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Tuesday, 19 March 2024

नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह को टिकट


नरेन्द्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में जब राजनाथ सिंह गृहमंत्री के बदले रक्षा मंत्री बने तो उनके सियासी भविष्य को लेकर अटकले तेज हो गई थीं। इसी तरह नितिन गडकरी को बीजेपी के संसदीय बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति से बाहर किया गया तो उनके सियासी भविष्य को लेकर भी कई तरह की बातें होने लगी थीं। शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री रहे हैं और विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भी उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया तो भी कई तरह के सवाल उठने लगे थे। लेकिन बीजेपी ने इन तीनों को 2024 के आम चुनाव में टिकट दिया है। इन तीनों दिग्गजों को बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में उतारा है लेकिन आने राले दिनों में सरकार और पार्टी में इनकी हैसियत क्या होगी यह अहम सवाल है। बीजेपी की पिछले दस सालों में पूरी तरह बदल गई है। नेतृत्व नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के हाथों में है। इस लिहाज से संगठन और सरकार में इन्हीं की टीम का दबदबा है। राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और शिवराज सिंह चौहान अटल-आडवाणी के नेतृत्व वाली बीजेपी से हैं। राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी खुद भी बीजेपी के अध्यक्ष रहे हैं। शिवराज सिंह चौहान को मध्य प्रदेश के विदिशा से नितिन गडकरी को नागपुर से और राजनाथ सिंह को लखनऊ से टिकट दिया गया है। बीजेपी की पहली सूची में नितिन गडकरी का नाम नहीं आने के बाद से यह कहा जाने लगा था कि उनका टिकट कट सकता है लेकिन बीजेपी ने उन्हें नागपुर से एक बार फिर मैदान में उतारा है। शिवराज सिंह चौहान को मध्य प्रदेश का सीएम नहीं बनाने के बाद से ही उन्हें केंद्र की राजनीति में भेजे जाने की बातें होने लगी थी। 2019 में सरकार बनने के कुछ समय बाद ही जून में राजनाथ सिंह को कई कमेटियों से बाहर कर दिया गया। लेकिन 24 घंटे के अंदर ही ये फैसला बदल गया। नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह के बारे में बातें कही जा रही थी कि इनका टिकट कट सकता है। लेकिन बीजेपी ने बताया कि वो अब भी इन नेताओं पर दांव खेल रही है। दरअसल बीजेपी इस बीच कुछ भी उथल-पुथल के मूड में नहीं है। उनकी भर कोशिश है कि किस तरह से वो अपनी जीत पक्की कर सकते हैं। बीजेपी किसी भी सीट पर कोई चांस नहीं लेना चाहती। नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह को टिकट मिलना इस बात का भी संकेत हैं कि पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं है। बीजेपी अंदर से थोड़ी घबराई हुई है कि वह अब की बार 400 पार तक पहुंच जाएगी। इसलिए बीजेपी अपने ही उस फार्मूले को लागू नहीं कर रही है कि 70 साल से ज्यादा को टिकट नहीं देना है। पार्टी दावा कर रही थी कि पुराने चेहरे बाहर और नए चेहरों को मौका दिया जाएगा। दरअसल बीजेपी हाईकमान सेफ प्ले करना चाहती है ताकि अधिक से अधिक सीटें हासिल कर सके। नए चेहरों पर इसलिए भी दांव नहीं खेला गया क्योंकि पता नहीं कि वो सीट निकाल पाएं या नहीं। इसलिए पुराने चेहरों पर ही दांव लगाया जाए। 2013 में जब राजनाथ सिंह पार्टी के अध्यक्ष थे तो उन्होंने ही नरेन्द्र मोदी के नाम की घोषणा पीएम उम्मीदवार के रूप में की थी। उन्हेंने तब एक इंटरव्यू में कहा था ये जरूरी नहीं है कि पार्टी अध्यक्ष लोगों को अपनी तरफ खींचने वाला ही हो और प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी हो। राजनाथ सिंह को भी गडकरी की तरह ही राजनीतिक विश्लेषक मोदी कैंप से बाहर मानते हैं। नितिन गडकरी को टिकट मिलने का एक अर्थ यह भी है कि बीजेपी अंदर खाते इस बात पर कांफीडेंट नहीं है कि अब की बार 400 पार। अंदर से पार्टी का विश्वास डगमगा रहा है।

-अनिल नरेन्द्र

Sunday, 27 May 2012

दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27 May 2012
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी भारी पड़ गए। पार्टी में संघ की नहीं चली और संजय जोशी को भाजपा कार्य समिति की बैठक से पहले बाहर का रास्ता दिखाना ही पड़ा। मोदी के दबाव में गडकरी और संघ नतमस्तक दिखे। पार्टी सूत्रों ने बताया कि मोदी ने साफ कहा कि अगर कार्य समिति में संजय जोशी आए तो बैठक से खुद को दूर रखने को मजबूर होंगे। गडकरी ने बुधवार शाम को फोन से बात की थी। गडकरी ने कोर कमेटी की बैठक में मोदी से बातचीत का सार रखा। सूत्रों के मुताबिक कुछ वरिष्ठ भाजपा नेता मोदी की धमकी को स्वीकार्य करने के इच्छुक नहीं थे मगर गडकरी और संघ के दबाव के चलते संजय जोशी को दो लाइन का इस्तीफा फैक्स से भेजना पड़ा। दरअसल मोदी और गडकरी में सौदे की सुगंध आ रही है। मोदी ने शर्त रखी कि जोशी को बाहर करो और गडकरी ने शर्त रखी कि मुझे दूसरा कार्यकाल देने का आप समर्थन करें। अब लगता है कि गडकरी के दूसरे कार्यकाल मिलने में सभी रुकावटें दूर हो गई हैं और उन्हें दूसरा कार्यकाल मिलना लगभग तय है। गडकरी का तीन साल का कार्यकाल 25 दिसम्बर को पूरा हो रहा है। इस प्रस्ताव के लिए बाकायदा संगठन के संविधान में संशोधन किया जाना प्रस्तावित था, जिसे अमली जामा पहनाया गया। पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने औपचारिक रूप से बैठक में अध्यक्ष के कार्यकाल को एक्सटेंशन दिए जाने का प्रस्ताव रखा जिसका दूसरे पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू ने अनुमोदन किया। इस सौदे का एक पहलू यह भी है कि केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य छत्रप के प्रभाव को स्वीकार कर लिया है। यह न तो भाजपा के लिए अच्छा संकेत है और न ही संघ के लिए। राष्ट्रीय पार्टी की छवि को लेकर जिस भाजपा को राष्ट्रवाद और अनुशासन के लिए जाना जाता था अब उस सिद्धांत पर पानी फिरता नजर आ रहा है। भाजपा का बौना होता नेतृत्व और उस पर हावी होते राज्य छत्रप संघ के लिए चुनौती बन गए हैं। राजस्थान में वसुंधरा राजे, गुजरात में नरेन्द्र मोदी और कर्नाटक में वीएस येदियुरप्पा से जो चुनौतियां मिल रही हैं वह भाजपा को कांग्रेस के विकल्प के रूप में उभरने से भी रोक रही है। भाजपा अध्यक्ष गडकरी के कार्यकाल को बढ़ाकर संघ भाजपा पर अपनी पकड़ जरूर साबित करना चाह रहा है लेकिन वह इकबाल और इस्तकबाल नहीं दिख रहा जो भाजपा में पहले होता था। भाजपा के इतिहास में यह पहला मौका है जब भाजपा को संघ की ओर से नियुक्त करवाए गए व्यक्ति को हटाना पड़ा है। इससे भी साबित होता है कि संघ की भाजपा पर पकड़ कमजोर होती जा रही है। हमें लगता है कि भाजपा के अन्दर भी ऐसे नेता हैं जो चाहते हैं कि संघ की भाजपा मामलों में दखलअंदाजी कम हो। पूरे प्रकरण में जहां नरेन्द्र मोदी की जीत हुई है वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक मायने में हार हुई है। इससे नरेन्द्र मोदी का कद और बढ़ेगा और दुनिया को उन्होंने साबित कर दिया कि दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए।
Anil Narendra, BJP, Daily Pratap, L K Advani, Narender Modi, Nitin Gadkari, RSS, Sushma Swaraj, Vir Arjun

Tuesday, 24 April 2012

भाजपा में सत्ता की तीन धुरियां

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24 April 2012
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी में नगर निगम चुनाव जीतने के बाद एक नया उत्साह है। उन्हें लगता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी बाजी मार सकती है पर सबसे बड़ी कमी जो उभर कर आ रही है वह है क्लीयर नेतृत्व का अभाव। यह किसी से छिपा नहीं कि पार्टी के एक बड़े धड़े खासकर सांसदों के मन में एक सवाल बार-बार कौंध रहा था कि आखिर यूपीए-2 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों के मुद्दे पर घिरी रही। लेकिन सरकार की विफलता का भाजपा को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। इसके चलते केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल को भुनाने के लिए पार्टी को लोकसभा चुनाव पूर्व अपना पीएम उम्मीदवार घोषित करने की दरकार है। इस समय यह स्थिति है कि भाजपा तीन धुरियों पर चल रही है। सबसे पहले हैं श्री नितिन गडकरी जो पार्टी अध्यक्ष हैं और उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन है। दूसरी तरफ हैं डी-4 नेता। इनमें आडवाणी जी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली प्रमुख हैं। तीसरी धुरी नरेन्द्र मोदी हैं जो अपने आपको पार्टी से ऊपर मानते हैं और प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार मानते हैं। इन तीनों धुरियों में सभी नेता अपनी-अपनी दिशा में चल रहे हैं। नितिन गडकरी के एक तरफ नरेन्द्र मोदी से मतभेद हैं वहीं दूसरी ओर 5-4 से अकसर खींचतान होती रहती है। ताजा उदाहरण सुरेन्द्र सिंह आहलूवालिया का पहले राज्यसभा से टिकट काटना और फिर जब डी-4 ने जोरदार विरोध किया तो उन्हें फिर से उम्मीदवार घोषित करना। कई माह से गडकरी और नरेन्द्र मोदी के बीच बातचीत तक नहीं हो रही है। संवादहीनता की इस स्थिति को गडकरी ने खुद स्वीकारा है। सवाल यह भी किया जा रहा है कि गडकरी ने मोदी से संवादहीनता की बात सार्वजनिक रूप से क्यों कही? यह बात किसी से छिपी नहीं कि नरेन्द्र मोदी भाजपा के पूर्व संगठन महासचिव संजय जोशी को पुन भाजपा में सक्रिय किए जाने के फैसले से नाराज हैं। गडकरी ने संजय जोशी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में खासा महत्व दिया। इसी के बाद दोनों में `कुट्टी' हो गई। रहा सवाल भाजपा की ओर से कौन होगा पीएम उम्मीदवार तो भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने गुरुवार को हैदराबाद में कहा कि अगले आम चुनाव से पहले पार्टी अपना प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित कर देगी। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले हम अपना उम्मीदवार घोषित करेंगे, अभी हम अपना उम्मीदवार बताने की स्थिति में नहीं हैं। उधर नरेन्द्र मोदी ने केंद्रीय राजनीति में आने के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। पिछले दिनों प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र के विरोध में सारे मुख्यमंत्री दिल्ली में एकत्र हुए थे। मोदी ने विशेष रूप से तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और बीजू जनता दल प्रमुख और उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के साथ बैठक की। हालांकि ऊपरी स्तर पर तो यह बैठक केंद्र सरकार के प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र को लेकर थी पर अन्दर खाते 2014 लोकसभा चुनावों पर भी चर्चा हुई होगी। मोदी ने अपने आपको पीएम उम्मीदवार दर्शाने की चालें चलनी शुरू कर दी हैं। आने वाले दिनों में यह अंतर्पलह और तेज होना स्वाभाविक है।
Anil Narendra, Arun Jaitli, BJP, Daily Pratap, Jayalalitha, L K Advani, Manmohan Singh, Narender Modi, NCTC, Nitin Gadkari, Sanjay Joshi, Sushma Swaraj, Tamil Nadu, UPA, Vir Arjun

