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Wednesday, 13 May 2020

लाउडस्पीकर पर अजान बंद हो

लेखक-गीतकार जावेद अख्तर का कहना है कि लाउडस्पीकर पर अजान देने का चलन बंद होना चाहिए, क्योंकि इससे दूसरों को असुविधा होती है। उन्होंने कहा कि अजान मजहब का अभिन्न हिस्सा है, लाउडस्पीकर का नहीं। शनिवार को किए गए ट्वीट में जावेद ने पूछा कि यह चलन करीब आधी सदी तक हराम (मना) माना जाता था, तो अब हलाल (इजाजत) कैसे हो गया? गीतकार ने ट्वीट कियाöभारत में करीब 50 साल तक लाउडस्पीकर पर अजान देना हराम था। फिर यह हलाल हो गया और इतना हलाल कि इसका कोई अंत नहीं है, लेकिन यह खत्म होना चाहिए। अजान ठीक है, लेकिन लाउडस्पीकर पर इसे देने से दूसरों को असुविधा होती है। मुझे उम्मीद है कि कम से कम इस दफा वह खुद इसे करेंगे। ट्विटर पर जब एक शख्स ने 75 वर्षीय अख्तर से मंदिरों में लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि स्पीकरों का रोजाना इस्तेमाल फिक्र की बात है। उन्होंने जवाब दियाöचाहे मंदिर हो या मस्जिद, अगर आप किसी त्यौहार पर लाउडस्पीकर का इस्तेमाल कर रहे हैं तो ठीक है, लेकिन इसका इस्तेमाल मंदिर या मस्जिद में रोजाना ठीक नहीं। अख्तर ने कहाöएक हजार साल से अधिक समय से अजान बिना लाउडस्पीकर के दी जा रही है। अजान आपके मजहब का अभिन्न हिस्सा है, इस यंत्र का नहीं। इससे पहले मार्च में अख्तर ने कोरोना वायरस महामारी के दौरान मस्जिदों को बंद करने का समर्थन किया था और कहा था कि महामारी के दौरान काबा और मदीना तक बंद हैं। जावेद के विचार को कट्टरपंथी मौलवी पता नहीं कैसे लेते हैं? इस पर विवाद पैदा कर सकते हैं। देखें कि जावेद की बात का क्या रिएक्शन होता है?

