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Wednesday, 4 July 2012

तालिबान, अलकायदा से भी बड़ा खतरा भारत!


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

Published on 4 July 2012
अनिल नरेन्द्र
न्यू रिसर्च सेंटर के ग्लोबल एटीट्यूड्स प्रजेक्ट ने पाकिस्तान में एक सर्वेक्षण किया है। सव्रेक्षण में बताया गया है कि पाकिस्तान में 10 में से केवल पांच नागरिक ही भारत को अपने लिए फायदेमंद मानते हैं वहीं बहुमत यानी हर 10 व्यक्तियों में से छह पाकिस्तानी भारत को अपने देश के लिए तालिबान या अलकायदा से भी बड़ा खतरा मानते हैं। इसमें यह भी पता चला है कि साल 2009 में जब पहली बार पाकिस्तानियों से उनके सबसे बड़े खतरे का प्राश्न पूछा गया था तब से वे इसके लिए लगातार भारत का नाम लेते रहे हैं।
तब से भारत से डरने वालों की संख्या 11 बिन्दु से बढ़कर 59 फीसदी हो गईं है। दूसरी ओर तालिबान को सबसे बड़ा खतरा बताने वालों का प्रातिशत नौ बिन्दु कम हो गया है। सव्रेक्षण के मुताबिक भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जहां पाकिस्तान के प्राति नकारात्मक दृष्टिकोण है। जिन सात देशों में यह प्राश्न पूछा गया, उनमें से छह में पाकिस्तान के प्राति नकारात्मक रुख देखा गया। चीन, जापान और मुस्लिम बहुल मिरत्र, जार्डन व ट्यूनीशिया में यह सवाल पूछा गया।
जनरल जिया उल हक ने मुल्क की शिक्षा में जो जहर भरा, उसे बाद की सरकारों ने दूर नहीं किया। कराची में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि यह शहर हिन्दुओं, पारसियों और ईंसाइयों का साझा शहर था। वे सभी अब चले गए हैं। हदू भाईं ने इस स्थिति के लिए मदरसों को आंशिक रूप से जिम्मेदार ठहराया और अफसोस प्राकट किया कि मुशर्रफ के शासनकाल के दौरान सुधार के लिए शुरू किए गए प्रायासों को ज्यादा दूर नहीं ले जाया गया। हदू भाईं की बातों पर हमें आार्यं नहीं हुआ। यूं ही नहीं पाकिस्तानी भारत से नफरत करते।
हमें इस सव्रेक्षण के नतीजों पर आर्यं नहीं हुआ। पाकिस्तान में छोटे बच्चों को ही भारत से नफरत करनी सिखाईं जाती है। इसकी पुष्टि एक पाकिस्तान के नामी विद्वान ने भी की है। पाकिस्तान के नामी विद्वान ने अपने मुल्क के स्वूलों में पढ़ाईं जा रही किताबों के जरिए वुछ चौंकाने वाली बातें दुनिया के सामने रखी हैं। न्यूक्लियर साइंटिस्ट और ताजा मुद्दों पर लिखने वाले हदू भाईं ने कहा है कि पाकिस्तान के स्वूलों में बच्चों के जहन में कट्टरपंथी और भारत विरोधी विचार डाले जा रहे हैं। इससे एक ओर पाकिस्तान में कट्टरपंथ मजबूत हो रहा है वहीं दूसरी ओर भारत के प्राति नफरत बढ़ रही है। हदू भाईं ने ब्रिटेन के किग्स कॉलेज में एक सेमिनार के दौरान आतंकवाद से लड़ाईं में शिक्षा की भूमिका से जुड़े उदाहरण पेश किए। हदू भाईं ने एक प्राइमर (प्राथमिक पाठ्य पुस्तक) से वुछ तस्वीरें और पाठ्य सामग्री पेश की। इसमें उर्दू में से अल्लाह, से बन्दूक, से टकराव, ज से जेहाद, से हिजाब, से खंजर और से जुदूब पढ़ाया जाता है। परवेज ने पाक में कक्षा पांच में पढ़ाईं जाने वाली किताबों से भी वुछ उदाहरण पेश किए। इनमें हिन्दुओं और मुस्लिमों में अन्तर को समझना और पाकिस्तान की जरूरत ‘पाकिस्तान के खिलाफ भारत के नापाक इरादे और शहादत और जिहाद पर भाषण’ तैयार करने जैसे विषयों पर चर्चा शामिल है। हदू भाईं ने कहा कि बीते 60 बरसों में पाकिस्तान में बड़ा बदलाव आया है।

Wednesday, 18 April 2012

तालिबानी हमले से कांपा अफगानिस्तान

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18 April 2012
अनिल नरेन्द्र
तालिबान ने काबुल में अफगानिस्तानी संसद और कई देशों के दूतावासों पर हमला कर यह संकेत दे रहा है कि तालिबान पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो चुका है। यह हमला तालिबान की ताकत का तो अहसास कराता ही है पर साथ-साथ यह भी बताता है कि अफगानिस्तान का भविष्य अंधकार में है, तालिबान के निहायत खतरनाक इरादे हैं। ओसामा बिन लादेन की बरसी से 17 दिन पहले तालिबान ने दुनिया को चुनौती दी है। आत्मघाती हमलावरों ने रविवार को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और रूस के दूतावासों पर हमले किए। साथ ही नेशनल असेम्बली में घुसने की भी कोशिश की। इसके अलावा तीन और शहरों में भी हमले हुए। कुल 11 जगहों पर हुए हमलों में 48 लोग मारे गए हैं। इनमें 19 आतंकी भी शामिल हैं। आतंकियों ने राकेट, ग्रेनेड और मशीनगनों से फायरिंग की। दिन के तीन बजे शुरू हुई गोलीबारी कुछ जगहों पर देर शाम तक चलती रही। 2001 के बाद से इसे काबुल पर अब तक का सबसे भीषण हमला बताया जा रहा है। तालिबान प्रवक्ता जबीउल्ला मुजाहिद ने हमलों की जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि यह महज शुरुआत है। हमले की तैयारी एक माह से चल रही थी। आने वाले समय में और हमले होंगे। इस हमले के पीछे हक्कानी गुट का हाथ होने की आशंका जताई जा रही है। 1994 से सक्रिय इस समूह का संचालन पाकिस्तान से होता है। अमेरिका कई बार पाक को हक्कानी पर लगाम लगाने की हिदायत दे चुका है। गुट की कमान मौलवी जियाउद्दीन हक्कानी और उसके बेटे सिराजुद्दीन हक्कानी के हाथों में है। संगठन तालिबान से मिला हुआ है। हक्कानी गुट पर इसलिए शक जाता है क्योंकि विगत सितम्बर में अमेरिकी दूतावास को इसी ने निशाना बनाया था। दरअसल पिछले दिनों अमेरिकी अधिकारियों की तालिबान के साथ बातचीत के पटरी से उतर जाने के बाद से ही अफगानिस्तान में आतंकवादी हिंसा की आशंका जताई जा रही थी। 2014 में अमेरिका और उसके सहयोगी अफगानिस्तान से कूच करने की तैयारी में हैं। यह चिन्ता का विषय है कि लगभग 1,25,000 नाटो सैनिकों की उपस्थिति के बावजूद हामिद करजई सरकार राजधानी काबुल की सुरक्षा में भी सक्षम नहीं दिखती। जाहिर है कि तालिबान का मनोबल इसलिए भी बढ़ा हुआ है, क्योंकि उन्हें मालूम है कि अमेरिका और उसके सहयोगी अब अफगानिस्तान में चन्द दिनों के ही मेहमान हैं। जाते-जाते अमेरिकी सैनिक भी ऐसी हरकतें कर रहे हैं जिससे आग और ज्यादा भड़के। कुरान को जलाना, एक अमेरिकी सैनिक द्वारा 16 निर्दोष अफगानियों को मौत के घाट उतारने से भी तालिबान को बल और जन समर्थक बढ़ा है। पिछले ही दिनों में हामिद करजई ने विदेशी सैनिकों को ग्रामीण इलाकों को छोड़ शहरी क्षेत्र में मुख्य कैम्पों में लौट जाने को कहा था। काबुल की मांग यह भी है कि अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से वापसी की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर दें। समझ नहीं आता कि करजई किस बिनाह पर ऐसा कह रहे हैं। अफगानिस्तान के मौजूदा परिदृश्य से हमें भी चिंतित होना चाहिए। यह राहतकारी है कि ताजा कार्रवाई से भारतीय दूतावास अछूता रहा, लेकिन यह सही समय है जब भारत सरकार इस पर गम्भीरता से विचार करे कि अफगानिस्तान के पुनरुत्थान में वह जो अरबों रुपये खर्च कर रही है उससे भारत को क्या हाथ लगने वाला है?
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Saturday, 17 March 2012

