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Thursday, 5 November 2026

राष्ट्रपति ट्रंप की साख दांव पर

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव के नतीजे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए महज चुनावी झटका नहीं, बल्कि उनकी सत्ता, नीतियों और राजनीतिक दबदबे पर जनता के बदलते मिजाज का संकेत हैं। जिस जनसमर्थन के भरोसे ट्रंप अमेरिका की राजनीति को अपनी शर्तें पर चलाने का दावा कर रहे थे, चुनावी नतीजे उसी भरोसे में दरार का इशारा करते हैं। यह नतीजे उनके लिए चेतावनी है कि सत्ता की ताकत और आक्रामक राजनीतिक बयानबाजी के दम पर जनमत को हमेशा अपने पक्ष में नहीं रखा जा सकता। ईरान पर हुए हमलों के बाद अमेरिका में जिस तरह पेट्रोल-डीजल, खाने-पीने की वस्तुओं के दाम बढ़े थे उससे जनता में काफी नाराजगी थी। पिछले कई महीनों से आ रहे पोल, सर्वे भी इसी तरह के नतीजे के संकेत दे रहे थे। सर्वे के मुताबिक, अमेरिकी संसद के निचले सदन या प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिवस) पर नियंत्रण हासिल करने के लिए जरूरी 218 सीटों से कहीं ज्यादा सीटों पर डेमोक्रेट्स उम्मीदवार बढ़त बनाए हुए हैं। हाल ही में आए न्यूयार्क टाइम्स के एक सर्वेक्षण में साउथ कैरोलाइना की सीनेट सीट पर मुकाबला बराबर का दिखाया गया था और नतीजे भी अनुमान के मुताबिक ही आए। यह वही राज्य है जहां डोनाल्ड ट्रंप ने 2024 में 18 प्रतिशत अंकों के अंतर से जीत दर्ज की थी। वैसे हाल के वर्षें में कई ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं, जब जनमत सर्वेक्षण (पोल सर्वे) चुनाव नतीजों का सटीक अनुमान नहीं लगा सके। ये मध्यावधि चुनाव डोनाल्ड ट्रंप के लिए अग्नि परीक्षा है। इनका नतीजा तय करेगा कि ट्रंप को अपने कार्यकाल के अगले दो वर्षें में संसद (कांग्रेस) का कितना समर्थन मिलेगा। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनावों की तरह मध्यावधि चुनाव भी हर चार साल में होते हैं। यह चुनाव राष्ट्रपति के ठीक आधे कार्यकाल के दौरान होते हैं। चुनाव वैलेट पेपर के जरिए कराए जाते हैं। इस वजह से अमेरिका में मध्यावधि चुनाव का बहुत ही महत्व होता है। अमेरिका के निचले सदन को प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिवस) में दो साल के कार्यकाल वाले इन प्रतिनिधियों की सभी 435 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। जनसंख्या के आधार पर सीटें तय की जाती है। ऊपरी सदन के सांसदों का कार्यकाल छह साल का होता है। सीनेट में 100 सीटें होती हैं। हर प्रांत के लिए दो सीटें हैं। 50 प्रांतों की कुल 100 सीटें हुईं। इस चुनाव में सीनेट की 35 सीटों के लिए मतदान हो रहा है। इस बार चुनाव में ट्रंप को कई मुद्दों पर चुनौतियां मिल रही हैं। इसमें महंगाई, बढ़ती पेट्रोल-डीजल की कीमतों के अलावा ईरान से जारी जंग बड़ा मुद्दा है। वहीं व्यापार, स्वास्थ्य, इमिग्रेशन सेवाएं, शिक्षा और लोकतंत्र का भविष्य प्रमुख मुद्दे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर हुए कई जनमत सर्वेक्षणों में डेमोक्रेट की बढ़त हासिल हुई थी। संभावित वोटरों के बीच डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को 52 से 53 प्रतिशत तक समर्थन है। जबकि ट्रंप की पाटी रिपब्लिकन उम्मीदवार 44 प्रतिशत के आसपास माने जा रहे हैं। डीसीजन डेस्क एमक्यू के सर्वेक्षण में डेमोक्रेट्स की जीत की 79 प्रतिशत की संभावना है। 16-18 करोड़ (लगभग) पंजीकृत मतदाता वोट डालने के लिए पात्र हैं। अमेरिका में 4 नवम्बर की सुबह लगभग 6 बजे से रुझान और शुरुआती नतीजे आने शुरू हो गए थे (भारतीय समयानुसार)। यह चुनाव भारत के लिए इसलिए मायने रखता है, क्योंकि अमेरिकी संसद के फैसले भारतीय निर्यात, अमेरिका में कार्यरत भारतीय पेशेवरों को सीधा प्रभावित कर सकते हैं। इन चुनावों के परिणाम न केवल अमेरिकी नीतियों को प्रभावित कर सकता है बल्कि पूरी दुनिया पर इसका असर देखने को मिल सकता है। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 3 November 2026

चुनाव की जांच मोसाद करेगी


इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद हाल ही में संपन्न हुए चुनाव में विदेशी दखल के आरोपों की जांच करेगी। इजरायली न्यूज चैनल 12 की रिपोर्ट के मुताबिक इस चुनाव की जांच में आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट भी शामिल होगी। आरोप है कि कतर और कुछ दूसरे देशों ने मंगलवार को हुए नेसेट के चुनाव में अरब वोटर्स को पैसा देकर ज्यादा से ज्यादा वोट डलवाने की कोशिश की। इस चुनाव में अरब पार्टियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए रिकार्ड 19 सीटें जीती हैं। यह इतिहास में उनका सबसे अच्छा प्रदर्शन है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी पार्टी के नेताओं ने भी अरब पार्टियों पर चुनाव में गड़बड़ी के आरोप लगाए हैं। हालांकि इजरायल के केन्द्रीय चुनाव आयोग ने साफ किया है कि जांच का दायरा सीमित है। आयोग के मुताबिक इस मामले से चुनाव के नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ा है और न ही नतीजों पर सवाल उठता है। जैसा आपको मालूम ही है कि इजरायल के इस चुनाव में त्रिशंकु परिणाम आए हैं। किसी को भी बहुमत नहीं मिला है। बेंजामिन नेतन्याहू सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं हैं और तरह-तरह के सत्ता में बने रहने के हथकंडे और सुझाव दे रहे हैं। नेतन्याहू की चालबाजियों को फेल करने के लिए नेतन्याहू विरोधी दल सरकार बनाने का रास्ता निकालने के लिए प्रधानमंत्री का सीधा चुनाव कराने के प्रस्ताव पर विचार कर रहे हैं। इस व्यवस्था के तहत जनता अलग से प्रधानमंत्री चुनेगी और इससे अरब पार्टियों के समर्थन के बिना अल्पमत सरकार बनाने का रास्ता खुल सकता है। द टाइम्स ऑफ इजरायल के मुताबिक हिब्रू मीडिया ने बताया कि विपक्षी गठबंधन इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए कानून लाने पर विचार कर रहा है। सभी वोटों की गिनती के बाद अरब जांईट लिस्ट गठबंधन को 11 सीटें मिली हैं। यह इजरायल के अरब आबादी के अधिकारों की बात करने वाला राजनीतिक गठबंधन है। इनमें तीन अलग-अलग पार्टियां शामिल हैं। गठबंधन में अरब नेताओं के साथ यहूदी नेता भी हैं। उधर प्रधानमंत्री नेतन्याहू के सहयोगी दल यूनाइटेड तोराह जुटाइज्म ने विपक्षी नेता गादी आइजनकोट को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया है। पार्टी को 7 सीटें मिली हैं। चैनल 12 की रिपोर्ट के मुताबिक पार्टी ने समर्थन के बदले हरेदी समुदाय के लोगों को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट देने की मांग की है। इजरायल में आमतौर पर नागरिकों के लिए सेना में सेवा क्षेत्र अनिवार्य है। इजरायल में सरकार बनाने के लिए चुने गए नेता को शुरुआत में 20 दिन का समय मिलता है। जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति इसे 14 दिन और बढ़ा सकते हैं। यानी सरकार बनाने के लिए कुल 42 दिन मिल सकते हैं। इस दौरान नेता को दूसरी पार्टियों से समर्थन जुटाना होता है। अगर नेता 61 सीटों का समर्थन नहीं जुटा पाते तो वह छोटी पार्टियों के सहयोग से अल्पमत सरकार बनाने या दो नेताओं के बीच बारी-बारी से प्रधानमंत्री बनाने का समझौता करने की कोशिश कर सकते हैं। अगर कोई भी गठबंधन सरकार बनाने में सफल नहीं होता तो 90 दिनों के भीतर नए चुनाव कराए जा सकते हैं। इससे नेतन्याहू को एक और मौका मिल सकता है। क्योंकि नए चुनाव होने तक वह कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे। इजरायल में नई संसद के गठन से पहले पार्टियों ने अपने संसदीय दलों के नेताओं के नाम तय करने शुरू कर दिए हैं। गादी आइजनकोट ने अपनी यशार पार्टी से चुने गए सांसद रॉय फौरुमैन को संसदीय दल का नेता चुना है। नई संसद का शपथ ग्रहण 10 नवम्बर को होगा। द टाइम्स ऑफ इजरायल के मुताबिक इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद चुनाव में विदेशी दखल के आरोपों की जांच करेगी। शक है कि कतर और कुछ अन्य देशों ने नेतन्याहू को हराने के उद्देश्य से इजरायल की अरब पार्टियों को आर्थिक मदद की और कहा कि इजरायल में बसे अरब ज्यादा से ज्यादा घरों से निकलकर नेतन्याहू को हराने की कोशिश करें। अगर विदेशी हस्तक्षेप की बात करें तो क्या नेतन्याहू की अमेरिकी राष्ट्रपति ने खुलकर मदद करने की अपील नहीं की? जांच तो अमेरिकी हस्तक्षेप की भी मोसाद और शिन बेट को करनी चाहिए।

- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 31 October 2026

बुरे भंवर में फंसे नेतन्याहू

लोकतंत्र शासन का सबसे बुरा रूप है, सिवाय उन सभी अन्य रूपों के जिन्हें पहले आजमाया जा चुका है, यह बात विंस्टन चर्चिल ने 1949 में ब्रिटेन के निचले सदन हाउस ऑफ कॉमन्स में कही थी। गत मंगलवार रात इजरायल के चुनाव नतीजे सामने आने लगे तो चर्चिल का यह कथन याद आ गया। इजरायल के संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की स्थिति कमजोर दिख रही है। विपक्ष से मिल रही तगड़ी चुनौती ने फिर त्रिशंकु संसद के आसार बढ़ा दिए हैं। अंतिम नतीजे 4 नवम्बर को घोषित किए जाएंगे। यह लिखे जाने तक करीब 95 प्रतिशत वोटों की गिनती हो चुकी है। इजरायली सेंट्रल इलेक्शन कमेटी के मुताबिक, प्रधानमंत्री नेतन्याहू और विपक्षी गठबंधन के नेता गादी आइजनकोट दोनों ही बहुमत से दूर हैं। नेतन्याहू गठबंधन को 53 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि गादी आइजनकोट गठबंधन को 48 सीटें मिलने का अनुमान है। अरब गठबंधन को 19 सीटें मिल सकती हैं। 120 सीटों वाली संसद (नेसेट) में 1973 के बाद सबसे ज्यादा मतदान हुआ। इस चुनाव ने मध्य पूर्व के सबसे स्थापित लोकतंत्र में नई सरकार के गठन का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं दिखाया। नतीजे अनिर्णायक रहे और संसद में किसी भी गुट को बहुमत नहीं मिला। बता दें कि इजरायल में कभी भी एक दलीय सरकार नहीं रही। वहां की चुनाव व्यवस्था ऐसी है कि अलग-अलग पार्टियों को मिलकर गठबंधन सरकार बनानी पड़ती है। 7 अक्टूबर 2023 के घातक हमलों का जवाब कैसे दिया जाए, इसे लेकर भी मतभेद उभरे कि इससे कैसे बचा जाए या हमास को नष्ट किया जाए इसके बाद गाजा युद्ध में बड़ी संख्या में इजरायली रिजर्व सैनिक मारे गए। ऐसे में अति रुढ़िवादी यहूदी युवाओं को सेना में भती से मिली छूट को लेकर विवाद और गहरा गया था। बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पाटी को भारी नुकसान हुआ है। फिर भी वह इजरायली संसद में सबसे बड़ी पाटी बनने की राह पर है। यह सब ऐसे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हो रहा है, जिन पर भ्रष्टाचार और अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए देश को जंग में धकेलने के आरोप हैं। अरब लोगों की इजरायल की कुल जनसंख्या का करीब 20 प्रतिशत है। उनका प्रतिनिधित्व करने वाली अरब पार्टियों को भी बड़ी सफलता मिली है। उन्हें करीब 15 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है। वहीं विपक्षी गुट में गादी आइजनकोट के नेतृत्व में मध्यमागी, वामपंथी और दक्षिणपंथी दलों के सदस्य शामिल थे। लेकिन वे अपनी इच्छा के मुताबिक बदलाव लाने में नाकाम रहे। इतने अलग-अलग विचारों और राजनीतिक हितों को एक सरकार के रूप में साथ लाना अब इजरायल की राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। क्या नेतन्याहू अपने धार्मिक सहयोगियों को छोड़कर विपक्षी गुट के दक्षिणपंथी नेताओं के साथ गठबंधन बनाने को राजी होंगे? और क्या वे नेता, जो लंबे समय से नेतन्याहू के विरोधी रहे हैं, उनके साथ सरकार में शामिल होने के लिए तैयार होंगे? देखना यह भी होगा कि फिलिस्तीनी नेतृत्व वाले अरब दल किंगमेकर बन सकते हैं? रुझानों से इन्हें 19 सीटें मिलने का अनुमान है। प्रचार के दोनों ही गठबंधनों ने अरब दलों का समर्थन लेने की संभावना खारिज कर दी थी। अरब दलों की बढ़ती शक्ति ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। इजरायल के इतिहास में यह पहली बार है जब अरब पार्टियों को इतनी भारी सफलता मिली है। अब प्रयास यह हो रहे हैं कि नेतन्याहू और आइजनकोट मिलकर सरकार बनाएं। आधे-आधे टर्म के लिए सत्ता में रहें। इस सियासी गुत्थी को सुलझाने में थोड़ा वक्त लग सकता है और इससे ट्रंप को भी भारी झटका लगा है। ऐसा पहली बार हुआ है जब अमेरिका के किसी राष्ट्रपति ने इतना खुलकर किसी प्रधानमंत्री का समर्थन किया हो, जैसा ट्रंप ने नेतन्याहू का किया है। ट्रंप ने तो यहां तक दावा किया है कि उनकी वजह से नेतन्याहू यहां तक पहुंचे हैं नहीं तो वह चुनाव हार चुके थे। खैर, अब देखना यह होगा कि इजरायल में कोई सरकार बनती है या नहीं और क्या फिर से चुनाव कराने होंगे? 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 29 October 2026

