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Saturday, 15 August 2015

मैदान-ए-जंग लोकसभा में भाजपा ने पलटी बाजी

मानसून सत्र खत्म होने से एक दिन पहले बुधवार को लोकसभा में ललित गेट पर ऐसी बहस हुई जो हमने पहले कभी भी नहीं देखी। संसद के पावस सत्र को खत्म कर चुकी कांग्रेस सहयोगी विपक्ष के दामन को छोड़ देने के बाद मजबूरी में बड़ी आक्रामकता के साथ लोकसभा में उतरी किन्तु भ्रष्टाचार और चोरी के जिन तीरों से उसने सुषमा स्वराज को भेदना चाहा, वे सभी पलट कर उसी को छेदते दिखे। अपनी तार्पिक वाप्पटुता से स्वयं सुषमा ने न केवल कांग्रेस के एक-एक सवाल का जवाब दिया बल्कि शायद पहली बार कांग्रेस नेतृत्व को कठघरे में खड़ा कर दिया। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, उपाध्यक्ष राहुल गांधी और पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम से उनके कारनामों पर अत्यंत तीखे सवाल भी पूछे। सुषमा पूरे रौ में बोलीं। ललित मोदी को बचाने के एवज में पैसे लेने के राहुल गांधी के आरोपों के जवाब में सुषमा बोलीं 15000 लोगों के हत्यारे एंडरसन और क्वात्रोची को और आदिल शहरयार को भगाने के लिए अपनी मॉम से जाकर पूछो उन्हें भगाने के कितने पैसे लिए? राहुल जी को छुट्टियां बिताने का शौक है। इस बार एकांत में छुट्टी बिताने जाएं और अपने परिवार के इतिहास को पढ़ें। सभी आरोपों को खारिज करते हुए सुषमा ने कहा कि मैंने कुछ गलत नहीं किया। मेरे परिवार ने एक पाई नहीं ली। मेरे पति पासपोर्ट मामले में ललित के वकील नहीं थे। मेरी बेटी ने एक भी पैसा नहीं लिया। वह तो नौवें नम्बर की जूनियर वकील थी। सोनिया गांधी चर्चा के दौरान अपनी बहन पर भाजपा सांसदों की टिप्पणी पर इतनी उत्तेजित हुईं कि वह वेल में आकर चिल्लाने लगीं। यह पहली बार हुआ जब कांग्रेस अध्यक्ष इस तरह से उत्तेजित नजर आईं। अलीगढ़ से भाजपा सांसद सतीश गौतम ने कहा कि सोनिया गांधी की बहन ने भी ललित मोदी से मुलाकात की थी। जोधपुर से पार्टी सांसद गजेन्द्र ने कहा कि ललित के संबंध राहुल की मौसी, सोनिया की बहन से भी हैं। इससे नाराज सोनिया की अगुवाई में पार्टी सांसद वेल तक आ गए और हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही एक घंटे तक स्थगित करनी पड़ी। अपना दल की सांसद अनुप्रिया पटेल ने जोशीले अंदाज में सुषमा जी का बचाव किया। विपक्ष की रणनीति पर तंज कसते हुए उन्होंने कहाö`खोदा पहाड़ निकली चूहिया।' वित्तमंत्री अरुण जेटली ने भी अनुप्रिया को