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Thursday, 19 December 2013

उलेमाओं का आतंक व दहशतगदी के खिलाफ स्वागतयोग्य फतवा

हम जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द द्वारा बुलाए गए तीन दिवसीय विश्व शांति सम्मेलन की सराहना करते हैं। रामलीला मैदान में आयोजित समापन समारोह में सबसे ज्यादा पतिनिधि पाकिस्तान से आए थे। दूसरे नंबर पर बांग्लादेश, इंग्लैंड, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव,म्यांमार के पतिनिधि मौजूद थे। शुरुआत के दो दिन तक यह सम्मेलन दारुल उलूम देवबंद में हुआ और रविवार को समापन दिल्ली के रामलीला मैदान में हुआ। समापन के दिन कई सर्वसम्मति से पस्ताव पारित हुए। मगर सबसे खास था। आतंकवाद की जमकर निंदा करना और उसके खिलाफ एक सुर में फतवा जारी करना। यह पहला मौका है जब भारत और उसके आस पड़ोस के देशें के इस्लामिक विद्वान आतंक और दहशतगदी के खिलाफ एक मंच पर जमा होकर एक राय पर आ टिके हैं। सम्मेलन की अध्यक्षता बांग्लादेश के मोहम्मद सैयद उस्मान मंसूर पुरी ने की और संचालन उलेमा हिंद के पूर्व सांसद मौलाना महमूद असद मदनी ने किया। फतवा जारी करते हुए कहा गया कि आतंकवाद और दहशतगदी से न केवल बर्बादी हो रही है बल्कि यह पूरी तरह से इस्लाम के खिलाफ है। पाकिस्तान जमीयत उलेमा इस्लाम के पभारी मो. फजलुर रहमान ने कहा कि हमें जंग से परहेज करना चाहिए और दोनों देशों के राजनेताओं को चाहिए कि वे बातचीत के जरिए कश्मीर के मसले का हल करें ताकि अमन कायम हो सके। श्रीलंका के  मुफ्ति रियाजी साहब ने कहा कि आतंक की वजह से तरक्की रुक रही है। कई वक्ताओं ने कहा कि इस समय यह दुनिया एक तरह से ग्लोबल विलेज बन चुका है जिसमें छोटी-छोटी बातों से दुश्मनी बढ़ती है और यदि उसमें बातचीत की गुंजाइश हो तो दुश्मनी को समाप्त भी किया जा सकता है। इसी तरह नेपाल से मो. खालिद सिद्दीकी, मालदीव से शेख फहमी व म्यांमार से मो. नूर मोहम्मद ने भी आतंकवाद के कारणों का पता लगाने की आवश्यकता पर बल दिया। सम्मेलन में मुजफ्फरनगर के दंगों पर पाकिस्तान सहित लगभग सभी देशों से आए उलेमाओं ने न केवल अफसोस जाहिर किया बल्कि दंगों के लिए उत्तरपदेश सरकार की जमकर खिंचाई की। एक वर्ष पहले दारुल उलूम देवबंद ने दहशतगदी के खिलाफ पस्ताव पारित किया था जिसमें करीब आठ सौ उलेमाओं ने हिस्सा लिया था लेकिन पस्ताव को सख्ती से लागू करने के लिए ही इस सम्मेलन को बुलाया गया था। हम दारुल उलूम देवबंद का इस सफल आयोजन और उसमें पारित पस्ताव का स्वागत करते हैं।

