Translater

Showing posts with label State Elections. Show all posts
Showing posts with label State Elections. Show all posts

Sunday, 13 May 2012

ऐसी लीपापोती समीक्षा से कांग्रेस का कोई भला नहीं होगा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13 May 2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस चुनाव हारी इसकी समीक्षा करने के लिए पिछले कई दिनों से कांग्रेस में आत्म मंथन चल रहा है। कई बैठकें हुईं, कई कमेटियां बनीं पर अंत में नतीजा वही सिफर निकला। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लीपापोती करते हुए कहा कि पार्टी में गुटबाजी और अनुशासनहीनता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। हमने सोचा था कि सोनिया जी पार्टी के लिए हार के जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई करेंगी पर उन्होंने ऐसा न करना बेहतर समझा और डरा-धमका कर मामले को रफा-दफा करने का प्रयास किया। ऐसी चेतावनियां सोनिया पहले भी दे चुकी हैं। बुराड़ी में दो साल पहले हुए कांग्रेस के सम्मेलन में सोनिया गांधी ने कार्यकर्ताओं से गुटबाजी छोड़ कमर कसने को कहा था। पिछले साल दिल्ली में भी पार्टी के एक सम्मेलन में सोनिया ने पद की लालसा करने वालों पर चुटकी लेते हुए कहा था कि कांग्रेस में सबका नंबर आता है। सोनिया के कथन का कांग्रेसियों पर कोई असर नहीं हुआ और न ही उन्होंने सोनिया की बात को संजीदगी से ही लिया, नतीजा सामने है। कांग्रेस पिछले दो साल में बिहार, यूपी, पंजाब, गोवा हार चुकी है। आंध्र प्रदेश में भी उसकी हालत खस्ता है। राजस्थान में गहलोत सरकार के हालात भी दुरुस्त नहीं हैं। मुंबई नगर पालिका रही हो या फिर दिल्ली नगर निगम सब जगह कांग्रेस को झटके पर झटके लग रहे हैं। बिहार और यूपी में तो चुनावी कमान राहुल गांधी के हाथों में थी पर सोनिया ने खुद पर और राहुल पर जिम्मेदारी लेकर एक नए विवाद को जन्म देने से पहले ही खत्म कर दिया और इससे पहले कि कोई राहुल पर उंगली उठाए, मामले को समाप्त कर दिया। यह ठीक है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की धुरी चुनाव है लेकिन जिस आधार पर चुनावी कामयाबी मिलती है और उसकी सोच व कार्यपद्धति भी मायने रखती है। उसके जरिए ही सत्ता मिलती है जो जनकल्याण के काम को सम्भव करा पाती है। कांग्रेस को यह समझ विरासत में मिली है, फिर भी वह हाल के दशक में अगर इससे डिगी हुई लगती है तो इस पर उसको गम्भीरता से आत्म मंथन करना चाहिए पर आत्म मंथन ऐसा नहीं होना चाहिए जिसका कोई अर्थ ही नहीं निकले। मौजूदा हालात में यह कहना दुखद है कि कांग्रेस भी अपनी कमजोरी और पराजय के कारणों पर बस मंथन कहने भर के लिए करती है। वास्तविक अर्थों में वह ऐसा करने से हिचकिचाती है। अगर कांग्रेस गम्भीर होती तो विभिन्न प्रदेशों में समय-समय पर हुई पराजयों और उसकी समीक्षा के लिए गठित समितियों की तरफ से गिनाए जाने वाले कारण अब तक दूर कर लिए गए होते। निश्चित रूप से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को यह मालूम है कि प्रदेश में सभी क्षत्रपों के अपने-अपने गुट हैं और आम कार्यकर्ताओं की जगह उनके ही चापलूस हैं जिनसे ही वे घिरे रहते हैं। वे आम कार्यकर्ताओं के भी नेता हैं, ऐसा नहीं मानते। सम्भवत इसका एक कारण नेताओं के कार्यकर्ताओं में जोश भरने की जगह अपने स्वार्थ हावी होना है। वे यह मान कर चलते हैं कि वोट डलवाने के लिए गांधी परिवार काफी है। इसके आगे न तो उन्हें महंगाई का न भ्रष्टाचार का और न ही बढ़ती बेरोजगारी मुद्दा हो सकती है। इनके सामने बुनियादी सुविधाएं जैसे बिजली, पानी है पर अंकुश लगाने के लिए लोकपाल, लोकायुक्त की नियुक्ति जरूरी है। विडम्बना यह है कि कांग्रेसी छुट भैया यह भी नहीं समझना चाहते कि अब गांधी परिवार का वह करिश्मा नहीं रहा। पहले बिहार और फिर उत्तर प्रदेश ने यह जता दिया है गांधी परिवार वोट खींचू या चुनाव जिताने-जीतने की गारंटी अब नहीं है। सारा जोर लगाकर भी गांधी परिवार की तीसरी पीढ़ी के वारिस उत्तर प्रदेश में दृश्य प्रवर्तक नहीं हो सके। बिहार ने तो सिरे से राहुल गांधी को खारिज कर दिया। इसलिए कि उनकी टीम के बाकी नेताओं ने कुछ ठोस काम ही नहीं किया और जनमानस में वह यह विश्वास पैदा नहीं कर सके कि कांग्रेस को वोट देने में ही उनकी भलाई है। गौर तो इस पर होना चाहिए था कि टीम राहुल सरजमीनी कम हवाई ज्यादा क्यों रही? पर पार्टी अध्यक्ष ने राहुल को केंद्र में रखकर चुनावी समीक्षा नहीं की। अगर कांग्रेस वाके ही पार्टी में सुधार चाहती है तो हार के सही कारणों पर चर्चा करने का साहस दिखाए और कसूरवार नेताओं पर सख्त कार्रवाई करे ताकि पार्टी के बाकी नेताओं में एक भय पैदा हो सके। कांग्रेस को अगर इस साल होने वाले गुजरात और हिमाचल प्रदेश समेत कई राज्यों में चुनावों को फतह करना है तो उसे केंद्र में अपनी लुंज-पुंज मनमोहन सरकार की कमियों पर भी गौर करना चाहिए। अनुशासनहीनता और गुटबाजी से परहेज की नसीहत को पालन लायक बनाने के लिए उदाहरणों का ऐसा आधार दिया जाना चाहिए ताकि उस पर पार्टी की निष्ठा टिक सके। यह लीपापोती समीक्षा का कोई फायदा नहीं।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Rahul Gandhi, Sonia Gandhi, State Elections, Vir Arjun

Monday, 9 April 2012

राहुल लगे यूपी चुनाव के पोस्टमार्टम में

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9 April 2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में करारी हार से कांग्रेस हाई कमान अभी तक उभर नहीं सका। राहुल गांधी तो ऐसे कोपभवन में गए हैं कि अब वह यूपी के किसी दलित के घर खाना खाते नजर नहीं आ रहे। हार के एक महीने के बाद अब राहुल ने चुनावों का पोस्टमार्टम करने की हिम्मत जुटाई है। पिछले दो दिनों से राहुल हारे हुए सिपाहियों को बुलाकर पूछ रहे हैं कि आखिर हम क्यों हारे? हार के कारणों की तलाश में जुटे राहुल ने हारे हुए उम्मीदवारों से यह पूछा कि आखिर क्या वजह रही कि पूरी मेहनत के बाद भी पार्टी का शर्मनाक प्रदर्शन रहा? हारे हुए उम्मीदवारों ने कई कारण गिनाएं। तकरीबन सभी ने कुछ मुद्दों पर बहुत जोर दिया। पहला तो था कि कमजोर संगठन बहुत भारी पड़ा। गलत उम्मीदवार का चयन एक हार का कारण बना। इसके साथ प्रचार में राजनीतिक चूक का मुद्दा उठाकर हारे हुए सिपाहियों ने कुछ केंद्रीय मंत्रियों पर जमकर भढ़ास निकाली। पराजित उम्मीदवारों ने कहा कि कानून मंत्री को मुस्लिम आरक्षण का वादा करना पार्टी पर बहुत भारी पड़ा। इसी तरह श्रीप्रकाश जायसवाल का यह बयान कि अगर किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाएगा मतदाताओं को बहुत चुभा और उन्होंने प्रतिक्रिया स्वरूप समाजवादी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दे दिया। बेनी प्रसाद वर्मा का मुस्लिम कोटे में सब कोटा भी मतदाताओं खासकर मुस्लिमों को बेवकूफ बनाने का एक असफल प्रयास माना गया। कमजोर संगठन के मुद्दों पर उम्मीदवार रहे सुरेन्द्र गोयल ने कहा कि दूसरी कतार के कुछ बड़े नेताओं ने निरर्थक बयानबाजी की, इससे काफी नुकसान हुआ। कुछ अन्य नेताओं ने भी यही आरोप दोहराया। इशारा दिग्विजय सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा, सलमान खुर्शीद, श्रीप्रकाश जायसवाल जैसे नेताओं के विवादित बयानों की ओर था। बाहरी लोगों को टिकट देने का मामला बैठक में आया तो आपस में ही बहस हो गई। क्योंकि ज्यादातर फौज चुनाव में बाहर से ही इकट्ठा हुई थी। समीक्षा बैठक में आए लोगों में भी ज्यादा ऐसे ही थे जो चुनाव के दौरान कांग्रेसी हुए थे। गुरुवार को राहुल ने उन पराजित उम्मीदवारों से बातचीत की जिन्होंने इस चुनाव में 20 हजार या उससे ज्यादा वोट हासिल किए। पराजित उम्मीदवारों को एक प्रश्नावली भी दी गई जिसमें 13 सवाल पूछे गए। जैसे उन्हें चुनाव में केंद्रीय नेतृत्व, प्रदेश कांग्रेस समिति, प्रदेश अध्यक्ष, महिला कांग्रेस और सेवा दल से क्या सहयोग मिला? हालांकि पूरे सूबे में घूमने वाले और कड़ी मशक्कत करने वाले राहुल गांधी को किसी ने सीधा निशाना तो नहीं बनाया पर हां, उनके मैनेजरों पर सवाल जरूर उठाए। स्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों में अपने ऊटपटांग बयानों के लिए चर्चा में रहे कांग्रेसी नेताओं की वाट लगनी तय है। सोनिया और राहुल दोनों ने साफ कर दिया है कि इन बयानों से चुनाव में पार्टी को नुकसान हुआ और अब नए कर्मठ चेहरों को आगे लाया जाएगा। राहुल को इस बात के लिए कड़ी आलोचना सहनी पड़ी कि वे सिर्प चन्द नेताओं से ही घिरे रहते थे जिससे पूरा परिपेक्ष उनके सामने नहीं आ पाता था।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Rahul Gandhi, State Elections, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Sunday, 25 March 2012

