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Thursday, 27 August 2026

नृपेंद्र मिश्र बनाम चंपत राय


श्री राम जन्म भूमि ट्रस्ट में चढ़ावा को लेकर की गई चोरी के विवाद में एक नया मोड़ आ गया है। राम मंदिर ट्रस्ट से इस्तीफे के बाद चंपत राय का एक 9 पन्नों का दूसरा पत्र सामने आया है। इसमें उन्होंने मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र की भूमिका को लेकर कई दावे किए हैं। चंपत राय ने आरोप लगाया कि मंदिर निर्माण से जुड़े कई फैसले समिति की बैठक में लिए जाते थे लेकिन बाद में उनमें बदलाव कर नृपेंद्र मिश्र के फैसलों को प्राथमिकता दी जाती थी। उन्होंने यह भी कहा कि कई मामलों में समिति के दूसरे सदस्यों के सुझाव और फैसलों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। चंपत राय ने अपने पत्र में बताया कि राम मंदिर निर्माण के लिए गठित ट्रस्ट में कुल 15 ट्रस्टी थे और नृपेंद्र मिश्र को निर्माण समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। उनके अनुसार नृपेंद्र मिश्र के ही सुझाव पर लार्सन एंड टूब्रो को मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी दी गई। मंदिर और अन्य भवनों के डिजाइन से जुड़े काम के लिए नोएडा की डिजाइन एसोसिएट फर्म का चयन किया गया। चंपत राय ने नृपेंद्र मिश्र पर सीधा आरोप लगाया कि निर्माण समिति में उन्होंने अपने लोगों को ही शामिल किया। उन्होंने दावा किया कि इनमें से कुछ लोग 6 वर्षों के दौरान सिर्फ एक या दो बार ही अयोध्या आए। चंपत राय के अनुसार एनबीसीसी के चेयरमैन अनूप मित्तल लगातार नृपेंद्र मिश्र के साथ निर्माण समिति की बैठकों में शामिल होते थे। बता दें कि चंपत राय ने मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कथित चोरी का मामला सामने आने के बाद 26 जून को महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद 6 जुलाई को ट्रस्ट की बैठक में उनका इस्तीफा मंजूर हो गया था। इसी दिन चंपत राय ने एक पत्र जारी कर ट्रस्टी अनिल मिश्र की भूमिका पर गंभीर आरोप लगाए थे। चंपत राय ने अपने पत्र में आगे कहा कि मंदिर निर्माण के सभी निर्णयों में नृपेंद्र मिश्र ने सदैव अपने को प्रमुख रखा। उन्होंने यह भी बताने की कोशिश की कि मंदिर निर्माण की सबसे पावरफुल मंदिर ट्रस्ट से ऊपर चलकर मंदिर निर्माण समिति रही जिसके चेयरमैन नृपेंद्र मिश्र हैं। चंपत राय जी ने सारा चढ़ावा चोरी प्रकरण में अपने आप को पाक साफ दर्शाने की कोशिश की है। सारा दोष अनिल और नृपेंद्र मिश्र पर मढ़ने की कोशिश की है। आप ट्रस्ट के महासचिव थे, आपकी क्या ड्यूटी थी? नृपेंद्र मिश्र के अनुसार श्री राम जन्म भूमि ट्रस्ट के चढ़ावे की डकैती हो रही थी और आपको पता नहीं चला। बेशक आप अपनी ऊंची पोजीशन और संपर्क से फिलहाल बच जाएं पर भगवान राम आपको कभी माफ नहीं करेंगे। आपने और आपके तमाम साथियों ने करोड़ों हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुंचाई है, वैसे आपको कभी क्षमा नहीं किया जा सकता। रहा सवाल नृपेंद्र मिश्र का तो उन्होंने चंपत राय के आरोपों के जवाब में कहा कि मैंने चंपत राय का कोई भी पत्र नहीं देखा है। उन्होंने साथ ही कहा कि अगर ऐसा कोई पत्र है भी तो उसमें उनके खिलाफ इस तरह की बातें नहीं लिखी गई होंगी। साफ है कि अब चंपत राय बदला लेने के मूड में हैं और यह विवाद अभी और आगे बढ़ेगा। -
अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 25 August 2026

महंगी चीनी : क्या वजह इथेनॉल तो नहीं?



भारत में चीनी के दाम पिछले कुछ महीनों से तेजी से बढ़ रहे हैं। राइटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार केवल इसी महीने भारत में चीनी की कीमतों में 20 फीसदी इजाफा हुआ है। भारत सरकार के उपभोक्ता मामलों के विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार 20 अगस्त को भारत की खुदरा बाजार में चीनी की कीमत 55.7 रुपए प्रति किलोग्राम थी। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, एक महीने पहले चीनी की कीमत 48.18 रुपए प्रति किलोग्राम थी। 20 अगस्त 2025 को इसकी कीमत 46.3 रुपए प्रति किलोग्राम थी। बाजार के जानकारों का कहना है कि चीनी के दाम इससे पहले कभी इतने ऊंचे नहीं गए। सवाल यह भी पूछा जा रहा है कि क्या पेट्रोल में मिलाए जाने वाले इथेनॉल से चीनी महंगी हुई है? कच्चे तेल की खपत के मामले में अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया में तीसरे नंबर पर है। लेकिन भारत में इस्तेमाल होने वाले कच्चे तेल का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है। इस आयात को कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने, आत्मनिर्भरता बढ़ाने और प्रदूषण कम करने के लिए केन्द्र सरकार ने 2018 में पेट्रोल में मिलाए जाने वाले इथेनॉल की मात्रा को 10 फीसदी से बढ़ाकर 20 फीसदी करने का फैसला किया था। यह लक्ष्य 2030 में हासिल किया जाना था लेकिन सरकार ने इसे जुलाई 2025 में ही हासिल कर लिया। भारत में चीनी उद्योग सरकारी नियंत्रण के तहत आता है। चीनी मिलों को किसानों से खरीदे गए गन्ने के लिए कितना एमआरपी देना होगा यह केन्द्र सरकार तय करती है। सरकार यह भी तय करती है कि कौन सी चीनी मिल हर महीने कितनी चीनी बेच सकती है और चीनी का निर्यात किया जा सकता है या नहीं। देश में बड़े पैमाने पर इथेनॉल खरीदने वाला ग्राहक भी सरकार ही है और इस तरह इथेनॉल की कीमत भी अप्रत्यक्ष रूप से सरकार ही तय करती है। राइटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार 2025-26 के चीनी वर्ष में 30 लाख टन चीनी का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने के लिए किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह देश में चीनी के कुल उत्पादन का करीब 10 फीसदी है। गन्ने के रस के अलावा चीनी बनाने के दौरान तैयार होने वाले सिरप, ए-हेवी मोलासिस, बी-हेवी मोलासिस और सी-हेवी मोलासिस से भी इथेनॉल बनाया जा सकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में उत्पादित कुल इथेनॉल का करीब एक तिहाई हिस्सा गन्ने से तैयार किया गया था। दूसरी तरफ सरकार ने शुक्रवार को कहा कि चीनी की बढ़ती कीमतों के लिए पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने के कार्यक्रम को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। सरकार ने कहा कि देश में उत्पादन अनुमान से कम रहने, त्यौहारी सीजन से पहले मांग बढ़ने और इंडस्ट्री के एक हिस्से की ओर से जमाखोरी के चलते चीनी के दाम उछले हैं। हालांकि मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त मात्रा में चीनी उपलब्ध है। मंत्रालय ने इथेनॉल ब्लैडिंग प्रोग्राम के चलते दाम बढ़ने की बात खारिज की। कहा, इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के उपयोग को कीमतों में हालिया बढोत्तरी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उधर सरकार ने चीनी की कीमतों की वृद्धि को देखते हुए 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन गैर-परिष्कृत चीनी के ड्यूटी-फ्री (शुल्क मुक्त) आयात को मंजूरी दे दी है। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि त्यौहारी सीजन में चीनी के बढ़ते दामों की कड़वाहट और न बढ़े। एक दिन पहले, सरकार ने 10 लाख टन से ज्यादा चीनी का इस्तेमाल करने वाले कारोबारियों के लिए चीनी की स्टॉक सीमा 15 दिन तय कर दी थी।

- अनिल नरेन्द्र

Saturday, 22 August 2026

अमेरिका-ईरान जंग का न्यूक्लियर होने का खतरा


अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अब परमाणु हमले की धमकियों तक पहुंच गया है। इससे सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देशों में हड़कंप मचा हुआ है। दरअसल, अमेरिका की पूर्व कांग्रेस वुमन मार्जेरी टेलर ग्रीन ने दावा किया था कि डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर न्यूक्लियर अटैक की योजना बना रहे हैं। इसके बाद ईरानी सांसद फिदा हुसैन मलेकी ने सख्त चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका ने परमाणु हमला किया तो ईरान भी उसी हथियार और उसी भाषा में पलटवार करेगा। अमेरिका की पूर्व कांग्रेस सुमन मार्जेरी टेलर ग्रीन ने ट्रंप की न्यूक्लियर अटैक वाली प्लानिंग लीक कर दी थी। उनहोंने दावा किया था कि वो ईरान पर परमाणु बम फोड़ने के बारे में विचार कर रहे हैं। इस बीच ईरान ने भी ऐसा ही ऐलान कर दिया है। क्या हम यह मानें कि ईरान ने भी कोई परमाणु हथियार बना लिया है? जिस भाषा का ईरान इस्तेमाल कर रहा है उसका मतलब तो साफ है कि अगर तुमने हम पर परमाणु हमला किया तो हम भी परमाणु हमले से जवाब देंगे। एएनआई के अनुसार, ग्रीन ने भी आरोप लगाया कि ट्रंप प्रशासन अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के उन आकलनों को स्वीकार नहीं कर रहा, जिनके मुताबिक ईरान परमाणु हथियार विकसित करने के मुहाने पर नहीं है। व्हाइट हाउस ने ग्रीन के दावे पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। अमेरिकी सरकार या रक्षा अधिकारियों ने भी सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी योजना की पुष्टि नहीं की। अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग अब उस डरावने मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां परमाणु हमले की धमकियां खुलेआम दी जाने लगी है। अगर डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर एटम बम फोड़ने की बेवकूफी की तो क्या होगा? इस एक सवाल ने न सिर्फ वाशिंगटन और तेहरान में बल्कि पूरे खाड़ी देशों में भी हड़कंप मचा दिया है। सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देश अब थर-थर कांप रहे हैं, क्योंकि ईरान ने साफ कह दिया है कि अगर किसी भी खाड़ी देश ने अमेरिका को मदद की तो उसे भी भस्म होने से कोई नहीं बचा पाएगा। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के सदस्य फिदा हुसैन मलेकी से सीधा सवाल पूछा गया कि अगर ट्रंप ने सच में परमाणु बम फोड़ दिया तो ईरान क्या करेगा? इस पर मलेकी ने बिना झिझक कहा, अगर ऐसा कोई हमला होता है तो ईरान भी उसी भाषा और उसी हथियार से जवाब देगा। हालांकि मलेकी ने खुलकर ये नहीं माना है कि ईरान के पास इस समय परमाणु बम तैयार है या नहीं, लेकिन उनके इस बयान ने अमेरिका और उसके सहयोगियों के पसीने छुड़ा दिए हैं। उन्होंने दावा किया कि ईरान के पास कई ऐसे हथियार हैं जो न केवल खतरनाक हैं, बल्कि आधुनिक हैं जो अभी दुनिया के सामने आए ही नहीं। अगर युद्ध भड़का तो वह सिर्फ मध्य पूर्व में ही नहीं रहेगा वह पूरी दुनिया का अपनी चपेट में ले लेगा। ईरान ने अब केवल अपना बचाव करने के बजाए आक्रामक रणनीति अपना ली है। अगर अमेरिका परमाणु बम जैसा आत्मघाती कदम उठाता है या खाड़ी देश अमेरिका की ऐसा करने में मदद करते हैं, तो यह जंग केवल दो देशों के बीच नहीं रहेगी। खाड़ी देशों के तबाह होने से पूरी दुनिया में कच्चे तेल की सप्लाई ठप्प हो जाएगी। पेट्रोल, डीजल के दाम आसमान छूने लगेंगे और वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी। यही वजह है कि ट्रंप के परमाणु बम और ईरान के जवाबी पलटवार की खबरों ने दुनिया भर के नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 20 August 2026