-अनिल नरेन्द्र

कभी न खत्म होने वाले अरविंद केजरीवाल के ड्रामे

दिल्लीवासी इन दिनों चौतरफा समस्याओं से घिरे हुए हैं। सोमवार से ऐसा कोहरा दिल्ली में सुबह के समय छाया रहता है कि घरों से निकलना दुश्वार हो गया है। विमान उड़ाने रद्द हो रही हैं, ट्रेने कैंसिल हो रही हैं या घंटें लेट चल रही हैं, महंगाई पिछले 14 माह के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है और रही सही कसर केजरीवाल एंड कंपनी ने अपने ड्रामों से निकाल दी है। कांग्रेस के बिना शर्त समर्थन के बाद भी आप पार्टी ड्रामा करने पर तुली हुई है, दिल्ली में सरकार नहीं बन पा रही है। सरकार बनने में आ रही मुश्किलों के बावजूद केंद्र सरकार दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगाने की जल्दबाजी में नहीं है। राष्ट्रपति शासन लगाने समेत विभिन्न मुद्दों पर, विकल्पों पर फिलहाल गृह मंत्रालय में विचार-विमर्श किया जा रहा है। रिर्पोर्टें में कहा गया है कि आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने सरकार बनाने से अभी तक इंकार नहीं किया है बल्कि सलाह मशविरा करने के लिए और समय की मांग की है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि दिल्ली में जल्द राष्ट्रपति ने शासन लगाने की कोई संवैधानिक मजबूरी नहीं है। 10 दिसम्बर को राष्ट्रपति ने जीते हुए विधायकों की सूची को अधिसूचित कर दिया है। इससे विधानसभा अस्तित्व में आ गई है। उनके अनुसार दिल्ली में बदलती राजनीती परिस्थितियों पर नजर रखी जा रही है और उपराज्यपाल ने किसी पाटी की सरकार नहीं बनने की स्थिति में विधानसभा को निलंबित रखते हुए राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की है। उपराज्यपाल ने शनिवार को ही   दिल्ली की राजनीतिक स्थिति के बारे में केन्द्र सरकार को अवगत करा दिया था। दिल्ली में सरकार गठन को लेकर गेंद एक पाले से दूसरे में घूम रही है। कांग्रेस ने आम आदमी पाटी के संयोजक अरविंद केजरीवाल की गेंद को एक बार फिर उन्हीं के कोर्ट में डाल दिया है अब देखना यह है कि आप क्या करेगी ? कांग्रेस महासचिव और दिल्ली के पभारी शकील अहमद  ने केजरीवाल को एक पत्र लिखकर बेहद सादगी और विनम्रतापूर्व तरीके से केजरीवाल को उनकी मांगें मान लेने का संदेश भेजा है। अपने पत्र में शकील अहमद ने पत्र के उन 18 मुद्दों का उल्लेख किया है जिनका आप पाटी ने जिक किया था। शकील ने कहा कि एक बार सरकार गठित हो जाने के बाद 18 में से 16 मुद्दों का कियान्वयन दिल्ली  सरकार स्वयं कर सकती है। यानी अगर केजरीवाल सरकार बनाते हैं तो यह सरकार खुद इन 16 मुद्दों का कियान्वयन करने में सक्षम है। इसमें संसद और केन्द्र सरकार के हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं है। बाकी बचे दो सवाल जिनमें जनलोकपाल विधेयक और दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देना शामिल है। यह मामले दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। केन्द्र सरकार के दायरे वाले इन दोनों मुद्दों पर भी कांग्रेस पाटी आप का साथ देगी। जब कांग्रेस ने इतना खुला समर्थन कर दिया है तो पता नहीं और क्या चाहते हैं अरविंद केजरीवाल फिर भी सरकार बनाने में आनाकानी कर रहे हैं। कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने सोमवार को भाजपा व आप पर सीधी टिप्पणी करते हुए कहा कि चुनावों में उन्हेंने वोट पाने के लिए ऐसे वायदे किए हैं जो वह पूरा नहीं कर सकती हैं। इस वजह से यह सरकार बनाने के लिए आगे नहीं आ रही हैं। शीला जी ने कहा कि अब दोबारा से चुनाव होते हैं तो कांग्रेस फिर से सत्ता में आएगी। चुनाव के बाद से ही दिल्ली में अस्थिरता का खतरा मंडरा रहा है। इस दौरान अरविंद केजरीवाल और उनकी आप पाटी के ड्रामे चालू हैं। पिछले दस दिनों से आप यह तय नहीं कर पा रही है कि वह सरकार बनाएगी या नहीं? दिल्ली के तेजी से बदलते राजनीतिक परिदृश्य में कहीं न कहीं आप पाटी फंसती नजर आ रही है। अब चारों तरफ से यह सवाल उठने लगे हैं कि आप को सरकार बनाने के बाद कम से कम बिजली की दर फीसदी घटाने और हर परिवार को पतिदिन 700 लीटर पानी मुफ्त देने जैसे चुनावी वायदों पर काम करना शुरू करना चाहिए। अब आपने फैसला किया है कि वह एक बार फिर जनता दरबार में जाएगी। आप नेता आम जनता से पूछेंगेः क्या हम सरकार बनाएं या नहीं? क्या कांग्रेस पाटी से समर्थन ले लें?  सरकार बन गई और कांग्रेस पाटी को आप का एजेंडा पसंद नहीं आया तो? अगर कांग्रेस पाटी एक-दो माह में समर्थन वापस ले ले तो? जिन मुद्दों पर कांग्रेस ने साथ देने की बात कही है उस पर भरोसा करें या नहीं? कहीं यह समर्थन आगामी लोकसभा चुनाव में आत्मघाती तो सिद्ध नहीं होगा?  भ्रष्टाचार की फाइलें जब पलटेंगी तो कई नेता जेल भी जाएंगे, ऐसे में कांग्रेस उनका साथ छोड़ देगी तो?  एक बार फिर वहीं पहुंच गए हैं जहां से यह सियासत दंगल आरम्भ हुआ थाः जनता में। देखें, अब आगे कौन-सा ड्रामा करते हैं केजरीवाल।



Wednesday, 18 December 2013

समलैंगिकता अपराध या अधिकार?

