संपग सरकार की समस्याएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। एक तरफ तो सरकार के गठबंधन साथियों ने सरकार और कांग्रेस पार्टी की नाक में दम कर रखा है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के भीतर भी अब घमासान मच गया है। राकांपा पहले से ही नाराज चल रही है और अब तो उसके नेताओं ने कांग्रेस नेतृत्व को चेतावनी देनी आरंभ कर दी है। राकांपा ने कांग्रेस को चेतावनी दी है कि यदि संपग गठबंधन के लिए समन्वय समिति और सहयोगियों के साथ उचित व्यवहार जैसी उसकी मांगों का बुधवार तक समाधान नहीं निकलता है तो वह सरकार से अलग हो सकती है। शरद पवार के नेतृत्व वाली पार्टी ने यह भी संकेत दिया है कि अगर वह केन्द्र सरकार से अलग होती है तो इसका असर महाराष्ट्र में गठबंधन पर भी पड़ेगा क्योंकि राज्य के नेता कांग्रेसनीत मंत्रिमंडल से अलग होने के पक्ष में है। राकांपा महाराष्ट्र में कांग्रेस सरकार के साथ पिछले 13 साल से गठबंधन में है। अभी सहयोगी राकांपा के साथ कांग्रेस की तकरार थमी भी नहीं थी कि पार्टी के भीतर भी बगावत शुरू हो गई है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के खिलाफ उन्हीं के कांग्रेस विधायकों ने उनकी शिकायत पार्टी हाईकमान से की है। इनका कहना है कि चव्हाण अपनी मनमानी कर रहे हैं और वह किसी की नहीं सुन रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और विलासराव देशमुख समर्थक 42 विधायकों ने एक शिकायत पत्र हाईकमान को लिखा है। पत्र में पार्टी हाईकमान से मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को तत्काल पद से हटाने की मांग की गई है। क्या यह महज इत्तिफाक है कि इधर शरद पवार एंड कंपनी बगावती तेवर दिखा रही है। उधर पवार दबाव बनाने में माहिर हैं और कांग्रेस नेतृत्व में वह यही काम आजकल कर रहे हैं। कांग्रेस की मुश्किल यह होती जा रही है कि पार्टी को केन्द्राrय और पादेशिक स्तर पर परस्पर विरोधाभाषी राजनीति से जूझना पड़ रहा है। केन्द्र की सियासत कहती है कि उसे सहयोगी और समर्थक दलों से अपने रिश्ते रखने चाहिए ताकि मनमोहन सिंह सरकार की स्थिरता बनी रहे जबकि उसकी पादेशिक इकाई इसके एकदम खिलाफ है क्योंकि उन्हें वहां उन्हीं राजनीतिक दलों से दो-दो हाथ करने पड़ रहे हैं जिनको केन्द्र से आजकल बेहद दुलार मिल रहा है। इसमें पहला नंबर तृणमूल कांग्रेस के साथ का है। दिल्ली में कांग्रेस को जितनी ज्यादा तृणमूल की जरूरत है पश्चिम बंगाल की कांग्रेस इकाई को उतनी ही नफरत तृणमूल से है। उसे रात-दिन तृणमूल से अपमानित होना पड़ रहा है। पदेश कांग्रेस अध्यक्ष पदीप भट्टाचार्य तो कई बार सरेआम कह चुके हैं कि आखिर केन्द्र में सत्ता की खातिर हम कब तक तृणमूल कार्यकर्ताओं से पिटते रहेंगे? ऊपर से ममता आए दिन यह कहते नहीं थकतीं कि कांग्रेस उसका साथ कल छोड़ती हों तो आज ही छोड़ दे। अब तो ममता ने खुलेआम यह घोषणा कर दी है कि पश्चिम बंगाल का आगामी विधानसभा चुनाव वह बिना कांग्रेस के ही लड़ेंगी। पिछली बार भी टिकट बंटवारे में कांग्रेस को तृणमूल से बेहद अपमानित समझौता करना पड़ा था। महाराष्ट्र में भी कांग्रेस राकांपा को लेकर यही दुखड़ा रो रही है। वहां तो वह सत्ता में बराबर की भागीदार हैं और मलाई वाले दमदार मंत्रालय राकांपा ने अपने हाथों में रखे हैं। महाराष्ट्र की कांग्रेस इकाई को यह लग रहा है कि घोटाले पर घोटाले तो राकांपा कर रही है और खामियाजा उसे न भुगतना पड़ जाए। यही वजह है कि इकाई एक श्वेत पत्र लाने की मांग कर रही है। शरद पवार एंड कंपनी को यह डर सता रहा है कि अगर किसी किस्म का श्वेत पत्र महाराष्ट्र सरकार लाती है तो उनके घोटालों का पर्दाफाश हो जाएगा जिसका खामियाजा उसे आगामी विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ेगा। पृथ्वीराज चव्हाण एक ईमानदार नेता की छवि रखते हैं और वह पवार एंड कंपनी के दबाव, ब्लैकमेलिंग में नहीं आ रहे। इसलिए अब पवार का पयास है कि चव्हाण को हटवा दिया जाए। इसी तरह उत्तर पदेश कांग्रेस इकाई भी दुखी है। पदेश के सांसद कह रहे हैं कि केन्द्र सरकार दोनों हाथों से सपा को पैसा लुटा रही है। जिसका इस्तेमाल उसके ही खिलाफ होना है। यदि सपा से इसी तरह रिश्ते कांग्रेस निभाती रही तो अगले चुनाव में कांग्रेस को कोई पूछने वाला नहीं होगा। 22 की जगह वह दो सीटों तक ही सीमित हो जाएगी। कुल मिलाकर कांग्रेस हाईकमान को यह फैसला करना होगा कि केन्द्र में सत्ता की खातिर वह राज्यों में अपनी इकाइयों को कितना नुकसान पहुंचाने को तैयार है। वैसे अभी तक तो कांग्रेस हाईकमान की यही नीति रही है कि राज्य जाएं भाड़ में केन्द्र में सत्ता बरकरार रहनी चाहिए।
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Thursday, 26 July 2012
Tuesday, 24 July 2012
शरद पवार की लड़ाई नम्बर दो की हैसियत की नहीं है