Friday, 13 April 2012

क्या नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत उम्मीदवार हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13 April 2012
अनिल नरेन्द्र
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर सुर्खियों में हैं। देश के अन्दर तो उनकी इतनी चर्चा नहीं हो रही जितनी विदेशों में है। अमेरिका के प्रतिष्ठित समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट के स्तम्भकार सीमोन डेयनार ने एक रिपोर्ट में लिखा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी 2014 के आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद के सबसे सशक्त दावेदार होंगे। भारत में काफी लोग उन्हें रोल मॉडल के रूप में देखते हैं। कुछ लोगों की नजर में वह देश के सबसे योग्य नेता हैं। हालांकि एक बड़ा वर्ग आज भी उन्हें मुसलमानों के सामूहिक नरसंहार के लिए माफ नहीं कर पाया है। रिपोर्ट में लिखा है कि नरेन्द्र मोदी को भारत की राजनीति में सबसे जटिल व्यक्तित्व वाला राजनेता माना जा सकता है। मोदी की अगुवाई में गुजरात जैसे राज्य की अर्थव्यवस्था ने नई ऊंचाइयों को छुआ है। लेकिन मुख्यमंत्री की हिन्दू राष्ट्रवादी छवि से काफी लोगों को लगता है कि उनके नेतृत्व में कट्टर धार्मिक शक्तियों को बल मिलेगा। दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी जैसे नेता की अगुवाई में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पुरानी सैक्यूलर छवि को धक्का लग सकता है। नरेन्द्र मोदी को राज्य में भ्रष्टाचार खत्म करने के साथ आर्थिक और औद्योगिक विकास को नई गति देने का श्रेय जाता है। तेजी से आगे बढ़ती गुजरात की अर्थव्यवस्था में न सिर्प देशी कम्पनियां बल्कि बड़ी संख्या में विदेशी कम्पनियों ने भी गुजरात में निवेश किया है। मोदी के आलोचक भी उन्हें निजी तौर पर भ्रष्ट नहीं मानते। साल 2014 में होने वाले आम चुनाव के बाद भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार हो सकते हैं नरेन्द्र मोदी।
श्री नरेन्द्र मोदी की इस प्रकार की प्रोजेक्शन से जहां मुसलमान समुदाय परेशान है वहीं उनकी अपनी पार्टी के कुछ लोग भी खुश नहीं हैं। प्रवासी भारतीयों के बीच मोदी को मिल रहे व्यापक समर्थन के चलते संघ परिवार के भीतर भी समीकरण बदल रहे हैं। इसका कारण है कि संघ की प्रवासी भारतीयों में गहरी पैठ है। अमेरिका, चीन और जापान का उद्योग क्षेत्र मोदी के साथ व्यापारिक संबंधों को बेहतर बनाने में लगा है। हालांकि भाजपा और संघ का एक बड़ा वर्ग मोदी को किनारे लगाने में लगा है ताकि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में ताकतवर होकर न उभर पाएं। इसलिए संगठन स्तर पर मोदी की छवि खलनायक वाली बनाने की भी कोशिश हो रही है और कुछ हद तक मोदी खुद ऐसी छवि बनाने के लिए बारूद दे रहे हैं। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचार न करना और पिछले वर्ष दिल्ली में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में न आना मोदी की संगठन विरोधी गतिविधियों को दर्शाता है। बहुत से भाजपाइयों का कहना है कि मोदी अपने आपको पार्टी से ऊपर समझने लगे हैं। मोदी के दिमाग में अब गरूर आ गया है। दुनिया के 100 प्रभावशालियों के लिए कराए जा रहे टाइम्स पत्रिका के सर्वे में मोदी ने ओबामा और ब्लादिमीर पुतिन को पछाड़ दिया है। माना जा रहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भावी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो सकते हैं। लेकिन देश-विदेश में हो रहे सर्वेक्षणों में लोकप्रियता के हिसाब से नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी से पीछे हैं।
Anil Narendra, Daily Pratap, Modi, Narender Modi, Nitin Gadkari, Nitish Kumar, RSS, Vir Arjun

Monday, 9 April 2012

नितिन गडकरी को दूसरा टर्म मिलेगा या नहीं?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9 April 2012
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी को क्या एक टर्म और मिलेगा? यह प्रश्न आजकल भाजपा में चर्चा में है। श्री गडकरी पद्भार सम्भालते ही विवादों से घिरे रहे। ताजा स्थिति तो यह है कि भाजपा में व्यवसायीकरण का तड़का लगाने की कोशिश कर रहे पार्टी अध्यक्ष से पार्टी के शीर्ष नेताओं ने धीरे-धीरे दूरी बनानी शुरू कर दी है। दो दिन पहले भाजपा का 32वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में एक कार्यक्रम 11, अशोक रोड स्थित पार्टी मुख्यालय पर आयोजित किया गया था। इस समारोह में पार्टी के लगभग सभी वरिष्ठ पहले से तय कार्यक्रमों में व्यस्त होने के बहाने नदारद रहे। राजनाथ सिंह दिल्ली में मौजूद होने के बावजूद अपने आवास से चन्द कदम की दूरी के बावजूद पार्टी के कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। नितिन गडकरी के फैसले भाजपा में कलह का कारण बन रहे हैं। शीर्ष नेताओं के बीच दूरियां बढ़ रही हैं। सामूहिक नेतृत्व और फैसलों में भी सामूहिकता का दम भरने वाली भाजपा में शीर्ष नेता गलत फैसलों का ठीकरा खामोशी के साथ एक-दूसरे के सिर फोड़ खुद को पाक-साफ दिखाने में लगे हैं। पार्टी में टकराव का कारण बनें अंशुमान मिश्रा तो विदेश चले गए लेकिन भाजपा नेतृत्व में विभाजन करवा गए। मिश्रा के बोल भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को कांटों की तरह चुभ रहे हैं। पहले उत्तर प्रदेश के चुनावों में पार्टी का निराशाजनक प्रदर्शन और फिर राज्यसभा चुनाव में अंशुमान मिश्रा प्रकरण ने गडकरी के खिलाफ लामबंदी का माहौल तैयार कर दिया है। यूपी चुनाव में बाबू सिंह कुशवाहा को लेना, टिकटों का वितरण सहित कई अहम फैसले गडकरी ने अपने दम पर ही लिए थे। गडकरी को दूसरा कार्यकाल देने के संघ के फैसले को अमल में लाना भी काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। भाजपा विधान के तहत हर तीन पर राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक भी नहीं हो सकी। इसी तरह भाजपा के रणनीति पर चर्चा करने वाली सबसे बड़े फोरम राष्ट्रीय परिषद की पिछले साल कोई बैठक नहीं हो सकी। भाजपा अध्यक्ष का कार्यकाल इसी साल दिसम्बर में खत्म हो रहा है। कार्यकाल खत्म होने से पहले यह फैसला होना है कि नितिन गडकरी को एक और टर्म के लिए पार्टी अध्यक्ष चुना जाए या नहीं। पार्टी में कुछ नेताओं का मानना है कि गडकरी को सेवा विस्तार देने की बजाय तेज-तरार हिन्दूवादी छवि वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को अध्यक्ष बनाया जाए। पार्टी में मोदी समर्थकों के अनुसार अक्तूबर में हो रहे गुजरात विधानसभा चुनावों के बाद मोदी को राज्य की राजनीति से निकालकर उन्हें केंद्र की राजनीति में लाया जाना चाहिए। वैसे भी गडकरी का कार्यकाल दिसम्बर माह में खत्म हो रहा है जबकि गुजरात विधानसभा का कार्यकाल दिसम्बर माह में खत्म हो रहा है जबकि गुजरात विधानसभा चुनाव अक्तूबर में सम्पन्न हो जाएंगे। भाजपा के अनेक वरिष्ठ नेता गडकरी के नेतृत्व में 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ने को तैयार नहीं है। पार्टी के अन्दर गडकरी का जिस तरह विरोध हो रहा है उससे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी दोबारा सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा। भाजपा के संविधान में एक व्यक्ति को एक ही टर्म देने का नियम है जिसमें गडकरी को दूसरा टर्म बिना भाजपा के संविधान में संशोधन किए बगैर नहीं मिल सकता है और यह काम इतना आसान नहीं होगा। गडकरी को दूसरा टर्म मिलेगा या नहीं?
Anil Narendra, BJP, Daily Pratap, Nitin Gadkari, Vir Arjun

Sunday, 25 March 2012

Party may go to hell, Gadkari’s business is on the rise.

 Anil Narendra
Most of the leaders of Bhhartiya Janata Party do not agree with the style of functioning of BJP President Nitin Gadkari. Gadkari is considered to be a representative of the Rashtriya Swayamsewak Sangh, and he became BJP President with the support of the RSS. Gadkari is a businessman and he is running BJP like his own shop. The recent controversy is related to the distribution of Rajya Sabha tickets. There sharp arguments at the BJP Parliamentary Party meeting on Tuesday over the issue of setting aside the deserving Party candidate and giving ticket to a person  allegedly on the basis of money power. A number of MPs under the leadership of Yashwant Sinha criticized the Party leadership for not fielding an official candidate, but supporting a businessman, Anshuman Mishra. Sinha said that the Party MLAs should not be left at the mercy of 'the horse trading bazaar'. It causes the Party's discipline to break and blemishes its image. He said that in case the strategy was not changed in the present Rajya Sabha elections in Jharkhand, he would resign. Most of the MPs were displeased with SS Ahluwalia being denied Party ticket from Jharkhand. It is reported that the Sangh had vetoed on the name of Ahluwalia. MP from Himachal Pradesh, Shanta Kumar said that Ahluwalia is an influential leader of the Upper House and he must have been allowed one more term. Nawada MP Bhola Singh said that Party's self-consciousness had been shattered and it had prostrated before the money power. Maneka Ghandhi, an MP from Anwala appealed to the central leadership to end the Karnataka crisis and consider the demands made by Yediyurappa. Denial of Rajya Sabha ticket to Ahluwalia has fulfilled the wishes of the Congress and Mayawati. Ahluwalia have been cornering the government on all the issues, which had added to the problems of the government. Mayawati also wanted that Ahluwalia should not be allowed second term as an MP, as he would have to surrender his government house at 10 Gurudwara Rakab Ganj. Had Gadkari wanted, he would have sent Ahluwalia to the Rajya Sabha. He was short of his victory by just 11 votes. Under the circumstances, he could have made up this shortage with the help of JD(U), but in spite of his talking to Gadkari for this seat earlier, Gadkari with Sushil Modi left this seat for JD(U) and the Bihar JD(U) chairman, and Vashishtha Singh was fielded from this seat. The most delicate situation in the Party's Parliamentary Committee meeting was that of LK Advani, who sat as a silent spectator throughout the meeting. The impact of the rebellious mood of MPs was evident immediately after. It is being said that now the Party would not press its MLAs to vote for any independent candidate, but efforts are being made that the BJP MLAs boycott the election. As a Party President, Gadkari led the election campaign in a dictatorial manner. First, with the support oj RSS, Gadkari appointed a Pracharak and former Organisation Secretary of RSS, Sanjay Joshi, the in charge of UP electioneering campaign, despite strong opposition from the high statured leader and the Chief Minister of Gujarat, Narendra Modi. Secondly, despite opposition from all Party leaders, Gadkari enrolled ousted BSP leaders Babu Singh Kushwaha and Badshah Singh as members of the Party. All the experiments, excepting that of Uma Bharati in Bundelkhand failed miserably. In order to stop the polarization of votes, fire-brand leaders, Varun Gandhi and Aaditya Nath were confined to their constituencies, while on the other hand, the leader with recognized Hinduism face, Narendra Modi was invited for electioneering, but when he expressed his displeasure, no effort to placate him was made.
Despite all its efforts, the Party not only failed to stop polarization of Muslim votes, but it also lost its traditional votes in this effort, which resulted in Party's failure even to revisit its performance of 2007.
Whether it is Uttarakhand or Punjab, the BJP has been down-graded in both the States. The popularity graph of BJP has been sliding downward, from the day, Gadkari has taken over as the President of the Party, but Nitin Gadkari is least bothered about this. In fact, he has been running the Party like a shop, with the sole aim of minting money and he is doing this job efficiently. Gadkari's shop is running will, Party may go to dogs.

