जम्मू-कश्मीर सीमा पर इन दिनों भयंकर युद्ध चल रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक से बुरी तरह बौखलाई पाकिस्तानी सेना व जेहादी संगठन अब सिविलियन जनता पर गोलीबारी करने लगे हैं। गांव के गांव खाली हो रहे हैं। एक दिन में आठ नागरिकों का मारा जाना यह साबित करता है कि स्थिति कितनी गंभीर है। जहां तक मुझे याद आता है कि पिछले 20 सालों में यह पहली घटना है जहां एक दिन में इतने नागरिक मारे गए हैं। पाकिस्तान की बौखलाहट का इससे ही पता चलता है कि भारत द्वारा 29 सितम्बर की रात सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान द्वारा युद्ध विराम का 63 बार उल्लंघन हो चुका है, जिसमें 12 आम नागरिक मौत के शिकार हुए। ऐसा नहीं कि हमारे जवान भी इसका करारा जवाब नहीं दे रहे हैं। पाकिस्तान की तरफ से लगातार सीमा पार से हो रही गोलीबारी का बीएसएफ की तरफ से भी माकूल जवाब दिया जा रहा है। पिछले 11 दिनों में पाकिस्तान लगातार सीजफायर तोड़ रहा है। बीएसएफ ने पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देते हुए 11 दिनों में 5000 मोर्टार दागे हैं जबकि 35000 से ज्यादा गोलियां चलाई हैं। बीएसएफ ने पाकिस्तानी फायरिंग के जवाब में 3000 लांग रेंज के मोर्टार, 2000 शार्ट रेंज के मोर्टार दागे हैं। लांग रेंज के मोर्टार की रेंज 5 से 6 किलोमीटर जबकि शार्ट रेंज की करीब 900 मीटर तक होती है। इसके अलावा बीएसएफ ने एमएमजी, एलएमजी और राइफल जैसे हथियारों का इस्तेमाल कर 38000 से अधिक गोलियां दागी हैं। बीएसएफ के मुताबिक अधिकतर कास-बार्डर फायरिंग जम्मू के सेक्टरों में हो रही है। पाकिस्तानी रेंजर्स खास कर रातों को फायरिंग कर रहे हैं। यह फायरिंग आतंकी घुसपैठ करने का पयास भी है। बीएसएफ की जवाबी कार्रवाई में अब तक कम से कम 15 पाकिस्तानी सैनिकों को मारे जाने का दावा किया जा रहा है। 19 अक्तूबर के बाद लगातार चल रही पाकिस्तानी फायरिंग में बीएसएफ के 3 जवान भी शहीद हुए हैं। पाकिस्तान ने 11 दिनों के भीतर अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर 63 बार सीजफायर तोड़ा है। बीएसएफ के एडीजे (वेस्टर्न सेक्टर) अरुण कुमार ने बताया कि भारतीय फौजें भी पाकिस्तानी सेना को करारा जवाब दे रही हैं। पाक गोला दागने के साथ मोर्टार से गोले बरसा रहा है। कई गांवों में तो कुछ घंटे के अंदर 100 के आसपास गोले तक गिरने की बात सामने आई है। बस्तियों पर अघोषित हमले का जवाब देना कठिन जरूर होता है। सरकार की ओर से लगातार उच्चस्तरीय बैठकों में स्थिति की समीक्षा की जा रही है। हमारे सामने सवाल अब यह है कि ऐसा कब तक चलेगा? कल्पना कीजिए कि जिन लोगों को अपना घर-बार छोड़कर अलग रहने को मजबूर होना पड़ रहा है उन पर क्या बीत रही होगी? चूंकि गांवों में ज्यादातर किसान हैं, इसलिए उनकी फसलें भी नष्ट हो रही हैं और मवेशियों के लिए संकट अलग खड़ा हो गया है। क्या हम धीरे-धीरे पूरे युद्ध की ओर बढ़ रहे हैं।
Translater
Thursday, 3 November 2016
बाज नहीं आने वाले दिल्लीवासी
इस साल उम्मीद की जा रही थी कि शायद पटाखे, बम इत्यादि कम छोड़े जाएंगे और दिल्ली
की आबोहवा इतनी पदूषित नहीं होगी। पर ऐसा नहीं हुआ। राजधानी में दिवाली पर पदूषण का
स्तर पिछले साल के मुकाबले ज्यादा रहना इस बात का सबूत है कि दिल्ली वाले पटाखे जलाने