तमाम कोशिशों के बावजूद एनसीपी और कांग्रेस नेतृत्व के बीच आई राजनीतिक दरार कम नहीं हो पा रही है। क्योंकि इस बार एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने काफी अड़ियल रुख अपना लिया है। लगता अब यह है कि शरद पवार एण्ड कम्पनी अपनी राह तय कर चुके हैं। एनसीपी के प्रवक्ता डीपी त्रिपाठी के मुताबिक एनसीपी सुप्रीमो ने अभी तक इतना खुलकर सरकार के कामकाज का विरोध नहीं जताया था। इसलिए महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक तालमेल के स्तर पर सब कुछ नहीं सुधरा तो एनसीपी सरकार से किनारा करने का मन बना चुकी है। क्या पवार इसलिए कैबिनेट छोड़ना चाहते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व उन्हें मनमोहन सरकार में नम्बर दो की पोजीशन देने को तैयार नहीं है? सूत्रों का कहना है कि यह तो बहाना है। असल में पवार का ज्यादा झगड़ा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के तौर-तरीकों से है। काफी दिनों से पवार और पृथ्वीराज की तनातनी चल रही है। बताया जाता है कि पवार और उनके दल के नेताओं के हितों के खिलाफ राज्य सरकार ने जो मुहिम छेड़ रखी है उससे एनसीपी खफा है। यही वजह है कि मंत्रिमंडल में वरिष्ठता क्रम में दूसरे नम्बर की आड़ में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने यूपीए सरकार पर भारी-भरकम दबाव बनाकर सरकार से बाहर जाने की बात कह दी है। शरद पवार की असल नाराजगी की वजह महाराष्ट्र से है। महाराष्ट्र पवार का असली गढ़ है। जब से पृथ्वीराज चव्हाण मुख्यमंत्री बने हैं तभी से कांग्रेस और एनसीपी में तनातनी चल रही है। पवार एण्ड कम्पनी का आरोप है कि कांग्रेस ने सोची-समझी रणनीति के तहत मराठवाड़ा में एनसीपी का प्रभाव कम करने के लिए वहां की सारी ग्रामीण परियोजनाओं को दबाकर रखा हुआ है। महाराष्ट्र सरकार स्वयं श्री पवार, उनकी पुत्री सुप्रिया सुले व प्रफुल्ल पटेल के चुनाव क्षेत्रों की विभिन्न परियोजनाओं को लटकाने की रणनीति पर चल रहे हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी की मिलीजुली सरकार है। शरद पवार के भतीजे अजीत पवार वित्त मंत्री होने के बावजूद लाचार समझे जा रहे हैं। पृथ्वीराज चव्हाण सारी फाइलें दबाए बैठे हैं। यह भी पता चला है कि शरद पवार की नाराजगी की एक बड़ी वजह यह भी है कि उनके महाराष्ट्र मुख्यमंत्री के कार्यकाल के दौरान एक सिंचाई परियोजना में आवंटित बजट से 26,000 करोड़ रुपए से अधिक खर्च की भी जांच है। इस परियोजना में पवार के करीबियों को ठेके मिले थे। अब इस परियोजना पर हुए खर्च की जांच रफ्तार को जहां पवार धीमा करना चाहते हैं वहीं एक अन्य मामला महाराष्ट्र सदन घोटाले से जुड़ा है। दिल्ली में बने दूसरे महाराष्ट्र सदन के निर्माण के समय इसकी योजना राशि 52 करोड़ रुपए थी। अन्त में यह सदन भवन तैयार होते-होते इसकी राशि 152 करोड़ रुपए पहुंच गई। महाराष्ट्र सदन घोटाले की जांच की मांग को लेकर भाजपा नेता किरीट सोमैया ने हाल ही में राष्ट्रपति को भी शिकायत की थी कि इस मामले में भी महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल के करीबी रिश्तेदार को ठेका दिया गया था। महाराष्ट्र सदन में घोटाले की बात सामने आने पर खुद राष्ट्रपति ने अपने को इसके उद्घाटन कार्यक्रम से अलग कर लिया था। शरद पवार को शंका है कि जिस तरह भाजपा इस मुद्दे को उठा रही है उससे यदि मामले की जांच हुई तो उनकी पार्टी के लिए समस्या खड़ी हो सकती है। प्रफुल्ल पटेल पर भी तरह-तरह के आरोप हैं। खुद शरद पवार के कृषि मंत्री की हैसियत से खाद्यान्न आयात-निर्यात के मामले भी विवादों में हैं। इसलिए लड़ाई की जड़ नम्बर दो की हैसियत की नहीं, यह मामला ज्यादा गम्भीर है जो इतनी आसानी से शायद ही सुलझे। दरअसल शरद पवार को इस बात की भी चिन्ता है कि कहीं कांग्रेस नेतृत्व इस साल के अन्त तक लोकसभा के मध्यावधि चुनाव न करवा ले। फिर महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव भी 2014 में होने हैं। वैसे लोकसभा चुनाव अगर अपने निश्चित समय अप्रैल 2014 में होते हैं तो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव अक्तूबर 2014 में होंगे। अगर लोकसभा चुनाव में एनसीपी की स्थिति कमजोर होती है तो इसका प्रभाव महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव पर सीधा पड़ सकता है। सवाल तो अब महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार के भविष्य को लेकर भी खड़ा हो रहा है। दूसरी ओर शिवसेना में आई दरार समाप्त हो रही है। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के फासले कम हो रहे हैं। अगर शिवसेना एक हो जाती है तो शिवसेना, मनसे और भाजपा महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की छुट्टी करा सकती है। इसलिए मामला ज्यादा गम्भीर है। यह लड़ाई सिर्प नम्बर दो की हैसियत की नहीं उससे ज्यादा पेचीदा है।
Wednesday, 18 July 2012
सरकार में नम्बर दो की लड़ाई खुलकर सामने आई
मैंने इसी कॉलम में लिखा था कि श्री प्रणब मुखर्जी के संप्रग सरकार से हटने से इस मनमोहन सरकार को चलाना अत्यंत कठिन हो जाएगा। प्रणब दा इस सरकार के संकट मोचक थे, वह हर राजनीतिक समस्या का हल निकाल देते थे। अब मनमोहन सरकार को प्रणब की कमी खलेगी। यह सिलसिला शुरू भी हो गया है। संप्रग सरकार में नम्बर दो का मामला उलझ गया है। यूपीए सरकार में नम्बर दो की हैसियत रखने वाले प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने के बाद उनकी `कुर्सी' के लिए जंग छिड़ गई है। प्रणब के सरकार से बाहर जाने के बाद राकांपा प्रमुख शरद पवार की जगह रक्षा मंत्री एके एंटनी को प्रधानमंत्री के बाद नम्बर दो की जगह देने का मुद्दा संप्रग गठबंधन में कलह का सबब बन गया है। बहुत सोच-समझ कर मुंह खोलने वाले मराठा सरदार पवार ने उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए बुलाई गई बैठक से दूर रहकर विपक्ष को संप्रग की एकता पर सवाल उठाने का एक और मौका दे दिया है। एनसीपी का कहना है कि कृषि मंत्री शरद पवार यूपीए-एक और दो में कैबिनेट के वरिष्ठता क्रम में प्रणब मुखर्जी के बाद आते थे। मुखर्जी के सरकार से इस्तीफे के बाद नम्बर दो की हैसियत उन्हें