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Saturday, 30 August 2025

टैरिफ ने छीनी हीरे की चमक

भारत पर अतिरिक्त 25 फीसदी अमेरिकी टैरिफ बुधवार को लागू हो गया। इसी के साथ भारतीय वस्तुओं पर अतिरिक्त टैरिफ बढ़कर 50 फीसद हो गया। माना जा रहा है 48 अरब डॉलर से ज्यादा का अमेरिका को दिए जाने वाला भारतीय निर्यात इससे प्रभावित होगा। भारत के वस्त्र, परिधान, रत्न आभूषण, झींगा, चमड़ा, टेक्सटाइल इत्यादि बहुत से उद्योगों पर सीधा असर पड़ेगा। मैंने कुछ दिन पहले हरियाणा के उद्योगों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का वर्णन किया था। आज मैं गुजरात के सूरत हीरा उद्योग के बारे में बताने का प्रयास करूंगा। सूरत दुनिया में हीरा की कटिंग और पालिशिंग के लिए जाना जाता है। लेकिन अब इस उद्योग पर निर्भर रहने वाले लोग मुश्किल में हैं। 50 फीसदी टैरिफ ने इस क्षेत्र के व्यापारियों के साथ-साथ मजदूरों को भी चिंता में डाल दिया है। हीरा उद्योग से जुड़े 25 लाख से ज्यादा कामगार इससे प्रभावित हो सकते हैं। 50 फीसदी टैरिफ लगाने का असर सबसे ज्यादा इस क्षेत्र पर पड़ रहा है क्योंकि सूरत का हीरा उद्योग अमेरिका के किए जाने वाले निर्यात पर ज्यादा निर्भर है। कुछ लोगों का मानना है कि अगर टैरिफ कम नहीं किया गया तो कई व्यापारी हीरा उद्योग से बाहर हो जाएंगे। कई लोगों की नौकरियां चली जाएंगी और भयंकर मंदी आ जाएगी। हालांकि दूसरी ओर हीरा उद्योग से जुड़े संगठन जैसे सूरत डायमंड एसोसिएशन और साउथ गुजरात चेंबर ऑफ कॉमर्स का मानना है कि अमेरिकी टैरिफ से कुछ मंदी आएगी लेकिन समय के साथ स्थिति स्थिर हो जाएगी क्योंकि भारत को हीरा उद्योग की जितनी जरूरत है, अमेरिका में भी हीरों की उतनी ही मांग है। इसलिए वहां के लोग, व्यापारी भी इस समस्या का समाधान चाहते हैं। सूरत की कई छोटी फैक्ट्रियों में 20 से 200 श्रमिक तक काम करते हैं। राज्यों में तो यह संख्या 500 तक होती है और सूरत में ऐसी हजारों फैक्ट्रियां हैं। हाल ही में कई लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया है। सूरत में कई छोटी-बड़ी फैक्ट्रियों का यह हाल है कि 20 साल पहले शैलेश मंगुकिया ने सिर्फ एक पॉलिशिंग व्हील (चक्की) से हीरा पालिश करने की एक यूनिट शुरू की थी जो अब इतनी बड़ी हो गई कि यहां कामगारों की संख्या 3 से बढ़कर 300 हो गई, हालांकि अब इस फैक्ट्री में सिर्फ 70 लोग ही बचे हैं। वे कहते हैं कि सारे आर्डर कैंसल कर दिए गए है। मजदूरों को कहना पड़ रहा है कि काम नहीं है। आर्डर नहीं होने की वजह से काम नहीं है और काम न होने की वजह से सैलरी देने के पैसे नहीं हैं। पिछले साल अगस्त में उनकी फैक्ट्री में हर महीने औसतन 2000 हीरें की प्रोसेसिंग हो रही थी। लेकिन इस साल घटकर मात्र 300 रह गई है। श्रमिक सुरेश राठौर ने कहा, आमतौर पर हमें जन्माष्टमी के दौरान सिर्फ 2 दिन की छुट्टी मिलती थी, इस बार हमें 1ˆ दिन की बिना वेतन छुट्टी दी गई। हम ऐसे कैसे रह सकते हैं? सुरेश राठौर जैसे कई कारीगर हैं, जो इस तरह प्रभावित हो रहे हैं। सूरत डायमंड पालिशर्स यूनियन के भावेश टांक कहते हैं कि हमारे पास इस समय बहुत से जौहरी शिकायत लेकर आ रहे हैं कि उनका वेतन कम कर दिया गया या उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। हजारों मजदूरों की आमदनी कम हो रही है। उद्योग जगत के नेताओं ने एक स्पेशल डायमंड टास्क फोर्स बनाई है। जो इस स्थिति का समाधान निकालने की कोशिश करेगी। दक्षिण गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष निखिल मद्रासी ने इस बारे में बीबीसी से कहा, अमेरिकी बाजार पर भारी निर्भरता के कारण लंबे समय में बड़ा झटका लगेगा। पुराने आर्डर पूरे हो गए हैं, लेकिन नए आर्डर का भविष्य अस्पष्ट है। सरकार को तुरंत मदद करनी होगी। उन्होंने कहा कि कई व्यापारी मध्य पूर्व और यूरोप जैसे बाजारों में अवसर तलाश रहे हैं और कुछ तो बाईपास मार्गों के जरिए अमेरिका तक माल पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि उनके अनुसार अब अलग-अलग यूरोपीय देशों में नए बाजारों की तलाश करने की जरूरत है। सवाल यह है कि सूरत के हीरा उद्योग को कैसे बचाया जा सकता है? इस उद्योग जगत के कुछ लोगों का कहना है कि आने वाले दिनों में स्थिति और खराब हो सकती है। जेम एंड ज्वैलरी एक्सपर्ट प्रमोशन काउंसिल (जीजेईपीसी) के गुजरात अध्यक्ष जयंति भाई सावलिया का मानना है कि अब समय आ गया है कि अमेरिका पर निर्भरता कम की जाए और अन्य बाजारों की ओर देखा जाए। उन्होंने कहा, अगर आर्डर नहीं मिले तो निश्चित रूप से श्रमिकों के वेतन और रोजगार पर असर पड़ेगा। असली मार आने वाले महीनों में दिखेगी। वे आगे कहते हैं कि वर्तमान में अमेरिका को होने वाला कुल निर्यात लगभग 12 अरब डॉलर का है, अगर हम इसका आधा व्यापार भी अन्य देशों में कर सके, तो सूरत का हीरा उद्योग बच सकता है। उस सूरत में भारत के हीरे की चमक टैरिफ से पड़ने वाले असर को कम कर देगी। -अनिल नरेन्द्र

