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Sunday, 10 June 2012

Laden informer sentenced to 33 years of jail

Anil Narendra

Recently, a Pakistani Court convicted Dr Shakeel Afridi of treason and sentenced him to 33 years of jail. He was the person, who had helped US intelligence agency CIA in locating and killing Al Qaeda Chief Osama bin Laden. We were shocked to hear about this decision of the Court and found it very strange. Mutahir Zeb Khan, the Political Representative of the Khyber tribal area, told the Pak newspaper Dawn that Shakeel was produced before a four-member tribal Court, which sentenced him to 33 years of imprisonment and a fine of Rs 32 lakh. Later, Shakeel was sent to Peshawar Central Jail. Instead of Pakistan criminal code, Shakeel was tried under the Pontier Crime Regulation Act of British era. Under the Act, there is no provision of capital punishment for treason. Dr Shakeel had carried out an immunization programme under the directions of the CIA to enable them to collect blood samples of Osama and his family members. It was on the basis of the evidence thus collected that US was able to kill Osama bin Laden in a raid in May, last year. This action by Pakistan has once again proved that Pakistan is not sincere in his fight against terrorism. It also proves that in the heart of the hearts, Pakistan is sympathetic towards terrorists of all hues, whether they are from al Qaeda or from LeT, and maintains contact with them. Pakistan is bent upon to take revenge on all persons, who had been helpful in eliminating the most wanted terrorist of the world. Perhaps, Dr Shakeel would have been honoured in other parts of the world for his daring act, but in Pakistan, he is being considered as a traitor, who has helped a foreign intelligence agency against national interests. If this episode reveals the double game of Pakistan, then it has also created embarrassment for US, who failed to protect its 'source' or the informer. This episode will further add to the deterioration of relations between Pakistan and US. The US Secretary of State, Hillary Clinton had called this decision as unjust and un-called for. Meanwhile, a Panel of the US Senate has also reduced the aid being given to Islamabad. Hillary said that injustice had been done to Afridi. She regretted his conviction. He had provided invaluable help, on the basis of which one of the most notorious killers of the world could be eliminated. It was, in fact, in the interest of Pakistan, in the interest of the US and in the interest of the whole world. Meanwhile, PPP Chief Bilawal Bhutto has said that extending cooperation to any foreign intelligence agency is against the laws of any country. In a case for spying for Israel, US had sentenced life imprisonment. Ours is an independent Judiciary, which was restored by the PPP. A new chapter has been added in the deteriorating relations between Pakistan and US. We think this action by Pakistan will enhance the morale of terrorists.

Friday, 1 June 2012

लादेन की खबर देने वाले डा. अफरीदी को 33 साल कैद

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1 June 2012
अनिल नरेन्द्र
गत दिनों अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को मार गिराने के अभियान में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का साथ देने वाले पाकिस्तानी डा. शकील अफरीदी को एक अदालत ने देशद्रोही करार देते हुए 33 साल की कैद की सजा सुना दी। हमें यह फैसला सुनकर आश्चर्य भी हुआ और अजीबोगरीब भी लगा। खैबर कबाइली क्षेत्र के राजनीतिक पतिनिधि मुताहिर जेबखान ने पाकिस्तानी अखबार `डान' को बताया कि शकील को चार सदस्यीय कबाइली अदालत में पेश किया गया। अदालत ने उन्हें 33 साल की कैद और 3.2 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। सजा सुनाए जाने के बाद शकील को पेशावर स्थित केन्द्राrय कारागार भेज दिया गया। शकील को पाकिस्तान अपराध संहिता की बजाए ब्रिटिश कालीन कानून, पंटियर काइम रेगुलेशन एक्ट के तहत दोषी करार दिया गया। इस एक्ट के तहत राजद्रोह के मामले में मौत की सजा का पावधान नहीं है। डा. शकील ने सीआईए के निर्देश पर एबटाबाद में एक टीका अभियान चलाया था, ताकि इसकी मदद से ओसामा और उसके परिवार के सदस्यों के डीएनए नमूने लिए जा सकें। अभियान से मिले सबूतों के आधार पर ही अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन के खिलाफ बीते मई महीने में कार्रवाई कर उसे मार गिराया था। पाकिस्तान द्वारा उठाए गए इस कदम से यह फिर साबित हो जाता है कि पाकिस्तान आतंकवाद से लड़ने के पति गंभीर नहीं है। यह भी साबित होता है कि अंदरखाते पाकिस्तान हर वर्ग के आतंकवादी चाहे वह अलकायदा से हो या फिर लश्कर से हो, संबंध और सहानुभूति रखता है। पाकिस्तान उस आदमी से बदला ले रहा है जिसने दुनिया के मोस्ट वांटेड टेरोरिस्ट को खत्म करने में मदद की थी। दुनिया के किसी और कोने में शायद डा. अफरीदी का सम्मान किया जाता पर पाकिस्तान में वह एक देशद्रोही है जिसने देश के खिलाफ एक विदेशी खुफिया एजेंसी की मदद की। अगर पाकिस्तान की डबल गेम इस किस्से से एक्सपोज होती है तो अमेरिका पर भी सवाल उठते हैं कि वह अपने `सोर्स' यानि मुखबिर को बचा नहीं पाया। इस किस्से से पाकिस्तान और अमेरिकी रिश्तों में और तनाव बढ़ेगा। अमेरिका की विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने फैसले को अन्यायपूर्ण तथा अवांछित बताया। साथ ही अमेरिकी सीनेट के एक पैनल ने इस्लामाबाद को दी जाने वाली सहायता में कटौती भी कर दी। हिलेरी ने कहा कि अफरीदी के साथ जो किया गया है वह अन्यायपूर्ण है। उन्हें दोषी ठहराए जाने पर अफसोस है। उन्होंने जो मदद की वह दुनिया के सर्वाधिक कुख्यात हत्यारों में से एक का खात्मा करने में कारगर रही। यह स्पष्ट रूप से पाकिस्तान के, हमारे और पूरी दुनिया के हित में था। दूसरी ओर पीपीपी अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ने कहा कि विदेशी खुफिया एजेंसियों के साथ सहयोग करना किसी भी देश के कानून के खिलाफ है। अमेरिका में इजराइल के लिए जासूसी करने पर उम्रकैद की सजा दी गई। हमारी स्वतंत्र न्यायपालिका है जिसे पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने बहाल किया है। पाकिस्तान और अमेरिका के पहले से तनावपूर्ण रिश्तों में यह एक और अध्याय जुड़ गया है। हमारी राय में पाकिस्तान का यह कदम आतंकवादियों के उत्साह को बढ़ाने वाला है।

