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Thursday, 7 November 2013

मंगलमय रहे भारत का पहला मंगल यान

रविवार को जब पूरा देश दीपावली की खुशियों में डूबा था, आंध्र पदेश के श्री हरिकोटा स्थित सतीश धवन पक्षेपण स्थल पर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिक एक नए तरह के थ्रिल से दो-चार थे। सुबह छह बजकर आठ मिनट पर देश के पहले मंगल अभियान की उल्टी गिनती शुरू करने के बाद उनकी निगह मार्स आर्बिटर  मिशन हर बारीक पहलू को टटोल रही थी। पिछले एक महीने से इस महत्वाकांक्षी मिशन के लिए 300 वैज्ञानिक दिन-रात एक किए हुए थे। मंगल ग्रह को लाल ग्रह भी कहा जाता है। आयरन आक्साइड की वजह से इसका धरातल लाल दिखाई देता है। इसके वातावरण में 95.32 फीसदी कार्बन डाइक्लाइड मौजूद है। पृथ्वी के मुकाबले चौड़ाई आधी है जबकि वजन में यह पृथ्वी का दसवां भाग है। मंगल ग्रह पर एक दिन 24 घंटे और 33 मिनट का होता है। पृथ्वी की तरह मंगल भी एक स्थलीय धरातल वाला ग्रह है। सौर मंडल का सबसे अधिक ऊंचा पर्वत आलेम्पस मोन्स मंगल पर ही स्थित है। मंगल के दो चंद्रमा फोबोस और डियोज हैं जो छोटे और अनियमित आकार के हैं। माना जाता है कि पृथ्वी पर जीवन को संभव बनाने वाले तत्व मंगल से धरती पर पहुंचे। मार्स आर्बिटर को पहले 28 अक्टूबर को लांच किया जाना था लेकिन खराब मौसम के कारण इस पक्षेपण को टालना पड़ा। मंगलवार को पृथ्वी से रवाना होने के बाद स्पेस काफ्ट गहरे अंतरिक्ष में करीब 10 महीने रहेगा। करीब 300 दिन। यान सितम्बर 2014 को मंगल के स्थानांतरण पक्षेप में पहुंचेगा। मंगल की कक्षा में पहुंचने की अपनी यात्रा के दौरान यान 200 से लेकर 400 मिलियन किमी की दूरी तय करेगा। मंगलवार पूरे देश के लिए मंगलमय रहा। बहुपतीक्षित मंगल अभियान के लिए भारत ने ध्रुवीय रॉकेट के माध्यम से सफलतापूर्वक अपना पहला मार्स आर्बिटर मिशन (एमओएम) पक्षेपित किया जिसके बाद मंगल यान विधिपूर्वक पृथ्वी की नियत कक्षा में पवेश कर गया। इसके साथ ही भारत का नाम अंतर ग्रह अभियान से जुड़े चुनिंदा देशों में शामिल हो गया। इसरो पमुख राधाकृष्णन ने कहा कि मार्स आर्बिटर पर लगे 5 सुंदर उपकरण भारतीय वैज्ञानिक समुदाय को महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराएंगे। एलएपी और एमएसएम वायुमंडलीय अध्ययन में मदद करेंगे। लाल ग्रह की सतह के चित्र में योगदान करेंगे। अभियान की लागत पर आलोचनाओं को दरकिनार करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि एमओएम मंगल के लिए सबसे सस्ते एवं कम लागत का अभियान है। यह अभियान मंगल की सतह से ज़ड़ी विशेषताओं, आकृतियों, खनिज विज्ञान और इसके पर्यावरण की स्वदेशी वैज्ञानिक उपकरणों से पड़ताल करेगा। भारत का यह मिशन दुनिया का सबसे किफायती मंगल मिशन होगा। आर्थिक संकट से जूझ रहे अमेरिका ने नासा के बजट में कटौती की है लेकिन इसके बावजूद अमेरिका मंगल मिशन पर सालाना 17.7 अरब डॉलर (करीब 900 अरब रुपए) खर्च कर रहा है। वहीं साढ़े चार अरब रुपए में मंगल पर उपस्थिति दर्ज कराकर भारत एक बड़ी उपलब्धि हासिल करेगा। मंगल ग्रह हमारी पृथ्वी से 40 करोड़ किमी की दूरी पर है और पृथ्वी से यान तक कोई निर्देश पहुंचने या वहां से सूचना आने में कुल 40 मिनट का वक्त लगेगा। सपनों को पंख लगाया था एक कारोबारी ने। बढ़ती आबादी के साथ धरती छोटी पड़ती जा रही है। कई देशों का मानना है कि कुछ 100 सालों में पृथ्वी पर इतने लोग होंगे कि जीना मुश्किल होगा। कई विकल्पों पर विचार हो रहे हैं। लाल ग्रह पर जीवित रहने की शून्य संभावना के बीच एक ऐसा शख्स भी है जिसके बारे में अधिसंख्य अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का मानना है कि वह मार्स पर बसने के सपने देख रहा है। इस व्यक्ति का नाम है बास लैडडार्य। उनके मिशन का नाम है मार्स वन। उनका दावा है कि अगर उनका मिशन कामयाब होता है तो आने वाली नस्लों के लिए एक मिशाल बन जाएगा। बास ने 2023 में मंगल ग्रह की धरती पर मानव को उतारने की चुनौती कबूली है, लेकिन यह एकतरफा सफर होगा। बास के इस सपने को वैज्ञानिकों एवं मीडिया का एक वर्ग शेखचिल्ली का ख्वाब करार दे रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि बास मंगल तक मानव को ले जाने के लिए भविष्य की किसी उन्नत तकनीक की परिकल्पना पेश नहीं कर रहे हैं बल्कि वह मौजूदा तकनीक की मदद से यह कारनामा करने का दावा कर रहे हैं। खैर यह तो भविष्य का विषय है। हम तमाम भारतीय वैज्ञानिकों को इस शानदार उपलब्धि के लिए बधाई देते हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने एक बार फिर दिखा दिया कि उनमें कितना दम-खम है। 

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