Thursday, 28 August 2025

वोट चोरी आरोप पर चुनाव आयोग का जवाब

भारत में चुनाव प्रािढया पर जनता का भरोसा डगमगा रहा है तो इसके पीछे क्या राजनीति है? सात अगस्त को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेस के बाद कई लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि कहीं हमारी वोट तो काटी नहीं है? राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेस में वोट चोरी का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग पर सत्तारुढ़ भाजपा के साथ सांठगांठ की बात कही थी जिसे चुनाव आयोग ने सिरे से खारिज कर दिया है। राहुल गांधी, तेजस्वी यादव और इंडिया गठबंधन के साथी इसे बिहार में जोरशोर से उठा रहे हैं और इसे भारी जनसमर्थन भी मिलता दिख रहा है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी इसे कांग्रेस समेत विपक्षी दलों की हताशा वाली राजनीति कह रहे हैं। बता दें कि जिस दिन बिहार के सासाराम से वोटर अधिकार यात्रा शुरू हुई थी। उसी दिन चुनाव आयोग ने भी प्रेस कांफ्रेंस की थी। लेकिन इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद भी चुनाव आयोग आलोचकों के निशाने पर है। सवाल है कि क्या केंद्र सरकार इन आरोपों के बाद किसी तरह बैकफुट पर दिखती है? चुनाव आयोग अगर बचावे करे तो क्या उसे हर बार पक्षपात के तौर पर ही देखा जाएगा? और चुनाव आयोग आखिर राहुल गांधी से शपथ पत्र लेने की मांग पर क्यों अड़ा हुआ है? जबकि राहुल गांधी दावा कर रहे हैं कि जो दस्तावेज उन्होंने सात अगस्त को पेश किए वे सब चुनाव आयोग के ही दिए आंकड़े हैं? इन सवालों पर चर्चा के लिए इंडियन एक्सप्रेस की नेशनल ब्यूरो चीफ रितिका चोपड़ा और भारत के पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा बीबीसी के साप्ताहिक कार्पाम ‘द लेंस' में शामिल हुए। इसी साल जून के महीने में राहुल गांधी ने अखबारों में एक लेख लिखा था। लेख में उन्होंने चुनाव आयोग पर निशाना साधते हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को मैच फिक्सिंग कहा था। अब बिहार में एसआईआर बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। एसआईआर पर अशोक लवासा कहते हैं, सबसे पहले उत्तेजन का कारण बिहार विधानसभा चुनाव है। चुनाव से पहले एसआईआर जैसी बड़ी प्रािढया अपनाने से लोगों में संशय हुआ है। दूसरा कारण है कि 2003 के रिवीजन में प्रिजम्प्शन ऑफ सिटिजनशिप शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया था। सासाराम में राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि बिहार में एसआईआर करके नए वोटरों को जोड़कर और योग्य लोगों के नाम काटकर यह (भाजपा-संघ) बिहार का चुनाव चोरी करना चाहती है। जबकि चुनाव आयोग का तर्क है कि वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों के दूर करने के लिए एसआईआर प्रािढया अपनाई जा रही है। अशोक लवासा का कहना है इस बार प्रािढया काफी जटिल बना दी गई है और इसके लिए लोगों को पर्याप्त समय नहीं दिया गया है। इस बार सवाल मतदाता सूची पर उठाए जा रहे हैं और पिछले दस सालों में ऐसे सवाल नहीं उठाए गए थे। बीते चुनावों में राजनीतिक दल ईवीएम, चुनावी शेड्यूल या मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट से संबंधित शिकायतें करते रहे हैं। सवाल अब भी चुनाव आयोग पर है लेकिन मुद्दा वोटर लिस्ट है इसलिए यह बाकी मामलों से अलग है। राहुल गांधी बार-बार कह रहे हैं कि चुनाव आयोग सिर्फ उनसे शपथ पत्र मांग रहा है जबकि किसी और से नहीं मांगा। अशोक लवासा का कहना है, अगर इतने बड़े पैमाने पर एक विधानसभा क्षेत्र में एक लाख से ज्यादा लोगों के बारे में दावा किया गया है तो किसी भी सार्वजनिक कार्यालय को इसकी जांच करनी चाहिए। मेरे ख्याल से उसके लिए किसी शपथ पत्र की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सियासी दलों से पूछा कि जब इतनी समस्याएं हैं तो सिर्फ आयोग के पास दो ही शिकायतें क्यों आई हैं? हालांकि तेजस्वी यादव ने दावा किया है कि उनकी शिकायतों को स्वीकार नहीं किया गया है। यह भी सच है कि ज्ञानेश कुमार के बोलने के तरीके के कारण लोगों के मन की शिकायतें पूरी तरह से खत्म नहीं हुई हैं। अशोक लवासा ने आगे कहा कि चुनाव आयोग को यह समझना चाहिए कि अगर कोई भ्रांति फैलाई जा रही है तो उसे चुनाव आयोग को ही दूर करना होगा। आयोग को दूध का दूध और पानी का पानी करना चाहिए। सही और गलत का निर्णय लोग स्वयं कर लेंगे। बिहार विधानसभा चुनाव में बहुत कम समय बचा है। समय सिर्फ तीन महीने का है और चुनाव आयोग को दस्तावेज जमा करने के साथ उनकी पुष्टि भी करनी है। कई वोटरों के पास तय दस्तावेज नहीं हैं और कुछ लोगों में भय का माहौल है। इन्हीं सब समस्याओं की वजह से इस मुद्दे की पकड़ ग्राउंड पर बढ़ती जा रही है। कई लोग इसे अपनी नागरिकता के साथ भी जोड़ रहे हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने साफ किया है कि एसआईआर का नागरिकता से कोई लेना-देना नहीं है पर बिहार के वोटरों में शंका बनी हुई है। अशोक लवासा बताते हैं प्रिजम्प्शन ऑफ सिटिजनशिप के इस्तेमाल से नागरिकता पर प्रश्न बना हुआ है। चुनाव आयोग बार-बार कह रहा है कि वोटर लिस्ट में नाम न आने से नागरिकता समाप्त नहीं होगी। लेकिन इसमें भी विरोधाभास यह है कि उसी वजह से तो आप उसे मतदाता सूची से बाहर निकाल रहे हैं? -अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 26 August 2025