जिंदा पकड़ो या मारो: मिलेंगे 30000

 
ईरान की हुकूमत ने अब अपनी अवाम को जमीनी लड़ाई के लिए लगता है तैयार करना शुरू कर दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते (पीस डील) अब लगभग समाप्त हो गए हैं और फिर से पूरी जंग की तैयारी शुरू हो गई है। तभी तो ईरान को अब लगता है कि अमेरिका-इजरायल का अगला हमला जमीन पर होगा। इसी खतरे को देखते हुए ईरानी हुकूमत ने ऐलान कर दिया है कि अमेरिकी सैनिकों को मारने या पकड़ने पर 30 हजार डॉलर इनाम की घोषणा की गई है। महिलाआंs के लिए ईनाम दोगुना होगा। ईरान की सेना ने रविवार को ऐलान किया कि वह अमेरिकी सैनिकों को मारने या पकड़ने पर 30000 डॉलर के बराबर ईनाम देगी। सेना की ओर से कहा गया है कि अगर यह काम कोई महिला करती है तो ईनाम दोगुना हो जाएगा। यह ऐलान पश्चिमी एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच लगातार तनाव के बीच हुआ है। जहां दोनों एक-दूसरे पर हमला करते रहे हैं। 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से होर्मूज स्टेट को फिर से खोलना किसी भी शांति समझौते में लगातार रुकावट रहा है। ईरान की सरकारी एजेंसी ईरना की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के आमी चीफ आमिर हतामी ने कहा कि वित्तीय मदद में हिस्सा लेने के लिए बड़ी संख्या में रिक्वेस्ट मिलने के बाद यह प्लान बनाया गया था। हतामी ने इस बारे में कोई डिटेल नहीं दी कि अमेरिकी सैनिकों को कहां और कब मारा या पकड़ा जाएगा। पश्चिम एशिया युद्ध के दौरान ईरान में अमेरिकी ग्राउंड फोर्स की फिलहाल कोई तैनाती नहीं हुई है, सिवाय अप्रैल में एक मारे गए अमेरिकी पायलट के रेस्क्यू मिशन के। ईरना ने हतामी के हवाले से कहा जो कोई हमलावर अमेरिकी मिलिट्री के किसी आदमी को मारेगा या पकड़कर सौंपेगा उसे इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की आमी की तरफ से 30000 डॉलर या पांच बिलियन तोमन के बराबर इनाम मिलेगा। उन्होंने 10000 ईरानी रियाल के बराबर की एक इनफार्मल यूनिट का इस्तेमाल किया। इस घोषणा को ट्रंप की उस चेतावनी से जोड़कर देखा जा रहा है जिसमें उन्होंने अमेरिकी सैनिकों को ईरान में उतारने की संभावना जताई थी। यरूशलम पोस्ट के अनुसार ईनाम पाने वाले को सिर्फ इतना ही नहीं मिलेगा बल्कि हतामी ने कहा कि अमेरिकी सैनिक को मारने के लिए इस्तेमाल किए गए हथियार को दोगुनी कीमत पर खरीदा जाएगा और उसे खास म्यूजियम में भी रखा जाएगा। यही नहीं ईरान अपने सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की हत्या का बदला लेने के लिए भी बेताब हैं। ईरान ने एक टारगेट लिस्ट भी बनाई है जिसमें डोनाल्ड ट्रंप, इजरायली पीएम नेतन्याहू और अमेरिका के सहयोगी देशों के राष्ट्राध्यक्षों के नाम भी शामिल हैं। ईरान पर हमले के लिए अमेरिका ने सबसे अधिक अरब देशों की जमीन पर एयरफोर्स का इस्तेमाल किया। अब मांग उठ रही है कि अरब देशों के राष्ट्राध्यक्षों को भी इस लिस्ट में शामिल किया जाए। क्येंकि अमेरिका के मददगार भी पूर्व सुप्रीम लीडर की हत्या में बराबरी के गुनहगार हैं। ईरान ने अब अपनी नीति बदली है। पड़ोसी अरब मुल्कों में अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाया ही गया पर उनकी टॉप लीडरशिप को खत्म करने की सौगंध ले रहा है। ईरान के सांसद अमीर हुसैन सबेती ने सरकार से मांग की है कि हिट लिस्ट में खाड़ी देशों के शासकों को भी जोड़ा जाए। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 18 August 2026

जिंदा हैं मुजतबा खामेनेई


पिछले 28 फरवरी से जब से अमेरिका इजरायल ने ईरान पर हमला किया था जिसमें आयतुल्लाह अली खामेनेई और उनके परिवार वालों की शहादत हुई थी जिसमें एक 14 महीने की बच्ची भी शामिल थी। कहा जा रहा था कि इस हमले में मुजतबा खामेनेई या तो मारे गए हैं या बुरी तरह से जख्मी हुए हैं। यह भी कहा गया था कि वो मास्को में आईसीयू में हैं। 28 फरवरी के हमले के बाद से मुजतबा खामेनेई कभी जनता के सामने भी नहीं आए थे। पर कुछ दिन पहले उनका एक वीडियो सामने आया। हाल ही में इजरायल ने दावा किया था कि उनकी हालत बेहद गंभीर है और उनको अस्पताल में भती कराया गया है। यहां तक कहा गया था कि उनकी मौत की खबर सामने आए तो हैरानी नहीं होगी। इन दावों के बीच ईरान की मेहर-न्यूज एजेंसी ने मुजतबा खामेनेई का 12 सेकंड का एक वीडियो जारी किया है। वीडियो में वह लोगों से बातचीत करते हुए नजर आ रहे हैं। हालांकि यह वीडियो कब का है यह साफ नहीं किया गया है। इसलिए सवाल अभी भी बरकरार है। वीडियो ने बीमारी की खबरों पर उठाए सवाल मेहर न्यूज एजेंसी की ओर से जारी वीडियो में मुजतबा खामेनेई लोगों के बीच चंगे भले नजर आ रहे हैं और बातें कर रहे हैं। पहली नजर में यह वीडियो उनकी गंभीर बीमारी से जुड़ी खबरों का जवाब माना जा रहा है। हालांकि यह बड़ा सवाल इसकी तारीख को लेकर भी है। एजेंसी ने यह नहीं बताया कि वीडियो कब रिकार्ड किया गया था। ऐसे में सिर्फ 12 सेकंड के इस वीडियो के आधार पर उनकी मौजूदा सेहत के बारे में कोई पुख्ता निष्कर्ष निकालना मुश्किल है। फरवरी में सर्वेच्च नेता की जिम्मेदारी मुजतबा खामेनेई ने संभाली थी। इसके बाद से उनकी सार्वजनिक मौजूदगी बेहद सीमित रही है। उनकी तरफ से ज्यादातर लिखित बयान ही सामने आए। इसी वजह से उनकी सेहत और गतिविधियों को लेकर लगातार अटकलें लगती रहीं हैं। मुजतबा खामेनेई की सेहत को लेकर चल रही अफवाहों के बीच ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि इस वक्त सुप्रीम लीडर (मुजतबा खामेनेई) से डायरेक्ट बात करना बेहद मुश्किल है। उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि वह मुजतबा खामेनेई से मिल चुके हैं। जानकारी के मुताबिक यह मुलाकात मई के महीने में हुई थी। राष्ट्रपति ने व्यापार संघ के प्रतिनिधियें से एक मीटिंग के दौरान कहा था कि वो और मुजतबा खामेनेई करीब ढाई घंटा साथ थे और यह मुलाकात काफी अच्छी रही। सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रपति को खामेनेई से मिलने का सुनहरा मौका एक रियायत के तौर पर मिला था। कहा जा रहा है कि पेजेश्कियान बार-बार मुजतबा से मिलने की गुजारिश कर रहे थे और यहां तक कि धमकी दे रहे थे कि अगर उनसे मिलने नहीं दिया गया तो वो अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। खामेनेई के कार्यालय को आखिर इस मुलाकात के लिए हामी भरनी पड़ी, लेकिन ये मुलाकात कहा जा रहा है कि नार्मल नहीं थी। अमेरिका-इजरायल ने लगातार ये दिखाने की कोशिश की कि मुजतबा को गंभीर चोटें लगी हैं, वह बुरी तरह जख्मी हुए हैं, उनका चेहरा जल गया है और पैरों में गंभीर चोटें आई हैं। जिसके बाद उनके पैर की सर्जरी भी हुई है और अब यह वीडियो। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 15 August 2026

