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Sunday, 15 December 2013

तीसरी बार डॉ. हर्षवर्धन के हाथ से सीएम कुर्सी फिसली

अपनी-अपनी राय हो सकती है। मेरी राय में बीजेपी ने दिल्ली में जनादेश को एक तरह ठुकरा दिया। बीजेपी के सीएम कैंडिडेट डॉ. हर्षवर्धन ने उपराज्यपाल को सूचित कर दिया है कि उनकी पार्टी के पास चूंकि बहुमत नहीं है, इसलिए सरकार बनाने में असमर्थ हैं। दिल्लीवासियों से डॉ. हर्षवर्धन ने सरकार नहीं बना पाने के लिए क्षमा याचना में कहा कि राष्ट्रपति ने उपराज्यपाल को स्पष्ट निर्देश दे रखे हैं कि सरकार बनाने का दावा पेश करने वाली पार्टी को सात दिन के भीतर सदन में बहुमत साबित करना होगा। चूंकि भाजपा के पास बहुमत नहीं है तो वह भला कैसे सरकार बना सकती है। राजनीति में शुचिता, पारदर्शिता और स्वच्छता की दुहाई देते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा का किसी अन्य दल में तोड़फोड़ करने का कोई इरादा नहीं है और न ही ऐसी सरकार में विश्वास है। बीजेपी ने हाई मॉडल ग्राउंड, ऊंचे राजनीतिक मापदंड तो स्थापित कर दिए पर आई हुई सत्ता को ठुकरा दिया। दिल्ली में 15 साल विपक्ष में बैठने की शायद बीजेपी को आदत सी बन गई है। यही तो फर्प है कांग्रेस और बीजेपी में। कांग्रेस सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं होती चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े और बीजेपी सत्ता लेने को तैयार नहीं। यह ठीक है कि डॉ. हर्षवर्धन के पास बहुमत नहीं है पर अगर वह एक अल्पमत सरकार बना लेते और शपथ लेते ही इतिहास में अपना नाम लिखवा लेते, सभी विधायक बन जाते। शपथ लेने के बाद वह उपराज्यपाल को पत्र लिखते कि हम चाहते हैं कि शक्ति परीक्षण के बाद अगर हमें बहुमत मिलता है तो यह दो-तीन कदम फौरी उठाए जातेःö बिजली की दरों में 30 फीसदी कटौती, पानी के बिलों में राहत, 9 गैस सिलेंडरों की जगह 12 सिलेंडर इत्यादि-इत्यादि। बहुमत सिद्ध करने की जब बारी आती तो संभव था कुछ भी हो सकता था। न तो कांग्रेस और न ही आप के विधायक और न ही दिल्ली की जनता छह महीने में दोबारा चुनाव चाहती है। संभव है कि मतदान के दिन कांग्रेसी विधायक सदन से किसी न किसी बहाने वाकआउट कर जाते, कुछ भी हो सकता था। मान लो बहुमत न भी सिद्ध होता तो त्यागपत्र दे देते और जनता से कह सकते थे कि हम तो जनहित में बहुत से कदम उठाना चाहते थे पर कांग्रेस और आप ने हमें ऐसा करने से रोका (दोबारा) चुनाव में पार्टी की स्थिति और मजबूत होती। बीजेपी को सरकार बनानी चाहिए थी इस मत के बहुत से बीजेपी विधायक भी हैं। दिल्ली अध्यक्ष विजय गोयल तो खुलकर बोल रहे हैं कि बीजेपी को राजधानी में सरकार बनाने के प्रयास जारी रखना चाहिए। उनका कहना है कि पार्टी के चुने गए अधिकतर प्रतिनिधि चुनाव नहीं चाहते। इसके अलावा जनता भी दोबारा चुनाव के मूड में नहीं है। डॉ. हर्षवर्धन के इंकार के बावजूद विजय गोयल का कहना है कि पार्टी को दिल्ली में सरकार बनाने के लिए प्रयास जारी रखने चाहिए और इसके लिए आम आदमी पार्टी से बातचीत करनी चाहिए। उनका यह भी कहना है कि इस चुनाव में जीते हुए अधिकतर पार्टी उम्मीदवार उनसे आकर गुजारिश कर रहे हैं कि दिल्ली में दोबारा चुनाव न होने देने के लिए कवायद की जानी चाहिए और बीजेपी को सरकार बनानी चाहिए। बहुमत न मिलने के बावजूद खबरों के अनुसार भाजपा विधायकों का भी दबाव था कि भाजपा सरकार बनाए, लेकिन पार्टी आलाकमान के आगे उनकी एक न चली। ऐसे विधायकों की संख्या एक दर्जन से अधिक बताई जा रही है। बुधवार देर रात उपराज्यपाल नजीब जंग के आमंत्रण के बाद बृहस्पतिवार को भाजपा के विधायक पार्टी नेताओं से सम्पर्प साधते रहे। हालांकि विधायक दल के नेता डॉ. हर्षवर्धन सुबह ही छत्तीसगढ़ के लिए रवाना हो गए थे, लेकिन विधायकों ने अपने प्रदेश स्तरीय नेताओं से इच्छा जाहिर की। प्रदेश पदाधिकारियों ने प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल से कहा कि सरकार बनाकर भाजपा को उम्मीद पैदा करनी चाहिए कि वह अल्पमत की सरकार में बेहतर प्रशासन दे सकती है। जब बहुमत साबित करने की बात आएगी तो डॉ. हर्षवर्धन सदन में यह साबित करें कि वह बेहतर सरकार देना चाहते हैं। दिल्लीवासियों को महंगाई से फौरी राहत देना चाहते हैं लेकिन दूसरे दलों के विधायकों ने साथ नहीं दिया, इसलिए वह इस्तीफा देने पर मजबूर हैं। यह तीसरा मौका है जब डॉ. हर्षवर्धन के हाथ से दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी फिसली है। इससे पहले भी दो बार उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी थी लेकिन आखिरी वक्त में पासा पलट गया। पहली बार डॉ. हर्षवर्धन का मुख्यमंत्री बनने का मौका तब आया था जब वर्ष 1993 से 1998 तक चली भाजपा सरकार के दौरान हालत बिगड़ने लगे थे। साहिब सिंह वर्मा को कुर्सी गंवानी पड़ी थी। उस समय तय हो गया था कि पार्टी हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री बनाएगी लेकिन आखिरी वक्त में प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा को भाजपा के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। उस समय भी पार्टी की जीत के पूरे आसार थे लेकिन नतीजा उल्टा हुआ। दूसरा मौका 2008 में आया तब भी डॉ. साहब के हाथ से कुर्सी खिसक गई। राजनीति का अंतिम पड़ाव सत्ता होता है इसीलिए तो आप सियासत में आते हो। भले ही आप की सरकार गिर जाती पर आप को कोशिश तो करनी चाहिए थी। कटु सत्य तो यह भी है कि कांग्रेस पार्टी छह महीने के अन्दर दिल्ली में फिर से विधानसभा चुनाव कतई नहीं चाहेगी। चुनाव में करारी हार के दंश से कांग्रेस अभी उभर भी नहीं पाई है और दोबारा चुनाव की आशंका ने पार्टी के लिए नेतृत्व का संकट खड़ा कर दिया है। कांग्रेस किसी भी कीमत पर सरकार बनाने के लिए आम आदमी पार्टी को बिना शर्त समर्थन देने की भी पहल कर रही है। दरअसल कार्यवाहक मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सहित पार्टी के तमाम दिग्गज नेताओं के चुनाव हारने के कारण कांग्रेस प्रदेश इकाई में नेतृत्व का संकट पैदा हो गया है। सूत्रों की मानें तो शीला जी के नेतृत्व में पार्टी दोबारा चुनाव मैदान में नहीं उतरना चाहती है। साथ ही चार राज्यों में प्रदेश अध्यक्षों को बदलने के पार्टी हाई कमान के फैसले को अमल में लाने के लिए भी दिल्ली राह का रोड़ा बन रही है। कांग्रेस आलाकमान मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष जेपी अग्रवाल की जगह ऐसे नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहती है जिसके नेतृत्व में चुनाव लड़ा जा सके। मौजूदा हालत में अगर दिल्ली में निकट भविष्य में विधानसभा चुनाव होते हैं तो कांग्रेस को इतनी भी सीटें न मिले। रही बात भाजपा की तो इस बात की क्या गारंटी है कि दोबारा चुनाव में उसे स्पष्ट बहुमत मिले? अगर छह महीने बाद भी त्रिशंकु विधानसभा आई तो...? दिल्ली की गद्दी तक नरेन्द्र मोदी को पहुंचाने की खातिर भाजपा नेतृत्व ने डॉ. हर्षवर्धन और पार्टी की दिल्ली इकाई को दांव पर लगा दिया है। हो सकता है, वह सही साबित हो और मैं गलत। राजनीति में कुछ भी हो सकता है। इस अनिश्चितता के चलते दिल्ली की जनता महंगाई की मार से पिस रही है। महंगाई और बढ़ गई है।

