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Tuesday, 24 April 2012

भाजपा में सत्ता की तीन धुरियां

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24 April 2012
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी में नगर निगम चुनाव जीतने के बाद एक नया उत्साह है। उन्हें लगता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी बाजी मार सकती है पर सबसे बड़ी कमी जो उभर कर आ रही है वह है क्लीयर नेतृत्व का अभाव। यह किसी से छिपा नहीं कि पार्टी के एक बड़े धड़े खासकर सांसदों के मन में एक सवाल बार-बार कौंध रहा था कि आखिर यूपीए-2 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों के मुद्दे पर घिरी रही। लेकिन सरकार की विफलता का भाजपा को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। इसके चलते केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल को भुनाने के लिए पार्टी को लोकसभा चुनाव पूर्व अपना पीएम उम्मीदवार घोषित करने की दरकार है। इस समय यह स्थिति है कि भाजपा तीन धुरियों पर चल रही है। सबसे पहले हैं श्री नितिन गडकरी जो पार्टी अध्यक्ष हैं और उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन है। दूसरी तरफ हैं डी-4 नेता। इनमें आडवाणी जी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली प्रमुख हैं। तीसरी धुरी नरेन्द्र मोदी हैं जो अपने आपको पार्टी से ऊपर मानते हैं और प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार मानते हैं। इन तीनों धुरियों में सभी नेता अपनी-अपनी दिशा में चल रहे हैं। नितिन गडकरी के एक तरफ नरेन्द्र मोदी से मतभेद हैं वहीं दूसरी ओर 5-4 से अकसर खींचतान होती रहती है। ताजा उदाहरण सुरेन्द्र सिंह आहलूवालिया का पहले राज्यसभा से टिकट काटना और फिर जब डी-4 ने जोरदार विरोध किया तो उन्हें फिर से उम्मीदवार घोषित करना। कई माह से गडकरी और नरेन्द्र मोदी के बीच बातचीत तक नहीं हो रही है। संवादहीनता की इस स्थिति को गडकरी ने खुद स्वीकारा है। सवाल यह भी किया जा रहा है कि गडकरी ने मोदी से संवादहीनता की बात सार्वजनिक रूप से क्यों कही? यह बात किसी से छिपी नहीं कि नरेन्द्र मोदी भाजपा के पूर्व संगठन महासचिव संजय जोशी को पुन भाजपा में सक्रिय किए जाने के फैसले से नाराज हैं। गडकरी ने संजय जोशी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में खासा महत्व दिया। इसी के बाद दोनों में `कुट्टी' हो गई। रहा सवाल भाजपा की ओर से कौन होगा पीएम उम्मीदवार तो भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने गुरुवार को हैदराबाद में कहा कि अगले आम चुनाव से पहले पार्टी अपना प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित कर देगी। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले हम अपना उम्मीदवार घोषित करेंगे, अभी हम अपना उम्मीदवार बताने की स्थिति में नहीं हैं। उधर नरेन्द्र मोदी ने केंद्रीय राजनीति में आने के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। पिछले दिनों प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र के विरोध में सारे मुख्यमंत्री दिल्ली में एकत्र हुए थे। मोदी ने विशेष रूप से तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और बीजू जनता दल प्रमुख और उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के साथ बैठक की। हालांकि ऊपरी स्तर पर तो यह बैठक केंद्र सरकार के प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र को लेकर थी पर अन्दर खाते 2014 लोकसभा चुनावों पर भी चर्चा हुई होगी। मोदी ने अपने आपको पीएम उम्मीदवार दर्शाने की चालें चलनी शुरू कर दी हैं। आने वाले दिनों में यह अंतर्पलह और तेज होना स्वाभाविक है।
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Sunday, 2 October 2011

आडवाणी और नरेन्द्र मोदी में टकराव बढ़ रहा है



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2nd October 2011
अनिल नरेन्द्र 
मनमोहन सिंह की कैबिनेट में अंतर्विरोध और टकराव का आरोप लगाने वाली भाजपा खुद भी ऐसी ही स्थिति में घिरी हुई है। भारतीय जनता पार्टी की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आरम्भ हो गई है। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के आग्रह के बावजूद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित कर्नाटक और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा और रमेश पोखरियाल निशंक बैठक में शामिल नहीं हुए। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने हालांकि यह कहा था कि पार्टी कोशिश कर रही है कि मोदी बैठक में शामिल हों। कुछ ही लोग शायद इस तर्प को मानेंगे कि मोदी नवरात्र के व्रत रख रहे हैं इसलिए बैठक में नहीं आए। असल कारण कुछ और ही है। 8 सितम्बर को पार्टी के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने अचानक देशव्यापी रथ यात्रा निकालने का ऐलान कर दिया था। इससे भाजपा नेतृत्व भी हतप्रभ रह गया था। इस ऐलान के साथ ही ये कयास लगने लगे कि आडवाणी की इस रथ यात्रा का उद्देश्य एक बार फिर पीएम इन वेटिंग का संदेश देना है। संघ ने 2009 के चुनाव में हार के बाद श्री आडवाणी को पीछे करके नम्बर दो के नेताओं को आगे करने की योजना बनाई। इसमें नरेन्द्र मोदी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और खुद नितिन गडकरी शामिल थे पर आडवाणी की अचानक रथ यात्रा की घोषणा ने यह समीकरण बिगाड़ दिए। आडवाणी की यात्रा का सबसे ज्यादा झटका गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लगा। लम्बे समय तक उनकी पहचान आडवाणी के खास सिपहसालार के रूप में रही है। लेकिन अब मोदी बड़े उस्ताद बन गए हैं। कुछ मायनों में वह अपने आपको पार्टी से ऊपर समझने लगे हैं। भाजपा सूत्रों के अनुसार भाजपा में प्रधानमंत्री पद के इन दो भावी दावेदारों मोदी और आडवाणी के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। आडवाणी की प्रस्तावित रथ यात्रा मोदी को रास नहीं आ रही है। इसी के चलते उन्होंने भी आडवाणी की तर्ज पर पिछले दिनों अहमदाबाद में एक बड़ा राजनीतिक शो कर डाला था। राज्यपाल के खिलाफ हाल ही में गुजरात में आयोजित मोदी की रैली में आडवाणी समेत किसी भी बड़े नेता ने हिस्सा नहीं लिया था। अहमदाबाद में मोदी उपवास का जिस तरह प्रचार किया गया उससे पार्टी का शीर्ष नेतृत्व खुश नहीं है। उनका मानना है कि मोदी खुद को भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश कर रहे हैं। उधर संघ ने आडवाणी पर दबाव डाला कि वह यह स्पष्ट कर दें कि उनकी यात्रा से उनकी प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी से कुछ लेना-देना नहीं है। संघ के नागपुर स्थित मुख्यालय में नेतृत्व से मुलाकात के बाद श्री आडवाणी ने घोषणा की कि वह प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर यह रथ यात्रा नहीं कर रहे। सबसे पहले नरेन्द्र मोदी ने ही उनकी यात्रा का विरोध किया था। सूत्रों के मुताबिक जब आडवाणी ने उनसे इस यात्रा के बारे में बात की तो मोदी ने अपनी आदत के मुताबिक उनसे दो टूक पूछ लिया कि इससे क्या फायदा? आप हासिल क्या करना चाहते हैं? इतना ही नहीं, मोदी ने गुजरात से यात्रा शुरू करने में मदद करने में अपनी असमर्थता तक जता दी। आखिरकार श्री आडवाणी ने अपनी रथ यात्रा बिहार से शुरू करने का फैसला किया। इसके पीछे एक और उद्देश्य भी नजर आता है। शायद आडवाणी जी एनडीए की तर्ज की राजनीति को बढ़ावा देना चाहते हैं। पहले भी उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ करके उसी लाइन पर चलने का प्रयास किया था जिस पर अटल जी चलते थे। आडवाणी की कोशिश है कि वह एनडीए की तर्ज पर फिर केंद्र में सरकार बनाएं और उसका नेतृत्व करें। इस उद्देश्य का न तो संघ समर्थन करेगा और न ही मोदी सरीखे नेता जिनकी पहचान हिन्दुत्व नेता की है। श्री आडवाणी की प्रस्तावित रथ यात्रा को लेकर जो विवाद आरम्भ हुआ है, यह थमने वाला नहीं। भाजपा नेतृत्व में इस समय जबरदस्त महत्वाकांक्षाओं का टकराव है और इसे इस रथ यात्रा ने फोकस में लाकर खड़ा कर दिया है। उधर कांग्रेस नेतृत्व में घमासान हो रहा है, रही-सही कसर भाजपा की अंतर्पलह ने पूरी कर दी है।
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Friday, 30 September 2011

