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Saturday, 16 March 2019

इन क्षत्रपों से निपटना होगा मोदी-राहुल को ः लोक पर्व 2019...(4)

उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटें दिल्ली दरबार के लिए गेट-वे कही जाती हैं तो इसलिए यहां की सीटें ही केंद्र में सरकार बनाने का आधार तैयार करती हैं। आमतौर पर दिल्ली की गद्दीनशीं तय करने वाले इस सूबे में खासकर भाजपा की साख दांव पर होगी, वहीं सपा-बसपा गठबंधन के लिए भी यह चुनाव किसी लिटमस परीक्षण से कम नहीं होगा। वर्ष 2014 में भाजपा ने 71 और उसके सहयोगी दल ने दो सीटें जीती थीं। खुद अमित शाह ने इस बार 73 से ज्यादा सीटें जीतने का दावा किया है। हमें नहीं लगता कि भाजपा 2014 को यूपी में दोहरा सकेगी। ऐसे में भाजपा की साख सबसे ज्यादा दांव पर है। कभी घोर प्रतिद्वंद्वी रहे सपा और बसपा ने अपने तमाम गिले-शिकवे भुलाकर इस चुनाव में भाजपा को हराने के लिए हाथ मिलाया है। 26 साल बाद यहां सपा-बसपा ने गठबंधन कर चुनाव को रोमांचक बनाया है तो भाजपा अपने नेटवर्क के सहारे पिछले ऐतिहासिक प्रदर्शन को दोहराने की कोशिश में है। प्रियंका गांधी वाड्रा के आगमन के बाद कांग्रेस नए हौंसले के साथ चुनावी रथ पर सवार है। इस तरह लगता यह है कि उत्तर प्रदेश में तिकोना मुकाबला होगा। हां अगर सपा-बसपा और कांग्रेस का गठबंधन हो जाता तो मुकाबला भाजपा बनाम गठबंधन हो जाता। अगर 2014 के चुनाव पर नजर डालें तो भाजपा ने 71 सीटें जीती थीं और उसका वोट प्रतिशत 42.64 प्रतिशत था। अपना दल ने दो सीटें जीतकर 0.02 प्रतिशत वोट पाया था। सपा को पांच सीटें मिलीं और उसे 22.35 प्रतिशत वोट मिला था। बसपा को कोई सीट नहीं मिली थी पर तब भी उसे 19.77 प्रतिशत वोट मिला था। कांग्रेस दो सीटें जीतकर 07.55 प्रतिशत वोट लेने में कामयाब हुई थी। रालोद को कोई सीट नहीं मिली थी और उसे 00.86 प्रतिशत वोट मिला था। इस प्रकार सपा-बसपा-रालोद और कांग्रेस का वोट प्रतिशत 49.67 प्रतिशत बनता है जोकि भाजपा के 42.65 प्रतिशत से ज्यादा है। देखना यह होगा कि विपक्षी गठबंधन कितनी मजबूती से वोट डलवाता है? बिहार की कुल 40 सीटों के लिए जो राजनीतिक परिदृश्य बनकर तैयार हो रहा है, उससे स्पष्ट है कि यहां भाजपा, जदयू और लोजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और राजद, कांग्रेस, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा), हम और वीआईपी के नेतृत्व वाले महागठबंधन के बीच महासंग्राम होगा। राजग के पक्ष में यह बात महत्वपूर्ण है कि इसका चुनावी गठजोड़ न सिर्फ समय से हो गया, बल्कि सीटों के बंटवारे को लेकर किसी प्रकार की किचकिच नहीं हुई। भाजपा और जदयू को 17-17 जबकि लोजपा को छह सीटें देने का फार्मूला तय हुआ है। नोट करने वाली बात यह है कि भाजपा को पिछली बार अपनी कई जीती हुईं सीटें छोड़नी पड़ रही हैं। इन सबके बावजूद राजग की राह को एकदम आसान नहीं कहा जा सकता। सीटों का बंटवारा बेशक हो गया हो, लेकिन कई संसदीय क्षेत्र ऐसे हैं जहां गठबंधन की एकता से ज्यादा जाति का फैक्टर हावी दिखाई देता है। दूसरी ओर यदि विपक्षी महागठबंधन की बात करें तो वहां अभी सब कुछ तय नहीं दिखाई दे रहा है। सीटों का फार्मूला क्या होगा, राजद अन्य घटक दलों, खासकर कांग्रेस को किस हद तक समायोजित करेगा, यह अभी तय नहीं हो पाया है। प्रदेश की 40 सीटों में भाजपा को 2014 में 22 सीटें मिली थीं और वोट प्रतिशत था 29.86 प्रतिशत। राजद को चार और वोट 20.46 प्रतिशत, जदयू दो और वोट प्रतिशत 16.04, कांग्रेस को दो और वोट 8.56 प्रतिशत, लोजपा को छह सीटें और 6.50 प्रतिशत वोट, रालोसपा को तीन और वोट प्रतिशत भी तीन ही था और एनसीपी को एक सीट मिली थी और वोट प्रतिशत 1.22 था। लोकसभा सीटों की संख्या के लिहाज से तीसरे सबसे बड़े राज्य पश्चिम बंगाल में 2019 का चुनावी महासंग्राम बहुत दिलचस्प होने वाला है। 