Tuesday, 3 March 2026

अयातुल्लाह खामेनेई की शहादत


मैं सबसे पहले ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को अपनी श्रद्धांजलि पेश करना चाहता हूं। दुनिया अयातुल्लाह खामेनेई की शहादत को याद रखेगी। उनकी बहादुरी की मिसाल शहादत के हर पा में अव्वल रहेगी। वह यह जानते थे कि वह अमेरिका और इजरायल के निशाने पर हैं और उन पर किसी भी क्षण हमला हो सकता है। फिर भी वह तेहरान छोड़कर नहीं भागे। न तो किसी बने शैल्टर में गए और न ही किसी गुप्त स्थान पर। उन्होंने अपने दफ्तर में काम करते हुए शहादत को गले लगाना चुना। वह अपने देश के लिए कुर्बान हो गए पर दुश्मन के सामने पीठ नहीं दिखाई। बेशक आज डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू खामेनेई को मारकर विजेता होने का दावा कर रहे हैं। लेकिन उन्होंने खामेनेई की हत्या करके बड़ा जोखिम मोल ले लिया है। खामेनेई की शहादत ने सारे ईरान व इस्लामी जगत को अमेरिका और इसरायल के खिलाफ खड़ा कर दिया है। उसके नतीजे सामने आने भी लगे हैं। कुवैत, यूएई, कतर, बहरीन पर ईरानी मिसाइलें गिर रही हैं। यूएई पर तो इस लेख लिखने तक 167 मिसाइलें गिर चुकी हैं। ईरानी पलटवार का कहर सबसे ज्यादा यूएई पर टूटा है। यूएई के रक्षा मंत्रालय ने कहा, ईरान की तरफ से देश के कई हिस्सों में अब तक 165 बैलिस्टिक मिसाइल, 2 ाtढज मिसाइल और 541 ईरानी ड्रोन से हमला किया जा चुका है। इनमें से 506 को हवा में रोककर नष्ट कर दिया गया, जबकि 35 देश के अन्य इलाके में गिरी। दुबई विशेष टारगेट पर है क्योंकि यहां अमेरिकी कंपनियों के मुख्यालय हैं और ईरान अमेरिका की आर्थिक ताकत को भारी नुकसान पहुंचाता है। इसलिए वह ऐसे स्थानों पर हमले कर रहा है जहां अमेरिका की सबसे बड़ी कंपनियां हैं। अयातुल्लाह अली खामेनेई मारे कैसे गए? यह प्रश्न सब पूछ रहे हैं। क्या कोई मोसाद-सीआईए का स्लीपर एजेंट था जिसने सटीक जानकारी दी थी कि खामेनेई किस समय कहां होंगे और मीटिंग में कौन-कौन होगा? बिना इस सटीक जानकारी के यह हमला संभव ही नहीं था। फिर सवाल यह भी उठता है कि ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम क्या कर रहे थे? वह इस मिसाइल या बमों को इंटरसेप्ट क्यों नहीं कर सके? क्या अमेरिका ने ईरान के राडार हमले से पहले जाम कर दिए थे? इसरायल के एफ-35 फाइटर जेट्स ने ईरान एयर डिफेंस को भेदते हुए तेहरान में खामेनेई बेत-ए-रहबरी पैलेस पर दो हजार किलो के 40 बंकर बस्टर बम गिराए। ये लेजर गाइडेड पैनिट्रेटर है यानि पैलेस के अंडरग्राउंड में भी छिपे खामेनेई को मार गिराया जा सके। इजरायली सेना ने कई तरह की मिसाइलों से भी हमला किया। हमले में रक्षा मंत्री अजीज नासिरजादेह, आर्मी चीफ आमिर हातामी और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के चीफ मोहम्मद पाकपुर समेत लगभग 40 आला अफसर और धार्मिक नेता मारे गए। सूत्रों के अनुसार इनमें से लगभग 15 खामेनेई के पैलेस में एक मीटिंग के लिए जमा हुए थे। अमेरिका और इजरायल चाहता है कि ईरान में निजाम यानि रजीम चेंज हो। देखना यह होगा कि वह अपने इस उद्देश्य में कितना कामयाब रहता है। फिलहाल तो ईरान की बदले की कार्रवाई से बचने का प्रयास हो रहा है। तेहरान ने बड़ी जवाबी कार्रवाई में कुवैत, कतर और बहरीन में अमेरिका के कई बड़े मिलिट्री बैस पर बैलिस्टिक मिसाइल दागी हैं। इनमें नुकसान की खबर भी आई है। सऊदी अरब और जार्डन में भी हमले की खबर है। अयातुल्लाह खामेनेई मरने से पहले ही दूसरी पंक्ति खड़ी करके गए थे। ईरान ने हमले के तुरन्त बाद ही जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी है। देखें, यह जंग आगे कितनी बढ़ती है, कहीं यह तीसरे विश्व युद्ध की शक्ल तो नहीं लेता? 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 28 February 2026

मोदी की इजरायल यात्रा और अरब मीडिया


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इजरायल यात्रा, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ उनके करीबी रिश्ते और इजरायली संसद में दिया गया उनका भाषण इन सबकी चर्चा अरब मीडिया में खूब हो रही है। अरब मीडिया इस यात्रा को सिर्फ भारत-इजरायल संबंधों के तौर पर नहीं बल्कि बड़े क्षेत्रीय समीकरणों के तौर पर पेश कर रहे हैं। कई अरब विश्लेषकों ने पा किया है कि जहां ऐतिहासिक रूप से भारत टू नेशन थ्योरी की बात कहता है और फिलस्तीनी क्षेत्र में शांति प्रयासों का समर्थन करता है, वहीं मोदी की लीडरशिप में वो इजरायल के बेहद नजदीक आ चुका है। अरब मीडिया इस बात पर भी फोकस कर रहा है कि भारत का मौजूदा स्टैंड इजरायल और फिलस्तिनियों के संबंध में उसके पारम्परिक स्टैंड से अलग दिशा में जा रहा है। जहां पहले भारत की विदेश नीति में इस बात पर जोर था कि इजरायल और फिलस्तीनी महत्वकांक्षा, दोनों से ही समान दूरी बनाए रखेगा, वहीं अब भारत की विदेश नीति के केंद्र में हित आधारित संबंध ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। अरब मीडिया के मुताबिक भारत अपने पड़ोसियों से तनावपूर्ण रिश्तों और अपनी सैन्य जरूरतों के मद्देनजर आज वो इजरायल के ज्यादा नजदीक जा रहा है। अरब मीडिया ने प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा के पा के साथ-साथ गाजा में इजरायल पर लगे नरसंहार के आरोपों को भी हाइलाइट किया। साथ ही भारत के विपक्षी नेताओं की उन टिप्पणियों को भी अपनी कवरेज में शामिल किया है जिनमें वो इजरायल पर लगे इन आरोपों के मद्देनजर पीएम की यात्रा का विरोध कर रहे हैं। अल जजीरा के इजरायल-फिलस्तीन मामलों के जानकार अन्जाम अबु अल अदस कहते हैं कि भारतीय प्रधानमंत्री की ये यात्रा गहरे रणनीतिक बदलाव का प्रतीक है। भारत-इजरायल साझेदारी इस क्षेत्र में एक नए क्षेत्रीय ध्रुवीकरण को जन्म देगी। आने वाले समय में मध्य पूर्व और एशिया की राजनीति में भारत-इजरायल की अहम भूमिका होगी। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी अपने भाषण में भारत के साथ सैन्य साझेदारी का संकेत दिया। इससे साफ है कि इस क्षेत्र में पाकिस्तान, तुर्की व सउदी अरब के संभावित गठबंधन को चुनौती पेश करने के लिए भारत और इजरायल सहयोगी देशों के रूप में नजदीक आ रहे हैं। भारत इजरायल के साथ इस गठबंधन को पाकिस्तान के साथ अपने क्षेत्रीय संघर्ष और एशिया में अपनी सैन्य, कूटनीतिक स्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। वहीं अल जजीरा ने मोदी के इजरायली संसद में दिए गए संबोधन पर लिखा ः गाजा में इजरायल पर नरसंहार के गंभीर आरोपों के बावजूद भारत ने इजरायल से एकजुटता दिखाई और प्रधानमंत्री मोदी ने गाजा में इजरायल के विनाशकारी युद्ध का बचाव करते हुए कहा कि इजरायल के साथ खड़ा है। भारत में अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने के लिए मोदी सरकार हिंदू राष्ट्रवाद का सहारा ले रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हमास के हमले का पा करते हुए कहा, हम आपका दर्द महसूस करते हैं, आपका दुख समझते हैं। कारण कोई भी हो नागरिकों की हत्या को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। गल्फ न्यूज ने भारत में नरेन्द्र मोदी की इस यात्रा की जिन विपक्षी नेताओं ने विरोध किया उसे भी कवर किया है और कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी के उस बयान को जगह दी है जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी इजरायली संसद में इजरायल के गाजा में किए गए नरसंहार का भी पा करेंगे। लंदन बेस्ड द न्यू अरब लिखता है कि मोदी एक कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी नेता है। जिन्होंने 7 अक्टूबर के हमले के बाद सबसे पहले इजरायल के साथ एकजुटता दिखाई थी। लेकिन भारत उन 100 से ज्यादा देशों में भी शामिल है जिन्होंने हाल ही में इजरायल के वेस्ट बैंक पर नियंत्रण के प्रयासों की और फिलस्तीनी प्राधिकरण के सीमित शक्तियों को कमजोर करने के इजरायल के इजरायल के प्रयासों की निंदा भी की है। इस समय यात्रा का क्या यह मतलब निकाला जाए कि भारत की विदेश नीति में भारी परिवर्तन आ रहा है। भारत को अब अरब देशों के रिएक्शन की कोई चिंता नहीं है? 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 26 February 2026

ट्रंप की धमकी, रमजान की रौनक


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हमले की लगातार धमकियों के बीच ईरान में रमजान को लेकर उत्साह में कोई कमी नहीं दिख रही है। स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार ईरान के भीतर सार्वजनिक जीवन नियमित रूप से चल रहा है। उधर ईरान से सटे इलाके में अमेरिकी सेना की लगातार बढ़ती तैनाती अब सिर्फ संकेत देने तक सीमित नहीं लगती बल्कि ये वास्तविक जंग के स्पष्ट संकेत हैं। अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस अब्राहिम लिंकन और यूएसएस फोर्ड के ईरानी जल क्षेत्र के पास पहुंचने से स्थिति बहुत गंभीर बनी हुई है। इसके अलावा सैकड़ों अमेरिकी फाइटर जेट व अन्य साजोसामान भी इस इलाके में पिछले कुछ दिनों में लाए गए हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका-इजराइल यहां कई स्तरों पर सैन्य कार्रवाई के लिए विकल्प तैयार कर रहे हैं। ईरान में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि ट्रंप अपनी बात मनवाने के लिए सैन्य दबाव बढ़ा रहा है। जंग की आहट के बावजूद ईरान में सब सामान्य दिख रहा है। मस्जिदों में विशेष नमाज, बड़े इफ्तार आयोजन और सदका-फितर प्रमुखता से हो रही है। इस्लामिक रिपब्लिकन न्यूज एजेंसी ने रमजान के अवसर पर राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन का संदेश प्रकाशित किया है। इसमें उन्होंने इस महीनों को आत्मचिंतन और एकजुटता का समय बताया। उन्होंने कहा कि दुनिया की शक्तियां हमें अपना सिर झुकाने के लिए साजिश कर रही है... लेकिन वे हमारे लिए जो भी समस्याएं पैदा करें, हम अपना सिर नहीं झुकाएंगे। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई ने अमेरिका को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि अगर अमेरिका हमला करता है तो इससे पश्चिम एशिया में एक क्षेत्रीय (रीजनल) युद्ध छिड़ सकता है, तनाव और अधिक बढ़ सकता है। खामनेई ने कहा कि ईरान उकसाने की नीति नहीं अपनाता लेकिन उन्होंने साफ किया कि ईरानी राष्ट्र पर अगर कोई हमला या उत्पीड़न किया गया तो ईरान ऐसा कडा जवाब देगा जिसका अमेरिका-इजराइल को अंदाजा नहीं। हम पर कोई भी स्ट्राइक हो चाहे वह लिमिटेड स्ट्राइक ही क्यों न हो पर उसका पूरी ताकत से जवाब देंगे। मध्यपूर्व के तमाम अमेरिकी सैन्य बेसों सहित उनके युद्धपोत भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार अपनी शर्तें बदल रहे हैं। पहले उन्होंने तीन शर्तें रखी थीं: ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम खत्म करे, अपनी मिसाइलों की प्रोडक्शन और क्षमता कम करे। ईरान से अमेरिका की इस सिलसिले में दो बार जेनेवा में वार्ता विफल हो चुकी है। अब तीसरे और अंतिम राउंड की बात हो रही है। इस बीच डोनाल्ड ट्रंप ने अब कहा है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। अमेरिका इन तरीकों से ईरान को घेरने की युद्ध नीति पर काम कर रहा है। जंगी जहाजों की तैनाती, अरब सागर में तैनात अमेरिका के विशाल विमान वाहक पोतों को घेरने की है। पहले बड़ी संख्या में टैंक से जहाजों के सुरक्षा सिस्टम को उलझाएंगे, ताकि वे मिसाइल को रोकने में कामयाब रहें। दूसरीः खाड़ी देशों के मौजूद अमेरिका के 19 ठिकानों पर करीब 50,000 सैनिक किसी भी समय हमले में भाग ले सकते हैं। हालांकि यही सैनिक ईरान के निशाने पर होंगे। तीसरीः तेल सप्लाई रोकना। अमेरिका इस प्रयास में है कि ईरान किसी भी देश को अपने यहां से तेल सप्लाई न कर सके ताकि उसकी आर्थिक स्थिति बिगड़े। उसने भारत पर भी दबाव डाला है कि भारत ईरान से तेल लेना बंद करे। इस बीच इजराइल से एक अपुष्ट खबर सोशल मीडिया पर चल रही है कि इजराइल ने अब चेतावनी दी है कि अगर उसके अस्तित्व पर खतरा हुआ तो वह ऐसे हथियार चलाएगा जो अभी तक इस्तेमाल नहीं हुए। इशारा साफ है कि परमाणु बम का इस्तेमाल भी कर सकता है। कुल मिलाकर बड़ी विस्फोटक स्थिति बनी हुई है। उम्मीद की जाती है कि जंग टले क्योंकि अगर यह होती है तो इसका असर पूरे विश्व पर पड़ सकता है।
- अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 24 February 2026