को लेकर जागरुक नहीं हुए हैं। खुद की सेहत से खिलवाड़ करने पर आमादा हैं। इस दिवाली
पर राजधानी में पदूषण के बीते तीन सालों का भी रिकार्ड टूट गया जबकि गुरुग्राम और फरीदाबाद
में भी सामान्य से छह गुणा अधिक पदूषण दर्ज किया गया। नोएडा और गाजियाबाद में भी वायु
पदूषण सामान्य दिनों के मुकाबले करीब तीन गुणा ज्यादा दर्ज किया गया। इस पदूषण के चलते
सोमवार सुबह दिल्ली-एनसीआर के कई स्थानों पर दृश्यता
100 से 200 मीटर के बीच दर्ज हुई। हालात इस कदर
बेकाबू रहे कि दिल्ली के अधिकांश हिस्से में रात 2 बजे तक पटाखें
की आवाज गूंजती रही। कहीं से भी किसी कार्रवाई की बात सामने नहीं आई। इससे साफ है कि
सुपीम कोर्ट के रात 10 बजे के बाद पटाखों को जलाने पर पाबंदी
को अमल में लाने के लिए पशासन की ओर से कोई पहल नहीं हुई। दिवाली पर दिल्ली में पदूषण
स्तर में करीब 21 गुणा वृद्धि होने के बाद केन्द्र ने पंजाब,
दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान
और उत्तर पदेश को समन भेजा है। 4 नवम्बर को इन राज्यों के संबंधित
सचिवों को पराली जलाने पर पतिबंध को पभावी रूप से लागू के संबंध में बुलाया गया। मंत्रालय
के मुताबिक दिल्ली और आसपास खुले में ठोस कचरा जलाना, दिल्ली
में वाहनों के ईंधन से उत्सर्जन, राष्ट्रीय राजधानी में सड़क
किनारे तथा निर्माण कार्य से धूल और दिल्ली के पड़ोसी राज्यों में पराली जलाना पदूषण
बढ़ने के पमुख कारण हैं। इन सब के बीच यह नहीं भूलना चाहिए कि पर्यावरण को साफ रखने
की जिम्मेदारी हम सभी की है। हर जगह दिवाली के दौरान पटाखे न जलाने की अपील की जा रही
थी तो क्या दिल्ली वालों को इसका एक बार भी ख्याल आया कि वह जो कर रहे हैं उससे सभी की सेहत पभावित होती है। लगता
है उन्हें इस बात की परवाह भी नहीं कि सुबह जब वह सैर करने निकलें तो उन्हें स्वच्छ
हवा मिले? क्या उन्हें याद नहीं कि पदूषण की वजह से
80 लोगों की रोजाना जान जाती है? क्या वे दिल्ली
हाईकोर्ट की उस टिप्पणी को भूल गए कि पदूषण की वजह से लोगों की आयु पांच वर्ष कम हो
रही है। हां, एक संतोष जरूर रहा कि इस दिवाली, दशहरे के सीजन में दिल्ली पुलिस की भूमिका सराहनीय रही, कोई भी आतंकी घटना नहीं हुई।
और चाइनीज पोडक्ट की बिकी में 60 पतिशत
कमी आई। इस दिवाली पर जवानों की बहादुरी पर बहुत से लोगों ने सलाम किया।
-अनिल नरेन्द्र
शिवराज की सर्जिकल स्ट्राइक पर सियासत
भोपाल
जेल से भागे सिमी के 8 आतंकियों
को पुलिस द्वारा आठ घंटे बाद ही एनकाउंटर में मार देने की खबर आग की तरह फैल गई। फैलनी
भी थी क्योंकि यह साधारण वाकया नहीं था। ऐसे खूंखार आतंकियों का पहली बार जेल से भागना और फिर एनकाउंटर
में मारे जाने की पकिया तो होनी ही थी। सवाल उठाए जा रहे हैं कि पुलिस ने इन आतंकियों
का फर्जी एनकाउंटर करके मार गिराया? सवाल यह भी उठाया जा रहा
है कि एक साथ जेल से इतनी संख्या में आतंकी कैसे भागे ? 10 किलोमीटर दूर तक कैसे पहंचे? एक ही जगह कैसे मिल गए? उन्होंने जीन्स,
जूते, घड़ियां कहां पहनां? पुलिस का दावा
है कि उनके पास तीन चाकू और देसी कट्टे भी मिले? यह सवाल अपनी
जगह सही भी है। जिस तरह यह समझना मुश्किल है कि पहले भी जेल से फरार हो चुके सिमी के
खूंखार आतंकियों को उनके शातिर साथियों के साथ एक ही वैरक में क्यों रखा गया?