42 सीटों वाले इस राज्य में तृणमूल कांग्रेस ने अपने सभी 42 प्रत्याशियों को मैदान में उतार दिया है। वहीं भाजपा भी दूसरे दलों के बड़े नेताओं को तोड़कर अपनी स्थिति लगातार मजबूत कर रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 34 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस चारभाकपा दो, भाजपा दो सीटों पर सफल रही थी। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच राज्य का मुकाबला चतुष्कोणीय न हो इसलिए कांग्रेस और वामदलों में गठबंधन की बात भी चल रही है। हालांकि यह दोनों दल इस पर सार्वजनिक रूप से कुछ बोल नहीं रहे हैं, फिलहाल सीधी लड़ाई मोदी लहर में भी 34 सीटें जीतने वाली दीदी और एयर स्ट्राइक और राष्ट्रवाद की तेज आंधी बहाने वाली भाजपा के बीच रही है। विपक्षी महागठबंधन का चेहरा बनने का प्रयास कर रही टीएमसी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतकर प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी मजबूत करने की कोशिश में हैं। दूसरी ओर भाजपा उत्तर भारतीय राज्यों में होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए बंगाल पर निगाहें लगाए हुए है। लोकसभा व विधानसभा चुनाव में मिले मत के हिसाब से तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच अंतर बहुत ज्यादा है। इसके बावजूद भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि वामदल और कांग्रेस को तीसरे और चौथे नम्बर पर धकेलने के बाद पार्टी त्रिपुरा की तर्ज पर यहां भी चमत्कार कर सकती है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कम से कम 23 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। आगामी लोकसभा चुनाव में जहां 200 से अधिक सीटों पर क्षेत्रीय क्षत्रप भाजपा और कांग्रेस को सीधी टक्कर देंगे, वहीं चुनाव के बाद भी यही दिग्गज देश की अगली सरकार के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। देश की कुल लोकसभा सीटों में से उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, केरल, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली की 218 लोकसभा सीटों पर भाजपा और कांग्रेस की सीधी लड़ाई इन क्षत्रपों से होगी। इन राज्यों में यह क्षत्रप नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी दोनों के खिलाफ खंभ ठोंकने को तैयार हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती-अखिलेश, आंध्र में चन्द्रबाबू नायडू, वाईएसआर के जगनमोहन रेड्डी, दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी मोदी को सीधी चुनौती देना चाहेंगे। यूपी, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, ओडिशा, केरल, तेलंगाना, पंजाब, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर में त्रिकोणीय मुकाबला है। इन राज्यों में 332 सीटें हैं। यही सरकार बनाने-गिराने के समीकरण बन रहे हैं। 144 सीटों वाले आठ राज्यों में भाजपा व कांग्रेस के मध्यप्रदेश, राजस्थान, असम, छत्तीसगढ़ से भाजपा को कड़ी चुनौती मिलेगी। मोदी सरकार के प्रति गुस्से में मोदी विकल्प बनकर कई नेता उभरे हैं। अगर सीधी लड़ाई होती है तो भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं पर इन क्षत्रपों की अपनी निजी महत्वाकांक्षाएं कहीं इस लड़ाई पर हावी न हो जाएं? (क्रमश)