उद्धृत करते हुए इसी मुहावरे के जरिए अपनी बात की। उन्होंने कहा कि इसमें से तो चूहा भी नहीं निकला। ललित गेट पर लोकसभा में लंबी बहस के बाद सरकार की ओर से वित्तमंत्री ने कांग्रेस की जमकर खिंचाई की। मंगलवार को संसद के हंगामे से असहज भाजपा के पितृपुरुष लाल कृष्ण आडवाणी बुधवार को बेहद उत्साही मुद्रा में दिखे। सुषमा स्वराज के भाषण के समय उनकी साथ वाली सीट पर बैठे आडवाणी भाषण के बाद उनकी पीठ ठोंकते दिखे। सुषमा के भाषण के दौरान अपने विरोध को बेअसर देख कांग्रेस सांसदों ने तख्तियां निकाल कर कैमरों के रास्ते में आने का विफल प्रयास भी किया। इससे पार पाने के लिए लोकसभा टीवी एंगल बदलता रहा। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कांग्रेस की जमकर खिंचाई करते हुए कहा कि उसके खोखले नारों की वजह से संसद का मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया। उन्होंने सरकार और सुषमा के खिलाफ लगाए गए सारे आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि यूपीए सरकार ने ललित मोदी के खिलाफ जयपुर और जोधपुर के एयरपोर्ट पर लाइट ब्लू नोटिस दिया जबकि उस वक्त ललित मोदी लंदन में था। ऐसे में रेड कॉर्नर या ब्लू कॉर्नर नोटिस दिया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि यूपीए कार्यकाल में भारत में ललित मोदी का पासपोर्ट कैंसिल कर दिया गया लेकिन वह गलत तरीके से रद्द किया गया। इसी कारण कोर्ट ने उनके पासपोर्ट को बहाल कर दिया। उन्होंने राहुल के बंदर वाले उदाहरण पर कहा कि आप गांधी जी के तीन बंदरों की बात कर सकते हैं लेकिन देश को बंदर मत बनाइए। राहुल गांधी को आड़े हाथों लेते हुए कहाö`बिना ज्ञान वाला विशेषज्ञ।' जेटली ने कहा कि इस पूरे मामले में श्रीमती सुषमा स्वराज को बलि का बकरा बनाया गया। कांग्रेस का असली मकसद महत्वपूर्ण कानूनों को रोक कर देश को आगे बढ़ने से रोकना है। उसने बिना मुद्दे के संसद के एक पूरे सत्र को बर्बाद कर दिया। कांग्रेस ने एक नाकाम और भ्रष्ट सरकार चलाई और अब देश के विकास को रोकना चाहती है। यूपीए ने भ्रष्ट सरकार चलाई पर जब एनडीए ने सब ठीक कर दिया तो अब कांग्रेस ने उसकी छवि खराब करनी शुरू कर दी। संसद नहीं चल पाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है जिसमें इसके लिए गाइडलाइंस तय करने की मांग की गई है। कांग्रेस के इस गैर-जिम्मेदार रवैये के कारण मानसून सत्र न चलने की कीमत देश को जनता की गाढ़ी कमाई के 260 करोड़ रुपए के रूप में चुकानी पड़ी है।