यह उनकी मूर्खता या मजबूरी हो सकती है लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं होना
चाहिए कि ये सिमी के आतंकी थे। बिजनौर से मिली सूचना के अनुसार मध्यपदेश के भोपाल से
भागने के बाद पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे गए पतिबंधित गुट सिमी के आठ आतंकियों में
से चार काफी समय तक बिजनौर में रह रहे थे और बम बनाने के पयास में विस्फोट होने पर
फरार हो गए थे। जिस जेल में सिमी के खूंखार आतंकी कैद हों, उसकी
व्यवस्था इतनी लचर कैसे थी कि एक सुरक्षा पहरी का गला रेत कर आतंकी चादरों को बांध कर जेल लांघ
गए। भूलना नहीं चाहिए, महज तीन वर्ष पूर्व मध्यपदेश के ही खंडवा
के जेल से सिमी के कुछ आतंकी ठीक इसी तरह फरार हो गए थे, जिसमें
तीन मुठभेड़ में मारे गए, तीन संदिग्ध आतंकी भी शामिल थे। कांग्रेस
सहित कई विपक्षी दल इस मुठभेड़ पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन इसका दूसरा पक्ष ये भी है
कि जेल से फरार होने के बाद ये आतंकी कई घंटे तक भटकते रहे, जिससे
इस आशंका से कैसे इनकार किया जा सकता कि वे किसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकते था,
सिमी की आतंकी गतिविधियों के बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है। जिसे
सितम्बर 2001 में अमेरिका में हुए आतंकी हमले के बाद आतंकी संगठन
के रूप में पतिबंधित किया गया था, वर्ष 2008 में उसे कुछ ढील जरूर दी गई थी, मगर उसके बाद उसका नाम
देश भर में हुई कई आतंकी हमलों और घटनाओं में आता रहा और उस पर फिर से पतिबंध लगा दिया
गया था जो अब भी लागू है। हालांकि यह पता नहीं चल सका कि मुठभेड़ की नौबत क्यों आई?
क्या वे हथियार से लैस थे अगर थे तो क्या उनके पास बम-बंदूक थे? इन सवालों का जवाब जितनी जल्दी आए उतना ही
अच्छा। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक संदिग्ध आतंकियों की मौत पर राजनीतिक रोटियां सेंकने
से बचा नहीं जा सकता। वैसे ऐसी घटना पर किसी भी तरह के राजनीतिक आरोप-पत्यारोप लगाने से बेहतर है कि पहले राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) जिसे जांच का जिम्मा सौंपा गया है की,
रिपोर्ट का इंतजार किया जाए। जेल से भागे संदिग्ध आतंकियों के साथ हुई
मुठभेड़ की सच्चाई कुछ भी हो, यह स्पष्ट है कि वे बेहद शातिर और खूंखार थे।
इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पतिबंध के दौर में ही सिमी ने खुद को न केवल इंडियन
मुजाहिद्दीन में तब्दील कर लिया था बल्कि
दायरा भी बढ़ा लिया था। भोपाल में ढेर किए गए आठ में से तीन कुछ
वर्ष पहले अपने कई सथियों के साथ सनसनीखेज तरीके से खंडवा जेल से फरार हुए थे। वहां
से भागने के बाद उन्होंने देश के अनेक हिस्सों में कई आतंकी वारदातों को अंजाम दिया
था। उन्होंने बम विस्फोट
किए, बैंक लूटे और आतंकरोधी
दस्ते के पुलिस कर्मियों की हत्याएं कीं। वे जेहादियों की भर्तियां भी कर रहे थे और
राष्ट्रीय स्तर पर कई नेताओं की हत्या करने की फिराक में भी थे। यह भी साफ है कि अति
सुरक्षित मानी जाने वाली भोपाल केन्द्राrय कारागार में ऐसे खूंखार
आतंकियों पर जितनी और जिस तरह से निगरानी रखी जानी चाहिए, नहीं
रखी गई। सवाल यह भी है कि अगर आतंकवादियों को न्यायालय सजा दे सकता है लेकिन सजा कटेगी तो
जेल में ही। ऐसे में भोपाल केन्द्राrय कारागार की यह घटना भयभीत