समलैंगिक संबंधों को वैध ठहराने वाले दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने पलट कर इस मसले पर व्यापक बहस और खेमाबंदी आरम्भ हो गई है। जहां एक तरफ प्रगतिशील कहे जाने वाले तबके ने इसे प्रतिगामी कदम करार दिया है वहीं धार्मिक संगठनों व बाल अधिकार के लिए कार्यरत संस्थाओं ने इस फैसले का स्वागत किया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा है कि जब तक आईपीसी की धारा 377 वजूद में है, समलैंगिक यौन संबंधों को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती, यदि संसद चाहे तो इस पर चर्चा करके उचित निर्णय ले सकती है। देश की सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली हाई कोर्ट के वर्ष 2009 के फैसले को पलट कर 1861 के इस कानून को न केवल वैध करार दिया है बल्कि भारतीय संस्कृति और धार्मिक भावनाओं का भी हवाला दिया है। असल में समलैंगिक संबंधों को वैध करार देने वाले दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर अनेक धार्मिक-सांस्कृतिक संगठनों ने ही चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए योग गुरु बाबा रामदेव ने कहा कि मैं इस फैसले का स्वागत करता हूं, समलैंगिकता मानव अधिकार का हनन है और यह एक मानसिक विकृति है जिसका इलाज है। बाबा रामदेव ने समलैंगिकता को जैनेटिक कहे जाने के तर्प को गलत बताया। उन्होंने कहा कि यदि हमारे माता-पिता समलैंगिक होते तो हमारा जन्म ही न होता। यह अप्राकृतिक है और एक बुरी आदत है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सहारनपुर जिले के दारुल उलूम देवबंद सहित अन्य उलेमाओं ने भी स्वागत किया है। उलेमाओं ने इसे ऐतिहासिक फैसला बताते हुए कहा कि समलैंगिकता को दुनिया का कोई भी मजहब अनुमति नहीं देता। विश्व प्रसिद्ध इस्लामी अदारा दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मानवता और सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुरूप है जिसे सख्ती से अमल में लाया जाना चाहिए, मजहब-ए-इस्लाम में समलैंगिकता अपराध की बहुत बड़ी सजा है। दूसरी ओर समलैंगिकताओं की लड़ाई लड़ने वाली ऋतु सेन ने कोर्ट के निर्णय पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि फैसले से हमारा अधिकार ही खत्म हो गया है जबकि संविधान हम सभी को अपने तरीके से जीने का अधिकार देता है। किन्नर संगठन `अस्तित्व' की प्रमुख लक्ष्मी पांडे ने कहा कि आज हमें भारतीय होने पर दुख हो रहा है क्योंकि हमें वह अधिकार नहीं है जो साधारण भारतीय नागरिक को प्राप्त हैं। फैसले से किन्नरों और समलैंगिकों पर अत्याचार बढ़ेगा। किन्नर ट्रस्ट से जुड़ी समलैंगिक रुद्राणी ने कहा कि 2009 के कोर्ट के फैसले के बाद लोगों की हमारे बारे में धारणा बदली थी। पुलिस भी कम परेशान करती थी लेकिन अब पुलिस हमें ज्यादा परेशान  करेगी। अगर आंकड़ों की हम बात करें तो भारत में लगभग 25 लाख समलैंगिक हैं जिनमें से 1.75 लाख समलैंगिक एचआईवी संक्रमित हैं। कुछ देशों में 01-14 साल तक की जेल का प्रावधान है, कुछ देशों में तो समलैंगिक संबंध बनाने पर मौत की सजा तक दी जाती है। लगभग 77 देशों में अपराध घोषित है समलैंगिकता। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आने के बाद जिस तरह से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इसे लोगों की स्वतंत्रता से जुड़ा मामला बताया है उसके बाद इस मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी और सरकार की कवायद तेज हो गई है कि समलैंगिकों को राहत पहुंचाने के लिए शायद सरकार एक अध्यादेश लाने की तैयारी कर रही है। गौरतलब है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि उनकी निजी राय में हाई कोर्ट का निर्णय उचित था। इसके बाद कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने राहत का संकेत दिया और मंत्रालय सूत्रों का कहना है कि सरकार जल्द ही राहत के लिए अध्यादेश ला सकती है। उधर भाजपा ने अपना रुख स्पष्ट करने से बचते और गेंद सरकार के पाले में डालते हुए कहा कि अगर सरकार इस बारे में प्रस्ताव लाना चाहती है तो वह इस विषय पर सर्वदलीय बैठक बुलाए। सुषमा स्वराज ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि संसद इस विषय को तय कर सकती है। समलैंगिकता की वकालत करने वाले कहते हैं कि दो बालिग यदि एकांत में संबंध बनाते हैं तो मौजूदा प्रगतिशील दौर में इसमें कानूनी हस्तक्षेप अनुचित है। वैसे भी हमारे संविधान की मूल भावना यह है कि आपकी आजादी की सीमा वहां तक है जहां से दूसरों की आजादी शुरू होती है। इस आधार पर भी कुछ लोग कोर्ट के फैसले की तीखी आलोचना कर रहे हैं तो उनकी अभिव्यक्ति का भी सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि न तो भारतीय समाज और न ही हमारे धर्म ऐसे रिश्तों को अवैध मानते हैं। फर्ज कीजिए कि अगर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यदि ठीक विपरीत होता तब भी उसकी उतनी ही तीखी आलोचना होती। अब उचित यही होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने धारा-377 को हटाने या उसमें जरूरी फेरबदल करने का जिम्मा संसद पर छोड़ा है तो उसे अपनी भूमिका निभानी चाहिए। साथ ही यह भी विचार करना चाहिए कि आखिर क्या वजह है कि जिन मुद्दों पर संसद में गहन विचार-विमर्श होना चाहिए वे अदालती कार्यवाही का मुद्दा बने ही क्यों?