ही मिलनी चाहिए। मुखर्जी के इस्तीफे के बाद हुई कैबिनेट बैठक (पहली) में पवार को प्रधानमंत्री के बगल में बिठाया गया था। प्रधानमंत्री कार्यालय की मंत्रियों के क्रम वाली वेबसाइट से भी उनका नाम दूसरे नम्बर पर था। मगर बाद में वेबसाइट ने सूची ही हटा दी गई। उधर बैठक के दो दिन बाद कैबिनेट में मंत्रियों के वरिष्ठता क्रम में बदलाव करते हुए रक्षा मंत्री एके एंटनी को सरकार में नम्बर दो बना दिया गया। इसके विरोध में एनसीपी ने शनिवार को उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार तय करने के लिए बुलाई गई यूपीए की बैठक में हिस्सा लेने से इंकार कर दिया। एनसीपी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक आजादी के बाद यह पहला मौका है जब कैबिनेट के वरिष्ठताक्रम में बदलाव किया गया है। इस नेता ने कहा कि एनसीपी ऐसी पार्टी नहीं है जो छोटे-छोटे मुद्दों पर हंगामा करती रहती है पर ऐसा रवैया हमारा अपमान है और हम यह अपमान बर्दाश्त करने को कतई तैयार नहीं हैं। एनसीपी ने कभी भी इससे पहले कैबिनेट मीटिंग का बहिष्कार या बायकाट नहीं किया, यह पहला मौका है और वजह है शरद पवार का अपमान। विपक्ष ने इसे संप्रग में बिखराव का एक और संकेत करार दिया है। भाजपा महासचिव मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा, `कांग्रेस गठबंधन धर्म का पालन करने में असफल रही है। हमें लगता है कि राष्ट्रपति चुनाव के बाद संप्रग टूट जाएगा और देश को मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़ेगा।' शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा, `शरद पवार का अनुभव और वरिष्ठता प्रणब मुखर्जी के बराबर है।' एनसीपी के एक नेता ने कहा कि इस मुद्दे पर औपचारिक रूप से पार्टी अपनी तरफ से कांग्रेस से कोई बात नहीं करेगी पर जो हुआ वह बेहद आपत्तिजनक है।
Sunday, 27 November 2011
शरद पवार को थप्पड़ आखिर क्यों पड़ा?
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 27th November 2011
अनिल नरेन्द्र
बृहस्पतिवार को नई दिल्ली के एनडीएमसी सेंटर में इफ्को के एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि आए केंद्रीय कृषि मंत्री ने कभी अन्दाजा नहीं लगाया होगा कि उस दिन उनसे क्या घटना घटेगी। कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए पवार जब बाहर की तरफ बढ़े तभी एक सिख युवक ने आगे बढ़कर उनके मुंह पर तमाचा मार दिया। पवार को समझ नहीं आया कि क्या हुआ। वह चुपचाप आगे बढ़ गए। मंत्री के स्टाफ की धक्का-मुक्की से नाराज युवक ने अपनी कृपाण निकाल ली। विरोधस्वरूप अपने हाथ पर वार भी किया। एनडीएमसी के गार्डों ने युवक को बड़ी मुश्किल से काबू कर पुलिस को सौंपा। हमलावर युवक का नाम हरविन्दर सिंह है और वह दिल्ली के विजय विहार में रहता है। वह नारा लगा रहा था, `वह भ्रष्ट हैं।' मैं यहां मंत्री को थप्पड़ मारने ही आया था। वे सभी भ्रष्ट हैं। उसने आगे कहा कि आज गुरु तेग बहादुर की शहादत का दिन है। हालात और भी बुरे हो सकते थे। मैंने ही रोहिणी कोर्ट में सुखराम को भी मारा था। मैं सिख हूं, चप्पल नहीं मारूंगा। सिर्प भाषण देते हो। भगत सिंह को भूल गए जिसने कुर्बानी दी। मारो-मारो मुझे खूब मारो। पागल...हूं मैं। इनके पास घोटालों के अलावा कुछ नहीं है। मैं गलत नहीं हूं।शरद पवार पर तमाचे की गूंज ने दिल्ली की सियासत को हिला दिया है। विपक्ष ने इस घटना की निन्दा तो की है, लेकिन इसे महंगाई से उपजा गुस्सा करार देकर सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। वहीं कांग्रेस ने इस घटना के लिए भाजपा नेता यशवंत सिन्हा के गैर जिम्मेदाराना बयान पर निशाना साधा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पवार से बातचीत कर पूरे घटनाक्रम की निन्दा की। कांग्रेस के संसदीय कार्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि यशवंत सिन्हा के बयान, महंगाई नहीं रुकी तो हिंसा होगी, वापस होना चाहिए। ऐसी धारणा बनाना गलत है। वहीं भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने कहा कि यह शख्स मेरे बयान से पहले ही सुखराम को भी थप्पड़ मार चुका है। ऐसे में इसे मुझसे जोड़ा जाना ठीक नहीं है। भाजपा की ही सुषमा स्वराज की टिप्पणी थी, भाजपा इसकी निन्दा करती है। अहिंसक तरीके से जताया जाना चाहिए अपना मतभेद। पवार उम्र के कारण आदर योग्य हैं। वहीं सबसे दिलचस्प टिप्पणी अन्ना हजारे की थी। अन्ना हजारे ने पवार पर हमले की सूचना मिलने पर पहली प्रतिक्रिया के तौर पर पूछा, `केवल एक थप्पड़?' बाद में उन्होंने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि पवार को थप्पड़ पड़ा लोकतंत्र को तमाचा है। जनता में इस घटना की क्या प्रतिक्रिया हुई, कुछ टिप्पणियां प्रस्तुत हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को पड़ा थप्पड़ किसी नेता या मंत्री पर नहीं बल्कि इनके द्वारा बनाई गई उस व्यवस्था पर है जिससे आम लोगों का पूरा बजट गड़बड़ा गया है। वह आम आदमी क्या करे, जिसकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया हो। दिल्ली वालों ने इसी तरह की प्रतिक्रिया दी। `महंगाई घरों की किचन के साथ लोगों के सपनों पर भी हमला कर रही है। एक इंसान अपने बच्चे को पढ़ाकर कुछ बनाने के सपने देखने से पहले यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि उसके लिए पैसे कैसे बचाए' कोटला की एक महिला की प्रतिक्रिया थी। मयूर विहार की एक कामकाजी महिला ने कहा कि यह थप्पड़ एक आदमी का नहीं, पूरे देश की