Translater

Saturday, 28 December 2013

भारत सरकार के देवयानी मसले पर स्टैंड से बौखलाया अमेरिका

अमेरिका में भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े के मामले में भारत सरकार ने जिस तरह की कड़क मिजाजी दिखाई है उसके सकारात्मक परिणाम दूसरे देशों से भी सामने आने लगे हैं और भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में यह चर्चा शुरू हुई है कि आखिर कब तक दुनिया अमेरिका की दादागिरी को बर्दाश्त करेगी? पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में भी भारत के स्टैंड को समर्थन मिल रहा है। द नेशन अखबार अपने सम्पादकीय में लिखता है कि इस पर किसको शक होगा? यह माना जाता है कि उसकी हुकूमत में  दुनिया के सबसे जहीन और आला दिमाग शख्स शामिल होंगे। लेकिन हिन्दुस्तान के वाणिज्य दूतावास की सीनियर अफसर देवयानी की गिरफ्तारी और उनके साथ की गई बदसुलूकी अमेरिकी प्रशासन की सियासी सूझबूझ पर किसी के अन्दर शक पैदा कर सकती है। आखिर यह नौबत आई कैसे? यह जो पूरा ड्रामा है और इससे जो तल्खी पैदा हुई है उसे टाला जा सकता था। पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी ने अमेरिका को चेताते हुए कहा कि देवयानी की गिरफ्तारी में शामिल रहे अमेरिकी अभियोजक, मार्शल और उनकी गिरफ्तारी पर हस्ताक्षर करने वाले विदेश विभाग के अधिकारियों ने कथित घरेलू अपराध को अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप दे दिया है। उन्होंने अमेरिका को लाहौर में अमेरिकी दूतावास में कार्यरत रहे रेमंड डेविस मामले की याद भी दिलाई। पिछले साल दो पाकिस्तानी नागरिकों की हत्या करने वाले अमेरिकी राजनयिक रेमंड डेविस का हवाला देते हुए हक्कानी ने कहा कि हमने डेविस के मामले को पाकिस्तान और अमेरिका के संबंधों के आधार पर लिया था जबकि यह खून का मामला था जो एक गम्भीर अपराध था। मुझे भी किसी आम व्यक्ति की तरह इस बात पर गुस्सा आया था कि एक शख्स ने भरे बाजार में दो लोगों की हत्या कर दी थी जबकि उनकी जान को कोई खतरा नहीं था। नियमत डेविस के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई होनी चाहिए थी। इस कार्रवाई से अमेरिका और पाकिस्तान के संबंध प्रभावित हो रहे हैं। देवयानी के मामले में सख्त हुई यूपीए सरकार ने इसी क्रम के चलते बहरीन के एक राजनयिक के खिलाफ अपनी मुंबई हाउसिंग सोसाइटी की एक महिला प्रबंधक के साथ छेड़छाड़ करने को लेकर एक मामला दर्ज किया है। हालांकि उन्हें प्राप्त राजनयिक विशेषाधिकारों के चलते गिरफ्तार नहीं किया गया। यह देवयानी मामले के बाद आए कड़े रुख का ही नतीजा है। उधर देवयानी के पिता उत्तम खोबरागड़े ने आरोप लगाया है कि