करने वाली है।
Wednesday, 2 November 2016
न्यायपालिका-कार्यपालिका आमने-सामने
कोलेजियम
की सिफारिशों के बावजूद केंद्र सरकार की ओर से हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति में देरी
पर सुप्रीम कोर्ट ने जबरदस्त नाराजगी जाहिर की है। इस नाखुशी को कुछ हद तक समझा भी
जा सकता है। हमारे यहां की अदालतों में जजों की कमी इतनी बड़ी समस्या है कि इस वजह
से मुकदमों की सुनवाई में वर्षों-दशकों लग जाते हैं। केंद्र से खफा सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक शुक्रवार को पूछ
लिया कि क्या सरकार देश में न्याय-व्यवस्था पर ताले जड़ना चाहती
है? क्या इसका इरादा पूरी न्यायिक व्यवस्था तबाह करने की है?
न्यायपालिका और कार्यपालिका के मौजूदा गतिरोध को देखकर यही कहा जा सकता
है कि कोलेजियम प्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सैद्धांतिक तौर पर स्वीकार करने
के बावजूद सरकार व्यावहारिक तौर पर उसे मानने को तैयार नहीं दिखती। सरकार ने नियुक्ति
प्रणाली के प्रपत्र (एमओपी) पर सहमति न
बनने के कारण कोलेजियम की तरफ से नौ माह पहले भेजे गए 77 नामों
में से अभी तक 18 नाम ही अनुमोदित किए हैं। सुप्रीम कोर्ट बार-बार सरकार को चेता रहा है कि प्रक्रिया पत्र पर अगर सहमति नहीं बनती तो क्या
सरकार नियुक्तियों को रोके रखेगी? दरअसल केंद्र सरकार ने न्यायिक
नियुक्तियों में पारदर्शिता के लिए पिछले साल कोलेजियम प्रणाली की जगह न्यायिक नियुक्ति
आयोग का गठन किया था। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इसे इस आधार पर खारिज कर दिया कि
जज चुनने की व्यवस्था में सरकार की भूमिका न्यायपालिका से अधिक हो जाएगी। चूंकि सुप्रीम
कोर्ट किसी को भी जवाब-तलब कर सकता है और उसे फटकार भी लगा सकता
है इसलिए आए दिन कोई न कोई उसकी फटकार के निशाने पर होता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि अन्य संवैधानिक संस्थाओं के मुकाबले उसकी जवाबदेही
कम हो जाती है। उसे सवाल करने के साथ ही सवाल सुनने भी चाहिए और उनका जवाब भी देना
चाहिए। वह इससे अच्छी तरह अवगत है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में गतिरोध
की एक वजह मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर को अंतिम रूप न दिया जाना भी है। मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर
न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित है और उसकी आवश्यकता इसलिए पड़ी,
क्योंकि न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी संविधान संशोधन कानून को खारिज
करने के बाद खुद सर्वोच्च न्यायालय ने यह मान लिया था कि कोलेजियम व्यवस्था में
कुछ खामियां हैं। इन खामियों को दुरुस्त करने के लिए उसने ही सरकार को मेमोरेंडम ऑफ
प्रोसिजर बनाने का निर्देश दिया था। जब सरकार ने उसे इस हिसाब से तैयार किया कि न्यायाधीशों
की नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी बने तो सुप्रीम कोर्ट को उसके कड़े प्रावधान रास नहीं
आए तब से यह मामला अधर में पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजों की मौजूदा संख्या
आवश्यकता से 60 प्रतिशत से भी कम है जो मुकदमों के फैसलों में
देरी का बड़ा कारण है। अदालत ने यह भी कहा है कि पहले जज ज्यादा थे और उनके लिए अदालत
