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Wednesday, 17 April 2019

द्रविड़ राजनीति के गढ़ में सेंध लगाने के प्रयास

राष्ट्रीय राजनीति में धाक जमाने के बावजूद देश की दो प्रमुख पार्टियां कांग्रेस और भाजपा तमिलनाडु में पैठ बनाने की कोशिश में लगी हुई हैं। इस बार दोनों ही दल क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर तमिलनाडु में अपनी जमीन पुख्ता करने की कोशिश में जुटी हैं। देखा जाए तो इस बार के लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु का परिदृश्य रोचक बनता जा रहा है। क्योंकि यह पहली बार होगा जब प्रमुख क्षेत्रीय दल अन्नाद्रमुक और द्रमुक अपने सबसे प्रभावशाली चेहरे जे. जयललिता और एम. करुणानिधि के बिना लोकसभा चुनाव में उतरेंगी। हालांकि दोनों पार्टियों ने इस दौरान अपने वारिस चुने हैं, लेकिन सामने अभी इस विरासत को बरकरार रखने की चुनौती है। ऐसे में एक ओर प्रमुख द्रविड़ दलों द्रमुक और अन्नाद्रमुक के समक्ष खुद की साख बचाने की चुनौती है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस और भाजपा इसे प्रमुख द्रविड़ दलों के सहारे तमिल राजनीति में पैठ बनाने के मौके के तौर पर देख रहे हैं। तमिलनाडु के मतदाताओं की एक खूबी रही है जिसे अपनाते हैं जीभर कर उसकी झोली भरते हैं। पिछली बार अन्नाद्रमुक को यहां से 37 सीटें मिली थीं। दूसरे चरण में 18 अप्रैल को 13 राज्यों की 97 लोकसभा सीटों पर हो रहे चुनाव में तमिलनाडु की 39 सीटें यूपीए की उम्मीदों का बड़ा गढ़ है। दक्षिण के इस किले में भारतीय जनता पार्टी के सहयोगियों के साथ सेंधमारी से रोकने के लिए यूपीए का कुनबा पूरा जोर लगा रहा है। तमिलनाडु में द्रमुक और कांग्रेस का गठजोड़ यहां की 39 सीटों और पुडुचेरी की एक सीट को निचले सदन में अपना संख्या बल बढ़ाने के लिहाज से काफी अहम मान रहा है। तमिलनाडु-पुडुचेरी को मिलाकर 48 सीटों में से द्रमुक 20 सीटों पर कांग्रेस 10 और अन्य सीटों पर उसके दूसरे सहयोगी लड़ रहे हैं। भाजपा ने अन्नाद्रमुक के साथ इस बार गठबंधन किया है, पिछले चुनाव में भाजपा ने कन्याकुमारी सीट जीती थी। इस बार भाजपा पांच सीटों पर लड़ेगी और अन्नाद्रमुक के साथ पीएमके और डीएमडीके जुड़े हैं। दरअसल लंबे समय के बाद तमिलनाडु का चुनाव बड़े क्षेत्रीय क्षत्रपों की गैर-मौजूदगी में हो रहा है। जानकार मानते हैं कि अन्नाद्रमुक प्रमुख रहीं जयललिता और द्रमुक के सर्वेसर्वा रहे एम. करुणानिधि की मृत्यु के बाद तमिलनाडु की सियासत में एक शून्य-सा नजर आ रहा है। अन्नाद्रमुक और द्रमुक दोनों ही दलों का मौजूदा नेतृत्व अपने पुराने सूरमाओं की लोकप्रियता के आसपास भी नहीं है। दोनों तरफ अंदरूनी जद्दोजहद चरम पर है। ऐसे में सूबे के लोग किस पर करुणावान होंगे कहना मुश्किल है। फिलहाल जानकारों का मानना है कि इस बार उलटफेर भी हो सकता है। कर्नाटक को छोड़ दें तो भाजपा के हिन्दुत्व की अपील का दक्षिण भारत में कभी भी ज्यादा असर नहीं रहा। हिन्दी को बढ़ावा देने का मामला या फिर जनसंख्या और उपयोग के आधार पर राजस्व के बंटवारे का प्रयास हो, केंद्र के यह प्रयास दक्षिण भारत को कभी पसंद नहीं आए। इस चुनाव में द्रमुक का पलड़ा भारी लगता है और इसी वजह से यहां कांग्रेस को फायदा हो सकता है। भाजपा और अन्नाद्रमुक गठबंधन क्या द्रविड़ राजनीति के गढ़ में सेंध लगा पाएगा यह तो चुनाव परिणाम आने का बाद ही पता चलेगा?