फैसला ट्रंप के टैरिफ रद्द करने का

मानना पड़ेगा कि अमेरिका में आज भी लोकतंत्र जिंदा है। संविधान सवरेपरि है। अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने दिखा दिया कि वह संविधान की रक्षा करने में किसी के सामने न तो झुकने को तैयार है और न ही किसी दबाव में आएगी। चाहे वह अमेरिका के राष्ट्रपति ही क्यों न हों। अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने शुव्रवार को फैसला सुनाया कि राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप का वैश्विक टैरिफ अवैध है। अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश चीफ जस्टिस जॉन रॉबट्र्स ने पैसला 6-3 के बहुमत से दिया। यानि छह जजों ने टैरिफ को अवैध बताया और तीन इससे असहमत थे। ट्रंप अमेरिकी व्यापार समझौतों को नए सिरे से करने के लिए दुनियाभर में टैरिफ को दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। यह पहली बार है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के दूसरे कार्यंकाल की किसी नीति को निर्णायक रूप से रद्द किया है। अन्य क्षेत्रों में अदालत के वंजर्वेटिव बहुमत ने अब तक ट्रंप को कार्यंकारी शक्तियों के व्यापाक उपयोग की छूट दी थी। इस बार सुप्रीम कोर्ट में छह जजों के बहुमत, तीन वंजर्वेटिव और तीन लिबरल ने कहा कि बिना कांग्रेस (अमेरिकी संसद) की स्पष्ट अनुमति के इतने व्यापक टैरिफ लागू कर ट्रंप ने सीमा लांघी हैं। अदालत ने ट्रंप के इस तर्व को खारिज कर दिया कि 1977 का कानून इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट, अप्रत्यक्ष रूप से टैरिफ की अनुमति देता है। जस्टिस रॉबट्र्स ने कहा कि राष्ट्रपति जिस अधिकार का दावा कर रहे हैं, वह किसी भी पैमाने पर सीमा से बाहर का था। चीफ जस्टिस ने पैसले में लिखा है, अगर कांग्रेस टैरिफ लगाने जैसी असाधारण शक्ति देना चाहती कि वह इसे स्पष्ट रूप से कर सकती है। उन्होंने यह भी लिखा कि ट्रंप प्रशासन के कानूनी तर्को को स्वीकार करना व्यापार नीति पर कार्यंपालिका और विधायिका के लम्बे सहयोग को समाप्त कर राष्ट्रपति को अनियंत्रित ताकत देना होगा। ट्रंप के टैरिफ को अवैध बताने के पैसले से तीन वंजर्वेटिव जजों क्लेरेंस थॉमस, सैमुअल एलिटो और ब्रेट वैवनॉ ने असहमति जताईं। ट्रंप ने तीन जजों की तारीफ भी की है। वैदनो ने कहा कि कईं कानून राष्ट्रपतियों को टैरिफ और आयात प्रतिबंध लगाने की अनुमति देते हैं। उनके अनुसार 1977 का कानून राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान विदेशी खतरों से निपटने के लिए राष्ट्रपति को अनुमति देते हैं। उधर, ट्रंप ने एक प्रेस कॉन्प्रेंस में पैसले को भयानक और हास्यास्पद बताया और कहा कि वह अदालत के वुछ सदस्यों से शर्मिदा हैं। उन्होंने कहा कि यह निर्णय गलत है। लेकिन इससे कोईं फर्व नहीं पड़ता क्योंकि हमारे पास बहुत शक्तिशाली विकल्प है। ट्रंप के पास दो बड़े विकल्प हैं। पहला: ट्रंप अमेरिकी कांग्रेस यानि प्रतिनिधि सभा और सीनेट में टैरिफ के प्रस्ताव को पास कराने के लिए रख सकते हैं। 435 की प्रतिनिधि सभा में ट्रंप के रिपब्लिकन 218 जबकि विपक्षी डेमोव्रेट 213 है जबकि 100 सीनेट में रिपब्लिकन 53 और डेमोव्रेट 47 हैं। टैरिफ के खिलाफ सेंटीमेंट को देख ट्रंप संसद में टैरिफ को रखने से शायद परहेज करें। अन्य प्रावधान लागू कर सकते हैं, पर लम्बी प्रव्रिया होगी। ट्रंप अमेरिकी संविधान की धारा 301 के तहत टैरिफ के प्रावधान लागू कर सकते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के तहत टैरिफ को जायज ठहराया जाता है। ट्रंप ने चीन, कनाडा और मैक्सिको पर इन्हीं प्रावधानों के तहत टैरिफ लगाया था। हालांकि इन्हीं प्रावधानों को भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। ट्रंप ने भी ऐलान कर दिया है कि वह पीछे नहीं हटेंगे। शुव्रवार रात उन्होंने कहा कि अन्य कानूनी अधिकारों के आधार पर नया 10 प्रतिशत वैश्विक टैरिफ लगाने के आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं। ट्रंप ने कहा कि हम पीछे नहीं हटेंगे, हम और ज्यादा पूंजी जुटाएंगे। देखें, आगे क्या होता है। सारी दुनिया में अब रिपंड की मांग भी उठनी शुरू हो गईं है। आगे-आगे देखते हैं होता है क्या? ——अनिल नरेन्द्र

Saturday, 21 February 2026

अजित पवार विमान हादसा

 
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित दादा पवार के विमान हादसे के करीब 20 दिन बाद उनके बेटे ने चुप्पी तोड़ी। अजित पवार के छोटे बेटे जय पवार ने एक बेहद भावुक पोस्ट के जरिए जांच पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जय पवार ने सीधे तौर पर कहा है कि विमान का ब्लैक बाक्स इतनी आसानी से नष्ट होने वाली चीज नहीं है। बता दें कि किसी भी विमान हादसे में जब सब कुछ नष्ट हो जाता है तो उसके अंदर ब्लैक बॉक्स न तो आग से, पानी से, जमीन पर गिरने से, विस्फोट से नष्ट नहीं होता। 20 वर्षों तक वह सुरक्षित रहता है। जय पवार ने साफ तौर पर कहा है कि ब्लैक बॉक्स  इतनी आसानी से नष्ट होने वाली चीज नहीं है, जैसा कि दावा किया जा रहा है। जनता को सब जानने का हक है। जय पवार ने सिस्टम को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने लिखा विमान दुर्घटना में ब्लैक बॉक्स आसानी से  नष्ट नहीं हो सकते। महाराष्ट्र की जनता को इस दिल दहला देने वाली दुर्घटना का पूरा, पारदर्शक और निर्विवाद सत्य जानने का अधिकार है। जय पवार ने विमान कंपनी वीएसआर के खिलाफ तत्काल सख्त कदम उठाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि इस कंपनी के उड़ान व संचालन पर तुरन्त प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए और विमानों के रखरखाव में हुई संभावित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। पोस्ट के अंत में उन्होंने बेहद भावुक होकर लिखा ः मिस यू डैड। उधर अजित पवार के भतीजे और विधायक रोहित पवार ने कहा कि अजित दादा पवार की आकस्मिक मृत्यु में साजिश की आशंका है। रोहित पवार ने मुंबई में दावा किया कि कई सूत्रों से विस्तृत जानकारी जुटाने के बाद ही वह प्रेस कांफ्रेंस कर रहे हैं। प्रेस कांफ्रेंस में रोहित पवार ने कहा कि उन्हें एयरलाइंस कंपनी वीएसआर, बुकिंग संभालने वाली कंपनी एरो और पायलट सुमित कपूर पर संदेह हैं। उन्हेंने कहा कि उन्हें इस मामले में जानकारी इसलिए जुटानी पड़ी क्योंकि जांच एजेसियां बहुत धीमी गति से काम कर रही है। अजित दादा पवार परिवार और एनसीपी ने अब इस मामले की सीबीआई जांच की मांग तेज कर दी है। उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस से मुलाकात कर इस मामले में उच्चस्तरीय जांच का निवेदन सौंपा है। प्रफुल्ल पटेल, हसन मुश्रीफ, सुनील तटकरे और पार्थ पवार जैसे दिग्गजों की मौजूदगी में सरकार से मांग की गई है कि इस हादसे के पीछे की हर साजिश या लापरवाही का पर्दाफाश होना चाहिए। इनका सीधा निशाना उस एविएशन कंपनी पर है जिसका विमान इस हादसे का शिकार हुआ। आरोप लग रहे हैं कि क्या विमान की सर्विसिंग और सुरक्षा मानकों में कोई कोताही बरती गई थी? 28 जनवरी को हुए इस हादसे में अजित दादा पवार सहित कुल 5 लोगों ने अपनी जान गंवाई। इस घटना के बाद से ही यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह मात्र एक दुर्घटना थी या कोई गहरी साजिश? आदरणीय अजित दादा पवार के आकस्मिक निधन से पूरे महाराष्ट्र को गहरा धक्का लगा है, यह कहना है सांसद सुप्रिया सुले का। एनसीपी (शरद गुट) ने मांग की है कि इस दुर्घटना की जांच पूरी होने तक नागर विमानन मंत्री के राममोहन नायडू को उनके पद से हटा दिया जाए। हमारा भी मानना है कि इस मामले की निष्पक्ष, स्वतंत्र जांच आवश्यक है ताकि दुर्घटना के कारणों का साफ पता चले पर ऐसा होगा क्या? 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 19 February 2026

निखिल गुप्ता को हो सकती है 40 साल जेल


एक भारतीय व्यक्ति ने पावार को न्यूयार्क में सिख अलगाववादी नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू की 2023 में हत्या की नाकाम साजिश रचने के आरोप में दोष स्वीकार किया है। पता नहीं पिछले कुछ दिनों से भारत और अमेरिका के ग्रह टकरा रहे हैं। एक के बाद एक नई समस्या खड़ी होती जा रही है। पहले गौतम अडानी का मामला फंसा, फिर भारत-अमेरिका ट्रंप डील पर विवाद खड़ा हो गया और अब पन्नू की हत्या की साजिश में मामला फंस गया है। अमेरिकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा है कि यह उस मामले में पहली बार अपराध स्वीकार किया गया है जिसे कनाडा और अमेरिका के अधिकारियों ने भारत सरकार की ओर से असंतुष्टों की हत्या के अभियान से जुड़ा बताया था। अमेरिका में भारतीय मूल के निखिल गुप्ता ने अलगाववादी नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की कथित साजिश रचने के मामले में अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। इस मामले की सुनवाई न्यूयार्क की एक अदालत में हो रही है। अटार्नी के दफ्तर से जारी हुए बयान के मुताबिक गुप्ता ने हत्या के लिए सुपारी देने, हत्या की साजिश रचने के साथ ही मनी लांड्रिंग की साजिश से जुड़े तीनों आरोपों को स्वीकार कर लिया है। गुप्ता को 27 मई को सजा सुनाई जाएगी। अमेरिका में इन तीनों आरोपों में सम्मिलित तौर पर 40 साल की सजा हो सकती है। गुप्ता के 30 जून 2023 को चेक रिपब्लिक से गिरफ्तार किया गया था और बाद में उसका प्रत्यर्पण किया गया। आरोप है कि निखिल गुप्ता ने ये साजिश भारतीय सरकारी कर्मचारी रहे विकास यादव के कहने पर रची, इस संबंध में विकास यादव को सीसी-1 कहकर संबोधित किया गया है। इस संबंध में मार्च 2025 में ही विदेश मंत्रालय ने कहा था कि वो (विकास यादव) अब भारत सरकार के कर्मचारी नहीं है। आरोप पत्र के मुताबिक 2023 में यादव ने गुप्ता को हत्या का काम सौंपा था। यादव के कहने पर गुप्ता ने एक ऐसे व्यक्ति से संपर्क किया जो असलियत में अमेरिका की जांच एजेंसी डीईए का ही अंडरकवर एजेंट था विकास यादव ने एक सहयोगी के जरिए इस हिटमैन को अग्रिम भुगतान के तौर पर 15 हजार डालर दिए। 2023 में ही विदेश मंत्रालय ने कहा था कि निखिल गुप्ता को तीन बार चेक गणराज्य में काउंसलर मदद दी गई। यूं तो मामला अमेरिका में 2023 से चर्चा में है, लेकिन इस मामले में इस हालिया घटपाम की टाइमिंग को भी अहम माना जा रहा है। जब भारत और अमेरिका के संबंध बहुत सहज नहीं हैं और दोनों देशों के बीच ट्रेड को लेकर एक व्यापार के अंतरिम समझौते के अगले महीने तक आखिरी रूप लेने की उम्मीद है। ऐसे में भारत के लिए आगे की राह आसान नहीं दिखती। न्याय विभाग ने पन्नू की हत्या को साजिश और 18 जुलाई को कनाडा में खालिस्तानी निज्जर की हत्या के बीच कई लिंक जोड़े हैं। एफबीआई के सहायक निदेशक रोमन रोज से जावस्की ने कहा अमेरिकी नागरिक सिर्फ बोलने की आजादी का इस्तेमाल करने के लिए ट्रांसनेशनल रिप्रेशन का निशाना बना। यानी दमन के लिए किसी दूसरे देश की धरती का इस्तेमाल की साजिश है। इन शब्द का इस्तेमाल कनाडाई अधिकारियों ने कनाडा में निज्जर की हत्या पर किया था। भारत सरकार के इशारे पर की गई बताई गई है जिसे भारत सिरे से खारिज कर चुका है। भारत ने पिछले साल नवम्बर में अमेरिका की ओर से उठाई गई सुरक्षा चिंताओं पर विचार करने के लिए एक उच्चस्तरीय जांच एजेंसी गठित की थी। अक्टूबर 2024 में भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस बात की पुष्टि की थी कि पन्नू के खिलाफ नाकाम हत्या की साजिश से जुड़े अमेरिकी न्याय विभाग के अभियोग में जिस व्यक्ति (विकास यादव) का नाम सामने आया था, वह अब भारत सरकार की सेवा में नहीं है। मूल अभियोग में सरकारी अधिकारी को सीसी-1 कहा गया था। अक्टूबर 2024 में ही अमेरिकी अधिकारियों ने दूसरा संशोधित अभियोग सार्वजनिक किया, जिसमें सीसी-1 की पहचान विकास यादव के रूप में की गई। बाद में विदेश मंत्रालय ने कहा कि विदेश विभाग ने हमें सूचित किया कि अभियोग में उल्लेखित व्यक्ति अब भारत में कार्यरत नहीं है। हम पुष्टि करते हैं कि वह अब भारत सरकार के कर्मचारी नहीं हैं। अब देखना यह है कि निखिल गुप्ता के खिलाफ अमेरिकी अदालत में केस आगे कैसे बढ़ता है। यह भी देखना होगा कि विकास यादव को लेकर अमेरिका भारत पर कितना दबाव बनाता है और भारत सरकार आगे क्यों करेगी? 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 17 February 2026