राज्यपाल बिल में देरी करें तो रास्ता क्या है?


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर राज्यपाल अनिश्चितकाल तक विधेयकों को पेडिंग रखते हैं तो इससे विधान मंडल निपिय हो जाएगा। ऐसी स्थिति में क्या अदालतें हस्तक्षेप करने में असमर्थ हैं? दरअसल मई 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से यह राय मांगी थी कि क्या न्यायालय आदेशों द्वारा राष्ट्रपति-राज्यपाल को समय-सीमा में बांध सकता है? चीफ जस्टिस आर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस पाम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदूरकर की पीठ इसी प्रेजिटेंशियल रेफरेंस पर सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान पावार को भारत सरकार के सॉलिसीटर जनरल ने दलीलें दी कि न्यायपालिका राष्ट्रपति या राज्यपाल को बाध्यकारी निर्देश नहीं दे सकती। तब चीफ जस्टिस ने सवाल किया कि क्या हम यह कहें कि चाहे संवैधानिक पदाधिकारी कितने भी ऊंचे हों, यदि वे कार्य नहीं करते तो अदालत असहाय है? हस्ताक्षर करना है या अस्वीकार करना है, उस कारण पर हम नहीं जा रहे कि उन्होने क्यों किया। परन्तु यदि सक्षम विधान मंडल ने कोई अधिनियम पारित कर दिया है और माननीय राज्यपाल बस उस पर बैठे रहें तो सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि हर समस्या का समाधान कोर्ट में नहीं खोजा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कुछ राज्यपाल विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर बैठे हुए हैं और उन पर निर्णय नहीं ले रहे हैं, ऐसे में राज्यों को न्यायिक समाधान के बजाए राजनीतिक समाधान तलाशने होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि अगर राज्यपाल विधेयकों में देर करते हैं तो रास्ता क्या है? तब सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि व्यावहारिक उत्तर यह है कि यदि कोई राज्यपाल विधेयकों पर बैठे रहते हैं तो राजनीतिक समाधान होते हैं। और ऐसे समाधान हो भी रहे हैं। हर जगह ऐसा नहीं होता कि राज्य को सुप्रीम कोर्ट आने की सलाह दी जाए। मुख्यमंत्री जाते हैं और प्रधानमंत्री से अनुरोध करते हैं। मुख्यमंत्री राष्ट्रपति से मिलते हैं। प्रतिनिधिमंडल जाते हैं और कहते हैं कि ये विधेयक लंबित पड़े हैं, कृपया राज्यपाल से बात करें ताकि वे किसी न किसी रूप में निर्णय लें। कई बार टेलीफोन पर ही मामले को निपटा लिया जाता है। मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राज्यपाल की संयुक्त बैठकें होती हैं और इस तरह गतिरोध समाप्त होता है। लेकिन इससे ये अधिकार क्षेत्र यानी ज्यूरिएडिक्शन नहीं मिल जाती कि जुडिशियल निर्णय के द्वारा समय-सीमा तय कर दें। सवाल यह है कि जब संविधान में समय-सीमा निर्धारित नहीं है तो क्या अदालत समय-सीमा तय कर सकती हैं? भले ही उसके लिए औचित्य हो? ऐसे मुद्दे कई दशकों से हर राज्य में उठते रहे हैं। लेकिन जब राजनीतिक (स्टेटसमैन शिप) और राजनीतिक परिपक्वता दिखाई जाती है तो वे केंद्र के संवैधानिक कार्यवाहकों से मिलते हैं, चर्चा करते हैं और राजनीतिक समाधान निकाल लेते हैं, यही इन समस्याओं के समाधान हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने पूछा कि अगर राज्यपाल की निपियता के खिलाफ कोई पीड़ित राज्य अदालत के पास आता है तो क्या आपके अनुसार न्यायिक समीक्षा पूरी तरह निषिद्ध है। इन पर तुषार मेहता ने कहा कि वे राज्यपाल की कार्रवाई की न्याय संगलता के प्रश्न पर नहीं है, बल्कि इस प्रश्न पर है कि क्या अदालत राज्यपाल को समय-सीमा के भीतर कार्य करने का निर्देश दे सकती है। इन पर चीफ जस्टिस ने कहा कि अगर कोई गलत है, तो उपाय तो होना चाहिए। मेहता ने उत्तर दिया कि देश की हर समस्या का समाधान इस मंच (सुप्रीम कोर्ट) से नहीं हो सकता। इस पर चीफ जस्टिस ने सवाल किया कि अगर कोई संवैधानिक पदाधिकारी बिना किसी कारण अपना कर्तव्य नहीं निभाता, तो क्या इस न्यायालय के हाथ बंधे हुए हैं? जस्टिस सूर्यकांत ने इस दौरान जोड़ा कि अगर व्याख्या की शक्ति सुप्रीम कोर्ट में निहित है तो कानून की व्याख्या अदालत को ही करनी होगी। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 23 August 2025

