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Saturday, 9 June 2012

संघ चाहता है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी चुनाव लड़े

भाजपा में बढ़ते अंतर्पलह का एक सबूत संजय जोशी का पार्टी छोड़ना है। पहले बेइज्जत करके संजय जोशी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निकाला गया और अब पार्टी से ही निकलने पर मजबूर कर दिया गया। यह सब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि आरएसएस और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के इशारों पर अध्यक्ष नितिन गडकरी ने किया। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि गडकरी तो मुखौटा हैं असल ताकत तो संघ है और संघ ने अन्दरखाते यह फैसला कर लिया है कि एक तरफ वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी को डाउन करना है दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करना है। तभी तो संघ के मुखपत्र आर्गनाइजर के ताजा अंक में कहा गया है कि कांग्रेस पार्टी का तेजी से ग्रॉफ गिर रहा है लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाले राजग को कांग्रेस के इस ह्रास का फायदा उठा पाना भी मुश्किल नजर आ रहा है। केवल मोदी ही ऐसा चेहरा हैं जिनमें पार्टी को उभारने और देशभर में उसके वोट आधार का विस्तार करने की क्षमता है जैसे अटल बिहारी वाजपेयी ने नब्बे के दशक में करके दिखाया था। अगर संघ इस नतीजे पर वाकई ही पहुंच चुकी है तो क्यों नहीं खुली घोषणा कर देता कि संघ और भाजपा 2014 का लोकसभा चुनाव नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लड़ेगा? श्री नरेन्द्र मोदी की छवि कट्टर हिन्दुत्व की है। अटल जी की छवि और मोदी की छवि में बहुत फर्प है। अटल जी सबको साथ लेकर चलते थे। मोदी के काम करने का अपना ही ढंग है, यह न तो कार्यकर्ता की परवाह करते हैं, न नेता की और न ही संघ की। उनकी महत्वाकांक्षाएं अब संघ और भाजपा से ऊपर हो गई हैं। वह इनको कुछ नहीं समझते। कल तक इन्हीं गडकरी साहब की मोदी से अनबन थी पर अब संघ के इशारे पर गडकरी को मोदी से समझौता करना पड़ा है और इस सौदे की गडकरी को क्या कीमत देनी पड़ी है संजय जोशी के केस से पता चलता है। हमें लगता यह है कि संघ मोदी को आडवाणी के खिलाफ खड़ा कर रहा है। आडवाणी को किनारे लगाने के लिए संघ किसी भी हद तक जा सकता है। जब संघ को यह विश्वास हो गया कि अब अटल जी राजनीति में सक्रिय भूमिका नहीं निभा सकते तो उसने आडवाणी की काट करनी आरम्भ कर दी और विडम्बना यह है कि खुद श्री आडवाणी ने उन्हें बहाना भी गलती से दे दिया। मैं जिन्ना के बयान की बात कर रहा हूं। कभी राजनाथ सिंह को आगे करके तो कभी दूसरी पंक्तियों के नेताओं को उकसा कर आडवाणी को डाउन करने का प्रयास होता रहा। कटु सत्य तो यह है कि आज भी आडवाणी के सामने अन्य सभी भाजपा नेता बौने लगते हैं। नरेन्द्र मोदी बेशक एक काबिल और धाकड़ छवि वाले नेता हैं पर उन्हें भाजपा के अन्दर और बाहर कितना स्वीकार किया जाएगा, यह कहना मुश्किल है। अगर नरेन्द्र मोदी को भावी पीएम प्रोजेक्ट किया जाता है तो भाजपा में ही घमासान मच जाएगा। सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, डाक्टर मुरली मनोहर जोशी सभी अपने दावे पेश कर सकते हैं। फिर राजग के दूसरे घटक दलों जिनमें नीतीश कुमार, बाल ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल जैसे दिग्गज प्रमुख हैं, क्या मोदी को स्वीकार करेंगे? आडवाणी जी ऐसे नेता हैं जिनकी छतरी के नीचे राजग सहयोगी दल संगठित हो सकते हैं। कांग्रेस के खिलाफ माहौल इतना खराब है कि क्या कह सकते हैं शायद मुसलमान भी मोदी की जगह आडवाणी का समर्थन कर दें? पर आडवाणी के ऊंचे कद के बावजूद आरएसएस उन्हें डाउन करने के लिए किसी हद तक जाने को तैयार है। पहले राजनाथ सिंह को खड़ा किया गया, वह फेल हो गए अब नरेन्द्र मोदी को खड़ा किया जा रहा है यानि संघ ऐसा करने के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार है पर संघ अपने ही बुने जाल में फंसता नजर आ रहा है और आडवाणी के खिलाफ मोदी को विकल्प के रूप में आगे करने की रणनीति संघ के ही खिलाफ साबित हो रही है। अब संघ को यह समझ नहीं आ रहा है कि वह मोदी की शर्तों को अस्वीकार कैसे करे? विवश होकर संघ मोदी से ब्लैकमेल हो रहा है। असल में संघ को यह अनुमान शायद नहीं था कि नरेन्द्र मोदी अपनी प्रवृत्ति के मुताबिक ही राजनीति करेंगे। उन्होंने अपनी राजनीतिक दबंगई से जिस तरह प्रवीण तोगड़िया सरीखे के संघ के नेताओं को प्रभावहीन बना दिया उसी तरह अपने विरोधियों को षड्यंत्र और राजनीतिक सौदेबाजी के तहत निपटाने में संकोच नहीं किया। नरेन्द्र मोदी की इस दबंगई की वजह से आज पूरी दुनिया में भाजपा की छवि मुस्लिम विरोधी और दंगाई की बनी हुई है। हिन्दुत्व के झंडाबरदारों को एक बात समझ लेनी चाहिए कि देश में उदार हिन्दुत्व तो ठीक है किन्तु हिंसक एवं कट्टर हिन्दुत्व का समर्थन बहुसंख्य हिन्दू भी नहीं करते। इसलिए इस बात की कोई गारंटी नहीं कि केंद्रीय राजनीति में मोदी प्रासंगिक और स्वीकार्य हों? भारत गुजरात नहीं। राज्य में जो चले यह जरूरी नहीं कि पूरे देश में भी वही चले। अभी तो संघ की गलत रणनीति के दुष्परिणाम की शुरुआत है। उसने भाजपा के परम्परागत सिस्टम के खिलाफ जो प्रयोग शुरू किया उसकी विकृति स्वरूप परिणाम भी आने शुरू हो गए हैं। सरल भाषा में कहें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नरेन्द्र मोदी को भस्मासुर के रूप में तैयार कर दिया है। किन्तु जैसा कि संघ से जुड़ी पत्र-पत्रिकाएं एवं नेता नरेन्द्र मोदी को लगातार नसीहतें दे रहे हैं, उसे छोड़ें और अपना दिल बड़ा करें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भाजपा में अब संगठन पहले नेता बाद में का सिद्धांत समाप्त हो गया है। अब भाजपा संघ की प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी बन चुकी है जिसके एमडी नितिन गडकरी हैं और यह पार्टी को अपनी निजी कम्पनी की तरह चला रहे हैं। मात्र दो सीटों से लोकसभा में भाजपा को पौने दो सौ तक पहुंचाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी की तुलना में नरेन्द्र मोदी कितने सफल साबित होंगे, यह तो भविष्य ही बताएगा किन्तु इतना तो तय है कि मोदी को भाजपा के अन्दर ही कई मोर्चों पर जूझना पड़ेगा। अभी लोकसभा चुनाव में दो वर्ष शेष हैं, ऐसी हालत में संघ की आडवाणी विरोधी मुहिम भी पिट सकती है। आडवाणी जी को संघ और भाजपा मिलकर भी चाहे जितना पीछे धकेलने की कोशिश करे किन्तु वास्तविकता तो यही है कि उनके सामने गडकरी और नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर दोनों में इन दोनों का व्यक्तित्व बौना लगता है। अगर आने वाले दिनों में यदि आडवाणी ने भाजपा से ही किनारा कर लिया तो पार्टी में विभाजन तक हो सकता है क्योंकि संघ की घटिया राजनीति की वजह से भाजपा का कोई भी नेता दूसरे पर भरोसा नहीं कर रहा है और इसीलिए पार्टी में कई गुट सक्रिय हैं। जाहिर है कि इन गुटों का परस्पर संघर्ष पार्टी को कमजोर ही करेगा और यदि अंतर्पलह के कारण 2014 में भाजपा को मात मिलती है तो इसके लिए पूरी तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिम्मेदार होगा। यदि संघ को भाजपा की चिन्ता होती तो वह पार्टी में उठापटक कराने के लिए आडवाणी के खिलाफ दूसरी पंक्ति के नेताओं को उकसाने और एकजुट करने का काम नहीं करता। यदि उसको जरा भी राजनीतिक समझ होती तो क्रम परम्परा, अटल जी के बाद आडवाणी जी और उनके बाद डॉ. मुरली मनोहर जोशी, से छेड़छाड़ न करता। सच तो यह है कि अब संघ खुद भी दिग्भ्रमित और अविश्वसनीय होता जा रहा है। एक वक्त था जब लोग मानते थे कि यदि भाजपा इतनी अनुशासित है तो संघ कितना अनुशासित होगा। लेकिन अब लोग भाजपा और संघ में कोई अन्तर नहीं करते, लोग अब दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू मान रहे हैं। अब फैसला संघ को करना है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा चुनाव लड़ेगी या नरेन्द्र मोदी के?
Anil Narendra, BJP, Daily Pratap, L K Advani, Modi, Narender Modi, RSS, Sanjay Joshi, Vir Arjun