-अनिल नरेन्द्र

कोरोना ने बदल डाली दुख बांटने की भी परिभाषा

कोरोना के तेजी से बढ़ते संक्रमण के बाद मरीजों का बेहतर इलाज और मृत्युदर को कम करना सरकार की पहली प्राथमिकता बन गई है। सरकार इस बात से चिंतित नहीं है कि केस कितने बढ़ रहे हैं। जितने ज्यादा टेस्ट होंगे उतनी संक्रमत केसों की संख्या बढ़ेगी। पर चिंता इस बात की होनी चाहिए कि इससे मौत को कंट्रोल किया जा सके। फिलहाल हर दिन कोरोना के तीन हजार से अधिक मरीज सामने आ रहे हैं। लेकिन अच्छी बात यह है कि रिकवरी रेट भी बढ़ा है। लॉकडाउन तीन में मिली छूट का असर अगले हफ्ते सामने आने के बाद हर दिन नए मरीजों की संख्या और ज्यादा होना तय माना जा रहा है। इसलिए जरूरी यह है कि लोगों को कोरोना के साथ ही जीना सीखना होगा। लॉकडाउन के नियमों का सख्ती से पालन करें, सभी जरूरी प्रिकौशन लें तभी कोरोना को चरम पर पहुंचने से रोका जा सकता है। देश में कोरोना के मरीजों की संख्या भले ही तेजी से बढ़ रही हो, लेकिन अच्छी बात यह है कि हर तीसरा मरीज स्वस्थ होकर घर भी जा रहा है। कोरोना ने जीवन की परिभाषा बदलकर रख दी है। संवेदना व भावनाओं को व्यक्त करने के तरीके में बदलाव कर दिया है। समय के साथ, परिस्थितियों के साथ यह जरूरी भी है, क्योंकि अगर थोड़ी-सी भी लापरवाही हुई तो स्वास्थ्य के लिए कठिनाइयां उत्पन्न हो जाएगी। दिल्ली के राजौरी गार्डन में ऐसा ही एक वाकया देखने को मिला। राजौरी गार्डन निवासी एक महिला के पिता का देहांत कनाडा में हो गया। महिला व उनके पति के करीबी लोगों ने अपनी संवेदना व्यक्त करने के लिए शारीरिक दूरी का पालन करने के साथ-साथ दूसरों के लिए मिसाल पेश की है। महिला अपने परिवार के साथ घर के बाहर खड़ी हो गई। इसी दौरान उनके करीबी कार में आए और कार से ही संवेदना व्यक्त कर चले गए। अधिकांश लोगों ने सड़क पर अपनी कार में खड़े होकर कागज पर अपनी बात लिखकर महिला को ढांढस बंधाया। राजौरी गार्डन में चांदनी अपने परिवार के साथ रहती हैं। चांदनी के पिता गुरिन्दर सिंह आनंद की मौत कनाडा में कोरोना संक्रमण के कारण दो मई को हो गई थी। इसके बाद से पूरा परिवार दुखी है। इस परिवार के परिचित घर आकर संवेदना व्यक्त करना चाहते थे, लेकिन चांदनी के पति रमनदीप ने इसके लिए साफ मना कर दिया। उन्होंने दोस्तों, रिश्तेदारों से कहा कि अभी के समय मिलना न तो आपके लिए हितकारी है और न मेरे लिए। पर दोस्तों का मन नहीं मान रहा था। इसके बाद रमनदीप ने कहा कि आप सभी लोग सात मई को मेरे घर के पास कार से आएं। हम सभी घर के गेट पर रहेंगे और आप बिना कार से उतरे अपनी संवेदना व्यक्त कर चले जाएं, क्योंकि यह समय की मांग है। हमें सरकार के दिशानिर्देशों का पूरी तरह से पालन करना है। साथ ही इस बात की जानकारी बीट ऑफिसर को भी दे दी गई। इसके बाद सात मई को रमनदीप के 10 दोस्त अपनी कार में आए और संवेदनाएं व्यक्त कर चले गए। हर कार में सिर्प दो लोग बैठे हुए थे। इस दौरान स्वास्थ्य विभाग के सभी निर्देशों का पालन किया गया।