कक्ष नहीं थे। आज जजों की कमी के कारण अदालतों में ताले लगे रहते हैं। अभी मद्रास,
केरल, चंडीगढ़ और झारखंड के हाई कोर्टों में
26 जजों की नियुक्ति जल्दी से जल्दी होनी है, लेकिन
सरकार इस पर तत्परता नहीं दिखा रही है। स्पष्ट तौर पर मौजूदा सरकार और न्यायपालिका
के रिश्ते उसी तरह बिगड़ रहे हैं जिस तरह से इंदिरा गांधी के कार्यकाल में बिगड़ गए
थे और इसका कितना बड़ा खामियाजा देश को भुगतना पड़ा था। हम उम्मीद करते हैं कि दोनों
पक्ष मिल-बैठकर, सहमति से इस समस्या को
निपटाएं। इस मामले में अटार्नी जनरल द्वारा अदालत को दिए गए आश्वासन के बाद क्या उम्मीद
करें कि जजों के रिक्त पदों को भरने की दिशा में सरकार अविलंब कदम उठाएगी।
-अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान ने युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी है
भारत द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तानी
सेना बौखला गई है। पाकिस्तान ने सारी हदें पार कर दी हैं और सीमा पर युद्ध जैसे हालात
बना दिए हैं। सीमावर्ती गांवों में निरंतर गोलाबारी से हालात मुश्किल होते जा रहे हैं।
पाकिस्तानी सेना की गोलाबारी की आड़ में भारत में घुसे आतंकियों ने एक बार फिर बर्बरता
की सारी हदें पार कर दी हैं। उन्होंने जम्मू-कश्मीर के माछिल सेक्टर में मुठभेड़ में शहीद हुए भारतीय जवान मनदीप सिंह का
शव बुरी तरह से क्षत-विक्षत कर दिया। रक्षा विशेषज्ञ पाकिस्तान
की बार्डर एक्शन टीम (बैट) को इस वहशियाना
व कायराना हरकत का मास्टरमाइंड मान रहे हैं। बैट पाकिस्तानी सेना का विशेष दस्ता है
जिसमें सैनिकों के साथ पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई प्रशिक्षित आतंकी भी शामिल हैं। यह
भारत-पाक सरहद पर छापामार युद्ध में स्पेशल सर्विस ग्रुप (एसएसजी) के साथ काम करता है। आईएसआई सरकारी खेमे की अहम
सूचनाएं जुटाने के लिए भी इसकी मदद लेती है। पाक आतंकियों ने शुक्रवार को एलओसी पर
हमला किया। कुपवाड़ा के माछिल सेक्टर में घुसपैठ कर रहे आतंकियों से मुठभेड़ में सेना
का एक जवान मनदीप सिंह शहीद हो गया। एक आतंकी भी मारा गया। पर आतंकियों ने भागने से
पहले शहीद सैनिक के शव को क्षत-विक्षत कर उसका सिर भी काट दिया।
इस दौरान पाक सेना की पोस्ट से आतंकियों को कवर फायर दिया जा रहा था। हालांकि भारतीय
सेना ने शहीद का सिर काटे जाने की पुष्टि नहीं की है। लेकिन कहा कि इस बर्बरता का बदला
जरूर लिया जाएगा। सर्जिकल स्ट्राइक के ठीक महीने भर बाद पाक ने यह हरकत की है। लगातार
सीजफायर तोड़ना पाकिस्तान को भारी पड़ रहा है। बीएसएफ के एडीजी अरुण कुमार ने बताया
कि भारत की जवाबी कार्रवाई में एक हफ्ते में 15 पाकिस्तानी रेंजर
मारे गए हैं। उन्होंने बताया कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पाक को 10 गुना ताकत से जवाब देने का आदेश दे रखा है। पाकिस्तानी सुरक्षा बल फायरिंग
की आड़ में आतंकवादियों को भेज रहा है। सीमा पार भारी नुकसान झेल रहे पाक रेंजर्स बौखलाहट
में हैं। अब वह सुरक्षा बलों को अधिक से अधिक नुकसान पहुंचाने की फिराक में हैं। रक्षा
सूत्रों के अनुसार सांबा सेक्टर में पाक को भारी क्षति हो रही है। घुसपैठ भी नाकाम
है। घुसपैठ न होने से बौखलाई पाक सेना अब शार्प शूटरों की मदद ले रही है। भारत की जबरदस्त
जवाबी कार्रवाई से हमें उम्मीद थी कि शायद पाकिस्तान अब अपनी हरकतों से बाज आए?