-अनिल नरेन्द्र

आप पार्टी ने कहा, अन्ना कौरवों के साथ हैं ः लोकपाल विधेयक पर मतभेद

लोकपाल के लिए एक साथ आंदोलन करने वाले अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के बीच इसी विधेयक को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं या यूं कहें कि इसको लेकर दोनों में ठन गई है। इस विधेयक के राज्यसभा में सर्वसम्मति से पास होने से पहले ही आम आदमी पार्टी और अन्ना हजारे के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। आप ने तो लोकपाल मुद्दे पर खुद को पांडव और अन्ना को एक तरह से सिंहासन से जोड़कर कौरवों का साथ देने वाला बता दिया। अन्ना केंद्र सरकार द्वारा लाए गए लोकपाल बिल का जहां समर्थन कर रहे हैं वहीं केजरीवाल इसे अब भी जोकपाल बिल बता रहे हैं। आप पार्टी के बड़बोले नेता कुमार विश्वास ने अन्ना के रुख पर फेसबुक पर लिखाöमहासमर में कभी-कभी ऐसा समय आता है, जब पितामह भीष्म के मौन और गुरु द्रोण के सिंहासन से सहमत हो जाने पर भी कंटकपूर्ण पथ पर चलकर पांच पांडवों को युद्ध जारी रखना पड़ता है। आप पार्टी युद्ध जारी रखेगी। इस बीच अरविंद केजरीवाल ने फिर मौजूदा लोकपाल को जोकपाल बताते हुए कहा कि इस बिल से मंत्री तो छोड़िए, चूहा तक जेल नहीं जा सकेगा। इस बिल से भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा बल्कि यह भ्रष्टाचारियों को बचाने का काम करेगा। दूसरी ओर अन्ना हजारे ने कहा कि लगता है कि अरविंद केजरीवाल ने इस विधेयक को अब तक ठीक से पढ़ा नहीं है। उन्हें इसे ठीक से पढ़ना चाहिए। अगर आम आदमी पार्टी को सरकारी लोकपाल पसंद नहीं आ रहा है तो वह आगे इसकी कमियां दूर करने के लिए आंदोलन करें। उधर अन्ना हजारे का अनशन आज भी जारी है। इस दौरान उनका वजन चार किलो घटा है। ब्लड प्रैशर लगातार बढ़ रहा है। समर्थन में जनसैलाब भी उमड़ रहा है। दिल्ली समेत कई राज्यों से दो से तीन हजार लोग रालेगण सिद्धि पहुंच रहे हैं। रविवार को मुंबई के डिब्बे वालों ने भी अनशन में भाग लिया। दोनों के बीच असहमति के आठ प्रमुख बिंदु हैं। नियुक्तिöप्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष का नेता, स्पीकर, चीफ जस्टिस और एक न्यायविद की समिति चुनाव करेगी। इसमें नेताओं का बहुमत है जबकि लोकपाल को इनके खिलाफ ही जांच करनी है। बर्खास्तगीöइसके लिए सरकार या 100 सांसद सुप्रीम कोर्ट में शिकायत कर सकेंगे। इससे लोकपाल को बर्खास्त करने का अधिकार सरकार, नेताओं के पास ही रहेगा। जांचöलोकपाल सीबीआई सहित किसी भी जांच एजेंसी से जांच करा सकेगा। लेकिन उसके हाथ में प्रशासनिक नियंत्रण नहीं रहेगा यानि जांच अधिकारियों का ट्रांसफर, पोस्टिंग सरकार के हाथ में ही होगी। व्हिसल ब्लोअर प्रोटेक्शनöसरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले को संरक्षण के लिए अलग बिल बनाया है। उसे इसी बिल का हिस्सा होना चाहिए। सिटीजन चार्टरöसरकार ने आवश्यक सेवाओं को समय में  पूरा करने के लिए अलग से बिल बनाया है जबकि इस बिल का हिस्सा बनाना चाहिए था ताकि जन लोकपाल अफसरों के खिलाफ कार्रवाई कर सके। राज्यों में लोकायुक्तöलोक आयुक्तों की नियुक्ति का मामला राज्यों के विवेक पर छोड़ा गया है। अगस्त 2011 में संसद ने सर्वसम्मति से यह आश्वासन दिया था। फर्जी शिकायतेंöझूठी या फर्जी शिकायतें करने वाले को एक साल की जेल हो सकती है। इसके डर से लोकपाल में सही शिकायतें नहीं होंगी। जन लोकपाल में जुर्माने की व्यवस्था है जेल की नहीं। अंतिम है दायरे को लेकर। न्यायपालिका के साथ ही सांसदों के संसद में भाषण व वोट के मामलों को अलग रखा है वहीं जन लोकपाल बिल में जजों, सांसदों सहित सभी लोक सेवकों को रखा था।

