल्यूलाइड मीडिया में पेश करने के अधिकार को खारिज कर रही है। स्वतंत्र भाषण और अभिव्यक्ति के अधिकार के अस्तित्व के लिए संगठित समूहों और हितों ने एक गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। पीठ ने यह भी कहा कि सत्ता शक्ति को यह ध्यान रखना चाहिए कि हम लोकतंत्र में महज इसलिए रहते हैं, क्योंकि हमारा संविधान हर नागरिक की बृहद स्वतंत्रता को मान्यता देता है। पीठ ने कहा कि पुलिस नैतिकता की ठेकेदार नहीं है। कानून व्यवस्था का हवाला देकर फिल्म की क्रीनिंग नहीं रोक सकते। यह कृत्य घातक है। राज्य अपने अधिकारों का मनमाने तरीके से इस्तेमाल नहीं कर सकती। पीठ ने यह भी कहा कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणित फिल्म को किसी अन्य अथारिटी से अनुमति लेने की दरकार नहीं है। बहुमत तय नहीं कर सकता कि कलाकारों का नजरिया क्या होना चाहिए और क्या नहीं। अभिव्यक्ति के अधिकार का संरक्षण करना राज्य की जिम्मेदारी है। कटु सत्य तो यह है कि एक  लोकतांत्रिक प्रणाली में कोई सरकार, राजनीतिक पार्टी या अन्य सियासी-धार्मिक समूह सिर्प इसलिए किसी कलाकृति के प्रदर्शन को बाधित करते हैं कि किसी राजनीति की हकीकत पर चोट पहुंचती है, यह चिन्ता की बात है। खासतौर पर जब हमारे देश के संविधान में अपनी बात करने, रखने और दिखाने के अधिकार मिले हुए हैं। यह समझना मुश्किल है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने इस फिल्म को रिलीज करने में बाधा आखिर क्यों डाली? क्या राज्य सरकार ने फिल्म के प्रदर्शन में इसलिए अड़चन खड़ी की, क्योंकि इसमें राजनीतिक व्यंग्य का सहारा लेकर, अलग-अलग पार्टियों को कठघरे में खड़ा किया गया है और इनमें तृणमूल कांग्रेस भी शामिल है? कायदे से फिल्म पर हमला करने या इसे रोकने के बजाय तृणमूल कांग्रेस और राज्य में उसकी सरकार को यह सोचना चाहिए था कि लोकतांत्रिक दायित्व को पूरा करने में कहां कमी रह गई। सीधे उसके प्रदर्शन पर रोक लगाकर उसने यह साबित किया कि देश की लोकतांत्रिक परंपराओं और कानूनी व्यवस्था की उसे परवाह नहीं है। यह तो हमारा सौभाग्य है कि हमारा सुप्रीम कोर्ट मजबूत है और ऐसी अलोकतांत्रिक पाबंदियों को रद्द करने की क्षमता रखता है। पर इसमें संदेह है कि अब भी कुछ स्वार्थी समूह व सियासी दल संभलेंगे?