Sunday, 27 May 2012

दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27 May 2012
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी भारी पड़ गए। पार्टी में संघ की नहीं चली और संजय जोशी को भाजपा कार्य समिति की बैठक से पहले बाहर का रास्ता दिखाना ही पड़ा। मोदी के दबाव में गडकरी और संघ नतमस्तक दिखे। पार्टी सूत्रों ने बताया कि मोदी ने साफ कहा कि अगर कार्य समिति में संजय जोशी आए तो बैठक से खुद को दूर रखने को मजबूर होंगे। गडकरी ने बुधवार शाम को फोन से बात की थी। गडकरी ने कोर कमेटी की बैठक में मोदी से बातचीत का सार रखा। सूत्रों के मुताबिक कुछ वरिष्ठ भाजपा नेता मोदी की धमकी को स्वीकार्य करने के इच्छुक नहीं थे मगर गडकरी और संघ के दबाव के चलते संजय जोशी को दो लाइन का इस्तीफा फैक्स से भेजना पड़ा। दरअसल मोदी और गडकरी में सौदे की सुगंध आ रही है। मोदी ने शर्त रखी कि जोशी को बाहर करो और गडकरी ने शर्त रखी कि मुझे दूसरा कार्यकाल देने का आप समर्थन करें। अब लगता है कि गडकरी के दूसरे कार्यकाल मिलने में सभी रुकावटें दूर हो गई हैं और उन्हें दूसरा कार्यकाल मिलना लगभग तय है। गडकरी का तीन साल का कार्यकाल 25 दिसम्बर को पूरा हो रहा है। इस प्रस्ताव के लिए बाकायदा संगठन के संविधान में संशोधन किया जाना प्रस्तावित था, जिसे अमली जामा पहनाया गया। पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने औपचारिक रूप से बैठक में अध्यक्ष के कार्यकाल को एक्सटेंशन दिए जाने का प्रस्ताव रखा जिसका दूसरे पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू ने अनुमोदन किया। इस सौदे का एक पहलू यह भी है कि केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य छत्रप के प्रभाव को स्वीकार कर लिया है। यह न तो भाजपा के लिए अच्छा संकेत है और न ही संघ के लिए। राष्ट्रीय पार्टी की छवि को लेकर जिस भाजपा को राष्ट्रवाद और अनुशासन के लिए जाना जाता था अब उस सिद्धांत पर पानी फिरता नजर आ रहा है। भाजपा का बौना होता नेतृत्व और उस पर हावी होते राज्य छत्रप संघ के लिए चुनौती बन गए हैं। राजस्थान में वसुंधरा राजे, गुजरात में नरेन्द्र मोदी और कर्नाटक में वीएस येदियुरप्पा से जो चुनौतियां मिल रही हैं वह भाजपा को कांग्रेस के विकल्प के रूप में उभरने से भी रोक रही है। भाजपा अध्यक्ष गडकरी के कार्यकाल को बढ़ाकर संघ भाजपा पर अपनी पकड़ जरूर साबित करना चाह रहा है लेकिन वह इकबाल और इस्तकबाल नहीं दिख रहा जो भाजपा में पहले होता था। भाजपा के इतिहास में यह पहला मौका है जब भाजपा को संघ की ओर से नियुक्त करवाए गए व्यक्ति को हटाना पड़ा है। इससे भी साबित होता है कि संघ की भाजपा पर पकड़ कमजोर होती जा रही है। हमें लगता है कि भाजपा के अन्दर भी ऐसे नेता हैं जो चाहते हैं कि संघ की भाजपा मामलों में दखलअंदाजी कम हो। पूरे प्रकरण में जहां नरेन्द्र मोदी की जीत हुई है वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक मायने में हार हुई है। इससे नरेन्द्र मोदी का कद और बढ़ेगा और दुनिया को उन्होंने साबित कर दिया कि दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए।
Anil Narendra, BJP, Daily Pratap, L K Advani, Narender Modi, Nitin Gadkari, RSS, Sushma Swaraj, Vir Arjun

Friday, 13 April 2012

क्या नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत उम्मीदवार हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13 April 2012
अनिल नरेन्द्र
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर सुर्खियों में हैं। देश के अन्दर तो उनकी इतनी चर्चा नहीं हो रही जितनी विदेशों में है। अमेरिका के प्रतिष्ठित समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट के स्तम्भकार सीमोन डेयनार ने एक रिपोर्ट में लिखा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी 2014 के आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद के सबसे सशक्त दावेदार होंगे। भारत में काफी लोग उन्हें रोल मॉडल के रूप में देखते हैं। कुछ लोगों की नजर में वह देश के सबसे योग्य नेता हैं। हालांकि एक बड़ा वर्ग आज भी उन्हें मुसलमानों के सामूहिक नरसंहार के लिए माफ नहीं कर पाया है। रिपोर्ट में लिखा है कि नरेन्द्र मोदी को भारत की राजनीति में सबसे जटिल व्यक्तित्व वाला राजनेता माना जा सकता है। मोदी की अगुवाई में गुजरात जैसे राज्य की अर्थव्यवस्था ने नई ऊंचाइयों को छुआ है। लेकिन मुख्यमंत्री की हिन्दू राष्ट्रवादी छवि से काफी लोगों को लगता है कि उनके नेतृत्व में कट्टर धार्मिक शक्तियों को बल मिलेगा। दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी जैसे नेता की अगुवाई में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पुरानी सैक्यूलर छवि को धक्का लग सकता है। नरेन्द्र मोदी को राज्य में भ्रष्टाचार खत्म करने के साथ आर्थिक और औद्योगिक विकास को नई गति देने का श्रेय जाता है। तेजी से आगे बढ़ती गुजरात की अर्थव्यवस्था में न सिर्प देशी कम्पनियां बल्कि बड़ी संख्या में विदेशी कम्पनियों ने भी गुजरात में निवेश किया है। मोदी के आलोचक भी उन्हें निजी तौर पर भ्रष्ट नहीं मानते। साल 2014 में होने वाले आम चुनाव के बाद भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार हो सकते हैं नरेन्द्र मोदी।
श्री नरेन्द्र मोदी की इस प्रकार की प्रोजेक्शन से जहां मुसलमान समुदाय परेशान है वहीं उनकी अपनी पार्टी के कुछ लोग भी खुश नहीं हैं। प्रवासी भारतीयों के बीच मोदी को मिल रहे व्यापक समर्थन के चलते संघ परिवार के भीतर भी समीकरण बदल रहे हैं। इसका कारण है कि संघ की प्रवासी भारतीयों में गहरी पैठ है। अमेरिका, चीन और जापान का उद्योग क्षेत्र मोदी के साथ व्यापारिक संबंधों को बेहतर बनाने में लगा है। हालांकि भाजपा और संघ का एक बड़ा वर्ग मोदी को किनारे लगाने में लगा है ताकि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में ताकतवर होकर न उभर पाएं। इसलिए संगठन स्तर पर मोदी की छवि खलनायक वाली बनाने की भी कोशिश हो रही है और कुछ हद तक मोदी खुद ऐसी छवि बनाने के लिए बारूद दे रहे हैं। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचार न करना और पिछले वर्ष दिल्ली में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में न आना मोदी की संगठन विरोधी गतिविधियों को दर्शाता है। बहुत से भाजपाइयों का कहना है कि मोदी अपने आपको पार्टी से ऊपर समझने लगे हैं। मोदी के दिमाग में अब गरूर आ गया है। दुनिया के 100 प्रभावशालियों के लिए कराए जा रहे टाइम्स पत्रिका के सर्वे में मोदी ने ओबामा और ब्लादिमीर पुतिन को पछाड़ दिया है। माना जा रहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भावी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो सकते हैं। लेकिन देश-विदेश में हो रहे सर्वेक्षणों में लोकप्रियता के हिसाब से नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी से पीछे हैं।
Anil Narendra, Daily Pratap, Modi, Narender Modi, Nitin Gadkari, Nitish Kumar, RSS, Vir Arjun

Sunday, 25 March 2012

Party may go to hell, Gadkari’s business is on the rise.

