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Tuesday, 24 April 2012

सियाचिन पर जनरल कयानी के बयान की विश्वसनीयता?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24 April 2012
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान में सेना और जरदारी सरकार में मतभेद हैं इसका एक उदाहरण हमें पाक सेनाध्यक्ष अशफाक परवेज कयानी के ताजा सियाचिन संबंधी बयान से मिलता है। बहुत कम पब्लिक में बोलने वाले जनरल कयानी ने पिछले दिनों कहा कि भारत और पाकिस्तान दोनों देशों को सियाचिन से अपनी सेना वापस बुला लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को सियाचिन के मुद्दे को बातचीत से सुलझाना चाहिए। ज्ञात हो कि सियाचिन में इस महीने की शुरुआत में हिमस्खलन में 125 पाक सैनिक सहित 139 लोग दब गए थे। जहां हमें इस बात का दुख है कि इतने पाक सैनिकों की मृत्यु हुई और हम उनके परिवारों के दुख में शरीक हैं वहीं हम यह भी कहना चाहेंगे कि हमें जनरल कयानी की बातों पर ज्यादा यकीन नहीं है। इधर जनरल कयानी का बयान आया तो उधर कुछ देर बाद ही पाक विदेश मंत्रालय ने स्पष्टीकरण दे दिया कि सियाचिन मुद्दे पर पाकिस्तान के रुख में कोई तब्दीली नहीं हुई। इससे सवाल उठता है कि क्या जनरल कयानी के सियाचिन के उस जगह दौरे जहां बर्प में धंसने से पाक सैनिकों की मौत हुई थी वह इस अति दुर्गम स्थल पर मौत के तांडव के प्रति उनकी महज जज्बाती प्रतिक्रिया थी? क्या हम इसका यह मतलब भी निकाल सकते हैं कि राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की भारत के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिशों को पाक सेना का समर्थन प्राप्त है? संयोग से पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी जरदारी की भारत यात्रा का समर्थन किया और सरकार से मांग की कि सियाचिन मुद्दे का हल ढूंढने के लिए वह अपनी ओर से पहल करें। मुश्किल यह है कि पाकिस्तान की कथनी और करनी में बहुत फर्प है। पाकिस्तान से मिलने वाले विरोधाभास संदेश अकसर दुविधा पैदा कर देते हैं। वैसे हाल में पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से कुछ सकारात्मक संकेत मिले हैं। मसलन गृहमंत्री रहमान मलिक का भारत को आगाह करना कि तालिबानी आतंकवादी भारत में घुसपैठ कर सकते हैं और इसे रोकने के लिए पाकिस्तान भारत से पूरा सहयोग करने को तैयार है। लेकिन इन्हीं रहमान मलिक ने नवाज शरीफ के इस सुझाव की निन्दा कर दी कि पाकिस्तान को एकतरफा कदम उठाते हुए सियाचिन से अपनी फौज हटा लेनी चाहिए। ऐसे सन्दर्भों की वजह से हम जनरल कयानी की बातों को गम्भीरता से नहीं ले सकते। जो देश अपने अस्तित्व को भारत से दुश्मनी के सन्दर्भ में परिभाषित करता रहा हो और जहां विभाजन के अपूर्ण एजेंडे को पूरा करने की बातें खुलेआम कही जाती हों, वहां के सेनाध्यक्ष की ऐसी बातों पर सहज विश्वास न होना स्वाभाविक ही है। इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान ने कम से कम तीन बार सियाचिन से भारत की फौजों को हटाने के लिए असफल सैन्य अभियान किए। यहां का मौसम इतना जानलेवा है कि युद्ध की बनिस्पत हिमस्खलन और शीत से ज्यादा लोग मरते हैं। दोनों ही देशों को यहां अपनी रक्षा सेनाओं पर जितना खर्च करना प़ड़ता है, उसकी तुलना में उन्हें कोई खास लाभ नहीं। भारत का कहना है कि हम अपनी सेनाओं की वापसी पर बातचीत कर सकते हैं पर इससे पहले दोनों भारत और पाक की फौजें इस समय कहां-कहां हैं, इसे अडेंटीफाई किया जाए और यह करने को पाक तैयार नहीं है।
Anil Narendra, Daily Pratap, General Kayani, Indo Pak War, Pakistan, Siachin, Vir Arjun

Saturday, 2 July 2011

धमकी की जुबान बोलने वाले पाकिस्तान का कबूलनामा


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2st July 2011
अनिल रेन्द्र
