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Thursday, 11 December 2014

केजरीवाल के खिलाफ आम आदमी पाटी में बगावत

चुनावों में हर पाटी में बागियों की फौज परेशानी का सबब बनती है। यह सभी पार्टियों में होता है पर आम आदमी पाटी के अरविन्द केजरीवाल एंड कंपनी के लिए यह खासी सिरदर्द बनी हुई है। केजरीवाल के लिए इससे निपटने की चुनौती है। उम्मीदवारों की दूसरी सूची में जिन पूर्व विधायकों के नाम नहीं है उनका नाम भी कटना लगभग तय माना जा रहा है। ऐसे में बागियों की फौज में कुछ और लोग भी शामिल हो सकते हैं। गौरतलब है कि आप पाटी से त्यागपत्र देकर शाजिया इल्मी भाजपा के साथ खड़ी हैं। आप में शाजिया एकमात्र मुस्लिम महिला चेहरा थीं। शाजिया के जाने के बाद आप पाटी में कोई मुस्लिम जानाöपहचाना चेहरा नहीं है। इसके बाद आप के संस्थापक सदस्य अश्वनी उपाध्याय भी भाजपा में शामिल हो चुके हैं। अश्वनी को भाजपा ने पवक्ता बनाकर केजरीवाल के खिलाफ तलवार भांजने की खुली छूट दे दी है। जंगपुरा से आप के पूर्व विधायक व विधानसभा अध्यक्ष एमएस धीर भी भाजपा में लौट चुके हैं। धीर ने भी केजरीवाल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अम्बेडकर नगर से आप के पूर्व विधायक अशोक चौहान भी भाजपा में शामिल हो चुके हैं। अशोक चौहान वाल्मीकि समाज से आते हैं। दूसरी ओर आप से जुड़े करण सिंह ने आवाम का गठन कर केजरीवाल के खिलाफ करीब एक महीने तक जंतर-मंतर पर मौन व्रत रखा। करण सिंह सैकड़ों पुराने आप कार्यकर्ताओं के साथ केजरीवाल के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। आप से टूट कर आम आदमी सेना का गठन करने वाले पभात कुमार भी लगातार केजरीवाल पर गंभीर आरोप लगाते हुए हमला कर रहे हैं। इसके अलावा पाटी से निष्कासित लक्ष्मी नगर के पूर्व विधायक विनोद कुमार बिन्नी ने तो केजरीवाल के खिलाफ नई दिल्ली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान कर मोर्चा खोल दिया है। हालांकि पटेल नगर से टिकट कटने के बाद अभी वीना आनंद ने केजरीवाल के खिलाफ मुंह नहीं खोला है। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक जिन पूर्व विधायकों का नाम उम्मीदवारों की दूसरी सूची में शामिल नहीं किया गया है उनका टिकट कटना लगभय तय है। बहरहाल टिकट कटने पर कुछ और पूर्व विधायक भी भाजपा में शामिल हो सकते हैं। यदि वे भाजपा में शामिल नहीं भी होते हैं तो केजरीवाल के खिलाफ दुष्पचार तो जरूर करेंगे। जिसका फायदा सीधा भाजपा को मिलेगा। आप पाटी सूत्रों का दावा है कि जिन पूर्व विधायकों के टिकट केजरीवाल काट रहे हैं उनके खिलाफ उनके पास पर्याप्त सुबूत व सामग्री है जिसका इस्तेमाल वह उस समय करेंगे जब यह पूर्व विधायक केजरीवाल पर हमला करेंगे। केजरीवाल एंड कंपनी पाटी की इस बगावत से ज्यादा चिंता नजर नहीं आती। उनका कहना है कि पाटी और केजरीवाल की लोकपियता में कोई कमी नहीं आई और इन बागियों की फौज से उन्हें कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। बागियों की यह सूची और लम्बी होगी जब बाकी टिकटों का ऐलान होगा। चुनाव अभी दूर है, देखें कि मतदान की तिथि घोषित होने पर क्या स्थिति बनती है। लड़ाई भाजपा बनाम आप पाटी की होगी। कांग्रेस कहीं भी अभी तक पिक्चर में नहीं है।