पर ऐसा नहीं होता प्रतीत हो रहा है। लेकिन पड़ोसी देश इससे सबक लेने
को तैयार नहीं हैं। उसने सीमा पर फौज की तैनाती बढ़ा दी है और युद्ध जैसे हालात पैदा
कर दिए हैं।
Tuesday, 1 November 2016
इस बार सर्दी और कोहरा ज्यादा रहने की संभावना
राजधानी
दिल्ली में सोमवार को मौसम का मिजाज बदला नजर आया। हवा की थमी रफ्तार के साथ-साथ प्रदूषण के स्तर में जहां कुछ कमी
दिखी वहीं न्यूनतम तापमान बीते दिनों के मुकाबले अधिक दर्ज हुआ। ग्लोबल वार्मिंग के
खिलाफ मुहिम के बीच सितम्बर 2016 ने सर्वाधिक तापमान का नया रिकार्ड
बनाया है। नासा ने मंगलवार को कहा कि पिछला माह 136 वर्षों में
सर्वाधिक गर्म यानी सितम्बर रहा है। नासा का कहना है कि इससे पहले 2014 का सितम्बर सर्वाधिक गर्म रहा था, लेकिन इस साल
2014 के मुकाबले 0.004 डिग्री तापमान ज्यादा रहा,
लेकिन इस बढ़ोतरी को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। वैसे राहत की थोड़ी
यह बात है कि मानसून देरी से आने और अच्छी बारिश के चलते इस बार दिल्लीवासियों को सर्दी
और कोहरा ज्यादा सताएगा। मौसम के जानकारों के मुताबिक नवम्बर के दूसरे सप्ताह से ही
घना कोहरा दर्ज हो जाएगा। इसके साथ ठंड भी अधिक पड़ सकती है। अमेरिकी संस्था एक्यूवेदर
के वरिष्ठ मौसम वैज्ञानिक एलेक्स सास्नोविस्की सान्सनोर्विवस्की के अनुसार पिछले कुछ
वर्षों से भारत के विभिन्न हिस्सों में सामान्य से काफी कम बारिश हो रही थी। इस बार
सभी जगहों पर अच्छी बारिश हुई है। इसका प्रभाव सर्दी पर साफ दिखाई देगा। पहाड़ों पर
अच्छी बर्प पड़ने की संभावना है। दिल्ली में सोमवार को आसमान साफ रहा। उत्तर की ओर
से आने वाली हवाओं के चलते न्यूनतम तापमान लगभग 18 डिग्री सेल्सियस
रहा। इससे सुबह-शाम ठंड महसूस की गई। उधर वायु प्रदूषण पर काम
करने वाले सीएसई के सीनियर रिसर्चर विवेक चट्टोपाध्याय के अनुसार सर्दी में वायुमंडल
में मौजूद प्रदूषण तत्व लंबे समय तक हवा में फंसे रहते हैं। रात के समय हवा में प्रदूषण
का स्तर काफी अधिक बढ़ जाता है। इस वर्ष यदि कोहरे व ठंड में वृद्धि होती है तो लोगों
को प्रदूषित हवा से भी जूझना पड़ेगा। नासा की ओर से जारी की गई तस्वीरों के अनुसार
हरियाणा व पंजाब में बड़े पैमाने पर धान की पराली जलाई जा रही है। इससे निकलने वाला
धुआं अगले कुछ सप्ताह में दिल्ली की हवा में प्रदूषण के स्तर को पांच गुना से अधिक
बढ़ा सकता है। नासा के वेब फायर मैप में लाल रंग के बिन्दुओं को दिखाया गया है जिससे
पराली के जलाए जाने के स्थानों का पता चलता है। छह अक्तूबर से पहले तक ये लाल बिन्दु
उत्तरी पंजाब की सीमा से लगे क्षेत्रों में केंद्रित थे, लेकिन
अब इसका विस्तार दिल्ली से सटे क्षेत्रों तक फैल गया है। दिल्ली सरकार ने पड़ोसी राज्यों
को फसलों के अवशेष जलाने पर लगाम लगाने के लिए उचित कदम उठाने के लिए पत्र लिखा है।
इस समय सुबह और शाम के वक्त गुलाबी ठंड का अहसास होना शुरू हो गया है। मौसम विभाग के
वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान में गिरावट से लग रहा है कि सर्दी ने दस्तक दे दी
