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Tuesday, 24 December 2013

निजी स्कूलों में नर्सरी दाखिले पर टकराव

नर्सरी दाखिले के लिए शिक्षा निदेशालय से जारी दिशानिर्देश के बाद 15 जनवरी से राजधानी के निजी स्कूलों में नर्सरी दाखिला प्रक्रिया शुरू होने जा रही है। लेकिन स्कूल से छह किलोमीटर तक के दायरे में आने वालों को सर्वाधिक 70 प्वाइंट देने के प्रावधान से स्कूल प्रबंधक जिस तरह नाराज है, इससे अभिभावकों की परेशानी बढ़ सकती है। दिल्ली के निजी स्कूलों में दाखिले, फीस बढ़ोत्तरी आदि से संबंधित गड़बड़ियों और मनमानी की शिकायतें पुरानी हैं। इन्हें दूर करने की कवायद कई बार हो चुकी है मगर कोई स्थायी हल नहीं निकल पाया है। हर बार स्कूलों के मालिक-प्रबंधक कोई न कोई पेच ढूंढ कर नियमों की अनदेखी का रास्ता निकाल लेते हैं। ऐसे में नर्सरी कक्षाओं में दाखिले से संबंधित नए नियमों पर स्कूलों की नाराजगी कोई हैरानी की बात नहीं है। पहले भी सरकार ने प्रवेश के लिए कुछ बिन्दुओं को निर्धारित किया गया था जिनमें स्कूल से प्रवेशार्थी के घर की दूरी, अगर संबंधित स्कूल में बच्चे का कोई भाई या बहन पढ़ रहा है, अगर बच्चे के माता-पिता में से कोई उस स्कूल का विद्यार्थी रह चुका हो, आदि पहलु शामिल हैं। पहले स्कूल से प्रवेशार्थी बच्चे के घर की दूरी अधिकतम 14 किलोमीटर रखी गई थी, नए नियम में उसे घटाकर छह किलोमीटर कर दिया गया है। दूरी के आधार पर बच्चे के दाखिले के लिए 70 अंक दिए जाएंगे। उसी तरह अगर उसके परिवार से कोई बच्चा पहले से उस विद्यालय में पढ़ रहा है तो उसे 20 अंक मिलेंगे। फिर लड़कियों के लिए पांच फीसद, मगर माता-पिता में से कोई उस विद्यालय का विद्यार्थी रह चुका है तो उसके लिए पांच फीसद और स्कूल कर्मचारियों के लिए पांच फीसद सीटें आरक्षित रखनी होंगी। प्रबंधन के कोटे से दाखिले का प्रावधान समाप्त कर दिया गया है। इस पर निजी स्कूल प्रबंधकों के संघ ने उपराज्यपाल से बातचीत के लिए समय मांगा पर उन्होंने मिलने से इंकार कर दिया। निजी स्कूलों के प्रबंधकों का कहना है कि अगर उपराज्यपाल नजीब जंग की तरफ से कोई जवाब नहीं मिलेगा तो एसोसिएशन अदालत जाकर शिक्षा निदेशालय द्वारा नर्सरी दाखिले के लिए जारी दिशानिर्देश पर रोक लगाने की अपील करेगी। वहां भी बात नहीं बनी तो तमाम स्कूल प्रबंधक इन शर्तों पर दाखिले से इंकार के बारे में भी विचार कर रहे हैं। हालांकि नर्सरी दाखिला प्रक्रिया की उल्टी गिनती के साथ ही जो अभिभावक यह सोच रहे हैं कि उनके बच्चे का दाखिला नर्सरी में कैसे होगा? दाखिले के लिए किसी की सिफारिश लगाएं। उनके लिए बेहतर सुझाव यह है कि वह यह सारी चिन्ता छोड़कर घर के नजदीक वाले स्कूलों को अपनी पसंद सूची में वरीयता दें। इन स्कूलों में बच्चे को किस  प्रकार की सुविधाएं मिल रही हैं, इस बारे में जानकारी एकत्र करें और जैसे ही 15 जनवरी को दाखिला फॉर्म निकले तो नजदीकी स्कूल में जाकर दाखिला फॉर्म भर दें। फीस बढ़ोत्तरी को लेकर भी जब-तब अभिभावकों और स्कूलों के बीच तकरार शुरू हो जाती है। उच्च न्यायालय के निर्देश के बावजूद इस मामले में स्कूलों की मनमानी थमी नहीं। अगर स्कूल सचमुच दाखिले और फीस आदि के निर्धारण में तर्पसंगत और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाते तो सरकार या फिर अदालतों को हर बार यूं हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं पड़ती।

-अनिल नरेन्द्र

क्या नरेन्द्र मोदी का पिछड़े वर्ग का लाभ भाजपा यूपी में उठा पाएगी?