-अनिल नरेन्द्र

Friday, 15 March 2019

भगोड़े नीरव मोदी पर कसता कानूनी शिकंजा

पंजाब नेशनल बैंक के 13,700 करोड़ रुपए लेकर भागा नीरव मोदी पर धीरे-धीरे शिकंजा कसता जा रहा है। एक ओर जहां उसका मुंबई के समुद्र तट पर 30,000 वर्ग फुट स्थित बंगला कुछ ही मिनटों में विस्फोटक इस्तेमाल करके ध्वस्त कर दिया गया, वहीं एक अखबार द टेलीग्राफ के रिपोर्टर ने उसे लंदन में ढूंढ लिया और उससे सड़क पर ही सवाल पूछे। मोदी पिछले 14 महीने से छिपा हुआ था। नीरव मोदी का जो आलीशान बंगला विस्फोटक से गिराया गया उसकी कीमत 40 करोड़ रुपए आंकी गई है। ईडी ने बताया कि बंगले के सामान की नीलामी की जाएगी। तीन वस्तुओं जिनमें जकूजी, झूमर और बुद्ध की प्रतिमा है, को अलग रखा गया है। जकूजी की कीमत 15 लाख, झूमर 20 लाख और बुद्ध की प्रतिमा की कीमत 10 लाख रुपए आंकी गई है। लंदन में नीरव मोदी वेस्ट एंड ए इलाके में जो लंदन के आलीशान इलाकों में से है, में खुलेआम एक अपार्टमेंट में रह रहा था। ब्रिटिश अखबार द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक नीरव मोदी सोलो में ऑफिस चला रहा है। वह हीरों का ही कारोबार करता है, लेकिन ब्रांडनेम बदल लिया है। वह जनवरी 2018 में इंग्लैंड पहुंचा था। जुलाई में उसके खिलाफ इंटरपोल का रेड कॉर्नर नोटिस जारी हुआ। इससे पहले ही मई में वहां नया बिजनेस शुरू कर दिया। घुमावदार मूंछ में दिखा, शुतुरमुर्ग के चमड़े की नौ लाख रुपए की जैकेट पहने नीरव से द टेलीग्राफ के रिपोर्टर ने सड़क पर घेर कर सवाल पूछने शुरू कर दिए। नीरव टैक्सी की तलाश में इधर-उधर चलता रहा। हर सवाल पर नो कमेंट्स कहते हुए उसने सात-आठ सवालों को टाल दिया। हर सवाल का एक ही उत्तर थाöनो कमेंट्स। नीरव मोदी अपना हुलिया बदल चुका है। उसने घुमावदार मूंछ रखी है, काले रंग की जैकेट पहन रखी थी, जो शुतुरमुर्ग के चमड़े से बनी है। उसकी कीमत नौ लाख रुपए बताई जा रही है। वह जिस अपार्टमेंट में रहता है उसकी कीमत 80 लाख पाउंड (करीब 73 करोड़ रुपए) और मासिक किराया 17 हजार पाउंड (15.5 लाख रुपए) आंका गया है। ब्रिटेन के गृहमंत्री ने बैंक कर्ज धोखाधड़ी के आरोपी नीरव मोदी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी शुरू करने के लिए उसे प्रत्यर्पित करने को भारत के अनुरोध को हाल ही में एक अदालत को भेजा है। प्रवर्तन निदेशालय के प्रवक्ता ने शनिवार को यह जानकारी दी। ईडी ने अपने बयान में कहा कि नीरव मोदी को भारत प्रत्यर्पित करने का अनुरोध जुलाई 2018 में ब्रिटेन भेजा गया था। ब्रिटेन के गृह कार्यालय के केंद्रीय प्राधिकरण ने पुष्टि की है कि प्रत्यर्पण के अनुरोध को वेस्टमिंस्टर मजिस्ट्रेट अदालत को भेज दिया गया है ताकि डिस्ट्रिक्ट जज आगे की कार्रवाई करे। सीबीआई ने शनिवार को कहा कि अपने रिश्तेदार मेहुल चोकसी के साथ मिलकर पंजाब नेशनल बैंक में 13 हजार करोड़ रुपए की धोखाधड़ी मामले में वांछित भगोड़े हीरा व्यापारी नीरव मोदी के प्रत्यर्पण के लिए ब्रिटेन के अधिकारियों को हर जरूरी सहायता उपलब्ध कराएगी। धीरे-धीरे ही सही नीरव मोदी, मेहुल चोकसी की भगोड़ा जोड़ी पर कानूनी शिकंजा कसता जा रहा है। इससे और अन्य भगोड़ों पर भी असर पड़ेगा। कानून का शिकंजा धीरे-धीरे सब पर मजबूती से कसता जा रहा है।

-अनिल नरेन्द्र

मोदी के गढ़ में प्रियंका की धमाकेदार एंट्री ः लोक पर्व 2019...(3)