 Anil Narendra
Most of the leaders of Bhhartiya Janata Party do not agree with the style of functioning of BJP President Nitin Gadkari. Gadkari is considered to be a representative of the Rashtriya Swayamsewak Sangh, and he became BJP President with the support of the RSS. Gadkari is a businessman and he is running BJP like his own shop. The recent controversy is related to the distribution of Rajya Sabha tickets. There sharp arguments at the BJP Parliamentary Party meeting on Tuesday over the issue of setting aside the deserving Party candidate and giving ticket to a person  allegedly on the basis of money power. A number of MPs under the leadership of Yashwant Sinha criticized the Party leadership for not fielding an official candidate, but supporting a businessman, Anshuman Mishra. Sinha said that the Party MLAs should not be left at the mercy of 'the horse trading bazaar'. It causes the Party's discipline to break and blemishes its image. He said that in case the strategy was not changed in the present Rajya Sabha elections in Jharkhand, he would resign. Most of the MPs were displeased with SS Ahluwalia being denied Party ticket from Jharkhand. It is reported that the Sangh had vetoed on the name of Ahluwalia. MP from Himachal Pradesh, Shanta Kumar said that Ahluwalia is an influential leader of the Upper House and he must have been allowed one more term. Nawada MP Bhola Singh said that Party's self-consciousness had been shattered and it had prostrated before the money power. Maneka Ghandhi, an MP from Anwala appealed to the central leadership to end the Karnataka crisis and consider the demands made by Yediyurappa. Denial of Rajya Sabha ticket to Ahluwalia has fulfilled the wishes of the Congress and Mayawati. Ahluwalia have been cornering the government on all the issues, which had added to the problems of the government. Mayawati also wanted that Ahluwalia should not be allowed second term as an MP, as he would have to surrender his government house at 10 Gurudwara Rakab Ganj. Had Gadkari wanted, he would have sent Ahluwalia to the Rajya Sabha. He was short of his victory by just 11 votes. Under the circumstances, he could have made up this shortage with the help of JD(U), but in spite of his talking to Gadkari for this seat earlier, Gadkari with Sushil Modi left this seat for JD(U) and the Bihar JD(U) chairman, and Vashishtha Singh was fielded from this seat. The most delicate situation in the Party's Parliamentary Committee meeting was that of LK Advani, who sat as a silent spectator throughout the meeting. The impact of the rebellious mood of MPs was evident immediately after. It is being said that now the Party would not press its MLAs to vote for any independent candidate, but efforts are being made that the BJP MLAs boycott the election. As a Party President, Gadkari led the election campaign in a dictatorial manner. First, with the support oj RSS, Gadkari appointed a Pracharak and former Organisation Secretary of RSS, Sanjay Joshi, the in charge of UP electioneering campaign, despite strong opposition from the high statured leader and the Chief Minister of Gujarat, Narendra Modi. Secondly, despite opposition from all Party leaders, Gadkari enrolled ousted BSP leaders Babu Singh Kushwaha and Badshah Singh as members of the Party. All the experiments, excepting that of Uma Bharati in Bundelkhand failed miserably. In order to stop the polarization of votes, fire-brand leaders, Varun Gandhi and Aaditya Nath were confined to their constituencies, while on the other hand, the leader with recognized Hinduism face, Narendra Modi was invited for electioneering, but when he expressed his displeasure, no effort to placate him was made.
Despite all its efforts, the Party not only failed to stop polarization of Muslim votes, but it also lost its traditional votes in this effort, which resulted in Party's failure even to revisit its performance of 2007.
Whether it is Uttarakhand or Punjab, the BJP has been down-graded in both the States. The popularity graph of BJP has been sliding downward, from the day, Gadkari has taken over as the President of the Party, but Nitin Gadkari is least bothered about this. In fact, he has been running the Party like a shop, with the sole aim of minting money and he is doing this job efficiently. Gadkari's shop is running will, Party may go to dogs.

Friday, 23 March 2012

गडकरी की हट्टी फल-फूल रही है, पार्टी जाए भाड़ में

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23 March 2012
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी के काम करने के तौर-तरीकों से अधिकतर भाजपा नेता सहमत नहीं हैं। गडकरी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रतिनिधि माना जाता है, वह संघ के समर्थन से ही भाजपा अध्यक्ष बने। गडकरी एक बिजनेसमैन हैं जो भाजपा को अपनी निजी दुकान की तरह चला रहे हैं। ताजा बवाल राज्यसभा की टिकटों के बंटवारे को लेकर है। राज्यसभा चुनाव में पार्टी के सही उम्मीदवारों को दरकिनार करने और कथित रूप से पैसे के बल पर टिकट देने के मुद्दे पर मंगलवार को भाजपा संसदीय दल की बैठक में जमकर बवाल हुआ। यशवंत सिन्हा की अगुवाई में सांसदों ने झारखंड में पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार खड़ा न करके एक व्यवसायी अंशुमान मिश्रा को समर्थन देने को लेकर सीधे पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठा दिया। सिन्हा ने कहा कि पार्टी विधायकों को `हार्स ट्रेडिंग की मंडी' में नहीं छोड़ना चाहिए। इससे पार्टी का अनुशासन भंग होता है और इमेज खराब होती है। उन्होंने कहा कि यदि झारखंड में मौजूदा राज्यसभा चुनाव में रणनीति को नहीं बदला गया तो वह इस्तीफा दे देंगे। अधिकतर सांसद एसएस आहलूवालिया को दोबारा झारखंड से टिकट नहीं देने पर नाराज थे। बताते हैं कि आहलूवालिया पर संघ ने वीटो लगा दिया था। बैठक में हिमाचल से सांसद शांता कुमार ने कहा कि आहलूवालिया उच्च सदन में एक प्रभावी नेता हैं और उन्हें एक और कार्यकाल तो मिलना ही चाहिए था। नवादा के सांसद भोला सिंह ने कहा कि पार्टी की आत्म चेतना मर चुकी है और वह धन-बल के सामने नतमस्तक हो रही है। आंवला से सांसद मेनका गांधी ने केंद्रीय नेतृत्व से कर्नाटक के संकट को समाप्त करने और येदियुरप्पा की मांगों पर ध्यान देने की अपील की। आहलूवालिया को राज्यसभा का टिकट न मिलने से कांग्रेस और मायावती की मुराद पूरी हो गई है। आहलूवालिया यूपीए सरकार को तमाम मुद्दों पर सबसे ज्यादा घेरते रहे हैं, जिनके कारण सरकार कई बार परेशानी में पड़ी है। मायावती भी चाहती थीं कि आहलूवालिया का राज्यसभा से पत्ता साफ हो जाए ताकि सांसद न रहने पर उनको (आहलूवालिया) अपना सरकारी बंगला 10 गुरुद्वारा रकाबगंज खाली करना पड़े। गडकरी चाहते तो आहलूवालिया को भेज सकते थे। उन्हें जीतने के लिए बस 11 वोट की कमी पड़ रही थी। ऐसे वह जद (यू) से पूरा कर सकते थे लेकिन गडकरी और सुशील मोदी ने मिलकर वह सीट ही जद (यू) के लिए छोड़ दी जिस पर बिहार जद (यू) अध्यक्ष वशिष्ठ सिंह ने नामांकन कर दिया जबकि आहलूवालिया ने इस सीट पर गडकरी से पहले से ही बात कर रखी थी। संसदीय दल की बैठक में सबसे नाजुक स्थिति आडवाणी जी की थी। पूरी बैठक में वह एक मूकदर्शक बने रहे। सांसदों के बगावती तेवर का असर तुरन्त देखने को मिला। कहा जा रहा है कि झारखंड में अब पार्टी राज्यसभा चुनाव में अपने विधायकों को किसी निर्दलीय उम्मीदवार के वोट देने के लिए दबाव नहीं देगी बल्कि कोशिश हो रही है कि भाजपा विधायक चुनाव का ही बायकॉट करें। बतौर अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हिटलरी स्टाइल से चुनाव अभियान चलाया। सबसे पहले गडकरी ने संघ के समर्थन के बल पर पार्टी के कद्दावर नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोध के बावजूद संघ के प्रचारक रहे पूर्व संगठन मंत्री संजय जोशी को यूपी चुनाव प्रचार का इंचार्ज बना दिया। दूसरा गडकरी ने सभी पार्टी नेताओं के विरोध के बावजूद बसपा से निष्कासित बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह को पार्टी में शामिल किया। पार्टी ने बुंदेलखंड में जितने भी प्रयोग किए सिवाय उमा भारती के बाकी सब फेल हुए। मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण को रोकने के लिए अपने सभी फायर ब्रांड नेताओं वरुण गांधी, योगी आदित्यनाथ को जहां अपने क्षेत्र तक सीमित कर दिया वहीं दूसरी तरफ हिन्दुवादी चेहरा माने जाने वाले नरेन्द्र मोदी को न्यौता भेजा लेकिन जब उनकी नाराजगी जाहिर हुई तो उन्हें मनाने का कोई प्रयास नहीं किया। पार्टी के सभी प्रयासों के बाद भी पार्टी मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण तो न रोक सकी बल्कि अपने इस प्रयास में उसने अपने परम्परागत वोट भी गंवा दिए और इसका परिणाम यह हुआ कि पार्टी 2007 का भी प्रदर्शन न दोहरा सकी। चाहे मामला उत्तराखंड का रहा हो या पंजाब का, दोनों ही राज्यों में भाजपा की स्थिति गिरी है। गडकरी जबसे अध्यक्ष बने हैं भाजपा का ग्रॉफ गिरता ही जा रहा है पर इससे नितिन गडकरी को कोई फर्प नहीं पड़ता। वह तो पार्टी को बतौर हट्टी (दुकान) चला रहे हैं जिसका एकमात्र मकसद है पैसा बनाना और यह काम वह बाखूबी कर रहे हैं। गडकरी की हट्टी तो फल-फूल रही है, पार्टी जाए भाड़ में।
Anil Narendra, Babu Singh Kushwaha, BJP, Daily Pratap, Jharkhand, Narender Modi, Nitin Gadkari, RSS, Uttar Pradesh, Uttara Khand, Varun Gandhi, Vir Arjun