-अनिल नरेन्द्र

पानी-किसानों की आत्महत्या यहां सबसे बड़ा मुद्दा है

महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटें 2019 चुनाव में विशेष महत्व रखती हैं। 2014 के चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबंधन को कुल 48 सीटों में से 42 पर विजय मिली थी। कांग्रेस के पाले में कुल दो सीटें आई थीं जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) ने चार सीटों पर जीत दर्ज की थी। महाराष्ट्र में मराठवाड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। लातूर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार वोट डालने वाले युवाओं से सेना के पराक्रम के नाम पर अपना वोट समर्पित करने की बात कही थी। वोट किसे देंगे... पर बात चली तो एक ग्रामीण उत्तेजित होकर बोला... सेना में मरने वाले जवान भी हमारे और उपज न होने से आत्महत्या करने वाले किसान भी हमारे। यह कैसा जय जवान-जय किसान है? पानी यहां सबसे बड़ा मुद्दा है। मराठवाड़ा के हर गांव में आप सूखे कुएं, पानी के लिए कतारें और सिर पर मटके रखकर कोसों दूर से पानी लाती महिलाओं को देख सकते हैं। यकीनन, यह पानी ही है जो 2019 लोकसभा चुनाव में सत्ताधारियों के चेहरे पर पानी उतार सकता है, भाजपा-शिवसेना गठबंधन की उम्मीदों पर पानी फेर सकता है। मराठवाड़ा से देश को कई बड़े नेता मिले हैं। दो बार मुख्यमंत्री रह चुके विलासराव देशमुख भी लातूर से आते थे। पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल भी। भाजपा के दिवंगत नेता गोपीनाथ मुंडे, प्रमोद महाजन, भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष राव साहेब सहित कई दिग्गजों का घर है मराठवाड़ा। इसके बावजूद यह इलाका पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता है। मराठवाड़ा में लोकसभा की आठ सीटें हैं और यह इलाका कांग्रेस का गढ़ रहा है। 2014 में मोदी लहर के बावजूद कांग्रेस ने प्रदेश में जो दो सीटें जीतीं, वह मराठवाड़ा की ही थीं। मराठवाड़ा की छह सीटोंöहिंगोली, नांदेड़, परभणि, उस्मानाबाद और लातूर में 18 अप्रैल को मतदान होगा। अन्य दो सीटोंöजालना और औरंगाबाद में 23 अप्रैल को मतदान है। औरंगाबाद में मुस्लिम, बौद्ध, मराठा, ओबीसी मतों में स्पष्ट विभाजन दिखता है, यह शिवसेना का गढ़ है। मुस्लिम वोटों की ज्यादा तादाद होने से यहां शिवसेना-भाजपा को थोड़ा खतरा जरूर है। शिवसेना ने मौजूदा सांसद चन्द्रकांत खैर को फिर से उतारा है, जबकि कांग्रेस से सुभाष झांवड को उतारा है, वंचित बहुजन आधाड़ी और एमआईएम ने मौजूदा विधायक इम्तियाज जलील को। मुस्लिम वोट बैंक को देखें तो इम्तियाज सबके लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरेंगे। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष राव साहेब दानवे के दामाद हर्षवर्धन यहां निर्दलीय उम्मीदवार हैं। चन्द्रकांत खैर और कांग्रेस की चिन्ता हैं मतों के विभाजन होने की। सबसे रोचक मुकाबला यहीं है। लातूर में भाजपा और कांग्रेस दोनों के ही उम्मीदवार बाहरी हैं। भाजपा ने सुधाकर श्रृंगारे और कांग्रेस ने मच्छिद्र कॉमत को उतारा है, दोनों में सीधा मुकाबला है। दोनों ही मुंबई से हैं, ऐसे में लोकल काडर में नाराजगी है। नांदेड़ से कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अशोक चव्हाण मैदान में हैं। उनके सामने भाजपा के प्रताप पाटिल हैं। बसपा-सपा गठबंधन और वंचित बहुजन आधाड़ी के उम्मीदवार कांग्रेस के वोट बैंक को नुकसान पहुंचा सकते हैं। कुल मिलाकर यहां अधिकतर सीटों पर भाजपा-कांग्रेस का मुकाबला है। पानी और किसानों की आत्महत्या सबसे बड़ा मुद्दा है। देखें, ऊंट किस करवट बैठता है।