Tuesday, 10 January 2012

पाकिस्तान के असल सीआईए एजेंट

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 10th January  2012
अनिल नरेन्द्र
गत सप्ताह पाकिस्तान के कुछ वरिष्ठ पत्रकार हमारे कार्यालय आए थे। हमने उनके स्वागत का भव्य कार्यक्रम बनाया था। इनमें श्री महमूद शाम, अयाज बादशाह प्रमुख थे। आए तो यह हैदराबाद में एक कांफ्रेंस के लिए थे पर दिल्ली में वह दो दिन रुके। वहां अच्छा आदान-प्रदान हुआ। दोनों तरफ कई नई जानकारियां मिलीं। मैंने अपने स्वागत भाषण में कहा कि पाकिस्तान आज पत्रकारों चाहे वह अखबार के हों या टीवी के हों, के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक देश बन गया है। पाकिस्तान में स्वतंत्र चिन्तन करने वालों पत्रकारों के लिए यह एक कठिन दौर है। अपने कर्तव्य पालन के दौरान इस पेशे से जुड़े 11 लोगों की हत्या 2011 में हुई। इन लोगों की हत्या या तो जातीय गुटों के बीच होने वाली गोलाबारी या चरमपंथी हिंसा या फिर राजनैतिक विचारधारा के चलते की गई। उदाहरण के तौर पर गत वर्ष सलीम शहजाद के अपहरण और हत्या में राज्य की मशीनरी के हाथ होने का आरोप था जबकि इस मामले की जांच के लिए गठित आयोग अभी हवा में ही हाथ-पांव मार रहा है। सलीम शहजाद ने सशस्त्र बल के उन लोगों का पर्दाफाश किया था जिनका अलकायदा या तालिबान के साथ करीबी संबंध थे। पिछले दिनों बलूचिस्तान में राष्ट्रवादी विचारधारा या फिर सुरक्षाबलों द्वारा की जा रही ज्यादतियों को उजागर करने वाले कई पत्रकारों की हत्या कर दी गई। नतीजा यह हुआ कि बहुत से डरे पत्रकारों ने अमेरिका जैसे देशों में शरण दिए जाने के आवेदन करने पड़े। कराची में कुछ पत्रकारों को जातीय समूहों या सियासी दलों द्वारा मिल रही धमकियों के चलते विदेशों में सुरक्षा ठिकाने तलाशने पड़े। इस सिलसिले में मैंने पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार श्री नजम सेठी का एक लेख मिड डे में पढ़ा। उन्होंने बताया कि अब सुरक्षा व्यवस्था के कर्ताधर्ता लोगों की समझ पर चुभते हुए सवाल उठाने के चलते कुछ वरिष्ठ पत्रकारों के विरुद्ध कपटपूर्ण प्रचार अभियान चला रहे हैं। उनको अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए का एजेंट होने का आरोप लगाया जा रहा है। पाकिस्तान के मौजूदा अमेरिकी विरोधी माहौल में इस तरह के आरोप लोगों को भड़काने के लिए दिए जा रहे हैं। मान लीजिए कि यदि आपने कह दिया कि एबटाबाद में 50 अमेरिकी हमले ने सेना की अक्षमता की पोल खोल दी तो क्या आप सीआईए एजेंट हो गए या आपने कह दिया कि राजनीतिक संस्थाओं का नियंत्रण सेना के उपर होना चाहिए तो क्या आप सीआईए एजेंट हो गए। यदि आपने कह दिया कि सेना को तालिबान के साथ किसी तरह की शांतिवार्ता में शामिल नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे उनको पाकिस्तानी क्षेत्र में पुन संगठित होने का मौका मिल जाएगा तो क्या आप सीआईए एजेंट हो गए? यदि आप कहते हैं कि ड्रोन विमानों के चलते वजीरिस्तान में तालिबान और अलकायदा के चरमपंथियों को खत्म करने में बड़ी मदद की तो आप सीआईए एजेंट हो गए। यदि आपने कह दिया कि सेना के लिए आवंटित बजट का जो कि देश की कुल कर का लगभग एक-चौथाई है की जांच संसद की समिति या पाकिस्तान के आडिटर जनरल के द्वारा की जानी चाहिए तो आप सीआईए एजेंट हो गए। यदि आप कहते हैं कि पाकिस्तान को भारत को व्यापार के क्षेत्र में एमएनएफ का दर्जा देना चाहिए जिसे भारत ने पाकिस्तान को 16 वर्ष पहले ही दे दिया था या वीजा नियमों में ढील देनी चाहिए या मनोरंजन उद्योग से जुड़े लोगों को मदद करने के लिए भारत से सांस्कृतिक संबंध बढ़ाना चाहिए या मीडिया समूह द्वारा चलाई जा रही अमन की आशा कार्यक्रम को सरकार को समर्थन देना चाहिए तो क्या आप सीआईए एजेंट हो गए। यदि आप कहते हैं कि पूर्व अमेरिकी राजदूत हुसैन हक्कानी और आईएसआई प्रमुख शुजा पाशा के मामले में एक समान त्यागपत्र की नीति अपनानी चाहिए। एक के ऊपर अमेरिकी सरकार को पाकिस्तानी सेना के ऊपर सरकार के नियंत्रण के लिए समर्थन मांगने का आरोप है जबकि दूसरे पर अरब शासकों से निर्वाचित सरकार को उखाड़ फेंकने में मदद के लिए अपील करने का आरोप है तो आप सीआईए एजेंट हो गए। यदि आप कहते हैं कि सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा से अधिक आवाम की दशा सुधारने वाली नीतियां बनानी चाहिए तो क्या आप सीआईए एजेंट हो गए। विडम्बना सबसे बड़ी यह है कि जिन लोगों ने अमेरिका के बढ़ते प्रभाव को बेनकाब किया है, इसका विरोध किया है उन्हें ही बदनाम करने के लिए उन पर सीआईए एजेंट की तौहमत लगाई जा रही है। पाकिस्तान में आज पत्रकार आवाम के हित में किसी भी प्रकार की आवाज उठाने से डरते हैं। इसीलिए कहता हूं कि पत्रकारों के लिए आज की तारीख में पाकिस्तान सबसे ज्यादा खतरनाक मुल्क है इस दुनिया में और इन परिस्थितियों में भी यह पत्रकार अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर रहे हैं। हमारा सलाम।
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Tuesday, 4 October 2011