आफेंस इज दी बेस्ट डिफेंस


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th September 2011
अनिल नरेन्द्र
अंग्रेजी में एक कहावत है "आफेंस इज दी बेस्ट डिफेंस" यानि कि आक्रमण करना सबसे अच्छा बचाव है। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसी तकनीक को अपनाया लगता है। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की आंच से झुलस रही केंद्र की यूपीए सरकार के रणनीतिकार जहां डैमेज कंट्रोल में जुटे हुए हैं वहीं अमेरिका से स्वदेश लौटते ही डॉ. मनमोहन सिंह ने विपक्ष पर जमकर हमला बोल दिया और विपक्ष के मंसूबों और इरादों की हवा निकालने का प्रयास किया है। विपक्ष पर सरकार को अस्थिर करने और जबरदस्ती देश को मध्यावधि चुनाव की ओर धकेलने का आरोप प्रधानमंत्री ने लगाकर पूरे मामले को एक नई दिशा देने की कोशिश की है। प्रधानमंत्री ने यह जवाबी हमला हवा में एयर इंडिया के विमान से ही शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि हम पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे और मध्यावधि चुनाव नहीं होगा। मंत्रिमंडल के सदस्यों में टकराव की बातें मीडिया की कल्पना है। पी. चिदम्बरम पर मुझे पहले भी पूरा भरोसा था और आज भी है। न्यूयार्प में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने के बाद फ्रैंकफर्ट से नई दिल्ली जाते हुए विमान में पत्रकारों से बात करते हुए मनमोहन सिंह ने माना कि बिगड़ती अर्थव्यवस्था का असर भारत पर भी हुआ है। मुद्रास्फीति हमारी सबसे बड़ी समस्या है लेकिन हम स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए हर संभव कदम उठाएंगे। डॉ. सिंह ने स्वीकार किया कि उनकी सरकार की छवि के बारे में जनता के बीच समस्या हो सकती है जिसे सही करना जरूरी है।
सरकार को अस्थिर कर देश को मध्यावधि चुनाव की ओर धकेलने के विपक्ष पर लगाए प्रधानमंत्री के आरोप पर भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा कि अगर सरकार गिरेगी तो अपने कुकर्मों से, हमें साजिश करने की जरूरत नहीं है और न ही ऐसा करने के लिए हमारे पास पर्याप्त संख्या बल है। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा कि प्रधानमंत्री ने विदेश से लौटते ही आरोप लगाया है कि विपक्ष सरकार को अस्थिर करने में जुटा है। सुषमा ने कहा कि सरकार के अस्थिरता की ओर बढ़ने का ठीकरा विपक्ष के सिर फोड़ने की बजाय बेहतर यह होगा कि प्रधानमंत्री अपने घर को दुरुस्त करने की फिक्र करें। सुषमा ने कहा कि सरकार और उनके मंत्रियों को लेकर जो भ्रष्टाचार के खुलासे हो रहे हैं उन्हें विपक्ष ने नहीं गढ़ा है बल्कि उन कुकर्मों को खुद उनके द्वारा संचालित सरकार की एजेंसियों ने ही उजागर किया है। अरुण जेटली ने कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, राष्ट्रमंडल घोटाला, यह विपक्ष ने नहीं किया। नोट के बदले वोट कांड से विपक्ष लाभान्वित नहीं हुआ। अस्थिरता की ओर बढ़ने का कारण सरकार में नेतृत्व का गंभीर संकट होना है। यह सरकार स्वयं विध्वंसक मोड़ में है। भाजपा के दोनों नेताओं ने दावा किया कि वित्त मंत्रालय के नोट से साबित हो चुका है कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला में जो अपराध तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा ने किया वही अपराध हूबहू चिदम्बरम ने भी किया। उन्होंने कहा कि इस घोटाले में प्रधानमंत्री को कहीं भी अंधेरे में नहीं रखा गया था बल्कि उन्हें राजा और चिदम्बरम ने हर कदम की बाकायदा जानकारी दी। प्रधानमंत्री की यह रणनीति कितनी सार्थक साबित होगी यह तो आने वाले दिन ही बताएंगे पर एक तरह से उन्होंने यह बयान देकर खुद अपनी सरकार के जीवन पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। जब प्रधानमंत्री खुद ही मध्यावधि चुनाव की बात करने लगे तो इसका जनता-जनार्दन में क्या संदेश जाएगा, आप खुद ही समझदार हैं।
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Wednesday, 14 September 2011