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 14 December 2013

लाल-नीली बत्ती स्टेटस सिम्बल बन गई है

देश को आजाद हुए साढ़े छह दशक हो गए हैं लेकिन अंग्रेजों व सामंतशाही की लाल बत्ती के रुतबे का चलन आज भी चल रहा है। लाल या नीली बत्ती वाले वाहनों में चलना एक स्टेटस सिम्बल बन गया है जो हमें सामंती प्रवृत्ति की याद दिलाता है। यह खुशी की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा आदेश दिया है जिससे आम नागरिकों को राहत और खुशी महसूस होगी। इस सामंती प्रवृत्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। वैसे यह पहला मौका नहीं है,  इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट दोनों केंद्र और राज्य सरकारों को लाल बत्ती और साइरन वाले वाहनों के दुरुपयोग पर फटकार लगाई है। अब उसने निर्देश दिए हैं कि वाहनों में लाल बत्ती का इस्तेमाल सिर्प संवैधानिक और उच्च पदों पर बैठे लोग ही करेंगे। इनमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री, कुछ वरिष्ठ अफसर और वरिष्ठ न्यायाधीश आते हैं। इस आदेश को सख्ती से लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य सरकारें इस सूची में बदलाव नहीं कर सकतीं यानी मनमाने ढंग से लाल बत्ती नहीं बांट सकतीं। अब तक होता यह था कि हर राज्य सरकार इतनी उदारता से लाल बत्ती बांटती थी कि लगभग हर राजनीतिक रसूख वाला आदमी या छोटा-मोटा सरकारी अफसर लाल बत्ती की गाड़ी में घूमता था। दरअसल लाल या नीली बत्ती रसूख और रुतबे का प्रतीक बन गई है और ऐसे वाहनों में बैठे लोगों को इस बात की परवाह भी नहीं होती कि उनकी वजह से आम आदमी को परेशानी का कभी-कभी सामना भी करना पड़ता है। दिल्ली में तो अपेक्षाकृत थोड़ी सख्ती व डर है वरना राज्य और जिला स्तर पर किसी पार्टी का नगर अध्यक्ष और किसी जिले का डिप्टी कलेक्टर भी लाल बत्ती की गाड़ी का साइरन बजाते हुए सड़कों पर दिखाई दे जाता था। सुप्रीम कोर्ट ने भी वही बात कही है जो इससे पहले भी कई बार कही जा चुकी है कि गाड़ी पर लाल बत्ती दरअसल एक स्टेटस सिम्बल बन गया  है और इसका इस्तेमाल लोग यह दिखाने के लिए करते हैं कि वे आम नहीं बल्कि खास आदमी हैं। अदालत ने यह टिप्पणी की कि यह अंग्रेजों के राज का बोझ है, जिसे हम आज तक ढो रहे हैं। भारत में कुप्रशासन की एक बड़ी वजह यह है कि आम आदमी और खास आदमी या वीआईपी के बीच बड़ा फर्प मौजूद है जो लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। वास्तव में इस व्यवस्था ने आजाद भारत में नागरिकों के दो वर्ग तैयार कर दिए हैं। हालांकि जब से यह मामला संज्ञान में आया है यह बहस भी चल रही है कि आखिर किन्हें वीआईपी या विशिष्ट जन माना जाए। संवैधानिक रूप से देखें तो यह दायरा काफी बड़ा हो जाता है क्योंकि इसमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, कैबिनेट मंत्री, मुख्य न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त और कैग सहित सभी संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुख आ जाते हैं। यही हाल नीली बत्ती वाले वाहनों का है, जिन्हें पुलिस, सेना और अग्निशमन सेवा से संबंधित वाहनों के लिए अधिकृत किया गया है पर इसका भी दुरुपयोग रोका नहीं जा सका है। जिस देश में यातायात नियमों को तोड़ने वाले 100-50 रुपए देकर छूट जाते हैं, वहां बहुत कुछ बदलने की जरूरत है। अब यह जरूरी है कि केंद्र सरकार, संवैधानिक संस्थाएं व तमाम राज्य सरकारें देश के हर हिस्से में सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का सख्ती से पालन करवाएं तभी भारत के लोकतंत्र से इस सामंती प्रवृत्ति को हटाया जा सकता है।