श्री नरेन्द्र मोदी की मिशन लोकसभा 2014 का रास्ता उत्तर प्रदेश से जाता है। 80 लोकसभा सीटों वाला यह सूबा भारतीय जनता पार्टी के गेम प्लान में बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। तभी तो नरेन्द्र मोदी ने अपने सबसे विश्वासपात्र, रणनीतिकार अमित शाह को लखनऊ में बिठा रखा है। भाजपा उत्तर प्रदेश में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के जरिये प्रदेश की 80 सीटों को साधने का प्रयास कर रही है। नरेन्द्र मोदी का चेहरा और नेतृत्व पार्टी को अपने सामाजिक समीकरणों के हिसाब से उत्तर प्रदेश में भा रहा है। पार्टी इस प्रयास में भी है कि नरेन्द्र मोदी का पिछड़ी जाति से होने का लाभ मिल सके। भाजपा उत्तर प्रदेश में मोदी कार्ड खेलकर सियासी स्तर पर एक तीर से कई निशाने साधने में जुटी हुई है। भाजपा रणनीतिकारों को लगता है कि मोदी की विकास पुरुष के साथ-साथ पिछड़े वर्ग के नेता की छवि न केवल भाजपा के लिए फायदेमंद साबित होगी बल्कि पार्टी के जातिगत समीकरणों को भी ताकत देगी। 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में भाजपा 40-50 के बीच लोकसभा सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है। नरेन्द्र मोदी की सभाएं यूपी में हिट हो रही हैं। शुक्रवार को काशी में राजातलाब स्थित खुजरी में आयोजित विजय शंखनाद रैली में उमड़ी भीड़ से गद्गद् मोदी ने कहा कि चुनाव से पहले इस तरह का माहौल कभी नहीं देखा। उन्होंने कहा कि यूपी केवल राजनीति का मैदान नहीं है। यूपी भारत का भाग्य विधाता बन सकता है। यहां के रामराज्य बनाने के काम आपके पूर्वजों ने किया था। रामराज्य के लिए जिस तरह के जन सामान्य की जरूरत चाहिए वह आपके पास है। मोदी ने बनारस की दुखती रग पर हाथ रखते हुए यहां की तुलना सूरत से की। उन्होंने कहा कि बनारस की तरह सूरत में भी वर्षों से साड़ियां मुख्य धंधा है। यहां के कारीगर और व्यापारी तबाह हो रहे हैं जबकि सूरत में साड़ी ने शहर की शक्ल ही बदल दी है। नेक इरादा हो तो बनारस साड़ी उद्योग को भी उसी तरह अपग्रेड किया जा सकता है। काशी में रैली को सम्बोधित करने से पहले बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने पहुंचे मोदी ने षोडशोपचार विधि से पूजा-अर्चना की। पूजा के दौरान जब ब्राह्मणों ने मोदी को संकल्प दिलाना शुरू किया तो हाथ में रुपए लेने को कहा। हाथ में शहद लगे होने के कारण और स्वेटर पहने होने के कारण मोदी ने जेब में हाथ नहीं डाला। बगल में खड़े राजनाथ सिंह ने 100 रुपए का नोट निकालकर मोदी को दिया। भाजपा द्वारा नरेन्द्र मोदी को बतौर कद्दावर पिछड़ी जाति के नेता प्रोजैक्ट करने से समाजवादी पार्टी भी अन्दरखाते चिंतित जरूर है। भाजपा को एक दौर में पिछड़ों का बड़ा समर्थन मिल चुका है। कल्याण सिंह और विनय कटियार जो कभी हिन्दुत्व के प्रतीक थे, बाद में पिछड़े तबके के नेता के रूप में आगे आए। बाद में वे न हिन्दुत्व के काम के रहे और न पिछड़ों में दबदबा कायम रख सके। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बाबू सिंह कुशवाहा, उसी रणनीति को लेकर उमा भारती तक को चुनाव लड़ा दिया गया। लेकिन मामला कुछ बना नहीं। अब मोदी की नई पहचान पिछड़े नेता के रूप में बताई जा रही है। नरेन्द्र मोदी पिछड़े तबके के नेता हैं, यह संदेश गांव-गांव तक जा रहा है। राजनाथ सिंह, नरेन्द्र मोदी की जोड़ी ने उत्तर प्रदेश में कैडर को लोकसभा चुनाव के लिए मैदान में खड़ा कर दिया है। ठीक उसी तरह जैसे 90 के दशक में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के कारण भाजपा को ऊंची जातियों के साथ पिछड़े वर्ग का लाभ मिला था।