पाकिस्तान अपने बड़बोलेपन के लिए मशहूर है, खासकर जब भारत के बारे में कोई बात होती है। आए दिन उसके जनरल धमकियां देते रहते हैं कि अगर हमारे ऊपर हमला किया गया तो हम भारत के दांत तोड़ने की क्षमता रखते हैं। यहां तक कि परमाणु हमले की भी धमकी परवेज मुशर्रफ से लेकर कयानी तक दे चुके हैं। जब पाकिस्तान के रक्षामंत्री चौधरी अहमद मुख्तार का यह बयान आया या स्वीकृति आई कि जंगी मुकाबले में उनके देश की हैसियत भारत से कम है तो ताज्जुब जरूर हुआ। एबटाबाद हमले जैसी कोशिश करने पर भारत को सबक सिखाने की धमकी देने वाले पाकिस्तान की जुबान पर आखिरकार सच्चाई आ ही गई। पाकिस्तान ने मान लिया है कि सैन्य ताकत में वह भारत की बराबरी नहीं कर सकता है। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने बीबीसी को दिए साक्षात्कार में कहा कि सैन्यशक्ति में अगर हम भारत की बराबरी करना चाहें या उसके पास उपलब्ध सैन्य हथियार उपकरणों को हम भी खरीदना चाहें तो हम ऐसा नहीं कर सकते हैं। सरकार ने दोनों देशों के सामरिक सामर्थ्य की तुलना करते हुए कहा कि पहले तो भारत और पाक 20 से 22 दिनों तक जंग लड़ सकते थे लेकिन अब भारत ने 45 दिन तक जंग करने लायक क्षमता विकसित कर ली है। हम ऐसा नहीं कर सकते। मुख्तार ने माना कि भारत की अर्थव्यवस्था पाकिस्तान से तकरीबन छह से सात गुणा ज्यादा बड़ी है। उनकी इस टिप्पणी को भारत के सामरिक और रणनीति विशेषज्ञ सच्चाई मान रहे हैं जिससे पाकिस्तान आंखें नहीं मूंद सकता है।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री चौधरी अहमद मुख्तार का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका द्वारा पाकिस्तान में घुसकर की गई कार्रवाई में दुनिया के सबसे दुर्दांत आतंकी ओसामा बिन लादेन को मार गिराने के कोई दो माह बाद उस देश की सप्रभुत्ता के अमेरिकी हनन का शेर शांत हो चुका है। लिहाजा मुख्तार के बयान को जुमलेबाजी नहीं मानना चाहिए। अगर पाकिस्तान आत्मघाती दुस्साहस, कोरी धमकियों का सिलसिला छोड़ दे तो हकीकत तो यह है कि पाकिस्तान की हैसियत किसी भी क्षेत्र में भारत के सामने ठहरती नहीं। अभावों के बीच व भूखे पेट लड़ाई नहीं हो सकती। सारी दुनिया जानती है कि पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था की आज वास्तविक स्थिति क्या है। अगर अमेरिका आर्थिक मदद आज देना बन्द कर दे तो पाकिस्तान का बैंड बज जाए। भारतीय अर्थव्यवस्था न केवल मजबूत ही है बल्कि दिन प्रतिदिन और मजबूत होती जा रही है। पिछले साल भारत का जीडीपी जहां 1430 बिलियन डालर अनुमानित था, वहीं पाकिस्तान का जीडीपी स्तर मात्र 175 बिलियन डालर था। वह पाकिस्तान अपने जीडीपी का बड़ा भाग फौज और सुरक्षा पर खर्च करता है जो इस आधार पर भारत के खर्च के मुकाबले 11 फीसदी से ज्यादा है। लेकिन उसकी झूठी शान तो है ही, गृह युद्ध जैसे हालात व अपने द्वारा पैदा तथा पोषित किए गए आतंकवाद से निपटने की मजबूरी भी है। सैन्य क्षेत्र में भी भारत की दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी सेना है जिसमें कुल 27 लाख, छह हजार से ज्यादा सैनिक हैं। पाकिस्तानी फौज इसके आधे से भी कम (12 लाख, 50 हजार सैन्य बल की) है। भारत के पास हथियारों का जो जखीरा है उसमें 5000 मुख्य लड़ाकू टैंक, 13000 तोपें, 1322 लड़ाकू विमान, 25 नौसैनिक विमान, 18 पनडुब्बी, 13 फ्रीगेट, 1200 बैलेस्टिक मिसाइलें और पृथ्वी, अग्नि, आकाश तथा त्रिशूल जैसी अन्य मिसाइलें हैं। इसकी तुलना में पाकिस्तान के पास 3950 तोपें, 710 लड़ाकू विमान व 21 फ्रीगेट हैं। उसके पास हत्फ, गौरी व शाहीन जैसी मिसाइलें हैं जिन पर कुछ क्षेत्रों में संदेह किया जाता है। कुल मिलाकर पाकिस्तान सैन्य दृष्टि से भारत के सामने ज्यादा दिन की लड़ाई लड़ने की क्षमता नहीं रखता। उसे अब भी अमेरिकी आर्थिक व सैन्य मदद का सिलसिला जारी है। भारत को चौधरी मुख्तार की स्वीकृति से खुश नहीं होना चाहिए और अपनी सैन्य क्षमता पर से ध्यान नहीं हटाना चाहिए क्योंकि हमें यह याद रखना होगा कि भारत के खिलाफ पाकिस्तान अकेला नहीं, उसको चीन का पूरा समर्थन है। दोनों, चीन और पाकिस्तान भारत पर भारी पड़ सकते हैं। बार-बार सबूत मिलने के बाद भी अमेरिका पाकिस्तान के मामले में सुधरा नहीं और आज भी उसे मदद देने से बाज नहीं आ रहा। एक दृष्टि से देखा जाए तो पाकिस्तान की विदेश नीति भारत से ज्यादा सफल है। उसे दोनों, अमेरिका और चीन का समर्थन मिल रहा है
