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Tuesday, 3 July 2012

बिना सरकार की मिलीभगत से कराची का कंट्रोल रूम नहीं बन सकता था

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3 July 2012
अनिल नरेन्द्र
सउदी अरब का भारत को धन्यवाद करना चाहिए कि उसने हमको अबू जिंदाल जैसे खूंखार आतंकी को सौंपा। जिंदाल के ताजा कबूलनामे से भारत को मुम्बई हमले में पाकिस्तान का सीधा हाथ होने का सबूत मिला है। भारत हमेशा कहता रहा है कि 26/11 हमले के पीछे पाकिस्तान का हाथ है पर दुनिया मानने को तैयार नहीं थी। जिंदाल के बयानों से पता चलता है कि 26/11 के पीछे पूरी तरह पाक एजेंसियों को न केवल जिम्मेदारी सौंपी गई थी बल्कि उनके निर्देश में ही इस साजिश का ताना-बाना बुना गया। उल्लेखनीय है कि आतंकवाद और विशेषकर मुम्बई के 26/11 के हमले के मुद्दे पर भारत द्वारा अनेक बार सबूत सौंपे जाने के बाद भी पाकिस्तान उन्हें लगातार यह कहकर खारिज करता आ रहा है कि पुख्ता सबूत नहीं है। भारत ने शुक्रवार को कहा कि मुम्बई में 2008 के आतंकी हमले को अंजाम देने के लिए आतंकवादियों को निर्देश देने के लिए पाकिस्तान के सरकारी तंत्र की मदद से बनाए गए जिस कराची नियंत्रण कक्ष में सैयद जबीउद्दीन अंसारी उर्प अबू जिंदाल था, वहां उसके साथ अन्य लोगों के अलावा लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक हाफिज सईद भी मौजूद था और यह बात और किसी ने नहीं बल्कि भारत के गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने कही। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने कहा कि जिस कराची नियंत्रण कक्ष से जिंदाल मुम्बई में आतंकी हमला करने वाले दस आतंकवादियों को पल-पल निर्देश दे रहा था, बिना पाकिस्तान के सरकारी अमले के समर्थन के नियंत्रण कक्ष स्थापित ही नहीं किया जा सकता था। उन्होंने कहा कि जिस तरह भारत पाकिस्तान के पूर्व गृहमंत्री रहमान मलिक की इस बात से सहमत है कि जिंदाल भारतीय नागरिक है और वह कट्टरपंथी भी भारत में ही बना, उसी तरह पाकिस्तान को भी यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि जिंदाल वहां गया था, उस संगठन में शामिल रहा जिसने मुम्बई में हमला करने वाले आतंकवादियों को प्रशिक्षण दिया था। नियंत्रण कक्ष में बैठे हमले के मास्टर माइंडों में वह भी शामिल था। पाकिस्तान को यह भी स्वीकारना चाहिए कि जिंदाल को पाकिस्तान सरकार ने एक फर्जी पासपोर्ट जारी किया। जिंदाल के पास पाकिस्तान के दो पहचान पत्र भी थे। वह दावा करता है कि वह पाकिस्तानी है। पाकिस्तान में अबू जिंदाल को बहुत ही सुरक्षित पनाहगाह मिली हुई थी। अबू जिंदाल का पकड़ा जाना महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। वस्तुत जिंदाल से पूछताछ में मुम्बई आतंकी हमले से जुड़ी कई ऐसी जानकारियां मिल रही हैं जो अब तक जांच कार्य में एक प्रश्न बनी हुई थीं। इतना तो तय है कि जिंदाल लश्कर में महत्वपूर्ण व्यक्ति था। उसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई थी और वह जिम्मेदारी थी मुम्बई में आतंकी हमले को अंजाम देने वाले अजमल कसाब सहित दसों आतंकवादियों को हिन्दी सिखाना और प्रशिक्षित करना। उन्हें यह सिखाना कि मुम्बई वाले कैसे दिखते और बोलते हैं और किस तरह मुम्बईवासी की तरह दिखा जा सकता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस केस में भी पाकिस्तान सब आरोपों का खंडन कर अपने आपको पाक-साफ बताने का प्रयास करेगा पर जिंदाल की गिरफ्तारी और बयान और अजमल कसाब का हमारे हाथ में पहले से ही होना मुम्बई हमलों में पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बेनकाब करने के लिए महत्वपूर्ण है।

Thursday, 5 April 2012

हाफिज सईद मोस्ट वांटेड टेरोरिस्ट लिस्ट में दूसरे नंबर पर पहुंचा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 5 April 2012
अनिल नरेन्द्र
देर आए दुरुस्त आए। इतने दिन के बाद आखिर अमेरिका को भी यह समझ आ गया है कि ओसामा बिन लादेन के बाद आज की तारीख में दुनिया में सबसे खतरनाक आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा बन गया है और उसका मुखिया हाफिज सईद दुनिया का मोस्ट वांटेड टेरोरिस्ट। अमेरिका ने सोमवार रात हाफिज सईद के सिर पर 10 मिलियन डॉलर (करीब 50 करोड़ रुपए) का इनाम घोषित किया है। हाफिज सईद मुंबई पर हुए 26/11 के हमलों का मास्टर माइंड है और वह पाकिस्तान में रहकर अपनी आतंकी गतिविधियां चला रहा है। उसके निशाने पर अमेरिका, भारत पमुख हैं। भारत ने सईद को लेकर कई बार पाकिस्तान पर दबाव बनाया पर पाकिस्तान ने हमेशा मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की। पाकिस्तान ने हमेशा यही बहाना बनाया कि सईद के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है। हाफिज सईद ने इनाम के ऐलान के बाद पाकिस्तानी चैनलों में कहा कि हम किसी खोह या कंदरा में छिप कर नहीं बैठे हैं और अगर अमेरिका में साहस है तो वह हमें गिरफ्तार कर ले। यही नहीं सईद ने इनाम घोषणा के बाद अमेरिका पर जोरदार हमला बोला। उसने कहा कि पाकिस्तान के रास्ते होने वाली नाटो आपूर्ति रोके जाने और ड्रोन हमलों के खिलाफ देशव्यापी विरोध से वाशिंगटन हताश था। अल जजीरा चैनल ने हाफिज सईद के हवाले से कहा, हम गुफाओं में नहीं छिपे बैठे हैं जो हमें खोजने के लिए इनाम रखे जाएं। सईद ने कहा, मुझे विश्वास है कि या तो अमेरिका को बहुत सीमित जानकारी है और वह भारत द्वारा दी जा रही गलत सूचनाओं के आधार पर फैसले ले रहा है या फिर वह हताश है। अमेरिका की रिवार्ड्स फॉर जस्टिस वेबसाइट ने हाफिज सईद को अरबी और इंजीनियरिंग का पूर्व पाध्यापक तथा जमात-उद-दावा का संस्थापक सदस्य बताया है। वेबसाइट के अनुसार यह चरमपंथी इस्लामी संगठन है जिसका मकसद भारत के कुछ हिस्सों और पाकिस्तान में इस्लामी शासन स्थापित करना है। लश्कर-ए-तैयबा इस संगठन की लड़ाकू शाखा है। अमेरिका की वर्तमान मोस्ट वांटेड टेरोरिस्ट सूची में हाफिज सईद का नंबर दूसरा है, पहले पर अयमन अल जवाहिरी। यह अलकायदा पमुख है जिन पर 2.5 करोड़ डॉलर का इनाम है। अमेरिका के इस कदम का भारत ने स्वागत किया है। एक तरह से यह भारत के उन आरोपों की पुष्टि है कि लश्कर का यह पमुख आज की तारीख में सबसे ज्यादा खतरनाक आतंकी है। भारत के केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने कहा कि अमेरिका का कदम इस बात को साबित करता है कि पाकिस्तान आतंकवादियों को पनाह देता है। विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने कहा कि अमेरिका का यह कदम मुंबई हमलों के दोषियों को सजा दिलाने और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रखने की अमेरिका और भारत की पतिबद्धता जाहिर करता है। यह घोषणा ऐसे समय आई है जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी अजमेर शरीफ में जियारत करने के लिए भारत आ रहे हैं। हमारे पधानमंत्री ने जरदारी के लिए लंच रखने की योजना बनाई है। उम्मीद है कि लंच में बातचीत के दौरान मनमोहन सिंह जरदारी के साथ इस ताजा घोषणा पर भी चर्चा करेंगे। उधर पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के मंत्री रहमान मलिक ने कहा कि हमें अमेरिका की तरफ से इनाम के ऐलान की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है।
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Tuesday, 29 November 2011

