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Wednesday, 18 July 2012

सरकार में नम्बर दो की लड़ाई खुलकर सामने आई

मैंने इसी कॉलम में लिखा था कि श्री प्रणब मुखर्जी के संप्रग सरकार से हटने से इस मनमोहन सरकार को चलाना अत्यंत कठिन हो जाएगा। प्रणब दा इस सरकार के संकट मोचक थे, वह हर राजनीतिक समस्या का हल निकाल देते थे। अब मनमोहन सरकार को प्रणब की कमी खलेगी। यह सिलसिला शुरू भी हो गया है। संप्रग सरकार में नम्बर दो का मामला उलझ गया है। यूपीए सरकार में नम्बर दो की हैसियत रखने वाले प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने के बाद उनकी `कुर्सी' के लिए जंग छिड़ गई है। प्रणब के सरकार से बाहर जाने के बाद राकांपा प्रमुख शरद पवार की जगह रक्षा मंत्री एके एंटनी को प्रधानमंत्री के बाद नम्बर दो की जगह देने का मुद्दा संप्रग गठबंधन में कलह का सबब बन गया है। बहुत सोच-समझ कर मुंह खोलने वाले मराठा सरदार पवार ने उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए बुलाई गई बैठक से दूर रहकर विपक्ष को संप्रग की एकता पर सवाल उठाने का एक और मौका दे दिया है। एनसीपी का कहना है कि कृषि मंत्री शरद पवार यूपीए-एक और दो में कैबिनेट के वरिष्ठता क्रम में प्रणब मुखर्जी के बाद आते थे। मुखर्जी के सरकार से इस्तीफे के बाद नम्बर दो की हैसियत उन्हें ही मिलनी चाहिए। मुखर्जी के इस्तीफे के बाद हुई कैबिनेट बैठक (पहली) में पवार को प्रधानमंत्री के बगल में बिठाया गया था। प्रधानमंत्री कार्यालय की मंत्रियों के क्रम वाली वेबसाइट से भी उनका नाम दूसरे नम्बर पर था। मगर बाद में वेबसाइट ने सूची ही हटा दी गई। उधर बैठक के दो दिन बाद कैबिनेट में मंत्रियों के वरिष्ठता क्रम में बदलाव करते हुए रक्षा मंत्री एके एंटनी को सरकार में नम्बर दो बना दिया गया। इसके विरोध में एनसीपी ने शनिवार को उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार तय करने के लिए बुलाई गई यूपीए की बैठक में हिस्सा लेने से इंकार कर दिया। एनसीपी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक आजादी के बाद यह पहला मौका है जब कैबिनेट के वरिष्ठताक्रम में बदलाव किया गया है। इस नेता ने कहा कि एनसीपी ऐसी पार्टी नहीं है जो छोटे-छोटे मुद्दों पर हंगामा करती रहती है पर ऐसा रवैया हमारा अपमान है और हम यह अपमान बर्दाश्त करने को कतई तैयार नहीं हैं। एनसीपी ने कभी भी इससे पहले कैबिनेट मीटिंग का बहिष्कार या बायकाट नहीं किया, यह पहला मौका है और वजह है शरद पवार का अपमान। विपक्ष ने इसे संप्रग में बिखराव का एक और संकेत करार दिया है। भाजपा महासचिव मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा, `कांग्रेस गठबंधन धर्म का पालन करने में असफल रही है। हमें लगता है कि राष्ट्रपति चुनाव के बाद संप्रग टूट जाएगा और देश को मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़ेगा।' शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा, `शरद पवार का अनुभव और वरिष्ठता प्रणब मुखर्जी के बराबर है।' एनसीपी के एक नेता ने कहा कि इस मुद्दे पर औपचारिक रूप से पार्टी अपनी तरफ से कांग्रेस से कोई बात नहीं करेगी पर जो हुआ वह बेहद आपत्तिजनक है।