Tuesday, 16 April 2019

सत्ता और सिने कलाकारों का चुनाव में मिलन

हर बार की तरह इस बार भी लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों से चुनाव समर में पर्दे के स्टार किस्मत आजमा रहे हैं। अगर उत्तर प्रदेश की बात करें तो हेमा मालिनी, जया प्रदा और राज बब्बर प्रमुख हैं। हालांकि यह तीनों पहले भी चुनाव लड़ चुके हैं। उत्तर प्रदेश की मथुरा संसदीय क्षेत्र में क्या इस बार सपा-बसपा व रालोद गठबंधन ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी के ग्लैमर को भेद पाएगा, यह सवाल गठबंधन नेताओं के लिए भी चुनौती बन गया है। मथुरा संसदीय क्षेत्र में इस बार 18 अप्रैल को मतदान होगा। यहां भाजपा की मौजूदा सांसद हेमा मालिनी का मुकाबला सपा-बसपा व रालोद के संयुक्त प्रत्याशी पुंवर नरेंद्र सिंह से है। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने यहां से चुनाव मैदान में उतरे रालोद प्रत्याशी जयंत चौधरी का समर्थन किया था, लेकिन इस बार कांग्रेस ने यहां से महेश पाठक को चुनाव मैदान में उतारा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के साथ-साथ यहां ड्रीम गर्ल का जादू लोगों पर जमकर चला था और उन्होंने कुल 5,74,633 मत हासिल कर शानदार विजय हासिल की थी। उन्होंने जयंत चौधरी को 3,30,743 मतों के भारी अंतर से हराया था। हेमा के खिलाफ मथुरा के कुछ मतदाताओं की शिकायत है कि उन्होंने मथुरा को इतना समय नहीं दिया जिसकी आवश्यकता थी। फिर 2019 में मोदी लहर भी घटी है। हेमा को अपने दम-खम पर ही सीट निकालनी होगी। उत्तर प्रदेश में दूसरे चरण का मतदान 18 अप्रैल को होना है और इसी चरण में फतेहपुर सीकरी और मथुरा लोकसभा का चुनाव होना है। फतेहपुर सीकरी से उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और सिने स्टार राज बब्बर किस्मत आजमा रहे हैं। राज बब्बर आगरा और फिरोजाबाद से लोकसभा सदस्य और उत्तर प्रदेश कोटे से राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं। 2014 में राज बब्बर गाजियाबाद में चुनाव लड़ने गए, जहां भाजपा के वीके सिंह ने उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक मतों से जीत का रिकॉर्ड बनाया। फतेहपुर सीकरी में 2014 के चुनाव में भाजपा के बाबू लाल चौधरी जीते थे, लेकिन इस बार उनका टिकट कट गया है। भाजपा के राज कुमार चाहर और सपा-बसपा गठबंधन से (बसपा) पूर्व विधायक भगवान शर्मा उर्प गुड्डू पंडित किस्मत आजमा रहे हैं। आजमगढ़ में पिता मुलायम सिंह यादव की विरासत को हासिल करने के लिए इस बार सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद मैदान में हैं। वहां छठे चरण में 12 मई को मतदान होगा। रामपुर में मौजूदा सांसद नेपाल सिंह का टिकट काटकर भाजपा ने सिने अभिनेत्री और पूर्व सांसद जया प्रदा को मैदान में उतारा है। उनका मुकाबला सपा सरकार के कई बार मंत्री रहे रामपुर के विधायक मोहम्मद आजम खान से है। रामपुर में कांग्रेस ने संजय कपूर को मौका दिया है। जया प्रदा का मुकाबला दिग्गज आजम खान से सीधे होने की वजह से रोमांचक हो गया है। जया प्रदा 2004 और 2009 में रामपुर में  बेगम नूर बानो को दो बार पटखनी दे चुकी हैं। 2014 में वह बिजनौर से हार गई थीं। तब वह अमर सिंह के साथ बगावत कर सपा से निकली थीं और रालोद के टिकट पर मैदान में उतरी थीं। मथुरा के गांवों में फसल काट ली हेमा मालिनी ने तो बेगूसराय में कन्हैया के पक्ष में खड़ी स्वरा भास्कर। कलाकारों के एक समूह ने मौजूदा सरकार को वोट नहीं देने की अपील की तो दूसरा खेमा मोदी के पक्ष में वोट देने की अपील करता नजर आ रहा है। सत्ता और सिनेमा में लोकप्रियता का मिलन हर चुनाव में दिखता है। 2019 में कोई भिन्न नहीं है।

