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Tuesday, 4 April 2023

क्या ब्लादिमीर पुतिन गिरफ्तार होंगे?

रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन को गिरफ्तार करने के अंतर्राष्ट्रीय व््िरामिनल कोर्ट (आईंसीसी) ने 17 मार्च 2023 को रूसी राष्ट्रपति पुतिन और चिल्ड्रेंस राइट्स के लिए रूस की कमिशनर मारिया मवोवा-बेलोबा के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया। आईंसीसी ने फरवरी 2022 में यूव््रोन पर रूस का हमला होने के बाद यूव््रोन से बच्चों के आपराधिक डिपोर्टेशन के मामले में दोनों पर निजी तौर पर जिम्मेदार होने का आरोप लगाया। आईंसीसी ने पुतिन पर इसे रोकने के लिए राष्ट्रपति के तौर पर अपने अधिकारों का इस्तेमाल न करने का आरोप लगाया और कहा कि उनके खिलाफ मामला चलाने के लिए पर्यांप्त सुबूत हैं। आईंसीसी ने कहा कि यूव््रोन के सैकड़ों बच्चों को अनाथालयों और बालगृहों से रूस लाया गया ताकि रूस में रह रहे परिवार और गोद ले सवें। यूव््रोन के नेशनल इनफाम्रेशन ब्यूरो के अनुसार 16221 बच्चों को जबरन रूस ले जाया गया है। कोर्ट ने कहा कि जिस वक्त बच्चों को डिपोर्ट किया गया उन्हें चौथे जेनेवा कन्वेंशन के तहत सुरक्षा दी गईं थी। यूव््रोन ने अंतर्राष्ट्रीय व््िरामिनल कोर्ट से अपनी जमीन पर हो रहे युद्ध अपराधों की जांच करने की गुजारिश की थी जिसके बाद उसकी सुनवाईं की गईं। यह पहली बार है जब कोर्ट ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से एक के नेता के खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी किया है। यूव््रोनी राष्ट्रपति ब्लादिमीर जेलेंस्की ने इस पैसले का स्वागत किया और इसे ऐतिहासिक पैसला बताया है जो इस मामले में जिम्मेदारी तय करेगा। रूस ने कोर्ट के इस पैसले को अस्वीकार्यं बताया और कहा कि यह गिरफ्तारी वारंट किसी काम का नहीं है। बता दें कि अंतर्राष्ट्रीय व््िरामिनल कोर्ट का मुख्यालय नीदरलैंड्स के द हेग में है। यह कोर्ट नरसंहार अपराध और मानवता के खिलाफ अपराधों की जांच करती है और इसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति पर मुकदमा चलाती है। 1998 में रोम संविधि के तहत इसकी स्थापना हुईं थी। हालांकि इसने 2002 में ही अपना काम शुरू कर दिया था। इसका सालाना बजट 13 करोड़ पाउंड का है जिसे यह मामलों की जांच पर खर्च करती है। अब तक कोर्ट 31 मामलों की सुनवाईं कर चुकी है और 10 लोगों को सजा सुना चुकी है। आईंसीसी जजों ने अब तक वुल 40 अरेस्ट वारंट जारी किए हैं। अब तक दूसरे मुल्कों की मदद से 21 लोगों को पकड़ कर आईंसीसी डिटेशन सेंटर में रखकर कोर्ट के सामने पेश किया गया है जबकि 18 को अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया। आईंसीसी वारंट तो जारी कर सकता है, लेकिन उसके पास व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट के अध्यक्ष प्यूटर हाफमैनस्की ने कहा है कि पुतिन को गिरफ्तार करना अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पर निर्भर करता है। लेकिन रूस में मौजूदा वक्त में पुतिन की जो हैसियत है उन्हें कोईं भी चुनौती नहीं दे सकता। वैसे भी रूस आईंसीसी में सिगनेटरी नहीं है। ——अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 19 June 2012

विरोध से शुरू हुआ है ब्लादिमीर पुतिन का तीसरा कार्यकाल

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19 June 2012
अनिल नरेन्द्र