Tuesday, 10 April 2012

आखिर कितने दिन का युद्ध लड़ सकती है हमारी सेना?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10 April 2012
अनिल नरेन्द्र
सेना की दो इकाइयों द्वारा 16-17 जनवरी में दिल्ली की ओर बढ़ने को लेकर खबरें पहले से ही पक रही थीं और इसकी भनक सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह को भी थी। यह मार्च में ही एक अंग्रेजी पत्रिका को दिए उनके इंटरव्यू से पता चलता है। उन्होंने कहा था, `मान लीजिए, हमारी एक कोर या डिवीजन या ब्रिगेड अभ्यास कर रही तो कोई कहेगा कि ओह.. उन्होंने अभ्यास किया। यह अभ्यास नहीं था, वे कुछ और करना चाहते थे।' उन्होंने कहा, `अब आप इससे एक खबर बनाएंगे। इन दिनों कई लोग गलत मकसद से खबरें बनाना चाहते हैं।' उधर अंग्रेजी अखबार द गार्डियन ने दावा किया है कि सेना के दिल्ली कूच की खबर के पीछे एक केंद्रीय मंत्री का हाथ है। मंत्री का नाम नहीं बताया पर यह कहा गया है कि मंत्री के करीबी रिश्तेदार का संबंध रक्षा खरीद से जुड़ी लॉबी का है और यह लॉबी दोनों रक्षा मंत्री एके एंटनी और सेनाध्यक्ष जनरल सिंह से परेशान थी। आर्म्स लॉबी एंटनी के इसलिए खिलाफ थी क्योंकि एंटनी एक ईमानदार मंत्री हैं जो खरीद में कोई गड़बड़ी नहीं होने देना चाहते। एंटनी का भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान से हथियार सप्लायर, उनके एजेंट, विदेशी कम्पनियां और सेना का एक वर्ग खिलाफ है और यह चाहते हैं कि इन्हें रक्षा मंत्रालय से हटाया जाए। पिछले महीने ही एंटनी ने छह हथियार कम्पनियों को बैन किया था। इनमें चार विदेशी कम्पनियां (इजरायली मिलिट्री इंडस्ट्री, सिंगापुर टेक्नोलॉजी कारपोरेशन डिफेंस (रूस) और एक स्विट्जरलैंड की कम्पनी शामिल है।) जनरल वीके सिंह के खिलाफ यह साजिश (अगर साजिश थी) इसलिए रची गई, क्योंकि वह रक्षा सौदे में कमीशनों का धंधा नहीं चलने दे रहे थे। कूच की खबर को लीक करने के पीछे जनरल के खिलाफ राजनीतिक दलों को एकजुट करना था। सेनाध्यक्ष की साख बिगाड़ने तथा सैन्य ट्रेनिंग से जुड़ी गतिविधियां ठप करना भी एक उद्देश्य हो सकता है। भ्रष्टाचार के आरोपों से सैन्य खरीद की रफ्तार कम हुई है।अगर विद्रोह के काल्पनिक डर से सेना की ट्रेनिंग एक्सरसाइज की आजादी छिनी तो फौज की मारक क्षमता प्रभावित होगी।
भारतीय थलसेना की मारक क्षमता का सवाल जनरल वीके सिंह ने प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में उठाया था। अब एक न्यूज चैनल ने अपनी रिपोर्ट में सेना के पास गोला-बारुद की कमी की भयानक तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध होने की स्थिति में सेना के पास सिर्प 10 दिनों तक लड़ने के लिए गोला-बारुद मौजूद है। यह पहली बार नहीं जब इस तरह की खबरें आई हैं। सेना काफी पहले से राजनीतिक नेतृत्व को आगाह करती आ रही है कि उसके पास जंग के लिए गोला-बारुद जैसे जरूरी सामग्री जरूरी स्तर से काफी नीचे पहुंच गया है। किसी खतरे का सामना करने की स्थिति में सेना की तैयारियों को लेकर कैग की रिपोर्ट ने भी सवाल उठाए हैं। खतरे की घंटी ः 125 एमएम टैंक के लिए गोला-बारुद जरूरी स्तर से काफी कम है। 16 हजार राउंड के लिए रूस से गोला-बारुद मिलने का इंतजार। 122 एमएम हाई एनर्जी रिड्यूस चार्ज 1.27 दिन तक चल पाएंगे। ओएफबी द्वारा मुहैया कराए गए गोला-बारुदों में काफी खराबी पाई गई। सरकार का दावा है कि युद्ध होने पर सेना के पास 30 दिनों तक का लड़ने के लिए पर्याप्त मात्रा में गोला-बारुद है। गोला-बारुद की इस कमी की बड़ी वजह घोटालों के चलते कई रक्षा कम्पनियों पर प्रतिबंध लगाना भी है। कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि कई तोपों में दूसरे विश्वयुद्ध के जमाने की तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। यदि कोई 16-17 जनवरी की खबर और उसके बाद प्रकाशित हो रही खबरों को विस्तार से पढ़े तो उसे मानना होगा कि स्थिति बेहद चिन्ताजनक है। यह निष्कर्ष भी निकलता है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में सेना और सरकार के संबंध सबसे निचले स्तर पर हैं।
A K Antony, Anil Narendra, Daily Pratap, General V.k. Singh, Indian Army, Vir Arjun

Monday, 9 April 2012

Dress Rehearsal or Warning or Conspiracy

- Anil Narndra
Had some members of the Indian Army launched a revolt against the Government? Had these Army Units carried forward their campaign to lay seize to Delhi in order to attempt a military coup? These are some of the unanswered burning questions circulating in the Capital since the Wednesday morning. In fact, the sensational expose in the Wednesday edition of the English Daily, the Indian Express created panic. According to a report by Shekhar Gupta, the editor of the newspaper, two big Army Units from Hissar and Agra had moved towards Delhi on the night of 16-17 January. Fully armed with arms and ammunition these Units of the Infantry Brigade had reached close to Delhi. But, the situation was somehow controlled. 33 Armed Division's Unit from Hissar had reached Bahadurgarh and halted there. Another Unit from Agra (12 Division) with arms and ammunition and tanks reached Palam and halted nearby. Was it a coincidence that the Army Chief General VK Singh had approached the Supreme Court on that very day, i.e.  15th January? The Indian Express report created commotion in the political circles of Delhi. 'Furore' should be a better word than the 'commotion' to describe the situation. The politicians were rendered speechless. As is habitual with the Government and as is its helplessness, the Government out rightly rejected the report, but accepted that the Units from Hissar and Agra did arrive at Bahadurgarh and Palam, but this was a routine movement of the Army. The Government has, however, not been able to explain why these Army Units moved towards Delhi without informing the Ministry of Defence? The Prime Minister Manmohan Singh said on Wednesday that this report is capable of creating fear and such reports need not be given much attention. On the question of tension between Army Chief and the Government, the Prime Minister said, 'The post of Army Chief is quite high and we must avoid doing anything that belittle the dignity of the post.' The Defence Minister, AK Antony termed the fear of any military coup by the Army as entirely baseless. He assured people that the Army will not do any thing, which may weaken the democracy. According to Antony, the patriotism of Army should not be put to doubt. The Army Spokesperson said that it is routine in the Army to carry on such exercises. Former Army Chief General Ved Prakash Malik said, 'I can only consider this as a ridiculous and mischievous report and I am of the view that this movement of the Army was part of a routine training, as such it was not necessary to notify it to the Ministry of Defence.' Former Naval Chief Admiral Arun Prakash said, 'It is most irresponsible example of journalism. I am not surprised about the objective of publishing such a report.' Terming this report wrong and ridiculous the former Chief of the Air Staff Air Chief Marshal SP Tyagi said, 'I do not consider it worth discussing.' An expert in defence studies and analysis, C Uday Bhaskar said, 'The report about movement of the Army towards Delhi is disappointing and it has caused worry about the alleged move of the Army in attempting a coup. The Indian Express report is not false, as no body has said that there was no Army Unit movement on that day. All have been terming it as an exercise. This report definitely causes concern. So far we are concerned; the reliability of the Indian Express report can not be questioned. Neither Shekhar Gupta is sensation-monger journalist, nor the Indian Express is such an irresponsible newspaper, then what happened on 15-16 night? There is nothing unusual in an exercise by single Unit, but the movement of two Units from different towns at the same time poses question, which needs an answer. The report is quite investigative.' He concludes that General VK Singh is a loyal and honest officer and this has been proved. Then, was it a dress rehearsal? But in a country like India, it is not easy to topple the political order. Any attempted military coup can not succeed without the knowledge of Delhi Area Commander (DAC). In case the Army is conducting an exercise, then the DAC must have the knowledge about it. The DAC must be asked about it. Whenever there is an exercise, then not only the Ministry of Defence, but the civilian authorities must have the information regarding it, so that suitable arrangements are made to avoid disruption of public life. One more thing has also emerged from the Indian Express report. It points to serious difference of opinions between the Army and the UPA Government. The Army is quite disappointed with this government. The Army is not happy with the Government due to the indifferent attitude of the bureaucracy in Delhi about the supply of military hardware, which is adversely affecting the capability and morale of the Army, whereas this Government is busy in dealing with scams. In other words, the Government is compromising the security of the country. In fact, this issue has two sides to it. This could be a routine military activity, because an Army Division conducts such exercises quarterly and it is not required to intimate the Government about such exercises. But, it was listed in the calendar for military exercises. A number of Divisions had already been deputed in Delhi in view of Republic Day. Moreover, it is impossible to take over Delhi with the help of a small Unit. On the other hand, it is unusual because information about movement of a Division from one area to another area is to be provided. Normally, Delhi is not selected for exercises. In spite of huge concentration of the Army in Delhi due to 26th January celebrations, why this military exercise was planned? Why did the senior officers of the concerned Division fail to realize the sensitivity of the matter? There are number of such questions, which would be answered in days to come. We, however, are of the view that the 15th January movement was not a routine military exercise. This could have been a jolt meant to awake the Government from its slumber or it could have been a dress rehearsal with a larger intent.