अजमल आमिर कसाब पर अब तक 100 करोड़ खर्च हो चुका है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 29th November 2011
अनिल नरेन्द्र
26 नवम्बर को मुझे एक दोस्त ने एसएमएस भेजा कि शरद पवार को थप्पड़ मारने वाले हरविन्दर सिंह को जल्दी सजा हो जाएगी और दर्जनों निर्दोषों को मारने वाला अजमल कसाब को इतने वर्ष बीतने के बाद भी सजा नहीं हुई।
26/11 के आतंकवादी हमले के तीन साल बाद भी अजमल कसाब को फांसी नहीं हो सकी। फांसी देना तो दूर रहा उसे हम पाल-पोश रहे हैं, बिरयानियां खिला रहे हैं। खबर है कि कसाब पर भारत सरकार व महाराष्ट्र सरकार ने 100 करोड़ रुपये खर्च कर दिए हैं। उस काले दिन का एक मात्र जीवित आरोपी कसाब इस समय मुंबई की जेल में बन्द है। यह खर्च उसकी सुरक्षा, स्पेशल सेल, स्पेशल वार्ड, मेडिकल एक्सपैंस, खान-पान और वकील की फीस पर किया गया जबकि विडम्बना देखिए कि हमले के करीब 175 पीड़ितों के परिजनों को मुआवजे के रूप में 13.73 करोड़ रुपये ही दिए गए हैं। हमले में मारे गए लोगों के परिजनों ने शुक्रवार को महाराष्ट्र के राज्यपाल से मिलकर उनसे सरकार की ओर से किए वायदे पूरे करवाने की गुहार लगाई। उसी दिन 26/11 की तीसरी बरसी पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण से मिलने जा रही मृतकों की विधवाओं व परिजनों को शनिवार को हिरासत में लेकर हवालात में डाल दिया गया। यह लोग मुख्यमंत्री को वे सरकारी वायदे याद दिलाने जा रहे थे जो अब तक पूरे नहीं हुए हैं। केवल कसाब को ही अब तक फांसी नहीं दी गई बल्कि महाराष्ट्र सरकार ने मृतकों के परिजनों को जो वायदे किए थे वह भी दुःख से कहना पड़ता है, पूरे नहीं किए गए। हिरासत में लिए गए लोगों में 26/11 के अलावा मुंबई में अब तक हुए तीन आतंकी वारदातों के पीड़ित भी शामिल थे। मृतकों के परिजनों के अनुसार केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा आतंक पीड़ितों के परिवारों को दी जाने वाली तीन लाख रुपये की राशि बहुत से परिवारों को आज तक नहीं मिली है। क्योंकि राज्य सरकार ने पीड़ितों को यह राशि दिलवाने की पहल ही नहीं की। इस मोर्चे के नेतृत्व कर रहे पूर्व सांसद किरीट सोमैया के अनुसार 26/11 के हमले में मारे गए 163 लोगों में से सिर्प 61 के परिजनों को यह राशि प्राप्त हो सकी है। इसी प्रकार फरवरी 2010 में पुणे में हुए जर्मन बेकरी कांड में मारे गए 17 लोगों में से सिर्प 11 के परिजनों को अब तक मुआवजा राशि मिली है। 26/11 को हुए इस आतंकी हमले में बच निकलने में सफल रहे लोग अब भी दोषी ठहराए गए पाकिस्तानी बन्दूकधारी अजमल कसाब को फांसी पर चढ़ाए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे सभी इस बात से हतप्रभ हैं कि आखिर सरकार कसाब को क्यों बचाने में लगी है? 13 वर्षीय देविका शेरवन ने कहा कि कसाब को अभी तक क्यों फांसी पर नहीं लटकाया गया? हमारी सरकार आखिर किस चीज का इंतजार कर रही है? क्या एक और 26/11 जैसे हमले की? देविका के पिता नटवर लाल यहां छत्रपति शिवाजी टर्मिनेस (सीएसटी) पर अपनी बेटी और बेटे के साथ ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। उसी दौरान दो आतंकवादियों ने रेलवे स्टेशन पर गोली चलानी शुरू कर दी। आतंकवादियों की एक गोली देविका के दाहिने पैर में लगी जो अदालत में गवाही के दौरान सबसे युवा प्रत्यक्षदर्शी थी। देविका को लम्बे समय तक बैसाखी के सहारे चलना पड़ा है। ओबेराय होटल में अपने पति पंकज को खो देने वाली कल्पना शाह के लिए आतंकवादियों को माफ करना या भूलना आसान नहीं है। उन्होंने कहा कि मैं भी अपने पति को प्रतिदिन याद करती हूं। मुझे जीवनभर उनकी कमी खलेगी। 26/11 में मारे गए बापू साहब दूरगुडे की पत्नी अरुणा ने कहा कि मेरे पति एटीएस ऑफिसर थे। उनकी शहादत ने मुझे और मजबूत बना दिया है। मैंने वक्त के साथ जीना सीख लिया है। लेकिन हमलों के तीन साल बाद भी यह नहीं समझ पाई हूं कि अजमल कसाब अब तक क्यों जिन्दा है? शहीद पुलिसकर्मी अरुण चित्ते की पत्नी मनीषा चित्ते का कहना था कि मेरी बड़ी बेटियों को पता है कि उनके पापा शहीद हो गए हैं, लेकिन छोटी अब भी उनकी फोटो निहारती रहती है। पूछती है कि शहीद क्या होता है? मैं जानना चाहती हूं कि कसाब को फांसी कब दी जाएगी।
26/11, Anil Narendra, Daily Pratap, Qasab, Vir Arjun

Sunday, 20 November 2011

दोधारी तलवार के बीच लटके आसिफ जरदारी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th November 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान में अस्थिरता का दौर समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा। एक तरफ कट्टरपंथियों का बढ़ता दबाव तो दूसरी तरफ राजनीतिक अस्थिरता। राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी बहुत चुनौतीपूर्ण समय से गुजर रहे हैं। अमेरिका, भारत और पश्चिमी देशों का अलग दबाव है। अमेरिका के ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के पूर्व चेयरमैन माइक मुलेन ने आसिफ जरदारी द्वारा भेजी गई सीकेट लेटर की पुष्टि की है। बताया जाता है कि जरदारी ने यह चिट्ठी पाकिस्तानी सेना द्वारा तख्तापलट की आशंका में अमेरिका भेजकर मदद मांगी थी। मुलेन ने कहा कि मुझे ऐसा मेमो मिला जरूर था, लेकिन मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया था। उधर अमेरिका में पाकिस्तानी राजदूत हुसैन हक्कानी ने इस्तीफे की पेशकश की है। ऐसी रिपोर्ट सामने आई थी कि जरदारी ने सैन्य तख्तापलट के अंदेशे से ओबामा प्रशासन को गुप्त संदेश भेजा था जिसमें हक्कानी की भी कथित भूमिका थी। बताया जाता है कि इस संदेश में जरदारी ने पाक सेना की इस कार्रवाई को रोकने के लिए अमेरिका की मदद मांगी थी। बुधवार देर रात जनरल अशफाक कयानी आसिफ जरदारी से दोबारा मिले। मंगलवार को भी दोनों की मुलाकात हुई थी। हाल ही में जरदारी के एक भोजन में पाकिस्तानी सेना का कोई भी प्रमुख शामिल नहीं हुआ था। इससे इन अटकलों को बल मिला कि सरकार और सेना के बीच रिश्ते सामान्य नहीं हैं। बुधवार रात राष्ट्रपति निवास पर हुई बैठक में प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी भी मौजूद थे। राष्ट्रपति के प्रवक्ता फरातुल्लाह बाबर ने बैठक के बारे में विस्तृत जानकारी देने से इंकार कर दिया और महज इतना कहा कि तीनों नेताओं ने देश की सुरक्षा स्थिति पर चर्चा की।
कट्टरपंथियों की बढ़ती ताकत व निहायत खतरनाक मंसूबों से भी पाक सरकार की चिन्ताएं बढ़ गई हैं। खबर आई है कि लश्कर-ए-तोयबा अब न्यूक्लियर जिहाद का सपना देख रही है। इसके लिए उसने एक लम्बी रणनीति पर काम भी शुरू कर दिया है। लश्कर की योजना पाकिस्तानी परमाणु प्रतिष्ठान पर जिहादी मानसिकता में ट्रेनिंग पाए परमाणु वैज्ञानिकों के जरिये कब्जा करने की है। इस मकसद के लिए लश्कर अपने स्कूलों में अब इंग्लिश के साथ-साथ साइंस की पढ़ाई भी करवा रहे हैं। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में ही लश्कर के ऐसे 175 स्कूल चल रहे हैं। आतंकवाद के मामलों के विशेषज्ञ आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सीनियर फैलो विल्सन जॉन की ताजा किताब कैलिफेट्स सोल्जर्स ः द लश्कर ए तोयबाज लांग वॉर में पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर के खतरनाक इरादों का खुलासा किया गया है। विल्सन जॉन के मुताबिक, पाक सेना में अब जेहादी मानसिकता वाले अधिकांश अधिकारी आला पदों पर हैं। इसी तरह लश्कर ने इंग्लिश पढ़े-लिखे जेहादी छात्रों को पाकिस्तान के परमाणु प्रतिष्ठानों में भर्ती कराने की सोची समझी रणनीति पर अमल शुरू कर दिया है। जॉन के इस खुलासे से सारी दुनिया को सचेत हो जाना चाहिए। लश्कर के नापाक मंसूबे केवल जम्मू-कश्मीर या भारत-पाक तक समित नहीं हैं। यह पूरी दुनिया के लिए अलकायदा से भी बड़ा खतरा बनने जा रहा है। पाक सरकार पता नहीं इस अस्थिरता के दौर का सफल मुकाबला कैसे करेगी?
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Tuesday, 15 November 2011

Pakistan - advocating death sentence to Kasab

- Anil Narendra
Declaring Ajmal Kasab, accused of Mumbai terrorist attacks of 26/11 a terrorist, the Interior Minister of Pakistan, Rehman Malik advocated him to be hanged. At the sidelines of 17th SAARC Summit, Malik said, 'Pakistan has nothing to do with his activities. He is a non-state actor and should be hanged.' But commenting on Smjhauta Train blast also, he said that incidents like Mumbai attack and Samjhauta blast are adversely affecting the relations between both the countries. We fail to understand why Rehman made such a remark? Pakistan has been known for saying something and doing the opposite. The world knows that Pakistan's intelligence agency ISI was behind the Mumbai terror attacks. Countries like US and UK have also accepted this truth. Pakistan has excluded Jamat-ud-Dawa from the list of terrorist organizations. We should not take Pakistan's remarks at 17th SAARC Summit at Maldives seriously. According to sources, Pakistan's Interior Ministry had issued a list of 31 banned terrorist organizations, but it did not contain the name of Jamat-ud-Dawa, considered to be the umbrella organization for the most dangerous terror outfit in South Asia, Lashkr-e-Toiba. It was banned under the pressure from US and United Nations.
When it became clear that this organization was behind the 26/11 Mumbai attacks, India and US both demanded this outfit to be banned. United Nations Security Council banned this outfit vide its resolution No 1267. Besides, Australia, Britain and European Union also included this organization in the list of banned organizations. Under pressure from all sides, Pakistan also declared JuD as a banned outfit on 7th December 2008. It may be noted that Pakistan never seriously took any action against JuD Chief Hafiz Mohammed Said. He was detained, but later was set free by the Court for want of evidence. FBI had also played an important role in the investigations of Mumbai attacks, as a number of American citizens were killed in this attack. Both, India and US also handed over important evidence to Pakistan. Now, Rehman Malik is saying that Hafiz Said was not released by his government, but by the Supreme Court. ISI's intention also became clear in this case. During the hearing, the prosecution submitted information about involvement in the attack, but not proofs to that effect. Courts base their decisions on evidence not on mere information. How ridiculous is the argument? India had made available solid proofs to Pakistan. It may be mentioned that Pak government or its intelligence agency has not allowed any foreign investigation agency to interrogate Hafiz Mohammed Said.
Everybody knows that ISI and Lashkar were behind the 26/11 Mumbai attacks. I had recently referred to a BBC programme in this column. I am recalling it again just to remind Pak Interior Minister Rehman Malik of certain facts. BBC is an impartial-independent agency, whose credibility is beyond challenge. It has broadcast a programme titled 'Secret Pakistan' in two parts. In the first part, CIA official, Bruce Rudil, former adviser to the US President, Barack Obama, was quoted. Terrorists coming from Pakistan had attacked a number of important places in Mumbai on 26th November, 2008. Obama had been elected as the President of America by then, but he had not taken oath of the Office of the President. Rudil said, 'I asked Pak President to stop playing double game with us. He was also told that Pakistan has been doing this to US and its friends for many years. It is apprehended that such attacks will continue in future also.' Rudil said, 'There are imprints of Lashkar-e-Toiba all over these attacks (26/11). It was quite clear from the beginning that it was the job of LeT.' He further said, 'When you once connect these attacks with Lashkar, then these are sure to be linked to the Pak intelligence agency ISI.' In the second part of the programme, it was said that CIA had received information about direct involvement of ISI in Mumbai attacks.
Pakistan Interior Minister's remarks about hanging Kasab, cannot be taken seriously. Perhaps Rehman Malik wanted to mislead and make fool of the world, especially India with such remarks. But, such remarks cannot absolve Pakistan. Everybody knows that ISI and Pak Army are protecting these organizations and providing all possible help. In the beginning, Pakistan had refused to accept that Ajmal Kasab was a Pakistani citizen, which is the indicator of its intention. Till date, it has not accepted the bodies of the terrorists killed in the Mumbai attacks. Pakistan even did not take the bodies of its soldiers, who had entered Indian territories as infiltrators during the Kargil war. India had to perform their final rites. Rehman Malik also said that there was nothing surprising in Pakistan not being aware of the presence of Osama bin Laden in Abbotabad. He was a trained terrorist leader and he must have had full knowledge how to hide and where to hide. Sources say that in this case, Pakistan itself is providing protection to the Chief of Lashkar-e-Toiba, most dangerous terror outfit of South Asia, Hafiz Said. India no more will be tricked by Rehman Malik and his masters. Enough is enough.

