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Thursday, 26 July 2012

कांग्रेस किस हद तक गठबंधन धर्म निभाने को तैयार है?

संपग सरकार की समस्याएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। एक तरफ तो सरकार के गठबंधन साथियों ने सरकार और कांग्रेस पार्टी की नाक में दम कर रखा है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के भीतर भी अब घमासान मच गया है। राकांपा पहले से ही नाराज चल रही है और अब तो उसके नेताओं ने कांग्रेस नेतृत्व को चेतावनी देनी आरंभ कर दी है। राकांपा ने कांग्रेस को चेतावनी दी है कि यदि संपग गठबंधन के लिए समन्वय समिति और सहयोगियों के साथ उचित व्यवहार जैसी उसकी मांगों का बुधवार तक समाधान नहीं निकलता है तो वह सरकार से अलग हो सकती है। शरद पवार के नेतृत्व वाली पार्टी ने यह भी संकेत दिया है कि अगर वह केन्द्र सरकार से अलग होती है तो इसका असर महाराष्ट्र में गठबंधन पर भी पड़ेगा क्योंकि राज्य के नेता कांग्रेसनीत मंत्रिमंडल से अलग होने के पक्ष में है। राकांपा महाराष्ट्र में कांग्रेस सरकार के साथ पिछले 13 साल से गठबंधन में है। अभी सहयोगी राकांपा के साथ कांग्रेस की तकरार थमी भी नहीं थी कि पार्टी के भीतर भी बगावत शुरू हो गई है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के खिलाफ उन्हीं के कांग्रेस विधायकों ने उनकी शिकायत पार्टी हाईकमान से की है। इनका कहना है कि चव्हाण अपनी मनमानी कर रहे हैं और वह किसी की नहीं सुन रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और विलासराव देशमुख समर्थक 42 विधायकों ने एक शिकायत पत्र हाईकमान को लिखा है। पत्र में पार्टी हाईकमान से मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को तत्काल पद से हटाने की मांग की गई है। क्या यह महज इत्तिफाक है कि इधर शरद पवार एंड कंपनी बगावती तेवर दिखा रही है। उधर पवार दबाव बनाने में माहिर हैं और कांग्रेस नेतृत्व में वह यही काम आजकल कर रहे हैं। कांग्रेस की मुश्किल यह होती जा रही है कि पार्टी को केन्द्राrय और पादेशिक स्तर पर परस्पर विरोधाभाषी राजनीति से जूझना पड़ रहा है। केन्द्र की सियासत कहती है कि उसे सहयोगी और समर्थक दलों से अपने रिश्ते रखने चाहिए ताकि मनमोहन सिंह सरकार की स्थिरता बनी रहे जबकि उसकी पादेशिक इकाई इसके एकदम खिलाफ है क्योंकि उन्हें वहां उन्हीं राजनीतिक दलों से दो-दो हाथ करने पड़ रहे हैं जिनको केन्द्र से आजकल बेहद दुलार मिल रहा है। इसमें पहला नंबर तृणमूल कांग्रेस के साथ का है। दिल्ली में कांग्रेस को जितनी ज्यादा तृणमूल की जरूरत है पश्चिम बंगाल की कांग्रेस इकाई को उतनी ही नफरत तृणमूल से है। उसे रात-दिन तृणमूल से अपमानित होना पड़ रहा है। पदेश कांग्रेस अध्यक्ष पदीप भट्टाचार्य तो कई बार सरेआम कह चुके हैं कि आखिर केन्द्र में सत्ता की खातिर हम कब तक तृणमूल कार्यकर्ताओं से पिटते रहेंगे? ऊपर से ममता आए दिन यह कहते नहीं थकतीं कि कांग्रेस उसका साथ कल छोड़ती हों तो आज ही छोड़ दे। अब तो ममता ने खुलेआम यह घोषणा कर दी है कि पश्चिम बंगाल का आगामी विधानसभा चुनाव वह बिना कांग्रेस के ही लड़ेंगी। पिछली बार भी टिकट बंटवारे में कांग्रेस को तृणमूल से बेहद अपमानित समझौता करना पड़ा था। महाराष्ट्र में भी कांग्रेस राकांपा को लेकर यही दुखड़ा रो रही है। वहां तो वह सत्ता में बराबर की भागीदार हैं और मलाई