-अनिल नरेन्द्र

Friday, 14 August 2015

अमेरिकी दूतावास पर हमला ः कई मोर्चों पर लड़ने को मजबूर

अमेरिका इस समय घर में भी घिरा हुआ है और अब विदेशों में भी इसके खिलाफ हमले हो रहे हैं। एक अश्वेत किशोर की श्वेत पुलिस कर्मी द्वारा हत्या की पहली बरसी पर दिनभर चले शांतिपूर्ण कार्यक्रम के बाद शाम को हिंसा भड़क गई। प्रदर्शनकारियों के साथ झड़प के बाद पुलिस ने रविवार को गोलीबारी की जिसमें एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया। उपनगर सेंट लुई में अश्वेत माइकल ब्राउन की निर्मम हत्या के बाद से ही अमेरिका के कई शहरों में अश्वेत बनाम श्वेत पुलिस कर्मियों में तनाव चल रहा है। माइकल ब्राउन की बरसी का कार्यक्रम शांतिपूर्ण मार्च के साथ शुरू हुआ लेकिन शाम होते ही विरोध प्रदर्शन करने वाले दर्जनों लोगों ने यातायात रोकना शुरू कर दिया और दुकानों के शीशे तोड़ने लग गए। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पानी की बोतलें फेंकी। इसके बाद पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। पुलिस ने कहा है कि प्रदर्शनकारियों में से किसी ने पुलिस पर गोलियां चलाईं। 18 वर्षीय ब्राउन की नौ अगस्त 2014 को मौत के बाद से ही पूरे अमेरिका में अस्थिरता व अविश्वास का माहौल बना हुआ है। उधर तुर्की के शहर इस्तांबुल में सोमवार को कई हमले हुए। इन हमलों में छह सुरक्षा कर्मियों की मौत हो गई और तीन आतंकी मारे गए। अमेरिका वाणिज्य दूतावास पर हमला हुआ। दो महिला हमलावरों ने दूतावास की इमारत के पास अचानक गोलीबारी शुरू कर दी। हमले की जिम्मेदारी वामपंथी संगठन रिवोल्यूशनरी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी फ्रंट (डीएमकेपीसी) ने ली है। इससे पहले तुर्की के इस सबसे बड़े शहर इस्तांबुल में एक पुलिस थाने पर फिदायीन हमले के बाद आतंकियों ने जबरदस्त गोलीबारी की। हमले में एक पुलिस कर्मी की मौत हो गई जबकि जवाबी कार्रवाई में दो आतंकी ढेर हो गए। वहीं सिरनक प्रांत में सड़क किनारे बम धमाके में चार पुलिस अधिकारी मारे गए। इन हमलों के पीछे कुर्द आतंकियों का हाथ बताया जा रहा है। वाणिज्य दूतावास पर हमला करने वाले संगठन (डीएमकेपीसी) को अमेरिका और तुर्की ने आतंकी संगठनों में शामिल कर रखा है। 2013 में इस संगठन ने तुर्की की राजधानी अंकारा में अमेरिकी दूतावास पर हमला किया था। आतंकी संगठन आईएस (इस्लामिक स्टेट) से मुकाबला करने के लिए अमेरिका ने एक और मोर्चा खोला है। उसने तुर्की के इन सर्लिक वायुसेना अड्डे पर छह एफ-16 जेट विमान और 300 सैन्य कर्मी भेजे हैं। वर्तमान समय में अमेरिका दोहरे मोर्चे पर लड़ने को मजबूर है। घर में मिसौरी के फर्ग्यूसन प्रांत में जहां अब इमरजेंसी लगानी पड़ी है और शेष दुनिया में आईएस के बढ़ते प्रभाव से। वैसे देखा जाए तो यह स्थिति अमेरिका ने खुद पैदा की है।