क्या कहती है यूपी की हार पर कांग्रेस की गोपनीय रिपोर्ट?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25 March 2012
अनिल नरेन्द्र
हाल ही में खत्म हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार पार्टी नेतृत्व पचा नहीं पा रहा है। बावजूद कड़ी मशक्कत के पार्टी को करारी हार का मुंह देखना पड़ा। पार्टी को सबसे ज्यादा चिन्ता सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र और युवराज राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र में हार की है। इस हार के कारणों को जानने के लिए पार्टी ने कई रिपोर्टें तैयार कराई हैं। राहुल गांधी के करिश्मे का फायदा न मिल पाने के लिए जहां कांग्रेस नेतृत्व कमजोर संगठन, गलत टिकटों का बंटवारा बता रहा है वहीं हकीकत कुछ और ही उभरकर आ रही है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की अगुवाई में सेंट्रल इलेक्शन कमेटी के लिए बनी एक विशेष रिपोर्ट में कहा गया है कि पार्टी के युवराज राहुल गांधी की मंडली भी हार के लिए जिम्मेदार है। इसमें कहा गया है कि एक-दूसरे से बेहद ईर्ष्या करने वाले लोगों के छोटे लेकिन प्रभावशाली गुट और राजनीतिक दमखम की कमी वाले उम्मीदवारों को टिकट दिए जाने से चुनाव के नतीजे पार्टी के लिए निराश करने वाले रहे। रिपोर्ट में कहा गया है कि जातिवाद और वरिष्ठ नेताओं के अहंकार को भी हार का कारण माना गया है जिसकी वजह से जमीनी कार्यकर्ता चुनाव में पूरी ताकत लगाने के बजाय तटस्थ रहा। कांग्रेस की इस हार की `पोस्टमार्ट्म' की इस पहली रिपोर्ट में सूबे के 33 सीटों पर फोकस किया गया है। इन सभी सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा है, जहां राहुल के करीबियों ने दखल देकर अपनी मर्जी के उम्मीदवारों को टिकट दिलाए थे। इन सभी सीटों पर कांग्रेस के पर्यवेक्षकों द्वारा चुने गए उम्मीदवारों और स्थानीय कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई। फिरोजाबाद में सिरसागंज सीट का उदाहरण सामने है जहां कांग्रेस उम्मीदवार हरिशंकर यादव महज 4224 वोट लेकर पांचवें स्थान पर रहे। पर्यवेक्षकों और स्थानीय कार्यकर्ताओं की पहली पसंद ठाकुर दलबीर सिंह तोमर थीं। राहुल ने विशेष जोर देकर यादव को टिकट दिलवाया। इसी तरह एटा जिले में अलीगंज सीट पर पार्टी के उम्मीदवार रज्जन पाल सिंह 8160 मतों के साथ पांचवें स्थान पर रहे। इस सीट पर पार्टी के आब्जर्वर ने बिजनेसमैन सुभाष वर्मा को टिकट की वकालत की थी। लोध राजपूत से ताल्लुक रखने वाले वर्मा जिला पंचायत के सदस्य भी हैं। वे इस विधानसभा क्षेत्र में लोध समुदाय के एकमात्र उम्मीदवार थे, जो 27,000 लोध वोटरों के अधिकतर वोट हासिल कर सकते थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं की उपेक्षा से उन्होंने पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ ही काम किया और उसे हरवाने में जुट गए। प्रदेश के एक मुस्लिम सांसद ने कहा कि जो रिपोर्टें अब मिल रही हैं हम लोगों को तो पहले से ही पता था। इस बारे में राहुल गांधी को भी सचेत किया गया था लेकिन उन्होंने इस ओर ध्यान नहीं दिया। मुस्लिम नेता के रूप में केवल सलमान खुर्शीद को आगे बढ़ाया गया जबकि मुस्लिम उन्हें अपना नेता मानते ही नहीं हैं। इसी तरह राहुल गांधी ने समाजवादी पार्टी से आए रशीद मसूद और बेनी प्रसाद वर्मा को अहमियत दी जबकि यह लोग दूसरे दलों से आए थे और इसी वजह से कांग्रेस कार्यकर्ता इस चुनाव में दूर रहा। प्रदेश के कई सांसद और नेता यह चाहते हैं कि हार के जिम्मेदार लोगों को सजा दी जाए जिन लोगों को इस चुनाव में अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यकों वाली सीटों को जीतने के लिए लगाया गया था, उन पर गाज गिरनी चाहिए।
Anil Narendra, Daily Pratap, Vir Arjun, Congress, Uttar Pradesh, State Elections, Elections, Rahul Gandhi, Bahujan Samaj Party, Ajit Singh, Samajwadi Party,

Tuesday, 13 March 2012

Nehru-Gandhi Family charm vanishes

Anil Narendra
Assembly election results for five States have been disappointing for the Congress Party on the one hand, and on the other these have proved a high voltage shock for the Nehru-Gandhi family. When asked about her reactions, the Congress President Sonia Gandhi told media on Wednesday that wrong selection of candidates and weak Party organization in UP led to the miserable performance of the Party. She said that defeat and victory are the way of life; we have lost Rai Bareilly and Amethi seats earlier also, etc. Meanwhile, her son Rahul Gandhi has accepted the responsibility for Party's election debacle. If it is a normal defeat, then question arises as to why a review is required? If Rahul has taken the responsibility, then the matter almost ends, but the question which was not replied to by Sonia Gandhi, is still there – does this defeat indirectly impact the Nehru-Gandhi family? The Congress has thrown in its present and future in UP. Rahul shouldered the election campaign, whereas the entire Gandhi-Wadra family (including children) entered the fight to save the family fort of Amethi-Rai Bareilly. People have completely rejected Nehru-Gandhi-Wadra family in Uttar Pradesh. Despite Rahul Gandhi's herculean efforts, the Congress has returned to the position of 2007 in UP. On the other hand, in the areas where Priyanka along with her husband and children took the command of the electioneering, the Congress had difficulty in saving its face. Rahul Gandhi organized more than 200 rallies. Sonia Gandhi also addressed many rallies. Party might have been able to secure more seats than 22 Assembly seats in 2007, but if we compare these with the Lok Sabha elections of 2009, then it would be sufficiently worrisome for Congress and Rahul Gandhi himself. The Rahul wave had been totally ineffective in UP and it is a bad omen for the Congress. When the elections in all these five States are being considered as the semi-final for power in the 2014 General Elections, the big jolt, that the Party has received in other States excepting Manipur, is an indication of people's apathy towards the UPA government at the Centre, especially  for the Congress.  Another shock for the Congress is the fact that the young SP leader Akhilesh has outweighed Rahul Gandhi who had been championing the cause of youths.  In fact, it would not be wrong to say that for the present, Mulayam Singh family has outweighed the Nehru-Gandhi family.  Not only the youth would be cause of concern for the Congress, but it would have to worry about Muslim votes, which have gone en masse in favour of Samajwadi Party, whereas the Congress leaders had left no stone unturned to win these votes. The blow to charismatic image of Rahul Gandhi in UP after Bihar, has led to concern in the Party. The UP election results have, however, confirmed that the magic of Nehru-Gandhi family has faded. Rahul had, with great fanfare entered into an alliance with the Rashtriya Lok Dal of Ajit Singh, but it did not prove beneficial to the Party. Performance of the Congress in Amethi-Rai Bareilly, considered to be the stronghold for Nehru-Gandhi family, has been a big blow for the Party, as in the last elections, it had secured 7 out of 10 seats in the area, when Mayawati tsunami had hit the area. This time, loosing all the five assembly seats in the parliamentary constituency of Sonia Gandhi and securing just two seats in the Rahul Gandhi parliamentary constituency and clean sweep in the district Sultanpur are the personal defeats for the Nehru-Gandhi family. Rahul Gandhi had left no stone unturned in the electioneering in the UP Assembly elections. He stayed continuously in UP for 46 days and held 211 rallies and 18 big road shows. No doubt, Rahul Gandhi has accepted the responsibility for this embarrassing defeat, but other Congress leaders, however, are not prepared to accept it as a defeat for the Nehru-Gandhi family. Boastful General Secretary Digvijay Singh has welcomed these results and called these the defeat of corrupt BSP. This is another thing that during the elections, Congress had targeted SP rather than BSP. The Party also lost on the Phulpur Lok Sabha seat  near Allahabad, of Pandit Jawaharlal Nehru, Indira Gandhi seat of Rai Berreilly, Amethi seat of Sanjay Gandhi and Rajeev Gandhi. It appears that the party organizers got an inkling of Party's weaker position. That is why Priyanka was brought here, but Party failed to open its account in Sonia Gandhi parliamentary constituency. The way the people of the area have rejected the Nehru-Gandhi family, will have far reaching impact on the Centre.

Monday, 12 March 2012

Election results bring more pain than cheer for BJP

Anil Narendra
Assembly elections in all the five States have brought more pain than cheer for the Bharatiya Janata Party. The reason for cheer is the result of Goa Assembly, where BJP and Goa Gomantak Party combined has secured clear majority. BJP, for the first time has claimed majority on its own in this State with beautiful beaches. The real hero of this BJP victory is the former Chief Minister, Parrikar. He was leading the BJP election campaign in the State. I think that securing power with the support of minority is the biggest achievement of BJP. Goa Christians have proved that BJP is not a pariah. The party has won eight seats out of 17 from Christian majority areas. BJP itself fielded 6 Christian candidates and supported two independent candidates and all the eight won. The Party has received the biggest shock in UP. The election results in Uttar Pradesh have proved to be a big blow to Party's hopes of forming RJD government at the Centre in 2014. BJP was viewing its performance in UP Assembly elections as a cornerstone for its success in 2014 General Elections, but the Assembly results have dashed its hopes and it is now more concerned about the 2014 scenario. Once again, the UP is following the path shown by Tamil Nadu, where national parties have almost taken to backstage and their role has become almost irrelevant. In UP elections considered to be election touchstone for BJP and the RSS, all their experiments, on one hand, have been shattered one by one and on the other, a number of their warriors have been grounded. RSS and the Party President Nitin Gadakari had jointly taken up the challenging task of consoling the dissatisfied voters. First, Gadakari, with the support of the RSS, propped up the former RSS Pracharak and former Organiser, Sanjay Joshi in the UP elections, in spite of strong objections from the high-statured leader and Gujarat Chief Minister, Narendra Modi. Secondly, in spite of stiff opposition from all party leaders, Gadakari admitted the ousted BSP leaders Babu Singh Kushwaha and Badshah Singh in the Party. In view of increasing opposition, he suspended the membership of Babu Singh Kushwaha, but not only kept the other corrupt leader, Badshah Singh in the Party, but made him party candidate from the Mahoba seat. Except Uma Bharati, all the BJP experiments with Bundelkhand proved unsuccessful. He restricted firebrand leaders like Varun Gandhi and Yogi Adityanath to their constituencies to stop the polarization of Muslim votes, and no effort was made to placate Narendra Modi considered to the face of Hinduism, who was invited to join the BJP election campaign, but who was not happy with the situation. In spite of all efforts, Party not only failed to stop the polarization of Muslim votes, but instead it lost its traditional voters, resulting in its failure to re-enact the 2007 performance, but its performance this time was miserably poor. This is the first occasion after the demolition of disputed structure in Ayodhya on 6th December 1992 that the BJP candidate Lallu Singh lost to Tej Narayan Pandey alias Pawan Pandey of SP. Lallu Singh has been winning this seat since 1991. Candidates for UP were also decided by RSS, Gadkari and Joshi. They fielded such weak candidates, who not only brought disgrace to the Party, but it was ousted from the race and was relegated to the fourth place and most of its candidates were unable to save their deposits. One hundred twenty two such candidates were defeated who failed to secure their place even in the four-cornered fight. The BJP President Nitin Gadakari had made comprehensive preparations to effect change in UP. He did several new experiments instead of sticking to the traditional attitude and not only this, Gadakari & Co conducted a separate survey for selection of best candidates. In the situation emerging after the elections, it came fourth with 122 candidates and most of them had to fight to save their deposit. There were a number of candidates, who were struggling hard even to get 5,000 votes. In UP, the BJP has been put on margin and responsibility for such a debacle rests on RSS and leaders like Nitin Gadakari and Sanjay Joshi.

Sunday, 11 March 2012

यूपी के मुस्लिम मतदाताओं ने सोच समझकर होशियारी से वोट दिया

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11 March 2012
अनिल नरेन्द्र
यूपी के मुसलमानों ने विधानसभा चुनाव में कुछ हद तक टेक्निकल वोटिंग की, यह कहें तो शायद गलत नहीं होगा। मैं समझता हूं कि पहली बार उन्होंने ढंग से मुस्लिम हितों को ऊपर रखकर मैच्योर वोटिंग की है। उन्होंने देखा कि कौन-सी पार्टी से कौन-सा मुस्लिम उम्मीदवार जीत सकता है, उसे ही वोट दो। नतीजों ने मुस्लिम मठाधीशों को धूल चटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उत्तरी राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल से लेकर शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी की सिफारिश के उम्मीदवारों को नकार दिया गया। उलेमा काउंसिल तो प्रदेश में अपना खाता तक नहीं खोल पाई। अपने गढ़ आजमगढ़ की निजामाबाद सीट पर खड़े काउंसिल के महासचिव ताहिर मदनी चौथे स्थान पर रहे। बेहट सीट से इमाम बुखारी के दामाद और सपा उम्मीदवार अमर अली खान चुनाव हार गए। वहीं लखीमपुर खीरी से सपा उम्मीदवार इमरान हार गए। पेशे से बिल्डर इमरान को टीले वाली मस्जिद के इमाम मौलाना शाह फजल-ए-रहमान वाहवी नदवी ने टिकट दिलवाया था। मुस्लिम मतदाताओं का यह फैसला पार्टी नहीं बल्कि उम्मीदवारों के खिलाफ था। समाजवादी पार्टी अधिकांश मुस्लिम बहुल सीटों पर कामयाब रही। इसका नमूना है कि आजमगढ़ की 10 सीटों में से 9 पर सपा उम्मीदवार विजयी रहे। गौरतलब है कि यूपी की चुनावी बिसात में करीब 150 सीटें ऐसी थीं जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में थे। इसके लिए सियासी पार्टियों के बीच रस्साकसी भी खूब चली। चुनावी लाभ के लिए मुसलमानों को आरक्षण देने की होड़ से लेकर साहित्य मेले में सलमान रुशदी की आमद तक मुद्दे उठाए गए। उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यों वाली विधानसभा में इस बार 63 मुस्लिम उम्मीदवार चुनकर आए हैं। 2007 में यह आंकड़ा 52 था। सपा के कुल 224 उम्मीदवार जीते हैं, जिनमें मुस्लिम प्रत्याशियों की संख्या 40 है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने 83 तो सपा ने 81 मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे। दोनों पार्टियों ने सभी 403 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। कांग्रेस ने अपने 359 प्रत्याशियों में 58 मुस्लिम को टिकट दिए थे। मुस्लिम बहुल इलाके में भारी मतदान हुआ। इनमें मुस्लिम महिलाओं ने अच्छी भागीदारी निभाई। सहारनपुर और आजमगढ़ के मुस्लिम बहुल क्षेत्र में तो 70 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ। बसपा के 14 मुस्लिम उम्मीदवार जीतकर आए जबकि पिछली बार 29 प्रत्याशी जीते थे। पिछले चुनाव में सपा के मुस्लिम विधायकों की संख्या 17 थी। पीस पार्टी के चार प्रत्याशी जीते जिनमें तीन मुस्लिम हैं। पार्टी के अध्यक्ष डाक्टर अयूब खलीलाबाद सीट से जीते हैं। कौमी एकता दल की ओर से माफिया से राजनीतिज्ञ बने मुख्तार अंसारी मऊ सीट से जीते हैं। सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान रामपुर से तथा वकार अहमद शाह बहराइच से जीते हैं। कांग्रेस के काजी अली खाँ रामपुर की स्बार सीट से जीते हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो यूपी के मुस्लिम मतदाताओं ने सोच-समझकर हिसाब से मतदान किया है।
Anil Narendra, Bahujan Samaj Party, Congress, Daily Pratap, Muslim, Muslim Reservation, Samajwadi Party, State Elections, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Saturday, 10 March 2012