रूस में राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की क्या सत्ता पर पकड़ ढीली होती जा रही है? पुतिन ने 7 मई को अपना तीसरा राष्ट्रपति का कार्यकाल आरम्भ किया है। वर्ष 2000 में बोरिस येल्तसिन को हराकर पुतिन पहली बार रूस के राष्ट्रपति बने थे। 2004 में उन्होंने दोबारा चुनाव जीता। वे 2008 में भी राष्ट्रपति का चुनाव लड़ते यदि संवैधानिक बाधा बीच में नहीं आती। इसे दूर करने के लिए पुतिन प्रधानमंत्री बन गए और अपने विश्वसनीय दमित्री मेदवेदेव को देश का राष्ट्रपति बनवा दिया। तीसरी बार शपथ लेने के तत्काल बाद पुतिन ने प्रधानमंत्री के रूप में मेदवेदेव को बिठा दिया। यह दोनों नेताओं के बीच सत्ता की भागीदारी को लेकर समझौते के तहत किया गया। खुफिया एजेंसी केजीबी के अधिकारी के तौर पर काम कर चुके पुतिन अपना यह कार्यकाल पूरा करते हैं तो वह स्टालिन के बाद सोवियत संघ और रूस में सबसे ज्यादा समय तक राष्ट्रपति का पद सम्भालने वाले नेता बन जाएंगे पर गत दिनों पुतिन के खिलाफ हजारों लोग मास्को की सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारी `पुतिन के बिना रूस' और `पुतिन चोर है' के नारे व बैनर लेकर सड़कों पर उतर आए। यह वर्तमान कार्यकाल में पुतिन के खिलाफ सबसे बड़ा प्रदर्शन था। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि मार्च में राष्ट्रपति का चुनाव जीतने के लिए पुतिन ने धांधलेबाजी की और जबरदस्ती चुनाव जीता। इससे पहले पुलिस ने कई विपक्षी नेताओं के घरों पर छापे मारे और मंगलवार की इस रैली, मार्च को रोकने का हर प्रयास किया। वर्तमान तीसरे कार्यकाल के आरम्भ से ही पुतिन का विरोध शुरू हो गया। विपक्ष तभी से कह रहा है कि पुतिन ने इन चुनावों में सरकारी तंत्र का बेजा इस्तेमाल करते हुए फर्जीवाड़ा किया। पुतिन ने विवाद का कोई हल ढूंढने की बजाय आंदोलन का लगातार उपहास उड़ाया। उन्होंने कई बार यह दोहराया कि इस आंदोलन के पीछे विदेशी हाथ है। पुतिन के इस रवैये से लोगों के बीच उनकी छवि एक ऐसे नेता की बन गई जो किसी भी कीमत पर सत्ता हथियाना चाहते हैं। राष्ट्रपति पुतिन को अब चाहिए कि वह अपनी विश्वसनीयता को बहाल करने के लिए अविलम्ब चुनाव सुधार करने चाहिए ताकि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता आए। वे जब तक चुनाव सुधारों की दिशा में कोई कारगर कदम नहीं उठाएंगे, विरोध के स्वर शायद ही शांत हों। यदि यह ऐसा कर पाते हैं तो यह रूस के राजनीतिक इतिहास का बड़ा बदलाव होगा। कमजोर राजनीतिक व्यवस्था के अलावा रूस में एक बहुत बड़ी समस्या भ्रष्टाचार बन गया है। खुद पुतिन स्वीकार करते हैं कि देश व्यवस्थागत भ्रष्टाचार से ग्रसित है। भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने रूस को भ्रष्टाचार के मामले में 178 देशों की सूची में 154वें स्थान पर रखा है जबकि भारत की रैंकिंग 87वीं है। यही नहीं, एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर के बैंकों में अभी जितना काला धन जमा है, उसमें सबसे ज्यादा पैसा भारतीयों का है तो दूसरे नम्बर पर रूसी हैं। रूस में भी भ्रष्टाचार आम जिन्दगी का हिस्सा बन चुका है। ट्रैफिक पुलिस और डाक्टरों से लेकर ऊंचे स्तर तक ज्यादातर कर्मचारियों में रिश्वतखोरी की परम्परा आम हो चली है। सेना तक में अब भ्रष्टाचार आ गया है। देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने की चुनौती राष्ट्रपति पुतिन के सामने मुंह फाड़ कर खड़ी है। विश्वव्यापी आर्थिक मंदी से भी रूस बच नहीं सका। बेरोजगारी और गरीबी की समस्या दिनोंदिन गम्भीर होती जा रही है पर अच्छा संकेत यह है कि रूस में सुधार हो रहा है। देश में विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ने लगा है और देश की मुद्रा रुबल धीरे-धीरे स्थिर होता जा रही है। आर्थिक संकट से लड़ने के लिए खर्च की गई 30 खरब रुबल की भारी-भरकम रकम असर दिखाने लगी है। देश ने अनाज निर्यात करने की क्षमता पुन हासिल कर ली है। फिर भी पुतिन को देश की अर्थव्यवस्था को पुराने मुकाम तक पहुंचाने के लिए बड़ी मशक्कत करनी होगी। राष्ट्रपति पुतिन को यह समझने की जरूरत है कि हर स्तर पर जवाबदेही और पारदर्शिता की संस्कृति लानी होगी। यदि पुतिन ऐसा करने में कामयाब हो जाते हैं तो उन्हें सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस को फिर से मजबूती से खड़ा करने वाले नेता के रूप में याद किया जाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि `स्ट्रांग मैन' कहे जाने वाले पुतिन रूस को उस ऊंचाई तक पहुंचाने में कामयाब होंगे जो एक समय सोवियत संघ तक पहुंच गई थी।