...और अब अमेरिकी सैनिक ने अफगानिस्तान में किया कत्लेआम

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17 March 2012
अनिल नरेन्द्र
अफगानिस्तान में लगता है कि अमेरिकी सैनिक अपना आपा खोते जा रहे हैं, लगता है कि इन सैनिकों को अब न तो अनुशासन में रहने की परवाह है और न ही दुनियादारी की। कुछ ही दिन पहले पवित्र कुरान शरीफ को जलाने की घटना हुई थी और अब निर्दोष अफगानियों के कत्लेआम की घटना सामने आई है। अफगानिस्तान के दक्षिणी प्रांत कंधार में गत रविवार तड़के एक अमेरिकी सैनिक गहरी नींद में सो रहे लोगों पर काल बनकर टूट पड़ा। उसने अंधाधुंध फायरिंग करते हुए पंचवाई जिले के नजीबन और अलकोजी गांव में घरों में घुसकर 16 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। कंधार गवर्नर के प्रवक्ता अहमद जावेद फैसल के अनुसार रविवार तड़के करीब 3 बजे एक अमेरिकी सैनिक नाटो के सैन्य ठिकाने से बाहर निकला और पास के गांवों नजीबन और अलकोजी में गहरी नींद में सो रहे अफगानियों पर उनके घरों में घुसकर अंधाधुंध गोलियां चलाने लगा। इस घटना में 9 बच्चे और 3 महिलाओं सहित 16 लोगों की मौत हो गई। नजीबन गांव के हाजी समद के मुताबिक फायरिंग में उसके परिवार के 11 लोगों की इस फायरिंग में मौत हो गई। इस हत्याकांड से एक नया बवाल खड़ा हो गया। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने अफगानी समकक्ष हामिद करजई से फोन पर बात कर कंधार की इस वारदात की जांच तेजी से कराने का इरादा जाहिर किया है। अमेरिकी रक्षा मंत्री लियोन पेनेटा ने कहा कि अफगानिस्तान में 16 नागरिकों की हत्या करने वाले सैनिक को यदि दोषी ठहराया जाता है तो उसे मृत्युदंड का सामना करना पड़ सकता है। पेनेटा ने स्पष्ट किया कि इस सैनिक ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया है। उन्होंने इसे छिटपुट घटना करार देते हुए काफी दुःखद बताया। अभी तक इस सैनिक का नाम सार्वजनिक नहीं किया गया है। इस शिविर में सैनिकों द्वारा हिंसा का पुराना इतिहास भी रहा है। पेनेटा ने कहा कि `युद्ध नरक है' लेकिन इस बात से इंकार किया कि यह घटना पिछले 10 साल से चले आ रहे संघर्ष के कारण अमेरिकी सैनिकों का धैर्य टूटने का संकेत है। उधर अफगान तालिबान ने मंगलवार को धमकी दी कि इस घटना का बदला लेने के लिए वे अमेरिकी सैनिकों के सिर कलम कर देंगे। तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने एक ईमेल के माध्यम से अपने संदेश में कहा, `हम अमेरिकी जानवरों को बता देना चाहते हैं कि मुजाहिद्दीन उनसे बदला लेकर रहेंगे और अल्लाह के रहम-ओ-करम से हम तुम्हारे बर्बर सैनिकों का सिर धड़ से अलग कर देंगे।' 16 ग्रामीणों की हत्या पर अफसोस जताने गए एक अफगान प्रतिनिधिमंडल जिसमें करजई का भाई भी शामिल था, तालिबान के हमले का शिकार हो गया। इस प्रतिनिधिमंडल की सुरक्षा कर रहे एक अफगान सैनिक को मौत के घाट उतार दिया गया। हमले में एक और सैन्य अधिवक्ता घायल हो गया। इस घटना का दुःखद पहलू यह भी है कि इस प्रकार की घटना से अमेरिका उलटा तालिबान को बल दे रहा है। कुरान जलाने और 16 निर्दोषों की हत्या की घटना से ओबामा प्रशासन की अफगानिस्तान से 2012 के लिए बनाई गई वापसी योजना संकट में पड़ेगी। अमेरिकी सैन्य और प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि इस प्रकार की घटनाएं तालिबान के भीतर कट्टरपंथियों को मजबूत करेंगी जो ऐसे रक्षा बल के साथ बातचीत का विरोध कर रहे हैं जो देश छोड़ रहा है। कुरान जलाए जाने के बाद अब इस घटना ने ओबामा प्रशासन के सारे प्रयासों पर पानी फेर दिया है। इसकी जितनी निन्दा की जाए कम है।
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Sunday, 26 February 2012

अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों का निहायत नीच और घिनौना कृत्य

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 26th February  2012
अनिल नरेन्द्र
अफगानिस्तान में तैनात अमेरिकी सैनिकों ने एक ऐसा कृत्य किया है जिससे सारी दुनिया का सिर शर्म से झुक गया है। इस कृत्य की जितनी भी निन्दा की जाए, कम है। अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के बड़गाम एयरबेस पर इस्लाम की पवित्र पुस्तक कुरान की प्रतियां जलाए जाने की रिपोर्ट आई है। इस अमानवीय कृत्य से सारी दुनिया में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। अफगानिस्तान में तो रिपोर्ट आने के बाद से प्रदर्शनों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा। इस घटना को लेकर अब तक 12 लोगों की मौत हो चुकी है। अफगानिस्तान के गृह मंत्रालय ने बुधवार को हुई मौतों में से कम से कम एक के लिए विदेशी सुरक्षा बलों को जिम्मेदार ठहराया है क्योंकि काबुल में अमेरिकी सैन्य शिविर ने प्रदर्शनकारियों पर हमला बोला था। इसके अलावा स्थानीय अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि ज्यादातर मौतें पुलिस के साथ हुई झड़पों के कारण हुई हैं। नाटो के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल कारस्टेन जेकाबंसन ने कहा कि यह अनभिज्ञता में किया गया कार्य था लेकिन इस गलती के गम्भीर परिणाम हैं। एक अमेरिकी अधिकारी ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि कुरान की उन प्रतियों को बड़गाम की जेल में बन्द कैदियों से लिया गया था क्योंकि जेल अधिकारियों को शक था कि कैदी इस पवित्र पुस्तक का उपयोग एक-दूसरे को संदेश भेजने के लिए कर रहे थे। अमेरिका विरोधी आग को हवा देते हुए तालिबान आतंकियों ने अफगान नागरिकों से अपील की है कि वह केवल प्रदर्शनों तक सीमित न रहें। तालिबान ने अपनी अपील में कहा है कि आपको सैन्य शिविरों पर हमला करना है, उनके सैन्य काफिलों पर हमले कीजिए, उनकी हत्या कीजिए, उन्हें बंधक बनाएं, मारें और उन्हें सबक सिखाएं ताकि वह दोबारा पवित्र कुरान का अपमान करने की हिम्मत भी न करें। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई जो पहले से ही बहुत कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं, इस घटना को लेकर बहुत ज्यादा परेशान हैं। हामिद करजई ने बृहस्पतिवार को बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिकी शिविर में कुरान की प्रतियां जलाने की घटना के लिए माफी मांगते हुए उन्हें एक पत्र लिखा है। पत्र में ओबामा ने लिखा है कि घटना जानबूझ कर नहीं की गई थी और उन्होंने मामले की विस्तृत जांच करने के लिए कहा है। अमेरिकी राजदूत रॉयन क्रोकर की ओर से करजई को सौंपे पत्र के अनुसार सूचित घटना के लिए मैं अपना अफसोस जताना चाहता हूं। ओबामा ने आगे लिखा है कि मैं आपसे और अफगानिस्तान के लोगों से माफी मांगता हूं। हामिद करजई ने इस मुद्दे को लेकर लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करते हुए कहा है कि अमेरिकी नेतृत्व वाला नाटो सुरक्षा बल इसकी जांच कर रहा है। उन्होंने अपने देश के सुरक्षा बलों को आदेश दिया है कि वह हिंसा से बचें और लोगों के जीवन और सार्वजनिक सम्पत्ति की सुरक्षा करें पर आग तेजी से फैल रही है। इसकी सारे इस्लामिक मुल्कों में प्रतिक्रिया हो सकती है। पहले से ही निशाने पर अमेरिका से सारी दुनिया के मुसलमानों के गुस्से में इजाफा होगा। यह दूसरी ऐसी घिनौनी घटना है। पिछले साल एक अमेरिकी पादरी ने फ्लोरिडा में भी कुरान को जलाया था। हम इसकी सख्त से सख्त शब्दों में निन्दा करते हैं और मांग करते हैं कि कसूरवारों को सजा मिले।
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Friday, 2 December 2011

पाक-अमेरिका के इस स्टैंड ऑफ में अंतत अमेरिका को झुकना पड़ेगा


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2nd December 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान और अमेरिका के आपसी रिश्ते बद से बदतर होते जा रहे हैं। ताजा टकराव नाटो के सैनिकों द्वारा पाकिस्तान के कबायली इलाके में स्थित दो चौकियों पर 26नवम्बर को तड़के किए गए एक हवाई हमले को लेकर है। इस हमले में 24पाकिस्तानी सैनिकों की मौत हो गई थी। दरअसल पाकिस्तान को सबसे बड़ी शिकायत यह है कि अमेरिका उसकी सरजमीं में घुसकर उस पर हमला करता है। अब तक तो आतंकवादी ठिकानों या आतंकियों पर पाकिस्तान में घुसकर हमले होते थे पर अबकी बारी तो अमेरिका ने नाटो के माध्यम से पाकिस्तानी सेना पर हमला किया है। ओसामा बिन लादेन को भी पाकिस्तान के अन्दर घुसकर एबटाबाद में ठिकाने लगाया था। इसी हमले के बाद से दोनों देशों के रिश्ते बिगड़ते गए। अब तो हद हो गई। पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र से नाटो के हवाई हमले पर अपना विरोध दर्ज कराने और निन्दा करने के लिए औपचारिक रूप से सम्पर्प किया है। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के राजदूत अब्दुल्ला हुसैन हारुन ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून को एक पत्र लिखकर सूचित किया है कि    26नवम्बर को नाटो द्वारा पाकिस्तान की सीमा चौकियों पर किए गए हमले की वजह से 24पाक सैनिक और अधिकारी शहीद हो गए और 13सैन्यकर्मी घायल हुए हैं। हारुन ने महासचिव को पाक कैबिनेट की रक्षा समिति द्वारा जारी बयान को भी भेजा है। बयान में कहा गया कि पाक इस हमले की कड़ाई से निन्दा करता है और इसे पाक अपनी सप्रभुता का उल्लंघन मानता है। पाकिस्तान सरकार ने यह भी फैसला किया है कि जर्मनी के बान शहर में आगामी पांच दिसम्बर को होने वाले अहम शिखर सम्मेलन का बायकाट करेगा। पाकिस्तान सेना ने नाटो के हमले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह हमला बिना किसी उकसावे के हुआ जो नाटो की निरंकुश आक्रमता को दर्शाता है। वरिष्ठ सैन्य अधिकारी मेजर जनरल अशफाक नदीम ने रावलपिण्डी स्थित सेना मुख्यालय में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि पाक-अफगान सीमा पर पाक सेना की चौकियों की पूरी जानकारी नाटो सेना को दी गई थी और नक्शे के माध्यम से भी समझाया गया था। वहीं जनरल नदीम ने कहा कि जिस इलाके में नाटो विमानों ने हमला किया, पाक सेना ने पहले ही उसको चरमपंथियों से सुरक्षित कर लिया था और वहां से चरमपंथियों की कोई घुसैपठ नहीं हो रही थी। उन्होंने बताया कि इससे पहले भी नाटो सेना ने 2008, 2009 और 2011 में हमले किए थे जिनमें 14 सैनिक मारे गए थे और 13 के करीब घायल हो गए थे। उस समय जांच की घोषणा की गई थी लेकिन जांच आज तक पूरी नहीं हुई है। मंत्रिमंडल की रक्षा समिति की बैठक के बाद पाक सरकार ने कहा कि अमेरिका को शम्सी हवाई अड्डे को 15 दिन के अन्दर खाली करना होगा, क्योंकि अमेरिका यहां से ही ड्रोन हमले करता है। अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने पाकिस्तान से कहा है कि वह अफगानिस्तान के भविष्य पर चर्चा करने के लिए बान सम्मेलन में भाग न लेने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करे। यही बात अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने भी की है। पाकिस्तान के बने नए हमदर्द देश चीन ने भी सोमवार को कहा कि पाकिस्तान की सीमावर्ती चौकियों पर नाटो हमले से उसे गहरा झटका लगा है। चीन ने नाटो से कहा कि वह पाकिस्तान की सप्रभुता का सम्मान करे, साथ ही उसने घटना की जांच की मांग की।
पूरे प्रकरण में पाकिस्तान का पलड़ा भारी है। अफगानिस्तान में इस समय नाटो के सवा लाख से भी ज्यादा सैनिकों के लिए सैनिक साजोसामान और पेट्रोल सप्लाई पाकिस्तान के जरिये होता है। इसे रोके जाने से अमेरिका के लिए भारी मुश्किलें पैदा होंगी। पाकिस्तान का सप्लाई रास्ता अमेरिका के लिए कई बरसों से सिरदर्द बना हुआ है क्योंकि अक्सर इस रास्ते से जाने वाले ट्रकों को तालिबान लड़ाके जला देते हैं। अब तक पाकिस्तानी सेना के संरक्षण में कराची बन्दरगाह से होकर हथियारों और पेट्रोल ले जाने वाले इन ट्रकों का काबुल तक पहुंचना मुमकिन हो पाता था लेकिन अब पाकिस्तानी सेना ने यदि सुरक्षा हटा ली तो अमेरिका के लिए अफगानिस्तान अपना सैनिक साजोसामान पहुंचाना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए हर हाल में अमेरिका को अफगानिस्तान में सैनिक साजोसामान भेजने के लिए पाकिस्तान पर निर्भर रहना पड़ेगा। अब इसे दबाव कहें या ब्लैकमेल कहें, पाकिस्तान का पलड़ा भारी है और अंतत अमेरिका को पाकिस्तान को पटाने के लिए कोई रास्ता निकालना होगा। हां, एक और विकल्प भी है कि अमेरिका पाकिस्तान पर भी जंग का ऐलान कर दे। उस सूरत में पूरे क्षेत्र में तनाव हो जाएगा। अमेरिका को याद रखना चाहिए कि पाकिस्तान एक परमाणु सम्पन्न देश है और उसके लिए अफगानिस्तान में नाटो सैनिक आसान टारगेट हैं। फिर अमेरिका से यह प्रश्न भी किया जा सकता है कि वह किसी दूसरे देश के अन्दर घुसकर कैसे हमला कर सकते हैं? उन्हें यह अधिकार किसने दिया है कि जब चाहे किसी देश की सप्रभुता को ताक पर रखकर हमला कर दें? पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार ने कहा है कि यह अमेरिका के साथ रिश्तों की समीक्षा करने का सही वक्त है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी सैन्य चौकियों पर हुए हवाई हमले अंतर्राष्ट्रीय कानून का खुला उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि अमेरिका से 15 दिन के भीतर शम्सी एयरबेस खाली करने के लिए कहा गया है। खार ने कहा कि हमें मदद नहीं हम प्रतिष्ठा और सम्मान के साथ जीना चाहते हैं।
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Thursday, 20 October 2011