अमेरिका का अलकायदा को दोहरा झटका


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th October 2011
अनिल नरेन्द्र
अमेरिका और अलकायदा, लश्कर-ए-तोयबा के बीच लड़ाई जारी है। लश्कर और अलकायदा ने मिलकर अमेरिका के रक्षा मुख्यालय पेंटागन को उड़ाने की एक साजिश रची तो उधर यमन के पहाड़ों पर अमेरिका ने एक हवाई हमला करके अलकायदा की यमन शाखा के खूंखार आतंकवादी अनवर अल-अवलाकी को मार गिराया। पहले बात करते हैं पेंटागन पर हमले की साजिश की। अमेरिकी न्याय विभाग ने बताया है कि एक 26 वर्षीय अमेरिकी नागरिक रिजवान फिरदौस पर विदेशी आतंकवादी संगठन विशेषकर अलकायदा को विदेशों में अमेरिकी सैनिकों पर हमले करने के लिए विस्फोटक सामग्री तथा संसाधन मुहैया करने के प्रयास का आरोप भी लगाया गया है। रिजवान फिरदौस को मैसायुसरस के फ्रैमिंघम में गिरफ्तार किया गया है। एक हलफनामे के मुताबिक 2011 के जनवरी की शुरुआत में सहयोग करने वाले गवाहों की रिकार्ड की गई बातचीत में फिरदौस ने बताया था कि उसने पेंटागन पर छोटे ड्रोन विमानों से हमला करने की साजिश रची थी। इसमें विस्फोटक होते और विमान को जेपीसी सिस्टम द्वारा निर्देशित किया जाना था। अप्रैल 2011 में फिरदौस ने अपनी साजिश का विस्तार कर उसमें एक अन्य स्थान पर हमले को शामिल किया। 2011 के मई और जून में फिरदौस ने छिपाकर दो पेन ड्राइवर सौंपे जिसमें पेंटागन और कैपिटल पर हमले की साजिश का कदम दर कदम निर्देश सहित ब्यौरा था। साजिश के मुताबिक इस हमले के लिए रिमोट कंट्रोल से चलने वाले तीन विमानों और छह व्यक्तियों का इस्तेमाल किया जाना था जिसमें वह व्यक्ति भी शामिल था जिसने खुद को `आमिर' बताया है। अरबी भाषा में आमिर का मतलब नेतृत्व करने वाला होता है। फिरदौस की गिरफ्तारी अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों की एक शानदार सफलता है। समय रहते एक खतरनाक साजिश को पर्दाफाश करके उन्होंने एक बड़ा आतंकी हमला होने से बचा लिया।
उधर ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद अमेरिका ने अलकायदा को एक और तगड़ा झटका दिया है। यह झटका अलकायदा की यमन शाखा के खूंखार आतंकी अनवर अल-अवलाकी का मारा जाना है। अवलाकी अमेरिकी मूल का आतंकवादी था। धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने और इंटरनेट के जरिये अमेरिका में हमलों के लिए आतंकवादियों की भर्ती करने के चलते उसने अलकायदा में अहम दर्जा हासिल कर लिया था। एक बार फिर अमेरिका की गुप्तचर एजेंसियों ने उल्लेखनीय कार्य कर दिखाया। जिस कार में अवलाकी सफर कर रहा था, उस पर ड्रोन और जेट विमानों से हमला किया गया। इस कार में अवलाकी सफर कर रहा था। माना जा रहा है कि वह हमले में मारा गया। यमन की सरकार ने कहा कि पहाड़ी प्रांत जाफ के काशेफ शहर के बाहर सुबह 9ः55 पर  अनवर अल-अवलाकी को निशाना बनाया गया और वह मारा गया। जाफ राजधानी साना से 140 किलोमीटर पूर्व में स्थित है। स्थानीय कबायलियों और सुरक्षा एजेंसियों ने कहा कि अवलाकी दो कारों में सफर कर रहा था। उसके साथ अलकायदा की यमन शाखा के दो और आतंकी भी थे। जिस समय उन पर हवाई हमला हुआ वह अल-जाफ के पास स्थित मारिव प्रांत जा रहा था। अवलाकी मैक्सिको में पैदा हुआ। उसके माता-पिता यमन के थे। उसने अपनी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई अमेरिका में की। अवलाकी का सेनेडियागो में सम्पर्प दो ऐसे लोगों से हुआ जिन्होंने 9/11 के हमले में सुसाइड हाइजैर्क्स की भूमिका निभाई। एफबीआई ने उससे पूछताछ की थी लेकिन एजेंसी को उसे हिरासत में लेने का कोई कारण नहीं मिला और उसे छोड़ दिया गया। 2004 में अवलाकी यमन आया। वह एक धर्मोपदेशक बन गया और उसने बरसों से इंटरनेट पर अपने उपदेशों में अमेरिका का विरोध किया और जिहाद की अपीलें करता रहा। अमेरिका की यह दोहरी सफलता उसकी आतंकविरोधी अलर्टनैस के कारण मिली। उसका गुप्त जानकारी हासिल करने का यंत्र एक बार फिर एक तरफ तो अपने देश में खतरनाक हमले को रोकने में सफल रहा, दूसरी ओर एक कट्टर अमेरिका विरोधी आतंकवादी को भी साफ करने में सफल रहा। भारत की गुप्तचर और जांच एजेंसियों को अमेरिकी सिस्टम से कुछ सीखना चाहिए। हम आज तक किसी भी जांच में सफल नहीं हुए। न ही हमें हमले से पहले कोई सूचना ही मिलती है। यूं ही नहीं अमेरिका की धरती पर 9/11 के बाद से एक भी हमला नहीं हो सका।
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Friday, 30 September 2011