नेहरू-गांधी परिवार का हवाई करिश्मा हवा-हवाई हो गया

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10 March 2012
अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों के चुनाव परिणाम जहां कांग्रेस पार्टी के लिए निराशाजनक हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम नेहरू-गांधी परिवार के लिए बहुत बड़ा व्यक्तिगत झटका है। जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई तो बुधवार को दिल्ली में मीडिया को उन्होंने कहा कि यूपी में उम्मीदवारों का गलत चयन और उत्तर प्रदेश में कमजोर संगठन पार्टी के खराब प्रदर्शन का कारण बना। उन्होंने कहाöहार-जीत तो होती रहती है, हम रायबरेली और अमेठी में पहले भी हारे हैं इत्यादि-इत्यादि। उधर सुपुत्र राहुल गांधी ने हार की सारी जिम्मेदारी ले ली। अगर यह हार सामान्य है तो प्रश्न उठता है कि समीक्षा की जरूरत क्या है? वैसे भी जब राहुल ने जिम्मेदारी ले ली है तो मामला खत्म-सा है पर जिस बात का सोनिया ने जवाब नहीं दिया वह है कि क्या यह हार नेहरू-गांधी परिवार पर सीधी आंच नहीं लाती? कांग्रेस ने वर्तमान और भविष्य सब कुछ उत्तर प्रदेश में झोंक दिया। राहुल ने पूरे प्रदेश का अभियान अपने कंधों पर ढोया तो अमेठी-रायबरेली का घरेलू किला बचाने के लिए पूरा गांधी-वाड्रा परिवार (बच्चे भी शामिल) मैदान में उतर गए। उत्तर प्रदेश की जनता ने नेहरू-गांधी वाड्रा परिवार को सिरे से खारिज कर दिया। राहुल के भागीरथी प्रयासों के बावजूद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस 2007 की हालत में ही पहुंच गई है, वहीं प्रियंका ने जिन इलाकों में अपने पति और बच्चों के साथ प्रचार की कमान संभाली वहां तो कांग्रेस के लिए इज्जत बचानी भी मुश्किल हो गई। राहुल गांधी ने 200 से अधिक रैलियां की। सोनिया गांधी ने भी कई रैलियां की। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव की 22 सीटों की तुलना में पार्टी को भले ही ज्यादा सीटें मिली हों पर यदि वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव को देखें तो यह कांग्रेस और स्वयं राहुल गांधी को परेशान करने के लिए काफी होगा। राहुल लहर का असर न होना कांग्रेस के लिए अशुभ संकेत है। ऐसे में जबकि इन पांच राज्यों के चुनाव को वर्ष 2014 के सत्ता के सिंहासन का सेमीफाइल कहा जा रहा था तो मणिपुर को छोड़कर अन्य जगह पार्टी को झटका लगना इस बात का संकेत है कि केंद्र की यूपीए सरकार विशेषकर कांग्रेस को लेकर लोगों में बहुत ज्यादा उत्साह नहीं है। गांधी परिवार के लिए एक झटका यह भी है कि युवाओं की बात करने वाले राहुल गांधी पर सपा के युवा नेता अखिलेश यादव भारी पड़े। देखा जाए तो यह कहना गलत न होगा कि फिलहाल तो नेहरू-गांधी परिवार पर मुलायम यादव परिवार भारी पड़ा। कांग्रेस के लिए चिन्ता की बात केवल युवा ही नहीं होगी बल्कि जिन मुस्लिमों के मतों को अपने पाले में करने के लिए कांग्रेसी नेताओं ने दिन-रात एक किए, उसकी भी बड़ी संख्या ने कांग्रेस की जगह सपा को चुना। बिहार के बाद उत्तर प्रदेश में राहुल की करिश्माई छवि को झटका लगना पार्टी के अन्दर चिन्ता का विषय बन गया था। अब उत्तर प्रदेश के परिणामों ने तो इस पर मोहर लगा दी कि नेहरू-गांधी परिवार का जादू समाप्त हो गया है। राहुल ने बड़ी धूमधाम से अजीत सिंह की रालोद से गठबंधन किया था। इस गठबंधन से उलटा पार्टी को नुकसान ही हुआ। पार्टी के लिए नेहरू-गांधी परिवार के गढ़ माने जाने वाले अमेठी-रायबरेली में कांग्रेस का प्रदर्शन इस लिहाज से बड़ा झटका है कि पिछले चुनावों में जब मायावती की आंधी चली थी तब भी इस क्षेत्र से पार्टी ने 10 में से 7 सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली की पांचों विधानसभा सीटें हारना और राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र में मात्र दो सीटें जीतना तथा सुल्तानपुर जिले में पार्टी का सूपड़ा साफ होना नेहरू-गांधी परिवार की व्यक्तिगत हार है। राहुल गांधी ने दिन-रात एक कर दिया था। उन्होंने उत्तर प्रदेश में लगातार 46 दिन रुककर 211 रैलियां और 18 बड़े रोड शो किए। इस शर्मनाक परिणाम की बेशक राहुल गांधी ने जिम्मेदारी ले ली हो लेकिन कांग्रेस के दूसरे नेता इसे गांधी परिवार की हार मानने को तैयार नहीं हैं। बड़बोले महासचिव दिग्विजय सिंह ने इन नतीजों पर खुशी जताई और कहा कि भ्रष्टाचारी बसपा की हार हुई है। यह बात अलग है कि चुनाव के दौरान कांग्रेस के मुख्य निशाने पर बसपा से ज्यादा सपा थी। जिस इलाहाबाद के पास फूलपुर से पंडित जवाहर लाल नेहरू, रायबरेली से इन्दिरा गांधी, अमेठी से संजय गांधी और राजीव गांधी लोकसभा में पहुंचते रहे वहां से भी पार्टी विफल रही। लगता है कि पार्टी की हिलती चूलों की भनक पार्टी प्रबंधकों को पहले से ही लग गई थी। इसीलिए यहां पर प्रियंका को उतारा लेकिन सोनिया के संसदीय क्षेत्र में पार्टी का खाता तक नहीं खुला। प्रदेश की जनता ने गांधी परिवार के हवाई करिश्में को जिस तरह से नकारा है, उसके केंद्र तक में खासे प्रभाव पड़ेंगे।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Goa, Priyanka Gandhi Vadra, Punjab, Rahul Gandhi, Sonia Gandhi, State Elections, Uttar Pradesh, Uttara Khand, Vir Arjun

भाजपा के लिए परिणाम ज्यादा गम और कम खुशी लेकर आए हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10 March 2012
अनिल नरेन्द्र
 भारतीय जनता पार्टी के लिए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव थोड़ी खुशी और ज्यादा गम लाए हैं। खुशी की वजह है गोवा परिणाम। गोवा में भाजपा और महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल गया है। भाजपा ने पहली बार खूबसूरत तटों वाले इस राज्य में 21 सीटें जीतकर अकेले अपने दमखम से बहुमत हासिल किया। गोवा में भाजपा की इस जीत के असल नायक पूर्व मुख्यमंत्री पार्रिकर हैं। चुनावी कमान उन्हीं के हाथों में थी। गोवा में मेरी राय में एक बहुत बड़ी उपलब्धि भाजपा की यह है कि उसने अल्पसंख्यकों के समर्थन से सत्ता पाई। गोवा के ईसाइयों ने यह साबित कर दिया कि भाजपा अछूती नहीं है। दक्षिण गोवा की 17 में से 8 सीटें पार्टी उन क्षेत्रों से जीते हैं जहां ईसाई बहुमत है। भाजपा ने खुद 6 ईसाई उम्मीदवार खड़े किए थे और 2 निर्दलीयों का समर्थन किया था। सभी आठों जीते। पार्टी को सबसे बड़ा झटका उत्तर प्रदेश में लगा है। उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम भाजपा को 2014 में केंद्र में राजग सरकार बनाने की उम्मीदों पर बड़ा झटका साबित हुए। भाजपा उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में रोपे गए बीज से केंद्र में 2014 के लोकसभा चुनावों में सफलता का अनुमान लगा रही थी, लेकिन परिणाम आए उससे निराशा और चिन्ता ही हाथ लगी है। उत्तर प्रदेश फिर एक बार तमिलनाडु की राह पर चला गया है जहां राष्ट्रीय दल की भूमिका अप्रासंगिक-सी हो गई है। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चुनावी प्रयोगशाला बने यूपी चुनावों में जहां एक-एक करके सभी प्रयोगों को धराशायी कर दिया वहीं पार्टी के कई दिग्गजों को धूल चटाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। रूठे मतदाताओं को मनाने का जिम्मा राष्ट्रीय स्वयं संघ और अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मिलकर उठाया। सबसे पहले गडकरी ने संघ के समर्थन की बदौलत पार्टी के कद्दावर नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोध के बावजूद संघ के प्रचार रहे पूर्व संगठन मंत्री संजय जोशी को यूपी के चुनावों में सक्रिय किया। दूसरा गडकरी ने सभी पार्टी नेताओ के विरोध के बावजूद बसपा से निष्कासित बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह को पार्टी में शामिल किया। बढ़ते विरोध के चलते कुशवाहा की सदस्यता को तो निलंबित कर दिया लेकिन भ्रष्टाचार के दूसरे आरोपी बादशाह सिंह को पार्टी में बनाए रखा बल्कि उनको महोबा से चुनाव मैदान में उतार दिया। पार्टी ने बुंदेलखंड को लेकर जितने भी प्रयोग किए सिवाय उसमें एकमात्र उमा भारती के अलावा कोई सफल नहीं हो सका। मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण को रोकने के लिए अपने सभी फायर ब्रांड नेताओं वरुण गांधी, योगी आदित्यनाथ को जहां अपने क्षेत्र तक सीमित कर दिया वहीं दूसरी तरफ हिन्दुवादी चेहरा माने जाने वाले नरेन्द्र मोदी को न्यौता तो भेजा लेकिन जब उनकी नाराजगी जाहिर हुई तो उन्हें मनाने का कोई प्रयास नहीं किया गया। पार्टी के सभी प्रयासों के बाद भी पार्टी मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण करने से तो न रोक सकी बल्कि वह अपने इस प्रयास में अपने परम्परागत मतदाताओं का भी वोट गंवा बैठे, जिसके चलते पार्टी 2007 के प्रदर्शन को दोहराना तो दूर रहा, उससे भी कम हो गई। अयोध्या में 6 दिसम्बर 1992 को विवादित ढांचे गिरने के बाद यह पहला मौका है जब भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी लल्लू सिंह सपा के तेज नारायण पांडे उर्प पवन पांडे से हार गया। लल्लू सिंह 1991 से लगातार यह सीट जीतते आ रहे थे। उत्तर प्रदेश के लिए उम्मीदवारों का चयन भी संघ, गडकरी और संजय जोशी ने किया। इन्होंने ऐसे फिसड्डी उम्मीदवार खड़े किए जिन्होंने न केवल पार्टी की भद्द पिटवाई बल्कि यह संघर्ष में न आकर चौथे स्थान पर रहे जहां भी ज्यादातर ने जमानत तक गंवा दी। 122 ऐसे प्रत्याशी हारे हैं जो चतुष्कोणीय लड़ाई में भी जगह नहीं बना सके। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने यूपी के अन्दर बदलाव के लिए लम्बी तैयारी की थी। पार्टी के अन्दर के पुराने परम्परावादी रवैये के बजाय कई नए प्रयोग किए और यही नहीं, गडकरी एण्ड कम्पनी ने अलग सर्वेक्षण कराया जिससे कि अव्वल प्रत्याशी चयन हो सके। चुनाव बाद जो स्थिति बनी है उसमें भाजपा के चौथे स्थान पर करीब 122 प्रत्याशी रहे जिनमें से ज्यादातर अपनी जमानत बचाने के लिए संघर्ष करते रहे। कई प्रत्याशी तो ऐसे थे जिनको 5000 वोट लाने के लाले पड़ गए। उत्तर प्रदेश में भाजपा हाशिये पर चली गई और इसके लिए जिम्मेदार हैं संघ, नितिन गडकरी और संजय जोशी सरीखे के नेता।
Anil Narendra, BJP, Daily Pratap, Elections, Goa, Nitin Gadkari, Punjab, RSS, Sanjay Joshi, State Elections, Uttar Pradesh, Uttara Khand, Vir Arjun