-अनिल नरेन्द्र

संथारा पर रोक आस्था और धर्म पर हस्तक्षेप है

संथारा जैन समाज की हजारों साल पुरानी प्रथा है। इसमें मृत्यु के निकट होने पर मुनि व्रत रख लेते हैं और खाना-पीना छोड़ देते हैं। इसी अवस्था में धीरे-धीरे उनकी मृत्यु हो जाती है। इसे संलेखना भी कहा जाता है। राजस्थान हाई कोर्ट ने गत दिनों एक बड़ा फैसला सुनाया है। जैन धर्म में मृत्यु अपनाने की सैकड़ों साल पुरानी संथारा प्रथा पर रोक लगा दी। हाई कोर्ट ने कहा कि किसी का भी खाना-पीना छोड़कर प्राण त्यागना आत्महत्या ही है। ऐसा करने वालों पर धारा 309 के तहत आत्महत्या का केस दर्ज होगा और संथारा के लिए उकसाने वालों के खिलाफ धारा 306 के तहत कार्रवाई होगी। इसका कोई रिकार्ड तो नहीं है पर जैन संगठनों के मुताबिक हर साल 200 से 300 लोग संथारा के तहत देह त्यागते हैं। अकेले राजस्थान में ही यह आंकड़ा सौ से ज्यादा है। गुजरात और मध्यप्रदेश में भी इस प्रथा का प्रभाव है। यह मामला नौ सालों से राजस्थान हाई कोर्ट में चल रहा था। वकील निखिल सोनी ने वर्ष 2006 में संथारा पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की थी। उसमें कहा गया था कि जिस तरह सती प्रथा आत्महत्या है, उसी तरह से संथारा भी खुदकुशी का एक प्रकार है। राजस्थान के चीफ जस्टिस सुनील अबवानी और जस्टिस अजीत सिंह की बेंच ने इस साल 23 अप्रैल को सुनवाई पूरी कर ली थी। फैसला अब आया है। इसी के साथ सती प्रथा के जैसे ही संथारा भी अपराध की श्रेणी में आ गया है। याचिका में कहा गया कि संथारा आत्महत्या है। इसे धार्मिक आस्था का नाम दे दिया गया है जबकि आस्था को कानून में कोई जगह नहीं इसलिए इस प्रथा पर रोक लगे। जबकि जैन समाज का कहना है कि यह आत्महत्या नहीं है। जैन परम्परा के मुताबिक यह प्रथा आत्मा को पवित्र करने के लिए मनुष्य की अंतिम तपस्या है। इसे मुनियों के लिए अनिवार्य कहा गया है। राजस्थान हाई कोर्ट के इस फैसले का जैन समाज में भारी विरोध हो रहा है। आचार्य मुनि लोकेश ने बताया कि आत्महत्या तनाव और पुंठा की स्थिति में की जाती है जबकि संथारा आस्था का विषय है। जैन संत तरुण सागर का कहना है कि समाज देशभर में इसका विरोध करेगा। वहीं कुछ जैन संगठन फैसले को धार्मिक क्षेत्र में दखल बताकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कर रहे हैं। दिगम्बर जैन मुनि ने टिप्पणी कीöआज संथारा तो कल दिगम्बर मुद्रा पर भी रोक लगा देंगे। हम कोर्ट का सम्मान करते हैं पर वहां बैठे लोगों को निर्णय लेने से पहले सोचना चाहिए था। सती और संथारा को एक मानना गलत है। संथारा की प्रक्रिया 12 साल तक चलती है। विनोबा भावे ने भी संथारा किया था। उन्होंने कहा थाöमैं जीवन गीता की तरह और मृत्यु महावीर की तरह चाहता हूं। कोर्ट ने इसे आत्महत्या समझ कर गलती की है। यह आजाद भारत का सबसे गुलाम फैसला है। श्वेताम्बर जैन मुनि ऋषभ विजय महाराज का कहना है कि यह धार्मिक मामलों में कोर्ट का हस्तक्षेप है। संथारा की अनुमति महावीर स्वामी ने दी थी। मरने से किसी को कौन बचा पाया है। हम जैन मुनियों से सहमत हैं। हमारी राय में भी अदालतों को धार्मिक और आस्था के मामलों में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। आस्था को चुनौती नहीं दी जा सकती। उम्मीद है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट जैन समाज की दलीलों पर गंभीरता से विचार कर सुधार करेगा।

