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Friday, 26 April 2019

हरियाणा में चार लालों की प्रतिष्ठा दांव पर है

हरियाणा की राजनीति में अहम योगदान दे चुके तीन प्रमुख लालों की तीसरी और चौथी पीढ़ी इस लोकसभा चुनाव में राज्य के चौथे लाल की टीम से इस बार टकराएगी। प्रदेश के पहले लाल व देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी देवी लाल की चौथी पीढ़ी से दुष्यंत चौटाला, दिग्विजय चौटाला और करण चौटाला मैदान में ताल ठोंक रहे हैं। दूसरे लाल एवं राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय भजन लाल के दोनों बेटेöचन्द्रमोहन एवं कुलदीप बिश्नोई अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। इस कड़ी में भजन लाल के छोटे बेटे कुलदीप बिश्नोई खुद हिसार से चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन उनकी जगह तीसरी पीढ़ी से उनके बेटे भव्य बिश्नोई को कांग्रेस से टिकट मिला है। हरियाणा के तीसरे लाल एवं पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी बंसी लाल की विरासत को उनके छोटे बेटे स्वर्गीय सुरेंद्र सिंह की पत्नी किरण चौधरी कांग्रेस विधायक होने के साथ ही विधानसभा में सीएलपी नेता हैं जबकि तीसरी पीढ़ी के रूप में किरण की बेटी श्रुति चौधरी अपने दादा की विरासत सहेजने को भिवानी से चुनाव लड़ रही हैं। अब बात करते हैं हरियाणा के चौथे लाल के रूप में उभरते मुख्यमंत्री मनोहर लाल की, जिन्होंने खुद अपनी वंश बेल नहीं बढ़ाई लेकिन प्रदेश की जनता को ही परिवार माना हुआ है। इस चुनाव में उनकी टीम के रूप में भाजपा के 10 उम्मीदवार राज्य के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्रों में राजनीति के तीनों लालों की तीसरी और चौथी पीढ़ी को टक्कर देने वाले हैं। लालों की धरती के नाम से मशहूर हरियाणा में सत्ता की चाबी वर्तमान समय में मनोहर लाल के हाथों में है। हालांकि 15 बरस पहले तक प्रदेश की सत्ता पर तीनों लालों या उनकी पीढ़ियों का हक बना रहा है। जिस पर तब कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अधिकार जमा लिया था। एक बार फिर से लोकसभा चुनाव के दौरान हरियाणा के तीनों लालों की तीसरी और चौथी पीढ़ी मुकाबले को तैयार है। खास बात यह है कि पूर्व उपप्रधानमंत्री चौधरी देवी लाल के दोनों पोतों अजय सिंह और अभय सिंह बीते कुछ महीनों के दौरान मनमुटाव के चलते अलग-अलग हो गए थे। पूर्व उपप्रधानमंत्री के बड़े बेटे अजय सिंह के बेटे दुष्यंत चौटाला ने इनेलो से अलग होकर जननायक पार्टी बना ली और अब चप्पल चुनाव चिन्ह पर हिसार से लड़ रहे हैं जबकि चौधरी देवी लाल के छोटे पोते अभय सिंह ने अपने बेटे करण को कुरुक्षेत्र से इनेलो का उम्मीदवार घोषित किया है। अजय सिंह के छोटे बेटे दिग्विजय चौटाला जेजो के प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कांग्रेस के भूपेंद्र सिंह हुड्डा के खिलाफ सोनीपत से ताल ठोंक रहे हैं। कुल मिलाकर हरियाणा का लोकसभा चुनाव दिलचस्प होने वाला है। हरियाणा की 10 सीटों पर 2014 के चुनाव में भाजपा ने सात सीटें जीती थी जबकि इनेलो के हाथ दो सीटें लगी थी और कांग्रेस इस चुनाव में केवल एक सीट ही जीत सकी थी। लालों के इस (पानीपत के) युद्ध में देखें, किस लाल का पलड़ा भारी रहता है?