-अनिल नरेन्द्र

दिल्ली की जनता के जनादेश का अपमान कर रहे हैं केजरीवाल

यह ठीक है कि विधानसभा चुनाव में दिल्ली की जनता ने कांग्रेस शासन के खिलाफ निगेटिव यानी नकारात्मक जनादेश दिया, वोट दिया पर वोट देते वक्त यह नहीं सोचा कि कांग्रेस की जगह कौन? अगर वह आप पार्टी को पूर्ण बहुमत दे देती या भाजपा को चार-पांच सीटें और जिता देती तो आज यह असमंजस की स्थिति न देखनी पड़ती। आज सभी परेशान हैं जो जीता वह भी परेशान और जो हारा वह भी परेशान। विधानसभा चुनाव में किसी को बहुमत न देकर चुनाव जीते विधायकों को तो तनाव में डाल ही दिया है साथ ही वे प्रत्याशी भी कम परेशान नहीं हैं जो चुनाव में हार गए हैं। आप पार्टी के जीते हुए उम्मीदवारों में कुछ तो ऐसे भी हैं जिनको जीत के बाद उनके समर्थक जब बधाई देने आते हैं उन्हें चाय तक पिलाने के लिए पैसा नहीं है। वह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि आप पार्टी सरकार बनाए और उन्हें सत्ता व सत्ता सुख भोगने को मिले। जो हारे हैं उन्हें यह चिन्ता सता रही है कि उन्हें दोबारा टिकट मिलेगी भी या नहीं? सियासी गलियारों में प्रमुख पार्टियां सरकार बनाने को लेकर गेंद एक-दूसरे के पाले में डाल रही हैं। भाजपा ने तो उपराज्यपाल को लिखकर दे दिया है कि वह सरकार नहीं बनाना चाहती क्योंकि जनता ने उसे स्पष्ट बहुमत नहीं दिया। अब आम आदमी पार्टी के पाले में गेंद है। इन सबके बीच जनता एक अलग ही राय लेकर चल रही है। बहुमत न मिलने के बावजूद जनता दिल्ली की कुर्सी तो आप को ही देने के पक्ष में है। आम जनता दिल्ली में दोबारा चुनाव कराने के पक्ष में नहीं है। लोगों की राय दिखाई दी कि राजनीतिक अनुभव लेने के लिए आप को कुर्सी जरूर सम्भालनी चाहिए। अरविन्द केजरीवाल के न समर्थन देने न लेने का बयान जनता के गले नहीं उतर रहा है। न समर्थन देने को तैयार न समर्थन लेने को तैयार, न अल्पमत सरकार बनाने को तैयार। यह राजनीति है या लोगों को गुमराह कर वोट लेने के बाद जिम्मेदारी से भागना है? यह सवाल आप के खिलाफ आने वाले दिनों में दोनों कांग्रेस व भाजपा अपने सवालों की लिस्ट में शामिल करेगी। लोकतंत्र में जनादेश सबसे अहम है। जनादेश न केवल जनता की मांग है बल्कि आप का संवैधानिक दायित्व भी है। संविधान में अल्पमत सरकार का प्रावधान है। लेकिन सिर्प जनता की भलाई और हित के लिए ही काम करने के दावे वाली भाजपा और आप दोबारा चुनाव की बात कर लोगों के करोड़ों रुपए, समय और साधन की बर्बादी की ओर ही नहीं झोंक रहे बल्कि जनता को किए वादों से भी भाग रही है।  कांग्रेस के पूर्व विधायक मुकेश शर्मा का कहना है कि दोनों ही पार्टियों ने जनता से झूठे वादे किए थे, जिन्हें वह पूरा नहीं कर सकतीं, इसलिए सरकार बनाने से बच रही हैं। इन पार्टियों के हठ की वजह से जनता को महंगाई की मार झेलनी पड़ेगी और जो राहत की उम्मीद लेकर उसने आप पार्टी को वोट दिया था वह भी टूटती नजर आ रही है। अगर सरकार बनाकर आप पार्टी केवल दो-तीन वादे ही पूरा कर दे तो भी जनता को राहत मिल जाएगी। बिजली की दरों में कटौती, 700 लीटर मुफ्त पानी उपलब्ध कराना इनमें शामिल हैं। लेकिन केजरीवाल जानते हैं कि बिजली के बिल 50 प्रतिशत कम करने, फ्री पानी देने जैसे कितने ही वादे वह पूरे नहीं कर सकते हैं, इसलिए अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं। कांग्रेस ने भी कह दिया है कि वह आप की सरकार का समर्थन कर सकती है। फिर उसे सरकार बनाने में संकोच क्यों है? 28 सदस्यों के बावजूद वह लोकसभा चुनाव से पहले बढ़िया काम करके दिखाए न कि जनता के जनादेश का अपमान करे।

