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Tuesday, 12 May 2020

एक और कोरोना वॉरियर लड़ते-लड़ते शहीद हो गया

सारा शहर उस समय सदमे में आ गया जब खबर आई कि जांबाज युवा दिल्ली पुलिस कांस्टेबल अमित कुमार कोरोना का शिकार हो गया। कोरोना संक्रमित दिल्ली पुलिस के इस जांबाज सिपाही अमित की मौत हो जाने से उनके सोनीपत स्थित गांव में मातम छा गया। गांव में उनकी पत्नी पूजा व तीन साल के उनके बेटे रेयान का रो-रोकर बुरा हाल है। उनके साले रवि ने बताया कि अमित की मौत हो जाने की खबर बहन को दो दिन बाद यानि बुधवार शाम को दी गई। पूजा और अमित की शादी चार वर्ष पहले हुई थी। पूजा दिल्ली में संविदा पर शिक्षक है। लॉकडाउन के चलते वह अभी गांव में थी। रवि ने बताया कि अमित बेहद अच्छे इंसान थे। वह सबको अपना दोस्त मानते थे। अमित ने रविवार को पूरे परिवार से बात की थी और कहा था कि मैं पूरी तरह से स्वस्थ हूं। अमित ने कुछ दिन पहले ही अपने तीन वर्षीय बेटे रेयान का स्कूल में एडमिशन कराया था। वह चाहते थे कि उनका बेटा बड़ा अधिकारी बने। सोमवार को तबीयत खराब होने के बाद अमित ने घर पर पत्नी को बताया तो उन्होंने कोरोना की जांच करा लेने की बात कही। हालांकि परिवार के किसी सदस्य को यह उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी कोरोना उनकी जान ले लेगी। सिपाही अमित के रिश्तेदार रवि व दोस्तों ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। रवि का कहना है कि यदि समय रहते उन्हें अस्पताल में भर्ती कर लिया जाता तो शायद वह आज जिन्दा होते। उनके साथी नवीन ने उनका इलाज करवाने के लिए 10 से अधिक अस्पतालों में चक्कर लगाए, लेकिन किसी ने भर्ती नहीं किया। नवीन ने जब किसी पुलिस अधिकारी को फोन किया तो उन्होंने आरएमएल में भर्ती कराने की बात कही। लेकिन इससे पहले ही उनकी मौत हो गई। इस बात की जांच होनी चाहिए कि क्या वाकई ही अमित का समय रहते इलाज नहीं हो सका? उनकी मौत का जिम्मेदार कौन है? अमित की मौत के बाद दिल्ली पुलिस कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव ने बड़े स्तर पर जवानों की सुरक्षा के लिए बदलाव किए हैं। ताकि इस महामारी के दौरान सड़कों पर मोर्चा संभाले दिल्ली पुलिस के किसी भी योद्धा के साथ ऐसा न हो। सीपी ने कहा कि अगर किसी पुलिसकर्मी को ऐसा लगता है कि उनकी तबीयत बिगड़ रही है तो वह तुरन्त अपने एसएचओ, सीपी या यूनिट में सूचित करेंगे। डीसीपी को जानकारी देंगे। डीसीपी को भी ऐसे मामलों की जानकारी नोडल ऑफिसर को देनी होगी। अगर किसी पुलिसकर्मी को ऐसा लगता है कि उसमें कोरोना के लक्षण हो सकते हैं तो उसके लिए सेंट्रल दिल्ली में एक पूरा होटल रिजर्व किया गया है। जहां पर जाकर पुलिसकर्मी खुद को क्वारंटीन कर सकते हैं। जांच के लिए हैदरपुर में दिल्ली सरकार के सहयोग से एक टेस्टिंग सेंटर भी खोला गया है। यह अच्छी बात है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने अमित के परिवार को एक करोड़ रुपए की सम्मान राशि देने का ऐलान किया है। हम अमित जांबाज को सलाम करते हैं। जय हिन्द।