Thursday, 23 February 2012

क्या राहुल गांधी अब गिरफ्तार होंगे?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23th February  2012
अनिल नरेन्द्र
कांग्रेस के महासचिव युवराज राहुल गांधी आदर्श चुनाव संहिता उल्लंघन के मामले में बुरी तरह फंस गए हैं। तीन दिन तक चली रस्साकशी के बाद सोमवार को 35 किमी लंबा रोड शो निकाल कर राहुल गांधी जिला पशासन के भी निशाने पर आ गए हैं। जिला पशासन ने इसे आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए कैंट थाने में राहुल और कांग्रेस जिलाध्यक्ष महेश दीक्षित सहित 40 अन्य के खिलाफ धारा 188, 283 और 290 के तहत एफआईआर दर्ज करा दी है। इस मामले में जो एफआईआर दर्ज हुई है उसमें ऐसी धाराएं लगाई गई हैं जिसमें गिरफ्तारी का खतरा है। लिहाजा राहुल गांधी गिरफ्तार भी किए जा सकते हैं। इससे बचने के लिए उन्हें अग्रिम जमानत लेनी पड़ सकती है। इस मामले को लेकर राजनीतिक खींचतान बढ़ना स्वाभाविक ही है। कांग्रेस के पवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी का कहना है कि किसी तरह का गैर कानूनी काम रोड शो में नहीं हुआ। वैध पचार अभियान लोकतांत्रिक अधिकार का बुनियादी हिस्सा है। ऐसे में उत्तर पदेश सरकार मनमानी नहीं कर सकती। यूपी कांग्रेस नेताओं का कहना है कि ये कार्रवाई बसपा सरकार के इशारे पर की गई है। डीएम ने पूरे मामले की जानकारी संबंधित चुनाव आयोग के अधिकारी, पर्यवेक्षक और शासन को दे दी थी। कांग्रेस की जिला इकाई ने रोड शो के लिए पशासन से अनुमति मांगी थी, लेकिन जिलाधिकारी ने इसे खारिज कर दिया था। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह के तेवर तल्ख हो गए हैं। उन्होंने कल मीडिया से कहा कि मुख्यमंत्री मायावती के इशारे पर जिला पशासन उनकी पार्टी के खिलाफ फरेब करने पर लगा है। राहुल गांधी ने लखनऊ में सफल रोड शो किया था, इससे कांग्रेस की हवा बनी थी। इसी को लेकर कानपुर के पशासन को लखनऊ से निर्देश दिए गए थे कि किसी भी हालत में कानपुर में लखनऊ जैसा सफल रोड शो न हो पाए। इसके बावजूद सफल रोड शो हो गया तो खीझकर पशासन ने तमाम आपराधिक धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। कांग्रेस को चुनौती है कि यदि अधिकारियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया तो उन्हें महंगा पड़ेगा। जिन धाराओं में केस दर्ज किया गया है उनमें आरोपियों को 6 महीने की सजा हो सकती है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में राहुल और उनके साथियों को अग्रिम जमानत लेनी पड़ेगी। वरना गिरफ्तारी का खतरा बना रहेगा। खबर आई है कि आरपार की लड़ाई के लिए तैयार कांग्रेस राहुल के खिलाफ दर्ज एफआईआर को खारिज कराने के लिए हाईकोर्ट तक जाएगी। चूंकि मामला अब राजनीतिक बन गया है इसीलिए भाजपा भी इसमें कूद पड़ी है। भाजपा पवक्ता शाहनवाज हुसैन का कहना है कि कांग्रेस नेताओं की आदत बन गई है कि बार-बार चुनाव आयोग के नियमों को ठेंगा दिखाना। पहले कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कारनामा किया। इसके बाद केंद्रीय मंत्री बेनी पसाद वर्मा ने आचार संहिता की धज्जियां उड़ाईं और अब कानपुर में राहुल गांधी ने रोड शो के नाम पर चुनाव आयोग के नियम तोड़े। इस पर पशासन ने कार्रवाई की तो कांग्रेस दादागीरी पर उतर आई है। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। मामला अब आगे बढ़ेगा, देखें क्या होता है?
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Rahul Gandhi, State Elections, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Thursday, 16 February 2012

उत्तर पदेश में चल रहा है एक साइलैंट करंट

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 16th February  2012
अनिल नरेन्द्र
ऐसा कौन सा मुद्दा है जिसे यूपी के नेता समझ नहीं पा रहे और जनता समझ गई है? मंडल-कमंडल के उन्मादी और उत्तेजक माहौल में भी जब उत्तर पदेश में 57 फीसदी से ज्यादा मतदान नहीं हुआ, इस बार पता नहीं कौन सा अंडर करंट चल रहा है कि इतना भारी मतदान हो रहा है। सतह पर बिल्कुल शांति है, न किसी का विरोध और न ही किसी के पक्ष में साफ हवा। मगर फिर भी मतदान 60 फीसदी के लगभग रहा है। उत्तर पदेश में आजादी के बाद पहली मर्तबा यह करिश्मा हो रहा है। इससे भी ज्यादा सुखद है कि पहले दो चरणों के मतदान में आधी आबादी का डिस्टिंगशन से पास होना। पहले चरण में बारिश के बावजूद पुरुषों से ज्यादा मतदान पतिशत महिलाओं का था। ज्यादा मतदान को उत्तर पदेश में सत्ता विरोधी लहर के रूप में ही देखा जाता है। इस बेहद सहज धारणा के लिए पिछले ढाई दशकों के नतीजे ही जिम्मेदार हैं। 1985 के बाद से कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में असफल रही है। ऐसे में बढ़े मतदान को सपा, भाजपा व कांग्रेस जाहिर तौर पर सत्ता बसपा विरोधी लहर के रूप में पेश कर रहे हैं। कांग्रेस को तो राहुल का करिश्मा दिख रहा है। सपा को बसपा सरकार का भ्रष्टाचार तो भाजपा को केंद्र सरकार के खिलाफ यूपी के लोगों का गुस्सा। मगर ऐसा क्या है कि आजादी के बाद पहली बार मतदाता ऐसे सड़कों पर उतरे। आजादी के बाद से हुए कुल 15 चुनावों में कभी इस तरह जनता सड़कों पर मतदान के लिए नहीं निकली। आपातकाल के बाद 1977 रहा हो या फिर 1991 में राम जन्म भूमि आंदोलन की लहर में भी मतदान पतिशत 55 फीसदी के पास ही रह पाया। भाजपा को रोकने के लिए 1993 में सामाजिक न्याय व दलित राजनीति को कांशीराम और मुलायम ने गठजोड़ कर सामाजिक परिवर्तन का बिगुल पूंका लेकिन मतदान 60 फीसदी के जादूई अंक तक नहीं पहुंच सका। छह मार्च को नतीजे आने से पहले तक राजनीतिक पंडित और दल अपने तर्प और गणित पेश करेंगे लेकिन वास्तविकता है कि हवा के मिजाज को कोई भी भांप नहीं पा रहा है, मगर मतदान में महिलाओं और युवाओं की बढ़ती भागीदारी से हमारे लोकतंत्र के परिपक्व होने का स्पष्ट संकेत है। साफ है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन का असर है तभी तो कुछ मतदाताओं ने राइट टू रिजेक्ट विकल्प का भी इस्तेमाल किया है। पर उत्तर पदेश के पूर्वी इलाके में दो चरणों में हुए मतदान से जो हवा चली है वह पश्चिमी हिस्से तक आते-आते बदल भी सकती है। इस इलाके में फैसले की चाबी मुसलमानों और जाटों के हाथों में है। आमतौर पर वेस्टर्न यूपी में जाटों का दबदबा माना जाता है। जाटों के नेता के रूप में चौधरी अजीत सिंह करीब दो दशकों से स्थापित हैं। कांग्रेस के साथ समझौता करने वाली अजीत सिंह को कुल 59 सीटें मिली हैं। अगर जमीनी स्तर पर यह समझौता सही मायनों में लागू होता है तो दोनों कांग्रेस और रालोद को फायदा होगा। वेस्टर्न यूपी में मुसलमान वोटों का भी खासा महत्व है। हालांकि सत्तारूढ़ होने के नाते पश्चिमी उत्तर पदेश में बीएसपी के पति नाराजगी है। लेकिन यह भी सच है कि इस इलाके की ज्यादातर सीटों पर मुख्य मुकाबला बसपा से ही है। दरअसल बीएसपी के 20 फीसदी दलित वोट उसका बड़ा हथियार है। स्थानीय स्तर पर दलितों के अलावा सभी जातियां अपने बीच का उम्मीदवार ढूंढ रही हैं सिर्प दलित ही बहनजी के इशारे पर वोट करते हैं। क्षेत्र में बसपा से नाराज मुसलमान एसपी और कांग्रेस को वोट दे सकते हैं। ऐसा हुआ तो बसपा ही फायदे में रहेगी। अगर मुसलमान वोट एकजुट हुआ तो बसपा ही सबसे ज्यादा घाटे में रहेगी। पूरे पश्चिमी उत्तर पदेश में हर सीट पर जातीय समीकरण अलग-अलग है। कुछ इलाकों में भाजपा भी मजबूत स्थिति में है। खासतौर पर शहरी इलाकों में उसका पभाव साफ दिख रहा है। पर इस बार का चुनाव बहुत कुछ उम्मीदवारों पर भी निर्भर है। कुल मिलाकर देखना यह है कि जो हवा पहले दो दौर के मतदान में चली वह तीसरे में भी बरकरार रहती है या नहीं?
Anil Narendra, Bahujan Samaj Party, BJP, Congress, Daily Pratap, Mayawati, Mulayam Singh Yadav, Samajwadi Party, State Elections, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Tuesday, 14 February 2012