हमें हर हाल में अपने घर जाना है

पूरे देश की सड़कों पर घर जाने वाले मजदूर कहीं साइकिल से तो कहीं पैदल जाते दिख रहे हैं। यह किसी तरह अपने गृह नगर लौटना चाहते हैं। पुलिस की सख्ती, दलालों का लालच और घर पहुंचाने का सरकारी दावा सब कम पढ़े-लिखे मजदूरों की उम्मीदों पर पानी फेर रहा है। किसी का पैसा खत्म है तो किसी का राशन। मजदूर मजबूर होकर सड़कों पर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं, दर-दर भटक रहे हैं। यूपी गेट के पास गाजीपुर सब्जी मंडी रोड पर रविवार सुबह 11 बजे करीब 15 साइकिल सवार मजदूर भटकते नजर आए। वह बदायूं जाने के लिए बॉर्डर पार करने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन पुलिस उन्हें वापस भेज रही थी। साइकिल सवार मजदूर कामते ने बताया कि सभी बदायूं के हैं और दिल्ली में मजदूरी करते हैं। लॉकडाउन में घर और रिश्तेदारों से रुपए मंगाकर खर्च चला रहे थे। घर जाने के लिए रजिस्ट्रेशन के बारे में पता नहीं चल रहा तो साइकिल से ही घर जा रहे हैं। गोरखपुर का विमलेश लॉकडाउन में 35 दिन लोडेड ट्रक लेकर हैदराबाद के पास हाई-वे पर फंसा रहा। राशन खत्म होने पर ट्रांसपोर्टर ने हाथ खड़े कर दिए। विमलेश पैदल ही कर्नाटक के गुलबर्गा के लिए चल पड़ा। दो दिन में कमरे पर पहुंचा तो वहां बचत के रुपए से पुरानी साइकिल खरीदी और 1800 किलोमीटर दूर अपने घर के लिए निकल पड़ा। नौ दिन की जद्दोजहद के बाद वह गोरखपुर के बड़हलगंज पहुंचा। यहां आधार कार्ड जांचने के बाद पुलिस ने उसे एक स्कूल में क्वारंटीन कराया। बड़हलगंज के सतडौली गांव का विमलेश ओझा कर्नाटक के गुलबर्गा में रहकर ट्रक चलाता है। 19 मार्च को वह गुलबर्गा से सीमेंट लदा ट्रक लेकर निकला। तेलंगाना में हैदराबाद के पास वह ट्रक लेकर लॉकडाउन में फंस गया। उसने हाई-वे पर ट्रक में ही किसी तरह 35 दिन गुजारे। इस बीच खाने-पीने का सामान और पैसा खत्म हो गया। उसने ट्रांसपोर्टर को इसकी जानकारी दी। उस ट्रांसपोर्टर ने मदद से हाथ खड़े कर दिए। इसके बाद वह ट्रक हाई-वे पर ही खड़ा कर पैदल गुलबर्ग के लिए निकल पड़ा। वह दो दिन में गुलबर्गा अपने कमरे पर पहुंचा। कमरे पर रखे बचत के छह हजार रुपए में से 5500 रुपए में मोहल्ले के एक युवक से पुरानी साइकिल खरीदी और 26 अप्रैल को अपने घर के लिए निकल पड़ा। विमलेश ने बताया कि जबलपुर से चला था कि रात में पिछला टायर पंक्चर हो गया। रात में पुछ दूर पैदल चला। हिम्मत जवाब देने पर सुरक्षित स्थान देखकर बैठ गया। खैर यह फिर यात्रा शुरू की। करीब 50 किलोमीटर पैदल चलने पर हाई-वे पर पंक्चर बनाने वाली दुकान मिली। काफी अनुरोध करने पर उसने पंक्चर जोड़ा। प्रवासी मजदूर अपने घर पहुंचने के लिए हर प्रकार के जोखिम उठाने पर तुले हैं। बस उनकी एक ही जिद हैöघर पहुंचना है चाहे कैसे भी पहुंचे।