कसाब को फांसी की पैरवी करने वाला पाक



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th November 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने मुम्बई हमलों के दोषी अजमल आमिर कसाब को गत गुरुवार को आतंकी मानते हुए उसे फांसी पर चढ़ाए जाने की वकालत की। 17वें सार्प सम्मेलन के दौरान कसाब से पल्ला झाड़ते हुए मलिक ने कहा, `उसकी गतिविधियों से पाकिस्तान का कोई लेना-देना नहीं है। वह नॉन स्टेट एक्टर है। इसलिए उसे फांसी मिलनी चाहिए।' लेकिन साथ ही उन्होंने समझौता ट्रेन ब्लास्ट पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि मुम्बई हमले और समझौता ट्रेन ब्लास्ट जैसी आतंकी घटनाएं दोनों देशों के रिश्ते खराब कर रही हैं। हमें समझ नहीं आया कि रहमान मलिक ने ऐसी बात क्यों की? पाकिस्तान की कथनी और करनी में हमेशा बहुत फर्प रहा है। सारी दुनिया जानती है कि मुम्बई हमले के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ था। यह बात अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों ने भी मानी है। मुम्बई हमले की साजिश रचने वाले जमात-उद-दावा को पाकिस्तान ने आतंकी संगठनों की सूची से बाहर कर दिया है। मालदीव में हुए 17वें सार्प सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान ने आतंकवाद से लड़ने के लिए चाहे कितनी ही बड़ी बातें क्यों न कही हों, हमें उसे गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। सूत्रों के मुताबिक सार्प सम्मेलन के कुछ ही दिन पहले पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने जो 31 प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों की सूची जारी की थी उसमें से जमात-उद-दावा का नाम नदारद था। यह संगठन बेहद खतरनाक है। दक्षिण एशिया के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन लश्कर-ए-तोयबा का सरपरस्त माने जाने वाले जमात-उद-दावा को अमेरिका व संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के दबाव में प्रतिबंधित किया गया था।
26 नवम्बर 2008 को मुम्बई में हुए आतंकी हमले में इस संगठन का हाथ पाए जाने के बाद भारत व अमेरिका दोनों ने ही इस संगठन पर प्रतिबंध की मांग की थी। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अपने प्रस्ताव (संख्या 1267) के जरिये इस पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके अलावा आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन व यूरोपीय संघ ने भी इस पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस चौतरफा दबाव के चलते पाकिस्तान ने 7 दिसम्बर 2008 को इसे प्रतिबंधित घोषित कर दिया था। अहम बात यह रही कि पाकिस्तान ने इस संगठन के प्रमुख हाफिज मोहम्मद सईद के खिलाफ कभी भी गम्भीरता से कार्रवाई नहीं की। दिखावे के लिए सईद को नजरबन्द किया गया और अदालत ने सुबूतों के अभाव में उसे रिहा कर दिया। चूंकि मुम्बई हमले में बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक मारे गए थे, इसलिए एफबीआई ने भी इसकी पड़ताल में अहम भूमिका अदा की थी। भारत व अमेरिका दोनों ही ने पाकिस्तान को उसके खिलाफ अहम सुबूत भी दिए थे। अब रहमान मलिक कह रहे हैं कि हाफिज सईद को सरकार ने नहीं बल्कि उनके देश की सर्वोच्च अदालत ने छोड़ा है। आईएसआई ने इस केस में भी अपनी नीयत का प्रदर्शन कर दिया। सरकारी पक्ष ने केस के दौरान आतंकी हमले में शामिल होने की सूचनाएं दीं, सुबूत नहीं। अदालत सुबूत के आधार पर कार्रवाई करती है, सूचना पर नहीं। यह दलील हास्यास्पद नहीं तो और क्या है। भारत ने उसके खिलाफ पाकिस्तान को पुख्ता सुबूत दिए थे। उल्लेखनीय है कि आज तक पाक सरकार या उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने किसी भी विदेशी जांच एजेंसी को हाफिज मोहम्मद सईद से पूछताछ करने की इजाजत नहीं दी है।
26/11 मुम्बई हमले के पीछे आईएसआई और लश्कर का हाथ था, यह बात अब सभी मानते हैं। मैंने पिछले दिनों इसी कॉलम में बीबीसी के एक कार्यक्रम का जिक्र किया था। पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक की याददाश्त ताजा करने के लिए फिर जिक्र कर रहा हूं। बीबीसी तो एक निष्पक्ष-स्वतंत्र एजेंसी है जिसकी विश्वसनीयता को चैलेंज नहीं किया जा सकता। बीबीसी ने दो हिस्सों में एक कार्यक्रम प्रसारित किया है जिसे `सीकेट पाकिस्तान' का नाम दिया गया था। कार्यक्रम के पहले हिस्से में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सलाहकार रहे सीआईए अधिकारी ब्रुस रडिल को कोट किया गया। पाक से आए आतंकियों ने
26 नवम्बर 2008 को मुम्बई के कई प्रमुख स्थानों पर हमला किया था। उस वक्त ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे, हालांकि उन्होंने शपथ नहीं ली थी। रडिल ने कहा, `मैंने पाकिस्तानी राष्ट्रपति से कहा कि वे हमारे साथ दोहरा खेल खेलना बन्द करें। उनसे यह भी कहा कि पाक सालों से अमेरिकी और उसके सहयोगियों के साथ ऐसा कर रहा है। उसके आगे भी ऐसा ही करते रहने का अंदेशा है।' रडिल ने कहा, `इन हमलों (26/11) में हर जगह लश्कर-ए-तोयबा की छाप नजर आती है। हमलों की शुरुआत से ही लगने लगा था कि यह लश्कर की करतूत है।' आगे कहते हैं कि एक बार जब आप लश्कर से इन हमलों को जोड़ते हैं तो आप इसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से भी जोड़ेंगे। कार्यक्रम के दूसरे हिस्से में कहा गया है कि सीआईए को यह जानकारी मिली थी कि मुम्बई के हमले में आईएसआई सीधे तौर पर शामिल थी।
पाकिस्तान के गृहमंत्री के इस बयान को गम्भीरता से नहीं लिया जा सकता कि कसाब को फांसी पर चढ़ा दो। सम्भव है कि रहमान मलिक ने सोचा हो कि ऐसा बयान देने से वह दुनिया और भारत को विशेष तौर पर गुमराह कर सकते हैं, बेवकूफ बना सकते हैं। ऐसे बयान देने से पाकिस्तान पाक साफ नहीं हो जाता। सबको पता है कि किस तरह से इन संगठनों को फलने-फूलने का पूरा मौका और हर सम्भव मदद आईएसआई और पाक फौज कर रही है। उसकी नीयत का अंदाजा तो इससे लगाया जा सकता है कि पहले तो पाकिस्तान ने अजमल कसाब नाम से किसी व्यक्ति को अपना नागरिक ही मानने से इंकार कर दिया था। आज तक इस हमले में मारे गए अपने देश के आतंकवादियों के शव तक नहीं लिए। इतना ही नहीं, उसने तो कारगिल युद्ध के दौरान घुसपैठी बनकर आए अपने सैनिकों तक के शव नहीं लिए। भारत को ही उनका अंतिम संस्कार करना पड़ा। रहमान मलिक ने यह भी कहा है कि अगर पाकिस्तान को यह नहीं पता चल पाया कि ओसामा बिन लादेन एबटाबाद में रह रहा था तो इसमें आश्चर्य कैसा? प्रशिक्षित आतंकी सरगना लादेन को पता था कि कैसे व कहां छिपा जाए। सूत्रों का मानना है कि यहां तो खुद पाकिस्तान ही दक्षिण एशिया के इस सबसे खूंखार आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तोयबा के रहनुमा हाफिज सईद को संरक्षण दे रहा है। भारत अब रहमान मलिक या उनके आकाओं की चालबाजियों में नहीं फंसेगा। बहुत हो चुका है।
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Wednesday, 9 November 2011