उनकी बेटी की पूर्व नौकरानी संगीता रिचर्ड अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की एजेंट हो सकती है। देवयानी को तो बलि का बकरा बनाया जा रहा है। अमेरिका के दोहरे मापदंडों का एक उदाहरण हैöसउदी अरब और रूस के राजनयिकों की गलतियों पर आंखें मूंदना। सउदी के सैन्य अटैची के वाशिंगटन स्थित आवास से जुल्म ज्यादती से तंग फिलीपींस की दो महिलाओं को बचाया गया था जबकि रूस के पूर्व एवं मौजूदा 49 राजनयिकों व उनके परिजनों पर अमेरिकी स्वास्थ्य योजनाओं में 15 लाख डॉलर (करीब 9.24 करोड़ रुपए) की धोखाधड़ी करने का आरोप लगा है। इनमें 11 तो अब भी अमेरिका में तैनात हैं। गुरुवार को अमेरिकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मैरी हर्प इस सवाल का जवाब नहीं दे पाईं कि देवयानी के प्रति सख्ती बरतने वाला अमेरिकी प्रशासन सउदी अरब और रूस के राजनयिकों की गलतियों पर क्यों आंखें मूंद रहा है? इधर नई दिल्ली में भारत अमेरिकी कांग्रेस के विरोध के बावजूद अमेरिकी दूतावास के आसपास फिर से सुरक्षा तामझाम खड़ा करने के मूड में नहीं है। गौरतलब है कि बीते 17 दिसम्बर को अमेरिकी दूतावास के गेट और सड़क से सुरक्षा खत्म किए जाने के बाद पहली बार अमेरिकी कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया जताई थी। भारत ने साफ संकेत दिया है कि देवयानी की गिरफ्तारी के मामले में सम्मानजनक हल न निकलने तक उसका यूएस दूतावास के समक्ष फिर से सुरक्षा तामझाम खड़ा करने का कोई इरादा नहीं है। भारत इस मामले में अपने रुख को और कड़ा करते हुए बीते सोमवार को ही अमेरिकी राजनयिकों के विशेषाधिकार खत्म कर चुका है। खबर अब यह भी है कि भारत अमेरिकी दूतावास, वाणिज्यिक दूतावास तथा स्कूलों तथा अन्य संस्थानों में कार्यरत अपने देश के लोगों को मिलने वाली सुविधाएं व वेतन की जानकारी मांग कर अमेरिका की दुखती रग पर हाथ रखने वाला है। दरअसल अमेरिका देवयानी की नौकरानी को 35000 रुपए वेतन देने को भी बेहद कम बता रहा है अपने संस्थानों में कार्यरत कई भारतीय कर्मचारियों को इसका आधा वेतन भी नहीं देता। राजनयिकों के यहां कार्यरत घरेलू नौकरों का तो अमेरिकी दूतावास के पास कोई रिकार्ड ही नहीं है। भारत के पास इन कर्मचारियों को रखने और निकालने के दौरान भारतीय श्रम कानूनों के उल्लंघन के कई सुबूत हैं। यही कारण है कि अमेरिका जहां इस बारे में जानकारी उपलब्ध कराने में अधिक समय की मांग कर मामले को टालने की कोशिश में है। आज पूरा देश इस मुद्दे पर केंद्र सरकार के साथ है। आप अड़े रहो, इसका फायदा इसी जगह ही नहीं, कई और जगहों पर भी मिलेगा। दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए।