Sunday, 22 December 2013

लिव इन रिलेशन यानि सहजीवन की बढ़ती प्रवृत्ति से कई समस्याएं हो रही हैं

दिल्ली में लिव इन रिलेशंस बढ़ते जा रहे हैं। लिव इन रिलेशन के मायने सहजीवन वाले पार्टनर। शादी की रस्म के बिना लड़का-लड़की एक साथ पति-पत्नी की तरह रहते हैं। इससे सामाजिक समस्या तो हो ही रही है पर साथ-साथ कानूनी समस्या भी बढ़ रही है। राजधानी दिल्ली में लिव इन में रहने वालों के खिलाफ दुष्कर्म के मामलों में तीन गुणा की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। आंकड़ों की मानें तो हर महीने ऐसे 23 मामले दर्ज होते हैं। इस साल अक्तूबर माह तक ऐसे कुल 228 मामले दर्ज किए गए जो दुष्कर्म की कुल दर्ज घटनाओं का 16 फीसदी बैठता है। यह खुलासा दिल्ली पुलिस की एक आंतरिक रिपोर्ट में हुआ है। यह रिपोर्ट दिल्ली पुलिस ने दुष्कर्म के मामलों में आरोपियों की अलग-अलग श्रेणियों की पहचान करने के लिए विभिन्न थानों में दर्ज मामलों के आधार पर तैयार कराई है। रिपोर्ट के मुताबिक बीते साल जहां लिव इन में रहने वालों के खिलाफ दुष्कर्म करने के 80 मामले दर्ज कराए गए थे वहीं इस साल अक्तूबर तक यह आंकड़ा बढ़कर 228 की संख्या तक पहुंच गया है। हाल ही में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश योगेश खन्ना की अदालत में एक केस आया। सहजीवन में रहने वाली अपनी पार्टनर को शादी का झांसा देकर उससे कई बार बलात्कार करने के आरोप में एमबीए के एक छात्र को अदालत ने सात वर्ष कैद की सजा सुनाई। न्यायाधीश योगेश खन्ना ने एलएलबी की एक छात्रा से बलात्कार का दोषी पाया 31 वर्षीय हरी मोहन शर्मा को जेल की सजा सुनाई। अदालत ने कहा कि तथ्यों एवं परिस्थितियों को देखते हुए, एक अपराध की प्रवृत्ति पर गौर करते हुए मैं हरी मोहन शर्मा को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) के तहत सात वर्ष सश्रम कारावास का दंड देता हूं। उत्तर प्रदेश निवासी शर्मा को पार्टनर की शिकायत पर गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया गया था। शिकायत में पीड़िता ने आरोप लगाया कि दिसम्बर 2010 से जनवरी 2011 के बीच शादी का झांसा देकर उन्होंने कई बार बलात्कार किया। पुलिस ने कहा कि लड़की ने अगस्त 2011 में तब शिकायत दर्ज कराई जब वह गर्भवती हो गई और शर्मा ने उससे शादी करने से इंकार करते हुए कहा कि उसके अभिभावक इस प्रेम-संबंध के खिलाफ हैं। सुनवाई के दौरान शर्मा ने बलात्कार के आरोपों से इंकार करते हुए कहा कि उन्हें गलत तरीके से फंसाया गया है। शर्मा ने कहा कि लड़की स्वेच्छा से लिव इन में रह रही थीबलात्कार का सवाल कहां? पर अदालत ने शर्मा की दलीलों व याचिका को खारिज करते हुए कहा कि सहजीवन संबंध केवल साथ-साथ रहना नहीं होता है बल्कि इससे प्रेमियों के बीच भविष्य की प्रतिबद्धता भी जुड़ी है। यह लिव इन रिलेशन वर्तमान पीढ़ी की सोच है जबकि भारत पीढ़ीगत अन्तर के लिए मशहूर रहा है। पुरानी पीढ़ी अपने जीवनकाल को श्रेष्ठ मानती है जबकि यह स्पष्ट है कि नौजवानों की सोच में फर्प आया है मूल्यों का रूपांतरण हुआ है, ज्यादा खुलापन, परम्पराओं को न मानना, अपने हिसाब और विचार से अपना जीवन व्यतीत करना आज के युवाओं की सोच है। समाज के लिए इस अन्तर को समझना जरूरी है और समयानुसार सुधार भी करने होंगे। फिर गनीमत यह है कि यह समस्या केवल बड़े शहरों तक सीमित है। यूपी, हरियाणा इत्यादि के ग्रामीण क्षेत्रों में तो आज भी इस प्रकार के संबंधों को कोई समझ नहीं सकता और न ही बर्दाश्त कर सकता है।

