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Sunday, 10 June 2012

Laden informer sentenced to 33 years of jail

Anil Narendra

Recently, a Pakistani Court convicted Dr Shakeel Afridi of treason and sentenced him to 33 years of jail. He was the person, who had helped US intelligence agency CIA in locating and killing Al Qaeda Chief Osama bin Laden. We were shocked to hear about this decision of the Court and found it very strange. Mutahir Zeb Khan, the Political Representative of the Khyber tribal area, told the Pak newspaper Dawn that Shakeel was produced before a four-member tribal Court, which sentenced him to 33 years of imprisonment and a fine of Rs 32 lakh. Later, Shakeel was sent to Peshawar Central Jail. Instead of Pakistan criminal code, Shakeel was tried under the Pontier Crime Regulation Act of British era. Under the Act, there is no provision of capital punishment for treason. Dr Shakeel had carried out an immunization programme under the directions of the CIA to enable them to collect blood samples of Osama and his family members. It was on the basis of the evidence thus collected that US was able to kill Osama bin Laden in a raid in May, last year. This action by Pakistan has once again proved that Pakistan is not sincere in his fight against terrorism. It also proves that in the heart of the hearts, Pakistan is sympathetic towards terrorists of all hues, whether they are from al Qaeda or from LeT, and maintains contact with them. Pakistan is bent upon to take revenge on all persons, who had been helpful in eliminating the most wanted terrorist of the world. Perhaps, Dr Shakeel would have been honoured in other parts of the world for his daring act, but in Pakistan, he is being considered as a traitor, who has helped a foreign intelligence agency against national interests. If this episode reveals the double game of Pakistan, then it has also created embarrassment for US, who failed to protect its 'source' or the informer. This episode will further add to the deterioration of relations between Pakistan and US. The US Secretary of State, Hillary Clinton had called this decision as unjust and un-called for. Meanwhile, a Panel of the US Senate has also reduced the aid being given to Islamabad. Hillary said that injustice had been done to Afridi. She regretted his conviction. He had provided invaluable help, on the basis of which one of the most notorious killers of the world could be eliminated. It was, in fact, in the interest of Pakistan, in the interest of the US and in the interest of the whole world. Meanwhile, PPP Chief Bilawal Bhutto has said that extending cooperation to any foreign intelligence agency is against the laws of any country. In a case for spying for Israel, US had sentenced life imprisonment. Ours is an independent Judiciary, which was restored by the PPP. A new chapter has been added in the deteriorating relations between Pakistan and US. We think this action by Pakistan will enhance the morale of terrorists.

Friday, 1 June 2012

लादेन की खबर देने वाले डा. अफरीदी को 33 साल कैद

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1 June 2012
अनिल नरेन्द्र
गत दिनों अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को मार गिराने के अभियान में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का साथ देने वाले पाकिस्तानी डा. शकील अफरीदी को एक अदालत ने देशद्रोही करार देते हुए 33 साल की कैद की सजा सुना दी। हमें यह फैसला सुनकर आश्चर्य भी हुआ और अजीबोगरीब भी लगा। खैबर कबाइली क्षेत्र के राजनीतिक पतिनिधि मुताहिर जेबखान ने पाकिस्तानी अखबार `डान' को बताया कि शकील को चार सदस्यीय कबाइली अदालत में पेश किया गया। अदालत ने उन्हें 33 साल की कैद और 3.2 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। सजा सुनाए जाने के बाद शकील को पेशावर स्थित केन्द्राrय कारागार भेज दिया गया। शकील को पाकिस्तान अपराध संहिता की बजाए ब्रिटिश कालीन कानून, पंटियर काइम रेगुलेशन एक्ट के तहत दोषी करार दिया गया। इस एक्ट के तहत राजद्रोह के मामले में मौत की सजा का पावधान नहीं है। डा. शकील ने सीआईए के निर्देश पर एबटाबाद में एक टीका अभियान चलाया था, ताकि इसकी मदद से ओसामा और उसके परिवार के सदस्यों के डीएनए नमूने लिए जा सकें। अभियान से मिले सबूतों के आधार पर ही अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन के खिलाफ बीते मई महीने में कार्रवाई कर उसे मार गिराया था। पाकिस्तान द्वारा उठाए गए इस कदम से यह फिर साबित हो जाता है कि पाकिस्तान आतंकवाद से लड़ने के पति गंभीर नहीं है। यह भी साबित होता है कि अंदरखाते पाकिस्तान हर वर्ग के आतंकवादी चाहे वह अलकायदा से हो या फिर लश्कर से हो, संबंध और सहानुभूति रखता है। पाकिस्तान उस आदमी से बदला ले रहा है जिसने दुनिया के मोस्ट वांटेड टेरोरिस्ट को खत्म करने में मदद की थी। दुनिया के किसी और कोने में शायद डा. अफरीदी का सम्मान किया जाता पर पाकिस्तान में वह एक देशद्रोही है जिसने देश के खिलाफ एक विदेशी खुफिया एजेंसी की मदद की। अगर पाकिस्तान की डबल गेम इस किस्से से एक्सपोज होती है तो अमेरिका पर भी सवाल उठते हैं कि वह अपने `सोर्स' यानि मुखबिर को बचा नहीं पाया। इस किस्से से पाकिस्तान और अमेरिकी रिश्तों में और तनाव बढ़ेगा। अमेरिका की विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने फैसले को अन्यायपूर्ण तथा अवांछित बताया। साथ ही अमेरिकी सीनेट के एक पैनल ने इस्लामाबाद को दी जाने वाली सहायता में कटौती भी कर दी। हिलेरी ने कहा कि अफरीदी के साथ जो किया गया है वह अन्यायपूर्ण है। उन्हें दोषी ठहराए जाने पर अफसोस है। उन्होंने जो मदद की वह दुनिया के सर्वाधिक कुख्यात हत्यारों में से एक का खात्मा करने में कारगर रही। यह स्पष्ट रूप से पाकिस्तान के, हमारे और पूरी दुनिया के हित में था। दूसरी ओर पीपीपी अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ने कहा कि विदेशी खुफिया एजेंसियों के साथ सहयोग करना किसी भी देश के कानून के खिलाफ है। अमेरिका में इजराइल के लिए जासूसी करने पर उम्रकैद की सजा दी गई। हमारी स्वतंत्र न्यायपालिका है जिसे पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने बहाल किया है। पाकिस्तान और अमेरिका के पहले से तनावपूर्ण रिश्तों में यह एक और अध्याय जुड़ गया है। हमारी राय में पाकिस्तान का यह कदम आतंकवादियों के उत्साह को बढ़ाने वाला है।

Tuesday, 1 May 2012

यूं हुआ ओसामा बिन लादेन का अंत

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1 May 2012
अनिल नरेन्द्र
अमेरिका की प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम ने पहली बार ओसामा बिन लादेन संबंधित एक गोपनीय मेमो प्रकाशित किया है जिसमें राष्ट्रपति बराक ओबामा ने लादेन को गिरफ्तार करने का आदेश दिया था। हालांकि इस पूरे ऑपरेशन की सारी कार्रवाई पहले भी आ चुकी है पर टाइम की रिपोर्ट एक तरह से अधिकृत रिपोर्ट मानी जा सकती है। गोपनीय मेमो में ओबामा ने नौसेना के सील कमांडो की एक टीम को लादेन के एबटाबाद के ठिकाने पर पकड़ने के आदेश दिए थे। इस मेमो पर सीआईए के तत्कालीन प्रमुख लियोन पेनेटा ने भी साइन किए हैं। ओसामा के ठिकाने पर न मिलने की स्थिति में वापस आने का आदेश था। ओसामा बिन लादेन की मौत को एक साल हो जाएगा। मेमो में कहा गया हैöसमय, अभियान संचालन, निर्णय और हमले के नियंत्रण से संबंधित सभी चीजों की कमान एडमिरल मैकरबैन के हाथों में होगी। ओबामा पर फैसला लिए जाने से पहले व्हाइट हाउस में महीनों चले गोपनीय एवं मुश्किल चर्चाओं पर टाइम ने विस्तार से लिखा है। यह एक ऐसा फैसला था, जिसके लिए ओबामा राष्ट्रपति पद का दांव लगा रहे थे। दुनिया के मोस्ट वांटेड व्यक्ति को पाकिस्तान में अमेरिकी कमांडो भेजकर पकड़ने का फैसला इतना आसान नहीं था। ओसामा के साथ अंतिम मुठभेड़ पर टाइम पत्रिका ने कहाöअंधेरी रात थी और बिजली भी गुल थी। घुप अंधेरा था। इसने ओसामा का भ्रम बढ़ा दिया। उसने उस गेट को खोला जो उसके कमरे तक पहुंचने के सभी रास्तों को बन्द करता था और जिसे केवल अन्दर से खोला जा सकता था। उसने यह देखने के लिए सिर बाहर निकाला कि वहां क्या हो रहा है? तत्काल वह सील कमांडो की नजरों में आ गया और वे सीढ़ियों पर चढ़ गए। ओसामा ने एक बड़ी गलती और कर दी, वह दरवाजा बन्द करना भूल गया। इससे कमांडो सीधे उसके बेडरूम में जा धमके। कमांडो ने लादेन के सीने और बाईं आंख में दो गोलियां दागकर उसे मौके पर ही खत्म कर दिया। रिपोर्ट में कहा गया, यह एक वीभत्स दृश्य था। उसके भेजे के चिथड़े उड़ गए थे और छत से चिपक गए थे। उसका कुछ हिस्सा आंखों से बाहर निकल आया। बेड के नजदीक की जगह भी ओसामा के खून से सराबोर हो गई। एक दशक से भागते-भागते वह बेहद थका लग रहा था। बचकर निकलने की उसने कोई योजना नहीं बनाई थी। उसके घर से कोई गुप्त मार्ग बाहर नहीं जाता था। लादेन मारे जाने से पहले पाकिस्तान में कई हमलों की योजना बना रहा था। एबटाबाद परिसर से मिले दस्तावेजों में एक बात सामने आई है। मीडिया में छपी रिपोर्टों से पता चलता है कि लादेन ने अल जवाहिरी और शीर्ष आतंकियों के साथ मिलकर पाकिस्तान पर कई हमले की योजना बनाई थी। उधर अमेरिका की एक संघीय अदालत ने लादेन के लगभग एक वर्ष पहले पाकिस्तान में मारे जाने के वीडियो और तस्वीरें जारी करने का अनुरोध ठुकरा दिया है। एबटाबाद में मारे जाने के बाद लादेन के शव को समुद्र में दफना दिया गया था। लेकिन सुरक्षा कारणों से इस अभियान से जुड़ा वीडियो और तस्वीरें सार्वजनिक नहीं की थीं। ओसामा बिन लादेन की बरसी से चन्द दिन पहले पाकिस्तान ने उसकी तीन विधवाओं सहित 14 परिजनों को देश से निकालकर सऊदी अरब रवाना कर दिया है। कड़ी सुरक्षा के बीच लादेन के परिवार को मध्य रात्रि में रावलपिण्डी के मकलाला सैनिक एयरबेस में ले जाया गया, जहां से विशेष विमान से उन्हें सऊदी अरब भेजा गया। लादेन पिछले साल दो मई को मारा गया था।
Abbotabad, Anil Narendra, Daily Pratap, Obama, Osama Bin Ladin, Pakistan, Vir Arjun