US spends 120 billion dollars on wars

 - Anil Narendra
US has been witnessing a series of protests against the corporate loot for last many days. The Occupy Wall Street movement has been getting worldwide support. In about 80 countries of Europe, America and Asia, thousands of people have taken to streets. Thousands of Occupy Wall Street supporters had demonstrated at the historic Time Square in New York, which led to massive traffic jam. There were scuffles between the protestors and the police. At least 88 persons have since been arrested. Of these, 24 demonstrators had forcibly entered the Citi Bank branch, whereas 45 were arrested for alleged violent protests. These people have been protesting for last 30 days against the corporate loot and financial relief package granted by the government. Thousands of people demonstrated in the Auckland city in New Zealand, whereas two thousand campaigners held demonstration in Sydney in Australia. Besides, a large number of people in Tokyo, Taipei, Manila also supported the call for the movement on Face Book and recorded their protests against economic injustice. Participating in such a demonstration in Australia, Josh Lee said, "we are not for change of government, but most of us want change in the system. We want to change the system where money dominates the politics. Large business houses, mining companies are controlling the politics. All this must end.
The US Secretary of Defence, Leon Panetta had difficulty in defending himself at the powerful Senate Committee on Defence, when other members of the Committee cornered him and asked about the propriety of spending 120 billion annually on war, when the country is passing through a serious economic crisis? In defence, the Secretary of Defence said that the process of withdrawal of US forces from Afghanistan is likely to be completed by 2014. During the hearing on defence and Army related subjects after ten years of  9/11 terror attacks on America, the defence budget was on top of the agenda. The first 15 minutes of the meeting were the victim of slogan mongering demonstrations against the war. The Secretary of Defence said that terrorists from Pakistan, Yemen and Somalia were posing a grave threat to the country. He said that primary concern of the US is to avoid Afghanistan being once again turning into safe haven for al-Qaeda and other terrorists. He further said that in case US withdraws its forces hastily from Afghanistan and that country once again turns into a safe haven for al-Qaeda and other terrorists, then world community would make US accountable. It was made clear that any cut in the budget would lead to loss to the country. Meanwhile, addressing the Economic Club of New York, Secretary of State, Hillary Clinton asked policy makers to learn from the emerging economies of countries like India and Brazil, who have centered their foreign policy around their economies. Ms Clinton said that whenever the leadership of these countries decides on big foreign policy challenge, their first question is that how this is going to help their economy to grow. Ms Clinton was clear in her concept that in US, the foreign policy, to a large extent overshadowing the US economy and these wars are proving burdensome to America.
Anil Narendra, Daily Pratap, Vir Arjun, America, Occupy Wall Street, Times Square,Australila, Afghanistan,

Tuesday, 18 October 2011

अमेरिका प्रति वर्ष 120 अरब डालर विभिन्न युद्धों पर खर्च करता है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18th October 2011
अनिल नरेन्द्र
कारपोरेट घरानों की लूट के खिलाफ अमेरिका में पिछले कई दिनों से प्रदर्शन हो रहे हैं। आक्यूपाई वॉल स्ट्रीट नामक इस आंदोलन को विश्वव्यापी समर्थन मिलने लगा है। यूरोप, अमेरिका और एशिया में करीब 80 देशों के 950 शहरों में हजारों की तादाद में लोग सड़कों पर उतर आए हैं। आक्यूपाई वॉल स्ट्रीट आंदोलन के हजारों प्रदर्शनकारियों ने न्यूयार्प स्थित ऐतिहासिक टाइम्स स्क्वेयर पर जबरदस्त प्रदर्शन किया। इससे मेनहट्टन में यातायात बाधित हो गया और पुलिस के साथ झड़पें भी हुईं। कम से कम 88 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें से 24 लोग सिटी बैंक की एक शाखा में जबरन घुस गए थे जबकि 45 लोगों को उग्र रैली निकालने को लेकर गिरफ्तार किया। ये लोग कारपोरेट घरानों की लूट और वित्तीय राहत पैकेज के विरोध में पिछले 30 दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। न्यूजीलैंड के ऑकलैंड शहर में हजारों लोगों और आस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में लगभग दो हजार लोगों ने प्रदर्शन किया। इसके अलावा टोक्यो, ताइपे, मनीला में भी लोगों ने फेसबुक पर प्रदर्शनों के आह्वान को समर्थन देते हुए `आर्थिक अन्याय' के खिलाफ प्रदर्शन किया। आस्ट्रेलिया में हो रहे ऐसे ही एक प्रदर्शन में शामिल जोश ली ने कहा, हम केवल सरकार बदलने की बात नहीं कर रहे हैं। ज्यादातर लोग व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं। हम चाहते हैं कि जिस तरह राजनीति पर पैसा हावी है वह व्यवस्था बदले। बड़े-बड़े व्यापारिक संस्थान, खनन कम्पनियां राजनीति पर कब्जा किए बैठी हैं। यह सब समाप्त होना चाहिए।
अमेरिका की सशक्त सैन्य संसदीय समिति में रक्षा मंत्री लियोन पैनेटा के लिए उस समय अपना बचाव करना मुश्किल हो गया जब समिति के अन्य सदस्यों ने उन्हें घेरते हुए कहा कि ऐसे समय में जब देश आर्थिक संकट से जूझ रहा है तो प्रति वर्ष 120 अरब डालर सालाना विभिन्न देशों में युद्ध पर खर्च करने का क्या औचित्य है? विपक्षी रिपब्लिकन की तेज-तर्रार नेता चेली पिनग्री ने पैनेटा से सवाल किया कि जब वित्तीय घाटे के कारण देश आर्थिक संकट का सामना कर रहा है तो अमेरिका युद्धों पर अरबों डालर क्यों खर्च कर रहा है? रक्षा मंत्री ने अपना बचाव करते हुए कहा कि वर्ष 2014 तक अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की प्रक्रिया पूरी हो जाने की उम्मीद है। अमेरिका पर 9/11 के आतंकवादी हमलों के 10 वर्ष बाद रक्षा और सेना विषय पर सुनवाई के दौरान मुख्य रूप से रक्षा बजट पर चर्चा हुई बैठक के पहले 15 मिनट तक युद्ध विरोधी प्रदर्शनकारियों के नारेबाजी के कारण बैठक बाधित हुई। रक्षा मंत्री ने कहा कि पाकिस्तान, यमन और सोमालिया के आतंकवादी देश के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका का मुख्य ध्यान इस ओर है कि अफगानिस्तान अलकायदा तथा अन्य आतंकियों के लिए फिर सुरक्षित पनाह न बनने पाए। उन्होंने कहा कि यदि अमेरिका जल्दबाजी में वहां से अपनी सेनाएं हटा लेता है और ऐसी स्थिति में वह फिर से अलकायदा का ठिकाना बन जाता है तो अंतर्राष्ट्रीय जगत अमेरिका से ही सवाल पूछेगा। मतलब साफ था कि बजट कट करोगे तो नुकसान होगा। उधर इकोनॉमिक क्लब ऑफ न्यूयार्प को संबोधित करते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने देश में नीति-निर्धारकों को भारत और ब्राजील जैसे उभरती हुई अर्थव्यवस्था वाले देशों से सीख लेने को कहा जिन्होंने अर्थव्यवस्था को अपनी विदेश नीति के केंद्र में रखा। श्रीमती क्लिंटन ने कहा कि जब उनके नेता विदेश नीति से जुड़ी चुनौतियों पर कोई फैसला करते हैं तो उनका पहला सवाल यह होता है कि यह उनकी अर्थव्यवस्था के विकास से कैसे मददगार होगा। क्लिंटन का मतलब साफ था कि अमेरिका की विदेश नीति काफी हद तक अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर हावी हो रही है और यह युद्ध अमेरिका को भारी पड़ रहे हैं।
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Friday, 30 September 2011

