तमाम कोशिशों के बावजूद एनसीपी और कांग्रेस नेतृत्व के बीच आई राजनीतिक दरार कम नहीं हो पा रही है। क्योंकि इस बार एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने काफी अड़ियल रुख अपना लिया है। लगता अब यह है कि शरद पवार एण्ड कम्पनी अपनी राह तय कर चुके हैं। एनसीपी के प्रवक्ता डीपी त्रिपाठी के मुताबिक एनसीपी सुप्रीमो ने अभी तक इतना खुलकर सरकार के कामकाज का विरोध नहीं जताया था। इसलिए महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक तालमेल के स्तर पर सब कुछ नहीं सुधरा तो एनसीपी सरकार से किनारा करने का मन बना चुकी है। क्या पवार इसलिए कैबिनेट छोड़ना चाहते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व उन्हें मनमोहन सरकार में नम्बर दो की पोजीशन देने को तैयार नहीं है? सूत्रों का कहना है कि यह तो बहाना है। असल में पवार का ज्यादा झगड़ा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के तौर-तरीकों से है। काफी दिनों से पवार और पृथ्वीराज की तनातनी चल रही है। बताया जाता है कि पवार और उनके दल के नेताओं के हितों के खिलाफ राज्य सरकार ने जो मुहिम छेड़ रखी है उससे एनसीपी खफा है। यही वजह है कि मंत्रिमंडल में वरिष्ठता क्रम में दूसरे नम्बर की आड़ में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने यूपीए सरकार पर भारी-भरकम दबाव बनाकर सरकार से बाहर जाने की बात कह दी है। शरद पवार की असल नाराजगी की वजह महाराष्ट्र से है। महाराष्ट्र पवार का असली गढ़ है। जब से पृथ्वीराज चव्हाण मुख्यमंत्री बने हैं तभी से कांग्रेस और एनसीपी में तनातनी चल रही है। पवार एण्ड कम्पनी का आरोप है कि कांग्रेस ने सोची-समझी रणनीति के तहत मराठवाड़ा में एनसीपी का प्रभाव कम करने के लिए वहां की सारी ग्रामीण परियोजनाओं को दबाकर रखा हुआ है। महाराष्ट्र सरकार स्वयं श्री पवार, उनकी पुत्री सुप्रिया सुले व प्रफुल्ल पटेल के चुनाव क्षेत्रों की विभिन्न परियोजनाओं को लटकाने की रणनीति पर चल रहे हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी की मिलीजुली सरकार है। शरद पवार के भतीजे अजीत पवार वित्त मंत्री होने के बावजूद लाचार समझे जा रहे हैं। पृथ्वीराज चव्हाण सारी फाइलें दबाए बैठे हैं। यह भी पता चला है कि शरद पवार की नाराजगी की एक बड़ी वजह यह भी है कि उनके महाराष्ट्र मुख्यमंत्री के कार्यकाल के दौरान एक सिंचाई परियोजना में आवंटित बजट से 26,000 करोड़ रुपए से अधिक खर्च की भी जांच है। इस परियोजना में पवार के करीबियों को ठेके मिले थे। अब इस परियोजना पर हुए खर्च की जांच रफ्तार को जहां पवार धीमा करना चाहते हैं वहीं एक अन्य मामला महाराष्ट्र सदन घोटाले से जुड़ा है। दिल्ली में बने दूसरे महाराष्ट्र सदन के निर्माण के समय इसकी योजना राशि 52 करोड़ रुपए थी। अन्त में यह सदन भवन तैयार होते-होते इसकी राशि 152 करोड़ रुपए पहुंच गई। महाराष्ट्र सदन घोटाले की जांच की मांग को लेकर भाजपा नेता किरीट सोमैया ने हाल ही में राष्ट्रपति को भी शिकायत की थी कि इस मामले में भी महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल के करीबी रिश्तेदार को ठेका दिया गया था। महाराष्ट्र सदन में घोटाले की बात सामने आने पर खुद राष्ट्रपति ने अपने को इसके उद्घाटन कार्यक्रम से अलग कर लिया था। शरद पवार को शंका है कि जिस तरह भाजपा इस मुद्दे को उठा रही है उससे यदि मामले की जांच हुई तो उनकी पार्टी के लिए समस्या खड़ी हो सकती है। प्रफुल्ल पटेल पर भी तरह-तरह के आरोप हैं। खुद शरद पवार के कृषि मंत्री की हैसियत से खाद्यान्न आयात-निर्यात के मामले भी विवादों में हैं। इसलिए लड़ाई की जड़ नम्बर दो की हैसियत की नहीं, यह मामला ज्यादा गम्भीर है जो इतनी आसानी से शायद ही सुलझे। दरअसल शरद पवार को इस बात की भी चिन्ता है कि कहीं कांग्रेस नेतृत्व इस साल के अन्त तक लोकसभा के मध्यावधि चुनाव न करवा ले। फिर महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव भी 2014 में होने हैं। वैसे लोकसभा चुनाव अगर अपने निश्चित समय अप्रैल 2014 में होते हैं तो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव अक्तूबर 2014 में होंगे। अगर लोकसभा चुनाव में एनसीपी की स्थिति कमजोर होती है तो इसका प्रभाव महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव पर सीधा पड़ सकता है। सवाल तो अब महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार के भविष्य को लेकर भी खड़ा हो रहा है। दूसरी ओर शिवसेना में आई दरार समाप्त हो रही है। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के फासले कम हो रहे हैं। अगर शिवसेना एक हो जाती है तो शिवसेना, मनसे और भाजपा महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की छुट्टी करा सकती है। इसलिए मामला ज्यादा गम्भीर है। यह लड़ाई सिर्प नम्बर दो की हैसियत की नहीं उससे ज्यादा पेचीदा है।
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Tuesday, 24 July 2012
Sunday, 20 May 2012
कसाब की मेहमाननवाजी पर खर्च हो रहे 20 करोड़ को वहन कौन करे?