Saturday, 7 April 2012

नौटंकीबाज पाकिस्तान

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7 April 2012
अनिल नरेन्द्र
जब मैंने यह खबर पढ़ी कि पाकिस्तान की एक अदालत ने अलकायदा के पूर्व सरगना ओसामा बिन लादेन के परिवार के 14 सदस्यों को 9 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया क्योंकि उन पर आरोप है कि वह गैर कानूनी तरीके से पाक आए और रहे तो मुझे हंसी आ गई। पाकिस्तान को नौटंकी करने की आदत-सी बन गई है। बिन लादेन की तीन बीवियों और दो बेटियों को औपचारिक रूप से 3 मार्च को गिरफ्तार किया गया था। तीन बीवियों में से सबसे छोटी अमाल अबदल फतेह यमन की और बाकी दो सऊदी अरब की निवासी हैं। पिछले साल 2 मई को एबटाबाद में अमेरिकी कमांडोज ने लादेन को मार दिया था, इन्हें वहीं से पकड़ा गया था। अब यह किसी से छिपा नहीं कि ओसामा बिन लादेन वर्षों से पाकिस्तान में रह रहा था और उसका सीधा सम्पर्प पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ बना हुआ था। ब्रिटेन के अखबार द टेलीग्रॉफ ने दोबारा सक्रिय हुई खोजी इंटरनेट वेबसाइट विकीलीक्स द्वारा प्रकाशित किए गए 50 लाख नए दस्तावेज से इसकी पुष्टि की है। इन दस्तावेजों में बताया गया है कि आईएसआई के कम से कम 12 अधिकारियों को लादेन के एबटाबाद स्थित सुरक्षित ठिकाने में छिपे होने की जानकारी थी। खबर तो यह भी आई है कि अपनी मौत से पहले ओसामा एबटाबाद के जिस मकान में रह रहा था, उसे बनवाने के लिए आईएसआई ने खासतौर पर एक आर्पिटेक्ट नियुक्त किया था। अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने खुफिया सूत्र के हवाले से लिखा है कि लादेन के इस ठिकाने पर लश्कर-ए-तोयबा के लोग भी आते-जाते रहते थे। रिपोर्ट में लिखा है कि पाकिस्तान की सैन्य अकादमी के पास बने लादेन के एबटाबाद स्थित ठिकाने के असली दस्तावेज तो गायब हो गए हैं लेकिन इसके आर्पिटेक्ट को आईएसआई ने नियमित तौर पर नियुक्त किया था। आर्पिटेक्ट को यह कहकर नियुक्त किया गया था कि एक उच्चपदस्थ अतिविशिष्ट व्यक्ति इस मकान में रहने आ रहा है। यही नहीं, ओसामा बिन लादेन एबटाबाद में अपने चार बच्चों के साथ रहता था और उसके इनमें से दो बच्चों का जन्म एबटाबाद के सरकारी अस्पताल में हुआ था और फिर भी पाकिस्तान यह दावा करे कि उसे ओसामा के पाकिस्तान में रहने की जानकारी नहीं यह हास्यास्पद नहीं तो और क्या है? यह किसको बेवकूफ बना रहे हैं? आज तक पाकिस्तान ने किसी भी बात को कबूला है? यह तो दाऊद इब्राहिम को भी नहीं जानते। बार-बार यही कहते हैं कि दाऊद पाकिस्तान में नहीं जबकि सारी दुनिया जानती है कि दाऊद कराची के क्लिफटन एरिया में वर्षों से रहता है और वहीं से अपनी गतिविधियां चला रहा है। अब लादेन की बीवी और बच्चों को जेल में यह कहकर डालना कि वह अवैध तरीके से पाकिस्तान में रह रहे थे, यह नौटंकी नहीं तो और क्या है? पर अब पाकिस्तान की नौटंकी एक्सपोज हो चुकी है, सारी दुनिया उसे जान चुकी है इसलिए शायद ही कोई अब यह माने कि पाक सेना, आईएसआई और पाक सरकार को यह मालूम नहीं था कि एबटाबाद में कौन रह रहा है।
Abbotabad, Anil Narendra, Daily Pratap, Osama Bin Ladin, Pakistan, Terrorist, Vir Arjun

Saturday, 7 January 2012

Pakistan on Dangerous Cross Roads

- Anil Narendra
The year 2012 might prove very crucial for Pakistan. Pakistan is struggling on a number of fronts simultaneously. On political front, President Asif Ali Zardari and Tehrik-e-Insaf are at logger heads. Popularity graph of Imran is shooting upwards. The second front is open between Army Chief General Ashfaq Parvez Kayani and Pakistan's intelligence agency, ISI Chief General Shuja Ahmed Pasha. That is why, General Kayani has negated the possibility of military rule in Pakistan, but in view of widening distance and mistrust between these two, it is difficult to say anything. Meanwhile, the Pakistan Parliamentary Committee has started investigating the memogate issue. The Pakistan Parliamentary Committee, entrusted with the investigation of the confidential letter (memogate) sent, has decided to issue summons to the-then Pakistan Ambassador to US, Hussain Haqqani, the US national of Pakistan origin, businessman Mansoor Eijaz and ISI Chief General Shuja Pasha. All these three could be asked to be present in person at the next meeting of the Parliamentary Committee, scheduled to be held on 10th January 2012. In the wake of the killing of Osama bin Laden in Pakistan in a US attack on 2nd May last year, it appears that Pakistan politics has entered a stormy phase. After this action in the internal politics of Pakistan, apprehending a military coup, President Asif Ali Zardari had written a letter to the US Administration seeking help. There is no indication of an early end to this storm in the Pak politics. Meanwhile, the Supreme Court of Pakistan has rejected Government's plea to handover the investigation of memogate episode to a Parliamentary Committee. Instead, the Supreme Court has constituted a three-member Committee to investigate the matter and submit its report within four weeks. All the three members of the Committee are Chief Justices of Islamabad, Baluchistan and Sindh High Courts. The Party in power, PPP is not happy with this decision of the Supreme Court and the Government will be requesting the Court to reconsider its decision, but the most serious matter is the deteriorating relations between Pakistan and US. In its report on Monday, the New York Times said, "America is now realizing the truth that the extensive security partnership with Pakistan has come to an end. Under such circumstances, US officials are, in a very limited sense, trying to save the anti-terror alliance. They are, however, aware that it would make the US capability to attack terrorists very complicated and supply in Afghanistan would be badly affected. A US Think Tank has crossed all the limits. This influential US Think Tank has said that the probable threats, US would be facing in 2012 include war with Pakistan. On the basis of interaction with the US officials and experts, The Council on Foreign Relations Centre for Preventive Action in America has prepared a list of probable threats, which US is likely to face during 2012. With reference to attack or anti-terror operations, Pakistan is quite up in this list. This list of America has been released at a time, when Pak Prime Minister Yousuf Raza Gillani has openly challenged US and NATO. After a meeting with the Army Chief Ashfaq Parvez Kayani, Gillani has warned US and NATO that Pakistan Army is completely prepared to deal with any threat, as such Pakistan will retaliate with its full strength to any attempt to violate its sovereignty. At present, Pakistan has stopped NATO supplies and any future decision in this regard is to be taken by the Cabinet. All told, it can be said that Pakistan is standing at dangerous cross roads. We hope that politicians in Pakistan would succeed in tackling these serious challenges and all these apprehensions would prove wrong.

Wednesday, 4 January 2012

निहायत खतरनाक चौराहे पर खड़ा पाकिस्तान

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th January  2012
अनिल नरेन्द्र
2012 का साल पाकिस्तान के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। पाकिस्तान एक साथ कई मोर्चों पर जद्दोजहद कर रहा है। सियासी मोर्चे पर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी बनाम इमरान की तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी की खुली जंग छिड़ गई है। इमरान की लोकप्रियता का ग्रॉफ लगातार बढ़ रहा है। दूसरा मोर्चा पाक सेना प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी और पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई प्रमुख शुजा अहमद पाशा के बीच खुला हुआ है। हालांकि जनरल कयानी ने कहा है कि पाकिस्तान में सैनिक शासन की सम्भावना नहीं है पर जिस तरीके से दोनों पक्षों के बीच फासला और अविश्वास बढ़ रहा है कुछ भी नहीं कहा जा सकता। उधर पाकिस्तानी संसदीय समिति ने मेमोगेट की जांच जोरों से शुरू कर दी है। अमेरिकी सरकार को भेजे गोपनीय पत्र (मेमोगेट) मामले की जांच कर रही पाकिस्तानी संसदीय समिति ने तत्कालीन राजदूत हुसैन हक्कानी, पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी व्यापारी मंसूर एजाज और आईएसआई प्रमुख जनरल शुजा पाशा को समन भेजने का फैसला किया है। आगामी 10 जनवरी को समिति की अगली बैठक में इन तीनों को व्यक्तिगत तौर पर उपस्थित होना पड़ सकता है। गत दो मई को अमेरिकी कार्रवाई के बाद ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद पाकिस्तान की सियासत में मानों भूचाल-सा आ गया। अंदरूनी सियासत में इस कार्रवाई के बाद पाकिस्तान में सैन्य तख्तापलट की आशंका को लेकर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने ओबामा प्रशासन को मदद के लिए पत्र लिखा था। इस रहस्योद्घाटन के बाद पाकिस्तान की राजनीति में ऐसा भूचाल आया कि थमने का नाम नहीं ले रहा। उधर पाक सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मेमोगेट कांड की जांच के लिए संसदीय समिति से जांच कराने की सरकार की मांग ठुकरा दी है। अदालत ने इस मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया है और चार हफ्तों में अपनी जांच पूरी करने को कहा है। तीनों सदस्य इस्लामाबाद, बलूचिस्तान और सिंध उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश हैं। सत्तारूढ़ पीपीपी इस आदेश से खुश नहीं और सरकार सुप्रीम कोर्ट से अपने आदेश की समीक्षा करने का अनुरोध करेगी पर सबसे गम्भीर मामला है पाकिस्तान और अमेरिका के बिगड़ते रिश्ते। न्यूयार्प टाइम्स ने सोमवार को अपनी रिपोर्ट में कहा हैöअमेरिका अब इस सच्चाई का सामना कर रहा है कि उसकी पाकिस्तान के साथ व्यापक सुरक्षा भागीदारी का समय समाप्त हो चुका है। ऐसे में अमेरिकी अधिकारी एक बेहद सीमित मात्रा में आतंकवाद विरोधी गठबंधन को बचाने के प्रयासों में जुटे हैं। हालांकि उन्हें यह अहसास भी है कि इससे आतंकवादियों के खिलाफ हमले करने की उनकी (अमेरिकी) क्षमता पेचीदा हो जाएगी और अफगानिस्तान में आपूर्ति भी प्रभावित होगी। अमेरिका के एक थिंक टैंक ने तो सारी हदें पार कर दी हैं। अमेरिका में एक असरदार थिंक टैंक ने कहा है कि साल 2012 में अमेरिका जिन सम्भावित खतरों से सबसे ज्यादा जूझ रहा है, उनमें पाकिस्तान के साथ संघर्ष भी शामिल है। अमेरिका में द काउंसिल ऑन फोरेन रिलेशंस सेंटर फॉर प्रिवेंटिव एक्शन ने अमेरिकी अधिकारियों और विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर उन सम्भावित खतरों की सूची तैयार की है, जिनसे नए साल में अमेरिका को जूझना पड़ेगा। किसी हमले या आतंकवाद विरोधी अभियान के चलते पाकिस्तान से लड़ाई इस सूची में काफी ऊपर है। अमेरिका की यह सूची उस समय सार्वजनिक हुई है, जब पाकिस्तान में प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने अमेरिका और नाटो को खुली चेतावनी दी है। सेना प्रमुख अशफाक परवेज कयानी से मुलाकात के बाद गिलानी ने अमेरिका और नाटो देशों को चेताया कि वह भविष्य में अपनी सप्रभुता पर किसी भी हमले का मुंहतोड़ जवाब देंगे, क्योंकि उनकी सेना का कहना है कि वह किसी भी खतरे से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। पाकिस्तान ने मौजूदा हालात में नाटो की सप्लाई रोक दी है और भविष्य में इस पर कोई भी फैसला कैबिनेट ही लेगी। कुल मिलाकर पाकिस्तान एक निहायत खतरनाक चौराहे पर खड़ा हुआ है। हम उम्मीद करते हैं कि पाकिस्तान के सियासतदान इन गम्भीर चुनौतियों से निपटने में कामयाब रहेंगे और सारी आशंकाएं गलत साबित होंगी।
America, Anil Narendra, Asif Ali Zardari, Daily Pratap, General Kayani, Haqqani Network, ISI, Osama Bin Ladin, Pakistan, USA, Vir Arjun