-अनिल नरेन्द्र

राजस्थान में दो मुख्यमंत्री पुत्रों की लड़ाई

राजस्थान की 25 सीटों को बरकरार रखना भाजपा के लिए कड़ी चुनौती है। 29 अप्रैल यानि चौथे चरण के मतदान में यहां की 13 सीटों पर मतदान होना है। राजस्थान में जोधपुर और झालावाड़ लोकसभा सीटें सबसे ज्यादा आकर्षण वाली सीटें इसलिए बन गई हैं क्योंकि इन दोनों सीटों पर एक मौजूदा मुख्यमंत्री और एक पूर्व मुख्यमंत्री के बेटों की लड़ाई है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत और झालावाड़ से पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत Eिसह चुनाव मैदान में हैं। दुष्यंत सिंह चौथी बार सांसद बनने के लिए मैदान में उतरे हैं जबकि वैभव गहलोत पहली बार सियासी पारी खेलेंगे। दोनों को ही इस बार कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है। जोधपुर में वैभव का मुकाबला केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत से होगा। दुष्यंत के सामने कांग्रेस ने भाजपा से जुड़े रहे युवा नेता प्रमोद शर्मा को पार्टी में शामिल कर चुनावी मैदान में उतारा है। जोधपुर सीट से पहली बार चुनावी मैदान में उतरे वैभव यूं तो कांग्रेस की राजनीति में 2003 से ही सक्रिय हैं। उन्होंने युवक कांग्रेस से होते हुए प्रदेश कांग्रेस में मौजूदा समय में महासचिव पद की जिममेदारी भी संभाली है। जोधपुर सीट से उनके पिता अशोक गहलोत पांच बार सांसद रहे और प्रदेश में अभी तीसरी बार मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वहीं शेखावत का कहना है कि देश की जनता नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाना चाहती है और राष्ट्रवाद की पक्षधर जनता उनके साथ है। उधर झालावाड़ की सीट पर लड़ रहे वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में ही देश तरक्की कर सकता है। इसके साथ ही सेना के हवाई हमले और राष्ट्रवाद की गूंज भी इस संसदीय क्षेत्र में खूब है। यह सीट झालावाड़ और बारां जिले की आठ विधानसभा सीटों को मिलाकर बनी है। वसुंधरा राजे इस सीट पर पांच बार सांसद बनी हैं और झालावाड़ से विधायक बनती आ रही हैं। कांग्रेस के प्रमोद शर्मा ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया था। प्रदेश के खनिज मंत्री प्रमोद जैन इस संसदीय क्षेत्र के बारां जिले में तगड़ा प्रभाव रखते हैं। उनकी सिफारिश पर ही कांग्रेस ने युवा प्रमोद शर्मा को इस कठिन सीट पर उतारा है। खनिज मंत्री प्रमोद जैन का कहना है कि इस बार बदलाव की लहर चलेगी। इस सीट पर 30 साल से एक ही परिवार का कब्जा चला आ रहा है। जनता इसमें बदलाव लाएगी। प्रदेश की अशोक गहलोत सरकार ने छह महीने के अपने कार्यकाल में कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं जिनकी बदौलत कांग्रेस मजबूत हो गई। देखें, ईवीएम क्या रिजल्ट निकालती है?