Anil Narendra, Daily Pratap, Russia, Valadimir Putin, Vir Arjun

Saturday, 12 May 2012

विरोध प्रदर्शनों के बीच पुतिन तीसरी बार राष्ट्रपति बने

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 12 May 2012
अनिल नरेन्द्र
रूस में बड़ा जनादेश हासिल करने वाले लोकप्रिय नेता ब्लादिमीर पुतिन ने सोमवार को तीसरी बार रूस के राष्ट्रपति का पद्भार सम्भाला। कभी रूस को समृद्धि की बुलंदियों पर ले जाने का सपना दिखाने वाले इस नेता ने इस बार लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती देने का ऐलान किया। यह तीसरा मौका है जब पुतिन ने रूस की सत्ता सम्भाली है। इससे पहले 2000 से 2008 तक वह राष्ट्रपति थे, इसके बाद के चार साल तक वह प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता का एक बड़ा केंद्र बने रहे। पुतिन ने कहा कि मैं शपथ लेता हूं कि रूस के राष्ट्रपति के तौर पर मैं अपने नागरिकों के अधिकारों और आजादी का सम्मान एवं सुरक्षा करूंगा। शपथ लेने के तत्काल बाद पुतिन ने प्रधानमंत्री के रूप में मेदवेदेव का नाम प्रस्तावित किया। यह दोनों नेताओं के बीच सत्ता की भागीदारी को लेकर हुए समझौते के तहत किया गया। माना जा रहा है कि रूसी संसद का निचला सदन ड्यूमा का एक विशेष सत्र बुलाकर प्रधानमंत्री के रूप में मेदवेदेव के नाम पर औपचारिक रूप से पुष्टि हो जाएगी पर पुतिन की शपथ ग्रहण समारोह विवादों से नहीं बच सका। शपथ ग्रहण समारोह के बीच मास्को में लोगों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। विपक्ष के नेता बोरिस नेमरसोव सहित 120 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। रविवार से अभी तक 400 लोगों से अधिक को गिरफ्तार किया जा चुका है। कुछ पश्चिमी देश भी पुतिन के आलोचक रहे हैं। सत्ता से चिपकने के पुतिन के प्रयासों की पश्चिमी देशों में आलोचना होती रही है पर पुतिन ने इनकी कभी परवाह नहीं की। शपथ लेने के बाद पुतिन ने दिए अपने संक्षिप्त भाषण में कहा कि रूस राष्ट्रीय विकास के एक नए दौर में पहुंच गया है। हमें अपने नए स्तर के लक्ष्यों को निर्धारित करना होगा। आने वाले वर्षों में रूस का भविष्य लम्बे समय के लिए निर्धारित होगा। उन्होंने कहा कि मेदवेदेव ने आधुनिकीकरण को नई गति ही है और रूस में बदलाव जारी रहेगा। लोकतंत्र को मजबूत बनाने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि रूस के लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों को मजबूत करना जरूरी है। मैं इसे अपनी जिन्दगी का लक्ष्य मानता हूं। अपने लोगों की सेवा करना हमारी प्रतिबद्धता है। राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद पुतिन ने अपने पहले बयान में अमेरिका से कहा कि अमेरिका इस बात की गारंटी दे कि उसका मिसाइल रोधी तंत्र रूस के खिलाफ नहीं है। शपथ ग्रहण के फौरन बाद रूस का परमाणु सूटकेस पुतिन के सुपुर्द कर दिया गया। सोमवार को मास्को में आने वाले दिनों के लिए इस बारे में पुतिन ने अपनी सरकार का नजरिया साफ कर दिया। नए आदेश के अनुसार रूस अमेरिका के साथ और गहरे संबंध चाहता है, लेकिन वो अपने अंदरूनी मामलों में किसी भी तरह की कोई दखलंदाजी कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। रूस अमेरिका के साथ संबंधों को सही तौर पर सामरिक स्तर पर ले जाना चाहता है लेकिन वो ऐसा एक बराबरी के रिश्ते के आधार पर करना चाहता है जहां दोनों देश एक के हितों का सम्मान करें। जहां रूसियों को पुतिन से बहुत उम्मीदें हैं वहीं उनके समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं। देश