Tuesday, 9 August 2011

तालिबान ने लिया लादेन की हत्या का बदला


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th August 2011
अनिल नरेन्द्र
अफगानिस्तान में तालिबान ने अमेरिका से ओसामा बिन लादेन की हत्या का बदला ले लिया है। गत शुक्रवार को तालिबान ने एक अमेरिकी चिनूक हेलीकाप्टर को मार गिराया। इस कार्रवाई में 31 अमेरिकी सैनिक मारे गए हैं। यह साधारण सैनिक नहीं थे। इस हेलीकाप्टर में 31 अमेरिकी सैनिकों में नेवी सील कमांडों, तीन एयर फोर्स के कंट्रोलर, सात अफगानी सैनिक मौजूद थे, जो 22 नेवी सील कमांडो इस हेलीकाप्टर कैश में मारे गए। यह उस सील टीम सिक्स का दस्ता था जो 160वें स्पेशल ऑपरेशन एविएशन रेजीमेंट का था जिसने पाकिस्तान में एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन को मारने के अभियान में हिस्सा लिया था। ओसामा को मारने के बाद से ही अमेरिकी बलों का यह यूनिट तालिबान के निशाने पर था। वर्ष 2001 में अफगानिस्तान में जंग शुरू होने के बाद विदेशी सैनिकों के लिए यह सबसे बड़ी सिंगल क्षति थी। इस हेलीकाप्टर को अफगानिस्तान के पूर्वी वारदाक प्रांत के आतंकवाद प्रभावित एक जिले में शुक्रवार को तालिबान विरोधी अभियान के दौरान निशाना बनाया गया। घटना के बाद वारदाक प्रांत के गवर्नर के प्रवक्ता शाहीदुल्लाह शाहिद ने कहा कि तालिबान की ओर से दागे रॉकेट ने हेलीकाप्टर को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। यह घटना वारदाक प्रांत के सामद आबाद जिले में हुई। हमले के बाद हेलीकाप्टर के कई टुकड़े हुए और यह पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने सैनिकों की मौत पर खेद जताते हुए कहा कि यह हमारे सुरक्षा बलों के सर्वोच्च बलिदान का एक और उदाहरण है। अफगानी राष्ट्रपति हामिद करजई ने भी ओबामा को फोन कर इस घटना पर अफसोस जताया। इस कार्रवाई के एक प्रत्यक्षदर्शी मोहम्मद साबिर ने बताया कि उसके गांव में देर को हुई कार्रवाई के दौरान एक हेलीकाप्टर अचानक गिर गया। उसने कहा कि करीब रात 10 बजे हमने अपने ऊपर हेलीकाप्टर उड़ते देखे। हम घर में थे। एक हेलीकाप्टर एक तालिबान कमांडर के घर पर उतरा और ताबड़तोड़ गोलीबारी शुरू हो गई। हेलीकाप्टर ने फिर उड़ान भरी लेकिन उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद वह गिर गया। वहीं एक अन्य हेलीकाप्टर भी उड़ रहा था। इस बीच नॉटो के एक प्रवक्ता ने कहा कि दरअसल क्या हुआ, इस संबंध में वह उपयुक्त समय में बयान देंगे। उधर तालिबान प्रवक्ता नबी उल्लाह मुजाहिद ने कहा कि उसका संगठन हेलीकाप्टर को मार गिराने के लिए जिम्मेवार है। उसने कहा कि यह अमेरिकी चिनूक (हेलीकाप्टर) था। उसने अमेरिकी कार्रवाई में आठ आतंकियों के मरने की बात भी कही है। हालांकि पश्चिमी सेना के एक सूत्र ने इस बात की पुष्टि की है कि वह कैसा हेलीकाप्टर था। चिनूक विशेषज्ञ हेलीकाप्टर है जिसका इस्तेमाल अफगानिस्तान में नॉटो गठबंधन सेना के सैनिकों और आपूर्ति के लिए किया जाता है। तालिबान ने ओसामा बिन लादेन की दो मई को पाकिस्तान के एबटाबाद में की गई हत्या का एक तरह से बदला ले लिया है। इसी 160वें स्पेशल ऑपरेशन एविएशन रेजीमेंट के नेवी सील सैनिकों ने लादेन को मार गिराया था। ओसामा को मारने वाले स्क्वाड्रन का नाम गोल्ड स्क्वाड्रन और सील टीम छह भी रखा हुआ था। कहा जा रहा था कि यह चिनूक हेलीकाप्टर किसी विशेष मिशन पर गया था। इसीलिए इसमें अमेरिकी सेना के सबसे प्रतिष्ठित सैनिक यूनिट के नेवी सील्स शामिल थे। तालिबान ने इसे रॉकेटों से उड़ाया। अमेरिका के लिए यह एक बहुत बड़ी क्षति है। सन् 2001 से अब तक यह सिंगल सबसे बड़ी त्रासदी कहा जाए तो शायद गलत न होगा।
Tags: America, Anil Narendra, Daily Pratap, Osama Bin Ladin, Taliban, Vir Arjun