13 राज्यों की 353 सीटों का महत्व

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस बार लोकसभा चुनावों में कितनी सीटें जीतने जा रही है इसके दावे तो आए दिन आते रहते हैं, लेकिन चुनावी भविष्यवाणियां हमेशा खतरनाक होती हैं। किसी भी पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी यह दो फैक्टरों पर निर्भर होता है। इनमें वोट शेयर में बदलाव और विपक्षी मतों का एकजुट होना शामिल है।  देखा जाए तो भारत की विविधता के चलते ऐसे कारक राज्य स्तर पर काफी भिन्न हैं। एक विश्लेषण के मुताबिक 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत में एक बार फिर 13 राज्यों की 353 लोकसभा सीटें अहम साबित होंगी। 2014 में एनडीए ने इन राज्यों में 74 प्रतिशत सीटों पर जीत दर्ज की थी। इन सीटों पर भाजपा की राजनीतिक चुनौती को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी में आठ राज्य शामिल हैं। यहां पर भाजपा और सहयोगी दलों के साथ या बिना उनके सीधी प्रतिस्पर्धा में हैं। इनमें हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र और झारखंड शामिल हैं। 2014 के लोकसभा चुनावों में इन 162 सीटों में से 151 सीटों पर एनडीए को जीत मिली थी। यहां भाजपा की मुख्य चुनौती 2014 के मतदाताओं को अपने साथ रखना और कांग्रेस और उसके सहयोगियों के पास जाने से रोकना है। महाराष्ट्र को छोड़कर 2014 में भाजपा इन राज्यों में अपने दमखम पर लड़ी थी। जबकि कांग्रेस के पास महाराष्ट्र, गुजरात और झारखंड में गठबंधन था। 2014 में इन राज्यों में एनडीए का वोट प्रतिशत यूपीए से काफी ज्यादा था। दूसरी श्रेणी में तीन राज्य हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक शामिल हैं। 2014 में एनडीए ने यहां 148 सीटों में से 121 पर जीत हासिल की थी। उत्तर प्रदेश में 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा का कुल वोट प्रतिशत और भाजपा का वोट प्रतिशत लगभग बराबर रहा। दोनों के वोट प्रतिशत को जोड़ें तो उत्तर प्रदेश में एनडीए की सीटें 73 से 37 हो जाएंगी। बिहार में जदयू 2014 में 22 सीटों पर लड़ी और दो ही जीत सकी, जबकि एनडीए को इनमें से 17 सीटें मिली। जदयू इस बार एनडीए के साथ है। देखना है कि जदयू 2014 में मिले 16 प्रतिशत वोट प्रतिशत को एनडीए में ला पाती है या नहीं। कर्नाटक में अगर कांग्रेस और जेडीएस 2014 में लोकसभा का चुनाव एक साथ लड़ती है तो भी भाजपा को सिर्प दो सीटों का नुकसान होता। भाजपा ने 2014 में यहां 17 सीटें जीती थीं। तीसरी श्रेणी में उन दो राज्यों को शामिल किया गया है, जहां भाजपा को इस बार बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है। यह दो राज्य पश्चिम बंगाल और ओडिशा हैं। यहां 2014 में भाजपा को 63 में से सिर्प तीन सीटें ही मिली थीं। ओडिशा में बीजद और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस शामिल हैं। यहां पर अन्य विपक्षी दलों में पश्चिम बंगाल में वामपंथी और ओडिशा में कांग्रेस हैं। पश्चिम बंगाल के वोट शेयर का उपयोग करके भाजपा के महत्व को यहां समझा जा सकता है। यदि 2014 में पश्चिम बंगाल में भाजपा और वामपंथी पार्टी को मिले वोटों का पूर्ण हस्तांतरण होता है तो राज्य की 42 सीटों में से भाजपा को 32 सीटों पर जीत मिल सकती है। ओडिशा में इसी तरह 2014 में भाजपा को कांग्रेस को मिले वोट मिल जाते हैं तो वह राज्य की 21 सीटों में से 13 पर जीतती। यदि भाजपा को कांग्रेस का आधा वोट शेयर मिलता है तो वह यहां से पांच सीटें जीत जाती।