Friday, 13 December 2013

करारी शिकस्त के बाद कांग्रेस के अंदर और बाहर नेतृत्व पर उठने लगे सवाल

जैसा मैंने इसी कॉलम में आशंका जाहिर की थी कि चार राज्यों में करारी हार से कांग्रेस के भीतर और उसके सहयोगियों में नेतृत्व के खिलाफ बगावती स्वर उठने लगेंगे वैसा ही देखने को मिल रहा है। आखिर हार की जिम्मेदारी किसी को तो लेनी पड़ेगी। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण शायद यह है कि 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस को लीड कौन करेगा? पहले बात करते हैं कांग्रेस के अंदर इस शर्मनाक हार के बाद उठी बगावती आवाजें। अगर हम दिल्ली से शुरुआत करें तो पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने हार का सबसे बड़ा कारण पार्टी के शीर्ष नेताओं का सहयोग नहीं मिल पाने को बताया। उनका इशारा साफ तौर पर दिल्ली कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जय प्रकाश अग्रवाल की ओर है। यह सही है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार में अकेली शीला जी ही दिन-रात एक करती दिखीं। इसके पीछे जय प्रकाश और शीला जी के बीच काफी समय से 36 का आंकड़ा भी एक कारण था। जय प्रकाश का कहना था कि शीला जी हमेशा अपनी करती थीं और कहीं भी उन्होंने उन्हें साथ लेने की कोशिश नहीं की। राजस्थान से भी अशोक गहलोत समर्थक अब खुलकर उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर यह कहते हुए आरोप लगा रहे हैं कि मतदान से ठीक पहले सीपी जोशी का नाम आगे बढ़ाकर वो क्या संदेश देना चाहते थे? पर सबसे तीखा हमला पार्टी के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने किया। मीडिया से बातचीत करते हुए मणिशंकर अय्यर ने 2014 के लोकसभा चुनाव में आशंका जताते हुए यह कहकर सनसनी फैला दी कि कुछ समय पहले विपक्ष में बैठना पार्टी के लिए अच्छा रहेगा। अय्यर ने पार्टी में गम्भीर बदलाव की वकालत कर संगठन स्तर पर क्रांतिकारी कदम उठाने की मांग की है। चार विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त के बाद कांग्रेस में आत्मचिन्तन की जरूरत को लेकर उठे सुरों को नाकाफी बताते हुए मणिशंकर अय्यर ने कहा कि अब काफी देर हो चुकी है। उनका कहना था कि देश के 32 लाख पंचायत प्रतिनिधियों में एक-तिहाई कांग्रेसी हैं। 10 लाख कैडर की पार्टी देश में अन्य किसी भी पार्टी को धूल चटा सकती है लेकिन जब उनका इस्तेमाल नहीं होगा तो इसी तरह के नतीजे आएंगे। निचले स्तर से ही नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए पर चापलूसी कांग्रेस संस्कृति के चलते हमें संदेह है कि पार्टी में कुछ खास बदलाव होगा। दो-तीन बलि के बकरे बना दिए जाएंगे और पार्टी दिग्विजय सिंह सरीखे के नेताओं के दम-खम पर ही चलती रहेगी और डूबेगी। अब भी दिग्विजय सिंह कह रहे हैं कि विधानसभा चुनाव के परिणाम राहुल गांधी के खिलाफ जनमत संग्रह नहीं हैं। दिग्विजय ने यह भी कहा कि विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनावों से अलग होते हैं और इन चुनावों में कांग्रेस को हुए नुकसान को 2014 में लोकसभा चुनावों में उसकी हार का संकेत नहीं कहा जा सकता। मुद्दे घटक होते हैं। इसी बीच एक और दिग्गज नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने करारी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा है कि कांग्रेस के जो खराब हालात बने हैं, उसकी खास वजह यह है कि आलाकमान चापलूसों की ज्यादा सुनता है। सभी जानते हैं कि कांग्रेस में आलाकमान का मतलब पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी से है। ऐसे में सत्यव्रत ने एक तरह से सोनिया गांधी पर ही निशाना साधा है। विवादित टिप्पणियों के लिए मशहूर सत्यव्रत का मध्यप्रदेश की राजनीति में काफी दखल रहा है। इसी वजह से संगठन के राष्ट्रीय नेतृत्व ने उन्हें लगातार अहमियत दी है। उन्होंने मध्यप्रदेश में पार्टी