विधेयक पर विपक्ष का हंगामा


गंभीर आपराधिक आरोपों में गिरफ्तार और लगातार 30 दिन हिरासत में रहने पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्रियों को पद से हटाने वाले बिल बुधवार को पेश हुए। हालांकि इस बिल को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेज दिया गया है जो अगले सत्र के पहले दिन अपनी रिपोर्ट पेश करेगी। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि विपक्ष को जेपीसी के सामने अपनी आपत्ति दर्ज कराने का मौका मिलेगा। अभी जो कानून है, उसके अनुसार जब तक दोष सिद्ध नहीं हो जाए, तब तक ये आला मंत्री इस्तीफा देने के लिए बाध्य नहीं हैं। इस बिल के जरिए संविधान के अनुच्छेद 75 में संशोधन करना होगा, जिसमें प्रधानमंत्री के साथ मंत्रियों की नियुक्ति और जिम्मेदारियों की बातें हैं। ड्राफ्ट बिल के मुताबिक अगर किसी मंत्री के पद पर रहते हुए लगातार 30 दिन के लिए किसी कानून के तहत अपराध करने के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है और हिरासत में लिया जाता है जिसमें पांच साल या उससे ज्यादा सजा का प्रावधान है, उसे राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर पद से हटा दिया जाएगा। ऐसा हिरासत में लिए जाने के 31वें दिन हो जाना चाहिए। सरकार इस विधेयक को भ्रष्टाचार विरोधी बता रही है। गृहमंत्री अमित शाह ने बिल पेश करते समय कहा, राजनीतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोदी सरकार की प्रतिबद्धता और जनता के आक्रोश को देखकर मैंने संविधान संशोधन बिल पेश किया ताकि पीएम, सीएम और मंत्री जेल में रहते हुए सरकार न चला सकें। इसका उद्देश्य राजनीति में शुचिता लाना है। हाल में ऐसी स्थिति बनी कि सीएम या मंत्री बिना इस्तीफा दिए जेल से सरकार चलाते रहे। उधर विपक्ष ने इस विधेयक का जबरदस्त विरोध किया। विपक्ष की ओर से एआईएमआईएम के चीफ व सांसद असदुद्दीन ओवैसी, कांग्रेस के मनीष तिवारी, केसी वेणुगोपाल, आरएसपी के एनके प्रेमचंद्रन व समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव ने जमकर विरोध किया। प्रेमचंद्रन ने कहा कि तीनों विधेयकों को सदन में पेश करने की सरकार को इतनी हड़बड़ी क्यों है? इस पर गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि प्रेमचन्द्रन जल्दबाजी की बात कर रहे हैं, लेकिन इनका सवाल इसलिए नहीं उठता क्योंकि मैं इन विधेयकों को जेपीसी को सौंपने का अनुरोध करने वाला हूं। इसके बाद कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने कहा कि भाजपा के लोग कह रहे हैं कि यह विधेयक राजनीति में शुचिता लाने के लिए लाया गया है। उन्होंने कहा कि क्या मैं गृहमंत्री से पूछ सकता हूं कि जब वह गुजरात के गृहमंत्री थे, उन्हें गिरफ्तार किया गया था तब क्या उन्होंने नैतिकता का ध्यान रखा था? गृहमंत्री ने वेणुगोपाल को जवाब देते हुए कहा कि मैं रिकार्ड स्पष्ट करना चाहता हूं। मैंने गिरफ्तार होने से पहले नैतिकता के मूल्यों का हवाला देकर इस्तीफा भी दिया और जब तक अदालत से निर्दोष साबित नहीं हुआ तब तक मैंने कोई संवैधानिक पद स्वीकार नहीं किया। शाह ने कहा कि हमें क्या नैतिकता सिखाएंगे? कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने विधेयक को अलोकतांत्रिक बताया और केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि ऐसे विधेयक लाकर भाजपा सरकार लोगों की आंखें में धूल झोंकने की कोशिश कर रही है। यह पूरी तरह दमनकारी कदम है। यह हर चीज के खिलाफ है और इसे भ्रष्टाचार विरोधी कदम के रूप में पेश करना लोगों की आंख में धूल झोंकना जैसा है। सोशल मीडिया में भी इस विधेयक की जमकर चर्चा हो रही है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यह विधेयक ही दो-मूही तलवार है। जहां इस विधेयक से चुनी हुई राज्य की विपक्षी सरकारों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है, वहीं यह एनडीए सहयोगियों के लिए भी इशारा है कि आप अगर लाइन पर नहीं चले तो आपका भी क्या अंजाम हो सकता है, समझदार को इशारा ही काफी है। वैसे हमें लगता है कि इस संविधान संशोधन विधेयक को पारित करना इतना आसान नहीं होगा। इसके लिए लोकसभा और राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत दोनों सदनों में चाहिए होगा। जो फिलहाल उसके पास नहीं है। वैसे भी मानसून सत्र खत्म हो गया है बिल अब तो विंटर सेशन में ही आएगा। केंद्र सरकार इस विधेयक को भ्रष्टाचार विरोधी बता रही है, जबकि विपक्ष इससे सहमत नहीं है। दोनों पक्षों को समन्वय के मार्ग पर चलना चाहिए। ध्यान रहे, हमारे संविधान सभा में शामिल नेताओं ने सोचा भी नहीं था कि कभी देश की राजनीति का नैतिक स्तर इतना गिर जाएगा। आज तो कोई दागी नेता पद नहीं छोड़ना चाहता है। ऐसे में आज या कल कुछ कानूनी प्रावधान ऐसे करने ही पड़ेंगे, ताकि दागियों के लिए जगह न बचे और इस हमाम में सभी नंगे है। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 21 August 2025