Friday, 6 April 2012

ड्रेस रिहर्सल या चेतावनी अथवा साजिश

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 6 April 2012
अनिल नरेन्द्र
इसी साल जनवरी के महीने में क्या भारतीय थलसेना के कुछ लोगों ने सरकार के खिलाफ बगावत की तैयारी कर ली थी? इन सैन्य टुकड़ियों ने सैन्य तख्तापलट की नीयत से क्या बाकायदा दिल्ली को घेरने के लिए मुहिम आगे बढ़ा दी थी? यह हैं कुछ ज्वलंत प्रश्न जो बुधवार सुबह से ही राजधानी में चर्चा का विषय बने रहे। दरअसल अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के बुधवार के अंक मे एक सनसनीखेज रहस्योद्घाटन से हलचल मच गई। सम्पादक शेखर गुप्ता की लिखी इस रिपोर्ट में बताया गया कि किस तरह 16-17 जनवरी की रात हिसार और आगरा से सेना की दो बड़ी टुकड़ियां दिल्ली कूच के लिए बढ़ आई थीं। तमाम गोला-बारुद से लैस इन्फैंट्री ब्रिगेड की टुकड़ियां दिल्ली के एकदम नजदीक पहुंच गई थी। किसी तरह स्थिति पर नियंत्रण पाया गया। सेना की हिसार की 33वीं आर्म्ड डिवीजन की टुकड़ी बहादुरगढ़ आकर रुक गई और यहां से आगे नहीं बढ़ी। दूसरी टुकड़ी आगरा से (12 डिवीजन) गोला-बारुद और टैंकों के साथ पालम के पास रुक गई। क्या यह इत्तेफाक था कि 16 जनवरी को ही थल सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह अपनी उम्र के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गए थे। इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट से दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। हलचल कहना गलत है हड़कम्प बेहतर शब्द है। राजनेताओं के खबर सुनकर तोते उड़ गए। सरकार की जैसे आदत व मजबूरी होती है, ने रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया। रिपोर्ट को खारिज करते हुए सरकार ने यह माना है कि बटालियनें आगरा और हिसार से बहादुरगढ़ और पालम तक तो आई थी, लेकिन यह भी कहा है कि थलसेना की यह गतिविधि सामान्य है। हालांकि सरकार यह नहीं बता पा रही है कि थलसेना ने रक्षा मंत्रालय की जानकारी में लाए बिना दिल्ली के लिए कूच क्यों किया? पीएम मनमोहन सिंह ने बुधवार को कहा कि यह रिपोर्ट डर पैदा करने वाली है। ऐसी रिपोर्ट को ज्यादा तवज्जों नहीं देनी चाहिए। आर्मी चीफ और सरकार के बीच चल रही खींचतान के सवाल पर पीएम ने कहा कि आर्मी चीफ का पद बहुत ऊंचा है। हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम ऐसा कुछ न करें जिससे इसकी गरिमा कम हो। रक्षा मंत्री एके एंटनी ने आर्मी की तरफ से किसी किस्म के तख्तापलट के डर को पूरी तरह से बकवास करार दिया। उन्होंने विश्वास जताया कि सेना ऐसा कुछ नहीं करेगी, जिससे डेमोकेसी कमजोर हो। एंटनी के मुताबिक सेना की देशभक्ति पर सवाल नहीं उठने चाहिए। रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि सेना इस किस्म के अभ्यास करती रहती है। पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वेद प्रकाश मलिक ने कहा कि मैं तो इसे एक हास्यास्पद रिपोर्ट ही कह सकता हूं। यह किसी की शरारत लगती है। मेरा मानना है कि सेना का कूच मात्र दैनिक प्रशिक्षण का हिस्सा भर था और रक्षा मंत्रालय को इसे नोटीफाई करने की जरूरत नहीं थी। पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश की टिप्पणी थी ः पत्रकारिता का यह एक बड़ा ही गैर जिम्मेदाराना उदाहरण है। मुझे आश्चर्य नहीं है कि इस रिपोर्ट को छापने का उद्देश्य क्या था। पूर्व वायु सेनाध्यक्ष एयर चीफ मार्शल एसपी त्यागी ने कहा कि रिपोर्ट पूरी तरह गलत है और इतनी हास्यास्पद है कि मैं इसके बारे में बात भी नहीं करना चाहूंगा। सी. उदय भास्कर जो डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस है का कहना था कि जिस प्रकार सेना ने दिल्ली की ओर बढ़ने की खबर छपी उससे निराशा और चिन्ता हुई है कि जैसे सेना की कोई तख्तापलट की योजना थी। इंडियन एक्सप्रेस द्वारा दी गई यह खबर गलत नहीं है। किसी ने भी यह नहीं कहा कि सैन्य टुकड़ियों की उस दिन मूवमेंट नहीं हुई थी। सभी इसे सामान्य अभ्यास बता रहे हैं। यह रिपोर्ट चिन्ता का विषय जरूर बनता है। हमारे अनुसार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं किया जा सकता। न तो शेखर गुप्ता ऐसे सनसनीखेज फैलाने वाले पत्रकार हैं और न ही अखबार इतना गैर जिम्मेदार है, तो फिर 16-17 जनवरी को क्या हुआ? एक टुकड़ी के अभ्यास की बात समझ आती है पर एक ही दिन दो विभिन्न शहरों से लगभग एक ही समय दो टुकड़ियों की मूवमेंट प्रश्न खड़ा करते हैं। रिपोर्ट में काफी छानबीन की गई है। उनका निष्कर्ष है कि जनरल वीके सिंह एक निष्ठावान, ईमानदार अफसर हैं, यह बात साबित भी हो चुकी है। क्या यह एक ड्रेस रिहर्सल था? वैसे भारत जैसे देश में राजनीतिक सत्ता को पलटना आसान नहीं है। सत्ता पलट की कोई भी कोशिश थलसेना के दिल्ली एरिया कमांडर की जानकारी में लाए बिना सफल नहीं हो सकती। यदि थलसेना कोई अभ्यास भी कर रही है तो यह दिल्ली एरिया कमांडर को पता होना चाहिए, इसलिए दिल्ली के एरिया कमांडर से इस बारे में पूछताछ होनी चाहिए। देश में कहीं भी किसी तरह का अभ्यास किया जाता है तो इसकी पूर्व जानकारी न केवल रक्षा मंत्रालय को होनी चाहिए बल्कि सिविल अधिकारियों को पता होना चाहिए ताकि आम जनजीवन प्रभावित नहीं हों। इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट से एक बात और सामने आई है। वह यह कि सेना और संप्रग सरकार में भारी मतभेद हैं। सेना में इस सरकार को लेकर बेहद ज्यादा मायूसी का माहौल है। सेना इसलिए भी नाराज है कि दिल्ली में बैठे सरकारी बाबू सैन्य सामग्री की आपूर्ति पर लापरवाही बरतते हैं जिसकी वजह से सेना की क्षमता प्रभावित हो रही है और यह सरकार घोटालों से ही निपटने में अपना सारा समय बिता रही है। दूसरे शब्दों में सरकार देश की सुरक्षा से समझौता कर रही है। इस मुद्दे के दोनों पक्ष हैं। सेना की यह गतिविधि सामान्य इसलिए है कि सैन्य डिवीजन का हर 3 माह में अभ्यास होता रहता है और इसकी सरकार को जानकारी देने की जरूरत नहीं है। सैन्य अभ्यास के कैलेंडर में इस बारे में सूचना दर्ज थी। 26 जनवरी की वजह से दिल्ली में कई डिवीजन पहले से ही तैनात थीं। एक छोटी टुकड़ी से तो दिल्ली पर कब्जा नहीं हो सकता। दूसरी ओर यह असामान्य इसलिए है कि सैन्य डिवीजन के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने पर देनी पड़ती है सूचना। सामान्यत अभ्यास के लिए दिल्ली को नहीं चुना जाता। 26 जनवरी की वजह से दिल्ली में सेना के जमावड़े के बावजूद अभ्यास की योजना क्यों बनी? संबंधित डिवीजन के वरिष्ठ अधिकारियों ने इसकी संवेदनशीलता को क्यों नहीं पहचाना? ऐसे ढेर सारे सवाल हैं जिनका उत्तर आने वाले दिनों में पता लगेगा। हमारा तो यह मानना है कि 16 जनवरी की यह मूवमेंट सामान्य अभ्यास नहीं था। हो सकता है कि सोई सरकार को जगाने के लिए यह झटका दिया गया या फिर यह किसी बड़े काम की ड़ेस रिहर्सल थी।