नरेन्द्र मोदी की अग्निपरीक्षा


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 14th September 2011
अनिल नरेन्द्र
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को बहुत उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट सोमवार को मोदी को 2002 के गोधरा कांड के बाद दंगों पर केस में लपेट लेगा और उन्हें कटघरे में खड़ा कर देगा।
मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और 62 अन्य अधिकारियों पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने 2002 में हुए गुलबर्ग सोसाइटी दंगों को रोकने के लिए जानबूझ कर कोई कदम नहीं उठाया और हिंसा को बढ़ावा दिया पर मोदी को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे उनके प्रतिद्वंद्वियों को सुप्रीम कोर्ट से निराशा मिली।
शीर्ष अदालत ने उनको दंगा रोकने में उनकी भूमिका में निक्रियता पर कोई फैसला सुनाने से इंकार कर दिया। न्यायमूर्ति डीके जैन की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने मोदी और अन्य सरकारी अधिकारियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज करने के लिए कोई भी विशिष्ठ निर्देश देने से इंकार कर दिया।
मोदी और इन सरकारी अधिकारियों को पूर्व कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी की पत्नी द्वारा की गई शिकायत में पक्ष बनाया गया था। जाफरी की अहमदाबाद दंगों में गुलबर्ग सोसाइटी नरसंहार में जान चली गई थी। न्यायमूर्ति पी. सदाशिवम और न्यायमूर्ति आफताब आलम की सदस्यता वाली पीठ ने शीर्ष न्यायालय के निर्देश पर विशेष जांच अदालत (एसआईटी) द्वारा की गई जांच की अंतरिम रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के समक्ष दाखिल करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए गठित की गई विशेष जांच समिति यानि एसआईटी को आदेश दिए हैं कि वह अपनी रिपोर्ट गुजरात की निचली अदालत को सौंप दे यानि अब निचली अदालत यह तय करेगी कि गुजरात दंगों में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मामला बनता है या नहीं? फैसले पर अपने-अपने ढंग से प्रतिक्रिया हुई। इस दंगे में मारे गए सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जकिया जाफरी ने कोर्ट के इस फैसले पर निराशा जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बेहद निराशाजनक है। मेरे पास एक बार फिर इसके खिलाफ अपील करने के अलावा और कोई चारा नहीं है। 2002 में जो कुछ भी हुआ था, उसके हर पल का सच्चा ब्यौरा मैंने एसआईटी को दिया था। इतने बरसों के बाद एक ही बात को मैं कब तक दोहराऊंगी? जकिया जाफरी का कहना है कि राज्य की अदालत को इस मामले का सौंप दिए जाने का मतलब यह ही है कि नरेन्द्र मोदी के हक में ही फैसला आएगा। हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता और नरेन्द्र मोदी की चिर-परिचित प्रतिद्वंद्वी तीस्ता सीतलवाड़ ने कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया और कहा कि इस फैसले को क्लीन चिट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, `यह संघर्ष बहुत लम्बा है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का गलत अर्थ निकाला जा रहा है। अब हमारी याचिका, एसआईटी की रिपोर्ट और राजू रामचन्द्रन की रिपोर्ट गुजरात के मजिस्ट्रेट देखेंगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी और अन्य लोगों के खिलाफ और केस ही नहीं है। अगर मोदी या किसी और के खिलाफ मामला बन्द होने की बात होती तो जकिया जी और हमारा पक्ष सुना जाएगा। हमें भरोसा है कि गुजरात की अदालत इस मामले में उपयुक्त फैसला सुनाएगी।' सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर नरेन्द्र मोदी ने महज तीन शब्दों में अपनी प्रतिक्रिया दी। `ईश्वर महान है।' भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि पार्टी को विश्वास था कि मोदी को बदनाम करने की मुहिम ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाएगी।
पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने मुस्कुराते हुए कहा, `मोदी से नफरत करने वालों और उन्हें गिराने की ताक में रहने वालों की वर्तमान अवस्था को मैं समझ सकता हूं। कानून ने वह रास्ता अपनाया है जो बिल्कुल सही है।
कांग्रेस ने इस मसले पर बहुत ही सोची-समझी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को क्लीन चिट नहीं दी है।' प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा, `इससे निराशा की कोई बात नहीं है। नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट थोड़े ही मिली है? हमारी कानूनी प्रक्रिया में सुधार लाए जाने की जरूरत है। जकिया जी और उनके परिवार के लिए मैं सहानुभूति जताना चाहूंगा।'
मामला कुछ यूं था। गोधरा कांड के बाद गुजरात में बड़े पैमाने में दंगे भड़के। गुलबर्ग सोसाइटी दंगों में 35 से ज्यादा लोग मारे गए थे और जकिया जाफरी ने आरोप लगाया था कि मुख्यमंत्री मोदी और 62 अन्य लोगों ने गुजरात में हुई हिंसा को बढ़ावा दिया। गुजरात में 2002 के दंगों में 1000 से अधिक लोग मारे गए थे। साबरमती एक्सप्रेस में कारसेवकों को जिन्दा जलाने के स्वरूप यह प्रतिक्रिया हुई थी। इन दंगों पर एसआईटी की अंतरिम रिपोर्ट पिछले साल आई थी। लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया गया था। एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट दे दी थी और कहा था कि उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं थे। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट पर एक स्वतंत्र राय लेने के लिए राजू रामचन्द्रन को अदालत की सहायता के लिए नियुक्त किया गया था। रामचन्द्रन को आदेश दिया गया था कि वे एसआईटी रिपोर्ट की निष्पक्ष पड़ताल करें और मामले से जुड़े गवाहों, पुलिस अधिकारियों और अन्य लोगों से मिलें और उसके बाद सुझाव दें कि गुजरात मुख्यमंत्री की भूमिका पर क्या कदम उठाना चाहिए? मीडिया में आई खबरों के मुताबिक राजू रामचन्द्रन ने एसआईटी की रिपोर्ट का खंडन करते हुए कहा था कि गुजरात दंगों के मामले में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस डीके जैन, जस्टिस पी. सदाशिवम और जस्टिस आफताब आलम की बैंच ने इसी रिपोर्ट के आधार पर अपना फैसला सुनाया और एसआईटी को आदेश दिया कि वह अपनी रिपोर्ट अब निचली अदालत के समक्ष रखें।
इस फैसले से जहां भाजपा की बांछें खिल गई हैं वहीं कांग्रेस मोदी को संसद से लेकर सड़क तक घेरती रही को इससे झटका लगा है। यही वजह है कि मोदी को भाजपा के हर कोने से बधाई मिली और उनकी राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका भी तलाशनी शुरू हो गई है। इस फैसले के बाद मोदी का राजनीतिक कद बढ़ा है। पार्टी के भीतर से उनके राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका में आने की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि मोदी पार्टी द्वारा सौंपे जाने वाली किसी भी जिम्मेदारी को निभाने में सक्षम हैं।
राज्यसभा में नेता विपक्ष अरुण जेटली ने एक सवाल के जवाब में कहा कि मोदी पहले से ही राष्ट्रीय राजनीति में हैं और हमारे प्रमुख नेताओं में हैं। फैसले पर खुशी जाहिर करते हुए जेटली ने कहा कि भाजपा शुरू से ही कहती रही है कि मोदी पर लगाए गए आरोप झूठे हैं और उनकी दंगों में कोई भूमिका नहीं थी। इससे साबित हुआ है कि मात्र प्रोपेगंडा व झूठे आरोप कभी भी साक्ष्य नहीं हो सकते। मोदी का नाम एक भी आरोप पत्र में नहीं है और न ही विशेष जांच दल ने उन्हें दोषी पाया है। सुषमा ने कहा कि मोदी ने अग्निपरीक्षा पास कर ली है, `सत्यमेव जयते।'
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Thursday, 4 August 2011