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 20 May 2012
अनिल नरेन्द्र
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दया याचिकाओं के मामले में उसके सामने दो मामले लम्बित हैं और इन मामलों में वह कुछ ऐसे निर्देश दे सकता है जो राष्ट्रपति के पास लम्बित दया याचिकाओं को प्रभावित कर सकता है, इसलिए बेहतर होगा कि वह दया याचिकाओं के निपटारे के लिए कोई समय सीमा निर्धारित करे। जस्टिस जीएस सिंघवी और एसजे मुखोपाध्याय की खंडपीठ ने कहा कि केंद्र समय सीमा निर्धारित करने पर विचार करे, हालांकि वह माफी देने के राष्ट्रपति के विशेषाधिकारों पर कोई निर्देश नहीं देना चाहती। कोर्ट ने कहा, `हम यह भी नहीं चाहते कि सरकार जल्दबाजी में फैसला ले क्योंकि इससे उसके सामने लम्बित केसों पर असर पड़ सकता है।' कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए कहा, `हालांकि हमने देखा है कि सरकार ने भुल्लर के मामले में सक्रियता तभी दिखाई जब उसने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।' उसकी याचिका के एक माह बाद ही सरकार ने उसे खारिज कर दिया। इससे यह सवाल उठा है कि क्या उसके केस का उचित गुण-दोष के आधार पर निर्णय हुआ है। राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिकाओं के वर्षों तक लटकने के खिलाफ मृत्यदंड प्राप्त दो दोषियों ः देवेन्द्र सिंह भुल्लर और महेन्द्र नाथ दास ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उनका कहना है कि उन्हें अनुच्छेद-21 के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन है, इसलिए उनकी सजाओं को अब उम्र कैद में बदल दिया जाए। दोनों याचिकाओं पर राष्ट्रपति के यहां लगभग सात वर्षों से अधिक की देरी तो हो चुकी है। उधर सूखा राहत के मामले पर दिल्ली से खाली हाथ लौटे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा है कि आर्थर रोड जेल में बन्द अजमल कसाब की सुरक्षा का खर्च महाराष्ट्र के सिर डालना सरासर गलत है। चव्हाण ने केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को एक पत्र लिखकर मांग की है कि कसाब की सुरक्षा में करीब 20 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं और इस खर्च को केंद्र सरकार को वहन करना चाहिए। चव्हाण ने यह चिट्ठी एनसीपी नेता और राज्य के गृहमंत्री आरआर पाटिल के उस बयान के बाद लिखी है जिसमें उन्होंने कसाब की इतनी लम्बी देखभाल को गलत बताया था। अजमल कसाब की सुरक्षा में लगी भारत-तिब्बत सीमा पुलिस ने महाराष्ट्र सरकार के पास 28 मार्च 2009 से लेकर 30 सितम्बर 2011 तक के करीब 20 करोड़ रुपये का बिल भेज दिया है। यह बिल आईटीबीपी के उन कर्मचारियों के वेतन और भत्तों पर खर्च हुआ है जो कसाब की सुरक्षा में लगे हैं। पहले से ही आर्थिक संकट झेल रही महाराष्ट्र सरकार पर यह 20 करोड़ रुपये का खर्च किसी बोझ से कम नहीं है, इस बात पर जोर देते हुए मुख्यमंत्री चव्हाण ने चिदम्बरम को चिट्ठी भेज दी है। केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच रस्साकशी का यह मसला आने वाले दिनों में तूल पकड़ सकता है। कसाब को कथित तौर से राजकीय मेहमान के तौर पर रखे जाने को लेकर शिवसेना कई बार केंद्र और राज्य सरकार पर हमला कर चुकी है। एनसीपी को भी अब लगने लगा है कि मराठी मानुष के मुद्दों से दूर होते जाने की वजह से ही हाल के स्थानीय निकाय चुनावों में मुंबई के मतदाताओं ने उसे पूरी तरह नकार दिया है। प्रश्न यह उठता है कि कब तक अजमल कसाब की देश यूं खातिरदारी करता रहेगा? आखिर कोई समय सीमा तो तय करनी ही होगी।
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Tuesday, 21 February 2012
महाराष्ट्र के मिनी चुनाव में भगवा भारी पड़ा
महाराष्ट्र के 10 महानगर पालिका चुनावों का हालांकि राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में इतना महत्व न हो पर इसका असर जरूर पड़ेगा। महाराष्ट्र में तो खैर यह एक तरह से विधानसभा मिनी चुनाव जरूर माना जा सकता है। इस चुनाव के नतीजों से जहां शिवसेना-भाजपा गठबंधन प्रसन्न होगा वहीं यह कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के लिए एक झटका है। देश के आधे से ज्यादा राज्यों के सालाना बजट वाली देश की सबसे बड़ी महानगर पालिका बृहन्न मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) की सत्ता के बिल्कुल करीब पहुंचकर शिवसेना ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि चुनाव हवा-हवाई दौरों से नहीं बल्कि मतदाताओं को मतदान केंद्रों पर ले जाकर जीते जाते हैं। 10 महानगर पालिका के चुनावों में शिवसेना-भाजपा गठबंधन ने पांच शहरों में भगवा लहराया है। कांग्रेस और एनसीपी को चार शहरों में ही जीत मिल सकी। राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना अप्रत्याशित तौर से नासिक में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। शिवसेना और भाजपा व आरपीआई ने मिलकर 227 सीटों वाली बीएमसी में से 107 सीटें जीतकर सबसे बड़े गठबंधन के तौर पर जीत दर्ज कराई है। कांग्रेस और एनसीपी ने पहली बार यहां मिलकर चुनाव लड़ा और मुंह की खाई। चुनाव परिणाम आते ही कांग्रेस पार्टी में अंतर्पलह शुरू हो गई है। पार्टी नेता एक दूसरे पर पराजय का ठीकरा फोड़ रहे हैं। मुंबई कांग्रेस इकाई प्रमुख कृपाशंकर को स्थानीय सांसद संजय निरूपम और प्रिया दत्त ने हार के लिए जिम्मेदार ठहराया है जबकि