जनता का है। देश के नेताओं और मंत्रियों को यह समझ जाना चाहिए कि जनता अपने तरीके से जवाब देना सीख रही है। उसे पांच साल तक बहला-फुसलाकर बेवकूफ नहीं बना सकते हैं। कोटला फिरोजशाह की एक महिला का कहना था कि परेशानी है तभी तो लोग ऐसा करने को मजबूर हो रहे हैं। मंत्री दफ्तर में बैठकर जो नीति तैयार करते हैं, वह आम आदमी की कमर तोड़ने वाली होती है। ऐसे में लोग क्या करें? उनके पास कोई विकल्प नहीं है। सेवा नगर में एक सियासी कार्यकर्ता का कहना था कि परेशानी अपनी जगह है, लेकिन हर जगह थप्पड़ मारना ठीक नहीं है। सबक सिखाना है तो चुनाव में सिखाएं। लेकिन लोग भी क्या करें जब उनके प्रतिनिधि उम्मीद पर खरे नहीं उतरते तो वह तनाव में आ जाते हैं और यही तनाव थप्पड़ के रूप में दूर होता है। एक व्यवसायी की टिप्पणी थी, `सरकार जब सो रही हो तो उसे जगाने के लिए इससे बेहतर तरीका और कुछ नहीं हो सकता।' सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता आरके शर्मा का मानना है कि लोगों का गुस्सा जायज है। मंत्री, नेता और उनके रिश्तेदार करोड़ों-अरबों में खेल रहे हैं और आम आदमी भरपेट खाने से पहले भी सोचता है। यह स्थिति खतरनाक है और देश के नीति-निर्धारकों को अब गम्भीरता से जनता के दुःख-दर्द के बारे में सोचना ही होगा। मैक्स अस्पताल के मनोचिकित्सक डाक्टर समीर पारिख का कहना है कि अपने आक्रोश को निकालने का यह तरीका काफी कैट कहा जा सकता है, जब लोग दूसरे की नकल करते हुए किसी पर हमला करते हैं और उसे चोट पहुंचाते हैं तो वह चीप पब्लिसिटी के भूखे होते हैं। हमला करने वाला पहले की घटना से कहीं न कहीं प्रेरित होता है और उसे लगता है कि उसे भी लोगों का आकर्षण मिल सकता है।
शरद पवार पर हुए हमले से सियासी पारा भी तेज होगा। पवार की पार्टी राकांपा अन्दरखाते कांग्रेस से बेहद नाराज है। उसे लग रहा है कि जिस तरह से कांग्रेस ने पवार को महंगाई का प्रतीक बनाया, उसकी वजह से हालात यहां तक पहुंचे। यद्यपि तुरन्त कांग्रेस के नेता पवार के बचाव में जरूर उतरे, लेकिन राकांपा इस घटना से बेहद व्यथित है। भारी उद्योग मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि बड़े नेताओं की सुरक्षा पर संसद में चर्चा होनी चाहिए। पवार पर हमले के बाद महाराष्ट्र में कुछ इलाकों में पार्टी कार्यकर्ताओं के उग्र रवैये पर पटेल ने संयम रखने की अपील की। मामले के पीछे भाजपा का हाथ होने का खुद पवार ने ही काट किया। उन्होंने कहा, मुझे नहीं लगता कि इसमें किसी राजनीतिक दल का हाथ है। इस बारे में पार्टी इसलिए भी नाराज है कि कांग्रेस लगातार महंगाई के मसले पर शरद पवार को ही आगे करती रही है। बेशक भ्रष्टाचार और महंगाई से देश त्रस्त है और भारी गुस्से में है लेकिन इसका समाधान यह नहीं है कि हम चारों तरफ आग लगाना शुरू कर दें और जो सामने आए टूट पड़ें। इससे समाधान तो क्या निकलेगा, हां चारों ओर अराजकता जरूर फैल जाएगी। वहीं राजनीतिज्ञों को भी समझ लेना चाहिए कि पब्लिक का मूड क्या है। हमारे सामने मध्य पूर्व का उदाहरण है जहां एक छोटी-सी चिंगारी ने देश में आग लगा दी थी। सियासतदानों को इस किस्से से डरना चाहिए और सबक लेना चाहिए।
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Saturday, 22 October 2011
न तो मैं महंगाई के लिए जिम्मेदार हूं और न ही इसे कम कर सकता हूं
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 22nd October 2011
अनिल नरेन्द्र
श्री मनमोहन सिंह की यह यूपीए सरकार कमाल की सरकार है। इस सरकार में किसी भी मंत्री के जो विचार हों वह उन्हें कह देता है और इसके लिए वह किसी को भी जवाबदेही नहीं है। प्रधानमंत्री ऐसे बयानों को गठबंधन की मजबूरी कहकर टाल देते हैं पर इनसे पता चलता है कि मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में उनकी कितनी इज्जत है और वह कितने शक्तिशाली हैं। उपचुनावों में मिली करार हार के बाद अब कांग्रेस के सहयोगी दलों ने प्रधानमंत्री और कांग्रेस की नीतियों को हार के लिए जिम्मेदार ठहराना आरम्भ कर दिया है। महाराष्ट्र की खड़कवासला विधानसभा सीट पर मिली हार से बौखला गए केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने सीधा प्रधानमंत्री पर ही हमला बोल दिया। पवार ने एक मराठी दैनिक की ओर से मुंबई में आयोजित एक समारोह में कहा कि पिछले दिनों विभिन्न घोटालों के संदर्भ में सरकार ने मजबूत नेतृत्व का प्रदर्शन नहीं किया। पवार ने कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के संदर्भ में जनता यह सवाल पूछ रही थी कि प्रधानमंत्री पूरे मामले में हस्तक्षेप क्यों नहीं कर रहे हैं? उन्होंने कहा कि ऐसे समय जबकि नेतृत्व क्षमता प्रदर्शित करने का समय था, केंद्र सरकार की ओर से कुछ नहीं किया गया। उन्होंने आगे कहा कि विभिन्न घोटालों के कारण जनमत केंद्र सरकार के खिलाफ गया तथा इससे सरकार की साख को धक्का लगा। सरकार की निक्रियता का परिणाम यह हुआ कि न्यायपालिका ने अति सक्रियता दिखाते हुए विभिन्न कदम उठाए। अन्ना हजारे और योग गुरु बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में निर्वाचित प्रतिनिधियों को सशक्त रूप से अपनी भूमिका निभानी चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करते तो अन्य ताकतों को सामने आने का मौका मिलेगा जो लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए अच्छी बात नहीं है। शरद पवार यहीं नहीं रुके। बुधवार को नई दिल्ली में आर्थिक सम्पादकों के सम्मेलन में बोलते हुए पवार का कहना था कि न तो मैं महंगाई के लिए जिम्मेदार हूं और न ही इसे कम करना मेरा काम है। मैं कृषि मंत्री यानि एक किसान हूं और मेरा काम अनाज पैदा करना है। मेरे मंत्रालय की यह भी कोशिश रहती है कि किसान को उसकी मेहनत का पूरा मूल्य मिले।