वाले दमदार मंत्रालय राकांपा ने अपने हाथों में रखे हैं। महाराष्ट्र की कांग्रेस इकाई को यह लग रहा है कि घोटाले पर घोटाले तो राकांपा कर रही है और खामियाजा उसे न भुगतना पड़ जाए। यही वजह है कि इकाई एक श्वेत पत्र लाने की मांग कर रही है। शरद पवार एंड कंपनी को यह डर सता रहा है कि अगर किसी किस्म का श्वेत पत्र महाराष्ट्र सरकार लाती है तो उनके घोटालों का पर्दाफाश हो जाएगा जिसका खामियाजा उसे आगामी विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ेगा। पृथ्वीराज चव्हाण एक ईमानदार नेता की छवि रखते हैं और वह पवार एंड कंपनी के दबाव, ब्लैकमेलिंग में नहीं आ रहे। इसलिए अब पवार का पयास है कि चव्हाण को हटवा दिया जाए। इसी तरह उत्तर पदेश कांग्रेस इकाई भी दुखी है। पदेश के सांसद कह रहे हैं कि केन्द्र सरकार दोनों हाथों से सपा को पैसा लुटा रही है। जिसका इस्तेमाल उसके ही खिलाफ होना है। यदि सपा से इसी तरह रिश्ते कांग्रेस निभाती रही तो अगले चुनाव में कांग्रेस को कोई पूछने वाला नहीं होगा। 22 की जगह वह दो सीटों तक ही सीमित हो जाएगी। कुल मिलाकर कांग्रेस हाईकमान को यह फैसला करना होगा कि केन्द्र में सत्ता की खातिर वह राज्यों में अपनी इकाइयों को कितना नुकसान पहुंचाने को तैयार है। वैसे अभी तक तो कांग्रेस हाईकमान की यही नीति रही है कि राज्य जाएं भाड़ में केन्द्र में सत्ता बरकरार रहनी चाहिए।

Tuesday, 24 July 2012

शरद पवार की लड़ाई नम्बर दो की हैसियत की नहीं है

तमाम कोशिशों के बावजूद एनसीपी और कांग्रेस नेतृत्व के बीच आई राजनीतिक दरार कम नहीं हो पा रही है। क्योंकि इस बार एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने काफी अड़ियल रुख अपना लिया है। लगता अब यह है कि शरद पवार एण्ड कम्पनी अपनी राह तय कर चुके हैं। एनसीपी के प्रवक्ता डीपी त्रिपाठी के मुताबिक एनसीपी सुप्रीमो ने अभी तक इतना खुलकर सरकार के कामकाज का विरोध नहीं जताया था। इसलिए महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक तालमेल के स्तर पर सब कुछ नहीं सुधरा तो एनसीपी सरकार से किनारा करने का मन बना चुकी है। क्या पवार इसलिए कैबिनेट छोड़ना चाहते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व उन्हें मनमोहन सरकार में नम्बर दो की पोजीशन देने को तैयार नहीं है? सूत्रों का कहना है कि यह तो बहाना है। असल में पवार का ज्यादा झगड़ा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के तौर-तरीकों से है। काफी दिनों से पवार और पृथ्वीराज की तनातनी चल रही है। बताया जाता है कि पवार और उनके दल के नेताओं के हितों के खिलाफ राज्य सरकार ने जो मुहिम छेड़ रखी है उससे एनसीपी खफा है। यही वजह है कि मंत्रिमंडल में वरिष्ठता क्रम में दूसरे नम्बर की आड़ में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने यूपीए सरकार पर भारी-भरकम दबाव बनाकर सरकार से बाहर जाने की बात कह दी है। शरद पवार की असल नाराजगी की वजह महाराष्ट्र से है। महाराष्ट्र पवार का असली गढ़ है। जब से पृथ्वीराज चव्हाण मुख्यमंत्री बने हैं तभी से कांग्रेस और एनसीपी में तनातनी चल रही है। पवार एण्ड कम्पनी का आरोप है कि कांग्रेस ने सोची-समझी रणनीति के तहत मराठवाड़ा में एनसीपी का प्रभाव कम करने के लिए वहां की सारी ग्रामीण परियोजनाओं को दबाकर रखा हुआ है। महाराष्ट्र सरकार स्वयं श्री पवार, उनकी पुत्री सुप्रिया सुले व