Translater

Showing posts with label Aksai Chin. Show all posts
Showing posts with label Aksai Chin. Show all posts

Friday, 2 March 2012

चीन को दिया एंटनी ने करारा जवाब

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2 March 2012
अनिल नरेन्द्र
चीन भारत से पंगा लेने से बाज नहीं आता। कुछ न कुछ शोशा छोड़ता ही रहता है। ताजा किस्सा भारत के रक्षा मंत्री एके एंटनी की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा को लेकर है। अरुणाचल प्रदेश पर दावा जताते हुए चीन ने फिर भारत को आंखें दिखाने का प्रयास किया। इस बार ड्रैगन रक्षा मंत्री एके एंटनी की अरुणाचल प्रदेश यात्रा को लेकर बौखला गया। उसने भारत को खुलेआम चेताया कि भारत को ऐसे किसी भी कदम से बचना चाहिए जिससे सीमा विवाद और जटिल होने की आशंका हो। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हांग ली ने सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए भारत से चीन के साथ मिलकर काम करने को कहा है। चीन की सरकारी एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक उन्होंने कहा कि सीमा विवाद पर चीन अपने रुख पर कायम है और उसका नजरिया बिल्कुल साफ है। दरअसल अरुणाचल के दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा होने का दावा कर रहा चीन किसी भी वरिष्ठ भारतीय सरकारी प्रतिनिधि की राज्य की यात्रा पर अपना एतराज जताता रहा है। वहअरुणाचल के लोगों को वीजा देने से भी इंकार करता रहा है। खास बात यह है कि दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच सीमा विवाद पर 15 दौर की वार्ता हो चुकी है। जनवरी से जून 2010 में सिक्किम से लगते क्षेत्र में चीनी सेना ने 65 बार भारतीय क्षेत्र में आने का प्रयास किया। हालांकि भारत सरकार ने हमेशा विवाद को शांत करने व टालने का प्रयास किया है पर इस बार हमें स्वीकार करना होगा कि रक्षा मंत्री एके एंटनी ने चीन को मुंह तोड़ जवाब दिया है। ऐसी ही भाषा चीन समझता है। एके एंटनी ने चीन को इस मुद्दे को लेकर सोमवार को खरी-खरी सुनाईं। उन्होंने कहा है कि इस तरह की टिप्पणी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और आपत्तिजनक है। चीन के इस रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए एंटनी ने कहा कि कश्मीर की तरह ही अरुणाचल भी भारत का अभिन्न हिस्सा है और बतौर रक्षा मंत्री वहां जाना उनका अधिकार और कर्तव्य है। एक कार्यक्रम से इतर पत्रकारों के सवालों के जवाब में रक्षा मंत्री ने कहा कि वह अरुणाचल प्रदेश की स्थापना की 25वीं वर्षगांठ पर आयोजित समारोह में भाग लेने गए थे और यह उनका हक बनता है। एंटनी ने कहा कि मुझे यह प्रतिक्रिया देखकर काफी हैरानी हुई है। इस तरह की टिप्पणी सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण है और इस पर उन्हें आपत्ति है। रविवार को बेंगलुरु से विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने चीन की प्रतिक्रिया की आलोचना कर कहा था कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अखंड हिस्सा है और इस मामले में उसे दखलअंदाजी नहीं करनी चाहिए। विदेश मंत्रालय के आला सूत्रों ने तो बीजिंग को यह कहकर संदेश दिया कि अरुणाचल में जनता ने भारतीय नेताओं को लोकातंत्रिक तरीके से हुए चुनाव में वोट दिया है। इसमें अपने आप में ही बीजिंग को जवाब देख लेना चाहिए। चीन को खरी-खरी सुनाते हुए रक्षा मंत्री ने परमाणु पनडुब्बी को भारतीय नौसेना में शामिल करने पर एतराज जता रहे पाकिस्तान को भी दो टूक अंदाज में जवाब दिया है। एंटनी ने कहा कि भारत अपनी सुरक्षा के लिए अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहा है न कि उसका इरादा किसी से टकराव का है। उभरते सुरक्षा माहौल के मद्देनजर भारत हर जरूरी सैन्य कदम उठाएगा। हम रक्षा मंत्री एंटनी के चीन और पाक दोनों को दो टूक जवाब देने का स्वागत करते हैं और उम्मीद करते हैं कि भविष्य में भी ऐसा ही होगा ताकि चीन को समझ आ जाए कि वह अब भारत को इतनी आसानी से डरा नहीं सकता।
A K Antony, Aksai Chin, Anil Narendra, China, Daily Pratap, Sikkim Chief Minister, Vir Arjun