26/11 मुंबई हमलों का मास्टर माइंड थी आईएसआई

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th November 2011
अनिल नरेन्द्र
बीबीसी ने दो हिस्सों में हाल ही में एक कार्यक्रम प्रसारित किया जिसे `सीकेट पाकिस्तान' नाम दिया गया था। कार्यक्रम के पहले हिस्से में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सलाहकार रहे सीआईए अधिकारी ब्रस रडिल को कोट किया गया है। उन्होंने मुंबई हमले के वक्त राष्ट्रपति को सूचित किया था, `हर अंगुली पाकिस्तान की ओर उठ रही है। यह एक निर्णायक क्षण है।' पाक से आए आतंकवादियों ने 26 नवम्बर 2008 को मुंबई के कई प्रमुख स्थानों पर हमला किया था। उस वक्त ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति निर्वाचित हो गए थे हालांकि उन्होंने शपथ नहीं ली थी। अमेरिकी व्यवस्था के अनुसार उन्होंने जनवरी 2009 में शपथ ली थी। रडिल ने कहा, `मैंने पाकिस्तानी राष्ट्रपति से कहा कि वे हमारे साथ दोहरा खेल खेलना बन्द करें। उनसे यह भी कहा गया कि पाक सालों से अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ ऐसा कर रहा है। उसके आगे भी ऐसा ही करते रहने का अंदेशा है।' रडिल ने कहा, `इन हमलों में हर जगह लश्कर-ए-तोयबा की छाप नजर आती है। हमलों की शुरुआत से लगने लगा कि लश्कर की करतूत है।' उन्होंने कहा कि एक बार जब आप लश्कर से इन हमलों को जोड़ते हैं तो आप इसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से भी जोड़ेंगे। इस कार्यक्रम के दूसरे हिस्से में कहा गया है, `सीआईए को यह जानकारी मिली थी कि मुंबई के हमले में आईएसआई सीधे तौर पर शामिल थी।' काबुल में जुलाई 2008 में विस्फोट से लदी कार को भारतीय दूतावास के निकट उड़ा दिया गया था। इस हमले में 58 लोग मारे गए थे और 141 घायल हुए थे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति के कार्यकाल में काम कर चुके माइक वाल्ट्सं का कहना है, `सूचना और सिलसिलेवार घटनाक्रमों से पूरी तरह स्पष्ट हो गया था कि काबुल में विस्फोट करने वाले हक्कानी नेटवर्प को पाक का समर्थन मिला हुआ था।' उस वक्त काबुल में ब्रिटिश राजदूत शेरर्ड कोपेर कोलेस ने कहा कि आईएसआई का एक छोटा धड़ा हक्कानी नेटवर्प के सम्पर्प में है। इनके बारे में पश्चिमी देशों को कभी जानकारी नहीं मिली। इस कार्यक्रम में तालिबान के कुछ स्वयंभू कमांडरों ने खुलासा किया कि ब्रिटेन और अमेरिका के सैनिकों के खिलाफ तालिबान की लड़ाई में पाक का समर्थन मिलता है। एक स्वयंभू कमांडर मुल्ला अजीजुल्ला के मुताबिक आतंकवादियों के लिए प्रशिक्षण शिविर चला रहे विशेषज्ञ आईएसआई के सदस्य हैं। उनका किसी न किसी तरह इस खुफिया एजेंसी से जुड़ाव है। उसने कहा कि वे पहले हमें विस्फोटों के बारे में बताते हैं, उसके बाद हम लोगों को व्यवहारिक जानकारियां दी जाती हैं। प्रशिक्षण के समय वे शिविर में मौजूद रहते हैं। बीबीसी तो अपनी स्वतंत्र रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है। उनका हर प्रोग्राम सोच समझकर दिया जाता है। जब बीबीसी कहता है कि आईएसआई मुंबई हमलों का मास्टर माइंड थी तो यह सही ही है।
26/11, Anil Narendra, BBC TV, Daily Pratap, India, Mumbai, Obama, Pakistan, Terrorist, Vir Arjun

Monday, 18 July 2011

A zero tolerance policy must for government of India

- Anil Narendra          
Whenever Prime Minister Manmohan Singh and Home Minister P Chidambaram say that the culprits of Mumbai bomb blasts will not be spared, people just don’t care about it, as they have become immune to such statements. Manmohan Singh had uttered these words before the Mumbaikars on 26 November 2008. What has this government done since then? Nothing, but just hollow assurances. People of Mumbai have been frustrated with these empty assurances. They are also fed up with candle marches, peace marches and human chains. People want some action against the culprits. Learn from America. The day al-Qaeda attacked America on 28/11, it had taken a pledge of not resting in peace till Osama bin Laden and al-Qaeda are eliminated. No doubt it took US ten long years to complete this task, but it proved that it is true to its intentions and it has the will to carry out its pledge. It took rest only after penetrating enemy’s den and destroying it. A man learns from experiences and make future amends on the basis of the lessons learnt. That is why Britain, Spain and other Western countries have been able to foil terrorist attempts by maintaining constant alert. They are successful as they follow a zero tolerance policy towards terrorism, which means, they are not going to tolerate even a single terror act, whereas in our country, such attacks continue and we, on our part, also continue to issue empty threats. Hon’ble Home Minister, Mumbai has been the target of 8 bomb blasts during the period from 12 March 1993 to July 2011 and 682 persons have lost their lives in these attacks. Do you know the number of persons killed in terror-related incidents has almost equaled to that of terror killings in Karachi and Kabul. About 394 persons have been killed in terrorist acts in Mumbai alone since 2005, while 500 persons were killed in Karachi and 520 in Kabul during the same period. If we consider total terror deaths in Maharashtra, then this figure comes to 506. Your weak policies have made Mumbai, one of the most dangerous city of the world to live in. Chidambaram had announced the creation of National Investigation Agency-NIA with much fanfare. What has your NIA achieved? If we consider five other attacks, then it appears that the achievements of your NIA have been negative. We are still clueless about the five incidents in various parts of the country after the Mumbai terror attacks of 26/11. It is strange, when we consider that the investigation of three out of these five terror incidences is being carried out by the NIA. The mystery of German Bakery blast of Pune on 13 February, blast in Chinnaswamy Stadium just before the IPL match on 17 April, firing in Jama Masjid area in last September, blast at Delhi High Court and Varanasi bomb blasts has remained unsolved till date. Mr Chidambaram may recall his much-talked about announcement that the NIA was created with the objective of solving terror-related cases all over the country. The agency was entrusted with the solving the mystery behind Jama Masjid and Varanasi blasts, but there has been not even an indication of success in these cases. Similarly, local police is continuing with the investigations in the High Court and German Bakery incidents, but, as usual, there is still no break through. One person has been arrested in this regard, but the ATS has been unable to prove his involvement. The needle of suspicion in this matter points to terror organization, Indian Mujahidin, but the Agency is yet to produce any reliable evidence regarding its involvement. In a few instances, even if the case reaches the Court, it is rejected there for want of credible evidence. The reason is that the investigating agencies collect evidence in such an irresponsible manner that these are not firmly maintainable in the Courts. Advocates connected with the bomb blast cases in the Courts all over the country also confirm the negligent non-professional attitude of investigating agencies towards collecting of evidence, which is one of the reason why the accused are acquitted by the Courts, who, in turn come heavily on the agencies, but the agencies revert back to their non-professional mode of working. There have been instances, where false cases have been initiated on the basis of forcible confessions. The UPA government scrapped TADA in a haste, but it has not been able to replace it with an effective law that may ensure that culprits are brought to book. There is still no special law to deal with the terrorism that has become a serious threat for the security of the nation. There have been 21 minor or major terror-related incidents during the period from October 2005 to 7 December 2010.
Pakistan is involved with these latest Mumbai blasts in some way or the other. The American media has also been saying the same thing. Reacting on these blasts, the American media has said that these blasts have once again raised doubts about the effectiveness of action being taken by Pakistan against terrorist organizations and LeT, is considered to be the mastermind behind these blasts, which had also been responsible for the 2008 Mumbai attacks,. Whatever may be the outcome of the investigations, but one thing is clear that in spite of pressure from the international community on Pakistan, this organization is still operating from its soil, while the government of India, instead of taking any strong steps, is extending hand of friendship towards Pakistan. What to talk of punishment to the culprits, the government of India has even failed to impress upon Pakistan to expedite hearing of the Mumbai accused. We fail to understand the logic behind talks with Pakistan. There has been no improvement in Pakistan’s attitude. They are still pursuing terrorism as state policy. Metro city centres like Mumbai, Delhi and Bangalore are still on the hit list of Pak-supported terror orgnisations. These blasts are not going to stop till we adopt a zero tolerance policy. We shall not tolerate even a single act of terror. Our Prime Minister or Home Minister lack the courage to talk about LeT or Indian Mujahideen being behind these attacks or even indicate their involvement in these attacks. Indian Mujahideen and Lashkar-e-Toiba are hand in gloves with each other. The government has not succeeded in getting permission from Pakistan to interrogate the masterminds of Mumbai attacks, whereas it has kept the lone surviving terrorist Kasab alive and Afzal Guru has also been kept as a showpiece. Why the government is afraid of hanging Afzal Guru, which can, otherwise give a clear message to the terrorists? Today, we remember Julius Reberio and KPS Gill, who had indicated to Punjab terrorists in no uncertain terms that if they kill one person, they will retaliate with killing ten and bullet will be replied by bullet. Punjab was not freed from terrorism by chance. There was a solid strategy working behind it. Will to act by the government was there and security forces had been given a free hand in taking action against the terrorists.
People of the country are fed up by the weak government policies in combating terrorism. It may not be untrue, if we say that the people have reached to the zero tolerance level. For how long the Mumbai residents will have to live under the fear of such terrorism? Why even a single terror act be tolerated? People are fed up of hearing that we are living in a dangerous neighbourhood. They are fed up of assurances of punishment to the culprits. They need guarantee of security, so that they can lead a life, free of fear. No doubt, it is necessary for them to revert back to normal life, but it doesn’t mean that they are ready to accept all types of nonsense. Had any leader been the victim of such a terror attack, would the government had adopted the same attitude? It is the poor, defenceless and innocent people who are always the victims, but the government would have to understand the mood of the public. Public is crying, “enough is enough”.
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Sunday, 17 July 2011