Sunday, 10 May 2020

ई-रिक्शा चालकों को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं हो रही

कलंदर कॉलोनी में रहने वाले राम प्रसाद ई-रिक्शा चलाते हैं। बताते हैं कि लॉकडाउन में घर चलाना भी मुश्किल हो रहा है। वह बताते हैं कि जब मेट्रो चलती थी तो दिलशाद गार्डन मेट्रो स्टेशन से और झिलमिल से सवारी लेता था और जीटीबी, सीमापुरी, शालीमार गार्डन पहुंचाता था। ई-रिक्शा खरीदने के लिए परिचितों से उधार लिया हूं लेकिन अब घर का खर्च चलाना भी मुश्किल हो रहा है। लॉकडाउन में एक माह से अधिक समय से काम बंद होने के कारण ई-रिक्शा चालकों को अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर पाना भी मुश्किल हो रहा है। जो जमापूंजी थी वह खत्म होने के बाद हाल में उधारी पर गुजारा कर रहे थे, लेकिन अब उधारी भी काफी चढ़ गई है। तुगलकाबाद इलाके में रहने वाले ई-रिक्शा चालक हेमंत कुमार लॉकडाउन की वजह से पिछले एक महीने से परेशान हैं। कहते हैं कि अब तो ई-रिक्शा भी चलाने से पहले ठीक कराने के लिए पैसे चाहिए। सरकार से आर्थिक मदद की उम्मीद लगाकर बैठे हेमंत बताते हैं कि 12 घंटे ई-रिक्शा चलाने पर औसतन 400-500 रुपए की बचत हो जाती थी। लेकिन मार्च महीने की 24 तारीख से काम-धंधा ठप पड़ा है। ई-रिक्शा न चलाने की वजह से उसकी बैटरी व अन्य सामान खराब होने का डर सता रहा है। पहले से ही नई बैटरी की किस्त जमा कर रहा हूं। यह बैटरी खराब हो गई तो 30 हजार का बोझ बढ़ जाएगा। हेमंत ने कहा कि तीन दिन से राशन के लिए चक्कर लगा रहा हूं लेकिन वह भी नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में अब कुछ समझ नहीं आ रहा कि आखिर क्या किया जाए? चार सदस्यों वाला मेरा परिवार है, जिसका भरण-पोषण रिक्शा चलाकर ही हो रहा था। ई-रिक्शा काफी दिनों से यूं ही खड़ा है। आय का कोई अन्य जरिया भी नहीं है। दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है कि करूं तो क्या करूं? -रिक्शा चालकों की हालत खराब है। सरकार को इनकी ओर ध्यान देना चाहिए। रोज कमाना-रोज खाना वालों की लॉकडाउन में समस्या गंभीर है।