Tuesday, 12 May 2020

2446 जमातियों के घर जाने का रास्ता साफ

क्वारंटीन की अवधि पूरी करने के बाद निजामुद्दीन तबलीगी मरकज से निकले लोगों का घर जाने का रास्ता साफ हो गया है। दिल्ली सरकार ने निजामुद्दीन मरकज से क्वारंटाइन केंद्रों में भेजे गए 2446 लोगों को उनके गृह राज्य भेजेगी। शनिवार देर शाम इस बाबत दिल्ली सरकार की ओर से आदेश जारी कर दिए गए हैं। वहीं अस्पतालों में पूरी तरह ठीक हो चुके लोग भी घर जाएंगे। हालांकि नियम तोड़ने की एवज में जिन लोगों पर मामले दर्ज हैं, उन्हें दिल्ली पुलिस अपने साथ ले जाएगी। दिल्ली के रहने वाले जमातियों को छोड़ने से पहले प्रशासन उनके पास भी बनवा कर देगी। इनमें से करीब एक हजार लोग कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए थे, जिन्हें विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराया गया, जबकि बाकी को नरेला के क्वारंटीन सेंटर में भेज दिया गया है। इनमें करीब 900 लोग दिल्ली के हैं और बाकी अन्य राज्यों के हैं। दिल्ली सरकार दूसरे राज्यों से बात कर ठीक हुए लोगों को उनके घर भेजने की बात कर रही है। क्वारंटीन अवधि में कुछ जमातियों ने नियमों को तोड़कर अव्यवस्था फैलाई थी। पुलिस ने इन पर मामला दर्ज किया था। ऐसे लोगों को घर न भेजकर दिल्ली पुलिस के हवाले कर देगी। पुलिस आगे की कार्रवाई करेगी। निजामुद्दीन से निकले 576 विदेशी जमातियों को दिल्ली पुलिस की हिरासत में रखा जाएगा। इन सभी की रिहाई और वतन वापसी के लिए गृह मंत्रालय की ओर से आदेश जारी किया जाएगा। इसके अतिरिक्त उन सभी जमातियों को भी नहीं छोड़ा जाएगा, जिन्हें पुलिस जांच के लिए रोकेगी।

-अनिल नरेन्द्र

अब तो कब्रिस्तान में दफन करने के लिए जगह नहीं बची

राजधानी दिल्ली में कोरोना से होने वाली मौत और दिल्ली सरकार की रिपोर्ट अलग-अलग तस्वीर क्यों बयां कर रही है? सरकार के हैल्थ बुलेटिन के मुताबिक शुक्रवार तक दिल्ली में 68 लोगों की कोरोना से मौत हुई, वहीं अकेले आईटीओ कब्रिस्तान में ही 86 डेड बॉडी कोरोना के तहत दफन की जा चुकी हैं। ऐसे में दिल्ली सरकार के हैल्थ बुलेटिन पर सवाल खड़े होने लाजिमी हैं। कोरोना से मरने वालों में हिन्दू भी होंगे और कब्रिस्तान में तो सिर्प मुस्लिम लोगों को ही दफनाया जाता है। आईटीओ कब्रिस्तान की स्थिति यह हो गई है कि यहां अब डेड बॉडीज दफन करने के लिए जगह बहुत कम बची है। इस कब्रिस्तान के प्रबंधकों का कहना है कि सरकार दूसरे कब्रिस्तानों में डेड बॉडी दफन करने का इंतजाम करे। कब्रिस्तान की प्रबंधक कमेटी के सचिव हाजी फैयाजुद्दीन का कहना है कि कब्रिस्तान 1924 से है, जोकि 50 एकड़ जमीन पर है। यहां की कुछ जगह कोरोना से मरने वालों के लिए रखी गई है। अब तक कोरोना से संबंधित 86 डेड बॉडी दफन की जा चुकी हैं। इनमें से छह शुक्रवार को दफन की गई हैं। यह डेड बॉडी लोकनायक और सफदरजंग अस्पताल से आई हैं। सभी डेड बॉडी कोरोना प्रोटोकॉल के हिसाब से दफन की जा रही हैं। हमारे पास सबके कागजात हैं। फैयाजुद्दीन ने कहा कि अगर ऐसे ही कोरोना से संबंधित डेड बॉडी आती रहीं तो आने वाले 10-12 दिन में जगह पूरी हो जाएगी। सरकार अब अन्य कब्रिस्तानों में डेड बॉडी के दफनाने का इंतजाम करे क्योंकि यहां अब जगह नहीं बची है। उन्होंने कहा कि 14 एकड़ जमीन उनके मिलेनियम पार्प स्थित कब्रिस्तान में थी। दिल्ली स्वास्थ्य विभाग के एक शीर्ष अधिकारी (निदेशक) का कहना है कि अगर कोई मरीज संदिग्ध होता है और उसकी मौत हो जाती है तो उसका शव प्रबंधन ठीक वैसा ही किया जाता है जैसा कि कोविड-19 पॉजिटिव के लिए किया जा रहा है। मोहम्मद शमीम (सुपरवाइजर) ने बताया कि आईसीयू में भर्ती कई मरीजों के परिजन अब तक कब्रिस्तान आ चुके हैं। ऐसे ही एक केस के बारे में उन्होंने बताया कि सरिता विहार में एक बड़ा प्राइवेट अस्पताल है, जहां 32 वर्षीय महिला का लीवर प्रत्यारोपण होना था, लेकिन कोरोना के चलते उसकी हालत बिगड़ गई। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। महिला वेंटिलेटर पर थी। बुकिंग कराने के लिए परिजन यहां पहले आए थे, लेकिन कब्रिस्तान एडवांस बुकिंग नहीं करता है। कोरोना के चलते परिजनों को दूर रखा जा रहा है। ऐसे में शवों को दफनाने के लिए एक जेसीबी कब्रिस्तान में है, जो प्रति शव छह हजार रुपए शुल्क लेती है। मिट्टी डालने के छह हजार रुपए। कब्रिस्तान प्रबंधन से इसका कोई लेना-देना नहीं है।