2019 लोकसभा चुनाव में जो बड़े बिन्दु होंगे, फैक्टर होंगे उनमें प्रियंका गांधी वाड्रा एक बड़ा फैक्टर होगी। लोकसभा चुनाव के ऐलान के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के गढ़ में कांग्रेस ने अपना तुरुप का पत्ता चल दिया है। पार्टी महासचिव प्रियंका वाड्रा ने मोदी के गढ़ गुजरात के गांधी नगर में विशाल रैली में धमाकेदार एंट्री की। रायबरेली और अमेठी से बाहर पहली बार प्रियंका ने अहमदाबाद में भाषण दिया। वैसे यह पहली बार था जब मोदी के गढ़ में तीन गांधी मौजूद थे। प्रियंका, सोनिया और राहुल गांधी। नीले रंग के बॉर्डर वाली सफेद साड़ी में प्रियंका के अंदाज--बयां में कांग्रेस कार्यकर्ता उनकी दादी इंदिरा गांधी की झलक देख रहे थे। गले में पार्टी का आई-कार्ड लटकाए प्रियंका आत्मविश्वास से लबरेज नजर आईं। प्रियंका ने तकरीबन साढ़े सात मिनट मंच से संबोधित किया। प्रियंका ने यह साफ कर दिया कि वह केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रहेंगी। पुलवामा हमले के बाद बने माहौल पर निशाना साधते हुए प्रियंका बोलींöजागरुकता सबसे बड़ी देशभक्ति है। देश में नफरत बढ़ रही है, लेकिन देश की फितरत जर्रे-जर्रे से सच्चाई खोज रही है। प्रधानमंत्री मोदी नाकामियों को छिपाने के लिए राष्ट्रवाद की आड़ ले रहे हैं। प्रियंका ने कहा कि लोकसभा चुनाव को एक और स्वतंत्रता संग्राम के रूप में लेना होगा। उन्होंने कहा कि वह फिजूल के मुद्दों में फंसाने की बजाय उन वास्तविक मुद्दों को उठाएं जिनसे उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। प्रियंका गांधी ने कहा कि आपका सबसे बड़ा हथियार देश की स्थितियों का सामना कर रहा है, उनके बारे में जागरूक होना है। आपका वोट आपका हथियार है। विचार और विवेक से इसका उपयोग करें। कांग्रेस महासचिव ने कहा कि खोखले वादे परखने का वक्त है। उन्होंने पीएम मोदी और भाजपा पर तंज कसते हुए कहा कि दो करोड़ नौकरियां कहां हैं? आपके खाते में 15 लाख रुपए कहां हैं? महिला सुरक्षा कहां है? इस बारे में सोचिए, यह सवाल पूछिए। प्रियंका गांधी ने कहा कि असली भारत हर जगह नफरत फैलाने वाला नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत का वास्तविक स्वरूप सभी के प्रति प्रेम और करुणा है, नफरत नहीं। यह इस देश की फितरत है जिसे नष्ट किया जा रहा है। इसका सभी को मिलकर मुकाबला करना है। प्रियंका गांधी की एंट्री का 2019 चुनाव में कितना असर पड़ेगा यह तो समय ही बताएगा पर इतना जरूर है कि प्रियंका के आने से कांग्रेस में नई जान पड़ गई है। प्रियंका ने मोदी और भाजपा का राष्ट्रवाद को हावी करने के प्रयास की भी काट करने की कोशिश की है। वह बेरोजगारी, किसानों, महिला सुरक्षा, राफेल, नोटबंदी, जीएसटी, अल्पसंख्यकों में असुरक्षा समेत वही सब मुद्दे उठाएंगी जिनसे देश की करोड़ों जनता प्रभावित है। सर्जिकल स्ट्राइक व राष्ट्रवाद को इस चुनाव में हावी होने से कांग्रेस इसे पीछे धकेलने की कोशिश करेगी और जनता को प्रभावित करने वाले मुद्दों को आगे लाएगी। प्रियंका गांधी को बेशक सत्तारूढ़ दल हवा में उड़ाने का प्रयास करे पर कटु सत्य यह है कि उनकी एंट्री से चुनाव प्रचार में बहुत फर्क पड़ेगा। (क्रमश)

Thursday, 14 March 2019

लोक पर्व 2019 ः अब जनता की बारी है...(2)

लोकसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही तमाम पार्टियां अपनी-अपनी जीत का बेशक दावा कर रही हों पर एक सर्वेक्षण के अनुसार बीते चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली एनडीए इस बार बहुमत से कुछ पीछे रह सकती है। कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए का भी बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद सत्ता तक पहुंचना मुश्किल दिख रहा है। जबकि क्षेत्रीय पार्टियां काफी तादाद में सीट जीत सकती हैं, जिससे अगली सरकार के गठन में उनकी भूमिका अहम होगी। यह सर्वेक्षण एबीवीपी न्यूज-सी वोटर ने किया है। इसके मुताबिक 543 लोकसभा सीट के लिए होने वाले चुनाव में भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए को 264 सीटें मिलती नजर आ रही हैं। जबकि यूपीए 141 सीट पर जीत हासिल कर सकती है। अन्य पार्टियों को 138 सीटें मिलने की संभावना है। चूंकि यह सर्वेक्षण चुनाव तारीख की घोषणा के साथ-साथ किया गया है इसलिए जैसे-जैसे चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ेगी जमीनी स्थिति बदलेगी, इसलिए इसे जरूरत से ज्यादा महत्व देने की जरूरत नहीं है। सभी राजनीतिक दल लहरविहीन चुनाव में अपने मनमाफिक परिणाम पाने की हसरत से सियासी गोटियां सजाने लगे हैं। लेकिन मेरे हिसाब से इस महादंगल में जो फैक्टर महत्वपूर्ण होंगे वह कुछ इस प्रकार हैंöप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी भाजपा को जिन मुद्दों का जवाब जनता को देना होगा, उनमें प्रमुख होंगे ः नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी, सामाजिक, आरबीआई और संवैधानिक संकट। नोटबंदीöयह सबसे चौंकाने वाला फैसला था। सरकार ने 500 और 1000 रुपए के नोटों पर रातोंरात बैन लगा दिया। जनता को अपना पैसा बदलवाने के लिए लंबी-लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ा। 100 से अधिक लोगों की तो बैंकों की लाइन में लगे-लगे ही मृत्यु हो गई। काला धन जिसके लिए नोटबंदी की गई थी, वह आज पहले से भी ज्यादा हो गया है। कहा गया था कि इससे आतंकवाद पर अंकुश लगेगा। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पिछले एक साल में जितने आतंकी हमले हुए हैं, जितने जवान मरे हैं वह पिछले सालों के मुकाबले बहुत ज्यादा हैं। नोटबंदी और जीएसटी के कारण हजारों इकाइयां बंद हो गईं, लाखों परिवार तबाह हो गए। मोदी ने हर साल दो करोड़ नौकरियों का वादा किया था। कांग्रेस का आरोप है कि पिछले साल एक करोड़ लोगों ने अपनी नौकरियां गंवा दीं। एनएसएसओ के अनुसार 2017-18 में बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत थी जबकि 1972-73 के बाद सर्वाधिक है। अब तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने भी स्पष्ट कर दिया है कि उसने नोटबंदी न करने की सलाह दी थी पर प्रधानमंत्री ने उनकी सलाह को भी दरकिनार कर दिया। मॉब लिंचिंग व गाय का मुद्दा भी उछलेगा। पांच सालों में बीफ पहली बार मुद्दा बनकर आया है। मॉब लिंचिंग के कई मामले सामने आए हैं। कांग्रेस के अनुसार देश में संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है। यह पहली बार था जब सुप्रीम कोर्ट के जज विवादों को लेकर मीडिया के सामने आए। लोकतंत्र को खतरा बताया। तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के तौर-तरीकों पर सवाल उठाए गए। सीबीआई की अंदरूनी कलह खुलकर सामने आई, आरबीआई के गवर्नर उर्जित ने पद छोड़ा, आलोक वर्मा को सीबीआई चीफ पद से हटाने पर भारी विवाद पैदा हुआ। भारत के आम चुनावों को लेकर पहले से कोई भविष्यवाणी आज तक सिर्फ इसलिए सही साबित नहीं हो सकी है, क्योंकि यह अलग-अलग मिजाज राज्यों का देश है। उनकी राजनीतिक पसंद-नापसंद, उनके अपने खानपान, रहन-सहन, बोलचाल, विश्वास और आस्था से जुड़ी होती है। यह वही फैक्टर हैं जिनके चलते वोटों के नतीजे आने तक दृढ़ता के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि सरकार किसकी बनने वाली है? वोटरों को किसी अंतिम निर्णय पर पहुंचने के बजाय 2014 और 2019 के फर्क को समझना शायद इसलिए जरूरी हो जाता है। 2014 का चुनाव लगातार 10 साल के सत्तारूढ़ यूपीए सरकार के खिलाफ था। बड़े घोटालों के कई मामले उजागर हो चुके थे, जिनमें कुछ मंत्रियों को जेल तक जाना पड़ा था और कुछ को इस्तीफा देना पड़ा था। जनता ने तय कर लिया था कि इन्हें सत्ता से बाहर करना है और किया भी। 2014 के चुनाव के इस माहौल में मोदी की ताजा हवा के झोंके सामने आए थे। वह चुनाव भाजपा नहीं लड़ रही थी, वह मोदी लड़ रहे थे। 2019 में कांग्रेस कोई फैक्टर नहीं होगी। चुनाव हमेशा सरकार के खिलाफ लड़ा जाता है। जाहिर-सी बात है कि इस बार मतदाताओं की कसौटी पर व्यक्तिगत रूप से मोदी की साख तो होगी ही, एनडीए सरकार के पांच साल का कामकाज भी मुद्दा होगा। 2014 में भाजपा या मोदी के पास न तो कुछ खोने के लिए था और न ही कुछ साबित करना था। लेकिन इस बार खोने का भी डर होगा और अपने आपको साबित करने की चुनौती भी होगी। मोदी के लिए यह साबित करने की चुनौती होगी कि अच्छे दिन का जो वादा था, वह कब आएंगे? 2014 के चुनाव में तिकोना मुकाबला था और विपक्ष बंटा हुआ था। राज्यों में इलाकाई दलों का बहुत बड़ा हिस्सा भाजपा और कांग्रेस दोनों से ही मुकाबिल था। इस बार भाजपा के मुकाबले विपक्ष एकजुट होकर और सीधे मुकाबले के प्रयास में दिख रहा है। अगर वन टू वन चुनाव कराने के विपक्ष का प्रयास सफल होता है तो मोदी और भाजपा के लिए संघर्ष तीखा हो जाएगा। चुनाव से पहले पुलवामा कांड और उसके बाद पाकिस्तान के खिलाफ एयर स्ट्राइक से माहौल में राष्ट्रवाद की हवा महसूस की जा रही है। यह ऐसा मुद्दा है जिसके आगे तमाम मुद्दे गौण हो जाते हैं। 2014 में भ्रष्टाचार का मुद्दा सबसे अहम था। भाजपा की पूरी कोशिश होगी कि राष्ट्रवाद के मुद्दे को हावी होने दिया जाए और विपक्ष इसके असर को समझते हुए इसे हावी होने से रोकने की पूरी कोशिश में है। 2014 में मोदी के खिलाफ ले-देकर सिर्फ राहुल का चेहरा था, जिसे औपचारिक तौर पर घोषित नहीं किया गया था। क्षेत्रीय दलों से कोई गठबंधन नहीं हुआ था, इसलिए उस खेमे से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में कोई नाम आने का सवाल ही नहीं था, लेकिन इस बार तो ममता बनर्जी से लेकर मायावती तक के नाम विपक्ष के प्रधानमंत्री के रूप में खुलकर चर्चा में हैं। फिर राहुल अब पूरी तरह बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सक्रिय हो चुके हैं और उन्होंने हाल के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में यह साबित भी कर दिया है कि अब न तो उन्हें और न ही कांग्रेस को हल्के में लिया जा सकता है। (क्रमश)