Friday, 23 March 2012

गडकरी की हट्टी फल-फूल रही है, पार्टी जाए भाड़ में

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23 March 2012
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी के काम करने के तौर-तरीकों से अधिकतर भाजपा नेता सहमत नहीं हैं। गडकरी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रतिनिधि माना जाता है, वह संघ के समर्थन से ही भाजपा अध्यक्ष बने। गडकरी एक बिजनेसमैन हैं जो भाजपा को अपनी निजी दुकान की तरह चला रहे हैं। ताजा बवाल राज्यसभा की टिकटों के बंटवारे को लेकर है। राज्यसभा चुनाव में पार्टी के सही उम्मीदवारों को दरकिनार करने और कथित रूप से पैसे के बल पर टिकट देने के मुद्दे पर मंगलवार को भाजपा संसदीय दल की बैठक में जमकर बवाल हुआ। यशवंत सिन्हा की अगुवाई में सांसदों ने झारखंड में पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार खड़ा न करके एक व्यवसायी अंशुमान मिश्रा को समर्थन देने को लेकर सीधे पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठा दिया। सिन्हा ने कहा कि पार्टी विधायकों को `हार्स ट्रेडिंग की मंडी' में नहीं छोड़ना चाहिए। इससे पार्टी का अनुशासन भंग होता है और इमेज खराब होती है। उन्होंने कहा कि यदि झारखंड में मौजूदा राज्यसभा चुनाव में रणनीति को नहीं बदला गया तो वह इस्तीफा दे देंगे। अधिकतर सांसद एसएस आहलूवालिया को दोबारा झारखंड से टिकट नहीं देने पर नाराज थे। बताते हैं कि आहलूवालिया पर संघ ने वीटो लगा दिया था। बैठक में हिमाचल से सांसद शांता कुमार ने कहा कि आहलूवालिया उच्च सदन में एक प्रभावी नेता हैं और उन्हें एक और कार्यकाल तो मिलना ही चाहिए था। नवादा के सांसद भोला सिंह ने कहा कि पार्टी की आत्म चेतना मर चुकी है और वह धन-बल के सामने नतमस्तक हो रही है। आंवला से सांसद मेनका गांधी ने केंद्रीय नेतृत्व से कर्नाटक के संकट को समाप्त करने और येदियुरप्पा की मांगों पर ध्यान देने की अपील की। आहलूवालिया को राज्यसभा का टिकट न मिलने से कांग्रेस और मायावती की मुराद पूरी हो गई है। आहलूवालिया यूपीए सरकार को तमाम मुद्दों पर सबसे ज्यादा घेरते रहे हैं, जिनके कारण सरकार कई बार परेशानी में पड़ी है। मायावती भी चाहती थीं कि आहलूवालिया का राज्यसभा से पत्ता साफ हो जाए ताकि सांसद न रहने पर उनको (आहलूवालिया) अपना सरकारी बंगला 10 गुरुद्वारा रकाबगंज खाली करना पड़े। गडकरी चाहते तो आहलूवालिया को भेज सकते थे। उन्हें जीतने के लिए बस 11 वोट की कमी पड़ रही थी। ऐसे वह जद (यू) से पूरा कर सकते थे लेकिन गडकरी और सुशील मोदी ने मिलकर वह सीट ही जद (यू) के लिए छोड़ दी जिस पर बिहार जद (यू) अध्यक्ष वशिष्ठ सिंह ने नामांकन कर दिया जबकि आहलूवालिया ने इस सीट पर गडकरी से पहले से ही बात कर रखी थी। संसदीय दल की बैठक में सबसे नाजुक स्थिति आडवाणी जी की थी। पूरी बैठक में वह एक मूकदर्शक बने रहे। सांसदों के बगावती तेवर का असर तुरन्त देखने को मिला। कहा जा रहा है कि झारखंड में अब पार्टी राज्यसभा चुनाव में अपने विधायकों को किसी निर्दलीय उम्मीदवार के वोट देने के लिए दबाव नहीं देगी बल्कि कोशिश हो रही है कि भाजपा विधायक चुनाव का ही बायकॉट करें। बतौर अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हिटलरी स्टाइल से चुनाव अभियान चलाया। सबसे पहले गडकरी ने संघ के समर्थन के बल पर पार्टी के कद्दावर नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोध के बावजूद संघ के प्रचारक रहे पूर्व संगठन मंत्री संजय जोशी को यूपी चुनाव प्रचार का इंचार्ज बना दिया। दूसरा गडकरी ने सभी पार्टी नेताओं के विरोध के बावजूद बसपा से निष्कासित बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह को पार्टी में शामिल किया। पार्टी ने बुंदेलखंड में जितने भी प्रयोग किए सिवाय उमा भारती के बाकी सब फेल हुए। मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण को रोकने के लिए अपने सभी फायर ब्रांड नेताओं वरुण गांधी, योगी आदित्यनाथ को जहां अपने क्षेत्र तक सीमित कर दिया वहीं दूसरी तरफ हिन्दुवादी चेहरा माने जाने वाले नरेन्द्र मोदी को न्यौता भेजा लेकिन जब उनकी नाराजगी जाहिर हुई तो उन्हें मनाने का कोई प्रयास नहीं किया। पार्टी के सभी प्रयासों के बाद भी पार्टी मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण तो न रोक सकी बल्कि अपने इस प्रयास में उसने अपने परम्परागत वोट भी गंवा दिए और इसका परिणाम यह हुआ कि पार्टी 2007 का भी प्रदर्शन न दोहरा सकी। चाहे मामला उत्तराखंड का रहा हो या पंजाब का, दोनों ही राज्यों में भाजपा की स्थिति गिरी है। गडकरी जबसे अध्यक्ष बने हैं भाजपा का ग्रॉफ गिरता ही जा रहा है पर इससे नितिन गडकरी को कोई फर्प नहीं पड़ता। वह तो पार्टी को बतौर हट्टी (दुकान) चला रहे हैं जिसका एकमात्र मकसद है पैसा बनाना और यह काम वह बाखूबी कर रहे हैं। गडकरी की हट्टी तो फल-फूल रही है, पार्टी जाए भाड़ में।
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Monday, 12 March 2012

Election results bring more pain than cheer for BJP

Anil Narendra
Assembly elections in all the five States have brought more pain than cheer for the Bharatiya Janata Party. The reason for cheer is the result of Goa Assembly, where BJP and Goa Gomantak Party combined has secured clear majority. BJP, for the first time has claimed majority on its own in this State with beautiful beaches. The real hero of this BJP victory is the former Chief Minister, Parrikar. He was leading the BJP election campaign in the State. I think that securing power with the support of minority is the biggest achievement of BJP. Goa Christians have proved that BJP is not a pariah. The party has won eight seats out of 17 from Christian majority areas. BJP itself fielded 6 Christian candidates and supported two independent candidates and all the eight won. The Party has received the biggest shock in UP. The election results in Uttar Pradesh have proved to be a big blow to Party's hopes of forming RJD government at the Centre in 2014. BJP was viewing its performance in UP Assembly elections as a cornerstone for its success in 2014 General Elections, but the Assembly results have dashed its hopes and it is now more concerned about the 2014 scenario. Once again, the UP is following the path shown by Tamil Nadu, where national parties have almost taken to backstage and their role has become almost irrelevant. In UP elections considered to be election touchstone for BJP and the RSS, all their experiments, on one hand, have been shattered one by one and on the other, a number of their warriors have been grounded. RSS and the Party President Nitin Gadakari had jointly taken up the challenging task of consoling the dissatisfied voters. First, Gadakari, with the support of the RSS, propped up the former RSS Pracharak and former Organiser, Sanjay Joshi in the UP elections, in spite of strong objections from the high-statured leader and Gujarat Chief Minister, Narendra Modi. Secondly, in spite of stiff opposition from all party leaders, Gadakari admitted the ousted BSP leaders Babu Singh Kushwaha and Badshah Singh in the Party. In view of increasing opposition, he suspended the membership of Babu Singh Kushwaha, but not only kept the other corrupt leader, Badshah Singh in the Party, but made him party candidate from the Mahoba seat. Except Uma Bharati, all the BJP experiments with Bundelkhand proved unsuccessful. He restricted firebrand leaders like Varun Gandhi and Yogi Adityanath to their constituencies to stop the polarization of Muslim votes, and no effort was made to placate Narendra Modi considered to the face of Hinduism, who was invited to join the BJP election campaign, but who was not happy with the situation. In spite of all efforts, Party not only failed to stop the polarization of Muslim votes, but instead it lost its traditional voters, resulting in its failure to re-enact the 2007 performance, but its performance this time was miserably poor. This is the first occasion after the demolition of disputed structure in Ayodhya on 6th December 1992 that the BJP candidate Lallu Singh lost to Tej Narayan Pandey alias Pawan Pandey of SP. Lallu Singh has been winning this seat since 1991. Candidates for UP were also decided by RSS, Gadkari and Joshi. They fielded such weak candidates, who not only brought disgrace to the Party, but it was ousted from the race and was relegated to the fourth place and most of its candidates were unable to save their deposits. One hundred twenty two such candidates were defeated who failed to secure their place even in the four-cornered fight. The BJP President Nitin Gadakari had made comprehensive preparations to effect change in UP. He did several new experiments instead of sticking to the traditional attitude and not only this, Gadakari & Co conducted a separate survey for selection of best candidates. In the situation emerging after the elections, it came fourth with 122 candidates and most of them had to fight to save their deposit. There were a number of candidates, who were struggling hard even to get 5,000 votes. In UP, the BJP has been put on margin and responsibility for such a debacle rests on RSS and leaders like Nitin Gadakari and Sanjay Joshi.