हमें शरद पवार की बातें सुनकर ज्यादा हैरानी नहीं हुई। यह पहले भी कांग्रेस नेतृत्व पर सीधे हमले कर चुके हैं। अगर ऐसे बयानों का विपक्षी दल फायदा उठाएं तो हैरत नहीं होनी चाहिए। भाजपा पवार के बयान से खुश है। पार्टी का कहना है कि यूपीए डूबता जहाज है और अब इससे भागने की सभी घटक दल कोशिश में जुट गए हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रधानमंत्री के साथ बंगलादेश जाने से इंकार के बाद अब ऐसा लगता है कि प्रमुख गठबंधन सहयोगी एवं कृषि मंत्री शरद पवार संप्रग छोड़ने की तैयारी में हैं। सवाल यह है कि जब एक वरिष्ठ मंत्री अपने ही प्रधानमंत्री और सरकार की नीतियों पर इस तरह के सवाल उठाता है तो सामूहिक जिम्मेदारी कहां गई? जिम्मेदारी की बात करें तो श्री पवार तो साफ कहते हैं कि महंगाई कम करना मेरा काम नहीं। अगर यह काम शरद पवार का नहीं तो किसका है और अगर वह अपनी सरकार की नीतियों से इतने ही नाखुश हैं और असहमत हैं तो उन्हें इस सरकार में रहने का कोई औचित्य समझ नहीं आता। क्यों नहीं शरद पवार मनमोहन सिंह सरकार से त्यागपत्र दे देते। हमें प्रधानमंत्री पर भी दया आती है। जो पीएम अपने वरिष्ठ मंत्रियों पर लगाम नहीं लगा सकता वह पूरे देश को कैसे चला सकता है? जैसे देश चल रहा है वह सबके सामने ही है।
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Thursday, 1 September 2011
खेल संगठनों पर लगाम वाले
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 2nd September 2011
अनिल नरेन्द्र
जब बात सियासतदानों पर लगाम कसने की हो तो भला बात कैसे बन सकती है? जी हां, मंगलवार को प्रधानमंत्री की मौजूदगी में हुई कैबिनेट बैठक में राष्ट्रीय खेल विकास बिल का जो हाल हुआ, उससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि अपनी गतिविधियों पर यह खेल मठाधीश किसी भी प्रकार का अंकुश लगाने का विरोध जमकर करते हैं। इन्हें इस बात की भी परवाह नहीं कि कैबिनेट मीटिंग का अध्यक्ष कौन है। गालिबन यह पहली बार हुआ होगा जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी ही कैबिनेट में एक राजनीतिक चुनौती मिली हो। खेल मंत्री अजय माकन ने फरवरी के महीने में ही घोषित कर दिया था कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) सहित सभी खेल संघों को एक नई नियमांवली के तहत लाने के लिए मंत्रालय एक विधेयक लाएगा। मंगलवार को कैबिनेट में अजय माकन ने यह विधेयक रखा था। इसमें यह प्रस्ताव भी था कि बीसीसीआई भी आरटीआई कानून के दायरे में आए ताकि इसमें ज्यादा पारदर्शिता दिखाई पड़े। मंत्रालय ने खेल संघों से जुड़े पदाधिकारियों के लिए अधिकतम आयु और कार्यकाल के नियंत्रण के भी नियम प्रस्ताव रखे। देश के खेलों की दिशा-दशा तय करने वाले संगठनों की लगाम कसने के मकसद से लाए गए इस बिल की यह दुर्गति तय ही थी, क्योंकि खेल संगठनों को बेलगाम दौड़ा रहे कई सियासी धुरंधरों को यह अपना खेल बिगाड़ने का अस्त्र नजर आ रहा था। जाहिर है, ऐसे में कैबिनेट की बैठक में इस बिल का भविष्य तय कर रहे सियासी खिलाड़ियों के हाथ से यह हरी झंडी पा कैसे जाता। बिल को लेकर सबसे ज्यादा उत्तेजित कृषि मंत्री शरद पवार थे। वे इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) के अध्यक्ष हैं। वे इस प्रस्ताव से खासे खफा थे कि खेल संघों के पदाधिकारियों के लिए 70 साल की अधिकतम आयु तय कर दी गई है। बुजुर्ग हो गए पवार ने आयु सीमा के इस प्रस्ताव पर खेल मंत्री से तीखे सवाल किए। सूत्रों के अनुसार इस मामले में उन्होंने यहां तक कह डाला कि यदि 70 साल की उम्र के बाद माना जाता है कि कोई काम ठीक से नहीं हो सकता, तो मैं समझता हूं कि इस कमरे में 70 साल की उम्र पार कर गए किसी व्यक्ति को नहीं होना चाहिए। यह कटाक्ष उन्होंने 70 पार कर गए वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री की ओर देखते हुए किया था। फारुख अब्दुल्ला भी इसी श्रेणी में आते हैं। कैबिनेट में इस बिल को लेकर शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल, कमलनाथ, फारुख अब्दुल्ला और विलास राव देशमुख ने अपना विरोध जताया। इसलिए प्रधानमंत्री को खेल मंत्री से यह कहना पड़ा कि इस बिल का ड्राफ्ट दोबारा लाएं और इसमें से वे प्रस्ताव हटा दें, जिनको लेकर साथी मंत्री नाराज हैं। खेल मंत्री अजय माकन ने पारदर्शिता का हवाला देते हुए उन्हें समझाने की कोशिश की। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने विधेयक का समर्थन किया पर पवार, कमलनाथ, सीपी जोशी, विलास राव देशमुख, प्रफुल्ल पटेल जैसे कई नेताओं के विरोध ने रास्ता रोक दिया। ध्यान रहे कि सीपी जोशी राजस्थान क्रिकेट बोर्ड तो विलास राव मुंबई क्रिकेट बोर्ड के, जबकि पटेल भारतीय फुटबाल संघ में बतौर अध्यक्ष काबिज हैं। इससे पहले केंद्रीय संसदीय कार्य राज्यमंत्री एवं बीसीसीआई उपाध्यक्ष राजीव शुक्ला ने भी इस पर आपत्ति जताई। विपक्ष के अनुराग ठाकुर व विजय कुमार मल्होत्रा भी विरोध में शामिल थे।