Friday, 15 July 2011

एक बार फिर मुंबई बनी आतंकियों का निशाना

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th July 2011
अनिल नरेन्द्र
पिछले काफी समय से भारत पर कोई आतंकी हमला नहीं हुआ था। हमले तो होते रहे पर कोई सीरियल टाइप के ब्लास्ट नहीं हुए थे। यूं तो तीन दिन पहले असम के कामरूप (ग्रामीण) जिले के रांगिया के पास एक विस्फोट के बाद गुवाहाटी-पुरी एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी पर उसके पीछे स्थानीय विद्रोहियों का हाथ था। इस दुर्घटना में 50 से ज्यादा यात्री घायल हुए थे पर बुधवार को मुंबई में जैसा आतंकी हमला हुआ, ऐसा हमला काफी दिनों के बाद हुआ है। हम भूल गए थे कि ऐसे हमले हो सकते हैं। शायद यही वजह थी कि हमारी खुफिया एजेंसियों को इस सिलसिलेवार धमाकों के बारे में कोई भनक न लग सकी। गृह मंत्रालय ने माना है कि मुंबई में हुए सिलसिलेवार धमाकों के बारे में केंद्र या राज्य सरकार के खुफिया तंत्र को जरा भी भनक नहीं लग सकी। बुधवार शाम मुंबई की भीड़ भरी जगहों पर हुए इन तीन धमाकों ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि पिछले छह महीने के दौरान देश में कोई आतंकी वारदात नहीं होने के बाद सुरक्षा-खुफिया तंत्र काफी हद तक शिथिल हो गया था। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में बुधवार की शाम भीड़भाड़ वाले तीन स्थानों पर 10 मिनट के अन्दर तीन धमाके हुए जिसमें 21 लोग मारे गए और 100 से अधिक घायल हुए। सांताकूज में एक जिन्दा बम भी मिला जो फटा नहीं था। पिछले 18 साल में बुधवार को 14वीं बार मुंबई आतंकी हमले का शिकार हुई। शाम करीब 6ः15 बजे झावेरी बाजार स्थित चांदी के आभूषणों के व्यापारी दीपक सेन ने अपने नौकर से भेल मंगवाई। वह भेल की पुड़िया खोल ही रहा था कि एक जोरदार धमाके ने उनकी दुकान की ट्यूबलाइटें एवं शोकेस के कांच को झनझना कर तोड़ दिया। सेन ने आग का एक बड़ा-सा गोला ऊपर की ओर जाते देखा, सामने की खान-पान की दुकानें आग पकड़ चुकी थीं। सामने सड़क पर खड़े पापड़ बेच रहे खोमचे वाले के परखच्चे उड़ गए थे। तीन दर्जन से ज्यादा लोग बुरी तरह झुलसकर जमीन पर गिर पड़े थे। लोक इधर-उधर भाग रहे थे। लेकिन कुछ ही पलों में लोग फिर सजग हो गए और जमीन पर पड़े घायलों को लेकर उपलब्ध साधनों से ही निकट के जीटी अस्पताल की ओर ले जाने लगे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार झावेरी बाजार में सिर्प कुछ पलों के अन्तर से दो धमाके हुए। बताया जाता है कि ये दोनों धमाके एक मोटरसाइकिल एवं एक स्कूटर में रखे विस्फोट से हुए। लगभग यही दृश्य कुछ मिनटों के अन्दर पहले ऑपेरा हाउस पर फिर दादर रेलवे स्टेशन के पास दोहराया गया। ऑपेरा हाउस हीरों के कारोबार का न सिर्प भारत में बल्कि पूरी दुनिया में प्रमुख केंद्र है। यहां हुआ विस्फोट पंचरत्न बिल्डिंग एवं प्रसाद चैम्बर के बीच टाटा रोड के खाऊ गली में हुआ जबकि दादर का विस्फोट बेस्ट के एक बस स्टॉप की छत पर विस्फोट रखकर किया गया। झावेरी बाजार को पिछले 18 वर्षों में तीसरी बार आतंकी हमले का शिकार होना पड़ा है जबकि दादर और ऑपेरा हाउस में पहली बार विस्फोट किया गया है। बुधवार के विस्फोट में झावेरी बाजार में हुए विस्फोट में सबसे ज्यादा लोग मारे गए एवं घायल हुए हैं। ऐसे मौकों पर जब एक शहर में धमाके हों तो दूसरे बड़े शहरों में दहशत फैल जाती है। मेरे पास कई एसएमएस आए कि दिल्ली के साकेत और डिफेंस कॉलोनी में भी बम मिले हैं। यह सब एक अफवाह थी और दिल्ली में उपर वाले की कृपा से कहीं भी कोई बम नहीं मिला।
अब सवाल आता है कि यह विस्फोट किसने करवाए और क्यों करवाए? जहां तक किसने करवाए इसकी सही जानकारी तो बाद में मिले या शायद कभी भी निश्चित रूप से न मिल सके पर मकसद का थोड़ा अन्दाजा जरूर हो सकता है। जिस तरह से बार-बार झावेरी बाजार को टारगेट बनाया जा रहा है उससे तो लगता है कि बिजनेस को प्रभावित करने का उद्देश्य है। ऑपेरा हाउस भी एक ऐसा ही बिजनेस सेंटर है। दोनों ही जगहों पर भीड़ होती है। विस्फोटों से ज्यादा से ज्यादा लोगों को नुकसान पहुंचाने का इरादा साफ झलकता है। मुंबई में सीरियल ब्लास्ट में जैसी तबाही पहले मचती रही है, वैसी इस बार नहीं हो सकी। इसकी वजह विस्फोटों का उतना शक्तिशाली न होना है। इसमें खराब प्लानिंग भी हो सकती है पर चूंकि इन विस्फोटों में आईईडी तकनीक का इस्तेमाल हुआ इसलिए यह कहा जा सकता है कि इसके पीछे किसी बड़े आतंकी संगठन का हाथ है। यह स्थानीय अंडरवर्ल्ड का खेल नहीं है। हो सकता है कि इसके पीछे आईएसआई, लश्कर-ए-तोयबा व दाऊद इब्राहिम गिरोह का हाथ हो? यह किसी ऐसे संगठन ने भी करवाया हो जो भारत-पाक वार्ता में बाधा डालना चाहता हो। पाक से रिश्ते सुधारने के लिए बातचीत का दौर लम्बे वक्त के बाद शुरू हो चुका है, यह हमला उसे तोड़ने की साजिश भी हो सकती है।
अखबारों में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार इसके पीछे दाऊद इब्राहिम का हाथ हो सकता है। आईएसआई के इशारे पर हुए इस विस्फोट में अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद ने इस काम को अंजाम देने का बीड़ा उठाया। इसमें हिजबुल मुजाहिद्दीन और इंडियन मुजाहिद्दीन ने साथ दिया। सूत्रों के अनुसार बुधवार को मुंबई में हुए आतंकी हमले ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद भारत में कुछ करने के लिए आईएसआई ने दाऊद से कहा। आईएसआई की पहल पर ही दाऊद अपने गुर्गों के साथ चार माह पहले ही लश्कर-ए-तोयबा में सम्मिलित हो गया था। सूत्रों के अनुसार आईएसआई ने दाऊद के कई लोगों को लाहौर के बहावलपुर में हथियार चलाने और कमांडो प्रशिक्षण भी दिलवाया है और प्रशिक्षण अभी भी जारी है। जिस प्रकार मुंबई में विस्फोट हुआ है उसमें कम और मध्यम क्षमता वाले बम का प्रयोग किया गया। इसमें आईईडी का भी इस्तेमाल हुआ है। इस तरह के बम का प्रयोग इंडियन मुजाहिद्दीन करते हैं। हिजबुल की आदत है कि वह बम विस्फोट में किसी हिन्दू धार्मिक स्थल पर मध्यम क्षमता के बम का प्रयोग करता है। मुंबई में झावेरी बाजार में मुंबा बेबी के पास बम फटा है। इसके अलावा हिजबुल प्राय बम विस्फोट में गाड़ी का इस्तेमाल करता है जो मुंबई में हुआ। इंडियन मुजाहिद्दीन एक प्रकार से लश्कर के स्लीपर सेल की तरह काम करता है। आने वाले दिनों में शायद इस पर और जानकारी मिले। भारत की खुफिया और सुरक्षा तंत्र को चुस्त-दुरुस्त करना होगा। ऐसे हमले और भी हो सकते हैं। हमें पूरी तरह से तैयार रहना होगा।
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Wednesday, 22 June 2011

अफगानिस्तान में 10 साल पहले अमेरिका घुसा क्यों था?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
अफगानिस्तान में तेजी से राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं। अमेरिका ने अब वहां से भागने के उपायों पर अमल करना आरम्भ कर दिया है। हाल के दिनों में दो ऐसी खबरें आई हैं जिनसे यह साफ होता है कि वहां कुछ खेल चल रहा है। पहली खबर जो आई वह यह थी कि भारत सहित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी 15 सदस्य देशों ने प्रतिबंधों के लिहाज से एक ऐसी सूची को मंजूरी दी है जिसमें तालिबान और अलकायदा को अलग-अलग नजरिये से देखा जाएगा। इसका मकसद तालिबान और अफगानिस्तान में सुलह के प्रयासों में शामिल करने से जुड़ा है। इस संबंध में सुरक्षा परिषद ने गत शुक्रवार रात पूर्ण बहुमत से दो प्रस्ताव पारित किए। इनमें प्रतिबंधों को लेकर तालिबान के लिए अलकायदा से एक अलग सूची की बात की गई है। इस कदम के बाद अब अलकायदा और तालिबान आतंकवादियों को अलग-अलग पैमानों पर तोला जाएगा। दूसरी घटना है अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई का यह कहना कि अमेरिका तालिबान से बातचीत कर रहा है। इस सम्पर्प के बारे में यह सम्भवत पहली आधिकारिक पुष्टि है। करजई ने काबुल में एक सम्मेलन में कहा कि तालिबान के साथ बातचीत शुरू हो गई है। बातचीत अच्छी चल रही है। विदेशी सेनाएं विशेषकर अमेरिका खुद ही बातचीत कर रहा है। अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान में चल रहा युद्ध 10वें साल में प्रवेश कर गया है और वहां पर इस संघर्ष के राजनीतिक समाधान की आवाज तेज होती जा रही है।
अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने जो खुलासा किया है वह अफगानिस्तान के लिए जितना खतरनाक है, उतना ही अमेरिका की स्वार्थपरता और दोहरेपन का एक और सबूत भी है। अफगानिस्तान के खिलाफ अमेरिका ने आखिर युद्ध क्यों छेड़ा था? जहां तक हम समझ सके हैं कि 9/11 हमलों के लिए अमेरिका अलकायदा और तालिबान को जिम्मेदार मानते हुए उन्हें सबक सिखाने के लिए यह युद्ध छेड़ा गया था। पिछले 10 सालों में पहले तो अमेरिका ने इसी तालिबान हुकूमत को सत्ता से हटाया और अब वही तालिबान अच्छा हो गया है और उसे दोबारा सत्ता सम्भालने की तैयारी हो रही है। हम राष्ट्रपति बराक ओबामा और अमेरिका की मजबूरी समझ सकते हैं। उन्होंने घोषणा कर रखी है कि 2014 तक अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की पूरी वापसी होनी है इसलिए वह आनन-फानन में समस्या का हल निकालना चाहते हैं। इसी के तहत तालिबान से बातचीत शुरू की है, जो हालांकि अभी शुरुआती दौर में है। अमेरिका के जेबी संगठन संयुक्त राष्ट्र ने तालिबान और अलकायदा पर इसीलिए पुरानी व्यवस्था तोड़ते हुए जो संदेश दिया है उसका लब्बोलुआब यही है कि अगर अलकायदा का साथ छोड़कर तालिबान अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में सहयोगी बनता है तो उसे `माफी' दे दी जाएगी।
हमें थोड़ा आश्चर्य इस बात पर भी है कि आखिर भारत ने क्या सोचकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी? क्या भारत की नजरों में भी तालिबान एक अच्छा संगठन बन गया है जिससे भारत को अब कोई खतरा नहीं है? सवाल यह नहीं कि तालिबान कैसा है, सवाल यह है कि एक आतंकी संगठन जिसने अपना एजेंडा सार्वजनिक किया हो उससे आप समझौते की बात कर रहे हो, वह भी बकवास शर्तों पर? मामला तो यह है कि एक आतंकी संगठन से बातचीत कर अमेरिका ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसके तमाम फैसलों के पीछे सिर्प उसका अपना स्वार्थ होता है, उसे इस बात की कतई परवाह नहीं कि इस फैसले का भारत-पाकिस्तान-ईरान मुल्कों पर क्या असर पड़ेगा? न ही उसे अब वैश्विक आतंकवाद से कोई लेना-देना है। विद्रुप तो यह है कि इस बातचीत में अफगान सरकार को भी शामिल नहीं किया गया। खुद अफगान मानते हैं कि यह अत्यंत घातक कदम होगा और मुल्क फिर 2001 से पहले की स्थिति में पहुंच जाएगा। अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा नुकसान भारत को भी होगा। भारत द्वारा अफगानिस्तान में चल रही विभिन्न पुनर्निर्माण योजनाओं को भारी झटका लगेगा। इससे करजई सरकार की छवि, कार्यक्षमता और भविष्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा पर अमेरिका को इन सबसे क्या लेना-देना है। इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी कि एक दशक पहले जिस अमेरिका ने `वॉर ऑन टेरर' का नारा देकर अफगानिस्तान में इसलिए प्रवेश किया था कि अलकायदा और तालिबान को समाप्त कर सके, आज वह उसे उन्हीं आतंकियों के हवाले करने के बारे में सोच रहा है ताकि उसे अफगानिस्तान से भागने का रास्ता मिल जाए?
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Sunday, 19 June 2011