Monday, 12 March 2012

Election results bring more pain than cheer for BJP

Anil Narendra
Assembly elections in all the five States have brought more pain than cheer for the Bharatiya Janata Party. The reason for cheer is the result of Goa Assembly, where BJP and Goa Gomantak Party combined has secured clear majority. BJP, for the first time has claimed majority on its own in this State with beautiful beaches. The real hero of this BJP victory is the former Chief Minister, Parrikar. He was leading the BJP election campaign in the State. I think that securing power with the support of minority is the biggest achievement of BJP. Goa Christians have proved that BJP is not a pariah. The party has won eight seats out of 17 from Christian majority areas. BJP itself fielded 6 Christian candidates and supported two independent candidates and all the eight won. The Party has received the biggest shock in UP. The election results in Uttar Pradesh have proved to be a big blow to Party's hopes of forming RJD government at the Centre in 2014. BJP was viewing its performance in UP Assembly elections as a cornerstone for its success in 2014 General Elections, but the Assembly results have dashed its hopes and it is now more concerned about the 2014 scenario. Once again, the UP is following the path shown by Tamil Nadu, where national parties have almost taken to backstage and their role has become almost irrelevant. In UP elections considered to be election touchstone for BJP and the RSS, all their experiments, on one hand, have been shattered one by one and on the other, a number of their warriors have been grounded. RSS and the Party President Nitin Gadakari had jointly taken up the challenging task of consoling the dissatisfied voters. First, Gadakari, with the support of the RSS, propped up the former RSS Pracharak and former Organiser, Sanjay Joshi in the UP elections, in spite of strong objections from the high-statured leader and Gujarat Chief Minister, Narendra Modi. Secondly, in spite of stiff opposition from all party leaders, Gadakari admitted the ousted BSP leaders Babu Singh Kushwaha and Badshah Singh in the Party. In view of increasing opposition, he suspended the membership of Babu Singh Kushwaha, but not only kept the other corrupt leader, Badshah Singh in the Party, but made him party candidate from the Mahoba seat. Except Uma Bharati, all the BJP experiments with Bundelkhand proved unsuccessful. He restricted firebrand leaders like Varun Gandhi and Yogi Adityanath to their constituencies to stop the polarization of Muslim votes, and no effort was made to placate Narendra Modi considered to the face of Hinduism, who was invited to join the BJP election campaign, but who was not happy with the situation. In spite of all efforts, Party not only failed to stop the polarization of Muslim votes, but instead it lost its traditional voters, resulting in its failure to re-enact the 2007 performance, but its performance this time was miserably poor. This is the first occasion after the demolition of disputed structure in Ayodhya on 6th December 1992 that the BJP candidate Lallu Singh lost to Tej Narayan Pandey alias Pawan Pandey of SP. Lallu Singh has been winning this seat since 1991. Candidates for UP were also decided by RSS, Gadkari and Joshi. They fielded such weak candidates, who not only brought disgrace to the Party, but it was ousted from the race and was relegated to the fourth place and most of its candidates were unable to save their deposits. One hundred twenty two such candidates were defeated who failed to secure their place even in the four-cornered fight. The BJP President Nitin Gadakari had made comprehensive preparations to effect change in UP. He did several new experiments instead of sticking to the traditional attitude and not only this, Gadakari & Co conducted a separate survey for selection of best candidates. In the situation emerging after the elections, it came fourth with 122 candidates and most of them had to fight to save their deposit. There were a number of candidates, who were struggling hard even to get 5,000 votes. In UP, the BJP has been put on margin and responsibility for such a debacle rests on RSS and leaders like Nitin Gadakari and Sanjay Joshi.

Saturday, 10 March 2012

भाजपा के लिए परिणाम ज्यादा गम और कम खुशी लेकर आए हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10 March 2012
अनिल नरेन्द्र
 भारतीय जनता पार्टी के लिए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव थोड़ी खुशी और ज्यादा गम लाए हैं। खुशी की वजह है गोवा परिणाम। गोवा में भाजपा और महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल गया है। भाजपा ने पहली बार खूबसूरत तटों वाले इस राज्य में 21 सीटें जीतकर अकेले अपने दमखम से बहुमत हासिल किया। गोवा में भाजपा की इस जीत के असल नायक पूर्व मुख्यमंत्री पार्रिकर हैं। चुनावी कमान उन्हीं के हाथों में थी। गोवा में मेरी राय में एक बहुत बड़ी उपलब्धि भाजपा की यह है कि उसने अल्पसंख्यकों के समर्थन से सत्ता पाई। गोवा के ईसाइयों ने यह साबित कर दिया कि भाजपा अछूती नहीं है। दक्षिण गोवा की 17 में से 8 सीटें पार्टी उन क्षेत्रों से जीते हैं जहां ईसाई बहुमत है। भाजपा ने खुद 6 ईसाई उम्मीदवार खड़े किए थे और 2 निर्दलीयों का समर्थन किया था। सभी आठों जीते। पार्टी को सबसे बड़ा झटका उत्तर प्रदेश में लगा है। उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम भाजपा को 2014 में केंद्र में राजग सरकार बनाने की उम्मीदों पर बड़ा झटका साबित हुए। भाजपा उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में रोपे गए बीज से केंद्र में 2014 के लोकसभा चुनावों में सफलता का अनुमान लगा रही थी, लेकिन परिणाम आए उससे निराशा और चिन्ता ही हाथ लगी है। उत्तर प्रदेश फिर एक बार तमिलनाडु की राह पर चला गया है जहां राष्ट्रीय दल की भूमिका अप्रासंगिक-सी हो गई है। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चुनावी प्रयोगशाला बने यूपी चुनावों में जहां एक-एक करके सभी प्रयोगों को धराशायी कर दिया वहीं पार्टी के कई दिग्गजों को धूल चटाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। रूठे मतदाताओं को मनाने का जिम्मा राष्ट्रीय स्वयं संघ और अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मिलकर उठाया। सबसे पहले गडकरी ने संघ के समर्थन की बदौलत पार्टी के कद्दावर नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोध के बावजूद संघ के प्रचार रहे पूर्व संगठन मंत्री संजय जोशी को यूपी के चुनावों में सक्रिय किया। दूसरा गडकरी ने सभी पार्टी नेताओ के विरोध के बावजूद बसपा से निष्कासित बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह को पार्टी में शामिल किया। बढ़ते विरोध के चलते कुशवाहा की सदस्यता को तो निलंबित कर दिया लेकिन भ्रष्टाचार के दूसरे आरोपी बादशाह सिंह को पार्टी में बनाए रखा बल्कि उनको महोबा से चुनाव मैदान में उतार दिया। पार्टी ने बुंदेलखंड को लेकर जितने भी प्रयोग किए सिवाय उसमें एकमात्र उमा भारती के अलावा कोई सफल नहीं हो सका। मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण को रोकने के लिए अपने सभी फायर ब्रांड नेताओं वरुण गांधी, योगी आदित्यनाथ को जहां अपने क्षेत्र तक सीमित कर दिया वहीं दूसरी तरफ हिन्दुवादी चेहरा माने जाने वाले नरेन्द्र मोदी को न्यौता तो भेजा लेकिन जब उनकी नाराजगी जाहिर हुई तो उन्हें मनाने का कोई प्रयास नहीं किया गया। पार्टी के सभी प्रयासों के बाद भी पार्टी मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण करने से तो न रोक सकी बल्कि वह अपने इस प्रयास में अपने परम्परागत मतदाताओं का भी वोट गंवा बैठे, जिसके चलते पार्टी 2007 के प्रदर्शन को दोहराना तो दूर रहा, उससे भी कम हो गई। अयोध्या में 6 दिसम्बर 1992 को विवादित ढांचे गिरने के बाद यह पहला मौका है जब भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी लल्लू सिंह सपा के तेज नारायण पांडे उर्प पवन पांडे से हार गया। लल्लू सिंह 1991 से लगातार यह सीट जीतते आ रहे थे। उत्तर प्रदेश के लिए उम्मीदवारों का चयन भी संघ, गडकरी और संजय जोशी ने किया। इन्होंने ऐसे फिसड्डी उम्मीदवार खड़े किए जिन्होंने न केवल पार्टी की भद्द पिटवाई बल्कि यह संघर्ष में न आकर चौथे स्थान पर रहे जहां भी ज्यादातर ने जमानत तक गंवा दी। 122 ऐसे प्रत्याशी हारे हैं जो चतुष्कोणीय लड़ाई में भी जगह नहीं बना सके। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने यूपी के अन्दर बदलाव के लिए लम्बी तैयारी की थी। पार्टी के अन्दर के पुराने परम्परावादी रवैये के बजाय कई नए प्रयोग किए और यही नहीं, गडकरी एण्ड कम्पनी ने अलग सर्वेक्षण कराया जिससे कि अव्वल प्रत्याशी चयन हो सके। चुनाव बाद जो स्थिति बनी है उसमें भाजपा के चौथे स्थान पर करीब 122 प्रत्याशी रहे जिनमें से ज्यादातर अपनी जमानत बचाने के लिए संघर्ष करते रहे। कई प्रत्याशी तो ऐसे थे जिनको 5000 वोट लाने के लाले पड़ गए। उत्तर प्रदेश में भाजपा हाशिये पर चली गई और इसके लिए जिम्मेदार हैं संघ, नितिन गडकरी और संजय जोशी सरीखे के नेता।
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Thursday, 9 February 2012