-अनिल नरेन्द्र

अब टीम इंडिया में बदलेगा 65 साल का योजना आयोग

कांग्रेस शासित राज्यों के रस्मी विरोध के बावजूद नरेन्द्र मोदी सरकार ने योजना आयोग का स्वरूप बदलने की दिशा में कदम उठा लिया है। योजना आयोग अपनी उम्र का 65वां साल शायद न पार कर सके। पहले मुख्यमंत्रियों की बैठक में फिर संवाददाता सम्मेलन में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आयोग की अपासंगिकता को जिस तरह रेखांकित किया है उससे शायद ही कोई असहमत हो। दीर्घावधि विकास के लिए योजना बनाने के लिए और राज्यों व केंद्र के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने के लिए पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जिस संस्था का गठन किया था, उसने शुरुआती कुछ दशकों तक बेशक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, पर यूपीए सरकार के पिछले दस साल में उसे केंद्र की एक एजेंसी के रूप में काम करते हुए ही ज्यादा देखा गया जहां केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों से भेदभाव करना शुरू कर दिया था। राज्यों का पैसा राज्यों के विकास के लिए देते हुए भी वह ऐसा जताता था, मानो कोई एहसान कर रहा हो। पधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की योजना आयोग को टीम इंडिया की शक्ल में बदलने की कवायद का लगभग सभी मुख्यमंत्रियों ने स्वागत किया। मुख्यमंत्रियों की आम राय थी कि योजना आयोग को ऐसी संस्था का रूप दिया जाए जिसमें राज्यों की उचित भागीदारी हो और उनकी जरूरतें संस्था के फैसलों में झलके। वर्तमान योजना आयोग के स्वरूप की योजना हमने पचास के दशक में तत्कालीन सोवियत संघ में पचलित पथा से ली थी जो दिल्ली के निर्देश और नियंत्रण व्यवस्था पर आधारित थी। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी जो दो खामियां थी, उनमें राज्यों को अपना पक्ष रखने की गुंजाइश और उनकी खास जरूरतों पर फोकस रखने की गुजांइश अत्यंत सीमित थी। नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण के दौर के बाद देश की बदलती जरूरतों से कदम ताल करने में योजना आयोग लगातार फिसलता दिख रहा था। दस वर्षें तक इस आयोग के अध्यक्ष रह चुके पूर्व पधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी राय दी थी कि बाजार पर निर्भर आज की उदार और खुली अर्थव्यवस्था के साथ सामंजस्य बैठाने के लिए योजना आयोग को भी अपनी सोच और कार्यशैली में बड़े बदलावों की जरूरत है। हाल के दशकों में गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, हरियाणा या कुछ और राज्यों ने अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिक विकास किया है तो वह केंद्रीकृत सोच और योजना आयोग के कारण नहीं बल्कि उन राज्य सरकारों की कोशिशों के बूते पर संभव हुआ है। चूंकि मुख्यमंत्री रहते हुए खुद नरेन्द्र मोदी ने योजना आयोग के पक्षपाती रुख को नजदीक से महसूस किया था, लिहाजा इसके मौजूदा स्वरूप में बदलाव लाने की उनकी पतिबद्धता जायज हो सकती है। योजना आयोग की जगह नई संस्था में राज्यों की भागीदारी ज्यादा होगी। केंद्र के साथ राज्यों की सरकारों को भी योजना बनाने में हिस्सेदारी का मौका मिलेगा। वित्तीय मामलों में भी राज्यों की सोच व जरूरतों का ख्याल रखा जाएगा। नए निकाय का ढांचा ऐसा होगा जिसमें केंद्र, राज्य व आयोग एक टीम के रूप में काम करेंगे। कोई भी बदलाव बेहतर परिणाम लाने के लिए होना चाहिए, किसी को कमतर बताने के लिए नहीं। योजना आयोग की जगह कोई भी संस्था बने, वह भविष्य में आंख मूंदकर सफल नहीं हो पाएगी।