Wednesday, 7 December 2011

India must amend its China policy

- Anil Narendra
India's relations with China have always been sweet and sour. It was India, who preached Buddhism to the Chinese. With the Communist Party coming to power in China in 1949, relations between both the countries were established. India was the only non-communist country that recognized the Chinese Communist Government and it also helped China in getting recognition by the UNO. An eight-year agreement was signed between India and China in 1954, under which India surrendered its additional regional rights over Tibet to China, on the basis of which both the countries affirmed Panchsheela principles. Relations between both started deteriorating in 1957. The Tibetan religious leader, Dalai Lama had to flee Tibet and take refuge in India on 31st March 1959 in view of Chinese repression, which also became one of the reasons for 1962 Indo-China war. Tension between India and China due to Dalai Lama and his followers mounted and it still continues. Meanwhile, China has now adopted a more rigid and aggressive stand on the issue of Dalai Lama and his followers. Recently, I was in Kolkata, in connection with a programme, in which Dalai Lama was invited. The Governor, AK Narayanan and the Chief Minister, Mamata Bannerjee were also to participate in the programme. China wrote a formal letter to the West Bengal Government demanding that Governor and Chief Minister stay away from the programme. This demand of China was not agreed upon. The Governor attended the programme, but the Chief Minister could not participate in view of the illness of her mother, however, her representative, MP Derek O'Brian attended the programme. India decided to lodge a protest in this matter and to ask China, why it wrote such a letter to the West Bengal Government. Earlier, also China had demanded to cancel the Buddhist scholar meet being held in New Delhi, which was to be addressed by the Dalai Lama. When the request was turned down, China decided not to participate in the proposed meeting on border disputes. China does not desist from interfering it India's internal affairs and its attitude towards India, of late, has turned more aggressive. For example, what the state government of a country should do or not do, must not be the concern for any foreign government. In fact, China has started regarding itself a super power like US and wants that all its obstinate demands must be agreed to. Government of India, too, appears to give in to China to some extent. That is why, the J&K Chief Minister, Omar Abdullah said that India must clarify its China policy. Addressing a gathering in Mumbai on Saturday, Omar said that India must deal with China firmly, because it claims parts of the country as disputed areas and it has also questioned the sovereignty of India over a number of its territories. A few hours earlier, his father Farooq Abdullah said in Delhi that India must accept the fact that the PoK cannot be taken back neither from Pakistan nor from China. His son, Omar asked, if you consider PoK as an integral part of India, then why didn't you cross the LoC during the Kargil war? If you respect the LoC during war, it means that you have lost hope of getting it back. Omar pleaded with New Delhi to give up its always forgiving posture in it its relations with Pakistan and China. He seriously wished that India exhibit more firmness while dealing with China. It appears that China never hesitates in declaring Kashmir as a disputed area, while we are expected to follow 'One China' policy and not to raise questions on the status of China over Tibet and Taiwan. Why it is so that we follow 'One China' policy, whereas China is ignoring the policy of United India. We had been moralistic and fearful in our relations with China, though it is not required. I feel that time has now come when we should deal with China with firmness. If China can question our sovereignty, then we also have every right to raise our fingers over its sovereignty (which includes Tibet also).