-अनिल नरेन्द्र

चुन-चुनकर मारेंगे आतंकी कमांडरों को

जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ समय से जारी आतंकवादी गतिविधियों का करारा जवाब देते हुए हमारे सुरक्षा बलों ने हिजबुल मुजाहिद्दीन के शीर्ष कमांडर और पोस्टर ब्वॉय रियाज नायकू समेत कुछ आतंकियों को जिस तरह मार गिराया है, वह वाकई एक बड़ी सफलता है। दरअसल कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में भारत की व्यस्तता का नाजायज फायदा उठाने की कोशिश में पड़ोसी पाकिस्तान न केवल संघर्षविराम का लगातार उल्लंघन करता रहा है, बल्कि हाल के दिनों में घाटी में बड़ी आतंकवादियों की सक्रियता भी उसकी नापाक मंशा के बारे में भी बताती है। विगत रविवार को हंदवाड़ा में आतंकियों से लोहा लेते हुए कर्नल आशुतोष शर्मा समेत पांच जवान शहीद हो गए थे। इसका सही जवाब देते हुए हमारे सुरक्षा बलों ने रियाज नायकू को ठिकाने लगाकर हिजबुल की रीढ़ तोड़ दी है। यह एक ऐसी उपलब्धि है जिसका असर कश्मीर में तो पड़ेगा ही देश के आतंकवाद पर भी पड़ेगा। बुरहान वानी समूह का नायकू जुलाई 2017 से हिजबुल के शीर्ष नेतृत्व की भूमिका में था। बुरहान वानी की तरह ही आतंकियों के लिए पोस्टर ब्वॉय बन गया था। ऑडियो-वीडियो में अपनी बात रखने के उसके तरीकों से युवा आतंकवाद की ओर आकर्षित होते थे। उसके नाटकीय अंदाज से लोगों को लगता था कि वह उनके लिए लड़ रहा है। इस कारण उसने अपने प्रत्यक्ष तथा परोक्ष समर्थक भी पैदा कर लिए थे। वह ऐसा आतंकवादी था जिसने पुलिस वालों के परिवारों के अपहरण से लेकर उनकी हत्या को अपनी मुख्य रणनीति के तौर पर अपनाया था। उसने आह्वान किया कि जम्मू-कश्मीर के लोग पुलिस की नौकरी छोड़ दें। ऐसा न करने पर उसने अभियान चलाया। यही वजह है कि उसकी मौत प्रदेश की पुलिस के लिए राहत की सांस लेने व जश्न मनाने का कारण बन गया है। जिस तरह से उसे उसके पैतृक गांव में ही घेर कर मारा गया उससे यह भी पता चलता है कि सुरक्षा बलों का खुफिया तंत्र पहले से बेहतर हुआ है। प्रमुख रक्षा अध्यक्ष (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत ने गुरुवार को कहा कि सुरक्षा बलों की प्राथमिकता है आतंकी कमांडरों को चुन-चुनकर खत्म करना। बेशक यह हमारे सुरक्षा बलों की भारी सफलता है और कर्नल आशुतोष शर्मा व उनके साथियों का बदला है पर हमारी चौकसी पहले से भी ज्यादा होनी चाहिए। बर्प पिघलने लगी है और घुसपैठ बढ़ेगी। इस शानदार उपलब्धि पर सुरक्षा बलों को बधाई।