-अनिल नरेन्द्र

क्या स्मृति कांग्रेसी गढ़ अमेठी में राहुल को चुनौती दे पाएंगी?

अमेठी संसदीय क्षेत्र, जिसका नाम आते ही गांधी परिवार का जिक्र स्वाभाविक रूप से आ जाता है। 1980 में संजय गांधी की जीत के साथ शुरू हुआ यह सिलसिला राजीव, सोनिया से होते हुए राहुल तक आ चुका है। यहां गांव-गांव में जनता की स्मृति में गांधी परिवार के सदस्यों से जुड़े तमाम किस्से-कहानियां हैं। अमेठी की इस पहचान में 21 साल पहले हालांकि केसरिया रंग भी घुला था, जब 1998 में भाजपा प्रत्याशी संजय सिंह ने कांग्रेस के कैप्टन सतीश शर्मा को हराया था। हालांकि अगले साल ही सोनिया गांधी ने खुद मोर्चा संभालकर कांग्रेस की यह खानदानी सीट जीत ली थी। अमेठी के इस कांग्रेसी किले को 2014 के चुनाव में बेहद कड़ी चुनौती मिली, जब भाजपा से स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी के सामने मोर्चा लिया। मुकाबला तगड़ा रहा और जीत का अंतर तुलनात्मक रूप से कम रहा। 2014 में राहुल गांधी को 46.71 प्रतिशत 4,08,651 वोट मिले जबकि स्मृति ईरानी को 34.38 प्रतिशत और 3,00,748 वोट मिले थे। 1,07,903 वोट से ही जीत सके थे राहुल गांधी। पांच साल बाद वही किरदार आमने-सामने हैं। स्मृति को राहुल के साथ ही गांधी परिवार से मिली अमेठी की पहचान से भी लड़ाई लड़नी पड़ रही है। स्मृति ने केंद्रीय मंत्री रहते कांग्रेस के इस किले में अपना चिराग जलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसी अवधि में अध्यक्ष बनने के बाद राहुल की बढ़ी राजनीतिक परिपक्वता का गवाह भी यह क्षेत्र है। सपा-बसपा गठबंधन ने नए सियासी शिष्टाचार के तहत अमेठी से प्रत्याशी नहीं उतारा। 2014 के चुनाव में आप पार्टी के कुमार विश्वास भी खड़े हुए थे और उन्हें 2.92 प्रतिशत और 25,527 वोट मिले थे। बसपा के उम्मीदवार धर्मेंद्र प्रताप सिंह को 6.60 प्रतिशत और 57,716 वोट मिले थे। अमेठी से बसपा-सपा गठबंधन द्वारा अपना उम्मीदवार न उतारने से राहुल गांधी को जरूर राहत मिली है। लेकिन एक परिवर्तन स्पष्ट हैöअमेठी में गांधी परिवार के मुरीद बहुत हैं तो मोदी की भाजपा के कद्रदान भी कम नहीं। हाल ही में अमेठी में रोड शो के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के चेहरे पर हरी लेजर लाइट दिखने के बाद पार्टी ने उनकी सुरक्षा पर सवाल उठा दिए। अंदेशा जताया गया कि लेजर लाइट स्नाइपर गन जैसे किसी हथियार की हो सकती है। लेकिन गृह मंत्रालय ने राहुल की सुरक्षा में चूक से इंकार करते हुए बताया कि यह लेजर लाइट कांग्रेस के ही एक फोटोग्राफर के मोबाइल कैमरे की थी। स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) की सुरक्षा प्राप्त राहुल गांधी के साथ यह घटना तब हुई जब वह अपना नामांकन करने के बाद पत्रकारों से  बात कर रहे थे। उसी दौरान उनके चेहरे पर हरे रंग की लेजर लाइट नजर आई। इस बारे में कांग्रेस का एक लेटर और वीडियो सामने आया, जिसमें कहा गया कि कम से कम सात बार हरी लाइट राहुल के चेहरे पर दिखाई दी। हमें लगता है कि यह लेजर लाइट स्नाइपर की हो सकती है। कैमरे के फ्लैश की लाइट ऐसी नहीं होती। हो सकता है कि यह ट्रायल रन रहा हो और राहुल की सुरक्षा प्रबंधों को देखने के लिए की गई है। जो भी हो राहुल को अपनी सुरक्षा पर खास ध्यान देना होगा। ऐसी ही सुरक्षा की चूक के कारण ही उनके पिता राजीव गांधी की हत्या हुई थी।