चुनावी सवालों का जवाब नहीं मिला

आखिर भारत के चुनाव आयोग ने चुनावी सवालों के मुद्दे पर प्रेस कांफ्रेंस की। प्रेस कांफ्रेंस तो की पर ज्वलंत सवालों के जवाबों को टालने पर ज्यादा जोर दिया गया। बेहतर होता कि चुनाव आयोग यह प्रेस कांफ्रेंस न करता। प्रेस कांफ्रेंस भी उस दिन की गई जब रविवार था और उसी दिन दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का रोड शो चल रहा था और बिहार के सासाराम में राहुल गांधी की वोट चोरी यात्रा आरंभ हो रही थी। नतीजा यह हुआ कि इस प्रेस कांफ्रेंस ने नए सवालों को जन्म दे दिया। लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार चलाने की वैधता हासिल करना नहीं, बल्कि यह उस चुनाव की बुनियाद का प्रमुख स्तंभ है, जिस पर देश, राज्य व लोकतंत्र का दारोमदार टिका हुआ है। इस प्रक्रिया के स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से पारदर्शिता से संपन्न कराने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर है। रविवार को चुनाव आयोग ने विपक्षी राजनीतिक दलों के वोट चोरी से जुड़े आरोपों के जवाब दिए। प्रेस कांफ्रेंस के बाद कांग्रेस ने कहा कि इस प्रेस कांप्रेंस में विपक्ष के उठाए सवालों का सीधा जवाब नहीं दिया गया। तेजस्वी यादव ने कहा कि बिहार चुनाव से ठीक पहले भाजपा चुनाव आयोग के साथ मिलकर वोट देने का अधिकार छीन रही है। आरजेडी ने यह सवाल उठाया कि एसआईआर ऐसे समय क्यों की जा रही है जब बिहार में बाढ़ आई हुई है। पत्रकारों ने चुनाव आयोग से सवाल पूछा था। इस पर आयोग ने कहा, बिहार में 2003 में भी एसआईआर हुआ था और उसकी तारीख भी 14 जुलाई से 14 अगस्त थी। तब भी यह सफलतापूर्वक हुआ था। राहुल गांधी ने दावा किया था कि 2004 के लोकसभा और महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हेरफेर हुआ, जिससे भारतीय जनता पार्टी को फायदा हुआ। विशेष रूप से, उन्होंने बेंगलुरु की महादेवपुरा विधानसभा में एक लाख से ज्यादा फर्जी वोटर और कई अमान्य पतों का आरोप लगाया था। राहुल गांधी ने डुप्लीकेट वोटरों (जैसे एक ही व्यक्ति का कई राज्यों में वोटर के रूप में रजिस्ट्रेशन) और गलत पतों (जैसे एक छोटे से कमरे में सैंकड़ों वोटर) के उदाहरण दिए थे। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को निराधार और गैर जिम्मेदाराना बताते हुए खारिज किया और कहा कि वोट चोरी जैसे शब्दों का इस्तेमाल करोड़ों मतदाताओं, लाखों चुनाव कर्मचारियों की ईमानदारी पर हमला है। क्या राहुल गांधी के सवालों का यही जवाब था? राहुल गांधी बार-बार कह रहे हैं कि चुनाव आयोग उनसे शपथ पत्र मांग रहा है, मुझसे एफीडेविट मांगा है जबकि कुछ दिन पहले ही भाजपा के लोग प्रेस कांफ्रेंस करते हैं तो उनसे कोई एफीडेविट नहीं मांगा जा रहा है। ज्ञानेश कुमार ने जवाब दिया, जहां आप गड़बड़ी की बात कर रहे हैं और आप उस विधानसभा क्षेत्र के निर्वाचक नहीं हैं तो कानून के मुताबिक आपको शपथ पत्र देना होगा। आयोग का कहना है कि हलफनामा देना होगा या देश से माफी मांगनी होगी। अगर सात दिनों के अंदर हलफनामा नहीं मिलता है तो इसका मतलब है कि ये सभी आरोप निराधार हैं। पर कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि चुनाव आयोग ने विपक्ष के सवालों का सीधा जवाब नहीं दिया। खेड़ा ने कहा क्या ज्ञानेश कुमार ने उन लाख वोटर्स के बारे में कोई जवाब दिया जिन्हें हमने महादेवापुरा में बेनकाब किया था? नहीं दिया। उन्होंने कहा, हमने उम्मीद की थी कि श्री ज्ञानेश कुमार हमारे प्रश्नों के उत्तर देंगे... ऐसा लग रहा था कि (प्रेस कांप्रेंस में) भाजपा का एक नेता बोल रहा है। वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता चुनाव आयोग की इस प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद थे। उनका मानना है कि फिलहाल जो सफाई चुनाव आयोग ने दी है उससे यह मुद्दा खत्म होते नहीं दिखाई दे रहा है। ठाकुरता कहते हैं, प्रेस कांफ्रेंस में कुछ सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिले है। जैसे मैंने पूछा कि क्या यह सच है कि महाराष्ट्र में आपने 40 लाख नए लोगों को वोटर लिस्ट में शामिल किया? इस पर आयोग ने कहा कि उस समय किसी ने आपत्ति दर्ज नहीं कराई थी। मैंने एक और सवाल पूछा कि क्यों लोगों से ज्यादा नाम मतदाता सूची में थे तो इसका जवाब मुझे नहीं मिला। इस तरह से कई और सवाल हैं जिनके स्पष्ट जवाब नहीं मिले हैं। चुनाव आयोग ने बिहार ड्राफ्ट लिस्ट से करीब 65 लाख मतदाता हटाए हैं। यह एक बड़ी संख्या है, इसका कोई जवाब नहीं मिला। चुनाव आयोग आज से पहले इस तरह कभी प्रेस कांफ्रेंस करने सामने नहीं आया था। विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव आयोग के जवाब को राजनीतिक संदर्भ में देखने की जरूरत है। टाइमिंग की बात करें तो निश्चित रूप से चुनाव आयोग का जवाब भी राजनीतिक है। जैसे राहुल गांधी इसे बिहार में राजनीतिक बना रहे है तो ठीक उसी तारीख को सरकार की ओर से चुनाव आयोग ने अपना पक्ष सामने रखा है। -अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 19 August 2025