अल जवाहिरी के आने से अमेरिका की मुश्किलें बढ़ेंगी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th June 2011
अनिल नरेन्द्र
ओसामा बिन लादेन के मरने का अमेरिका की `वॉर ऑन टेरर' पर पता नहीं क्या असर पड़ेगा? उसकी अफगानिस्तान में, पाकिस्तान में और दुनिया के अन्य भागों में समस्या कम होगी या उसमें एक बार फिर वृद्धि होगी? यह हैं कुछ प्रश्न जो अमेरिकन अधिकारियों को जरूर सता रहे होंगे। अलकायदा संगठित होता जा रहा है। नए अलकायदा प्रमुख की घोषणा हो चुकी है। पेशे से आंखों के डाक्टर, मिस्र के `इस्लामिक जेहाद' नाम के कट्टरपंथी संगठन के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अयमान अल जवाहिरी को अब अलकायदा का प्रमुख बना दिया गया है। ओसामा बिन लादेन का दाहिना हाथ माने जाने वाले जवाहिरी कुछ मायनों में लादेन से ज्यादा खतरनाक साबित हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि 9/11 हमलों में अल जवाहिरी का ही दिमाग था। वर्ष 2001 में जिन 22 संदिग्ध आतंकवादियों की सूची जारी की गई थी उसमें ओसामा बिन लादेन के बाद जवाहिरी का दूसरा नम्बर था। अमेरिका ने जवाहिरी पर 25 मिलियन डालर का ईनाम रखा है। बताया जाता है कि जवाहिरी आखिरी बार अक्तूबर 2001 में अफगानिस्तान के खोस्त शहर में देखा गया था। अफगानिस्तान में तालिबान के खात्मे के बाद से वह भूमिगत हो गया था। हाल के वर्षों में अल जवाहिरी अलकायदा के सबसे मुखर प्रवक्ता के रूप में उभरकर सामने आया है। जवाहिरी पढ़ा-लिखा है और उसने 1974 में काहिरा के मेडिकल कॉलेज से स्नातक की उपाधि और चार साल बाद यहीं से सर्जरी में मास्टर्स की डिग्री हासिल की थी। उसे अरब जगत के सबसे पुराने कट्टरपंथी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ जुड़ने के कारण महज 15 साल की उम्र में पहली बार गिरफ्तार किया गया था।
जवाहिरी की ताजपोशी से परेशान अमेरिका ने उसका भी वही हश्र करने की धमकी दी है जो लादेन के साथ किया। अमेरिका के ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ माइक मुलेन ने कहा कि जैसा कि हमने लादेन को पकड़ने और मारने, दोनों की कोशिश और मारने में सफल भी रहे, हम जवाहिरी के साथ भी निश्चित रूप से ऐसा ही करेंगे। अमेरिका की मुश्किल इसलिए भी बढ़ सकती है, क्योंकि पाकिस्तान में हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे हैं। ओसामा बिन लादेन के ऑपरेशन से पाकिस्तान में हलचल बढ़ती जा रही है। पाक सेना प्रमुख अशफाक कयानी और आईएसआई प्रमुख पाशा पर दबाव बढ़ता जा रहा है। कयानी को अमेरिका के प्रति नरम होने के आरोप में हटाने की मुहिम चल रही है। आईएसआई ने लादेन के ठिकाने के बारे में अमेरिकी अधिकारियों को ठोस जानकारी देने के आरोप में पांच जासूसों को गिरफ्तार कर लिया है। इनमें एक पाकिस्तानी सेना का मेजर भी शामिल है। उधर एक अमेरिकी सीनेटर ने एक बैठक में सीआईए के डिप्टी डायरेक्टर माइकल मोरेल से पूछा कि पाकिस्तान अमेरिका को आतंकवाद से लड़ने के मुद्दे पर कितना समर्थन दे रहा है? तो जवाब में मोरेल ने कहा कि 10 में से 3 अंक। मतलब अमेरिका पाक की गतिविधियों से बिल्कुल नाखुश है। दि न्यूयार्प टाइम्स के अनुसार अमेरिका में इस बात की सख्त नाराजगी है कि पाक सरकार ने उन लोगों पर तो कोई कार्रवाई की नहीं जिन्होंने ओसामा बिन लादेन को छिपाने में मदद की थी, लेकिन जिन लोगों ने लादेन को मारने में मदद की थी, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। आने वाला समय अमेरिका के लिए इस मामले में चुनौतीपूर्ण होगा।
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Wednesday, 1 June 2011

Pakistan’s Existence in Danger

Anil Narendra
Pakistan’s very existence has now become a big question mark. Taliban has said that Pakistan’s nuclear arsenal is no longer their target. Taliban’s target, now is not only to capture the nuclear bombs but also Pakistan. As we all are aware after the death of Osama Bin Laden, Taliban has un-leashed the campaign of terrorists in Pakistan. Taliban’s spokesman Ahsaan Ullah had the guts to say that our objective is now to capture power in Pakistan. A reporter of the Wall Street Journal spoke to Ahsaan over phone wherein Ahsaan told him that Pakistan is the only Muslim Country which has the atomic bomb and hence we want to capture it.
 Taliban’s threat cannot be taken lightly. Few days back when the Naval Base Mehran was attacked by a handful of Al-Qaeda militants, they were successful in their objective to a very large extent. This was also because a section of the Pakistani military sympathizers of Al-Qaeda provided these militants with vital information of the airbase. The place where the Al-Qaeda militants struck was hardly 24 km away from the Nuclear Arsenal Depot. P.N.S. Mehran is one of the most important and well guarded naval airbases of Pakistan. Without the active support of a section of the Pakistani Army and Defense Establishment, success in this attack could not be guaranteed. The way these militants fought for hours with the Pakistani commandos goes to prove that not only were they fully equipped for the job but were well armed with prior strategic information about the base. 
There is virtually a civil war kind of situation going on in Pakistan today and in these circumstances we can not afford to talk the Taliban’s threat lightly. I can not imagine the catastrophic situation wherein Taliban succeeds in their attempt. Behind the facade of political leadership the real force is the Pakistan’s army and the way Al-Qaeda and Taliban element are succeeding in their strike day after day proves that even the Pakistan Army is unable to contain these terrorists elements. The writ of the Government of Asif Ali Zardari and Yusuf Raza Gilani hardly extends beyond the metros of Pakistan. The situation is so grave that even Indian Prime Minister Man Mohan Singh who is well known for his peaceful co-existence thesis is now asking for caution vis-à-vis Pakistan. India cannot prevent the Talibani’s from taking over Pakistan but the United States is definitely in a position to do so. The US can ensure that Al-Qaeda and Taliban do not succeed in their extremely dangerous plan. The least the Americans can do for the time being is to take control of this nuclear arsenal of Pakistan. This will at least prevent a very grave danger, the rest can be looked into later on.
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पाकिस्तान का तो अस्तित्व ही खतरे में आ गया है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on  1st June 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान का तो वजूद ही खतरे में आ गया है। तालिबान ने कह दिया है कि पाकिस्तान के परमाणु आयुधों पर हमले की उसकी कोई योजना नहीं है। उसका तो लक्ष्य पाकिस्तान के परमाणु हथियार सहित पाकिस्तान पर कब्जा करना है। तालिबान ने ओसामा बिन लादेन के मारे जाने का बदला लेने के लिए पाक में हिंसक अभियान छेड़ रखा है। तालिबान पवक्ता एहसानुल्ला एहसान ने कहा कि तालिबान का अब लक्ष्य पाकिस्तान और उसके परमाणु हथियारों पर कब्जा करने का है। पाकिस्तान के कराची स्थित नौसेना के पमुख अड्डे पर तालिबान ने पूरे समन्वय के साथ हमला किया था। द वाल स्ट्रीट जनरल की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने इस मुद्दे पर तालिबान पवक्ता से टेलीफोन पर बात की। फोन पर एहसान ने कहा कि पाकिस्तान परमाणु क्षमता वाला अकेला मुस्लिम देश है और तालिबान का इरादा हथियारों को नष्ट करने का नहीं बल्कि पूरे देश और परमाणु हथियारों पर कब्जा करने का है।
तालिबान की धमकी को हल्के से नहीं लिया जा सकता। पिछले दिनों जब कराची के नौ सैनिक अड्डे मेहरान पर मुट्ठी भर आतंकियों को सफलता इसलिए भी मिली क्योंकि पाकिस्तानी सेना में तालिबान समर्थक अधिकारी बैठे हुए हैं। पाकिस्तानी नौसेना के साथ, असैनिक विश्लेषक आइशा सिद्दीकी ने डान अखबार के साथ एक बातचीत में कहा नौसेना संवदेनशील है क्योंकि नौ सेना और वायुसेना दोनों में उग्रवादियों की घुसपैठ है। वह कहती हैं ः नौसेना में आतंकवादियों की घुसपैठ एक पुरानी दास्तान है। आइशा की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब रक्षा विशेषज्ञों का आंकलन है कि पाकिस्तानी नौसेना, वायु सेना और थल सेना तीनों में तालिबान की घुसपैठ हो चुकी है। मेहरान हवाई बेस पर इनकी मदद से ही तालिबान ने सफल हमला किया। जिस जगह हमला हुआ था उससे मुश्किल से 24 किलोमीटर दूर परमाणु हथियारों का डिपो था। पीएनएस मेहरान पाक के सबसे अहम नेवल एयरबेसों में से एक है। बिना भीतरी शख्स की मदद के आतंकवादियों को नेवल बेस में एयरकाफ्ट की मौजूदगी का पता नहीं लग सकता था। जिस तरह से वे घंटों डटे रहे। उससे मालूम होता है कि वे पुख्ता जानकारी के साथ आए थे।
आज जब पाकिस्तान में गृह युद्ध जैसे हालात बन गए हैं, तालिबान की धमकी एक डरावनी हकीकत में न बदल जाए? पर्दे के पीछे से पाक में असल सत्ता चला रही पाक सेना आतंकियों के मुकाबले पस्त दिख रही है। आम पाकिस्तानी न तो अब पाक फौज पर विश्वास करता है और न ही पाक राजनीतिज्ञों पर। आसिफ अली जरदारी और यूसुफ रजा गिलानी की सरकार बस इस्लामाबाद सहित मुट्ठीभर बड़े शहरों तक ही सीमित रह गई है। हालात कितने भयावह हो चुके हैं इसका अंदाजा पधानमंत्री मनमोहन सिंह की चेतावनी से लगाया जा सकता है। हमेशा बातचीत से समस्याओं को सुलझाने की पहल करने वाले मनमोहन सिंह को भी पड़ोसी देश को संभलकर चलने की चेतावनी देनी पड़ी है। पाकिस्तान को तालिबानी हाथों में जाने से फिलहाल केवल अमेरिका ही रोक सकता है। अमेरिका की दोनों पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मौजूदगी है। इससे पहले कि तालिबान के हाथ पाक एटमी हथियार लगे, अमेरिका को अविलम्ब इन पाक परमाणु हथियारों को अपने कब्जे में ले लेना चाहिए। ऐसा करने के बाद कम से कम एक बहुत भारी खतरा तो टलेगा, बाकी देखा जाएगा।
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Wednesday, 25 May 2011