Sunday, 14 April 2019

ईवीएम-वीवीपैट मिलान पर आपत्ति?

सुप्रीम कोर्ट ने प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले हर विधानसभा क्षेत्र में पांच ईवीएम से वीवीपैट पर्चियों (वोटर वेरिफाइड पेपर ऑर्डर ट्रेल) का मिलान करने का आदेश दिया है, जिससे निर्वाचन प्रक्रिया की निष्पक्षता और मजबूत होगी। साथ-साथ यह आदेश इसलिए भी अहम है क्योंकि 11 अप्रैल से शुरू हुए लोकसभा चुनाव के पहले चरण से यह लागू हो गया है। अभी तक चुनाव आयोग प्रत्येक विधानसभा में एक मतदान केंद्र से वीवीपैट पर्चियों का मिलान करता था। अब उसे प्रत्येक विधानसभा के पांच मतदान केंद्रों का मिलान करना होगा। आखिर वीवीपैट से मिलान का उद्देश्य क्या है? इससे यह सत्यापित हो जाता है कि ईवीएम का आंकड़ा वीवीपैट में ही हूबहू मिल जाता है। अगर मिलान शत-प्रतिशत सही होता है तो फिर शंका का कोई कारण नहीं होना चाहिए। 21 विपक्षी दलों ने वीवीपैट से कम से कम 50 प्रतिशत ईवीएम के मिलान का आयोग को आदेश देने की अपील की थी। न्यायालय ने आयोग का पक्ष जाना और हर उस प्रश्न का जवाब दिया जो विपक्षी दल उठा रहे थे। चुनाव आयोग ने न्यायालय को स्पष्ट बताया कि ईवीएम बिल्कुल सुरक्षित प्रणाली है और इसमें छेड़छाड़ की संभावना पैदा नहीं होगी। बावजूद इसके विपक्ष अभी भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखता। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू ने मंगलवार को कहा कि वह वीवीपैट पर उच्चतम न्यायालय के फैसले से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं और चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि वीवीपैट पर्चियों के ईवीएम से मिलान में कोई अंतर न हो। उन्होंने सुझाया कि किसी तरह के अंतर आने पर चुनाव आयोग को देश में सभी वीवीपैट की गणना सुनिश्चित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हालांकि मैं पूरी तरह संतुष्ट तो नहीं पर कुछ नहीं से बेहतर है। बता दें कि पहली बार किसी लोकसभा चुनाव में वीवीपैट मशीनों का प्रयोग हो रहा है। हालांकि कुछ संसदीय एवं विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में इनका इस्तेमाल किया जा चुका है। किसी भी लोकतांत्रिक देश की मजबूती के लिए जरूरी है कि उसकी निर्वाचन प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष हो और इस मामले में भारत दुनिया में एक मिसाल है। ईवीएम के आगमन के बाद से चुनावी धांधलियों पर अंकुश लगा है। इसके बावजूद तमाम राजनीतिक दल ईवीएम को लेकर सवाल उठाते रहे हैं और उनके संदेह के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने ही 2013 में चुनाव आयोग को ईवीएम को वीवीपैट से जोड़ने के निर्देश दिए थे। पहली बार चुनाव में ऐसा हो रहा है। इसमें विपक्षी दलों के मतगणना एजेंट जिस भी ईवीएम को चाहें वीवीपैट से मिलान कर सकते हैं। वस्तुत चुनाव आयोग का तर्प था कि 50 प्रतिशत मिलान के मतगणना केंद्र का बहुत ज्यादा विस्तार करना होगा, गणनाकर्मियों की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी होगी और कई दिनों का समय लग जाएगा। परिणाम आने में चार से पांच दिन का समय लगने की बात आयोग ने न्यायालय को बताई। उम्मीद की जाती है कि 2019 का लोकसभा चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी होगा।
-अनिल नरेन्द्र