भारत सरकार को आतंकवाद पर जीरो टालरेंस नीति अपनानी होगी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17th July 2011
अनिल नरेन्द्र
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी. चिदम्बरम जब यह कहते हैं कि मुंबई बम धमाकों के कसूरवारों को बख्शा नहीं जाएगा तो जनता को अब बुरा-सा लगने लगा है और ऐसे कोरे आश्वासन सुनकर अब जनता उखड़ने लगी है। मनमोहन सिंह ने यही शब्द 26 नवम्बर 2008 को भी मुंबई वालों को कहे थे। तब से लेकर इस सरकार ने किया क्या? कुछ नहीं। केवल कोरे आश्वासन। मुंबईवासी अब इन कोरे आश्वासनों से ऊब चुके हैं। वह कैंडिल मार्चों, शांति पीस मार्चों से ह्यूमन चेन बना-बनाकर आजिज आ चुके हैं। जनता कहती है कि कुछ कर के दिखाओ। अमेरिका से कुछ तो सबक लो। जब अलकायदा ने 28/11 को अमेरिका पर हमला किया था उसी समय अमेरिका ने घोषित कर दिया था कि वह तब तक दम नहीं लेगा जब तक वह ओसामा बिन लादेन व अलकायदा को खत्म नहीं कर देगा। बेशक इस काम में अमेरिका को 10 साल लगे पर उसने यह दिखा दिया कि वह अपने इरादे का पक्का है और जो कहता है उसे पूरा करने की इच्छाशक्ति भी रखता है। उसने अपने दुश्मन के घर में घुसकर दुश्मन को तहस-नहस करके ही दम लिया। आदमी अनुभव से सीखता है और भविष्य में उस सबक से सुधार करता है। यही वजह है कि ब्रिटेन, स्पेन और दूसरे पश्चिमी देश हर दम चौकन्ने रहकर आतंकवादियों के मंसूबे को फेल करते आ रहे हैं। यह इसलिए कामयाब हो रहे हैं क्योंकि उन्होंने `जीरो टालरेंस' की नीति अपना रखी है यानि एक भी हमला हम बर्दाश्त नहीं करेंगे और हमारे यहां हमले पर हमले होते जाते हैं और हम कोरी धमकियां देने से बाज नहीं आते। माननीय गृहमंत्री जी 12 मार्च 1993 से जुलाई 2011 के बीच अकेले मुंबई में 8 बम धमाके हो चुके हैं जिनमें 682 जानें जा चुकी हैं। क्या आपको यह मालूम है कि मुंबई में आतंकी घटनाओं में मरने वालों की संख्या अब कराची और काबुल में मरने वालों की संख्या के लगभग बराबर पहुंच चुकी है। अकेले मुंबई में लगभग 394 लोग 2005 से मारे जा चुके हैं जबकि इसी वक्फे में कराची में 500 और काबुल में 520 लोग मरे। अगर पूरे महाराष्ट्र की संख्या जोड़ी जाए तो यह संख्या 506 बन जाती है। मुंबई को अब दुनिया में सबसे खतरनाक शहरों में आपकी लचर नीति ने बना दिया है। चिदम्बरम ने बड़े जोरशोर से एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) की घोषणा की थी। क्या किया आपकी एनआईए ने? अगर 26/11 के बाद में हुए पांच अन्य हमलों की बात करें तो लगता है कि आपकी एनआईए कुछ नहीं कर पाई। 26/11 को मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई पांच घटनाओं का सुराग अभी तक तलाशा ही जा रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से तीन मामलों की जांच एनआईए के हाथों में है। 13 फरवरी को पुणे की जर्मन बेकरी, 17 अप्रैल को चेन्नई के चिन्नास्वामी स्टेडियम में आईपीएल मैच से ठीक पहले धमाका, पिछले साल सितम्बर के अन्त में जामा मस्जिद में गोलीबारी, दिल्ली हाई कोर्ट में धमाका और वाराणसी में हुए बम धमाकों का रहस्य अभी भी बरकरार है। याद कराना चाहेंगे कि चिदम्बरम साहब आपने बड़े जोरशोर से घोषणा की थी कि एनआईए का गठन गृह मंत्रालय ने इसलिए किया है ताकि देशभर में आतंकवाद से संबंधित मामले सुलझाए जा सकें। इस एजेंसी ने जामा मस्जिद, वाराणसी और चिन्नास्वामी स्टेडियम में हुई घटनाओं की गुत्थी सुलझाने का बीड़ा उठाया था, लेकिन अभी तक कामयाबी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। वहीं हाई कोर्ट और जर्मन बेकरी धमाकों को लेकर स्थानीय पुलिस द्वारा छानबीन की जा रही है, मगर स्थिति वही ढाक के तीन पात ही है। इस मामले में एक व्यक्ति की गिरफ्तारी हुई है, लेकिन एटीएस, घटना में उसकी संलिप्तता मजबूती से साबित नहीं कर पाई। इन मामलों में जांच में शक की सुई आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन पर घूमती रही है, लेकिन एजेंसी को उसकी संलिप्तता के पुख्ता सबूत अभी तक हाथ नहीं लग सके। इक्का-दुक्का मामले में अगर कोई केस अदालत जाता है तो वह भी सबूतों के अभाव में ठप हो जाता है। बम धमाकों के मुजरिम अक्सर कई मामलों में बरी हो जाते हैं। वजह यह कि जांच एजेंसियां लचर तरीके से सबूत जुटाती हैं और ऐसे सबूत अदालत में पुख्ता तौर पर ठहर नहीं पाते। देश में बम धमाकों के मुकदमों से जुड़े वकील भी तस्दीक करते हैं कि जांच एजेंसियां सबूत जुटाने के मामले में अक्सर ढीलाढाला, गैर-पेशेवर रवैया अख्तियार करती हैं जिसमें अभियुक्त छूट जाते हैं और जांच एजेंसियां कोर्ट की लताड़ झेल पहले की तरह गैर-पेशेवर ढर्रे पर चलने लगती हैं। ऐसे भी मामले सामने आए हैं जब जबरिया कबूलनामे के आधार पर झूठा केस बना दिया गया हो। यूपीए सरकार ने टाडा हटाने में बहुत जल्दी की पर आज तक उसकी जगह ऐसा कोई प्रभावी कानून नहीं बनाया जिससे आतंकियों को सजा मिल सके। देश की सुरक्षा के लिए खतरा बने आतंकवाद से निपटने के लिए आज भी कोई विशेष कानून देश में मौजूद नहीं है। अक्तूबर 2005 से लेकर 7 दिसम्बर 2010 तक छोटे-बड़े मिलाकर कुल 21 आतंकी मामले हो चुके हैं।
मुंबई में ताजा बम धमाकों के पीछे पाकिस्तान का हाथ कहीं न कहीं जरूर है। अमेरिकी मीडिया भी यही कह रहा है। अमेरिकी मीडिया ने इन धमाकों पर कहा है कि इन धमाकों ने पाकिस्तान द्वारा आतंकियों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई की प्रभावशीलता पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं और इसके पीछे लश्कर का हाथ होने का सन्देह है। जिसने 2008 में भी मुंबई में आतंकी हमला करवाया था। जांच से चाहे जो भी पता चले लेकिन एक चीज साफ है कि पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के भारी दबाव के बावजूद यह समूह अभी भी वहां से अपनी गतिविधियों का संचालन कर रहे हैं और भारत सरकार कोई सख्त कदम उठाने की जगह दोस्ती का हाथ बढ़ा रही है। भारत सरकार अब तक मुंबई में पिछले हमलों में पाकिस्तान में चल रहे मुकदमे को आगे नहीं बढ़वा सकी व कसूरवारों को सजा दिलवाना तो दूर रहा। पाकिस्तान से बातचीत की क्या तुक है, यह अपनी समझ से बाहर है। पाकिस्तान के चाल-चलन में कोई फर्प नहीं आया। आज भी टेरर स्टेट पॉलिसी है। पाक समर्थक आतंकी संगठनों के निशाने पर आज भी मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे बड़े शहर हैं। हम जब तक जीरो टालरेंस की नीति पर नहीं चलते तब तक इन धमाकों का सिलसिला रुकने वाला नहीं यानि एक भी हमला हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। हमारे प्रधानमंत्री या गृहमंत्री में इतनी हिम्मत नहीं कि लश्कर या इंडियन मुजाहिद्दीनों का इस हमले के पीछे होने की बात कह सकें या इशारा तक कर सकें? इंडियन मुजाहिद्दीन और पाकिस्तान के लश्कर-ए-तोयबा के बीच रिश्ते रहे हैं। सरकार आज तक पाकिस्तान से मुंबई हमलों के सूत्रधारों से पूछताछ करने की अनुमति नहीं ले सकी है जबकि एक मात्र जीवित बचे आतंकवादी कसाब को सीने से चिपकाए हुए हैं और अफजल गुरु को शो पीस बनाकर रखा हुआ है। क्यों नहीं अब अफजल गुरु को फांसी पर लटका देती ताकि इन आतंकियों को एक स्पष्ट संकेत जाए? आज उन जुलियस रिबेरो, केपीएस गिल की याद आती है जब उन्होंने पंजाब में आतंकवादियों को यह संदेश दिया था कि तुम एक मारोगे तो हम 10 मारेंगे। गोली का जवाब गोली से दिया जाएगा। यूं ही पंजाब में आतंकवाद समाप्त नहीं हुआ था। उसके पीछे ठोस रणनीति थी, सरकार की इच्छाशक्ति थी और सुरक्षाबलों को अपने हिसाब से कार्रवाई करने की खुली छूट थी।
देश की जनता इस सरकार की आतंकवाद से निपटने की ढुलमुल नीति से तंग आ चुकी है। अगर यह कहें कि जनता जीरो टालरेंस पर आ चुकी है तो शायद गलत न होगा। मुंबई वासियों को आखिर कब तक इसी तरह आतंक के साये में जीना पड़ेगा? एक भी आतंकी हमला आखिर क्यों बर्दाश्त किया जाए? लोग यह सुनते-सुनते आजिज आ चुके हैं कि हम एक खतरनाक पड़ोस में रहते हैं। उनके कान यह सुनकर पक चुके हैं कि हम कसूरवारों को नहीं बख्शेंगे। जनता को सुरक्षा की गारंटी चाहिए ताकि वह निरापद जीवन जी सके। बेशक उनको रुटीन पर लौटना कुछ हद तक जरूरी है पर इसका मतलब सरकार को यह नहीं निकालना चाहिए कि वह सब तरह की कोरी बकवास और हजम करने को तैयार है। अगर कोई नेता आतंकी हमले का शिकार होता तो भी क्या सरकार का यही रुख होता? यह तो बेचारी, निहत्थी, भोली-भाली साधारण पब्लिक है जो मारी जाती है पर सरकार को जनता के मूड को समझना होगा। जनता चीख-चीखकर पुकार रही हैö`बस अब और नहीं।'
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Saturday, 16 July 2011

Blood bath in Mumbai and the Union Home Ministry

 - Anil Narendra
Serial blasts in Mumbai have exposed the claims of alertness and security by the Union Ministry of Home Affairs, the Intelligence Bureau and the National Investigation Agency-NIC created with much hype to investigate terror related matters. The Home Ministry and P Chidambaram as the Home Minister had earned a fair amount of goodwill. People had started reposing trust in him and they had begun thinking that here is a Minister who has succeeded in stopping the bomb blasts to some extent. There had been no major blast after the 26/11 Mumbai attacks. Though minor bomb blast continued, but there was no attack on the scale of the Parliament attack or attack on Akshardham Temple or Mumbai carnage. These Wednesday blasts have caused embarrassment to the Union Ministry of Home Affairs, as these happened at time when the NIS team, specially formed for tackling the terror attacks was present in the town, and the Union Home Secretary was also on Mumbai tour on Monday. Although, his was a private visit, but it is strange that he and the NIC team could not foresee the impending threat, especially when it was on alert for last few days. But terrorists had the audacity to blot the image of Chidambaram, who in spite of all the odds was able to retain his portfolio in the heat of recent Cabinet reshuffle. According to Home Ministry sources, terrorists succeeded in triggering three blasts in Mumbai on Wednesday within an interval of eleven minutes, in spite of about half a dozen warnings by Intelligence agencies. It may also be mentioned that a few hours before, the US intelligence agency CIA had warned of possible terror attacks on some Indian cities including Mumbai. Not only this, it was also the 24th birthday of Aamir Ajmal Kasab, the main accused in Mumbai terror attacks of 26 November 2008, on Wednesday. Despite all this, alertness by security-intelligence agencies proved futile. The continued indifference of the Ministry towards terror attacks can be gauged from the fact that while presenting its monthly report in the first week of July, the Ministry had patted itself for no terror attack during last six months. Perhaps, the Ministry could not anticipate this possible threat. It is for the first time after P Chidambaram taking over as the Minister of Home Affairs that the terrorist organizations have directly challenged the country by causing three blasts within a span of few minutes. The Ministry is still groping in the dark for the culprits of German bakery blast of Pune and Varanasi Ghat blast. It is interesting to note that the Ministry had claimed to almost solve the German bakery blast case, but later, it was declared unsolved.
Though the Mumbaikars have, as usual faced the Wednesday blasts with courage and calmness, yet the Mumbai has changed over the years. Mumbai has faced about half a dozen terror attacks since 1993, including the 2008 attacks. At least 700 persons have lost their lives in these attacks. But, it appears that the violence is still far from being curbed. It is often said about attacks on Mumbai that an attack on Mumbai, the financial capital of India and the hub of entertainment industry, could prove a great set back for the country. Moreover, terrorist groups can draw attention of the world towards them by executing such attacks. But, now, it appears to be only one aspect of the story. Many Mumbai residents may tell you that following demolition of Babri Masjid in 1993, the city continued to reel under the communal riots for two weeks and since then the city has started crumbling down. Two months after the riots, the underworld caused serial bomb blasts as avenge the Babri Masjid demolition, claiming lives of more than 250 persons. The victims included a number of Muslims also. Many people believe that lawlessness started raising its head from that very day. Every government ignored the report in two volumes on communal riots and no action was taken against politicians and police personnel allegedly involved in the riots. But, at the same time, the administration took necessary action against those involved in the blasts. For this, the government was branded as anti-Muslim. The trust between two larger communities of the city started deteriorating. The author of a much appreciated book on Mumbai City, “Mumbai Fables” says that till now, Mumbai was considered to be a law-abiding, liberal city, but this image has now receded to the imagination only. Now the city is agog with conspiracies of politicians, builders, criminals, Hindu extremists, Muslim extremists since mid-1990s. There appears to be no change in the situation. The city is cracking under these conspiracies, which has made it an easy target for terror attacks. It has become a tired city full of bitterness under the facade of glittering nights, vast bungalows of film stars, the costliest building of the richest person of India. A large chunk of its population still lives in slums. Thousands, still sleep on pavements under the open sky. How can this city remain lively? Talking of Mumbai spirit after each blast or calamity has lost its meaning and has become tiring.       