Thursday, 13 August 2015

याकूब की फांसी की कवरेज पर 3 चैनलों को नोटिस

मुंबई धमाकों के दोषी याकूब मेमन को फांसी से जुड़ी खबरों में पतिस्पर्धियों को पीछे छोड़ने की होड़ में कई चैनलों ने अपनी सीमाओं का ध्यान नहीं रखा कम से कम यह सोचना है केन्द्राrय सूचना व पसारण मंत्रालय का। दो चैनलें ने तो अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा शकील का फोन पर साक्षात्कार लिया जबकि एक चैनल ने मेमन के वकील की बेजा टिप्पणी पसारित की। इससे नाखुश सूचना एवं पसारण मंत्रालय ने तीन पमुख चैनलों को नोटिस जारी किया है। नोटिस में पूछा गया है कि क्यों न उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए। सरकारी सूत्रों ने कहा कि ऐसा पाया गया है कि इन न्यूज चैनलों की ओर से की गई कवरेज में यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि उनकी कवरेज ने पोग्राम कोड की धाराओं का उल्लघंन कैसे नहीं किया। पोग्राम कोड की धाराएं कहती हैं कि किसी अश्लील, मानहानिपूर्ण, जानबूझकर गलत और पेरित एवं आधे सच को दिखाने वाला कोई कार्यकम पसारित नहीं किया जाएगा। कोड की अन्य धाराओं के मुताबिक कोई ऐसा कार्यकम पसारित नहीं किया जाना चाहिए जिससे हिंसा को बढ़ावा मिलने की आशंका हो या उससे कुछ भी हो, जिससे कानून व्यवस्था बिगड़ने या राष्ट्र विरोधी भावनाओं को बल मिलने का खतरा हो। एक अन्य धारा के मुताबिक चैनल ऐसा नहीं दिखा सकते जिससे राष्ट्रपति एवं न्यायपालिका की निष्ठा पर किसी तरह का आक्षेप लगता पतीत होता हो। सूचना एवं पसारण मंत्रालय की इकाई इलेक्ट्रानिक मीडिया मॉनिटरिंग सेंटर (ईएमएमसी) करीब 600 चैनलों की विषय वस्तु पर निगरानी करता है। जिन चैनलों को नोटिस भेजा गया है उनमें दो ऐसे हैं जिन्हेंने कथित तौर पर अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा शकील का फोन-इन-इंटरव्यू पसारित किया था। एक अन्य चैनल ने कथित तौर पर मेमन के वकील के बयान को पसारित किया था। भारत में न्यूज चैनलों के संपादकों की शीर्ष संस्था ने तीनों न्यूज चैलनों को जारी नोटिस पर आश्चर्य जताते हुए एक बयान में कहा है कि बीईए ने इस मुद्दे को सरकार के समक्ष उठाने का निर्णय लिया है। बीईए ने केवल टेलीविजन नेटवर्प (संसोधन) नियम 2015 पर  भी चिंता जताई जिसमें आतंकवाद निरोधक अभियानों में मीडिया कवरेज को अभियान खत्म होने तक सिर्प सरकार की ओर से दी गई सूचनाएं पसारित करने तक सीमित कर दिया गया है। बीईए ने कहा कि आतंकवादी फरमानों के सीधे  पसारण में विश्वास नहीं रखता लेकिन इसका यह मानना है कि मीडिया कवरेज को सरकार की तरफ से सूचना दिए जाने तक सीमित नहीं किया जा सकता है। कई पत्रकार सगठनों ने इसकी निंदा की और इसे मीडिया को धमकाने की कोशिश बताया।