दम घुटा...जो जहां था, वहीं गिर गया

आंध्र प्रदेश के आरआर वेंकटपुरम गांव में स्थित एलजी पॉलिमर के कैमिकल प्लांट से गैस का रिसना जितना चिन्ताजनक है, उससे कहीं अधिक दुखद है गैस रिसाव से लोगों की मौत। इस रिसाव ने एक बार फिर भोपाल गैस त्रासदी की याद ताजा कर दी है। बुधवार देर रात कारखाने में गैस का रिसाव शुरू हुआ। उस वक्त जो लोग कारखाने में तैनात थे, उन पर तो असर हुआ ही, आसपास के करीब तीन किलोमीटर क्षेत्र तक उसका प्रभाव देखा गया। दम घुटने से लोग दहशत में थे। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था, भागकर जाएं तो जाएं कहां। कुछ तो बेचारे ऐसे भी थे जो अंधेरे में नाले में जा गिरे। कुछ की सांस इतनी फूल रही थी कि मौत आंखों के आगे नाचने लगी। चारों ओर अफरातफरी का माहौल मचा तो लोग दहशत में आ गए कि कहीं कोरोना हवा में तो नहीं फैल गई? रात के अंधेरे में ही लोग जहां जैसे थे, वहां से भाग पड़े। पांच किलोमीटर तक के इलाके में अफरातफरी मच गई। रास्ते में कई लोग गिरते जा रहे थे। कई जगहों पर लोग बेहोश पड़े दिखे। मृत मवेशी भी नजर आए। बच्चों को कंधे पर रखकर लोग अस्पताल भाग रहे थे। भर्ती मरीजों में बड़ी संख्या में बच्चे शामिल हैं। लोगों के मुताबिक सोते समय अचानक सांस में तकलीफ, भयानक खुजली और आंखों में जलन महसूस होनी शुरू हुई। गोपालपत्तनम पुलिस ने बताया कि करीब 50 लोग स़ड़क पर बेहोश मिले। घटनास्थल तक पहुंचने में काफी दिक्कत हुई। कई घरों से लोगों को दरवाजे तोड़कर निकलना पड़ा। एलजी पॉलिमर के प्लांट से दरअसल बड़ी मात्रा में स्टाइरीन गैस लीक हो गई थी। इसके असर से 8 साल के बच्चे स]िहत 11 लोगों की मौत हो गई, 300 से ज्यादा लोग अस्पतालों में भर्ती हैं। 20 लोग वेंटिलेटर सपोर्ट पर हैं। राज्य सरकार ने घटना की जांच के लिए उच्च स्तरीय कमेटी गठित की है। विशाखापत्तनम पुलिस ने एलजी पॉलिमर प्लांट के प्रबंधन के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज कर लिया है। इस मामले में गैर-इरादतन हत्या और लापरवाही से मौत की धाराएं जोड़ी गई हैं। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने भी इस घटना पर स्वत संज्ञान लेते हुए राज्य और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। ऐसे औद्योगिक हादसों की वजह छिपी नहीं है। यूं तो प्रशासन ने कारखाना प्रबंधन के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली है, प्रबंधन अपने पक्ष में मामूली चूक, मानवीय भूल जैसी दलीलें देकर बचने का प्रयास भी करेगा। पर सवाल है कि औद्योगिक सुरक्षा मानकों के मामले में लापरवाही की प्रवृत्ति पर अंकुश क्यों नहीं लगता? जिन कारखानों में जहरीली गैसों का उपयोग या उत्पादन होता है, वहां सुरक्षा को लेकर अधिक मुस्तैदी की जरूरत होती है। भोपाल गैस त्रासदी के अनुभवों को देखते हुए इसके लिए सख्त निर्देश भी तय हुए थे। मगर कारखाना प्रबंधन अकसर मामूली पैसा बचाने के लोभ में सुरक्षा इंतजामों को नजरंदाज करते रहे हैं, जहां ऐसी खतरनाक गैसों का उपयोग या उत्पादन होता है, वहां रिसाव आदि की स्थिति में चेतावनी देने वाले स्वचालित यंत्र लगाने अनिवार्य हैं। फिर विशाखापत्तनम के कारखाने में गैस का बड़े पैमाने पर रिसाव हो गया और कैसे प्रबंधन को इसकी भनक तक नहीं लगी? आखिर लोगों की जान की कीमत पर ऐसी लापरवाहियों और मनमानियों को कब तक अनदेखा किया जाता रहेगा?

Friday, 8 May 2020

कितना सुरक्षित है आरोग्य सेतु ऐप?

आरोग्य सेतु के निजता में सेंध लगाने के विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए केंद्रीय सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि यह मोबाइल ऐप निजता की सुरक्षा एवं डेटा सुरक्षा के सन्दर्भ में पूरी तरह से मजबूत और सुरक्षित है। प्रसाद ने कहाöयह भारत का प्रौद्योगिकी आविष्कार है (इलैक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी, हमारे वैज्ञानिकों, राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र, नीति आयोग और कुछ निजी संस्थानों का) जो कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में मदद के लिए पूरी तरह से एक जिम्मेदार मंच है। कांग्रेस ने आरोग्य सेतु को निजता के अधिकार का उल्लंघन करने वाला ऐप करार देते हुए बुधवार को दावा किया कि इसके माध्यम से हर व्यक्ति की निगरानी की जाएगी। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने यह सवाल किया कि आखिर इस ऐप का डेटा एकत्र करने वाला सर्वर कहां है? उन्होंने वीडियो लिंक के माध्यम से संवाददाताओं से कहाöआरोग्य सेतु ऐप को लेकर निजता के उल्लंघन से जुड़े गंभीर मुद्दे हैं। हम सब जानते हैं कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है। उच्चतम न्यायालय ने भी इस संबंध में व्यवस्था दी है। सुरजेवाला के मुताबिक इस ऐप के बारे में कल एक ऐथिकल हैकर ने ट्वीट के जरिये बताया कि किस प्रकार से इसमें निजता के उल्लंघन का गंभीर मुद्दा है और राहुल गांधी की इसे लेकर जताई गई आपत्ति सही थी। उन्होंने कहा कि हैकर ने यह भी बताया कि भारत सरकार की इंडियन कम्प्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम ने उससे तथ्यों की जानकारी ली। यह अपने आपमें सबूत है कि यह ऐप निजता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं। कांग्रेस ने यह दावा किया कि इस ऐप के जरिये हर व्यक्ति की 24 घंटे निगरानी की जा सकती है। यह तो एक जासूसी कैमरा लगाने जैसा है। दरअसल फ्रांस के हैकर ने साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ एल्लोट एल्डसन ने मंगलवार को दावा किया कि ऐप में सुरक्षा को लेकर मसले पाए गए हैं और नौ करोड़ भारतीयों की निजता को खतरा है।