क्या जनरल सिंह के खिलाफ रणनीति के तहत साजिश रची गई?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th February  2012
अनिल नरेन्द्र
थल सेना अध्यक्ष जनरल वीके सिंह की उम्र के विवाद के पीछे क्या सत्ता में बैठे कुछ लोगों ने साजिश रची थी? कम से कम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुसार तो यह सारा विवाद एक रणनीति के तहत खड़ा किया गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने मुख्य पत्र आर्गेनाइजर में एक रिपोर्ट छापी है। रिपोर्ट के मुताबिक सत्ता में शीर्ष पर बैठे लोगों ने जनरल विजय कुमार सिंह को समय से पहले रिटायर करने की साजिश पिछले साल रची थी। संघ ने आर्गेनाइजर के माध्यम से सेना प्रमुख का खुलकर समर्थन किया है और उनके खिलाफ सरकार के सख्त रुख को जनरल सिंह की ईमानदारी का नतीजा बताया है और कहा है कि कांग्रेस पार्टी के लिए वह रक्षा सौदों में आड़े आ रहे हैं। सेना प्रमुख के खिलाफ सरकार के भीतर और बाहर विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी के भीतर के तत्वों की साजिश का यह दावा ऐसे समय सामने आया है जब उच्चतम न्यायालय ने उम्र के विवाद पर उनकी याचिका पर सरकार को अपना आदेश वापस लेने को कहा है। कानूनी विशेषज्ञों और जानकार सूत्रों ने इस बात की पुख्ता सम्भावना जाहिर की है कि सरकार अपना 30 दिसम्बर का वह आदेश वापस ले लेगी जिसके जरिये रक्षा मंत्री एके एंटनी ने सेना प्रमुख की वैधानिक याचिका खारिज कर दी थी। रक्षा मंत्री द्वारा अपनी शिकायत खारिज होने पर ही जनरल सिंह ने 16 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी जिसकी सुनवाई हो रही है। साजिश के पहलू का आधार गिनाते हुए संघ ने कहा है कि सत्ता में शीर्ष पर बैठे लोगों ने तय किया कि जनरल सिंह की जगह अपना आदमी बैठना चाहिए। सम्पादकीय में कहा गया है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कार्यकाल में बड़ी संख्या में हुए रक्षा सौदों को इस विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि जनरल वीके सिंह की ईमानदारी सरकार के भीतर एवं बाहर तथा कांग्रेस पार्टी के रक्षा सौदे करने वालों को रास नहीं आ रही थी। व्हाट ए शेम डॉ. सिंह शीर्षक से प्रकाशित सम्पादकीय में संघ ने कहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुप्पी भी इसी ओर इशारा करती है। संघ ने राष्ट्रपति और देश की सर्वोच्च कमांडर से आग्रह किया है कि उन्हें संकट के इस समय में प्रधानमंत्री के सामने अपने मन की बात रखनी चाहिए। संघ ने कहा कि जब इज्जत पर कीचड़ उछाली जाती जा रही हो तो चुप रहना ठीक नहीं होता और जनरल वीके सिंह ने आवाज उठाकर ठीक ही किया है। जिस तरह की प्रतिक्रिया उनके कदम पर सामने आई है उससे जाहिर है कि वह अकेले नहीं हैं, सारा राष्ट्र उनके साथ है। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि हमारी चिन्ता सरकार के फैसले को लेकर नहीं है बल्कि चिन्ता निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर है जो दुर्भावना वाली लगती है। अदालत ने कहा कि जनरल सिंह की शिकायत को सरकार ने विचार योग्य नहीं माना, तब उनके पास सुप्रीम कोर्ट आने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। संघ के आरोपों में कितना सच है यह तो सरकार ही बेहतर जानती है पर हमारा मानना है कि यह मामला बड़ी आसानी से सुलझ सकता था। जनरल सिंह का जन्म आर्मी अस्पताल में अगर हुआ था तो उस अस्पताल से जन्म तिथि क्यों नहीं पूछ सकते?
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Friday, 7 October 2011