जैफ्री एपस्टीन फाइल्स


आपने ताशकंद फाइल्स, केरला फाइल्स, कश्मीर फाइल्स और बंगाल फाइल्स का तो नाम सुना होगा और आप में से कईयों ने इन्हें देखा भी होगा पर आज मैं आपको विश्व चर्चित एपस्टीन फाइल्स के बारे में बताता हूं। जैफ्री एपस्टीन कौन था? एपस्टीन फाइल्स जी हां, यही वो दो शब्द हैं जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके प्रशासन को महीनों से परेशान कर रहे हैं। जैफ्री एपस्टीन अमेरिका का एक अमीर फाइनेंसर था। उस पर महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और तस्करी के गंभीर आरोप लगे थे। समय के साथ उसने काफी दौलत बनाई और उसके बाद उसके संबंध बड़े कारोबारियों, राजनेताओं और अंतर्राष्ट्रीय हस्तियों से जुड़ते चले गए। साल 2019 में उसे अमेरिका के फ्लोरिडा और न्यूयार्क में नाबालिगों की यौन तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इससे पहले वह 2008 में भी ऐसे ही मामलों में जेल जा चुके थे। लेकिन तब उसे बहुत कम सजा मिली थी। अगस्त 2019 में जेल में उसकी रहस्यमय ढंग से मौत हो गई। जिसे अमेरिकी सरकार ने आत्महत्या बताया। एपस्टीन फाइलें उन सरकारी डाक्यूमेंट का संग्रह है जो उनके खिलाफ जांच से जुड़े हैं। इनमें पूछताछ के रिकार्ड, अदालत से जुड़े कागजात और अन्य सुबूत शामिल हैं। एपस्टीन की रहस्यमय मौत के बाद से ही लोग ये जानना चाहते थे कि उसके मामलों में किन-किन लोगों का हाथ रहा है। जब ये फाइलें सामने आई तो वहीं बड़े नामों का पा होने के कारण बहस और तेज हो गई। बाल यौन शोषण के दोषी जैफ्री एपस्टीन के यौन अपराधों को लेकर ट्रंप प्रशासन लगातार संकट से जूझ रहा है। अमेरिका की हाउस ओवर साइट कमेटी ने एपस्टीन से जुड़े लाखों दस्तावेज जारी किए हैं। इनमें ई-मेल, वीडियो, चैट इत्यादि शामिल हैं। मामला एक नाबालिग लड़की से छेड़छाड़ के बाद सामने आया। तब एक लड़की (14 वर्ष) के माता-पिता ने फ्लोरिडा में पुलिस को बताया कि जैफ्री एपस्टीन ने अपने पाम बीच स्थित घर में उनकी बेटी से छेड़छाड़ की थी। पूरे घर में लड़कियों की तस्वीरें मिलीं और उसे एक नाबालिग से वेश्यावृत्ति कराने का दोषी ठहराया गया। एपस्टीन को यौन अपराधी के रूप में पंजीकृत किया गया। 11 साल बाद 2019 में उस पर फिर आरोप लगा कि वह नाबालिग लड़कियों का सैक्स रैकेट व नेटवर्क चला रहा है। जेल में ट्रायल का इंतजार करते हुए उसकी मौत हो गई। जिसे आत्महत्या बताया गया। इन दिनों चर्चा में बहुत सारे दस्तावेज जमा हुए हैं। जैसे पीड़ितों और गवाहों के बयान उनके घरों में छापे में मिली चीजें। 2025 में अमेरिका के न्याय विभाग के एक मंत्री के मुताबिक इस मामले में एफबीआई के पास 300 गीगाबाइट (जीबी) से ज्यादा डेटा और सबूत हैं। न्याय विभाग कहता है कि इनमें पीड़ितों की बहुत सारी तस्वीरें और वीडियो हैं। जो बच्चों के शोषण से जुड़ी हुई है। इन्हें सार्वजनिक नहीं किया जाएगा क्योंकि नया कानून सर्वाइवर की पहचान छिपाने की इजाजत देता हैं। यही जानकारी एपस्टीन फाइल्स हैं, जो समय-समय पर जारी हो रही है। एपस्टीन फाइल्स से जुड़े 30 लाख नए दस्तावेज जारी किए गए हैं। कुछ सामग्री पहले ही सार्वजनिक हो चुकी है। जैफ्री एपस्टीन से जुड़े मामलों में एक अत्यन्त गंभीर और चौंकाने वाला आरोप सामने आया है। अमेरिका के न्याय विभाग द्वारा हाल ही में जारी कई फाइलों में नाबालिग लड़कियों और महिलाओं से दरिंदगी का खुलासा हुआ है। एक फाइल के अनुसार दो विदेशी महिलाओं की मौत यौन संबंधों के दौरान गला घोंटने के कारण हुई थी। बाद में एपस्टीन के एक कर्मचारी ने उन्हें न्यू मैक्सिको स्थित फार्म हाउस जोरो रैंच में दफना दिया। इसमें एपस्टीन की करीबी सहयोगी गिस्लेन मैक्सवेल भी शामिल थीं। यह गिस्लेन मैक्सवैल कौन थीं, इसके बारे में फिर बताऊंगा। एक अन्य फाइल के अनुसार एक नाबालिग लड़की ने खुद को ह्यूमन इंक्यूवेटर की तरह इस्तेमाल किए जाने का दावा किया है। ई-मेल के अनुसार जोरो रैंच में लड़कियों को लंबे समय तक बंद रखा गया और उनसे जबरन गर्भधारण कराया गया। बच्चे पैदा कराए गए और जन्म के बाद ये बच्चे गायब हो गए। मैंने जैफ्री एपस्टीन जो कि एक मनुष्य नहीं था जानवर से भी बदतर था उसके बारे में कुछ जानकारी दी है। चूंकि यह मामला अभी चल रहा है इसलिए जो भी अपडेट होगी आप तक लाने की कोशिश करूंगा। इस नरभक्षी की परतें खुलती जा रही हैं। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 14 February 2026

एपस्टीन से मेरी मुलाकात हुई थी


सारी दुनिया में इस समय इस एपस्टीन फाइल्स की चर्चा हो रही है। अमेरिका में नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और मानव तस्करी के आरोपी अरबपति जेफ्री एपस्टीन से जुड़े गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक होते ही दुनिया की सत्ता और रसूख के गलियारों में हलचल मच गई है। जैफ्री एपस्टीन की पूरी कहानी किसी और दिन बताऊंगा, आज तो एपस्टीन फाइल्स और भारत के एक मंत्री का नाम सामने आने के बारे में बताऊंगा। एक लंबे गतिरोध के बाद बुधवार को लोकसभा में बजट पर बोलते हुए विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अमेरिका और भारत की ट्रेड डील पर मोदी सरकार पर कई आरोप लगाए। उन्होंने कई आर्थिक मुद्दों पर सवाल उठाएं। अपने भाषण में नेता प्रतिपक्ष ने जेफ्री एपस्टीन फाइल्स, अनिल अंबानी और अडानी से जुड़े मामलों पर भी बोले। उन्होंने अनिल अंबानी और केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी पर भी आरोप लगाए। राहुल गांधी की ओर से इन मुद्दों को उठाने के बाद सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तनाव बढ़ गया। चूंकि लोकसभा की चर्चा में हरदीप पुरी का नाम आ गया था। इसलिए मंत्री हरदीप पुरी ने बाद में बाकायदा एक प्रेस कांफ्रेंस की और अपना पक्ष रखा। हरदीप पुरी ने कहा कि एपस्टीन से उनकी मुलाकात केवल तीन-चार मौकों पर वह भी एक प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के तौर पर हुई थी और उनके साथ सिर्फ एक ई-मेल का आदान-प्रदान हुआ था। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी के आरोपों को निराधार बताया और स्पीकर से अनुरोध किया कि राहुल गांधी के भाषण की गलत बातों को कार्रवाई से हटा दिया जाए। उधर राहुल गांधी ने एपस्टीन फाइल्स का पा करते हुए कहा कि केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने कि अनिल अंबानी का परिचय अमेरिकी निवेशक और यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन से कराया था। उन्होंने कहा एक बिजनेसमैन है अनिल अंबानी, मैं पूछना चाहता हूं कि वो जेल में क्यों नहीं है? मैं हरदीप पुरी से भी पूछना चाहता हूं, जिन्होंने उन्हें एपस्टीन से परिचय करवाया था। हरदीप पुरी ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में कई बातें कहीं। उन्होंने कहा एपस्टीन से जुड़ी 30 लाख फाइलें रिलीज हुई है और मैं न्यूयार्क में आठ साल रहा। मैं संयुक्त राष्ट्र में भारत का राजदूत बनकर 2009 में पहुंचा था और 2017 में मैं मंत्री बना और आठ सालों में संभवत तीन या चार मीटिंग का संदर्भ है। अमेरिका में भारतीय राजदूत के पद से रिटायर होने के कुछ महीने बाद मुझे इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट (आईपीआई) में आयोजित किया गया था। मैं आईसीएम के अध्यक्ष जो आस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री थे के साथ एक डेलीगेशन में एपस्टीन से मिला था। हरदीप पुरी का कहना था कि एपस्टीन से जुड़े अन्य मामलों से उनका कोई लेना-देना नहीं है। हरदीप पुरी की प्रेस कांफ्रेंस के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने एक्स पर पोस्ट डालते हुए पुरी से कुछ 6 सवाल पूछे। पवन खेड़ा ने लिखा ः हरदीप पुरी ने कहा कि उनके सदस्यों ने उन्हें रीड हाफमैन से मिलवाया था। लेकिन जो उन्होंने नहीं कहा, वह ज्यादा मायने रखता है। 4 अक्टूबर 2014 को एपस्टीन ने हरदीप पुरी को ई-मेल किया गया रीड से मुलाकात हुई? पुरी ने जवाब दियाः क्या मैं आज दोपहर एक मीटिंग के लिए सैन फ्रांसिस्को में हूं। मेरे दोस्त, तुम तो चीजें करवा देते हो। कोई सलाह? इसके बाद खेड़ा ने एक्स पर की गई पोस्ट में 6 सवाल पूछे, ये सवाल थे - पहला ः एपस्टीन की रीड के साथ उनकी मुलाकात के बारे में पहले ही कैसे पता चल गया? दूसरा ः क्या एपस्टीन ही वह कंटैक्ट था जिसने रीड हॉफमैन के साथ मुलाकात करवाई थी? तीसरा ः हरदीप उनसे मुलाकात की जानकारी क्यों डिस्कस कर रहे थे? चौथा ः एपस्टीन को दोस्त कह के क्यों संबोधित किया था? पांचवां ः एपस्टीन हरदीप के लिए क्या करवा रहा था? छठा ः अगर उनका संबंध महज एक संयोगवश या सतही था तो हरदीप पुरी एपस्टीन से सलाह क्यों मांग रहे थे? एपस्टीन फाइल्स में लाखों दस्तावेज, वीडियो, ईमेल हैं। अभी बहुत से खुलासे बाकी हैं। इन फाइल्स के खुलासों के कारण अब तक 10 देशों में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे राजनेता, उद्योगपति, नौकरशाह, राजघराने से जुड़े महत्वपूर्ण लोगों के इस्तीफे हो चुके हैं और 80 की जांच जारी है। अभी तो मामला शुरू हुआ है, आगे-आगे देखिए होता है क्या? 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 12 February 2026

ट्रंप झुकेगा बस झुकाने वाला चाहिए


अमेरिका के सर्वशक्तिमान, रेम्बो डोनाल्ड ट्रंप ईरान के सामने झुक गए हैं। पिछले एक पखवाड़े से ज्यादा ट्रंप की फौजों, समुद्री जहाजों, फाइटर जैट्स ने ईरान को चारो तरफों से घेरा हुआ है पर ट्रंप ने हमला अभी तक नहीं किया। अरबों डॉलर खर्च करके भी उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही कि ईरान पर हमला करे। दरअसल ईरान ने दिखा दिया है कि सैनिक तैयारी कैसी है। ईरान के पास ऐसी-ऐसी मिसाइलें हैं जो इजरायल तो छोड़िए अमेरिका तक मार कर सकती है। मध्य पूर्व में जहां-जहां भी अमेरिकी सैनिक अड्डे हैं वह सब ईरान की मिसाइलों की रेंज में हैं और यही तथ्य सउदी अरब, कतर, मिस्र, कुवैत आदि अरब देशों को सता रहा है। इजरायल ने तो 12 दिन की जंग में देख ही लिया था कि ईरान कितना विनाश कर सकता है। उसे डर है कि अब अगर लड़ाई छिड़ी तो वह तो नक्शे से ही मिट सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को समझ नहीं आ रहा था कि वह आगे कैसे बढ़े? वह इतने आगे आ चुका है, अब पीछे हटना भी नाक कटाने जैसा होगा। इसलिए कुछ समय के लिए ट्रंप ने वार्ता का रास्ता चुना है। ओमान में अमेरिका और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत का पहला दौर पूरा हो चुका है। दोनों पक्ष आगे वार्ता जारी रखने पर सहमत हुए हैं। लेकिन तनाव बरकार है और जंग की तैयारी पूरी चल रही है। खाड़ी देश ओमान की राजधानी मस्कट में शुक्रवार को अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता हुई। दोनों देश आमने-सामने नहीं बैठे, बल्कि ओमान के विदेश मंत्री बदर अल बुसैदी संदेशवाहक की भूमिका में रहे। ईरान की ओर से विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची शामिल हुए जबकि अमेरिका की तरफ से विशेष दूत स्टीव विरकॉम और ट्रंप के दामाद जेरेड कोरी कुशनर मौजूद रहे। बातचीत से ठीक पहले डोनाल्ड ट्रंप खुली चुनौती दे चुके थे कि अगर ईरान ने परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए या अपनी मिसाइलों की दूरी कम नहीं की तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई कर सकता है। डोनाल्ड ट्रंप की धमकी के बावजूद ईरान ने दो टूक कहा कि न तो उसका यूरेनियम संवर्धन बंद होगा न ही वह अपनी मिसाइल प्रोडक्शन को सीमित या कम करेगा और न ही अपने प्रवासियों, हिजबुल्ला, हूती, हमास, इत्यादी को अपना समर्थन बंद करेगा। हां वह अमेरिका के साथ अपने न्यूक्लियर प्रोडक्शन पर बात कर सकता है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने काहिरा में कहा कि परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका के साथ हुई वार्ताओं के बाद कड़ा रुख अपनाते हुए रविवार को कहा कि ताकतवर देशों के आगे नहीं झुकने से ईरान को ताकत मिलती है। अरागची ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि अमेरिका के साथ बातचीत का नया दौर जल्द शुरू होगा। उन्हेंने एक दिन पहले हुई वार्ता को एक अच्छी शुरुआत बताया, साथ ही चेताया कि भरोसा फिर से बनाने में समय लगेगा। अल जजीरा के साथ एक इंटरव्यू में अरागची ने यह भी साफ किया कि तेहरान अपने यूरेनियम एग्रीमेंट प्रोग्राम को नहीं छोड़ेगा जिसे उन्होंने एक ऐसा अधिकार कहा जिसे अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि उनका देश एक ऐसे एग्रीमेंट के लिए तैयार है जो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को भरोसा दिलाए और साथ ही उसकी संवर्धन गतिविधियों को भी बचाए। इंटरव्यू के दौरान उन्होंने अमेरिका की इस मांग को भी खारिज कर दिया कि ईरान अपने मिसाइल प्रोग्राम पर रोक लगाए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरी ओर वार्ता विफल होने पर ईरान को घातक अंजाम भुगतने की धमकी दी है। ट्रंप ने कहा कि अगर ईरान परमाणु समझौता करने में विफल रहता है तो उसे वेनेजुएला से भी गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। अब देखना है कि मध्य पूर्व में शांति होती है या जंग। ईरान अपने स्टैंड पर अड़ा हुआ है और कहीं भी झुकने को तैयार नहीं है। पहला राउंड तो ईरान ने जीत लिया है। अब गेंद ट्रंप के पाले में है देखते हैं कि मध्य पूर्व में शांति होती हैं या जंग?
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 10 February 2026