मतदान वाले नियम के तहत बहस का जुआ


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th August 2011
अनिल नरेन्द्र
जैसा अनुमान था भारतीय जनता पार्टी ने संसद में संपग सरकार पर हल्ला बोल दिया है। भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को घेरने में लगी भाजपा ने पधानमंत्री मनमोहन सिंह को घेरने का पूरा प्लान बना लिया है। भाजपा ने मनमोहन सिंह पर मानसून सत्र का माहौल बिगाड़ने का भी आरोप लगाया है। भाजपा ने कहा कि पधानमंत्री ने ही पहल करते हुए विपक्ष के संबंध में जो अनावश्यक वक्तव्य दिया है उसके पीछे उनका एक मात्र मकसद विपक्ष को उत्तेजित करना और संसद का वातावरण खराब करना लगता है। संसद भवन परिसर में एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में लोकसभा के विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने मनमोहन और चिदंबरम पर तीखे हमले किए। जेटली ने कहा कि स्पेक्ट्रम आवंटन के मामले में पूर्व संचार मंत्री ए राजा और पधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं उनके कार्यालय के बीच 18 बार पत्राचार हुआ। इस पत्राचार के जरिए राजा ने पधानमंत्री को स्पेक्ट्रम मामले में अपने मंत्रालय के फैसले और नीति से पूरी तरह अवगत कराया था। इसलिए पधानमंत्री यह कहकर बच नहीं सकते कि उन्हें कुछ भी नहीं पता था। सुषमा ने पधानमंत्री पर संसद का माहौल बिगाड़ने का आरोप लगाते हुए कहा कि राजग संसद में महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर मतदान के पावधान वाले नियमों के तहत चर्चा कराने का नोटिस देगी। सुषमा ने कहा कि राजग भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दों पर लोकसभा में मतदान वाले नियम 184 और राज्यसभा में नियम 167 के तहत नोटिस देगा।
भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दों पर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को संसद में घेरने के लिए भाजपा और उसके नेतृत्व वाले राजग ने मतदान वाले नियम के तहत बहस कराने का पस्ताव लोकसभा सचिवालय को भेज दिया है। भाजपा चाहती है कि भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर सदन में केवल चर्चा ही नहीं बल्कि मतदान भी हो ताकि इन मुद्दों पर यह साफ हो सके कि कौन सरकार के साथ है और कौन सरकार के विरोध में है। यह दांव चलकर भाजपा कांग्रेस के साथ उसके घटक दलों को भी एक्सपोज करना चाहती है। भाजपा का आकलन है कि भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दों पर मतदान हुआ तो यूपीए सरकार फंस सकती है। सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का इन मुद्दों पर विचार स्पष्ट है। सपा के रामगोपाल यादव ने कहा कि भ्रष्टाचार पर अब सरकार भाग नहीं सकती। उसे संसद का सामना करना होगा और देश की जनता के सवालों का जवाब देना होगा। बसपा की ओर से मोर्चा सतीश मिश्रा ने संभाला है। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा है। इसके खिलाफ उनकी पार्टी कारगर लोकपाल से कम पर राजी नहीं है। इसके अलावा अन्नाद्रमुक, बीजू जद, राजद, जनता दल एस और लोकदल जैसे तथ्य माने जाने वाले छोटे दलों ने भी अपने अन्दाज में सरकार को आंखे दिखाईं और कांग्रेस सदस्य चुपचाप सुनते, देखते रहे। मजबूरन सदन के पहले दिन सभापति को सदन स्थगित करना पड़ा। उत्तर पदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा महंगाई और भ्रष्टाचार पर कांग्रेस, सपा और बसपा के गठबंधन को फिर से उजागर करना चाहती है। सपा और बसपा ने यदि कांग्रेस का समर्थन किया तो भाजपा सपा, बसपा और कांग्रेस गठबंधन को मुद्दा बनाएगी। यदि सपा और बसपा ने मतदान के समय कांग्रेस का साथ नहीं दिया और यूपीए घटक दलों ने भी अलग अलग सुर और तेवर दिखाए तब ऐसे में यूपीए सरकार की फजीहत हो सकती है। वामदलों का स्टैंड पहले से ही स्पष्ट है वह सरकार का जमकर विरोध करेंगे। भाजपा ने इन सारी बातों को ही ध्यान में रखकर यह दांव चला है। हमें नहीं लगता कि सरकार मतदान वाले नियम के तहत किसी भी चर्चा को तैयार होगी। जाहिर है कि यदि भाजपा की मांग नहीं मानी गई तो पार्टी संसद के भीतर और बाहर यही संदेश देगी कि सरकार भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर गम्भीर नहीं है इसलिए सिर्प चर्चा कर मुद्दे को टाल रही है। भाजपा की ओर से भ्रष्टाचार पर नियम 184 के तहत चर्चा कराने के लिए वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने पस्ताव भेजा है। महंगाई पर भाजपा नेता यशवंत सिन्हा और राजग के कार्यकारी संयोजक शरद यादव ने पस्ताव दिया है। अब सरकार ने वोट नियम के तहत बहस स्वीकार कर ली है। देखें कि इस जुए में वह कितनी सफल रहती है ?
Tags: Anil Narendra, Arun Jaitli, BJP, Congress, Daily Pratap, Manmohan Singh, Parliament, Sushma Swaraj, Vir Arjun