Saturday, 10 March 2012

भाजपा के लिए परिणाम ज्यादा गम और कम खुशी लेकर आए हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10 March 2012
अनिल नरेन्द्र
 भारतीय जनता पार्टी के लिए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव थोड़ी खुशी और ज्यादा गम लाए हैं। खुशी की वजह है गोवा परिणाम। गोवा में भाजपा और महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल गया है। भाजपा ने पहली बार खूबसूरत तटों वाले इस राज्य में 21 सीटें जीतकर अकेले अपने दमखम से बहुमत हासिल किया। गोवा में भाजपा की इस जीत के असल नायक पूर्व मुख्यमंत्री पार्रिकर हैं। चुनावी कमान उन्हीं के हाथों में थी। गोवा में मेरी राय में एक बहुत बड़ी उपलब्धि भाजपा की यह है कि उसने अल्पसंख्यकों के समर्थन से सत्ता पाई। गोवा के ईसाइयों ने यह साबित कर दिया कि भाजपा अछूती नहीं है। दक्षिण गोवा की 17 में से 8 सीटें पार्टी उन क्षेत्रों से जीते हैं जहां ईसाई बहुमत है। भाजपा ने खुद 6 ईसाई उम्मीदवार खड़े किए थे और 2 निर्दलीयों का समर्थन किया था। सभी आठों जीते। पार्टी को सबसे बड़ा झटका उत्तर प्रदेश में लगा है। उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम भाजपा को 2014 में केंद्र में राजग सरकार बनाने की उम्मीदों पर बड़ा झटका साबित हुए। भाजपा उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में रोपे गए बीज से केंद्र में 2014 के लोकसभा चुनावों में सफलता का अनुमान लगा रही थी, लेकिन परिणाम आए उससे निराशा और चिन्ता ही हाथ लगी है। उत्तर प्रदेश फिर एक बार तमिलनाडु की राह पर चला गया है जहां राष्ट्रीय दल की भूमिका अप्रासंगिक-सी हो गई है। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चुनावी प्रयोगशाला बने यूपी चुनावों में जहां एक-एक करके सभी प्रयोगों को धराशायी कर दिया वहीं पार्टी के कई दिग्गजों को धूल चटाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। रूठे मतदाताओं को मनाने का जिम्मा राष्ट्रीय स्वयं संघ और अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मिलकर उठाया। सबसे पहले गडकरी ने संघ के समर्थन की बदौलत पार्टी के कद्दावर नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोध के बावजूद संघ के प्रचार रहे पूर्व संगठन मंत्री संजय जोशी को यूपी के चुनावों में सक्रिय किया। दूसरा गडकरी ने सभी पार्टी नेताओ के विरोध के बावजूद बसपा से निष्कासित बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह को पार्टी में शामिल किया। बढ़ते विरोध के चलते कुशवाहा की सदस्यता को तो निलंबित कर दिया लेकिन भ्रष्टाचार के दूसरे आरोपी बादशाह सिंह को पार्टी में बनाए रखा बल्कि उनको महोबा से चुनाव मैदान में उतार दिया। पार्टी ने बुंदेलखंड को लेकर जितने भी प्रयोग किए सिवाय उसमें एकमात्र उमा भारती के अलावा कोई सफल नहीं हो सका। मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण को रोकने के लिए अपने सभी फायर ब्रांड नेताओं वरुण गांधी, योगी आदित्यनाथ को जहां अपने क्षेत्र तक सीमित कर दिया वहीं दूसरी तरफ हिन्दुवादी चेहरा माने जाने वाले नरेन्द्र मोदी को न्यौता तो भेजा लेकिन जब उनकी नाराजगी जाहिर हुई तो उन्हें मनाने का कोई प्रयास नहीं किया गया। पार्टी के सभी प्रयासों के बाद भी पार्टी मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण करने से तो न रोक सकी बल्कि वह अपने इस प्रयास में अपने परम्परागत मतदाताओं का भी वोट गंवा बैठे, जिसके चलते पार्टी 2007 के प्रदर्शन को दोहराना तो दूर रहा, उससे भी कम हो गई। अयोध्या में 6 दिसम्बर 1992 को विवादित ढांचे गिरने के बाद यह पहला मौका है जब भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी लल्लू सिंह सपा के तेज नारायण पांडे उर्प पवन पांडे से हार गया। लल्लू सिंह 1991 से लगातार यह सीट जीतते आ रहे थे। उत्तर प्रदेश के लिए उम्मीदवारों का चयन भी संघ, गडकरी और संजय जोशी ने किया। इन्होंने ऐसे फिसड्डी उम्मीदवार खड़े किए जिन्होंने न केवल पार्टी की भद्द पिटवाई बल्कि यह संघर्ष में न आकर चौथे स्थान पर रहे जहां भी ज्यादातर ने जमानत तक गंवा दी। 122 ऐसे प्रत्याशी हारे हैं जो चतुष्कोणीय लड़ाई में भी जगह नहीं बना सके। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने यूपी के अन्दर बदलाव के लिए लम्बी तैयारी की थी। पार्टी के अन्दर के पुराने परम्परावादी रवैये के बजाय कई नए प्रयोग किए और यही नहीं, गडकरी एण्ड कम्पनी ने अलग सर्वेक्षण कराया जिससे कि अव्वल प्रत्याशी चयन हो सके। चुनाव बाद जो स्थिति बनी है उसमें भाजपा के चौथे स्थान पर करीब 122 प्रत्याशी रहे जिनमें से ज्यादातर अपनी जमानत बचाने के लिए संघर्ष करते रहे। कई प्रत्याशी तो ऐसे थे जिनको 5000 वोट लाने के लाले पड़ गए। उत्तर प्रदेश में भाजपा हाशिये पर चली गई और इसके लिए जिम्मेदार हैं संघ, नितिन गडकरी और संजय जोशी सरीखे के नेता।
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Wednesday, 29 February 2012

बागी येदियुरप्पा बने गडकरी का सिरदर्द

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 29th February  2012
अनिल नरेन्द्र
कर्नाटक में भाजपा के सामने विकट स्थिति खड़ी हो गई है। अभी विधानसभा में तीन सांसदों का सदन के अन्दर अश्लील फिल्में देखने का मामला थमा नहीं कि पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने नया हंगामा खड़ा कर दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने अपनी पुनर्नियुक्ति किए जाने पर खुली बगावत कर दी है। उधर भाजपा अध्यक्ष नीतिन गडकरी ने उनकी धमकियों की परवाह न करते हुए साफ कह दिया है कि कर्नाटक में कोई संकट नहीं है और राज्य में मौजूदा मुख्यमंत्री डीवी सदानन्द गौड़ा को बदलने की सम्भावना से इंकार कर दिया है। हालांकि गडकरी ने खिन्न चल रहे येदियुरप्पा को यह कहकर संतुष्ट करने का प्रयास किया कि पार्टी उनका सम्मान करती है। गडकरी ने कहा कि सदानन्द गौड़ा फिलहाल सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। नेतृत्व में बदलाव का सवाल ही नहीं उठता। येदियुरप्पा ने अपनी शक्ति-प्रदर्शन के तहत विधायकों, विधान पार्षदों और सांसदों के लिए दोपहर भोज का आयोजन भी किया। सोमवार को येदियुरप्पा ने बेंगलुरु में पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर निशाना साधते हुए कहा कि पिछले साल जब उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए कहा था तब पार्टी आलाकमान ने छह माह में फिर उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था। पहले पार्टी नेतृत्व को 27 फरवरी तक खुद को मुख्यमंत्री बनाने का समय देने वाले येदियुरप्पा ने कहा, `मैं मुख्यमंत्री पद का आकांक्षी नहीं हूं। चूंकि केंद्रीय नेतृत्व ने मुझे छह माह बाद फिर मुख्यमंत्री पद पर बैठाने का वादा किया था इसलिए मैं अपनी कुर्सी पाने के लिए दिल्ली गया था।' येदियुरप्पा अपने 70वें जन्मदिन पर पिछड़ा वर्ग फोरम की ओर से आयोजित बैठक को सम्बोधित कर रहे थे। केंद्रीय नेतृत्व से नाराज पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि वह नेतृत्व परिवर्तन का मुद्दा सुलझाने के लिए दिल्ली में तीन मार्च को आयोजित भाजपा कोर कमेटी की बैठक में भाग नहीं लेंगे। उसकी जगह वह पूरे राज्य का दौरा करेंगे ताकि पार्टी मजबूत हो। खबर तो यह भी है कि कुछ कांग्रेसी नेता भाजपा को झटका देने के लिए बागी येदियुरप्पा को कांग्रेस में शामिल कराने की जोरदार पैरवी में लग गए हैं। कांग्रेस में आने की बातचीत भी येदियुरप्पा से की गई है। लेकिन 10 जनपथ ने कर्नाटक के अपने नेताओं को साफ सन्देश भेज दिया है कि भ्रष्टाचार के कीचड़ में सने येदियुरप्पा को किसी हालत में कांग्रेस में एंट्री नहीं दी जा सकती। सूत्रों के अनुसार एक पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं कर्नाटक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता येदियुरप्पा के सन्दर्भ में एक राजनीतिक प्रस्ताव लेकर आए थे। उन्होंने पार्टी के दो राष्ट्रीय महासचिवों को भी इसके लिए तैयार कर लिया था कि यदि येदियुरप्पा को कांग्रेस में लिया जाए तो राज्य में भाजपा हमेशा के लिए कमजोर हो जाएगी पर हाई कमान इसके लिए तैयार नहीं है। जो लोग प्रस्ताव की पैरवी कर रहे थे उन्हें डांट पड़ी है। उनसे कहा गया है कि अरबों रुपये के भ्रष्टाचार में शामिल येदियुरप्पा को कांग्रेस में ले लिया गया तो इससे राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के लिए गलत सन्देश जाएगा। भाजपा नेतृत्व के लिए कर्नाटक एक चुनौती बन गई है। दक्षिण भारत में एकमात्र भाजपा सरकार को बचाने के लिए पार्टी नेतृत्व को इस मामले को जल्द से जल्द सुलझाना पार्टी हित में ही होगा। सत्ता के भूखे येदियुरप्पा को कैसे कंट्रोल किया जाए, यह गडकरी के लिए एक चुनौती है।
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Monday, 20 February 2012

The Angry Young Man of Congress

- Anil Narendra
We have witnessed many faces of the Congress prince Rahul Gandhi during the Assembly election campaign in Uttar Pradesh. We have seen a mild mannered, calm and quite Rahul Gandhi, who had been sharing food with Dalit families and had been sensitive to their sufferings, but today we are witnessing a different bearded face of Rahul Gndhi dramatically tearing off documents on the stage. With the passage of time, the increasing anger of Rahul Gandhi has not only started surfacing, but his aggressive postures have become sharper. Now, he has even started publicly expressing his anger by tearing off papers on the stage. Perhaps he is trying to convey a message to the youth of UP that 'this uncomplaining attitude of yours will not help you, if you want to survive in the present age, make noise so that your voice could be heard'. It is this posture of his, which has earned the status of an angry young man for him in the Congress Party. Besides being 'the prince' of Congress, Rahul is also the only star campaigner for the Congress for the Assembly elections. In fact, this time whole of the Gandhi Family has thrown its weight in UP elections. Sonia Gandhi, Priyanka Gandhi and Robert Wadra, all the three have come out in the open. This is something unprecedented for the Gandhi Family. However, Congress is keeping its fingers crossed and waiting for the Rahul magic to work. That is why, with the completion of election-phases in UP, enthusiasm of the Congress is also increasing. The Congress has, even started claiming that elections in UP have now been restricted to Rahul vs others, that is why leaders of SP, BSP and BJP have started targeting Rahul Gandhi in their speeches. It appears that Prince Rahul has taken a vow to take the Congress to the seat of power in UP single-handedly and when he comes across obstacles on his way, he becomes angry. Meanwhile, he has also learnt the politics of cashing on this anger. So, whenever he exhibits aggressiveness, the audience applauds him. It happened during the election meeting at Lucknow, the other day. With slightly grown beard, Rahul Gandhi took mike in his hand at the election meeting at DAV College courtyard and started speaking like a Bollywood hero. Angry Rahul said that both the SP and BSP have been making empty promises in these years, which have made your condition bad to worse. I have in my hand a list of promises made by SP, which promises of electricity, roads, employment, if they come to power. If they fail to provide employment, they promise unemployment allowance at enhanced rate. This is the list, which the SP provided to the people during last elections. You need employment, not a list of promises. That is why I am tearing this list. Then, like a hero, he tore the paper in his hands into many pieces and threw it in the air. This action by Rahul has created a new controversy. BJP President, Nitin Gadkari said that by doing so, Rahul has exhibited his immaturity. It shows that he is still unaware of political nuances. Best comment came from SP President Akhilesh Yadav, who called Rahul's anger a drama and a stunt. Sometimes, he tears papers and sometimes he asks the audience to leave his meeting. I'm afraid; he may not jump off from the stage one day. What effect the anger of Rahul Gandhi will have, will be known only after the counting of the votes.