यह जानलेवा कोरियन लव गेम


गाजियाबाद में तीन सगी बहनों का 9वीं मंजिल से कूदकर जान देने की घटना ने एक बार फिर इन जानलेवा गेम्स की भारी कीमत चुकाने की याद दिला दी है। इस घटना को महज आत्महत्या कहना सच्चाई से आंखें मूंदना जैसा होगा। इन तीन नाबिलग बच्चियों की दर्दनाक मौत ने एक बार फिर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। गाजियाबाद के शालीमार गार्डन की यह घटना कई दिनों सुर्खियों में है और कई तरह की बातें कही जा रही हैं। शालीमार गार्डन के एसीपी अतुल कुमार सिंह ने पत्रकारों को बताया चार फरवरी की रात लगभग सवा दो बजे सूचना मिली कि टीला मोड़ पुलिस स्टेशन क्षेत्र के तहत भारत सिटी में एक घटना हुई है। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची वहां तीन बच्चियों की ऊंची इमारत से गिरने के कारण मौत हो गुई थी। उन्हें एम्बुलेंस के जरिए लोनी के एक अस्पताल लाया गया, जहां डाक्टरों ने तीनों को मृत घोषित कर दिया। तीनों बहनों के नाम है 16 वर्षीय विशिका, 14 वषीय प्राची और 12 वर्षीय पाखी। बारह, चौदह और सोलह वर्ष की उम्र तो सपनों को पंख लगाकर उड़ने की होती है। उस उम्र में मौत को गले लगाना भला किसके गले उतर सकता है? दरअसल हालात, स्थितियां और आभासी भावनाओं के झूठे संसार ने इन मासूमों को मौत की दर तक पहुंचाया। यह एक डिजिटल मर्डर है। यह दुखद हादसा खूनी डिजिटल एल्गोरिदम का परिणाम है। जो मोबाइल के जरिए हम सबके घरों में घुस आया है। यह घटना कोरियन लव गेम और उसके पीछे एल्गोरिदम की कारगुजारी है। शुरुआती जांच में मोबाइल फोन और कोरियाई संस्कृति के प्रति जुनून इस घटना का मुख्य कारण हो सकते हैं। लड़कियां कोरियाई संगीत, ड्रामा, हस्तियां, जापानी फिल्में और डोरेमान के अलावा हिट मैन जैसे कार्टूनों के साथ-साथ ऑनलाइन गेम्स की शौकीन थीं। साथ ही वे कोरियाई कल्चर से इस हद तक प्रभावित थीं कि उन्होंने अपने नाम भी बदल लिए थे। लेकिन ब्लूव्हेल जैसे टास्क आधारित गेम को इस घटना का एक मात्र या मुख्य कारण नहीं माना जा सकता। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया है कि तीनों बच्चियों की मौत शरीर से ज्यादा खून निकलने और चोट से हुई है। ऊंचाई से गिरने के कारण कई हड्डियां टूटी थीं। परिवार आर्थिक तंगी की मार झेल रहा था और घर में कलह ने भी चीजें सुरक्षित बना दी थीं। कमरे में एक सुसाइड नोट भी मिला, जिसमें सॉरी पापा लिखा हुआ था। इस घटना के बाद बच्चों के बीच फोन एडिक्शन को लेकर फिर चर्चाएं तेज हो गई हैं। कई मां-बाप का कहना है कि हमारे बच्चे रात को सो नहीं पा रहे हैं। वे इतने डरे हुए हैं। बाल मनोचिकित्सक नीलेश देसाई कहते हैं कि फोन एडिक्शन रसायनिक पदार्थों की लत जैसा ही है। किशोरावस्था एक नाजुक अवस्था है। जहां बदलते समाज के साथ टेक्नोलॉजी का आक्रमण बढ़ रहा है। इस स्थिति में जब कोई किशोर या किशोरी से परिवार एकदम से फोन छीन लेता है तो एक आपदा सी खड़ी हो जाती है। एक बच्चे के लिए ये एक रसायनिक पदार्थ के एडिक्शन से कम नहीं है। डाक्टर भावना वर्मा बताती हैं, लंबे समय से स्कूल न जाने का मतलब पढ़ाई छूटने से नहीं है। यह मनोवैज्ञानिक कमजोरियों का एक सिलसिला खड़ा कर देता है। स्कूल किशोरों के स्वस्थ विकास के लिए केवल तथ्य सीखने की जगह से कहीं अधिक एक अहम स्ट्रक्चर के तौर पर काम करता है। मैंने कई किशोरों और परिवारों को परामर्श दिया है। जहां के पॉप, के-ड्रामा, कोरियाई सौंदर्य रुझान और आइडल्स के प्रति तीव्र आकर्षण एक सामान्य रूचि से कहीं अधिक गहरा हो गया है जोकि बच्चों के लिए बहुत हानिकारक हो चुका है। गाजियाबाद की घटना हर उस माता-पिता के लिए एक चेतावनी है जो यह सोच कर निश्चिंत बैठे हैं कि उनका बच्चा कमरे में सुरक्षित मोबाइल चला रहा है। कोरियन लव गेम जैसे डिजिटल खेल बच्चों की भावनाओं, असुरक्षा बोध का फायदा उठाकर उन्हें टाक्स पूरा करने के लिए मजबूर करते हैं। इसी का एक नतीजा गाजियाबाद की। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के रूप में सामने आया है। ऐसी खतरनाक, जानलेवा गेम्स पर तुरन्त बैन लगाना चाहिए।
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 7 February 2026

ट्रेड डील में कृषि सेक्टर पर विवाद


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील पर सहमति बनने और साथ ही भारत पर अमेरिकी टैरिफ को कम करते हुए 18 प्रतिशत करने की जानकारी दी। हालांकि इस ट्रेड डील की विस्तृत जानकारी आना अभी बाकी है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत भारत सरकार के कई मंत्रियों ने इसे एक बड़ी उपलब्धि बताया है। लेकिन विपक्षी नेताओं ने दावा किया है कि इस ट्रेड डील में किसानों और डेयरी सेक्टर के हितों को नजरअन्दाज किया गया है। इसका जवाब देते हुए वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में कहा कि भारत ने अपने एग्रीकल्चर और डेयरी सेक्टरों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं किया है। गोयल ने कहा कि ट्रेड डील पर अंतिम दौर की बातीत में ब्यौरे तय किए जा रहे हैं और बहुत जल्द भारत और अमेरिका की ओर से इस पर एक संयुक्त बयान जारी किया जाएगा। ट्रंप ने दूसरी ओर ट्रूथ सोशल पर को जानकारी दी उसमें कहा गया है कि भारत अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ और नॉन टैरिफ बैरियर्स को जीरा करेगा। उन्होंने आगे कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका से अधिक खरीद पर सहमति जताई है जिसमें 500 अरब डॉलर से अधिक की अमेरिकी ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, कृषि, कोयला और अन्य कई उत्पादों की खरीद शामिल है। इसके बाद अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रुक रोलिंस ने भी इस डील को अमेरिकी किसानों के लिए लाभदायक बताते हुए कहा कि अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारत के विशाल बाजार तक पहुंच बढ़ने और इसमें 1.3 अरब डॉलर के भारत के साथ अमेरिकी कृषि व्यापार घाटे को कम करने में मदद मिलेगी। भारत की चिंताओं पर अगर हम नजर डालें तो एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में खेती से क्षेत्र की आधी आबादी यानि करीब 70 करोड़ लोगों का भरण-पोषण हो रहा है और यह सेक्टर भारत की रीढ़ बना हुआ है। खेती भारत के करीब आधे कामगारों को रोजगार देती है। अमेरिका कई सालों से भारत पर कृषि क्षेत्र को व्यापार के लिए खोलने के लिए दबाव बना रहा है। भारत खाद्य सुरक्षा, आजीविका और लाखों किसानों के हित का हवाला देकर इससे बचता रहा है। भारत और अमेरिका के बीच कृषि व्यापार 8 अरब डालर का है, जिसमें भारत चावल, झींगा और मसाले निर्यात करता है और अमेरिका मेवे, सेब और दालें भेजता है। अमेरिका अब अपने 45 अरब डालर के व्यापार घाटे को कम करने के लिए मक्का, सोयाबीन और कपास के बड़े कृषि निर्यात के लिए दरवाजे खोले जाने की मांग करता रहा है। विशेषज्ञों को डर है कि टैरिफ रियायतों को लेकर भारत को अपने न्यूनतम समर्थन मूल्य यानि एमएसपी और सार्वजनिक खरीद को कम करने के लिए दबाव डाल सकती है। ये दोनों भारतीय किसानों के प्रमुख कवच हैं, जो उन्हें अपनी फसलों को उचित दाम की गारंटी देकर उन्हें कीमतों में अचानक कमी से बचाती है और अनाज खरीद को सुनिश्चित करती है। दिलचस्प बात है कि भारत के नीति आयोग के एक ताजा दस्तावेज में प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत चावल, डेयरी, पोल्ट्री, मक्का, सेब, बादाम और जीएम सोया सहित अमेरिकी कृषि आयात पर टैरिफ कटौती की सिफारिश की गई है। इस ट्रेड डील में क्या-क्या शर्तें है या क्या कुछ अमेरिका ने मांगा है या हमने स्वीकार किया है उसे स्पष्ट करना चाहिए। क्या भारत सरकार ने कृषि, डेयरी सेक्टर भी खोल दिए हैं?
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 5 February 2026

मणिकर्णिका घाट पर अहिल्याबाई की मूर्ति पर विवाद


उत्तर प्रदेश का वाराणसी शहर पिछले कई दिनों से सुर्खियों में बना हुआ है। हिन्दुओं की धार्मिक नगरी के रूप में चर्चित वाराणसी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र भी है। वह 2024 के लोकसभा चुनाव में यहां से तीसरी बार निर्वाचित हुए हैं। प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने की वजह से वाराणसी में विकास की कई परियोजनाएं चल रही हैं। इसी कड़ी में ऐतिहासिक मणिकर्णिका घाट का भी पुनर्विकास किया जा रहा है। कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि इसके लिए पहले पुराने ढांचों को तोड़ा गया है। इस तोड़फोड़ को लेकर स्थानीय लोग नाराज भी हैं। काशी के पाल समाज के अध्यक्ष महेंद्र पाल कहते हैं कि जब मूर्ति खंडित की गई तो उन्होंने विरोध किया था। कई लोगों का आरोप है कि वहां मौजूद इंदौर के पूर्व राजघराने की अहिल्याबाई होल्कर की मूर्ति भी टूट गई है। लेकिन वाराणसी के मेयर अशोक तिवारी इससे साफ इंकार करते हैं। उनका कहना है कि मूर्ति सुरक्षित रखी गई है, जिसे बाद में स्थापित कर दिया जाएगा। अहिल्याबाई होल्कर की मूर्ति टूटने के दावों के बाद वहां विरोध प्रदर्शन भी हुए। पुलिस ने इस मामले में कई लोगों को हिरासत में भी लिया। विरोध प्रदर्शन में शामिल काशी के पाल समाज के अध्यक्ष महेंद्र पाल कहते हैं, अहिल्याबाई होल्कर हम लोगों की पूर्वज रही हैं और वो पाल समाज की महिला थीं। उन्होंने दावा किया हम लोग मौके पर पहुंचे थे और तोड़-फोड़ देखी थी। जेसीबी लगाकर मूर्ति को तोड़ा जा रहा था। इसलिए जब उनकी मूर्ति खंडित की गई तो हमने विरोध किया। लेकिन पुलिस ने हमें वहां जाने नहीं दिया। वैसे तो वाराणसी में 80 से अधिक घाट हैं लेकिन मणिकर्णिका घाट को धार्मिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी घाट के पुनर्विकास के लिए काम शुरू हुआ है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पुनर्विकास के नाम पर प्राचीन परंपराओं और स्वरूप से छेड़छाड़ की जा रही है। अजय शर्मा काशी में मूर्तियों की स्थापना का काम करते हैं। उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा यहां जो टूटी है वह मणि टूटी है। मेरा विरोध हमारे पौराणिक विग्रहों के संरक्षण के लिए है। विकास का कोई विरोध नहीं है। नवीनीकरण और सौंदर्यीकरण का भी यहां कोई व्यक्ति विरोध नहीं करता। अजय शर्मा कहते हैं कि अहिल्याबाई की जो मूर्ति थी या गणेश जी की मूर्ति थी या गंगा स्वरूप की जो मूर्ति थी, वे नष्ट नहीं हुई। लेकिन वाराणसी के मेयर अशोक तिवारी ने सभी आरोपों का खंडन किया है। उनका कहना है कि सभी मूर्तियां संरक्षित की गई हैं और घाट के विकास के बाद उन्हें दोबारा स्थापित किया जाएगा। उन्होंने कहा, मणिकर्णिका घाट के पुनर्विकास की योजना पर काम किया जा रहा है ताकि इसे आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया जा सके। इसके अंतर्गत शव जलाने के लिए चिमनीयुक्त 38 प्लेटफार्म बनाए जा रहे हैं, जिससे खासकर बरसात के मौसम में शवदाह में आसानी होगी। अशोक तिवारी ने बताया अंतिम संस्कार के लिए जाने वाले लोगों के लिए अप्रोच रैम्प, प्रतीक्षालय और व्यूइंग गैलरी बनाई जाएगी। लकड़ी ढुलाई के लिए अलग रैम्प, पंजीकरण कार्यालय और स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था भी की जाएगी। अशोक तिवारी का दावा है कि ये काम डोमराजा के कहने पर ही प्रधानमंत्री ने शुरू कराया है। हालांकि इस सब विवाद के बीच पुनर्विकास का काम जारी है। इस जगह पर शवदाह का काम चलता रहता है। मान्यता है कि यहां अंतिम संस्कार होने से मोक्ष प्राप्त होता है।
-अनिल नरेन्द्र

Sunday, 1 February 2026

अजित पवार प्लेन क्रैश से जुड़े सवाल


आखिर हम इन हवाई दुर्घटनाओं में कितनी कीमती जानें गंवाएंगे? अगर हाल ही के प्लेन क्रेशों पर नजर डाले तो 2021 में सीडीएस जनरल विपिन रावत, भारत के पहले प्रमुख रक्षा अध्यक्ष का दिसम्बर 2021 तमिलनाडु के कुनूर के पास एयर क्रेश में मृत्य हो गई। दो सितम्बर 2009 को आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी (वाईएसआर) का हेलीकाप्टर नालामाला जंगल में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। 30 अप्रैल 2011 को अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दोइली खांदू को तवांडा से ईटानगर ही रहे हैं हेलीकाप्टर क्रेश हो गया और उनकी मृत्यु हो गई। हाल ही में 2025 (12 जून) को अहमदाबाद में भयंकर एयर क्रेश में पूर्व मुख्यमंत्री विजय रुपाणी सहित 292 यात्रियों की मौत हो गई। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष जीएमसी बालयोगी का निधन भी एक हेलीकाप्टर क्रेश में हुआ। और अब महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित दादा पवार की प्लेन क्रेश में मृत्यु हो गई। पूर्वी जिले के बारामती में हुए इस हादसे की अब कई कोणों से जांच की जा रही है। क्या यह महज दुर्घटना थी, पायलट एटर था या फिर कोई साजिश थी? इसका झराब तो गहन जांत से मिल सकता है। अगर कभी मिला भी? क्योंकि आज तक जितने भी क्रेश हुए हैं आज तक उनमें से किसी का भी संतोषजनक जवाब नहीं मिला, यह नहीं पता चल सका कि दुर्घटना का असल कारण क्या था? अजित दादा पवार के प्लेन क्रेश पर केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय की ओर से जारी बयान के मुताबिक विजिवलिटी कम होने की वजह से बारामती में रनवे नहीं दिखा और लैडिंग की कोशिश नाकाम हो गई। अगर पं. बंगाल की मुख्यमंत्री सहित कई नेताओं ने हादसे पर सवाल उठाए हैं और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की है। हालांकि, अजित पवार के चाचा शरद पवार ने हादसे के पीछे किसी भी तरह की राजनीति होने की बात से इंकार करते हुए कहा कि यह महज एक दुर्घटना थी। हादसे के बाद शुरुआती जानकारियां भी सामने आ चुकी हैं लेकिन अब भी कई ऐसे अहम सवाल हैं जिनके जवाब देश चाहता है। आखिरी पलों में क्या हुआ? लैडिंग के दौरान किन हालात ने खतरा बढ़ाया और क्या सुरक्षा प्रोटोकाल का पूरी तरह पालन हुआ ये वो सवाल है जो इस पूरे मामले को और गंभीर बना रहे हैं। हमें इन सवालों का जवाब चाहिए उनमें प्रमुख हैं ः खराब विजिविलिटी में लैडिंग की कोशिश क्यों की गई? क्या यह संभव था कि विमान वापस चला जाता (अगर उसमें ईंधन काफी था)? लैडिंग व्लीटेंस के बाद अचानक क्या हुआ? कितना सुरक्षित है लियर जेट-45 विमान? नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अनुसार वीटी-एसएस थे - एलजे 45 चार्टर विमान माध्यम आकार का बिजनेस जेट है। जिन्हें कनाडा की कंपनी बम्बारडियर एटोस्योन ने बनाया है इसमें 8 यात्रियों के बैठने की जगह है। ये विमान छोटे रनवे वाले हवाई अड्डे पर भी आसानी से उतर सकता है। यह भी पता चला है कि इससे पहले 14 सितम्बर 2023 को, ऐसा ही विमान मुंबई में लैडिंग के बाद रनवे से फिसल गया था और दो हिस्सों में टूट गया था। बुधवार के हादसे के बाद एक बार फिर से सवाल खड़ा हो गया है कि ये विमान कितना सुरक्षित है? क्या लैडिंग एप्रोच सुरक्षित थी? हादसे के चश्मदीदों ने बताया कि विमान को हवा में देखकर ही लग रहा था कि वे लैंड नहीं कर पाएगा। एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि जब विमान नीचे आ रहा था, ऐसा लग रहा था कि वह क्रेश हो जाएगा। तभी तो क्रेश हो गया। डीजीसीए के बयान में ये बताया गया है कि विमान के पायलट ने पहले रनवे न दिखाई की सूचना दी और बाद में ये सूचना दी गई कि रनवे दिख रहा है। सोशल मीडिया पर सामने आया है कि जिसमें विमान हवा में ही पलटते हुए दिख रहा है। किसी भी विमान हादसे के बाद मे ये शब्द का इस्तेमाल कई बार होता है। ये शब्द एबिएशन और मैरिटरपून इमरजेंसी के लिहाज से बहुत अहम है। एक अन्य पायलट ने कहा कि मेडे कॉल न किया जाना इस ओर इशारा करता है कि आखिरी वक्त तक पायलट का विमान नियंत्रण में था। उन्होंने कहा कि अगर विमान के इंजन फलियर हुआ होता या कोई और समस्या होती तो पायलटों ने मेडे वाल दी होती। इन सवालों का जवाब देश चाहता है। पर पता नहीं कभी मिले या यह भी इतिहास का एक पन्ना बनकर रह जाएगा?
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 31 January 2026