कांग्रेस के जब ऐसे दोस्त हों तो दुश्मनों की जरूरत नहीं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 14th February  2012
अनिल नरेन्द्र
चुनावी माहौल में ऊटपटांग बयान देना कोई खास बात नहीं होती। चुनावी प्रचार के दौरान वोटों की खातिर नेता गण बहुत फिजूल के बयान दे देते हैं पर उत्तर प्रदेश में जिस प्रकार के बयान कुछ कांग्रेसी नेता दे रहे हैं वह आश्चर्यजनक और कुछ हद तक चौंकाने वाले जरूर हैं। हमें नहीं लगता कि यह बयान या विवाद किसी तय रणनीति के तहत दिए जा रहे हैं। हम समझते हैं कि इनसे कांग्रेस आलाकमान खुश तो नहीं हो सकता। क्योंकि ऐसे दोस्त हों तो दुश्मनों की जरूरत न रहे। इन शेखचिल्ली टाइप बयानों से कांग्रेस की फजीहत बढ़ती ही है। कांग्रेस ने जिन लोगों को यूपी में पार्टी की नैया पार लगाने के लिए मुकर्रर किया है वे ही उसकी फजीहत कराने पर तुले हैं और हाई कमान द्वारा किए जा रहे इशारे के बावजूद भी अपनी भूल सुधार नहीं रहे हैं। इन लोगों में पहला नाम सलमान खुर्शीद का है। वे केंद्रीय कानून मंत्री हैं और चुनाव आचार संहिता के बारे में जानते हुए भी वे 9 फीसदी अल्पसंख्यक आरक्षण का लगातार राग अलाप रहे हैं। चुनाव आयोग की फटकार के बाद भी वह बाज नहीं आ रहे। कहते हैं चुनाव आयोग चाहे फांसी पर चढ़ा दे या कुछ भी करे, मैं पसमांदा समुदाय के लोगों को उनका हक दिलाऊंगा। मुझ पर बहुत सारी पाबंदी लगा दी गई हैं। क्या मैं पसमांदा लोगों के हक के बारे में बोल भी नहीं सकता। पसमांदा लोगों को आरक्षण नहीं मिले तो किसे मिलेगा। कांग्रेस के पास जवाब नहीं बन पा रहा जब मीडिया उनसे खुर्शीद के बयान के बारे में सवाल करता है। सलमान खुर्शीद के बाद दूसरा नाम आजकल यूपी में राहुल गांधी के नाक में बाल बने बेनी प्रसाद वर्मा का है। वे कभी अपने ही सांसद पीएल पूनिया को यूपी की बजाय बाहरी (पंजाब) का बता रहे हैं तो कभी प्रधानमंत्री पर सीधी टिप्पणी करते हैं। देश के प्रधानमंत्री बूढ़े हो चले हैं। वे अब देश चलाने लायक नहीं हैं। वर्तमान कार्यकाल खत्म होते-होते उनकी उम्र में दो साल और वृद्धि हो जाएगी। ऐसे में देश की बागडोर युवा हाथ में आनी चाहिए। ये बातें केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने गत शुक्रवार को जनपद के मडियांहू विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के उम्मीदवार परमेन्द्र सिंह के समर्थन में हुई चुनावी जनसभा के बाद पत्रकारों से कही। उन्होंने कहा कि देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह 80 वर्ष के हो चुके हैं। अपने बड़बोलेपन से आए दिन सुर्खियों में रहने वाले वर्मा ने कहा कि देश की कमान अब युवा हृदय सम्राट व कांग्रेस के युवराज सांसद राहुल गांधी के हाथ में आनी चाहिए। आजमगढ़ में चुनाव से ठीक पहले सलमान खुर्शीद ने एक और हंगामा खड़ा करवा दिया। एक चुनावी सभा में आपने फरमाया कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जब बटला हाउस कांड की तस्वीरें देखीं तो वह रो पड़ी थीं। इस पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने खुर्शीद के इस बयान को गलत बताते हुए कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी रोई नहीं थीं। इसके बाद दिग्विजय सिंह ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की बात कहकर अपने ही लोगों को चौंका दिया। सलमान खुर्शीद के साथ मानों मुसलमानों के नेता बनने के लिए वे जमकर प्रतियोगिता कर रहे हैं। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद कहते हैं कि पार्टी को 100 सीटें मिलेंगी। वहीं श्रीप्रकाश जायसवाल फरमाते हैं कि यूपी में कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है और प्रदेश में चाहे कांग्रेस का मुख्यमंत्री भले ही कोई बने रिमोट कंट्रोल तो राहुल गांधी के हाथ में ही होगा। रॉबर्ट वाड्रा कहते हैं कि प्रियंका राजनीति में आएंगी और प्रियंका कहती हैं मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं। इसीलिए कहता हूं कि कांग्रेस के जब ऐसे दोस्त हों तो दुश्मनों की जरूरत नहीं है।
चुनावी माहौल में ऊटपटांग बयान देना कोई खास बात नहीं होती। चुनावी प्रचार के दौरान वोटों की खातिर नेता गण बहुत फिजूल के बयान दे देते हैं पर उत्तर प्रदेश में जिस प्रकार के बयान कुछ कांग्रेसी नेता दे रहे हैं वह आश्चर्यजनक और कुछ हद तक चौंकाने वाले जरूर हैं। हमें नहीं लगता कि यह बयान या विवाद किसी तय रणनीति के तहत दिए जा रहे हैं। हम समझते हैं कि इनसे कांग्रेस आलाकमान खुश तो नहीं हो सकता। क्योंकि ऐसे दोस्त हों तो दुश्मनों की जरूरत न रहे। इन शेखचिल्ली टाइप बयानों से कांग्रेस की फजीहत बढ़ती ही है। कांग्रेस ने जिन लोगों को यूपी में पार्टी की नैया पार लगाने के लिए मुकर्रर किया है वे ही उसकी फजीहत कराने पर तुले हैं और हाई कमान द्वारा किए जा रहे इशारे के बावजूद भी अपनी भूल सुधार नहीं रहे हैं। इन लोगों में पहला नाम सलमान खुर्शीद का है। वे केंद्रीय कानून मंत्री हैं और चुनाव आचार संहिता के बारे में जानते हुए भी वे 9 फीसदी अल्पसंख्यक आरक्षण का लगातार राग अलाप रहे हैं। चुनाव आयोग की फटकार के बाद भी वह बाज नहीं आ रहे। कहते हैं चुनाव आयोग चाहे फांसी पर चढ़ा दे या कुछ भी करे, मैं पसमांदा समुदाय के लोगों को उनका हक दिलाऊंगा। मुझ पर बहुत सारी पाबंदी लगा दी गई हैं। क्या मैं पसमांदा लोगों के हक के बारे में बोल भी नहीं सकता। पसमांदा लोगों को आरक्षण नहीं मिले तो किसे मिलेगा। कांग्रेस के पास जवाब नहीं बन पा रहा जब मीडिया उनसे खुर्शीद के बयान के बारे में सवाल करता है। सलमान खुर्शीद के बाद दूसरा नाम आजकल यूपी में राहुल गांधी के नाक में बाल बने बेनी प्रसाद वर्मा का है। वे कभी अपने ही सांसद पीएल पूनिया को यूपी की बजाय बाहरी (पंजाब) का बता रहे हैं तो कभी प्रधानमंत्री पर सीधी टिप्पणी करते हैं। देश के प्रधानमंत्री बूढ़े हो चले हैं। वे अब देश चलाने लायक नहीं हैं। वर्तमान कार्यकाल खत्म होते-होते उनकी उम्र में दो साल और वृद्धि हो जाएगी। ऐसे में देश की बागडोर युवा हाथ में आनी चाहिए। ये बातें केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने गत शुक्रवार को जनपद के मडियांहू विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के उम्मीदवार परमेन्द्र सिंह के समर्थन में हुई चुनावी जनसभा के बाद पत्रकारों से कही। उन्होंने कहा कि देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह 80 वर्ष के हो चुके हैं। अपने बड़बोलेपन से आए दिन सुर्खियों में रहने वाले वर्मा ने कहा कि देश की कमान अब युवा हृदय सम्राट व कांग्रेस के युवराज सांसद राहुल गांधी के हाथ में आनी चाहिए। आजमगढ़ में चुनाव से ठीक पहले सलमान खुर्शीद ने एक और हंगामा खड़ा करवा दिया। एक चुनावी सभा में आपने फरमाया कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जब बटला हाउस कांड की तस्वीरें देखीं तो वह रो पड़ी थीं। इस पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने खुर्शीद के इस बयान को गलत बताते हुए कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी रोई नहीं थीं। इसके बाद दिग्विजय सिंह ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की बात कहकर अपने ही लोगों को चौंका दिया। सलमान खुर्शीद के साथ मानों मुसलमानों के नेता बनने के लिए वे जमकर प्रतियोगिता कर रहे हैं। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद कहते हैं कि पार्टी को 100 सीटें मिलेंगी। वहीं श्रीप्रकाश जायसवाल फरमाते हैं कि यूपी में कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है और प्रदेश में चाहे कांग्रेस का मुख्यमंत्री भले ही कोई बने रिमोट कंट्रोल तो राहुल गांधी के हाथ में ही होगा। रॉबर्ट वाड्रा कहते हैं कि प्रियंका राजनीति में आएंगी और प्रियंका कहती हैं मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं। इसीलिए कहता हूं कि कांग्रेस के जब ऐसे दोस्त हों तो दुश्मनों की जरूरत नहीं है।
Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Election Commission, Salman Khursheed, State Elections, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Saturday, 11 February 2012

पहले चरण के मतदान से कांग्रेस और सपा ज्यादा उत्साहित

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11th February  2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश में विधानसभा का पहला राउंड पूरा हो गया है। बारिश के बीच बुधवार को वोटों की भी झमाझम बरसात हुई। विधानसभा चुनाव के पहले चरण में मतदान में बारिश और सर्द हवाएं भी वोटरों का जोश ठंडा नहीं कर सकी। इसे वोटरों की जागरुकता कहें या अन्ना हजारे व चुनाव आयोग की मुहिम का नतीजा, आजादी के बाद प्रदेश में पहली बार 62 फीसदी मतदान हुआ। खास बात यह भी रही कि पहले चरण का मतदान पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा, नहीं तो उत्तर प्रदेश में चुनावी हिंसा मशहूर है पर इस दौर में कहीं से हिंसा तो दूर छोटे-मोटे झगड़े की शिकायत भी नहीं हुई। भारी मतदान के सियासी दल अपने-अपने ढंग से मतलब निकाल रहे हैं। पहली बात तो यह मानी जा रही है कि भारी मतदान कभी भी सत्तारूढ़ दल को नहीं भाती। माना यही जाता है कि वोटर सत्ता के प्रति विरोध जताने के लिए हमेशा उत्साह दिखाता है। इस बार के चुनाव में सबसे बड़ी पहेली है कि प्रदेश के करीब 46 फीसदी युवा वोटर (उम्र 18 से 39 वर्ष) में से लगभग 55 लाख वोटर 18 वर्ष के हैं। एक करोड़ से ऊपर ऐसे वोटर हैं जो पहली बार अपना वोट देंगे। अहम मुद्दा यह भी है कि युवा वर्ग का यह वोटर क्या करेगा? इस वर्ग को राजनीति में कम दिलचस्पी है, कैरियर, भविष्य, नौकरी, रोजगार आदि शायद इनके लिए महत्वपूर्ण हैं। युवा वर्ग चाहे शहरी इलाके का हो या ग्रामीण क्षेत्रों का वह अपने भविष्य को लेकर कहीं ज्यादा उत्सुक एवं अधीर रहता है। यही वजह है कि वह राजनीति में झाड़ू लगाकर कुछ सफाई का काम कर सकता है। भ्रष्टाचार या राजनीति के अपराधीकरण को चुपचाप स्वीकार करने के बजाय इस वर्ग में प्रदेश की खुशहाली, सरकार के स्थायित्व, रोजगार के नए अवसर जैसे मुद्दों को तरजीह देकर बदलाव लाने की क्षमता रखता है। इसलिए शायद हर बड़ी सियासी पार्टी ने चाहे रोजगार हो या मुफ्त लैपटॉप जैसे प्रलोभन खुलकर सामने रखे हैं। इस नए वर्ग के वोटर की वजह से अगर राहुल गांधी कांग्रेस को उत्साहित कर रहे हैं तो अखिलेश यादव सपा के तुरुप के पत्ते बने हुए हैं। बसपा और भाजपा में इस वर्ग के सशक्त नेताओं की कमी साफ खटक रही है। उत्तर प्रदेश में चुनाव का आखिरी राजनीतिक नतीजा जो भी हो, पहले चरण के मतदान ने यह संकेत दे दिया है कि सामान्यता उदासीन रहने वाले वोटरों का जमाना गया। उन उम्मीदवारों के लिए भी आशा क्षीण हो गई है जो महज 20-20 फीसदी वोट लेकर जीतते रहे हैं। आशा यह जताई जा रही है कि बाकी के छह चरणों में मतदान 65 फीसदी को भी पार कर सकता है। बहरहाल राज्य की 55 सीटों पर शांतिपूर्ण मतदान के बावजूद चुनौतियां कम नहीं हैं। पूरे उत्तर प्रदेश में अब तक जिन 15 लाख से ज्यादा संदिग्धों को पकड़ा गया है, उनमें से दो लाख से कुछ ज्यादा इन सीटों वाले क्षेत्रों के हैं। पूरे राज्य में अब तक 33 करोड़ नकदी के साथ-साथ 4345 गैर-कानूनी हथियार, 6636 कारतूस और 2,43,415 लीटर गैर-कानूनी शराब जब्त की गई है।
बुधवार के पहले चरण के मतदान के दौरान कांग्रेस, सपा और बसपा सभी सियासी दलों की सांसें अटकी रहीं। दोपहर पहले बेहद धीमी मतदान की रफ्तार से कांग्रेस खासी चिन्ता में पड़ गई लेकिन शाम को आई अचानक तेजी ने पार्टी में नया उत्साह भर दिया। पहले चरण के मतदान में जिन सीटों पर वोट पड़े उनमें कांग्रेस को अच्छी खासी उम्मीद है। इन 10 जिलों में विधानसभा की 55 सीटें हैं जिनमें से कांग्रेस को 10 से 15 सीटें मिलने की उम्मीद है। इस क्षेत्र में पार्टी को अन्य पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम मतदाताओं से उम्मीद है कि वे कांग्रेस के पक्ष में मतदान करेंगे। पहले चरण के मतदान को कांग्रेस इसलिए भी महत्वपूर्ण मान रही है क्योंकि इससे सूबे का ट्रेंड पता चलेगा। इस चरण में कांग्रेस की तरफ मतदाताओं का रुझान दिखा तो यह बाकी चरणों में भी पुर-असर दिख सकता है। इसके पीछे कोई कर्मकांडी टोटके जैसी वजह नहीं है। जिन 10 जिलों में 55 सीटों के लिए बुधवार को मतदान हुआ, उस क्षेत्र में 2007 के विधानसभा और 2009 के लोकसभा चुनाव के नतीजों का विश्लेषण इसके पीछे कारण है। इस क्षेत्र में मुस्लिम, दलित और अतिपिछड़ों के मत ज्यादा हैं, जिन पर कांग्रेस ने पूरे चुनाव पर जोर दिया है। कांग्रेस मतदान से ठीक पहले यह स्पष्ट संकेत देने में जुटी कि कांग्रेस इस बार अपने ही दम पर सरकार बना लेगी। राहुल गांधी ने कई मीटिंगों में और सोनिया गांधी ने उन्नाव में अपनी आखिरी मीटिंग में कहा कि कांग्रेस किसी के साथ गठबंधन नहीं करेगी, से स्पष्ट संकेत देना था कि कांग्रेस सरकार बनाने की काफी कांफिडेंट है। इसके पीछे उन अवसरवादी वोटरों को भी पटाना था जो अन्त तक देखते रहते हैं कि सरकार किसकी बनेगी। अगर कांग्रेस बहुत उत्साहित है तो उत्साह तो समाजवादी पार्टी का भी चरम पर है। सपा का दावा है कि अगली सरकार उसी की बनेगी। बहुमत में कमी रही तो उसका भी बंदोबस्त हो जाएगा। पार्टी का दावा है कि अखिलेश यादव की चुनावी सभाओं में जिस कदर भीड़ उमड़ रही है, उसके भविष्य के संकेत साफ दिख रहे हैं। पार्टी की एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि अपराधियों से पार्टी को अलग रखने की अखिलेश यादव के फैसले से तमाम उन वर्गों में भी पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ी है जो सपा से अतीत में सदा दूर रहे। उनका दावा है कि इस बार बहुजन समाज पार्टी के तमाम किले ढह जाएंगे। कहना होगा कि यह चुनाव इस नजरिये से भी महत्वपूर्ण होगा कि सभी पार्टियों ने अपने पारम्परिक वोट बैंक के अलावा दूसरों पर खास ध्यान दिया है। इन वोटों में ब्राह्मण, राजपूत जैसी अगड़ी जातियां, यादव को छोड़कर दूसरी पिछड़ी जातियां, कोइरी, राजभर, निषाद-मल्लाह जैसी अतिपिछड़ी जातियां, मुस्लिम वोट शामिल हैं और इन सभी के बीच जबरदस्त मंथन है। कांग्रेस और सपा की तरफ से दलित जातियों में भी जाटव बनाम गैर-जाटव के आधार पर इस मंथन की कोशिश हुई। राहुल गांधी का दलित परिवारों के बीच जाकर उठना-बैठना, इसी नजरिये से देखा जा रहा है। बहरहाल, इन सभी कोशिशों के अंतिम नतीजों को अपने-अपने पक्ष में लेकर जो पार्टियां दावा कर रही हैं, उनमें कांग्रेस सबसे आगे है। इसकी वजह भी है। कांग्रेस के पास इस चुनाव में पाना ही पाना है, खोना कुछ नहीं है। कांग्रेस विश्लेषक इसी आधार पर मान रहे हैं कि इस चरण में अगर कुछ निश्चित कारक उसके हक में काम आए तो यह अगले चरण के चुनाव में भी असर दिखा सकते हैं।