ओबामा की धमकी का पाकिस्तान ने उसी अंदाज में दिया जवाब

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25th May 2011
अनिल नरेन्द्र
अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद अमेरिका और पाकिस्तान का वाप्युद्ध थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। दोनों ही एक-दूसरे को धमकियां दे रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा है कि पाकिस्तान में आतंकवाद का खात्मा करने के लिए अमेरिका ऑपरेशन ओसामा अभियान दोहराने में नहीं चूकेगा। एक इंटरव्यू के दौरान ओबामा ने कहा कि अपनी सुरक्षा के लिए वे पाक में दोबारा सेना भेजने से नहीं चूकेंगे। बीबीसी को दिए इंटरव्यू में ओबामा ने कहा कि वे पाकिस्तान की सप्रभुत्ता का सम्मान करते हैं लेकिन अमेरिका की सुरक्षा उनकी पहली प्राथमिकता है। वे किसी को यह इजाजत नहीं दे सकते कि उनके खिलाफ साजिश और रची जाए और इस पर अमेरिका कार्रवाई न करे। उन्होंने कहा कि अगर तालिबान का सरगना पाकिस्तान में पाया जाता है तो अमेरिकी सेना को दोबारा पाक भेजने में उन्हें कोई संकोच नहीं होगा। उन्होंने पाकिस्तान को नसीहत देते हुए कहा कि भारत के प्रति पाकिस्तान का दुराग्रह उसकी बड़ी भूल है, इसी वजह से भारत उसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा प्रतीत होता है। उन्होंने कहा कि अगर वह इस मनोवृत्ति से परे हटकर काम करे तो बहुत अच्छा होगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तान इस बात को महसूस करे कि उसके लिए सबसे बड़ा खतरा बाहर से नहीं बल्कि घर के भीतर से ही है।
दूसरी ओर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख अहमद शुजा पाशा ने अमेरिका को चेतावनी भरे स्वर में कहा कि अगर अमेरिका ने कबायली इलाकों में ड्रोन हमले नहीं रोके तो पाक इसका जवाब देगा। पाशा ने सीआईए के डिप्टी डायरेक्टर माइकल मोरेल के साथ शनिवार को हुई बैठक में यह विचार जताए। अखबार `द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' की रिपोर्ट के मुताबिक पाशा ने मोरेल से कहा, `अगर आप ड्रोन हमले नहीं रोकेंगे तो हम जवाब देने के लिए मजबूर होंगे।' पाशा ने हाल ही में पाकिस्तानी वायु सीमा में नॉटो हेलीकॉप्टरों की घुसपैठ की घटना का जिक्र करते हुए इस घटना को अमेरिका और पाकिस्तान के सैन्य सहयोग को एक झटका बताया। पाकिस्तान की यात्रा पर आए मोरेल सीआईए के ऑपरेशनल अफसरों और आईएसआई अफसरों पर आए हुए हैं।
दरअसल हमें लगता है कि अमेरिका अब पाकिस्तान की दोहरी नीति को समझ गया है। एक तरफ तो वह वार ऑन टेरर में अमेरिका का सबसे विश्वासपात्र सहयोगी बताता है और दूसरी ओर आतंकियों को पूरी सुरक्षा, ट्रेनिंग, पैसा देता है। वहीं अमेरिका को आंखें दिखाने के लिए चीन को आगे कर देता है। पाक प्रधानमंत्री गिलानी द्वारा अपनी हाल ही की चीन यात्रा के दौरान उनके द्वारा साम्यवादी देश के प्रति दिखाए गए सौहार्द ने कुछ अमेरिकी सांसदों की भृकुटियां चढ़ा दी हैं और वे पूछ रहे हैं कि चीन को अपना सबसे अच्छा मित्र बताने वाला पाकिस्तान अमेरिका से अधिक से अधिक सहायता क्यों मांग रहा है? सीनेट की विदेशी मामलों की समिति में सीनेटर जिम रिश ने कहा, `हमारे द्वारा खर्च किए गए एक डालर में से 40 सेंट उधार से आते हैं। अमेरिकी लोगों को यह समझाना कठिन है कि हम 40 सेंट उधार लेकर उसे पाकिस्तान में खर्च कर देते हैं और उसके बाद भी पाक सरकार चीन को अपना सबसे विश्वासपात्र दोस्त बताता है?'
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Tuesday, 24 May 2011

अलकायदा का मिस्री कनेक्शन : सैफ अल अदेल

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

 Published on 24th May 2011
अनिल नरेन्द्र
अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन के मरने के बाद इस आतंकी संगठन ने अपना नया नेता चुन लिया है। अलकायदा का मिस्री कनेक्शन सामने आ गया है। बिन लादेन का उत्तराधिकारी है मिस्र का एक पूर्व सैन्य अधिकारी, उसका नम है सैफ अल अदेल। सैफ अल अदेल को लादेन के मारे जाने के करीब एक पखवाड़े बाद अस्थायी नेता चुना गया है। अल अदेल के बारे में कहा जाता है कि वह 1981 में मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति अनवर सदात की हत्या के लिए जिम्मेदार संगठन इस्लामिक जिहाद का सदस्य रह चुका है। वह अफगानिस्तान में 1980 के दशक में सोवियत संघ की सेना के खिलाफ संघर्ष में भी शामिल रहा था। 2001 में तालिबान के पतन के बाद वह ईरान भाग गया था। सीएनएन ने दो दशक से अधिक समय से अलकायदा से वाकिफ नोमान बेनोटमैन के हवाले से बताया कि सैफ अल अदेल अलकायदा का अंतरिम नेता है। खबर के अनुसार अल अदेल की संगठन में लम्बे समय से महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
उधर ओसामा को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने के लिए अमेरिका द्वारा घोषित 25 लाख डालर (करीब 111 करोड़ रुपये) का ईनाम किसी को नहीं दिया जा रहा। अमेरिकी अधिकारियों ने यह रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि ओसामा के खात्मे की वजह कोई मुखबिर नहीं बल्कि अत्याधुनिक मशीनें और खुफिया एजेंसियां थीं। इस फैसले से उन अटकलों पर भी विराम लगा दिया है जिनमें कहा जा रहा था कि आतंकी संगठन से जुड़ी किसी शख्स ने अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को ओसामा तक पहुंचाया। ओसामा बिन लादेन अमेरिका की मोस्ट वांटेड आतंकियों की सूची में शीर्ष पर था।
वेबसाइट बीबीसी डॉट को डॉट यूके ने ओसामा द्वारा उनकी मौत से कुछ अरसा पहले कथित तौर पर रिकार्ड किया गया एक ऑडियो टेप जारी किया है। लादेन का यह ऑडियो टेप 12 मिनट का है जिसे एक इस्लामिक वेबसाइट पर जारी किया गया है। टेप में लादेन ने ट्यूनीशिया और मिस्र के विरोधी प्रदर्शनों का तो उल्लेख किया है लेकिन सीरिया, लीबिया और यमन का कोई जिक्र नहीं है। लादेन ने कहा, मुझे लगता है कि अल्लाह की मर्जी से बदलाव की बयार पूरे मुस्लिम जगत में बहेगी। आपके सामने दोराहा है और मुस्लिम समुदाय के साथ उठ खड़े होने तथा खुद को शासकों की इच्छाओं, इंसानी कानूनों और पश्चिमी प्रभुत्व से मुक्त कराने का एक महान तथा दुर्लभ ऐतिहासिक अवसर है। लादेन ने कहा है, तो आप किसका इंतजार कर रहे हैं?
लादेन की मौत के बाद अलकायदा के अंतरिम प्रमुख सैफ अल अदेल ने धमकी देने में ज्यादा वक्त नहीं लगाया। ब्रिटिश अखबार डेलीमेल की एक रिपोर्ट के अनुसार सैफ ने लादेन की मौत का बदला लेने की धमकी दी है। अखबार ने तालिबान प्रवक्ता एहसानुल्ला एहसान के हवाले से कहा है कि हमारे नेता लंदन में बड़े हमले की तैयारी कर रहे हैं। एहसान के अनुसार अल अदेल का मानना है कि ब्रिटेन यूरोप की रीढ़ है और इसे तोड़ने की जरूरत है। ऐसे में लंदन पर बड़ा हमला कर यूरोप सहित पूरी दुनिया को हिलाया जा सकता है। इस बीच यह भी खबर है कि तालिबान और अलकायदा नेता पाक सीमा से सटे अफगानिस्तान के इलाके में मिले हैं और आगे की रणनीति पर विचार-विमर्श हुआ है। अल अदेल को अम्मान अल जवाहरी और इलियास कश्मीरी को दरकिनार कर नई जिम्मेदारी सौंपी गई है।
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Saturday, 21 May 2011

ISI Chief Lt Gen Shuja Pasha’s threat to India

- Anil Narendra
After Osama bin Laden episode and Pak exposure before the world, Pakistan has been greatly agitated and every other day, it is issuing confused statements. The other day, it was Prime Minister, Yousuf Raza Gilani who threatened America in the National Assembly to stop drone attacks, otherwise NATO convoys will not be allowed to pass through his country. And now, the Chief of the notorious Pak agency, ISI, Ahmed Shuja Pasha while briefing the members of Pak Senate and National Assembly on Pak military preparedness has threatened India. He has said that if India dares to carry out any Abbotabad type attack on US lines, Pakistan will also raid Indian targets. Pasha said that all preparations in this regard have been completed. He even claimed that ISI has identified Indian targets for such raids. It has, even rehearse as to how it can destroy selected targets in India.
It cannot be denied that in the wake of Osama episode, Pak military establishment can go to any extent to divert its people’s attention and as such India will have to be on alert and state of readiness and also it should not take Pasha’s statement seriously. ISI is directly controlled by the Pak Army. After the elimination of Osama bin Laden, who had been living in Abbotabad in the vicinity of Pak Military Academy and the Headquarters of three regiments of the Pak Army, by the Navy SEALS in a secret mission, Pakistan has been the target of world’s scorn. This has raised a number of questions about its entire military and intelligence establishment. US action on the internal front of Pakistan is seen as a violation of its sovereignty. The national leadership, whether it is the President Asif Ali Zardari or even the Prime Minister, is unable to provide satisfactory answers to the people of the country. To counter this, first, efforts were made to take ISI under the control of the Internal Affairs Ministry of the civilian government, but Pak Army opposed the move, then Pasha was tried to be sidelined. Pasha had already got an inkling of this move, as such during in camera hearing before the National Assembly on May 13, he tried to assure the politicians that in case of US type action by India in the future, there will be immediate retaliatory attacks and for such attacks, Indian targets have already been identified. In fact, the Indian Chief of Staff, General VK Singh had recently said that India, too is capable of taking US type of action to destroy terrorists’ sanctuaries on the other side of the border. His statement has led to confusion in whole of the Pakistan. Not only ISI Chief, the Pakistan as a whole is confused and in this confusion it is likely to take any uncalled for action. As such, we will also have to maintain full preparedness.