Friday, 2 March 2012

चीन को दिया एंटनी ने करारा जवाब

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2 March 2012
अनिल नरेन्द्र
चीन भारत से पंगा लेने से बाज नहीं आता। कुछ न कुछ शोशा छोड़ता ही रहता है। ताजा किस्सा भारत के रक्षा मंत्री एके एंटनी की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा को लेकर है। अरुणाचल प्रदेश पर दावा जताते हुए चीन ने फिर भारत को आंखें दिखाने का प्रयास किया। इस बार ड्रैगन रक्षा मंत्री एके एंटनी की अरुणाचल प्रदेश यात्रा को लेकर बौखला गया। उसने भारत को खुलेआम चेताया कि भारत को ऐसे किसी भी कदम से बचना चाहिए जिससे सीमा विवाद और जटिल होने की आशंका हो। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हांग ली ने सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए भारत से चीन के साथ मिलकर काम करने को कहा है। चीन की सरकारी एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक उन्होंने कहा कि सीमा विवाद पर चीन अपने रुख पर कायम है और उसका नजरिया बिल्कुल साफ है। दरअसल अरुणाचल के दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा होने का दावा कर रहा चीन किसी भी वरिष्ठ भारतीय सरकारी प्रतिनिधि की राज्य की यात्रा पर अपना एतराज जताता रहा है। वहअरुणाचल के लोगों को वीजा देने से भी इंकार करता रहा है। खास बात यह है कि दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच सीमा विवाद पर 15 दौर की वार्ता हो चुकी है। जनवरी से जून 2010 में सिक्किम से लगते क्षेत्र में चीनी सेना ने 65 बार भारतीय क्षेत्र में आने का प्रयास किया। हालांकि भारत सरकार ने हमेशा विवाद को शांत करने व टालने का प्रयास किया है पर इस बार हमें स्वीकार करना होगा कि रक्षा मंत्री एके एंटनी ने चीन को मुंह तोड़ जवाब दिया है। ऐसी ही भाषा चीन समझता है। एके एंटनी ने चीन को इस मुद्दे को लेकर सोमवार को खरी-खरी सुनाईं। उन्होंने कहा है कि इस तरह की टिप्पणी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और आपत्तिजनक है। चीन के इस रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए एंटनी ने कहा कि कश्मीर की तरह ही अरुणाचल भी भारत का अभिन्न हिस्सा है और बतौर रक्षा मंत्री वहां जाना उनका अधिकार और कर्तव्य है। एक कार्यक्रम से इतर पत्रकारों के सवालों के जवाब में रक्षा मंत्री ने कहा कि वह अरुणाचल प्रदेश की स्थापना की 25वीं वर्षगांठ पर आयोजित समारोह में भाग लेने गए थे और यह उनका हक बनता है। एंटनी ने कहा कि मुझे यह प्रतिक्रिया देखकर काफी हैरानी हुई है। इस तरह की टिप्पणी सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण है और इस पर उन्हें आपत्ति है। रविवार को बेंगलुरु से विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने चीन की प्रतिक्रिया की आलोचना कर कहा था कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अखंड हिस्सा है और इस मामले में उसे दखलअंदाजी नहीं करनी चाहिए। विदेश मंत्रालय के आला सूत्रों ने तो बीजिंग को यह कहकर संदेश दिया कि अरुणाचल में जनता ने भारतीय नेताओं को लोकातंत्रिक तरीके से हुए चुनाव में वोट दिया है। इसमें अपने आप में ही बीजिंग को जवाब देख लेना चाहिए। चीन को खरी-खरी सुनाते हुए रक्षा मंत्री ने परमाणु पनडुब्बी को भारतीय नौसेना में शामिल करने पर एतराज जता रहे पाकिस्तान को भी दो टूक अंदाज में जवाब दिया है। एंटनी ने कहा कि भारत अपनी सुरक्षा के लिए अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहा है न कि उसका इरादा किसी से टकराव का है। उभरते सुरक्षा माहौल के मद्देनजर भारत हर जरूरी सैन्य कदम उठाएगा। हम रक्षा मंत्री एंटनी के चीन और पाक दोनों को दो टूक जवाब देने का स्वागत करते हैं और उम्मीद करते हैं कि भविष्य में भी ऐसा ही होगा ताकि चीन को समझ आ जाए कि वह अब भारत को इतनी आसानी से डरा नहीं सकता।
A K Antony, Aksai Chin, Anil Narendra, China, Daily Pratap, Sikkim Chief Minister, Vir Arjun