चीन के प्रति भारत को अपनी नीति बदलनी होगी



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

Published on 7th December 2011
अनिल नरेन्द्र
भारत और चीन के बीच संबंध हमेशा सर्द-गर्म के रहे हैं। भारत से ही चीन में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ था। 1949 में चीन की कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना हुई और दोनों देशों के बीच संबंधों की स्थापना हुई। भारत ने प्रारम्भ से ही चीन के प्रति मैत्री व सद्भावना का इजहार किया। भारत एक ऐसा पहला गैर कम्युनिस्ट देश था जिसने चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता दी थी और संयुक्त राष्ट्र संघ में भी चीन को मान्यता दिलाने का प्रयास किया था। 1954 में चीन और भारत के बीच एक 8वर्षीय समझौता हुआ जिसके अंतर्गत भारत ने तिब्बत में अपने अतिरिक्त देशीय अधिकारों को चीन को सौंप दिया। इसके आधार पर दोनों देशों के बीच पंचशील सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया। 1957 में दोनों देशों के बीच तिब्बत को लेकर संबंध खराब होने शुरू हो गए। 31 मार्च 1959 को तिब्बत में चीनी दमन की वजह से वहां के धर्मगुरु दलाई लामा ने भारत में राजनीतिक शरण ली इसी तनाव की परिणति 1962 में भारत-चीन युद्ध के रूप में भी हुई। आज भी दलाई लामा और उनके अनुयायियों को लेकर भारत-चीन में तनाव बना हुआ है। दलाई लामा के मुद्दे पर चीन अब कुछ ज्यादा ही आक्रामक रुख अपनाए हुए है। पिछले दिनों कोलकाता में एक कार्यक्रम था जहां दलाई लामा ने आना था। इस कार्यक्रम में राज्यपाल एके नारायणन और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी उपस्थित होना था। चीन ने पश्चिम बंगाल सरकार को बाकायदा एक चिट्ठी लिखी जिसमें यह मांग की गई थी कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री इस कार्यक्रम में न जाएं। यह मांग नहीं मानी गई, राज्यपाल इस कार्यक्रम में शामिल हुए और मुख्यमंत्री अपनी मां की बीमारी की वजह से उसमें शामिल नहीं हो पाईं, लेकिन उनके प्रतिनिधि के तौर पर सांसद डेरेक ओब्राइन शामिल थे। भारत ने इस बात का विरोध दर्ज करने का फैसला किया है कि चीन ने पश्चिम बंगाल सरकार को आखिर ऐसी चिट्ठी क्यों लिखी? कुछ ही दिन पहले चीन ने नई दिल्ली में बौद्ध विद्वानों के सम्मेलन को रद्द करने की मांग की थी जिसे दलाई लामा को संबोधित करना था। जब चीन की जिद्द नहीं मानी गई तो उसने सीमा विवाद पर प्रस्तावित बैठक में शामिल न होने का फैसला किया। चीन भारत के अंदरुनी मामलों में दखलंदाजी से बाज नहीं आता। उसने ज्यादा ही आक्रामक रुख अपना लिया है। मसलन देश की एक राज्य सरकार के मुखियाओं को क्या करना चाहिए या नहीं करना चाहिए, यह सीधे तौर पर किसी विदेशी सरकार को नहीं बताना चाहिए था। चीन दरअसल अपने आपको अमेरिका की तरह एक महाशक्ति मानने लगा है और अपनी हर जिद्द को मनवाना चाहता है। भारत सरकार भी कुछ हद तक चीन के सामने घुटने टेकती दिख रही है। तभी तो हाल में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भारत से कहा कि वह अपनी चीनी नीति को स्पष्ट करे। मुंबई में एक सभा में बोलते हुए उमर ने कहा कि भारत को थोड़ा और दृढ़ता के साथ चीन से पेश आना चाहिए क्योंकि यह देश को विवादित क्षेत्र कहता है और कई हिस्सों पर भारत की सप्रभुता पर सवाल भी खड़े करता है। उमर शनिवार को मुंबई में एक्सप्रेस अड्डे में बोल रहे थे। कुछ ही घंटे पहले उमर के पिता फारुख अब्दुल्ला ने दिल्ली में कहा था कि भारत को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि वह पाक अधिकृत कश्मीर को न तो पाकिस्तान से और न ही चीन से वापस ले सकता है। बेटे उमर ने कहा कि अगर सचमुच आपको विश्वास है कि पाक अधिकृत कश्मीर भारत का हिस्सा है तो कारगिल संघर्ष के दौरान आपने नियंत्रण रेखा को क्यों नहीं लांघा? अगर आप संघर्ष के समय भी नियंत्रण रेखा का सम्मान करते हैं तो इसका मतलब यही है कि आपने उस इलाके को वापस पाने की उम्मीद छोड़ दी है। उमर ने नई दिल्ली से गुजारिश की कि चीन व पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों में हमेशा क्षमाप्रार्थी हेने की मुद्रा त्याग दें। उन्होंने कहा कि मेरी दिली इच्छा है कि चीन के साथ पेश आते समय भारत थोड़ा और दृढ़ता दिखाए। ऐसा लगता है कि कश्मीर को विवादित क्षेत्र करार देने में चीन को जरा भी झिझक नहीं है जबकि हमसे `एक चीन' की नीति का पालन करने और तिब्बत व ताइवान के दर्जे पर सवाल नहीं खड़े करने की अपेक्षा की जाती है। ऐसा क्यों है कि हम अखंड चीन की नीति का पालन करें जबकि चीन अखंड भारत की नीति का पालन नहीं कर रहा है। चीन और पाकिस्तान दोनों के ही साथ अपने संबंधों में हम अरसे से शील-संकोची रहे हैं जबकि वाकई इसकी जरूरत नहीं थी। मुझे लगता है कि चीन के साथ थोड़ा सख्त होना अब जरूरी है। अगर हमारी सप्रभुता को लेकर चीन सवाल खड़ा करता है तो हमें भी कई हिस्सों में उसकी सप्रभुता (जिनमें तिब्बत भी शामिल है) पर सवाल खड़े करने का हक है।
Aksai Chin, Anil Narendra, China, Daily Pratap, Dalai Lama, India, Mamta Banerjee, Vir Arjun, West Bengal