Sunday, 19 February 2012

कांग्रेस के नए एंग्री यंग मैन राहुल गांधी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th February  2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान हमने कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के कई रूप देख लिए हैं। कहां तो एक शांत-सौम्य चेहरा जो दलितों के घर रोटी-पानी खाकर उनके दर्द को समझने वाला शालीन स्वभाव का था और कहां वह अब दाढ़ी बढ़ाकर फिल्मी अन्दाज में मंच पर कागज फाड़ रहे हैं। वक्त की रफ्तार के साथ राहुल का गुस्सा थोड़ा और बढ़ने के साथ ही न सिर्प दिखने लगा है बल्कि उनके तेवरों की आक्रामकता भी बढ़ गई है। यहां तक कि अब वह मंच से ही कागज फाड़कर गुस्से का सार्वजनिक अहसास भी कराने लगे हैं। शायद वह यूपी के युवाओं को फलसफा देना चाहते हैंö`ये खामोश मिजाजी तुम्हें जीने नहीं देगी, इस दौर में जीना है तो कोहराम मचा दो।' इनके इसी तेवर पर कांग्रेस ने उन्हें `एंग्री यंग मैन' का तमगा पहना दिया है। राहुल कांग्रेस के `युवराज' तो हैं ही साथ-साथ वह कांग्रेस पार्टी के चुनावी अभियान के अकेले सुपर स्टार भी हैं। वैसे इस बार गांधी परिवार ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। श्रीमती सोनिया गांधी, राहुल, प्रियंका व रॉबर्ट वाड्रा सभी इस बार मैदान में आ गए। इतनी ताकत तो गांधी परिवार ने शायद ही पहले कभी झोंकी हो। खैर! कांग्रेस को राहुल के करिश्मे का इंतजार है। यही वजह है कि यूपी में जैसे-जैसे चरणों में चुनाव सम्पन्न हो रहा है, कांग्रेस का उत्साह भी बढ़ता जा रहा है। कांग्रेस तो अब दावा कर रही है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव अब केवल राहुल बनाम अन्य होकर रह गया है, इसलिए सपा, बसपा से लेकर भाजपा तक के नेता अपने भाषणों में केवल राहुल गांधी पर निशाना साध रहे हैं। लगता है कि राहुल बाबा ने तो सपना पाल लिया है कि इस चुनाव में कांग्रेस को अपने दम पर सिंहासन तक पहुंचाएंगे और ऐसे में जब उन्हें ज्यादा भव-बाधाएं दिखाई पड़ती हैं तो उन्हें गुस्सा आ जाता है। अब इस गुस्से को भुनाने की राजनीतिक कला भी उन्होंने सीख ली है। सो, अब वे जब एंग्री युवा लीडर के तेवर दिखाते हैं तो दर्शक खूब तालियां पीटते हैं। कुछ ऐसा ही उस दिन लखनऊ की एक चुनावी सभा में हुआ। डीएवी कॉलेज के प्रांगण में एक चुनावी सभा में, हल्की दाढ़ी उगाए राहुल गांधी ने माइक थामा। इसके बाद वे किसी बॉलीवुड नायक की तरह बोल पड़े। चेहरे पर गुस्से के भाव लेकर वे बोले कि सपा और बसपा ने सालों से केवल वादे किए हैं। हकीकत में कुछ नहीं किया। इसी के चलते आपके हाल बदतर हुए हैं। मेरे हाथ में सपा की चुनावी लिस्ट है। यही कि चुनाव जीते, तो सड़कें देंगे, बिजली देंगे, रोजगार देंगे। यदि रोजगार नहीं दे पाए तो बढ़ा हुआ बेरोजगारी भत्ता देंगे। यह वही लिस्ट है, जो पिछले चुनाव में भी सपा ने आम लोगों को दी थी। आम लोगों को काम चाहिए वादों की लिस्ट नहीं। ऐसे में सपा की यह लिस्ट फाड़ रहा हूं। यह कहकर उन्होंने हीरोगीरी के अन्दाज में हाथ में लिया कागज फाड़कर नीचे फेंक दिया। राहुल के इस एक्शन पर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा कि ऐसा करके राहुल ने अपना बचपना दिखाया है। लगता यही है कि उन्हें अभी राजनीति की समझ नहीं है। सबसे अच्छा कमेंट सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का था। अखिलेश ने कहा राहुल का गुस्सा नाटक है और स्टंट है। कभी पर्चा फाड़ते हैं तो कभी श्रोताओं को अपनी सभा से चले जाने को कहते हैं। कहीं ऐसा न हो कि किसी दिन वह मंच से ही कूद जाएं। राहुल गांधी के यह तेवर क्या रंग खिलाते हैं, इसका तो मतों की गिनती पर ही पता चलेगा।
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Friday, 10 February 2012

कर्नाटक विधानसभा में डर्टी पिक्चर का किस्सा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10th February  2012
अनिल नरेन्द्र
भाजपा शासित कर्नाटक सरकार ने एक बार फिर पार्टी की जमकर फजीहत करवा दी, वह भी ऐसे समय जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के वोट डलने शुरू हो गए हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की झंडाबरदार इस पार्टी को कर्नाटक के आला नेताओं ने खासा करारा झटका दे दिया है। सरकार के तीन मंत्री विधानसभा में नंगी लड़कियों की तस्वीरें यानि ब्लू फिल्म देखते पकड़े गए। एक स्थानीय टीवी चैनल ने अपने कैमरे में इन तीन मंत्रियों की करतूत पकड़ी। इससे जमकर हंगामा हुआ। उत्तर प्रदेश के चुनावों को देखते हुए पार्टी आला कमान ने बगैर देरी के तीनों के इस्तीफे मांग लिए जो मंजूर भी हो गए हैं। कर्नाटक विधानसभा में मंगलवार को जिस समय पाकिस्तानी झंडा फहराने पर बहस हो रही थी, ठीक उसी समय में मंत्रिगण अपने मोबाइल की क्लिपिंग देख रहे थे। यही नहीं, कुछ हॉट तस्वीरें देखकर यह एक-दूसरे से अश्लील इशारे भी कर रहे थे। यह सब हरकतें कैमरे में दर्ज हो गईं। स्थानीय चैनल ने इनमें से कुछ तस्वीरें प्रसारित भी कर दीं। शर्मसार कर देने वाली इस घटना के एक दिन पहले ही इस बात को लेकर बहस जारी थी कि सरकार ने मंगलौर के समुद्र तट पर `रेव पार्टी' की इजाजत कैसे दी? आरोप लगा था कि पर्यटन के बढ़ावे के नाम पर सरकार ने इस अश्लील `रेव पार्टी' की इजाजत दे दी। इस पार्टी में ड्रग्स व शराब का खुलकर इस्तेमाल किया गया। पार्टी में कई विदेशी लड़कियों ने अपने कपड़े उतारकर जश्न मनाया था। इसकी तस्वीरें भी एक चैनल के कैमरे में आ गई थीं। इसी बीच चाल-चरित्र और चेहरे की दुहाई देने वाली पार्टी के मंत्रियों ने विधानसभा परिसर में ही `डर्टी पिक्चर' देखकर एक नया रिकार्ड बनाया है। इस विवाद के चलते यूपी में पार्टी की छवि को धक्का लग सकता है। इस प्रकरण में शर्मसार भाजपा नेतृत्व ने पार्टी की छवि को हुए नुकसान कम करने हेतु सहकारिता मंत्री लक्ष्मण सावदी व महिला एवं बाल विकास मंत्री सीसी पाटिल को पद छोड़ने के लिए कहा जबकि विज्ञान एवं तकनीकी मंत्री कृष्णा पालेमार, दोनों मंत्रियों को कथित रूप से ब्लू फिल्म देने के लिए बर्खास्त कर दिया। इस साल एक जनवरी को बीजापुर जिले में पाकिस्तानी झंडा फहराने पर मंगलवार को बहस चल रही थी उसी समय सावदी और पाटिल मोबाइल पर अश्लील वीडियो फुटेज देख रहे थे। सूत्रों के अनुसार मंत्रियों के इस्तीफे लेने का दबाव मंगलवार रात में लाल कृष्ण आडवाणी ने बनाया था। इसके बाद पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने तीनों से इस्तीफे मांग लिए थे। आला कमान ने मुख्यमंत्री से कह दिया था कि आधी रात तक तीनों मंत्रियों के इस्तीफे नहीं आते तो इन्हें बर्खास्त कर दिया जाए। दिल्ली से आए इस फरमान के बाद ही तीनों ने आधी रात के बाद इस्तीफा भेजा था। वैसे कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने मीडिया से कहा कि मंत्रियों के इस्तीफे के बाद और चमत्कार हो जाएगा क्योंकि महज कुछ तस्वीरें देखने के लिए हमने अपने मंत्रियों को इतनी बड़ी सजा दे दी है। येदियुरप्पा की इस टिप्पणी को लेकर दिल्ली में भाजपा के कई बड़े नेता हैरान हैं। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा है कि वे अनैतिक आचरण करने वाले अपने किसी नेता को रियायत नहीं देने वाले जबकि कांग्रेस ऐसी हिम्मत नहीं दिखाती।
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Thursday, 26 January 2012