पहले चरण में कहीं झड़पें, ईवीएम पर हंगामा ः कुल मिलाकर सही रहा

लोकसभा चुनाव के पहले चरण में 11 अप्रैल, गुरुवार को 20 राज्यों की 91 सीटों पर चुनाव सम्पन्न हो गया। चढ़ते पारे के बावजूद मतदाताओं ने इसमें जमकर उत्साह दिखाया। चुनाव आयोग की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक बिहार में 2014 के मुकाबले करीब ढाई प्रतिशत अधिक मत पड़े। वहीं उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में पिछले चुनाव के मुकाबले कुछ कम मत पड़े, लेकिन आयोग ने कहा कि अंतिम आंकड़ों में दो से तीन प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो सकती है क्योंकि छह बजे के बाद भी कई जगह पर लोग लंबी कतारों में खड़े हुए थे। जम्मू-कश्मीर का बारामूला और जम्मू सीट पर आतंकियों की धमकियों को दरकिनार कर लोगों ने कतारों में खड़े होकर मतदान किया। दोनों सीटों पर पांच बजे तक करीब 57.31 प्रतिशत वोट पड़े। वहीं आतंक प्रभावित कुपवाड़ा में 51.7 प्रतिशत वोट पड़े। ईवीएम मशीनों की खराबी की शिकायतें यूपी के बिजनौर, महाराष्ट्र की छह सीटों पर और आंध्र प्रदेश तड़ीपात्री में टीडीपी और वाईएसआरसीपी के कार्यकर्ताओं में हुई झड़प में दो लोगों की मौत हो गई। आंध्र विधानसभा के स्पीकर कोडेला शिव प्रसाद घायल हो गए। यूपी के कैराना स्थित रसूलपुर गांव में बिना पहचान पत्र मतदान की कोशिश कर रहे लोगों को रोकने के लिए सुरक्षाबलों को हवाई फायरिंग करनी पड़ी। मतदान शुरू होने के कुछ देर बाद मुजफ्फर नगर से भाजपा प्रत्याशी संजीव बालियान ने आरोप लगाया कि कुछ लोग बुर्के में आकर फर्जी मतदान कर रहे हैं। बसपा नेता सतीश चन्द्र मिश्रा ने आरोप लगाया कि यूपी के कई बूथों पर अधिकारियों और पुलिस ने दलित मतदाताओं को मतदान करने से रोका। इन सबके के बावजूद हमें इनसे सीखने की भी जरूरत है। केदारनाथ विधानसभा क्षेत्र के तरसाली गांव के ग्रामीणों ने 100 प्रतिशत मतदान करके इतिहास रच दिया। गांव में पहली बार मतदान केंद्र बनाया गया था। मतदान को लेकर उत्साह का आलम यह रहा कि दोपहर एक बजे तक ही ग्रामीणों ने शत-प्रतिशत मतदान कर दिया था। पहले चरण में जिस उत्साह के साथ मतदाताओं ने भाग लिया यह  लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत है। पर मतदाताओं का जागरूक होना और मतदान में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेना पहला