मार्को रुबियो सीधा जामनगर क्यों गए

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो हाल ही में भारत आए। पर वह हालांकि औपचारिक यात्रा पर आए थे पर वह प्रोटोकॉल के अनुसार राजधानी नई दिल्ली नहीं आए और न ही जैसे आमतौर पर होता है, न तो प्रधानमंत्री से मिले और न ही विदेश मंत्री एस. जयशंकर से। वह सीधे मुंबई गए और वहां वह उद्योगपति मुकेश अंबानी से मिले और उनके साथ जामनगर अंबानी की ऑयल रिफाइनरी देखने चले गए। जामनगर जाना अमेरिका के प्लान का बड़ा हिस्सा है। अमेरिका रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) के इस विशाल रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स की क्षमता को बहुत अच्छे से समझता है। वेनेजुएला के क्रूड को दुनिया में पहुंचाने के लिए यह कॉम्प्लेक्स बहुत बड़ा किरदार निभा सकता है। ऐसे में मार्को रुबियो का जामनगर का दौरा यूं ही नहीं है। रुबियो का यह दौरान ऐसे समय में हुआ जब अमेरिका वेनेजुएला के कच्चे तेल (व्रूड) के लिए नए बाजार तलाश रहा है। अमेरिका भारत से जोर देने में लगा है कि वह रूस से ऊर्जा आयात को कम करके अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाए। मार्को ने जामनगर में मुकेश अंबानी और मुंबई में टाटा और अडानी समूह से भी मुलाकात की। हमें लगता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में पूंजीपति अब अहम हिस्सा बन रहे हैं। जामनगर भारत की ऊर्जा से जुड़ी पेचिदा सियासत की एक खिड़की है। इसी सियासत ने हाल में अमेरिका, रूस और ईरान के साथ भारत के रिश्तों को आकार दिया है। बहस से कहीं आगे जामनगर भारत की ऊर्जा से जुड़ी पेचीदा सियासत की एक खिड़की है। रुबियो की अंबानी, टाटा और अडानी से वार्ता करना यह जरूर दिखाता है कि भारतीय पूंजी और देश की विदेश नीति के बीच रिश्ता गहरा होता जा रहा है। भारतीय कंपनियों का आर्थिक वजन बढ़ रहा है। उनकी पहुंच दुनिया भर में फैल रही है। ऐसे में वह भारत की कूटनीति के तरकश का एक अहम तीर बनती जा रही है। अमेरिकी कारोबार और विदेश नीति के रिश्ते को एक पुरानी कहावत बखूबी बयान करती है। जो जनरल मोटर्स के लिए अच्छा है वो अमेरिका के लिए भी अच्छा है। यानी जो भी अमेरिकी कंपनी अच्छी है वह अमेरिका के लिए भी अच्छी है। दुनिया के नेताओं के साथ मुकेश अंबानी को देखना भारतीय लोगों को शायद अजीब लगता हो। पर ये एक लम्बे बदलाव का नतीजा है। कुछ साल पहले भारत आने वाले विदेशी नेता अक्सर बेंगलूरू में इन्फोसिस कैंपस जाते थे। पर अब सीन शिफ्ट हो गया है। अब लगता है कि विदेशी मेहमानों का ज्यादा फोकस जामनगर व गुजरात पर है। जामनगर में हाईड्रोकार्बन की पुरानी अर्थव्यवस्था है। हाईड्रोकार्बन यानी तेल और गैस जैसे ईंधन। यह दुनिया का सबसे बड़ा रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स है। यहां अलग-अलग किस्म के कच्चे तेल को साफ किया जा सकता है और तैयार इं&धन दुनिया भर के बाजारों में भेजा जा सकता है। 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद जामनगर की अहमियत बढ़ी है। होर्मूज स्ट्रेट से होने वाली तेल सप्लाई में रुकावट ने भी इसकी अहमियत बढ़ाई है। अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था सिर्फ देश ने नहीं बनाई। पूंजी और तकनीक लम्बे समय से सरकारों के पास मौजूद विकल्पों पर असर डालती आई है। समझदार देश अपने यहां पूंजी को कुछ हाथों में जरूरत से ज्यादा सिमटने नहीं देते और दुनिया में इसकी भूमिका की शर्तें खुद तय करते हैं। भारतीय कंपनियां अब सरहदों के पार काम करने और भू-राजनीतिक उथल-पुथल से निपटने का पैमाना हासिल कर रही हैं। ऐसे में वो भारत के विदेशी रिश्तों में ज्यादा अहम खिल़ाड़ी बनेंगी। रुबियो का जामनगर दौरा याद दिलाता है कि आज की भारतीय विदेश नीति को समझने के लिए पूंजीवाद और आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय रिश्तों के उलझे हुए और कभी न टूटने वाले रिश्तों को बेहतर समझना होगा और इसका मतलब है कि दिल्ली की उलझी हुई विदेश नीति वाली बहसों में मुंबई का कारोबारी तर्क और बेंगलूरू की तकनीकी जरूरत भी घोली जाए। अमेरिका की विदेश नीति साफ है, सवाल यह है कि हमारी विदेश नीति क्या साफ है।   

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 27 October 2026

अब भी चीन से झड़पें हो रही हैं

आईटीबीपी के जवानों के लिए हर साल आयोजित होने वाले सम्मान समारोह हिमवीर सम्मान में गुरुवार को आईटीबीपी के डीजी शत्रुजीत कपूर ने चौकाने वाला रहस्योद्घाटन किया कि अरुणाचल प्रदेश सीमा पर अब भी झड़पें जारी हैं। टकराव के दौरान आईटीबीपी के बहादुर कमांडो ने चीनी सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब दिया। जनरल शत्रुजीत सिंह कपूर ने खुलासा किया है कि अरुणाचल प्रदेश में पिछले कुछ महीनों में भारत और चीन के सैनिकों का आमना-सामना हुआ। कई जगह टकराव की स्थिति भी बनी। पिछले कुछ दिनों में ऐसी स्थिति बनी, जब कई जगहों पर भारत-चीन आमने-सामने आ गए। उन्होंने शौर्य कमांडो के असाधारण काम की सराहना की। उन्होंने यह भी कहा कि आईटीबीपी परंपरागत हथियारों का इस्तेमाल करती है। ड्रोन और ड्रोन रोधी तकनीक में निवेश करने और उसे विकसित करने पर उन्होंने जोर दिया और चेतावनी भी दी कि अब परंपरागत हथियारों से चीन का मुकाबला शायद सम्भव न हो क्योंकि चीन ने अपने सुरक्षा बलों को आधुनिक बनाने में भारी निवेश किया है। यह पहली बार है, जब अधिकारिक तौर पर इन झड़पों की पुष्टि हुई है। जनरल कपूर के बयान को लेकर कांग्रेस और विपक्ष ने केन्द्र सरकार को घेरा है। बता दें कि नेता विपक्ष राहुल गांधी ने पहले से ही यह चेतावनी दे दी थी कि चीन सीमा पर अतिक्रमण बढ़ रहा है। इस पर प्रधानमंत्री ने जवाब दिया था कि न तो कोई घुसा है औ न ही कोई आया है। आज राहुल गांधी की चेतावनी सही साबित हुई है। जहां अरुणाचल में भारत-चीन सेना टकरा रही है वहीं भारत सरकार ने आईटीबीपी के जवानों को दिल्ली के जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस में प्रदर्शनकारियों को रोकने में लगा दिया। यह अजीब स्थिति है। खैर, कांग्रेस ने कहा है, इस साल जुलाई से ही चीनी सैनिकों के साथ झड़प की खबरें आ रही हैं, लेकिन मोदी सरकार इन खबरों को दबाने में लगी रही। यहां तक कि चीन को लाल आंख दिखाने की जगह नरेन्द्र मोदी चीन के राष्ट्रपति शी जिन फिंग के साथ हंसी-ठिठोली करते नजर आए। ब्रिक्स सम्मेलन में एक तरफ चीन हमारे सैनिकों के साथ झड़प कर रहा था, दूसरी तरफ मोदी चीन के राष्ट्रपति का स्वागत कर रहे थे। ये हमारे सैनिकों के जख्मों पर नमक झिड़कने जैसा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा एलएसी से जुड़े मुद्दों को सुलझाने के लिए भारत और चीन लगातार बातचीत कर रहे हैं। जैसा कि हमने पहले भी कहा है, भारत-चीन बार्डर पर हालात समय-समय पर बिगड़ जाते हैं। जब चीन सैनिक अपने तय रास्ते से अलग गश्त (पेट्रोलिंग) करने लगते हैं। एलओसी पर बचे हुए युद्धों को सुलझाने, गलतफहमियों को दूर करने और किसी भी गड़बड़ी से बचने के लिए दोनों पक्ष लगातार बातचीत सैन्य रास्तों का इस्तेमाल कर रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे ने कहा कि पीएम मोदी देश और संसद को सीमा की वास्तविक स्थिति बताएं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या डोकलाम और गलवान के बाद एक और गंभीर टकराव की स्थिति बन रही है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि गलवान के बाद चीन को दी गई क्लीनचिट का खामियाजा देश भुगत रहा है। कटु सत्य तो यह है कि चीन की पीएलए हमसे बहुत आगे है। हम उसका मुकाबला नहीं कर रहे हैं। आईटीबीपी के जनरल के इस बयान के बाद, लाल आंखं दिखाने की बातें कहां रह गई ? खोखले दावे और 2020 में चीन को दी गई इस विवादित क्लीन चिट के पीछे की सच्चाई साफ है। द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार पीएलए उँचाई वाले इलाके में भारत की धारणा के मुताबिक भारत के 6-7 किलोमीटर अंदर घुस चुकी है। आईटीबीपी के महानिदेशक के बयान ने पहले ही मुश्किलों में घिरी भारत की सेना का आधुनिकरण होना अति आवश्यक है। सैन्य ताकत केवल लड़ने के लिए नहीं, वार्ता के जरिए मेज पर अपना पक्ष मतजबूती से रखना भी जरूरी है।