नितिन गडकरी की ताजा मिसाइल नरेन्द्र मोदी पीएम

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 26th January  2012
अनिल नरेन्द्र
अपने विवादास्पद बयानों के लिए मशहूर भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने फिर नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। एक टीवी चैनल को दिए एक प्रश्न के उत्तर में गडकरी ने कहा, `नरेन्द्र मोदी पार्टी अध्यक्ष बन सकते हैं, उनमें पीएम बनने की भी काबलियत है।' पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव इतने निकट हों और भाजपा अध्यक्ष ऐसा बयान दें? इससे पहले कुशवाहा प्रकरण में पार्टी को मुंह की खानी पड़ी थी। इससे पार्टी सम्भली नहीं कि नितिन जी ने नया तीर चला दिया। इस बयान से जहां भाजपा में खलबली मची वहीं कांग्रेस अपने ढंग से इसका मतलब, उद्देश्य निकाल रही है। कांग्रेस का मानना है कि नितिन गडकरी ने यह सोचा-समझा बयान दिया है जिसका मकसद यूपी में हिन्दू वोट बैंक को संगठित करना है। नरेन्द्र मोदी की छवि का फायदा उठाने की कोशिश है। यूपी को खास ध्यान में रखकर दिया गया है यह बयान। यूपी में राहुल गांधी के दौरों से उपर कास्ट वोट कांग्रेस की तरफ झुक हा है। मायावती का अपना गणित भी भाजपा के परम्परागत वोट बैंक को हिलाता लग रहा है। इसी को ध्यान में रखकर पहले उमा भारती को यूपी में आगे किया गया और अब नरेन्द्र मोदी की पीएम की बात उछाली गई। वहीं भाजपा के अन्दर इस बयान ने नई हलचल पैदा कर दी है। नितिन के इस बयान का पार्टी के अन्दर यह अर्थ निकाला जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी गडकरी और संघ की पीएम की पहली च्वाइस होंगे। लाल कृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली सरीखे के नेताओं से दूर हटकर गडकरी ने अब मोदी के साथ खड़े होने की कोशिश की है। कुशवाहा प्रकरण के बाद पार्टी विद ए डिफरेंस के दूसरे मतलब भी अब सामने आ रहे हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक एवं जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने नितिन गडकरी की राय का खुलकर विरोध किया है। जब यादव से पूछा गया कि इस बारे में आपका क्या कहना है तो उन्होंने फौरन कहाöअभी 2014 बहुत दूर है। आप लोग 2012 की बात कीजिए। जब यह बात सामने आएगी, तब हम देखेंगे। अपने अध्यक्ष के बयान पर भाजपा ने सोमवार को कहा कि यह एक विशिष्ट प्रश्न पर दिया गया विशिष्ट उत्तर था। पार्टी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि ऐसे मामलों पर पार्टी सामूहिक निर्णय करती है। इस बारे में दो राय नहीं है कि मोदी में भाजपा अध्यक्ष या प्रधानमंत्री बनने की पूरी क्षमता है। सारा देश और हम सभी यह बात मानते हैं। साथ ही उन्होंने कहा, लेकिन किसी को प्रधानमंत्री या पार्टी अध्यक्ष बनाना भाजपा में कोई पारिवारिक मामला नहीं है। कौन पार्टी अध्यक्ष होगा या प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनेगा, इसे पार्टी उचित समय पर तय करेगी। भाजपा और कांग्रेस में सबसे बड़ा फर्प यही है। कांग्रेस में नेतृत्व स्पष्ट है और जो फैसला सोनिया गांधी कर दें वह अंतिम होता है। भाजपा में तो दर्जनों नेता सुप्रीमो हैं। कोई एक-दूसरे की बात मानने को तैयार नहीं है। जिसके मुंह में जो आता है वह कह देता है। फिर अभी लोकसभा चुनाव दूर हैं। अभी से पीएम उम्मीदवार की बात छेड़ने से क्या फायदा होगा हमारी समझ से बाहर है। भाजपा का पहला उद्देश्य तो यूपी में अच्छा प्रदर्शन करने, पंजाब और उत्तराखंड में पुन सरकार बनाने का होना चाहिए। इन्हीं के परिणामों से एक संकेत मिलेगा कि पार्टी जनता की नजरों में खड़ी कहां है? घर बैठे-बैठे ख्याली पुलाव बनाने से शायद ही कोई फायदा हो?
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Saturday, 7 January 2012

भाजपा क्या ऐसे लाएगी उत्तर प्रदेश में राम राज्य?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th January  2012
अनिल नरेन्द्र
चुनाव के समय हर सियासी दल को अपने पांव पूंक-पूंक कर रखने चाहिए। उनके हर कदम को माइक्रोस्कोप से देखा जाएगा और उनके सियासी विरोधी हर गलती का खूब सियासी प्रचार करने का प्रयास करेंगे। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाले में फंसे मायावती के करीबी रहे पूर्व स्वास्थ्य मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा का भाजपा में शामिल होने से हंगामा हो गया है। कुशवाहा भाजपा की गले की हड्डी बन गए हैं। उत्तर प्रदेश चुनाव से ठीक पहले ऐसे विवादास्पद व्यक्ति को पार्टी में लेना जोखिम-भरा फैसला है। एक पखवाड़े पहले संसद में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सबसे ज्यादा मुखर रहने वाली भारतीय जनता पार्टी ने आरोपी बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल करने से भी परहेज नहीं किया। इसके इस आरोप में बेशक दम है कि कुशवाहा के भाजपा में आने के महज 24 घंटे के भीतर ही सीबीआई को उनके ठिकानों पर छापा मारने की सुध कैसे आई? मगर यह भी किसी से छिपा नहीं है कि खुद उसके वरिष्ठ नेता किरीट सोमैया ने मुख्यमंत्री मायावती और उनके परिजनों के साथ ही कुशवाहा के खिलाफ भ्रष्टाचार में लिप्त होने के गम्भीर आरोप लगाए थे। क्या पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी को यह पता नहीं था कि पूर्व परिवार कल्याण मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा पर घोटालों में शामिल होने के साथ ही दो पूर्व सीएमओ और एक पूर्व डिप्टी सीएमओ की हत्या के मामले में संलिप्त होने के आरोप हैं? कुशवाहा को शामिल करने पर पार्टी के अन्दर भी महाभारत छिड़ गया है। जहां भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी और भाजपा के पिछड़े वर्ग के नेता कुशवाहा के बचाव में खड़े हो गए हैं वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी और लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज सहित पार्टी के कई शीर्ष नेता इस फैसले से खुश नहीं हैं। इनके विरोध के चलते ही आखिरकार पार्टी को यह ऐलान करना पड़ा कि कुशवाहा को टिकट नहीं दिया जाएगा। अगर टिकट नहीं देना था तो आप फिर ऐसे दागी आदमी को पार्टी में लाए ही क्यों? जिस तरह दागी कुशवाहा की एंट्री पर हंगामा हुआ है उससे लगता है कि यूपी में थोक के भाव पार्टी में आने की कोशिश करने वालों की लिस्ट की छानबीन होगी और कई दागियों की एंट्री पर अब ब्रेक लग जाएगी। श्री आडवाणी और सुषमा के विरोध के बाद पार्टी के भीतर अब चुनाव के समय होने वाले पार्टी बदल के सिलसिले में पार्टी अलर्ट रहेगी। दागी लोगों से दूर रहना चाहिए। भाजपा को चाहिए कि वह इस बात का प्रचार भी करे कि बीएसपी और कांग्रेस का अंदरूनी गठजोड़ है और इसका पर्दाफाश करे। यह उजागर किया जाना चाहिए कि कैसे बीजेपी में आने के अगले ही दिन व्यक्ति के खिलाफ सीबीआई कार्रवाई कर रही है। यह कार्रवाई दोनों मायावती और कांग्रेस को शूट करती है। बेशक यह सही हो या न हो पर भाजपा के पास इस बात का क्या जवाब है कि 30 दिसम्बर को पार्टी के राष्ट्रीय सचिव किरीट सोमैया कई सौ पेज के कागजात का पुलिंदा कुशवाहा के खिलाफ सीबीआई को देकर आते हैं और उसके चार दिन बाद 3 जनवरी को कुशवाहा को नितिन गडकरी साहब पार्टी में आने की दावत दे देते हैं। दुःखद बात यह है कि कुशवाहा का मामला अकेला नहीं है। अपनी खोई हुई जमीन पुन हासिल करने के लिए भाजपा का नेतृत्व किसी भी हद तक जाने को तैयार है। कुशवाहा से पहले पूर्व मंत्री बादशाह सिंह, अवधेश कुमार वर्मा और ददन मिश्र जैसे पूर्व मंत्रियों को राजनीतिक पनाह दिया गया। मायावती ने जिस विवादास्पद मंत्री या नेता को पार्टी और सरकार से बाहर निकाला, भाजपा ने उसे गले लगा लिया। अपने चाल-चरित्र, चेहरे और स्वस्थ छवि के मामले में दूसरों से सर्वथा अलग और श्रेष्ठ होने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी यूपी में इतना गिर गई है कि उसने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी तक को पीछे छोड़ दिया है। इन दोनों पार्टियों ने भ्रष्टाचार के आरोपों में पार्टी या मंत्रिमंडल से बर्खास्त किए गए मंत्रियों को अपना टिकट देने से साफ इंकार कर दिया था मगर भाजपा ने अपने दिल्ली मुख्यालय में इन दागियों का खुले दिल से स्वागत किया और तब तो हद ही हो गई जब भाजपा के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि गंदे नाले भी गंगा में मिलने के बाद गंगा हो जाते हैं। हाल तक यही नकवी मायावती और उनके मंत्रियों को अली बाबा और 40 चोर बता रहे थे। जाहिर है कि दागियों को पार्टी में शामिल करने का फैसला भाजपा अध्यक्ष और आला नेताओं की सहमति से ही हुआ होगा। इसलिए यह और भी खतरनाक है, ऐसी प्रवृत्ति रखने वालों को पार्टी में शामिल करके भाजपा उत्तर प्रदेश में कैसा राम राज्य लाना चाहती है।
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Friday, 21 October 2011