Thursday, 9 February 2012

For last 37 days, Punjab and Uttarakhand administrations rendered inactive

- Anil Narendra
Election Commission of India, through its decision, has rendered the State administrations of Punjab and Uttarakhand inactive for more than a month. Election code of conduct is still effective in these States, though polling process has been completed in both the States. The code of conduct would be effective till 6th March, the date of counting of the votes. A Punjab bureaucrat commented, there is no work for us and we are just passing the time by viewing television. Elections in Punjab, Uttarakhand and Manipur have been completed, but no body knows who runs the State? Who is the Chief Minister or Chief Electoral Officer or Chief Election Commissioner (Delhi)? The irony is that, had the Election Commission given a bit of thought, this situation could have been averted. If polling in Punjab and Uttarakhand would have been held on 3rd March and results declared on 6th March, the state of uncertainty could have been avoided. It can be asked, as to what was the compulsion, which led to the administrations in these States making completely inactive. The Election Commission may argue that it wanted to hold elections at the earliest, as election dates are decided keeping a number of factors under consideration. For example, suggestions of political parties are to be kept under consideration. Then, factors like weather, school examinations, holidays, festivals etc are also considered, while finalizing elections arrangements in States. An Akali Dal leader said that we were expecting polling between 10 to 15 February, but when polling date was declared as 30th January, we were a little baffled. Last two State Assembly elections were held on 13th February in 2002 and 2007. In the election history of Uttarakhand, elections were held for the first time during the period of severe cold and snowfall in the hilly region of the State. There have been two Assembly elections in the State in 2002 and 2007, since its inception. The elections in 2002 were held on 14th February and results were declared 24th February. Similarly, 2007 elections were held on 21st February, whereas results were announced after six days on 27th February. According to EC officials the Chief Minister has still not expressd his desire to relax the code of conduct. No doubt, at present, the Chief Minister is working as a caretaker CM and he neither can transfer any officer nor can he ask for explanation, in real sense. This is also one of the reasons that bureaucrats do not take the CM seriously, because they are not sure of CM coming to power again. Uttarakhand Chief Minister, Bhuvan Chandra Khanduri had objected to the election dates decided by the Election Commission, but the EC ignored his objections. This could have been avoided, had the polling in both these States been held a few days earlier to the dates of announcement of results. The political parties are explaining this decision of Election Commission according to their different point of views. Akali-BJP say that the Chief Elections Commissioner has taken this decision to please the Congress so that he could be adjusted somewhere after his retirement.

Tuesday, 7 February 2012

पंजाब और उत्तराखंड में 37 दिनों के लिए सरकार, प्रशासन ठप

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th February  2012
अनिल नरेन्द्र
भारत के चुनाव आयोग ने अपने एक फैसले से पंजाब और उत्तराखंड राज्यों के प्रशासन को एक महीने से ज्यादा समय तक के लिए पंगु बना दिया है। हालांकि दोनों राज्यों में मतदान हो चुका है पर चुनाव आचार संहिता अभी भी लागू है। यह आचार संहिता 37 दिन के लिए यानि कि 6 मार्च तक लागू रहेगी जब तक मतगणना होगी। एक पंजाब के नौकरशाह की टिप्पणी थी कि हम तो अपना सारा समय टीवी देखकर गुजार रहे हैं, काम तो कोई है नहीं। पंजाब और उत्तराखंड व मणिपुर तीनों राज्यों में चुनाव हो चुके हैं और किसी को सही से पता नहीं कि राज्य का मालिक कौन है? मुख्यमंत्री, राज्यपाल, चीफ इलैक्टोरल ऑफिसर या मुख्य चुनाव आयुक्त (दिल्ली), कौन है जिसके आदेशों पर राज्य का प्रशासन चले? विडम्बना यह है कि यह स्थिति उत्पन्न होने से बचा जा सकता अगर चुनाव आयोग थोड़ा-सा भी ध्यान देता। अगर पंजाब, उत्तराखंड में चुनाव 3 मार्च को होते और परिणाम 6 मार्च को आता तो इस अनिश्चित स्थिति से बचा जा सकता था। सवाल यह पूछा जा सकता है कि ऐसी कौन-सी मजबूरी थी जिसकी वजह से राज्यों के प्रशासन को पूरी तरह ठप कर दिया गया। चुनाव आयोग बेशक यह दलील दे कि हम वहां जल्दी चुनाव करवाना चाहते थे क्योंकि चुनाव की तिथियों को बहुत-सी बातों को देखकर ही तय किया जाता है। उदाहरण के तौर पर राजनीतिक दलों की राय। दूसरे राज्यों में चुनाव के प्रबंधों को देखकर, मौसम, स्कूल परीक्षाएं, छुट्टियां, त्यौहार इत्यादि-इत्यादि। अकाली दल के एक नेता का कहना है कि हम थोड़ा हैरान जरूर हुए जब 30 जनवरी को पोलिंग की तिथि की घोषणा हुई, क्योंकि हम उम्मीद कर रहे थे कि चुनाव 10 से 15 फरवरी के बीच होंगे। क्योंकि पिछले दो विधानसभा चुनाव 2002 और 2007 में 13 फरवरी को चुनाव हुए थे। उत्तराखंड के चुनावी इतिहास में यह पहली बार था जब चुनाव ऐसे समय हुए जब राज्य में कड़ाके की ठंड थी, पहाड़ी इलाकों में बर्प पड़ी हुई थी। राज्य बनने के बाद 2002 और 2007 में दो बार विधानसभा चुनाव हुए। 2002 में चुनाव 14 फरवरी को हुए थे और परिणाम 24 फरवरी को घोषित कर दिए गए थे। इसी तरह 2007 में चुनाव 21 फरवरी को हुए थे और 6 दिन बाद परिणाम 27 फरवरी को घोषित कर दिए गए थे। चुनाव आयोग अधिकारियों ने कहा कि अभी तक मुख्यमंत्री ने आचार संहिता को रिलैक्स करने की कोई इच्छा प्रकट नहीं की है। बेशक मुख्यमंत्री अभी भी केयरटेकर मुख्यमंत्री हैं पर वह किसी भी अधिकारी की ट्रांसफर नहीं कर सकता, न ही सही मायनों में जवाबतलबी कर सकता है। नौकरशाह इसलिए भी मुख्यमंत्री को गम्भीरता से नहीं लेते क्योंकि वह कहते हैं कि पता नहीं कि यह दोबारा सत्ता में आए भी या नहीं? उत्तराखंड मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूरी ने चुनाव आयोग द्वारा तय की गई चुनाव डेट पर ऐतराज किया था पर चुनाव आयोग ने इसे नजरअंदाज कर दिया। इस स्थिति से बचा जा सकता था अगर इन दोनों राज्यों में चुनाव परिणाम आने से कुछ दिन पहले होते। राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से चुनाव आयोग के इस फैसले का मतलब निकाल रहे हैं। अकाली-भाजपा का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने कांग्रेस को खुश करने के लिए यह किया ताकि पार्टी उनको रिटायरमेंट के बाद कहीं न कहीं एडजस्ट कर दे।
Akali Dal, Anil Narendra, BJP, Congress, Daily Pratap, Election Commission, Punjab, State Elections, Uttara Khand, Vir Arjun

Friday, 3 February 2012

भारी मतदान वोटरों में जागरुकता का प्रतीक है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3rd February  2012
अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों के लिए विधानसभा के गठन की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी है। पंजाब, उत्तराखंड और मणिपुर में मतदान सम्पन्न हो चुका है। इन तीनों राज्यों में हुए मतदान से जहां हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूती मिलती है वहीं चुनाव आयोग को इसका संतोष होगा कि इन राज्यों में नाममात्र हिंसा के न केवल चुनाव सम्पन्न हुआ बल्कि इनमें भारी मतदान भी हुआ। मणिपुर में मतदान का प्रतिशत हमेशा ऊपर रहा है। यही 80 फीसदी वोट पड़ना असामान्य भले न हो पर ध्यान देने की बात है कि कुछ आतंकवादी संगठनों की सक्रियता बेअसर रही। जनता ने बुलैट की जगह बैलट को प्राथमिकता दी। पंजाब और उत्तराखंड में दोनों में मतदान का प्रतिशत 77 और 70 रहा। अब उम्मीद यही है कि उत्तर प्रदेश में भी यही ट्रेड जारी रहेगा। उत्तराखंड में 2007 में 63.72 प्रतिशत वोट पड़ा था। आमतौर पर माना जाता है कि भारी मतदान का मतलब सत्ता विरोधी लहर। यह भी कहा जाता है कि वहां की जनता ने सत्ता परिवर्तन के नाम पर अधिक संख्या में वोट दिए पर हमारा मानना है कि भारी मतदान होने से कोई अनुमान लगाना ठीक नहीं होता। कभी-कभी यह भी होता है कि सत्तारूढ़ दल अपने वोट डलवा लेता है। पंजाब में इस बार 77 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ है। कई सीटों पर तो यह 85 प्रतिशत का आंकड़ा भी छू गया। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के हलके लांबी में 85 प्रतिशत जबकि मलेरकोटला में 88 प्रतिशत मतदान हुआ। इतने मतदान के कोई अर्थ निकालना पंजाब में बेहद मुश्किल सौदा है। पिछले चार विधानसभा चुनावों के आंकड़े देखें तो यह कहना कठिन है कि किस दल की सरकार मार्च में बनेगी। 2007 में बीते विधानसभा चुनाव के दौरान सूबे में 75.45 प्रतिशत मतदान हुआ था और अकाली-भाजपा गठबंधन सत्ता में आया था। उस समय 117 सदस्यीय पंजाब विधानसभा में अकाली दल को 49 और उसकी सहयोगी भाजपा को 19 सीटें मिली थीं। कांग्रेस को तब 44 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। तीनों राज्यों में भारी मतदान से साफ है कि वोट की ताकत नोट से ज्यादा है। इतने भारी मतदान का एक मतलब यह निकाला जा सकता है कि मतदाताओं में अपने अधिकार और लोकतंत्र के प्रति सजगता बढ़ी है। वे अपने हक का इस्तेमाल करने आगे आए हैं। जनतंत्र के पहियों को रफ्तार देने में उनकी भागीदारी स्वस्थ लोकतंत्र की नींव मजबूत करेगी। वोट की ताकत क्या है यह बताने में अन्ना हजारे, मीडिया और सूचना तंत्र के दूसरे आयामों की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। अन्ना हजारे की मुहिम कम से कम मतदान बढ़ाने में जरूर असर दिखा रही है। एक जमाना था जब वोट का मतलब नेता तक सीमित होता था। राजनीतिक दल वोटर को घर से उसकी जी-हुजूरी करते हुए मतदान केंद्र तक के लिए घोड़ागाड़ी, रिक्शा का इंतजाम करते थे। वोट की पर्ची हाथ जोड़कर उसके घर पहुंचा देते थे। दोनों हाथ जोड़कर कहते थेöहमारा ख्याल रखना, साडी इज्जत त्वाडे हथ है। लेकिन अब वोटर जागरूक हो गया है। वोटर ने नेता की बानगी को तोलकर वोट का फैसला अपने बूते पर करने की जो पहल की है उसका स्वागत है। कुल मिलाकर मतदान में इस बार नई व अद्भुत स्फूर्ति देखने को मिली है जो हमारे देश के लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत है।
Anil Narendra, Daily Pratap, Manipur, Punjab, State Elections, Uttara Khand, Vir Arjun