Friday, 27 December 2013

कांग्रेसियो अब पछताए होत क्या, चिड़ियां चुग गईं खेत

दिल्ली विधानसभा चुनाव में सबसे बुरी तरह हारी कांग्रेस ने दांव तो खेला था आम आदमी पार्टी (आप) को सरकार में फंसाने का लेकिन उसे समर्थन देकर वह खुद फंस गई। जब होश आया तो देर हो चुकी थी। लिहाजा अब आप को समर्थन के मसले में ही कांग्रेस में घमासान मचा हुआ है। दिल्ली के सभी नेता अलग परेशान हैं और कार्यकर्ता धरना-प्रदर्शनों पर उतर आए हैं। बुधवार शाम को ही राष्ट्रपति, उपराज्यपाल की ओर से आप पार्टी को शपथ लेने को कहा गया। सुबह तक किसी को यह नहीं मालूम था कि शपथ कब होगी? सुबह केजरीवाल की सरकार बनने पर भी सस्पेंस खड़ा हो गया था। दरअसल सस्पेंस की मूल वजह कांग्रेस के अन्दर शुरू हुए पुनर्विचार को माना जा रहा है। सूत्रों का दावा है कि पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित `आप' की सरकार के गठन के लिए कांग्रेस के विधायकों का समर्थन उचित नहीं मानतीं। उन्होंने मंगलवार दिनभर इसके लिए लॉबिंग की और यह बता दिया कि केजरीवाल की सरकार कैसे दिल्ली में पार्टी की राजनीतिक जड़ें खोदने में जुट जाएगी। जो काम मुख्य विपक्षी दल भाजपा पांच सालों में नहीं कर पाई। वह काम केजरीवाल की कम्पनी एक महीने में कर सकती है, क्योंकि वह भ्रष्टाचार के नाम पर कांग्रेस के खिलाफ मुहिम छेड़ सकती है। इससे लोकसभा चुनाव में पार्टी को बड़ा नुकसान हो सकता है। स्थिति तो यह है कि दिल्ली कांग्रेस के सभी बड़े नेता पार्टी हाई कमान के बिना शर्त समर्थन देने के निर्णय के खिलाफ एकजुट होकर अब खुलकर विरोध पर उतर आए हैं। शीर्ष नेतृत्व की दिक्कत यह है कि अब वह आप पार्टी को दिए समर्थन को बिना वजह वापस भी नहीं ले सकती। सूत्रों का कहना है कि दिल्ली में कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा इस समर्थन के खिलाफ किए गए विरोध प्रदर्शन के पीछे कई बड़े नेताओं का हाथ है जो कांग्रेस आलाकमान को समर्थन न देने के लिए मनाने में असफल रहे थे और अब सम्भावित खतरों को भांपते हुए उन्होंने हाई कमान पर दबाव बनाने का यह नया दांव चला है। इतना ही नहीं, कांग्रेस के कई बड़े दिग्गज जो इस समर्थन को उचित ठहरा रहे थे अब उनके स्वर भी बदलने लगे हैं। वे अब मान रहे हैं कि आप को समर्थन देकर कांग्रेस ने बहुत बड़ी गलती कर दी है। क्योंकि अब सरकार बनते ही केजरीवाल सबसे पहले कांग्रेस का ही पिटारा खोलेंगे और उन्होंने बाकायदा इसकी घोषणा भी कर दी है कि हर दिन शीला दीक्षित सरकार के एक मंत्री का कच्चा चिट्ठा खोलेंगे। उनका इरादा इस बात से भी स्पष्ट हो जाता है कि केजरीवाल ने शीला दीक्षित सरकार के मुख्य सचिव डीएम सपोलिया को बदल कर अपने मुताबिक नए मुख्य सचिव के लिए राजेन्द्र कुमार का चुनाव किया है। आम आदमी पार्टी के लिए कांग्रेस पर हमलावर होना इसलिए भी जरूरी  लगता है ताकि जनता उन पर कांग्रेस के साथ साठगांठ का आरोप न लगा सके। आप को समर्थन के  बाद अब कांग्रेस कहां खड़ी है? समर्थन के विरोध में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कार्यालय पर धरना-प्रदर्शन के सवाल पर कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि पार्टी में एक राय यह भी है कि समर्थन का निर्णय शायद इस रूप में उचित नहीं था। दिल्ली की जनता ने हमें तीसरे नम्बर पर रखा। पार्टी महज आठ सीटें जीती, हमें नेता विपक्ष तक का पद नहीं मिला, इसलिए कांग्रेस को कहना चाहिए था कि हमें जनादेश नहीं मिला, जिसे जिससे मिलकर सरकार बनाना है बनाए और चलाए। उचित यही होता कि कांग्रेस विपक्ष की भूमिका निभाती। हमारा दायित्व यह देखना नहीं था कि सरकार कौन बनाएगा, कौन चलाएगा पर अब बहुत देर हो चुकी है तीर निकल चुका है अब पछताने से क्या?

-अनिल नरेन्द्र

मुजफ्फरनगर क्षेत्र में दोनों समुदायों में अविश्वास की खाई को कैसे पाटा जाए?