इस घटनाक्रम से कई सवाल खड़े हो गए हैं। जो विधेयक प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और गृहमंत्री की खास पहल पर लाया गया हो उस पर कैबिनेट के पांच मंत्रियों ने बुलडोजर चला दिया हो साधारण स्थिति नहीं मानी जा सकती। इससे प्रधानमंत्री की अपनी कैबिनेट पर पकड़ के सवाल भी खड़े होते हैं। क्योंकि कैबिनेट बैठक में शरद पवार का यह कहना कि इस कमरे में भी तो 70 साल के बुजुर्ग बैठे हैं, सीधी पीएम को चुनौती थी। पवार यहीं तक नहीं रुके। उन्होंने यहां तक धमकी दे दी कि यदि कैबिनेट में यह प्रस्ताव मंजूर हो गया तो वे इस मामले की शिकायत यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी के पास ले जाएंगे। पवार के तेवर देखकर प्रणब दा भी सन्न रह गए। मजेदार बात यह है कि इस प्रस्तावित विधेयक के खिलाफ भाजपा के अरुण जेटली, विजय कुमार मल्होत्रा, यशवंत सिन्हा व अनुराग ठाकुर जैसे दिग्गज भी हैं। क्योंकि यह लोग भी कई खेल संघों से दशकों से अड्डा जमाकर बैठे हैं। प्रधानमंत्री के लिए इतनी ही गनीमत है कि विपक्ष इस मामले में सरकार को घेरने की स्थिति में नहीं है। जो गिने-चुने नेता इसकी हिमायत कर रहे थे उनमें प्रमुख थे लालू प्रसाद यादव और कीर्ति आजाद। खेल विकास बिल के कई प्रावधान ऐसे हैं जो सालों से खेल संगठन की कुर्सी सम्भाल `मलाई' खा रहे राजनीतिक धुरंधरों का सूपड़ा साफ कर सकते हैं।
प्रस्तावित विधेयक ने खेल की दुनिया में हलचल मचा दी है। खासकर क्रिकेट की दुनिया में। सुनील गावस्कर जैसे दिग्गज क्रिकेटर ने कहा कि यदि बीसीसीआई को कुछ छिपाना नहीं है तो वह आरटीआई के दायरे में आने से इतना क्यों घबराती है। कपिल देव का कहना है कि जब बीसीसीआई सरकार से कोई अनुदान नहीं लेती तो उसे आरटीआई में कैसे कवर किया जा सकता है? दरअसल प्रस्तावित विधेयक में बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में लाने की बात कही गई है। इसके अलावा इसमें क्रिकेटर्स को एंटी डोपिंग एजेंसी के तहत लाने का भी प्रावधान है। बीसीसीआई का कहना है कि इस बिल के जरिये सरकार उसे अपने नियंत्रण में लाने की कोशिश कर रही है जबकि सरकार का तर्प है कि वह उसे जवाबदेही और पारदर्शी बनाना चाहती है। गौरतलब है कि बीसीसीआई अपने आप में एक स्वायत्त संस्था है जो अपना फंड खुद ही मैनेज करती है। यह अलग बात है कि सरकार से वह टैक्स में छूट या अन्य तरह की दूसरी सहूलियतें लेती रहती है। पिछले कुछ समय से इस संगठन पर कई तरह के आरोप लग रहे हैं। खासतौर पर आईपीएल के आयोजन में वह सवालों के घेरे में रही है। इसलिए कई लोग मांग करने लगे हैं कि क्रिकेट जैसे सर्वाधिक लोकप्रिय खेल का संचालन करने वाली इस संस्था के कामकाज में पारदर्शिता लाई जाए ताकि पूरा देश इस पर नजर रख सके। भारत में क्रिकेट महज एक खेल नहीं है, यह देश की सोशल लाइफ के साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करता है। इसलिए इस क्षेत्र को बिना किसी रेगुलेशन के छोड़ना ठीक नहीं है। अगर नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट बिल पास हुआ तो बीसीसीआई का दर्जा भी देश के अन्य खेल फैडरेशनों के बराबर हो जाएगा और इसका संचालन भी उन्हीं की तरह होगा। लेकिन क्रिकेटरों के एक वर्ग की दलील है कि बीसीसीआई को और फैडरेशनों की तरह बनाना समझदारी-भरा कदम नहीं होगा। फैडरेशनों में बेशक कुछ कमियां हैं पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन्होंने खेलों को कहां तक पहुंचाया है। आज खेल की दुनिया में भारत का नाम है। यह कुछ हद तक इसलिए सम्भव हुआ क्योंकि बीसीसीआई ने बिना किसी दखल के अपने तरीके से काम कर, धनराशि का पुरस्कार इत्यादि देकर भारतीय क्रिकेट को अव्वल टीमों में से एक बनाया है। इसी तरह और भी खेल हैं जिनका प्रदर्शन पिछले एशिया गेम्स में देखने को मिला। अगर इस पर नियंत्रण लगाने की कोशिश की तो हो सकता है कि इसका प्रतिकूल असर खेलों पर पड़े। दरअसल दोनों पक्ष अपने-अपने दमदार तर्कों के साथ खड़े हैं, इसलिए हड़बड़ी में कुछ करना घातक हो सकता है। अगर बीसीसीआई जैसी संस्था को आरटीआई के दायरे में लाना है तो पहले इस कानून में संशोधन की जरूरत पड़ेगी। इस मसले पर और बहस की दरकार है, सभी पक्षों की राय जानकर ही कोई फैसला लेना बेहतर होगा।
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Friday, 10 June 2011
प्रधानमंत्री का मंत्रियों पर नकेल कसने की कसरत का स्वागत है
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 10th June 2011
अनिल नरेन्द्र
काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ बढ़ते चौतरफा दबावों से घिरी मनमोहन सिंह सरकार चिंतित लग रही है। खासकर पीएम डॉ. मनमोहन सिंह। वह अपनी सरकार की गिरती छवि को थामने के लिए अब कदम उठाने की बात कर रहे हैं। इनमें से एक है एक बार फिर अपने मंत्रियों को अपनी सम्पत्ति का खुलासा करने का निर्देश देना। प्रधानमंत्री का यह कदम उच्च स्तर पर शासन में पारदर्शिता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। मनमोहन सिंह ने अपने मंत्रियों के लिए आचार संहिता जारी की है। इसके तहत हर मंत्री को अपनी और अपने परिजनों की सम्पत्ति के ब्यौरे की घोषणा करनी होगी। इतना ही नहीं, मंत्रियों को अपने हितों की भी जानकारी देनी होगी। मसलन, यदि किसी मंत्री का परिजन विदेशी कम्पनी में कार्यरत है तो इसका पूरा ब्यौरा उन्हें देना होगा तथा सरकार से इसकी पूर्व अनुमति लेनी होगी। राज्यों को भी आचार संहिता लागू करनी होगी। उन्हें 31 अगस्त तक मंत्रियों को अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा देने को कहा गया है।