Sunday, 5 June 2011

26/11 हमले की साजिश आईएसआई ने रची थी : शहजाद


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 5th June 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तानी पत्रकार सैयद सलीम शहजाद की निर्मम हत्या ने पाकिस्तान में भी हड़कम्प मचा दिया है। तमाम मुल्क में उसकी हत्या की निंदा की जा रही है।
पाक मीडिया खुलकर लिख रहा है कि पाकिस्तान पत्रकारों के लिए कितना खतरनाक देश बन चुका है। एक तरफ जहां पाकिस्तानियत डॉट काम के ब्लागर अदील नजाम ने शहजाद की मौत को देश के लिए चेतावनी बताया है वहीं `ए केस ऑफ एक्सप्लोडिंग मैंगोज' के लेखक मोहम्मद हनीफ ने ट्विटर पर लिखा है। क्या यहां कोई ऐसा पत्रकार है जो यह मानता है कि इसके पीछे खुफियों का हाथ नहीं है? नजाम ने अपने ब्लाग में लिखा है कि पाकिस्तानियों को असुरक्षित और भयभीत रहने की आदत सी हो गई है। आज वे और ज्यादा असुरक्षित और भयभीत महसूस कर रहे हैं। डेली टाइम्स ने अपने सम्पादकीय में लिखा ः पत्रकार की हत्या पत्रकारों के लिए एक चेतावनी की तरह है कि अगर वे ईमानदारी से पत्रकारिता करेंगे तो उनका यही अंजाम होगा। डॉन अखबार लिखता है कि यदि दुनिया पाकिस्तान को पत्रकारों के लिए एक जान लेवा मुल्क कहती है, तो इस तोहमत से छुटकारा पाना उसके लिए वाकई मुश्किल है।
शहजाद ने एक किताब `इन साइड अलकायदा एंड तालिबान ः बियोड़ बिन लादेन एं 9/11 लिखी थी। गत बीस मई को पकाशित इस किताब को डॉन अखबार ने पकाशित किया है। किताब में 40 वर्षीय लेखक शहजाद ने मुंबई हमले की पृष्ठ भूमि का विस्तार से वर्णन किया है। इसमें शहजाद ने बताया है कि किस तरह वर्ष 2008 में मुंबई हमले को अंजाम दिया गया। भारत के खिलाफ अभियान में इलियास कश्मीरी को विशेषज्ञता हासिल है। उसने यह सुझाव देकर अलकायदा के नेताओं को स्तब्ध कर दिया था कि वर्तमान गतिरोध को समाप्त करने का एक मात्र रास्ता युद्ध का विस्तार है। उसने भारत में ऐसा बड़ा अभियान चलाने का सुझाव दिया जिससे भारत और पाक में युद्ध छिड़ जाए और उससे अलकायदा के खिलाफ सभी पस्तावित अभियान रुक जाएं। इससे रोमांचित हो अलकायदा ने भारत पर आतंकी हमले के पस्ताव को मंजूरी दे दी। शहजाद ने कहा कि कश्मीरी ने तय हमले की पूरी साजिश का खाका सेना के पूर्व मेजर हारुन आशिफ को सौंपा।
किताब में शहजाद ने कहा है कि सेना के पूर्व मेजर ने इलियास कश्मीरी के गुर्गों की सहायता से आईएसआई की साजिश को हड़प कर उसे 26 नवम्बर 2008 को मुंबई के विनाशकारी हमले के रूप में बदल दिया।
दरअसल शहजाद आईएसआई और अलकायदा के बारे में जरूरत से ज्यादा जानकारी पा चुका था। यदि खोजी पत्रकारिता शहजाद की मौत का सबब बनी। शहजाद ने आशंका व्यक्त की कि आईएसआई देश के अधिकारिक परमाणु हथियार कार्यकम के अलावा एक गुप्त कार्यकम भी चला रही है। इसके तहत कायमलाऊ परमाणु बम तैयार किए जा रहे हैं। आईएसआई के कुछ अधिकारी महाविनाश के इन हथियारों को आतंकी गुटों तक पहुंचा सकते हैं। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में आतंकवाद के बारे में शहजाद बहुत कुछ जान चुके थे जो आईएसआई को बहुत सता रहा था। सैयद सलीम शहजाद को शायद अलकायदा के पास एटमी हथियार हेने और भारत या इस्राइल के खिलाफ उनके इस्तेमाल की साजिश की जानकारी थी। इससे पहले कि वह ऐसी गतिविधियों का और खुलासा करते उनका मुंह हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। मुंह तो बंद कर दिया पर उनकी लेखनी अमर हो गई है।
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Tuesday, 31 May 2011

आखिर यह तहव्वुर राणा कौन है और उस पर क्या आरोप है?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28th May 2011
अनिल नरेन्द्र
अमेरिका में शिकागो के व्यवसायी तहव्वुर राणा के खिलाफ मुकदमा शुरू हो गया है। उस पर 2008 के मुंबई हमले की साजिश में भागीदार होने का आरोप है। इस मुकदमें पर पूरी दुनिया की नजर है क्योंकि इससे आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान की भूमिका पर नई रोशनी पड़ रही है। उल्लेखनीय है कि इन दिनों शिकागो की अदालत में डेविड कोलमैन हेडली और तहव्वुर राणा पर मुंबई में 26/11 हमले का केस चल रहा है। डेविड हेडली के बारे में तो अब सारी दुनिया जान चुकी है पर यह तहव्वुर राणा कौन है?मुंबई हमले में लश्कर-ए-तैयबा की मदद करने का आरोपी पाकिस्तानी मूल का कनाडाई व्यवसायी तहव्वुर राणा तो डेविड हेडली के लिए सिर्प एक मोहरा भर था। हेडली से राणा के वकीलों ने कहा कि उनका मुवक्किल एक अच्छा आदमी है लेकिन उसे एक ऐसे दोस्त ने धोखा दिया, जिस पर वह विश्वास करता था। राणा के वकील चार्ल्स स्विफट ने हेडली से पूछा, वह आपका दोस्त था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया जैसा आप कह रहे हैं। हेडली ने जवाब दिया हां। हेडली ने राणा को एक ऐसा इंटेलीजेंट छात्र बताया,जो धार्मिक मान्यताओं का पालन करता थाऔर शराब नहीं पीता था। हेडली दूसरी ओर ड्रग्स की तस्करी करता था और कई महिलाओं के साथ समय बिताता था।
तहव्वुर हुसैन राणा पाकिस्तान में पढ़े-लिखे, बड़े हुए। चिकित्सा की डिग्री लेने के बाद वे पाकिस्तान सेना के मेडिकल कोर से जुड़ गए। पचास वर्षीय राणा और उनकी पत्नी दोनों ने 2001 में कनाडा की नागरिकता ले ली। उनकी पत्नी भी चिकित्सक है। वर्ष 2009में गिरफ्तारी से पहले राणा अमेरिका के शिकागो में रहता था। वह ट्रेवल एजेंसी समेत कई धंधों में लिप्त था। तीन साल पहले राणा ने बचपन के अपने दोस्त डेविड हेडली को मुंबई में अपनी ट्रेवल एजेंसी की शाखा खोलने में मदद की। आरोप है कि इस व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य था मुंबई हमलों के लिए लक्ष्यों की टोह लेना। हेडली पहले ही मुंबई हमलों की साजिश में शामिल होने की बात स्वीकार कर चुका है। उम्मीद है कि अब वे राणा के खिलाफ अभियोजन पक्ष का मुख्य गवाह होगा। हेडली ने तो लश्कर-ए-तैयबा और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से सीधे संबंध होने की बात स्वीकार कर ली है। पिछले कुछ दिनों से तो वह अदालत में 26/11हमले की डिटेल्स बता रहा है। राणा पर कुल मिलाकर 12 आरोप लगाए गए हैं, जिनमें अमेरिकी नागरिकों की हत्या में सहायक होने का भी आरोप शामिल है। मुंबई हमलों में मारे गए 160 से ज्यादा लोगों में छह अमेरिकी शामिल थे। राणा और हेडली को अक्टूबर 2009में डेनमार्प के अखबार के कार्यालयों पर हमले की योजना बनाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसी अखबार ने पहली बार पैगम्बर पर विवादास्पद कार्टून छापे थे। गिरफ्तारी के बाद हुई पूछताछ के दौरान पता चला कि दोनों मुंबई हमलों की साजिश में शामिल हैं। शिकागो की अदालत में दायर चार्जशीट में चार और लोगों के नाम हैं। कैप्टन इकबाल, साजिद मीर, अबू कहाफा और मजहर इकबाल। चारों पाकिस्तानी नागरिक हैं। लेकिन इनमें से सिर्प मजहर इकबाल की ही पाकिस्तान में गिरफ्तारी हो पाई है। हेडली की गवाही से राणा और आईएसआई के संबंध स्थापित होंगे और पाकिस्तान व आईएसआई बेनकाब होगी।