Thursday, 25 April 2019

ईस्टर पर ईसाइयों का कत्लेआम, लहूलुहान श्रीलंका

रविवार की सुबह श्रीलंका की राजधानी कोलंबो सहित कई जगह चर्चों और पांच सितारा होटलों में हुए बम विस्फोटों में, जिनमें से कुछ को आत्मघाती हमलावरों ने अंजाम दिया, सिर्प हताहतों का आंकड़ा ही चौंकाने वाला नहीं है बल्कि ईस्टर जैसे पवित्र पर्व पर सुनियोजित तरीके से जगह-जगह ईसाइयों को जिस तरह निशाना बनाया गया, वह और भी दुखद है। 10 वर्ष पूर्व तमिलों के आतंकवादी संगठन लिट्टे के खात्मे के बाद श्रीलंका में शांति और स्थिरता के दौर में रविवार जैसा भीषण आतंकी हमले की जितनी भी निन्दा की जाए कम है। जिस तरीके से इन हमलों को अंजाम दिया गया यह बताता है कि यह हमले किसी बड़ी सुनियोजित साजिश का हिस्सा थे। अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों से भरे रहने वाले पांच सितारा होटलों के साथ जिस तरह चर्चों को खासतौर पर निशाना बनाया गया उससे साफ है कि आतंकी ईसाई समुदाय के लोगों को निशाना बनाना चाह रहे थे। इसीलिए चर्चों में तब विस्फोट किए गए जब वहां ईस्टर की विशेष प्रार्थना हो रही थी। यह सचमुच बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि 21वीं सदी के इस आधुनिक समय में समाज में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में होने वाले कट्टर मजहबी हमले अपनी भीषणता के साथ-साथ हमारी असुरक्षा की भी याद दिला जाते हैं। ईस्टर के अवसर पर ईसाइयों को निशाना बनाया गया है। चर्च और ऐसे होटलों पर हमले किए गए हैं, जहां धर्मविशेष के लोगों का जमघट था। वह धार्मिक कार्य के लिए जुटे थे, खुशी मना रहे थे, आपस में मिलजुल रहे थे, लेकिन आतंकियों को यह पसंद नहीं आया। उनकी शैतानी मानसिकता इस कायराना हमले से पता चलती है। इसकी जितनी निन्दा की जाए कम है। यह हमले मानवता पर ठीक उसी तरह से हमला है जैसे हाल ही में न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में मस्जिद पर हुआ हमला था। दोनों ही जगह धार्मिक कृत्य में लगे लोगों को निशाना बनाया गया। तत्काल इस नतीजे पर पहुंचना मुश्किल है कि यह भयावह हमले किसने अंजाम दिए? अगर इन हमलों के पीछे किसी बाहरी आतंकी समूह का हाथ है तो भी सवाल है कि आखिर श्रीलंका को ही क्यों चुना गया? यह देश अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में होने के बजाय बीते कुछ समय से अपनी ही राजनीतिक उठापटक से त्रस्त है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी उठापटक का फायदा किसी नए-पुराने आतंकी समूह ने उठा  लिया? जो भी हो, कटु सत्य तो यह है कि जब किसी देश में शासन व्यवस्था सुदृढ़ न हो और राजनीतिक अस्थिरता का अंदेशा हो तो अराजक, अतिवादी और आतंकी ताकतों को सिर उठाने का मौका मिल जाता है। हालांकि औपचारिक रूप से किसी आतंकी संगठन ने इन हमलों की जिम्मेदारी तो नहीं ली है पर फिलहाल इन विस्फोटों के पीछे एनटीजी यानि नेशनल तौहिद जमात जैसे कट्टरवादी मुस्लिम संगठन का हाथ होने की आशंका है। यह संगठन पिछले साल कुछ बुद्ध प्रतिमाओं को तोड़ने के बाद चर्चा में आया था। यह विडंबना ही है कि 10 दिन पहले चर्चों पर हमले की चेतावनी के बावजूद इन हमलों और विनाश को नहीं रोका जा सका। यहां तक कि ईस्टर रविवार को देखते हुए भी चर्चों को समुचित सुरक्षित प्रदान करने की जरूरत नहीं समझी गई। आतंकवाद का लंबे समय से सामना कर रहे भारत का श्रीलंका की पीड़ा के साथ खड़े होना स्वाभाविक है, अलबत्ता पड़ोस में हुई यह हिंसा खुद हमें भी सजग रहने की मांग करती है। भगवान पीड़ितों को इतनी शक्ति दे कि वह अपने खोए परिजनों के सदमे को बर्दाश्त कर सकें। हम उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देते हैं।
-अनिल नरेन्द्र
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बिहार में लालटेन की लौ बनाए रखने की चुनौती