Wednesday, 10 December 2014

श्रमिक हड़ताल से पीएम मोदी के मेक इन इंडिया को धक्का लगेगा

जिस तरह से विभिन्न क्षेत्रों के श्रमिक हड़ताल पर उतारू हैं उससे जहां देश के उत्पादन पर असर पड़ता है वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया अभियान को भी धक्का लग सकता है। पिछले दिनों बैंकों की हड़ताल ने पूरी आर्थिक व्यवस्था को धक्का लगा दिया था। अब अगर लाखों श्रमिक हड़ताल की योजना बना रहे हैं तब नई चीजों का निर्माण और अधिक उत्पादन की कल्पना को क्षति पहुंच सकती है। कोयला, बंदरगाह, रक्षा उत्पादन इकाइयों और रेल में काम करने वाले श्रमिक 11 दिसम्बर को बड़ी हड़ताल की तैयारी कर रहे हैं। बैंक में दो दिसम्बर से पांच दिसम्बर तक अलग-अलग शहरों में हड़ताल रही। इससे पूर्व हड़ताल टालने के प्रयास किए गए लेकिन नाकाफी रहे। अब दूसरे क्षेत्रों के श्रमिक एफडीआई, विनिवेश और सरकार की श्रमिक विरोधी नीतियों के खिलाफ हड़ताल करना चाहते हैं। इस बार की हड़ताल बड़ी हो सकती है क्योंकि सभी राजनीतिक दलों के मजदूर संगठन एक साथ हैं। इसके बड़े रहने की यह वजह हो सकती है क्योंकि इसमें कई क्षेत्रों के श्रमिक शामिल हो सकते हैं। कोयला श्रमिक के संगठनों ने दिल्ली में दूसरे संगठनों को कहा है कि वे कोयला का उत्पादन ठप करने पर विचार कर रहे हैं, वहीं बंदरगाह पर काम करने वाले 46,000 श्रमिकों के संगठन कह रहे हैं कि वे माल का लदान और उसका उतारना बंद कर सकते हैं। रक्षा उत्पादन इकाइयों के संगठन भी हड़ताल की तैयारी कर रहे हैं। दूसरे श्रमिक संगठन भी उनके साथ हैं। डाक विभाग के कर्मचारियों ने भी इसी तरह के सहयोग का वादा किया है। हड़ताल को लेकर दिल्ली में लगातार बैठकें हो रही हैं। 11 दिसम्बर को हड़ताल की तारीख तय करने के लिए सारे मजदूर फैडरेशन की बड़ी बैठक दिल्ली में रखी गई। नए श्रम और रोजगार मंत्री बंडारू दत्तात्रेय की मजदूर संगठनों के साथ पहले दौर की बातचीत फेल हो गई है। उन्होंने तो मंत्री के इस आग्रह को भी ठुकरा दिया है कि मोदी सरकार के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन नहीं किया जाए। इंटक के अध्यक्ष संजीवा रेड्डी कहते हैं कि सरकार के श्रमिक विरोधी चेहरे को जनता के बीच मिलकर उजागर किया जाएगा। एटक के नेता गुरुदास दास गुप्ता और सीटू के नेता तपन सेन का कहना है कि सड़क पर नहीं संसद में भी श्रमिकों की आवाज बुलंद की जाएगी। कोयला श्रमिकों का विषय पिछले दिनों माकपा सांसद तपन सेन ने राज्यसभा में भी उठाया था, वहीं एचएमएस के महासचिव एमएस सिद्धू ने कहा कि रेल कर्मचारी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की तैयारी कर रहे हैं और कोयला, बंदरगाह, रक्षा उत्पादन इकाइयों और डाक समेत कई क्षेत्रों के श्रमिक संगठन साथ हैं इसलिए इस बार की हड़ताल अब तक सबसे बड़ी होगी। उम्मीद की जाती है कि समय रहते मोदी सरकार हड़ताल को टालने और श्रमिक संगठनों की जायज मांगों पर गम्भीरता से विचार करेगी। हड़तालों से चौतरफा नुकसान होता है, फायदा किसी को नहीं होता।