भाग ट्रंप भाग

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पुष्टि की है कि पिछले महीने तुर्किए में नाटो सम्मेलन से रवाना होते समय उन्होंने चुपचाप जेम्स बांड स्टाइल में विमान बदल लिया था। ऐसा संभावित खतरे की वजह से किया गया था। ट्रंप ने मंगलवार को पत्रकारों से कहा कि मैं सीक्रेट सर्विस और सेना की बात मानता हूं। वह चाहते थे कि मैं दूसरी उड़ान और दूसरे विमान से जाऊं। मुझे वही करना था, जो उन्होंने कहा। ट्रंप ने यह भी स्वीकार किया कि वह छिपकर अपने विमान एयरफोर्स वन से भागकर एक दूसरे विमान से निकले। यह बताना जरूरी है कि छिपकर भागने से पहले उन्होंने न तो मार्को रूबियो, अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को विमान बदलने का प्लान बताया और न ही उनके साथ गए पत्रकारों को। यह दर्शाता है कि उनकी नजरों में इनकी कीमत क्या है। खैर, मैं आपको पूरी कहानी बताता हूं कि हुआ क्या। डोनाल्ड ट्रंप पिछले महीने तुर्किए में नाटो शिखर सम्मेलन में गए थे। नाटो सम्मेलन से निकलते समय ईरान के संभावित खतरे को देखते हुए ट्रंप ने गुपचुप तरीके से विमान बदल लिया। वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति टेलीविजन कैमरों की मौजूदगी में एयरफोर्स वन में सवार हुए, फिर उन्हें चुपके से एक ऊंचे एयरपोर्ट केटरिंग (खाने के) ट्रफ में ले जाया गया और एक अन्य सैन्य विमान में पहुंचाया गया। इस दौरान एयरफोर्स वन विमान में सवार पत्रकारों और व्हाइट हाउस के कुछ कर्मचारियों व मंत्री मार्को रुबियो को इसकी जानकारी तक नहीं मिली। अधिकारियों ने सीबीएस न्यूज व बीबीसी को बताया कि अमेरिका ने विमान पर मिसाइल दागने की ईरान की विश्वसनीय धमकी का पता लगाया था। हालांकि व्हाइट हाउस ने इस गुप्त तरीके से विमान बदलने की पुष्टि नहीं की। हालांकि बाद में खुद ट्रंप ने इसकी पुष्टि कर दी। आखिरी समय में विमान बदलने के इस फैसले से सवाल उठे हैं कि क्या जिस विमान को दिखावे के लिए इस्तेमाल किया गया था, उसमें मौजूद लोगों को खतरे में ही छोड़ दिया गया था। विमान में सवार पत्रकारों और व्हाइट हाउस के अधिकारियों को पता नहीं था कि संभावित ईरानी खतरे के जवाब में एक योजना के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को वहां से चुपचाप निकाल लिया गया था। ट्रंप पहले कह चुके हैं कि अंकारा में हुए सम्मेलन के दौरान वह ईरान के टारगेट नम्बर वन थे। ट्रंप ने मंगलवार को कहा, मेरा अनुमान है कि कोई खतरा था। मैंने इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मांगी। मुझे बहुत सारी धमकियां मिलती हैं, जिनके बारे में आपको शायद पता भी नहीं हो। पिछले महीने की यह गुप्त कार्रवाई तब हुई जब युद्ध खत्म करने की बातचीत टूटने के बाद अमेरिका ने ईरान पर फिर से हमले शुरू किए थे। इसके एक दिन बाद ट्रंप ने विमान बदला था। ट्रंप कतर की ओर से दिए गए विमान नया बोईंग 747-8 से तुर्किए पहुंचे थे। लेकिन उन्होंने कहा था कि वह पुराने समय की याद में पुराने एयरफोर्स वन से वापस जाएंगे। 8 जुलाई को उन्होंने कैसे डर के मारे विमान बदला यह सबने देखा ही है। अखबार के मुताबिक रक्षामंत्री पीर हेगसेथ भी अलग से बाहरी सीढ़ियों के जरिए सी-32ए में सवार हुए। उधर एयरफोर्स वन पर बैठे पत्रकारों से कहा गया कि वह खिड़कियों के पर्दे बंद रखें। शायद इसलिए कि वह बाहर का दृश्य न देख सकें। वह यह न देख सकें कि राष्ट्रपति ट्रंप विमान के गुप्त दरवाजे से विमान छोड़ चुके हैं। इसलिए कहा, भाग ट्रंप भाग।  

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 13 August 2026

होर्मूज में अमेरिकी जहाजों की तैनाती

अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाते हुए मिडल ईस्ट में 20 से ज्यादा युद्धपोत तैनात कर दिए हैं और होर्मूज जलडमरूमध्य में नाकाबंदी सख्त कर दी है। ईरान ने जलमार्ग को खोलने के लिए मुआवजा, प्रतिबंध हटाने और ब्लॉकेड खत्म करने जैसी शर्तें रखी हैं। ओमान के साथ संभावित समझौता अंतिम चरण में है, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव अभी भी चरम पर बना हुआ है। अमेरिका ने मिडल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाते हुए 20 से ज्यादा युद्धपोत तैनात कर दिए हैं। यह कदम ईरान पर नाकाबंदी को सख्ती से लागू करने में होर्मूज में बढ़ते तनाव के बीच उठाया गया है, जहां वैश्विक तेल सप्लाई की सबसे अहम लाइन गुजरती है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने सोमवार को एक्स पर एक पोस्ट में बताया कि ये युद्धपोत सीधे तौर पर ईरान के खिलाफ लगाए गए ब्लॉकेड को लागू करने के मिशन में लगे हैं। तैनात जहाजों में अमेरिकी नेवी का डेस्ट्रॉयर यूएसएस रॉस भी शामिल है, जिसके जरिए समुद्री निगरानी और इंटरसेप्शन ऑपरेशन चल रहे हैं। सेंटकॉम ने इसी की तस्वीर शेयर की थी। सेंट्रल कमांड ने दावा किया है कि 9 अगस्त तक 55 कमर्शियल जहाजों को रास्ता बदलने पर मजबूर किया गया, 2 जहाजों को रोका गया और 2 पर चढ़कर जांच की गई। यह साफ संकेत है कि अमेरिका सिर्फ चेतावनी नहीं दे रहा, बल्कि सीधे तौर पर समुद्र में नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। उधर, ईरान-अमेरिका युद्ध में सबसे बड़ी लेकिन अनदेखी मानवीय त्रासदियों में से एक समुद्र के बीच फंसे हजारों नाविक हैं। संयुक्त राष्ट्र की समुद्री एजेंसी (आईएमओ) के मुताबिक करीब 6000 नाविक अब भी फारस की खाड़ी में जहाजों फंसे हैं। कई नाविक तो चार महीने से घर नहीं लौट पाए हैं। मैं यूएसएस अब्राहम लिंकन बाबत एक ऐसी ही रिपोर्ट पढ़ रहा था। उसमें बताया गया था कि पिछले लगभग 200 दिनों से ज्यादा समय से यह समुद्री जहाज समुद्र में हैं। जहाज के अंदर अब तो खाने की कमी हो गई है। दवाएं कम हो गई हैं। टायलेट खराब हो चुके हैं इत्यादि इत्यादि। जहाज के डॉक्टर अब कहने लगे हैं कि अगर जल्द यह सैनिक घर नहीं लौटे तो इनमें से कई मनोवैज्ञानिक शिकार हो जाएंगे। वैसे भी देखा जाए जब लिंकन में ऐसी भयावह स्थिति बनी है तो उस पर तैनात लगभग 5000 सैनिक युद्ध कैसे लड़ेंगे। कई नाविकों का बाहरी संपर्क लगभग टूट चुका है। उन्हें हर कुछ में दिन में सिर्फ 30 मिनट इंटरनेट मिलता है। कुछ जहाजों पर सीमित राशन होने से नाविक दिन में सिर्फ एक बार चावल और दाल खा रहे हैं। लगातार मिसाइल या ड्रोन हमले के खतरे के खौफ में नींद भी पूरी नहीं कर पाते। कई लोग इस तैयारी के साथ सोते हैं कि हमला होते ही भाग सकें। विशेषज्ञों के मुताबिक, नाविक जहाज को नहीं छोड़ सकते हैं। सुरक्षित निकासी बेहद मुश्किल है और कई नाविक अल्पकालिक अनुबंध पर हैं। उन्हें डर है कि यदि वे खतरनाक ड्यूटी छोड़ने की मांग करते हैं तो उन्हें दोबारा नौकरी नहीं मिलेगी। युद्ध के बीच फंसे नाविकों की मानसिक सेहत, नींद और आर्थिक स्थिति पर भी गंभीर असर पड़ा है। युद्ध की शुरुआत में 36-38 भारतीय जहाजों पर 1,100 भारतीय नाविक होर्मूज के आसपास फंस गए थे। बाद में अधिकांश जहाज निकल गए। सूत्रों के मुताबिक 125 भारतीय नाविक अभी भी 6 भारतीय जहाजों पर फारस की खाड़ी में मौजूद हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 11 August 2026

और अब इस्लामिक नाटो

हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के बीच मक्का पाइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए हैं, जिसके तहत अगर तीनों में से किसी एक देश पर हमला होता है तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। इस समझौते का मकसद रक्षा सहयोग बढ़ाना, साझा सुरक्षा रणनीति बनाना और क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच सामूहिक ताकत दिखाना है। विश्लेषकों का मानना है कि यह गठजोड़ पश्चिम एशिया में बदलते हालात, खासतौर पर ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते टकराव के बीच एक नए पावर ब्लाक के रूप में उभर सकता है। इस्लामिक नाटो मुस्लिम बहुल देशों के बीच एक प्रस्तावित या अनौपचारिक सैन्य गठबंधन को दिया नाम है, जिसकी तुलना पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन नाटो से की जाती है। इस समझौते के पीछे प्रमुख भूमिका सऊदी अरब की है। वह एक तरफ ईरान के हमलों से परेशान है और दूसरी तरफ हाल ही में यमन के हूतियों के साथ जबर्दस्त संघर्ष छिड़ने से। ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों खाड़ी क्षेत्रों में, जहाजरानी में व्यवधान और संघर्ष के पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैलने की आशंकाओं ने सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताएं बढ़ा दी हैं। दशकों तक रियाद अपनी सुरक्षा के लिए मुख्य रूप से अमेरिका पर निर्भर था पर 28 फरवरी के बाद उसने देख लिया कि अमेरिका तो अपने सुरक्षा ठिकानों को बचा नहीं पा रहा है तो वह सऊदी अरब को कैसे बचाएगा। रहा सवाल पाकिस्तान का तो सऊदी अरब का पहले से ही पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता हो रखा है पर क्या पाकिस्तान सऊदी अरब को ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों से बचा सका? क्या पाकिस्तान सऊदी अरब पर हमला होने पर ईरान पर हमला कर सकता है? यह सब नाटकबाजी है। रहा सवाल इजरायल और अमेरिका का तो इजरायइल इस समझौते का जमकर विरोध कर रहा है और इसे अपने लिए खतरा मानता है। सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि अगर इजरायल सऊदी या तुर्किए पर हमला करता है तो क्या जनरल असिम मुनीर में इतनी हिम्मत है कि वह अमेरिका के खिलाफ जाकर इजरायल पर हमला करें? यह सिर्फ पैसे ऐंठने का खेल है। फक्कड़ हुआ पाकिस्तान कहीं से भी भीख मांगने को तैयार है और इसके एवज में जो चाहे वादा करवा लो? रहा सवाल ईरान का तो राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने मुस्लिम एकता की अपील करते हुए कहा कि शिया-सुन्नी को साथ रहना चाहिए। पेजेश्कियन ने कहा है कि अमेरिका और इजरायल मिलकर फारस की खाड़ी के देशों को ईरान के खिलाफ करने की कोशिश कर रहे हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि सऊदी अरब तुर्किए और पाकिस्तान तीनों ही देश सुन्नी बाहुल्य हैं, वहीं ईरान शिया देश है। क्या यह भारत के लिए चिंता की बात है? विश्लेषक कहते हैं कि इस डिफेंसपैक्ट का भारत पर सीधे तौर पर कोई असर नहीं होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि सऊदी अरब पहले भी कहता रहा है कि पाकिस्तान हमारा महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी है, लेकिन कभी उसने भारत से जंग के मौके पर साथ नहीं दिया। जहां तक  तुर्किए का सवाल है वह तो आपरेशन सिंदूर में भी खुलेआम पाकिस्तान के साथ था और आगे भी रहेगा। भारत के लिए चिंता की बात नहीं है क्योंकि भारत डिफेंस क्षमता में तीनों से आगे है। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 8 August 2026

क्या पाकिस्तान अंदर से टूट रहा है?