अलास्का में नहीं बनी बात

 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की अलास्का की बैठक पर सारी दुनिया की नजरें थीं। पिछले तीन साल से चले आ रहे रूस, यूक्रेन युद्ध की समाप्ति पर उम्मीदें लगाई जा रही थीं। स्थायी शांति न भी होती तो इतना तो हो सकता था कि युद्ध विराम तो हो जाता। पर सारी उम्मीद टूट गई। बेशक कुछ मुद्दों पर जरूर दोनों देशों के राष्ट्रपतियों की सहमति बनी पर कोई स्थायी समाधान नहीं निकला। तीन साल से अलग-थलग किए गए पुतिन का ट्रंप ने न सिर्फ खुले दिल से स्वागत किया, बल्कि लाल कालीन बिछाकर उनका सार्वजनिक रूप से सम्मान भी किया। हालांकि जिस मुद्दे के लिए यह अहम बैठक हुई थी उस पर कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। ट्रंप-पुतिन मुलाकात से यूक्रेन मुद्दे पर कोई तत्काल हल नहीं निकला, बावजूद यह मुलाकात खास रही। रूस के यूक्रेन पर हमले और युद्ध अपराधों के आरोपों के चलते पुतिन पश्चिमी दुनिया से अलग-थलग पड़ गए थे। इस मुलाकात ने उन्हें अचानक वैश्विक केंद्र में वापस ला दिया। अमेरिका के सैन्य अड्डे पर दोनों नेताओं का बगल-बगल खड़े होकर एक-दूसरे की तारीफ करना, बातचीत करना और यहां तक कि ट्रंप की लियोजीन में साथ बैठना ये सब ऐसे दृश्य थे जो अमेरिका-रूस संबंधों के इतिहास में कम ही देखे गए। दुनिया भर की मीडिया एक प्रेस कांफ्रेंस की उम्मीद कर रही थी, लेकिन दोनों नेताओं ने सिर्फ बयान दिए और किसी सवाल का जवाब नहीं दिया। ट्रंप ने उम्मीद जताई थी और यहां तक दावा किया था कि वह रूस–यूक्रेन युद्ध को रूकवा देंगे। हालांकि पुतिन ने कभी भी इसे स्वीकार नहीं किया था। पुतिन के लिए यह बैठक किसी जीत से कम नहीं थी। बिना कोई रियायत दिए उन्हें दुनिया की सबसे ताकतवर कुर्सी से सम्मान और स्वीकृति मिल गई। इस पूरी कवायद में यूक्रेन की भूमिका हाशिए पर रही। इस बैठक के लिए यूक्रेन के राष्ट्रपति ब्लादिमीर जेलेंस्की को आमंत्रित तक नहीं किया गया। अलास्का में ट्रंप पुतिन बैठक को वैश्विक मीडिया शांति की दिशा में बहुत भरोसे के साथ नहीं देख रहा है। रूसी मीडिया ने पुतिन की कूटनीतिक जीत का सुबूत माना, यूरोपीय मीडिया ने उम्मीद और आशंका दोनों जताई। वहीं अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों और घरेलू अमेरिकी राजनीतिक हल्कों में चर्चा का बड़ा हिस्सा ट्रंप की व्यक्तिगत शैली और उनकी मसखरी नेता जैसी छवि पर केंद्रित रहा। न्यूयार्क टाइम्स ने अपेक्षाकृत संशयपूर्ण रुख अपनाते हुए सवाल उठाया, क्या यह वार्ता सिर्फ फोटोशूट और अल्पकालिक सुर्खियां थीं या वास्तव में संघर्ष विराम की दिशा में ठोस कदम? अमेरिकी खुफिया व रक्षा हल्कों में आशंका है कि पुतिन ने बैठक का इस्तेमाल वैश्विक मंच पर अपनी छवि सुधारने और यह दिखाने के लिए किया कि अमेरिका अंतत रूस से बातचीत करने पर मजबूर हुआ। वाशिंगटन पोस्ट ने राजनीतिक दांव बताते हुए सवाल उठाया कि क्या ट्रंप का मूड आधारित नेतृत्व अमेरिका की दीर्घकालिक रणनीति को कमजोर कर रहा है। दोनों अखबारों ने लिखा कि ट्रंप के फैसले उनके मूड पर निर्भर हैं आज खुश तो शांति की बात करेंगे, पर गुस्से में होंगे तो पलट जाएंगे। एमएसएन ने ट्रंप को रियलिटी शो का होस्ट स्टार करार दिया। नोबेल की चाह में बेकरार राजनेता वैश्विक मंच पर कोई ड्रामा कर सकता है। ट्रंप वैश्विक मंच व वैश्विक राजनीति शो मैनशिप में बदल रहे हैं। सीएनएन ने कहा, ट्रंप शांति की ओर बढ़ रहे हैं पर उनका अप्रत्याशित रुख सब पर भारी है। वहीं ब्रिटिश अखबार व गार्डियन ने वार्ता को राजनीतिक विडम्बना बताया। लिखा ः वार्ता ऐसे समय हुई जब आर्कटिक क्षेत्र में रूस, अमेरिका और चीन के बीच प्रभुत्व की दौड़ तेज है, सुरक्षा विशेषज्ञों को यह कदम अमेरिका की आर्टिक रणनीति में नरमी का संकेत लगता है। गार्डियन ने चेतावनी दी, ट्रंप की अप्रत्याशित कूटनीति से वार्ता के नतीजे भरोसेमंद नहीं माने जा सकते। उधर रूस के अखबार इजवेसित्या ने लिखा ः ट्रंप को मानना पड़ा कि पुतिन के बिना यूक्रेन का भविष्य तय नहीं हो सकता। कोमरूट ने इसे रूस की कूटनीतिक वापसी बताया। टीवी चैनल आरटी ने भी बैठक को पुतिन की मजबूती और धैर्य का परिणाम करार दिया। इतना तो हम भी कह सकते हैं कि इस बैठक ने निसंदेह ब्लादिमीर पुतिन को वैश्विक कटूनीति का अपरिहार्य खिलाड़ी बना दिया है। उम्मीद की जाती है कि रूस-यूक्रेन जंग में जो बर्फ पिघलने का सिलसिला शुरू हुआ है यह आगे बढ़ेगा और अंतत यह जंग बंद होगी। 
-अनिल नरेन्द्र