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जब रविवार को उत्तर प्रदेश के दंगा प्रभावित मुजफ्फरनगर और शामली जिलों में राहत शिविरों और गांवों का औचक दौरा किया तो उनका सामना इस गन्ना पट्टी में दंगों के बाद समुदायों के बीच बन गई गहरी खाई की कड़ी हकीकत से हुआ। एक ओर एक साथ रहने की मंशा है तो दूसरी ओर समुदायों के बीच अविश्वास की बढ़ती खाई है। इसी के मद्देनजर राहुल ने मध्यस्तता की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने शिविरों में बेहद खराब स्थितियों को सुधारने की तत्काल जरूरत पर भी जोर दिया। शिविर में रहने वालों ने इस बात की शिकायत की कि गरम कपड़ों के उपलब्ध न होने से 23 बच्चों की मौत हो गई है। ज्यादातर राहत शिविरों में इसी तरह की शिकायतें थीं। खुरगान के एक पीड़ित युवक ने यह बात कही तो राहुल ने पूछा कि वहां कितने दबंग हैं? गांधी ने दंगा पीड़ितों से अपील की कि वे अपने घरों को लौट जाएं। जब राहुल ने बार-बार उनसे पूछा कि क्या किया जाना चाहिए जिससे वे अपने घरों को लौट सकें तो मलकपुर में मुफ्ती असलम ने कहा कि यह तब तक सम्भव नहीं है जब तक कि जिन लोगों ने दंगों को अंजाम दिया उन्हें सलाखों के पीछे नहीं डाल दिया जाता। दंगों को अंजाम देने वाले अब भी खुलेआम घूम रहे हैं। बनराली में एक महिला ने कहा कि मैंने बेटा खो दिया है और उन्होंने मेरा घर भी जला दिया है। मैं वहां जाकर क्या करूंगी? मसाऊ शिविर में दंगा पीड़ितों ने राहुल के काफिले को रोकने की कोशिश की। उन्होंने अपनी समस्याओं का समाधान करने और साफ आश्वासन की मांग की। पीड़ितों के प्रतिनिधियों ने राज्य सरकार के आदेश की एक प्रति और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सौंपा गया मांग पत्र जिसमें उन्होंने कहा कि समुदाय के दंगा पीड़ितों में ज्यादातर खेतिहार मजदूर या ईंट भट्ठा में काम करने वाले लोग हैं। उन्होंने अब अपनी आजीविका खो दी है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को कैराना के अखिल भारतीय इत्तेहादुल मुसलमीन द्वारा सौंपी गई मांगों की सूची में पहली मांग थी ः शामली, मुजफ्फरनगर और बागपत में जाट समुदाय के कर्मचारियों और पुलिस अधिकारियों का अन्य जिलों में तबादला किया जाना चाहिए। धीमे स्वर में यह भी शिकायतें थीं कि शिविरों को चलाने में कुछ लोगों के निहित स्वार्थ हैं क्योंकि उन्हें विभिन्न क्षेत्रों से समुदाय के लिए आने वाली आर्थिक मदद से लाभ होता है। शामली जिले के कांग्रेस अध्यक्ष अयूब जंग ने आरोप लगाया कि ज्यादातर राहत शिविरों को समाजवादी पार्टी के सदस्य चला रहे हैं, क्योंकि वे नहीं चाहते कि शिविर में रहने वाले लोग घर लौटें। दंगों में जीवित बचे लोगों ने कुछ समय पहले मुजफ्फरनगर की सड़कों पर आरोप लगाते हुए प्रदर्शन किया था कि राज्य सरकार उन पर इस बात की घोषणा करने का दबाव डाल रही है कि वे अपने गांवों को नहीं लौटेंगे और पांच लाख रुपए के मुआवजे के बदले में अपनी सम्पत्तियों पर दावे को छोड़ दें। जाट बहुल करनकड़ा में ग्रामीणों ने राहुल गांधी से शिकायत की कि मुस्लिम दंगा पीड़ितों को राज्य सरकार मुआवजा दे रही है वहीं उनके समुदाय के लोगों को कुछ नहीं दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य प्रशासन दबाव में कार्रवाई कर रहा है और एक खास समुदाय के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा रही है। उस समुदाय के लोगों ने ही पहले हिंसा का सहारा लिया। एक ग्रामीण जगलाल ने कहा कि इससे पहले वहां कभी दंगे नहीं हुए। सवाल यह उठता है कि इस समस्या का आखिर हल क्या होगा?