Sunday, 23 October 2011

हीरो से विलेन तक का गद्दाफी का लम्बा सफर

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23rd October 2011
अनिल नरेन्द्र
लीबिया में 42 साल तक हुकूमत करने वाला 69 वर्षीय तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी अंतत गुरुवार को मारा गया। उसकी मौत गृह नगर सिरते में सिर और पैर में गोली लगने से हुई। हमले में उसके बेटे मुतस्सिम और सेना प्रमुख अबु बकर यूसुफ जबर समेत कई साथी भी मारे गए। गद्दाफी के गढ़ सिरते पर विद्रोही सैनिकों ने कब्जा कर लिया था और नॉटो हमले भी हो रहे थे। गद्दाफी हवाई हमले में पहले ही बुरी तरह घायल हो चुका था। विद्रोही सैनिकों के मुताबिक वह एक पाइप में छिपकर बैठा था। सैनिकों को बढ़ते देख वह गिड़गिड़ाने लगा कि डोंट शूट-डोंट शूट...। लेकिन सैनिकों ने नहीं सुनी और उसके सिर और दोनों पैरों में गोली मार दी, जिससे उसकी मौत हो गई। विद्रोहियों के अनुसार उसके पास सोने की पिस्टल मिली और वह फौजी वर्दी में था। गद्दाफी हमेशा से एक विवादास्पद व्यक्ति रहे। कुछ लोगों की नजरों में जब 42 वर्ष पूर्व उन्होंने राजा इद्रीस का तख्ता पलट कर सत्ता हासिल की तो शुरू के वर्षों में उन्होंने कई अच्छे काम किए। उन्होंने अपना एक राजनीतिक चिंतन विकसित किया था, जिस पर उन्होंने एक किताब भी लिखी, जो उनकी नजर में इस क्षेत्र में प्लेटो, लॉक और मार्क्स के चिंतन से भी कहीं आगे थी। कई अरब और अंतर्राष्ट्रीय बैठकों में वो न सिर्प अपने अलग किस्म के लिबास की वजह से बल्कि अपने धारदार भाषण और अपरांगत रंग-ढंग से भी औरों से अलग दिखे। वर्ष 1969 में जब उन्होंने सैनिक तख्त पलटकर सत्ता हासिल की थी तो मुअम्मर गद्दाफी एक खूबसूरत और करिश्माई युवा फौजी अधिकारी थे। स्वयं को मिस्र के जमाल अब्दुल नासिर का शिष्य बताने वाले गद्दाफी ने सत्ता हासिल करने के बाद खुद को कर्नल के खिताब से नवाजा और देश के आर्थिक सुधारों की तरफ तवज्जो दी, जो वर्षों की विदेशी अधीनता के चलते जर्जर हालत में थी। अगर नासिर ने स्वेज नहर को मिस्र की बेहतरी का रास्ता बनाया था तो कर्नल गद्दाफी ने तेल के भंडार को इसके लिए चुना। लीबिया में 1950 के दशक में तेल के बड़े भंडार का पता चल गया था लेकिन उसके खनन का काम पूरी तरह से विदेशी कम्पनियों के हाथ में था जो उसकी ऐसी कीमत तय करते थे, जो लीबिया के लिए नहीं बल्कि खरीदारों को फायदा पहुंचाती थी। गद्दाफी ने तेल कम्पनियों से कहा कि वो पुराने करार पर पुनर्विचार करें नहीं तो उनके हाथ से खनन का काम वापस ले लिया जाएगा। लीबिया वो पहला विकासशील देश था, जिसने तेल के खनन से मिलने वाली आमदनी में बड़ा हिस्सा हासिल किया। दूसरे अरब देशों ने भी उसका अनुसरण किया और अरब देशों में 1970 के दशक की पेट्रो-बूम यानि तेल की बेहतर कीमतों से शुरू हुआ खुशहाली का दौर। गद्दाफी ने अपने आरम्भिक दौर में लीबियाई नागरिकों के लिए कई ऐसी स्कीमें चालू कीं कि वह हीरो बन गए पर फिर उन्होंने आतंकवादी तत्वों का समर्थन करना आरम्भ कर दिया और धीरे-धीरे एक तानाशाह बन गए जो अपने किसी भी विरोध को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थे। जो भी उनके खिलाफ आवाज उठाता उसे गोली मार दी जाती। बर्लिन के एक नाइट क्लब पर साल 1986 में हुआ हमला गद्दाफी की मदद से चरमपंथियों ने किया। इस क्लब में अकसर अमेरिकी फौजी आया करते थे। घटना से नाराज अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने त्रिपोली और बेन गाजी पर हवाई हमले किए। दूसरी घटना जिसने दुनिया को हिला दिया था, वो थी लॉकर बी शहर के पास पैन अमेरिकन एयरलाइंस जहाज में बम विस्फोट, जिसमें 270 लोग मारे गए थे। कर्नल गद्दाफी ने हमले के दो संदिग्धों को स्कॉटलैंड के हवाले करने से मना कर दिया जिसके बाद लीबिया के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र ने आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए जो दोनों लोगों के आत्मसमर्पण के बाद 1999 में हटाया गया। 