हक्कानी नेटवर्प को लेकर पाक-अमेरिका में बढ़ती तल्खी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th September 2011
अनिल नरेन्द्र
अमेरिका के एक शीर्ष कांग्रेसी सांसद टेड पो ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सभी तरह की आर्थिक सहायता पर रोक लगाने के लिए अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में एक प्रस्ताव पेश कर दिया है। टेक्सास के इस सांसद की तरफ से पेश किया गया यह प्रस्ताव (एमआर 3013) अगर पारित हो जाता है तो पाकिस्तान को परमाणु हथियारों की सुरक्षा के लिए दी जा रही सहायता राशि के अलावा सभी तरह की सहायता राशि पर रोक लग जाएगा। टेड ने हाल ही में सदन में यह प्रस्ताव पेश करने के बाद कहा कि ऐबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के ठिकाने का पता लगने के बाद पाकिस्तान अमेरिका के लिए विश्वासघाती, धोखेबाज और खतरनाक साबित हुआ है। उन्होंने कहा कि यह तथाकथित सहयोगी अरबों डालर की अमेरिकी सहायता ले रहा है और दूसरी तरफ अमेरिकियों पर हमला करने वाले आतंकवादियों को समर्थन दे रहा है, इसलिए उसे दी जा रही सहायता रोकी जाए। अमेरिका 1948 से अब तक एक अनुमान के अनुसार 30 अरब पौंड (करीब 22 खरब 93 अरब रुपये) की सीधी मदद दे चुका है। इसकी आधी राशि (अलग से) पाक को सैन्य मदद के रूप में दी जा चुकी है। 1962 में अमेरिकी मदद की राशि सबसे ज्यादा 2.5 अरब डालर (122.42 अरब रुपये) थी। 1990 के दशक में मदद निम्नतम स्तर पर थी। राष्ट्रपति जार्ज बुश ने पाक के परमाणु कार्यक्रम के चलते मदद करनी बन्द कर दी थी। 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान और बाद में अमेरिका ने कोई मदद नहीं दी। एक समय कहा जाता था कि पाकिस्तान की सुई भी अमेरिका से आती है। अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दी जा रही आर्थिक, सैन्य मदद से साफ है कि अमेरिका के बिना पाकिस्तान कुछ नहीं। अमेरिकी मदद से ही पाकिस्तान में विकास कार्य चलते हैं। यदि यह मदद आनी बन्द हो गई तो पाकिस्तान में हर चीज ठप होने का खतरा बढ़ जाएगा।
कुछ दिनों से अमेरिका और पाकिस्तान के बीच तनाव का मुख्य कारण हक्कानी नेटवर्प को मदद को लेकर है। अमेरिका ने हक्कानी नेटवर्प के खिलाफ पाकिस्तान को सख्त कार्रवाई करने को कहा है। पेंटागन प्रवक्ता ने कहा कि पिछले एक हफ्ते से हम पाक सरकार को यह संदेश दे रहे हैं कि वो अपने क्षेत्र में मौजूद आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करे। पेंटागन प्रवक्ता जार्ज लिटिल ने कहा कि हम पाकिस्तान सरकार से उम्मीद करते हैं कि वह अफगान सीमा से सटे अपने क्षेत्र में मौजूद उन आतंकियों के खिलाफ कदम उठाए जो अफगानिस्तान में दाखिल होकर अमेरिकी तथा अफगानियों पर हमला कर रहे हैं। एक अन्य वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि पाकिस्तान हक्कानी नेटवर्प का सुरक्षित पनाहगाह है और यह गंभीर चिन्ता का विषय है। अमेरिका इस नेटवर्प के खिलाफ ठोस कार्रवाई देखना चाहता है। उल्लेखनीय है कि हक्कानी नेटवर्प मूल रूप से अफगानिस्तान के जलालुद्दीन हक्कानी के नेतृत्व में सक्रिय आतंकी संगठन है। अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमांत क्षेत्र में इसके पास 15000 सक्रिय आतंकियों की फौज है। इसके प्रमुख नेता हैंöजलालुद्दीन हक्कानी, सिराजुद्दीन हक्कानी, बदरुद्दीन हक्कानी  और नसीरुद्दीन हक्कानी। मूल रूप से इसके आत्मघाती हमले करवाना सबसे प्रभावी तरीका है। हत्या, फिरौती और हथियारों की खरीद-फरोख्त के माध्यम से धन उगाने से यह अपना नेटवर्प चलाता है। हक्कानी नेटवर्प का प्रभाव दक्षिण अफगानिस्तान के पाकतिया, पाकतिका, वारदक, लोगर और गजनी क्षेत्रों में जाता है।
पाकिस्तान ने अमेरिका पर जवाबी हमला करते हुए कहा कि अमेरिका ने ही हक्कानी नेटवर्प को खड़ा किया है। पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने दावा किया है कि अमेरिका की सीआईए ने सोवियत संघ के अफगानिस्तान में जबरन कब्जे के खिलाफ यह तालिबानी गुट बनाया था, उन्हीं से इसे प्रशिक्षित किया था। मलिक ने रविवार को इस्लामाबाद में कहा कि हक्कानी समूह का जन्म पाकिस्तान में नहीं हुआ और अमेरिका को अब उन चीजों के बारे में नहीं बोलना चाहिए जो 20 साल पहले हुई थी। मलिक ने कहा कि हक्कानी नेटवर्प अब अफगानिस्तान में सक्रिय है और जो लोग इसके विपरीत दावा कर रहे हैं उन्हें पाकिस्तान में इसकी उपस्थिति के बारे में सबूत देना चाहिए। हक्कानी नेटवर्प और आईएसआई के रिश्तों से अमेरिका और पाकिस्तान के बीच आई तल्खी के बीच अफगान तालिबान ने पहली बार पाक सरकार का पक्ष लेते हुए बयान जारी किया है कि इस मामले की आड़ लेकर अमेरिका पाकिस्तान में अराजकता पैदा कर सरकार को कमजोर करना चाहता है ताकि वह अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर हो। बयान में कहा गया है कि अमेरिका का प्रयास पाकिस्तानी जनता और वहां की सरकार के बीच टकराव पैदा करने का भी है, वह यह दिखाना चाहता है कि पाकिस्तान आतंकवादियों की पनाहगाह है। कुल मिलाकर अमेरिका और पाकिस्तान के बीच तल्खी बढ़ती जा रही है। मैंने एक खबर यह भी पढ़ी है कि अमेरिकी सेना पाकिस्तान के कुछ आतंकी ठिकानों पर बड़ा अटैक करने की योजना बना रही है।
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Sunday, 19 June 2011