-अनिल नरेन्द्र

लोक अदालतों ने विश्व रिकार्ड बनाया ः एक दिन में निपटाए सवा करोड़ केस

देशभर की तमाम अदालतों में शनिवार को आयोजित दूसरी राष्ट्रीय लोक अदालत ने एक ही दिन में 1.25 करोड़ से ज्यादा केस निपटाकर विश्व कीर्तिमान स्थापित कर लिया। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के मुताबिक इस मुहिम में एक ही दिन में देश में लंबित मामलों में नौ फीसदी की गिरावट आई है। इसके अलावा लोक अदालत ने वाहन दुर्घटना मामलों में 3000 करोड़ रुपए के दावों को भी निपटाया। पिछले साल शुरू हुई राष्ट्रीय लोक अदालत में देशभर के 71.50 लाख केसों का निपटारा किया गया था। नालसा के मुताबिक एक दिन में इतने अधिक मामलों का निपटारा आज तक किसी भी देश में नहीं हुआ। जिन मामलों में सबसे अधिक निपटारा हुआ उनमें बैंक रिकवरी, वाहन दुर्घटना दावा, चेक बाउंस और पारिवारिक मामले आदि प्रमुख हैं। लोक अदालत में उन मामलों को लिया गया जो या तो लंबित थे या मुकदमा दाखिल करने की पहले की स्थिति में थे। लोक अदालत के जरिये सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखे गए 53 मामलों में से 28 का निपटारा हुआ। शनिवार सुबह सुप्रीम कोर्ट परिसर में दूसरी लोक अदालत की शुरुआत न्यायमूर्ति एआर दवे ने की। इस अवसर पर जस्टिस दवे ने आग्रह किया कि लोग अपने अभिमान को छोड़कर बड़ा दिल दिखाते हुए मामले का निपटारा करें। राजधानी दिल्ली में लोक अदालत ने लंबित 62 हजार मुकदमों का निपटारा किया। आपसी बातचीत के जरिये लोक अदालत में पक्षकारों को करीब 65 करोड़ रुपए की समझौता राशि भी प्रदान की गई। इन मुकदमों में दीवानी, चेक बाउंस, बिजली, यातायात, सड़क दुर्घटना, छोटे आपराधिक व वैवाहिक मामले शामिल हैं। दिल्ली हाई कोर्ट, जिला अदालतों पटियाला हाउस, तीस हजारी, कड़कड़डूमा, रोहिणी, साकेत एवं द्वारका में लगभग 90 हजार मामलों की सुनवाई हुई। इनमें से 61 हजार 951 मुकदमों का निपटारा आपसी बातचीत और समझौता राशि के आदान-प्रदान से हो गया। जिन मामलों में दोनों पक्षकारों में सहमति नहीं हो पाई उन्हें वापस संबंधित अदालतों में सुनवाई के लिए भेज दिया गया। शनिवार को विभिन्न अदालतों में 201 जज बैठे। 26 करोड़ 53 लाख रुपए की समझौता राशि दी गई दीवानी, दुर्घटना मामलों में। सुप्रीम कोर्ट की इस पहल का हम स्वागत करते हैं। देश में करोड़ों केस लंबित पड़े हैं। डेट पर डेट दी जाती है। इनमें से अधिकतर केस छोटे-मोटे अपराध, पारिवारिक झगड़े, चोरी चकारी के होते हैं जिनका निपटारा एक-दो पेशी में हो सकता है। दिल्ली की तिहाड़ जेल में हजारों की तादाद में  लोग बंद हैं जो या तो डौरी केस या मोबाइल चोरी या अन्य छोटे-मोटे अपराधों में लिप्त थे। इनकी जेल के अंदर कभी-कभी इतनी लम्बी स्टे हो जाती है जितनी सजा में नहीं होती। अंदर लम्बे वक्त तक रहने से हार्ड कोर क्रिमिनलों के सम्पर्प में आते हैं और सुधार होने की जगह शातिर अपराधी बनकर निकलते हैं। सुप्रीम कोर्ट को इस पर अविलम्ब ध्यान देना होगा।