Tuesday, 17 December 2013

आतंकियों पर केस वापस नहीं ले सकती अखिलेश सरकार

यह दुख की बात है कि उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार को अदालत की फटकारों से कोई फर्प नहीं पड़ता और उसे इनकी कोई परवाह भी नहीं। अकसर अखिलेश सरकार को फटकारें लगती ही रहती हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने जहां आतंकी घटनाओं में आरोपियों पर चल रहे मुकदमे वापस लेने पर फटकार लगाई वहीं सुप्रीम कोर्ट ने मुजफ्फरनगर और शामली के दंगों के बाद रिलीफ कैम्प में रहने वाले 39 बच्चों की मौत के मामले में चिन्ता जताते हुए यूपी सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा कि वह कैम्प में रहने वालों के लिए जाड़े के मद्देनजर तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराए। चीफ जस्टिस पी. सदाशिवम और जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच ने मामले को बेहद गम्भीर बताते हुए कहा कि बच्चों की मौत के संबंध में मीडिया रिपोर्ट की सच्चाई का पता लगाए। दूसरा करारा झटका है इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा 19 लोगों के खिलाफ आतंकवाद के मामले हटा लेने के उसके फैसले को रद्द करना। हाई कोर्ट का कहना है कि इन लोगों के खिलाफ केंद्रीय धाराओं के तहत मामले दर्ज हुए हैं, इसलिए बिना केंद्र सरकार की इजाजत के राज्य सरकार मामले वापस नहीं ले सकती। जस्टिस देवी प्रसाद सिंह, जस्टिस अजय लाम्बा और जस्टिस अशोक पाल सिंह की बेंच ने यह व्यवस्था देते हुए साफ किया कि आतंकवादी वारदात अथवा देशद्रोह के आरोपियों के मुकदमे वापस लेने के लिए असाधारण कारण होने चाहिए। यदि सरकार बिना कोई कारण बताए मुकदमे वापस लेने का आदेश देती है तो लोक अभियोजक को अपनी स्वतंत्र राय रखनी चाहिए। 96 पेज का यह फैसला वृहद पीठ ने मामले से जुड़े सभी पक्षों को विस्तार से सुनने के बाद सुनाया। इससे पहले मामले की सुनवाई कर रही एक खंडपीठ ने चार कानूनी सवाल तय करते हुए जवाब के लिए मामले को वृहद पीठ को भेजा था। राज्य सरकार के लिए यह एक राजनीतिक झटका तो है ही क्योंकि वह मुजफ्फरनगर दंगों के बाद समाजवादी पार्टी अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतने की पुरजोर कोशिश कर रही है। इस फैसले से अल्पसंख्यक तो खुश नहीं होंगे, साथ ही सरकार विरोधी ताकतों को प्रचार का मौका जरूर मिल जाएगा कि राज्य सरकार अल्पसंख्यकों की तुष्टिकरण कर रही है। राज्य सरकार ने यह वादा किया था कि वह निर्दोष मुस्लिम नवयुवकों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लेगी और इसी क्रम में उसने सन 2007 में लखनऊ, वाराणसी और फैजाबाद में हुए दंगों के सिलसिले में गिरफ्तार इन 19 लोगों के खिलाफ मामले वापस लेने की घोषणा की थी। आतंकवाद हमारे देश के लिए सबसे  बड़े खतरों में से एक है, लेकिन इस समूचे कांड में घटनाक्रम यह बताता है कि हमारा राजनीतिक नेतृत्व वोट बैंक पालिटिक्स के चलते इन ज्वलंत मुद्दे से निपटने के लिए कितना गम्भीर है। यह सही है कि किसी निर्दोष नवयुवक को केवल फाइल को खानापूर्ति करने के लिए जबरदस्ती किसी भी मामले में विशेषकर आतंकी व देशद्रोह के मामले में कतई नहीं फंसाया जाना चाहिए पर आरोपी निर्दोष है या कसूरवार यह तय करना अदालतों का कार्य है न कि राज्य सरकारों का राजनीतिक नेतृत्व। अखिलेश सरकार की अपनी निष्पक्ष छवि के लिए जरूरी है कि वह ऐसे मामलों को अदालतों पर छोड़ दे। बार-बार की फटकार से तो उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी एक्सपोज अलग हो रही है और थू-थू अलग करवा रही है।

-अनिल नरेन्द्र

आखिर कब मिलेगा निर्भया को इंसाफ?