-अनिल नरेन्द्र

यादव सिंह मामले से बौखलाहट

नोएडा के तीन-तीन पाधिकरणों के इंजीनियर इन चीफ के कार्यभार से नवाजे गए अरबों की काली कमाई और घपले-घोटालों के आरोपी यादव सिंह के विरुद्ध सीबीआई जांच को लेकर जिस तरह उत्तर पदेश सरकार में घबराहट है उसकी वजह समझ में नहीं आती। इस मुद्दे पर उसे सुपीम कोर्ट में भी लानत-मलामत झेलनी पड़ी जिसने खुद इस बेचैनी का कारण पूछ लिया। सुपीम कोर्ट ने शुकवार को किसी दूसरी एजेंसी को मामला सौंपने के लिए उत्तर पदेश सरकार की याचिका खारिज करते हुए कहा कि सीबीआई जांच पर तो आपको खुश होना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि हमारी नजर में इस मामले की सीबीआई जांच जरूरी है। इसलिए केंद्रीय एजेंसी को जांच करने दीजिए। उत्तर पदेश सरकार की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने बताया कि यह मामला अभी न्यायिक आयोग के पास है। इसलिए राज्य सरकार सीबीआई जांच के पक्ष में कतई नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि सीबीआई जांच के जरिए राज्य सरकार को अस्थिर करने का पयास किया जाएगा। सुपीम कोर्ट ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला प़ढ़ने के बाद हमें लगता है कि वह पूरी तरह न्यायोचित है। जिस समय आप व्यापमं की जांच सीबीआई से कराने की मांग लेकर आए थे उस समय हमने वह मामला भी इसी एजेंसी को सौंपा था। कपिल सिब्बल ने कहा कि आप जानते हैं कि सीबीआई एक तोता है। इस पर पीठ ने कहा, हम ऐसा नहीं मानते, सीबीआई पर लोगों को विश्वास है। आप परेशान न हों। यादव सिंह फरार हैं। उनके विदेश भागने का अंदेशा है। आरोप है कि यादव ने विदेश में पूंजी बना रखी है और अब उसकी लोकेशन भी नहीं मिल रही है। आने वाले दिनों में सीबीआई यादव सिंह के खिलाफ रेड कार्नर नोटिस जारी कर सकती है। यादव सिंह को निलंबित होने के कुछ दिन बाद से ही नहीं देखा गया। न तो पुलिस को उसकी लोकेशन का पता है और न ही उसके खास मिलने-जुलने वालों को। सीबीआई द्वारा यादव कुनबे के खिलाफ दो मुकदमे दर्ज कर 16 ठिकानों पर छापामारी के दौरान भी वह किसी टीम को नहीं मिला। यादव सिंह की अकूत संपत्तियों की चर्चा भले ही चल रही हो लेकिन 10 अपैल 2015 को यादव ने हाई कोर्ट में जो हलफनामा दाखिल किया है उसमें उसके पास 1982 में नोएडा पाधिकरण से मिला 115 वर्ग मीटर का घर है। यादव का दावा है कि वह किसी भ्रष्टाचार में शामिल नहीं हैं और उसकी पत्नी के नाम कुसुम गारमेंट नामक एक फर्म है। अरबों के घोटाले उजागर होने के बाद से गायब यादव सिंह कभी मायावती की आंख के तारे रहे हैं। शुरुआत में सपा सरकार की आंख की किरकिरी बने थे। उसकी शिकायत पर यादव सिंह का निलंबन हुआ था फिर रातों रात सकिय हुई इंजीनियर लॉबी ने पता नहीं कैसे उसे सपा की गोद में बैठाने में सफलता पाई? इसके बाद यादव सिंह को मिस्टर थटी परसेंट की उपाधि से नवाजा गया। यह अवर अभियंता स्तर का कर्मचारी एक साथ तीनों पाधिकरणों का इंजीनियर इन चीफ  बना दिया गया। फिर ठेका-पत्ती में कमीशन, हिस्सेदारी के अलावा उसने कथित तौर पर फजी कंपनियों के नाम पर जमीन का जो धंधा शुरू किया वह अरबों तक जा पहुंचा। अब जब अदालतों की सख्ती से वह घिर गया है तो पदेश सरकार में बेचैनी हो रही है। खुद सपा मुखिया ने लखनऊ में बिना नाम लिए कहा कि कांग्रेस की तरह भाजपा भी सीबीआई का दुरुपयोग कर रही है और विरोधियों को परेशान करने में लगी है। और इंतहा तो तब हो गई जब राज्य सरकार सीबीआई जांच का विरोध करने सुपीम कोर्ट पहुंच गई जहां उसकी याचिका तो खारिज हुई ही साथ-साथ डांट और पड़ गई। अगर सही मायने में यादव सिंह की जांच हुई तो निश्चित रूप से कई बड़ी हस्तियां फंसेगी। इस स्तर का घोटाला बिना राजनीतिक संरक्षण के संभव ही नहीं।