निप्रभावी चुनाव आयोग ः आचार संहिता की धज्जियां उड़ीं

नेताओं की बिगड़ी जुबान अब कोई नई बात नहीं है। आए दिन देश के अलग-अलग हिस्सों से चुनाव प्रचार के दौरान ऐसी खबरें आती रहती हैं कि फ्लां नेता ने फ्लानी आपत्तिजनक बात कही तो फ्लां नेता ने मर्यादा का ध्यान नहीं रखा और फ्लां नेता ने तो फूहड़ता की सारी हदें पार कर दी हैं। अफसोस तो इस बात का है कि हमारा चुनाव आयोग चुप कर तमाशा देखता रहता है। ऐसा कोई सियासी दल नहीं है जिसने आचार संहिता को तमाशा बनाकर नहीं रखा है। चुनाव आयोग की भले किसको परवाह है। यह तो धन्य हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने धर्म और जाति के आधार पर लोगों को बांट रहे नेताओं पर कार्रवाई नहीं करने पर चुनाव आयोग को सोमवार सुबह फटकार लगाई। सुबह 11 बजे सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई और दोपहर तीन बजे चुनाव आयोग ने कार्रवाई शुरू कर दी। आयोग ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को 72 घंटे, बसपा प्रमुख मायावती को 48 घंटे, भाजपा नेता मेनका गांधी को 48 घंटे और सपा के आजम खान को 72 घंटे तक प्रचार नहीं करने के निर्देश दिए। योगी और मायावती का समय मंगलवार सुबह छह बजे शुरू हो गया, जबकि आजम खान और मेनका गांधी का समय सुबह 10 बजे से शुरू हुआ। चारों नेता न सियासी ट्वीट कर पाएंगे, न ही इंटरव्यू दे सकते हैं। योगी की तीन दिन में पांच रैलियां थीं, मायावती की 16 और 17 अप्रैल को चुनावी सभाएं थीं जिनमें अब वह भाग नहीं ले पाएंगी। बता दें कि योगी आदित्यनाथ ने नौ अप्रैल को मेरठ में कहाöअगर सपा-बसपा-कांग्रेस को अली पर भरोसा है तो हमें बजरंग बली पर भरोसा है। वहीं सात अप्रैल को मायावती ने देवबंद में कहा कि मुस्लिम समाज के लोगों से यह कहना चाहती हूं कि वोट नहीं बंटने दें। 13 अप्रैल को मायावती ने कहा कि बजरंग बली भी दलित हैं। अब तो बजरंग बली भी हमारे हैं और अली भी। वहीं बदजुबान आजम खान ने सारी हदें पार करते हुए 14 अप्रैल की टिप्पणी हम लिखना नहीं चाहते। उन्होंने जय प्रदा पर ऐसी टिप्पणी की कि उन पर 15 दिन में बदजुबानी के आठ केस दर्ज हो चुके हैं। भाजपा नेता भी कम नहीं हैं। हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टिप्पणियों का जिक्र नहीं करना चाहते पर उन्हीं की सांसद मेनका गांधी ने 11 अप्रैल को सुल्तानपुर में मुस्लिम बहुल इलाके में सभा में कहा थाöमैं तो जीत ही रही हूं। आपने वोट नहीं दिया तो फिर देखना मैं क्या करती हूं। मैं कोई महात्मा गांधी की संतान नहीं हूं। महाराष्ट्र के नेता का बयान गौर करने लायक है। एक चुनावी सभा में उन्होंने स्वीकार किया कि चुनाव के दौरान आचार संहिता को मानने का दबाव रहता है, लेकिन भाड़ में गया कानून, आचार संहिता को भी हम देख लेंगे, जो बात हमारे मन में है, वह बात अगर मन से नहीं निकले तो घुटन-सी महसूस होती है। सोमवार को एक साथ ऐसी कई खबरें आईं जिनमें नेताओं के मन की ऐसी सोच का निचला स्तर सामने आ गया। आजम खान का तो हमने जिक्र किया ही है, पर हिमाचल प्रदेश के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने मंच से बाकायदा कांग्रेस अध्यक्ष को गाली ही दे दी। इसी के साथ खबर आई कि चौकीदार चोर है, के नारे पर सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी को नोटिस जारी कर दिया है। चुनाव आयोग के समक्ष नेताओं के बिगड़ते बोल तो चुनौती हैं ही पर ईवीएम मशीनों में पहले दौर में आई खराबी का भी वह सही हल नहीं ढूंढ पा रहा है। 21 विपक्षी दलों ने एक बार फिर ईवीएम के साथ वीवीपैट का मेल करने की मांग की है। चुनाव आयोग का कर्तव्य है कि वह देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए। इस मामले में चुनाव आयोग का ट्रैक रिकॉर्ड मिलाजुला है। चुनाव आयोग यह दलील देता है कि उसके हाथ बंधे हुए हैं और उसके पास ऐसी पॉवर नहीं है कि वह इन धांधलियों को पूरी तरह से रोक सके और दोषियों को सख्त सजा दे सके? यह कुछ हद तक सही भी है क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल चुनाव आयोग को ज्यादा सख्ती करने की छूट नहीं देता। पर चुनाव आयोग के पास यह पॉवर तो है कि वह किसी दोषी का चुनाव रद्द कर दे। अगर एक भी नेता का चुनाव रद्द कर दिया जाए तो बाकी सबको संदेश मिल जाएगा। चुनाव आयोग पर यह भी आरोप लग रहा है कि वह सत्तारूढ़ दल का पिछलग्गू बन गया है, उसके हाथ में तोता बन गया है। यही बात सीबीआई, आयकर विभाग पर भी लागू होती है जो चुन-चुनकर विपक्षी नेताओं पर रेड डाल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में सख्त है और चुनाव आयोग को फटकार लगाता रहता है। उम्मीद की जाए कि चुनाव के बाकी चरणों पर इन बदजुबानी पर अंकुश लगेगा।