पड़ाव है। इस बार लोकसभा चुनाव खास है, इसलिए नहीं कि आने वाले पांच सालों तक कौन राज करेगा केंद्र में, इसका जवाब इस चुनाव से मिलेगा, बल्कि इसलिए कि चुनाव के कुछ ऐसे मुद्दे दोबारा रेखांकित हो रहे हैं जो कुछ समय पहले तक राजनीतिक विमर्श के केंद्र में नहीं थे। लोकतंत्र का अर्थ सिर्प इतना नहीं है कि जनता कुछ सांसदों और मंत्रियों को चुन दे सरकार बनाने के लिए। लोकतंत्र में किन विषयों पर विमर्श चल रहा है, इस सवाल के जवाब से यह तय होता है कि हमारा लोकतंत्र कितना परिपक्व है। सिर्प जातिगत समीकरण या धार्मिक मुद्दों को भड़का कर चुनाव नहीं जीता जा सकता, यह बात धीरे-धीरे मुख्यधारा के राजनीतिक विमर्श में स्थापित हो रही है। यह एक अच्छा संकेत है। उम्मीदवारों का स्तर भले ही न सुधरे, वंशवाद तो लगातार बढ़ता दिख रहा है। चुनाव जीतने के लिए तमाम हथकंडे इस बार अपनाए जा रहे हैं और चाहे पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा हो, लेकिन इन सब नकारात्मक तथ्यों के बीच बढ़ता मतदान प्रतिशत एक आशा की किरण जरूर जगाती है। मतदाता जागेगा, ठीक से उम्मीदवार को परखेगा, मुद्दों को समझेगा तो ही हमारा लोकतंत्र मजबूत होगा। आमतौर पर एक कटु सत्य यह भी है कि शहर के इलाके में वोटिंग प्रतिशत कम होता है, जहां पढ़ा-लिखा, सरकारी तबका, सुविधा-सम्पन्न वर्ग निवास करता है। ऐसा वर्ग ड्राइंग रूम में और अपने एयरकंडीशनर को चलाकर देश के हालात पर लंबा-चौड़ा अपना मत तो अवश्य करता है, लेकिन वोट के लिए लाइन में लगना उसके लिए कतई जरूरी नहीं होता। ऐसा नहीं है कि जातिगत समीकरणों या धार्मिक मुद्दों की प्राथमिकता खत्म हो गई है पर अब हर दल को यह भी बताना पड़ रहा है कि गरीब किसान या निम्न तबके के लिए उसकी क्या योजना है, उसके घोषणा पत्र में क्या वादा किया गया है? इन योजनाओं के लिए संसाधन कहां से जुटाएंगे? जब चुनाव आयोग सहित पूरा देश मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए कोशिशें कर रहा है, तब एक-एक वोट बेहद कीमती हो जाता है। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए भले ही कोई बलिदान दे, लेकिन मतदान करके एक सकारात्मक योगदान की उम्मीद तो जगती ही है। चुनाव आयोग कुल मिलाकर पहले राउंड में अच्छे नम्बर लेकर सफल रहा है उम्मीद की जाती है कि निष्पक्ष और हिंसा सहित बाकी दौरों का चुनाव भी इसी तरह सम्पन्न होगा।