एक बार फिर अन्ना हजारे और कांग्रेस आमने-सामने

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th October 2011
अनिल नरेन्द्र
समाजसेवी अन्ना हजारे ने सख्त शब्दों में कांग्रेस को चेतावनी दी है। रालेगण सिद्धि से बोलते हुए अन्ना ने कहा कि यदि केंद्र संसद के शीतकालीन सत्र में जन लोकपाल विधेयक पारित करने में विफल रहा तो सत्तारूढ़ पार्टी को चुनाव होने जा रहे उन पांच राज्यों में जबरदस्त हार का सामना करना पड़ेगा। हजारे ने हिसार उपचुनाव को अपने इस अभियान का पहला कदम करार देते हुए कहा कि वह हरियाणा के हिसार लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं से अपील करेंगे कि वे कांग्रेस प्रत्याशी को वोट नहीं दें, क्योंकि पार्टी जानबूझकर जन लोकपाल विधेयक संसद में नहीं ला रही है। हिसार में 13 अक्तूबर को उपचुनाव होना है। पुणे से 50 किलोमीटर दूर अपने गांव में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए अन्ना ने कहा कि हम लोगों से यह नहीं कहने जा रहे कि उन्हें किसे वोट देना चाहिए। हम लोगों से कांग्रेस को छोड़कर किसी अन्य पार्टी को वोट देने और साफ छवि एवं अच्छे चरित्र वाला उम्मीदवार चुनने को कहेंगे। अन्ना हजारे ने यह भी घोषणा की कि वह उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव शुरू होने से तीन दिन पहले लखनऊ में चार दिन का अनशन भी करेंगे। उधर टीम अन्ना ने सरकार एवं संसद पर जन लोकपाल विधेयक के पक्ष में दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से गांधी जयंती के अवसर पर देशभर में विधेयक पर जनमत संग्रह अभियान की शुरुआत कर दी। इस जनमत संग्रह में केवल दो सवाल पूछे जा रहे हैं। पहला, कि क्या उनके निर्वाचन क्षेत्र के सांसद और उनकी पार्टी को संसद में अन्ना के जन लोकपाल विधेयक का समर्थन करना चाहिए या नहीं और दूसरा, यह कि अगर उनके क्षेत्र के सांसद ने संसद में अन्ना के जन लोकपाल विधेयक का समर्थन नहीं किया तो क्या आप अगले चुनाव में उस सांसद या उसकी पार्टी को अपना वोट देंगे या नहीं। इस अभियान की शुरुआत के लिए उत्तर प्रदेश के प्रमुख नेताओं के निर्वाचन क्षेत्रों को चुना गया है जिनमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी, भाजपा नेता राजनाथ सिंह, डॉ. मुरली मनोहर जोशी तथा सपा के मुलायम सिंह यादव शामिल हैं। गांधी जयंती पर जिन क्षेत्रों में जनमत संग्रह की शुरुआत की गई उनमें गाजियाबाद, कौशाम्बी, हमीरपुर, मैनपुरी, रायबरेली, अमेठी, वाराणसी, लखनऊ और अम्बेडकर नगर शामिल हैं।
कांग्रेस में अन्ना की चेतावनी का असर कितना पड़ा है यह कहना तो मुश्किल है पर इतना जरूर है कि पार्टी ने अन्ना पर जवाबी हमला करना शुरू कर दिया है। संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने कहा कि आप किसी की गर्दन पर पिस्तौल रखकर कोई चीज नहीं हासिल कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि संसद की स्थायी समिति इस पर विचार कर रही है और इस पर सदस्यों का विचार भी प्राप्त कर रही है। बंसल ने कहा कि विधेयक को आगामी शीतकालीन सत्र में पेश करने के लिए गंभीर प्रयास किए जाएंगे। लेकिन यह इस बात पर निर्भर है कि समिति कितना काम करने में सक्षम है। समिति में सभी पार्टियों से सदस्य हैं और उन्हें विभिन्न लोगों से विचार मिल रहे हैं जो इसके समक्ष आना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि यदि समिति तय समय में अपनी रिपोर्ट देने में सक्षम होगी तो अगले सत्र में विधेयक पेश करने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने अन्ना की घोषणा में जवाब दिया कि यदि आप भ्रष्टाचार से लड़ना चाहते हैं तो आपको राजनीति में उतरना पड़ेगा। लोकतांत्रिक तरीके से ही व्यवस्था को दुरुस्त किया जा सकता है। महासचिव और मीडिया विभाग के अध्यक्ष जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि उन्हें देश के सामूहिक विवेक, जिसका प्रतिनिधित्व संसद करती है पर पूरी आस्था रखनी चाहिए और ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे उनके मुद्दे का कोई राजनीतिक स्वार्थ के लिए दुरुपयोग करे। द्विवेदी ने कहा कि संसद से जो लोकपाल विधेयक सामने आएगा वह असरदार होगा और इसे लेकर उन्हें पहले कोई धारणा नहीं बनाना चाहिए। अन्ना हजारे परिपक्व और अनुभवी व्यक्ति हैं। मैं समझता हूं कि उन्हें लोकतंत्र और उसकी प्रक्रियाओं पर भरोसा है।
अन्ना की चेतावनी और कार्यवाही से उत्तर प्रदेश और हरियाणा में असर होना स्वाभाविक है। इससे कांग्रेस की परेशानी निश्चित रूप से बढ़ेगी तो जरूर। प्रदेशाध्यक्ष डॉ. रीता बहुगुणा ने कहा कि मुझे अन्ना के बयान का तो मालूम नहीं, लेकिन समझ में नहीं आता कि सबका निशाना कांग्रेस की तरफ ही क्यों है? चुनाव तो चुनाव हैं, देखा जाएगा। टीम अन्ना के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल के गृह क्षेत्र हिसार में भी अन्ना की घोषणा का पूरा असर दिखने लगा है। शहर के बंगलों से लेकर गांव-ढाणियों के चौबारों पर अन्ना की घोषणा पर मंथन चल निकला है। इन सबके बीच सवाल बड़ा है कि ईमानदार, अच्छा प्रत्याशी किसे चुनें? ग्रामीणों का कहना है कि यहां तो मामला कठिन है पर देना है, ऐसे में कम बुरा छांटना पड़ेगा। अन्ना 9 या 10 अक्तूबर को हिसार आएंगे। प्रत्याशियों पर नजर डालें तो सभी पर कुछ न कुछ आरोप हैं। हालांकि अन्ना ने कांग्रेस को बायकाट करने को कहा है, लेकिन हिसार के लोगों ने प्रत्याशी जय प्रकाश को भी पलड़े में रख लिया है। वे कहते हैं कि यह प्रत्याशी तीन बार सांसद बन चुका है लेकिन हर बार अलग-अलग दल का सहारा लिया। अन्य आरोप भी लगते रहे हैं। दूसरे प्रत्याशी हजकां-भाजपा के कुलदीप बिश्नोई के बारे में कहते हैं कि इनकी पार्टी के पांच विधायकों (अब कांग्रेस में) ने ही आरोप लगा दिए थे कि यह उनके बेचने का सौदा कर रहे थे। तीसरे प्रत्याशी इनेलो से अजय सिंह चौटाला हैं, इनके बारे में दूसरे दल आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में दोषी करार होने की बात कहते हैं पर अपना मानना है कि मुख्य मुकाबला अजय चौटाला और कुलदीप बिश्नोई में है। जय प्रकाश तीसरे नम्बर पर चल रहे हैं।
भाजपा को अन्ना हजारे का कांग्रेस विरोध तो रास आ रहा है लेकिन गुजरात में अपनी ही सरकार के खिलाफ अन्ना के तेवरों ने उसे बंगले झांकने को भी मजबूर किया है। पार्टी ने हालांकि अन्ना और अपने बीच किसी तरह का तालमेल होने से साफ इंकार किया है। पार्टी प्रवक्ता निर्मला सीतारमण ने कहा कि अन्ना और भाजपा दोनों ही कांग्रेस के खिलाफ इसलिए हैं क्योंकि कांग्रेस पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुकी है। अन्ना के आंदोलन को भाजपा भले ही राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश करें, लेकिन अन्ना लगातार यह कह रहे हैं कि भाजपा और आरएसएस से उनके आंदोलन का कुछ लेना-देना नहीं है। अब उन्होंने गुजरात में आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट की गिरफ्तारी का विरोध कर इसे साफ भी कर दिया है। आने वाले दिनों में अन्ना हजारे और कांग्रेस के बीच वाप्युद्ध और तेज हो सकता है। अन्ना की अपील का पहला टेस्ट हिसार लोकसभा उपचुनाव हो सकता है।
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Tuesday, 13 September 2011

अन्ना के जन लोकपाल का विरोध किसके इशारे पर?