Tuesday, 9 December 2014

भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी में कमी आई है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान देशवासियों से यह वादा किया था कि अगर वह सत्ता में आते हैं तो देश में भ्रष्टाचार और सरकार में पारदर्शिता पर उनका सबसे ज्यादा ध्यान होगा। यह संतोष की बात है कि उनके सत्ता में आने के बाद से इन दोनों मुद्दों पर सरकार अभी तक खरी उतरी है। देश में भ्रष्टाचार कम हुआ है। भ्रष्टाचार के स्तर का आंकलन करने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया (टीआईआई) के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में भारत की रैकिंग से सुधार दर्ज किया गया है। इसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी क्षेत्र में रिश्वतखोरी में कमी आई है। रिपोर्ट के मुताबिक सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार घटा है। भ्रष्टाचार धारण इंडेक्स में भारत के पायदान में सुधार मुख्य रूप से दो स्रोतोंöवर्ल्ड इकनामिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) और वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट (डब्ल्यूजेपी) की सूची पर आधारित रहा। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के कामकाज को लेकर भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की धारणा में सुधार हुआ है, साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र में कामकाज में भी पारदर्शिता आई है। दुनिया के सबसे कम भ्रष्ट देश हैं ः डेनमार्प, न्यूजीलैंड, फिनलैंड, स्वीडन, नार्वे, स्विटजरलैंड, सिंगापुर, नीदरलैंड, लक्समबर्ग और कनाडा। सबसे कम भ्रष्ट देश डेनमार्प ने अपने यहां रिश्वतखोरी रोकने के लिए कई कड़े नियम बनाए हैं। इस साल नवम्बर में वहां पब्लिक रजिस्टर सिस्टम की शुरुआत की गई है। इसके तहत कर कंपनी से लाभान्वित होने वाले लोगों की सूची सार्वजनिक की जाती है। भ्रष्टाचार की कोई सीमा नहीं होती। एक अध्ययन के मुताबिक अमीर और गरीब देशों के कार्यरत बहुराष्ट्रीय कंपनियां आर्थिक विकास के हर स्तर पर रिश्वत देने में आगे रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी भारत में नौकरशाही निक्रियता खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना की है। इससे कुछ दिन पहले ही उन्होंने मोदी को मैन ऑफ एक्शन कहा था। बहरहाल ओबामा ने कहा कि यह एक दीर्घावधि परियोजना है और हर कोई देखेगा कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी कोशिशों में कैसे सफल होते हैं। ओबामा ने एक कारोबारी गोलमेज बैठक को संबोधित करते हुए कहा ः मोदी ने भारत के भीतर नौकरशाही को खत्म करने की अपनी इच्छाशक्ति से मुझे प्रभावित किया है। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि हमारा सबसे मजबूत पड़ोसी और प्रतिद्वंद्वी चीन पिछले साल के मुकाबले 20 पायदान नीचे खिसककर 100वें स्थान पर पहुंच गया है। हालांकि हालत में सुधार का श्रेय सिर्प सरकार को नहीं बल्कि न्यायपालिका सहित अन्य संवैधानिक संस्थानों के साथ-साथ मीडिया को भी दिया जाना चाहिए। सुधार की प्रक्रिया जारी रखने के लिए जरूरी है कि भ्रष्टाचार उन्मूलन से संबंधित समस्त विधेयकों और प्रतिक्रियाओं को समयबद्ध ढंग से अमल में लाया जाए। हालांकि भ्रष्टाचार पर निर्णायक वार तभी हो सकता है जब हमारी राजनीति वित्तीय मामलों में भी पारदर्शिता ला सकेगी। कुल मिलाकर यह अच्छी खबर है कि भ्रष्टाचार में कमी आई है।