Tuesday, 24 January 2012

उत्तर पदेश चुनाव में बाहुबलियों के मामले में सबका दामन दागदार

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24th January  2012
अनिल नरेन्द्र
निर्वाचन आयोग चाहे जितने भी कानून बनाए, उत्तर पदेश विधानसभा चुनावों में इन बाहुबलियों को नहीं रोक सकता। यह कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेते हैं। इन बाहुबलियों का अंतिम उद्देश्य शायद एक विधायक बनना होता है और ऐसा करने के लिए पहले तो वह बड़ी सियासी दलों को टटोलते हैं। जब उसे वहां जगह नहीं मिलती तो वह कोई छोटा दल ढूंढता है क्योंकि उसे उस दल के बूते पर तो चुनाव जीतना नहीं उसे तो वह उस पार्टी का चुनाव चिह्न चाहिए। ऐसा ही एक दल है अपना दल। इस दल से ही इलाहाबाद के अतीक अहमद की माननीय बनने का सपना पूरा हुआ था। यह बात दीगर है कि इसके बाद समाजवादी पार्टी ने भी उन्हें अपने यहां जगह देकर लोकसभा तक पहुंचाया और वह भी पंडित जवाहर लाल नेहरू के संसदीय क्षेत्र से। 2004 में अपना दल के संस्थापक सोने लाल पटेल ने बबलू श्रीवास्तव को सीतापुर से अपना दल का उम्मीदवार बनाया था। यही नहीं, उनकी किताब `अधूरा ख्वाब' का लोकार्पण भी पटेल ने किया था। अब जब दूसरे माफिया मुन्ना बजरंगी को माननीय बनने की ख्वाहिश हुई है तब उनके ख्वाब को भी अपना दल ही पंख लगा रहा है। मुन्ना बजरंगी जौनपुर से अपना दल के उम्मीदवार हैं। अतीक अहमद फिर एक बार इलाहाबाद से अपना दल के टिकट पर किस्मत आजमा रहे हैं। कुछ यही स्थिति पीस पार्टी की भी है। कांग्रेस पदेश अध्यक्ष डॉ. रीता जोशी का घर जलाने के आरोपी जितेन्द्र सिंह बबलू को पीस पार्टी के अपने यहां जगह दी थी। मायावती बाद में उन्हें निकाल पाईं। अब वह बीकापुर से मैदान में है। यही नहीं, अपने बूते पर सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली के निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतते आ रहे अखिलेश सिंह को भी पीस पार्टी में न केवल राजनीतिक शरण मिली बल्कि उन्हें राष्ट्रीय महासचिव का ओहदा भी दे दिया गया। दागियों को चुनाव से दूर रखने की बात सभी दल करते हैं पर इस पर अमल धेले का नहीं होता है। वाराणसी के अजय राम पख्यात बाहुबली हैं। यह पहले भाजपा में थे। लोकसभा में चुनाव का टिकट नहीं मिला तो समाजवादी पार्टी में चले गए। इस बार वह वाराणसी की पिडरा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। निर्दलीय उम्मीदवार रघुराज पताप सिंह उर्प राजा भैया समाजवादी पार्टी के करीब है। इस बार टुंडला सीट से फिर चुनाव लड़ रहे हैं। रायबरेली जिले से उम्मीदवार मोहम्मद मुस्लिम के खिलाफ मारपीट, बलवा जैसे मामले दर्ज हैं। सपा में भी दागियों की कमी नहीं। मित्रसेन यादव को हाल ही में अदालत से एक मामले में सजा हुई है। यादव के बेटे आनंद सेन यादव एक दलित छात्रा के दुष्कर्म और हत्या के मामले में उम्र कैद की सजा काट रहे हैं। सपा ने मित्रसेन को फैजाबाद जिले की बीकापुर सीट से अपना उम्मीदवार बनाया है। बाहुबली अभय सिंह भी फैजाबाद की गोसाईगंज सीट से सपा के उम्मीदवार हैं। गुड्डू पंडित और विनोद सिंह उर्प पंडित सिंह भी सपा के बैनर तले चुनाव लड़ रहे हैं। लिस्ट बहुत लंबी है, किस-किस की कहानी बताएं। चुनाव हर हाल में जीतने की चाह में सभी दल यह नहीं देखते कि वह किस व्यक्ति को टिकट दे रहे हैं , उसका चरित्र क्या है और रिकार्ड क्या है? यही वजह है कि राजनीति में अपराधिकरण बढ़ता जा रहा है। चुनाव आयोग क्या करे जब यह सियासी दल खुद ही इससे परहेज नहीं करते हैं?
Anil Narendra, Crime, Criminals, Daily Pratap, State Elections, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Sunday, 22 January 2012

क्या उमा भारती की एंट्री हिंदुत्व के धुवीकरण का प्रयास है?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22th January  2012
अनिल नरेन्द्र
न न करते हुए भी आखिरकार भारतीय जनता पार्टी की फायर ब्रैंड नेता सुश्री उमा भारती उत्तर पदेश विधानसभा चुनावों में पूंद ही गईं। इससे भाजपा में उनके पुनर्वास की पकिया भी पूरी हो गई। यूं तो पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उमा को 6 साल के बनवास के बाद पिछले जून में पार्टी में शामिल किया था पर सही मायने में उमा की राजनीति में री एंट्री बुंदेलखंड में महोबा जिले की चरखारी विधानसभा सीट पर अपना नामांकन करने से हुई है। उमा भारती मूल रूप से बुंदेलखंड की ही रहने वाली हैं। लेकिन उनका क्षेत्र मध्य पदेश रहा है। चरखारी क्षेत्र लोध बाहुल्य है, सुश्री उमा भारती भी लोध जाती की हैं। उमा भारती को भाजपा में शामिल करने के पीछे नितिन गडकरी की यह उम्मीद थी कि वह कल्याण सिंह के पार्टी छोड़ने के बाद पार्टी का पुनर्गठन कर जिताएंगी। उमा भारती हमेशा विवाद का केन्द्र रही हैं। उमा पार्टी में लौर्टी, तो चर्चाएं शुरू हो गईं कि क्या पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाएंगी? नब्बे के दशक जैसा सियासी जलवा पाने की जुगत में जुटी भाजपा पिछड़ों कार्ड के बहाने फिर हिंदुत्व का डंका बजाने की तैयारी में है। मुस्लिम आरक्षण का विरोध और उमा भारती को आगे कर पिछड़े वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए भाजपा ने अपने चुनावी एक्शन प्लान का काम शुरू कर दिया है। चुनावी मुद्दे की तलाश में भटक रही भाजपा का काम कांग्रेस ने कुछ हद तक आसान कर दिया है। केन्द्र सरकार द्वारा पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) कोटे से 4.5 फीसदी कोटा धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यकों को देने के फैसले में भाजपा को चुनावी फायदा नजर आया। सो पार्टी ने लाइन ऑफ एक्शन ही बदल डाला। भ्रष्टाचार, कुशासन और महंगाई, ब्लैक मनी जैसे मसले को पीछे कर मुस्लिम आरक्षण के विरोध को ही मुख्य मुद्दा बना लिया। इतना ही नहीं पिछड़ों की हमदर्दी लेने की जल्दबाजी में एनआरएचएम घोटाले में आरोपी मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा को गले लगा लिया। कुशवाहा पकरण गले की फांस बनता दिखा तो मध्य पदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को चुनाव मैदान में उतारा। पिछड़ों के हित बचाने के लिए मुस्लिम विरोध के ट्रैक पर लौटती भाजपा ने शुकवार से पूरे पदेश में विधानसभा क्षेत्र स्तर पर सत्ता परिवर्तन पदयात्राएं निकालनी शुरू कर दी हैं। पिछड़ों को लुभाने के लिए वर्ष 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट लागू कर अति पिछड़ों को ओबीसी कोटा में कोटा देने का दाव भी नहीं चल पाया। 1996 में 174 सीटें जीतने वाली भाजपा 2002 में 88 सीटों पर ही सिमट गई थी। कल्याण सिंह की वजह से लोध वोट बैंक भाजपा के साथ लम्बे समय तक जुड़ा रहा है। पदेश में यह वोट बैंक चार से छह फीसदी माना जाता है। बुंदेलखंड में तो इस वोट बैंक की हिस्सेदारी 9 फीसदी तक मानी जा रही है। 2007 में तो भाजपा बुंदेलखंड से अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी। मंदिर आंदोलन के दौरान उमा ने बुंदेलखंड की धरती पर कमल को खिलाने के लिए जमकर मेहनत की थी। सो गांव-गांव में उनका नेटवर्प कायम है। लंबे समय तक गंगा अभियान जैसे गैर राजनीतिक आंदोलनों में अपनी ऊर्जा लगाती आईं उमा एक बार फिर आकामक चुनावी मुद्रा में नजर आने लगी हैं। दो दिन पहले तो उनके निशाने पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी आ गए। दरअसल बुंदेलखंड के चुनाव मैदान में उमा जोर-शोर से उतरीं, तो राहुल ने उनको निशाना बनाया था। एक सभा में उन्होंने उमा पर कटाक्ष करते हुए कह दिया कि मध्य पदेश से भागकर आईं एक नेता अचानक आपके बीच मसीहा बनने की कोशिश कर रहीं हैं। जब आप तकलीफ में थे तब साथ देने के लिए अपेले कांग्रेस ही आई थी। राहुल के इस कटाक्ष का जोरदार जवाब अपने चिर-परिचित स्टाइल में उमा ने यूं दिया ः उनकी मां तो इटली से आई हैं फिर भी यहां के लोगों ने उन्हें स्वीकार कर लिया। जबकि वे तो पड़ोसी पदेश से ही आई हैं। ऐसे में राहुल कुछ बोलने से पहले कुछ सोच-समझ लिया करें तो अच्छा है। इसमें कोई शक नहीं कि उमा भारती के मैदान में कूदने से कांग्रेस में हलचल है। कांग्रेस ने अकेले बुंदेलखंड में ही 19 में से 10 सीटें जीतने पर उम्मीद लगाई हुई है। उमा भारती के आने से जहां कांग्रेस का समीकरण बदल सकता है वहीं धीरे-धीरे पार्टी फिर हिंदुत्व पर आ सकती है। उमा भारती का पयास होगा कि एक बार फिर उत्तर पदेश में वोटों का धार्मिक लाइन पर धुवीकरण हो जाए।
Anil Narendra, BJP, Daily Pratap, Elections, State Elections, Uma Bharti, Uttar Pradesh, Vir Arjun