Saturday, 30 July 2011

अंतत येदियुरप्पा को जाना ही पड़ा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th July 2011
अनिल नरेन्द्र
अंतत भाजपा हाई कमान ने हिम्मत और बुद्धिमता दिखाई और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को हटाने का फैसला कर ही लिया। येदियुरप्पा ने हालांकि अपनी कुर्सी बचाने के लिए सब तरह के हथकंडे अपना लिए परन्तु आलाकमान के आगे उनकी एक न चली। आला कमान ने बुधवार देर रात ही उन्हें बता दिया कि पार्टी चाहती है कि वे अपना पद छोड़ दें। इसके बाद गुरुवार सुबह संसदीय दल की बैठक में उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने के बारे में किए गए फैसले पर मोहर लगा दी गई। पार्टी ने येदियुरप्पा को हटाने के बारे में तभी मन बना लिया था, जब लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट के कुछ हिस्से लीक हो गए थे। लेकिन पार्टी चाहती थी कि पहले लोकायुक्त अपनी रिपोर्ट औपचारिक तौर पर सरकार के सुपुर्द कर दें। रिपोर्ट सुपुर्द करने के फौरन बाद ही येदियुरप्पा को दिल्ली तलब किया गया और उन्हें पद छोड़ने के लिए कहा गया। येदियुरप्पा बिना इस्तीफा दिए बेंगलुरु पहुंच गए। बेंगलुरु पहुंचने पर येदियुरप्पा ने अपनी ताकत आजमाने के लिए विधायकों व मंत्रियों की बैठक बुलाई जिसमें उनके हाथ निराशा ही लगी। उनकी बुलाई बैठक में कुल 13 विधायक ही पहुंचे। दरअसल भाजपा हाईकमान येदियुरप्पा की चाल को समझ गए थे। इधर येदियुरप्पा दिल्ली से खिसके उधर नितिन गडकरी ने विधायकों को येदियुरप्पा से दूरी बनाने को फोन कर दिया। मंत्रियों को साफ कहा गया कि अगर उन्होंने येदियुरप्पा का अब भी साथ दिया तो उन्हें अगले मंत्रिमंडल में नहीं लिया जाएगा। हाईकमान ने एम. वेंकैया नायडू को `ऑपरेशन येदियुरप्पा' के लिए बेंगलुरु रवाना कर दिया। पार्टी के कड़े रुख को देखते हुए येदियुरप्पा ने पद छोड़ने का फैसला किया और कहा कि वह 31 जुलाई को त्यागपत्र देंगे। उन्होंने बताया कि वह 31 जुलाई को इस्तीफा देंगे क्योंकि 31 जुलाई को शुक्ल पक्ष शुरू हो रहा है क्योंकि 30 जुलाई को अमावस्या है और ज्योतिषियों ने उन्हें शुभ मुहूर्त में इस्तीफा देने की सलाह दी है।
येदियुरप्पा ने अपने उत्तराधिकारी के तौर पर सांसद सदानन्द गौड़ा का नाम सुझाया है, लेकिन पार्टी शुक्रवार को होने वाली विधान मंडल की बैठक में ही नेता का फैसला करेगी। दिल्ली से अरुण जेटली और राजनाथ सिंह को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा जा रहा है। मुख्यमंत्री के दावेदारों में के. ईश्वरप्पा, बीएस आचार्य, सुरेश कुमार और अनन्त कुमार भी दावेदार हैं। येदियुरप्पा लिंगायत हैं। कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अपनी इस जाति के ताकत पर ही येदियुरप्पा हाईकमान को ब्लैकमेल कर रहे थे। राज्य की कुल आबादी में लिंगात करीब 27 प्रतिशत हैं जबकि लिंगात के बाद दूसरे स्थान पर वोकलिंग हैं जो 17 प्रतिशत हैं। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा वोकलिंग समुदाय से हैं। हाल के वर्षों में येदियुरप्पा लिंगात समुदाय के बड़े नेता के तौर पर उभरकर सामने आए। कर्नाटक भाजपा विधायक दल में ही 35 से ज्यादा विधायक लिंगायत जाति के हैं। विधायकों के बलबूते पर ही विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव या पंचायत चुनाव, लिगांत कार्ड खेलकर येदियुरप्पा भाजपा को चुनाव जिताने के साथ-साथ अपनी भी जड़ें जमाते रहे। भाजपा को उत्तराधिकारी चुनते समय कर्नाटक के जातीय समीकरण का जरूर ध्यान रखना होगा। जहां तक सम्भव हो येदियुरप्पा का उत्तराधिकारी भी लिगांयत समुदाय से ही होगा।
कर्नाटक की राजनीति में एक बहुत बड़ा फैक्टर रेड्डी बंधु हैं। रेड्डी बंधुओं की कहानी किसी किवदंती से कम नहीं लगती। पुलिस कांस्टेबल के बेटे, जिनके पास साइकिल खरीदने की क्षमता थी उनके पास आज अपना हेलीकाप्टर है। राजनीतिक पकड़ ऐसी कि मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी उन्हें किनारे करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। उन पर लौह अयस्क के अवैध खनन के गम्भीर आरोप लगे। वे करीब 1500 करोड़ के खनन कारोबारी हैं। एक अनुमान के मुताबिक 2002 में खनन तथा इसके निर्यात के व्यवसाय में उतरने के बाद उनकी सम्पत्ति अरबों में है। ओबुलापुरम माइनिंग कम्पनी का मालिकाना हक कर्नाटक के पर्यटन मंत्री जी. जनार्दन रेड्डी के पास है तो येदियुरप्पा सरकार में बड़े भाई जी. करुणाकरण रेड्डी राजस्व मंत्री हैं जबकि छोटे भाई सोमशेखर बेल्लारी से विधानसभा सदस्य हैं। वर्ष 2009 में भी रेड्डी बंधुओं ने येदियुरप्पा के खिलाफ इसलिए विद्रोह कर दिया था कि उन्हें बेल्लारी में मनमाफिक अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार नहीं दिया गया। तब भी सुषमा स्वराज के दखल से मामला सुलझा। भाजपा के शीर्ष नेता कहते रहे हैं कि बेल्लारी में कांग्रेस के गढ़ तोड़ने के लिए भाजपा को उनका सहारा लेना पड़ा। रेड्डी बंधुओं का राजनीतिक उदय बेल्लारी संसदीय सीट से पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के चुनाव लड़ने के दौरान हुआ। भाजपा ने सोनिया के खिलाफ सुषमा स्वराज को मैदान में उतारा था। तब रेड्डी बंधुओं ने सुषमा को `काची' (मां) का दर्जा देते हुए उनकी जीत के लिए हर सम्भव कोशिश की थी पर जीत सोनिया की हुई। रेड्डी बंधुओं के सुषमा स्वराज से संबंधों को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं लेकिन हाल ही में सुषमा ने दो टूक शब्दों में यह कह दिया कि रेड्डी बंधुओं से उनका कोई कारोबारी संबंध नहीं है। येदियुरप्पा के उत्तराधिकारी चुनने के समय भाजपा आलाकमान को रेड्डी बंधुओं से क्या रणनीति अपनानी है, इस पर भी गम्भीरता से विचार करना होगा क्योंकि यह सरकार बनाने और उखाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं।
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Sunday, 19 June 2011

क्या इतने अनुकूल माहौल का भाजपा फायदा उठा पाएगी?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th June 2011
अनिल नरेन्द्र