Sunday, 9 October 2011

पीओके में चीनी मौजूदगी भारत की चिन्ता का सबब है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th October 2011
अनिल नरेन्द्र
भारत के सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने उस आशंका की पुष्टि कर दी है जो पिछले कई दिनों से फैली हुई थी। थल सेना अध्यक्ष जनरल सिंह ने बुधवार को कहा कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में चीन की सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के सैनिकों सहित करीब 4000 चीनी लोग मौजूद हैं। यह वहां निर्माण कार्य में जोरों से लगे हुए हैं। इनमें से कुछ वहां सुरक्षा उद्देश्यों से भी मौजूद हैं। यह क्षेत्र विवादित होने के साथ ही भारत-पाक के बीच नियंत्रण रेखा के भी काफी करीब है। सिंह का यह वक्तव्य पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चीनी सैनिकों की मौजूदगी और उनकी गतिविधियों के बारे में भारत में जताई जा रही चिन्ताओं की पृष्ठभूमि में आया है। वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मॉर्शल एनए ब्राउन एक साक्षात्कार के दौरान यह स्पष्ट कर चुके हैं कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चीन की मौजूदगी बढ़ने से भारत का ध्यान उस ओर आकर्षित हुआ है। पिछले वर्ष खबर आई थी कि जम्मू-कश्मीर के पीओके गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में करीब 11 हजार चीनी सैनिक मौजूद हैं। चीन के खतरनाक मंसूबों को लेकर जनरल सिंह की चेतावनी को गम्भीरता से लेने की जरूरत है। इस साल यह तीसरा मौका है जब देश के शीर्ष सैन्य या राजनीतिक नेतृत्व ने देश की सीमा पर चीन की हरकतों को लेकर चिन्ता व्यक्त की है। यह इसलिए भी ज्यादा चिन्ता का विषय है कि चीनी घुसपैठ अब पीओके में हो रही है। वहां बड़े पैमाने पर सड़कें, हवाई अड्डे आदि इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण जैसी चीनी हरकतें और पाकिस्तान द्वारा इसकी इजाजत देना भारत के लिए चिन्ता का सबब होना चाहिए। पहले ही पाकिस्तान ने हजारों वर्ग मील का पीओके का क्षेत्र चीन के हवाले कर दिया था। भारत को घेरने की जिस रणनीति पर यह दोनों देश वर्षों से काम कर रहे हैं, यह कदम उसी दिशा में उठाया एक और कदम है और इस अर्थ में दुस्साहसी है कि इससे भारत के खिलाफ चीन और पाक के कुटिल इरादे का एक बार फिर पर्दाफाश होता है। पिछले दिनों भारतीय सीमा में घुसकर बने पुराने बंकरों को नष्ट करने और भारतीय नमक्षेत्र का उल्लंघन कर चुकने के बाद बीजिंग अब पाक अधिकृत कश्मीर में नियंत्रण रेखा के बिल्कुल नजदीक सड़कें और बांध बना रहा है। यह भी महज इत्तिफाक नहीं कि उधर पीओके में चीनी गतिविधियां बढ़ती हैं तो इधर हमारे कश्मीर में आतंकियों की घुसपैठ बढ़ जाती है। भारत और अफगानिस्तान के बीच हुए रणनीतिक समझौते के बाद पाकिस्तान की हताशा को देखते हुए घुसपैठ और आतंकवाद के मोर्चे पर हमें ज्यादा सजग रहना होगा, क्योंकि उसकी पीठ पर चीन का हाथ है। चीनी घुसपैठ पर भारत की चिन्ता और शिकायत वाजिब है। भारत का हिस्सा होने के कारण पाक अधिकृत कश्मीर पर पाकिस्तान का कब्जा ही अवैध है, तब वहां किसी तीसरे देश द्वारा निर्माण कार्य करने का तो कोई औचित्य ही नहीं है। इसलिए अपनी आदत से मजबूर चीन के खंडन का भारत के लिए कोई मायना नहीं होना चाहिए। हमें अपना विरोध जारी रखते हुए अपनी सुरक्षा को और कड़ा करने पर ध्यान देना होगा। चीन पिछले कुछ समय से अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहा है वह भारत के लिए ही नहीं पूरी दुनिया के लिए चिन्ता का विषय है। लेकिन जहां तक भारत का सवाल है एक बार चीन से धोखा खाने के बाद भी हमारे हुक्मरान सम्भले नहीं हैं। पिछले दिनों रक्षा मंत्री ने खुद स्वीकार किया था कि सीमा पर सड़कों, हवाई अड्डों जैसी इंफ्रास्ट्रक्चर सुविधाओं के विकास को लेकर हम लापरवाह थे। जानबूझ कर बरती गई इस लापरवाही के पीछे जो सोच थी वह और भी डरावनी थी। हमें यह डर था कि सीमा पर विकसित इंफ्रास्ट्रक्चर कहीं चीनी हमले के समय उनकी सुविधा की चीज न बन जाए। मतलब हम 1962 के चीनी हमले और उससे मिली शर्मनाक हार की पुंठा से आज तक नहीं उभर पाए हैं। शायद यही कारण था कि पिछले कुछ समय तक चीनी हरकतों को छिपाने की कोशिश ज्यादा रहती थी। शुक्र है कि चीन की बढ़ती दबंगई और उसके षड्यंत्रकारी कदमों को अब भारत सरकार भलीभांति समझने लगी है। चीन के विरोध की अनसुनी करते हुए वियतनाम के साथ दक्षिण चीन सागर में संयुक्त रूप से तेल और गैस की खोज का अभियान शुरू करना सही दिशा में सही उठाया गया एक कदम है। चीन को काबू में रखने के लिए जरूरी है कि उस पर हर तरीके से जवाबी दबाव बनाया जाए। हमें अपनी सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यों को जल्द से जल्द पूरा करने की सख्त जरूरत है। हमारी फौजें पूरी तरह सजग रहें और चीन-पाक संयुक्त गतिविधियों पर पैनी नजर रखें।
Aksai Chin, Anil Narendra, China, Daily Pratap, India, Vir Arjun