पाकिस्तान वर्तमान में गंभीर आंतरिक संघर्ष, राजनीतिक अस्थिरता और सूबों में सशस्त्र विद्रोह जैसी गंभीर अंदरूनी चुनौतियों से जूझ रहा है। सेना के बढ़ते दखल, आर्थिक संकट और आतंकवादियों के ताबड़तोड़ हमलों के कारण देश के भीतर गृह युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं। पाकिस्तान के चार सूबे हैं। इनमें से बलूचिस्तान सूबे में अलगाववादी बलूचिस्तान लिबरेशन आमी (बीएलए) ने विद्रोह का झंडा बुलंद किया हुआ है। खैबर पख्तूनख्वां सूबे में अफगान तालिबान का दबदबा बढ़ता जा रहा है। आए दिन तालिबान के हमलों से यहां पाक फौज के पांव उखड़ रहे हैं। पीओके में पाक सेना की बर्बरता पर विद्रोह की स्थिति बनी हुई है। चलिए विस्तार से सारी स्थिति को बताते हैं। बलूचिस्तान पाक का सबसे बड़ा और फैला हुआ (लगभग 45 प्रतिशत) क्षेत्र है। ईरान से इसकी सरहद लगती है। बलूचिस्तान की बीएलए के लड़ाके अलग देश की मांग कर रहे हैं। हालात ये हैं कि बलूच लड़ाकों और पश्तून (पठान) विद्रोहियों का बलूचिस्तान सूबे में लगभग 70ज्ञ् हिस्से में कब्जा हो चुका है। असली सवाल यह है कि क्या पाकिस्तानी सरकार पुलिस स्टेशन खुले रख सकती है, हाईवे पर यातायात चला सकती है, बाजार और कारोबार सामान्य रख सकती है और लोगों को बिना डर के यात्रा करने की सुरक्षा दे सकती है? खैबर पख्तूनख्वां पाकिस्तान का फ्रंटियर यानी सरहदी इलाका है। डूरंड लाइन पाक और अफगानिस्तान को अलग करती है। अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के पांच साल में खैबर के अधिकांश इलाके में इन्हीं का दबदबा है। खैबर में पाक सरकार का कानून नहीं तालिबान का शरिया चलता है। दरअसल, इस इलाके में विभाजन के समय से ही कबिलाई व्यवस्था लागू रही है। स्वात, सैदु, मिंगोरा और मर्दन में लोया जिरगा के जरिए ही कानून चलता है। ये जिरगा असल में शरिया कानून को लागू करती है। अफगान तालिबान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) संगठन को अपने ठिकानों में पनाह देता है। इमरान खान की सरकार ने 2021 में टीटीपी के साथ सुलह की कोशिश की, लेकिन इमरान की गद्दी जाते ही टीटीपी ने खैबर में अपने दबदबे को और बढ़ा लिया है। खैबर के वजीरिस्तान में पाकिस्तान सेना कई सैन्य ऑपरेशन कर चुकी है, लेकिन यहां अब टीटीपी काबिज है। आए दिन टीटीपी के हमलों के कारण स्कूल और कॉलेज बंद रहते हैं। पंजाब और सिंध के मूल निवासी कर्मचारी खैबर में अपनी पोस्टिंग नहीं चाहते। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) और अन्य इलाकों में दमनकारी नीतियों व अधिकारों के हनन को लेकर जनता में भारी असंतोष और विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं। अगर हम राजनीतिक दृश्य की बात करें तो सरकार और सेना के बीच सत्ता के समीकरणों तथा हालिया संवैधानिक संशोधनों को लेकर न्यायपालिका और राजनीतिक गलियारों में तीव्र पतन और बगावत का माहौल है। कुल मिलाकर पाकिस्तान की आंतरिक हालत बहुत खराब हो रही है। अगर यही स्थिति रही तो पाकिस्तान के कई टुकड़ों में बंटने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 6 August 2026

फिर पलटे ट्रंप ईरान से मानसिक युद्ध

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर बड़े हमले की धमकी के बाद एक बार फिर पलट गए हैं। ट्रंप की यह तो पलटने की आदत बन गई है। यह नौवीं बार है जब ट्रंप धमकी देकर पलटे हैं। यही वजह है कि अब उनकी धमकी को कोई गंभीरता से नहीं लेता बल्कि उनका खुलेआम मजाक उड़ाया जाता है। ट्रंप ने दावा किया कि पश्चिम एशिया के सहयोगी देशों ने ईरान के साथ जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए एक समझौते की रूपरेखा पर सहमति बना ली है। फिलहाल वह पांच महीने से जारी इस संघर्ष में ईरान पर नए सैन्य हमले का आदेश नहीं देंगे। उधर, ईरान ने ट्रंप की धमकियों को मानसिक युद्ध बताया है। ट्रंप ने शनिवार को कहा कि ईरान के साथ समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य को तत्काल व पूरी तरह खोलना व उसके परमाणु खतरे का अंत शामिल होगा। उन्होंने कहा कि इस अनुरोध के आधार पर मैंने दुनिया के भविष्य के हित में फिलहाल हमलों को रोकने पर सहमति दी है। बशर्ते कि शीघ्र ही कोई समझौता हो सके। ट्रंप ने समझौते में इजरायल की सहमति की बात कही। क्या ट्रंप ईरान पर परमाणु हमला करने की सोच रहे हैं? जब ट्रंप यह कहते हैं कि मैंने दुनिया के भविष्य को खतरे में डालने से बचाने के लिए फिलहाल ईरान पर हमले रोकने का फैसला किया है तो इसका मतलब हम यह निकालें कि ट्रंप ईरान पर एटम बम मारने की सोच रहे हैं? वैसे भी ट्रंप इतनी बार अपने बयानों से पलटे हैं कि अब उन्हें शायद ही कोई गंभीरता से लेता हो? ईरान ने ट्रंप के हमलों को टालने के फैसले का मजाक उड़ाया है। ईरानी मीडिया ने ट्रंप के दावों को झूठ बताते हुए कहा कि तेहरान ने कभी हमले रोकने की अपील नहीं की। ईरानी मीडिया ने ट्रंप के दावों को झूठ बताते हुए कहा कि अमेरिका की मिसाइलों की कमी और बढ़ते दबाव के कारण ट्रंप पीछे हटे हैं। ट्रंप के दावों को खारिज करते हुए कहा कि अमेरिका ने अपनी कमजोरी छिपाने के लिए पूरी कहानी गढ़ी है। ट्रंप की हवा एक बार फिर ईरान ने निकाल दी। यह पहली बार नहीं है। पहले भी 5 बार ट्रंप धमकी देकर अपने कदम पीछे कर चुके हैं। ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी फार्म ने ट्रंप पर तंज कसते हुए लिखा कि मूर्ख ट्रंप की सारी हवा निकल गई। वहीं मेहर न्यूज एजेंसी ने कहा कि ट्रंप ने एक बार फिर अपनी खोखली धमकियों से पीछे हटकर उसे दुनिया के सामने एहसान की तरह पेश करने की कोशिश की है। मेहर ने सैन्य सूत्रों के हवाले से दावा किया कि ईरानी सेना पूरी तरह सतर्क है और किसी भी स्थिति का जवाब देने के लिए तैयार है। एजेंसी ने ट्रंप के दावों को एक और झूठ बताया। ईरान ने अमेरिका को एक बार फिर चेतावनी दी है। ईरान ने कहा कि अगर अमेरिकी सेना ने ईरानी ठिकानों पर नए हमले किए तो वह इसका कड़ा जवाब देगा। इससे पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ जाएगा। ये चेतावनी ट्रंप के उस बयान के बाद आई है, जिसमें ट्रंप ने कहा था कि तेहरान के साथ बातचीत से उनका भरोसा कम हो रहा है। ट्रंप ने कहा कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका उन पर हमला करेगा। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर, तकीय के विदेश मंत्री हाकन फिदान और सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान के साथ अलग-अलग फोन पर बातचीत के जरिए इसकी जानकारी दी। ट्रंप एक बार फिर पलटे। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 4 August 2026

अमेरिका में 7 जगह हमले किसने करे?