Thursday, 19 May 2011

आईएसआई प्रमुख ले. जनरल पॉशा की भारत को धमकी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19 May 2011
अनिल नरेन्द्र
ओसामा बिन लादेन प्रकरण और सारी दुनिया में बेनकाब हेने के बाद पाकिस्तान बौखला गया है। बौखलाहट में वह आए दिन कोई न कोई उल्टा-सीधा बयान दे रहा है। कभी पाकिस्तानी संसद में प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी अमेरिका को धमकी देते हैं कि जब तक अमेरिका ने ड्रोन हमले बन्द नहीं किए तब तक नॉटो के काफिलों को अपने देश से गुजरने नहीं दिया जाएगा। अब पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी कुख्यात आईएसआई के प्रमुख अहमद शुजा पॉशा ने पाक की सीनेट और नेशनल असेम्बली के सदस्यों को सैन्य तैयारियों की जानकारी देते हुए भारत को धमकी दे डाली। भारत ने अमेरिकी तर्ज पर एबटाबाद जैसे किसी हमलों को अंजाम दिया तो पाकिस्तान भी उसके ठिकानों पर धावा बोल देगा। इसके लिए पाकिस्तान ने बाकायदा तैयारी कर ली है, पॉशा ने कहा। पॉशा ने यह भी कहा कि आईएसआई ने हमले के लिए भारतीय लक्ष्यों की पहचान भी कर ली है। इतना ही नहीं, भारत स्थित ठिकानों को कैसे तबाह करना है, इसका भी रिहर्सल किया जा चुका है।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ओसामा प्रकरण के बाद बौखलाया पाक सैनिक तंत्र अपनी जनता का ध्यान बंटाने के लिए कुछ भी कर सकता है और भारत को हमेशा तैयार रहना होगा पर पॉशा के बयान को ज्यादा गम्भीरता से भी नहीं लिया जाना चाहिए। खुफिया एजेंसी आईएसआई की कमान सीधी पाक फौज के हाथ में होती है। एबटाबाद में मिलिट्री अकादमी व फौज के तीन रेजीमेंटों के मुख्यालय के पास रह रहे दुनिया के सबसे कुख्यात आतंकी बिन लादेन के खिलाफ 2 मई को गुपचुप कार्रवाई कर अमेरिकी नेवी सील कमांडो ने जब उसका सफाया कर दिया है तब से समूची दुनिया में पाकिस्तान की थू-थू हो रही है। इससे उसका समूचा फौजी और खुफिया तंत्र सवालों के घेरे में आ गया है। पाकिस्तान के अंदरुनी मोर्चे पर अमेरिकी कार्रवाई को देश की सप्रभुता पर हमले के रूप में लिया जा रहा है। देश का राजनीतिक नेतृत्व चाहे वह राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी हों या फिर प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ही हों पर देश की आवाम को कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहे। इससे निपटने के लिए पहले तो आईएसआई को सिविलियन सरकार के गृह मंत्रालय के तहत लेने की चाल चली गई पर जब पाकिस्तानी फौज इसके लिए तैयार नहीं हुई तो पॉशा को बरतरफ करने की कोशिश हुई। पॉशा को इसका अहसास पहले हो गया था, लिहाजा 13 मई को जब संसद के कमरे में उनकी `इन कैमरा' पेशी हुई तो उन्होंने राजनीतिज्ञों को भविष्य के लिए आश्वस्त होने की गरज से कहा कि भारत यदि अमेरिका की तरह कोई कार्रवाई करता है तो उस पर तत्काल हमले किए जाएंगे और इसके लिए भारतीय ठिकानों की पहचान भी कर ली गई है। दरअसल भारतीय सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने हाल में कहा था कि भारत भी सरहद पार आतंकियों की पनाहगाहों को नेस्तनाबूद करने के लिए अमेरिका जैसी कार्रवाई करने की क्षमता रखता है। इससे पूरे पाकिस्तान में हड़कम्प है। आईएसआई चीफ पॉशा ही नहीं, पूरा पाकिस्तान इस समय बौखला गया है और बौखलाहट में अपनी जनता का ध्यान हटाने के लिए कोई बड़ी हिमाकत भी कर सकता है। इसलिए हमें भी अपनी तैयारी पूरी रखनी होगी।

Wednesday, 11 May 2011

ऑपरेशन बिन लादेन की सफलता ने सीआईए के सारे पाप धोए

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 11 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
अमेरिका की खुफिया एजेंसी सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी उर्प सीआईए ने ऑपरेशन जेरोनिमो ईकेआईएस (यानि एनिमी किल्ड इन एक्शन) करके न केवल अमेरिका के सबसे खतरनाक अंडर कवर ऑपरेशन को सफल अंजाम दिया बल्कि पिछले सारे कलंक एक ही झटके में धो डाले। ओसामा बिन लादेन को पहली बात तो ढूंढना आसान नहीं था, फिर ढूंढने के बाद उसे ठिकाने लगाना वह भी एक दूसरे देश के अन्दर और भी मुश्किल था पर सीआईए ने ह्यूमन इंटेलीजेंस और इलैक्ट्रॉनिक इंटेलीजेंस के बीच जो समन्वय बनाया वह शीत युद्ध के बाद उसकी सबसे बड़ी सफलता है। सीआईए ने यह साबित कर दिया कि वह विश्व की अतिसक्षम खुफिया एजेंसियों में से एक है। 11 सितम्बर, 2001 के बाद से ही इस एजेंसी की क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगाए जा रहे थे कि विश्व के सर्वाधिक समृद्ध और शक्तिशाली देश के मुंह पर करारा तमाचा रसीद करने वाले ओसामा का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाई। जाने-माने विशेषज्ञों को लगने लगा था कि सीआईए भी दुनिया की अन्य खुफिया एजेंसियों की तरह नौकरशाहों और लालफीताशाही की शिकार हो गई है और यह भी कि उसकी क्षमता का प्रचार ज्यादा है, जिसमें किवंदतियां अधिक और असलियत कम है पर ऑपरेशन जेरोनिमो (ओसामा अभियान का सांकेतिक कूटनाम) ने न केवल अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, सीआईए के निदेशक लियोन पनेटा, सीआईए और अमेरिकी खुफिया तंत्र की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाए हैं बल्कि आज की तारीख में खुफिया जानकारी के एकत्रीकरण और विश्लेषण के बारे में कुछ कीमती सबक भी मुहैया करवाए हैं।
सीआईए के लिए यह जानकारी काफी महत्वपूर्ण साबित हुई कि लादेन अलकायदा के अभियान को संदेश वाहकों के जरिये चला रहा है। इनमें से दो अभियान चालक अमेरिका की गिरफ्त में आ चुके थे। वर्ष 2004 में अलकायदा के एक कार्यकता की गिरफ्तारी से ओसामा के संदेश वाहक अबू अहमद अल कुवैती की पहचान हुई। कुवैतों उस फराज-उल-लिबी का सहयोगी था, जिसने अलकायदा के अभियान संचालक और 9/11 के सूत्रदार खालिद शेख मोहम्मद की जगह ली थी। वर्ष 2005 में लिबी को पकड़े जाने के बाद इस बात की पुष्टि हो गई कि कुवैती बिन लादेन का तभी से संदेश वाहक बना हुआ था। गौरतलब है कि इंटेलीजेंस का यह महत्वपूर्ण टुकड़ा गिरफ्तारशुदा लोगों से की गई पूछताछ से उभरा है। एक बार जब कुवैती की पहचान हो गई तो अगला सुराग सिग्नल इंटेलीजेंस के जरिये तब मिला जब सीआईए ने कुवैती और एक अन्य व्यक्ति के बीच टेलीफोन पर हो रही बातचीत को इंटरसेप्ट किया। इससे कुवैती को खोजने में मदद मिली, जिसका वाहन एबटाबाद के उस संदिग्ध परिसर में पाया गया। हवाई निगरानी के जरिये उस इमारत पर लगातार नजर रखी गई। अमेरिकी विशेषज्ञों ने सारे इंटेलीजेंस को अच्छी तरह परखते हुए परिसर में ओसामा की मौजूदगी की तार्पिक संभावनाओं की गहन जांच की। बाद की कहानी तो सबको मालूम ही है। पूरे प्रकरण से साफ है सीआईए ने ह्यूमन और इलैक्ट्रॉनिक इंटेलीजेंस दोनों का इस्तेमाल किया और अमेरिका के अब तक के सबसे सफल और कठिन ऑपरेशन को अंजाम दिया। भारत की खुफिया एजेंसियों को इससे कई सबक मिलते हैं। अगर वह लेना चाहे तो?

Sunday, 8 May 2011

भारत के लिए तो लादेन से ज्यादा लश्कर खतरनाक है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 07 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
ओसामा बिन लादेन के मरने से बेशक अमेरिका ने थोड़ी राहत महसूस की हो पर जहां तक भारत का सवाल है, हमें लादेन के मरने से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं। हमारे लिए तो लश्कर-ए-तोयबा अलकायदा से ज्यादा बड़ा खतरा है। बिन लादेन से पाकिस्तान का आतंकी ढांचा भी प्रभावित नहीं होगा। आज भी पाकिस्तान में लश्कर, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिद्दीन, हरकत उल अंसार जैसे दर्जनों आतंकी संगठनों के शिविर जारी हैं। इस समय पाकिस्तान में लगभग 37 आतंकी शिविर मौजूद हैं। जम्मू-कश्मीर में सक्रिय हार्ड कोर आतंकियों की संख्या लगभग 2300 है। इसके अलावा लगभग 900 से अधिक भाड़े के विदेशी आतंकी भी मौजूद हैं। जम्मू-कश्मीर में इस समय पाकिस्तान, पाक अधिकृत कश्मीर, अफगानिस्तान, मिस्र, सूडान, यमन, बहरीन, बंगलादेश, ईरान और इराकी मूल के विदेशी आतंकी मौजूद हैं।
दरअसल भारतीय खुफिया एजेंसियों की नजर में ओसामा के अलकायदा और लश्कर-ए-तोयबा के बीच कोई अन्तर नहीं है। लश्कर पर भारतीय डोजियर कहता है कि इस आतंकी संगठन के अलकायदा और तालिबान से गहरे रिश्ते हैं। इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान में ईद समेत धार्मिक समारोहों में मारे जाने वाले जानवरों की खालों से करोड़ों रुपये कमाने के अलावा चन्दे व सदस्यता शुल्क, आदि से अपने विस्तार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करते हैं। सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान के मनशेरा में पवनोढेरी में मौजूद लश्कर का प्रशिक्षण केंद्र एक बार में 500 लोगों को प्रशिक्षण देता है। मुजफ्फराबाद, लाहौर, पेशावर, इस्लामाबाद, रावलपिण्डी, कराची, मुल्तान, क्वेटा, गुजरांवाला, सियालकोट, गिलगित समेत कई बड़े शहरों में लश्कर के 2000 से ज्यादा भर्ती केंद्र और दफ्तर हैं। उनके पास आधुनिक हथियारों के साथ ही उन्नत संचार यंत्र भी हैं। खुफिया सूत्रों के मुताबिक घाटी में फिरौती और संचार के लिए लश्कर के आतंकी वाइस इंटरनेट प्रोटोकॉल का इस्तेमाल करते हैं जिसके कारण मोबाइल फोन पर नम्बर तक नहीं आता।
संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध के बावजूद जमात-उद-दावा और लश्कर समेत 19 अलग-अलग नामों से चल रहे इस आतंकी संगठन का कारोबार इसकी ताकत का अहसास कराता है। संयुक्त राष्ट्र में लश्कर के 2005 और पाकिस्तान में 2002 से प्रतिबंध होने के बावजूद इसका मुखिया हाफिज सईद ओसामा बिन लादेन की मौत पर शोक सभाएं आयोजित करने से बाज नहीं आया। भारत में सिमी, इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी संगठनों के सहारे आतंकवाद को आउटसोर्सिंग का मॉडल भी लश्कर विकसित कर चुका है। बंगलादेश में जमात उल मुजाहिद्दीन और हरकत उल जिहाद अल इस्लामी (हूजी) के तार भी लश्कर से सीधे जुड़े हुए हैं। मुंबई आतंकी हमले ने अमेरिका को भी अब यह मानने पर मजबूर कर दिया है कि लश्कर का विस्तार और पश्चिमी देशों को निशाना बनाने की उनकी हसरतें खतरे का सबब हैं। लश्कर आतंकियों ने मुंबई हमले में इजरायलियों के लिए महत्वपूर्ण खसड़ हाउस और पश्चिमी पर्यटकों के पसंदीदा होटल ताज होटल को निशाना बनाकर इसकी बानगी भी दे दी है। भारत को आतंकवाद के खिलाफ अपनी ही लड़ाई लड़नी होगी। हां, हम अमेरिका पर यह दबाव जरूर डाल सकते हैं कि वह पाकिस्तान में मौजूद टेरर फैक्टरियों को नष्ट करे या हमारी मदद करे।