के अन्दर और बाहर दोनों स्तरों पर पुतिन को होशियारी से कदम रखने होंगे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि पुतिन ने रूस की गिरती छवि को कुछ हद तक सम्भाला है। सभी रूस को एक मजबूत, सशक्त देश देखना चाहते हैं। अमेरिका की बढ़ती दादागिरी को चैक में रखने के लिए भी एक मजबूत रूस की जरूरत है और पुतिन यह काम कर सकते हैं पर इसके लिए यह भी जरूरी है कि वह देश के अन्दर असंतोष को समाप्त करने का प्रयास करें। जनता की जायज मांगों पर ध्यान दें। रूस की जनता ने जो विश्वास पुतिन पर किया है उम्मीद है कि वह इस पर खरा उतरेंगे।
रूस में बड़ा जनादेश हासिल करने वाले लोकप्रिय नेता ब्लादिमीर पुतिन ने सोमवार को तीसरी बार रूस के राष्ट्रपति का पद्भार सम्भाला। कभी रूस को समृद्धि की बुलंदियों पर ले जाने का सपना दिखाने वाले इस नेता ने इस बार लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती देने का ऐलान किया। यह तीसरा मौका है जब पुतिन ने रूस की सत्ता सम्भाली है। इससे पहले 2000 से 2008 तक वह राष्ट्रपति थे, इसके बाद के चार साल तक वह प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता का एक बड़ा केंद्र बने रहे। पुतिन ने कहा कि मैं शपथ लेता हूं कि रूस के राष्ट्रपति के तौर पर मैं अपने नागरिकों के अधिकारों और आजादी का सम्मान एवं सुरक्षा करूंगा। शपथ लेने के तत्काल बाद पुतिन ने प्रधानमंत्री के रूप में मेदवेदेव का नाम प्रस्तावित किया। यह दोनों नेताओं के बीच सत्ता की भागीदारी को लेकर हुए समझौते के तहत किया गया। माना जा रहा है कि रूसी संसद का निचला सदन ड्यूमा का एक विशेष सत्र बुलाकर प्रधानमंत्री के रूप में मेदवेदेव के नाम पर औपचारिक रूप से पुष्टि हो जाएगी पर पुतिन की शपथ ग्रहण समारोह विवादों से नहीं बच सका। शपथ ग्रहण समारोह के बीच मास्को में लोगों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। विपक्ष के नेता बोरिस नेमरसोव सहित 120 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। रविवार से अभी तक 400 लोगों से अधिक को गिरफ्तार किया जा चुका है। कुछ पश्चिमी देश भी पुतिन के आलोचक रहे हैं। सत्ता से चिपकने के पुतिन के प्रयासों की पश्चिमी देशों में आलोचना होती रही है पर पुतिन ने इनकी कभी परवाह नहीं की। शपथ लेने के बाद पुतिन ने दिए अपने संक्षिप्त भाषण में कहा कि रूस राष्ट्रीय विकास के एक नए दौर में पहुंच गया है। हमें अपने नए स्तर के लक्ष्यों को निर्धारित करना होगा। आने वाले वर्षों में रूस का भविष्य लम्बे समय के लिए निर्धारित होगा। उन्होंने कहा कि मेदवेदेव ने आधुनिकीकरण को नई गति ही है और रूस में बदलाव जारी रहेगा। लोकतंत्र को मजबूत बनाने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि रूस के लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों को मजबूत करना जरूरी है। मैं इसे अपनी जिन्दगी का लक्ष्य मानता हूं। अपने लोगों की सेवा करना हमारी प्रतिबद्धता है। राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद पुतिन ने अपने पहले बयान में अमेरिका से कहा कि अमेरिका इस बात की गारंटी दे कि उसका मिसाइल रोधी तंत्र रूस के खिलाफ नहीं है। शपथ ग्रहण के फौरन बाद रूस का परमाणु सूटकेस पुतिन के सुपुर्द कर दिया गया। सोमवार को मास्को में आने वाले दिनों के लिए इस बारे में पुतिन ने अपनी सरकार का नजरिया साफ कर दिया। नए आदेश के अनुसार रूस अमेरिका के साथ और गहरे संबंध चाहता है, लेकिन वो अपने अंदरूनी मामलों में किसी भी तरह की कोई दखलंदाजी कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। रूस अमेरिका के साथ संबंधों को सही तौर पर सामरिक स्तर पर ले जाना चाहता है लेकिन वो ऐसा एक बराबरी के रिश्ते के आधार पर करना चाहता है जहां दोनों देश एक के हितों का सम्मान करें। जहां रूसियों को पुतिन से बहुत उम्मीदें हैं वहीं उनके समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं। देश के अन्दर और बाहर दोनों स्तरों पर पुतिन को होशियारी से कदम रखने होंगे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि पुतिन ने रूस की गिरती छवि को कुछ हद तक सम्भाला है। सभी रूस को एक मजबूत, सशक्त देश देखना चाहते हैं। अमेरिका की बढ़ती दादागिरी को चैक में रखने के लिए भी एक मजबूत रूस की जरूरत है और पुतिन यह काम कर सकते हैं पर इसके लिए यह भी जरूरी है कि वह देश के अन्दर असंतोष को समाप्त करने का प्रयास करें। जनता की जायज मांगों पर ध्यान दें। रूस की जनता ने जो विश्वास पुतिन पर किया है उम्मीद है कि वह इस पर खरा उतरेंगे।
Anil Narendra, Daily Pratap, Russia, Valadimir Putin, Vir Arjun

Tuesday, 6 March 2012

रूस में पुतिन का जीतना ही सबसे अच्छा विकल्प है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 6 March 2012
अनिल नरेन्द्र
रविवार को रूस में राष्ट्रपति पद के लिए मतदान हुआ है। इस चुनाव में वर्तमान राष्ट्रपति पुतिन के अलावा 4 अन्य प्रत्याशी मैदान में हैं। ब्लादिमीर पुतिन वर्ष 2000 में पहली बार राष्ट्रपति चुने गए थे। उन्होंने अपने दो कार्यकाल पूरे किए थे और फिर रूसी कानून के तहत उन्होंने राष्ट्रपति का पद छोड़ा था। इस बीच दमित्री मेदवेदेव ने राष्ट्रपति का पद सम्भाला था और पुतिन खुद प्रधानमंत्री बन गए थे। 59 वर्षीय पुतिन जो कभी रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी के जासूस थे, का राष्ट्रपति बनना तय है। माना जा रहा है कि पुतिन दो-तिहाई बहुमत से जीतेंगे पर इस बार का कार्यकाल पहले के कार्यकालों से ज्यादा चुनौतीपूर्ण होने की सम्भावना है। क्योंकि पिछले कुछ दिनों से रूस में असंतोष नजर आ रहा है। पुतिन के खिलाफ जगह-जगह प्रदर्शन हुए। हाल के दिनों में संसदीय चुनावों में गड़बड़ी के आरोपों और उनके शासन के खिलाफ व्यापक स्तर पर प्रदर्शन हुए हैं। पुलिस भी चुनावों के बाद किसी तरह की अशांति से निपटने के लिए तैयारी कर रही है। अमेरिका के घटते रुतबे एवं आर्थिक संकट से जूझते यूरोप के साथ अटलांटिक जगत अपनी चमक तेजी से खोता जा रहा है। दुनिया की धुरी एशिया-प्रशांत क्षेत्र की ओर खिसक रही है। इस दृष्टि से एक स्थिर रूस पूरे क्षेत्र को बल प्रदान कर सकता है। पुतिन ने रूस को मजबूत किया है और धीरे-धीरे लाइन से उतरती रूसी गाड़ी को कुछ हद तक वापस लाइन पर लाने में सफलता पाई है। भारत के लिए भी एक सशक्त रूस इसके हित में होगा। राष्ट्रपति पुतिन के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती आबादी में गिरावट है। विश्व बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि ने पुतिन का सिरदर्द बढ़ा दिया है पर उनकी सर्वाधिक चिन्ता जनसांख्यिकीय कम जन्मदर और कार्यशील पुरुष कर्मचारियों-मजदूरों की उच्च मृत्युदर से भूराजनीतिक शून्यता पैदा हो रही है। फिलहाल पुतिन ने खासकर पुरुषों में शराबखोरी की वज्रपाती दर रोकने के लिए एक नया अभियान चलाया है। उन्होंने उन महिलाओं को विशेष भत्ता देने की घोषणा की है, जिनके दो से अधिक बच्चे हैं। पुतिन के पैकेज में सभी रूसी नागरिकों को आवास और शिक्षा की बेहतर सुविधाएं प्रदान करना शामिल हैं। उन्होंने एक स्मार्ट आव्रजन नीति अपनाने की बात कही है, जिसके जरिये विदेश में रहने वाले रूसी मूल के लोगों को मातृभूमि पर लौटने के लिए लुभाया जाएगा। जनमत सर्वेक्षणों के ताजा नतीजों में प्रधानमंत्री ब्लादिमीर पुतिन के राष्ट्रपति पद के लिए हो रहे चुनाव में दो-तिहाई मतों से स्पष्ट जीत दर्ज कराने की बात कही गई है। रूस में चुनावी रुझान से जुड़े बेहद सटीक आंकड़े देने वाले लेवादा सेंटर ने बताया है कि पुतिन को इस चुनाव में 63 से 66 फीसदी वोट मिल सकते हैं। रूस और यूकेन की सुरक्षा एजेंसियों ने रूस में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से