प्रधानमंत्री ने सभी मंत्रियों को चिट्ठी लिखकर अपनी सम्पत्ति और सालाना कमाई ही नहीं बल्कि अपने पति या पत्नी के साथ उन पर आश्रित परिजनों के नाम की सम्पत्ति को भी सार्वजनिक करने के लिए कहा गया है। इतना ही नहीं, मंत्रियों को इस बार विशेष रूप से कारपोरेट जगत से अपने कारोबारी रिश्तों और संबंधों का भी खुलासा करने के निर्देश दिए गए है। प्रधानमंत्री की इस चिट्ठी में मंत्रियों को यह निर्देश दिए गए हैं कि यदि उनके परिवार का कोई सदस्य अपनी कोई फर्म शुरू करता है या फिर किसी कारोबारी फर्म के बोर्ड का सदस्य बनता है तो इस जानकारी का भी उन्हें खुलासा करना होगा। आचार संहिता के तहत सभी मंत्रियों को सम्पत्ति, देनदारियों, व्यापारिक हितों और अन्य किसी आश्रितों के किसी विदेशी सरकार या संगठन के तहत रोजगार संबंधी जानकारी भी देनी होगी। विवरण में समस्त अचल सम्पत्ति, नकदी, आभूषण, शेयर और डिबेंचर का ब्यौरा शामिल है।
कारण कुछ भी रहा हो, चाहे वह बाबा रामदेव के आंदोलन का दबाव रहा हो या फिर अन्ना हजारे का प्रेशर्स, प्रधानमंत्री के इस कदम का हम स्वागत करते हैं। मनमोहन सरकार में कई करोड़पति मंत्री पहले से ही मौजूद हैं। नेशनल इलेक्शन वॉच की एक रिपोर्ट जो मंत्रियों द्वारा 2009 में दाखिल चुनाव हलफनामे पर आधारित है, का कहना है कि श्री प्रफुल्ल पटेल पहले से ही 89.9 करोड़ सम्पत्ति के मालिक हैं। कपिल सिब्बल 31.97 करोड़, विसेंट पाला 25.16 करोड़, वीरभद्र सिंह 22.52 करोड़। यूपीए सरकार में कुल 47 मंत्री करोड़पति हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के खलनायक पूर्व संचार मंत्री ए. राजा के मामले में पर्दे के पीछे कुछ औद्योगिक घरानों से उनकी साठगांठ, इंडियन प्रीमियर लीग की टीमें खरीदने के लिए शरद पवार की सांसद बेटी सुप्रिया सुले और पूर्व विदेश मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनन्दा पुष्कर की वजह से सरकार की हुई फजीहत शायद प्रधानमंत्री के नए निर्देश का कारण हो सकती है। जहां हम पीएम के इस कदम का स्वागत करते हैं वहीं यह भी कहना चाहते हैं कि नौकरशाहों पर भी नकेल कसनी चाहिए। मंत्रियों से कहीं ज्यादा इन नौकरशाहों ने लूट-खसोट मचा रखी है।
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Thursday, 19 May 2011
कांग्रेस के पास मौका है कि पवार एण्ड कम्पनी को सही औकात दिखाए
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 19 May 2011
अनिल नरेन्द्र
अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान जिस तरह वाम मोर्चे का पश्चिम बंगाल में और तमिलनाडु में डीएमके का सफाया हुआ है, उससे एनसीपी सदमें की हालत में अगर है तो वह स्वाभाविक ही है। पार्टी कायकर्ताओं में अब यह चर्चा हो रही है कि द्रमुक की हार की प्रमुख वजह 2जी स्पेक्ट्रम भ्रष्टाचार घोटाला था तो एनसीपी नेता शरद पवार ढेरों मामलों में फंसे हुए हैं। आईपीएल, 2जी स्पेक्ट्रम, लवासा जैसे अनेक विवादित मामलों में जांच एजेंसियों के रॉडार पर चल रहे मराठा क्षत्रप शरद पवार को जनता कैसे बख्शेगी? अकेले पवार ही नहीं बल्कि प्रफुल्ल पटेल के भी विवादास्पद व्यक्तियों (बलवा, हसन अली) से संबंधों का पर्दाफाश हो चुका है। एयर इंडिया स्कैंडल भी सामने आ चुका है। एनसीपी अपने स्थापना दिवस 10 जून को मुंबई में दलितों का एक बड़ा सम्मेलन करने की तैयारी में लगी हुई है, लेकिन कांग्रेस-एनसीपी के खेमे से आरपीआई के उठावले गुट को अपनी तरफ खींच लेने वाले भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने उसके ठीक एक दिन पहले भ्रष्टाचार विरोधी सम्मेलन करने का ऐलान कर दिया है। महाराष्ट्र राज्य सरकारी बैंक के हजारों करोड़ के घपले में गले तक डूबी नजर आ रही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता यह नहीं समझ पा रहे कि पार्टी की स्थापना की 12वीं वर्षगांठ से पहले वे अपने कार्यकर्ताओं को क्या सन्देश दें? यहां तक कि इस सम्मेलन की तैयारी के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी को कार्यकर्ताओं की कमी का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के प्रदेश कार्यालय पर भी कार्यकर्ताओं की भीड़ लगातार कम होती जा रही है और जो लोग वहां दिख भी रहे हैं उनके चेहरे पर पांच राज्यों के विधानसभा परिणाम ने उदासी पोत दी है। पुणे से आए एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने बताया कि एनसीपी ने अगर अपनी छवि को दुरुस्त करने के लिए कोई बड़ा कदम जल्द नहीं उठाया तो विनायक देशमुख की देखादेखी एनसीपी के तमाम नेता इस साल के अन्त से शुरू हो रहे स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों से पहले कांग्रेस की तरफ दौड़ लगा सकते हैं।
कांग्रेस के लिए भी यह मौका अच्छा है कि शरद पवार से हमेशा के लिए निपट ले। शरद पवार की पार्टी एनसीपी के गठन के बाद यह पहला मौका है कि कांग्रेस ने उसके मर्मस्थल सहकारिता की शुगर लॉबी पर कठोर प्रहार किया है मगर पवार कांग्रेस को कोई करारा जवाब देने की बजाय उसकी चिरोरी करते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को छोड़कर अलग पार्टी बनाने वाले शरद पवार कांग्रेस के ही साथ मिलकर पिछले 12 साल से महाराष्ट्र की सत्ता और छह साल से केंद्र की सत्ता भोग रहे हैं। सहयोगी दल होने के बावजूद पवार अपनी आदत के अनुसार समय-समय पर कांग्रेस को अंगुली करते ही रहते हैं। कृषि मंत्रालय में उनकी नीतियों और चालबाजियों ने देश को विकराल महंगाई के कगार पर ला खड़ा किया है, लेकिन पवार ने यह बताने में कोई चूक नहीं की कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इसके लिए पूरे जिम्मेवार हैं। कांग्रेस को शरद पवार डुबा सकते हैं, उन्होंने पहले भी ऐसा ही किया था। यह मौका अच्छा है अगर कांग्रेस थोड़ी हिम्मत करे तो शरद पवार को सही औकात दिखला सकती है। कृषि मंत्रालय और प्रफुल्ल पटेल का मंत्रालय इस झटके में बदल दिया जाना चाहिए।