कृपाशंकर मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के सिर हार का ठीकरा फोड़ रहे हैं। उनका कहना है कि पूरा चुनाव श्री चव्हाण के नेतृत्व में ही लड़ा गया तो फिर वे ही हार के जिम्मेदार माने जाने चाहिए जबकि दिल्ली में बैठे कांग्रेस के दूसरे नेताओं का कहना है कि मुंबई को गैर-मराठी नेताओं के हवाले करने का खामियाजा उठाना पड़ा है। मराठी मानुष के नाम पर शिवसेना और मनसे जैसी पार्टियां कामयाब रही हैं। उनका मानना है कि सोची-समझी रणनीति के तहत मराठी नेतृत्व को मुंबई में पनपने नहीं दिया गया। इस समय मुंबई में दो कांग्रेसी नेता हैं और दोनों कृपाशंकर और संजय निरूपम उत्तर भारत के हैं। मुरली देवड़ा राजस्थान से तो प्रिया दत्त पंजाब से हैं। ऐसे में मराठी वोट किस कारण कांग्रेस को मिलता? कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मुंबई की हार को गम्भीरता से लिया है। आलाकमान ने मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में हार की वजहों की पड़ताल के लिए मुंबई कांग्रेस कमेटी, प्रदेश कांग्रेस कमेटी और मुख्यमंत्री से अलग-अलग रिपोर्ट मांगी है। पार्टी का एक धड़ा आपसी गुटबाजी मान रहा है। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि बतौर मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को सूबे में भेजे जाने के फैसले को प्रदेश की सियासत में सक्रिय प्रभाव रखने वाले तमाम नेता अभी तक पचा नहीं पाए हैं। कांग्रेस-राकांपा के बीच बेहतर तालमेल न रहने को भी हार का कारण माना जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, विलास राव देशमुव के अलग-अलग खेमे में सूबे में पृथ्वीराज चव्हाण की भूमिका को सही मन से नहीं स्वीकार कर पाए। विवादों के घेरे में आए कृपाशंकर जैसे नेताओं का बचाव भी पार्टी के पक्ष में नहीं गया। चुनाव के दौरान राष्ट्रपति के बेटे राजेन्द्र सिंह शेखावत से करोड़ रुपये मिलना भी पार्टी को विवादों के पचड़े में डाल गया। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने चुनाव में पूरी ताकत लगाई थी। उन पर विरोधी चुटकी भी ले रहे थे कि वे गली-कूचों की खाक छान रहे हैं। नतीजे यूपी चुनाव के दौरान आए हैं। लिहाजा पार्टी के लिए यह अतिरिक्त झटका है। हालांकि पार्टी ने इस बात से इंकार किया कि चुनाव नतीजों का असर यूपी चुनाव में पड़ेगा। पार्टी ने कहा कि राहुल गांधी के प्रयासों और यूपी के चुनाव पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। प्रभारी मोहन प्रकाश ने कहा कि यह विधानसभा चुनाव नहीं था। स्थानीय निकाय का चुनाव था जहां परिणाम स्थानीय कारणों पर निर्भर करता है।
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Sunday, 27 November 2011
शरद पवार को थप्पड़ आखिर क्यों पड़ा?
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 27th November 2011
अनिल नरेन्द्र
बृहस्पतिवार को नई दिल्ली के एनडीएमसी सेंटर में इफ्को के एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि आए केंद्रीय कृषि मंत्री ने कभी अन्दाजा नहीं लगाया होगा कि उस दिन उनसे क्या घटना घटेगी। कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए पवार जब बाहर की तरफ बढ़े तभी एक सिख युवक ने आगे बढ़कर उनके मुंह पर तमाचा मार दिया। पवार को समझ नहीं आया कि क्या हुआ। वह चुपचाप आगे बढ़ गए। मंत्री के स्टाफ की धक्का-मुक्की से नाराज युवक ने अपनी कृपाण निकाल ली। विरोधस्वरूप अपने हाथ पर वार भी किया। एनडीएमसी के गार्डों ने युवक को बड़ी मुश्किल से काबू कर पुलिस को सौंपा। हमलावर युवक का नाम हरविन्दर सिंह है और वह दिल्ली के विजय विहार में रहता है। वह नारा लगा रहा था, `वह भ्रष्ट हैं।' मैं यहां मंत्री को थप्पड़ मारने ही आया था। वे सभी भ्रष्ट हैं। उसने आगे कहा कि आज गुरु तेग बहादुर की शहादत का दिन है। हालात और भी बुरे हो सकते थे। मैंने ही रोहिणी कोर्ट में सुखराम को भी मारा था। मैं सिख हूं, चप्पल नहीं मारूंगा। सिर्प भाषण देते हो। भगत सिंह को भूल गए जिसने कुर्बानी दी। मारो-मारो मुझे खूब मारो। पागल...हूं मैं। इनके पास घोटालों के अलावा कुछ नहीं है। मैं गलत नहीं हूं।शरद पवार पर तमाचे की गूंज ने दिल्ली की सियासत को हिला दिया है। विपक्ष ने इस घटना की निन्दा तो की है, लेकिन इसे महंगाई से उपजा गुस्सा करार देकर सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। वहीं कांग्रेस ने इस घटना के लिए भाजपा नेता यशवंत सिन्हा के गैर जिम्मेदाराना बयान पर निशाना साधा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पवार से बातचीत कर पूरे घटनाक्रम की निन्दा की। कांग्रेस के संसदीय कार्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि यशवंत सिन्हा के बयान, महंगाई नहीं रुकी तो हिंसा होगी, वापस होना चाहिए। ऐसी धारणा बनाना गलत है। वहीं भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने कहा कि यह शख्स मेरे बयान से पहले ही सुखराम को भी थप्पड़ मार चुका है। ऐसे में इसे मुझसे जोड़ा जाना ठीक नहीं है। भाजपा की ही सुषमा स्वराज की टिप्पणी थी, भाजपा इसकी निन्दा करती है। अहिंसक तरीके से जताया जाना चाहिए अपना मतभेद। पवार उम्र के कारण आदर योग्य हैं। वहीं सबसे दिलचस्प टिप्पणी अन्ना हजारे की थी। अन्ना हजारे ने पवार पर हमले की सूचना मिलने पर पहली प्रतिक्रिया के तौर पर पूछा, `केवल एक थप्पड़?' बाद