Wednesday, 12 August 2015

पंजाब को पुन आतंक में झोंकने का आईएसआई प्लान

आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब देने में पंजाब हमेशा आगे रहा है। गुरदासपुर के दीनानगर में पिछले दिनों हुए आतंकी हमले का पंजाब पुलिस ने मुंहतोड़ जवाब दिया था। इस ऑपरेशन में पंजाब पुलिस का एक ऐसा जांबाज भी था जिसने कभी हॉकी की दुनिया में अपनी ड्रैग फ्लिकर से तहलका मचा दिया था। आतंकियों से लोहा लेने में भी भारतीय हॉकी टीम के पूर्व स्टार और पेनल्टी कॉर्नर गोल करने वाले विशेषज्ञ पंजाब पुलिस के डीसीपी जुगराज सिंह पीछे नहीं रहे। उनकी एके-47 से निकली गोलियों ने ही पहले आतंकी को मार गिराया था। मीडिया से बातचीत में बताया कि एसएसपी के साथ मैं सुबह आठ बजे दीनानगर पहुंच गया था। हमने दीनानगर थाने के सामने मोर्चा संभाला हुआ था और सवा 11 बजे मुझे खिड़की के पास एक आतंकी दिखाई दिया। मैंने करीब 20 राउंड फायर किए और कुछ ही देर में आतंकी की बॉडी खिड़की पर गिरी नजर आई। मैंने अपने एसएसपी को हाथ से इशारा करते हुए कहा कि एक तो गया। हम जुगराज और तमाम पंजाब पुलिस को उनकी बहादुरी के लिए सलाम करते हैं। वैसे गुरदासपुर हमला आतंकवाद का महज विस्तार नहीं है। यह भारत को परेशान करने वाला घेराव है। पाकिस्तान एक बार फिर पंजाब में आतंकवाद वापस लाना चाहता है। दुख का विषय यह भी है कि लुंज-पुंज बादल राज से ही पाकिस्तान की हिम्मत बढ़ी। यह जगजाहिर है कि अकालियों की राजनीति धार्मिक संगठनों के प्रति सहानुभूति के साथ चलती है। वह मानती है कि खालिस्तान की मांग करने वालों के साथ इंदिरा राज के समय से ही ज्यादतियां की गई हैं। लिहाजा अकाली सरकार का फर्ज बनता है कि वह अपने राज में उनके साथ नरमी बरते। यही वजह है कि सैकड़ों बेगुनाहों की जान लेने वाले उग्रवादियों-आतंकवादियों को शहीद का दर्जा देना, सालाना उन्हें सम्मानित करना या उनके नाम पर स्मारक बनाने की मांगों पर ढील से पेश आना। अकाली सरकार को उन सभी क्षेत्रों में मुस्तैदी से काम करना चाहिए जिससे पंजाब को फटने के लिए बारूद मिल सकता है। केवल यह कहना काफी नहीं कि पंजाब में फिर से आतंकवाद के लौटने का चांस नहीं है, क्योंकि लोगों ने इसे खारिज कर दिया है। पाकिस्तान की आईएसआई बब्बर खालसा जैसे आतंकवादियों को इसीलिए पाल रखा है कि वह पंजाब को एक बार फिर अस्थिर करें। जम्मू-कश्मीर में तो भाजपा सरकार का हिस्सा है और पंजाब में उसकी सहयोगी सरकार है। केंद्र सरकार को भी सख्ती से बादल को कहना होगा कि वह आतंकी समर्थकों से सख्ती से निपटे ताकि आईएसआई अपने मंसूबों में कामयाब न हो।