हक्कानी नेटवर्प को लेकर पाक-अमेरिका में बढ़ती तल्खी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th September 2011
अनिल नरेन्द्र
अमेरिका के एक शीर्ष कांग्रेसी सांसद टेड पो ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सभी तरह की आर्थिक सहायता पर रोक लगाने के लिए अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में एक प्रस्ताव पेश कर दिया है। टेक्सास के इस सांसद की तरफ से पेश किया गया यह प्रस्ताव (एमआर 3013) अगर पारित हो जाता है तो पाकिस्तान को परमाणु हथियारों की सुरक्षा के लिए दी जा रही सहायता राशि के अलावा सभी तरह की सहायता राशि पर रोक लग जाएगा। टेड ने हाल ही में सदन में यह प्रस्ताव पेश करने के बाद कहा कि ऐबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के ठिकाने का पता लगने के बाद पाकिस्तान अमेरिका के लिए विश्वासघाती, धोखेबाज और खतरनाक साबित हुआ है। उन्होंने कहा कि यह तथाकथित सहयोगी अरबों डालर की अमेरिकी सहायता ले रहा है और दूसरी तरफ अमेरिकियों पर हमला करने वाले आतंकवादियों को समर्थन दे रहा है, इसलिए उसे दी जा रही सहायता रोकी जाए। अमेरिका 1948 से अब तक एक अनुमान के अनुसार 30 अरब पौंड (करीब 22 खरब 93 अरब रुपये) की सीधी मदद दे चुका है। इसकी आधी राशि (अलग से) पाक को सैन्य मदद के रूप में दी जा चुकी है। 1962 में अमेरिकी मदद की राशि सबसे ज्यादा 2.5 अरब डालर (122.42 अरब रुपये) थी। 1990 के दशक में मदद निम्नतम स्तर पर थी। राष्ट्रपति जार्ज बुश ने पाक के परमाणु कार्यक्रम के चलते मदद करनी बन्द कर दी थी। 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान और बाद में अमेरिका ने कोई मदद नहीं दी। एक समय कहा जाता था कि पाकिस्तान की सुई भी अमेरिका से आती है। अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दी जा रही आर्थिक, सैन्य मदद से साफ है कि अमेरिका के बिना पाकिस्तान कुछ नहीं। अमेरिकी मदद से ही पाकिस्तान में विकास कार्य चलते हैं। यदि यह मदद आनी बन्द हो गई तो पाकिस्तान में हर चीज ठप होने का खतरा बढ़ जाएगा।
कुछ दिनों से अमेरिका और पाकिस्तान के बीच तनाव का मुख्य कारण हक्कानी नेटवर्प को मदद को लेकर है। अमेरिका ने हक्कानी नेटवर्प के खिलाफ पाकिस्तान को सख्त कार्रवाई करने को कहा है। पेंटागन प्रवक्ता ने कहा कि पिछले एक हफ्ते से हम पाक सरकार को यह संदेश दे रहे हैं कि वो अपने क्षेत्र में मौजूद आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करे। पेंटागन प्रवक्ता जार्ज लिटिल ने कहा कि हम पाकिस्तान सरकार से उम्मीद करते हैं कि वह अफगान सीमा से सटे अपने क्षेत्र में मौजूद उन आतंकियों के खिलाफ कदम उठाए जो अफगानिस्तान में दाखिल होकर अमेरिकी तथा अफगानियों पर हमला कर रहे हैं। एक अन्य वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि पाकिस्तान हक्कानी नेटवर्प का सुरक्षित पनाहगाह है और यह गंभीर चिन्ता का विषय है। अमेरिका इस नेटवर्प के खिलाफ ठोस कार्रवाई देखना चाहता है। उल्लेखनीय है कि हक्कानी नेटवर्प मूल रूप से अफगानिस्तान के जलालुद्दीन हक्कानी के नेतृत्व में सक्रिय आतंकी संगठन है। अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमांत क्षेत्र में इसके पास 15000 सक्रिय आतंकियों की फौज है। इसके प्रमुख नेता हैंöजलालुद्दीन हक्कानी, सिराजुद्दीन हक्कानी, बदरुद्दीन हक्कानी  और नसीरुद्दीन हक्कानी। मूल रूप से इसके आत्मघाती हमले करवाना सबसे प्रभावी तरीका है। हत्या, फिरौती और हथियारों की खरीद-फरोख्त के माध्यम से धन उगाने से यह अपना नेटवर्प चलाता है। हक्कानी नेटवर्प का प्रभाव दक्षिण अफगानिस्तान के पाकतिया, पाकतिका, वारदक, लोगर और गजनी क्षेत्रों में जाता है।
पाकिस्तान ने अमेरिका पर जवाबी हमला करते हुए कहा कि अमेरिका ने ही हक्कानी नेटवर्प को खड़ा किया है। पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने दावा किया है कि अमेरिका की सीआईए ने सोवियत संघ के अफगानिस्तान में जबरन कब्जे के खिलाफ यह तालिबानी गुट बनाया था, उन्हीं से इसे प्रशिक्षित किया था। मलिक ने रविवार को इस्लामाबाद में कहा कि हक्कानी समूह का जन्म पाकिस्तान में नहीं हुआ और अमेरिका को अब उन चीजों के बारे में नहीं बोलना चाहिए जो 20 साल पहले हुई थी। मलिक ने कहा कि हक्कानी नेटवर्प अब अफगानिस्तान में सक्रिय है और जो लोग इसके विपरीत दावा कर रहे हैं उन्हें पाकिस्तान में इसकी उपस्थिति के बारे में सबूत देना चाहिए। हक्कानी नेटवर्प और आईएसआई के रिश्तों से अमेरिका और पाकिस्तान के बीच आई तल्खी के बीच अफगान तालिबान ने पहली बार पाक सरकार का पक्ष लेते हुए बयान जारी किया है कि इस मामले की आड़ लेकर अमेरिका पाकिस्तान में अराजकता पैदा कर सरकार को कमजोर करना चाहता है ताकि वह अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर हो। बयान में कहा गया है कि अमेरिका का प्रयास पाकिस्तानी जनता और वहां की सरकार के बीच टकराव पैदा करने का भी है, वह यह दिखाना चाहता है कि पाकिस्तान आतंकवादियों की पनाहगाह है। कुल मिलाकर अमेरिका और पाकिस्तान के बीच तल्खी बढ़ती जा रही है। मैंने एक खबर यह भी पढ़ी है कि अमेरिकी सेना पाकिस्तान के कुछ आतंकी ठिकानों पर बड़ा अटैक करने की योजना बना रही है।
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Tuesday, 27 September 2011

पाकिस्तान की अमेरिका को धमकी व चुनौती

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th September 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान और अमेरिका के बीच तल्खी बढ़ती जा रही है और अब तक चल रहा वाप्युद्ध अब सामरिक रिश्तों में दरार के रूप में सामने आने लगा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में शिरकत करने आई पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी ने अपने भाषण में कहा कि अमेरिका पाकिस्तान या पाकिस्तानी आवाम को अलग-थलग करने का खतरा नहीं उठा सकता। पाक विदेश मंत्री के मुताबिक अगर वह ऐसा करता है तो इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। रब्बानी का यह बयान अमेरिका के शीर्ष सैन्य अधिकारी एडमिरल माइक मुलेन के उस आरोप के बाद आया जिसमें बीते सप्ताह काबुल में अमेरिकी दूतावास पर हुए हमले के पीछे आईएसआई को जिम्मेदार बताया गया था। मुलेन का कहना है कि हमले के पीछे मौजूद हक्कानी नेटवर्प को आईएसआई की शह हासिल है। वैसे अमेरिका लम्बे समय से मानता रहा है कि अफगानिस्तान में अपनी पैठ मजबूत करने के लिए पाकिस्तान हक्कानी नेटवर्प का सहारा ले रहा है। अफगानिस्तान से 2014 तक सैनिकों की वापसी और वहां एक स्थिर और लोकतांत्रिक सरकार के गठन के अमेरिकी सपने में हक्कानी नेटवर्प सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है। समस्या यह है कि इन विशाल और प्रशिक्षित नेटवर्प के खात्मे में अमेरिका को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में उसे अपने सबसे मजबूत `सहयोगी' पाकिस्तान की तरफ से ही कोई मदद नहीं मिली। हक्कानी नेटवर्प को पाकिस्तान और तालिबान अपनी रणनीतिक सम्पत्ति मानते हैं जो अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने के बाद वहां पाकिस्तानी हितों की हिफाजत करेगा। अमेरिका की मुश्किल यह है कि वह तमाम कोशिशों के बावजूद अलकायदा को जिस तरह उसने तहस-नहस किया था वैसे हक्कानी नेटवर्प को नहीं कर सका। अलकायदा सरगना जहां ड्रोन हमलों से अनपी जान बचा रहे हैं, वहीं हक्कानी नेटवर्प एक के बाद एक दुस्साहसी हमलों को अंजाम दे रहा है। ऐसे में आखिरकार अमेरिका अब जलालुद्दीन व सिराजुद्दीन हक्कानी को ओसामा बिन लादेन व अलकायदा जितना ही खतरनाक मानने लगा है। अमेरिका हक्कानी नेटवर्प का हर कीमत पर सफाया चाहता है। दरअसल ओबामा प्रशासन काबुल में अमेरिकी दूतावास पर हुए आतंकवादी हमले से बौखला गया है। 12 सितम्बर को हुए इस हमले में जलालुद्दीन हक्कानी के बेटे सिराजुद्दीन हक्कानी का हाथ था। इस हमले में चार पुलिसकर्मी व चार नागरिक मारे गए थे। 19 घंटे तक चली इस लड़ाई में 11 आतंकवादियों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इससे दो दिन पहले ही हक्कानी के आतंकवादियों ने वरदाक राज्य स्थित नॉटो के ठिकाने पर हमला किया था जिसमें चार अफगानी नागरिक मारे गए थे व 77 अमेरिकी घायल हो गए थे।
आखिरकार अमेरिका को वह सच्चाई समझ में आने लगी है कि पाकिस्तान इस आतंकी संगठनों से न केवल मिला हुआ है बल्कि इनकी हर तरह से मदद करता है, इन्हें संरक्षण देता है। भारत ने यह बात अमेरिका को कई बार समझाने की कोशिश की पर अमेरिका सब कुछ समझते हुए भी अनजान बना रहा था शायद उसने इसमें इसलिए दिलचस्पी नहीं दिखाई, क्योंकि पाक प्रायोजित आतंकवाद का शिकार भारत था। अब जब खुद अमेरिका इसका निशाना बन रहा है, अमेरिका को कुछ-कुछ समझ आने लगा है। हालांकि भारत के साथ-साथ कई अमेरिकी विशेषज्ञ भी बार-बार यह कह रहे थे कि पाकिस्तान ने आतंकवाद को बढ़ावा देने को अपनी राष्ट्र नीति का अंग बना लिया है, लेकिन अमेरिकी शीर्ष नेतृत्व इसे जानबूझ कर ठुकराता रहा है। अमेरिका की मुश्किल और कमजोरी का पाकिस्तान पूरा फायदा उठा रहा है और उठाएगा। उन्हें मालूम है कि अमेरिका 2014 तक अफगानिस्तान से हटना चाहता है। पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान में अमेरिका के हटने के बाद भी उसका वर्चस्व कायम रहे। पाकिस्तान हमेशा अमेरिका को ब्लैकमेल करता रहा है और अब भी कर रहा है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति तक यह प्रकट करने में लगे हैं कि इस्लामाबाद से ज्यादा वाशिंगटन को उनके समर्थन की जरूरत है। इन वक्तव्यों में एक तरह की धमकी भी छिपी हुई है। देखना यह है कि अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान की इस चालबाजी को भांप पाता है या नहीं और उसके सन्दर्भ में अपनी नीति में कोई ठोस बदलाव करता है या नहीं? पाकिस्तान के संदर्भ में अमेरिका की भावी नीति भले ही कुछ हो, ओबामा प्रशासन को यह समझने की जरूरत है कि वह और लम्बे समय तक बिना अपने हितों से समझौता किए पाकिस्तान से सबसे मजबूत सहयोगी मानने वाली नीति पर चल नहीं सकता। अमेरिका को यह भी समझना होगा कि पाकिस्तान की पूरी मदद और समर्थन चीन भी कर रहा है। मामला केवल अमेरिका-पाकिस्तान का नहीं रह जाता। चीन के बीच में आने से सारे समीकरण बदल जाते हैं। हमारा मानना है कि पाकिस्तान से ज्यादा आज अमेरिका संकट में है। देखें आगे क्या होता है।
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Saturday, 24 September 2011