-अनिल नरेन्द्र

ओबामा की भारत यात्रा से पहले तेज हुए आतंकी हमले

कश्मीर में शुक्रवार को हुए सनसनीखेज आतंकी हमलों से देश अब फुल अलर्ट में है। खुफिया एजेंसियों की मानें तो अब राजधानी दिल्ली पर बड़े आतंकी हमले का खतरा मंडरा रहा है। जम्मू-कश्मीर में दो चरणों में हुए भारी मतदान से आतंकी बौखला गए हैं। वे जहां-तहां हमले कर लोगों को हतोत्साहित करने में जुट गए हैं। इसके साथ ही उनकी कोशिश है कि आम लोगों को इतना भयभीत कर दिया जाए ताकि वे मतदान केंद्रों पर पहुंचने में हिचकें। अगले चरण का मतदान 9 दिसम्बर को है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कश्मीर पहुंचे थल सेनाध्यक्ष जनरल दलबीर सिंह सुहाग से कहा कि बहादुर सैनिकों के बलिदान व्यर्थ नहीं जाएंगे। सैन्य अधिकारियों के साथ बैठक में उन्होंने साफ कहाöघुसपैठियों को किसी भी हालत में सीमा पार न करने दें, उन्हें नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर ही मार गिराया जाए। वादी में अमन और लोकतंत्र के माहौल को बिगाड़ने की हर संभव साजिश को पूरी ताकत से नाकाम किया जाए। उड़ी में शुक्रवार को मारे गए आतंकियों के पास बरामद सामान की पड़ताल से पता चला कि साजिश में पाकिस्तान निर्मित सामान का इस्तेमाल किया गया है। भारत के पास इस बात के पक्के सबूत हैं। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिद्दीन चाहते हैं कि घाटी के साथ ही देश के अन्य हिस्सों में आतंकी घटनाएं बढ़ें। कश्मीर के बाद इनका सबसे बड़ा टारगेट भारत की राजधानी दिल्ली है। खुफिया एजेंसियों की मानें तो दिल्ली पर बड़े आतंकी हमले का खतरा मंडरा रहा है। खतरा कितना बड़ा है इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है नार्थ डिस्ट्रिक्ट ने इस खतरे से निपटने के लिए अब तक सबसे बड़े सुरक्षा इंतजामों के तहत `हिट टीम' को उतार दिया है। एके-47 और एमपी5 जैसे अत्याधुनिक हथियारों से लैस यह टीम का एक्शन मिनट में नहीं बल्कि सैकेंडों में होगा। आतंकी हमला होने पर इनके पास सीधे गोली मारने के आदेश हैं। जम्मू-कश्मीर में शुक्रवार को हुए हमलों को देखते हुए इसे बेहद गंभीरता से इसलिए भी लिया जा रहा है क्योंकि गणतंत्र दिवस पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा आ रहे हैं। आतंकियों और उनके सरगनाओं की ओबामा की भारत यात्रा से पहले दिल्ली को दहलाने की योजना है। खुफिया विभागों ने आशंका जाहिर की है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा से पहले आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा दिल्ली में मुंबई (26/11) जैसी घटना को अंजाम दे सकता है, जिससे ओबामा को भारत आने से रोका जा सके। हमारी सुरक्षा एजेंसियों, खुफिया एजेंसियों को अगले कुछ दिनों तक फुल अलर्ट पर रहना होगा। एलओसी, कश्मीर घाटी और नई दिल्ली तीनों स्थानों पर हमले हो सकते हैं। चिंता का विषय यह भी है कि हाल के दिनों में स्थानीय लोग आतंकवाद से जुड़ रहे हैं। एक तथ्य यह भी है कि शुक्रवार को ताबड़तोड़ हमलों में जम्मू-कश्मीर में पिछले सात-आठ सालों में एक भी हमले में और वह भी एक ही दिन में इतने सुरक्षाकर्मियों की मौत नहीं हुई थी। पाकिस्तान घुसपैठ कराने पर तुला हुआ है। भारत द्वारा इसे कड़ा जवाब अब देना जरूरी है। प्रधानमंत्री ने थल सेनाध्यक्ष जनरल सुहाग को हर प्रकार की जवाबी कार्रवाई करने के लिए हरी झंडी दे दी है।