में उन्होंने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि पवार को थप्पड़ पड़ा लोकतंत्र को तमाचा है। जनता में इस घटना की क्या प्रतिक्रिया हुई, कुछ टिप्पणियां प्रस्तुत हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को पड़ा थप्पड़ किसी नेता या मंत्री पर नहीं बल्कि इनके द्वारा बनाई गई उस व्यवस्था पर है जिससे आम लोगों का पूरा बजट गड़बड़ा गया है। वह आम आदमी क्या करे, जिसकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया हो। दिल्ली वालों ने इसी तरह की प्रतिक्रिया दी। `महंगाई घरों की किचन के साथ लोगों के सपनों पर भी हमला कर रही है। एक इंसान अपने बच्चे को पढ़ाकर कुछ बनाने के सपने देखने से पहले यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि उसके लिए पैसे कैसे बचाए' कोटला की एक महिला की प्रतिक्रिया थी। मयूर विहार की एक कामकाजी महिला ने कहा कि यह थप्पड़ एक आदमी का नहीं, पूरे देश की जनता का है। देश के नेताओं और मंत्रियों को यह समझ जाना चाहिए कि जनता अपने तरीके से जवाब देना सीख रही है। उसे पांच साल तक बहला-फुसलाकर बेवकूफ नहीं बना सकते हैं। कोटला फिरोजशाह की एक महिला का कहना था कि परेशानी है तभी तो लोग ऐसा करने को मजबूर हो रहे हैं। मंत्री दफ्तर में बैठकर जो नीति तैयार करते हैं, वह आम आदमी की कमर तोड़ने वाली होती है। ऐसे में लोग क्या करें? उनके पास कोई विकल्प नहीं है। सेवा नगर में एक सियासी कार्यकर्ता का कहना था कि परेशानी अपनी जगह है, लेकिन हर जगह थप्पड़ मारना ठीक नहीं है। सबक सिखाना है तो चुनाव में सिखाएं। लेकिन लोग भी क्या करें जब उनके प्रतिनिधि उम्मीद पर खरे नहीं उतरते तो वह तनाव में आ जाते हैं और यही तनाव थप्पड़ के रूप में दूर होता है। एक व्यवसायी की टिप्पणी थी, `सरकार जब सो रही हो तो उसे जगाने के लिए इससे बेहतर तरीका और कुछ नहीं हो सकता।' सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता आरके शर्मा का मानना है कि लोगों का गुस्सा जायज है। मंत्री, नेता और उनके रिश्तेदार करोड़ों-अरबों में खेल रहे हैं और आम आदमी भरपेट खाने से पहले भी सोचता है। यह स्थिति खतरनाक है और देश के नीति-निर्धारकों को अब गम्भीरता से जनता के दुःख-दर्द के बारे में सोचना ही होगा। मैक्स अस्पताल के मनोचिकित्सक डाक्टर समीर पारिख का कहना है कि अपने आक्रोश को निकालने का यह तरीका काफी कैट कहा जा सकता है, जब लोग दूसरे की नकल करते हुए किसी पर हमला करते हैं और उसे चोट पहुंचाते हैं तो वह चीप पब्लिसिटी के भूखे होते हैं। हमला करने वाला पहले की घटना से कहीं न कहीं प्रेरित होता है और उसे लगता है कि उसे भी लोगों का आकर्षण मिल सकता है।
शरद पवार पर हुए हमले से सियासी पारा भी तेज होगा। पवार की पार्टी राकांपा अन्दरखाते कांग्रेस से बेहद नाराज है। उसे लग रहा है कि जिस तरह से कांग्रेस ने पवार को महंगाई का प्रतीक बनाया, उसकी वजह से हालात यहां तक पहुंचे। यद्यपि तुरन्त कांग्रेस के नेता पवार के बचाव में जरूर उतरे, लेकिन राकांपा इस घटना से बेहद व्यथित है। भारी उद्योग मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि बड़े नेताओं की सुरक्षा पर संसद में चर्चा होनी चाहिए। पवार पर हमले के बाद महाराष्ट्र में कुछ इलाकों में पार्टी कार्यकर्ताओं के उग्र रवैये पर पटेल ने संयम रखने की अपील की। मामले के पीछे भाजपा का हाथ होने का खुद पवार ने ही काट किया। उन्होंने कहा, मुझे नहीं लगता कि इसमें किसी राजनीतिक दल का हाथ है। इस बारे में पार्टी इसलिए भी नाराज है कि कांग्रेस लगातार महंगाई के मसले पर शरद पवार को ही आगे करती रही है। बेशक भ्रष्टाचार और महंगाई से देश त्रस्त है और भारी गुस्से में है लेकिन इसका समाधान यह नहीं है कि हम चारों तरफ आग लगाना शुरू कर दें और जो सामने आए टूट पड़ें। इससे समाधान तो क्या निकलेगा, हां चारों ओर अराजकता जरूर फैल जाएगी। वहीं राजनीतिज्ञों को भी समझ लेना चाहिए कि पब्लिक का मूड क्या है। हमारे सामने मध्य पूर्व का उदाहरण है जहां एक छोटी-सी चिंगारी ने देश में आग लगा दी थी। सियासतदानों को इस किस्से से डरना चाहिए और सबक लेना चाहिए।
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सरकार के नक्सल विरोधी अभियान में महत्वपूर्ण उपलब्धि
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 27th November 2011
अनिल नरेन्द्र
सरकार को अपने एंटी-नक्सली आपरेशंस में एक शानदार सफलता मिली है। सीपीआई (माओवादी) की मिलिट्री यूनिट के मुखिया और पोलित ब्यूरो सदस्य कोटेश्वर राव उर्प किशन जी को सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में मार गिराया है। सुरक्षा बलों के हाथों मुठभेड़ में मौत की गृह मंत्रालय द्वारा पुष्टि के साथ ही भारत में `नक्सल आंदोलन' का एक अध्याय खत्म हो गया। सीआरपीएफ की नक्सल विरोधी कमांडो बटालियन 207 कोबरा के जवानों ने किशन जी को मौत के घाट उतारा है। मूल रूप से आंध्र प्रदेश का रहने वाला कोटेश्वर राव उर्प किशन जी लम्बे समय से नक्सल आंदोलन से जुड़ा था। पिछले तीन साल से उसने पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र सरकार की नाक में दम कर रखा था। सूत्रों के अनुसार किशन जी ने दो नक्सली माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी और पीपुल्स वॉर ग्रुप के आपस में विलय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। करीब