Thursday, 26 December 2013

सलाखों में ही अंत होगा तेजपाल के लिए यह साल और 2014 शुरू भी वहीं होगा

विधानसभा चुनाव और उसके परिणामों में सब इतने मशरूफ हो गए कि एक समय के पेज-3 के हीरो तरुण तेजपाल को सभी भूल गए। वक्त-वक्त की बात है कभी पेज-3 के हीरो आज बामुश्किल से पेज-8 के एक कॉलम की खबर बन गए हैं। बहरहाल तरुण तेजपाल पणजी जेल में बंद हैं। उन्हें इस साल का अंत और नए साल की शुरुआत भी जेल से ही करनी होगी। तहलका संपादक तरुण तेजपाल की न्यायिक हिरासत सोमवार 4 जनवरी 2014 तक बढ़ा दी गई है। तेजपाल की पिछली 12 दिवसीय हिरासत समाप्त होने के बाद पथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्टेट सारिका फलदेसाई ने उनकी न्यायिक हिरासत को बढ़ा दिया। तेजपाल के वकीलों ने सोमवार को जिला अदालत के समक्ष एक याचिका दायर करके उनकी जमानत की मांग की। इस याचिका में कहा गया कि न्यायिक हिरासत में लिए जाने के बाद से पुलिस द्वारा आरोपी से पूछताछ नहीं की गई है। तेजपाल से सिर्फ तभी पूछताछ की गई जब वे पुलिस हवालात में थे। गोवा अपराध शाखा ने इस दौरान महिला सहकर्मी के यौन शोषण के आरोपी तेजपाल की मुश्किल बढ़ाते हुए उनके खिलाफ अतिरिक्त आरोप लगाए हैं। अपराध शाखा के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि तेजपाल के खिलाफ दर्ज पाथमिकी में अब आईपीसी की धारा 341 और 342 जोड़ी गई हैं। तेजपाल से पूछताछ कर रहे अधिकारी ने कहा कि पीड़िता, गवाहों के बयानों और होटल के सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद तेजपाल के खिलाफ अतिरिक्त धाराएं लगाई गई हैं। धारा 341 किसी को गलत ढंग से रोकने और धारा 342 किसी को गलत ढंग से बंधक बनाने से जुड़ी है। उधर तरुण तेजपाल की अपनी ही कहानी है। तरुण तेजपाल ने पुलिस पूछताछ में कहा कि युवती और उनके बीच जो कुछ भी हुआ उसमें एक तरह की सहमति थी। मामले की जांच कर रहे गोवा पुलिस के एक काइम ब्रांच के अधिकारी ने कहा कि जांच सही दिशा में चल रही है और तेजपाल से विस्तृत पूछताछ की जा रही है। वह सहयोग कर रहे हैं। अधिकारी ने कहा कि पूछताछ में तेजपाल इस बात पर कायम हैं कि उन्होंने जो कुछ भी किया उसमें आपसी सहमति थी। उन्होंने इस पूरे मामले में संलिप्तता से इंकार किया। हालांकि तेजपाल के वकील ने यह कहा कि इस बारे में अफवाह उड़ रही है और कहा कि मामले के आरोप पत्र दाखिल होने के बाद ही पूरी जानकारी हासिल हो पाएगी। अधिकारी ने कहा कि पीड़ित युवती ने अपनी शिकायत में जो बातें कही हैं, तेजपाल उनकी पुष्टि कर रहे हैं लेकिन वह यह नहीं मान रहे कि उन्होंने लड़की के साथ किसी तरह की जोरöजबरदस्ती की। इस आधार पर वह कह रहे हैं कि जो कुछ भी हुआ उसमें आपसी सहमति थी। सवाल यह है कि केस टेढ़ा है और केस साबित करने का भार अब अभियोजन पक्ष पर है। हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस आरएस सोढ़ी बताते हैं कि रेप और छेड़छाड़ के मामले में लड़की का बयान सबसे अहम माना जाता है। यह सबसे बड़ा साक्ष्य है। अगर लड़की के बयान में तारतम्यता है और कोर्ट को लगता है कि बयान विश्वसनीय है तो वह सबसे अहम साक्ष्य है। सीनियर एडवोकेट केपीएस तुलसी का कहना है कि सुपीम कोर्ट ने अपने जजमेंट में कहा है कि अगर लड़की का बयान पुख्ता है और विश्वसनीय है तो अन्य किसी पूरक साक्ष्य की जरूरत नहीं है। जहां तक मेडिकल एविडेंस का सवाल है तो वैसे एविडेंस पूरक साक्ष्य हैं और मेडिकल में रेप की पुष्टि होती है तो केस ज्यादा ठोस माना जाता है। देखें, चार्जशीट में पुलिस क्या कहती है ?
अनिल नरेन्द्र

जो भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं वही उसके खिलाफ उपदेश दे रहें हैं?