की हार का ठीकरा सीधे दिग्विजय सिंह पर ही फोड़ा है। उनका कहना है कि पिछले दो साल से कांग्रेस नेतृत्व से बार-बार कहा जा रहा है कि मध्यप्रदेश की जनता दिग्विजय सिंह को सबसे ज्यादा नापसंद करती है, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व उन लोगों की बात नहीं सुनता जो कड़वी बातें करते हैं। मध्यप्रदेश में कांग्रेस को हानि पहुंचाने वाले दिग्विजय सिंह को पूरे चुनाव में सबसे अहम स्थान दिया गया। जिस आदमी को सबसे ज्यादा नापसंद किया जाता है उसे सबसे ज्यादा महत्व देकर आखिर कांग्रेस नेतृत्व करना क्या चाहता है? सत्यव्रत कहते हैं कि अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रचार अभियान की कमान सौंपी जाती तो बेहतर नतीजे आते। वह कहते हैं कि क्या दिग्गी के नाम कांग्रेस नेतृत्व ने मध्यप्रदेश की जागीर लिख दी है? इधर केंद्र में भी कांग्रेसियों ने ही पार्टी नेतृत्व की नाक में दाम कर रखा है। मनमोहन सरकार के खिलाफ आंध्र प्रदेश के उत्तेजित सांसदों ने अविश्वास प्रस्ताव ला दिया है। उत्तेजित सांसदों ने मंगलवार को कहा कि वे इस अलोकप्रिय सरकार को गिराने के लिए संख्या बल जुटाने पर काम कर रहे हैं। विजयवाड़ा से कांग्रेस सांसद एल. राजगोपाल ने कहा कि हमें आंध्र प्रदेश और राज्य के बाहर से कुछ सांसदों का समर्थन मिला है। उन्होंने कहा कि यह अविश्वास प्रस्ताव एक अलोकप्रिय सरकार द्वारा तेलंगाना विधेयक को संसद में पेश होने से रोकना है। अब बात करते हैं संप्रग सरकार के सहयोगी और समर्थक दलों की। द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस जैसे सहयोगी दल पहले ही अलग-अलग कारणों से यूपीए के कुनबे से बाहर हो चुके हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद जद (यू) भी कांग्रेस के राजनीतिक कुनबे से जुड़ने से कतरा रहा है। बीजद भी यूपीए से दूरी रखने में ही भलाई समझ रहा है। दिल्ली में आप की ऐतिहासिक जीत से तीसरे मोर्चे के लिए उत्साहित क्षत्रपों को नई ऑक्सीजन मिल गई है। एनसीपी के प्रमुख शरद पवार इस बार भी नहीं चूके। यूं तो उनकी राजनीतिक फितरत है कि जब भी कांग्रेस संकट के दौर में आती है, पवार निशाना साधने से नहीं चूकते। उन्होंने बगैर नाम लिए कांग्रेस के युवराज पर तंज कसा है। कह दिया कि नेतृत्व की कमजोरी की वजह से कांग्रेस चुनाव हारी है। ऐसे में समय रहते कांग्रेस को नेतृत्व के बारे में पुनर्विचार कर लेना चाहिए। देश चाहता है कि नेतृत्व मजबूत, दृढ़संकल्प वाला हो। तारिक अनवर ने सीधे राहुल गांधी का नाम लेकर कह दिया कि इस हार पर राहुल गांधी को चिन्तन जरूर करना चाहिए। क्योंकि यह चुनाव कांग्रेस ने अघोषित तौर पर उन्हीं के नेतृत्व में लड़े थे। यह जमीनी सच्चाई है। चुनावी नतीजे यूपीए सरकार के प्रति लोगों की नाराजगी के संकेत नहीं हैं बल्कि सीधे तौर पर इन खराब नतीजों के लिए कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व जिम्मेदार माना जा सकता है। इन चुनावी नतीजों का निहितार्थ कांग्रेस के लिए तो एक दम दो टूक साफ है, यही कि अब देश का मूड कांग्रेस के खिलाफ है। इन चारों राज्यों में लोगों ने कांग्रेस को खारिज कर दिया है। कांग्रेस के लोग भले ही यह मानने को तैयार न हों कि इन चुनावों का बड़ा असर आगामी 2014 के लोकसभा चुनावों पर पड़ने वाला है लेकिन इस सियासी घटनाक्रम से यूपीए के कांग्रेसी घटक भी सहम गए हैं। उन्हें लगने लगा है कि कांग्रेस के साथ ही चिपके रहे तो उनका भी सियासी भविष्य खतरे में पड़ सकता है। इसी के चलते कांग्रेस के कई सहयोगियों ने अब अलग रास्ते का विकल्प तलाशना शुरू कर दिया है। कुल मिलाकर कांग्रेस के अंदर, कांग्रेस के सहयोगी दलों ने कांग्रेस नेतृत्व की काबिलियत पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं। देखें, 100 साल पुरानी इस महान पार्टी को भविष्य में सही नेतृत्व मिलता है या यूं ही ढर्रे पर चलती रहेगी?