छह साल पहले हुए इस विलय के कारण नक्सलियों की ताकत काफी बढ़ गई थी। किशन जी के दोनों नेपाल के माओवादियों और उनके जरिये चीन से भी सम्पर्प में था। करीमगंज जिले के नाफपल्ली गांव से नक्सलवाद का सफर शुरू करने वाला किशन जी गुरिल्ला युद्ध में माहिर था। उसने सम्भाल रखी थी बंगाल से महाराष्ट्र तक की कमान। उसका मुख्य उद्देश्य था पश्चिमी मदिनापुर, बाकुड़ा व पुरुलिया बेल्ट को झारखंड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ से जोड़ना। किशन जी की मौत के बाद नक्सली हिंसा से ग्रसित राज्यों, बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ व आंध्र प्रदेश में शुक्रवार को हाई अलर्ट घोषित किया गया है। नक्सली हमले की आशंका को देखते हुए यह हाई अलर्ट घोषित किया गया है। छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त महानिदेशक राम निवास ने बताया कि नक्सली बदले की कार्रवाई कर सकते हैं। पुलिस को डर है कि नक्सली थाना व 40,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले नक्सल प्रभावित बस्तर इलाके में आम लोगों को निशाना बना सकते हैं। बस्तर के आंतरिक इलाकों में नक्सलियों की समानांतर सरकार चलती है। किशन जी की मौत से नक्सली-माओवादी समस्या तो खत्म नहीं होगी पर यह जरूर है कि यह इनके लिए एक बहुत बड़ा झटका है जिससे उन्हें उभरने में वक्त जरूर लगेगा। सरकार की नक्सल विरोधी कार्रवाई में यह एक शानदार उपलब्धि जरूर है।Andhra Pradesh, Anil Narendra, Chhattis Garh, China, Daily Pratap, Kishanji, Maharashtra, Naxalite, Nepal, Odisa, Vir Arjun, West Bengal
Friday, 1 July 2011
इन रेव पार्टियों ने तो तबाही मचा रखी है
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 1st July 2011
अनिल रेन्द्र
पिछले दिनों रायगढ़ जिले में एक होटल में हो रही रेव पाटा पर छापा मारते हुए वहां से मुंबईं मादक पदार्थ निरोधख शाखा के एक इंस्पैक्टर समेत पांच लोगों को गिरफ्तार किया। रायगढ़ पुलिस अधीक्षक आरडी शिंदे ने बताया कि रेव पाटा के संबंध में मुंबईं की मादक पदार्थ निरोधक शाखा के इंस्पैक्टर अनिल जाधव समेत पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पाटा में युवाओं को मादक पदार्थ दिए जा रहे थे। जिले के खालापुर में रविवार रात हुईं इस पाटा में जाने-माने परिवारों की 59 लड़कियों समेत लगभग 290 युवा शामिल हुए। सभी को चिकित्सकीय जांच के बाद जाने दिया गया। रिपोर्ट आने के बाद पुलिस उन लोगों पर कार्रवाईं शुरू करेगी जिन्होंने मादक पदार्थ लिए थे। पुलिस ने रविवार देर रात खालापुर के होटल माऊंट व्यू में हो रही इस पाटा में छापा मारकर यहां से गांजा, चरस और कोकीन के अलावा 3.08 लाख रुपये नकद बरामद किए थे। पिछले दिनों गुजरात में भी एक ऐसी रेव पाटा को पुलिस ने पकड़ा था। दोनों जगह एक बात मुख्य है। शराब, कॉल गल्र्स और बेसुध होकर नाचते, शराब और ड्रग्स लेते हुए युवाओं को पकड़ा गया। और यही आलम होता है लगभग हर रेव पाटा में। इन दोनों पाटा में अन्तर था तो बस यही कि एक गुजरात की पाटा में गिरफ्तार अभियुक्तों का संबंध राज्य के प्रातिष्ठित लोगों से है इसलिए उनके नाम उजागर नहीं हुए जबकि मुंबईं की पाटा में पकड़े गए अधिकतर लोग युवा हैं और उम्र की ऐसी दहलीज पर हैं जहां पैर फिसलने की पूरी सम्भावनाएं होती हैं। वुल मिलाकर, हर उम्र, हर दज्रे, हर तबके के लोग इसके शिकार हो रहे हैं। मुझे कोईं आार्यं नहीं होगा अगर जल्दी ही यह सुनने को मिले कि पिता एक रेव पाटा में पकड़ा गया, बीवी दूसरी में और बेटा-बेटी तीसरी रेव पाटा में पकड़े गए। हम बेवजह ही कहते हैं कि देश में नौकरियों की कमी है। देखिए कितनी नौकरियां बिखरी पड़ी हैं। एक तरफ तो गरीबी के कारण लोग आत्महत्या करने पर मजबूर हैं, दूसरी ओर यह लोग लाखों रुपये इन रेव पार्टियों में शराब, ड्रग्स में उड़ा रहे हैं। देश में बेशक भुखमरी हो पर ऐसी पार्टियों को देखकर लगता है कि युवा पीढ़ी को तो खाने की कमी नहीं, वे तो पीकर ही, नशा करके ही काम चला रहे हैं। रेव पाटा ऐसे अय्याश लोगों का जमावड़ा जो शराब पीने, खुले बदन नाचने और ड्रग्स को ही जिन्दगी मानने लगे हैं उनसे तो बात करना भी बेकार है। क्योंकि वह छूटते ही कह देंगे कि आप पुराने दकियानूसी बातें क्यों कर रहे हैं। वैसे भी पािमी संस्वृति का इतना प्राभाव आज के युवाओं पर आ गया है कि वह माता-पिता की हर बात का विरोध करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। वैसे ऐसे माता-पिता की भी कमी नहीं जिन्हें खुद सोशलाइजिंग से पुर्सत नहीं, उन्हें इसकी परवाह नहीं कि उनके बच्चे कर क्या रहे हैं, कहां जा रहे हैं, कब आ रहे हैं। सभी खुद की जिन्दगी अपने अंदाज में जीना चाहते हैं। बड़े-बूढ़ों की इज्जत करने के दिन लद गए।
सोशलाइजिंग की खातिर आज मध्यवगाय लड़कियों को जिनके लिए अपना स्टेटस मेनटेन करना अपनी इज्जत मेनटेन करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि ऐसी पार्टियों में अपनी हदें तोड़ना उतना ही आसान है जितनी आसानी से वो अपने मांबाप का विश्वास तोड़ देते हैं। इन्हें न तो अपने पापा का जन्मदिन याद रहेगा, न मांबाप की शादी की सालगिरह। इन्हें कहां, कब रेव पाटा हो रही है, यह जरूर याद रहेगा। आजकल पेसबुक आ गया है। उसमें बन्दे-बन्दी की सब डिटेल्स मिल जाती है और एक दूसरे से फोन पर सम्पर्व करने में कोईं दिक्कत नहीं होती। इन्हीं कम्युनिटी साइटों से फोन नम्बर एक्सचेंज होते हैं। वैन्यू डिसाइड होते हैं और लोग आपस में मिलने के लिए युवा बरकरार होते हैं। हम बेकार ही कहते हैं कि लोगों के पास समय नहीं, एक दूसरे के लिए या लोग अब सोशल नहीं रहे पर इन रेव पार्टियों को देखकर लगता है कि युवा तो पहले से कहीं ज्यादा सोशल हो गए हैं।