-अनिल नरेन्द्र

Wednesday, 13 March 2019

फिर बेनकाब हुआ पाकिस्तान अपने दोहरे रवैये से

विंग कमांडर अभिनंदन को वापस भेज शांति की दुहाई देने वाले पाकिस्तान का एक बार फिर दोहरा रवैया उजागर हो गया है। एक ओर तो अभिनंदन को वापस कर रहा है पाकिस्तान, दूसरी ओर लगातार सीमा पर गोलीबारी कर रहा है और झूठ पे झूठ बोले जा रहा है। एलओसी पर पाक सेना की ओर से निरंतर फायरिंग जारी है। लगभग युद्ध-सा माहौल बना हुआ है। हर रोज उनके और हमारे लोग मारे जा रहे हैं। पुलवामा हमले के आरोपी जैश--मोहम्मद की निन्दा से बच रहा पाकिस्तान अब तो उलटा उसके बचाव में उतर आया है। पाकिस्तान के झूठे विदेश मंत्री महमूद कुरैशी ने एक साक्षातकार में कहा कि हमले में जैश की भूमिका को लेकर असमंजस की स्थिति है। पुलवामा हमले की जिम्मेदारी जैश द्वारा लिए जाने के सवाल पर कुरैशी ने कहा कि जब जैश नेतृत्व से बात की गई तो जैश ने हमला करने से इंकार कर दिया। जब कुरैशी से यह पूछा गया कि जैश नेतृत्व से किसने बात की, किससे बात की तो उन्होंने कहा कि जैश को जानने वाले लोगों ने। बता दें कि पुलवामा हमले में जैश के शामिल होने के पुख्ता सबूत डोजियर पाक को दे दिए हैं। कुरैशी ने कहा कि हम इस डोजियर का अध्ययन कर रहे हैं। पाकिस्तान इतना बेशर्म हो चुका है कि वह अपने पायलट की मौत को भी कबूल नहीं कर रहा। भारत के बालाकोट में आतंकियों के खिलाफ की गई कार्रवाई के अगले दिन पाकिस्तान ने एफ-16 के जरिये भारतीय सीमा का उल्लंघन किया था। इसके जवाब में भारतीय विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान ने अपने मिग-21 विमान से इस एफ-16 को मार गिराया था। इस दौरान विंग कमांडर अभिनंदन का मिग-21 विमान भी दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। पाक एफ-16 विमान का पायलट शहजाजुद्दीन भी पैराशूट से कूद गया था। हालांकि पाकिस्तान ने कहा कि उसके किसी एफ-16 विमान ने जवाबी कार्रवाई में हिस्सा नहीं लिया। मीडिया रिपोर्टों और शहजाजुद्दीन के करीबी लंदन में रहने वाले वकील उमर खालिद की फेसबुक पोस्ट के अनुसार पाक के जिस एफ-16 विमान को गिराने की बात कही गई, उसके पायलट शहजाजुद्दीन को पाकिस्तानियों की भीड़ ने ही भारतीय पायलट समझ कर मार डाला था। खा]िलद ने लिखा कि अभिनंदन ठीक-ठाक हालत में पीओके में उतर गए। शहजाजुद्दीन भी अन्य स्थान पर गिरे लेकिन उन्हें पाकिस्तानियों ने भारतीय पायलट समझ कर पीट-पीटकर मार डाला। यह अब किसी से छिपा नहीं कि पाकिस्तान इन आतंकी गुटों को न केवल पालता ही है बल्कि पूरी तरह संरक्षण देता है। आज तक जितने भी आतंकी उसने आईएसआई के इशारे पर भारत में तबाही मचाने के लिए भेजे और वह हमारी सुरक्षा फोर्सेज के हाथों मारे गए, उनकी लाशों को पाकिस्तान ने कभी भी नहीं कबूला है। अजमल कसाब को भी अपना नागरिक नहीं माना था। अब अगर जैश के पाकिस्तान में होने और पुलवामा हमले की पुष्टि करता है तो फंसता है। इसीलिए वह न तो अपने एफ-16 विमान की और न ही उसके पायलट शहजाजुद्दीन की किसी प्रकार से पुष्टि कर रहा है। हम जानते हैं कि पाक की कथनी और करनी में कितना अंतर है।