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 12 December 2013

चार राज्यों में भाजपा की जीत क्या मोदी फैक्टर को जाती है?

चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या ये परिणाम बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की लहर की वजह से हैं या फिर इसका श्रेय इन चार राज्यों के मौजूदा मुख्यमंत्रियों और भावी मुख्यमंत्रियें को जाता है? यह सवाल इसलिए उठा है क्योंकि नरेन्द्र मोदी ने इन चार राज्यों में जमकर पचार किया लेकिन एकतरफा जीत तीन राज्यों में मिली और चौथे राज्य दिल्ली में जहां मोदी ने बहुत मेहनत की वहां पार्टी बहुमत तक नहीं पहुंची। यही नहीं बल्कि दिल्ली में तो पार्टी का वोट पतिशत पिछले विधानसभा चुनाव से भी घट गया ? सबसे पहले तो हमारा मानना है कि यह लोकसभा चुनाव नहीं है जहां मोदी की लोकपियता की परीक्षा रही हो, यह विधानसभा चुनाव हैं जो राज्य सरकारों की कारगुजारी, छवि, मुख्यमंत्रियों की लोकपियता स्थानीय मुद्दों पर लड़ा गया न कि नरेन्द्र मोदी के मुद्दे पर। कांग्रेस तो यह कहेगी कि बीजेपी मोदी की लहर की वजह से नहीं जीती। मध्यपदेश के ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राज्य में बीजेपी की जीत का सेहरा मोदी के सिर पर बांधने से इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि जीत की असली वजह मोदी नहीं शिवराज सिंह चौहान हैं। इसी तरह की बात दिग्विजय सिंह, नीतीश कुमार ने भी कही है। हैरानी की बात यह है कि अमेरिकी एक्सपर्ट्स का भी मानना है कि चार स्टेट्स के विधानसभा इलेक्शन के रिजल्ट ने अगले साल होने जा रहे जनरल इलेक्शन से पहले विपक्षी बीजेपी को कान्फिडेंस जरूर पदान किया है लेकिन इसमें न तो मोदी की लहर का कोई संकेत दिखा और न ही अगले साल ऐसे ही परफॉर्मेंस की गारन्टी है। भारत के चुनाव पर करीब से नजर रखने वाले एक्सपर्ट्स का मानना है कि मध्यपदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली जहां आप ने बहुत लोगों को चौंका दिया ये भाजपा के अच्छे परफॉर्मेंस का एकमात्र कारण केवल मोदी नहीं हैं। साउथ एशिया में मैक्लार्टी एसोसिएशन्स के डायरेक्टर रिचर्ड एम रोसो ने कहा कि इन राज्यों में बीजेपी हमेशा मुकाबले में रही है। केन्द्र की सत्ता के सेमीफाइनल समझे जाने वाले इन विधानसभा चुनाव के परिणामों से बीजेपी कैम्प खासा उत्साहित है। मतदाताओं ने बेहतर काम-काज करने वाली सरकारों को न तो इनाम देने में कंजूसी की और न ही उम्मीदों पर खरी नहीं उतरने वाले दलों को सजा देने में। मतदाताओं ने चारों राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर यह तय कर दिया है कि पार्टी 2014 के फाइनल की रेस में बहुत पीछे छूट गई। इस सेमीफाइनल में भाजपा का परचम लहराने से निसंदेह नरेन्द्र मोदी की पधानमंत्री पद की दावेदारी को और पंख लगे हैं। चार राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को पधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित करने में पार्टी में मतभेद थे। आडवाणी कैम्प का कहना था कि चूंकि यह राज्यों के चुनाव हैं इसलिए इनके परिणाम आने के बाद श्री मोदी की दावेदारी पेश करनी चाहिए पर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि नहीं राज्य विधानसभा चुनाव से पहले ही दावेदारी पेश होनी चाहिए। इस कैम्प का मानना है कि उनका फैसला सही था और मोदी का दांव विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए फायदेमंद साबित हुआ। मोदी के नेतृत्व को केन्द्र में रख चार राज्यों के विधानसभा चुनाव लड़ी भाजपा ने मोदी की उम्मीदवारी को चार राज्यों में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवारों के साथ पेश कर एक तीर से दो लक्ष्य साधने का काम कर दिया। एक तरफ भाजपा ने मोदी को पीएम पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया तो दूसरी तरफ रणनीति के तहत मुख्यमंत्री के पद के उम्मीदवारों को भी मोदी के साथ केन्द्र में रखा। लिहाजा चारें राज्यों में भाजपा को मोदी फैक्टर का लाभ मिला। इसे महंगाई का असर कहें या फिर मोदी की देश में लहर, जिसमें राहुल गांधी भी कांग्रेस को नहीं बचा पाए और मोदी ने राहुल गांधी को पचार अभियान में बुरी तरह  एक्सपोज कर दिया। आज मोदी की वजह से ही कांग्रेस के अंदर नेतृत्व की क्षमता को लेकर खुद कांग्रेसी और उनके समर्थक दल आवाजें उठा रहे हैं। पतिद्वंद्वी पार्टियां देश में मोदी की लहर मानने से इन्कार करती रही हैं लेकिन विधानसभा चुनाव में मोदी फैक्टर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के मुकाबले भाजपा पत्याशियों को जीत दिलाने में भारी पड़ा है। चार राज्यें में तूफानी पचारों के दौरान नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी ने 11 समान विधानसभा क्षेत्रों में रैलियां कां। यह सभाएं बीकानेर, बांसवाड़ा, जयपुर, अजमेर, दक्षिणपुरी, इंदौर, मंदसौर, सहडोल, रायपुर, बस्तर और जगदलपुर में हुई थां। इन सभाओं का 27 सीटों पर सीधा पभाव था। दोनों पार्टिंयों के स्टार पचारकों की ओर से की गई रैलियों के पभाव वाले स्थानों में से जयपुर की नौ सीट, बीकानेर की दो सीट, बांसवाड़ा की एक, अजमेर की दो, रायपुर की तीन सीट, इंदौर की चार सीट, जगदलपुर की एक सीट और मंदसौर की एक सीट पर भाजपा पत्याशियों का जीतना मोदी फैक्टर की वजह से रहा। विधानसभा चुनाव परिणामों ने बीजेपी का उत्साह ही नहीं बढ़ाया बल्कि विश्वास भी मजबूत कर दिया है। दरअसल एक नजरिये से चुनाव नतीजों ने आम चुनाव से पहले पार्टी के उस फैसले पर मोहर लगा दी जिसे लेकर सबसे ज्यादा विवाद और उहापोह में था। चार राज्यों जो सभी अत्यन्त अहम हैं की जनता ने भाजपा को क्लीन स्वीप का संदेश देकर परोक्ष रूप से नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व का भी समर्थन कर दिया है और उन्हें पधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के फैसले पर मोहर लगा दी और उन्हें पधानमंत्री बनाए जाने का समर्थन ही किया है। अब पार्टी इस मोदी लहर को तूफान में बदलने की कोशिश करेगी। निसंदेह नरेन्द्र मोदी और मजबूत होकर उभरे हैं। अंत में नरेन्द्र मोदी ने चुटकी लेते हुए कहा कि सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली पार्टी की चारों राज्यों में आई कुल सीटें भाजपा द्वारा एक राज्य में जीती गईं सीटों के बराबर भी नहीं हैं। सूत्रों के अनुसार भाजपा संसदीय बोर्ड ने दिल्ली में बहुमत न मिलने के कारण मोदी को सामने नहीं किया और मोदी ने ट्वीट का सहारा लिया। हालांकि कुछ लोग बीजेपी में चाहते थे कि नरेन्द्र मोदी सामने आकर जीत पर अपनी पतिकिया खुलकर दें।