ईरान की ट्रंप को धमकी

 
जिस तरह से अमेरिका ने ईरान को चारो तरफ से जंगी उपकरणों व अत्याधुनिक हथियारों से इस समय घेर रखा है ऐसा जमावड़ा हमने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कभी नहीं देखा। एयराफ्ट कैरियरों, 500 लड़ाकू विमानों, हजारों सैनिकों से इस टाइम ट्रंप ने आयतुल्ला खामनेई को घेर रखा है। ट्रंप ने ईरान पर परमाणु समझौता वार्ता के लिए दबाव बनाने के उद्देश्य से यह जंगी बेड़ा भेजा है। ट्रंप ने ईरान को सीधी धमकी दी है कि वह परमाणु समझौता कर ले वरना उस पर अगला हमला और भीषण होगा। उधर ईरान ने चेतावनी दी कि उसकी सेना किसी भी अमेरिकी भी सैन्य ऑपरेशन का जोरदार जवाब देगी। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने सोशल प्लेटफार्म एक्स पर लिखा कि उनकी सेना तैयार है और देश पर किसी भी हमले का जोरदार जवाब देने के लिए ट्रिगर पर उंगली रखे हुए हैं। अरागची की टिप्पणी ट्रंप के धमकी के बाद आई है। जिसमें ट्रंप ने कहा था कि इस विवादित परमाणु कार्पाम पर अमेरिका के साथ डील करे वरना उसे बड़े पैमाने पर अमेरिकी हमले का सामना करना पड़ेगा। उधर ट्रंप ने अपनी बात रखते हुए कहा, ईरान के पास हमारा बड़ा जंगी बेड़ा है, वेनेजुएला से भी बड़ा तेहरान में मौजूद अधिकारी लगातार संकेत दे रहे हैं कि ईरान वार्ता के लिए तैयार है। ट्रंप ने कहा वे समझौता करना चाहते हैं मुझे पता है। उन्होंने कई बार कॉल भी किया है। ट्रंप ने आगे कहा उम्मीद है कि ईरान जल्द ही बातचीत के लिए तैयार होगा और एक निष्पक्ष और बराबरी का समझौता करेगा। कोई परमाणु हथियार नहीं... जो सभी पक्षों के लिए अच्छा हो। समय कम है और यह सच में बहुत जरूरी है। अगला हमला और भीषण होगा। इसे मत होने दो। ट्रंप की धमकियों के बीच मध्य-पूर्व के अरब देशों में भी हलचल बहुत तेज हो गई है। सऊदी अरब, तुर्किए, कतर इत्यादि देशों के अध्यक्ष व राजा अपनी पूरी ताकत लगा रखे हैं कि जंग टल जाए। सऊदी बादशाह सलमान ने तो पूरी ताकत झोंक दी है। यह इसलिए भी है कि ईरान ने खुली धमकी दी है कि अगर अमेरिका और इजरायल की तरफ से कोई हमला होता है तो ईरान, अरब देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर मिसाइल मार देगा और उन्हें तबाह कर देगा। बता दें कि सऊदी अरब सहित तमाम अरब देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं। जहां हजारों अमेरिकी सैनिक तैनात हैं और सैकड़ों लड़ाकू विमान इत्यादि रखे हुए हैं। अगर लड़ाई छिड़ती है तो एक तरफ ईरान इजरायल को तबाह कर देगा और दूसरी तरफ मध्य-पूर्व में तमाम अमेरिकी सैन्य अड्डों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। ईरान खुद जंग के लिए पूरी तरह तैयार है। वह पिछले 20 साल से इस दिन का इंतजार कर रहा है। इस दौरान उसने दुनिया की सबसे प्रभावी मिसाइलों का निर्माण कर लिया है। उसने ऐसी-ऐसी मिसाइलें तैयार कर ली हैं जो 10 हजार प्रति घंटा की स्पीड से बहुत दूरी तक मार कर सकती है। दुनिया ने पिछले साल बारह दिन की जंग में ईरान ने इजरायल का क्या हाल किया था, सभी ने देखा था। इस बीच खबर ये भी आई है कि सऊदी अरब ने स्पष्ट कहा है कि अगर ईरान पर अमेरिका हमला करता है तो सऊदी हमले के लिए अपनी जमीन नहीं देगा। सऊदी अरब के युवराज व प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान बिन अब्दुलअजीज अल सउद ने कहा है कि उनका देश ईरान के खिलाफ कार्रवाई के लिए अपनी जमीन या हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देगा। मध्य-पूर्व एशिया में इस समय जंगी बादल मंडरा रहे हैं और किसी भी छोटी चिंगारी से अचानक युद्ध छिड़ सकता है। हम ऊपर वाले से प्रार्थना करते हैं कि यह जंग टल जाए और बातचीत से मसला हल हो जाए और पूरी दुनिया जंग की तबाही से बच जाए। 
-अनिल नरेन्द्र

Friday, 30 January 2026

महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा


महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार की बुधवार को विमान दुर्घटना में मौत से जहां पूरा देश स्तब्ध है, शोक में डूबा हुआ है वहीं यह भी प्रश्न उठ रहा है कि उनकी अकस्मात मृत्यु से महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा? 66 साल के अजीत पवार का निजी विमान महाराष्ट्र के बारामती में लैंड करते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया। बता दें कि अजीत पवार ने जुलाई 2023 में अपने चाचा शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) से बगावत कर दी थी। 2023 में 2 जुलाई को वे अपनी पार्टी के 8 सदस्यों के साथ महाराष्ट्र सरकार में शामिल हो गए थे और सरकार में उपमुख्यमंत्री बने। शरद पवार से बगावत कर एकनाथ शिंदे सरकार में शामिल होने के अपने फैसले पर अजीत पवार ने कहा था, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत प्रगति कर रहा है, इसलिए भाजपा के साथ कुछ मतभेद होने के बावजूद एनसीपी ने महाराष्ट्र की प्रगति के लिए सरकार के साथ हाथ मिलाने का फैसला किया है। नवम्बर 2024 में महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हुए और अजीत पवार अपने चाचा पर भारी पड़े। हालांकि छह महीने पहले ही लोकसभा चुनाव में अजीत पवार की पार्टी को केवल एक सीट पर ही जीत मिली थी। तब अजीत पवार को महाराष्ट्र की सत्तारुढ़ भाजपा नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी कहा जा रहा था। लेकिन विधानसभा चुनाव में अजीत पवार सबसे मजबूत खिलाड़ी के रूप में उभरे। उन्होंने 41 विधानसभा सीटें हासिल की और लगभग अपने चाचा के विद्रोही गुट एनसीपी (एसपी) को खत्म कर दिया। जो केवल 10 सीटें ही जीत सकी। अजीत पवार ने 5 दिसम्बर 2024 को रिकार्ड छठी बार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। विश्लेषक कहते हैं कि शरद पवार की छाया में 20 साल बिताने के बाद अजीत पवार को लगा कि चाचा उनके रास्ते में बाधा बन रहे हैं इसलिए उन्होंने अपना रास्ता ढूंढ़ लिया। 5 फरवरी से महाराष्ट्र जिला परिषद पंचायत समिति के चुनाव होने जा रहे हैं। इसी के प्रचार के लिए अजीत दादा पवार बारामती जा रहे थे। एनसीपी का पूरा दायित्व अजीत पवार के ऊपर ही था। अजीत पवार का निधन तब हुआ है, जब शरद पवार राजनीतिक रूप से बहुत कमजोर हो गए हैं। जिला परिषद के चुनाव में अजीत अपने चाचा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले थे। अब मुझे लग रहा है कि पूरी सहानुभूति शरद पवार के साथ जाएगी। भाजपा के उभार के बाद से महाराष्ट्र में मराठा नेताओं की हैसियत कमजोर हुई है और इसका अहसास प्रदेश में सबको है। मराठा जाति का वर्चस्व खेती, शिक्षा और बैंकिंग पर खत्म हो चुका है। शरद पवार के साथ अब मराठा जाति की सहानुभूति आएगी। ग्रामीण महाराष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था पर अब भी मराठा जाति की पकड़ है और इन्हें अब लग रहा है कि भाजपा के आने से उनकी पकड़ कमजोर पड़ रही है। देवेन्द्र फडणवीस की सरकार में एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना और अजीत पवार की अगुवाई वाली एनसीपी है। अजीत पवार के निधन के बाद एनसीपी अगर इस सरकार से हट जाती है तब भी सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। भले सरकार सत्ता में बनी रहेगी लेकिन फर्क दूसरी तरह से पड़ेगा। मराठा जाति अजीत पवार के निधन के बाद सोचेगी कि अब उनके पास कौन है? शरद पवार खुद ही जीवन के सांध्य काल में हैं। पूरा मराठा तबका अब सोचेगा कि उन्हें किस तरफ रुख करना है? एक विश्लेषक का कहना है कि अजीत पवार महाराष्ट्र की राजनीति में हिन्दुत्व के बढ़ते प्रभाव के बीच अपनी ताकत बनाए हुए थे और यह बड़ी बात थी। भाजपा और शिवसेना दोनों हिन्दुत्व की राजनीति करते हैं। भाजपा की अगुवाई वाली सरकार स्थिर रहेगी लेकिन मराठा राजनीतिक का उभार हो सकता है। एनसीपी फिर से शरद पवार के नेतृत्व में एकजुट हो सकती है और यह भाजपा की मजबूती के हक में नहीं होगी। अजीत पवार को देवेन्द्र फडणवीस सरकार में एकनाथ शिंदे की शक्ति संतुलन करने के रूप में भी देखा जाता था। कहा जाता है कि अगर अजीत दादा पवार का साथ नहीं होता तो नवम्बर 2024 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बनने के लिए अड़ सकते थे। ऐसे में भाजपा के पास विकल्प था वह अजीत पवार के साथ सरकार बना ले। हम अजीत पवार को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं कि उनके परिवार को इस भारी क्षति से उभरने का साहस दें। 
-अनिल नरेन्द्र

Wednesday, 28 January 2026

ट्रंप को उसी की भाषा में जवाब


बड़बोले और बेलगाम बोलने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अगर उन्हीं की भाषा में जवाब दिया है तो वह हैं कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी। दरअसल हुआ यह कि कार्नी स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में बोल रहे थे। मार्क कार्नी के दिए भाषण को अमेरिकी दबदबे वाले वर्ल्ड आर्डर को आईना दिखाने के रूप में देखा जा रहा है। कहा जा रहा है कि दुनिया के लगभग हर देश ट्रंप की नीतियों से परेशान है लेकिन इस तरह बोलने का जोखिम मार्क कार्नी ने उठाया। मंगलवार को स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम को संबोधित करते हुए मार्क कार्नी ने कहा कि ताकतवर देशों की प्रतिद्वंद्विता में मिडिल पावर वाले देशों के सामने दो विकल्प हैं... या तो समर्थन पाने के लिए आपस में होड़ करें या साहस के साथ एक तीसरा रास्ता बनाएं और ऐसा करने के लिए साथ आएं। भारत समेत दुनिया के बाकी को लग रहा है कि अभी चुप रहना ज्यादा बेहतर है। दूसरी तरफ कनाडा के प्रधानमंत्री को लग रहा है कि मौजूदा विश्व व्यवस्था में कोई संक्रमण नहीं बल्कि विध्वंस की स्थिति है और झूठ का पर्दा हट रहा है। मार्क कार्नी खुलेआम कह रहे हैं कि पुरानी व्यवस्था वापस नहीं आएगी और इसका शोक नहीं मनाना चाहिए बल्कि नई और इंसाफ सुनिश्चित करने वाली वैश्विक व्यवस्था के लिए काम शुरू कर देना चाहिए। कार्नी कह रहे हैं कि मध्यम शक्ति वाले देशों को भ्रम की दुनिया से बाहर आना चाहिए। कार्नी को पता है कि ट्रंप की नीतियों की आलोचना करने का जोखिम भी है। कनाडा की अर्थव्यवस्था बहुत हद तक व्यापार पर निर्भर है और 2024 में कनाडा के कुल निर्यात का 75 प्रतिशत व्यापार अमेरिका में हुआ था। ट्रंप ने अमेरिका के प्रति कृतज्ञता न दिखाने का आरोप लगाते हुए मार्क कार्नी की आलोचना करते हुए कहा, वैसे कनाडा हमसे बहुत-सी मुफ्त सुविधाएं पाता है। उन्हें आभार व्यक्त करना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं कर रहे हैं। मैंने मंगलवार को मार्क कार्नी को देखा और वह ज्यादा कतृज्ञ नहीं थे। कनाडा अमेरिका की वजह से ही अस्तित्व में है। अगली बार जब मार्क कार्नी बयान देंगे तो उन्हें... यह बात याद रखनी चाहिए। इससे पहले ट्रंप कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात कह चुके हैं। इतनी धमकियों के और दबाव के बावजूद कनाडा ने ट्रंप को दो टूक जवाब दिया। ऐसे में यह सवाल पूछा जा रहा है कि ट्रंप की नीतियों, धमकियों के बावजूद अमेरिका भारत के हितों को चोट पहुंचा रहा है फिर भी भारत कनाडा की तरह ट्रंप को उन्हीं की भाषा में जवाब आखिर क्यों नहीं दे रहा है? ट्रंप ईरान से तेल खरीदने, रूस से तेल खरीदने, 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने से लेकर 70 बार से ज्यादा भारत-पाक युद्ध रोकने की बात कह चुके हैं, अमेरिका ने वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन किया, ईरान में भी सत्ता परिवर्तन करवाने की बात कर रहा है। सवाल यह है कि भारत कनाडा की तरह ट्रंप की नीतियों पर क्यों नहीं बोल पा रहा है?
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 24 January 2026

मैं ही हूं शंकराचार्य!