एक और कोरोना वॉरियर लड़ते-लड़ते शहीद हो गया

सारा शहर उस समय सदमे में आ गया जब खबर आई कि जांबाज युवा दिल्ली पुलिस कांस्टेबल अमित कुमार कोरोना का शिकार हो गया। कोरोना संक्रमित दिल्ली पुलिस के इस जांबाज सिपाही अमित की मौत हो जाने से उनके सोनीपत स्थित गांव में मातम छा गया। गांव में उनकी पत्नी पूजा व तीन साल के उनके बेटे रेयान का रो-रोकर बुरा हाल है। उनके साले रवि ने बताया कि अमित की मौत हो जाने की खबर बहन को दो दिन बाद यानि बुधवार शाम को दी गई। पूजा और अमित की शादी चार वर्ष पहले हुई थी। पूजा दिल्ली में संविदा पर शिक्षक है। लॉकडाउन के चलते वह अभी गांव में थी। रवि ने बताया कि अमित बेहद अच्छे इंसान थे। वह सबको अपना दोस्त मानते थे। अमित ने रविवार को पूरे परिवार से बात की थी और कहा था कि मैं पूरी तरह से स्वस्थ हूं। अमित ने कुछ दिन पहले ही अपने तीन वर्षीय बेटे रेयान का स्कूल में एडमिशन कराया था। वह चाहते थे कि उनका बेटा बड़ा अधिकारी बने। सोमवार को तबीयत खराब होने के बाद अमित ने घर पर पत्नी को बताया तो उन्होंने कोरोना की जांच करा लेने की बात कही। हालांकि परिवार के किसी सदस्य को यह उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी कोरोना उनकी जान ले लेगी। सिपाही अमित के रिश्तेदार रवि व दोस्तों ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। रवि का कहना है कि यदि समय रहते उन्हें अस्पताल में भर्ती कर लिया जाता तो शायद वह आज जिन्दा होते। उनके साथी नवीन ने उनका इलाज करवाने के लिए 10 से अधिक अस्पतालों में चक्कर लगाए, लेकिन किसी ने भर्ती नहीं किया। नवीन ने जब किसी पुलिस अधिकारी को फोन किया तो उन्होंने आरएमएल में भर्ती कराने की बात कही। लेकिन इससे पहले ही उनकी मौत हो गई। इस बात की जांच होनी चाहिए कि क्या वाकई ही अमित का समय रहते इलाज नहीं हो सका? उनकी मौत का जिम्मेदार कौन है? अमित की मौत के बाद दिल्ली पुलिस कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव ने बड़े स्तर पर जवानों की सुरक्षा के लिए बदलाव किए हैं। ताकि इस महामारी के दौरान सड़कों पर मोर्चा संभाले दिल्ली पुलिस के किसी भी योद्धा के साथ ऐसा न हो। सीपी ने कहा कि अगर किसी पुलिसकर्मी को ऐसा लगता है कि उनकी तबीयत बिगड़ रही है तो वह तुरन्त अपने एसएचओ, सीपी या यूनिट में सूचित करेंगे। डीसीपी को जानकारी देंगे। डीसीपी को भी ऐसे मामलों की जानकारी नोडल ऑफिसर को देनी होगी। अगर किसी पुलिसकर्मी को ऐसा लगता है कि उसमें कोरोना के लक्षण हो सकते हैं तो उसके लिए सेंट्रल दिल्ली में एक पूरा होटल रिजर्व किया गया है। जहां पर जाकर पुलिसकर्मी खुद को क्वारंटीन कर सकते हैं। जांच के लिए हैदरपुर में दिल्ली सरकार के सहयोग से एक टेस्टिंग सेंटर भी खोला गया है। यह अच्छी बात है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने अमित के परिवार को एक करोड़ रुपए की सम्मान राशि देने का ऐलान किया है। हम अमित जांबाज को सलाम करते हैं। जय हिन्द।