अमेरिका के 7 राज्यों में एक के बाद एक तगड़े अटैक हुए हैं। ये हमले सीधे उस लाइफलाइन पर हुए हैं, जिसके दर्द से आम जनता कराह उठी। इस हमले के बाद ट्रंप का ऐसा हाल हो गया है कि वो ईरान का नाम भी नहीं ले पा रहे हैं। ट्रंप उल्टा अपने ही लोगें को बदनाम करने में जुट गए हैं लेकिन अपने सबसे बड़े दुश्मन की चालाकी दुनिया के सामने यह एक्सेप्ट नहीं कर पा रहे हैं। ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका में अचानक कुछ ऐसा हो गया है जिसने डोनाल्ड ट्रंप के पसीने छुड़ा दिए हैं। दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क की धरती पर एक-दो नहीं, बल्कि एक के बाद एक पूरे सात बड़े अटैक हुए हैं। यह वार किसी और जगह नहीं, बल्कि अमेरिकी जनता की लाइफलाइन पर हुआ है। शक है कि इस पूरे खेल के पीछे अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन ईरान ही है, लेकिन ट्रंप खुलेआम उसका नाम ले नहीं रहे हैं। अगर ट्रंप ने दुनिया के सामने यह मान लिया कि हमला ईरान ने ही किया है तो साबित हो जाएगा कि तकनीक के मामले में वह अमेरिका से आगे निकल चुका है। दरअसल ये हमले अमेरिका की पानी की सप्लाई करने वाली सबसे अहम पाइपलाइनों और प्लांट्स पर हुए हैं। इस सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर पर 7 जगहों से साइबर अटैक किए गए। हालात इतने खराब हो गए कि कई राज्यें में वॉटर सिस्टम को बनाने के लिए ऑटोमैटिक सिस्टम बंद करके हाथों से काम संभालना पड़ा। अब इस पूरे खेल में सबसे बड़ा झटका अमेरिकी राजनीति और डोनाल्ड ट्रंप को लगा है। क्योंकि जब दुनिया की नजरें ईरान पर टिक रही हैं, तब ट्रंप सीधे तौर पर ईरान का नाम तक लेने से बच रहे हैं। इस बड़े सनसनीखेज साइबर हमले की पहली भनक मिनेसोटा राज्य से लगी 26 और 27 जुलाई के बीच यहां के 30 से ज्यादा कम्युनिटी वॉटर सिस्टम को हैकर्स ने अपना निशाना बनाया। मिनेसोटा आईटी सर्विसेज ने जब आनन-फानन में जांच शुरू की तो पता चला कि किसी ने जान बूझकर पानी की सप्लाई कंट्रोल करने वाले सिस्टम का एक्सेस हथिया लिया था। प्रवक्ता एमिली जिमर का कहना है कि मामले की जांच बहुत तेजी से चल रही है। जिस तरीके से इस मामले को अंजाम दिया गया है, वो ठीक वैसा ही है जैसा हमारे फेडरल पार्टनर्स ने पहले क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमलों में देखा था। हैकर्स ने बहुत ही चालाकी से पानी के प्लांट्स में लगे पोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर्स को अपना शिकार बनाया। अमेरिका की जांच एजेंसियां यह मान रही है कि हमले का पैटर्न ईरान के पुराने साइबर हमलों से काफी मिलता-जुलता है। लेकिन सबसे बड़ा ड्रामा तब शुरू हुआ जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान सामने आया। ट्रंप ने इस भयंकर अटैक का दोष सीधे ईरान पर डालने की बजाय अपनी ही व्यवस्था पर फोड़ दिया। कैबिनेट मीटिंग के दौरान ट्रंप ने ईरान का बचाव करने जैसा बयान दिया और कहा कि लोग कह रहे हैं कि मिनेसोटा के 30 वॉटर प्लांट्स पर जो हमला हुआ उसके पीछे ईरान है। मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता है। मैं इसके लिए मिनेसोटा के नाकाम प्रशासन और वहां के भ्रष्ट गवर्नर को जिम्मेदार मानता हूं। ईरान के पास मिनेसोटा के बारे में सोचने से बहुत बड़े मुद्दे हैं। ट्रंप के इस रवैये से हर कोई हैरान है। जहां एक्सपर्ट्स इसे सीधे तौर पर ईरान से जोड़ रहे हैं वहीं ट्रंप ईरान का नाम लेने से कतरा रहे हैं और अपने ही अधिकारियों को कसूरवार ठहरा रहे हैं। इस पर मिनेसोटा के गवर्नर ने पलटवार करते हुए कहा ट्रंप को अच्छी तरह पता है कि हमलावर कौन है, वह सच्चाई से भाग रहे हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 1 August 2026

...और अब ईरान बनाम यूक्रेन


दुनिया के दो बड़े संघर्ष अब एक-दूसरे से जुड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ पिछले कई महीनों से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और सैन्य कार्रवाई चल रही है, वहीं अब दूसरी तरफ रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध पांचवें साल में प्रवेश कर चुका है। अब एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने दोनों संघर्षों को आपस में जोड़ दिया है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। ताजा विवाद कैस्पियन सागर में एक ईरानी जहाज पर हुए हमले से शुरू हुआ है। यूक्रेन पर आरोप है कि उसने कैस्पियन सागर में एक ईरानी कमर्शियल जहाज को निशाना बनाया। यूक्रेन के राष्ट्रपति बेलादिमीर जेलेंस्की का दावा है कि यह जहाज रूस और ईरान के बीच हथियारों और सैन्य सामानों की सप्लाई में इस्तेमाल किया जा रहा था। इसी वजह से इस पर हमला किया गया। इस घटना के बाद ईरान ने कड़ी नाराजगी जताई है। तेहरान ने यूक्रेन के राजदूत को तलब किया और गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलिस से भी बात की और इस हमले के खिलाफ अपना विरोध जताया। उन्होंने यूक्रेन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग भी की। कैस्पियन सागर में किसी जहाज पर इस तरह हमला पहली बार हुआ है। कैस्पियन सागर एक ऐसा समुद्री क्षेत्र है जो चारों ओर जहां जमीन से घिरा हुआ है। इसके उत्तर-पश्चिम में रूस, दक्षिण में ईरान, पूर्व में कजाखस्तान और तुर्कमेन्तिान तथा पश्चिम में अजरबैजान स्थित हैं। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस और ईरान के संबंध और मजबूत हुए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, तकनीकी सहयोग और रक्षा क्षेत्र में संपर्क बढ़ा है। इसी कारण लंबे समय से यह चर्चा होती रही है कि कैस्पियन सागर के रास्ते रूस और ईरान के बीच सैन्य सामग्री का आदान-प्रदान भी होता है। हालांकि इस बारे में कभी सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्ट स्वीकारोक्ति नहीं हुई थी। ईरान का कहना है कि जिस जहाज पर हमला हुआ वह एक सामान्य कमर्शियल जहाज था। ईरानी अधिकारियों के अनुसार इस हमले में एक नाविक की मौत हो गई जबकि एक अन्य नाविक घायल हो गया। हमले के बाद राष्ट्रपति जेलेंस्की ने सोशल मीडिया पर बयान जारी करते हुए कहा कि जहाज रूस और ईरान के बीच सैन्य सामग्री पहुंचाने का काम कर रहा था। उन्होंने दावा किया कि रूस लंबे समय से ईरान की तरफ से उपलब्ध कराए गए शहीद ड्रोन का इस्तेमाल यूक्रेन के खिलाफ कर रहा है। युद्ध के शुरुआती चरण में रूस ने बड़ी संख्या में ईरानी ड्रोन का उपयोग किया था, जिससे उसे युद्ध में बढ़त हासिल करने में मदद मिली थी। जेलेंस्की ने केवल जहाज पर हमले का बचाव ही नहीं किया, बल्कि रूस पर एक और गंभीर आरोप भी लगाया। उन्होंने दावा किया कि रूस ने ईरान को खाड़ी में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों की उपग्रह तस्वीरें और खुफिया जानकारी उपलब्ध कराई हैं। उनके अनुसार जुलाई महीने में रूसी उपग्रह बहरीन जार्डन और कुवैत में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों की निगरानी भी कर रहे हैं। जेलेंस्की का आरोप है कि ईरान द्वारा अमेरिकी ठिकानों पर किए गए कुछ सटीक हमलों के पीछे भी रूस की ओर से दी गई खुफिया जानकारी की भूमिका हो सकती है। यूक्रेन का मानना है कि रूस केवल यूक्रेन से युद्ध नहीं लड़ रहा, बल्कि वह पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
- अनिल नरेन्द्र

Thursday, 30 July 2026

क्या ईरान के आगे झुका है ट्रंप ?


अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर सीजफायर हो गया है और जंग फिर थम गई है। 13 दिनों में अमेरिका को भारी नुकसान हुआ है क्योंकि ईरान जार्डन और इराक में भी हमले कर रहा है। ईरान ने इस बार सिर्फ अमेरिकी बेस पर मौजूद हथियारों को टारगेट किया बल्कि अगर खबर सही है तो इन हमलों में अमेरिकी सैनिकों के मरने व घायल होने की बात ईरान कर रहा है। ट्रंप की सेना ने फिलहाल हमले रोक दिए हैं, नहीं तो वो लगातार 12-13 दिनों से हर रोज ईरान पर बमबारी कर रहा था। अमेरिका ने तो एक बार फिर भारी बी-1 बाम्बरों का भी इस्तेमाल किया। ईरान ने तो ताबड़तोड़ कई जवाबी हमले किए। जब अमेरिका ने हमले रोके तो ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई रोक दी। कहा जा रहा है कि अमेरिका के एयर डिफेंस मिसाइलों का स्टॉक कम हो चुका है, जिससे अरब क्षेत्र में अमेरिका ठिकानों की सुरक्षा करना मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से ट्रंप को पीछे हटना पड़ा है। दरअसल ईरान ने युद्ध की शुरुआत से ही सस्ते ड्रोन से लगातार हमले करने की रणनीति बनाई थी जिसका परिणाम ये हुआ कि अमेरिका को पैट्रियट मिसाइलों का इस्तेमाल बहुत अधिक करना पड़ा और चंद दिनों में ही मिसाइलों का स्टॉक कम हो गया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका पिछले 13 दिनों से अपने तमाम बेसों की सुरक्षा के लिए पैट्रियट मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहा था। 13 दिनों की जंग के बाद अब कहा जा रहा है कि अमेरिकी सेना के पास सिर्फ 900 से 1000 पैट्रियट मिसाइलें ही बची हैं। दूसरी तरफ अमेरिकी कंपनियां हर महीने सिर्फ 20 मिसाइलों का प्रोडक्शन कर रहा है। दूसरी तरफ ईरान ने अपनी मिसाइलें और ड्रोनों का स्टॉक लगातार बढ़ा लिया है और वह नई मिसाइलों और ड्रोनों का भी बहुत तेजी से निर्माण कर रहा है। अब अगर ईरान की तरफ से और हमले होते हैं तो अमेरिका की बची-खुची मिसाइलें भी खत्म हो जाएंगी। यह चेतावनी अमेरिका की सेटकॉम ने भी ट्रंप को दी है। ऐसे में अमेरिका को अपने बेस की सुरक्षा की फिक्र है। ईरान के हमलों से भी अमेरिकी डिफेंस को भारी नुकसान हुआ है। हमलों के दौरान अमेरिकी बेस पर कमांड एंड कंट्रोल सेंटर नष्ट हो चुके हैं। इसके अलावा 6 पैट्रियट एयर डिफेंस रडार नष्ट हो चुके हैं। अमेरिका हमलों की वजह से 3 ईपीएस रडार सिस्टम गंवा चुका है। हमलों में 5 लांग रेंज रडार भी नष्ट हो गए हैं। एक तरफ हथियारों की कमी है तो दूसरी तरफ नुकसान की वजह से युद्ध का बढ़ता खर्च भी ट्रंप पर दबाव बना रहा है। हमलों के दौरान अमेरिका का एक एफ-15 विमान नष्ट हो गया। एफपी-8 विमान भी नष्ट हो चुका है। ईरानी हमलों की वजह से सी-17 कार्गो विमान जल गया, 8 हवा में तेल भरने वाले रिफ्यूलिंग विमान भी नष्ट हो गए हैं। हमलों के दौरान 4 हेलिकॉप्टर नष्ट हो गए। 13 दिनों में अमेरिका को इसलिए भी भारी नुकसान हुआ है क्योंकि ईरान जार्डन और ईराक में भी हमले करता रहा। ईरान ने इस बार सिर्फ अमेरिकी बेस पर मौजूद हथियारों, विमानों को टारगेट किया बल्कि दावा किया जा रहा है कि चीन की सेटेलाइट्स की मदद से ईरान ने सटीक निशाने से हमला किया। कहा तो यह भी जा रहा है कि केवल एयर डिफेंस सिस्टम पर ही हमले नहीं हुए पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के कई ठिकानों पर भी सीधे हमले किए ताकि जो इंटेलिजेंस कह रहे थे उनको रोका जा सके। ईरान के हमलों में अमेरिका के नुकसान का ग्राफ बढ़ता गया। ईरान ने अमेरिका एयर डिफेंस को खाली करने की राणनीति को आगे बढ़ाया। ईरान ने विमानों के रैंप और हैंगर्स को निशाना बनाया है। बहरीन ने हेलीकॉप्टर चेनटेनस सेंटर को नष्ट किया। ईरान ने अमेरिकी बेस पर 12 तेल डिपो को तहस-नहस कर दिया। सबसे बड़ा दावा तो इराक के इटबिल बेस को लेकर है। ईरानी सेना का दावा है कि लगातार हमलों की वजह से इराक के इटबिल में अमेरिका का पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो चुका है और ईरान के ठिकानों की ऑपरेशनल क्षमता काफी हद तक खत्म हो चुकी है। यूं ही नहीं अमेरिका के राष्ट्रपति ने युद्ध बंद करने की घोषणा की। पर डोनाल्ड ट्रंप की बातों पर अब शायद ही कोई यकीन करे? इस युद्ध को रोकने की पीछे भी कोई नया खेल हो सकता है। पर ईरान हर स्थिति के लिए तैयार है।
- अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 28 July 2026