Rabbani's killing, a cause of concern to all

Rabbani's killing, a cause of concern to all

- Anil Narendra

It is a big blow to US peace efforts in Afghanistan. The former Afghan President, Burhanuddin Rabbani has been killed in a suicide bomb attack. The attacker had kept explosive concealed in his turban. Four security personnel were also killed in this attack. The killing of Rabbani (71) is a big blow to the peace process in the strife-torn Afghanistan. Following his killing, President Hamid Karzai decided to cut short his US tour and return home. According to the Kabul Police, the attacker had been invited to the Kabul residence of Rabbani on Tuesday evening as he was considered to be a special envoy bringing some special message from Taliban. While embracing Rabbani, the attacker triggered the explosive, kept in his turban.
The gravity of the challenge posed by Taliban after the withdrawal of US-led NATO forces from Afghanistan can be easily gauged from the killing of Rabbani. Rabbani was living in a high security zone area, close to the US Embassy. The Hamid Karzai government had appointed Rabbani as the Chief of its high-level Peace Council and he was continuing on this post for last one year. But now, with his killing, the possibilities of negotiations have weakened. A few months ago, Taliban had executed a plan to kill the half brother of the President Karzai, Wali Karzai,  who was also killed deceitfully by one of his colleagues in the same manner as Rabbani was killed this time. Then, the Taliban gunan had killed the former Governor Jan Mohammed Khan. Taliban have been attacking the Karzai government since its establishment with the help of US and Western Countries. Killings one after the others have made it clear that Taliban are not in favour of negotiations. Long back, Taliban were created in the Pak Madrassas and even today a number of Taliban groups are under the influence of Pakistan Army and its intelligence agency ISI. In case of Taliban rule in Afghanistan, Pakistan could get the much-talked strategic depth, in case of a war with India. That is why Pakistan does not want an India-friendly government in Afghanistan. Rabbani was considered to be a friend of India. Taliban would never like a person, who is friendly to America, India and Western Countries.
It is natural for India to be concerned over the killing of Rabbani and also over the instability in the neighbouring country. New Delhi is more concerned over the efforts to dispose off leaders in Afghanistan, who are trying hard for peace and confidence building measures. Dr. Manmohan Singh has called this incident as a big blow and has assured the people of Afghanistan of India's full support in this hour of crisis. In a letter to Karzai, the Prime Minister has said that the best way to remember Rabbani would be to carry forward the work left unfinished by him. The killing of Rabbani has added to the anxiety of US and NATO forces also. Condoling the death of Rabbani, the US President said that the peace process in Afghanistan would continue. The suicide bomber, killing the former Afghan President Rabbani has been identified as Ismatullah and for quite some time he was waiting for an opportunity to kill Rabbani. One thing is clear from this Taliban suicide attack that US and NATO alliance would have to talk directly to Taliban if they want to withdraw from Afghanistan, but the problem is that there are so many groups among the Taliban. It would be very difficult to decide as whom to talk with and through whom? Then, there is ISI also. It has its own interests. It would favour such a government in Afghanistan that will toe Pakistan's line. The path for Obama is strewn with thorns and US is in tight corner. It has to decide between the devil and the deep sea. 

रब्बानी की हत्या ने सभी की चिन्ताएं बढ़ाईं


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24th September 2011
अनिल नरेन्द्र
अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा शांति प्रयासों को भारी धक्का लगा है। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन रब्बानी की एक आत्मघाती हमलावर ने हत्या कर दी। इस हमलावर ने अपनी पगड़ी में विस्फोटक रखा था। रब्बानी की हत्या करने वाले हमलावर के इस घटना में रब्बानी के चार सुरक्षाकर्मी भी मारे गए। रब्बानी (71) की हत्या युद्ध जैसे हालात से गुजर रहे अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया के लिए एक बड़ा झटका है। उनकी हत्या के बाद राष्ट्रपति हामिद करजई ने अपनी अमेरिकी यात्रा बीच में ही छोड़कर वतन लौटने का फैसला किया। काबुल पुलिस के मुताबिक हमलावर को रब्बानी के काबुल स्थित निवास में मंगलवार शाम को बुलाया गया था, समझा जा रहा था कि वह विशेष दूत है, जो तालिबान का खास संदेश लेकर आया है। रब्बानी से गले मिलते ही हमलावर ने पगड़ी में रखे विस्फोटक में धमाका कर दिया।
श्री रब्बानी की हत्या से साफ है कि अमेरिका के नेतृत्व वाली नॉटो सेनाओं के अफगानिस्तान से विदा होने के बाद तालिबानी और कितनी बड़ी चुनौती उपस्थित कर सकते हैं। रब्बानी राजधानी काबुल के अति सुरक्षित इलाके में रहते थे जहां अमेरिका का दूतावास भी पास में स्थित है। रब्बानी को हामिद करजई सरकार ने पिछले करीब एक साल से अपनी उच्चस्तरीय शांति परिषद का प्रमुख बनाया था। उन्हें शांति प्रयासों में कोई खास कामयाबी नहीं मिली। अब उनकी हत्या से तो मेल-मिलाप की रही-सही संभावनाएं भी क्षीण होने लगी हैं। जिस तरह तालिबान ने छल कर रब्बानी की हत्या की, उसी तरह कुछ महीने पहले राष्ट्रपति हामिद करजई के सौतेले भाई वली करजई की उनके ही एक सहयोगी से छलपूर्वक हत्या कराई गई थी। इसके बाद तालिबानी बन्दूकधारियों ने एक पूर्व गवर्नर जान मोहम्मद खान की हत्या की थी। जब से अमेरिका और पश्चिमी देशों की मदद से करजई सरकार बनी है। तालिबानी उस पर हमले कर रहे हैं। एक के बाद एक होती हत्याओं से साफ है कि तालिबान मेल-मिलाप के पक्ष में नहीं है। तालिबान का निर्माण कभी पाकिस्तानी मदरसों में हुआ था और आज भी पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई का तालिबान के अनेक गुटों पर नियंत्रण है। अफगानिस्तान में तालिबानी शासन होने से पाकिस्तान को भारत के साथ युद्ध की स्थिति में सामरिक गहराई मिलती है। इसलिए पाकिस्तान नहीं चाहता कि अफगानिस्तान में ऐसी कोई सरकार हो, जो भारत की मित्र हो। रब्बानी को भारत का मित्र माना जाता था। तालिबान को ऐसा भी कोई शख्स पसंद नहीं है जो अमेरिका, भारत और पश्चिमी देशों का मित्र हो।
श्री रब्बानी की हत्या के साथ अस्थिर हालात से गुजर रहे पड़ोसी मुल्क के हालात को लेकर भारत की चिन्ता बढ़नी स्वभाविक ही है। नई दिल्ली की चिन्ता अफगानिस्तान में शांति और विश्वास बहाली का परचम थामने वालों नेताओं को ठिकाने लगाने की कोशिशों को लेकर है। मनमोहन सिंह ने कहा कि इस घटना से गहरा धक्का पहुंचा है और भारत मुश्किल की इस घड़ी में अफगानिस्तान के लोगों के साथ खड़ा है। करजई को लिखे पत्र में पीएम ने कहा कि अफगानिस्तान में विभिन्न गुटों के बीच शांति प्रक्रिया की अगुवाई कर रहे रब्बानी को याद रखने का सबसे अच्छा तरीका यही होगा कि हम उनके काम को आगे बढ़ाएं। रब्बानी की हत्या ने अमेरिका और नॉटो सेना की चिन्ता भी बढ़ा दी है। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने रब्बानी की हत्या पर शोक प्रकट करते हुए कहा कि शांति प्रक्रिया जारी रहेगी। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति रब्बानी की हत्या करने वाले आत्मघाती हमलावर की पहचान एस्मातुल्ला के रूप में की गई है। वह लम्बे समय से रब्बानी की हत्या का मौका तलाश कर रहा था। तालिबान के इस आत्मघाती हमले से एक बात तो साफ है कि अगर अमेरिका व नॉटो गठबंधन को अफगानिस्तान से बाहर निकलना है तो उन्हें तालिबान से सीधी बातचीत करनी ही होगी पर मुश्किल यह भी है कि तालिबान के अन्दर कई गुट हैं। किस से किसके माध्यम से यह बात हो? फिर आईएसआई भी है। उनके अपने हित हैं। वह अफगानिस्तान में ऐसी सरकार चाहेंगे जो पाकिस्तान का पिट्ठू बनने को तैयार हो। ओबामा का आगे का रास्ता कांटों भरा है पर फिर अमेरिका तो बुरी तरह फंसा हुआ है, इधर कुआं तो उधर खाई।
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Wednesday, 22 June 2011