Sunday, 22 May 2011

Pakistan plays Beijing card again

Anil Narendra
Estranged Pakistan has once again played its Beijing card. Pak Prime Minister, Yousuf Raza Gilani is in Beijing these days to pay his obeisance. For quite some time, China has been the most dependable friend for Pakistan. In the presence of Gilani, China warned US to keep away from Pakistan. China also assured Pakistan of going to any extent to ensure its security and providing all types of assistance and also said that America cannot harm Pakistan’s sovereignty. This information has been given by a Pak English Daily The Nation. According to a media report, China has clearly warned US that any attack on Pakistan will be considered as an attack on it. This warning comes in the wake of US operation in Abbotabad against al Qaeda Chief, Osama bin Laden. The Chinese Foreign Minister also communicated this warning-laden message during Sino-US political talks and discussions on economic affairs in Washington. America has also been advised to respect the sovereignty and integrity of Pakistan. The Chinese Prime Minister, Wen Jiabao told this to Yousuf Raza Gilani during the formal talks at Great Hall of the People.
China is the biggest businessman in the world. It does not do any favour without getting a price for it. If, today, it is supporting Pakistan openly, then it is gradually grabbing land in PoK too. And, Pakistan is handing over our land to the Chinese. China has already grabbed thousands of kilometer of land. GOC-in-C Northern Command, Lt Gen KT Parnaik, recently said in a Seminar that the presence of Chinese troops in PoK is continuously increasing and Chinese troops have been stationed on LoC. China is involved in a number of road, airport and hydro-power projects in PoK. Unfortunately, India tops the list of enemies of both Pakistan and China. US is second to us in the list. It may be noted that during the Indo-China war of 1962, China had occupied 38,000 sq. Km. area in the Northern sector of Aksai Chin. Next year, in order to pressurize India, Pakistan, under a pact handed over 5120 sq Km land in PoK for development. Military experts consider this area, strategically and politically very important.
Pakistan has always been playing the Beijing card to pressurize the US. China has helped Pakistan from nuclear to all types of assistance. Although China would not like to annoy America by its deeds, but for it, India has little significance. Pakistan has always been serving its interest by blackmailing other. Sometimes it blackmails America by staging war against al Qaeda-Taliban and sometime by playing Chinese card.