प्रफुल्ल पटेल के चुनाव क्षेत्रों की विभिन्न परियोजनाओं को लटकाने की रणनीति पर चल रहे हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी की मिलीजुली सरकार है। शरद पवार के भतीजे अजीत पवार वित्त मंत्री होने के बावजूद लाचार समझे जा रहे हैं। पृथ्वीराज चव्हाण सारी फाइलें दबाए बैठे हैं। यह भी पता चला है कि शरद पवार की नाराजगी की एक बड़ी वजह यह भी है कि उनके महाराष्ट्र मुख्यमंत्री के कार्यकाल के दौरान एक सिंचाई परियोजना में आवंटित बजट से 26,000 करोड़ रुपए से अधिक खर्च की भी जांच है। इस परियोजना में पवार के करीबियों को ठेके मिले थे। अब इस परियोजना पर हुए खर्च की जांच रफ्तार को जहां पवार धीमा करना चाहते हैं वहीं एक अन्य मामला महाराष्ट्र सदन घोटाले से जुड़ा है। दिल्ली में बने दूसरे महाराष्ट्र सदन के निर्माण के समय इसकी योजना राशि 52 करोड़ रुपए थी। अन्त में यह सदन भवन तैयार होते-होते इसकी राशि 152 करोड़ रुपए पहुंच गई। महाराष्ट्र सदन घोटाले की जांच की मांग को लेकर भाजपा नेता किरीट सोमैया ने हाल ही में राष्ट्रपति को भी शिकायत की थी कि इस मामले में भी महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल के करीबी रिश्तेदार को ठेका दिया गया था। महाराष्ट्र सदन में घोटाले की बात सामने आने पर खुद राष्ट्रपति ने अपने को इसके उद्घाटन कार्यक्रम से अलग कर लिया था। शरद पवार को शंका है कि जिस तरह भाजपा इस मुद्दे को उठा रही है उससे यदि मामले की जांच हुई तो उनकी पार्टी के लिए समस्या खड़ी हो सकती है। प्रफुल्ल पटेल पर भी तरह-तरह के आरोप हैं। खुद शरद पवार के कृषि मंत्री की हैसियत से खाद्यान्न आयात-निर्यात के मामले भी विवादों में हैं। इसलिए लड़ाई की जड़ नम्बर दो की हैसियत की नहीं, यह मामला ज्यादा गम्भीर है जो इतनी आसानी से शायद ही सुलझे। दरअसल शरद पवार को इस बात की भी चिन्ता है कि कहीं कांग्रेस नेतृत्व इस साल के अन्त तक लोकसभा के मध्यावधि चुनाव न करवा ले। फिर महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव भी 2014 में होने हैं। वैसे लोकसभा चुनाव अगर अपने निश्चित समय अप्रैल 2014 में होते हैं तो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव अक्तूबर 2014 में होंगे। अगर लोकसभा चुनाव में एनसीपी की स्थिति कमजोर होती है तो इसका प्रभाव महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव पर सीधा पड़ सकता है। सवाल तो अब महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार के भविष्य को लेकर भी खड़ा हो रहा है। दूसरी ओर शिवसेना में आई दरार समाप्त हो रही है। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के फासले कम हो रहे हैं। अगर शिवसेना एक हो जाती है तो शिवसेना, मनसे और भाजपा महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की छुट्टी करा सकती है। इसलिए मामला ज्यादा गम्भीर है। यह लड़ाई सिर्प नम्बर दो की हैसियत की नहीं उससे ज्यादा पेचीदा है।

Sunday, 20 May 2012

कसाब की मेहमाननवाजी पर खर्च हो रहे 20 करोड़ को वहन कौन करे?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20 May 2012
अनिल नरेन्द्र