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 24 October 2026

जलता फ्रांस

फ्रांस में पिछले कई दिनों से हिंसात्मक आंदोलन हो रहा है। देश भर में इस प्रदर्शनों के दौरान 23,00 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है। आंदोलन में करीब 1000 सुरक्षाकमी घायल हुए हैं। कई शहरों में दुकानों में लूटपाट, आगजनी और सार्वजनिक इमारतों को नुकसान पहुंचाया गया है। महंगाई से शुरू हुआ आंदोलन करीब चार हफ्ते पहले तब शुरू हुआ जब स्कूलों की खराब स्थिति के खिलाफ छात्रों ने प्रदर्शन शुरू किया। यानी की फ्रांस में भी जेन-जी द्वारा आंदोलन शुरू किया गया। बाद में महंगाई, ईंधन, खाद्य पदार्थें की बढ़ती कीमतों के खिलाफ जनता की नाराजगी भी इसमें जुड़ गई। शनिवार को करीब 5 लाख लोग सड़कों पर उतरे थे। इस बीच प्रदर्शनकारियों ने पेरिस के मशहूर लूब्र म्यूजियम का प्रवेश द्वार रोक दिया, जिसके चलते म्यूजियम नहीं खुल सका। फ्रांस के पेरिस, मार्सिले, लियोन और लिमोस समेत शहरों में रात के कर्फ्यू से हालात कुछ शांत हुए हैं। रात में पुलिस हेलीकाप्टरों से गश्त करती रही। पेरिस के आंदोलन में सबसे ज्यादा प्रभावित प्लेस डी ला रिपब्लिकन इलाके में क्रेन की मदद से लगी प्रतिमा से पीली जैकेट हटाई गई। इस आंदोलन में प्रदर्शनकारियों ने जमकर लूटपाट की। लूई विटन, एपल स्टोर सहित कई अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों के शोरूम लूट लिए गए। इस राजनीतिक संकट से राष्ट्रपति मैक्रों ने करीब एक दशक पहले पुरानी राजनीतिक व्यवस्था बदलने, आर्थिक सुधारों को तेजी से लागू करने और देश में व्यवस्था ठीक करने का वादा किया था। लेकिन कार्यकाल के सिर्फ 6 महीने बाकी रहते, प्रदर्शनों ने उन्हें कमजोर राष्ट्रपति साबित कर दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि हिंसा दिखाती है कि अब सरकारी तंत्र का असर कितना कम रह गया है। एक ऐसे नेता की लाचारी खुलकर सामने आई है जो न तो जनता के गुस्से को थाम पा रहा है, जिसके पास खर्च करने के लिए पैसा नहीं बचा है। राजनीतिक समर्थन कमजोर हो चुका है और कानून-व्यवस्था पर पकड़ लगातार ढीली होती जा रही है। फ्रांस की बढ़ती हिंसा के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की आलोचना की है। ट्रंप ने दावा किया कि पेरिस जल्द ही एक मुस्लिम शहर बन जाएगा। उन्होंने फ्रांस में जारी हिंसा के लिए इमिग्रेशन को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि मैक्रों को काफी पहले ही देश की सीमाएं बंद कर देनी चाहिए थी। मैंने उनसे ऐसा करने को कहा भी था। प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस में 46 प्रतिशत लोग ईसाई हैं और करीब 43 प्रतिशत लोग किसी धर्म को नहीं मानते। मुस्लिम आबादी करीब 9 प्रतिशत है। फाक्स न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार कम्युनिस्ट, समाजवादी, मुस्लिम छात्र और फलस्तीन समर्थक समेत कई समूहों ने प्रदर्शन को बढ़ावा दिया है। रिपोर्ट के अनुसार इन 54 संगठनों में 16 छात्र या युवा समूह हैं। बाकी में वामपंथी, राजनीतिक दल, मजदूर संघ, किसान संगठन, नागरिक अधिकार समूह और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया मंच शामिल है। इनमें से कुछ ने प्रदर्शनों में भाग लिया, जबकि अन्य ने इंटरनेट मीडिया या समाचार कवरेज के जरिए आंदोलन का समर्थन किया। 28 कम्युनिस्ट, समाजवादी युवा गठबंधन 12 यूरोपीय देशों में प्रदर्शनों की तैयारी कर रहे हैं। फ्रांस के अलावा इटली अन्य देशों में भी आंदोलन हो रहा है। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 22 October 2026