16 दिसम्बर 2012 की उस सर्द रात को सड़क किनारे बगैर कपड़ों के पड़े पैरामेडिकल की छात्रा व उसके दोस्त, वह सीन आंखों के सामने अभी भी ताजा हैं, शायद ही कभी भूल पाएं। ऐसा लगता है कि कल ही की तो बात है। निर्भया कांड को एक साल हो गया पर इस साल में क्या बदला? बेशक कई क्षेत्रों में जैसे बेहतर पोलीसिंग, पुलिस सुरक्षा के लिए उठाए गए कदम कानून इत्यादि में जरूर परिवर्तन हुआ है पर दरिंदगी में कमी नहीं आई। देश को हिला देने वाली वसंत विहार गैंगरेप की घटना और उसके बाद उठाए गए कदमों के बावजूद दिल्ली वाले नहीं सुधरे हैं। दिल्ली वालों ने दुष्कर्म के मामलों में तो रिकार्ड ही तोड़ दिया है। यह जानकर हैरानी होगी कि निर्भया मामले के बाद दिल्ली में दुष्कर्म के मामले में लगभग दोगुनी जबकि छेड़छाड़ के मामलों में तिगुनी बढ़ोत्तरी हुई है। रोजाना तीन से चार दुष्कर्म तथा पांच से सात छेड़छाड़ के मामले दर्ज किए जा रहे हैं। दूसरी तरफ खास यह भी है कि पहले जहां महिलाएं व युवतियां अपने साथ हुई ज्यादती की शिकायत करने से कतराती थीं, बचती थीं वहीं अब वह खुलकर अपनी समस्याओं के बारे में बता रही हैं। यह निर्भया मामले का ही असर है कि राजधानी के प्रत्येक थाने में महिला डेस्क ने काम शुरू कर दिया है जबकि पब, सिनेमा हॉल, मॉल्स तथा बस स्टाप से निकले प्रेमी युगल की डिमांड के अनुसार अब पीसीआर उनके घर तक छोड़ती है। वो जीना चाहती थी। अस्पताल में इलाज के दौरान बिताए गए 13 दिन में उसने इसका प्रमाण भी दिया, लेकिन दर्दनाक हादसे ने उसे इतने दर्द दिए कि उसे बचाना मुश्किल हो गया। सिंगापुर जाने से पहले उसने केवल तीन बार अपनी बात लिखकर समझाने की कोशिश की और तीनों बार उसने यही प्रश्न किया, मेरे दोषियों को सजा मिली या नहीं? दुख से कहना पड़ता है कि दोषियों को एक साल बीतने के बाद भी केस अदालतों में ही फंसा हुआ है। हाई कोर्ट ने भले ही सुनवाई हर रोज करने का फैला किया, लेकिन बचाव पक्ष के रवैये के चलते सुनवाई लंबी ही खिंचती जा रही है। बचाव पक्ष के वकील कभी दस्तावेजों के हिन्दी अनुवाद को लेकर जिरह टाल रहे हैं तो कभी कोई दूसरा बहाना बनाकर अदालत से गायब हो जाते हैं। 23 सितम्बर से हाई कोर्ट की सुनवाई शुरू हुई लेकिन जिरह एक नवम्बर से ही शुरू हो पाई। अभियोजन पक्ष ने मात्र 8 दिनों में जिरह पूरी कर ली, लेकिन बचाव पक्ष 33 दिनों में जिरह शुरू नहीं कर पाया है। हाई कोर्ट के जल्द सुनवाई के फैसले से  लग रहा था कि नवम्बर तक मामले का निपटारा हो जाएगा, मगर बचाव पक्ष ने ऐसा कानूनी दांव मारा कि अब तक जिरह शुरू भी नहीं हो पाई। अभी सुप्रीम कोर्ट बाकी है। पता नहीं कि दोषियों को कब सजा मिलेगी? निर्भया का बलिदान बेकार नहीं जाएगा। व्यवस्था में सुधार हो रहा है पर अभी भी काफी कमियां हैं। इन पर सभी को ध्यान देना होगा। दिल्ली रेप कैपिटल ऑफ इंडिया बनती जा रही है। अकेले पुलिस नहीं दोषी, समाज भी उतना ही दोषी है। जरूरत लोगों की मानसिकता बदलने की है, महिलाओं को इज्जत की नजरों से देखने की है। कुछ का मानना है कि एक  बार निर्भया कांड के दोषियों को फांसी पर लटका दिया जाए तो शायद स्थिति में सुधार हो पर सवाल यह है कि कब लटकेंगे ये फांसी पर? कब मिलेगा निर्भया को इंसाफ?