-अनिल नरेन्द्र

लवली ने ताज तो पहन लिया पर यह ताज कांटों भरा है

दिल्ली में विधानसभा चुनाव में करारी हार के लिए बलि का बकरा बनाया गया प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जय प्रकाश अग्रवाल को। उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। अब यह कांटों भरा दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का ताज 46 वर्षीय अरविन्दर सिंह लवली के सिर पर डाला गया है। लवली न केवल सबसे कम उम्र के प्रदेशाध्यक्ष ही बने हैं बल्कि वह पहले सिख नेता हैं जिन्हें इस महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी दी गई है। गौरतलब है कि कांग्रेस में महत्वपूर्ण पदों पर युवा चेहरों को लाना राहुल गांधी की प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। कांग्रेस हाई कमान ने अपने युवा विधायक लवली को सूबे की पार्टी कमान थमाकर साफ संकेत दे दिए हैं कि भले ही विधानसभा चुनाव में उसकी करारी पराजय हुई हो, लेकिन प्रतिद्वंद्वी दलों से टकराने का दम-खम उसमें अब भी बाकी है। लवली अपनी तेज-तर्रार छवि के लिए जाने जाते हैं। दिल्ली विधानसभा से लेकर सरकार तक में उनकी धमक महसूस की जाती रही है। यह दीगर बात है कि दिल्ली में 43 सीटों से घटकर महज आठ सीटों में सिमट गई कांग्रेस पार्टी को फिर से सत्ता के करीब पहुंचा पाना लवली के लिए आसान काम नहीं है। दिल्ली के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। इस समय यह कहना गलत नहीं होगा कि पार्टी पिछले 20 साल के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। भाजपा और आम आदमी पार्टी के बाद कांग्रेस विधानसभा में तीसरे नम्बर पर है और उसे विपक्ष की भूमिका भी नहीं मिली है। अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भी कांग्रेस की स्थिति डांवाडोल है। इन परिस्थितियों में यह पद अरविन्दर सिंह लवली के लिए कांटों भरा ताज है। कांग्रेस आलाकमान ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर पूर्वी दिल्ली के युवा विधायक अरविन्दर सिंह लवली को चुना है तो इसकी वजह है। दरअसल भाजपा ने पूर्वी दिल्ली की ही एक सीट कृष्णानगर से पार्टी के विधायक डॉ. हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किया है। कांग्रेस के नवनियुक्त प्रदेशाध्यक्ष लवली हर्षवर्धन को चुनौती देने की क्षमता भी रखते हैं। दूसरा कारण यह है कि लवली पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के करीबी होने के साथ ही अजय माकन के भी खास मित्र हैं। 2013 की इस कांग्रेस विरोधी लहर में भी लवली का अपनी सीट पर जीतना यह दर्शाता है कि उनकी अपने क्षेत्र में पकड़ मजबूत है। सिख होने के नाते उन्हें दिल्ली का प्रभावशाली सिख समुदाय का भी समर्थन मिल सकता है। पार्टी के सामने अंदरुनी गुटबाजी सबसे बड़ी चुनौती है। एक-दूसरे की टांग खींचना, नीचा दिखाने की प्रवृत्ति को बदलना होगा। पार्टी के सामने अब न केवल भाजपा बल्कि आम आदमी पार्टी से भी मुकाबले की चुनौती है। ऐसे में पार्टी को प्रदेशाध्यक्ष के तौर पर ऐसे नेता की जरूरत थी जो विरोधियों से खुलकर दो-दो हाथ कर सके। माना जा रहा है कि अरविन्दर सिंह लवली इस काम में माहिर हैं। लवली की छवि यूं तो बेदाग रही है लेकिन शराब व्यापारी पोंटी चड्ढा हत्याकांड के बाद उन्हें इस मामले में घसीटने की कोशिश जरूर की गई। हालांकि खुद लवली का कहना है कि यदि हत्या का आरोपी ही किसी व्यक्ति को ऐसे मामले में घसीटने की कोशिश करे तो उसकी विश्वसनीयता खुद व खुद संदिग्ध हो जाती है। हम अरविन्दर सिंह लवली को बधाई देना चाहते हैं साथ-साथ यह भी कहना चाहते हैं कि ताज तो उन्होंने पहन लिया पर सावधान रहें, क्योंकि यह ताज कांटों भरा है।

Saturday, 21 December 2013

केजरीवाल का नया ड्रामा ः सरकार बनानी है या नहीं फैसला रायशुमारी से?