और अब सऊदी-हूतियों में जंग

मध्य-पूर्व एशिया में एक तरफ अमेरिका-ईरान की जंग थम नहीं रही, वहीं अब एक नया मोर्चा खुलता दिख रहा है। यह है सऊदी अरब और यमन के हूतियों के बीच। सऊदी अरब और हूतियों के बीच सीधा टकराव शुरू हो चुका है। शुक्रवार को लाल सागर में एक सऊदी मालवाहक जहाज पर हमला हुआ, जिसके बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया। हमले के कुछ ही देर बाद सऊदी अरब ने हूतियों के नियंत्रण वाले यमन के हुदैदाह शहर पर जबर्दस्त हवाई हमले किए। कहा जा रहा है कि अमेरिकी फाइटर जेट एफ-35 से यह हमले किए गए। इसके जवाब में हूतियों ने सऊदी अरब को बड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि उसने अपने नर्क के दरवाजे खोल दिए हैं। हूती विद्रोहियों ने हालिया हमले में सऊदी अरब की सैन्य कार्रवाई और अपनी घोषित नौसैनिक नाकेबंदी का जवाब बताया है। उनके अनुसार सऊदी से जुड़े जहाजों को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे सऊदी बंदरगाहों के लिए माल ढो रहे थे या हूतियों की घोषित नाकेबंदी का उल्लंघन कर रहे थे। बता दें कि हूती विद्रोही लंबे समय से सऊदी अरब को यमन युद्ध का प्रमुख पक्ष मानते हैं। उनका आरोप है कि सऊदी के सैन्य अभियानों से यमन में भारी तबाही हुई हैं। इसलिए वे सऊदी के आर्थिक और सामरिक हितों को निशाना बना रहे हैं। लाल सागर बता दें कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गें में से एक है। तेल टैंकरों पर हमलों से न केवल सऊदी अरब के निर्यात पर असर पड़ता है, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर ही दबाव बनता है। हालिया हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में भी उछाल देखा गया है। दरअसल, यमन में सक्रिय हूती विद्रोही मुख्य रूप से देश के अल्पंसख्यक जैदी शिया समुदाय से जुड़ा एक सशस्त्र संगठन है। इस संगठन का नाम इसके संस्थापक हुसैन अल-हूती के नाम पर पड़ा। हूती खुद को अंसार उल्लाह यानी ईश्वर के समर्थक भी कहते हैं। साल 2003 में अमेरिका के नेतृत्व में इराक पर हुए हमले के बाद हूती आंदोलन ने अमेरिका और इजरायल विरोधी रुख की ओर मुखर किया। संगठन के समर्थकों के बीच अमेरिका और इजरायल के खिलाफ नारे लगाए गए, जो आज भी उनकी वैचारिक पहचान का हिस्सा माने जाते हैं। हूती संगठन खुद को हमास और हिजबुल्लाह जैसे समूहों के साथ मिलकर ईरान समर्थित एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस यानी प्रतिरोध की धुरी का हिस्सा मानता है। उधर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हूती विद्रोहियों को चेतावनी दी कि अगर जहाजों पर हमले जारी है तो उनके खिलाफ बड़ी सैन्य कार्रवाई की जाएगी। हूती विद्रोहियों के हमले से मध्य-पूर्व एशिया में एक नया मोर्चा खुलने की संभावना बढ़ गई है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को पहले ही झकझोर रखा है। इस ताजा संघर्ष के कारण दुनिया भर में ईरान समेत अन्य वस्तुओं की कीमतों में तेज उछाल आया है। वहीं फारस की खाड़ी में तनाव और गहरा हो गया है। क्येंकि अमेरिका और ईरान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलमार्ग पर प्रभाव और नियंत्रण को लेकर आमने-सामने हैं। एपी के अनुसार साबा न्यूज ने हूतियों के हवाले से कहा कि गुरुवार को लाल सागर में सऊदी के दो जहाजें, एनसीलिया और लामला पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले किए, जिससे दोनों में आग लग गई। हूती का कहना है कि सऊदी अरब ने जो बरसों पुरानी नाकेबंदी लागू कर रखी है। उसके विरोध में सऊदी जहाजों के लिए नाकेबंदी की गई है। उधर दोनों पक्षों में शांति वार्ता की खबरें भी आ रही हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 25 July 2026

अमेरिका-सऊदी परमाणु करार

ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच खाड़ी से एक ऐसी खबर आई है जो न सिर्फ मध्य-पूर्व को बल्कि पूरी दुनिया को चौंका देगी। जिस यूरेनियम संवर्धन को लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की धरती कंपा रखा है, वहीं वो एक डील के तहत सऊदी अरब को देने वाला है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने बुधवार को घोषणा की कि उसने सऊदी अरब के साथ एक अभूतपूर्व समझौता किया है। इस समझौते के तहत सऊदी अरब अमेरिकी सहयोग से अपने असैन्य परमाणु कार्यक्रम को विकसित कर सकेगा। अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान ने शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु सहयोग से जुड़े एग्रीमेंट 123 पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच परमाणु सुरक्षा उपायों से संबंधित एक द्विपक्षीय समझौते पर भी हस्ताक्षर हुए। व्हाइट हाउस ने कहा, दोनों समझौते मिलकर कई दशकों तक चलने वाली और अरबों डॉलर की साझेदारी के लिए कानूनी आधार तैयार करते हैं। इस समझौते को अब समीक्षा के लिए अमेरिकी कांग्रेस के पास भेजा जाएगा। अधिकारिक घोषणा के बाद अमेरिका और दुनिया के कई देशों में इस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। इजरायल के अर्थ व्यवस्था मंत्री नीर बरकात ने कहा कि यदि सऊदी अरब परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों और बिजली उत्पादन तक सीमित रखता है, तो उनके देश को इसमें कोई आपत्ति नहीं है। अगर वे इसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने के लिए करता है तो इजरायल इसे कभी स्वीकार नहीं कर सकता। वहीं इजरायल के पूर्व रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री अविग्दोर लिबरमैन ने इसका विरोध करते हुए लिखा, सऊदी अरब का असैन्य परमाणु कार्यक्रम आखिरकार परमाणु हथियार कार्यक्रम में बदल जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे पूरे मध्य पूर्व में परमाणु हथियारों की होड़ तेज हो सकती है, जिसे उन्होंने एक पागलपन भरी हथियारों की दौड़ करार दिया। इस समझौते के तहत सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिल सकती है और अमेरिकी कंपनियों के लिए अरबों डॉलर की कमाई हो सकती है। द वाल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक समझौते को इस तरह से तैयार किया गया है कि अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब के उभरते न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर के केन्द्र में कई विदेशी कंपनियां इससे बाहर हैं। ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि सीधे अमेरिकी दखल से सऊदी न्यूक्लियर प्रोग्राम पर वाशिंगटन का असर बढ़ेगा। तर्क है कि अमेरिका की भागीदारी से न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी को सैन्य मकसद के लिए इस्तेमाल होने से रोकने में भी मदद मिलेगी। ये मामला पाकिस्तान की टेंशन भी बढ़ाने वाला है क्योंकि अब तक मुस्लिम देशों में सिर्फ पाकिस्तान ही है, जिसके पास परमाणु हथियार है। इसी के दम पर पाकिस्तान इस्लामिक नाटो बनाने के ख्वाब देखता है। सऊदी अरब ने भी उसके साथ डिफेंस डील इसीलिए की थी। ऐसे में अगर वो खुद इन हथियारों तक पहुंच रख सकेगा तो उसके लिए पाकिस्तान की प्रासंगिकता भी खत्म हो जाएगी। इस डील का अमेरिका के अंदर भी विरोध हो रहा है। अमेरिका में लोगों का कहना है कि क्या ट्रंप ये भूल गए हैं कि 9/11 हमले में जो 19 आतंकी थे उनमें से 15 सऊदी अरब से आए थे। अब आप उन्हीं से इतना खतरनाक समझौता करना चाहते हो। इससे न केवल मध्य-पूर्व में ही परमाणु हथियार बनाने की होड़ मचेगी बल्कि पूरी दुनिया में भी ऐसी कोशिश होगी। वैसे डोनाल्ड ट्रंप कब अपनी बात से पलट जाएं कहा नहीं जा सकता। हमने ईरान के साथ शांति समझौते का हाल देखा है। समझौता होने के बाद हस्ताक्षर होने के बावजूद ट्रंप ऐसी-ऐसी नई शर्तें जोड़ देते हैं जिससे वह समझौता खटाई में पड़ जाए। कल को यह भी संभव है कि इजरायल के दबाव में वह ऐसी नई शर्तें जोड़ दे जिससे ये समझौता खटाई में पड़ जाए। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 23 July 2026

क्या नेतन्याहू न्यूयार्क में गिरफ्तार हो सकते हैं?