-अनिल नरेन्द्र

लोक पर्व 2019 ः अब जनता की बारी है...(1)

आम चुनाव की रणभेरी बज गई है। चुनाव आयोग ने लोकसभा और चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिए रविवार को तारीखों का ऐलान कर दिया। लोकसभा की 543 सीटों के लिए 11 अप्रैल से 19 मई तक सात चरणों में वोटिंग होगी। नतीजे 23 मई को आएंगे। तीन जून तक नई लोकसभा का गठन हो जाएगा। चुनाव आयोग ने इस बार 100 प्रतिशत वीवीपैट के इस्तेमाल का ऐलान कर उन सभी लोगों का मुंह बंद करने की कोशिश की है जो ईवीएम पर सवाल खड़े करते हैं। कुल 90 करोड़ मतदाता, यह किसी देश में वोटर्स की सर्वाधिक संख्या है। पहली बार 21वीं सदी में जन्मे 18-19 साल के 1.6 करोड़ वोटर चुनेंगे देश की अगली सरकार। 17वीं लोकसभा चुनाव की रणभेरी बजने से मुख्य मुकाबला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मोदी विरोध के नाम पर परोक्ष-प्रत्यक्ष रूप से एकजुट हुआ विपक्ष होगा। विकास में राष्ट्रवाद का छौंक लगाकर मैदान में उतरी भाजपा पूरे चुनाव को वर्तमान राजनीति में सबसे बड़े कद वाले नेता नरेंद्र मोदी पर केंद्रित करना चाहती है। भाजपा का तुरुप का पत्ता है नरेंद्र मोदी की बेदाग छवि। वर्ष 2014 में जब लोकसभा का चुनाव हुआ था तब नरेंद्र मोदी की लहर थी। आज वह लहर घटी है और बेशक फिलहाल विपक्ष बंटा लगता है पर अगर विपक्षी महागठबंधन सही मायनों में प्रभावी ढंग से बन जाता है तो भाजपा को सख्त चुनौती के रूप में पेश कर सकता है। 2014 में जब लोकसभा चुनाव हुए थे तो यूपीए को सत्ता में 10 साल हो चुके थे। भ्रष्टाचार एवं अन्य कारणों के चलते सत्ता विरोधी लहर चल पड़ी थी। भाजपा को यूपीए के प्रति नाराजगी और सत्ता से बाहर होने की सहानुभूति का लाभ मिला। उसने राष्ट्रीय स्तर पर उभर रही मोदी की छवि को भी पूरे देश में भुनाया और 30 साल के बाद कोई पार्टी (भाजपा) स्पष्ट बहुमत लेकर सरकार बनाने में सफल रही। लेकिन अब राजनीतिक स्थितियां काफी बदली हुई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि गुजरात, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों में सारी सीटें जीतना भी आसान नहीं है। बीते पांच साल में बदली सियासी परिस्थितियों ने 2014 और 2019 के आम चुनाव में बड़ा अंतर पैदा कर दिया है। चुनाव में एक तरफ निर्विवाद और सबसे बड़ा चेहरा माने जाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, तो दूसरी तरफ बीते पांच साल से जूझती कांग्रेस की बागडोर संभाल कर आम चुनाव से ठीक पहले सत्तारूढ़ भाजपा से अचानक तीन राज्य छीनकर अपनी ]िस्थति मजबूत करने वाले राहुल गांधी हैं। पहली बार खेती-किसानी, ग्रामीण भारत और अगड़ी जातियों के हित चुनावी मुद्दों के केंद्र में हैं तो दूसरी ओर राम मंदिर के नाम पर बालाकोट के नाम से उपजा राष्ट्रवाद रहेगा। बेरोजगारी, नोटबंदी, जीएसटी, राफेल जैसे मुद्दे विपक्ष के सबसे बड़े हथियार होंगे। बीते चुनाव में कांग्रेस को सत्ता की गाड़ी से बेपटरी करने वाले, बिना परखा चेहरा  मोदी था तो इस बार उनके मुकाबले बिना परखा चेहरा राहुल हैं। सॉफ्ट हिन्दुत्व अपनाने के साथ उन्होंने ऐन चुनाव के वक्त बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को राजनीति में उतार कर मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है। पांच साल पहले की सरकार और विपक्ष के लिहाज से देखें तो मनमोहन सिंह के मुकाबले मौजूदा मोदी सरकार ज्यादा मुखर व मजबूत है। मोदी सरकार ने पूरे पांच साल हावी रहने में कोई कसर नहीं छोड़ी, जबकि कांग्रेस और विपक्षी खेमे में पांचवें साल धार आई है। (क्रमश)