अब वह समाज के पुराने उसूलों को तोड़कर अपना नया रास्ता ढूंढने में लगे हुए हैं। देह व्यापार के बढ़ने का एक कारण यह भी है कि इन रेव पार्टियों में इतना प्री सेक्स मिलता है कि उसके बाद सेक्स का चस्का लग जाता है।
ज्वाइंट पैमिली सिस्टम का टूटना कईं मामलों में घातक साबित हो रहा है।
पहले घर के बड़े-बूढ़े जो कहते थे बच्चों को मानना पड़ता था और अनुशासन के दायरे में रहना पड़ता था। बच्चों को बड़े-बूढ़े अच्छे संस्कार देते थे, उन पर कड़ी नजर रखते थे पर अब यह सब समाप्त होता जा रहा है। पैसों की लालच ने, यह पािमी संस्वृति ने यह सब तोड़ दिया है और मुझे तो डर यह लगता है कि ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब समाज का विघटन चरम पर होगा। शादी, रिश्ते, सामाजिकता जैसी बातें सिर्प किस्से-कहानियां बनकर रह जाएंगी। वेश्यावृत्ति, नशाखोरी और बढ़ता अपराध आम बात हो जाएगी।
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Saturday, 25 June 2011
टीम अन्ना को अंत में दोबारा आंदोलन करने का ही विकल्प रहेगा
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Published on 25th June 2011
अनिल नरेन्द्र
मनमोहन सिंह सरकार गांधीवादी अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की हवा निकालने और उसे फेल करने के लिए सभी हथकंडे अपनाने लगी है। साम, दाम, दण्ड, भेद सभी तरीके अपनाए जा रहे हैं। आजकल दोनों सरकार और कांग्रेस पार्टी के मुख्य वक्ता बने दिग्विजय सिंह कहते हैं कि अन्ना हजारे ने अगर अनशन किया तो उनका हश्र भी बाबा रामदेव की तरह होगा यानि कि उनके आंदोलन को हर हाल में कुचला जाएगा। बुधवार को दिग्विजय सिंह ने कहा कि हजारे के खिलाफ भी वैसे ही सलूक हो सकता है जैसा रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के साथ हुआ। हालांकि यह मौके की नजाकत पर निर्भर करेगा। नए-नए खुलासों और बयानों को लेकर अपनी तुलना विकीलीक्स से किए जाने पर उन्होंने कहा कि विकीलीक्स तो लाजवाब है ही, लेकिन `दिग्गीलीक्स' उससे भी ज्यादा जबरदस्त हैं। पत्रकारों से बातचीत करते हुए दिग्गीलीक्स ने कहा कि अन्ना तो बुजुर्ग नेता हैं और उनके समर्थक उन्हें `चने के झाड़' पर चढ़ाकर अनशन पर बिठा देते हैं जबकि उम्र को देखते हुए उनका अनशन पर बैठना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार की जवाबदेही अन्ना और उनकी टीम के प्रति नहीं जनता के प्रति है। देश में संसदीय प्रणाली सर्वोच्च है और उसी की प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।अन्ना ने दिग्गीलीक्स को उन्हीं की भाषा में जवाब दिया है। लोकपाल बिल के मसौदे पर रजामंदी की कोशिशें विफल होने के बाद अन्ना हजारे ने बुधवार को कहा कि भ्रष्टाचार पर नेताओं और अफसरों की सांठगांठ पाकिस्तान से भी बड़ा खतरा है। उन्होंने 16 अगस्त से फिर अनशन करने के फैसले को दोहराते हुए कहा कि सरकार और उनकी एजेंसियां उनके आंदोलन को कमजोर करने की कोशिशों में जुट गई है। इसलिए सरकार की ओर से जन लोकपाल के बारे में तरह-तरह के भ्रामक बयान दिए जा रहे हैं। अप्रैल में जन्तर-मन्तर पर पांच दिन और 8 जून को राजघाट पर अनशन देखने के बाद सरकार समझ गई है कि 16 अगस्त से शुरू होने वाला आंदोलन पहले की तुलना में ज्यादा बड़ा होगा। इसलिए तरह-तरह से जनता को गुमराह करने में सरकार जुटी है। अन्ना ने कहा कि 16 अगस्त से दोबारा अनशन शुरू करने से पहले वे देश के अलग-अलग हिस्सों में सघन जागरुकता यात्रा पर जाना चाहते हैं। लेकिन इस कार्यक्रम में उन्हें दिक्कत आ रही है, क्योंकि आने वाले दिनों में उन्हें कई बार अदालतों के चक्कर लगाने होंगे। अगले महीने से पहले से उनके खिलाफ महाराष्ट्र के कुछ नेताओं द्वारा दाखिल किए मुकदमों की तारीखों में पेश होना होगा। उन्होंने कहा कि ये मामले सिर्प मुझे परेशान करने के लिए दाखिल किए गए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने उन्हें परेशान करने के लिए उनके हिन्द स्वराज ट्रस्ट की जांच-पड़ताल शुरू कर दी है। ये सब मेरा ध्यान बंटाने व आंदोलन को कमजोर करने की कोशिशें ही हैं। अन्ना ने यह भी कहा कि वह गांधी जी के अनुयायी हैं। उन्हें सत्याग्रह से कोई नहीं रोक सकता। मैं तो फक्कड़ हूं, मुझे जेल में डाल दो, गोलियों से भून दो मैं पीछे हटने वाला नहीं।
ताजा स्थिति अब यह है कि सरकार ने तमाम राजनीतिक दलों पर सारी बात शिफ्ट कर दी है। लोकपाल बिल पर सरकार ने 3 जुलाई को सर्वदलीय बैठक बुलाई है। इस बैठक के बाद लोकपाल बिल का मसौदा कैबिनेट में जाएगा। वहां से मसौदा फाइनल होने पर इसे संसद के एक अगस्त को शुरू हो रहे मानसून सत्र में पेश कर दिया जाएगा। सरकार के सूत्रों ने बताया कि सर्वदलीय बैठक में सरकार की ओर से बनाए गए मसौदे के साथ हजारे पक्ष की तरफ से बनाया गया मसौदा भी रखा जाएगा। सरकार और अन्ना के बीच लोकपाल बिल पर पिछले दो महीनों में करीब 9 बैठकें हुई हैं। लेकिन आम सहमति नहीं बन पाई। सरकार के मसौदे से असहमत अन्ना हजारे ने 16 अगस्त से फिर अनशन पर जाने की घोषणा की है। अब देखें विपक्षी दलों की बैठक में कोई हल निकलता है। उनके सामने दो मसौदे होंगे। एक जो अन्ना हजारे टीम ने तैयार किया है और दूसरा सरकार ने। हमें नहीं लगता कि यूपीए सरकार अन्ना हजारे की मांगों को किसी हालत में भी स्वीकार करेगी। अन्ना के पास दोबारा आंदोलन करने के अलावा शायद ही कोई अन्य विकल्प रहे।