Sunday, 10 May 2020

ई-रिक्शा चालकों को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं हो रही

कलंदर कॉलोनी में रहने वाले राम प्रसाद ई-रिक्शा चलाते हैं। बताते हैं कि लॉकडाउन में घर चलाना भी मुश्किल हो रहा है। वह बताते हैं कि जब मेट्रो चलती थी तो दिलशाद गार्डन मेट्रो स्टेशन से और झिलमिल से सवारी लेता था और जीटीबी, सीमापुरी, शालीमार गार्डन पहुंचाता था। ई-रिक्शा खरीदने के लिए परिचितों से उधार लिया हूं लेकिन अब घर का खर्च चलाना भी मुश्किल हो रहा है। लॉकडाउन में एक माह से अधिक समय से काम बंद होने के कारण ई-रिक्शा चालकों को अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर पाना भी मुश्किल हो रहा है। जो जमापूंजी थी वह खत्म होने के बाद हाल में उधारी पर गुजारा कर रहे थे, लेकिन अब उधारी भी काफी चढ़ गई है। तुगलकाबाद इलाके में रहने वाले ई-रिक्शा चालक हेमंत कुमार लॉकडाउन की वजह से पिछले एक महीने से परेशान हैं। कहते हैं कि अब तो ई-रिक्शा भी चलाने से पहले ठीक कराने के लिए पैसे चाहिए। सरकार से आर्थिक मदद की उम्मीद लगाकर बैठे हेमंत बताते हैं कि 12 घंटे ई-रिक्शा चलाने पर औसतन 400-500 रुपए की बचत हो जाती थी। लेकिन मार्च महीने की 24 तारीख से काम-धंधा ठप पड़ा है। ई-रिक्शा न चलाने की वजह से उसकी बैटरी व अन्य सामान खराब होने का डर सता रहा है। पहले से ही नई बैटरी की किस्त जमा कर रहा हूं। यह बैटरी खराब हो गई तो 30 हजार का बोझ बढ़ जाएगा। हेमंत ने कहा कि तीन दिन से राशन के लिए चक्कर लगा रहा हूं लेकिन वह भी नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में अब कुछ समझ नहीं आ रहा कि आखिर क्या किया जाए? चार सदस्यों वाला मेरा परिवार है, जिसका भरण-पोषण रिक्शा चलाकर ही हो रहा था। ई-रिक्शा काफी दिनों से यूं ही खड़ा है। आय का कोई अन्य जरिया भी नहीं है। दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है कि करूं तो क्या करूं? -रिक्शा चालकों की हालत खराब है। सरकार को इनकी ओर ध्यान देना चाहिए। रोज कमाना-रोज खाना वालों की लॉकडाउन में समस्या गंभीर है।

-अनिल नरेन्द्र