क्या नरेन्द्र मोदी पार्टी से ऊपर हो चुके हैं?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21st October 2011
अनिल नरेन्द्र
पिछले कुछ समय से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी भाजपा के बीच समीकरण ठीक नहीं लग रहा। भाजपा में मोदी को लेकर दोनों रोष और अलगाव की भावना पैदा हो रही है। भाजपा के नेतृत्व का मानना है कि नरेन्द्र मोदी को अब अहंकार हो गया है और वह अपने आपको पार्टी से ऊपर मानने लगे हैं। पार्टी ने मोदी को उनकी हैसियत का अहसास करवाना शुरू कर दिया है। लाल कृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा पर आंखें दिखाने वाले नरेन्द्र मोदी को इस यात्रा में बिल्कुल अनदेखा कर दिया है। वह कहीं भी नजर नहीं आ रहे और अब अखबारों में उनकी सुर्खियां भी कम देखने को मिल रही हैं। आडवाणी जी ने अपनी यात्रा में भाजपा के और तमाम मुख्यमंत्रियों के कामकाज, उपलब्धियों का जिक्र किया है पर उन्होंने अभी तक एक भी बड़ी सभा में नरेन्द्र मोदी का नाम नहीं लिया। यही आडवाणी पहले नरेन्द्र मोदी को एक आदर्श मुख्यमंत्री पेश करते थकते नहीं थे। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि मोदी का राजनीतिक कद काफी बड़ा हो चुका है। उन्हें यह अहसास कराने की जरूरत है कि पार्टी उनकी वजह से नहीं बल्कि वे पार्टी की वजह से हैं। इसके तहत इस मुद्दे पर अब विचार किया जा रहा है कि अगले साल में शुरू होने वाले उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों में विधानसभा चुनावों में मोदी को प्रचार के लिए न बुलाया जाए। पार्टी को लगता है कि अपनी कट्टरवादी हिन्दुत्व की छवि के कारण अगर मोदी प्रचार करते हैं तो तमाम मुसलमान बिखर जाएंगे और भाजपा का मोदी की वजह से विरोध करना शुरू कर देंगे। भाजपा को यह मालूम है कि एक भी मुसलमान वोट उसे मिलने वाला नहीं पर वह यह भी नहीं चाहती कि बिना वजह मुसलमान पार्टी के खिलाफ आक्रामक रुख अपना लें। पार्टी उत्तर प्रदेश में पिछड़े व अतिपिछड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ने के लिए नीतीश कुमार की मदद लेना बेहतर विकल्प समझने लगी है। नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी के कट्टर विरोधी माने जाते हैं। यह महज इत्तेफाक नहीं कि श्री आडवाणी ने अपनी जनचेतना यात्रा को बिहार से शुरू किया और इस यात्रा को हरी झंडी नीतीश ने दिखाई। बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने मोदी को प्रदेश में न भेजने की चेतावनी दी थी, भाजपा ने इस पर अमल किया और नतीजे सबके सामने हैं। आज नीतीश कुमार एनडीए के सबसे सशक्त उम्मीदवार बनकर उभरे हैं। भाजपा को भी सूट करता है कि वह एनडीए को आगे बढ़ाए और इस रास्ते से वह सत्ता तक पहुंचे। मोदी का कद छोटा करने के लिए भाजाप नेतृत्व और संघ ने मिलकर जानबूझ कर संजय जोशी को जिम्मेदारी सौंपी है। नरेन्द्र मोदी संजय जोशी को बेहद नापसंद करते हैं। उन्हें संगठन मंत्री पद से हटवाने में उनकी बहुत अहम भूमिका रही। वैसे तो लाल कृष्ण आडवाणी भी संजय जोशी को पसंद नहीं करते क्योंकि जिन्ना प्रकरण में संजय जोशी ने ही आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने को कहा था। आमतौर पर अध्यक्ष अपना इस्तीफा उपाध्यक्ष को देता है पर आडवाणी ने अपना इस्तीफा संजय जोशी को भेजा था।
श्री नरेन्द्र मोदी की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। वह अपने घर में ही घिरते जा रहे हैं। गुजरात दंगों के मामले में नरेन्द्र मोदी को फंसाने के लिए झूठे साक्ष्य गढ़ने वाले निलम्बित और फिर गिरफ्तार किए गए आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को सोमवार एक स्थानीय अदालत ने तमाम विरोध के बावजूद जमानत दे दी। अदालत ने उस प्रकरण पर तार्किक संदेह व्यक्त किया जिसके तहत भट्ट को गिरफ्तार किया गया था। रिहा होते ही भट्ट ने मोदी पर हमला बोल दिया। भट्ट ने मोदी को अपराधी बताते हुए कहा कि मेरे लिए मोदी सिर्प एक अपराधी हैं जो मुख्यमंत्री बन गए हैं। मोदी और उनके लोग खुद को बचाने के लिए मेरी हत्या तक करवा सकते हैं। जैसा कि हरेन पांड्या का कराया गया। यह निश्चित है कि कांग्रेस जो संजीव भट्ट को उकसा रही है इनका जमानत पर छूटने और बाहर आने का पूरा-पूरा लाभ उठाएगी। हैरानगी तो इस बात की भी है कि गुजरात के तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने संजीव भट्ट का खुला समर्थन कर दिया है। 30 सितम्बर को भट्ट की गिरफ्तारी के बाद यह पहली बार है जब अधिकारी भट्ट परिवार से मिलने उसके घर गया और संजीव की पत्नी श्वेता भट्ट से मुलाकात की। यह मुलाकात करीब दो घंटे चली। श्वेता ने बताया कि तीनों अधिकारियों ने संजीव के साथ हो रहे घटनाक्रम पर खेद व्यक्त किया और मदद का आश्वासन दिया। आने वाले दिनों में लगता है कि नरेन्द्र मोदी की समस्याएं बढ़ने ही वाली हैं, घटने वाली नहीं।
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Sunday, 2 October 2011

आडवाणी और नरेन्द्र मोदी में टकराव बढ़ रहा है



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2nd October 2011
अनिल नरेन्द्र 
मनमोहन सिंह की कैबिनेट में अंतर्विरोध और टकराव का आरोप लगाने वाली भाजपा खुद भी ऐसी ही स्थिति में घिरी हुई है। भारतीय जनता पार्टी की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आरम्भ हो गई है। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के आग्रह के बावजूद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित कर्नाटक और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा और रमेश पोखरियाल निशंक बैठक में शामिल नहीं हुए। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने हालांकि यह कहा था कि पार्टी कोशिश कर रही है कि मोदी बैठक में शामिल हों। कुछ ही लोग शायद इस तर्प को मानेंगे कि मोदी नवरात्र के व्रत रख रहे हैं इसलिए बैठक में नहीं आए। असल कारण कुछ और ही है। 8 सितम्बर को पार्टी के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने अचानक देशव्यापी रथ यात्रा निकालने का ऐलान कर दिया था। इससे भाजपा नेतृत्व भी हतप्रभ रह गया था। इस ऐलान के साथ ही ये कयास लगने लगे कि आडवाणी की इस रथ यात्रा का उद्देश्य एक बार फिर पीएम इन वेटिंग का संदेश देना है। संघ ने 2009 के चुनाव में हार के बाद श्री आडवाणी को पीछे करके नम्बर दो के नेताओं को आगे करने की योजना बनाई। इसमें नरेन्द्र मोदी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और खुद नितिन गडकरी शामिल थे पर आडवाणी की अचानक रथ यात्रा की घोषणा ने यह समीकरण बिगाड़ दिए। आडवाणी की यात्रा का सबसे ज्यादा झटका गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लगा। लम्बे समय तक उनकी पहचान आडवाणी के खास सिपहसालार के रूप में रही है। लेकिन अब मोदी बड़े उस्ताद बन गए हैं। कुछ मायनों में वह अपने आपको पार्टी से ऊपर समझने लगे हैं। भाजपा सूत्रों के अनुसार भाजपा में प्रधानमंत्री पद के इन दो भावी दावेदारों मोदी और आडवाणी के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। आडवाणी की प्रस्तावित रथ यात्रा मोदी को रास नहीं आ रही है। इसी के चलते उन्होंने भी आडवाणी की तर्ज पर पिछले दिनों अहमदाबाद में एक बड़ा राजनीतिक शो कर डाला था। राज्यपाल के खिलाफ हाल ही में गुजरात में आयोजित मोदी की रैली में आडवाणी समेत किसी भी बड़े नेता ने हिस्सा नहीं लिया था। अहमदाबाद में मोदी उपवास का जिस तरह प्रचार किया गया उससे पार्टी का शीर्ष नेतृत्व खुश नहीं है। उनका मानना है कि मोदी खुद को भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश कर रहे हैं। उधर संघ ने आडवाणी पर दबाव डाला कि वह यह स्पष्ट कर दें कि उनकी यात्रा से उनकी प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी से कुछ लेना-देना नहीं है। संघ के नागपुर स्थित मुख्यालय में नेतृत्व से मुलाकात के बाद श्री आडवाणी ने घोषणा की कि वह प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर यह रथ यात्रा नहीं कर रहे। सबसे पहले नरेन्द्र मोदी ने ही उनकी यात्रा का विरोध किया था। सूत्रों के मुताबिक जब आडवाणी ने उनसे इस यात्रा के बारे में बात की तो मोदी ने अपनी आदत के मुताबिक उनसे दो टूक पूछ लिया कि इससे क्या फायदा? आप हासिल क्या करना चाहते हैं? इतना ही नहीं, मोदी ने गुजरात से यात्रा शुरू करने में मदद करने में अपनी असमर्थता तक जता दी। आखिरकार श्री आडवाणी ने अपनी रथ यात्रा बिहार से शुरू करने का फैसला किया। इसके पीछे एक और उद्देश्य भी नजर आता है। शायद आडवाणी जी एनडीए की तर्ज की राजनीति को बढ़ावा देना चाहते हैं। पहले भी उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ करके उसी लाइन पर चलने का प्रयास किया था जिस पर अटल जी चलते थे। आडवाणी की कोशिश है कि वह एनडीए की तर्ज पर फिर केंद्र में सरकार बनाएं और उसका नेतृत्व करें। इस उद्देश्य का न तो संघ समर्थन करेगा और न ही मोदी सरीखे नेता जिनकी पहचान हिन्दुत्व नेता की है। श्री आडवाणी की प्रस्तावित रथ यात्रा को लेकर जो विवाद आरम्भ हुआ है, यह थमने वाला नहीं। भाजपा नेतृत्व में इस समय जबरदस्त महत्वाकांक्षाओं का टकराव है और इसे इस रथ यात्रा ने फोकस में लाकर खड़ा कर दिया है। उधर कांग्रेस नेतृत्व में घमासान हो रहा है, रही-सही कसर भाजपा की अंतर्पलह ने पूरी कर दी है।
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Saturday, 25 June 2011