बिहार की 40 लोकसभा सीटों पर हो रहे चुनाव में इस बार भी आरजेडी केंद्र बिंदु में है। पार्टी के लिए यह चुनाव अगर हम कहें कि उनके अस्तित्व की लड़ाई है तो शायद गलत न हो। इस बार आरजेडी कांग्रेस के अलावा राज्य के चार क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। आरजेडी ने एनडीए के मुकाबले के लिए एक व्यापक गठबंधन किया है। बड़ा समझौता करते हुए अपने कोटे की सीट छोटे दलों को दी। इसे सोशल इंजीनियरिंग कहा जा रहा है। इसमें कई जातियों को समेटने की मंशा है। आज भी आरजेडी की सबसे बड़ी मजबूती उसका ठोस वोट बैंक बना हुआ है। आरजेडी ने अपने इसी वोट बैंक के दम पर अपनी ताकत बनाई। मुस्लिम और यादव (माई फैक्टर) उनके साथ बने हुए है। राज्य की कई सीटों पर यह निर्णायक क्षमता रखते हैं। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) नेता व बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने इस बार के लोकसभा चुनाव को धर्म की लड़ाई बताई और कहा कि लोग धर्म की नाव पर सवार होकर अधर्म की नैया को डुबो दें ताकि समाज और देश की रक्षा हो सके। तेजस्वी यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर हमला बोला और कहा कि श्री मोदी जुमलेबाज हैं। उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि इस बार चुनाव देश के संविधान को बचाने का संघर्ष भी है। देश का विकास पूरी तरह ठप हो गया है। लालू यादव से जेल में न मिलने देने पर उनके बेटे तेजस्वी यादव ने इसे राजनीतिक साजिश करार दिया है। वहीं लालू की पत्नी और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने आरोप लगाया है कि लालू प्रसाद यादव को जेल में जहर देकर मारने की साजिश की जा रही है। तेजस्वी ने कहा कि इस राजनीतिक साजिश के पीछे सुशील मोदी और नीतीश कुमार हैं और यह नरेंद्र मोदी के इशारे पर हो रहा है। बिहार के इस लोकसभा चुनाव में राजद की प्रचार सामग्रियों में मैं भी चौकीदार टीशर्ट की धूम मची हुई है। वहीं लालू प्रसाद यादव, तेजस्वी यादव के साथ ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की टोपी की अच्छी-खासी मांग है। जहां नमो समर्थक नमो टीशर्ट ले रहे हैं तो वहीं कांग्रेसी राहुल की कैप। राज्य में चुनाव के बढ़ते तेवर के साथ आरजेडी गठबंधन चुनाव को अगड़ा बनाम पिछड़ा का मुद्दा बनाकर आगे बढ़ने के मूड में है तो भाजपा की अगुवाई में गठबंधन राष्ट्रवाद के मुद्दे से इसे काउंटर करने की कोशिश कर रहा है। विपक्षी गठबंधन के नेताओं का मानना है कि चूंकि भाजपा ने अपनी अधिकतर सीटों पर सवर्ण समुदाय के उम्मीदवारों को जगह दी है। ऐसे में अब यह मुद्दा सामने आने से एनडीए को परेशान कर सकता है। आरजेडी अपने चुनावी प्रचार में सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के मोदी सरकार के कदम को पिछड़ों को आरक्षण समाप्त किए जाने की दिशा में एक कदम मान रही है। संसद में इससे जुड़े बिल का विरोध करने वालों में आरजेडी अकेली पार्टी थी। हालांकि इस मुद्दे पर पार्टी का कांग्रेस से मतभेद भी हुआ था। गठबंधन के पिछड़े कार्ड को काउंटर करने के लिए भाजपा नीतीश को आगे कर रही है। उन्हें लगता है कि नीतीश के साथ रहने से अति पिछड़े वोट पर इसका असर नहीं होगा। प्रधानमंत्री मोदी ने अररिया में अपनी रैली में गठबंधन की इस कोशिश पर हमला करते हुए साफ किया कि आरक्षण से किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की जाएगी? भाजपा को विश्वास है कि मोदी फैक्टर से गठबंधन की कोशिश किसी भी सूरत में सफल नहीं होगी।
करती है। भगवान पीड़ितों को इतनी शक्ति दे कि वह अपने खोए परिजनों के सदमे को बर्दाश्त कर सकें। हम उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देते हैं।