अफगानिस्तान में 10 साल पहले अमेरिका घुसा क्यों था?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
अफगानिस्तान में तेजी से राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं। अमेरिका ने अब वहां से भागने के उपायों पर अमल करना आरम्भ कर दिया है। हाल के दिनों में दो ऐसी खबरें आई हैं जिनसे यह साफ होता है कि वहां कुछ खेल चल रहा है। पहली खबर जो आई वह यह थी कि भारत सहित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी 15 सदस्य देशों ने प्रतिबंधों के लिहाज से एक ऐसी सूची को मंजूरी दी है जिसमें तालिबान और अलकायदा को अलग-अलग नजरिये से देखा जाएगा। इसका मकसद तालिबान और अफगानिस्तान में सुलह के प्रयासों में शामिल करने से जुड़ा है। इस संबंध में सुरक्षा परिषद ने गत शुक्रवार रात पूर्ण बहुमत से दो प्रस्ताव पारित किए। इनमें प्रतिबंधों को लेकर तालिबान के लिए अलकायदा से एक अलग सूची की बात की गई है। इस कदम के बाद अब अलकायदा और तालिबान आतंकवादियों को अलग-अलग पैमानों पर तोला जाएगा। दूसरी घटना है अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई का यह कहना कि अमेरिका तालिबान से बातचीत कर रहा है। इस सम्पर्प के बारे में यह सम्भवत पहली आधिकारिक पुष्टि है। करजई ने काबुल में एक सम्मेलन में कहा कि तालिबान के साथ बातचीत शुरू हो गई है। बातचीत अच्छी चल रही है। विदेशी सेनाएं विशेषकर अमेरिका खुद ही बातचीत कर रहा है। अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान में चल रहा युद्ध 10वें साल में प्रवेश कर गया है और वहां पर इस संघर्ष के राजनीतिक समाधान की आवाज तेज होती जा रही है।
अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने जो खुलासा किया है वह अफगानिस्तान के लिए जितना खतरनाक है, उतना ही अमेरिका की स्वार्थपरता और दोहरेपन का एक और सबूत भी है। अफगानिस्तान के खिलाफ अमेरिका ने आखिर युद्ध क्यों छेड़ा था? जहां तक हम समझ सके हैं कि 9/11 हमलों के लिए अमेरिका अलकायदा और तालिबान को जिम्मेदार मानते हुए उन्हें सबक सिखाने के लिए यह युद्ध छेड़ा गया था। पिछले 10 सालों में पहले तो अमेरिका ने इसी तालिबान हुकूमत को सत्ता से हटाया और अब वही तालिबान अच्छा हो गया है और उसे दोबारा सत्ता सम्भालने की तैयारी हो रही है। हम राष्ट्रपति बराक ओबामा और अमेरिका की मजबूरी समझ सकते हैं। उन्होंने घोषणा कर रखी है कि 2014 तक अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की पूरी वापसी होनी है इसलिए वह आनन-फानन में समस्या का हल निकालना चाहते हैं। इसी के तहत तालिबान से बातचीत शुरू की है, जो हालांकि अभी शुरुआती दौर में है। अमेरिका के जेबी संगठन संयुक्त राष्ट्र ने तालिबान और अलकायदा पर इसीलिए पुरानी व्यवस्था तोड़ते हुए जो संदेश दिया है उसका लब्बोलुआब यही है कि अगर अलकायदा का साथ छोड़कर तालिबान अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में सहयोगी बनता है तो उसे `माफी' दे दी जाएगी।
हमें थोड़ा आश्चर्य इस बात पर भी है कि आखिर भारत ने क्या सोचकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी? क्या भारत की नजरों में भी तालिबान एक अच्छा संगठन बन गया है जिससे भारत को अब कोई खतरा नहीं है? सवाल यह नहीं कि तालिबान कैसा है, सवाल यह है कि एक आतंकी संगठन जिसने अपना एजेंडा सार्वजनिक किया हो उससे आप समझौते की बात कर रहे हो, वह भी बकवास शर्तों पर? मामला तो यह है कि एक आतंकी संगठन से बातचीत कर अमेरिका ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसके तमाम फैसलों के पीछे सिर्प उसका अपना स्वार्थ होता है, उसे इस बात की कतई परवाह नहीं कि इस फैसले का भारत-पाकिस्तान-ईरान मुल्कों पर क्या असर पड़ेगा? न ही उसे अब वैश्विक आतंकवाद से कोई लेना-देना है। विद्रुप तो यह है कि इस बातचीत में अफगान सरकार को भी शामिल नहीं किया गया। खुद अफगान मानते हैं कि यह अत्यंत घातक कदम होगा और मुल्क फिर 2001 से पहले की स्थिति में पहुंच जाएगा। अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा नुकसान भारत को भी होगा। भारत द्वारा अफगानिस्तान में चल रही विभिन्न पुनर्निर्माण योजनाओं को भारी झटका लगेगा। इससे करजई सरकार की छवि, कार्यक्षमता और भविष्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा पर अमेरिका को इन सबसे क्या लेना-देना है। इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी कि एक दशक पहले जिस अमेरिका ने `वॉर ऑन टेरर' का नारा देकर अफगानिस्तान में इसलिए प्रवेश किया था कि अलकायदा और तालिबान को समाप्त कर सके, आज वह उसे उन्हीं आतंकियों के हवाले करने के बारे में सोच रहा है ताकि उसे अफगानिस्तान से भागने का रास्ता मिल जाए?
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Sunday, 19 June 2011

अल जवाहिरी के आने से अमेरिका की मुश्किलें बढ़ेंगी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 19th June 2011
अनिल नरेन्द्र
ओसामा बिन लादेन के मरने का अमेरिका की `वॉर ऑन टेरर' पर पता नहीं क्या असर पड़ेगा? उसकी अफगानिस्तान में, पाकिस्तान में और दुनिया के अन्य भागों में समस्या कम होगी या उसमें एक बार फिर वृद्धि होगी? यह हैं कुछ प्रश्न जो अमेरिकन अधिकारियों को जरूर सता रहे होंगे। अलकायदा संगठित होता जा रहा है। नए अलकायदा प्रमुख की घोषणा हो चुकी है। पेशे से आंखों के डाक्टर, मिस्र के `इस्लामिक जेहाद' नाम के कट्टरपंथी संगठन के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अयमान अल जवाहिरी को अब अलकायदा का प्रमुख बना दिया गया है। ओसामा बिन लादेन का दाहिना हाथ माने जाने वाले जवाहिरी कुछ मायनों में लादेन से ज्यादा खतरनाक साबित हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि 9/11 हमलों में अल जवाहिरी का ही दिमाग था। वर्ष 2001 में जिन 22 संदिग्ध आतंकवादियों की सूची जारी की गई थी उसमें ओसामा बिन लादेन के बाद जवाहिरी का दूसरा नम्बर था। अमेरिका ने जवाहिरी पर 25 मिलियन डालर का ईनाम रखा है। बताया जाता है कि जवाहिरी आखिरी बार अक्तूबर 2001 में अफगानिस्तान के खोस्त शहर में देखा गया था। अफगानिस्तान में तालिबान के खात्मे के बाद से वह भूमिगत हो गया था। हाल के वर्षों में अल जवाहिरी अलकायदा के सबसे मुखर प्रवक्ता के रूप में उभरकर सामने आया है। जवाहिरी पढ़ा-लिखा है और उसने 1974 में काहिरा के मेडिकल कॉलेज से स्नातक की उपाधि और चार साल बाद यहीं से सर्जरी में मास्टर्स की डिग्री हासिल की थी। उसे अरब जगत के सबसे पुराने कट्टरपंथी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ जुड़ने के कारण महज 15 साल की उम्र में पहली बार गिरफ्तार किया गया था।
जवाहिरी की ताजपोशी से परेशान अमेरिका ने उसका भी वही हश्र करने की धमकी दी है जो लादेन के साथ किया। अमेरिका के ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ माइक मुलेन ने कहा कि जैसा कि हमने लादेन को पकड़ने और मारने, दोनों की कोशिश और मारने में सफल भी रहे, हम जवाहिरी के साथ भी निश्चित रूप से ऐसा ही करेंगे। अमेरिका की मुश्किल इसलिए भी बढ़ सकती है, क्योंकि पाकिस्तान में हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे हैं। ओसामा बिन लादेन के ऑपरेशन से पाकिस्तान में हलचल बढ़ती जा रही है। पाक सेना प्रमुख अशफाक कयानी और आईएसआई प्रमुख पाशा पर दबाव बढ़ता जा रहा है। कयानी को अमेरिका के प्रति नरम होने के आरोप में हटाने की मुहिम चल रही है। आईएसआई ने लादेन के ठिकाने के बारे में अमेरिकी अधिकारियों को ठोस जानकारी देने के आरोप में पांच जासूसों को गिरफ्तार कर लिया है। इनमें एक पाकिस्तानी सेना का मेजर भी शामिल है। उधर एक अमेरिकी सीनेटर ने एक बैठक में सीआईए के डिप्टी डायरेक्टर माइकल मोरेल से पूछा कि पाकिस्तान अमेरिका को आतंकवाद से लड़ने के मुद्दे पर कितना समर्थन दे रहा है? तो जवाब में मोरेल ने कहा कि 10 में से 3 अंक। मतलब अमेरिका पाक की गतिविधियों से बिल्कुल नाखुश है। दि न्यूयार्प टाइम्स के अनुसार अमेरिका में इस बात की सख्त नाराजगी है कि पाक सरकार ने उन लोगों पर तो कोई कार्रवाई की नहीं जिन्होंने ओसामा बिन लादेन को छिपाने में मदद की थी, लेकिन जिन लोगों ने लादेन को मारने में मदद की थी, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। आने वाला समय अमेरिका के लिए इस मामले में चुनौतीपूर्ण होगा।
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Thursday, 12 May 2011