ठीक पहले ब्लादिमीर पुतिन की हत्या की साजिश को नाकाम कर दिया। समाचार डेली टेलीग्रॉफ के अनुसार षड्यंत्रकारी अपराधियों के गिरोह को यूकेन के शहर ओडेसा में हिरासत में लिया गया। गिरोह राष्ट्रपति चुनाव के ठीक बाद मास्को में पुतिन की हत्या का षड्यंत्र बना रहा था। बताया जाता है कि चेचन विद्रोहियों के कथित सरगना एडम ओस्माचेव ने स्वीकार किया है कि षड्यंत्र उमारोव के आदेश पर किया गया था, जो उत्तरी काकेइनस क्षेत्र में रूस के शासन के खिलाफ आंदोलनरत् इस्लामिक गतिविधियों का अमीर है। चैनल वन ने ओस्माचेव को हिरासत में यह कहते हुए दिखाया है, अंतिम लक्ष्य मास्को की यात्रा और पुतिन की हत्या था। पुतिन का प्रयास है कि वह रूस को उसके गौरवमय इतिहास को फिर से दोहराएं।
Anil Narendra, Daily Pratap, Russia, Valadimir Putin, Vir Arjun

Thursday, 15 December 2011

क्या रूस में हो रहे प्रदर्शनों के पीछे अमेरिकी हाथ है?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th December 2011
अनिल नरेन्द्र
रूस में मौजूदा प्रधानमंत्री ब्लादीमिर पुतिन के एकछत्रवादी शासन और हाल में ही ड्यूमा के लिए सम्पन्न हुए चुनावों में हुई कथित धांधलियों को लेकर जनता का क्रोध थमता नहीं दिख रहा है और विपक्षी दलों ने रविवार को भी विरोधी रैलियां निकाली। गौरतलब है कि रूस में चार दिसम्बर को आयोजित हुए ड्यूमा चुनावों में कुल मिलाकर सात दलों ने शिरकत की थी। चुनावी परिणामों की घोषणा होने के बाद पुतिन की अध्यक्षता वाली यूनाइटेड रशिया पार्टी को सबसे अधिक लगभग 50 फीसदी मत और ड्यूमा में 238 सीटें हासिल हुई हैं। इन चुनावों में रूसी कम्युनिस्ट पार्टी (केपीआरएफ) 20 फीसदी मत और 92 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी है। रूस के राष्ट्रपति दमित्री मेदवेदेव ने हाल के चुनाव में मतों की हेराफेरी के आरोपों पर हजारों लोगों के प्रदर्शन के बाद रविवार को मामले की जांच के आदेश दिए। मेदवेदेव ने फेसबुक पर लिखा, `मैं न तो इन रैलियों में लगाए जाने वाले नारों से सहमत हूं, न ही बयानों से।' हालांकि मैंने मतदान केंद्रों पर चुनावी कानून के पालन संबंधी सभी सूचनाओं की जांच के आदेश दिए हैं। गौरतलब है कि पिछले हफ्ते हुए संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री पुतिन के खिलाफ 50000 से भी अधिक नागरिक सड़कों पर उतर आए और उन्हें सत्ता से हटने और निष्पक्ष चुनाव कराने की मांग की। इस पर मेदवेदेव ने लिखा,`लोगों के पास अपने विचार अभिव्यक्त करने का अधिकार है, जो उन्होंने किया। यह अच्छा है कि सब कानून के दायरे में हुआ।'
सवाल यह है कि क्या जनता का गुस्सा जायज है और वाकई ही चुनावों में धांधली हुई है या फिर कोई सोची-समझी रणनीति के तहत पुतिन के खिलाफ बने वातावरण को हवा देने में लगा है। प्रधानमंत्री ब्लादीमिर पुतिन ने देश में हो रहे व्यापक प्रदर्शनों के लिए अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन को जिम्मेदार ठहराया है। पुतिन ने आरोप लगाया कि पश्चिमी राष्ट्र देश में चुनाव को प्रभावित करने के लिए करोड़ों डालर खर्च कर रहे हैं। पुतिन ने कहा कि यूरोपीय पर्यवेक्षकों आर्गेनाइजेशन फॉर सिक्यूरिटी एण्ड को-ऑपरेशन (ओएससीई) की रिपोर्ट देखने से पहले ही हिलेरी ने चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठा दिए हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिकी विदेश मंत्री ने विपक्षी कार्यकर्ताओं के सुर तय कर दिया है और उनकी पीठ पर अमेरिकी विदेश विभाग का हाथ है। उन्होंने कहा कि अमेरिका को रूस का परमाणु शक्ति सम्पन्न होना पच नहीं रहा है इसलिए वह घरेलू राजनीति में हस्तक्षेप कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी भरे स्वर में कहा, `हम अपनी घरेलू प्रक्रिया को प्रभावित करने नहीं दे सकते और अपनी सप्रभुता की रक्षा के लिए कृतसंकल्प