आप पार्टी द्वारा सरकार बनाने या न बनाने का ड्रामा बदस्तूर जारी है। बिग बॉस के रिएलिटी शो की तरह अब केजरीवाल भी अपने समर्थकों से पूछ रहे हैं कि वह सरकार बनाएं या न बनाएं? आप पार्टी थिंक टैंक के प्रमुख सदस्य योगेन्द्र यादव ने कहा कि मैं इस बात से सहमत हूं कि हमारे पास नैतिक जनादेश है। हालांकि हमारे पास सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या बल नहीं है इसीलिए हम जनता से पूछ रहे हैं कि हम क्या करें? एक अन्य नेता मनीष सिसोदिया कहते हैं कि हमारा प्रायोजन सरकार बनाने का नहीं है कि हम चार लोग एक कमरे में फैसला ले लें। हमारे लिए जनता का फैसला ही सार्वमान्य है। सही मायनों में यही लोकतांत्रिक ढंग से ठीक भी है। अगर बहुमत में जनता हमें आदेश देगी तो हम सरकार बनाएंगे। सिर्प एक बार जनता को चुनाव का मौका देकर विजयी नेताओं के फैसले उन पर थोपे जाने ठीक नहीं हैं। इधर बुधवार को आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से दिल्ली में साझा सरकार के गठन के खिलाफ हैं, लेकिन पार्टी के भीतर इस मामले पर मतभेद के बाद हमने दिल्ली की जनता से रायशुमारी कराने का फैसला किया है। केजरीवाल ने कहा कि वह जनता के फैसले का सम्मान करेंगे। चाहे वह पार्टी के लिए हो या उसके खिलाफ। उन्होंने बताया कि इस मामले में पार्टी में मतभेद हैं और विधायकों की बैठक के दौरान एक वर्ग का ख्याल था कि आप को सरकार बनाने से बचना नहीं चाहिए क्योंकि कांग्रेस उसे बिना शर्त समर्थन दे रही है। कुछ विधायकों के अनुसार पार्टी अपना एजेंडा लागू कर पाएगी क्योंकि कांग्रेस की तरफ से कोई दखलअंदाजी नहीं होगी। केजरीवाल ने कहा कि मैं व्यक्तिगत रूप से सरकार बनाने के खिलाफ था क्योंकि हमने बार-बार कहा है कि हम कांग्रेस अथवा भाजपा को न तो समर्थन देंगे और न ही उनसे समर्थन लेंगे लेकिन बाद में लोगों के एक वर्ग ने यह कहना शुरू कर दिया कि हमें सरकार बनानी चाहिए, जबकि दूसरा वर्ग इसका विरोध कर रहा था, इसलिए हमने इस बारे में फैसला जनता पर छोड़ा है। चाहे वह एसएमएस हो, चाहे सोशल साइट्स केजरीवाल को जबरदस्त रिस्पांस मिल रहा है। 24 घंटे के अन्दर चार लाख मैसेज आ गए। 23 घंटों में 2362 कमेंट, 177 शेयर, 2616 लाइक्स। खुद अरविन्द केजरीवाल पर 15604 कमेंट, 1709 शेयर, 14531 लाइक्स। ट्विटर पर भी जबरदस्त रिस्पांस आया है। कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैंöसचिन कुमार ः अरे भाई सरकार बनाओ, काम करके दिखाओ और फिर भी कांग्रेस समर्थन वापस लेती है तो जनता उसका जवाब देगी। टेंशन क्यों लेते हो। अरविन्द तिवारी ः भाई साहब बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही में वरदहस्त लोग हैं वो नहीं चाहते कि कोई और हमारे बीच खड़ा हो। यह सब केजरीवाल को फंसाने में लगे हैं। ओम भौंसले ः मैं आपके साथ हूं। लायन अनिल मेहता ने लिखा कि नम्बरदार पहले खुद को बदलो फिर सिस्टम बदलना। मनीष चौधरी ः सरकार नहीं तो पार्टी भी गई। विकास महाजन ः जी बिल्कुल जाइए सरकार बनाइए वरना दूसरा मौका शायद ही सामने आए। रिकी शर्मा ः आपको सरकार बनाकर एक उदाहरण पेश करना चाहिए। कुछ लोगों ने इस रायशुमारी या जनमत संग्रह के तरीके पर सवाल उठाया है। यह मतदान कितना निष्पक्ष होगा? इसके लिए चलाए जा रहे मोबाइल और इंटरनेट पोल पर सवाल उठ रहे हैं कि इससे यह कैसे सुनिश्चित होगा कि वह व्यक्ति दिल्ली का मतदाता है या नहीं। हालांकि आप पार्टी का कहना है कि इसका इंतजाम