नितिन गडकरी को धूल चटाने में जुटे उन्हीं के पार्टी के नेता


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25th June 2011
अनिल नरेन्द्र
एक हफ्ते के ड्रामे के बाद आखिर भाजपा नेता श्री गोपीनाथ मुंडे मान ही गए। कहा जा रहा है कि लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज से मिलने के बाद महाराष्ट्र में भाजपा के चेहरे और लोकसभा में पार्टी के उपनेता ने अपने तेवर नरम कर लिए। इसके साथ ही पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ मुंडे की बगावत से उपजे संकट के फिलहाल टलने का रास्ता साफ हो गया। एक बार फिर इससे साबित हो गया कि भाजपा जो एक समय अपने आपको पार्टीविद् व डिफरैंस कहती थी वह कितनी नीचे आ चुकी है और दूसरी पार्टियों की तरह बनकर रह गई है। गोपीनाथ मुंडे इतने महत्वपूर्ण नहीं जितना महत्वपूर्ण है पार्टी में अनुशासन। गोपीनाथ मुंडे ने क्या-क्या नहीं किया? उन्होंने खुलकर पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी को गाली दी। पहले शिवसेना में जाने का प्रयास किया, वहां से उनके लिए दरवाजा बन्द था, फिर कांग्रेस में घुसने की कोशिश की। मुंडे हैं तो प्रमोद महाजन के बहनोई, इसलिए सौदेबाजी में तो अपने आपको माहिर समझते हैं। कांग्रेस से उन्होंने आने की शर्त रखी। मुझे कैबिनेट का दर्जा चाहिए। रिपोर्टों के अनुसार वह सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल से और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण से भी मिले। कांग्रेस ने उलटा शर्त रख दी कि आप पहले भाजपा की टिकट पर बीड लोकसभा सीट से त्यागपत्र दें और बतौर कांग्रेस उम्मीदवार वार्ड इलैक्शन जीतें फिर आपको मंत्री बनाने की बात सोची जाएगी। गोपीनाथ मुंडे इसके लिए शायद तैयार नहीं थे। वह चाहते थे कि उन्हें पृथ्वीराज चव्हाण की खाली हुई पृथ्वीराज चव्हाण की राज्यसभा सीट दी जाए। जब कांग्रेस से लात पड़ी तो मुंह बचाने के लिए मुंडे ने वापस आने का रास्ता ढूंढना आरम्भ कर दिया। यहां सुषमा स्वराज काम आ गईं। चूंकि मुंडे ने नितिन गडकरी को खुली चुनौती दी थी इसलिए भाजपा के एक गुट का उन्हें गुप्त समर्थन मिल रहा था। यह गुट अध्यक्ष नितिन गडकरी को नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ता। भाजपा का आज हाई कमान क्या है? कौन है हाई कमान? कांग्रेस में तो सोनिया गांधी जो पार्टी अध्यक्ष हैं वही हैं हाई कमान। उनके फैसले को कोई नहीं टाल सकता। अच्छे अच्छों को आंखें दिखाने पर बाहर का रास्ता दिखाया गया है पर भाजपा में हिसाब उलटा ही है। अध्यक्ष को गाली निकालो और हीरो बनो। भाजपा को मजबूत करने में जुटे गडकरी को पार्टी के अन्दर ही एक गुट रोकना चाहता है ताकि वह पार्टी में अपनी पकड़ न बना पाएं। महाराष्ट्र की राजनीति में उलझाकर भाजपा की यह लॉबी गडकरी को कमजोर अध्यक्ष साबित करने में जुटी है जिससे वह बड़े फैसले न ले सकें। मुंडे ने भाजपा में बने रहने का शंखनाद नहीं किया बल्कि गडकरी के खिलाफ लड़ाई जारी रखने के लिए एक चाल चली है। भाजपा में यह लॉबी त्रस्त चल रही है। गडकरी के भाजपा में पुराने लोगों को लाना उन्हें रास नहीं आ रहा। गडकरी ने हाल ही में अपने कई इंटरव्यू में जो कड़ा संदेश दिया उससे भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेता परेशान हैं। गडकरी ने साफ कहा है कि वह पार्टी को मजबूत करने के लिए अपने एजेंडे पर कायम रहेंगे। इसका मतलब साफ है कि पुराने जमे लोगों को तकलीफ हो रही है। गडकरी के साथ संघ पूरी तरह खड़ा है। संघ चाहता है कि भाजपा की खोई हुई ऊर्जा वापस आए। गोपीनाथ मुंडे की लड़ाई मुद्दों पर नहीं है। दरअसल असल मुद्दा उनके लिए यह है कि उनसे जूनियर नितिन गडकरी दिसम्बर 2009 में अध्यक्ष बनने के बाद उनसे ऊपर कैसे पहुंच गए। वह आज भी अपने आपको गडकरी से ऊपर मानते हैं। वह खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। दुःखद यह है कि उस पार्टी के भीतर नेताओं के आपसी टकराव बढ़ रहे हैं, जो खुद को दूसरों से अलग बताती है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं को लेकर सुषमा स्वराज और अरुण जेटली की तकरार सुर्खियों में थी। ऐसा लगता है कि पार्टी अटल जी के सक्रिय राजनीति से अलग होने और आडवाणी जी के संरक्षण की भूमिका में आने के बाद से नेतृत्व संकट से जूझ रही है। असल में पांच-सात वर्ष पहले तक जो नेता दूसरी और तीसरी पंक्ति में थे, वे अब पहली पंक्ति में आ गए हैं और उनमें आगे बढ़ने की होड़ लग गई है। यह विडम्बना ही है कि ऐसे समय जब देश घोटालों के अभूतपूर्व दौर से गुजर रहा है, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार चरम पर है और केंद्र सरकार लोकप्रियता के सबसे निचले स्तर पर आ गई है, प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते भाजपा का इन सबसे लड़ने के लिए न तो कोई ठोस कार्यक्रम है और न ही सशक्त नेतृत्व। कल को जनता पूछ सकती है कि अगर जनता आपको विकल्प की तरह चुने तो आपका प्रधानमंत्री उम्मीदवार कौन होगा? आपका नेतृत्व क्या है? हमारी राय में तो श्री गोपीनाथ मुंडे को निकाल बाहर करना चाहिए था ताकि दूसरों को भी सबक मिले। अपने आपको पार्टीविद् डिफरैंस कहलाने वाली पार्टी से यह उम्मीद नहीं थी कि वह इस तरह के समझौते करती फिरेगी?
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Thursday, 9 June 2011

उमा भारती की वापसी : सही दिशा में सही कदम


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th June 2011
अनिल नरेन्द्र
अंतत भाजपा के प्रधानमंत्री पद के तमाम दावेदारों के विरोध के बावजूद भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उमा भारती को वापस पार्टी में शामिल कर लिया है। जब उमा भारती को भाजपा में फिर शामिल करने की घोषणा गडकरी पार्टी मुख्यालय में कर रहे थे तो उनका धुर विरोध करने वाले अरुण जेटली व सुषमा स्वराज और वेंकैया नायडू नदारद थे। दरअसल उमा भारती की वापसी के पीछे कई कारण, कई मजबूरियां थीं। सबसे अहम बात तो यह है कि आजकल सभी पार्टियों का फोकस मिशन यूपी 2012 पर लगा हुआ है। भाजपा नेतृत्व यह समझ रहा है कि कांग्रेस की हवा दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है पर इससे भाजपा का रास्ता आसान नहीं हो रहा है। दिल्ली की गद्दी का रास्ता वाया यूपी आता है। इसलिए अगर उत्तर प्रदेश में पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तो दिल्ली दरबार तक पहुंचना आसान नहीं होगा। यूपी में वैसे भी भाजपा के नेतृत्व का अभाव है, जो नेता हैं वह तमाम पूंके कारतूस की तरह हैं। भाजपा को यूपी में नई जान पूंकने के लिए एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो युवाओं, महिलाओं, पिछड़ों व हिन्दुत्व वोटों को एक साथ पार्टी के पीछे ला सके। उमा भारती में नितिन गडकरी को लगा कि यह सब खूबियां मौजूद हैं। वह कुशल प्रशासक भी हैं। जब वह मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं तो उन्होंने अच्छा शासन दिया था। उन्हीं के बल पर पार्टी सत्ता में आई थी।

उमा भारती की छह साल बाद वापसी हुई है। भाजपा नेतृत्व व रणनीतिकारों का मानना है कि जिस तरह से उमा भारती आक्रमक राजनीति करती हैं उनका मुकाबला उनके शब्दों और शैली में करने के लिए पार्टी के पास कोई वैसा नेता प्रदेश में मौजूद नहीं था जो उनकी भाषा में उनको जवाब दे सके। भाजपा का मानना है कि यदि पार्टी को उत्तर प्रदेश में सीटों में बढ़ोतरी न भी कर पाए तो भी वह जिस शैली में भाषण देती हैं उससे पार्टी के एक माहौल बनाने में सहायता अवश्य मिलेगी। सामाजिक संरचना की दृष्टि से भी अगर देखा जाए तो पार्टी को कद्दावर नेता रहे कल्याण सिंह की पार्टी से छुट्टी और पुनर्वापसी के बाद भी पार्टी अपने रुठे पिछड़े वर्ग को पार्टी में जोड़ने में असफल रही। उमा भारती का लोद जाति का होना भी पार्टी के लिए अच्छा है। हो सकता है कि जातिवाद की राजनीति के लिए मशहूर उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग शायद उमा के कारण पार्टी से जुड़ जाए?

उमा भारती की मुश्किल यह है कि जब उन्हें गुस्सा आता है तो वह सब कुछ भूल जाती हैं और अपने आपे से बाहर हो जाती हैं। मुझे वह सीन आज भी याद है जब लगभग साढ़े पांच वर्ष पूर्व उमा भारती ने मीडिया के सामने ही लाल कृष्ण आडवाणी की उपस्थिति में पार्टी के कुछ लोगों पर ऑफ द रिकॉर्ड बात करने, छवि खराब करने और अपनी उपेक्षा का आरोप लगाया था और भरी मीटिंग से उठकर चली गई थीं। तब भाजपा संसदीय बोर्ड ने छह दिसम्बर 2005 को उन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया था। जहां हम समझते हैं कि श्री नितिन गडकरी ने सही दिशा में एक सही कदम उठाया है वहीं उमा ने भी पिछले पांच-छह सालों में सीख ली होगी और भविष्य में वह अनुशासन की लक्ष्मण रेखा नहीं लांघेंगी।
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Tuesday, 17 May 2011

भाजपा के इस शर्मनाक प्रदर्शन का जिम्मेदार कौन?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17 May 2011
अनिल नरेन्द्र
भाजपा के लिए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव बेहद निराशाजनक रहे। असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और प. बंगाल में भाजपा राष्ट्रीय दल के रूप में पहचान के लिए तरस गई। कर्नाटक में उपचुनावों में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने जरूर अपना दबदबा बनाए रखा। चुनावों में पहली बार भाजपा के बड़े नेताओं की अपनी रणनीतिक कौशल दिखाने के लिए ड्यूटी लगाई गई थी, लेकिन कोई भी नेता अपना चमत्कार नहीं दिखा सका। भाजपा को असम और पश्चिम बंगाल में अच्छे परिणाम की उम्मीद थी। पार्टी को केरल में भी अपना खाता खोलने की पूरी उम्मीद थी। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज के पास दक्षिण के राज्यों तमिलनाडु और केरल की कमान थी। विजय गोयल के पास असम और चन्दन मित्रा के पास पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी थी। उनके ऊपर सुपर बोस थे अरुण जेटली।
भाजपा को सबसे बड़ा झटका असम में लगा है। सवाल हो रहा है कि आखिर पूर्वोत्तर के इस राज्य में भाजपा क्यों पिटी? वह भी तब जबकि सबसे ज्यादा ताकत भाजपा नेतृत्व ने इसी राज्य में लगाई थी। पार्टी के चार-चार महासचिव असम में डेरा डाले रहे। पार्टी के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी से लेकर अरुण जेटली तक लोगों से वोट मांगने के लिए उतरे। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने दर्जनों सभाएं संबोधित की। लेकिन इन सबके बाद भी पार्टी की लुटिया डूब गई। राज्य में सरकार बनाने का सपना पाले भाजपा के नेताओं को उम्मीद थी कि असम गण परिषद (एजीपी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बाद सरकार बन जाएगी और सरकार न भी बनी तो पार्टी एक बड़ी ताकत के रूप में उभरेगी। मगर पार्टी पिछले विधानसभा चुनाव में जीतीं 10 सीटों का आंकड़ा भी नहीं छू पाई और असम की विधानसभा में पार्टी की ताकत आधी हो गई।
पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में भाजपा खाता खोलने के लिए ही चुनाव लड़ रही थी पर केरल में उसका यह सपना इस बार भी साकार नहीं हो पाया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी ने तो कटाक्ष भी किया कि भाजपा खुद को राष्ट्रीय पार्टी कहती है लेकिन पांच राज्यों की लगभग 800 विधानसभा सीटों में से वह आठ सीटें भी नहीं जीत पाई। पश्चिम बंगाल में भाजपा को एक सीट मिली है जबकि असम में चार सीटों से ही संतोष करना प़ड़ा। बाकी कहीं खाता नहीं खुल सका है। अब भाजपा नेतृत्व भले ही यह कहकर अपनी झेंप मिटा रही हो कि हमें तो पहले से ही बहुत उम्मीद नहीं थी। भाजपा नेताओं ने केरल में अपनी पूरी ताकत इसलिए लगाई थी कि अगर वहां कमल खिल जाता तो वह इस बात का ढिंढोरा पीट सकती थी कि दक्षिण के लालगढ़ में भी हम पहुंच गए हैं। भाजपा को केरल में 9 फीसदी वोट जरूर मिले पर खाता नहीं खोल पाई। असम और प. बंगाल में भाजपा के लिए सबसे रणनीतिक असफलता यह रही कि दोनों ही राज्यों में पार्टी का किसी दल या गठबंधन के साथ तालमेल नहीं हो पाया। इस शर्मनाक प्रदर्शन के लिए जवाब कौन देगा? राज्य के प्रभारी और महासचिव विजय गोयल, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वरुण गांधी या फिर खुद अध्यक्ष नितिन गडकरी?