कांग्रेस के लिए भी यह मौका अच्छा है कि शरद पवार से हमेशा के लिए निपट ले। शरद पवार की पार्टी एनसीपी के गठन के बाद यह पहला मौका है कि कांग्रेस ने उसके मर्मस्थल सहकारिता की शुगर लॉबी पर कठोर प्रहार किया है मगर पवार कांग्रेस को कोई करारा जवाब देने की बजाय उसकी चिरोरी करते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को छोड़कर अलग पार्टी बनाने वाले शरद पवार कांग्रेस के ही साथ मिलकर पिछले 12 साल से महाराष्ट्र की सत्ता और छह साल से केंद्र की सत्ता भोग रहे हैं। सहयोगी दल होने के बावजूद पवार अपनी आदत के अनुसार समय-समय पर कांग्रेस को अंगुली करते ही रहते हैं। कृषि मंत्रालय में उनकी नीतियों और चालबाजियों ने देश को विकराल महंगाई के कगार पर ला खड़ा किया है, लेकिन पवार ने यह बताने में कोई चूक नहीं की कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इसके लिए पूरे जिम्मेवार हैं। कांग्रेस को शरद पवार डुबा सकते हैं, उन्होंने पहले भी ऐसा ही किया था। यह मौका अच्छा है अगर कांग्रेस थोड़ी हिम्मत करे तो शरद पवार को सही औकात दिखला सकती है। कृषि मंत्रालय और प्रफुल्ल पटेल का मंत्रालय इस झटके में बदल दिया जाना चाहिए।
Sunday, 17 April 2011
...और अब शरद पवार 2जी स्पेक्ट्रम में भी शामिल
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi प्रकाशित: 17 अप्रैल 2011 -अनिल नरेन्द्र |
केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार का नाम बस अब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़ना बाकी रह गया था। कारपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया ने सीबीआई को दिए बयान में यह काम भी पूरा कर दिया है। कभी आईपीएल गेट तो कभी लवासा तो कभी हसन अली मामले के चलते विवादों में रहे पवार का नाम 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में फायदा उठाने वाली डीबी रियल्टी की स्वान टेलीकॉम से भी जुड़ गया है। कारपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया ने सीबीआई के सामने दिए बयान में स्वान टेलीकॉम में पवार का नियंत्रण होने की सम्भावना जताई है। डीबी रियल्टी की कम्पनी स्वान टेलीकॉम 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में अनुचित तरीके से फायदा उठाने की आरोपी है। राडिया ने सीबीआई पूछताछ में कबूला है कि स्वान टेलीकॉम को लाइसेंस दिलाने के लिए पवार ने तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा से सिफारिश की थी। इसी कड़ी में राडिया ने दागी स्वान टेलीकॉम में पवार की हिस्सेदारी होने की सम्भावना भी जताई है। राडिया का यह बयान सीबीआई के आरोप पत्र का हिस्सा है। इसमें राडिया ने कहा है कि मुंबई में लोगों की ऐसी धारणा है, लेकिन दस्तावेजी सबूत नहीं हैं। यह पहली बार नहीं है कि शरद पवार का नाम किसी विवाद से जुड़ा है। चाहे वह आईपीएल, लवासा, आदर्श सोसायटी घोटाला हो या फिर चीनी घोटाले से लेकर वायदा बाजार को फायदा पहुंचाने जैसे विवाद, सबमें उनका नाम जरूर आया। वहीं पवार ने डीबी रियल्टी पर स्वान टेलीकॉम में किसी भी तरह की भागीदारी से इंकार किया है। डीबी रियल्टी के मालिक विनोद गोयनका से 35 साल पुराने रिश्तों की बात तो उन्होंने स्वीकारी है और कहा कि उन्होंने 20 साल पहले बारामती (पवार के गृह क्षेत्र) में दुग्ध प्रसंस्करण इकाई स्थापित की थी। बकौल पवार `हम सभी किसान उन्हें अच्छी गुणवत्ता का दूध निकालने में मदद करते हैं। हमारे रिश्ते हैं और इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन टेलीकॉम कम्पनी में मेरी भागीदारी या जुड़ाव कतई नहीं है।' बेशक पवार यह कहें कि उनका 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से कोई लेना-देना नहीं है लेकिन यह पूरा सच नहीं है। पवार की बेटी सुप्रिया सुले और उनके पति सदानन्द की पुणे के पंचशील रियल्टी के पंचशील टेक पार्प वन प्रोजैक्ट में चार प्रतिशत की हिस्सेदारी है जिसके सीधे-सीधे संबंध डीबी रियल्टी से हैं। शाहिद बलवा की डीबी रियल्टी और पंचशील रियल्टी में सीधा संबंध पुणे के यरवदा की 15 हजार करोड़ रुपये की करीब 19 एकड़ जमीन के विकास से जुड़ी है। पुणे म्युनिसिपल कारपोरेशन (पीएमसी) और जिला कलेक्टर कार्यालय में मौजूद दस्तावेजों के अनुसार पंचशील टेक पार्प वन आईटी प्रोजैक्ट और डीबी रियल्टी (हिसलाइड कंस्ट्रक्शन प्रा. लि.) के द ग्रांड हमार फाइव स्टार होटल प्रोजैक्ट की जमीन के सर्वे क्रमांक 191(ए) के दो हिस्सा नम्बरों में नहीं बांटा गया है। जमीन के बंटवारे के साथ ही मुख्य सर्वे नम्बर में जमीन के टुकड़ों को अलग-अलग हिस्सा नम्बर अवंटित किए जाते हैं। अलग-अलग हिस्सा नम्बर लिए बिना यदि दो कम्पनियां काम कर रही हैं तो टाउन प्लानर्स के मुताबिक उनमें आपसी सहमति या भागीदारी निश्चित है। शरद पवार इतने बदनाम हो चुके हैं कि वह किस-किस मामले में सफाई देंगे? पर सवाल यह उठता है कि इस सबके बावजूद उन पर कोई हाथ डालने का साहस क्यों नहीं करता? कांग्रेस तो गठबंधन धर्म निभाने का बहाना लेकर साइड कर लेती है और सरकार के वह खुद हिस्सा हैं। अन्ना हजारे ने यूं ही शरद पवार को नहीं चुना। |
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