उसने पहले ही कर लिया है। पार्टी के दिल्ली प्रदेश सचिव दिलीप पांडे कहते हैं कि बुधवार शाम तक इस पर कुल 4.10 लाख लोगों की प्रतिक्रिया मिल गई थी। पार्टी ने अब तक इस बात का खुलासा नहीं किया कि इसमें से कितने पक्ष में थे और कितने विपक्ष में। कहा तो यह भी जा रहा है कि कांग्रेसी और भाजपाई भी आप को कन्फ्यूज करने के लिए धड़ाधड़ मैसेज करवा रहे हैं। उधर दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव उमेश सहगल ने आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक अरविन्द केजरीवाल द्वारा सूबे में नई सरकार के गठन के लिए जनता की राय पूछने के तरीके पर सवाल उठाया है। उन्होंने यह भी कहा है कि इस पूरी प्रक्रिया पर आम आदमी के करीब एक करोड़ रुपए खर्च होंगे। केजरीवाल को बुधवार को भेजे गए अपने पत्र में सहगल ने कहा है कि यदि दिल्ली का हर मतदाता मान लीजिए एक करोड़ मतदाता फोन अथवा एसएमएस के जरिये अपनी राय भेजता है तो इस पूरी प्रक्रिया में करीब एक करोड़ रुपए खर्च होगा। ऐसे में सवाल है कि फैसला आपको लेना है और पैसे जनता के खर्च हों? जितना समय निकलता जा रहा है आप पार्टी की आलोचना बढ़ती जा रही है। अन्ना ने केजरीवाल पर कटाक्ष करते हुए यहां तक कह दिया कि उनका आंदोलन विदेशी चंदे पर नहीं चलता। रालेगण सिद्धि के लोगों ने मेरे अनशन के लिए दिन-रात मेहनत की है और पांच-पांच रुपए इकट्ठे कर डेढ़ लाख रुपए इकट्ठे हुए जिसमें से एक लाख तो टैंट का ही खर्चा है। भारतीय जनता पार्टी ने भी आप पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, भाजपा नेता नितिन गडकरी ने आप पर तीखा हमला करते हुए अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व वाली पार्टी की गतिविधियों को बुधवार को दक्षिणपंथी माओवादी करार दिया और कहा कि दिल्ली में सरकार बनाने के लिए लोगों के विचार एकत्र करने का कदम लोकतंत्र का उपहास है। गडकरी ने कहा कि आप लोकप्रिय जनादेश का तमाशा बना रहे हैं और लोगों से पूछ रहे हैं कि उनका आगे का कदम क्या होना चाहिए। जब कांग्रेस ने उसे बिना शर्त समर्थन की पेशकश की है तो आप सरकार क्यों नहीं बना रही है? आप की गतिविधियां दक्षिणपंथी (कम्युनिस्ट) माओवादी हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि पार्टी और उसके नेताओं का मुख्य काम सिर्प अन्य पर हमला करना और बेबुनियाद आरोप लगाना है। भाजपा 32 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी लेकिन खंडित जनादेश के चलते वह सरकार बनाने में सक्षम नहीं है। बेशक भाजपा विधायक दल के नेता डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि आप को 28 सीटें देकर जनता ने दूसरी बड़ी पार्टी के तौर पर चुना है तो फिर इसके नेता जनमत संग्रह का ढोंग क्यों कर रहे हैं, जबकि इसका परिणाम पहले से ही तय है। उन्होंने आप से 14 सवाल भी पूछे हैं, आप जनता को जवाब दे कि दिल्ली में सरकार बनाएगी या नहीं? कांग्रेस का समर्थन लेगी या नहीं? अनिश्चय की स्थिति में दिल्ली का विकास बाधित हो रहा है इसके लिए आप दोषी है या नहीं? आप द्वारा एक ओर कांग्रेस पर आरोप लगाए जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना रही है? क्या यह नूराकुश्ती है? दोनों पार्टियों में अन्दरखाते क्या डील हुई है? भाजपा स्पष्ट कर चुकी है कि सरकार नहीं बनाएगी तो आप ने भाजपा को पत्र क्यों लिखा? सरकार बनाने के लिए आप द्वारा ड्रामा क्यों रचा जा रहा है? इत्यादि-इत्यादि।