Sunday, 15 December 2013

तीसरी बार डॉ. हर्षवर्धन के हाथ से सीएम कुर्सी फिसली

अपनी-अपनी राय हो सकती है। मेरी राय में बीजेपी ने दिल्ली में जनादेश को एक तरह ठुकरा दिया। बीजेपी के सीएम कैंडिडेट डॉ. हर्षवर्धन ने उपराज्यपाल को सूचित कर दिया है कि उनकी पार्टी के पास चूंकि बहुमत नहीं है, इसलिए सरकार बनाने में असमर्थ हैं। दिल्लीवासियों से डॉ. हर्षवर्धन ने सरकार नहीं बना पाने के लिए क्षमा याचना में कहा कि राष्ट्रपति ने उपराज्यपाल को स्पष्ट निर्देश दे रखे हैं कि सरकार बनाने का दावा पेश करने वाली पार्टी को सात दिन के भीतर सदन में बहुमत साबित करना होगा। चूंकि भाजपा के पास बहुमत नहीं है तो वह भला कैसे सरकार बना सकती है। राजनीति में शुचिता, पारदर्शिता और स्वच्छता की दुहाई देते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा का किसी अन्य दल में तोड़फोड़ करने का कोई इरादा नहीं है और न ही ऐसी सरकार में विश्वास है। बीजेपी ने हाई मॉडल ग्राउंड, ऊंचे राजनीतिक मापदंड तो स्थापित कर दिए पर आई हुई सत्ता को ठुकरा दिया। दिल्ली में 15 साल विपक्ष में बैठने की शायद बीजेपी को आदत सी बन गई है। यही तो फर्प है कांग्रेस और बीजेपी में। कांग्रेस सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं होती चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े और बीजेपी सत्ता लेने को तैयार नहीं। यह ठीक है कि डॉ. हर्षवर्धन के पास बहुमत नहीं है पर अगर वह एक अल्पमत सरकार बना लेते और शपथ लेते ही इतिहास में अपना नाम लिखवा लेते, सभी विधायक बन जाते। शपथ लेने के बाद वह उपराज्यपाल को पत्र लिखते कि हम चाहते हैं कि शक्ति परीक्षण के बाद अगर हमें बहुमत मिलता है तो यह दो-तीन कदम फौरी उठाए जातेःö बिजली की दरों में 30 फीसदी कटौती, पानी के बिलों में राहत, 9 गैस सिलेंडरों की जगह 12 सिलेंडर इत्यादि-इत्यादि। बहुमत सिद्ध करने की जब बारी आती तो संभव था कुछ भी हो सकता था। न तो कांग्रेस और न ही आप के विधायक और न ही दिल्ली की जनता छह महीने में दोबारा चुनाव चाहती है। संभव है कि मतदान के दिन कांग्रेसी विधायक सदन से किसी न किसी बहाने वाकआउट कर जाते, कुछ भी हो सकता था। मान लो बहुमत न भी सिद्ध होता तो त्यागपत्र दे देते और जनता से कह सकते थे कि हम तो जनहित में बहुत से कदम उठाना चाहते थे पर कांग्रेस और आप ने हमें ऐसा करने से रोका (दोबारा) चुनाव में पार्टी की स्थिति और मजबूत होती। बीजेपी को सरकार बनानी चाहिए थी इस मत के बहुत से बीजेपी विधायक भी हैं। दिल्ली अध्यक्ष विजय गोयल तो खुलकर बोल रहे हैं कि बीजेपी को राजधानी में सरकार बनाने के प्रयास जारी रखना चाहिए। उनका कहना है कि पार्टी के चुने गए अधिकतर प्रतिनिधि चुनाव नहीं चाहते। इसके अलावा जनता भी दोबारा चुनाव के मूड में नहीं है। डॉ. हर्षवर्धन के इंकार के बावजूद विजय गोयल का कहना है कि पार्टी को दिल्ली में सरकार बनाने के लिए प्रयास जारी रखने चाहिए और इसके लिए आम आदमी पार्टी से बातचीत करनी चाहिए। उनका यह भी कहना है कि इस चुनाव में जीते हुए अधिकतर पार्टी उम्मीदवार उनसे आकर गुजारिश कर रहे हैं कि दिल्ली में दोबारा चुनाव न होने देने के लिए कवायद की जानी चाहिए और बीजेपी को सरकार बनानी चाहिए। बहुमत न मिलने के बावजूद खबरों के अनुसार भाजपा विधायकों का भी दबाव था कि भाजपा सरकार बनाए, लेकिन पार्टी आलाकमान के आगे उनकी एक न चली। ऐसे विधायकों की संख्या एक दर्जन से अधिक बताई जा रही है। बुधवार देर रात उपराज्यपाल नजीब जंग के आमंत्रण के बाद बृहस्पतिवार को भाजपा के विधायक पार्टी