Thursday, 26 May 2011

नक्सलियों के पास अत्याधुनिक हथियार, हिंसा बढ़ने की आशंका

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 26th May 2011
अनिल नरेन्द्र
इसमें कोई सन्देह नहीं कि 26/11 मुंबई हमले के बाद से भारत के अन्दर कोई बड़ा आतंकी हमला नहीं हुआ पर वहीं बढ़ती नक्सली हिंसा चिन्ता का विषय जरूर है। अभी दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के गरियाबंद पुलिस जिले के उड़ीसा जुड़ी सीमा क्षेत्र में गश्त पर गए एक अपर पुलिस अधीक्षक सहित 12 पुलिस कर्मियों का अता-पता नहीं है। खबरों के अनुसार सभी नक्सलियों के हमले में शहीद हो गए हैं। पिछले दिनों प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी कहा था कि नक्सली समस्या भारत की सबसे बड़ी समस्या है। देश का एक-तिहाई से अधिक भाग इस नक्सली आंदोलन से प्रभावित है। नक्सली खुलेआम कहते हैं कि हमारी लड़ाई तो व्यवस्था बदलने की है, सत्ता बदलने की नहीं। हजारों लोग नक्सली, माओवादी हिंसा के शिकार हो चुके हैं। सरकार की ढुलमुल नीति के कारण इनका प्रभाव क्षेत्र में बढ़ता जा रहा है। उगाही के क्षेत्र में भी इनके पास इतना पैसा आ गया है कि यह अपनी मूवमेंट आगे बढ़ाने के लिए अत्याधुनिक हथियार इत्यादि खरीद रहे हैं। अब तो नक्सली वह हथियार इस्तेमाल करने लगे हैं जो भारतीय सेना व अर्द्धसैनिक बल इस्तेमाल करते हैं।
बस्तर के धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नक्सलियों के पास मौजूद तकनीक से हमारे खुफिया एजेंसियों की नींद उड़ गई है। नक्सली अब केवल बारुदी सुरंग विस्फोट एवं एके-47 तक ही सीमित नहीं रह गए हैं। सूत्रों के दावों पर यकीन करें तो खुफिया रिपोर्ट में नक्सलियों के पास अत्याधुनिक रॉकेट लांचर होने की बात भी सामने आई है। वहीं खबर तो यह भी है कि अब इनके पास हैंड ग्रैनेड का जखीरा और जहरीली गैस छोड़ने वाले संसाधन भी उपलब्ध हैं। नक्सलियों को चीनी हथियार मिल रहे हैं, इनमें हैंड ग्रैनेड, रॉकेट लांचर शामिल हैं। सुरक्षाबलों को हाल में उल्लेखनीय सफलता मिली है और इससे नक्सली बौखला उठे हैं। बीते कुछ महीनों में अंदरुनी जंगलों में मुठभेड़ और सर्च ऑपरेशनों के दौरान भी नक्सलियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। इससे पहले वे बिना रोक-टोक रणनीतियों के तहत आगे बढ़ रहे थे। नक्सलियों की इस बौखलाहट को पुलिस की सफलता मानी जा रही है।
2010 का साल नक्सली हिंसा का सबसे खूनी साल रहा है। पिछले एक साल में एक हजार से ज्यादा लोग नक्सली, माओवादी हिंसा की भेंट चढ़ गए। 44 वर्ष पहले 1967 में शुरू हुए नक्सलवादी आंदोलन के इतिहास में यह सबसे रक्तरंजित साल था। 2010 में नक्सल प्रभावित नौ राज्यों में उन्होंने 998 लोगों की जान ली। इनमें 285 पुलिसकर्मी और 700 से ज्यादा आम नागरिक थे। जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में आतंकी घटनाओं में मारे गए लोगों से यह संख्या पांच गुना ज्यादा है। नक्सली हिंसा का शिकार ज्यादातर वे गरीब आदिवासी और ग्रामीण हुए जिन्होंने उनका विरोध किया या पुलिस के मुखबिर बने। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने बीते दिसम्बर में अपनी रिपोर्ट में एक बार फिर नक्सली, माओवादी हिंसा को देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया। चिदम्बरम ने सुरक्षाबलों से कहा कि उन्हें सुरक्षात्मक नहीं बल्कि आक्रामक होने की जरूरत है। मुश्किल यह है कि यही चिदम्बरम साहब और प्रधानमंत्री कभी तो सख्ती की बात करते हैं कभी वार्ता की अपील करते हैं, नतीजा यह है कि सुरक्षाबलों को यह नहीं पता लगता कि सरकार की नीति आखिर है क्या?
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Wednesday, 25 May 2011

जैसे बीज बोओगे वैसी ही फसल काटोगे

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25th May 2011
अनिल नरेन्द्र

पाकिस्तान के अंदरुनी हालत बद से बदतर होते जा रहे हैं। शायद ही अब कोई दिन ऐसा जाता हो जब वहां आतंकी हिंसा न होती हो। रविवार रात को पाकिस्तानी तटीय शहर में अति सुरक्षित माने जाने वाला एक नौसेना बेस मेहरान हवाई ठिकाने पर आतंकियों ने जबरदस्त हमला किया। सुरक्षाबलों से 16 घंटे तक मुठभेड़ चली और तभी जाकर आतंकियों पर काबू पाया जा सका। इस हमले में 10 सुरक्षाकर्मी और 14 आतंकी मारे गए। मुठभेड़ के बीच ही चार आतंकवादियों ने खुद को उड़ा लिया। कराची का यह हमला मुंबई 26/11 हमले की तरह का ही था। फर्प सिर्प इतना था कि वह बहुत बड़ा था और लम्बा चला था, यह हमला छोटा था और जल्द खत्म हो गया पर यह हमला इसलिए गम्भीर है क्योंकि यह एक फौजी ठिकाने पर हुआ है और यहां घुसकर लगभग 15 घंटे तक सुरक्षाबलों का मुकाबला करके तालिबान ने पाकिस्तानी सत्ता सत्र व सेना को गम्भीर चुनौती दी है। पाकिस्तान में सेना, आईएसआई मुख्यालय, पुलिस ठिकाने, मिलिट्री कॉलेज लगभग सभी सुरक्षा ठिकाने आतंकवादी हमलों के शिकार हो चुके हैं। रावलपिण्डी स्थित सेना मुख्यालय पर अक्तूबर 2009 में हुए हमलों के बाद यह सबसे भयानक हमला था।
यह हमला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह ठिकाना उन चुनिन्दा महत्वपूर्ण ठिकानों में से एक है, जहां सुरक्षा इंतजाम चाक-चौबंद रहते हैं क्योंकि यहां पाक फौज से जुड़े कुछ अहम संस्थान हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि पीएनएस मेहरान जहां आतंकियों ने हमले को अंजाम दिया वहां पाक नेवी और एयरफोर्स का आसपास ही मजबूत बेस है। यह पाक नौसेना का पहला नेवल एयर स्टेशन है यानि यह पाकिस्तानी नेवी के हवाई दस्ते का ठिकाना है। यही नहीं, इससे बिल्कुल पास में ही स्थित है पाकिस्तान का फैजल एयरबेस। यहीं पर पाकिस्तानी एयरफोर्स का साउदर्न एयर कमांड मौजूद है। इस हमले ने अमेरिका को भी हिलाकर रख दिया है। पाक में सबसे महफूज माने जाने वाले कराची के मेहरान नौसैनिक अड्डे की सुरक्षा व्यवस्था को भेदते हुए आतंकवादियों ने जिस तरह से यह वारदात की उससे अमेरिका व पश्चिमी देशों में यह आशंका बलवती हो गई है कि पाक के एटमी हथियार सुरक्षित नहीं हैं। पाक के एटमी हथियारों का एक बड़ा हिस्सा कराची के इन बेसों में ही सुरक्षित रखा गया है। अमेरिका को अब यह डर सताने लगा है कि कहीं पाकिस्तान के एटमी हथियार आतंकियों के हाथ न लग जाएं। कराची का यह हमला पाक एटमी हथियारों को अपने कब्जे में लेने के लिए ड्रेस रिहर्सल भी तो हो सकता है। आतंकियों ने सोचा हो कि क्यों न हम इस बेस पर हमला करके तजुर्बा करें कि क्या अगली बार हम एटमी हथियारों को अपने कब्जे में ले सकते हैं?
हमारे बड़े बूढ़े कहते हैं कि जैसा बीज बाओगे वैसी ही फसल काटोगे। पाकिस्तान आज दुनिया की सबसे बड़ी टेरर फैक्टरी है। यहां बच्चों तक को जिहादी बनाया जा रहा है और इस काम के लिए धन दे रहे हैं सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात। पाकिस्तान के प्रमुख पत्र डॉन ने विकीलीक्स के हवाले से रविवार को यह खबर दी कि खाड़ी देशों से इन संगठनों को हर साल करीब 10 करोड़ डालर की मदद मिल रही है। इस राशि से पाकिस्तान के जेहादी संगठन अपने शिविर चला रहे हैं। आज पाकिस्तान अपने बुने हुए जाल में ही फंस गया है। उसे समझ नहीं आ रहा कि वह करे तो क्या करे? इधर कुआं है तो उधर खाई।
Tags: Pakistan, Anil Narendra, Vir Arjun, Terrorist, 26/11, Taliban, ISI, Daily Pratap, 

Saturday, 14 May 2011

America endorses ISI role in 26/11

ANIL NARENDRA
It is gratifying to note that finally America has also accepted Pakistan’s role in the 26/11 Mumbai attack. In a court in Chicago a charge-sheet has been filed by the FBI on 25th April. This is the second charge-sheet. It names Sajid Meer Mazhar Iqbal Abu Kahaffa along with Major Iqbal as accused. Besides these a Lashkar-e-Taiba cadre referred to as “Member D” has also been made accused. America has also given India a dossier regarding the charge sheet. Among the five terrorists named with the charge sheet is one ISI Major Iqbal also. The court proceedings in the Chicago court will start on 16th May. All the accused named in the charge sheet are Pakistani citizen. Sajid, Abu and Iqbal though were identified earlier but it is for the first time that their names have been mentioned in the charge sheet. American born terrorists David Coleman and the Tahavur Rana have also been accused in the Mumbai Attack. According the American authorities Sajid Meer is a member of Lashkar-e-Taiba and his job was to coordinate Lashkar activities with other terrorists groups. He also assisted Headley in many ways. Everybody is aware that Headley has accepted his role in the Mumbai attack. Abu Kahaffa is also connected to the Lashkar. He is known to train new recruits in the art of modern war-fare, weapons etc. at the Lashkar Training Camps. Mazhar Iqbal and “Member D” are alleged to be self made commander of Lashkar. The lawyers have said a person named Iqbal helped in overall planning and providing financial help in the Mumbai Terrorist attack. Sajid Kahaffa and Mazhar helped Headley “Member D” and others to plan and execute 26/11. In the Mumbai attack on 26.11.2008 166 people which also included many foreigners, lost their lives.