 
Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 13th September 2011
अनिल नरेन्द्र
रामलीला मैदान में सफल आंदोलन करने के बाद भ्रष्टाचार पर लड़ाई की आगे की रणनीति तय करने के लिए अन्ना हजारे के गांव रालेगण सिद्धि में टीम अन्ना की कोर कमेटी की बैठक हुई। दो दिन चलने वाले इस बैठक में अन्ना के अलावा अरविन्द केजरीवाल, प्रशांत भूषण, संतोष हेगड़े, किरण बेदी और मेधा पाटकर समेत कोर ग्रुप के शीर्ष सदस्यों ने भाग लिया। बैठक समाप्त होने के बाद संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए केजरीवाल ने कहा, `आंदोलन की तरफ से अन्ना हजारे प्रधानमंत्री को पत्र लिखेंगे और उनमें सांसदों के प्रदर्शन का वार्षिक लेखाजोखा कराने, खारिज करने का अधिकार, वापस बुलाने का अधिकार और भूमि अधिग्रहण विधेयक पर अपने विचार जाहिर करेंगे।' इसके साथ ही हजारे ने लोगों से उन सभी पार्टियों पर नजर रखने को कहा है जो जन लोकपाल विधेयक का विरोध कर रही हैं। उन्होंने इस विधेयक का विरोध कर रहे सांसदों के घेराव का आह्वान भी किया। अन्ना ने बैठक में जाने से पहले मीडिया से कहा कि हमें इस विधेयक के खिलाफ जाने वाली सभी राजनीतिक पार्टियों और लोगों पर ध्यान देना चाहिए। जन लोकपाल विधेयक का विरोध कर रहे सांसदों और उनकी टीम के सदस्यों को निशाना बनाने वाले लोगों को लेकर दुःख जताते हुए उन्होंने कहा कि इस विधेयक का विरोध कर रहे सभी सांसदों के घरों को हमें घेरना चाहिए। अन्ना ने कहा कि हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि जब तक यह विधेयक संसद में पारित नहीं हो जाता तब तक हम यह आंदोलन खत्म नहीं करने दें। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि केंद्र सरकार विधेयक को पारित करने में विलम्ब करने का प्रयास करेगी तो जन्तर-मन्तर पर एक और आंदोलन छेड़ा जाएगा।
इस दौरान केंद्र सरकार ने अन्ना के खिलाफ कई मोर्चे खोल दिए हैं। एक तरफ सरकार टीम अन्ना के सदस्यों को आयकर विभाग के नोटिस थमा रही है तो दूसरी तरफ रामलीला मैदान में बयानबाजी को आधार बनाकर टीम अन्ना को कई सांसदों द्वारा विशेषाधिकार हनन की नोटिस दी गई है। कल तक अन्ना का समर्थन कर रहे कांग्रेस सांसद प्रवीण सिंह ऐरन ने एक नया शोशा छोड़ दिया है। लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को लिखे अपने पत्र में ऐरन ने कहा कि टीम अन्ना की चुनौती का उचित जवाब जनता में जाकर देंगे। क्योंकि उनके इरादे ठीक नहीं हैं। टीम अन्ना बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं किसी दल के लिए राजनीतिक हित साधने का काम कर रही है जबकि ये लोग जनता के बीच जाने की बात कर रहे हैं।
ऐरन ने पत्र में लिखा है कि टीम अन्ना के सदस्य किरण बेदी, अरविन्द केजरीवाल और प्रशांत भूषण का इरादा और एजेंडा नेक न होकर ओछी राजनीति से प्रेरित है। ये लोग कांग्रेस और सरकार को बदनाम करने में जुटे हैं।
उन्होंने कहा कि जनता की आवाज उठाने के नाम पर ये लोग अपने या किसी और राजनीतिक, औद्योगिक या मल्टी नेशनल कम्पनी के नाजायज हित साधने के अभियान पर हैं। ये लोग समाज और प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता की मनस्थिति का अनुचित और अनैतिक लाभ उठा रहे हैं।
उधर दलित संगठनों ने भी अन्ना के जन लोकपाल बिल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दलित संगठन इसे निरंकुश, संविधान-संसद विरोधी बताकर राज्यस्तरीय अभियान छेड़ने की तैयारी में हैं। इस अभियान के पीछे लेखक मुद्राराक्षस और दलित टुडे के सम्पादक एसके पंजय हैं। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के सिघौली तहसील मुख्यालय पर बामसेफ, डॉ. अम्बेडकर विचार मंच, इंसाफ, दलित एक्शन फोरम, अर्जक संघ, शोषित समाज दल, यादव महासभा, आदि संगठनों ने एक सम्मेलन कर जन लोकपाल के खिलाफ हुंकार भरी। मुद्राराक्षस ने इस सन्दर्भ में बातचीत करते हुए कहा कि जन लोकपाल भारतीय स्वर्ण मध्य वर्ग का एजेंडा है जो अति आधुनिक रूप में भी संघ की सांप्रदायिकता को अपने में समेटे है।
दलित एशिया के सम्पादक एमके पंजय ने बताया कि जन लोकपाल स्वर्ण हिन्दू पुनरुत्थान का नया पैंतरा है। जन लोकपाल भारतीय संविधान, संसद पर सवर्ण प्रभुत्व वाद का हमला है। उन्होंने कहा कि लोकपाल चाहे सरकारी हो या सिविल सोसाइटी का, दोनों ने मंदिरों, ट्रस्टों में व्याप्त भ्रष्टाचार को अपने दायरे में लाने का प्रयास क्यों नहीं किया? कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह तो पहले से ही टीम अन्ना को निशाना बना रहे हैं। केजरीवाल को आयकर विभाग का नोटिस मिलने पर दिग्विजय सिंह ने कहा कि नोटिस तो उन्हें 2005 में ही जारी किया गया था। बकौल दिग्विजय उन पर न सिर्प सरकारी सेवा के नियम तोड़ने का आरोप है बल्कि राजनीति में शामिल होने और एनजीओ के जरिये करोड़ों रुपये कमाने का भी आरोप है। केजरीवाल ने जवाब देते हुए कहा कि अगर दिग्विजय को लगता है कि मैंने करोड़ों का घपला किया है तो उनकी पार्टी की सरकार एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराती। कुल मिलाकर कांग्रेस और सरकार टीम अन्ना के आगे के रास्ते में रोड़े अटकाने से बाज नहीं आ रही। देखना यह है कि टीम अन्ना आगे का रास्ता कैसे तय करती है।
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Sunday, 19 June 2011

क्या इतने अनुकूल माहौल का भाजपा फायदा उठा पाएगी?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th June 2011
अनिल नरेन्द्र