पिछले कुछ दिनों से भाजपा प्रशासन और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज में भयंकर विवाद छिड़ा हुआ है। एक तरफ शंकराचार्य जी और अन्य साधु-संत हैं तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनका मेला प्रशासन है। सारा मामला शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के प्रयागराज में गंगा स्नान न करने को लेकर शुरू हुआ। प्रयागराज में चल रहे माघ मेले में मौनी अमावस्या के अवसर पर होने वाले पारंपरिक शाही स्नान को लेकर ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच स्वामी जी के पालकी पर सवार होकर स्नान को लेकर शुरू हुआ। प्रशासन ने स्वामी जी की पालकी पर स्नान करने से रोका, इस पर प्रशासन और स्वामी जी के समर्थकों में हाथापाई तक हो गई। स्वामी जी का कहना है कि प्रशासन के अधिकारियों ने न केवल स्वामी जी की पालकी को तोड़ने का प्रयास किया बल्कि उनके समर्थक साधु-भक्तों को जटा से पकड़कर मारा-पीटा और जेल में ठूंस दिया। इसके विरोध में शंकराचार्य जी ने धरना शुरू कर दिया जो अब भी जारी है। स्वामी जी का कहना है कि प्रशासन की माफी के बिना वे अपने आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे और मौके पर ही धरने पर बैठ गए। इस बीच मेला प्रशासन ने उन्हें नोटिस जारी करते हुए 24 घंटे में ये साबित करने को कहा है कि वे शंकराचार्य कैसे हैं? मेला प्रशासन ने शंकराचार्य जी से पूछा है कि उन्होंने अपने नाम के साथ शंकराचार्य की उपाधि क्यों जोड़ी? नोटिस में ये भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन एक मामला अभी तक समाप्त नहीं हुआ है, ऐसे में किसी भी धर्माचार्य को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य की मान्यता प्राप्त नहीं है। बावजूद इसके, स्वामी जी ने मेला क्षेत्र में बोर्डों पर अपने नाम के आगे ये शीर्षक लिखवा दिया। बता दें कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उनके गुरू स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद शंकराचार्य बनाया गया था। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का पट्टा अभिषेक भी शंकराचार्य ने किया था। अब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता एके मिश्रा के माध्यम से प्राधिकरण को आठ पन्नों का जवाब भेजा है। अपने जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मेला प्राधिकरण के आरोपों को सिरे से नकार दिया और कहा कि वे शंकराचार्य हैं। स्वामी जी ने 15 बिंदुओं में प्रयागराज मेला प्राधिकरण को जवाब दिया है। उन्होंने लिखा, सोमवार को आपकी (मेला प्राधिकरण) ओर से नोटिस सम्मानित अविमुक्तेश्वरानंद को बदनाम और अपमानित करने के बुरे इरादे से जारी किया गया। जो मनमाना, द्वेषपूर्ण और भेदभावपूर्ण है। शारदा मठ द्वारका के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज की वसीयत का भी जिक्र दिया गया है। त्रिवेणी मार्ग शिविर के बाहर प्रेसवार्ता में मेला प्राधिकरण के नोटिस पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के जिस आदेश का हवाला दिया गया है वो 14 अक्टूबर 2022 का है जबकि 11 सितम्बर 2022 को शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के अगले दिन 12 सितम्बर को स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के आश्रम में शंकराचार्य के तौर पर उनका पट्टाभिषेक हो चुका था। जिस तरह से मेला प्रशासन ने शंकराचार्य और उनके अनुयायियों के साथ व्यवहार किया। उनकी उपेक्षा नहीं की जाती। धर्म गुरुओं को इस तरीके से अपमानित करना शर्मनाक है और साधुओं को जटाओ से पकड़ कर पीटना उससे भी ज्यादा निंदनीय है। अब तो शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के पक्ष में अन्य शंकराचार्य और संत खड़े हो गए हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जो खुद भी चाहते हैं कि मामले को निपटाने का प्रयास करना चाहिए। मेला प्रशासन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी से माफी मांगे और उन्हें बाइज्जत गंगा स्नान करवा दे तो विवाद समाप्त हो सकता है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह विवाद बढ़ता जाएगा और तमाम साधु समाज मैदान में उतर आएंगे।
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 22 January 2026

ग्रीनलैंड लेकर रहेंगे: ट्रंप


पिछले कई दिनों से ग्रीनलैंड को लेकर भयंकर रस्साकशी चल रही है।  इस नाटक के तीन प्रमुख किरदार हैं। पहले हैं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जो कह रहे हैं कि अब वक्त आ चुका है, ग्रीनलैंड लेकर हम रहेंगे। ट्रंप झुकने के मूड में नहीं लगते। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अपनी नाक का सवाल बना लिया है। वो कभी ग्रीनलैंड की सेना का मजाक उड़ाते हैं तो कभी वहां सैन्य हमले की बात करते हैं। ट्रंप ने यूरोपीय देशों को खुलकर धमकी दी है कि जो देश ग्रीनलैंड से जुड़े अमेरिकी इरादों का समर्थन नहीं करेंगे। उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने अब तो 8 यूरोपीय देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी भी दे डाली है। ट्रंप किसी भी कीमत पर ग्रीनलैंड हासिल करना चाहते हैं। वह यह भी दावा करते हैं कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर अपना कब्जा नहीं किया तो रूस या चीन इस पर अपना कब्जा कर लेगा। तो पहला किरदार तो डोनाल्ड ट्रंप हैं। दूसरा किरदार यूरोपीय देश हैं। ग्रीनलैंड मुद्दे पर ट्रंप ने यूरोप के 8 देशों पर टैरिफ बढ़ाने की चेतावनी पर यूरोपीय यूनियन ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि अगर अमेरिकी दबाव बनाने के लिए टैरफ लगाएगा तो ईयू भी जवाबी काउंटर टैरिफ लगाएगा। यूरोप का कहना है कि वह अपने हितों और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा। हालांकि ईयू ने अभी जवाबी टैरिफ का प्रतिशत तय नहीं किया है। ईयू में ट्रंप के ग्रीनलैंड बयान और टैरिफ दबाव से ईयू-यूएस ट्रेड एग्रीमेंट भी संकट में पड़ गया है। यूरोप के नेता इस कदम को दबाव की राजनीति बता रहे हैं। इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी ने संकेत दिए कि यूरोप ब्लैकमेल के आगे नहीं झुकेगा। वहीं फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल पों ने कहा कि कोई भी धमकी यूरोप का रास्ता नहीं बदल सकती। वहीं तीसरा किरदार ग्रीनलैंड के लोग हैं और उनके समर्थक। ग्रीनलैंड की राजधानी नुउक में शनिवार को हजारों लोग बर्फ से ढकी सड़कों पर मार्च करते दिखे। यह मार्च ग्रीनलैंड पर कब्जे को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान के खिलाफ था। रणनीतिक और खनिज संपन्न आर्कटक द्वीप ग्रीनलैंड पर अमेरिका ने कंट्रोल की बात दोहराई है। प्रदर्शनकारियों ने ग्रीनलैंड का राष्ट्रीय झंडा लहराया, हाथों में तख्तियां उठाई और नारे लगाएö ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। अमेरिका द्वारा यह कहना कि ग्रीनलैंड उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है मानना आतार्किक नहीं कहा जा सकता। ऐसा मानने वाले ट्रंप कोई पहले राष्ट्रपति नहीं हैं। उनसे पहले भी कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने ऐसा ही तर्क दिया था। यह दीगर बात है कि वह आगे नहीं बढ़ सके। ट्रंप विशुद्ध व्यापारी सोच वाले व्यक्ति हैं। लेकिन व्यापार आदर्शवाद से नहीं चलता। यह सही है कि व्यापार और अर्थव्यवस्था हमेशा से ही कूटनीतिक औजार रही है पर इस प्रकार से सारे कायदे-कानून, परंपरा ताक पर रख जबरदस्ती किसी अन्य देश पर कब्जा करने की धमकी कहां तक सही है। जिस तरह से अमेरिका और यूरोपीय देश आमने-सामने आ गए हैं उससे एक नया खतरा पैदा हो गया है। ट्रंप एक के बाद एक नया फ्रंट खोले जा रहे हैं। इस बार उनके निशाने पर उनके नाटो के देश हैं। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 20 January 2026

चाबहार पर भारत के पीछे हटने की अटकलें

ईंरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रातिशत टैरिफ लगाने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा के बाद से ही यह सवाल बना हुआ था कि भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा? ईंरान से भारत का व्यापार अमेरिकी प्रातिबंधों के कारण बेशक बड़ा नहीं है लेकिन ईंरान रणनीतिक रूप से भारत के लिए काफी अहम है। ईंरान के दक्षिणी तट पर सिस्तानब्लू िचस्तान प्रांत में स्थित चाबहार बंदरगाह इसी रणनीति का अहम हिस्सा है। इसे भारत और ईंरान मिलकर विकसित कर रहे थे ताकि भारत को मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक सीधे पहुंच मिल सके। चाबहार भारत के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि इसके जरिए वह पाकिस्तान को बाइपास करते हुए मध्य एशिया पहुंच सकता है। लेकिन अमेरिका के अतिरिक्त टैरिफ की घोषणा के बाद से भारत के चाबहार पोर्ट से बाहर होने की खबरें जोर पकड़ने लगी हैं। इन खबरों और अटकलों को देखते हुए भारत सरकार ने बीते शुव््रावार को जवाब दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रावक्ता रणधीर जायसवाल ने शुव््रावार को कहा, जैसा कि आप जानते हैं 28 अक्टूबर 2025 को अमेरिकी वित्त विभाग ने एक पत्र जारी किया था जिसमें 26 अप्रौल 2026 तक वैध सशर्त प्रातिबंध छूट के दिशा-निर्देश दिए गए थे। हम इस व्यवस्था को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिकी पक्ष के साथ सपर्व में हैं। ईंरान के साथ हमारा संबंध लंबे समय से चला आ रहा है। हम घटनाव््राम पर करीबी नजर रखे हुए हैं और इस साझेदारी को आगे बढ़ाएंगे।

पिछले वर्ष भारत और ईंरान के साथ व्यापार 1.6 अरब डॉलर का था।

ईंरान, भारत के वुल व्यापार का 0.15 प्रातिशत हिस्सा है। दरअसल, चाबहार को लेकर इन अटकलों को हवा मिली इकनॉमिक टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट से। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत ने चाबहार परियोजना से खुद को रणनीतिक रूप से पीछे करना शुरू कर दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अपने तय निवेश की राशि पहले ही ईंरान को ट्रांसफर कर दी है और इस परियोजना का संचालन करने वाली सरकारी वंपनी इंडिया पोट्र्स ग्लोबल लिमिटेड ने औपचारिक रूप से दूरी बना ली है ताकि भविष्य में किसी भी अमेरिकी प्रातिबंध से बचा जा सके। विपक्षी पार्टियां, वरिष्ठ पत्रकार और यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार भी अमेरिका को लेकर भारत की नीति पर सवाल उठा रहे हैं। इनका दावा है कि भारत बार-बार अमेरिका को नाराज न करने के दबाव में झुक रहा है और अपने बड़े हितो को नुकसान पहुंचा रहा है। कांग्रोस के प्रावक्ता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया एक्स पर सवाल किया है कि भारत आखिर कब तक अमेरिका के दबाव में पैसला लेता रहेगा? उन्होंने लिखा— असल मुद्दा केवल चाबहार या रूस के तेल का नहीं है। असली सवाल यह है कि मोदी अमेरिका को भारत पर दबाव डालने क्यों दे रहे हैं? सामरिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. ब्रrा चेलानी ने एक्स पर लिखा : 2019 में जब अमेरिका ने ईंरान के तेल पर प्रातिबंध लगाए तो भारत ने अचानक ईंरान से तेल खरीदना बंद कर दिया। इससे भारत और ईंरान के बीच चला आ रहा ऊर्जा संबंध लगभग खत्म हो गया और इसका सीधा फायदा चीन को मिला। चाबहार बंदरगाह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट जिसे चीन चला रहा है उसके मुकाबले भारत का एक रणनीतिक जवाब माना जाता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ईंरान का चाबहार पोर्ट भारत के लिए बेहद अहम ट्रेड हब है। इस पोर्ट को विकसित करने में हमने 47000 करोड़ रुपए का निवेश किया हुआ है।

चाबहार भारत के पाकिस्तान को बाइपास कर अफगानिस्तान और सैंट्रल एशिया पहुंचाने में मदद करता है। ईंरान को लेकर फिलहाल ट्रंप का रवैया कभी हां, कभी ना वाला रहा है। फिलहाल वूटनीतिक पहल कर भारत अमेरिका के साथ इस मुद्दे पर अपनी बात मनवा सकता है, ऐसी आशा हम करते हैं। भारत अपने हितों को ऊपर रखे और किसी भी बाहरी दबाव में न आए।

——अनिल नरेन्द्र 

Saturday, 17 January 2026

जंग की चौखट पर ईरान-अमेरिका


ईरान में हाल के विरोध प्रदर्शनों ने ईरान और अमेरिका को जंग की चौखट पर लाकर खड़ा कर दिया है। विरोध प्रदर्शनों के बाद हालात और सख्त होने के संकेत मिल रहे हैं। ईरान के चीफ जस्टिस गुलाम हुसैन मोहसेनी एजेई ने कहा है कि गिरफ्तार प्रदर्शनकारियों पर तेजी से मुकदमा चल सकता है और उन्हें फांसी की सजा भी दी जा सकती है। यह बयान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी के बावजूद आया है, जिन्होंने कहा था कि अगर ईरान फांसी देता है तो अमेरिका कड़ी कार्रवाई करेगा। लगभग 130 घंटों से ईरान में इंटरनेट और फोन संपर्क ठप है। अमेरिका में ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्टस न्यूज एजेंसी का दावा है कि अब तक कम से कम 2571 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें 2403 प्रदर्शनकारी, 147 सरकार समर्थक, 12 बच्चे और आम नागरिक शामिल हैं। करीब 18,100 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। ईरान की राजधानी तेहरान में सुरक्षा बलों और नागरिकों के लिए सामूहिक अंतिम संस्कार भी किया गया, जहां डेन टू अमेरिका जैसे नारे लगे। भारत के दूतावास ने अपने नागरिकों को ईरान छोड़ने और बेहद सतर्क रहने की सलाह दी है। ट्रंप ने दी कड़े एक्शन की चेतावनी। ट्रंप ने एक संदेश में कहा ईरानी देशभक्तों विरोध जारी रखो। अपनी संस्थाओं पर कब्जा करो। मृत्युदंड दिए जाने की स्थिति में बहुत कड़ी कार्रवाई करेंगे। अगर वे ऐसा कुछ करते हैं तो हम कड़ी कार्रवाई करेंगे। जारी विरोध प्रदर्शन के बीच अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की बात कही जा रही है। राष्ट्रपति ट्रंप भी ऐसा कई बार कर चुके हैं। अमेरिका के भीतर ईरान में सत्ता परिवर्तन की बात लंबे समय से उठती रही है। अमेरिका ने ईरान में 1953 में सत्ता परिवर्तन किया भी था लेकिन 1979 की इस्लामिक ाढांति ने अमेरिका समर्थक सरकार को अपदस्थ कर दिया था और आयतुल्ला खुमैनी का राज स्थापित हो गया था। तभी से अमेरिका ईरान के इस मुल्ला राज को खत्म करना चाहता है और तख्ता पलट कर अपनी समर्थक सरकार बनाना चाहता है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है जिसकी बहुत संभावना है तो ईरान के साथ कौन खड़ा रहेगा? रूस और चीन ईरान के अहम साझेदार हैं और उनसे उम्मीद की जाती है कि ये अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का खुलकर विरोध करेंगे और कर भी रहे हैं। पर क्या यह समर्थन जवाबी जमा खर्च होगा या फिर खुलकर लड़ाई के मैदान में उतरेंगे? यह प्रश्न महत्वपूर्ण है। जहां तक अरब देशों का सवाल है यह खुलकर न तो समर्थन कर रहे हैं न ही विरोध। यह बात सही है कि जनता के गुस्से को ाtढर हिंसा से दबाना उचित नहीं, लेकिन किसी राष्ट्र की संप्रभुता के उल्लंघन का बहाना भी नहीं बनाया जाना चाहिए। अगर ट्रंप वास्तव में मदद करना चाहते हैं तो उन्हें तेहरान के साथ व्यापार पर लगाए गए 25 प्रतिशत एक्स्ट्रा टैरिफ समेत उन तमाम प्रतिबंधों को हटाने पर विचार करना चाहिए, सरकार जिनका असर खासकर आम लोगों पर पड़ा रहा है। ईरान में इस समय जरूरत है टकराव टालकर बातचीत का रास्ता अपनाने की। इसकी शुरुआत भारत की तरफ से होनी चाहिए। वहां की जनता लंबे समय से मुश्किल आंदोलनों हालात का सामना कर रही है। समय-समय पर उसका असंतोष के जरिए बाहर आता रहा है। हम उम्मीद करते हैं कि टकराव टल जाए और युद्ध की स्थिति न ही बने। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 15 January 2026