Sunday, 17 August 2025

ट्रंप टैरिफ से निर्यात पर संकट


केंद्र सरकार के प्रमुख सलाहकार (आर्थिक) अनंता नागेश्वरन ने कहा कि ट्रंप टैरिफ का असर 6 महीने से ज्यादा नहीं रहने वाला है। उन्होंने कहा, लांग टर्म चैलेंज के लिए प्राइवेट सेक्टर को अहम योगदान देना होगा। नागेश्वरन ने चेताया कि छह महीने के दौरान जैम्स एंड जूलरी टेक्सटाइल और फूड इंडस्ट्री को बढ़े हुए टैरिफ का मुकाबला करना होगा। ट्रंप टैरिफ का भारत की अर्थव्यवस्था पर खासकर कुछ क्षेत्रों में तो अभी से बुरा असर पड़ना शुरू हो गया है। दैनिक भास्कर की छपी रिपोर्ट के अनुसार भारतीय उत्पादों पर अमेरिका के भारी भरकम 50 फीसदी टैरिफ ने देश के कई प्रमुख निर्यात उद्योगों के सामने नया संकट खड़ा कर दिया है। इसका असर न सिर्फ भारत के 55 फीसदी निर्यात पर पड़ेगा, बल्कि राज्यों के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। हालांकि, टैरिफ का असर सभी क्षेत्रों में समान नहीं है। लेकिन कहीं पुराने सौदों पर संकट है तो कहीं भविष्य में आर्डर ठप होने की आशंका बढ़ गई है। चावल निर्यातकों की चिंता! भारत 127 देशों को करीब 60 लाख टन बासमती चावल निर्यात करता है। इसमें से करीब 2.70 लाख टन यानि 4 फीसदी चावल अमेरिका को जाता है। इस निर्यात में करीब 40 फीसदी हिस्सा हरियाणा में तरावड़ी (करनाल) से जाता है। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्ट अधिकारियों का कहना है कि अगर अमेरिका को बासमती चालव का निर्यात नहीं होता तो भी बड़ा नुकसान नहीं होने वाला है। 2.70 लाख टन अन्य देशों में खपाना मुश्किल नहीं होगा। फिलहाल चावल निर्यातक वेट एंड वॉच की स्थिति में हैं, क्योंकि इस साल का निर्यात लगभग पूरा हो चुका है। पानीपत उत्तर भारत का बड़ा टेक्सटाइल हब है। जहां से हर साल करीब 20,000 करोड़ रुपए का निर्यात होता है। इसमें से 10,000 करोड़ रुपए तक का व्यापार अकेले अमेरिका से जुड़ा है। निर्यातकों का कहना है कि अमेरिका के टैरिफ बढ़ाने से 500 करोड़ रुपए के पुराने ऑर्डर पर संकट आ गया है। नए ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं। कुछ निर्यातक पहले से ही स्थिति को भांप गए थे। ऐसे में उन्होंने अमेरिका से बड़े ऑर्डर लेना बंद कर दिए और उत्पादों में भी कटौती की है। सिंगापुर के जरिए भी अमेरिका से व्यापार की गुंजाइश है। यूके से द्विपक्षीय समझौते से कुछ लाभ मिल सकता है। पानीपत में 35000 करोड़ टेक्सटाइल्स इकाइयां