कांग्रेस पार्टी का भ्रष्टाचार और घोटालें में कथनी और करनी में हमेशा फर्क रहा है। ताजा उदाहरण है उपाध्यक्ष राहुल गांधी के भ्रष्टाचार के खिलाफ उपदेश देने का और महाराष्ट्र में आदर्श घोटाले की जांच रिपोर्ट को दफन करना। राहुल गांधी  तो इधर कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार देश का सबसे बड़ा मुद्दा है, जो लोगों को चूस रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अनियंत्रित शक्तियां परियोजनाओं को रोक रही हैं। उन्होंने महंगाई पर भी काबू करने की बात कही। इधर राहुल यह सब कह रहे हैं उधर कांग्रेस की ही महाराष्ट्र सरकार उन्हें ठेंगा दिखा रही है। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने साफ कह दिया है कि आदर्श हाउसिंग घोटाले मामले में जांच आयोग की सिफारिशें नहीं मानी जाएंगी। चव्हाण ने यह फैसला जनहित के नाम पर किया है। इसको लेकर सीधे तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर सियासी हलकों में उंगलियां उठने लगी हैं। इन्हीं कारणों से भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को यह कहने का मौका मिला कि जो भ्रष्टाचार में डूबे हैं वही अब उसके खिलाफ उपदेश दे रहे हैं। मोदी ने मुंबई में एक विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि मैंने कांग्रेस के एक बड़े नेता के भाषण सुने। वह भ्रष्टाचार के खिलाफ बोल रहे थे। उनका साहस तो देखिए। कोई अन्य इतना साहस नहीं कर सकता। यह लोग भ्रष्टाचार में इतने डूबे हुए हैं इसके बावजूद मासूम चेहरा बनाते हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते हैं। उन्होंने राहुल गांधी की ओर इशारा करते हुए कहा कि आदर्श आयोग की रिपोर्ट में मंत्रियों को अभ्यारोपित किया गया है। एक ओर महाराष्ट्र सरकार भ्रष्टाचारियों को बचाने का फैसला करती है और दूसरी ओर कांग्रेसी नेता दिल्ली में उपदेश दे रहे हैं। कांग्रेस बोलती कुछ है और करती कुछ है। आदर्श सोसायटी घोटाले की गिनती पिछले कुछ वर्षें के भ्रष्टाचार के सबसे चर्चित मामलों में होती रही है। वर्ष 2010 में जब इसका खुलासा हुआ, तब देश का सियासी तापमान ब़ढ़ गया था। इसकी जांच रिपोर्ट का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा था। यह बेहद अफसोसजनक है कि महाराष्ट्र सरकार ने आदर्श सोसायटी काण्ड की जांच रिपोर्ट खारिज कर दी है पर शायद यह कोई हैरत की बात नहीं है। अगर महाराष्ट्र सरकार ने यह रिपोर्ट स्वीकार की होती तो उसके सामने कैसी राजनीतिक मुश्किलें आती इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। न्यायमूर्ति जेए पटेल की अध्यक्षता वाले दो सदस्यीय जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जिन लोगों की भूमिका पर उंगली उठाई है उनमें चार पूर्व मुख्यमंत्री शामिल हैं। इनमें गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे भी हैं। यह सभी कांग्रेस से ताल्लुक रखते हैं। इसके अलावा राज्य के दो कैबिनेट मंत्रियों का भी नाम है जिनका नाता कांग्रेस के सहयोगी दल राष्ट्रवादी कांगेस पाटी से है। महाराष्ट्र में कांगेस और राकांपा के गठजोड़ की सरकार है। इस काण्ड की वजह से अशोक चव्हाण को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। रिपोर्ट में सबसे तीखी टिप्पणी उन्हीं के खिलाफ है। कुछ महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनावों को देखते हुए इस मामले को ठण्डे बस्ते में डाल देना आसान नहीं होगा। आदर्श सोसायटी काण्ड मंत्रियों और नौकरशाहों द्वारा विवेकाधिकार के दुरुपयोग की देन है। राहुल गांधी दिल्ली में उद्योग संगठन फिक्की के कार्यकम में कहते हैं कि हम (उनकी पाटी) भ्रष्टाचार के मुद्दों पर जीरो टालरेंस की नीति अपनाएंगे। इसमें किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा क्योंकि तमाम बड़ी समस्याओं की जड़ में भ्रष्टाचार है। दुख से कहना प़ड़ता है कि कांग्रेस हाल के विधानसभा परिणामों से कोई सबक नहीं ले रही। यह अब भी जनता को टेकन फार ग्रांटेड ले रही है। जनता जागरुक हो चुकी है अब उसे कांग्रेस की कथनी और करनी में फर्क साफ नजर आ रहा है।