-अनिल नरेन्द्र

Wednesday, 11 December 2013

दिलचस्प झलकियां 2013 दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणामों की

दिल्ली में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत न देकर दिल्ली के मतदाताओं ने इस ऐतिहासिक चुनाव का मजा थोड़ा किरकिरा जरूर कर दिया है। जरूरत तो इस बात की थी कि या तो भाजपा की सीटें बढ़ा देते या फिर आप पार्टी की ही बढ़ा देते। अब किसी को स्पष्ट बहुमत न मिल पाने के कारण त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति हो गई है। तीनों प्रमुख पार्टियों में से कोई किसी को समर्थन देने को तैयार नहीं है। सरकार बनाने के लिए सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी भाजपा को चार और दूसरे नम्बर पर आई आप को आठ विधायकों का समर्थन चाहिए। यह दोनों के लिए आसान नहीं है। ऐसे में क्या हो सकते हैं विकल्पöपहलाöसबसे बड़ी पार्टी के नाते भाजपा सरकार बनाने का दावा करे या फिर इंतजार करे कि उपराज्यपाल नजीब जंग डॉ. हर्षवर्धन को निमंत्रण दें,  दूसराöभाजपा को निमंत्रण दें और एक निश्चित समय के अन्दर सदन में अपना बहुमत सिद्ध करने को कहें। भाजपा स्वीकार कर भी लेती है तो बहुमत साबित करना आसान नहीं होगा। यह तभी सम्भव है जब कांग्रेस में टूट हो जाए और उसके दो-तिहाई विधायक समर्थन दें। उपराज्यपाल भाजपा के इंकार करने पर आप पार्टी को आमंत्रित कर सकते हैं और सशर्त सरकार बनाने का आमंत्रण दे सकते हैं पर वही बात आएगी बहुमत सिद्ध कैसे करेगी? भाजपा या कांग्रेस में से एक को इस सरकार का समर्थन करना पड़ेगा, अंतिम विकल्प है राष्ट्रपति  शासन लगेगा और विधानसभा को लम्बित करके प्रतीक्षा करें या फिर भंग करके नए सिरे से चुनाव हों। इस विधानसभा चुनाव में कई दिलचस्प चीजें निकलकर आई हैं। न तो इनमें ग्लैमर चला, न जात-पात कार्ड, न बुजुर्गी। इन चुनावों में सोशल मीडिया का भी अहम रोल रहा। पहले बात करते हैं ग्लैमर न चलने की। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनावों में सफलता की गारंटी रहा ग्लैमरस चेहरों का जादू दिल्ली के दंगल में नहीं चला। न केवल ग्लैमर का तड़का नहीं लग पाया बल्कि राजनीति की नर्सरी (डूसू चुनावों) के जरिये विधानसभा में आने वाले उम्मीदवारों की आस भी टूट गई। जिसमें कांग्रेस की रागिनी नायक, अमृता धवन तो वहीं आप की शाजिया इल्मी। शाजिया इल्मी की हार पर थोड़ा दुख जरूर है, क्योंकि वह कुल 326 वोटों से हारीं जबकि इससे ज्यादा उनके विधानसभा मतदान में नोटा पर बटन दबे यानि नोटा ने उन्हें हरा दिया। 528 मतदाताओं ने यहां नोटा पर बटन दबाया। अंतिम क्षणों में स्टिंग ऑपरेशन ने भी शाजिया को हराया। नोटा की बात करें तो सभी विधानसभा क्षेत्रों में इसका प्रयोग हुआ। अनुमान है कि 50,000 से ज्यादा लोगों ने नोटा का बटन दबाया। सर्वाधिक चर्चित नई दिल्ली विधानसभा सीट रही जहां से शीला दीक्षित और अरविन्द केजरीवाल चुनाव मैदान में आमने-सामने थे वहां पर 460 मतदाताओं ने सभी उम्मीदवारों को नकार दिया। नोटा ने कुछ उम्मीदवारों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। विकासपुरी विधानसभा सीट पर जहां हार-जीत के बीच अन्तर महज 405 मतों का रहा वहीं नोटा को 1426 वोट मिले। वहीं आरकेपुरम में 528 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया जबकि हार-जीत का अन्तर महज 326 वोट का ही रहा। दिल्ली विधानसभा चुनाव के सबसे बुजुर्ग (80 साल) प्रत्याशी और गिनीज बुक ऑफ रिकार्ड में लगातार जीत के रिकार्डधारी चौधरी प्रेम सिंह भी इस बार अपनी सीट नहीं बचा पाए। 1958 से लगातार जीतने वाले चौधरी प्रेम सिंह की सीट आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार अशोक कुमार ने जीत ली। अगर हम छोटी पार्टियों की बात करें तो जहां अकाली दल ने भाजपा के साथ गठबंधन करके अपने कोटे की चार सीटों में से तीन पर जोरदार जीत हासिल करके अपना दम दिखाया वहीं बसपा और सपा अपना खाता भी नहीं खोल पाई। अकाली दल के सबसे कमजोर उम्मीदवार माने जा रहे हरमीत सिंह कालका ने कालका जी सीट पर भाजपा के कमल चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़कर जीत हासिल कर सबको चौंका दिया। शाहदरा सीट पर कमल चुनाव चिन्ह पर लड़ रहे जतिन्दर सिंह शंटी ने डाक्टर नरेन्द्र नाथ जैसे कर्मठ कांग्रेसी नेता को पछाड़ दिया। दिल्ली की आरक्षित सीटों के मतदाताओं पर आप का जादू सिर चढ़कर इस बार बोला। 2008 में बदरपुर और गोकुलपुर सीटें जीत कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले हाथी को झाड़ू ने इस बार साफ कर दिया। इतना ही नहीं, कई सीटों पर वह एक हजार से कम वोटों पर ही सिमट गई। दिल्ली कैंट, ग्रेटर कैलाश, जंगपुरा, कस्तूरबा नगर सहित अन्य सीटें ऐसी रहीं कि बसपा उम्मीदवार मात्र एक हजार वोटों पर ही सिमट गए। कई मायनों में असल जीत आप पार्टी की हुई है। जिन सीटों पर  सबसे ज्यादा मतदान हुआ है उनमें से अधिकतर जगहों पर आप पार्टी ने बाजी मारी है। कुल 25 सीटों पर 65 फीसदी से अधिक मतदान हुआ जिनमें आप को 13 सीटें, भाजपा को 9 सीटें और कांग्रेस को तीन सीटें मिलीं। इससे यह भी साबित होता है कि मत प्रतिशत बढ़ने से सबसे ज्यादा फायदा आप को हुआ न कि भाजपा को जैसा कहा जा रहा था। भाजपा यह चुनाव जीत सकती थी। 800 वोटों के अन्तर ने बीजेपी को बहुमत से दूर कर दिया। जरा-सी हार के अन्तर ने भाजपा को बना दिया सत्ता से कोसों दूर। दरअसल बीजेपी को चार सीटों पर 800 से भी कम वोटों के अन्तर से हार का मुंह देखना पड़ा है। दिल्ली की 70 सीटों में से 5 सीटें ऐसी हैं जहां पर जीत और हार का अन्तर बहुत कम रहा। दिल्ली में 28 सीटों पर कब्जा करने के साथ आम आदमी पार्टी 19 सीटों पर दूसरे नम्बर पर रही। इस प्रकार आप 17 सीटों पर तीसरे नम्बर पर रही। वहीं आप की तुलना में कांग्रेस आप के मुकाबले दूसरे नम्बर पर भी नहीं रह पाई। कांग्रेस सिर्प 16 सीटों पर दूसरे नम्बर पर अपना स्थान बचा पाई बाकी 28 जगहों पर भाजपा दूसरे नम्बर पर रही। अगर हम दिल्ली में कांग्रेसी सांसदों की बात करें तो दो लोकसभा क्षेत्रों में तो कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो गया है। नई दिल्ली और पश्चिमी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र में तो कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला। सबसे बुरा हाल पूर्वी दिल्ली में सांसद संदीप दीक्षित के क्षेत्र का है। यह पूरा एरिया कांग्रेस का गढ़ माना जा रहा था। यहां से कांग्रेस ने काफी भरोसेमंद प्रत्याशियों को उम्मीदवार बनाया था। यहां से अरविन्दर सिंह लवली, डॉ. एके वालिया, डॉ. नरेन्द्र नाथ, नसीब सिंह और अमरीश गौतम जैसे नेताओं को मैदान में उतारा था। यहां लवली को छोड़कर बाकी सभी हार गए। ऐसे में शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित की क्षमता पर एक बार फिर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। वहीं नई दिल्ली में सांसद अजय माकन के क्षेत्र का हाल और बुरा है। नई दिल्ली एरिया में तो कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई। समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता का एक बड़ा कारण सोशल मीडिया था। ठीक यही प्रयोग अरविन्द केजरीवाल की टीम ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपनाया। ट्विटर हो या फेसबुक या फिर मैसेज या ब्लॉग आप की सफलता में सोशल मीडिया ने अहम भूमिका निभाई।