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के गलियारों में इस समय न्यूयार्क से उठी एक आवाज ने हलचल मचा दी है। न्यूयार्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी ने कहा है कि अगर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सितम्बर में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में हिस्सा लेने के लिए न्यूयार्क आते हैं तो उनकी गिरफ्तारी की संभावना पर उनका कार्यालय अब भी विचार कर रहा है। द न्यूयार्क टाइम्स के पॉडकास्ट द इंटरव्यू में ममदानी ने कहा कि उनका कानूनी विभाग नेतन्याहू की संभावित गिरफ्तारी के कानूनी पहलुओं पर सक्रिय रूप से विचार कर रहा है। ममदानी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा करने का वादा भी किया था। ममदानी ने कहा, मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू की जगह हेग में है। वे एक युद्ध अपराधी हैं, जिन पर अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) ने आरोप लगाए हैं कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू की वजह से कई वर्षें में उनके कदमों के कारण जो हालात पैदा हुए हैं, उसे देखते हुए बहुत से लोग यही राय रखते हैं। जब ममदानी से पूछा गया कि कानून उन्हें इस मामले में क्या ऐसा करने की अनुमति देता है तो उन्होंने जवाब दिया, इस पर हमारी कानूनी विभाग के साथ सक्रिय चर्चा चल रही है, लेकिन हमारे राष्ट्रीय स्तर पर कई बार देखा है कि कुछ लोग अपने हिसाब से कानून लिखने या कानूनी दायरे से बाहर जाने की कोशिश करते हैं। हमारी मंशा ऐसा करना नहीं है। बता दें कि अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने 2024 में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और इजरायल के कुछ अन्य नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। उन पर 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद गाजा में युद्ध अपराध के आरोप लगाए गए हैं। यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि गाजा में जारी मानवीय त्रासदी से आहत दुनिया के एक बड़े हिस्से की अंतरात्मा की आवाज है। मेयर ममदानी का संकल्प अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने बेंजामिन नेतन्याहू के अलावा पूर्व रक्षा मंत्री गैलेंट के खिलाफ भी गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं। इन नेताओं पर गाजा में युद्ध के एक तरीके के रूप में भुखमरी का इस्तेमाल करने, भोजन, पानी, ईंधन और दवाओं जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को व्यक्तिगत रूप से रोकने और नागरिकों पर जानबूझकर हमले करने जैसे गंभीर आरोप हैं। ममदानी ने अपनी मंशा स्पष्ट करते हुए कहा कि वे न्यूयार्क शहर के कानून विभाग के साथ लगातार संपर्क में हैं ताकि यह जाना जा सके कि उनके पास एक विदेशी नेता व एक राष्ट्राध्यक्ष को हिरासत में लेने का कितना अधिकार है? उन्होंने कहा न्यूयार्क शहर में कानून मुझे जो कुछ भी करने की अनुमति देगा, हम वही करेंगे। हालांकि कुछ कानूनी जानकारों का मानना है कि अमेरिका आईसीसी का सदस्य नहीं है, इसलिए मेयर के लिए ऐसा करना जटिल हो सकता है। भले लॉ स्कूल के प्रोफेसर हेरोल्ड हौगजू कोह के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर शहर की सड़कों पर चलते समय नेतन्याहू की स्थिति संवेदनशील हो सकती है। इस संभावित कदम पर नेतन्याहू ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने ममदानी पर पलटवार करते हुए उन्हें हमास का समर्थक और गुप्त रूप से अमेरिका से नफरत करने वाला तक कह डाला। नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल अमेरिकी मूल्यों के साथ खड़ा रहने वाला लोकतंत्र है। उधर ममदानी इन आरोपों को खारिज करते हैं। इस बीच ममदानी के बयान पर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। कई लोगों ने इसे ममदानी का बड़बोलापन बताया है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी दूत माइक वाल्ट्स ने इस खबर पर पोस्ट किया। मेयर ममदानी, ये चार वजहें बताती है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान न्यूयार्क में प्रधानमंत्री नेतन्याहू को क्यों नहीं गिरफ्तार किया जा सकता है। पहला-अमेरिका उस संधि का पक्षकार नहीं है, जिस पर अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय की कानूनी-व्यवस्था आधारित है। दूसरा-संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय समझौते के अनुसार बैठकों में आने वाले विदेशी सरकार के प्रमुखों को राजनयिक संरक्षण प्रदान करता है। तीसरा-राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख की कानूनी इम्यूनिटी भी ऐसे मामलों में लागू होती है और चौथा- विदेश नीति ऐसे मामलों में संघीय सरकार का अधिकार स्थानीय प्रशासन से ऊपर होता है। इसलिए न्यूयार्क के मेयर की इच्छा या घोषणा से ऐसा कोई भी कदम उठाया नहीं जा सकता। 

-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 21 July 2026

होर्मुज ईरान का ट्रंप कार्ड

ईरान ने होर्मुज स्टेट बंद कर अमेरिका के सभी रणनीतिक गणित और वैश्विक बाजार को हिला दिया है। यह ईरान का ऐसा तुरुप का पत्ता है जिसने ट्रंप को चारों खाने चित्त कर दिया है। ईरान ने बिना कोई बड़ा परमाणु कदम उठाए सिर्फ एक समुद्री रास्ते की चाबी अपने हाथ में लेकर अमेरिका के पूरे जंग की रणनीति को बदल दिया है। अब अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध का सबसे बड़ा मुद्दा होर्मुज को खोलने, खुलवाने का बन गया है। याद रहे कि 28 फरवरी से पहले यह होर्मुज कभी भी बंद नहीं हुआ था। यह विचार तो ईरान को तब आया जब अमेरिका ने 28 फरवरी को इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमले किए। ईरान ने होर्मुज का ताला लगाकर अमेरिका के सामने यह साफ कर दिया है कि अगर बातचीत करनी है तो शर्तें ईरान की होगी। होर्मुज का बंद होना न सिर्फ मध्य-पूर्व में ही असर डाल रहा है पर इसका प्रभाव अमेरिका में भी सीधा पड़ रहा है। मैं बात कर रहा हूं अमेरिका में होने वाले मिड टर्म चुनाव की जिनमें ट्रंप का राजनीतिक भविष्य कुछ हद तक टिका हुआ है। ईरान ने ठीक उसी समय होर्मुज पर दबाव बनाया है, जब अमेरिकी कूटनीति सबसे कमजोर मोड़ पर है। ईरान से तंग अमेरिकी कूटनीति के लिए एक बड़ा मिस कैलकुलेशन साबित हुआ है। सीजफायर खत्म होने के बाद से ही अमेरिका ईरान पर मिसाइलें बरसा रहा है और ईरान जवाबी हमले कर रहा है। लेकिन ईरान ने फिर अमेरिका को झुकाने के लिए अपने ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया और बारूदी धमाकों के बीच ईरान ने एक बार फिर होर्मुज को बंद कर दिया। ये ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका में मिड-टर्म चुनाव सिर पर हैं और अमेरिकी जनता से पेट्रोल के दाम गिरने का दावा कर रहे थे। ईरान ने ठीक उसी वक्त अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सबसे कमजोर नस यानी कच्चे तेल की सप्लाई पर पैर रख दिया है। अमेरिका-ईरान के बीच हमलों के बाद तेल की कीमतों में 3ज्ञ् से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई है। होर्मुज स्टेट ने तनाव बढ़ने और कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा होने की वजह से नवम्बर में होने वाले अमेरिकी मिड-टर्म चुनावों पर इसका सीधा असर पड़ने वाला है। वॉलिट और वोट समीकरण अमेरिकी राजनीति का कड़वा सच है क्योंकि अमेरिकी राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि राष्ट्रपति चाहे कोई भी वादा करे, लेकिन वोटर अपना फैसला पेट्रोल पंप पर तेल की कीमतों को देखकर ही तय करता है। इससे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उसकी विरोधी पाटी रिपब्लिकन पाटी पर भारी राजनीतिक दबाव बढ़ेगा? राष्ट्रपति ट्रंप के सत्ता में आने के बाद पेट्रोल के दाम 2.50 डॉलर प्रति गैलन तक लाने का वादा किया था, लेकिन होर्मुज संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतें 80 डॉलर से 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जिससे पेट्रोल के दाम घटने के बजाय बढ़ रहे हैं। पेट्रोल महंगा होने का मतलब है आज अमेरिकी परिवार के बजट पर सीधा दबाव पड़ेगा, अमेरिकी जनता की जेब पर सीधी मार होगी। इससे अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी, ट्रांसपोर्टेशन बढ़ने से सुपर मार्केट के सामान से लेकर हवाई टिकट तक सब महंगा होगा। इतिहास गवाह है कि जब भी चुनाव से ठीक पहले अमेरिका में ईंधन के दाम बढ़े हैं। सत्ताधारी दल को चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ा है। जैसे 1979 में जिमी कार्टर के साथ हुआ था। होर्मुज बंद होते ही वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ने लगे हैं। इंटरनेश्नल बेच मार्क ब्रेट क्रूड 3.92ज्ञ् से बढ़कर 78.99 डॉलर प्रति बैरल हो गया और अमेरिकी क्रूड 3.44ज्ञ् से बढ़कर 73.87 डालर प्रति बैरल हो गया है। अगर होर्मुज लंबे समय तक यूं ही बंद रहता है तो इसका असर अमेरिका पर ही नहीं पूरे विश्व पर पड़ेगा और ऐसा होने से रोकने की चाबी सिर्फ ईरान के हाथ में है। 

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 18 July 2026

ट्रंप: मोजतबा खामेनेई 90 फीसदी खत्म?