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दया याचिकाओं के मामले में उसके सामने दो मामले लम्बित हैं और इन मामलों में वह कुछ ऐसे निर्देश दे सकता है जो राष्ट्रपति के पास लम्बित दया याचिकाओं को प्रभावित कर सकता है, इसलिए बेहतर होगा कि वह दया याचिकाओं के निपटारे के लिए कोई समय सीमा निर्धारित करे। जस्टिस जीएस सिंघवी और एसजे मुखोपाध्याय की खंडपीठ ने कहा कि केंद्र समय सीमा निर्धारित करने पर विचार करे, हालांकि वह माफी देने के राष्ट्रपति के विशेषाधिकारों पर कोई निर्देश नहीं देना चाहती। कोर्ट ने कहा, `हम यह भी नहीं चाहते कि सरकार जल्दबाजी में फैसला ले क्योंकि इससे उसके सामने लम्बित केसों पर असर पड़ सकता है।' कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए कहा, `हालांकि हमने देखा है कि सरकार ने भुल्लर के मामले में सक्रियता तभी दिखाई जब उसने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।' उसकी याचिका के एक माह बाद ही सरकार ने उसे खारिज कर दिया। इससे यह सवाल उठा है कि क्या उसके केस का उचित गुण-दोष के आधार पर निर्णय हुआ है। राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिकाओं के वर्षों तक लटकने के खिलाफ मृत्यदंड प्राप्त दो दोषियों ः देवेन्द्र सिंह भुल्लर और महेन्द्र नाथ दास ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उनका कहना है कि उन्हें अनुच्छेद-21 के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन है, इसलिए उनकी सजाओं को अब उम्र कैद में बदल दिया जाए। दोनों याचिकाओं पर राष्ट्रपति के यहां लगभग सात वर्षों से अधिक की देरी तो हो चुकी है। उधर सूखा राहत के मामले पर दिल्ली से खाली हाथ लौटे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा है कि आर्थर रोड जेल में बन्द अजमल कसाब की सुरक्षा का खर्च महाराष्ट्र के सिर डालना सरासर गलत है। चव्हाण ने केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को एक पत्र लिखकर मांग की है कि कसाब की सुरक्षा में करीब 20 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं और इस खर्च को केंद्र सरकार को वहन करना चाहिए। चव्हाण ने यह चिट्ठी एनसीपी नेता और राज्य के गृहमंत्री आरआर पाटिल के उस बयान के बाद लिखी है जिसमें उन्होंने कसाब की इतनी लम्बी देखभाल को गलत बताया था। अजमल कसाब की सुरक्षा में लगी भारत-तिब्बत सीमा पुलिस ने महाराष्ट्र सरकार के पास 28 मार्च 2009 से लेकर 30 सितम्बर 2011 तक के करीब 20 करोड़ रुपये का बिल भेज दिया है। यह बिल आईटीबीपी के उन कर्मचारियों के वेतन और भत्तों पर खर्च हुआ है जो कसाब की सुरक्षा में लगे हैं। पहले से ही आर्थिक संकट झेल रही महाराष्ट्र सरकार पर यह 20 करोड़ रुपये का खर्च किसी बोझ से कम नहीं है, इस बात पर जोर देते हुए मुख्यमंत्री चव्हाण ने चिदम्बरम को चिट्ठी भेज दी है। केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच रस्साकशी का यह मसला आने वाले दिनों में तूल पकड़ सकता है। कसाब को कथित तौर से राजकीय मेहमान के तौर पर रखे जाने को लेकर शिवसेना कई बार केंद्र और राज्य सरकार पर हमला कर चुकी है। एनसीपी को भी अब लगने लगा है कि मराठी मानुष के मुद्दों से दूर होते जाने की वजह से ही हाल के स्थानीय निकाय चुनावों में मुंबई के मतदाताओं ने उसे पूरी तरह नकार दिया है। प्रश्न यह उठता है कि कब तक अजमल कसाब की देश यूं खातिरदारी करता रहेगा? आखिर कोई समय सीमा तो तय करनी ही होगी।
Anil Narendra, Daily Pratap, Vir Arjun, Qasab, Maharashtra, NCP,

Sunday, 27 November 2011

शरद पवार को थप्पड़ आखिर क्यों पड़ा?