नेताओं से सम्पर्प साधते रहे। हालांकि विधायक दल के नेता डॉ. हर्षवर्धन सुबह ही छत्तीसगढ़ के लिए रवाना हो गए थे, लेकिन विधायकों ने अपने प्रदेश स्तरीय नेताओं से इच्छा जाहिर की। प्रदेश पदाधिकारियों ने प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल से कहा कि सरकार बनाकर भाजपा को उम्मीद पैदा करनी चाहिए कि वह अल्पमत की सरकार में बेहतर प्रशासन दे सकती है। जब बहुमत साबित करने की बात आएगी तो डॉ. हर्षवर्धन सदन में यह साबित करें कि वह बेहतर सरकार देना चाहते हैं। दिल्लीवासियों को महंगाई से फौरी राहत देना चाहते हैं लेकिन दूसरे दलों के विधायकों ने साथ नहीं दिया, इसलिए वह इस्तीफा देने पर मजबूर हैं। यह तीसरा मौका है जब डॉ. हर्षवर्धन के हाथ से दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी फिसली है। इससे पहले भी दो बार उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी थी लेकिन आखिरी वक्त में पासा पलट गया। पहली बार डॉ. हर्षवर्धन का मुख्यमंत्री बनने का मौका तब आया था जब वर्ष 1993 से 1998 तक चली भाजपा सरकार के दौरान हालत बिगड़ने लगे थे। साहिब सिंह वर्मा को कुर्सी गंवानी पड़ी थी। उस समय तय हो गया था कि पार्टी हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री बनाएगी लेकिन आखिरी वक्त में प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा को भाजपा के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। उस समय भी पार्टी की जीत के पूरे आसार थे लेकिन नतीजा उल्टा हुआ। दूसरा मौका 2008 में आया तब भी डॉ. साहब के हाथ से कुर्सी खिसक गई। राजनीति का अंतिम पड़ाव सत्ता होता है इसीलिए तो आप सियासत में आते हो। भले ही आप की सरकार गिर जाती पर आप को कोशिश तो करनी चाहिए थी। कटु सत्य तो यह भी है कि कांग्रेस पार्टी छह महीने के अन्दर दिल्ली में फिर से विधानसभा चुनाव कतई नहीं चाहेगी। चुनाव में करारी हार के दंश से कांग्रेस अभी उभर भी नहीं पाई है और दोबारा चुनाव की आशंका ने पार्टी के लिए नेतृत्व का संकट खड़ा कर दिया है। कांग्रेस किसी भी कीमत पर सरकार बनाने के लिए आम आदमी पार्टी को बिना शर्त समर्थन देने की भी पहल कर रही है। दरअसल कार्यवाहक मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सहित पार्टी के तमाम दिग्गज नेताओं के चुनाव हारने के कारण कांग्रेस प्रदेश इकाई में नेतृत्व का संकट पैदा हो गया है। सूत्रों की मानें तो शीला जी के नेतृत्व में पार्टी दोबारा चुनाव मैदान में नहीं उतरना चाहती है। साथ ही चार राज्यों में प्रदेश अध्यक्षों को बदलने के पार्टी हाई कमान के फैसले को अमल में लाने के लिए भी दिल्ली राह का रोड़ा बन रही है। कांग्रेस आलाकमान मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष जेपी अग्रवाल की जगह ऐसे नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहती है जिसके नेतृत्व में चुनाव लड़ा जा सके। मौजूदा हालत में अगर दिल्ली में निकट भविष्य में विधानसभा चुनाव होते हैं तो कांग्रेस को इतनी भी सीटें न मिले। रही बात भाजपा की तो इस बात की क्या गारंटी है कि दोबारा चुनाव में उसे स्पष्ट बहुमत मिले? अगर छह महीने बाद भी त्रिशंकु विधानसभा आई तो...? दिल्ली की गद्दी तक नरेन्द्र मोदी को पहुंचाने की खातिर भाजपा नेतृत्व ने डॉ. हर्षवर्धन और पार्टी की दिल्ली इकाई को दांव पर लगा दिया है। हो सकता है, वह सही साबित हो और मैं गलत। राजनीति में कुछ भी हो सकता है। इस अनिश्चितता के चलते दिल्ली की जनता महंगाई की मार से पिस रही है। महंगाई और बढ़ गई है।

-अनिल नरेन्द्र