निशाने पर बॉलीवुड सितारे

बॉलीवुड को एक बार फिर लारेंस बिश्नोई गैंग ने हिलाकर रख दिया है। अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर कातिलाना हमले ने बॉलीवुड को एक बार फिर याद करा दिया कि अंडरवर्ल्ड की दहशत अभी खत्म नहीं हुई है। 2018 में लॉरेंस बिश्नोई की पहली धमकी के बाद आठ साल से वह फिल्म जगत से जुड़ी हस्तियों के लिए खौफ और दहशत का सबब बना हुआ है। अभिनेता सलमान खान को धमकी से शुरू हुआ यह सिलसिला कई अभिनेताओं, गायकों पर हमले हुए हैं, जबकि सलमान के मददगार माने जाने वाले एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी की हत्या भी हो चुकी है। हर वारदात में बिश्नोई गिरोह का जुड़ाव होने से बॉलीवुड सितारे खौफजदा बताए जा रहे हैं। बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर रविवार शाम करीब 7.30 बजे मुंबई में जानलेवा हमला हुआ। जुहू पुलिस स्टेशन से महज 350 मीटर दूर तीन बदमाशों ने उनकी कार पर 5 गोलियां चलाईं। शुक्र है कि गोलियां कार के ग्लास पर लगीं इसलिए टाइगर श्रॉफ बाल-बाल बच गए। हालांकि उनके ड्राइवर फिरदौस के बाएं हाथ में चोट आई। जबकि पास ही वीडियो बना रहे एक फैन योगेश चव्हाण घायल हो गए। पुलिस की 15 टीमों ने हमलावरों की तलाश कर ली है। इस मामले में एक अपडेट सामने आया है। राजस्थान पुलिस की एंटी गैंगस्टर टास्क फोर्स और कोटा पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए 19 अक्टूबर को 3 आरोपियों को कोटा रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक तीनों आरोपी मुंबई से दिल्ली जा रही टेन में सवार थे। पुलिस ने कोटा रेलवे स्टेशन पर उन्हें पकड़ लिया। जानकारी के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों में दो हरियाणा और एक बिहार का रहने वाला है। तीनों में से दो हमलावरों की पहचान बेगुसराय निवासी ऋतिक कुमार और सोनीपत के रेहान के रूप में हुई है, जबकि एक अन्य तीसरा नाबालिग आरोपी भी सोनीपत से है। बता दें कि पिछले 4 साल में लॉरेंस गैंग ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली है। सिद्धू मूसेवाला, मई 2022, सलमान खान अप्रैल 2024, एपी ढिल्लो (गायक) सितम्बर 2024, एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी, अक्टूबर 2024 और रोहित शेट्टी (डायरेक्टर) फरवरी 2026। अभिनेता सलमान खान को धमकी से शुरू सिलसिले में जो हमले शुरू हुए वह थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। सलमान के मददगार माने जाने वाले बाबा सिद्दीकी से लेकर टाइगर श्रॉफ सभी निशाने पर रहे। बॉलीवुड से लॉरेंस बिश्नोई गिरोह की अदावत की शुरुआत 2018 में तब हुई थी, जब लॉरेंस ने जोधपुर कोर्ट में पेशी के दौरान खुले तौर पर सलमान खान को जान से मारने की धमकी दे डाली थी। बताया जाता है कि उसने तब अपने एक गुर्गे को मुंबई भेज दिया था, जो सलमान के घर की रेकी भी कर चुका था। इसके बाद सलमान के घर पर फायरिंग से लेकर सारी बॉलीवुड की हस्तियों और खासतौर पर सलमान खान से जुड़े लोगों को धमकियां देना शुरू कर दी। अप्रैल 2024 में सलमान के बांद्रा स्थित आवास गेलेक्सी अपार्टमेंट के बाहर पांच राउंड फायर करवाई थी। टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग के बाद विपक्ष राज्य सरकार पर हमलावर है। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि मुंबई और पूरे महाराष्ट्र में कानून व्यवस्था बिगड़ गई है। कांग्रेस नेता सचिन रावत ने कहा कि मुंबई अराजकता की चपेट में आ गई है। उन्होंने मुख्यमंत्री और गृहमंत्री देवेन्द्र फडनवीस पर आरोप लगाया कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखने में पूरी तरह विफल हो गए हैं। मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष वर्षा गायकवाड ने महाराष्ट्र के लिए अलग गृहमंत्री की मांग की और इस स्थिति के लिए फडनवीस को जिम्मेदार ठहराया। एनसीपी विधायक रोहित पवार ने कहा कि मुख्यमंत्री हालात नहीं संभाल पा रहे हैं तो गृह विभाग किसी अन्य मंत्री को सौंप दें। उधर बॉलीवुड में पूरी तरह दहशत का माहौल बन गया है। सबको अब अपनी जान-माल का खतरा हो गया है। एक बार फिर मुंबई अंडरवर्ल्ड के कब्जे में न आ जाए? 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 20 October 2026

रिजीम चेंज बनाम तख्ता पलट

सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील प्रशांत भूषण ने गुरुवार को दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित कॉकरोज जनता पाटी (सीजेपी) की प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि वह अब रिजीम चेंज यानी सत्ता परिवर्तन चाहते हैं। इसके बाद हंगामा हो गया। मुझे लगता है कि प्रशांत भूषण ने देवेन्द्र यादव के इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक लेख में यह लिखा था कि हम रिजीम चेंज नहीं चाहते हम चुनाव प्रक्रिया में सुधार चाहते हैं। यादव के इस बयान पर आंदोलनकारियों को बहुत बुरा लगा और अपनी स्थिति साफ करने के उद्देश्य से प्रशांत भूषण ने रिजीम चेंज की बात कही। इसके पहले कि मैं बीजेपी का इस पर क्या जवाब आया मैं पहले बताना चाहता हूं कि रिजीम चेंज का मतलब क्या होता है और क्यों वह लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। मैंने गूगल पर इनका मतलब सर्च किया और जवाब आया ः रिजीम चेंज का हिंदी में सामान्य अर्थ ः शासन परिवर्तन या सत्ता परिवर्तन होता है। इसका मतलब किसी देश की मौजूदा शासन व्यवस्था, सरकार या नेतृत्व को हटाकर उसकी जगह नया नेतृत्व लाना है। इसका मतलब कतई तख्ता पलटना नहीं होता। तख्ता पलटने का आमतौर पर मतलब होता है जब सेना चुनी हुई सरकार को जबरन हटाकर खुद शासन संभाल लेती है। यह हमने कई बार पाकिस्तान में देखा है, अफ्रीका के कई देशों में देख है। लोकतंत्र में सरकार या शासन परिवर्तन लोकतंत्र का मूल हिस्सा है। अन्ना आंदोलन के बाद जनता ने सत्ता परिवर्तन किया था और भाजपा को बाद में शासन मिला। जब रिजीम चेंज की बात करते हैं तो वर्तमान सरकार को चुनाव में हराकर सत्ता परिवर्तन होता है। अगर ऐसा न हो और एक ही सरकार बिना चुनाव जीते सत्ता में सालों-साल बनी रहती है तो वह तो तानाशाही हो जाएगी। इसलिए यह कहना कि रिजीम चेंज का मतलब तख्त पलटना है तो यह सही नहीं है। खैर, इस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पलटवार करते हुए कहा कि विपक्ष का आंदोलन चुनाव सुधारों के लिए नहीं है इनका मकसद अराजकता फैलाना है। वहीं भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि प्रेस कांफ्रेंस से साफ हो चुका है कि इन लोगों की मंशा है देश में तख्ता पलट करना ऐर बिना चुनाव लड़े अपनी सरकार बनाना है। विपक्ष का आंदोलन चुनाव सुधारों के लिए नहीं है, बल्कि सत्ता परिवर्तन के लिए बांग्लादेश की तर्ज पर देश में हिंसा और अराजकता फैलाना है। इस पर कांग्रेस ने राजनाथ सिंह के बयान पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि विपक्ष का तथ्य साफ है और हम चुनाव के जरिए सरकार को हटाना चाहते हैं। कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने अराजकता के सहारे सत्ता परिवर्तन के राजनाथ के आरोप को भाजपा का पाखंड बताया। प्रेस कांफ्रेंस में पवन खेड़ा ने रक्ष मंत्री के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि हमें इस सरकार को हटाना है और इस व्यवस्था को बदलना है। खेड़ा ने कहा चुनावों के माध्यम से सरकार बदलना लोकतंत्र की एक सामान्य प्रक्रिया है। खेड़ा ने 1977 का जिक्र करते हुए कहा-हम तो कह रहे हैं कि रिजीम चेंज करना है। 77 में क्या हुआ था? हर बार जब विपक्ष सड़क पर आता है, कोई भी आंदोलन होता है तो सत्ता परिवर्तन होता है। चुनाव के जरिए ही रिजीम चेंज होता है। खेड़ा ने कहा, भाजपा लोकतंत्र का पालन करने की आदत भूल चुकी है। प्रशांत भूषण ने कहा, अब सरकार कह रही है कि यह तो विपक्ष का रिजीम चेंज का ऑपरेशन है। हम तो अभी चुनावी लोकतंत्र ठीक करने की गुहार लगा रहे थे, लेकिन सरकार की ऐसी बर्बरता चलेगी तो जरूर रिजीम चेंज होगा। रिजीम चेंज के आरोपों पर उन्होंने कहा ः हां हम रिजीम चेंज चाहते हैं, क्या इसमें गलती है? भाजपा रिजीम चेंज के लिए बार-बार आंदोलन करती है और कहती है कि ये लोग तो रिजीम चेंज की साजिश रच रहे हैं। उन्होंने कहा, रिजीम चेंज कराना हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। हमारे संविधान में सरकार के खिलाफ विरोध करना कोई अपराध नहीं है। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 17 October 2026