हैं।' पुतिन के आरोपों में कितना दम है यह तो हम नहीं जानते पर हां अमेरिका का यह स्टाइल रहा है। गत महीनों में मध्य पूर्व में भी ऐसे ही प्रदर्शन हुए थे और कहा यही जाता है कि अमेरिका का इनके पीछे हाथ व समर्थन था। वहां का उद्देश्य और रूस का उद्देश्य समान है। सभी जगहों अमेरिका को शासक की स्वतंत्र नीति पसंद नहीं थी और वह मौजूदा शासन का तख्ता पलटना चाहते थे। रूस में भी पुतिन के कुछ मुद्दों पर लिए स्टैंड से अमेरिकी विदेश विभाग खुश नहीं है। वैसे रूस में सरकार समर्थित एक वेबसाइट ने अमेरिकी सरकार और स्वतंत्र निर्वाचन पर्यवेक्षक `गोलोस' के बीच ई. मेल के आदान-प्रदान का विवरण प्रकाशित किया है। `लाइफ न्यूज' की वेबसाइट पर गोलोस को मिलने वाली अमेरिकी मदद का उल्लेख किया गया है। प्रधानमंत्री पुतिन ने गुरुवार को अमेरिकी विदेश विभाग पर रूस में विरोध प्रदर्शनों को हवा देने के आरोप के बाद यह खुलासा हुआ है। वेबसाइट ने लिखा, `पहले सिर्प यह कहा जाता था कि गोलोस को मदद मिलती है और अब हमारे पास सबूत हैं।' उधर एक विशेषज्ञ मैक्सिम गोनचारोव ने कहा कि माइक्रो-ब्लागिंग वेबसाइट ट्विटर पर हमला रूसी प्रशासन की मिलीभगत से हुआ है। आखिर क्या वजह है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद कमजोर रूस को एक सशक्त रूस बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पुतिन के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए हैं? सोवियत संघ के जमाने में जब रेडियो या टेलीविजन स्वान लेक (एक तरह का संगीत) के अलावा कुछ और नहीं चलाता था तो इसका मतलब यह समझा जाता था कि देश में कोई राजनीतिक संकट आने वाला है। इसकी तुलना आज के इस हालत से की जा सकती है कि यदि रूस में जब भी कोई इंटरनेट खोलता है तो वेब-ब्राउसर डियानल ऑफ सर्विस बतलाता है। यानि कहा जा सकता है कि एक बार फिर रूस में राजनीतिक संकट के संकेत मिल रहे हैं। हाल के प्रदर्शनों में 1000 से अधिक लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। मास्को समेत देश के 30 शहरों में विशाल प्रदर्शन पुतिन और मेदवेदेव के लिए चिन्ता का विषय होना चाहिए। पिछले 12 वर्षों में रूस में जब भी प्रदर्शन हुए उनमें लोग शामिल नहीं हुआ करते थे। लोग राजनीति को कम अहमियत देते थे। उनका एक मात्र मकसद अपनी जिन्दगी में स्थिरता लाना होता था। रूसी जनता सोवियत संघ के विघटन से पहले क्षेत्र को नियंत्रित करने वाली सरकार और नब्बे के दशक की कड़वी यादों को भुला देना चाहती है पर कटु सत्य तो यह है कि जब इस बार चुनाव हुए तो लोगों को लगा कि शासक वर्ग उनकी स्थिति का फायदा उठा रहा है। चुनावों में वाकई धांधली हुई है या यह अमेरिका का पुतिन के खिलाफ एक हथियार है, कहना मुश्किल है पर इतना तय है कि रूस में एक बार फिर अस्थिरता का दौर आरम्भ हो चुका है और हम उम्मीद करते हैं कि ब्लादीमिर पुतिन और मेदवेदेव इसको नियंत्रण में ला सकेंगे।
America, Anil Narendra, Daily Pratap, Russia, Valadimir Putin, Vir Arjun

Friday, 9 December 2011

रूस में ब्लादीमिर पुतिन का गिरता लोकप्रियता ग्रॉफ


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th December 2011
अनिल नरेन्द्र
मिखाइल गोर्बाच्योव की उदारवादी नीतियों व आर्थिक उदारीकरण के कारण और वर्षों से दबी राजनीतिक विरोध की चिंगारी की वजह से महान सोवियत संघ का विघटन हो गया और महान सोवियत एम्पायर 15 स्वतंत्र उपराज्यों में विखंडित हो गई। इन परिस्थितियों में 31 दिसम्बर 1999 को अचानक राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया जिससे ब्लादीमिर पुतिन देश के कार्यवाहक राष्ट्रपति बन गए। फरवरी 2000 में लम्बी लड़ाई के बाद रूसी सेनाओं ने चेचन विद्रोहियों को परास्त करते हुए राजधानी ग्रोज्नी पर अधिकार कर लिया। पुतिन के इस कदम से उनकी लोकप्रियता में भारी इजाफा हुआ। 