आर-पार की लड़ाई


पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्र सरकार के बीच अकसर टकराव देखने को मिलता है। पर इस बार पश्चिम बंगाल में विधानसभा का चुनाव है और यह लड़ाई अब आर-पार की बनती दिख रही है। कुलपतियों की नियुक्ति से लेकर राज्यपाल की भूमिका और एसआईआर तक दोनों के भेद कई बार आमने-सामने आ चुके हैं। लेकिन अब जो लड़ाई है वह आर-पार की लगती दिख रही है, इस बार फ्लैश पाइंट पर पहुंचती दिख रही है। ममता बनर्जी लंबे समय से केंद्रीय एजेंसियों- ईडी, सीबीआई और अन्य को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाती रही हैं। टीएमसी का दावा है कि ये एजेंसियां भाजपा सरकार के इशारों पर काम कर रही हैं। खासकर चुनावों से पहले। उदाहरण के लिए हाल ही में ईडी की छापेमारी के दौरान ममता बनर्जी की गतिविधि को लिया जा सकता है। लेकिन पॉलिटिक्ल कसंलिटिंग फर्म आई-पैक और उसके प्रमुख प्रतीक जैन के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय के छापों की वजह से जो टकराव चल रहा है उसने केंद्र और राज्य की एजेंसियों को भी आमने-सामने ला दिया है। ईडी का आरोप है कि ममता ने उसकी कार्रवाई में बाधा डाली और बंगाल पुलिस उनकी सरकार के निर्देश पर मनी लांड्रिंग जांच को विफल करने का प्रयास कर रही है। वहीं ममता का आरोप है कि केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियां राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश करने में लगी हुई हैं। ममता का दावा है कि ईडी ने छापा मारकर सबूत नहीं बल्कि उनकी पार्टी की चुनावी रणनीति संबंध दस्तावेज उठाने की कोशिश की। ममता का छापे के दौरान पहुंच कर कुछ फाइलों को जबरदस्ती ईडी अफसरों के हाथ से छीनने का भी आरोप लगा है। ईडी ने इस मामले में मुख्यमंत्री, पुलिस प्रमुख व अन्य के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की है और अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है जहां प्राथमिक सुनवाई भी हो गई है इससे पहले ईडी कोलकाता हाईकोर्ट भी गई। वहीं ममता का कहना है कि वह सीएम की हैसियत से नहीं बल्कि तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख के तौर पर मौके पर पहुंची थीं। हालांकि यह भेद करना मुश्किल है कि वह कब पार्टी प्रमुख हैं और कब सरकार प्रमुख। ममता ने ईडी की छापेमारी को राजनीतिक रंजिश बताते हुए न सिर्फ सड़क पर उतर कर विरोध किया बल्कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर भी गंभीर आरोप लगाए। ममता के भतीजे और टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी कहा कि एजेंसियां हथियारबंद हैं और इसके सहारे भाजपा चुनाव में हेरफेर का प्रयास कर रही है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का समय ज्यो-ज्यों करीब आ रहा है, राजनीतिक उथल-पुथल की स्थिति गंभीर होती जा रही है। अब तो यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या राज्य राष्ट्रपति शासन की दिशा में बढ़ रहा है? यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक है कि हाल के वर्षों में ममता और केंद्रीय एजेंसियां, राज्यपाल और संघीय ढांचे से जुड़े मुद्दों पर बार-बार चुनौतियां खड़ी की हैं। केंद्र और विपक्षी दलों वाले राज्यों के बीच अनबन का पुराना इतिहास है लेकिन बंगाल में अगर यह ज्यादा उग्र दिखता है तो वजह दोनों तरफ से ताकत बढ़ाने और नियंत्रण की कोशिश है। यह किसी से छिपा नहीं कि भाजपा पश्चिम बंगाल में अपना शासन चाहती है और इसके लिए साम, दाम, दंड और भेद सभी हथकंडे अपना रही है। मुश्किल यह भी है कि पश्चिम बंगाल में डबल इंजन की सरकार नहीं है। वहां की नौकरशाही पर ममता का कंट्रोल है इसलिए केंद्र अपनी एजेसियों का इस्तेमाल कर रही है। संवैधानिक संस्थाओं के बीच इस तरह का संघर्ष किसी के हित में नहीं है। पर लगता यह है कि ममता आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं।
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 13 January 2026

हजारों ईरानियों के खून से सने हैं ट्रंप के हाथ


ईरान में महंगाई के खिलाफ 13 दिनों से चल रहे प्रदर्शन के बीच गुरुवार रात को हालात और बेकाबू हो गए। एक न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में 100 से ज्यादा शहरों में प्रदर्शन फैल चुका है। प्रदर्शनकारियों ने सड़के ब्लाक की, आग लगाई। लोग खामेनेई की मौत और इस्लामिक रिपब्लिकन का अंत हुआ, जैसे नारे लगा रहे थे। कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारी क्राउन प्रिंस रजा पहलवी के समर्थन में नारे लगा रहे थे। वह नारा लगा रहे थे यह आखिरी लड़ाई है शाह पहलवी लौटेंगे। अमेरिकन ह्ममून राइट एजेंसी के मुताबिक प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा में अब तक 200 लोग मारे गए हैं। जिसमें 8 बच्चे शामिल हैं। एक पुलिस अधिकारी की भी चाकू मारकर हत्या कर दी गई। जबकि 2270 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है। ईरान में महंगाई के खिलाफ आम लोगों का विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे तेहरान बनाम वाशिंगटन होता जा रहा है। ईरानी मीडिया खुलेआम कह रहा है कि प्रदर्शनकारियों को सीआईए और मोसाद हवा व मदद दे रहा है। प्रदर्शन की आड़ में वाशिंगटन और तेल अवीव सत्ता परिवर्तन करवाना चाहता है। वह खामेनेई को भगाना चाहता है और ईरान के मुल्ला सत्ता को उखाड़ फेंक शाह पहलवी को सत्ता पर बिठाना चाहता है। इसके पीछे ईरान का तेल और अन्य कीमती खनिज पदार्थ ट्रंप अपने हाथ में लेना चाहता है। इसमें कोई शक नहीं कि ईरानी जनता महंगाई, बेरोजगारी से परेशान है और इसलिए सड़कों पर उतरी है। पर इस असंतोष का फायदा ट्रंप उठाना चाहते हैं और इस बहाने वह सत्ता परिवर्तन करना चाहते हैं। पर यह काम इतना आसान नहीं होगा। ईरानी एक बहुत बहादुर और लड़ाकू कौम है। वह अपनी सरकार से नाराज तो हो सकते हैं। पर वह अपने देश की कमान ट्रंप के हाथ में नहीं देना चाहेंगे। प्रदर्शनों के बीच ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई ने शुक्रवार को स्पष्ट और सख्त संदेश दिया कि इस्लामिक गणराज्य किसी भी हालत में पीछे नहीं हटेगा। सरकारी टीवी पर प्रसारित भाषण में 86 वषीय खामेनेई ने प्रदर्शनकारियों को विदेश समर्पित तत्व करार दिया और कहा कि उनका उद्देश्य ईरान को अस्थिर करना है। खामेनेई ने विशेष रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति के हाथ हजारों ईरानियों के खून से सने हैं। दरअसल ईरान की समस्या बहुत हद तक अमेरिकी और पश्चिम देशों ने पैदा की हुई है। वर्षों से ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। इस समय भी परमाणु हथियारों के कार्यक्रम पर रोक नहीं लगाने के आरोप में अमेरिका और यूरोप ने ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध लाद रखे हैं। इन पाबंदियों की वजह से ईरान की इकोनॉमी डूबने की कगार पर पहुंच चुकी है। दशकों का इन पाबंदियों की वजह से ईरान को कभी संभलने का मौका नहीं मिला। ताजा विरोध प्रदर्शन देश के अधिकतर हिस्सों में फैल चुका है। इंटरनेट बंद है और आम नागरिकों की सुरक्षा को लेकर पूरी दुनिया में चिंता है। पर यह ईरान का अंदरूनी मामला है और एक संप्रभु देश के मामले में अमेरिका या और किसी देश को कूदने का भी अधिकार नहीं है। अमेरिका और इजरायल आए दिन ईरान पर सैनिक कार्रवाई करने की धमकी दे रहा है। ईरान की जनता को ही अंतिम फैसला करना होगा कि वह क्या चाहते हैं?
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 10 January 2026

मादुरो को अचानक सत्ता से हटाया तो क्या होगा?


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा निकोलस मादुरो को पकड़ने के लिए सैन्य अभियान को अधिकृत करने से ठीक पहले अमेरिका की गुप्तचर सेवा सीआईए ने एक गोपनीय आंकलन पूरा किया जिसमें यह जांच की गई कि अगर मादुरो को अचानक सत्ता से हटा दिया जाता है तो वेनेजुएला की आंतरिक स्थिति कैसी होगी? न्यूयार्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप द्वारा प्रत्यक्ष कार्रवाई के जोखिमों और परिणामों का आकंलन करने के दौरान वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने गुप्त विश्लेषण का अनुरोध किया था। रिपोर्ट में अमेरिका के नेतृत्व में तख्तापलट की संभावना पर कम और मादुरो के लिए व्यावहारिक निकास परिदृष्टियों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया था, जिसमें बातचीत के माध्यम से समझौते, निरन्तर अमेरिकी दबाव और अंतिम उपाय के रूप में बल प्रयोग शामिल थे। खुफिया आंकलन से अवगत लोगों ने बताया कि सीआईए ने मादुरो के पद छोड़ने के लिए एक ही संभावित परिणाम की कल्पना करने के बजाए कई विकल्पों पर विचार किया। इनमें बातचीत के जरिए सत्ता हस्तांतरण शामिल था, जिसमें मादुरो स्वेच्छा से पद छोड़ देते, प्रतिबंधों और संपत्ति जब्ती के माध्यम से दबाव बढ़ाना और अन्य विकल्पों के विफल होने पर जबरन निष्कासन की संभावना शामिल थी। इस विश्लेषण का उद्देश्य ट्रंप द्वारा द्वारा वेनेजुएला के एक अत्याधिक सुरक्षित सैन्य ठिकाने के खिलाफ उच्च जोखिम वाले अभियान की मंजूरी देने पर विचार करते समय उच्चस्तरीय निर्णय लेने में मार्गदर्शन करना था। रिपोर्ट से परिचित अधिकारियों ने कहा कि इसमें राष्ट्रपति के अंतिम निर्णय को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीआईए की नजर में सबसे संभावित उत्तराधिकारी कौन था? इस आकलन के सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक उत्तराधिकारी पर इनका दृष्टिकोण था, उप राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगज। रोड्रिगज को उस व्यक्ति के रूप में पहचाना जो मादुरो को हटाए जाने की स्थिति में तुरन्त सत्ता संभालने के लिए सबसे उपयुक्त थीं। हालांकि कुछ सांसदों और वेनेजुएला के नागरिकों ने विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो को संभावित वैकल्पिक नेता के रूप में देखा है, लेकिन खुफिया समीक्षाओं ने इस बात पर संदेह जताया है कि क्या उनके पास मादुरो के बाद की स्थिति में जल्दी से सत्ता संभालने के लिए आवश्यक संगठनात्मक ढांचा या राजनीतिक प्रयास है? खुफिया जानकारी से परिचित अधिकारियों के अनुसार सीआईए को संदेह था कि क्या विपक्ष जनसमर्थन को राज्य संस्थाओं, सेना और सुरक्षा सेवाओं पर प्रभावी नियंत्रण में बदल पाएगा? चिंता वैचारिक नहीं बल्कि व्यावहारिक थी, स्पष्ट और व्यवहार्य उत्तराधिकारी के बिना मादुरो को हटाने से अस्थिरता कम होने के बजाए और बढ़ सकती थी। सीआईए का यह आंकलन सही साबित होता दिख रहा है। वेनेजुएला में न तो सत्ता परिवर्तन हुआ और न ही मौजूदा सरकार और देशवासियों में अमेरिका के प्रति समर्थन बढ़ता दिख रहा है। निकोलस मादुरो को तो हटा दिया पर फिलहाल उनके उत्तराधिकारी डेल्सी रोड्रिगज वैसी ही बातें कर रही हैं जैसे मादुरो करते थे। आगे चलकर बदल जाए तो और बात है। अभी तो वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति, डेल्सी रोड्रिगज ने कहा है कि देश पर वेनेजुएला की सरकार शासन कर रही है, न कि कोई विदेशी शक्ति। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के उन दावों को खारिज कर दिया, जिन्होंने कहा था कि उन्हें वेनेजुएला तक पूरी पहुंच चाहिए। रोड्रिगज ने कहा यहां कोई युद्ध नहीं है क्योंकि हम युद्ध में नहीं हैं। हम एक शांतिप्रिय लोग हैं। एक शक्तिशाली देश हैं, जिस पर हमला किया गया और आाढमण किया गया। उनकी यह टिप्पणी तब आई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि वेनेजुएला के अंतरिम अधिकारी 3 से 5 करोड़ बैरल प्रतिबंधित तेल अमेरिका को हस्तांतरित करेंगे। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 8 January 2026