विपक्ष का सुप्रीम मार्च

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत से मिलने का समय मांगा था। लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने मुलाकात से इंकार कर दिया। विपक्षी नेताओं ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजकर कहा कि वे उनसे मिलकर चुनाव आयोग और कथित वोट चोरी समेत कई मुद्दों पर अपनी चिंताएं उनके सामने रखना चाहते हैं। मुख्य न्यायाधीश ने इस मुलाकात को ठुकराते हुए कहा कि जिन मुद्दों को लेकर मुलाकात का अनुरोध किया गया है, उनसे जुड़े मामले पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। ऐसे मामलों पर अलग बैठक करना न्यायिक मर्यादाओं के अनुकूल नहीं होगा। मुख्य न्यायाधीश ने विपक्षी नेताओं को सुझाव दिया कि वह एक याचिका दायर कर दें। उस पर वह सुनवाई करेंगे। मुख्य न्यायाधीश के सुझाव पर अमल करते हुए तमाम विपक्षी नेता सोमवार को एक मार्च करते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। 12 अक्टूबर को यह मार्च निकाला गया। इत्तेफाक से मुझे इन जुलूस को देखने का अवसर मिला। हुआ यूं कि मैं लगभग 3 बजे अपने कार्यालय प्रताप भवन बहादुर शाह जफर मार्ग जा रहा था। जब हम इंडिया गेट पहुंचे तो तिलक मार्ग का रास्ता बंद था। मजबूरन हमें कॉपरनिक्स मार्ग से मंडी हाउस के रास्ते से जाना पड़ा। मंडी हाउस पहुंचने पर मैंने देखा कि वह पूरी तरह भरा हुआ है। वहां सैकड़ों प्रदर्शनकारी पहुंचे हुए थे। वहां से लेडी इरविन कॉलेज वाला रोड तिलक ब्रिज तक का ब्लाक था। मजबूरन हम बाराखंभा रोड से जाने लगे। बाराखंभा रोड पर सैकड़ों लोग सड़क पर थे। इनमें ज्यादातर वकील थे। वह शांतिपर्वूक खड़े थे या सड़क पर बैठे थे। उन्होंने मेरी गाड़ी को रास्ता दिया और भीड़ में मैं ललित होटल होते हुए कार्यालय पहुंचा। मैंने अपने जीवन में इतनी भीड़ सिर्फ एक बार पहले देखी थी जब रामलीला ग्राउंड में अन्ना आंदोलन हुआ था। पर बाद में मैंने टीवी पर भीड़ देखी तो मैं हैरान हो गया। दिल्ली में वर्षें बाद ऐसी भीड़ देखी। यह भीड़ कोई किराए पर लाए लोग नहीं थे, जो बसों में दबाव के चलते आने पर मजबूर हुए। भीड़ में बुजुर्ग, अन्य उम्र के लोग, लड़के, लड़कियां सभी तरह के लोग थे जो अपने पैसों से अपनी मजी से इस मार्च में शामिल हुए। पुलिस ने भी इस बात पर बहुत नियंत्रण, समझदारी से काम किया। उन्होंने कहीं भी किसी प्रकार की जोर-जबर्दस्ती नहीं की। भीड़ इतनी थी कि राहुल गांधी, प्रियंका की जान को खतरा हो सकता था। हालांकि उनको जेड प्लस की सुरक्षा मिली हुई है जिसमें 45-50 सुरक्षा गार्ड होते हैं, उस दिन मुश्किल से चार-पांच ही नजर आए। राहुल, प्रियंका को थोड़ा अपनी सुरक्षा पर ध्यान देना जरूरी है। ऐसी अनियंत्रित भीड़ में कुछ भी हो सकता है। खैर 11 विपक्षी नेताओं ने एसआईआर में बड़े स्तर पर नाम काटने और गड़बड़ी के आरोप लगाते हुए संयुक्त याचिका दायर की। इसमें निर्वाचन आयोग, सीईसी ज्ञानेश कुमार और दोनों निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधु व विवेक जोशी पक्षकार बनाए गए हैं। वोट चोरी को लेकर दिल्ली की सड़कों पर 7 दिन से लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। इससे पहले बाराखंभा रोड से विपक्ष का सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च शुरू हुआ तो राहुल गांधी ने अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और सुप्रिया सुले समेत कई दूसरे नेताओं को भी बुलाया। एआईएसए (आईसा) की नेहा वोरा भी गाड़ी में मौजूद थीं। मार्च के दौरान जब राहुल गांधी पहले आगे बढ़ने के लिए निकले तो उनके आसपास लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई। इससे कुछ देर तक धक्का-मुक्की जैसी स्थिति बन गई। भीड़ को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो गया। इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि दोनों में एक अहम मुद्दे पर लोगों को सड़कों पर आने के लिए मजबूर होना पड़े। और जब कोई जवाबदेही को तैयार न रहे तो एक ही रास्ता न्याय के लिए बचता है वह है सुप्रीम कोर्ट का द्वार और यही विपक्ष ने किया। न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 15 October 2026

नाराजगी क्या सिर्फ चुनाव आयोग से है या?