26 मार्च 2000 को पुतिन ने राष्ट्रपति चुनाव जीत लिया। इसके पश्चात उन्होंने सत्ता का केंद्रीकरण शुरू किया और प्रांतीय गवर्नरों और व्यावसायिक घरानों की बढ़ती ताकत पर अंकुश लगाया। यद्यपि आर्थिक दृष्टिकोण से रूस ने पुतिन के काल में कोई विशेष तरक्की तो नहीं की परन्तु ब्लादीमिर पुतिन ने सोवियत विखंडन के बाद रूस को पहली बार राजनीतिक स्थिरता का माहौल जरूर प्रदान किया। इसी वजह से पुतिन मार्च 2004 में फिर रूस के राष्ट्रपति बने। गत सप्ताह रूस में संसदीय चुनाव हुए। इसमें प्रधानमंत्री ब्लादीमिर पुतिन की यूनाइटेड रशिया पार्टी को तगड़ा आघात लगा है। संसद के निचले सदन ड्यूमा में नवीनतम आंकड़ों के अनुसार उसे पूरे 50 प्रतिशत वोट भी नहीं मिले हैं। अलबत्ता 450 सदस्यीय सदन में उसे 238 सीटों का साधारण बहुमत तो जरूर प्राप्त हो गया है मगर पहले की तरह उतना बहुमत नहीं जिसके बल पर वे अपनी इच्छा से कोई संविधान में संशोधन कर सकें। चार साल पहले के 64 प्रतिशत वोट और 315 सीटों से अगर तुलना करें तो साफ है कि पुतिन और उनकी पार्टी की लोकप्रियता काफी घटी है। दूसरी ओर कम्युनिस्ट पार्टी का वोट प्रतिशत 11 से बढ़कर 20 के लगभग पहुंच गया है। उस पर भी तुर्रा यह कि विरोधी पार्टियों और यूरोपीय चुनाव पर्यवेक्षकों ने चुनाव में हेराफेरी का आरोप लगाया है। ड्यूमा चुनावों में धांधलियों का आरोप लगाते हुए सोमवार को रूस की राजधानी मास्को में व्यापक स्तर पर धरने-प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारी देश में पिछले 12 वर्षों से चले आ रहे पुतिन एकछत्रवादी शासन का विरोध कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों ने पुतिन बगैर रूस और क्रांति की मांग सरीखे नारों से मास्को की पुरानी प्राचीरों को झकझोर कर रख दिया। ड्यूमा चुनावों में रूस की दूसरी सबसे बड़ी और मुख्य विपक्षी पार्टी बनकर उभरी रूसी कम्युनिस्ट पार्टी (केपीआर) के महासचिव गेन्नादी किगानोव ने सोमवार को संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि उनकी पार्टी चुनाव में बड़े पैमाने पर हुई धांधलियों को लेकर चिंतित है और सभी आंकड़ों की जांच कर रही है। बदकिस्मती से अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने भी चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठा दिए हैं, जिसे रूस के सबसे ताकतवर नेता ब्लादीमिर पुतिन शायद ही बर्दाश्त करें। इन चुनाव नतीजों का असर अगले साल मार्च में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों पर पड़ सकता है जिसमें पुतिन खड़ा होना चाहते हैं। पुतिन दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति नहीं रह सकते थे, अत उन्होंने 2008 में दमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति बनवा दिया और खुद उनके प्रधानमंत्री बन गए। तब भी दुनिया जानती थी कि असली ताकत तो पुतिन के पास ही है। पिछले कुछ समय से पुतिन अमेरिका की लाइन पर नहीं चल रहे। हो सकता है कि इसी वजह से अमेरिका उन्हें पसंद नहीं कर रहा। हालांकि पुतिन का वह करिश्मा तो नहीं रहा जो पहले था पर आज भी वह अकेले नेता नजर आते हैं जो रूस की प्रतिष्ठा को आगे बढ़ा सकते हैं। रूस को अमेरिका को जवाब देने के लिए पुतिन जैसा नेता ही चाहिए। देखना यह है कि इस संसदीय चुनाव के नतीजों से लेकर अगले राष्ट्रपति चुनाव तक ब्लादीमिर पुतिन कैसे अपनी गिरती लोकप्रियता को सम्भालते हैं और पुन राष्ट्रपति बनते हैं? रूस के हित में तो है कि रूस एक मजबूत देश बनकर फिर से दुनिया में अपनी जगह बनाए पर भारत व गैर पश्चिमांचली देशों के लिए भी एक मजबूत रूस फायदेमंद होगा और ऐसा करने के लिए फिलहाल पुतिन से बेहतर कोई और रूसी नेता नहीं दिख रहा। पुतिन को अपनी गलतियों पर आत्मचिन्तन करना चाहिए और उन्हें सुधारने का प्रयास करना होगा।
Anil Narendra, Daily Pratap, Russia, Valadimir Putin, Vir Arjun,