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th November 2011
अनिल नरेन्द्र
बृहस्पतिवार को नई दिल्ली के एनडीएमसी सेंटर में इफ्को के एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि आए केंद्रीय कृषि मंत्री ने कभी अन्दाजा नहीं लगाया होगा कि उस दिन उनसे क्या घटना घटेगी। कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए पवार जब बाहर की तरफ बढ़े तभी एक सिख युवक ने आगे बढ़कर उनके मुंह पर तमाचा मार दिया। पवार को समझ नहीं आया कि क्या हुआ। वह चुपचाप आगे बढ़ गए। मंत्री के स्टाफ की धक्का-मुक्की से नाराज युवक ने अपनी कृपाण निकाल ली। विरोधस्वरूप अपने हाथ पर वार भी किया। एनडीएमसी के गार्डों ने युवक को बड़ी मुश्किल से काबू कर पुलिस को सौंपा। हमलावर युवक का नाम हरविन्दर सिंह है और वह दिल्ली के विजय विहार में रहता है। वह नारा लगा रहा था, `वह भ्रष्ट हैं।' मैं यहां मंत्री को थप्पड़ मारने ही आया था। वे सभी भ्रष्ट हैं। उसने आगे कहा कि आज गुरु तेग बहादुर की शहादत का दिन है। हालात और भी बुरे हो सकते थे। मैंने ही रोहिणी कोर्ट में सुखराम को भी मारा था। मैं सिख हूं, चप्पल नहीं मारूंगा। सिर्प भाषण देते हो। भगत सिंह को भूल गए जिसने कुर्बानी दी। मारो-मारो मुझे खूब मारो। पागल...हूं मैं। इनके पास घोटालों के अलावा कुछ नहीं है। मैं गलत नहीं हूं।
शरद पवार पर तमाचे की गूंज ने दिल्ली की सियासत को हिला दिया है। विपक्ष ने इस घटना की निन्दा तो की है, लेकिन इसे महंगाई से उपजा गुस्सा करार देकर सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। वहीं कांग्रेस ने इस घटना के लिए भाजपा नेता यशवंत सिन्हा के गैर जिम्मेदाराना बयान पर निशाना साधा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पवार से बातचीत कर पूरे घटनाक्रम की निन्दा की। कांग्रेस के संसदीय कार्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि यशवंत सिन्हा के बयान, महंगाई नहीं रुकी तो हिंसा होगी, वापस होना चाहिए। ऐसी धारणा बनाना गलत है। वहीं भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने कहा कि यह शख्स मेरे बयान से पहले ही सुखराम को भी थप्पड़ मार चुका है। ऐसे में इसे मुझसे जोड़ा जाना ठीक नहीं है। भाजपा की ही सुषमा स्वराज की टिप्पणी थी, भाजपा इसकी निन्दा करती है। अहिंसक तरीके से जताया जाना चाहिए अपना मतभेद। पवार उम्र के कारण आदर योग्य हैं। वहीं सबसे दिलचस्प टिप्पणी अन्ना हजारे की थी। अन्ना हजारे ने पवार पर हमले की सूचना मिलने पर पहली प्रतिक्रिया के तौर पर पूछा, `केवल एक थप्पड़?' बाद में उन्होंने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि पवार को थप्पड़ पड़ा लोकतंत्र को तमाचा है। जनता में इस घटना की क्या प्रतिक्रिया हुई, कुछ टिप्पणियां प्रस्तुत हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को पड़ा थप्पड़ किसी नेता या मंत्री पर नहीं बल्कि इनके द्वारा बनाई गई उस व्यवस्था पर है जिससे आम लोगों का पूरा बजट गड़बड़ा गया है। वह आम आदमी क्या करे, जिसकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया हो। दिल्ली वालों ने इसी तरह की प्रतिक्रिया दी। `महंगाई घरों की किचन के साथ लोगों के सपनों पर भी हमला कर रही है। एक इंसान अपने बच्चे को पढ़ाकर कुछ बनाने के सपने देखने से पहले यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि उसके लिए पैसे कैसे बचाए' कोटला की एक महिला की प्रतिक्रिया