किसी भी विपक्षी दल के लिए न तो यूपीए सरकार से बेहतर और कोई सत्तारूढ़ सरकार हो सकती थी और न ही इतना खराब राजनीतिक माहौल जितना मनमोहन सिंह सरकार ने कर दिया है। कोई भी विपक्षी दल ऐसे राजनीतिक माहौल का इंतजार करता रहता है जब इतनी विवादास्पद केंद्र सरकार हो जितनी यह सरकार है। इस सरकार ने देश को क्या-क्या नहीं दिया? बढ़ती कीमतें, महंगाई, एक के बाद एक घोटाला, आतंकवाद जैसे ज्वलंत मुद्दे पर ढुलमुल नीति, नक्सलियों से रणनीति व इच्छाशक्ति का अभाव, तानाशाह रवैया इत्यादि इत्यादि। कहने का मतलब है कि भारतीय जनता पार्टी जो प्रमुख विपक्षी दल है वह इससे बेहतर राजनीतिक वातावरण की उम्मीद नहीं कर सकती थी। खुद भाजपा नेता अरुण जेटली कहते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को राजनीतिज्ञ नहीं बल्कि नौकरशाह चला रहे हैं। आजादी के बाद की इतनी भ्रष्ट, निकम्मी और कूर सरकार जनता ने पहले कभी नहीं देखी थी। यह सरकार अपने पांच वर्ष पूरे नहीं करेगी क्यों जनता अब कांग्रेस सरकार को फूटी आंख भी देखना नहीं चाहती है। यह कड़ी टिप्पणी राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता अरुण जेटली ने प्रदेश भाजपा द्वारा आयोजित संघर्ष के एक वर्ष कार्यक्रम में हाल में कही। जेटली ने कहा कि भाजपा को आंदोलन करने का शौक नहीं है पर मनमोहन सिंह सरकार रोज एक के बाद एक ऐसी गम्भीर गलतियां कर रही है कि भाजपा को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। देश को ऐसा प्रधानमंत्री चला रहा है जो अदृश्य है। पर्दे के पीछे सत्ता की बागडोर किन्हीं अन्य हाथों में है, इतिहास में ऐसा कहीं देखने को नहीं मिलता, जहां सो रहे हजारों निहत्थे लोगों पर रात के अंधेरे में पुलिस टूट पड़ती हो, सोते हुए महिलाओं और बच्चों पर लाठियां बरसाई जाएं, आंसू गैस के गोले दागे जाएं। बन्द पंडाल में कहीं भी आंसू गैस के गोले नहीं छोड़े जाते हैं। जेटली ने इस सरकार को हैडलैस चिकन कहा। इसका मतलब है कि इस सरकार का कोई सिर-पैर नहीं, कोई वालीवारिस नहीं है।
मनमोहन सिंह सरकार का जो खाका जेटली साहब ने खींचा है वह बहुत हद तक सही है पर सवाल यह उठता है कि जब मनमोहन सिंह सरकार की इतनी बुरी दशा बन गई है तो इसका राजनीतिक लाभ क्या प्रमुख विपक्षी दल के नाते भारतीय जनता पार्टी उठा पा रही है? हमने देखा कि भाजपा विपक्ष में होते हुए भी विपक्ष की भूमिका सही तरीके से नहीं निभा पाई। मैं यूपीए-1 की बात कर रहा हूं। तब भाजपा नहीं वाम दल प्रमुख विपक्ष की भूमिका बेहतर निभा रहे थे। यूपीए-2 में तो कामरेड मौजूद नहीं और सारा विपक्षी दारोमदार भाजपा पर ही आ जाता है पर ईमानदारी से भाजपा नेताओं को प्रश्न करना होगा कि क्यों नहीं वह स्थितियों का फायदा उठा पा रहे हैं? क्या कारण हैं कि इतना अनुकूल माहौल होने के बावजूद आज जनता में वह इतना विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे कि जनता उन्हें केंद्र में सत्ता सौंपने की हिम्मत जुटाए? इसमें कोई शक नहीं कि राज्यों में भाजपा सरकारें अच्छा काम कर रही हैं, उनकी छवि भी अच्छी है और जनता को कहने को वह कह सकते हैं कि हम केंद्र में भी ऐसा शासन दे सकते हैं तावक्ते कि आप हमें मौका दें पर राज्यों में अगर भाजपा सरकारें अच्छा काम कर रही हैं तो उसका मुख्य कारण है मजबूत नेतृत्व। हर राज्य में एक मजबूत मुख्यमंत्री है और उसी मुख्यमंत्री के रहते, उसकी वजह से ही राज्य में अच्छा शासन चल रहा है। गुजरात में नरेन्द्र मोदी, मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान, उत्तराखंड में रमेश चन्द्र पोखरियाल निशंक इत्यादि। इनकी व्यक्तिगत छवि और दृष्टि, कारगुजारी ही अच्छे शासन की प्रमुख वजह है न कि केंद्रीय नेतृत्व। केंद्र में तो भाजपा नेतृत्व न के बराबर है। दुःख से कहना पड़ता है कि यह दूसरी पंक्ति के युवा नेता आपस में ही एक-दूसरे की काट करने से नहीं बाज आते। न तो इनकी नजरों में पार्टी का कोई महत्व है और न ही इन्हें इस बात की परवाह है कि कार्यकर्ता क्या सोचता है, जनता की तो बात छोड़ो। इनके अपने-अपने निजी एजेंडे पार्टी एजेंडे से ऊपर हैं। निजी महत्वाकांक्षाएं संगठित ढंग से काम करने में आड़े आ रही है। यही वजह है कि इतना अच्छा माहौल होने के बावजूद आज जनता में यह वह विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे जो करना चाहिए था। अटल जी आडवाणी जी के नेतृत्व में भाजपा ने सुनहरा युग देखा। उनके रहते पार्टी, पार्टी लगती थी, उनकी अपनी छवि थी, कार्यकर्ताओं से वह जुड़े थे, जनता की नब्ज को समझते थे पर आज का नेतृत्व अपने एयरकंडीशन कमरों में ही अपना गुणगान कर अंक बढ़ाता रहता है।
दुःख की बात है पर सच यही है कि आज भारत की जनता का सभी राजनीतिक दलों से, नेताओं से विश्वास उठ चुका है। उसकी नजरों में सभी एक समान हैं यानि कि हमाम में सब नंगे हैं। वह भाजपा से जानना चाहती है कि जो समस्याएं आज देश के सामने मुंह फाड़ रही हैं उनसे अगर उन्हें मौका मिले तो वह कैसे निपटेंगे? वह जानना चाहती है कि भाजपा नेतृत्व कौन-कौन से ऐसे कदम उठाएगा जिससे घोटाले रुकें, कीमतों पर नियंत्रण हो, महंगाई कम हो, बेरोजगारी घटे, कानून-व्यवस्था सुधरे, बिजली-पानी जैसी ज्वलंत समस्याओं का समाधान हो? क्यों जनता इन पर ज्यादा विश्वास करे? यह है कि कुछ प्रश्न जिनका मेरी राय में भाजपा नेतृत्व को जवाब देना होगा। जनता को बताना होगा कि अगर आप हमें सत्ता में लाएं तो हम आपकी इन समस्याओं का ऐसे समाधान करेंगे पर इसके लिए सबसे पहले भाजपा को अपना घर साधना होगा। उसे सही नेतृत्व तय करना होगा। अपनी प्राथमिकताएं सही करनी होंगी। अब तो भाजपा यह भी नहीं कह सकती कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उनके कामकाज में दखलंदाजी करता है। संघ जब से मोहन भागवत के हाथ आया है, राजनीति से कुछ हद तक अलग हो गया है, अब संघ रोजमर्रा के मामलों में दखल नहीं देता। हो सकता है कि भाजपा के कुछ नेताओं को मेरे विचार अच्छे न लगें पर उन्हें समझना चाहिए कि मैं जो कुछ कह रहा हूं यह एक तरह से जनता की आवाज है और आज बहुत से लोग यह चाहते हैं कि भाजपा पहले अपना घर ठीक करे ताकि जल्द आने वाले मौके का पूरा-पूरा फायदा उठा सके।
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Saturday, 7 May 2011

दिग्गी राजा का ओसामा बिन लादेन प्रेम!

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

प्रकाशित: 07 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
वैसे तो श्री दिग्विजय सिंह एक सुलझे हुए नेता हैं। वह कांग्रेस महासचिव होने से पहले दस साल तक मध्य प्रदेश जैसे राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। उन्हें राजनीति की अच्छी जानकारी है पर पिछले कुछ दिनों से पता नहीं उन पर सैक्यूलरवाद खासकर अल्पसंख्यकवाद का ऐसा रंग चढ़ा है कि न जाने क्या-क्या बोलने लगे हैं। ताजा उदाहरण लखनऊ की एक प्रेस कांफ्रेंस का है जहां आपने दुर्दांत आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को `ओसामा जी' कहकर संबोधित कर दिया। दिग्विजय बोले, `ओसामा जी कई वर्षों से पाक में रह रहे थे। पाक आर्मी ने क्यों कुछ नहीं किया? अमेरिका ने मारने के बाद समुद्र में उन्हें फेंक कर अच्छा नहीं किया, अपने देश में भी मुंबई हमलों में मारे गए लोगों को उनके धर्म के अनुसार दफन किया गया।' दिग्विजय का ओसामा प्रेम अपनी समझ से बाहर है। ओसामा की तारीफ करना, उसकी विचारधारा की तारीफ करना है और इससे किसी भी प्रकार की हमदर्दी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करती है। पूरी दुनिया ओसामा को कोस रही है। तमाम मुस्लिम देश भी उसकी कारगुजारियों की लानत-मनानत कर रहे हैं। लेकिन दिग्गी राजा की चिन्ता कुछ और ही है। वह समझते हैं कि ओसामा को ओसामा जी कहने से भारत के मुसलमान खुश हो जाएंगे और उनकी वाह-वाह करेंगे।
पिछले कुछ महीनों में कभी `हिन्दू आतंकवादी' तो कभी `संघी आतंकवादी' का नाम लेकर हलचल मचाने में दिग्गी राजा ने कोई कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली के बटला हाउस एनकाउंटर को उन्होंने फर्जी एनकाउंटर कहा। यही नहीं, वह आजमगढ़ गए और मरने वाले लड़कों के घरों में जाकर उनसे हमदर्दी जताई। यह सब तब हुआ जब दिल्ली पुलिस का एक जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा इस मुठभेड़ में आतंकवादियों के हाथों मारा गया और दिल्ली की विभिन्न अदालतों ने भी इस एनकाउंटर को सही ठहराया। मुंबई हमलों में मारे गए हेमंत करकरे की हत्या पर भी दिग्गी राजा ने प्रश्न उठाए। पिछले दिनों एक समारोह में दिग्विजय सिंह ने गुजरात का नाम लेते हुए कहा कि आखिर प्रज्ञा ठाकुर और असीमानन्द जैसे लोगों को वहां शरण क्यों मिली है? जो बम बनाते हैं, वह गुजरात में जाकर संरक्षण पा लेते हैं। ऐसे तत्वों को भाजपा सरकारें संरक्षण दे रही हैं। मध्य प्रदेश में भी संघी आतंकियों को शरण दी जाती है। बटला हाउस मुठभेड़ पर फिर से सवाल उठाते हुए उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी से पूछा कि आखिर पकड़ा गया हर आतंकी संघ का क्यों है? लाल कृष्ण आडवाणी को भी घेरते हुए उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक तनाव उनकी रथ यात्रा के बाद से ही पनपा है।
अपने सांप्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि कश्मीर में तिरंगे की दुहाई देने वालों का हमेशा से विभाजन ही मुख्य उद्देश्य रहा है। देश के बंटवारे के लिए मोहम्मद अली जिन्ना नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता वीर सावरकर ही मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। हिन्दू संगठनों को कोसना आजकल दिग्विजय का स्टाइल हो गया है पर आतंकवादियों को महिमामंडित करना अलग बात है। आप ऐसे व्यक्ति, विचारधारा के गुणगान कर रहे हैं जिसने बाकी विश्व के साथ-साथ भारत को भी तबाह करने की धमकी दी थी। आपको देशहित की भी परवाह नहीं, आपको तो केवल परवाह है वोट बैंक की पर इन सबके बावजूद कितना कंसालिडेट हुआ है आपका वोट बैंक यह अलग प्रश्न है।