अल जवाहिरी के आने से अमेरिका की मुश्किलें बढ़ेंगी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th June 2011
अनिल नरेन्द्र
ओसामा बिन लादेन के मरने का अमेरिका की `वॉर ऑन टेरर' पर पता नहीं क्या असर पड़ेगा? उसकी अफगानिस्तान में, पाकिस्तान में और दुनिया के अन्य भागों में समस्या कम होगी या उसमें एक बार फिर वृद्धि होगी? यह हैं कुछ प्रश्न जो अमेरिकन अधिकारियों को जरूर सता रहे होंगे। अलकायदा संगठित होता जा रहा है। नए अलकायदा प्रमुख की घोषणा हो चुकी है। पेशे से आंखों के डाक्टर, मिस्र के `इस्लामिक जेहाद' नाम के कट्टरपंथी संगठन के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अयमान अल जवाहिरी को अब अलकायदा का प्रमुख बना दिया गया है। ओसामा बिन लादेन का दाहिना हाथ माने जाने वाले जवाहिरी कुछ मायनों में लादेन से ज्यादा खतरनाक साबित हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि 9/11 हमलों में अल जवाहिरी का ही दिमाग था। वर्ष 2001 में जिन 22 संदिग्ध आतंकवादियों की सूची जारी की गई थी उसमें ओसामा बिन लादेन के बाद जवाहिरी का दूसरा नम्बर था। अमेरिका ने जवाहिरी पर 25 मिलियन डालर का ईनाम रखा है। बताया जाता है कि जवाहिरी आखिरी बार अक्तूबर 2001 में अफगानिस्तान के खोस्त शहर में देखा गया था। अफगानिस्तान में तालिबान के खात्मे के बाद से वह भूमिगत हो गया था। हाल के वर्षों में अल जवाहिरी अलकायदा के सबसे मुखर प्रवक्ता के रूप में उभरकर सामने आया है। जवाहिरी पढ़ा-लिखा है और उसने 1974 में काहिरा के मेडिकल कॉलेज से स्नातक की उपाधि और चार साल बाद यहीं से सर्जरी में मास्टर्स की डिग्री हासिल की थी। उसे अरब जगत के सबसे पुराने कट्टरपंथी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ जुड़ने के कारण महज 15 साल की उम्र में पहली बार गिरफ्तार किया गया था।
जवाहिरी की ताजपोशी से परेशान अमेरिका ने उसका भी वही हश्र करने की धमकी दी है जो लादेन के साथ किया। अमेरिका के ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ माइक मुलेन ने कहा कि जैसा कि हमने लादेन को पकड़ने और मारने, दोनों की कोशिश और मारने में सफल भी रहे, हम जवाहिरी के साथ भी निश्चित रूप से ऐसा ही करेंगे। अमेरिका की मुश्किल इसलिए भी बढ़ सकती है, क्योंकि पाकिस्तान में हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे हैं। ओसामा बिन लादेन के ऑपरेशन से पाकिस्तान में हलचल बढ़ती जा रही है। पाक सेना प्रमुख अशफाक कयानी और आईएसआई प्रमुख पाशा पर दबाव बढ़ता जा रहा है। कयानी को अमेरिका के प्रति नरम होने के आरोप में हटाने की मुहिम चल रही है। आईएसआई ने लादेन के ठिकाने के बारे में अमेरिकी अधिकारियों को ठोस जानकारी देने के आरोप में पांच जासूसों को गिरफ्तार कर लिया है। इनमें एक पाकिस्तानी सेना का मेजर भी शामिल है। उधर एक अमेरिकी सीनेटर ने एक बैठक में सीआईए के डिप्टी डायरेक्टर माइकल मोरेल से पूछा कि पाकिस्तान अमेरिका को आतंकवाद से लड़ने के मुद्दे पर कितना समर्थन दे रहा है? तो जवाब में मोरेल ने कहा कि 10 में से 3 अंक। मतलब अमेरिका पाक की गतिविधियों से बिल्कुल नाखुश है। दि न्यूयार्प टाइम्स के अनुसार अमेरिका में इस बात की सख्त नाराजगी है कि पाक सरकार ने उन लोगों पर तो कोई कार्रवाई की नहीं जिन्होंने ओसामा बिन लादेन को छिपाने में मदद की थी, लेकिन जिन लोगों ने लादेन को मारने में मदद की थी, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। आने वाला समय अमेरिका के लिए इस मामले में चुनौतीपूर्ण होगा।
Tags:Afghanistan, Aiman Al Zawahiri, Al Qaida, America, Anil Narendra, CIA, Daily Pratap, Osama Bin Ladin, Pakistan, Terrorist, Vir Arjun

Wednesday, 25 May 2011

ओबामा की धमकी का पाकिस्तान ने उसी अंदाज में दिया जवाब

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25th May 2011
अनिल नरेन्द्र
अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद अमेरिका और पाकिस्तान का वाप्युद्ध थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। दोनों ही एक-दूसरे को धमकियां दे रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा है कि पाकिस्तान में आतंकवाद का खात्मा करने के लिए अमेरिका ऑपरेशन ओसामा अभियान दोहराने में नहीं चूकेगा। एक इंटरव्यू के दौरान ओबामा ने कहा कि अपनी सुरक्षा के लिए वे पाक में दोबारा सेना भेजने से नहीं चूकेंगे। बीबीसी को दिए इंटरव्यू में ओबामा ने कहा कि वे पाकिस्तान की सप्रभुत्ता का सम्मान करते हैं लेकिन अमेरिका की सुरक्षा उनकी पहली प्राथमिकता है। वे किसी को यह इजाजत नहीं दे सकते कि उनके खिलाफ साजिश और रची जाए और इस पर अमेरिका कार्रवाई न करे। उन्होंने कहा कि अगर तालिबान का सरगना पाकिस्तान में पाया जाता है तो अमेरिकी सेना को दोबारा पाक भेजने में उन्हें कोई संकोच नहीं होगा। उन्होंने पाकिस्तान को नसीहत देते हुए कहा कि भारत के प्रति पाकिस्तान का दुराग्रह उसकी बड़ी भूल है, इसी वजह से भारत उसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा प्रतीत होता है। उन्होंने कहा कि अगर वह इस मनोवृत्ति से परे हटकर काम करे तो बहुत अच्छा होगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तान इस बात को महसूस करे कि उसके लिए सबसे बड़ा खतरा बाहर से नहीं बल्कि घर के भीतर से ही है।
दूसरी ओर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख अहमद शुजा पाशा ने अमेरिका को चेतावनी भरे स्वर में कहा कि अगर अमेरिका ने कबायली इलाकों में ड्रोन हमले नहीं रोके तो पाक इसका जवाब देगा। पाशा ने सीआईए के डिप्टी डायरेक्टर माइकल मोरेल के साथ शनिवार को हुई बैठक में यह विचार जताए। अखबार `द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' की रिपोर्ट के मुताबिक पाशा ने मोरेल से कहा, `अगर आप ड्रोन हमले नहीं रोकेंगे तो हम जवाब देने के लिए मजबूर होंगे।' पाशा ने हाल ही में पाकिस्तानी वायु सीमा में नॉटो हेलीकॉप्टरों की घुसपैठ की घटना का जिक्र करते हुए इस घटना को अमेरिका और पाकिस्तान के सैन्य सहयोग को एक झटका बताया। पाकिस्तान की यात्रा पर आए मोरेल सीआईए के ऑपरेशनल अफसरों और आईएसआई अफसरों पर आए हुए हैं।
दरअसल हमें लगता है कि अमेरिका अब पाकिस्तान की दोहरी नीति को समझ गया है। एक तरफ तो वह वार ऑन टेरर में अमेरिका का सबसे विश्वासपात्र सहयोगी बताता है और दूसरी ओर आतंकियों को पूरी सुरक्षा, ट्रेनिंग, पैसा देता है। वहीं अमेरिका को आंखें दिखाने के लिए चीन को आगे कर देता है। पाक प्रधानमंत्री गिलानी द्वारा अपनी हाल ही की चीन यात्रा के दौरान उनके द्वारा साम्यवादी देश के प्रति दिखाए गए सौहार्द ने कुछ अमेरिकी सांसदों की भृकुटियां चढ़ा दी हैं और वे पूछ रहे हैं कि चीन को अपना सबसे अच्छा मित्र बताने वाला पाकिस्तान अमेरिका से अधिक से अधिक सहायता क्यों मांग रहा है? सीनेट की विदेशी मामलों की समिति में सीनेटर जिम रिश ने कहा, `हमारे द्वारा खर्च किए गए एक डालर में से 40 सेंट उधार से आते हैं। अमेरिकी लोगों को यह समझाना कठिन है कि हम 40 सेंट उधार लेकर उसे पाकिस्तान में खर्च कर देते हैं और उसके बाद भी पाक सरकार चीन को अपना सबसे विश्वासपात्र दोस्त बताता है?'
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Wednesday, 11 May 2011