थी। मयूर विहार की एक कामकाजी महिला ने कहा कि यह थप्पड़ एक आदमी का नहीं, पूरे देश की जनता का है। देश के नेताओं और मंत्रियों को यह समझ जाना चाहिए कि जनता अपने तरीके से जवाब देना सीख रही है। उसे पांच साल तक बहला-फुसलाकर बेवकूफ नहीं बना सकते हैं। कोटला फिरोजशाह की एक महिला का कहना था कि परेशानी है तभी तो लोग ऐसा करने को मजबूर हो रहे हैं। मंत्री दफ्तर में बैठकर जो नीति तैयार करते हैं, वह आम आदमी की कमर तोड़ने वाली होती है। ऐसे में लोग क्या करें? उनके पास कोई विकल्प नहीं है। सेवा नगर में एक सियासी कार्यकर्ता का कहना था कि परेशानी अपनी जगह है, लेकिन हर जगह थप्पड़ मारना ठीक नहीं है। सबक सिखाना है तो चुनाव में सिखाएं। लेकिन लोग भी क्या करें जब उनके प्रतिनिधि उम्मीद पर खरे नहीं उतरते तो वह तनाव में आ जाते हैं और यही तनाव थप्पड़ के रूप में दूर होता है। एक व्यवसायी की टिप्पणी थी, `सरकार जब सो रही हो तो उसे जगाने के लिए इससे बेहतर तरीका और कुछ नहीं हो सकता।' सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता आरके शर्मा का मानना है कि लोगों का गुस्सा जायज है। मंत्री, नेता और उनके रिश्तेदार करोड़ों-अरबों में खेल रहे हैं और आम आदमी भरपेट खाने से पहले भी सोचता है। यह स्थिति खतरनाक है और देश के नीति-निर्धारकों को अब गम्भीरता से जनता के दुःख-दर्द के बारे में सोचना ही होगा। मैक्स अस्पताल के मनोचिकित्सक डाक्टर समीर पारिख का कहना है कि अपने आक्रोश को निकालने का यह तरीका काफी कैट कहा जा सकता है, जब लोग दूसरे की नकल करते हुए किसी पर हमला करते हैं और उसे चोट पहुंचाते हैं तो वह चीप पब्लिसिटी के भूखे होते हैं। हमला करने वाला पहले की घटना से कहीं न कहीं प्रेरित होता है और उसे लगता है कि उसे भी लोगों का आकर्षण मिल सकता है।
शरद पवार पर हुए हमले से सियासी पारा भी तेज होगा। पवार की पार्टी राकांपा अन्दरखाते कांग्रेस से बेहद नाराज है। उसे लग रहा है कि जिस तरह से कांग्रेस ने पवार को महंगाई का प्रतीक बनाया, उसकी वजह से हालात यहां तक पहुंचे। यद्यपि तुरन्त कांग्रेस के नेता पवार के बचाव में जरूर उतरे, लेकिन राकांपा इस घटना से बेहद व्यथित है। भारी उद्योग मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि बड़े नेताओं की सुरक्षा पर संसद में चर्चा होनी चाहिए। पवार पर हमले के बाद महाराष्ट्र में कुछ इलाकों में पार्टी कार्यकर्ताओं के उग्र रवैये पर पटेल ने संयम रखने की अपील की। मामले के पीछे भाजपा का हाथ होने का खुद पवार ने ही काट किया। उन्होंने कहा, मुझे नहीं लगता कि इसमें किसी राजनीतिक दल का हाथ है। इस बारे में पार्टी इसलिए भी नाराज है कि कांग्रेस लगातार महंगाई के मसले पर शरद पवार को ही आगे करती रही है। बेशक भ्रष्टाचार और महंगाई से देश त्रस्त है और भारी गुस्से में है लेकिन इसका समाधान यह नहीं है कि हम चारों तरफ आग लगाना शुरू कर दें और जो सामने आए टूट पड़ें। इससे समाधान तो क्या निकलेगा, हां चारों ओर अराजकता जरूर फैल जाएगी। वहीं राजनीतिज्ञों को भी समझ लेना चाहिए कि पब्लिक का मूड क्या है। हमारे सामने मध्य पूर्व का उदाहरण है जहां एक छोटी-सी चिंगारी ने देश में आग लगा दी थी। सियासतदानों को इस किस्से से डरना चाहिए और सबक लेना चाहिए।
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Saturday, 9 July 2011

द्रमुक की तीसरी भ्रष्ट विकेट डाउन, मारन का इस्तीफा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th July 2011