10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों को लेकर सरकार की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों को जिस बर्बरता से रोकने की कोशिश हुई उस पर सवाल उठ रहे हैं। 2026 में युवाओं से जुड़े विरोध प्रदर्शनों का दायरा अब सिर्फ रोजगार या परीक्षा तक सीमित नहीं रहा है। परीक्षा और रोजगार के सवालों से शुरू हुआ जेन-जी आंदोलन के बाद अब मतदाता सूची और चुनाव आयोग को लेकर भी जेन-जी और विपक्षी दलों के प्रदर्शन हो रहे हैं। आज का सवाल यह है कि युवा किन मुद्दों पर सड़कों पर आ रहे हैं और क्यों? क्या रोजगार की चिंता धीरे-धीरे संस्थाओं पर भरोसे की चिंता में बदल रही है? क्या परीक्षा में निष्पक्षता का सवाल और चुनाव में निष्पक्षता का सवाल, दोनों के पीछे व्यवस्था से न्याय मिलने के भरोसे का सवाल है? यह कुछ प्रश्न थे जिसको लेकर 10 अक्टूबर को राजधानी में ऐसा प्रदर्शन हुआ जो पहले कभी नहीं देखा गया था। जिस तरीके से प्रशासन-सरकार ने इससे निपटने के लिए हथकंडे अपनाए उससे सारी दुनिया में भारत की छवि खराब हुई। विदेशी मीडिया ने इस घटना को बड़ी कवरेज दी। और तो और पाकिस्तानी अखबार द डॉन ने अपनी रिपोर्ट में इस प्रदर्शन को भारत के पीएम मोदी के खिलाफ युवाओं का विद्रोह करार दिया। अखबार लिखता है कि यह पहली बार है जब कोई वायरल ऑनलाइन यूथ मूवमेंट सोशल मीडिया से निकलकर सीधे सड़कें पर आ गया है। द डॉन ने सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके के 2.2 करोड़ इंस्टाग्राम फॉलोअर्स और युवाओं के बीच बढ़ती लोकप्रियता को भी हाइलाइट किया है। अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि एक तरफ दिल्ली की सड़कें  पर अफरा-तफरी का माहौल था, तो दूसरी तरफ संसद में मुस्कुराते हुए मिस्टर मोदी शांति की छवि पेश करने की कोशिश कर रहे थे और उन्होंने प्रदर्शनकारियों की मांगों को संबोधित नहीं किया। अखबार ने लिखा है कि सत्ताधारी बीजेपी ने भारत के युवाओं के भारी गुस्से को कमतर आंकने की गलती की है। साथ ही रिपोर्ट में कहा गया है कि पीएम मोदी की एक स्ट्रांगमैन वाली छवि में भी अब दरारें दिख रही हैं। न्यूयार्क टाइम्स ने सरकार समर्थक टीवी चैनलों पर भी तंज कसा कि जिन्होंने पहले इस प्रदर्शन को नजरअंदाज किया, वे बाद में संसद के आसपास दहशत का माहौल दिखाते नजर आए। बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट में जंतर-मंतर पर तिरंगा और तख्तियां लिए प्रदर्शनकारियों और संसद की ओर जाने वाले रास्तों पर सुरक्षा बलों की भारी घेराबंदी के बीच टकराव को दिखाया है। रिपोर्ट में जिक्र है कि पुलिस के पीछे धकेलने पर कई प्रदर्शनकारी सिर से खून बहते हुए या लंगड़ाते हुए जंतर-मंतर की तरफ लौटे। बीबीसी के मुताबिक यह आंदोलन पीएम मोदी के खिलाफ हाल के वर्षें में असंतोष का सबसे बड़ा चेहरा बन गया है। फाईनेंशल टाइम्स के मुताबिक पुलिस ने भीड़ पर आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठियां बरसाईं। अखबार का मानना है कि यह प्रदर्शन मोदी सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती बन सकता है। रिपोर्ट में प्रदर्शनकारियों के उस नारे का विशेष जिक्र है, जिसमें वे चिल्ला रहे थे ः जब भी मोदी डरता है, पुलिस को आगे करता है। बिजनेस न्यूज ब्लूमबर्ग के अनुसार प्रदर्शनकारियों ने पीछे हटने से इंकार कर दिया है, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ गया है। ब्लूमबर्ग ने चेताया है कि यह बढ़ता असंतोष अगले साल मई तक होने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में बीजेपी के लिए यह एक बड़ा टेस्ट साबित होगा। वहीं वॉल स्ट्रीट जर्नल ने भी इसे पीएम मोदी के सामने सालों की सबसे बड़ी चुनौती करार दिया है। ब्रिटिश अखबार द गार्डियन ने अपनी हैडलाइन में लिखा हजारों सीजेपी प्रदर्शनकारियें ने पुलिस को चुनौती देते हुए दिल्ली में मार्च किया। इस भीड़ में मुख्य रूप से छात्र और जेन-जी युवा शामिल थे, जो मोदी सरकार से इस बात को लेकर बेहद नाराज हैं कि सरकार ने युवाओं को निराश किया है। द गार्डियन ने नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों में युवाओं द्वारा सरकारें गिराए जाने का हवाला देते हुए लिखा कि भारत में उस स्तर का विरोध प्रदर्शन हाल के वर्षें में एक असमान्य घटना है। सुरक्षा बलों की बर्बरता व सख्ती से विरोध के स्वर बेशक कुछ समय तक शांत किए जा सकते हैं, लेकिन अब यह आंदोलन रुकने वाला नहीं लगता। समस्या का हल तो संवाद से ही संभव है, जिसकी पहल की संभावना फिलहाल सरकार की ओर से नजर नहीं आ रही है। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 13 October 2026

विपक्ष महामहिम की शरण में

विपक्षी इंडिया गठबंधन के प्रतिनिधिमंडल ने शुक्रवार रात महामहिम से मुलाकात की। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने वालों में मल्लिकार्जुन खरगे, कांग्रेस अध्यक्ष, राहुल गांधी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष, ममता बनर्जी, तृणमूल कांग्रेस प्रमुख, उमर अब्दुल्ला, मुख्यमंत्री जे एंड के, सुप्रिया सुले, एनसीपी (शरद पवार) सांसद, मनोज झा, आरजेडी सांसद व अन्य विपक्षी नेता शामिल थे। विपक्षी प्रतिनिधिमंडल की ये मांगें प्रमुख थी जो उन्होंने महामहिम के समक्ष रखी। पहली-मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा और सीईसी-ईसी को आजीवन कानूनी छूट देने वाले 2023 के कानून को रद्द किया जाए। दूसरा-एसआईआर पर तत्काल रोक लगे और मतदाता सूची से कथित तौर पर हटाए गए 13.30 करोड़ मतदाताओं के नाम बहाल किए जाएं। तीसरा-सभी चुनावों में बैलेट पेपर की व्यवस्था वापस लाई जाए। चौथा-पिछले दो वर्षें में हुए उन सभी चुनावों (विधानसभा) को रद्द किया जाए, जिनमें विपक्ष के मुताबिक वोट चोरी के निर्णायक सुबूत पेश किए गए हैं। विपक्षी सांसदों ने राष्ट्रपति से मुलाकात को संतोषजनक बताया। इससे पहले विपक्षी दलों के नेताओं ने मार्च निकालते हुए राष्ट्रपति भवन की ओर बढ़े तो पुलिस ने 10 लोगों की अनुमति होने का हवाला देते हुए उन्हें विजय चौक पर रोक लिया। विपक्ष 150 सांसदों के साथ मिलना चाहता था। विपक्षी नेता मांगें मंगवाने के लिए धरने पर बैठ गए। बाद में एक प्रतिनिधिमंडल को राष्ट्रपति के पास भेजने पर तैयार हो गए। राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा-हमने राष्ट्रपति को सौंपे गए ज्ञापन में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को स्थगित करने और 13.3 करोड़ मतदाताओं के अवैध तरीके से काटे गए नाम को फिर से बहाल करने की मांग की। राष्ट्रपति को सौंपे गए ज्ञापन में साफ तौर पर आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने भारतीय लोकतंत्र को नष्ट करने की साजिश रची है। राहुल ने बाद में संवाददाताओं से बात करते हुए दावा किया कि राष्ट्रपति ने हमारी बात का बिलकुल भी खंडन नहीं किया। उन्होंने (राहुल के अनुसार) चुनाव में धांधली के सुबूत मांगे जो उन्हें सौंप दिए जाएंगे। चुनाव चोरी किए गए हैं राहुल ने कहा। हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, दिल्ली और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में धांधली करके जीत हासिल की और अब तक 24 चुनाव चोरी हुए हैं। राहुल ने कहा मुझे उम्मीद थी कि राष्ट्रपति इस बात से इंकार करेंगी कि वोट चोरी हो रही है लेकिन मैं हैरान और स्तब्ध रह गया कि उन्होंने हमारी बात मान ली। बता दें कि यह नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का कहना है, राष्ट्रपति भवन से ऐसी कोई पुष्टि नहीं हुई है। देखना अब यह होगा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की इस पर क्या प्रतिक्रिया होती है? बता दें कि संविधान के अनुसार चुनाव आयोग राष्ट्रपति को रिपोर्ट करता है। सम्भव है कि राष्ट्रपति यह ज्ञापन चुनाव आयोग को भेजे और उनसे जवाब तलब करे। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 8 October 2026