-अनिल नरेन्द्र

बिल्डरों के कहने पर कर्नाटक ने रोकी प्रवासियों की ट्रेनें

रेलवे 5 दिन में 122 स्पेशल ट्रेन चलाकर देशभर में फंसे 1.25 लाख प्रवासी श्रमिकों को गृह राज्य तक पहुंचा चुका है। उधर कर्नाटक में बुधवार को तब राजनीति गरमा गई जब बिल्डरों की कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा से मुलाकात के कुछ घंटे बाद राज्य की भाजपा सरकार ने रवानगी से ऐन पहले श्रमिक स्पेशल ट्रेन रद्द कर दी। बिल्डरों ने मुख्यमंत्री से मांग की कि मजदूरों को उनके राज्य से जाने से रोका जाए। बिल्डरों के मुताबिक अगर मजदूर लौट जाएंगे तो कंस्ट्रक्शन का काम रुक जाएगा। राज्य सरकार ने लॉकडाउन की शर्तों में राहत दी है। भवन निर्माण समेत कुछ अन्य व्यापारिक गतिविधियों को मंजूरी दी है। मजदूरों की कमी होने से इन उद्योगों से जुड़े काम प्रभावित होंगे। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि वह मजदूरों को राज्य छोड़कर नहीं जाने के लिए समझाएं। वहीं महाराष्ट्र सरकार ने यूपी-बिहार समेत उन राज्यों पर निशाना साधा जो प्रवासी मजदूरों को राज्य से ले जाने से पहले उनकी जांच करवा रहे हैं। शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में यूपी-बिहार सरकार के इस कदम को अमानवीय बताया। उन्होंने कहा कि अमीरों को सरकार फ्री बुला रही है जबकि इन मजदूरों से किराये के रकम वसूलने के साथ ही इनकी जांच भी करा रही है। विशेष ट्रेनों से भेजे गए अधिकतर श्रमिक उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश और झारखंड के रहने वाले हैं। रेलवे ने बुधवार को 42 विशेष श्रमिक ट्रेनें चलाने की योजना बनाई थी, जिनमें से देर शाम 26 अपने गंतव्य पर रवाना हो चुकी थी और 16 को देर रात रवाना होना था। कर्नाटक राज्य के नोडल अधिकारी एन. मंजूनाथ प्रसाद ने रेलवे को पत्र लिखकर अगले 5 दिन में चलने वाली 10 ट्रेनें रद्द करने के लिए कहा। बिल्डरों द्वारा मजदूरों की वापसी पर निर्माण कार्य ठप होने की आशंका जताई गई थी। ट्रेन रद्द होने को ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस ने आवाजाही की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन बताया है।

