अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से साबित कर दिया कि अमेरिका ईरान पर जो युद्ध कर रहा है वह दरअसल उसका अपना युद्ध नहीं। यह सब कुछ ट्रंप इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के कहने पर कर रहे हैं। यह युद्ध ट्रंप ने अमेरिका के हितों के लिए नहीं बल्कि इजरायल के हितों की रक्षा करने के लिए किया है। यह किसी से छिपा नहीं कि ट्रंप को नेतन्याहू ब्लैकमेल कर रहे हैं और वह सब कुछ कहने और करने पर करवा रहे हैं जो वो और शक्तिशाली यहूदी लॉबी करवा रही है। सभी जानते हैं कि ट्रंप ऐसा क्यों कर रहे हैं? इसके पीछे एपस्टीन फाइल्स का भूत है। अगर ऐसा नहीं होता तो ट्रंप ये नई शर्त क्यों डालते। ट्रंप ने हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब, कतर, तुर्किए, मिस्र और जार्डन से ईरान शांति समझौते में शामिल होने की अपील करते हुए इन अरब देशों से कहा कि ईरान से समझौता तभी पूरा माना जाएगा, जब सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किए, मिस्र और जार्डन और बहरीन से अरब मुस्लिम देश अब्राहम अकॉर्ड में शामिल हों। यानि इजरायल को मान्यता दें और उससे रिश्ते जोड़ें। ट्रंप ने आगे चेताया कि जो देश ऐसा नहीं करेंगे, उन्हें अमेरिका-ईरान डील का हिस्सा नहीं होना चाहिए। ट्रंप ने सऊदी व कतर से तुरंत इजरायल से संबंध जोड़ने को कहा। ट्रंप ने आगे कहा, डील के बाद ईरान को भी अब्राहम अकॉर्डस में शामिल करना सम्मान की बात होगी। अब्राहम अकॉर्ड की शुरुआत सितम्बर 2020 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान हुई थी। यह एक कूटनीतिक समझौता था जिसके तहत यूएई और बहरीन ने अधिकारिक तौर पर इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे। बाद में मोरक्को और सूडान भी इस फ्रेमवर्क में शामिल हो गए। दशकों तक अधिकांश अरब मुल्कों का रुख यह था कि जब तक फिलिस्तीन मुद्दे का समाधान नहीं होगा, तब तक वे इजरायल को मान्यता नहीं देंगे। लेकिन इस समझौते ने उस नीति को बदलने की कोशिश की। इस समझौते की सबसे बड़ी आलोचना यह रही कि इसमें फिलिस्तीन मुद्दे को नजरअंदाज कर दिया गया। न तो फिलिस्तीन राज्य को लेकर कोई स्पष्ट रोडमैप दिया गया और न ही इजरायली बस्तियों पर रोम की बात हुई। सभी जानते हैं कि इजरायल एक ग्रेटर इजरायल की भावना पाले बैठा है जिसमें कुछ अरब मुल्कों की जमीनें लेकर एक ग्रेटर (बड़ा इजरायल) बनाना चाहता है और उसमें अब ट्रंप खुलकर बेशमी से मदद कर रहे हैं। पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव को तुरंत खारिज कर दिया। पाकिस्तान ने आज तक इजरायल को अधिकारिक मान्यता नहीं दी है। हालांकि, यह बात पाकिस्तान के लिए इतनी आसान नहीं है, क्योंकि ट्रंप जिस तरह के शख्स हैं और अपनी बात मनवाने के लिए जिस तरह से गैर-राजनीतिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, उससे माना जा रहा है कि हो सकता है कि पाकिस्तान विदेश नीति के सामने आने वाले समय में यह मुद्दा बड़ी चुनौती बनकर सामने आए। सऊदी अरब ने भी इस प्रस्ताव को यह कहकर रद्द कर दिया है कि पहले 1967 की वह स्थिति बहाल करो जब इजरायल जबरन फिलिस्तीन की जमीन काटकर बसाया गया था। तुर्किए ने तो साफ कह दिया कि हमारी तो नीति स्पष्ट है, हम तो इजरायल की मौजूदगी को मानते ही नहीं, इसलिए हमारा इजरायल को मान्यता देने का सवाल ही नहीं उठता। सवाल यह उठता है कि ट्रंप ने आखिर में दांव क्यों चला? ट्रंप ईरान डील को सिर्फ युद्ध रोकने वाला समझौता नहीं रखना चाहते। वे इसे पश्चिम एशिया की नई राजनीतिक व्यवस्था बनाना चाहते हैं। इसलिए सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किए जैसे देशों पर जुड़ने का दबाव दे रहा है। अगर ऐसा होता है तो सबसे बड़ी सफलता इजरायल को मिलेगी। इजरायल को गल्फ में मान्यता मिलेगी।
-अनिल नरेन्द्र
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