Wednesday, 25 December 2013

केदारनाथ हादसे में मारे गए लोगों का न तो मुआवजा मिला न सर्टिफिकेट

बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा बेशक एक पढ़े-लिखे अच्छे इंसान हैं पर उनकी अपनी सरकार और प्रशासन पर पकड़ बहुत कमजोर है। उत्तराखंड का सियासी माहौल इस सर्द मौसम के बावजूद गर्म हो गया है। सूत्रों के अनुसार लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड की कांग्रेस के पाले वाली पांचों लोकसभा सीटें खतरे में बताई जा रही हैं, इसलिए कांग्रेस आलाकमान मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को हटाने की सोच रहा है। श्री हरीश रावत का उत्तराधिकारियों की सम्भावित सूची में फिलहाल सबसे ऊपर नाम चल रहा है पर यह तो सियासी मामला है जिसका संबंध कांग्रेस पार्टी से है। हमें तो दुख इस बात का है कि केदारनाथ में जून माह में हुए प्राकृतिक हादसे के दौरान लापता हुए दिल्ली के 237 लोगों की छह माह बाद भी न तो कोई खोज खबर मिली और न ही उनकी मौत के प्रमाण पत्र व मुआवजा उनके परिजनों को मिले। मृतकों के परिजन कभी उत्तराखंड तो कभी दिल्ली के राजस्व विभाग के चक्कर लगा रहे हैं। कुल 143 लोगों के मृत्यु प्रमाण पत्र पिछले सप्ताह उत्तराखंड सरकार ने दिल्ली के राजस्व विभाग को भेजे हैं लेकिन अब राजस्व विभाग मृतकों के परिजनों की पुष्टि करने के लिए कुछ नियम-कायदे बनाने में लगा है। लापता 94 लोगों के बारे में सरकार की ओर से किसी प्रकार की खबर नहीं दी गई है। लापता अनेक लोगों के परिजन ऐसे हैं जो अभी भी अपनों के लौटने का इंतजार कर रहे हैं। अनेक ऐसे परिवार हैं जो यह मान चुके हैं कि उनके परिजनों की हादसे में मौत हो गई है और अब वह कभी नहीं लौटेंगे जबकि कई परिवार ऐसे भी हैं जो अभी भी अपने लापता प्रियजनों का इंतजार कर रहे हैं। दिल्ली राजस्व विभाग कार्यालय के एक आला अधिकारी ने बताया कि पिछले सप्ताह ही उत्तराखंड सरकार की ओर से 143 लोगों के मृत्यु प्रमाण पत्र व उनका मुआवजा राजस्व विभाग को मिला है लेकिन मुआवजा व सर्टिफिकेट बांटने के लिए मृतकों के परिजनों का सत्यापन करना जरूरी है। उन्होंने बताया कि बिना सत्यापन के मुआवजा व सर्टिफिकेट नहीं बांटे जा सकते। राजस्व विभाग के अनुसार मृतकों के परिजनों का सत्यापन करने के लिए उनसे नोटरी द्वारा अटेस्टिड शपथ पत्र तथा किसी समाचार पत्र में छपी गुमशुदा की सूचना संबंधी प्रति मांगे जाने के साथ-साथ जांच अधिकारी की रिपोर्ट मांगी जाएगी, इसके बाद ही उन्हें प्रमाण पत्र व मुआवजा बांटा जाएगा। लापता बाकी 94 लोगों के मृत्यु व मुआवजे के बारे में दिल्ली के राजस्व विभाग को उत्तराखंड सरकार ने अभी कोई सूचना नहीं दी है। उधर प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार केदारनाथ मंदिर को भविष्य में किसी तरह की प्राकृतिक आपदा से बचाने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) मंदाकिनी नदी का रुख बदलने का सुझाव दे रहा है क्योंकि उस क्षेत्र में नदी की तलहटी गांव की जमीन से ऊंची हो गई है। जून में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद मंदिर के जीर्णोद्धार का काम एएसआई को सौंपा गया है हालांकि मौसम इसमें लगातार बाधा बना हुआ है। संस्कृति मंत्री चन्द्रsश कुमार कटोच ने बताया कि हमारी रिपोर्ट के अनुसार केदारनाथ में नदी की तलहटी ऊंची हो गई है और ग्रामीण इलाके नीचे हो गए हैं, इसलिए हम नदी (मंदाकिनी) का रुख बदलने का सुझाव दे रहे हैं ताकि भविष्य में मंदिर को किसी प्राकृतिक आपदा की दिशा में कोई नुकसान न हो या फिर भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) या वन विभाग सलाह देगा कि कैसे केदारनाथ मंदिर की भविष्य में सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

-अनिल नरेन्द्र

आप पार्टी की सरकार सियासत में स्वच्छता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम

दिल्लीवासियों ने राहत की सांस ली होगी कि अंतत आप पार्टी ने पिछले एक पखवाड़े से जो सस्पेंस बनाया हुआ था कि सरकार बनाएंगे या नहीं वह समाप्त हो गया। अब घोषणा हो गई है कि आप पार्टी दिल्ली में सरकार बना रही है। आप पार्टी की राजनीतिक मामलों की सोमवार को एक बैठक हुई जिसमें जनमत संग्रह के नतीजों को देखते हुए सरकार बनाने की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया गया। पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल उपराज्यपाल नजीब जंग से मिले और उन्हें सरकार बनाने का दावा करने संबंधी पत्र सौंपा। अरविंद केजरीवाल दिल्ली के नए मुख्यमंत्री होंगे। जो रामलीला मैदान में सार्वजनिक तौर पर शपथ लेंगे। हम आप पार्टी और अरविंद केजरीवाल को बधाई देना चाहते हैं। खंडित जनादेश में यह तो होना ही था जब भाजपा ने सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद सरकार बनाने से मना कर दिया था। उस सूरत में दो ही विकल्प बचते थे ः एक राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए, दूसरा आप पार्टी सरकार बनाए। हां फिर चुनाव कराना तो विकल्प था ही। अगर राष्ट्रपति शासन लगता तो घूम-फिर कर कांग्रेस का ही शासन होता क्योंकि केंद्रीय गृह मंत्रालय सर्वेसर्वा होता। अब भी सत्ता की बागडोर एक तरह से कांग्रेस के हाथों में है। उसके आठ विधायकों के दम-खम पर ही यह सरकार चलेगी और कांग्रेसी नेता अब यह कहने लगे हैं कि हमने बिना शर्त समर्थन नहीं दिया, मुद्दों पर समर्थन दिया है। इसी लाइन से आप पार्टी की सरकार के भविष्य पर थोड़ी अनिश्चितता बनी हुई है कि पता नहीं कांग्रेस इस सरकार को कितने दिन चलने देगी? इसमें कोई शक नहीं कि केजरीवाल को थूक कर चाटना पड़ा है। केजरीवाल ने यहां तक कह दिया था कि मैं अपने बच्चों की कसम खाता हूं कि मैं कांग्रेस का समर्थन नहीं लूंगा। जनता में इस बात को लेकर भी आशंका है कि जो वादे आप पार्टी ने जनता से किए हैं बिजली, पानी, भ्रष्टाचार रोकने, घोटालों की जांच करवाना, लाल बत्ती संस्कृति खत्म करना, मोहल्ला कमेटियों में सीधा पैसा बांटना इत्यादि-इत्यादि उन 18 वादों में से कितने पूरा कर सकेंगे। मुझे लगता है कि इनमें से अधिक मुद्दे आप पार्टी पूरा कर लेगी। हो सकता है कि 50 प्रतिशत बिजली के बिल और 700 लीटर फ्री पानी इस हद तक न पूरा हो सके, कम रहे पर तब भी जनता को बहुत राहत मिलेगी। सबसे बड़ी बात यह होगी कि भारत की गिरती सियासत के स्तर पर रोक लगेगी। राजनीति में थोड़ी स्वच्छता जरूर आएगी। भारत की सियासत के शुद्धिकरण की दिशा में एक सही कदम जरूर होगा और यह दूसरे दलों को भी बदलने के लिए मजबूर करेगी। आप पार्टी और कांग्रेस में फ्लैश प्वाइंट तब आ सकता है जब केजरीवाल कांग्रेस शासन के दौरान घोटालों की जांच करती है और जैसा कि दो दिन पहले केजरीवाल ने खुद कहा कि मैं भ्रष्ट कांग्रेसी नेताओं को जेल भेजूंगा। अगर उन्होंने ऐसा किया तो निश्चित रूप से कांग्रेस जवाबी कार्रवाई करेगी। हालांकि कुछ लोगों का दावा है कि कांग्रेस और केजरीवाल में गुप्त डील हो चुकी है कि वह शीला दीक्षित शासन की जांचें नहीं करवाएंगे। भाजपा बेशक आज यह कहे कि आप ने जनता से धोखा किया और उसने उसी कांग्रेस से हाथ मिला लिया जिसके खिलाफ चुनाव लड़े थे पर अपना मानना है कि और कोई विकल्प नहीं था, हमें दोबारा चुनाव से बचना था। बचे हैं या नहीं यह तो आप सरकार के शुरुआती 15 दिनों में पता चल जाएगा। पता चल जाएगा कि यह सरकार लम्बी पारी खेलेगी या नहीं? पर फिलहाल अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी को हमारी शुभकामनाएं और हम चाहते हैं कि सारे विरोधाभास के बावजूद सरकार चले।