Friday, 12 April 2019

कठिन है डगर भाजपा की जम्मू-उधमपुर चुनाव में

आतंकी हमले की दहशत झेल रहे जम्मू-कश्मीर की दो सीटों पर दूसरे चरण में 18 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे। जम्मू तथा बारामूला के दो संसदीय क्षेत्रों में किस्मत आजमा रहे 33 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला 33 लाख मतदाता करेंगे। जम्मू संसदीय क्षेत्र में 24 उम्मीदवार मैदान में हैं जबकि बारामूला में नौ उम्मीदवार सीट के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। जम्मू संसदीय क्षेत्र चार जिलों में 20 विधानसभा क्षेत्रों में फैला हुआ है, जिनमें जम्मू, सांबा, पूंछ और राजौरी शामिल हैं। संसदीय सीट पर कुल 20,472,29 वोटर हैं। जम्मू-पूंछ तथा उधमपुर, कठुआ के संसदीय क्षेत्रों में भाजपा के लिए अपना गढ़ बचाए रखने की चुनौती पैदा हो गई है। ऐसा तीन विपक्षी दलों द्वारा किए गए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समझौते के कारण है। ऐसे में भाजपा उम्मीदवारों को सिर्प मोदी के नाम का सहारा है। भाजपा ने दोनों ही लोकसभा सीटों पर अपने पुराने चेहरों को मैदान में उतारा है। जम्मू से वर्तमान सांसद जुगल किशोर शर्मा तथा उधमपुर से मंत्री व सांसद जितेन्द्र सिंह किस्मत आजमा रहे हैं। हालांकि दोनों ही संसदीय क्षेत्रों में विपक्षी पार्टियों के उम्मीदवार दम-खम तो नहीं रखते पर चिन्ता का विषय यह है कि कांग्रेस के उम्मीदवार को मगर प्रत्यक्ष तौर पर नेशनल कांफ्रेंस तथा अप्रत्यक्ष तौर पर पीडीपी का समर्थन प्राप्त है। जम्मू से कांग्रेस की ओर से पूर्व मंत्री रमण भल्ला को उतारा है। वह राज्य सरकार में विकास-पुरुष के नाम से जाने जाते थे। जबकि उधमपुर से कांग्रेसी उम्मीदवार डॉ. कर्ण सिंह के सुपुत्र विक्रमादित्य राजघराने से हैं। उनके पिता डॉ. कर्ण सिंह चार बार इस लोकसभा क्षेत्र से विजयी हो चुके हैं। जानकारी के लिए पिछले चुनावों में भी दोनों संसदीय क्षेत्रों से नेशनल कांफ्रेंस ने बिना समझौते के इन लोकसभा क्षेत्रों से प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारे थे लेकिन इस बार बाकायदा दोनों दलों में समझौता हुआ है और पीडीपी ने सांप्रदायिक वोटों को बंटने से रोकने की खातिर दोनों ही संसदीय क्षेत्रों से मैदान में अपने उम्मीदवार न उतारने का फैसला किया है। विपक्ष के साझे उम्मीदवारों के अतिरिक्त भाजपा को अपने ही असंतुष्ट और दबंग नेता चौधरी लाल सिंह से भी निपटना होगा। वह भाजपा को छोड़कर डोगरा लोगों के हितों की रक्षा के लिए बना गए संगठन डोगरा-स्वाभिमान के बैनर तले दोनों ही संसदीय क्षेत्रों से किस्मत आजमा रहे हैं। भाजपा को पीडीपी सरकार बनाने का भी खामियाजा भुगतना पड़ेगा। जम्मू क्षेत्र की अपेक्षा की गई और उतना विकास नहीं हुआ जिसकी भाजपा से उम्मीद की जा रही थी। पिछले पांच सालों में जम्मू क्षेत्र में आतंकवाद भी बढ़ा और आतंकी हमले भी ज्यादा हुए। जम्मू क्षेत्र के यह चुनाव राष्ट्र महत्व रखते हैं। हिन्दू बहुल इस क्षेत्र में अगर भाजपा पिछड़ जाती है तो घाटी में तो उसका सफाया तय है। भाजपा नेतृत्व को आरंभ से ही समीक्षा करनी होगी कि जब उनकी सरकार थी तो उन्होंने जम्मू क्षेत्र को क्यों नजरंदाज किया? मुख्य मुकाबला भाजपा बनाम विपक्षी सांझे उम्मीदवार के बीच होगी। कोई भी हारे-जीते अंतत जीत तो भारतीय लोकतंत्र की ही होगी।

-अनिल नरेन्द्र