-अनिल नरेन्द्र

Friday, 20 December 2013

अमेरिका की दादागीरी अब भारत को स्वीकार्य नहीं है

यह पहली घटना नहीं जब अमेरिका द्वारा किसी भारतीय को अपमानित किया गया हो। यह पहली बार भी नहीं जब अपने किसी राजनयिक के अस्वीकार्य आचरण की वजह से भारत को नीचा देखना पड़ा हो। न्यूयार्प में भारत की उप-महावाणिज्य दूत देवयानी खोबरागड़े पर आरोप हैं कि उन्होंने नौकरानी (घर पर सहायिका) के वीजा-आवेदन में धोखाधड़ी की और अमेरिकी कानून के मुताबिक वेतन भत्ते, छुट्टियां वगैरह न देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया पर इसके बाद जो हुआ वह न केवल अमानवीय था और भारत को अपमानित किया गया जो किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है। अपनी बच्ची को स्कूल छोड़ने जा रही 1999 बैच की अधिकारी देवयानी को अमेरिकी पुलिस ने पकड़ लिया और कपड़े उतरवाकर तलाशी ली। बदसलूकी का सिलसिला यहीं नहीं रुका। देवयानी को नशैड़ियों और खतरनाक कैदियों के साथ जेल में रखा गया। सेक्स वर्परों के साथ कतार में खड़ा किया गया। वह अपनी बच्ची को स्कूल से लाने की दुहाई देती रहीं मगर अमेरिकी पुलिस नहीं पसीजी। सवाल खड़ा होता है कि क्या भारत देश का प्रतिनिधित्व करने वाली किसी अधिकारी के साथ कानूनी कार्रवाई की यह प्रक्रिया जायज है? दूसरा सवाल मानवाधिकारों का झंडा उठाने का दावा करने वाले अमेरिका का यह अमानवीय कृत्य अंतर्राष्ट्रीय कानून के विरुद्ध नहीं है? बिना दूसरा पक्ष सुने सिर्प शक की बिनाह पर किसी दूसरे देश के अधिकारी को पकड़ कर उसके साथ खूंखार अपराधियों जैसा सलूक किया जाना क्या अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं? पूर्व राष्ट्रपति डाक्टर अब्दुल कलाम को भी सुरक्षा के नाम पर अपमानित किया था। एनडीए शासन में जॉर्ज फर्नांडीज से भी बदतमीजी की गई थी। फिल्म अभिनेता शाहरुख खान को 2001 में महज अपने मुस्लिम नाम के कारण रोक लिया गया था। इससे ज्यादा विडम्बना और क्या होगी कि शाहरुख आतंकी घटना के बाद बनी अपनी फिल्म माई नेम इज खान के प्रमोशन के लिए वहां गए थे और भी कई केस हुए हैं। स्वाभाविक तौर पर भारत में इसकी गम्भीर प्रतिक्रिया होनी थी। पहले केसों में भारत ने पर्याप्त जवाब नहीं दिया पर इस बार भारत सरकार ने कारण कुछ भी रहे हों तय किया है कि अमेरिका को उसी की भाषा में जवाब दिया जाएगा जो वह समझता है। मंगलवार को भारत ने कड़ा एतराज जताते हुए अमेरिकी दूतावास और उसके अधिकारियों-कर्मचारियों पर सख्ती बरतनी शुरू कर दी। विशेष छूट अब नहीं। अमेरिकी काउंसलेट के राजनयिक केंद्र सरकार की ओर से जारी आईडी कार्ड लौटाएं। अमेरिकी कर्मचारियों और परिजनों को देश के हवाई अड्डों से स्पेशल पास रद्द होंगे। अमेरिकी एम्बेसी काउंसलेट में तैनात भारतीय स्टाफ की सैलरी आदि की डिटेल मांगी गई है। यूएस राजनयिकों के घर की मेड और नौकरों के वेतन आदि की जानकारी देने को कहा गया है। इसके अलावा लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, राष्ट्रीय सलाहकार शिवशंकर मेनन समेत भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात करने से इंकार कर दिया। इन कदमों से भारत ने साफ संदेश दे दिया है कि भारतीय राजनयिकों के साथ अपमानजनक व्यवहार को अमेरिका हल्के में न ले। दुःखद बात यह है कि पहले अमेरिकी चोरी करे फिर सीना जोरी करे। अमेरिकी अधिकारी अब भी कह रहे हैं कि उन्होंने अमेरिकी कानूनी प्रक्रिया के तहत काम किया है। वीजा में गलती, नौकरानी को सही वेतन न देना इत्यादि के आरोपों में किसी महिला व राजनयिक महिला के कपड़े उतरवा कर, सड़क पर हथकड़ी लगाकर घुमाना कौन-सी कानूनी प्रक्रिया में लिखा हुआ है? चाहे वह लोकसभा चुनाव का दबाव रहा हो, चाहे वह भाजपा का दबाव, इस बार भारत सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है। हम इस रुख का स्वागत करते हैं। दुनिया के सबसे बड़े `दादा' समझे जाने वाले अमेरिका के खिलाफ इतनी जुर्रत करना, वाकई में कुछ-कुछ हैरान करने वाली बात जरूर है। ऐसा ही व्यवहार पड़ोसी देश पाकिस्तान भी भारतीय राजनयिकों से करता है। अमेरिका को कड़ा संदेश देने से शायद पाकिस्तान भी समझ जाए कि बस अब और नहीं। जिस तरह अमेरिका अपने कानूनों को गम्भीरता से लेता है, उसी तरह उसे कार्रवाई की मर्यादा का भी ध्यान रखना चाहिए। अमेरिका को बिना शर्त माफी मांगनी चाहिए और कसूरवारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी होगी।