पाकिस्तान ने फिर खेला बीजिंग कार्ड

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
 Published on 22 May 2011
अनिल नरेन्द्र
चारों तरफ से घिरे पाकिस्तान ने एक बार फिर अपना बीजिंग कार्ड खेल दिया है। आजकल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी बीजिंग माथा टेकने गए हुए हैं। चीन पिछले कुछ सालों से पाकिस्तान का सबसे विश्वासपात्र देश बना हुआ है। चीन ने गिलानी की मौजूदगी में अमेरिका को चेतावनी दे डाली। चीन ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा कि वो पाकिस्तान से दूर रहे। इसके साथ ही चीन ने पाकिस्तान को आश्वासन दिया कि वो पाकिस्तान की रक्षा और मदद के लिए कुछ भी करेगा और अमेरिका पाकिस्तान की सप्रभुता को नुकसान नहीं पहुंचा सकता। पाकिस्तान के एक अंग्रेजी अखबार `द नेशन' ने ये जानकारी दी है। मीडिया की एक खबर में कहा गया है कि एबटाबाद में अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन के खिलाफ चलाए गए अमेरिकी अभियान के सन्दर्भ में चीन ने साफतौर पर चेतावनी दी है कि पाकिस्तान पर किए गए किसी भी हमले को चीन पर हमले की तरह समझा जाएगा। चेतावनी भरा यह संदेश वाशिंगटन में चीन-अमेरिका राजनीतिक वार्ता तथा आर्थिक मामलों पर हुई बातचीत के दौरान औपचारिक रूप से चीनी विदेश मंत्री ने भी दे दिया। अमेरिका को पाकिस्तान की सप्रभुता और एकता का सम्मान करने की नसीहत भी दी है। चीन के प्रधानमंत्री बेन जियाबाओ ने यूसुफ रजा गिलानी को ग्रेट हाल ऑफ द पीपुल्स में अपनी औपचारिक बातचीत के दौरान इस बारे में बताया।
चीन दुनिया का सबसे बड़ा बनिया है। वह बिना कीमत लिए कोई भी काम नहीं करता। अगर आज वह पाकिस्तान का इतना खुला समर्थन कर रहा है तो उसकी कीमत में पाक अधिकृत कश्मीर की जमीन को धीरे-धीरे हड़पता जा रहा है। पाकिस्तान कश्मीर के हमारे हिस्से को चीन को थमाता जा रहा है। चीन ने पहले से ही हजारों किलोमीटर के क्षेत्र को अपने कब्जे में कर रखा है। भारत के उत्तरी सेना कमांडर ले. जनरल केटी पटनायक ने हाल में एक सेमिनार में कहा कि पीओके में चीनी सैनिकों की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है और एलओसी में इन सैनिकों की मौजूदगी है। समझा जाता है कि चीन पीओके में लगातार निर्माण कराता जा रहा है। चीन पीओके के अन्दर अनेक सड़क, हवाई अड्डे और हाइड्रो-पॉवर परियोजनाओं में शामिल है। भारत दुर्भाग्य से आज चीन और पाकिस्तान दोनों का दुश्मन नम्बर वन है। अमेरिका का नम्बर हमारे बाद आता है। उल्लेखनीय है कि 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान चीन ने उत्तरी इलाके के 38 हजार वर्ग किलोमीटर अक्साई चिन के क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था। इसके अगले साल पाकिस्तान ने भारत पर दबाव बढ़ाने के लिए चीन से एक समझौता करके पीओके को 5120 वर्ग किमी क्षेत्र चीन को विकास के लिए सौंप दिया था। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्षेत्र सुरक्षा के लिहाज से राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है।
पाकिस्तान अमेरिका को आंख दिखाने के लिए हमेशा बीजिंग कार्ड खेलता है। चीन ने पाकिस्तान को परमाणु से लेकर हर तरह की मदद दी है। हालांकि खुले तौर पर चीन कोई ऐसा काम शायद न करे, जिससे अमेरिका नाराज हो जाए पर भारत उसकी किसी गिनती में नहीं। पाकिस्तान ने हमेशा ब्लैकमेलिंग करके अपना उल्लू साधा है, कभी अमेरिका को अलकायदा-तालिबान के खिलाफ लड़ाई का नाटक करके और कभी चीनी कार्ड खेलकर।