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नितिन गडकरी को धूल चटाने में जुटे उन्हीं के पार्टी के नेता
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Published on 25th June 2011
अनिल नरेन्द्र
एक हफ्ते के ड्रामे के बाद आखिर भाजपा नेता श्री गोपीनाथ मुंडे मान ही गए। कहा जा रहा है कि लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज से मिलने के बाद महाराष्ट्र में भाजपा के चेहरे और लोकसभा में पार्टी के उपनेता ने अपने तेवर नरम कर लिए। इसके साथ ही पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ मुंडे की बगावत से उपजे संकट के फिलहाल टलने का रास्ता साफ हो गया। एक बार फिर इससे साबित हो गया कि भाजपा जो एक समय अपने आपको पार्टीविद् व डिफरैंस कहती थी वह कितनी नीचे आ चुकी है और दूसरी पार्टियों की तरह बनकर रह गई है। गोपीनाथ मुंडे इतने महत्वपूर्ण नहीं जितना महत्वपूर्ण है पार्टी में अनुशासन। गोपीनाथ मुंडे ने क्या-क्या नहीं किया? उन्होंने खुलकर पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी को गाली दी। पहले शिवसेना में जाने का प्रयास किया, वहां से उनके लिए दरवाजा बन्द था, फिर कांग्रेस में घुसने की कोशिश की। मुंडे हैं तो प्रमोद महाजन के बहनोई, इसलिए सौदेबाजी में तो अपने आपको माहिर समझते हैं। कांग्रेस से उन्होंने आने की शर्त रखी। मुझे कैबिनेट का दर्जा चाहिए। रिपोर्टों के अनुसार वह सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल से और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण से भी मिले। कांग्रेस ने उलटा शर्त रख दी कि आप पहले भाजपा की टिकट पर बीड लोकसभा सीट से त्यागपत्र दें और बतौर कांग्रेस उम्मीदवार वार्ड इलैक्शन जीतें फिर आपको मंत्री बनाने की बात सोची जाएगी। गोपीनाथ मुंडे इसके लिए शायद तैयार नहीं थे। वह चाहते थे कि उन्हें पृथ्वीराज चव्हाण की खाली हुई पृथ्वीराज चव्हाण की राज्यसभा सीट दी जाए। जब कांग्रेस से लात पड़ी तो मुंह बचाने के लिए मुंडे ने वापस आने का रास्ता ढूंढना आरम्भ कर दिया। यहां सुषमा स्वराज काम आ गईं। चूंकि मुंडे ने नितिन गडकरी को खुली चुनौती दी थी इसलिए भाजपा के एक गुट का उन्हें गुप्त समर्थन मिल रहा था। यह गुट अध्यक्ष नितिन गडकरी को नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ता। भाजपा का आज हाई कमान क्या है? कौन है हाई कमान? कांग्रेस में तो सोनिया गांधी जो पार्टी अध्यक्ष हैं वही हैं हाई कमान। उनके फैसले को कोई नहीं टाल सकता। अच्छे अच्छों को आंखें दिखाने पर बाहर का रास्ता दिखाया गया है पर भाजपा में हिसाब उलटा ही है। अध्यक्ष को गाली निकालो और हीरो बनो। भाजपा को मजबूत करने में जुटे गडकरी को पार्टी के अन्दर ही एक गुट रोकना चाहता है ताकि वह पार्टी में अपनी पकड़ न बना पाएं। महाराष्ट्र की राजनीति में उलझाकर भाजपा की यह लॉबी गडकरी को कमजोर अध्यक्ष साबित करने में जुटी है जिससे वह बड़े फैसले न ले सकें। मुंडे ने भाजपा में बने रहने का शंखनाद नहीं किया बल्कि गडकरी के खिलाफ लड़ाई जारी रखने के लिए एक चाल चली है। भाजपा में यह लॉबी त्रस्त चल रही है। गडकरी के भाजपा में पुराने लोगों को लाना उन्हें रास नहीं आ रहा। गडकरी ने हाल ही में अपने कई इंटरव्यू में जो कड़ा संदेश दिया उससे भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेता परेशान हैं। गडकरी ने साफ कहा है कि वह पार्टी को मजबूत करने के लिए अपने एजेंडे पर कायम रहेंगे। इसका मतलब साफ है कि पुराने जमे लोगों को तकलीफ हो रही है। गडकरी के साथ संघ पूरी तरह खड़ा है। संघ चाहता है कि भाजपा की खोई हुई ऊर्जा वापस आए। गोपीनाथ मुंडे की लड़ाई मुद्दों पर नहीं है। दरअसल असल मुद्दा उनके लिए यह है कि उनसे जूनियर नितिन गडकरी दिसम्बर 2009 में अध्यक्ष बनने के बाद उनसे ऊपर कैसे पहुंच गए। वह आज भी अपने आपको गडकरी से ऊपर मानते हैं। वह खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। दुःखद यह है कि उस पार्टी के भीतर नेताओं के आपसी टकराव बढ़ रहे हैं, जो खुद को दूसरों से अलग बताती है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं को लेकर सुषमा स्वराज और अरुण जेटली की तकरार सुर्खियों में थी। ऐसा लगता है कि पार्टी अटल जी के सक्रिय राजनीति से अलग होने और आडवाणी जी के संरक्षण की भूमिका में आने के बाद से नेतृत्व संकट से जूझ रही है। असल में पांच-सात वर्ष पहले तक जो नेता दूसरी और तीसरी पंक्ति में थे, वे अब पहली पंक्ति में आ गए हैं और उनमें आगे बढ़ने की होड़ लग गई है। यह विडम्बना ही है कि ऐसे समय जब देश घोटालों के अभूतपूर्व दौर से गुजर रहा है, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार चरम पर है और केंद्र सरकार लोकप्रियता के सबसे निचले स्तर पर आ गई है, प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते भाजपा का इन सबसे लड़ने के लिए न तो कोई ठोस कार्यक्रम है और न ही सशक्त नेतृत्व। कल को जनता पूछ सकती है कि अगर जनता आपको विकल्प की तरह चुने तो आपका प्रधानमंत्री उम्मीदवार कौन होगा? आपका नेतृत्व क्या है? हमारी राय में तो श्री गोपीनाथ मुंडे को निकाल बाहर करना चाहिए था ताकि दूसरों को भी सबक मिले। अपने आपको पार्टीविद् डिफरैंस कहलाने वाली पार्टी से यह उम्मीद नहीं थी कि वह इस तरह के समझौते करती फिरेगी?Tags: Anil Narendra, BJP, Congress, Daily Pratap, Gopinath Munde, L K Advani, Maharashtra, Nitin Gadkari, Parmod Mahajan, Prithvi Raj Chavan, Sushma Swaraj, Vir Arjun