2010 में ट्यूनीशिया से अरब जगत में बदलाव की क्रांति का प्रारम्भ हुआ तो उस संदर्भ में जिन देशों का नाम लिया गया, उनमें लीबिया को पहली पंक्ति में नहीं रखा गया था। क्योंकि गद्दाफी को पश्चिमी देशों का पिट्ठू नहीं समझा जाता था, जो क्षेत्र में जनता की नाराजगी का सबसे बड़ा कारण समझा जाता था। उन्होंने तेल से मिले धन को भी दिल खोलकर बांटा। यह अलग बात है कि आखिरी कुछ सालों में उसने अपना ध्यान अपने और अपने परिवार को अमीर करने में लगा दिया। एक अनुमान के अनुसार गद्दाफी के पास सात बिलियन डालर (3.50 खरब रुपये) मूल्य का सोना था। कनाडा में 2.4 बिलियन डालर (1.19 खरब रुपये), आस्ट्रिया में 1.7 बिलियन डालर (84 अरब रुपये), ब्रिटेन में एक बिलियन डालर (49 अरब रुपये) तो लीबिया क्रांति के शुरू होने के बाद जब्त किए गए हैं। दुनियाभर के बैंकों में लीबिया की 168 अरब डालर की सम्पत्ति है। छह माह चले विद्रोह में लीबिया को 15 अरब डालर का नुकसान हुआ है।
मुअम्मर गद्दाफी अपनी जीवन शैली एवं जीने के तौर-तरीकों खासतौर पर अमेरिका के साथ संबंधों को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहे। अकसर खबरें आती थीं कि उनकी सुरक्षाकर्मी महिलाएं थीं। एक बार जब वे अमेरिका गए तो किसी भवन में नहीं ठहरकर अपना शिविर लगाकर रहे। वर्ष 1942 में गद्दाफी का जन्म एक खानाबदोश परिवार में हुआ। 1961 में लीबिया की यूनिवर्सिटी में इतिहास का अध्ययन करने गए थे और उसके बाद वह बेनगाजी सैन्य अकादमी में शामिल हो गए। 1965 में ग्रेजुएट होने के बाद गद्दाफी लीबिया सेना में अपनी सेवा देने लगे। उन्हें 1966 में प्रशिक्षण देने के लिए ब्रिटेन की रॉयल सैन्य अकादमी स्टूअर्ट भेजा गया। एक अगस्त 1969 में गद्दाफी के नेतृत्व वाले सैन्य अधिकारियों के एक दल (फ्री ऑफिसर मूवमेंट) ने रक्तहीन क्रांति के जरिये तत्कालीन शासक इद्रीस को मार दिया और लीबिया में अरब गणराज्य की स्थापना की। गद्दाफी कभी भी भारत का दोस्त नहीं रहा। 1971 में युद्ध के बाद वह सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ मातम में शामिल हुआ था। यही नहीं, भुट्टो ने मुस्लिम देशों से इस्लामिक बैंक और इस्लामिक बम बनाने का आह्वान किया था तो तानाशाह गद्दाफी ने भुट्टो को सबसे ज्यादा प्रोत्साहन दिया था। भुट्टो भी गद्दाफी से इतने प्रभावित थे कि उसके नाम पर अपने देश के सबसे अच्छे स्टेडियम में से एक लाहौर स्थित स्टेडियम का नाम गद्दाफी स्टेडियम रखा। गद्दाफी ने एक बार भारत को उस समय भी कूटनीतिक असमंजस में डाल दिया था जब उन्होंने कश्मीर को एक स्वतंत्र देश बनाने का समर्थन किया और कहा कि यह भारत और पाकिस्तान के बीच एक बाथिस्ट देश होना चाहिए। वर्ष 2009 में संयुक्त राष्ट्र में अपने पहले सम्बोधन में कहा था कि भारत उन देशों में शामिल है जो सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए होड़ कर रहा है। कश्मीर स्वतंत्र देश होना चाहिए न भारतीय न पाकिस्तानी। हमें इस संघर्ष को खत्म करना चाहिए। यह पहली बार था जब भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर किसी इस्लामिक नेता ने भारत और पाकिस्तान से कश्मीर की पूर्ण स्वतंत्रता की वकालत की थी।
गद्दाफी ने सद्दाम हुसैन के शिकंजे में फंसने के बाद पश्चिम देशों के सामने हथियार डाले और अमेरिका का दोस्त बन गया। लेकिन जब अरब क्रांति के शुरू होते ही उनके अन्दर का तानाशाह जाग गया। इस दौरान लोकतांत्रिक आंदोलन को दबाने के लिए उन्होंने सामूहिक बलात्कार जैसे अमानुषिक हथियार तक इस्तेमाल करने से परहेज नहीं किया। कर्नल गद्दाफी की यह नियति अलबत्ता कहीं न कहीं पश्चिम की दोहरी नीति का ही एक और उदाहरण है। यूरोप-अमेरिका ने अरब देशों का अधिक से अधिक दोहन भी किया और उन्हें उनके हाल पर छोड़ भी दिया। जाहिर है, पश्चिम के समर्थन के बगैर गद्दाफी चार दशकों तक अपना निरंकुश शासन नहीं चला सकता था और अब उनकी मौत के बाद लीबिया को लोकतंत्र के रास्ते पर ले जाने का रास्ता न तो राष्ट्रीय अंतरिम परिषद के पास है और न ही उनके आका यूरोप-अमेरिका के पास। जब अफगानिस्तान और इराक में ही शांति और स्थिरता का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया है तो लीबिया के जमीनी हालत तो इनसे भी जटिल हैं। अंतिम क्षणों तक गद्दाफी ने हथियार नहीं डाले और विदेशी सेना और नए शासन के लड़ाकों के खिलाफ घंटों मोर्चा सम्भाले रखा। सैनिकों ने बर्बरता से लात-घूंसों से पिटाई की और पैर-पीठ में गोली मार दी।
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Sunday, 12 June 2011