किसी भी विपक्षी दल के लिए न तो यूपीए सरकार से बेहतर और कोई सत्तारूढ़ सरकार हो सकती थी और न ही इतना खराब राजनीतिक माहौल जितना मनमोहन सिंह सरकार ने कर दिया है। कोई भी विपक्षी दल ऐसे राजनीतिक माहौल का इंतजार करता रहता है जब इतनी विवादास्पद केंद्र सरकार हो जितनी यह सरकार है। इस सरकार ने देश को क्या-क्या नहीं दिया? बढ़ती कीमतें, महंगाई, एक के बाद एक घोटाला, आतंकवाद जैसे ज्वलंत मुद्दे पर ढुलमुल नीति, नक्सलियों से रणनीति व इच्छाशक्ति का अभाव, तानाशाह रवैया इत्यादि इत्यादि। कहने का मतलब है कि भारतीय जनता पार्टी जो प्रमुख विपक्षी दल है वह इससे बेहतर राजनीतिक वातावरण की उम्मीद नहीं कर सकती थी। खुद भाजपा नेता अरुण जेटली कहते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को राजनीतिज्ञ नहीं बल्कि नौकरशाह चला रहे हैं। आजादी के बाद की इतनी भ्रष्ट, निकम्मी और कूर सरकार जनता ने पहले कभी नहीं देखी थी। यह सरकार अपने पांच वर्ष पूरे नहीं करेगी क्यों जनता अब कांग्रेस सरकार को फूटी आंख भी देखना नहीं चाहती है। यह कड़ी टिप्पणी राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता अरुण जेटली ने प्रदेश भाजपा द्वारा आयोजित संघर्ष के एक वर्ष कार्यक्रम में हाल में कही। जेटली ने कहा कि भाजपा को आंदोलन करने का शौक नहीं है पर मनमोहन सिंह सरकार रोज एक के बाद एक ऐसी गम्भीर गलतियां कर रही है कि भाजपा को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। देश को ऐसा प्रधानमंत्री चला रहा है जो अदृश्य है। पर्दे के पीछे सत्ता की बागडोर किन्हीं अन्य हाथों में है, इतिहास में ऐसा कहीं देखने को नहीं मिलता, जहां सो रहे हजारों निहत्थे लोगों पर रात के अंधेरे में पुलिस टूट पड़ती हो, सोते हुए महिलाओं और बच्चों पर लाठियां बरसाई जाएं, आंसू गैस के गोले दागे जाएं। बन्द पंडाल में कहीं भी आंसू गैस के गोले नहीं छोड़े जाते हैं। जेटली ने इस सरकार को हैडलैस चिकन कहा। इसका मतलब है कि इस सरकार का कोई सिर-पैर नहीं, कोई वालीवारिस नहीं है।
मनमोहन सिंह सरकार का जो खाका जेटली साहब ने खींचा है वह बहुत हद तक सही है पर सवाल यह उठता है कि जब मनमोहन सिंह सरकार की इतनी बुरी दशा बन गई है तो इसका राजनीतिक लाभ क्या प्रमुख विपक्षी दल के नाते भारतीय जनता पार्टी उठा पा रही है? हमने देखा कि भाजपा विपक्ष में होते हुए भी विपक्ष की भूमिका सही तरीके से नहीं निभा पाई। मैं यूपीए-1 की बात कर रहा हूं। तब भाजपा नहीं वाम दल प्रमुख विपक्ष की भूमिका बेहतर निभा रहे थे। यूपीए-2 में तो कामरेड मौजूद नहीं और सारा विपक्षी दारोमदार भाजपा पर ही आ जाता है पर ईमानदारी से भाजपा नेताओं को प्रश्न करना होगा कि क्यों नहीं वह स्थितियों का फायदा उठा पा रहे हैं? क्या कारण हैं कि इतना अनुकूल माहौल होने के बावजूद आज जनता में वह इतना विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे कि जनता उन्हें केंद्र में सत्ता सौंपने की हिम्मत जुटाए? इसमें कोई शक नहीं कि राज्यों में भाजपा सरकारें अच्छा काम कर रही हैं, उनकी छवि भी अच्छी है और जनता को कहने को वह कह सकते हैं कि हम केंद्र में भी ऐसा शासन दे सकते हैं तावक्ते कि आप हमें मौका दें पर राज्यों में अगर भाजपा सरकारें अच्छा काम कर रही हैं तो उसका मुख्य कारण है मजबूत नेतृत्व। हर राज्य में एक मजबूत मुख्यमंत्री है और उसी मुख्यमंत्री के रहते, उसकी वजह से ही राज्य में अच्छा शासन चल रहा है। गुजरात में नरेन्द्र मोदी, मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान, उत्तराखंड में रमेश चन्द्र पोखरियाल निशंक इत्यादि। इनकी व्यक्तिगत छवि और दृष्टि, कारगुजारी ही अच्छे शासन की प्रमुख वजह है न कि केंद्रीय नेतृत्व। केंद्र में तो भाजपा नेतृत्व न के बराबर है। दुःख से कहना पड़ता है कि यह दूसरी पंक्ति के युवा नेता आपस में ही एक-दूसरे की काट करने से नहीं बाज आते। न तो इनकी नजरों में पार्टी का कोई महत्व है और न ही इन्हें इस बात की परवाह है कि कार्यकर्ता क्या सोचता है, जनता की तो बात छोड़ो। इनके अपने-अपने निजी एजेंडे पार्टी एजेंडे से ऊपर हैं। निजी महत्वाकांक्षाएं संगठित ढंग से काम करने में आड़े आ रही है। यही वजह है कि इतना अच्छा माहौल होने के बावजूद आज जनता में यह वह विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे जो करना चाहिए था। अटल जी आडवाणी जी के नेतृत्व में भाजपा ने सुनहरा युग देखा। उनके रहते पार्टी, पार्टी लगती थी, उनकी अपनी छवि थी, कार्यकर्ताओं से वह जुड़े थे, जनता की नब्ज को समझते थे पर आज का नेतृत्व अपने एयरकंडीशन कमरों में ही अपना गुणगान कर अंक बढ़ाता रहता है।
दुःख की बात है पर सच यही है कि आज भारत की जनता का सभी राजनीतिक दलों से, नेताओं से विश्वास उठ चुका है। उसकी नजरों में सभी एक समान हैं यानि कि हमाम में सब नंगे हैं। वह भाजपा से जानना चाहती है कि जो समस्याएं आज देश के सामने मुंह फाड़ रही हैं उनसे अगर उन्हें मौका मिले तो वह कैसे निपटेंगे? वह जानना चाहती है कि भाजपा नेतृत्व कौन-कौन से ऐसे कदम उठाएगा जिससे घोटाले रुकें, कीमतों पर नियंत्रण हो, महंगाई कम हो, बेरोजगारी घटे, कानून-व्यवस्था सुधरे, बिजली-पानी जैसी ज्वलंत समस्याओं का समाधान हो? क्यों जनता इन पर ज्यादा विश्वास करे? यह है कि कुछ प्रश्न जिनका मेरी राय में भाजपा नेतृत्व को जवाब देना होगा। जनता को बताना होगा कि अगर आप हमें सत्ता में लाएं तो हम आपकी इन समस्याओं का ऐसे समाधान करेंगे पर इसके लिए सबसे पहले भाजपा को अपना घर साधना होगा। उसे सही नेतृत्व तय करना होगा। अपनी प्राथमिकताएं सही करनी होंगी। अब तो भाजपा यह भी नहीं कह सकती कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उनके कामकाज में दखलंदाजी करता है। संघ जब से मोहन भागवत के हाथ आया है, राजनीति से कुछ हद तक अलग हो गया है, अब संघ रोजमर्रा के मामलों में दखल नहीं देता। हो सकता है कि भाजपा के कुछ नेताओं को मेरे विचार अच्छे न लगें पर उन्हें समझना चाहिए कि मैं जो कुछ कह रहा हूं यह एक तरह से जनता की आवाज है और आज बहुत से लोग यह चाहते हैं कि भाजपा पहले अपना घर ठीक करे ताकि जल्द आने वाले मौके का पूरा-पूरा फायदा उठा सके।
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Thursday, 9 June 2011