लादेन का खात्मा करने वाले गुमनाम नेवी सील्स

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 07 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
अमेरिका के प्रतिष्ठित नेवी सील दस्ते जिसने दुनिया के मोस्ट वांटेड टेरेरिस्ट ओसामा बिन लादेन को मार गिराया, में कौन-कौन शामिल थे, उनके नाम क्या थे, यह शायद ही कभी पता चले। यह गुमनाम सीलों आज अमेरिका सहित पूरी सभ्य दुनिया के हीरो हैं पर इनकी ट्रेनिंग देखिए, इनके बारे में कोई व्यक्तिगत डीटेल जैसे कि नाम, पता कभी नहीं दिया जाएगा। बस इन्हें टीम-6 के नाम से ही पुकारा जाएगा। बिन लादेन ऑपरेशन में कुल 79 सैनिक थे। इनमें से लगभग 12 नेवी सील एबटाबाद की उस हवेली में घुसे जहां बिन लादेन रह रहा था। निश्चित रूप से यह अमेरिकी सेना में सबसे घातक जत्था है। इनकी ट्रेनिंग इतनी सख्त होती है कि मुश्किल से 80 प्रतिशत ही पूरी कर पाते हैं। यह समुद्र, जमीन और आसमान तीनों पर हमला करने के लिए ट्रेंड होते हैं। ऑपरेशन बिन लादेन के लिए इन सीलों ने एक अत्याधुनिक हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल किया। इस प्रकार का हेलीकॉप्टर पहले कभी नहीं देखा गया है। इसके बारे में जानकारी तब मिली जब विशेषज्ञों को एबटाबाद ऑपरेशन के दौरान तबाह हुए हेलीकॉप्टर के मलबे के निरीक्षण से मिली। इस ऑपरेशन के दौरान अमेरिकी दस्ते नेवी सील्स का एक हेलीकॉप्टर खराब होकर गिर गया था और ऑपरेशन की समाप्ति के बाद सील्स ने उसको तबाह खुद ही कर दिया था ताकि उसके अन्दर कम्प्यूटर पर डाटा इत्यादि सूचनाएं बाहर न आ सकें और न ही हेलीकॉप्टर के अन्दर क्या-क्या यंत्र लगे हैं, इसकी भी जानकारी बाहर आए। इस हेलीकॉप्टर का नाम यूएम-60 ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर है। इसमें कई बदलाव किए गए हैं ताकि उसकी आवाज कम से कम हो जाए और राडार भी इसे नहीं पकड़ सके। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के एक वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारी ने यह स्वीकार किया कि राडार ने तो हेलीकॉप्टर को न केवल पकड़ ही सका बल्कि अफगानिस्तान से पाकिस्तान के अन्दर आते वक्त ही उनको देखा गया।
ओसामा बिन लादेन के खात्मे के लिए अमेरिका के जिस शख्स ने सबसे ज्यादा मेहनत की वह अमेरिकी सरकार में आतंकियों का शिकार करने में सर्वाधिक अनुभव रखने वाले अधिकारियों में से एक वाइस एडमिरल विलियम एच. मकरैवन हैं। जब रविवार को अमेरिकी हेलीकॉप्टर लादेन के खात्मे के लिए पाकिस्तानी सीमा में घुसे थे, उस वक्त अफगानिस्तान के बगराम एयर फील्ड स्थित ज्वाइंट ऑपरेशन सेंटर की कमान टेक्सास से वाइस एडमिरल मवरैवन ही सम्भाल रहे थे। इन्होंने ही दो माह पहले ही ओसामा बिन लादेन मिशन के लिए नेवी सील्स की विशेष यूनिट बनाई थी। उन्होंने इस अतिगोपनीय अभियान के लिए हफ्तेभर गहन ट्रेनिंग दी। अभियान के दो ही नतीजे होते सफल होता तो अलकायदा का सफाया और विफल होता तो पाकिस्तान के साथ अमेरिकी गठबंधन खतरे में पड़ जाता। जब पता चला कि एबटाबाद में बिन लादेन का घर ऊंची-ऊंची दीवारों से घिरा है और अमेरिकी राष्ट्रपति ने उसमें घुसने की इजाजत दे दी तो सीआईए प्रमुख लियोन पेनेटा ने यह काम मवरैवन को सौंपा। वाइस एडमिरल मवरैवन किसी भी मिशन की सफलता के लिए छह मुख्य सूत्र मानते हैं अचरज में डालना, गति, सुरक्षा, सरलता, उद्देश्य और दोहराव। ओसामा अभियान की जोखिम को देखते हुए उन्होंने इसमें एक और सूत्र जोड़ा शुद्धता या सूक्षमता। उनके द्वारा उच्च मानदंडों को महत्व देना ही मिशन ओसामा की सफलता का कारण बना।

Saturday, 7 May 2011

दिग्गी राजा का ओसामा बिन लादेन प्रेम!

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

प्रकाशित: 07 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
वैसे तो श्री दिग्विजय सिंह एक सुलझे हुए नेता हैं। वह कांग्रेस महासचिव होने से पहले दस साल तक मध्य प्रदेश जैसे राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। उन्हें राजनीति की अच्छी जानकारी है पर पिछले कुछ दिनों से पता नहीं उन पर सैक्यूलरवाद खासकर अल्पसंख्यकवाद का ऐसा रंग चढ़ा है कि न जाने क्या-क्या बोलने लगे हैं। ताजा उदाहरण लखनऊ की एक प्रेस कांफ्रेंस का है जहां आपने दुर्दांत आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को `ओसामा जी' कहकर संबोधित कर दिया। दिग्विजय बोले, `ओसामा जी कई वर्षों से पाक में रह रहे थे। पाक आर्मी ने क्यों कुछ नहीं किया? अमेरिका ने मारने के बाद समुद्र में उन्हें फेंक कर अच्छा नहीं किया, अपने देश में भी मुंबई हमलों में मारे गए लोगों को उनके धर्म के अनुसार दफन किया गया।' दिग्विजय का ओसामा प्रेम अपनी समझ से बाहर है। ओसामा की तारीफ करना, उसकी विचारधारा की तारीफ करना है और इससे किसी भी प्रकार की हमदर्दी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करती है। पूरी दुनिया ओसामा को कोस रही है। तमाम मुस्लिम देश भी उसकी कारगुजारियों की लानत-मनानत कर रहे हैं। लेकिन दिग्गी राजा की चिन्ता कुछ और ही है। वह समझते हैं कि ओसामा को ओसामा जी कहने से भारत के मुसलमान खुश हो जाएंगे और उनकी वाह-वाह करेंगे।
पिछले कुछ महीनों में कभी `हिन्दू आतंकवादी' तो कभी `संघी आतंकवादी' का नाम लेकर हलचल मचाने में दिग्गी राजा ने कोई कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली के बटला हाउस एनकाउंटर को उन्होंने फर्जी एनकाउंटर कहा। यही नहीं, वह आजमगढ़ गए और मरने वाले लड़कों के घरों में जाकर उनसे हमदर्दी जताई। यह सब तब हुआ जब दिल्ली पुलिस का एक जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा इस मुठभेड़ में आतंकवादियों के हाथों मारा गया और दिल्ली की विभिन्न अदालतों ने भी इस एनकाउंटर को सही ठहराया। मुंबई हमलों में मारे गए हेमंत करकरे की हत्या पर भी दिग्गी राजा ने प्रश्न उठाए। पिछले दिनों एक समारोह में दिग्विजय सिंह ने गुजरात का नाम लेते हुए कहा कि आखिर प्रज्ञा ठाकुर और असीमानन्द जैसे लोगों को वहां शरण क्यों मिली है? जो बम बनाते हैं, वह गुजरात में जाकर संरक्षण पा लेते हैं। ऐसे तत्वों को भाजपा सरकारें संरक्षण दे रही हैं। मध्य प्रदेश में भी संघी आतंकियों को शरण दी जाती है। बटला हाउस मुठभेड़ पर फिर से सवाल उठाते हुए उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी से पूछा कि आखिर पकड़ा गया हर आतंकी संघ का क्यों है? लाल कृष्ण आडवाणी को भी घेरते हुए उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक तनाव उनकी रथ यात्रा के बाद से ही पनपा है।
अपने सांप्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि कश्मीर में तिरंगे की दुहाई देने वालों का हमेशा से विभाजन ही मुख्य उद्देश्य रहा है। देश के बंटवारे के लिए मोहम्मद अली जिन्ना नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता वीर सावरकर ही मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। हिन्दू संगठनों को कोसना आजकल दिग्विजय का स्टाइल हो गया है पर आतंकवादियों को महिमामंडित करना अलग बात है। आप ऐसे व्यक्ति, विचारधारा के गुणगान कर रहे हैं जिसने बाकी विश्व के साथ-साथ भारत को भी तबाह करने की धमकी दी थी। आपको देशहित की भी परवाह नहीं, आपको तो केवल परवाह है वोट बैंक की पर इन सबके बावजूद कितना कंसालिडेट हुआ है आपका वोट बैंक यह अलग प्रश्न है।