अनिल नरेन्द्र
कुछ यूपीए घटक दलों ने मनमोहन सिंह सरकार का साथ-समर्थन इसलिए किया था कि वह देश को लूट सकें। उनका एकमात्र मकसद पैसा कमाना था और है। इनमें प्रमुख है द्रमुक। हालांकि एनसीपी भी इसी श्रेणी में आती है पर फिलहाल द्रमुक का नम्बर लगा है। 2जी स्पैक्ट्रम आवंटन घोटाले में डीएमके को अंतत तीसरा विकेट गंवाना पड़ा। केंद्रीय कपड़ा मंत्री दयानिधि मारन का मामला जेल में बन्द चल रहे ए. राजा और डीएमके सांसद व करुणानिधि की सुपुत्री कनिमोझी से भी एक कदम आगे हैं। दयानिधि मारन ने यूपीए में केंद्रीय संचार मंत्री रहते कमाल ही कर दिया। सीबीआई ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट पेश करते हुए बयान दिया कि मारन ने एयरसेल कम्पनी की हिस्सेदारी मलेशियाई कम्पनी मैक्सिस को बिकवाई। फिर उसे लाइसेंस देकर बदले में 675 करोड़ रुपये का निवेश अपने सन टीवी में करवाया। सीबीआई के वकील केके वेणुगोपाल ने जस्टिस जीएस सिंघवी और एके गांगुली की बैंच को बताया कि 2006 में टेलीकॉम मंत्री रहते मारन ने चेन्नई की कम्पनी एयरसेल का लाइसेंस आवेदन जानबूझ कर लम्बित रखा। उसे अपनी हिस्सेदारी मलेशियाई कम्पनी मैक्सिस को बेचने के लिए मजबूर किया। मैक्सिस-एयरसेल को लाइसेंस देते हुए बदले में अपनी डीटीएम कम्पनी सन टीवी के लिए बड़ा निवेश हासिल किया। मारन का फॉर्मूला सिम्पल था, इस हाथ लो, उस हाथ दो। मैक्सिस केटी आनन्द कृष्णन मारन के रिश्तेदार हैं। इसीलिए मारन ने उनके जरिये यह फायदा का सौदा किया। देखिए यह खेल मारन ने कैसे खेला ः दबाव बनाने के लिए पहले तो मारन ने एयरसेल के 2जी स्पैक्ट्रम लाइसेंस आवेदन को दो साल तक रोके रखा। फिर 2006 में एयरसेल को अपनी हिस्सेदारी मैक्सिस को बेचने के लिए मजबूर किया। बदले में मैक्सिस ने अपनी एक सहयोगी कम्पनी के जरिये मारन की सन टीवी में 675 करोड़ रुपये का निवेश किया। इसके एवज में एयरसेल की 74 फीसदी हिस्सेदारी को लेकर मैक्सिस को 23 सर्पिल के लाइसेंस दे दिए। कनिमोझी तो कुल 200 करोड़ रुपये के घोटाले में शामिल थी, दयानिधि मारन ने तो 675 करोड़ रुपये का सीधा घपला किया है।
यह दूसरा मौका है जब मारन को मंत्री पद छोड़ना पड़ा है। इससे पहले उन्हें 2007 में पद तब छोड़ना पड़ा था जब करुणानिधि परिवार में आंतरिक मतभेद का वह शिकार हुए थे। चेन्नई मध्य से लोकसभा के सदस्य मारन आम चुनावों के बाद मई 2009 में फिर से कैबिनेट में शामिल हुए। लेकिन इस बार उन्हें दूरसंचार मंत्रालय नहीं मिला जैसा वह चाहते थे बल्कि उन्हें कपड़ा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई। कांग्रेस ने गुरुवार को जहां दयानिधि मारन के इस्तीफे पर टिप्पणी करने से मना कर दिया वहीं यह भी कहा कि द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (डीएमके) पार्टी के साथ उसका गठबंधन जारी रहेगा। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि जमीनी हकीकत की तरजीह पर राजनीतिक गठबंधन आधारित होता है। हमारा गठबंधन डीएमके के साथ वर्ष 2004 से है और इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं है।
क्या इसे महज इत्तिफाक माना जाए कि मनमोहन सरकार से उन तमाम भ्रष्ट मंत्रियों का सफाया सुप्रीम कोर्ट के कहने पर हो रहा है या यह सब किसी तयशुदा रणनीति के तहत हो रहा है? द्रमुक के बाद अब अगला नम्बर एनसीपी के भ्रष्ट मंत्रियों का होना चाहिए।
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