ऑपरेशन बिन लादेन की सफलता ने सीआईए के सारे पाप धोए

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 11 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
अमेरिका की खुफिया एजेंसी सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी उर्प सीआईए ने ऑपरेशन जेरोनिमो ईकेआईएस (यानि एनिमी किल्ड इन एक्शन) करके न केवल अमेरिका के सबसे खतरनाक अंडर कवर ऑपरेशन को सफल अंजाम दिया बल्कि पिछले सारे कलंक एक ही झटके में धो डाले। ओसामा बिन लादेन को पहली बात तो ढूंढना आसान नहीं था, फिर ढूंढने के बाद उसे ठिकाने लगाना वह भी एक दूसरे देश के अन्दर और भी मुश्किल था पर सीआईए ने ह्यूमन इंटेलीजेंस और इलैक्ट्रॉनिक इंटेलीजेंस के बीच जो समन्वय बनाया वह शीत युद्ध के बाद उसकी सबसे बड़ी सफलता है। सीआईए ने यह साबित कर दिया कि वह विश्व की अतिसक्षम खुफिया एजेंसियों में से एक है। 11 सितम्बर, 2001 के बाद से ही इस एजेंसी की क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगाए जा रहे थे कि विश्व के सर्वाधिक समृद्ध और शक्तिशाली देश के मुंह पर करारा तमाचा रसीद करने वाले ओसामा का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाई। जाने-माने विशेषज्ञों को लगने लगा था कि सीआईए भी दुनिया की अन्य खुफिया एजेंसियों की तरह नौकरशाहों और लालफीताशाही की शिकार हो गई है और यह भी कि उसकी क्षमता का प्रचार ज्यादा है, जिसमें किवंदतियां अधिक और असलियत कम है पर ऑपरेशन जेरोनिमो (ओसामा अभियान का सांकेतिक कूटनाम) ने न केवल अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, सीआईए के निदेशक लियोन पनेटा, सीआईए और अमेरिकी खुफिया तंत्र की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाए हैं बल्कि आज की तारीख में खुफिया जानकारी के एकत्रीकरण और विश्लेषण के बारे में कुछ कीमती सबक भी मुहैया करवाए हैं।
सीआईए के लिए यह जानकारी काफी महत्वपूर्ण साबित हुई कि लादेन अलकायदा के अभियान को संदेश वाहकों के जरिये चला रहा है। इनमें से दो अभियान चालक अमेरिका की गिरफ्त में आ चुके थे। वर्ष 2004 में अलकायदा के एक कार्यकता की गिरफ्तारी से ओसामा के संदेश वाहक अबू अहमद अल कुवैती की पहचान हुई। कुवैतों उस फराज-उल-लिबी का सहयोगी था, जिसने अलकायदा के अभियान संचालक और 9/11 के सूत्रदार खालिद शेख मोहम्मद की जगह ली थी। वर्ष 2005 में लिबी को पकड़े जाने के बाद इस बात की पुष्टि हो गई कि कुवैती बिन लादेन का तभी से संदेश वाहक बना हुआ था। गौरतलब है कि इंटेलीजेंस का यह महत्वपूर्ण टुकड़ा गिरफ्तारशुदा लोगों से की गई पूछताछ से उभरा है। एक बार जब कुवैती की पहचान हो गई तो अगला सुराग सिग्नल इंटेलीजेंस के जरिये तब मिला जब सीआईए ने कुवैती और एक अन्य व्यक्ति के बीच टेलीफोन पर हो रही बातचीत को इंटरसेप्ट किया। इससे कुवैती को खोजने में मदद मिली, जिसका वाहन एबटाबाद के उस संदिग्ध परिसर में पाया गया। हवाई निगरानी के जरिये उस इमारत पर लगातार नजर रखी गई। अमेरिकी विशेषज्ञों ने सारे इंटेलीजेंस को अच्छी तरह परखते हुए परिसर में ओसामा की मौजूदगी की तार्पिक संभावनाओं की गहन जांच की। बाद की कहानी तो सबको मालूम ही है। पूरे प्रकरण से साफ है सीआईए ने ह्यूमन और इलैक्ट्रॉनिक इंटेलीजेंस दोनों का इस्तेमाल किया और अमेरिका के अब तक के सबसे सफल और कठिन ऑपरेशन को अंजाम दिया। भारत की खुफिया एजेंसियों को इससे कई सबक मिलते हैं। अगर वह लेना चाहे तो?