Thursday, 19 May 2011
कांग्रेस के पास मौका है कि पवार एण्ड कम्पनी को सही औकात दिखाए
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 19 May 2011
अनिल नरेन्द्र
अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान जिस तरह वाम मोर्चे का पश्चिम बंगाल में और तमिलनाडु में डीएमके का सफाया हुआ है, उससे एनसीपी सदमें की हालत में अगर है तो वह स्वाभाविक ही है। पार्टी कायकर्ताओं में अब यह चर्चा हो रही है कि द्रमुक की हार की प्रमुख वजह 2जी स्पेक्ट्रम भ्रष्टाचार घोटाला था तो एनसीपी नेता शरद पवार ढेरों मामलों में फंसे हुए हैं। आईपीएल, 2जी स्पेक्ट्रम, लवासा जैसे अनेक विवादित मामलों में जांच एजेंसियों के रॉडार पर चल रहे मराठा क्षत्रप शरद पवार को जनता कैसे बख्शेगी? अकेले पवार ही नहीं बल्कि प्रफुल्ल पटेल के भी विवादास्पद व्यक्तियों (बलवा, हसन अली) से संबंधों का पर्दाफाश हो चुका है। एयर इंडिया स्कैंडल भी सामने आ चुका है। एनसीपी अपने स्थापना दिवस 10 जून को मुंबई में दलितों का एक बड़ा सम्मेलन करने की तैयारी में लगी हुई है, लेकिन कांग्रेस-एनसीपी के खेमे से आरपीआई के उठावले गुट को अपनी तरफ खींच लेने वाले भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने उसके ठीक एक दिन पहले भ्रष्टाचार विरोधी सम्मेलन करने का ऐलान कर दिया है। महाराष्ट्र राज्य सरकारी बैंक के हजारों करोड़ के घपले में गले तक डूबी नजर आ रही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता यह नहीं समझ पा रहे कि पार्टी की स्थापना की 12वीं वर्षगांठ से पहले वे अपने कार्यकर्ताओं को क्या सन्देश दें? यहां तक कि इस सम्मेलन की तैयारी के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी को कार्यकर्ताओं की कमी का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के प्रदेश कार्यालय पर भी कार्यकर्ताओं की भीड़ लगातार कम होती जा रही है और जो लोग वहां दिख भी रहे हैं उनके चेहरे पर पांच राज्यों के विधानसभा परिणाम ने उदासी पोत दी है। पुणे से आए एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने बताया कि एनसीपी ने अगर अपनी छवि को दुरुस्त करने के लिए कोई बड़ा कदम जल्द नहीं उठाया तो विनायक देशमुख की देखादेखी एनसीपी के तमाम नेता इस साल के अन्त से शुरू हो रहे स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों से पहले कांग्रेस की तरफ दौड़ लगा सकते हैं।
कांग्रेस के लिए भी यह मौका अच्छा है कि शरद पवार से हमेशा के लिए निपट ले। शरद पवार की पार्टी एनसीपी के गठन के बाद यह पहला मौका है कि कांग्रेस ने उसके मर्मस्थल सहकारिता की शुगर लॉबी पर कठोर प्रहार किया है मगर पवार कांग्रेस को कोई करारा जवाब देने की बजाय उसकी चिरोरी करते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को छोड़कर अलग पार्टी बनाने वाले शरद पवार कांग्रेस के ही साथ मिलकर पिछले 12 साल से महाराष्ट्र की सत्ता और छह साल से केंद्र की सत्ता भोग रहे हैं। सहयोगी दल होने के बावजूद पवार अपनी आदत के अनुसार समय-समय पर कांग्रेस को अंगुली करते ही रहते हैं। कृषि मंत्रालय में उनकी नीतियों और चालबाजियों ने देश को विकराल महंगाई के कगार पर ला खड़ा किया है, लेकिन पवार ने यह बताने में कोई चूक नहीं की कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इसके लिए पूरे जिम्मेवार हैं। कांग्रेस को शरद पवार डुबा सकते हैं, उन्होंने पहले भी ऐसा ही किया था। यह मौका अच्छा है अगर कांग्रेस थोड़ी हिम्मत करे तो शरद पवार को सही औकात दिखला सकती है। कृषि मंत्रालय और प्रफुल्ल पटेल का मंत्रालय इस झटके में बदल दिया जाना चाहिए।
कांग्रेस के लिए भी यह मौका अच्छा है कि शरद पवार से हमेशा के लिए निपट ले। शरद पवार की पार्टी एनसीपी के गठन के बाद यह पहला मौका है कि कांग्रेस ने उसके मर्मस्थल सहकारिता की शुगर लॉबी पर कठोर प्रहार किया है मगर पवार कांग्रेस को कोई करारा जवाब देने की बजाय उसकी चिरोरी करते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को छोड़कर अलग पार्टी बनाने वाले शरद पवार कांग्रेस के ही साथ मिलकर पिछले 12 साल से महाराष्ट्र की सत्ता और छह साल से केंद्र की सत्ता भोग रहे हैं। सहयोगी दल होने के बावजूद पवार अपनी आदत के अनुसार समय-समय पर कांग्रेस को अंगुली करते ही रहते हैं। कृषि मंत्रालय में उनकी नीतियों और चालबाजियों ने देश को विकराल महंगाई के कगार पर ला खड़ा किया है, लेकिन पवार ने यह बताने में कोई चूक नहीं की कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इसके लिए पूरे जिम्मेवार हैं। कांग्रेस को शरद पवार डुबा सकते हैं, उन्होंने पहले भी ऐसा ही किया था। यह मौका अच्छा है अगर कांग्रेस थोड़ी हिम्मत करे तो शरद पवार को सही औकात दिखला सकती है। कृषि मंत्रालय और प्रफुल्ल पटेल का मंत्रालय इस झटके में बदल दिया जाना चाहिए।
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