ईरान के नए सर्वेच्च नेता मोजतबा अली खामेनेई अपने पिता आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भी नहीं दिखे थे और तब से ही उनकी सेहत को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फॉक्स न्यूज से कहा कि आयतुल्लाह अली खामनेई मारे जा चुके हैं और उनके बेटे मोजतबा खामेनेई भी 90 फीसदी खत्म हो चुके हैं। ट्रंप ने आगे कहा कि उनके पास अब कोई नौसेना नहीं बची है, उनकी वायु सेना भी नहीं बची है, सब कुछ खत्म हो चुका है। उनका एयर डिफेंस सिस्टम भी खत्म हो चुका है। उनके सभी नेता मारे जा चुके हैं। उनके सबसे बेहतरीन नेता मारे जा चुके हैं। इससे पहले मोजतबा खामेनेई के नाम से शनिवार को जारी एक लिखित बयान में पूर्व सर्वेच्च नेता आयतुल्लाह अली खामनेई की हत्या का बदला लेने की कसम खाई। बयान में कहा गया था कि हम अपने पवित्र खून और इन दोनों युद्धों में शहीद हुए सभी लोगों के खून का बदला लेने की कसम खाते हैं। दुनिया भर में ऐसे लोग मौजूद हैं जो बदला लेने को तैयार हैं। इसी साल 23 अप्रैल को अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें बताया गया था कि ईरान के नए सर्वेच्च नेता मोजतबा खामेनेई अमेरिका-इजरायल के उस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसमें उनके पिता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई थी। हालांकि वह मानसिक रूप से पूरी तरह सक्रिय हैं। अखबार ने अधिकारियों के हवाले से कहा था, उनके एक पैर का तीन बार ऑपरेशन किया गया है और अब उन्हें कृत्रिम संक्रमित पैर (प्रोस्येटिक) लगाए जाने का इंतजार है। उनके एक हाथ की भी सर्जरी हुई है और उसकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे वापस आ रही है। उनके चेहरे और होंठ पूरी तरह झुलस गए हैं, जिससे उन्हें बोलने में कठिनाई होती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि आखिरकार उन्हें प्लास्टिक सर्जरी की भी जरूरत होगी। बता दें कि इसी साल 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल हवाई हमलों में आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद मोजतबा खामेनेई को सर्वेच्च नेता नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के बाद से ही वह सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए हैं। उन्होंने कोई वीडियो संदेश भी जारी नहीं किया है। इससे इस बात को लेकर सवाल उठे हैं कि उसी हमले में वह कितने गंभीर रूप से घायल हुए थे? आयतुल्लाह अली खामेनेई के अन्य तीन बेटे मसूद, मुस्तफा और मेमसाम रविवार को आयोजित श्रद्धांजलि सभा में शामिल हुए थे। उनके साथ राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और रिव्यूल्शनरी गार्ड्स के प्रमुख अहमद वहीदी सहित कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। जून में जारी एक बयान में मोजतबा खामेनेई ने कहा था कि सिद्धांत रूप से वह अमेरिका के साथ डील के पक्ष में नहीं थे। लेकिन राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के आश्वासनों के बाद ही उन्होंने इसकी अनुमति देने का फैसला किया। कुवैती अखबार अल जरीदा ने मार्च 2026 में एक रिपोर्ट की थी। इसके मुताबिक मोजतबा खामेनेई को शुरुआत में इलाज के लिए मास्को ले जाया गया था। उसके बाद मोजतबा के स्वास्थ्य को लेकर कोई खबर नहीं आई। इस वक्त मॉस्को खुद असुरक्षित है, वहां लगातार यूव्रेन का हमला हो रहा है, इसलिए इस वक्त चीन को मोजतबा के लिए सुरक्षित माना जाता है। ईरानी जनता चाहती है कि जल्द आयतुल्लाह मोजतबा आवाम के सामने आएं ताकि दुनिया देख सके कि वह ठीक हैं, सुरक्षित हैं। 

-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 16 July 2026

आंख के बदले आंख

मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान ने दावा किया कि उसने आंख के बदले आंख नाम से सैन्य अभियान शुरू करते हुए खाड़ी क्षेत्र में मौजूद ठिकानों पर मिसाइल हमले किए हैं। ईरान का कहना है कि यह कार्रवाई हाल के अमेरिकी हमलों के जवाब में की गई है। इस दावे के बाद पूरे क्षेत्र में युद्ध तेज हो गया है। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब एक बार फिर खुली जंग का रूप ले चुका है। यह संघर्ष अब सिर्फ सीमित क्षेत्रों तक ही नहीं रहा बल्कि पूरे मिडल ईस्ट, वैश्विक तेल बाजार और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार तक फैल चुका है। यह कहना गलत नहीं होगा कि अब यह युद्ध बढ़ता जा रहा है और भयानक रूप अख्तियार कर सकता है। ईरान के सरकारी मीडिया के मुताबिक इस अभियान के तहत खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। ईरान का दावा है कि उसका उद्देश्य उन ठिकानों को जवाब देना था, जहां से उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई की गई थी। ईरान ने इस सैन्य कार्रवाई को आंख के बदले आंख (आई फॉर एन आई) नाम दिया है। इस नाम का सीधा संदेश है कि वह अपने खिलाफ हुई हर सैन्य कार्रवाई का जवाब देगा। ईरान लंबे समय से कहता आ रहा है कि अगर उसकी देश की सुरक्षा या उसके सैन्य ठिकानों पर हमला होगा तो वह जवाबी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। इसी नीति के तहत उसने पहले भी कई बार जवाबी कार्रवाई की घोषणा की है। ईरान की आईआरजीसी ने दावा किया है कि उसने आई फॉर एन आई अभियान के तहत जार्डन, बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। पहले चरण में जार्डन के प्र्रिंस हसन एयरबेस पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए। दूसरे चरण में बहरीन के शेख ईसा एयरबेस पर हमला कर हेलीकॉप्टर और ड्रोन सुविधाओं को निशाना बनाया गया। तीसरे चरण में कुवैत के अली अल-अलेम एयरबेस और अहमद अल-जाबेर एयरबेस पर हमले का दावा किया गया। ईरान ने कहा कि यह कार्रवाई अमेरिकी सैन्य हमलों के जवाब में की गई है। खाड़ी क्षेत्र दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का सबसे अहम केन्द्र माना जाता है। यहीं से दुनिया के बड़े हिस्से में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है। अगर अमेरिका ईरान के बीच यह युद्ध और तेजी पकड़ता है तो इसका सीधा असर होर्मुज स्टेट पर पड़ेगा, बल्कि पड़ना शुरू हो गया है। अमेरिका के लगातार ईरान पर हमलों के जवाब में ईरान ने होर्मूज बंद करने का एलान भी कर दिया है। इसका सीधा असर अंतर्राष्ट्रीय तेल कीमतों, शिपिंग लागत और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ेगा। भारत जैसे देश जो अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी से पूरा करते हैं, वे भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। यह पहली बार नहीं जब ईरान ने बदले के लिए सैन्य कार्रवाई का वादा पूरा करने का प्रयास किया है। जनवरी 2020 में जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद ईरान ने इराक में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें दागी थीं। अप्रैल 2024 में दमिश्क स्थित ईरानी दूतावास पर हमले के बाद भी ईरान ने पहली बार सीधा अपनी जमीन से इजरायल पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए थे। इससे साफ है कि ईरान अपनी सुरक्षा नीति में जवाबी कार्रवाई को महत्वपूर्ण रणनीति मानता है। 

 -अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 14 July 2026

ट्रंप की हत्या की साजिश


इजरायल ने अमेरिका के साथ ऐसी नई जानकारी देने का दावा किया है, जिसमें ईरान पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया है। अमेरिकी मीडिया में यह दावा किया गया है। ट्रंप इस पर भड़क गए और अपना आपा खो बैठे हैं। अमेरिका का प्रतिष्ठित समाचार पत्र द वॉल स्ट्रीट जर्नल में एक रिपोर्ट छपी है, जिसके मुताबिक इजरायल ने अमेरिका को बताया है कि उसके पास खुफिया रिपोर्ट है। खुफिया जानकारी है जिसके अनुसार तेहरान ट्रंप की हत्या की नई योजना बना रहा है। मोसाद ने ये इंटेल शेयर की है और ट्रंप से कहा है कि वे ईरान के टारगेट नंबर वन पर है। इसका नतीजा यह हुआ कि नाटो के समिट के बाद ट्रंप ने डर कर अपना नया एयर फोर्स वन बदल डाला और अमेरिका से पूरा एयर फोर्स वन मंगवाया और उसमें वापस अमेरिका पहुंचे। उधर ट्रंप ने दावा किया कि अगर ईरान उनकी हत्या करने में सफल होता है तो उन्होंने पहले ही एक आदेश दे रखा है कि अगर ईरान अमेरिका पर हमला करता है, जैसा दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा होगा ऐसा जवाब दिया जाएगा। ट्रंप ने कहा है कि 1000 मिसाइलें ईरान को अपने निशाने पर लिए हुए हैं। उन्होंने कहा कि अगर ईरान उनकी हत्या करने में सफल होता है तो उन्होंने पहले से ही एक आदेश दे रखा है। न्यूयार्क पोस्ट को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि इस आदेश के मुताबिक ईरान पर इतना बड़ा जवाबी हमला करे जैसा दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा होगा। सवाल उठता है कि क्या ट्रंप ऐसा कोई आदेश दे भी सकते हैं या फिर इतिहास में किसी नेता ने ऐसा आदेश दिया था। अमेरिकी संविधान के तहत कोई भी राष्ट्रपति ऐसा आदेश नहीं छोड़ सकता कि उसकी मौत के बाद अपने आप किसी देश पर हमला कर दिया जाए। किसी भी बड़े सैन्य अभियान का फैसला उस समय जो राष्ट्रपति होगा वही तय करेगा। क्योंकि कमांडर इन चीफ के आदेश पर ही अमेरिकी सेना ऐसा कुछ कर सकती है। ट्रंप का यह बयान सिर्फ ईरान के लिए नहीं बल्कि अमेरिकी जनता के लिए भी एक राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। एक तरफ वह अपने समर्थकों के सामने यह छवि बनाना चाहते हैं कि वह निडर हैं और सख्त नेता हैं जो किसी भी धमकी के आगे नहीं झुकेंगे, दूसरी तरफ ईरान को यह संदेश देना चाहते हैं कि अगर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई हुई तो जवाब पूरे देश को मिलेगा। सभी जानते हैं कि इजरायल अमेरिका-ईरान के शांति-वार्ता से परेशान है और इसे हर हालत में तोड़ना चाहता है। वह ट्रंप कितने बहादुर हैं यह भी जानती है। इससे बेहतर क्या हो सकता है कि यह खबर चला दो कि आप ईरान के टारगेट नंबर वन हैं। इससे ट्रंप मजबूरन ईरान पर हमला कर देंगे और एक बार फिर युद्ध शुरू हो जाएगा। हुआ भी यही। अमेरिका ने ईरान पर ताबड़तोड़ हमले कर दिए और ईरान ने भी जबर्दस्त जवाबी कार्रवाई कर दी। एक बार फिर मध्य-पूर्व जंग की आग में धकेल दिया गया। वैसे हम ट्रंप और नेतन्याहू से पूछना चाहते हैं कि जब आपने 28 फरवरी को अयातुल्ला अली खामेनेई और उनके लगभग पूरे परिवार को निशाना बनाया था, जिसमें उनकी 14 महीने की पोती भी शामिल थी, 40 से अधिक टॉप के मिलिट्री कमांडरों को निशाना बनाया था तब आपको यह ख्याल नहीं आया था कि ईरान भी ऐसा कर सकता है और अपने सुप्रीम लीडर की हत्या का बदला ले सकता है? अब जब अपने पर पड़ी तो आप को नानी याद आ गई। वैसे भी इजरायल के मंत्री ने खुलेआम ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई की हत्या करने की खुली धमकी दी थी। शहीद अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में आपने देखा होगा कि किस तरह करोड़ों लोगों ने अपने रहबर की हत्या का बदला लेने की कसम खाई थी। ईरान आपसे बदला ले सकता है और ले भी रहा है पर इस तरह नहीं जैसे नेतन्याहू और मोसाद आपको बेवकूफ बनाकर अपने हित साध रहा है।
- अनिल नरेन्द्र