Sunday, 8 May 2011

लादेन का खात्मा करने वाले गुमनाम नेवी सील्स

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 07 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
अमेरिका के प्रतिष्ठित नेवी सील दस्ते जिसने दुनिया के मोस्ट वांटेड टेरेरिस्ट ओसामा बिन लादेन को मार गिराया, में कौन-कौन शामिल थे, उनके नाम क्या थे, यह शायद ही कभी पता चले। यह गुमनाम सीलों आज अमेरिका सहित पूरी सभ्य दुनिया के हीरो हैं पर इनकी ट्रेनिंग देखिए, इनके बारे में कोई व्यक्तिगत डीटेल जैसे कि नाम, पता कभी नहीं दिया जाएगा। बस इन्हें टीम-6 के नाम से ही पुकारा जाएगा। बिन लादेन ऑपरेशन में कुल 79 सैनिक थे। इनमें से लगभग 12 नेवी सील एबटाबाद की उस हवेली में घुसे जहां बिन लादेन रह रहा था। निश्चित रूप से यह अमेरिकी सेना में सबसे घातक जत्था है। इनकी ट्रेनिंग इतनी सख्त होती है कि मुश्किल से 80 प्रतिशत ही पूरी कर पाते हैं। यह समुद्र, जमीन और आसमान तीनों पर हमला करने के लिए ट्रेंड होते हैं। ऑपरेशन बिन लादेन के लिए इन सीलों ने एक अत्याधुनिक हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल किया। इस प्रकार का हेलीकॉप्टर पहले कभी नहीं देखा गया है। इसके बारे में जानकारी तब मिली जब विशेषज्ञों को एबटाबाद ऑपरेशन के दौरान तबाह हुए हेलीकॉप्टर के मलबे के निरीक्षण से मिली। इस ऑपरेशन के दौरान अमेरिकी दस्ते नेवी सील्स का एक हेलीकॉप्टर खराब होकर गिर गया था और ऑपरेशन की समाप्ति के बाद सील्स ने उसको तबाह खुद ही कर दिया था ताकि उसके अन्दर कम्प्यूटर पर डाटा इत्यादि सूचनाएं बाहर न आ सकें और न ही हेलीकॉप्टर के अन्दर क्या-क्या यंत्र लगे हैं, इसकी भी जानकारी बाहर आए। इस हेलीकॉप्टर का नाम यूएम-60 ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर है। इसमें कई बदलाव किए गए हैं ताकि उसकी आवाज कम से कम हो जाए और राडार भी इसे नहीं पकड़ सके। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के एक वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारी ने यह स्वीकार किया कि राडार ने तो हेलीकॉप्टर को न केवल पकड़ ही सका बल्कि अफगानिस्तान से पाकिस्तान के अन्दर आते वक्त ही उनको देखा गया।
ओसामा बिन लादेन के खात्मे के लिए अमेरिका के जिस शख्स ने सबसे ज्यादा मेहनत की वह अमेरिकी सरकार में आतंकियों का शिकार करने में सर्वाधिक अनुभव रखने वाले अधिकारियों में से एक वाइस एडमिरल विलियम एच. मकरैवन हैं। जब रविवार को अमेरिकी हेलीकॉप्टर लादेन के खात्मे के लिए पाकिस्तानी सीमा में घुसे थे, उस वक्त अफगानिस्तान के बगराम एयर फील्ड स्थित ज्वाइंट ऑपरेशन सेंटर की कमान टेक्सास से वाइस एडमिरल मवरैवन ही सम्भाल रहे थे। इन्होंने ही दो माह पहले ही ओसामा बिन लादेन मिशन के लिए नेवी सील्स की विशेष यूनिट बनाई थी। उन्होंने इस अतिगोपनीय अभियान के लिए हफ्तेभर गहन ट्रेनिंग दी। अभियान के दो ही नतीजे होते सफल होता तो अलकायदा का सफाया और विफल होता तो पाकिस्तान के साथ अमेरिकी गठबंधन खतरे में पड़ जाता। जब पता चला कि एबटाबाद में बिन लादेन का घर ऊंची-ऊंची दीवारों से घिरा है और अमेरिकी राष्ट्रपति ने उसमें घुसने की इजाजत दे दी तो सीआईए प्रमुख लियोन पेनेटा ने यह काम मवरैवन को सौंपा। वाइस एडमिरल मवरैवन किसी भी मिशन की सफलता के लिए छह मुख्य सूत्र मानते हैं अचरज में डालना, गति, सुरक्षा, सरलता, उद्देश्य और दोहराव। ओसामा अभियान की जोखिम को देखते हुए उन्होंने इसमें एक और सूत्र जोड़ा शुद्धता या सूक्षमता। उनके द्वारा उच्च मानदंडों को महत्व देना ही मिशन ओसामा की सफलता का कारण बना।

Thursday, 5 May 2011

क्या जवाहिरी और मुल्ला उमर भी पाक सेना के संरक्षण में हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 05 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र