अब नॉन पॉलिटिकल मनमोहन सरकार और कांग्रेस पार्टी आमने-सामने

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 12th June 2011
अनिल नरेन्द्र
मुझे मनमोहन सिंह सरकार पर कभी-कभी दया भी आती है कभी निराशा भी। दया इसलिए आती है कि इस सरकार को जो लोग चला रहे हैं वह सभी नॉन पॉलिटिकल (गैर राजनीतिज्ञ) हैं। सबसे ऊपर सोनिया गांधी हैं जो सुपर प्राइम मिनिस्टर हैं और सरकार का रिमोट कंट्रोल हैं। वह नॉन पॉलिटिकल हैं। उनके नीचे हैं प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह जिन्होंने अपनी जिन्दगी में एक भी चुनाव नहीं लड़ा। सोनिया गांधी के मुख्य एडवाइजर अहमद पटेल सरीखे के लोग हैं जो पर्दे के पीछे से फैसले करते हैं, वह भी गैर राजनीतिज्ञ से ही हैं। इसलिए यह सरकार जो भी फैसले करती है उसमें नौकरशाह की बदबू ज्यादा आती है राजनीतिक होने की कम। इसी से निराशा होती है। आप हाल ही में इस सरकार के महत्वपूर्ण फैसले देखिए। चाहे वह अन्ना हजारे का मामला रहा हो, चाहे बाबा रामदेव का। दोनों में भी बड़े बचकाने तरीके से इस मनमोहन सरकार ने मामले को हैंडिल किया। मेरी बात तो छोड़िए अब तो कांग्रेस पार्टी के अन्दर बाबा के प्रकरण को लेकर घमासान छिड़ गया है।
रामलीला मैदान में लगे बाबा रामदेव के योग शिविर को पुलिसिया कार्रवाई के तहत हटाने के बाद कांग्रेस में घमासान छिड़ गया है। इस प्रकरण में अब एक तरीके से कांग्रेस पार्टी और सरकार आमने-सामने आ गए हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और सरकार में मंत्री की कुर्सी सम्भालने वाले कई वरिष्ठ नेता आपस में ही भिड़ गए हैं। सबसे ज्यादा मुखर पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह हैं। दिग्विजय सिंह जितना भला-बुरा बाबा रामदेव को कह रहे हैं, उससे अधिक वे अपनी पार्टी की सरकार के मंत्रियों पर निशाना साध रहे हैं। ताजा आक्रमण उन्होंने वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी पर किया है जबकि सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत को भूलकर पर्यटन मंत्री सुबोध कान्त सहाय ने सरकार पर निक्रियता का ही आरोप मढ़ दिया है। दिग्विजय ने प्रणब मुखर्जी और केंद्र के तीन मंत्रियों को बाबा से बातचीत करने के लिए एयरपोर्ट जाने पर कड़ा एतराज जताया। उन्होंने यहां तक कह दिया कि प्रणब ने तो बाबा को लेकर अपना पूरा भविष्य ही दांव पर लगा दिया। सरकार की आलोचना करते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि केंद्र में प्रणब जब से मंत्री हैं, तब रामदेव पैदा भी नहीं हुए थे। मंत्रियों को एयरपोर्ट पर जाकर बाबा को मनाने के बारे में अपनी नाखुशी जताते हुए उन्होंने कहा कि यदि वे मंत्री होते तो कभी रामदेव को नहीं मनाते। यही नहीं, सरकार में कांग्रेस के दिग्गज मंत्रियों के स्वर भी पार्टी के साथ हो लिए हैं। सुबोध कान्त सहाय ने मुख खोला और कहा कि रामलीला मैदान में बाबा के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई पर स्पष्टीकरण में सरकार की तरफ से शिथिलता बरती गई। हालांकि सहाय उन मंत्रियों में शामिल थे, जो सरकार की तरफ से बाबा के साथ बातचीत कर रहे थे। सहाय ने कहा कि जब पहले से ही सरकार की तरफ से तय हो चुका था कि यदि अनशन से बाबा अपने समर्थकों के साथ नहीं हटे, तो उन पर पुलिसिया कार्रवाई की जाएगी। कार्रवाई होने के बाद गृहमंत्री पी. चिदम्बरम द्वारा चार दिन बाद स्पष्टीकरण दिया गया। इससे जनता में गलत संदेश गया और इससे सरकार और पार्टी, दोनों की छवि खराब हुई।
कांग्रेस के मुख पत्र `कांग्रेस संदेश' तक ने चार मंत्रियों के बाबा को हवाई अड्डे पर रिसीव करने पर कड़ा एतराज जताया है। पार्टी के मुख पत्र होते हुए भी उसने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि क्या चार वरिष्ठ मंत्रियों का हवाई अड्डा जाना जरूरी था? अनिल शास्त्री इस पत्रिका के सम्पादक हैं। सम्पादकीय में कहा गया है कि सरकार का यह कर्तव्य है कि वह नागरिक समाज की मांगों पर अनुकूल रुख अपनाए, लेकिन यह काम इस तरीके से होना चाहिए कि निर्वाचित सरकार की गरिमा एवं उसके न्याय सम्मत अधिकारों का हनन नहीं हो। सम्पादकीय के मुताबिक किसी विशिष्ठ समूह को सड़कों पर संवैधानिक मामलों के बारे में फैसला करने की इजाजत नहीं दी जा सकती और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि कानून निर्माण की कुछ खास प्रक्रिया होती है। `कांग्रेस संदेश' के सम्पादक अनिल शास्त्राr हैं और इसके सम्पादक मंडल में सलमान खुर्शीद और सरबजीत सिंह भी शामिल हैं। दूसरी ओर दिग्विजय के बयान से कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता सहमत नजर नहीं आ रहे हैं। हवाई अड्डे के बारे में मंत्रियों की मजबूरी गिनाते हुए पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि सरकार को रामदेव के दिल्ली आने की सूचना थी और इससे पहले ही उन्हें अनशन नहीं करने के लिए मनाने पर जुटी थी। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल और पर्यटन मंत्री सुबोध कान्त सहाय रामदेव से फोन पर सम्पर्प में थे पर दिल्ली आने से ठीक पहले रामदेव से फोन पर सम्पर्प नहीं हो पा रहा था। जैसे ही सम्पर्प हुआ तब तक रामदेव दिल्ली हवाई अड्डे पहुंच गए और उनसे कई मुद्दों पर बात करने के लिए मंत्रियों ने हवाई अड्डे के वीआईपी लान में बात करना मुनासिब समझा।
कांग्रेस में बढ़ रही खिलाफत का सिलसिला अब प्रदेशों तक पहुंच गया है। प्रादेशिक नेताओं ने भी अब पार्टी रणनीतिकारों को पत्र लिखकर मांग करनी शुरू कर दी है कि पार्टी के जो नेता बाबा रामदेव से जुड़े हैं, उन्हें संगठन व सरकार में महत्व नहीं मिलना चाहिए। उज्जैन से कांग्रेस सांसद प्रेम चन्द गुड्डू ने राज्य प्रभारी व पार्टी महासचिव वीके हरिप्रसाद को पत्र लिखकर यह मांग की है। केंद्रीय मंत्री कमलनाथ का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि जो लोग बाबा रामदेव के चरण धोते हैं, वे सरकार में क्यों बैठे हैं? पार्टी को इस पर गम्भीरता से सोचा चाहिए। वहीं कांग्रेस पार्टी के मुख पत्र `कांग्रेस संदेश' में छपे सम्पादकीय पर भी पार्टी ने अपनी नाराजगी व्यक्त की है। कांग्रेस महासचिव और मीडिया विभाग के अध्यक्ष जनार्दन द्विवेदी ने सम्पादक को चेतावनी दी है कि यह पत्रिका कांग्रेस का मुख पत्र है, यह बात उन्हें याद रखनी चाहिए और इसमें अपने विचार सम्पादक को थोपने का अधिकार नहीं है।
केंद्र सरकार के मिस्टर क्लीन-चेहरे एके एंटनी का पारदर्शिता पर गूढ़ बयान, प्रणब दा की आर्थिक मोर्चे पर घेराबंदी, चिदम्बरम की अचानक रामदेव के बहाने अपनी दृढ़ छवि पेश करने की कोशिशöये चन्द उदाहरण हैं जिनसे कांग्रेस पार्टी में भारी असंतोष का अहसास होता है। दरअसल पार्टी और सरकार, दोनों बाबा रामदेव प्रकरण को लेकर असहज स्थिति में पहुंच चुकी हैं। बाबा रामदेव पर अगली कार्रवाई भी इसी उधेड़बुन के बीच फंसी हुई है। प्रणब पर गुरुवार को एक अखबार में छपी खबर को लेकर भी पार्टी और सरकार में अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं। सरकार के अन्दर विरोधाभास सामने आ गया है। बाबा की हालत चिन्ताजनक स्थिति में पहुंच गई है। उन्हें जबरन आईसीयू में भर्ती कराया गया है। रामलीला मैदान में पुलिस लाठीचार्ज से प्रभावित राजबाला की हालत अत्यंत गम्भीर हो गई है। सरकार को समझ नहीं आ रहा कि वह अगला कदम उठाए तो क्या उठाए? बाबा को अगर कुछ हो गया तो क्या होगा? अन्त में मुंबई में शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे ने प्रश्न किया है कि चार जून को पुलिस रामलीला मैदान पर लाठीचार्ज के खिलाफ प्रिन्स राहुल गांधी धरने पर क्यों नहीं बैठे? जब वह भट्टा-पारसौल में पुलिस अत्याचार के खिलाफ धरना दे सकते हैं तो रामलीला मैदान कांड पर क्यों नहीं?
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Friday, 10 June 2011