-अनिल नरेन्द्र


Wednesday, 24 April 2019

पुरी संसदीय सीट पर प्रवक्ताओं की टक्कर

भगवान जगन्नाथ ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि उनके साथ रहने वाले दो चिन्ह यूं आपस में टकराएंगे। लेकिन इस लोकसभा चुनाव में ऐसा हो रहा है। भगवान जगन्नाथ की पुरी नगरी में शंख और पदम के बीच लड़ाई है। दरअसल बीजू जनता दल (बीजेडी) के प्रतीक शंख और भाजपा के प्रतीक कमल (पदम) के बीच इस बार मुकाबला है। यही नहीं तीनों प्रमुख दलों बीजेडी, भाजपा और कांग्रेस ने अपने प्रवक्ताओं को यहां मैदान में उतारा है। मूल रूप से बीजद की मजबूत जनाधार वाली सीट पर पिछले दो चुनावों में जीत हासिल कर रहे पिनाकी मिश्रा फिर मैदान में हैं। पिनाकी मिश्रा 2009 में कांग्रेस छोड़कर बीजद में आए थे। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने इस बार अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा को टिकट दिया है जो अनूठे तरीकों से इस सीट पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। वहीं कांग्रेस ने सत्य प्रकाश नायक को टिकट दिया है। खास बात यह है कि प्रवक्ताओं की लड़ाई में मतदाता तय नहीं कर पा रहे हैं कि किसको अपना कीमती वोट दें? सत्य प्रकाश नायक कांग्रेस प्रदेश कमेटी मीडिया सेल के प्रमुख हैं। लगभग 14 लाख वोटर इस लोकसभा सीट पर आमतौर पर 50 प्रतिशत वोट बीजद को मिलते आए हैं। पुरी लोकसभा सीट के तहत आने वाली सात विधानसभा सीटों में पांच बीजद के पास हैं। संबित पात्रा की उम्मीदवारी के जरिये भाजपा ने इस बार शेष चार विधानसभा सीटों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। मतदाताओं के बीच कभी गीत गाकर तो कभी स्थानीय लोगों में घुल मिलकर पात्रा ने अपने प्रचार को धार देने की कोशिश की है। बावजूद इसके भाजपा का पूरा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के इर्दगिर्द केंद्रित रहा। भाजपा के पक्ष में बेहतर माहौल के पीछे संबित पात्रा को मोदी के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जा रहा है। वेद की पढ़ाई कर रहे आशीष दूबे का कहना था कि प्रधानमंत्री मोदी को एक बार मौका जरूर मिलना चाहिए। वहीं दो बार सांसद रह चुके पिनाकी मिश्रा के प्रति मतदाताओं में नाराजगी है। पुरी की जनता कहती है कि पिनाकी हमारे प्रतिनिधि हैं, लेकिन वह यहां सिर्प चुनाव के वक्त आते हैं। जनता में नाराजगी की सबसे बड़ी वजह पिनाकी का उपलब्ध न होना है। मंदिरों के इस शहर के चुनावी संघर्ष से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का लिटमस टेस्ट भी होगा। 2014 की मोदी लहर में ओडिशा में भाजपा महज एक सीट जीत पाई थी। 21 सीटों के इस राज्य में बाकी 20 सीटें बीजद जीती थी। धोती-कुर्त्ता पहने व माथे पर चन्दन लगाए पात्रा मोदी के नाम पर वोट मांगते दिखे। बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद यहां प्रधानमंत्री की लोकप्रियता बढ़ी है। भाजपा के बढ़ते अपराध, पर्यटन की अनदेखी और मछुआरों के वित्तीय संकट के मुद्दे यहां प्रमुख हैं। यहां प्रवक्ताओं की लड़ाई तो है ही पर ऊपरी स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री व बीजू जनता दल प्रमुख नवीन पटनायक की लोकप्रियता का भी एक टेस्ट है। पुरी में अनुभवी सांसद पिनाकी मिश्रा राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं और इतनी आसानी से हार मानने वाले नहीं हैं। प्रधानमंत्री मोदी की छवि और उपलब्धियों के बावजूद पहली बार पुरी से चुनाव लड़ रहे डॉ. संबित पात्रा खारे पानी में कमल खिलाने की पूरी कोशिश करेंगे।