अमेरिका ने पाकिस्तान के इस दावे को मानने से इंकार कर दिया है कि वह अपनी धरती पर ओसामा बिन लादेन की मौजूदगी से अनजान था। अमेरिका के डिप्टी नेशनल सिक्यूरिटी एडवाइजर जॉन ब्रेनन ने मंगलवार को कहा कि लादेन जिस देश में लम्बे समय से छुपा था, वहां उसका कोई सपोर्ट सिस्टम ने हो, यह बात कुछ हजम नहीं होती। मैं यह आंकलन नहीं लगाना चाहता कि सपोर्ट सिस्टम किस तरह का हो सकता है, लेकिन अमेरिका मानता है कि वह पाकिस्तान  में छह साल से ज्यादा समय से रह रहा था। लादेन का पाकिस्तान की राजधानी के इतने नजदीक पाया जाना सवाल खड़ा करता है। सीआईए प्रमुख  लियोन पैनेटा ने साफ कहा कि अमेरिकी अधिकारियों को शक था कि पाकिस्तान के साथ काम करने से ऑपरेशन को लीक कर देते। अमेरिका के प्रमुख सांसदों ने पाकिस्तान पर अमेरिका से डबल गेम खेलने का आरोप लगाया है और उन्होंने पाक के लिए अमेरिकी सहायता पर कटौती चाही है। सीनेटर सूसन कालिंस ने कहा कि इस्लामाबाद से सिर्प 120 किलोमीटर दूर लादेन का मारा जाना यह दिखाता है कि पाक हमारा सुनिश्चित सहयोगी नहीं है। उधर पाकिस्तान का कहना है कि लादेन के खिलाफ अमेरिकी ऑपरेशन हमारी जानकारी के बिना अवैध था। उसका यह भी कहना है कि लादेन के खिलाफ ऑपरेशन में सफलता हमारे सहयोग से मिली। मंगलवार रात को जारी पाक सरकार के बयान में कहा गया है कि एबटाबाद और आसपास का इलाका खुफिया एजेंसियों की नजरों में 2003 से था, तभी 2004 में अलकायदा का अहम टारगेट पकड़ा गया। लादेन के परिसर के बारे में आईएसआई ने 2009 में सीआईए को सूचना दी थी। यह बात अलग है कि सीआईए की टेक्नोलॉजी एडवांस थी सो उसने हमसे मिले सुरागों के आधार पर लादेन तक पहुंचने में सफलता पाई। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय का कहना है कि सरकार को अमेरिकी ऑपरेशन की जानकारी नहीं थी। अमेरिकी हेलीकॉप्टर पाकिस्तानी रॉडार की नजरों से बचकर पाकिस्तानी एयरस्पेस में आए थे। सूचना मिलने पर पाकिस्तानी जेटों ने भी उड़ान भरी थी। पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने कहा है कि रविवार को ऑपरेशन में पाक शामिल नहीं था, लेकिन उसके सहयोग से ही लादेन का खात्मा हो सका। उन्होंने कहा कि लादेन की मौजूदगी का पाक अधिकारियों को पता नहीं था। अमेरिका में पाक के राजदूत हुसैन हक्कानी ने माना है कि हमारे देश में लादेन का सपोर्ट सिस्टम था, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार ने लादेन को बचाने में कोई भूमिका नहीं निभाई थी।
लादेन के पाकिस्तान में ही छुपे होने के बाद यह बात भी साफ हो गई है कि अलकायदा की दूसरी पंक्ति के नेता अल जवाहिरी और तालिबानी नेता मुल्ला उमर भी पाकिस्तानी सेना की शरण में छिपे हैं। ओसामा के मारे जाने के बाद पाकिस्तान पर अब इन नेताओं को भी जिन्दा या मुर्दा पकड़ने का अमेरिकी दबाव बढ़ेगा। इन नेताओं की गिरफ्तारी या मौत के बाद ही आतंकवाद की रीढ़ तोड़ी जा सकती है। इसके साथ ही अफगानिस्तान में अमेरिकी नेतृत्व वाली अंतर्राष्ट्रीय सेना का मुकाबला कर रहे तालिबान लड़ाकों को भी पाकिस्तानी सेना की मदद बन्द करवानी होगी। ओसामा के मारे जाने के बाद अब आतंकवाद और पाकिस्तानी सांठगांठ पूरी तरह उजागर हो गई। भारत यह बात वर्षों से कहता आ रहा है पर अमेरिका की दोहरी नीति के कारण अमेरिकनों को समझ नहीं आई।

Tuesday, 19 April 2011

जनरल कयानी का अमेरिका को अल्टीमेटम

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 19 अप्रैल 201
-अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान और अमेरिका के आपसी रिश्तों में एक बार थोड़ा तनाव देखा जा रहा है। दरअसल पाकिस्तान अपने उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र में अमेरिकी गुप्तचरों और ड्रोन हमलों से परेशान है। घटना से नाराज पाकिस्तान ने इसकी बाकायदा नाराजगी अमेरिकी राजदूत से भी की है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख अशफाक कयानी द्वारा हमले को देश के नागरिकों पर आक्रामण की संज्ञा देने के बाद अमेरिका से माफी मांगने और स्पष्टीकरण देने की मांग कर डाली है। कयानी ने कहा कि इस तरह की घटनाओं  को किसी भी लिहाज से अनुचित और किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं की जा सकती। उन्होंने हमलों को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताते हुए कहा कि शांतिपूर्ण नागरिकों की जिगरा (परिषद) को लोगों की जान की परवाह किए बगैर गैर-जिम्मेदाराना और संवेदनशील तरीके से निशाना बनाया जा रहा है।
कयानी ने कहा कि इस तरह की हिंसक घटनाएं आतंकवाद को खत्म करने के लक्ष्य से हमें काफी दूर ले जाएगी। जनरल कयानी ने अपने यहां सक्रिय सीआईए एजेंटों और स्पेशल फोर्स के लोगों की भारी कटौती करने की भी मांग की है। अपने अशांत उत्तर-पश्चिम इलाके में ड्रोन हमलों को रोकने की मांग करके कयानी ने इस बात का संकेत दिया है कि दोनों देशों में खुफिया सहयोग लगभग चरमरा गया है। न्यूयार्प टाइम्स के अनुसार पाकिस्तान द्वारा सीआईए एजेंट रेमंड डेविस को गिरफ्तार करने के बाद से ही दोनों देशों के राजनयिक संबंध में खटास आ गई थी और पाक ने अब सीआईए एजेंटों में कटौती की जो मांग की है, यह उसकी का नतीजा है। आश्चर्य की बात यह है कि पाकिस्तान की यह मांग गिलानी सरकार की ओर से नहीं बल्कि सीधे सेना प्रमुख अशफाक परवेज कयानी की ओर से की गई है। पाकिस्तानी मांग तब सामने आई जब आईएसआई चीफ लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शुजा पाशा की सीआईए डायरेक्टर लियोने पेटा और ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ के चेयरमैन एडमिरल माइक मुलेन से चार घंटे तक बातचीत हुई। सीआईए प्रवक्ता ने भले ही इसके बाद बयान दिया हो कि दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों के बीच सहयोग मजबूती से चल रहा है। लेकिन इस मुलाकातके बाद पाशा ने अचानक अपने दौरे में कटौती कर दी और पाकिस्तान लौट गए। अमेरिकी और पाकिस्तानी अधिकारियों ने इसका कोई कारण नहीं बताया।
पाकिस्तानी अधिकारियों के हवाले से न्यूयार्प टाइम्स ने खबर दी है कि कयानी ने अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशन फौजियों की संख्या में 25-40 फीसदी कटौती की मांग की है। पाक अधिकारियों के अनुसार 335 अमेरिकी एजेंटों और विशेष फौजियों को वापस बुलाने को कहा गया है। यह स्पष्ट नहीं है कि यदि इतनी कटौती की गई तो पाकिस्तान में कितने अमेरिकी एजेंट और फौजी रह जाएंगे, क्योंकि इसका कभी खुलासा किया ही नहीं गया कि पाकिस्तान में कितने अमेरिकी एजेंट और स्पेशल फोर्स तैनात है? बहरहाल, अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि यदि यह कटौती की गई तो तालिबान और अलकायदा के खिलाफ लड़ाई कमजोर पड़ जाएगी।