-अनिल नरेन्द्र

न्यायपालिका की हिफाजत हर हाल में

यह खबर अत्यंत चिन्ताजनक है कि याकूब मेमन की फांसी की पुष्टि करने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा को धमकी भरा खत मिला है। पत्र लाल स्याही से लिखा गया है और पत्र में किसी भी आतंकी संगठन का नाम तो नहीं लिखा हुआ है पर हम इसे हल्के-से नहीं ले सकते। अगर यह खत किसी ने शरारत से नहीं लिखा है तो जस्टिस मिश्रा की सुरक्षा बढ़ाने के अलावा इस मामले की गंभीरता से छानबीन की जरूरत है। भारत में शायद ही पहले कभी यह सुनने में आया हो कि सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को इस तरह की धमकी मिली हो। पत्र में बहुत ही संतुलित भाषा का इस्तेमाल करने के साथ गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने का प्रयोग नहीं किया गया है। दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ विशेष पुलिस आयुक्त (लॉ एंड आर्डर) दीपक मिश्रा ने बताया कि न्यायमूर्ति को बुलेटप्रूफ कार मुहैया करा दी गई है। बैंच के दो अन्य जजों की सुरक्षा भी बढ़ा दी गई है। नई दिल्ली जिले के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि पत्र बहुत ही टूटी-फूटी हिन्दी भाषा में लिखा गया है। पत्र को देखने से लग रहा है कि लिखने वाला बहुत ही कम पढ़ा-लिखा है या जानबूझ कर सीधे हाथ से लिखने वाले व्यक्ति ने उलटे हाथ से लिखा है। पत्र में कहा गया है कि कितनी भी सुरक्षा ले लो, तुम्हें मार देंगे। हमारे आदमी कई दिन पहले दिल्ली आ चुके हैं। जो हाल उनके भाईजान याकूब मेमन का हुआ है उससे ज्यादा बुरा हाल तुम्हारा करेंगे। पत्र के आखिर में आपका दुश्मन लिखा हुआ है। पत्र में न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा का नाम लिखा हुआ है। पंजाब में जब आतंकवाद का जोर था तब स्थानीय जजों को आतंकवादियों से धमकियां मिलने की कुछ खबरें आई थीं। तब खालिस्तान समर्थक आतंकी न्यायपालिका, प्रशासन और प्रेस के लोगों को अकसर धमकाते रहते थे। इसे गंभीरता से लेना इसलिए भी जरूरी है कि ऐसा सिलसिला फिर से न शुरू हो जाए। इस पत्र को गंभीरता से इसलिए भी लिया जाना चाहिए क्योंकि यह धमकी उन लोगों की तरफ से दी गई है जो 22 साल पहले मुंबई में कत्लेआम कर चुके हैं और आज भी भारतीय राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ने जैसी कार्रवाई में लगे हैं। वे ऐसा इसलिए भी कर पा रहे हैं क्योंकि उनकी पीठ पर पाक सेना व आईएसआई का हाथ है। दाउद इब्राहिम और टाइगर मेमन आज भी पाकिस्तान की पनाह में हैं जबकि हाल में पाक ने भारत विरोधी आतंकवादी कार्रवाइयां खासी तेज कर दी हैं। प्रधान न्यायाधीश एचएल दत्तू ने कहा है कि जज ऐसी धमकियों से  बेखौफ रहते हुए अपना काम करते रहें। बेशक अतीत की तरह भविष्य में भी आतंकियों और खूंखार अपराधियों के खिलाफ फैसला देते समय भारतीय न्यायपालिका पूर्ण न्याय भावना एवं ऊंचे मनोबल का परिचय देती रहेगी। मगर भारत अपनी न्यायपालिका पर नापाक इरादों की छाया तक नहीं पड़ने देगा। अत हमारा अनुरोध है कि न केवल जस्टिस दीपक मिश्रा बल्कि पूरे सुप्रीम कोर्ट तथा याकूब मेमन की सुनवाई से संबंधित हाई कोर्ट व टाडा कोर्ट के जजों, अभियोजकों और गवाहों को भी सुरक्षा मुहैया करानी चाहिए। वक्त यह दिखाने का है कि भारत न तो आतंक से डरेगा और न ही इन कायरों की गीदड़ भभकियों से। हम अपने देश व न्यायपालिका की सुरक्षा करने में पूरी तरह सक्षम हैं और यह दहशतगर्द अपने मंसूबों में कभी कामयाब नहीं होंगे। साथ-साथ यह भी कहना चाहते हैं कि निष्पक्ष न्याय भी तभी मुमकिन हो सकेगा जब उससे जुड़े सभी पक्ष सुरक्षित महसूस करेंगे।