है।
-अनिल नरेन्द्र
पाक का पुराना पैंतरा पहले जासूसी फिर सीनाजोरी
जम्मू-कश्मीर में सीमा पार से लगातार जारी गोलाबारी के बीच गुरुवार को दिल्ली स्थित
पाक उच्चायोग के एक अधिकारी को जासूसी करने के आरोप में पकड़ा गया। भारत में पाकिस्तानी
और पाकिस्तान में भारतीय जासूस का पकड़ा जाना कोई नई घटना नहीं है, हर दो-चार महीनों में ऐसी घटनाएं हो ही जाती हैं लेकिन
दोनों देशों के बीच तनाव के इस दौर में ऐसी गतिविधियां बेहद घातक हो सकती हैं। यह पहला
मौका नहीं है जब पाकिस्तान के किसी राजनयिक को जासूसी के आरोप में देश से बाहर किया
गया हो। पहले भी पाक अधिकारियों व कर्मचारियों को सर्सोना नान ग्राटा यानी देश में
अनाधिकृत व्यक्ति के तहत वापस भेजा जा चुका है। इतिहास में कई मामले दर्ज हैं,
जब पाक ने प्रतिक्रिया में भारतीय अधिकारियों को बेवजह वापस भेजा। राजधानी
दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायुक्त में कार्यरत महमूद अख्तर को जासूसी के आरोप में उस
वक्त गिरफ्तार किया गया, जब वह राजस्थान के दो निवासियों के साथ
सरहद और बीएसएफ से संबंधित अत्यंत गोपनीय दस्तावेजों की सौदेबाजी कर रहा था। यानी साफ
है कि उड़ी हमले के बाद भारतीय सैन्य बलों की नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार आतंकी शिविरों पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक
की कार्रवाई और राजनयिक स्तर पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने के
बावजूद इस पड़ोसी मुल्क की भारत के खिलाफ साजिश रचने वाली आतंकी मशीनरी को कोई खास
फर्प नहीं पड़ा लगता है। निश्चित रूप से यह चिन्ता की बात है कि उसके साथ ही कुछ भारतीयों
को भी गिरफ्तार किया गया है, जिनकी भूमिका के बारे में जांच से
पता चलेगा। जाहिर है कि सीमा पर घुसपैठ की गतिविधियां स्थानीय लोगों की मिलीभगत के
बिना नहीं हो सकतीं और पाक फौज और आईएसआई इस काम को बखूबी अंजाम देती है। आईएसआई की
गतिविधियों के संचालन के लिए पाकिस्तानी उच्चायोग के अधिकारी से लेकर गैर सरकारी स्तर पर लोग सक्रिय
रहते हैं। देश बदर किया गया पाक राजनयिक अधिकारी महमूद अख्तर बलूचिस्तान में तैनात
पाक फौज का हवलदार बताया जाता है। उसकी कार्यकुशलता देखकर उसे आईएसआई ने अपने काम में
लगाया था। आईएसआई की यह विशिष्टता है और इसी के बूते पर वे आतंकवाद को एक हथियार बनाकर
कई देशों में अस्थिरता पैदा करते हैं। देश की सुरक्षा से जुड़े इस मामले में केंद्र
की कठोर ना]ित के चलते इस बात के लिए जरूर आश्वस्त हुआ जा सकता है कि इस साजिश में
जो लोग भी शामिल होंगे, उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। विगत तीन वर्षों
के दौरान 46 पाकिस्तानी एजेंटों को देश के विभिन्न हिस्सों से
गिरफ्तार किया जा चुका है। ताजा मामला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि
पहली बार इतने स्पष्ट तौर पर पाक उच्चायोग की भारत के खिलाफ भूमिका उजागर हुई है। वरना
अभी तक वह अलगाववादियों को प्रश्रय देने और उनकी मेजबानी करने तक सीमित रहा है।
Subscribe to:
Posts (Atom)