राजस्व के लिए डीजल-पेट्रोल व शराब पर निर्भर सरकारें

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल-डीजल के दामों में भारी गिरावट आई है, कच्चे तेल के दाम अब तक के अपने निचले स्तर पर आ चुके हैं तो ऐसे में अपने-अपने स्तर पर पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने का राज्य सरकारों का फैसला हैरान करने वाला है। पेट्रोल और डीजल का अतिरिक्त भार अंतत जनता पर ही पड़ता है। मंगलवार को पेट्रोल 10 रुपए और डीजल 13 रुपए सस्ता हो सकता था लेकिन केंद्र सरकार ने जनता को कोरोना महामारी के बीच यह राहत नहीं आने दी। इतना ही पेट्रोल और डीजल में एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी। डीजल की आधार कीमत ढुलाई के साथ 18.78 रुपए और पेट्रोल की 18.28 रुपए है लेकिन दिल्ली में हमें डीजल 69.39 रुपए और पेट्रोल 71.26 रुपए प्रति लीटर मिल रहा है। मसलन आप एक लीटर पेट्रोल खरीदते हैं तो केंद्र सरकार को एक्साइज ड्यूटी के तौर पर 32.98 रुपए का कर और राज्य सरकार को 16.44 रुपए का कर देते हैं। केंद्र सरकार की तरफ से बढ़ाई गई एक्साइज ड्यूटी और दिल्ली सरकार की तरफ से बढ़ाए गए वैट के बाद अब पेट्रोल और डीजल के दाम में अंतर बहुत मामूली रह गया है। लॉकडाउन में हुए घाटे से उबरने के लिए दिल्ली सरकार ने शराब और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इजाफा किया है। टैक्स फ्री बजट का दावा करने वाली दिल्ली सरकार ने कोरोना महामारी के दौर में पैसे जुटाने के लिए शराब व पेट्रोल-डीजल पर अतिरिक्त वैट लगाकर अपना घाटा पूरा करने का जो फैसला किया वह जनहित में नहीं माना जा सकता। चलो शराब में 70 प्रतिशत कीमत बढ़ाना तब भी समझ आता है लेकिन पेट्रोल-डीजल तो आम जनता पर जिसकी कमर पहले से ही टूटी पड़ी है उस पर और भार डालना हमारी समझ से बाहर है। सरकार को पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी से चालू वर्ष में 1.6 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है। इससे लॉकडाउन से हो रहे राजस्व नुकसान की भरपाई करने में मदद मिलेगी। इस वक्त पूरी दुनिया में कच्चे तेल का बाजार इतिहास की सबसे बड़ी गिरावट झेल रहा है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पिछले तीन महीने में कच्चा तेल 56 डॉलर से गिरकर 22 डॉलर प्रति बैरल तक आ चुका है, यानि करीब 60 प्रतिशत तक की गिरावट। ऐसे में जब भारत की तेल कंपनियों ने 19 डॉलर प्रति बैरल के भाव से कच्चा तेल खरीदा हो, दाम घटने चाहिए थे। आज भी पेट्रोल-डीजल के दाम कमोबेश वहीं के वहीं बने हुए हैं जहां दो-तीन महीने पहले थे। उल्टा, अपना खजाना भरने के लिए राज्य सरकारों ने वैट बढ़ाने जैसा जनविरोधी फैसला करने में कोई संकोच नहीं किया। सवाल है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारी गिरावट का आमजन को कोई फायदा क्यों नहीं मिलना चाहिए। ऐसा पहली बार हुआ है जब केंद्र ने पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क एक साथ इतना ज्यादा बढ़ाया है। हालांकि कहा जा रहा है कि इससे जनता पर कोई अतिरिक्त भार नहीं पड़ेगा पर हकीकत में यह गरीब जनता पर एक और अतिरिक्त भार है। सरकारों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि पेट्रोल-डीजल महंगा होने का सीधा और पहला असर माल ढुलाई पर और रोजमर्रा की जरूरत वाली चीजों की कीमतों पर पड़ता है। वैसे ही लोग लॉकडाउन से परेशान हैं, यह कदम और परेशानी में डालने वाला है।