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 10 December 2013

जनादेश विधानसभा 2013ö कांग्रेस को सबक सिखाया

क्या है संदेश जनादेश विधानसभा 2013 का? जनादेश कांग्रेस पार्टी के खिलाफ है। जनादेश भ्रष्टाचार, घोटालों, महंगाई, महिलाओं की असुरक्षा और सबसे ज्यादा कांग्रेस के अहंकारी व्यवहार के खिलाफ है। जनता जनार्दन अब मानने लगी थी कि चाहे वह केंद्र की कांग्रेस सरकार हो चाहे वह दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार इन्हें इतना अहंकार हो गया है, घमंड हो गया है कि अब इन्हें जनता के दुख-दर्द की कतई परवाह नहीं है। महंगाई से गृहणी किस तरह से निपट रही हैं इसकी कांग्रेस पार्टी को कतई परवाह नहीं थी। युवाओं में अपने भविष्य को लेकर कितनी चिन्ता थी उससे इस सरकार को कोई लेना-देना नहीं था। कांग्रेस ने तो मान लिया था कि वह जीवनभर सत्ता का सुख भोगने के लिए पैदा हुई है भले ही जनता कुछ भी सोचें, कुछ भी करे। आज से कुछ वर्ष पूर्व तक भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं होता पर भ्रष्टाचार के कारण जब घोटाले दर घोटाले का पर्दाफाश हुआ और पिछले दो-तीन साल में तो सारे रिकार्ड टूट गए तो जनता ने इन घोटालों को सीधा महंगाई से जोड़ना शुरू कर दिया। जनता मानने लगी कि इन घोटालों की वजह से ही आसमान छूती, कमरतोड़ महंगाई हुई है। उसे धक्का तब और लगा जब उसे लगने लगा कि यह सरकार चाहे वह केंद्र की सरकार हो या राज्य की  इन्हें न तो महंगाई की कोई फिक्र है और न ही इनमें इसे रोकने की कोई इच्छाशक्ति। इनमें इतनी एरोगैस या अहंकार घुस चुका था कि यह अपनी ही दुनिया में रहने लगे थे और जनता से बिल्कुल कट से गए थे। जनता के दुख-दर्द से इन्हें कुछ सरोकार नहीं रहा। ऐसे समय में अन्ना हजारे दृश्य पर आए। पिछले साल जब वह इन्हीं मुद्दों को लेकर रामलीला मैदान पर अनशन के लिए बैठे तो दिल्ली की जनता पहली बार लाखों की संख्या में रामलीला मैदान पहुंची। वह अन्ना के लिए नहीं गई थी दरअसल वह अपनी भड़ास निकालने गई थी। उसमें जो सरकार और उसकी नीतियों के खिलाफ रोष था उस रोष को प्रकट करने गई थी। अन्ना के साथ अरविन्द केजरीवाल भी आंदोलन का एक प्रमुख हिस्सा था। अन्ना का अनशन तो खत्म हो गया पर अरविन्द केजरीवाल का राजनीतिक सफर यहां से शुरू हो गया। उन्होंने आप पार्टी बना ली और उन्हीं मुद्दों को लेकर आप पार्टी ने जनसम्पर्प करना शुरू कर दिया। आप पार्टी को न तो कांग्रेस ने और न ही भाजपा ने पहले गम्भीरता से लिया पर दिल्ली में एक जबरदस्त अंडर करंट चल रहा था आप पार्टी के हक में, इसलिए जब पोल सर्वे आए और एग्जिट पोल  आए किसी ने भी आप को इतनी सीटें नहीं जीतते दिखाया। बेशक एग्जिट पोल आमतौर पर सही साबित हुए पर गलती उनकी आप पार्टी को लेकर और कांग्रेस परफार्मेंस को लेकर हुई। भाजपा के लिए तो लगभग सभी ने 32 सीटों की भविष्यवाणी की थी पर अरविन्द केजरीवाल एण्ड कम्पनी इतनी सीटें लेगी यह किसी ने शायद नहीं कहा। मुझे शीला जी पर थोड़ी हमदर्दी भी हो रही है। शीला जी से कई गलतियां जरूर हुईं जिनका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। शीला जी ने इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि इस चुनाव में जीजान से मेहनत की पर उनकी टीम यानि मंत्रियों व संगठन ने उनका साथ नहीं दिया। वह अकेली ही मैदान सम्भाले हुए थीं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मांग थी और वक्त का तकाजा था कि कांग्रेस अपने कुछ उम्मीदवार जिनमें कुछ मंत्री भी शामिल थे, को बदले। इनके खिलाफ एंटी-इन्कैम्बेंसी फैक्टर भारी था पर शीला जी ने जुआ खेला और सारे मौजूदा विधायकों को मैदान में उतार दिया। कार्यकर्ताओं की मांग को ठुकरा कर शीला जी खुद भी हारीं और पार्टी की लुटिया भी डूब गई। एक और बड़ा कारण था केंद्र सरकार की नीतियां  और महंगाई। आलू, टमाटर, प्याज की कीमतों ने गृहणियों का बजट तहस-नहस कर दिया था और केंद्र सरकार की नीतियों का यह हाल था कि चुनाव से ठीक पहले 50 पैसे प्रति लीटर डीजल के भाव बढ़ा दिए। यह जनता को टेकन फॉर ग्रांटेड चल रहे थे। जनता ने भी तय कर रखा था कि कांग्रेस को सबक सिखाना है। भाजपा ने दिल्ली में शानदार प्रदर्शन किया। असल उलटफेर तो कांग्रेस और आप पार्टी के बीच हुआ। जो सीटें साधारणत कांग्रेस की आतीं वह सीटें आप पार्टी की आ गईं। सवाल अब यह उठता है कि लोकसभा चुनावों में मुश्किल से छह महीने से कम का समय है अब कांग्रेस यहां से आगे कैसे चलेगी? सबसे बड़ा प्रश्न तो नेतृत्व को लेकर है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी का नेतृत्व बुरी तरह एक्सपोज हो गया है। सरदार मनमोहन सिंह न तो तीन में हैं न तेरह में। राहुल गांधी बिल्कुल फिसड्डी साबित हुए हैं। उनके नेतृत्व में पार्टी का लोकसभा चुनाव लड़ने पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। प्रियंका ने साफ कर दिया है कि वह अमेठी और रायबरेली से बाहर नहीं जाएंगी। इस सूरत में सिर्प सोनिया गांधी ही बचती हैं। क्या लोकसभा चुनाव सोनिया बनाम नरेन्द्र मोदी होगा? कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार के अलावा मुझे तो और कोई नेता बतौर प्रधानमंत्री उम्मीदवार स्वीकार्य नजर नहीं आ रहा। कांग्रेस की यह चौतरफा हार 2014 लोकसभा चुनावों को सीधा प्रभावित करेगी। कांग्रेस संगठन पूरी तरह लड़खड़ा गया है, कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटना स्वाभाविक ही है राजनीति में किसी को राइटऑफ करना सही नहीं होता। हमारे सामने कई उदाहरण हैं जब पार्टी लगभग तबाह हो चुकी हो और फिर बाउंस बैक कर जाए। कांग्रेस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है वह बाउंस बैक कर सकती है पर इसके लिए सही नेतृत्व, संगठन और सबसे महत्वपूर्ण है सही मुद्दे उठाना, जनता को सीधे प्रभावित करने वाले मुद्दों पर खास ध्यान देना। इन विधानसभा चुनावों के परिणाम ऐसे वक्त पर आए हैं जब संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है, ऐसे में कांग्रेस और सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी इस सत्र में विपक्ष के हमलों को झेलना। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पराजय के बाद लोकसभा चुनावों से पहले अपनी गलतियों को सुधारने की बात रविवार को कही है। सोनिया ने कहा कि चार राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों को लेकर पार्टी बेहद निराश है। हालांकि साथ ही कहा कि इन नतीजों का आगामी लोकसभा चुनावों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। क्योंकि आम चुनाव बिल्कुल अलग होते हैं। सोनिया ने कहाöहम गम्भीरता से आत्मनिरीक्षण करेंगे और अपनी गलतियों व कामकाज के तरीकों को सुधारने का प्रयास करेंगे। वहीं राहुल ने स्वीकार किया कि वह आप पार्टी से बहुत कुछ सीखे हैं। हम आप की सफलता से सीखेंगे। लोकसभा चुनाव में अब बहुत कम समय रह गया है, देखना यह होगा कि कांग्रेस जनादेश विधानसभा 2013 से क्या सीखी और क्या सुधार करने को तैयार है?

-अनिल नरेन्द्र