यूसुफ रजा गिलानी ने अमेरिका को खरी-खोटी सुनाईं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 12 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने सोमवार को अमेरिका के `किल ओसामा' ऑपरेशन के मसले पर संसद में सफाई देते हुए उल्टे अमेरिका को कटघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने साफ पूछा कि ओसामा किसकी देन है? ओसामा न तो हमारी देन है और न ही हमने ओसामा को बढ़ावा ही दिया। यह आपने (अमेरिका) ने किया है। गिलानी ने ओसामा बिन लादेन के दुर्दांत आतंकी बनने पर सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर ओसामा को तैयार किसने किया? 90 के दशक में तालिबान और अलकायदा के उभरने पर सवाल उठाते हुए गिलानी ने कहा कि ओसामा बिन लादेन के लिए अकेले पाकिस्तान को दोष नहीं दिया जा सकता। अमेरिका पर परोक्ष हमला बोलते हुए गिलानी ने कहा कि अलकायदा सरगना को इतना बड़ा आतंकी किसने बनाया यह भी जानना जरूरी है। उन्होंने कहा कि हमें अन्य देशों की नीतियों और गलतियों का जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। अलकायदा का जन्म स्थान पाकिस्तान नहीं है। हमें इतिहास से सीख लेते हुए चीजों को सामने रखना होगा। गिलानी नेशनल असेम्बली (संसद) को संबोधित कर रहे थे। गिलानी ने कहा कि हमने लादेन को पाकिस्तान या अफगानिस्तान में आमंत्रित नहीं किया। गिलानी ने आईएसआई की सराहना करते हुए कहा कि आईएसआई हमारी राष्ट्रीय सम्पदा है। मुझे आतंक विरोधी गतिविधियों के लिए आईएसआई की भूमिका पर गर्व है। गिलानी ने यह भी कहा कि अमेरिका हमारी आईएसआई की मदद के बिना आतंकी सरगना लादेन तक पहुंच नहीं सकता था। गिलानी ने पाक में लादेन के पाए जाने के बाद पाक सेना और आईएसआई की आलोचनाओं को खारिज कर दिया। गिलानी ने अमेरिका की दोहरी चाल का हवाला देते हुए कहा कि 80 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत सेना के खिलाफ जेहादियों को तैयार करने में अमेरिका ने मुख्य भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा कि पाक निश्चित तौर पर पूरे प्रकरण की तह में जाएगा। उन्होंने यहां तक कह दिया कि अमेरिकी नीति का दुष्परिणाम पाकिस्तान आज भी भुगत रहा है। गिलानी ने अन्त में यह चेतावनी दे डाली कि अब किसी ने ऐसा दुस्साहस किया तो मुंहतोड़ जवाब देंगे।
निश्चित रूप से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने अमेरिका को खरी-खरी सुनाई हैं। यह सत्य है कि ओसामा बिन लादेन अमेरिका की देन है पर पुराना इतिहास दोहरा कर पाकिस्तान अपनी जिम्मेवारियों से नहीं बच सकता। दरअसल पाकिस्तान इसलिए भी अमेरिका से पंगा लेने का जोखिम उठा रहा है, क्योंकि वह अमेरिका की मजबूरियों से परिचित है। अमेरिका सब कुछ होने के बावजूद पाकिस्तान के तलवे चाटेगा उन्हें अरबों डालर देगा। पाकिस्तान आज भी अमेरिका की वॉर ऑन टेरर में सबसे बड़ा सहयोगी है। फिर चीन पूरी तरह से पाकिस्तान के साथ है। ऑपरेशन किल ओसामा के बाद जब सारी दुनिया पाक को कोस रही थी तो चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जियांग यू ने कहा, `पाकिस्तान आतंकवाद निरोधक प्रयासों में आगे है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को आतंकवाद के विरुद्ध पाकिस्तान की ओर से दिए जाने वाले सहयोग को समझना चाहिए और उसका समर्थन करना चाहिए।' आज भी अमेरिका को पाकिस्तान की ज्यादा जरूरत है बनिस्पत पाक को अमेरिका की। वैसे अमेरिका को इतनी खरी-खोटी सुनाने के लिए गिलानी की हिम्मत की दाद देनी होगी।

Sunday, 8 May 2011

भारत के लिए तो लादेन से ज्यादा लश्कर खतरनाक है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 07 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
ओसामा बिन लादेन के मरने से बेशक अमेरिका ने थोड़ी राहत महसूस की हो पर जहां तक भारत का सवाल है, हमें लादेन के मरने से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं। हमारे लिए तो लश्कर-ए-तोयबा अलकायदा से ज्यादा बड़ा खतरा है। बिन लादेन से पाकिस्तान का आतंकी ढांचा भी प्रभावित नहीं होगा। आज भी पाकिस्तान में लश्कर, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिद्दीन, हरकत उल अंसार जैसे दर्जनों आतंकी संगठनों के शिविर जारी हैं। इस समय पाकिस्तान में लगभग 37 आतंकी शिविर मौजूद हैं। जम्मू-कश्मीर में सक्रिय हार्ड कोर आतंकियों की संख्या लगभग 2300 है। इसके अलावा लगभग 900 से अधिक भाड़े के विदेशी आतंकी भी मौजूद हैं। जम्मू-कश्मीर में इस समय पाकिस्तान, पाक अधिकृत कश्मीर, अफगानिस्तान, मिस्र, सूडान, यमन, बहरीन, बंगलादेश, ईरान और इराकी मूल के विदेशी आतंकी मौजूद हैं।
दरअसल भारतीय खुफिया एजेंसियों की नजर में ओसामा के अलकायदा और लश्कर-ए-तोयबा के बीच कोई अन्तर नहीं है। लश्कर पर भारतीय डोजियर कहता है कि इस आतंकी संगठन के अलकायदा और तालिबान से गहरे रिश्ते हैं। इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान में ईद समेत धार्मिक समारोहों में मारे जाने वाले जानवरों की खालों से करोड़ों रुपये कमाने के अलावा चन्दे व सदस्यता शुल्क, आदि से अपने विस्तार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करते हैं। सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान के मनशेरा में पवनोढेरी में मौजूद लश्कर का प्रशिक्षण केंद्र एक बार में 500 लोगों को प्रशिक्षण देता है। मुजफ्फराबाद, लाहौर, पेशावर, इस्लामाबाद, रावलपिण्डी, कराची, मुल्तान, क्वेटा, गुजरांवाला, सियालकोट, गिलगित समेत कई बड़े शहरों में लश्कर के 2000 से ज्यादा भर्ती केंद्र और दफ्तर हैं। उनके पास आधुनिक हथियारों के साथ ही उन्नत संचार यंत्र भी हैं। खुफिया सूत्रों के मुताबिक घाटी में फिरौती और संचार के लिए लश्कर के आतंकी वाइस इंटरनेट प्रोटोकॉल का इस्तेमाल करते हैं जिसके कारण मोबाइल फोन पर नम्बर तक नहीं आता।
संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध के बावजूद जमात-उद-दावा और लश्कर समेत 19 अलग-अलग नामों से चल रहे इस आतंकी संगठन का कारोबार इसकी ताकत का अहसास कराता है। संयुक्त राष्ट्र में लश्कर के 2005 और पाकिस्तान में 2002 से प्रतिबंध होने के बावजूद इसका मुखिया हाफिज सईद ओसामा बिन लादेन की मौत पर शोक सभाएं आयोजित करने से बाज नहीं आया। भारत में सिमी, इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी संगठनों के सहारे आतंकवाद को आउटसोर्सिंग का मॉडल भी लश्कर विकसित कर चुका है। बंगलादेश में जमात उल मुजाहिद्दीन और हरकत उल जिहाद अल इस्लामी (हूजी) के तार भी लश्कर से सीधे जुड़े हुए हैं। मुंबई आतंकी हमले ने अमेरिका को भी अब यह मानने पर मजबूर कर दिया है कि लश्कर का विस्तार और पश्चिमी देशों को निशाना बनाने की उनकी हसरतें खतरे का सबब हैं। लश्कर आतंकियों ने मुंबई हमले में इजरायलियों के लिए महत्वपूर्ण खसड़ हाउस और पश्चिमी पर्यटकों के पसंदीदा होटल ताज होटल को निशाना बनाकर इसकी बानगी भी दे दी है। भारत को आतंकवाद के खिलाफ अपनी ही लड़ाई लड़नी होगी। हां, हम अमेरिका पर यह दबाव जरूर डाल सकते हैं कि वह पाकिस्तान में मौजूद टेरर फैक्टरियों को नष्ट करे या हमारी मदद करे।

Thursday, 5 May 2011

क्या जवाहिरी और मुल्ला उमर भी पाक सेना के संरक्षण में हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 05 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र

अमेरिका ने पाकिस्तान के इस दावे को मानने से इंकार कर दिया है कि वह अपनी धरती पर ओसामा बिन लादेन की मौजूदगी से अनजान था। अमेरिका के डिप्टी नेशनल सिक्यूरिटी एडवाइजर जॉन ब्रेनन ने मंगलवार को कहा कि लादेन जिस देश में लम्बे समय से छुपा था, वहां उसका कोई सपोर्ट सिस्टम ने हो, यह बात कुछ हजम नहीं होती। मैं यह आंकलन नहीं लगाना चाहता कि सपोर्ट सिस्टम किस तरह का हो सकता है, लेकिन अमेरिका मानता है कि वह पाकिस्तान  में छह साल से ज्यादा समय से रह रहा था। लादेन का पाकिस्तान की राजधानी के इतने नजदीक पाया जाना सवाल खड़ा करता है। सीआईए प्रमुख  लियोन पैनेटा ने साफ कहा कि अमेरिकी अधिकारियों को शक था कि पाकिस्तान के साथ काम करने से ऑपरेशन को लीक कर देते। अमेरिका के प्रमुख सांसदों ने पाकिस्तान पर अमेरिका से डबल गेम खेलने का आरोप लगाया है और उन्होंने पाक के लिए अमेरिकी सहायता पर कटौती चाही है। सीनेटर सूसन कालिंस ने कहा कि इस्लामाबाद से सिर्प 120 किलोमीटर दूर लादेन का मारा जाना यह दिखाता है कि पाक हमारा सुनिश्चित सहयोगी नहीं है। उधर पाकिस्तान का कहना है कि लादेन के खिलाफ अमेरिकी ऑपरेशन हमारी जानकारी के बिना अवैध था। उसका यह भी कहना है कि लादेन के खिलाफ ऑपरेशन में सफलता हमारे सहयोग से मिली। मंगलवार रात को जारी पाक सरकार के बयान में कहा गया है कि एबटाबाद और आसपास का इलाका खुफिया एजेंसियों की नजरों में 2003 से था, तभी 2004 में अलकायदा का अहम टारगेट पकड़ा गया। लादेन के परिसर के बारे में आईएसआई ने 2009 में सीआईए को सूचना दी थी। यह बात अलग है कि सीआईए की टेक्नोलॉजी एडवांस थी सो उसने हमसे मिले सुरागों के आधार पर लादेन तक पहुंचने में सफलता पाई। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय का कहना है कि सरकार को अमेरिकी ऑपरेशन की जानकारी नहीं थी। अमेरिकी हेलीकॉप्टर पाकिस्तानी रॉडार की नजरों से बचकर पाकिस्तानी एयरस्पेस में आए थे। सूचना मिलने पर पाकिस्तानी जेटों ने भी उड़ान भरी थी। पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने कहा है कि रविवार को ऑपरेशन में पाक शामिल नहीं था, लेकिन उसके सहयोग से ही लादेन का खात्मा हो सका। उन्होंने कहा कि लादेन की मौजूदगी का पाक अधिकारियों को पता नहीं था। अमेरिका में पाक के राजदूत हुसैन हक्कानी ने माना है कि हमारे देश में लादेन का सपोर्ट सिस्टम था, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार ने लादेन को बचाने में कोई भूमिका नहीं निभाई थी।
लादेन के पाकिस्तान में ही छुपे होने के बाद यह बात भी साफ हो गई है कि अलकायदा की दूसरी पंक्ति के नेता अल जवाहिरी और तालिबानी नेता मुल्ला उमर भी पाकिस्तानी सेना की शरण में छिपे हैं। ओसामा के मारे जाने के बाद पाकिस्तान पर अब इन नेताओं को भी जिन्दा या मुर्दा पकड़ने का अमेरिकी दबाव बढ़ेगा। इन नेताओं की गिरफ्तारी या मौत के बाद ही आतंकवाद की रीढ़ तोड़ी जा सकती है। इसके साथ ही अफगानिस्तान में अमेरिकी नेतृत्व वाली अंतर्राष्ट्रीय सेना का मुकाबला कर रहे तालिबान लड़ाकों को भी पाकिस्तानी सेना की मदद बन्द करवानी होगी। ओसामा के मारे जाने के बाद अब आतंकवाद और पाकिस्तानी सांठगांठ पूरी तरह उजागर हो गई। भारत यह बात वर्षों से कहता आ रहा है पर अमेरिका की दोहरी नीति के कारण अमेरिकनों को समझ नहीं आई।