उमा भारती की वापसी : सही दिशा में सही कदम


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th June 2011
अनिल नरेन्द्र
अंतत भाजपा के प्रधानमंत्री पद के तमाम दावेदारों के विरोध के बावजूद भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उमा भारती को वापस पार्टी में शामिल कर लिया है। जब उमा भारती को भाजपा में फिर शामिल करने की घोषणा गडकरी पार्टी मुख्यालय में कर रहे थे तो उनका धुर विरोध करने वाले अरुण जेटली व सुषमा स्वराज और वेंकैया नायडू नदारद थे। दरअसल उमा भारती की वापसी के पीछे कई कारण, कई मजबूरियां थीं। सबसे अहम बात तो यह है कि आजकल सभी पार्टियों का फोकस मिशन यूपी 2012 पर लगा हुआ है। भाजपा नेतृत्व यह समझ रहा है कि कांग्रेस की हवा दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है पर इससे भाजपा का रास्ता आसान नहीं हो रहा है। दिल्ली की गद्दी का रास्ता वाया यूपी आता है। इसलिए अगर उत्तर प्रदेश में पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तो दिल्ली दरबार तक पहुंचना आसान नहीं होगा। यूपी में वैसे भी भाजपा के नेतृत्व का अभाव है, जो नेता हैं वह तमाम पूंके कारतूस की तरह हैं। भाजपा को यूपी में नई जान पूंकने के लिए एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो युवाओं, महिलाओं, पिछड़ों व हिन्दुत्व वोटों को एक साथ पार्टी के पीछे ला सके। उमा भारती में नितिन गडकरी को लगा कि यह सब खूबियां मौजूद हैं। वह कुशल प्रशासक भी हैं। जब वह मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं तो उन्होंने अच्छा शासन दिया था। उन्हीं के बल पर पार्टी सत्ता में आई थी।

उमा भारती की छह साल बाद वापसी हुई है। भाजपा नेतृत्व व रणनीतिकारों का मानना है कि जिस तरह से उमा भारती आक्रमक राजनीति करती हैं उनका मुकाबला उनके शब्दों और शैली में करने के लिए पार्टी के पास कोई वैसा नेता प्रदेश में मौजूद नहीं था जो उनकी भाषा में उनको जवाब दे सके। भाजपा का मानना है कि यदि पार्टी को उत्तर प्रदेश में सीटों में बढ़ोतरी न भी कर पाए तो भी वह जिस शैली में भाषण देती हैं उससे पार्टी के एक माहौल बनाने में सहायता अवश्य मिलेगी। सामाजिक संरचना की दृष्टि से भी अगर देखा जाए तो पार्टी को कद्दावर नेता रहे कल्याण सिंह की पार्टी से छुट्टी और पुनर्वापसी के बाद भी पार्टी अपने रुठे पिछड़े वर्ग को पार्टी में जोड़ने में असफल रही। उमा भारती का लोद जाति का होना भी पार्टी के लिए अच्छा है। हो सकता है कि जातिवाद की राजनीति के लिए मशहूर उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग शायद उमा के कारण पार्टी से जुड़ जाए?

उमा भारती की मुश्किल यह है कि जब उन्हें गुस्सा आता है तो वह सब कुछ भूल जाती हैं और अपने आपे से बाहर हो जाती हैं। मुझे वह सीन आज भी याद है जब लगभग साढ़े पांच वर्ष पूर्व उमा भारती ने मीडिया के सामने ही लाल कृष्ण आडवाणी की उपस्थिति में पार्टी के कुछ लोगों पर ऑफ द रिकॉर्ड बात करने, छवि खराब करने और अपनी उपेक्षा का आरोप लगाया था और भरी मीटिंग से उठकर चली गई थीं। तब भाजपा संसदीय बोर्ड ने छह दिसम्बर 2005 को उन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया था। जहां हम समझते हैं कि श्री नितिन गडकरी ने सही दिशा में एक सही कदम उठाया है वहीं उमा ने भी पिछले पांच-छह सालों में सीख ली होगी और भविष्य में वह अनुशासन की लक्ष्मण रेखा नहीं लांघेंगी।
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Tuesday, 17 May 2011