अन्ना की हुंकार, एंटनी की चेतावनी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10th June 2011
अनिल नरेन्द्र
बुधवार का दिन सियासत से भरा हुआ दिन रहा। इधर तो राजघाट में अन्ना हजारे हुंकार भर रहे थे तो उधर नई दिल्ली के प्रेस क्लब में रक्षा मंत्री एके एंटनी ने यह कहकर कि ये पारदर्शिता की क्रांति है जो अब रुक नहीं पाएगी, सबको चौंका दिया। यह बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलनों का ही असर है कि मनमोहन सरकार के इतने वरिष्ठ मंत्री, 10 जनपथ के करीबी एंटनी यह कह रहे हैं। एंटनी ने जो कहा, निश्चित रूप से वह बिना ऊपर सलाह किए नही कहा होगा। फिर सरकार का एक मंत्री ऐसी चेतावनी किसको दे रहा है? क्या यह अपनी ही सरकार को तो नहीं चेता रहा? या फिर अन्ना के आंदोलन और मांगों की हवा निकालने के लिए यह सब हो रहा है? अन्ना डर गए हैं। अन्ना का अनशन हर लिहाज से हिट रहा। गांधीवादी अन्ना हजारे ने रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के समर्थकों पर हुई लाठीचार्ज के विरोध में बुधवार को राजघाट पर अपने एकदिवसीय अनशन के समापन पर जनता का आह्वान किया कि वे आगे की लड़ाई के लिए अपने को मजबूत करें। उन्होंने कहा कि संसद के मानसून सत्र में लोकपाल विधेयक पारित नहीं होने की स्थिति में 16 अगस्त से जन्तर-मन्तर पर पहले से भी बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा। अनशन के समापन पर अन्ना ने विशेष रूप से गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के उस बयान की कड़ी आलोचना की जिसमें कहा गया है कि मीडिया का एक वर्ग भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन की प्रतिस्पर्धा लोकलुभावन कवरेज कर रहा है जिससे संसदीय लोकतंत्र का अवमूल्यन हो रहा है। हम चिदम्बरम साहब को यह बताना चाहते हैं कि मीडिया अपनी भूमिका निभा रहा है। मीडिया जनता की आवाज और नब्ज है। आज भारत की जनता भ्रष्टाचार और महंगाई से परेशान, हैरान है। उसे समझ नहीं आ रहा कि वह अपना रोष प्रकट कैसे करे? चुनाव दूर हैं और सत्तारूढ़ पार्टी संसद के अन्दर आंकड़ों के जोड़तोड़ कर सभी मुद्दों पर पानी फेर रही है। जब जनता की पुकार सांसद नहीं सुनेंगे तो जनता सड़कों पर उतरेगी और इसीलिए चाहे बाबा रामदेव का अनशन हो या फिर अन्ना हजारे का, उन्हें जबरदस्त जनसमर्थन मिल रहा है और चिदम्बरम साहब आपके तो वरिष्ठ मंत्री एंटनी खुद यह कह रहे हैं कि अब यह क्रांति नहीं रुकेगी? मीडिया को दोष देना छोड़िए, अपने अन्दर झांकिए और देखिए कि जनता में मची त्राहि को कम कैसे किया जाए।
अन्ना हजारे एक जिम्मेदार गांधीवादी हैं और उनकी बातों को गम्भीरता से लिया जाता है। अन्ना ने एक सनसनीखेज रहस्योद्घाटन किया कि एक मंत्री ने उन्हें मारने के लिए 30 लाख रुपये की सुपारी भी दी, लेकिन वह इससे विचलित होने वाले नहीं। अन्ना के इस आरोप की जांच होनी चाहिए। कौन था वह मंत्री जिसने यह सुपारी दी? अन्ना ने यह भी कहा कि सरकार जनसेवक होती है जो जनता के सोने के कारण से मालिक बन बैठी है, अब उसे बताने का समय आ गया है कि असल मालिक कौन है, कौन सेवक है। यूपीए सरकार पर चौतरफा दबाव बढ़ता जा रहा है और जैसे एंटनी ने कहा कि अब यह क्रांति रुकने वाली नहीं है।