अंकिता भंडारी केस का सच सामने आना चाहिए


अंकिता भंडारी हत्याकांड केस में वीआईपी का नाम सामने आने के बाद न्याय की मांग ने नए सिरे से तूल पकड़ लिया है। सामाजिक संगठनो और कांग्रेस ने रविवार को कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच की मांग को लेकर बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया। कार्यकर्ताओं ने देहरादून में मुख्यमंत्री आवास तक जाने की कोशिश की। इधर दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी मामले में न्याय की मांग पर प्रदर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटे। इस मुद्दे को लेकर 11 जनवरी को उत्तराखंड बंद का ऐलान किया गया है। इसके अलावा आने वाले दिनों में मशाल जुलूस और प्रदर्शनों का सिलसिला भी जारी रहने की उम्मीद है। बता दें कि अंकिता भंडारी मर्डर केस क्या है? अंकिता भंडारी (19) वन्तारां रिजार्ट में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करती थी। 18 सितम्बर 2022 को वह अचानक लापता हो गई। कुछ दिनों बाद उसका शव चीला कैनाल में बरामद हुआ। रिसॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य और दो कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। कोर्ट में उन्हें उम्र कैद की सजा सुनाई गई। उन्हें हत्या, सबूत मिटाने और अन्य गंभीर आरोपों के तहत सजा मिली। कोर्ट ने अंकिता के परिवार को मुआवजा भी देने का आदेश दिया। हाल में अंकिता केस ने सोशल मीडिया और कुछ वीडियो-ऑडियो क्लिप की वजह से वीआईपी का नाम चर्चा में आया। हालांकि पुलिस ने ऐसे किसी व्यक्ति की भूमिका से इंकार किया है। उर्मिला सनावर नाम की महिला ने ये क्लिप शेयर किए थे, जिसमें एक शख्स को गट्टू नाम का बताया गया। इसके बाद बड़े नेता यानि वीआईपी का नाम सामने आया। आरोप लगा कि वीआईपी भाजपा का एक सीनियर नेता है। उत्तराखंड महिला मंच के बुलाने पर 4 जनवरी को देहरादून में जबरदस्त प्रदर्शन किया गया। प्रोटेस्ट को उत्तराखंड क्रांति दल, कांग्रेस और कई संगठन अपना समर्थन दे रहे हैं। किन्नर भी न्याय के लिए सामने आए हैं। इस पूरे मामले में सीबीआई जांच, वीआईपी का नाम और जितनी शंकाएं उठ रही हैं, उनकी जांच करवाने को लेकर उत्तराखंड महिला मंच द्वारा बुलाए गए प्रोटेस्ट में हजारों युवाओं ने भी भाग लिया। देहरादून में इस प्रोटेस्ट के दौरान पुलिस व कांग्रेस के प्रदर्शनकारियों के बीच जबरदस्त नोंकझोंक भी हुई। वहीं भाजपा ने जिला मुख्यालय में अंकिता भंडारी मामले को लेकर कांग्रेस पर झूठ फैलाने का आरोप लगाया और कांग्रेस के पुतले भी फूंके। कांग्रेस, उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद), महिला मंच, वामपंथी दलों और सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता परेड ग्राउंड में एकत्र हुए और मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच करते हुए हत्याकांड में सफेदपोश के नाम का खुलासा किए जाने के लिए प्रकरण की जांच सीबीआई को सौंपे जाने की अपनी मांग को दोहराया। इस विरोध मार्च में शामिल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के राज्य सचिव इंद्रेश येचुरी ने कहा कि हत्याकांड की जांच से जुड़े पुलिस अधिकारी शेखर सुभात द्वारा मामले में किसी वीआईपी की संलिप्तता न होने संबंधी बयान से सहमत नहीं हुआ जा सकता। येचुरी ने कहा कि उनकी मांग है कि मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के जज की निगरानी में सीबीआई से कराई जाए ताकि वीआईपी का पता चल सके। हमारा भी मानना है कि अब यह मामला इतना तूल पकड़ चुका है कि असलीयत का पता चलना ही चाहिए। अगर सरकार इतनी निष्पक्ष है तो क्यों नहीं सीबीआई जांच करा लेती। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा और धामी सरकार पर यह आरोप भी नहीं लगेगा कि वह इस व्यक्ति वीआईपी को बचाने के लिए मामले की लीपापोती कर रही है।
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 6 January 2026

क्या शाहरुख खान गद्दार हैं?


ऐसा कहना कुछ भाजपा के नेताओं का है क्योंकि शाहरुख खान की आईपीएल टीम कोलकाता नाइट राइडर्स (केकेआर) कें टीम ने बांग्लादेश के तेज गेंदबाज मुस्तफिजुर रहमान को अपनी टीम के लिए खरीद लिया। मुस्तफिजुर रहमान को कोलकाता नाइट राइडर्स ने आईपीएल 2026 के लिए 9 करोड़ रुपए से अधिक में खरीदा था। बॉलीवुड सुपर स्टार शाहरुख खान टीम के मालिकों में से एक हैं। अब खबर आई है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने कोलकाता नाइट राइडर्स को बांग्लादेश के तेज गेंदबाज मुस्तफिजुर रहमान को टीम से रिलीज करने के लिए कहा है। बीसीसीआई के सेक्रेट्री देवजीत सैकिया ने एएनआई को बताया है कि ये फैसला हाल के घटनाक्रमों को देखते हुए लिया गया है। बोर्ड ने केकेआर को रहमान के बदले किसी दूसरे खिलाड़ी को रखने की इजाजत दे दी। इससे पहले भारत के दक्षिण पंथी संगठन और कुछ भाजपा के नेताओं ने मुस्तफिजुर को केकेआर टीम में शामिल करने पर शाहरुख खान की जमकर आलोचना की थी। राम भद्राचार्य ने शाहरुख खान पर निशाना साधते हुए पीटीआई से कहा कि केकेआर में मुस्तफिजुर रहमान को शामिल करना दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे पहले देवकी नंदन ठाकुर ने भी बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ कथित हिंसा का हवाला देते हुए केकेआर के फैसले पर सवाल उठाया था और कहा था, बांग्लादेश में हिन्दुओं की निर्ममता से हत्या की जा रही है, उनके घर जलाए जा रहे हैं, उनकी मांओं और बोटियों से बलात्कार हो रहा है। इस तरह की क्रूर हत्याओं को देखने के बाद कोई इतना बेरहम कैसे हो सकता है कि उस देश के किसी क्रिकेटर को अपनी टीम में शामिल करे? वहीं भाजपा नेता और यूपी में सरधना के पूर्व विधायक संगीत सिंह सोम ने मुस्तफिजुर को केकेआर में शामिल करने के लिए शाहरुख खान को गद्दार तक कह दिया। उन्होंने कहा कि शाहरुख खान को भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं है। संगीत सोम ने मेरठ में कहा था एक तरफ बांग्लादेश में हिन्दुओं का कत्लेआम हो रहा है, दूसरी तरफ आईपीएल नीलामी में क्रिकेटरों को खरीदा जा रहा है। आज बांग्लादेश में भारत विरोधी नारे लग रहे हैं, प्रधानमंत्री को गालियां दी जा रही हैं, लेकिन शाहरुख खान जैसे गद्दार 9 करोड़ रुपए खर्च करके उनकी मदद कर रहे हैं। इन टिप्पणियों की विपक्षी नेताओं और मुस्लिम धार्मिक संगठनों ने बड़ी निंदा की है। कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहती हूं कि बांग्लादेशी खिलाड़ियों को उस पूल में किसने डाला? यह सवाल बीसीसीआई और आईसीसी के लिए है। गृहमंत्री के बेटे जय शाह को जवाब देना चाहिए कि बांग्लादेशी खिलाड़ियों को उस पूल में किसने डाला जहां आईपीएल खिलाड़ियों की खरीद-बिक्री होती है और नीलामी होती है। कांग्रेस सांसद मणिक्कम टैगोर ने शाहरुख खान पर हुए हमलों को भारत की बहुलता पर हमला बताया। गुरुवार को उन्होंने एक्स पर लिखा, सुपरस्टार शाहरुख खान को गद्दार कहना भारत की बहुलता पर हमला है। नफरत राष्ट्रवाद की परिभाषा नहीं हो सकती। आरएसएस को समाज को जहर देना बंद करना चाहिए। इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने कहा के विरोध प्रदर्शन अक्सर सिर्फ इसलिए होते हैं क्योंकि उनमें मुस्लिम नाम शामिल होते हैं। शाहरुख खान मुस्लिम हैं, मुस्तफिजुर भी मुस्लिम हैं इसलिए विरोध होना लाजमी है क्योंकि मुस्लिमों के प्रति नफरत सामने आती है।
-अनिल नरेन्द्र

Sunday, 4 January 2026

कुरान पर हाथ रखकर ली शपथ ममदानी ने


जोहरान ममदानी ने एक जनवरी 2026 को न्यूयार्क के मेयर पद की शपथ ले ली है। वह शहर के 111वें मेयर और बीते 100 साल में सबसे कम उम्र के मेयर बनकर इतिहास रच चुके हैं। शहर के 111वें मेयर के तौर पर जोहरान ममदानी ने एक पुराने सबवे में आयोजित निजी समारोह में कुरान को हाथ में ले शपथ ली। क्वीन्स प्रांत के प्रतिनिधि रह चुके 34 वर्षीय ममदानी अब अमेरिका के सबसे बड़े शहर के मेयर बनने वाले दक्षिण एशियाई मूल के और मुस्लिम समुदाय के पहले व्यक्ति हो गए हैं। जोहरान ममदानी ने कभी अपने मुस्लिम होने को छिपाया नहीं बल्कि खुलकर कहा मैं एक मुसलमान हूं। 34 साल के ममदानी 100 साल से भी अधिक समय में न्यूयार्क के सबसे युवा, पहले मुसलमान और दक्षिण एशियाई मूल के मेयर बने हैं। मेयर पद के लिए मुख्य मुकाबला जोहरान ममदानी और एंड्रयू कुओमो के बीच था। उनके चुनाव ने प्रोग्रेसिव लोगों के लिए एक बड़ा बदलाव लाया जो शहर के राजनीतिक केंद्र में बदलाव का संकेत था। चुनाव जीतने के बाद ममदानी ने आधे घंटे लंबे भाषण में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर निशाना साधा था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव से पहले ममदानी को वोट न देने की अपील की थी। उन्होंने फ्री बस सेवा, यूनिवर्सल चाइल्डकेयर और बढ़ती महंगाई काबू करने समेत अपने सभी चुनावी वादों को पूरा करने की बात कही। जोहरान ममदानी का जन्म 1991 में युगांडा की राजधानी कंपाला में हुआ था। उनके पिता ने उन्हें एक क्रांतिकारी और घाना के पहले प्रधानमंत्री क्वामे एनक्रूमा के नाम पर मिडिल नेम क्वामे दिया था। ममदानी बता दें कि मशहूर भारतीय-अमेरिकी फिल्म निर्देशक मीरा नायर और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के जाने-माने प्रोफेसर महमूद ममदानी के बेटे हैं। ममदानी ने कहा था कि उनका शपथ ग्रहण न्यूयार्क के लिए एक नए युग की शुरुआत का प्रतीक होगा। इससे न्यूयार्क के कामकाजी कर्मचारियों को आवश्यक रूप से केंद्र में रखा जाएगा। जोहरान ममदानी ने दिल्ली के जेएनयू छात्र नेता और 2020 से जेल में बंद उमर खालिद को एक पत्र लिखकर कहा कि मैं आपको याद कर रहा हूं और आपके बारे में सोच रहा हूं। ममदानी के इस पत्र की भारत सरकार ने आलोचना की है और कहा है कि वे हमारी न्याय व्यवस्था पर प्रश्न उठा रहे हैं जोकि उन्हें कोई अधिकार नहीं है। ममदानी की जीत साधारण जीत नहीं मानी जा सकती। न्यूयार्क खरबपतियों का शहर है जहां पर यहूदी लॉबी बहुत शक्तिशाली है। तमाम उद्योगपतियों के विरोध और यहूदी लॉबी के विरोध के बावजूद ममदानी की जीत ऐतिहासिक मानी जाएगी। एक समय तो खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ममदानी के खिलाफ प्रचार में उतर गए थे और यहां तक कहा था कि देखता हूं यह कैसे जीतता है? ट्रंप उन्हें कम्युनिस्ट तक कह चुके हैं। ममदानी को दाद देनी होगी कि उन्होंने न तो अपने मूल को छुपाया और न ही अपने धर्म को। उनकी जीत से अमेरिका के अंदर सियासी समीकरण बदलने की आशंका जताई जा रही है। उनके क्रांतिकारी वादे जो कुछ-कुछ आम आदमी पार्टी के नारों से मिलते हैं, क्या रंग लाते हैं देखना होगा। यह भी देखने लायक होगा कि अब जब ममदानी न्यूयार्क जैसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली शहर के मेयर बन चुके हैं। राष्ट्रपति ट्रंप इनके साथ कौन सा रवैया अपनाते हैं? हम जोहरान ममदानी को उनकी अप्रत्याशित जीत पर हार्दिक बधाई देते हैं और उम्मीद करते हैं कि वो अपने वादों पर खरे उतरेंगे और अपने समर्थकों को निराश नहीं करेंगे। पर रास्ता आसान नहीं होगा। उन्होंने कांटे भरा रास्ता चुना है।
-अनिल नरेन्द्र

Friday, 2 January 2026

2025 की वो घटनाएं जो हमेशा याद रहेंगी


2026 आ गया है। हम ऊपर वाले से प्रार्थना करते हैं कि यह वर्ष पिछले वर्ष से हर लिहाज से बेहतर साबित हो। 2025 दुर्भाग्य से अगर उसे हादसों का वर्ष कहें तो शायद गलत नहीं होगा। 2025 का साल भारत के लिए त्रासदियों भरा रहा। 2025 में भारत में वो 5 घटनाएं हुई हैं जो देशवासियों के जहन में हमेशा के लिए दर्ज हो गई हैं। जिसमें पहलगाम आतंकी घटना, प्रयागराज महाकुंभ भगदड़, अहमदाबाद विमान हादसा, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन भगदड़ और दिल्ली आतंकी हमला शामिल है। 22 अप्रैल 2025 भारत के लिए कभी भी न भूलने वाली तारीख है। इस दिन जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पर्यटकों पर आतंकियों ने हमला किया था। इसमें 26 निर्दोष लोगों की मौत हो गई थी। इस हमले की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तौयबा के एक संगठन ने ली थी। मंगलवार के दिन बसैरन घाटी में आतंकियों ने इस कायरनामा हरकत से मिनी स्विटजरलैंड कहा जाने वाला यह स्थान कुख्यात हो गया। दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला प्रयागराज महाकुंभ वैसे तो सफल रहा। लेकिन 29 जनवरी 2025 को जो वहां भगदड़ मची उसने एक बदनुमा दाग लगा दिया। जिसमें करीब 40 लोगों की मौत हो गई थी और दर्जनों घायल हुए थे। यह हादसा मौनी अमावस्या के दिन अमृत स्नान के दौरान हुआ। 11 फरवरी 2025 को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़ में 18 लोगों की मौत हो गई थी। यहां लोग प्रयागराज महाकुंभ जाने के लिए स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। लेकिन ट्रेन का प्लेटफार्म बदलने के चलते ये भगदड़ मच गई थी। स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 13 और 14 पर शनिवार को उस समय भगदड़ मच गई जब यात्रियों के बीच प्रयागराज जा रही दोनों ट्रेने के रद्द होने की अफवाह फैल गई। 12 जून 2025 की यह तारीख भारत को कभी नहीं भूलने वाली डेट है। इस दिन अहमदाबाद से लंदन जा रही एयर इंडिया की एक फ्लाइट अपनी उड़ान भरने के महज 30 सैकेंड बाद ही क्रैश हो गई थी। इस बोइंग विमान 783 ड्रीमलाइनर विमान में पायलट समेत 242  लोग सवार थे। जिसमें 241 मारे गए थे, सिर्फ एक बचा था। इस विमान दुर्घटना में भाजपा के वरिष्ठ नेता और गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी का भी निधन हो गया था। भारतीय इतिहास के सबसे बड़े विमानन दुर्घटनाओं में से एक मानी जा रही इस दुर्घटना ने हर किसी को गमगीन कर दिया था। अंत में इस सूची में दिल्ली लालकिला आतंकी हमला आता है। वैसे तो पूरे देश में और कई हादसे हुए। मैंने सिर्फ कुछ प्रमुख हादसों का जिक्र किया है। लालकिला ब्लास्ट 10 नवम्बर 2025 को लाल किला मैट्रो स्टेशन के पास हुआ था। रेड लाइट पर एक सफेद रंग की हुंडई आई-20 कार में ब्लास्ट होने से 12 लोगों की मौत हो गई थी और दर्जनों घायल हो गए थे। छानबीन के कुछ समय बाद सामने आया कि हुंडई आई-20 कार चलाने वाला उमर मोहम्मद उर्फ उमर-उन- नबी था। इसके बाद इसके तार अल फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े। डाक्टरों के एक निहायत खतरनाक आतंकी नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ। अभी भी इसकी जांच चल रही है। फरीदाबाद में गिरफ्तार मुस्लिम के घर से 2910 किलो विस्फोटक बरामद हुआ था। कुल मिलाकर 2025 न केवल भारत के लिए ही एक हादसों का साल रहा बल्कि पूरे विश्व की अशांति और हिंसा का साल रहा। 2026 बेस्ट साबित हो हम इसकी उम्मीद और प्रार्थना करते हैं।
-अनिल नरेन्द्र