Friday, 20 January 2012

पंजाब में कांटे की टक्कर में तीसरे मोर्चे की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th January  2012
अनिल नरेन्द्र
पंजाब के उप मुख्यमंत्री व शिरोमणी अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने फजिल्का मे एक मीटिंग को संबोधित करते हुए वर्परों व नेताओं को हिदायत दी कि वे अकाली-भाजपा गठबंधन के उम्मीदवारों का पूरा समर्थन करें। गठबंधन के उम्मीदवारों का समर्थन न करने वालों को पार्टी से बाहर कर दिया जाएगा। वे रविवार को फजिल्का में भाजपा उम्मीदवार व परिवहन मंत्री सुरजीत के समर्थन में रैली को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने साथ ही आजाद पत्याशियों को भी चेतावनी दी और कहा कि जो आजाद पत्याशी वर्परों को धमकाएंगे उनसे पंजाब पुलिस व मैं खुद निपटना जानता हूं। बादल ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह डे ड्रीम सिड्रोंम (दिन में सपने देखना) से पीड़ित हैं। इसलिए वह शिअद-भाजपा को 33 सीटें तक सीमित करने और कांग्रेस के खाते में 75 सीटें आने का दावा कर रहे हैं। लगता है कि कैप्टन को दिन में सपने देखने की बीमारी है। उन्होंने कहा कि 2002 में पंजाब में जब कांग्रेस की लहर थी तब भी अकाली-भाजपा गठबंधन को 48 सीटें मिली थी, अब तो हालात बिल्कुल उल्टे हैं।
पंजाब के मतदाता 30 जनवरी को 117 विधानसभा सीटों के लिए मतदान करेंगे लेकिन कौन सी पार्टी या गठबंधन सरकार बनाएगी, इस बाबत न तो सत्तारूढ़ शिरोमणी अकाली दल-भाजपा गठबंधन आश्वस्त है और न ही कांग्रेस। पचास साल पहले 1966 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद से पंजाब सूबे की आवाम ने किसी भी राजनीतिक दल को लगातार दूसरी बार जिताकर पंजाब में शासन की कमान नहीं सौंपी है। पंजाब का राजनीतिक माहौल उसके पड़ोसी हरियाणा से मेल नहीं खाता क्योंकि हरियाणा आया राम-गया राम के कारण पूरे मुल्क में बदनाम हो चुका है। वहां सरकार बनाने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त का माहौल नहीं है। चाहे कांग्रेस हो या अकाली गठबंधन हो। कुछ लोगों का कहना है कि इस बार पंजाब में अकालियों की चुनावी नैया भाजपा के भरोसे है। राज्य में भाजपा की हालत काफी पतली है। अगर पार्टी पिछली बार की तुलना में आधी सीटें भी जीत पाने में कामयाब रहती है तो अकाली गठबंधन की सरकार बन सकती है। वैसे राज्य में भ्रष्टाचार, कालाधन या लोकपाल चुनावी मुद्दा नहीं बन पाए हैं। नवीनतम आकलन के मुताबिक कांग्रेस के साथ अकाली-भाजपा गठबंधन की कांटे की टक्कर है। अगर भाजपा को 10 सीटें भी हासिल हो गई तो गठबंधन सरकार बनाने की स्थिति में जा सकता है। पिछली बार भाजपा को 19 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। इस बार एक अन्य फैक्टर तीसरा मोर्चा भी होगा जिसे साझा मोर्चा का नाम दिया गया है। अकाली-भाजपा गठबंधन और कांग्रेस दोनों पार्टियों के लिए पंजाब के पूर्व वित्तमंत्री मनपीत बादल एक ऐसी राजनीतिक शख्सियत बन गए हैं, जिन्हें वे अनचाहे अपने कंधों पर लादे अपना-अपना राजनीतिक समीकरण बना रहे हैं। मनपीत बादल पकाश सिंह बादल के भतीजे हैं और सुखबीर के चचेरे भाई, उन्हें अक्टूबर 2010 में वित्तमंत्री व शिरोमणी अकाली दल से बर्खास्त कर दिया गया तो उन्होंने अपनी पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब का गठन किया और तब से वह चुनावी रणनीति में लगे हुए हैं। इस साझा मोर्चे मे पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब, वामपंथी दल व कुछ छोटे दल शामिल हैं। साझा मोर्चे ने सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है और कई सीटों पर मजबूत उम्मीदवार भी उतारे हैं। गौरतलब है कि पंजाब में अभी तक न तो बहुजन समाज पार्टी व न ही वामपंथी मुख्य राजनीतिक दलों का खेल बिगाड़ सके। बसपा के जनक कांशीराम पंजाब के ही थे और यहां दलितों की आबादी करीब 30 पतिशत है। बहरहाल, माकपा और भाकपा भी साझा मोर्चे में हैं। साझा मोर्चा आगामी चुनाव में क्या भूमिका निभाता है इसका पता तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे लेकिन कांग्रेस, अकाली-भाजपा गठबंधन की कांटे की टक्कर में कुछ भी हो सकता है, हो सकता है कि तीसरा मोर्चा किंगमेकर की भूमिका में आ जाए?
Akali Dal, Anil Narendra, Congress, Daily Pratap, Punjab, State Elections, Vir Arjun

Thursday, 19 January 2012

यूपी में होगी सोशल इंजीनियरिंग की असली परीक्षा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th January  2012
अनिल नरेन्द्र
उत्तर प्रदेश चुनाव में हर सियासी पार्टी का तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग की परीक्षा होगी। बसपा प्रमुख मायावती ने विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के 403 प्रत्याशियों की सूची जारी करते हुए गिनाना शुरू कियाöअनुसूचित जाति 88, ओबीसी 113, ब्राह्मण 74 तथा 33 ठाकुर आदि-आदि। बसपा की ओर से अपनी सूची में जाति का ब्यौरा देना कोई नई बात नहीं है। नई बात यह रही कि बहन जी की प्रेस कांफ्रेंस के कुछ घंटों बाद ही भाजपा की प्रेस कांफ्रेंस में पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने भी ब्यौरा पेश किया कि अब तक जारी भाजपा की सूची में कितने अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) व अनुसूचित जातियों के हिस्से गई हैं। यह बानगी इसलिए कि उत्तर प्रदेश विधानसभा का यह चुनाव हर दल की अपनी-अपनी सोशल इंजीनियरिंग और काफी हद तक मंडलवाद के विस्तारित अध्याय को आजमाने की परीक्षा का मैदान ही साबित होने जा रहा है। कांग्रेस पर गौर फरमाएं। राहुल गांधी की कमान वाले युग में पार्टी ने अब तक घोषित 325 प्रत्याशियों में 87 ओबीसी के खाते में दिए हैं। समाजवादी पार्टी की बैल्ट मानी जाने वाली मैनपुरी, एटा, फिरोजाबाद में पार्टी ने सपा से खफा होकर निकले यादवों को टिकट से नवाजा है। यह मंडलवाद का ही असर माना जाएगा कि अब तक घोषित 325 प्रत्याशियों में अगड़ों (खासकर ब्राह्मणों) की पार्टी मानी जाने वाली कांग्रेस ने अभी तक सिर्प 39 ब्राह्मणों को ही टिकट दिया है। ठाकुरों के खाते में 51, अनुसूचित जाति के खाते में 82 और मुस्लिमों को अब तक 52 टिकट दिए गए हैं। संकेत साफ है कि पिछड़ी जातियों के वोटों के लिए घमासान चरम पर है। तभी तो भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने अपनी पार्टी के आंकड़े देते हुए गर्व बोध के साथ बताया कि अब तक घोषित 381 प्रत्याशियों में पिछड़ों को 123 और अनुसूचित जाति के 83 प्रत्याशी शामिल हैं। समाजवादी पार्टी ने भी टिकट बंटवारे में अपनी सोशल इंजीनियरिंग का पूरा ध्यान रखा है। पार्टी लगभग 400 सीटों के प्रत्याशी घोषित कर चुकी है और इसमें अपने वोट बैंक मुस्लिम-पिछड़ों का भरपूर ध्यान रखा गया है। पार्टी ने 80 मुसलमानों को मैदान में उतारा है।
चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता पर अकसर नुक्ताचीनी होती है पर एक ताजा सर्वेक्षण हुआ है। अमर उजाला, सी वोटर, इंडिया टीवी के दूसरे दौर के ओपिनियन पोल के मुताबिक यूपी में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी में कांटे की टक्कर नजर आ रही है। पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन और कांग्रेस में कड़ा मुकाबला है जबकि उत्तराखंड में बसपा किंग मेकर बनने की राह पर है। सर्वे नतीजों के मुताबिक यूपी में बसपा अब तक अनुमानित 145 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। सपा 138 सीटों और कांग्रेस 48 सीटों के साथ तीसरा स्थान पक्का कर रही है। भाजपा को अब तक 41 सीटें मिलने का अनुमान है। भाजपा को चौथे स्थान पर धकेलकर कांग्रेस किंग मेकर होने की ताकत जरूर हासिल करती दिख रही है। प्रदेश का सवर्ण कांग्रेस और भाजपा के साथ दिख रहा है। कुशवाहा प्रकरण से भाजपा को हुए नुकसान का फायदा उठाने में कांग्रेस कामयाब हो रही है। मुस्लिम या तो सपा के साथ हैं और जहां सपा कमजोर है वहां कांग्रेस के साथ हैं। मूर्ति प्रकरण से बसपा के दलित वोटर एकजुट हुए हैं। उत्तराखंड में पार्टी की कलह चलते कांग्रेस ने अपनी शुरुआती बढ़त खो दी है। यूपी के उलट यहां कांग्रेस का खेल खराब कर बसपा किंग मेकर बनती दिख रही है। मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी की अच्छी छवि का फायदा भाजपा को होता दिख रहा है लेकिन वह पार्टी को बहुमत के आंकड़े तक शायद ही ले जाए। कुल मिलाकर दिलचस्प स्थिति बनी हुई है। देखें यूपी में सोशल इंजीनियरिंग कितना कारगर सिद्ध होता है। अर्थात् किस पार्टी का जातीय समीकरण फिट बैठता है।
Anil Narendra, BC Khanduri, Daily Pratap, Mayawati, State Elections, Uttar Pradesh, Uttara Khand, Vir Arjun

Sunday, 15 January 2012

यूपी चुनाव में नरेन्द्र मोदी व नीतीश कुमार आमने-सामने

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th January  2012
अनिल नरेन्द्र
आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस, भाजपा, सपा व बसपा के प्रमुख प्रचारक कौन-कौन होंगे लोगों की इस पर भी दिलचस्पी बनी हुई है। खासतौर पर उत्तर प्रदेश में। मिशन-2012 फतह पर देवभूमि उत्तराखंड व यूपी में कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। प्रत्याशियों के नामों की घोषणा के बाद पार्टियां अब चुनावी प्रचार के लिए स्टार प्रचारकों की सूची बनाने में लग गई हैं। जाहिर है कि श्रीमती सोनिया गांधी, राहुल गांधी खास अट्रैक्शन होंगे। मुस्लिम मतदाताओं को पटाने के लिए सलमान खुर्शीद, दिग्विजय सिंह, राशिद अलवी, रशीद मसूद का इस्तेमाल हो सकता है। पता नहीं प्रधानमंत्री भी जाएंगे या नहीं? इसके अलावा दिल्ली, राजस्थान के मुख्यमंत्रियों का भी इस्तेमाल हो सकता है। हरियाणा के मुख्यमंत्री भी शामिल हो सकते हैं। युवाओं को आकर्षित करने के लिए राहुल के साथ सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जतिन प्रसाद भी जनता को संबोधित कर सकते हैं। जहां तक भाजपा का सवाल है पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी, एलके आडवाणी, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली मुख्य प्रचारक हो सकते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर अटकलें जोरों पर हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बारे में भी कहा जा रहा है कि वह यूपी में तो जरूर प्रचार के लिए आएंगे। नीतीश कुमार और नरेन्द्र मोदी सियासत में एक-दूसरे से नजरें मिलाने से भी परहेज करते हैं लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश में दोनों आमने-सामने होंगे। भाजपा द्वारा प्रतिष्ठाजनक सीटें नहीं दिए जाने के कारण पहले नीतीश ने उप्र चुनाव से अलग रहने का फैसला लिया था, लेकिन अब जबकि उनकी पार्टी जद (यू) सभी 403 सीटों पर अकेले लड़ने के प्रयास में है तो चुनाव प्रचार के लिए उनका यूपी आना तय-सा माना जा रहा है। उधर भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को अपने स्टार प्रचारक के तौर पर पेश करने का निर्णय लिया है। बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की शर्त को कबूल कर लिया था और प्रचार के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को बिहार नहीं आने दिया था। मोदी की छवि कट्टरवादी हिन्दू नेता की रही है। इस कारण नीतीश उनसे परहेज करते हैं। नीतीश को अल्पसंख्यकों का भारी समर्थन मिलता रहा है और वह किसी कीमत पर इस जनाधार को खोना नहीं चाहते। पूर्व में एनडीए के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में नीतीश और मोदी आमने-सामने एक मंच पर आए थे। दोनों नेताओं के साथ वाली तस्वीर से सियासत में तूफान खड़ा होता रहा है। भाजपा की राष्ट्र कार्यकारिणी की बैठक के दौरान इस तस्वीर के छपने पर नीतीश इतने नाराज हो गए कि उन्होंने भाजपा की रैली में शिरकत करने से मना कर दिया। यही नही नीतीश ने गुजरात सरकार को वह पांच करोड़ भी लौटा दिए जो बाढ़ राहत के लिए मोदी ने भेजे थे। हालांकि अब भी बिहार में दोनों पार्टियों का गठबंधन कायम है। इन दोनों राजनीतिज्ञ प्रतिद्वंद्वियों के बीच एक चुनाव में आमने-सामने से देखें क्या स्थिति बनती है? समाजवादी पार्टी के स्टार प्रचारक मुलायम सिंह, अखिलेश यादव और आजम खां प्रमुख होंगे। बसपा में तो एक ही प्रचारक हैं बहन जी। बहन जी अकेले अपने ही दमखम पर पार्टी को जिताने का प्रयास करेंगी। यूपी में इन प्रमुख दलों के अलावा और दर्जनों छोटे दल भी चुनावी दंगल में हैं। वह सब भी अपनी ताल ठोंकेंगे। कुल मिलाकर दिलचस्प होगा इन स्टार प्रचारकों का आपस में भिड़ने का नजारा।
Anil Narendra, Daily Pratap, Elections, Narender Modi, Nitish Kumar, State Elections, Uttar Pradesh, Vir Arjun