-अनिल नरेन्द्र

Wednesday, 17 April 2019

द्रविड़ राजनीति के गढ़ में सेंध लगाने के प्रयास

राष्ट्रीय राजनीति में धाक जमाने के बावजूद देश की दो प्रमुख पार्टियां कांग्रेस और भाजपा तमिलनाडु में पैठ बनाने की कोशिश में लगी हुई हैं। इस बार दोनों ही दल क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर तमिलनाडु में अपनी जमीन पुख्ता करने की कोशिश में जुटी हैं। देखा जाए तो इस बार के लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु का परिदृश्य रोचक बनता जा रहा है। क्योंकि यह पहली बार होगा जब प्रमुख क्षेत्रीय दल अन्नाद्रमुक और द्रमुक अपने सबसे प्रभावशाली चेहरे जे. जयललिता और एम. करुणानिधि के बिना लोकसभा चुनाव में उतरेंगी। हालांकि दोनों पार्टियों ने इस दौरान अपने वारिस चुने हैं, लेकिन सामने अभी इस विरासत को बरकरार रखने की चुनौती है। ऐसे में एक ओर प्रमुख द्रविड़ दलों द्रमुक और अन्नाद्रमुक के समक्ष खुद की साख बचाने की चुनौती है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस और भाजपा इसे प्रमुख द्रविड़ दलों के सहारे तमिल राजनीति में पैठ बनाने के मौके के तौर पर देख रहे हैं। तमिलनाडु के मतदाताओं की एक खूबी रही है जिसे अपनाते हैं जीभर कर उसकी झोली भरते हैं। पिछली बार अन्नाद्रमुक को यहां से 37 सीटें मिली थीं। दूसरे चरण में 18 अप्रैल को 13 राज्यों की 97 लोकसभा सीटों पर हो रहे चुनाव में तमिलनाडु की 39 सीटें यूपीए की उम्मीदों का बड़ा गढ़ है। दक्षिण के इस किले में भारतीय जनता पार्टी के सहयोगियों के साथ सेंधमारी से रोकने के लिए यूपीए का कुनबा पूरा जोर लगा रहा है। तमिलनाडु में द्रमुक और कांग्रेस का गठजोड़ यहां की 39 सीटों और पुडुचेरी की एक सीट को निचले सदन में अपना संख्या बल बढ़ाने के लिहाज से काफी अहम मान रहा है। तमिलनाडु-पुडुचेरी को मिलाकर 48 सीटों में से द्रमुक 20 सीटों पर कांग्रेस 10 और अन्य सीटों पर उसके दूसरे सहयोगी लड़ रहे हैं। भाजपा ने अन्नाद्रमुक के साथ इस बार गठबंधन किया है, पिछले चुनाव में भाजपा ने कन्याकुमारी सीट जीती थी। इस बार भाजपा पांच सीटों पर लड़ेगी और अन्नाद्रमुक के साथ पीएमके और डीएमडीके जुड़े हैं। दरअसल लंबे समय के बाद तमिलनाडु का चुनाव बड़े क्षेत्रीय क्षत्रपों की गैर-मौजूदगी में हो रहा है। जानकार मानते हैं कि अन्नाद्रमुक प्रमुख रहीं जयललिता और द्रमुक के सर्वेसर्वा रहे एम. करुणानिधि की मृत्यु के बाद तमिलनाडु की सियासत में एक शून्य-सा नजर आ रहा है। अन्नाद्रमुक और द्रमुक दोनों ही दलों का मौजूदा नेतृत्व अपने पुराने सूरमाओं की लोकप्रियता के आसपास भी नहीं है। दोनों तरफ अंदरूनी जद्दोजहद चरम पर है। ऐसे में सूबे के लोग किस पर करुणावान होंगे कहना मुश्किल है। फिलहाल जानकारों का मानना है कि इस बार उलटफेर भी हो सकता है। कर्नाटक को छोड़ दें तो भाजपा के हिन्दुत्व की अपील का दक्षिण भारत में कभी भी ज्यादा असर नहीं रहा। हिन्दी को बढ़ावा देने का मामला या फिर जनसंख्या और उपयोग के आधार पर राजस्व के बंटवारे का प्रयास हो, केंद्र के यह प्रयास दक्षिण भारत को कभी पसंद नहीं आए। इस चुनाव में द्रमुक का पलड़ा भारी लगता है और इसी वजह से यहां कांग्रेस को फायदा हो सकता है। भाजपा और अन्नाद्रमुक गठबंधन क्या द्रविड़ राजनीति के गढ़ में सेंध लगा पाएगा यह तो चुनाव परिणाम आने का बाद ही पता चलेगा?

-अनिल नरेन्द्र