भाजपा के इस शर्मनाक प्रदर्शन का जिम्मेदार कौन?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17 May 2011
अनिल नरेन्द्र
भाजपा के लिए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव बेहद निराशाजनक रहे। असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और प. बंगाल में भाजपा राष्ट्रीय दल के रूप में पहचान के लिए तरस गई। कर्नाटक में उपचुनावों में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने जरूर अपना दबदबा बनाए रखा। चुनावों में पहली बार भाजपा के बड़े नेताओं की अपनी रणनीतिक कौशल दिखाने के लिए ड्यूटी लगाई गई थी, लेकिन कोई भी नेता अपना चमत्कार नहीं दिखा सका। भाजपा को असम और पश्चिम बंगाल में अच्छे परिणाम की उम्मीद थी। पार्टी को केरल में भी अपना खाता खोलने की पूरी उम्मीद थी। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज के पास दक्षिण के राज्यों तमिलनाडु और केरल की कमान थी। विजय गोयल के पास असम और चन्दन मित्रा के पास पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी थी। उनके ऊपर सुपर बोस थे अरुण जेटली।
भाजपा को सबसे बड़ा झटका असम में लगा है। सवाल हो रहा है कि आखिर पूर्वोत्तर के इस राज्य में भाजपा क्यों पिटी? वह भी तब जबकि सबसे ज्यादा ताकत भाजपा नेतृत्व ने इसी राज्य में लगाई थी। पार्टी के चार-चार महासचिव असम में डेरा डाले रहे। पार्टी के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी से लेकर अरुण जेटली तक लोगों से वोट मांगने के लिए उतरे। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने दर्जनों सभाएं संबोधित की। लेकिन इन सबके बाद भी पार्टी की लुटिया डूब गई। राज्य में सरकार बनाने का सपना पाले भाजपा के नेताओं को उम्मीद थी कि असम गण परिषद (एजीपी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बाद सरकार बन जाएगी और सरकार न भी बनी तो पार्टी एक बड़ी ताकत के रूप में उभरेगी। मगर पार्टी पिछले विधानसभा चुनाव में जीतीं 10 सीटों का आंकड़ा भी नहीं छू पाई और असम की विधानसभा में पार्टी की ताकत आधी हो गई।
पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में भाजपा खाता खोलने के लिए ही चुनाव लड़ रही थी पर केरल में उसका यह सपना इस बार भी साकार नहीं हो पाया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी ने तो कटाक्ष भी किया कि भाजपा खुद को राष्ट्रीय पार्टी कहती है लेकिन पांच राज्यों की लगभग 800 विधानसभा सीटों में से वह आठ सीटें भी नहीं जीत पाई। पश्चिम बंगाल में भाजपा को एक सीट मिली है जबकि असम में चार सीटों से ही संतोष करना प़ड़ा। बाकी कहीं खाता नहीं खुल सका है। अब भाजपा नेतृत्व भले ही यह कहकर अपनी झेंप मिटा रही हो कि हमें तो पहले से ही बहुत उम्मीद नहीं थी। भाजपा नेताओं ने केरल में अपनी पूरी ताकत इसलिए लगाई थी कि अगर वहां कमल खिल जाता तो वह इस बात का ढिंढोरा पीट सकती थी कि दक्षिण के लालगढ़ में भी हम पहुंच गए हैं। भाजपा को केरल में 9 फीसदी वोट जरूर मिले पर खाता नहीं खोल पाई। असम और प. बंगाल में भाजपा के लिए सबसे रणनीतिक असफलता यह रही कि दोनों ही राज्यों में पार्टी का किसी दल या गठबंधन के साथ तालमेल नहीं हो पाया। इस शर्मनाक प्रदर्शन के लिए जवाब कौन देगा? राज्य के प्रभारी और महासचिव विजय गोयल, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वरुण गांधी या फिर खुद अध्यक्ष नितिन गडकरी?

Friday, 22 April 2011

भाजपा में बढ़ता असंतोष व अनुशासनहीनता को कौन रोके?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 22 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

किसी भी सियासी दल के लिए अनुशासन बहुत जरूरी होता है। उस पार्टी के नेतृत्व में इतनी क्षमता बर्दाश्त और कार्यकर्ताओं से लगातार सम्पर्प बनाए रखने की काबलियत होनी चाहिए। अगर नेताओं में अहंकार आ जाए और वह सत्ता में इतने गैर-जवाबदेही हो जाएं कि उन्हें न तो पार्टी की परवाह हो, न ही कार्यकर्ता की तो उस पार्टी में विद्रोह और असंतोष फैल जाता है। एक समय में भारतीय जनता पार्टी इन आरोपों से बची हुई थी पर वर्तमान पार्टी नेतृत्व बुरी तरह से विभिन्न कारणों से फेल होता नजर आ रहा है। हम देख रहे हैं कि भाजपा की विभिन्न राज्य ईकाइयों में असंतोष, अनुशासनहीनता बढ़ती जा रही है। भाजपा में इन दिनों कई राज्यों में बगावत का माहौल है। देश के उत्तरी छोर जम्मू-कश्मीर से लेकर पंजाब, राजस्थान, दिल्ली व झारखंड तक पार्टी के अन्दर जारी गुटबाजी अब खुलकर सतह पर आ गई है। कहीं तो यह खुली बगावत का रूप ले चुकी है तो कहीं अन्दर ही अन्दर असंतोष पनप रहा है। पार्टी आलाकमान ने हर तरफ स्थिति सम्भालने के लिए अपने सिपाही भेजे हैं मगर ज्यादातर मामलों में इनकी कोशिशें अभी तक फेल ही हुई हैं।
पार्टी को सबसे बड़ा झटका जम्मू में लगा। अमरनाथ आंदोलन के बाद जनता ने भाजपा पर भरोसा करते हुए उसे 11 विधायकों की बम्पर जीत दी। पार्टी अपना आधार बढ़ाने की तैयारी कर रही थी कि सात विधायकों की क्रॉस वोटिंग से उसके पांव तले जमीन खिसक गई। सूत्रों से पता चला है कि विधायकों के भीतरघात के पीछे प्रदेश अध्यक्ष शमशेर सिंह का रवैया भी बड़ी वजह है। ये नेता लम्बे अरसे से अपनी शिकायत संगठन के कार्यकर्ताओं को पहुंचा रहे थे मगर मामला हाथ से निकल गया। खिसयाए नेतृत्व ने सभी 11 विधायकों का इस्तीफा ले लिया है। उधर पार्टी आलाकमान की नाक के नीचे राजधानी दिल्ली में भी हालात बिगड़ते जा रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता की नए मेयर के चुनाव में खुली छूट देना पार्टी के लिए सिरदर्द साबित हुआ है। पार्टी के प्रभारी महासचिव अरुण जेटली आजकल सातवें आसमान पर हैं। उन्हें न तो दिल्ली भाजपा की कोई परवाह है, न ही कार्यकर्ताओं की। विधायक, कार्यकर्ता करें तो क्या करें?
झारखंड में तो पार्टी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा अपनी ही सरकार के खिलाफ बेमियादी धरने पर बैठ गए। मामला था प्रदेश में अतिक्रमण हटाने के अदालत के आदेश का। सिन्हा पीड़ित लोगों की तरफदारी से धरने पर बैठ गए और अर्जुन मुंडा सरकार से मांग कर दी कि इसके लिए अध्यादेश जारी करके लोगों को राहत दे। पंजाब में पार्टी गठबंधन में मतभेद के चलते स्वास्थ्य मंत्री लक्ष्मी कान्ता चावला का इस्तीफा लेने की बार-बार कोशिश कर रही है मगर कामयाब नहीं हो सके। राजस्थान में भी नेता विपक्ष वसुंधरा राजे ने प्रदेश प्रमुख अरुण चतुर्वेदी की ओर से गठित टीम पर एतराज किया। नतीजतन पार्टी को कई नाम बदलने पड़ गए। कर्नाटक व उत्तराखंड में तो पार्टी की अंदरुनी उठापटक रोज की बात हो गई है। प्रवक्ता निर्मला सीतारमण ने कबूल किया कि इन सारी चीजों से लगता है कि संगठन को और मजबूत करने की जरूरत है लेकिन इसे इस सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए। कई प्रदेशों में पार्टी सिफर थी। सवाल यह है कि भाजपा में आई इस गिरावट को थामेगा कौन? केंद्रीय नेतृत्व या तो खुद गुटबाजी में व्यस्त है या फिर नेताओं का सत्ता भोग सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। आज यह उस पार्टी को भी भूल गए हैं जिसकी बदौलत ये नेता यहां तक पहुंचे हैं।