कम वोटिंग से किसका घाटा? सारा जोर अब अगले चरणों पर

लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण में गत शुक्रवार को जारी संशोधित आंकड़ों के मुताबिक 11 राज्यों एवं केंद्रशासित पुडुचेरी की 95 सीटों पर 69.13 प्रतिशत मतदान हुआ। जबकि पहले चरण में 69.43 प्रतिशत मतदान हुआ था। 2014 की बात करें तो लोकसभा चुनाव के पहले चरण में 69.62 प्रतिशत मतदान हुआ था। क्या पहले दो चरणों के वोटिंग प्रतिशत गिरने का ट्रेंड अगले चरणों में भी जारी रहेगा? पहले दो चरणों में हुई सुस्त वोटिंग के बाद अब सियासी दलों की सबसे बड़ी चिन्ता यही है। 11 अप्रैल के बाद 18 अप्रैल को खत्म हुए दूसरे चरण की 95 सीटों पर भी 2014 के मुकाबले कम वोटिंग हुई। 186 लोकसभा सीटों पर लगभग 68.63 प्रतिशत वोटिंग दर्ज हुई। तीसरा चरण 23 अप्रैल को हुआ, जिसमें 116 लोकसभा सीटों पर मतदान हुआ। इसके साथ ही पूरे देश के आधे से ज्यादा सीटों पर चुनाव खत्म हो गया। अब तक के आंकड़ों के अनुसार शहरी सीटों पर वोटिंग कम हुई। खासकर बेंगलुरु और तमिलनाडु के बाकी शहरों में। माना जाता था कि सामान्यता से बहुत अधिक वोटिंग होने से ऐसा संदेश जाता है कि यह परिवर्तन की भीड़ उमड़ी है। जबकि उदासीन वोट से संदेश जाता है कि वोटरों में इसके प्रति उत्साह नहीं, जिसे सत्तापक्ष अपने लिए उम्मीद के रूप में देखता है। लेकिन यह मिथ्य भी हाल के दौरान कई चुनावों के दौरान टूटा है। सबकी नजर तीसरे चरण की 116 सीटों पर टिकी हुई थी। 23 अप्रैल को 14 राज्यों की 116 सीटों पर मतदान के चलते कांटे की लड़ाई हुई। इस हिसाब से 23 अप्रैल की शाम तक 303 सीटों का मतदान पूरा हो गया। भाजपा-राजग को जहां अपना किला बचाना होगा, साथ ही जहां कुछ घाटा नजर आया तो उसकी पूर्ति भी करनी होगी। तीसरे चरण में छत्तीसगढ़ की सात सीटों पर चुनाव हुआ। यहां कांग्रेस कुछ माह पूर्व विधानसभा में मिली जीत से उत्साहित है हालांकि 2014 में भाजपा ने यहां कांग्रेस का सूपड़ा साफ किया था। इसी तारीख में कर्नाटक की शेष 14 लोकसभा सीटों पर भी मतदान हुआ। इसमें कांग्रेस-जनता दल (एस) गठबंधन को विधानसभा चुनाव की तर्ज पर जीत के लिए समूची ताकत लगानी पड़ी जबकि भाजपा को मोदी लहर पर भरोसा है। महाराष्ट्र व कर्नाटक की 14-14 सीटों पर पिछले चुनाव में राजग का पलड़ा भारी रहा था। दोनों जगहों पर पक्ष तथा विपक्ष को औसत बस अंतर भर था। इसी कड़ी के चलते बिहार व अन्य जगहों पर राजग को पिछली सीटों को बचाना बड़ी चुनौती है। वर्ष 2014 में तब बिहार की 26 में से 25 पर राजग जीती थी। जबकि जनता दल (यू) एक सीट जीती थी। इस बार राजग के घटक दल बदल गए हैं। जनता दल (यू) भाजपा के साथ जुड़ गया है। मोदी की टीम का प्रयास होगा कि पिछले 26 में से ज्यादा से ज्यादा सीटें जीते जबकि विपक्ष भी कसर बाकी नहीं रखेगा। अंतिम चार चरणों में बिहार में जहां मतदान होगा उसमें दरभंगा, उजियापुर, हाजीपुर, मुजफ्फरपुर, सारण, बाल्मीकि नगर, पटना साहिब प्रमुख होंगी। तीसरे चरण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के गृह राज्य गुजरात की 26 सीटों पर मतदान हुआ। 2014 में भाजपा सभी 26 सीटों पर विजयी रही थी। राजस्थान की 25 सीटों पर चौथे और पांचवें चरण में वोटिंग होगी। उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 26 सीटों पर चुनाव हो चुके हैं, बाकी बची 54 सीटों पर आगामी चरणों में वोटिंग होगी। 2014 में भाजपा इन 54 सीटों में से 47 सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल रही थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 16 सीटों के बाद तीसरे चरण में गठबंधन को उन 10 सीटों पर जोर-आजमाइश करनी पड़ी है जहां मुलायम परिवार की साख दांव पर है। वर्ष 2014 में सपा को प्रदेश में अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिहाज से यह इलाका मददगार साबित हुआ है। कुल मिलाकर एक तरफ मोदी और दूसरी तरफ कांग्रेस-सपा-बसपा गठबंधन की साख दांव पर होगी।

-अनिल नरेन्द्र