वोट छीनना संविधान के खिलाफ

पिछले तीन-चार महीने से पूरे देश में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और उनके द्वारा वोट चोरी को लेकर आंदोलन हो रहे हैं। कॉकरोच जनता पार्टी ने जून से इस आंदोलन को नीट पेपर लीक और अन्य परीक्षाओं के लीक होने से शुरू हुआ यह आंदोलन तब जोर पकड़ गया जब इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर चुनाव आयुक्तों में मतभेदों को लेकर छपी तब पूरे देश में आंदोलन छिड़ गया और यह दिन-प्रतिदिन बड़ा होता जा रहा है। इस बीच, पूरे देश की नजरें अब सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हुई हैं जहां दर्जनों याचिकाएं, चुनाव प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के आचरण को लेकर टिकी हुई हैं। इस बीच माननीय सुप्रीम कोर्ट के एक सिटिंग जज के इस पूरे प्रकरण पर विचार आए तो पूरे देश में उम्मीद की नई किरण जगी है। मैं बात कर रहा हूं सुप्रीम कोर्ट के माननीय सिटिंग जज जस्टिस उज्जवल भुईयां की। हैदराबाद के नालसार लॉ यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा है कि भारतीय नागरिक को वोट डालने का अधिकार संविधान की मूल संरचना का अंतिम हिस्सा है। अगर किसी प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में नागरिकों को मताधिकार से वंचित किया जाता है तो ऐसी प्रकिया मनमानी होगी। जस्टिस भुईयां ने कहा कि कोई भी बहाना नागरिकों को वोट का अधिकार छीनने को उचित नहीं कहा जा सकता। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 326 का उल्लंघन होगा। जस्टिस भुईयां ने आगे कहा कि 18 साल की आयु पूरा करने वाले नागरिक संविधान में निर्धारित अयोग्यताओं को छोड़कर चुनाव में वोट देने का हकदार है। इन संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन करने वाला कानून अमान्य होगा। जस्टिस ने कहा कि मताधिकार नागरिकता की आत्मा है। आम नागरिक के लिए देश के शासन में भागीदारी का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम मतदान ही है। हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर चुनाव आयोग के वोटिंग लिस्ट में बदलाव की प्रक्रिया-स्पेशल इंटेंसिव रिविजन  (एसआईआर) का जिक्र नहीं किया। जस्टिस भुईयां मतदाता सूची से नाम हटाने के मामले में प्रक्रियात्मक सुरक्षा का भी सवाल उठाया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के लाल बाबू हुसैन बनाम इलेक्टोरल रजिस्टेशन ऑफिसर मामले के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मृत मतदाता को छोड़कर किसी भी मतदाता का नाम नोटिस और सुनवाई का उचित अवसर दिए बिना मतदाता सूची से नहीं हटाया जा सकता। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची में शामिल होने का अधिकार नागरिकता से अलग नहीं किया जा सकता। इसे नागरिक से अलग करना ऐसा होगा जैसे शरीर से आत्मा निकाल देना। आम नागरिक के लिए देश के शासन में भागीदारी का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम मतदान ही है। जस्टिस भुईयां ने नालसार के छात्रों से कहा, आपने देश-दुनिया को दिखाया है कि यूनिवर्सिटी और खासकर कानून के छात्र को कैसा होना चाहिए। आप प्रतिभाशाली, निर्भीक और बहादुर हैं। याद रहे कि यही वह यूनिवर्सिटी है जब कुछ छात्रों ने सीजीआई सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में प्रस्तावित मुख्य अतिथि बनाने का विरोध किया था। कांग्रेस ने जस्टिस भुईयां की राय पर कहा कि इससे साबित होता है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने संविधान का उल्लंघन किया है। उनके पास पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है।  

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 6 October 2026

उस वक्त भी मैं हनुमान चालीसा पढ़ रहा था

यह कहना है भारतीय मूल के पायलट स्मित मच्छार का जब वह अपनी और 170 विमान यात्रियों को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। पीएम मोदी ने शुक्रवार को भारतीय पायलट स्मित मच्छार से 9 मिनट वीडियो कॉल की। पीएम ने कहा, आज पूरा देश गर्व से कह सकता है कि हम हिन्दुस्तानी दूसरों की जान बचाने के लिए खुद को भी जोखिम में डालने वाले लोग हैं। स्मित ने उस पल का अनुभव साझा करते हुए कहा कि मैं अपनी लाइफ के लिए लड़ रहा था, मैं नीचे गिर गया था, घाव हो चुके थे और मैं फंस गया था। उन्होंने कहा कि जब भी दर्द होता है तो मैं हनुमान चालीसा ही बोलता हूं और उस वक्त भी मैं हनुमान चालीसा ही बोल रहा था और मुझे पता है कि भगवान हनुमान ने ही मुझे बचाया। दुबई से तेल अवीव (इजरायल) जा रहे फ्लाईदुबई के विमान में कैप्टन स्मित मच्छार ने जिस अदम्य साहस का परिचय दिया, वह वाकई ही बेमिसाल है। स्मित ने बताया कि मैं 17 साल से जहाज उड़ा रहा हूं। पिछले 11 साल से कैप्टन हूं और मुझे पता चलता है, आंख बंद करके भी जहाज में क्या हो रहा है। जब मैं नीचे गिरा हुआ था, तब मुझे एहसास हो रहा था कि एयरक्राप्ट नीचे जा रहा है। मैंने अपने आप से कहा कि स्मित बस एक लास्ट पुश और दरवाजा खोल दे। तब मैंने किसी तरह  दरवाजा खोला और बाकी सब आ गए और सबने अपना रोल निभाया। मुझे बस ये पता था कि मैं उन सबको मरने नहीं दे सकता। यूएई की सरकारी समाचार एजेंसी डब्ल्यूएएम के मुताबिक संयुक्त अरब अमीरात के प्रॉस्टिक्यूटर जनरल ने शनिवार को कहा कि फ्लाईदुबई की उड़ान एफ जेड 1073 के को-पालयट ने उड़ान के दौरान आतंकवादी हमला किया और विमान को क्रैश कराने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि पायलट ने कॉकपिट के अंदर व्रैश एक्स से पायलट पर हमला किया और विमान का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की कोशिश की। व्रैश एक्स आमतौर पर कॉकपिट में रखा जाता है और दुर्घटना जैसी आपात स्थितियों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने कहा कि घटना की परिस्थितियों, हमले के मकसद और इससे जुड़े किसी भी संबंध का पता लगाने के लिए जांच जारी है। उधर इजरायली  प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि को-पायलट ओमानी नागरिक है। हालांकि फ्लाईदुबई ने किसी आधिकारिक रूप से को-पायलट की राष्ट्रीयता के बारे में कुछ भी नहीं कहा है। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भी को-पायलट ओमान का नागरिक है। अधिकारियों ने बताया कि 2024 में ओमान एयर में को-पायलट ट्रेनी पर काम करने के दौरान को-पायलट हमाम अल हमामी के पास चरमपंथ से जुड़ी सामग्री पाई गई थी। इसके बावजूद उसे एयरलाइन में प्रशासनिक भूमिका में काम जारी रखने की अनुमति दी गई थी। इस घटना ने एक बार फिर विमानन क्षेत्र की अपनी सुरक्षा व्यवस्थाओं पर गंभीरता से पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। विमानन सुरक्षा के सामने एक नया सवाल पैदा होता है। अब तक सुरक्षा का बड़ा हिस्सा बाहरी खतरे को लेकर व रोकने पर केंद्रित रहा है। 9/11 के बाद कॉकपिट के दरवाजे मजबूत किए गए, यात्रियों की स्क्रीनिंग कड़ी हुई,  सामान की जांच के तरीके बेहतर हुए और संदिग्ध गतिविधियों पर निगरानी बढ़ी है। लेकिन फ्लाईदुबई की घटना बताती है कि सुरक्षा की अगली चुनौती विमान के भीतर मौजूद ऐसे संभावित खतरों की पहचान के रूप में हो सकती है। पायलटों की मानसिक सेहत की लगातार जांच करने के लिए  बेहतर सिस्टम की जरूरत है। लेकिन ये हो कैसे ये चुनौती है। भारत में आए दिन पायलटों के नशे में होने की शिकायत आती रही है। सीएनएन ने लिखा कि फ्लाईदुबई की उड़ान में कैप्टन पर हमला करने वाले संदिग्ध पायलट को ओमान की राष्ट्रीय एयरलाइन की नौकरी से हटा दिया गया था, ऐसा उसके चरमपंथी विचारों को लेकर किया गया था। फिर इसको फ्लाईदुबई ने विमान उड़ाने की अनुमति क्यों दी? मामले की जांच हो रही है। यूएई में कई लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ जारी है। सोशल मीडिया में एक अलग कहानी चल रही है। ईरान और ही कुछ बता रहा है। क्या हुआ, कैसे हुआ, किसने करवाया यह तो वास्तविक जांच से ही पता चलेगा? पता चले भी या नहीं वैसे किसी ने ठीक ही कहा हैः सॉरी ब्रोः फ्लाप शो, बैड स्क्रिप्ट। 

 अनिल नरेन्द्र