Tuesday, 12 March 2019

आतंकियों के निशाने पर जम्मू

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा हमले के बाद दावा किया जा रहा था कि पूरे राज्य में सुरक्षाबल सावधान हैं, सब जगह चौकसी है, लेकिन गुरुवार को दोपहर जम्मू बस स्टैंड पर खड़ी बस में एस ग्रैनेड द्वारा हमला जाहिर करता है कि राज्य में फिलहाल आतंकियों को कम करके आंकना भूल होगी। बेशक हमने सीमापार से हमले फिलहाल रोक दिए हों पर जम्मू-कश्मीर के अंदर पल-पोष रहे इन आतंकियों का क्या करेंगे? गौरतलब है कि जम्मू के एक बस स्टैंड पर हुए बम धमाके में एक लड़के की मौत हो गई और 31 लोग घायल हो गए। हमले के पांच घंटे के अंदर ही पुलिस ने कुलगांव के एक युवक यासिर जावेद बट को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस का दावा है कि हिजबुल मुजाहिद्दीन ने यह हमला करवाया था। पूछताछ करने पर बट ने माना है कि उसे धमाके के लिए हिजबुल मुजाहिद्दीन ने 50 हजार रुपए दिए थे। आतंकी यासिर ने बैग में कपड़े और खाने के लिए टिफिन के एक डिब्बे में ग्रैनेड छिपा रखा था। ग्रैनेड हमले में मारे गए किशोर की पहचान मोहम्मद शारिक (17) निवासी उत्तराखंड के रूप में हुई है। जम्मू के प्रमुख बस स्टैंड पर पिछले 10 माह में यह तीसरा ग्रैनेड हमला है। पंजाब रोडवेज की बस जम्मू रेलवे स्टेशन से अमृतसर जाने के लिए सुबह बस स्टैंड से बीसी रोड की तरफ निकली तभी प्रवेश द्वार के पास जोरदार धमाका हुआ। जिस पंजाब रोडवेज की बस के नजदीक धमाका हुआ उसमें दो ही यात्री सवार थे, जिससे कोई नुकसान नहीं हुआ। आतंकी हमले का निशाना बनी बस के पीछे दो और बसें आ रही थीं। धमाके की आवाज से दोनों बसों के शीशे टूट गए। वहीं शुक्रवार को जम्मू एयरपोर्ट के प्रवेश द्वार के नजदीक एक बमनुमां पैकेट मिला जिससे हड़कंप मच गई। बम निरोधक दस्ते ने सावधानीपूर्वक रोबोट की मदद से पैकेट को खाली जगह ले जाकर उसे निक्रिय कर दिया। सुरक्षा एजेंसियां इस बात से इंकार नहीं कर रहीं कि इसकी मदद से आतंकी जम्मू से हवाई जहाज को हाइजैक करने की फिराक में थे। दरअसल पुलवामा में हमले के बाद भारत ने पाक के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक की, तब से पाकिस्तान की ओर से किसी कार्रवाई की आशंका बनी हुई थी। लेकिन भारत के रुख को देखते हुए शायद फिर से आतंकियों के जरिये परोक्ष रूप से संदेश देने की यह कोशिश की गई। आतंकी संगठनों को यह अंदाजा है कि ऐसे-ऐसे छोटे-छोटे हमले भी नागरिकों को खौफ में बनाए रख सकते हैं। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि भारतीय सेना और अर्द्धसैनिक बलों के बड़े हमलों से फिलहाल थोड़ी राहत जरूर पाई है लेकिन इन होम ग्रोन टेरिस्टों को खतरा बरकरार है। लगता यह है कि अब पाक और उनके समर्थक आतंकी समूह जम्मू को निशाना बनाने से कतराएंगे नहीं। इसलिए विशेष सुरक्षा और सटीक खुफिया जानकारी जरूरी हो गई है। लेकिन अगर आतंकियों और उनका समर्थन करने वाले अलगाववादियों को यह समझना जरूरी नहीं लगता है कि उनकी गतिविधियों से कैसे हालात पैदा होंगे तो हमारे सुरक्षाबलों के सामने इन आतंकियों का सामना करने या उन्हें उचित जवाब देने के सिवाय और क्या रास्ता बचेगा।

-अनिल नरेन्द्र