-अनिल नरेन्द्र

अंतत लोकपाल बिल का अन्ना का सपना पूरा हुआ

46 सालों की कोशिशों के बाद आखिरकार देश को अब ऐतिहासिक लोकपाल कानून लगभग मिल गया है। राज्यसभा ने पहले ही पास कर दिया, बुधवार को लोकसभा ने भी लोकपाल एवं लोकायुक्त विधेयक 2013 को ध्वनिमत से पारित कर दिया। समाजवादी पार्टी को छोड़कर बाकी अन्य दलों विशेषकर भाजपा, वाम और बसपा आदि ने विधेयक का समर्थन किया। विधेयक का विरोध कर रहे सपा सदस्य सदन से वाकआउट कर गए। 2011 में जब अन्ना हजारे लोकपाल को लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे थे तभी से यह लगने लगा था कि वह दिन दूर नहीं जब सरकार व राजनीतिक दलों को जनता की मांग को स्वीकार करना होगा। आज अगर यह कानून बनने जा रहा है तो इसका सबसे ज्यादा श्रेय अन्ना हजारे को जाता है। यह उन्हीं के संघर्ष का नतीजा है। कांग्रेस और भाजपा ने भी इसका समर्थन करके अच्छा काम किया। इस क्रम में हमें कांग्रेसी सांसद व संसदीय प्रवर समिति के अध्यक्ष सत्यव्रत चतुर्वेदी को नहीं भूलना चाहिए। चतुर्वेदी की प्रशंसा करना सियासी दल भी नहीं भूले। नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने कहा कि दो साल पहले 27 दिसम्बर 2011 को इस सरकार ने लोकपाल विधेयक पर कन्नी काट ली थी। जेटली ने कहा कि विधेयक पर आम सहमति बनाने के लिए प्रवर समिति के अध्यक्ष सत्यव्रत चतुर्वेदी  ने पार्टी लाइन से ऊपर उठ कर कड़ी मेहनत की। जेटली के बाद सभी वक्ताओं ने चतुर्वेदी के प्रयास की सराहना की। दरअसल जब सरकार ने विपक्षी दलों की आशंकाओं को दूर कर दिया और उनके तकरीबन सारे सुझाव नए विधेयक में डाल दिए गए तो विधेयक के रुकने का कोई सवाल ही नहीं था। बेशक लोकपाल बिल से भ्रष्टाचार पूरी तरह से नहीं रुकेगा पर यह सही दिशा में एक सही कदम तो है ही। सबसे बड़ी बात मेरी राय में इस विधेयक से हर स्तर पर पहली बार नेताओं, अफसरों इत्यादि की जवाबदेही तय होगी। अब तक तो किसी की किसी स्तर पर जवाबदेही ही नहीं थी। जैसा अन्ना ने कहा अब मैं खुश हूं। 50 प्रतिशत भ्रष्टाचार तो मिटेगा। संसद की मंजूरी के बाद विधेयक राष्ट्रपति को भेजा जाएगा। उनके हस्ताक्षर के बाद कानून बन जाएगा। राज्यों में लोकपाल की तर्ज पर लोकायुक्त बनेंगे। इसके लिए संबंधित राज्यों को कानून बनाने के लिए 365 दिन का समय दिया गया है। संशोधित लोकपाल बिल में प्रमुख प्रावधान कुछ इस प्रकार हैंöलोकपाल की जांच के दायरे में प्रधानमंत्री, सांसद और केंद्र सरकार के समूह ए, बी, सी, डी के अधिकारी और कर्मचारी आएंगे। लोकायुक्त के दायरे में मुख्यमंत्री, राज्यों के मंत्री, विधायक और राज्य सरकार के अधिकारी होंगे। लोकपाल को कुछ मामलों में दीवानी अदालत के अधिकार भी होंगे यानि यह सजा तक दे सकता है। लोकपाल के पास भ्रष्ट अधिकारी की सम्पत्ति को अस्थायी तौर पर अटैच करने का अधिकार होगा। विशेष परिस्थितियों में भ्रष्ट तरीके से कमाई गई सम्पत्ति, आय, प्राप्तियों या फायदों को जब्त करने का अधिकार होगा। केंद्र सरकार को भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई के लिए उतनी विशेष अदालतों का गठन करना होगा जितनी लोकपाल बताए। अगर एक साल के समय में सुनवाई पूरी नहीं हो पाती तो विशेष अदालत इसके कारण दर्ज करेगी और सुनवाई तीन महीने में पूरी करनी होगी। यह अवधि तीन-तीन महीने के हिसाब से बढ़ाई जा सकती है। यह एक ऐतिहासिक कदम है और इसका असर जरूर होगा।