Sunday, 7 December 2014

मोदी का मिशन पूर्वोत्तर ः भगवा क्रांति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आजकल पूर्वोत्तर राज्यों में अपना सारा ध्यान लगा रहे हैं। नरेंद्र मोदी की इच्छा देश के पूर्वोत्तर राज्यों में भगवा क्रांति लाने की है। सोमवार को एक सार्वजनिक सभा में जब उन्होंने अपनी इस मंशा का खुलासा त्रिपुरा के वामपंथी मुख्यमंत्री माणिक सरकार के सामने किया तो एकबारगी सन्नाटा फैल गया। लेकिन मोदी ने तुरन्त साफ किया कि भगवा क्रांति से उनका आशय ऊर्जा क्रांति से है। पूर्वोत्तर राज्यों में ऊर्जा का अपार भंडार है और केंद्र सरकार यहां के राज्यों के साथ मिलकर इस क्षेत्र को भारत का प्रमुख ऊर्जा हब बनाने को तैयार है। ओएनजीसी की गैस आधारित त्रिपुरा पॉवर कंपनी की दूसरी इकाई का उद्घाटन करने के अवसर पर मोदी अपने पूरे रंग में थे। वे पिछले तीन दिनों तक पूर्वोत्तर राज्यों में ही रहे। यह शायद पहला मौका है जब देश के प्रधानमंत्री लगातार तीन दिनों तक पूर्वोत्तर राज्यों में रहे। कुछ लोग इसे भारतीय जनता पार्टी की इस हिस्से में पैर जमाने की कोशिश के तौर पर भी देख रहे हैं। असम, मेघालय और नागालैंड के बाद अगरतला में जिस तरह की भीड़ उमड़ी उसे देखकर मोदी के भगवा क्रांति के आह्वान का दूसरा ही मतलब निकाला जा रहा है। लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी भाजपा के शीर्ष नेताओं के साथ यहां आ चुके थे और लोगों से जुड़ी महत्वपूर्ण समस्याओं को सुलझाने के लिए कई घोषणाएं भी उन्होंने की थीं। इससे क्षेत्र के लोग खासे उत्साहित हुए जिसका नतीजा पूर्वोत्तर में भाजपा के अभूतपूर्व प्रदर्शन के रूप में दिखा। असम में कुल 14 लोकसभा सीटों में से आधी यानि सात सीटें भाजपा को मिलीं। भाजपा की इस जीत की वजह यूपीए सरकार के खिलाफ लोगों की नाराजगी तो थी ही, बांग्लादेशी घुसपैठ और अरुणाचल प्रदेश में बन रही जल विद्युत परियोजना जैसे मुद्दों पर राज्य की कांग्रेस सरकार की नाकामी भी एक बड़ी वजह थी। मोदी ने पूर्वोत्तर राज्यों के लिए एक्ट ईस्ट का नया नारा भी दिया। पूर्वोत्तर राज्यों को जापान की मदद से औद्योगिक कारिडोर बनाया जाएगा, जो बांग्लादेश से लेकर म्यांमार तक फैला होगा। इस बारे में मोदी की जापान यात्रा के दौरान समझौता भी हुआ था। मोदी ने पूर्वोत्तर राज्यों को विकास के लिए भारतीय ध्वज में प्रयुक्त चार रंगों के आधार पर चार तरह की क्रांति करने की सलाह दी। इसमें हरा रंग कृषि क्रांति का द्योतक है, सफेद रंग से प्रेरणा लेकर दुग्ध क्रांति शुरू की जा सकती है। इसी तरह मोदी ने भगवा रंग को ऊर्जा क्रांति और अशोक चक्र में इस्तेमाल नीले रंग को जल क्रांति से जोड़ा। राज्य सरकार ने केंद्र से क्षेत्र में रेल नेटवर्प बनाने, बांग्लादेश से चटगांव बंदरगाह से राज्य को जोड़ने समेत कई ढांचागत परियोजनाओं की मांग भी की। बहरहाल अवैध घुसपैठ, भूमि हस्तांतरण समझौता, मूल निवासियों के हितों की रक्षा जैसे भावनात्मक मुद्दे हैं जिसे नजरअंदाज कर कोई भी पार्टी यहां अपना आधार बनाने में सफल नहीं हो सकती। लिहाजा भाजपा खासकर मोदी को अविलंब इन मुद्दों पर पहल करनी चाहिए ताकि यहां की जनता की मायूसी दूर हो और वह भाजपा की ओर आकर्षित हो सके।

-अनिल नरेन्द्र