जेरोनिमो ईकेआईए सुनने को थे बेकरार ओबामा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 05 मई 2011
अनिल नरेन्द्र
एक बार जब यह सुनिश्चित हो गया कि एबटाबाद के एक घर में ओसामा बिन लादेन छिपा हुआ है तो अमेरिकी सुरक्षा विभाग ने राष्ट्रपति बराक ओबामा को दो विकल्प दिए। पहला कि इमारत परिसर को बमों से उड़ा दिया जाए, दूसरा कि जमीनी हमला करके उसे तबाह कर अन्दर सभी लोगों को मार दिया जाए या गिरफ्तार किया जाए। बराक ओबामा ने दूसरा  विकल्प चुना। उन्होंने कहा कि जमीनी हमला करो ताकि हम सब और सारी दुनिया में यह निश्चित रूप से निर्णायक रूप से तय हो जाए कि ओसामा बिन लादेन ही छिपा है और हमला उसी पर किया गया है। इस काम के लिए प्रतिष्ठित नेवी सील की एक विशेष टीम चुनी गई। अफगानिस्तान के अमेरिकी बैस से हेलीकॉप्टरों ने उड़ान भरी। भारतीय समयानुसार रात दो बजे चार हेलीकॉप्टरों ने हवेली की घेराबंदी शुरू कर दी और यह सारी कार्रवाई राष्ट्रपति ओबामा, विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और टॉप कमांडर व्हाइट हाउस के बेसमेंट में सिचुएशन रूम में बन्द होकर खुफिया वीडियो क्रीन पर देख रहे थे। यूएस नेवी सील्स के जवानों के हेलमेट पर कैमरे लगे थे। ओबामा बेसब्री के साथ लादेन के मारे जाने से संबंधित कोड मैसेज मिलने का इंतजार कर रहे थे। यह मैसेज था, जेरोनिमो ईकेआईए। सीआईए के डायरेक्टर लियोन ई. पैनेटा ने कहा कि हमें जेरोनिमो दिखाई दिया है। इसके कुछ ही मिनट बाद उन्होंने कहा कि जेरोनिमो ईकेआईएस यानि एनिमी किल्ड इन एक्शन। लादेन की बाईं आंख पर गोली मारी जा चुकी थी। ओबामा ने कहा वी गाट हिम।
दरअसल राष्ट्रपति ओबामा ने राष्ट्रपति का पद्भार सम्भालते ही सीआईए के डायरेक्टर लियोन पैनेटा को आदेश दिया था कि मुझे 30 दिन के अन्दर एक ऐसा प्लान चाहिए जिसमें ओसामा लादेन को या तो जिन्दा पकड़ा जाए या फिर मुर्दा। सीआईए ने अगस्त 2010 में प्लान तैयार कर लिया था। आतंक का दूसरा नाम बन चुका बिन लादेन कहां रहता है, यह जानकारी अमेरिकी खुफिया अधिकारियों को एक कार का पीछा करते हुए मिली। सफेद रंग की सुजुकी कार को पिछले साल जुलाई में पेशावर के निकट देखा गया था। कार में बैठा था अलकायदा प्रमुख लादेन का सबसे विश्वस्त संदेशवाहक, जिसका अमेरिकी खुफिया अधिकारी कई महीनों से पीछा कर रहे थे। समाचार चैनल सीएनएन के मुताबिक संदेशवाहक का नाम अबू अहमद था और वह कुवैती नागरिक था। उसकी जानकारी हालांकि अमेरिकी खुफिया अधिकारियों को 2007 में ही मिल चुकी थी। न्यूयार्प टाइम्स के मुताबिक सीआईए के लिए काम करने वाले पाकिस्तानी जासूस ने पिछले साल जुलाई में पेशावर के निकट अहमद की सफेद कार देखी थी और उसका पीछा किया था। कई सप्ताह तक कार का पीछा करने पर जासूस को एबटाबाद के एक बंगले का पता चला। यह बंगला अभी चार दिवारियों से घिरा हुआ था। यह स्थान इस्लामाबाद से 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जब कमांडो कार्रवाई हुई उस समय अहमद भी एबटाबाद की इस इमारत में मौजूद था और मारा गया। बिन लादेन सबसे छोटी पत्नी और बेटे सहित दो संदेशवाहकों के साथ रह रहा था। इस हवेली की 18 फीट ऊंची दीवारें थीं जिसमें आने-जाने के लिए कम रास्ते थे और सड़क कच्ची थी। 4.4 करोड़ रुपये कीमत की हवेली थी लेकिन उसमें फोन या इंटरनेट नहीं था। मोबाइल तक भी नहीं था। इस तरह हुआ ओसामा बिन लादेन का अन्त।

Friday, 29 April 2011

आईएसआई एक आतंकवादी संगठन है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 29 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

भारत तो हमेशा से कहता आया है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई एक सही एजेंसी नहीं है और यह आतंकवाद को बतौर एक हथियार इस्तेमाल करती है पर अमेरिका सहित अधिकतर पश्चिमी देश हमारी बात से सहमत नहीं थे। अमेरिका ने तो आतंकवाद के खिलाफ जंग में पाकिस्तान को अपना स्ट्रेटेजिक पार्टनर तक बना रखा है पर जब खुद पर बीतती है तो अमेरिका भी बोलने  में मजबूर हो जाता है कि आईएसआई एक आतंकवादी संगठन है। द गार्डियन जैसे प्रतिष्ठित ब्रिटिश अखबार ने अमेरिकी गुप्तचर फाइलों का हवाला देते हुए कहा है कि गुआंतानामो-वे के जांचकर्ताओं को की गई सिफारिश में इंटरसर्विसेज महानिदेशालय के साथ-साथ अलकायदा, हमास और हिजबुल्ला को एक चुनौती करार दिया गया है। सितम्बर 2007 के इन दस्तावेजों में कहा गया है, इन समूहों में से किसी से भी संबंधित होने का अर्थ आतंकवादी या विद्रोही गतिविधि है। दस्तावेज में कहा गया है, `इन संगठनों के साथ संबंध रखने का अर्थ है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति ने अलकायदा या तालिबान को समर्थन दिया है या वह अमेरिका पर गठबंधन बलों के खिलाफ कार्रवाइयों में लिप्त रहा है।' हाल ही में अमेरिका की गुप्तचर सेवाओं को खबरें मिली थीं कि आईएसआई तालिबान को अफगानिस्तान में कई वर्षों से समर्थन दे रही है। इस खबर के प्रकाशित होने के कुछ समय बाद ही यह नया खुलासा हुआ है। अमेरिकी अधिकारियों की ओर से तैयार खुफिया दस्तावेज में आईएसआई का जिन तीन दर्जन आतंकी संगठनों के साथ उल्लेख किया गया है उनमें अलकायदा, तालिबान के अलावा भारत को खासतौर पर आतंकित करते रहने वाले लश्कर-ए-तोयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन भी हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि यह दस्तावेज 2007 में तैयार किया गया हो लेकिन माना जा रहा है कि अमेरिका को चुनौती देने वाले संगठनों की सूची में से आईएसआई को अभी हटाया नहीं गया है। इसका सीधा अर्थ है कि जिस तरह पाकिस्तान ने आतंकवाद को लेकर दोहरे मानदंड अपना रखे हैं उसी तरह अमेरिका ने भी। पाकिस्तान यह दावा करता है कि वह भी आतंकवाद  के खिलाफ है और अपने दावे को सही ठहराने के लिए खुद के आतंकवाद से त्रस्त होने का रोना रोता है, लेकिन सच्चाई यह है कि वह एक बड़ी संख्या में आतंकी संगठनों का परोक्ष-प्रत्यक्ष रूप से समर्थन करता है। समय-समय पर अमेरिकी विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और यहां तक कि राष्ट्रपति बराक ओबामा यह कह चुके हैं कि आतंकवाद के खिलाफ अपेक्षित कदम उठाने से पाकिस्तान इंकार कर रहा है।
सारी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान दुनिया में एक मात्र देश है जो अपनी नीति और रणनीति के तहत आतंकवाद को प्रश्रय देता है। पाकिस्तान को आज इसीलिए आतंकवाद की नर्सरी कहा जाता है और आईएसआई की विभिन्न आतंकी कार्रवाइयों में संलिप्तता बार-बार उजागर भी होती रही है। मुंबई हमले में भी उसकी भूमिका से अब अमेरिका पूरी तरह वाकिफ हो चुका है। यही नहीं अमेरिका में 9/11 हमलों में भी आईएसआई की भूमिका थी। अमेरिका अन्दरखाते यह सब जानता है पर चूंकि अफगानिस्तान में उसे आईएसआई का साथ चाहिए इसलिए भी सब कुछ जानते हुए भी अनजान बन जाता है। ताजा खुलासे से अमेरिका का पाक की ओर शायद ही नजरिया बदले पर भारत को यह संतोष जरूर होगा कि आज सारी दुनिया मानने लगी है कि आईएसआई एक आतंकी संगठन है।