हैं जिसमें 500 एक्सपोर्ट हाउस हैं और इनमें करीब 2.5 लाख लोगों को रोजगार मिला है। नए ऑर्डर नहीं मिलने पर इनकी आजीविका पर असर पड़ेगा। जम्मू-कश्मीर के हैंडलूम और हस्तशिल्प उद्योग (विशेषकर पश्मीना एवं घानी शॉल) ने बीते तीन साल में निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। टैरिफ के बाद कारोबारी सतर्क हो गए हैं। जम्मू के शॉल निर्यात संगठन ने कहा अमेरिका में माल महंगा होगा पर कोई आर्डर अभी तक रद्द नहीं हुआ है। हमारे लिए दूसरे देशों के बाजार खुले हुए हैं। मगर अमेरिका में मांग घटी तो निर्यात को दूसरे देशों के बाजारों में मोड़ देंगे। वाणिज्यिक खुफिया एवं सांख्यिकी महानिदेशालय और जम्मू-कश्मीर आर्थिक सर्वे से कुल निर्यात तीन साल में बढ़कर 2023-24 में 1,162 करोड़ पहुंच गया। इसमें शॉल का निर्यात 477.24 करोड़ था। रोहतक का नट-बोल्ट उद्योग सालाना 5,000 करोड़ रुपए का कारोबार करता है। इसमें 70 फीसदी निर्यात अमेरिका को होता है। उद्यमियों का कहना है कि नया टैरिफ अगर लागू होता है तो न सिर्फ आपूर्ति प्रभावित होगी बल्कि कारोबार भी मुश्किल में आ जाएगा। चिंता की बात है कि कुछ कंपनियों को दो महीने से अमेरिका से कोई आर्डर नहीं मिला है। बड़ी कंपनियां पुराने आर्डर को पूरा करने में लगी हैं। भविष्य के लिए जो आर्डर मिले हैं। उनकी आपूर्ति पर टैरिफ का असर दिखेगा। अतिरिक्त टैरिफ से जिले की औद्योगिक इकाइयों के लिए दुनिया के बड़े बाजारों में माल बेचना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि उत्पाद 25 फीसदी तक महंगा हो जाएगा। इसका असर कंपनी पर सीधा न पड़कर ग्राहक पर पड़ेगा। जसमेर लाठा जिसने बताया हम अमेरिका, यूके, यूरोप में नट-बोल्ट की आपूर्ति करते हैं। टैरिफ के कारण यहां से करीब 50 करोड़ रुपए के ही आर्डर बुक हुए हैं। हमारा 70 फीसदी नट-बोल्ट अमेरिका जाता है। पहले कस्टम ड्यूटी तीन फीसदी थी। अब यह बढ़कर 25 फीसदी हो गई है । यह पिछले 40-50 वर्षों में बहुत ज्यादा है। इसके अलावा 25 फीसदी टैरिफ और भी है। इससे हमारा उत्पाद काफी महंगा हो जाएगा ऐसा यहां के उद्योग चलाने वालों का मानना है। मैंने यह तो सिर्फ हरियाणा के कुछ उद्योग और निर्यातकों की बात की है, शेष देश में प्रभावित उद्योगों की बात नहीं की। लाखों कामगार बेरोजगार होने की कगार पर खड़े हैं। पहले से ही बेरोजगारी देश में चरम पर है, इस नए धमाके का क्या असर पड़ेगा जल्द पता चल जाएगा। 
-अनिल नरेन्द्र