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अब तो गरीब की थाली से सब्जी भी गायब हो रही है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2st July 2011
अनिल रेन्द्र
सरकार ने पेट्रोल पम्प डीलरों के कमीशन की बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है जिससे पेट्रोल 27 पैसे और डीजल 15 पैसे प्रति लीटर और महंगा हो गया है। इससे महंगाई और बढ़ जाएगी। पहले से ही महंगाई की मार से दबी जनता पर अब और भार पड़ जाएगा पर यूपीए सरकार को इससे कोई चिन्ता नहीं। प्रधानमंत्री कहते हैं कि आम जनता को यह मार अभी कुछ और समय तक झेलनी पड़ेगी। मनमोहन सिंह ने कहा कि अगले साल मार्च तक 6 फीसदी हो सकती है मुद्रास्फीति की दर। उनके वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी कहते हैं कि डीजल, रसोई गैस और केरोसिन के दामों में हाल में की गई बढ़ोतरी को वापस नहीं लिया जाएगा। अमेरिका की यात्रा पर पहुंचे प्रणब ने बुधवार को कहा कि दामों में बढ़ोतरी का फैसला वापस लेने का कोई सवाल ही नहीं उठता। बढ़ती महंगाई के कारण गरीब आदमी की थाली से सब्जियां भी अब गायब होने लग गई हैं। अर्थशास्त्राr योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने बढ़ती कीमतों को यूं तर्पसंगत बताया। उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्र का प्रमुख सिद्धांत है, खपत कम करो तो महंगाई कम होगी। वस्तुओं की कीमतें कम होंगी तो वित्तीय घाटा कम होगा। इसलिए महंगाई घटाने के लिए ही कीमतें बढ़ाई गई हैं।
डीजल की बढ़ी कीमत का असर आम आदमी की थाली पर दिखना शुरू हो गया है। बाजार में सब्जियों के दाम उंचाई छूने लगे हैं। थोक की तुलना में फुटकर बाजार में यह तेजी ज्यादा दिख रही है। हालत यह है कि डीजल की बढ़ती कीमत का हवाला देकर फुटकर कारोबारी सब्जियों की मनमानी कीमतें वसूल रहे हैं। एक माह के भीतर थोक बाजार में टमाटर के भाव 10 गुणा बढ़े हैं, वहीं खुदरा कारोबारियों ने इसकी कीमत 20 गुणा तक बढ़ा दी है। महंगाई के चलते अब सलाद से टमाटर भी गायब हो गया है। थाली से हरी सब्जियां भी धीरे-धीरे नदारद हो रही हैं। डीजल की कीमतों में हुई वृद्धि की वजह से सब्जियों की कीमतों में जो उछाल आया है वह थमने का नाम ही नहीं ले रहा। खुदरा कारोबारी इसका मनमाना फायदा उठा रहे हैं। दिल्ली की आजादपुर की थोक मण्डी में जो टमाटर 30 मई को 1.60 रुपये किलो था वही 28 जून तक 15 रुपये किलो बिका। खुदरा बाजार में इसकी कीमत 45 रुपये तक पहुंच गई है। जो आलू 30 मई को 800 था वह 22 जून को 1250 और 28 जून को 1125 तक पहुंच गया। यह है थोक दाम और फुटकर का तो हाल ही न पूछें। 29 जून को टमाटर फुटकर में 30 से 45 रुपये प्रति किलो बिक रहा है। आलू का दाम 15 से 20 रुपये। प्याज जैसी चीज 20 से 30 रुपये प्रति किलो, फूल गोभी 30 से 40 रुपये, शिमला मिर्च 35 से 50 रुपये प्रति किलो बिकी। मानसून की वजह से भी हरी सब्जी और टमाटर की आवक प्रभावित हुई है, जिसका असर उनके दामों पर देखने को मिल रहा है। भिण्डी जो पहले 7 रुपये में बिकती थी अब 30 रुपये में बिक रही है। घीया 5 से 15, तोरई 20 से 60, करेला 10 से 35, आलू 7 से 15 तक पहुंच गया। महंगाई इस देश की सबसे बड़ी समस्या है। इससे भारत की 95 प्रतिशत जनता सीधा प्रभावित होती है और मनमोहन सरकार के पास इसको घटाने का न तो कोई फॉर्मूला है और न ही इच्छाशक्ति। प्रधानमंत्री और उनके वित्तमंत्री, उनके सिपहसालारों को ज्यादा चिन्ता ग्रोथ रेट की है। अंतर्राष्ट्रीय छवि की है। अमेरिका हमारी आर्थिक नीतियों पर क्या सोचता है यह प्रधानमंत्री के लिए ज्यादा जरूरी है बनिस्पत भारत की जनता।
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