Besides the proofs provided in the charge sheet in Chicago Court Indian investigating agencies have also collected other vital facts. Very recently new evidence emerged in a house in Karachi. Pakistani investigating Agency found a box containing a GPS (Global Positioning System). This house was used as control room during 26/11 attack. The boat named Kuber in each terrorists reached Mumbai also had a GPS phone. This GPS’s packing cartons was also found in the house in Karachi. The GPS number, model, date of packing matches a specifications of the GPS found on the Kuber. With these new evidences India’s case against Zaki-ur-Rehman, Lakhvi and six other terrorist involved in the Mumbai attacks will become stronger. As the Chicago case proceeds new facts are likely to emerge which will prove the involvement of the Pakistan army and ISI.

Friday, 13 May 2011

26/11 मुंबई हमलों पर आईएसआई की भूमिका पर अमेरिकी मुहर

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 13 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
26/11 मुंबई हमलों पर आईएसआई की भूमिका पर अब अमेरिका ने भी मुहर लगा दी है। अमेरिका के शिकागो की एक अदालत में 25 अप्रैल को दाखिल दूसरी चार्जशीट में साजिद मीर, मजहर इकबाल और अबू कहाफा के साथ मेजर इकबाल का नाम बतौर आरोपी लिया गया है। इसके अलावा लश्कर-ए-तोयबा `मेम्बर डी' पहचान वाले एक व्यक्ति को भी आरोपी बनाया गया है। अमेरिका ने भारत को इससे जुड़ा एक डोजियर भी सौंपा है। डोजियर ने भारत के इस दावे पर मुहर लगा दी है कि मुंबई हमलों में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी का हाथ था। जिन पांच आतंकवादियों का नाम चार्जशीट में शामिल है उनमें आईएसआई के मेजर इकबाल का नाम भी शामिल है। इनके खिलाफ मामले की सुनवाई 16 मई को शिकागो अदालत में शुरू होगी। शिकागो की अदालत में दायर चार्जशीट में जिन आतंकियों के नाम आए हैं, ये सभी पाकिस्तानी नागरिक हैं। इनमें से साजिद, मजहर, अबू और इकबाल की शिनाख्त पहले भी की गई थी। लेकिन इनका नाम पहले चार्जशीट में नहीं था। पाकिस्तानी मूल के संदिग्ध आतंकी डेविड कोलमैन हेडली और तहव्वुर राणा को भी मुंबई हमले के मामले में आरोपी बनाया गया है। अमेरिकी आयोजकों के मुताबिक, साजिद मीर लश्कर से जुड़ा था और आतंकवादी संगठन और दूसरे संगठनों के बीच के संबंधों की निगरानी करता था। उसने हेडली के सहयोगी की भूमिका निभाई थी। मुंबई हमले से जुड़ी अपनी भूमिका को हेडली पहले से ही स्वीकार कर चुका है। अबू कहाफा का ताल्लुक भी लश्कर से है। वह लश्कर के प्रशिक्षण शिविर में आतंकवादियों को हमलों के लिए आधुनिक तकनीक के गुर सिखाता था। दूसरी ओर मजहर इकबाल और `सदस्य डी' इस पाकिस्तानी आतंकी संगठन के स्वयंभू कमांडर थे। वकीलों का कहना है कि इकबाल नामक शख्स ने मुंबई हमले की साजिश रचने और आर्थिक मदद देने में अहम भूमिका निभाई। साजिद, कहाफा और मजहर ने हेडली, सदस्य डी और अन्य के साथ मिलकर मुंबई हमलों की पूरी साजिश रची थी। 26 नवम्बर 2008 को मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले में 166 लोगों की जान गई थी जिनमें कई विदेशी भी थे।

मुंबई हमलों में पाक के शामिल होने का एक और सबूत भी सामने आया है। कराची के एक घर से एक ऐसा डिब्बा मिला है, जिसमें जीपीएस (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) रखा था। इस घर को मुंबई हमले के दौरान आतंकियों ने कंट्रोल रूम के तौर पर इस्तेमाल किया था। एक अधिकारी ने कहा कि पाक के साथ होने वाली द्विपक्षीय वार्ता में भी भारत इस मुद्दे को उठाएगा। जिस `कुबेर' नाम की नाव से हमलावर मुंबई पहुंचे थे, उन्होंने जीपीएस का उपयोग किया था। इसका पैकिंग कॉर्टून कराची में मिला है। यह पैकिंग कॉर्टून स्वयं पाक एजेंसी ने जब्त किया है। जीपीएस का नम्बर, उसका मॉडल और पैकिंग की तिथि उस जीपीएस से मिलती है जो कुबेर नामक नौका से मिला था। इस नए तथ्य से भारत का जकीउर रहमान लखवी सहित सात लश्कर आतंकियों के खिलाफ मुंबई हमले में चलाए जा रहे अभियोग को भी मजबूती मिलेगी। शिकागो में चल रहा केस जल्द और तथ्य उजागर करेगा और पाक सरकार, सेना व आईएसआई को बेनकाब करने में मदद देगा।

Saturday, 7 May 2011

For India, Lashkar is more dangerous than Laden

Anil Narendra
US might have felt relieved with the death of Osama bin Laden, but so far India is concerned, we are least affected by his death. For us, Lashkar-e-Toiba is more dangerous than Al Qaeda. Even the terrorist infrastructure in Pakistan is not going to be affected by the killing of bin Laden. A number of terror camps of dozens of outfits like Lashkar, Jaish-e-Mohammed, Hizb-ul- Mujahideen, Harkat-ul-Ansar are still operating in Pakistan. At present, about 37 terror camps are active in Pakistan. About 2,300 hardcore terrorists are operating in Jammu and Kashmir. Besides, about 900 foreign mercenaries are also present there. Foreign mercenaries from Pakistan, PoK, Afghanistan, Egypt, Sudan, Yemen, Bahrain, Bangladesh, Iran and Iraq are also present in J&K.
In fact, Indian Intelligence Agencies see no difference between Al Qaeda of Osama and Lashkar-e-Toiba. Indian dossier on Lashkar says that this terror outfit has close relations with Al Qaeda and Taliban. These terror organizations in Islamic Pakistan nation, fulfill their expansion needs out of the revenue received from the sale of hides of slaughtered animals on Eid and other religious celebrations, besides from donations and levies collected from people. According to sources, the Lashkar training camp at Pawanodheri in Manshera of Pakistan has the capacity to train 500 persons at a time. Lashkar also has more than 2,000 recruiting centers and offices spread in a number of big cities including Muzaffarabad, Lahore, Peshawar, Islamabad, Rawalpindi, Karachi, Multan, Quetta, Gujaranwala, Sialkot, Gilgit. Beside modern weapons, they have advanced communication equipment. According to intelligence sources, terrorists of Lashkar use voice internet protocol for ransom and communication in the Valley.
In spite of UN sanctions, the power of this terror outfit, working under different 19 names including Jamat-ud-Dawa and Lashkar-e-Toiba can be gauged from the operations of the organization. Even though the Lashkar has been banned by UN since 2005 and by Pakistan since 2002, its chief Hafiz Saeed did not refrain from organizing condolence meetings on the death of Osama bin Laden. In India, with the support of outfits like Indian Mujahideen SIMI has developed a model for outsourcing terrorism. In Bangladesh, Jamaat-ul-Mujahideen and Harkat-ul-Jihad al-Islami (HuJI) has direct links with Lashkar. Mumbai terror attack has, now forced US to acknowledge the fact that expansion of Lashkar and targeting Western countries are a cause of serious concern. Lashkar terrorists have proved this point by targeting Khasad House, an important place for Israelis and Hotel Taj, a preferred stay-destination for Western tourists in Mumbai. India must fight its fight against terrorism on its own. We, however, can pressurize US in destroying terror factories in Pakistan or help us in destroying them.

Saturday, 30 April 2011

मेजर इकबाल सहित लश्कर के 4 आतंकी अमेरिकी अदालत में आरोपी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 30 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

26/11 हमलों में एक अमेरिकी अदालत में दूसरा आरोप पत्र दाखिल किया गया है। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि 26/11 मुंबई हमलों में पाकिस्तान और आईएसआई सीधी जुड़ी हुई थी। सोमवार को शिकागो की संघीय अदालत में दूसरी बार आरोप पत्र दाखिल किया गया। इस नए आरोप पत्र के मुताबिक 26/11 हमले के साजिशकर्ताओं में चार नए नाम जुड़ गए हैं। इनमें से एक पाकिस्तानी सेना का मेजर इकबाल भी है। मेजर इकबाल के अलावा साजिद मीर, मजहर इकबाल और अबू कहाफा को भी इस केस में शामिल किया गया है। इन सबके अलावा लश्कर-ए-तोयबा के एक अन्य अनाम आदमी `मेम्बर डी' पर भी आरोप लगाए गए हैं। यह सभी पाकिस्तान में रहने वाले हैं। इन पर भारत में अमेरिकी नागरिकों की हत्या में मदद करने और आतंकवादियों को उकसाने का आरोप है।
नए आरोपों में कहा गया है कि मुंबई हमले के दौरान हमलावर (अजमल कसाब एण्ड कम्पनी) सैटेलाइट फोन के जरिये पाकिस्तान में मौजूद साजिद मीर, अबू कहाफा और मजहर इकबाल से सीधे सम्पर्प में थे। आरोप पत्र के मुताबिक हमले के आखिरी समय तक उन्होंने मुंबई में मौजूद आतंकवादियों को बंधकों को मारने, आग लगाने और ग्रैनेड फेंकने जैसे आदेश भी दिए। फरवरी 2010 में पाकिस्तान को सौंपे गए एक डोजियर में भारत ने भी पाकिस्तान सेना के दो अफसरों `मेजर इकबाल' और `मेजर समीर अली' पर मुंबई हमले में संलिप्त होने का आरोप लगाया था। यह डोजियर 25 फरवरी 2010 को भारत-पाक विदेश सचिवों की नई दिल्ली में हुई वार्ता के दौरान सौंपा गया था।
मेजर इकबाल का नाम पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिक डेविड हेडली से एफबीआई की पूछताछ में सामने आया है। इन चारों का नाम पहले भी मामले में आया था, हालांकि अभियोग में इनके नामों को नहीं जोड़ा गया था। पहले केवल अमेरिका में शुरू होने वाले मुंबई हमले के केस में केवल डेविड हेडली और पाकिस्तानी मूल के कनाडा निवासी तहव्वुर हुसैन राणा पर अभियोग लगाए गए थे। 26/11 हमलों में छह अमेरिकी नागरिक मारे गए थे चूंकि यह अदालती अमेरिकी अदालत में चल रही है इसलिए इसका महत्व ज्यादा हो जाता है। मुकदमे के दौरान कई डिटेल्स पेश होंगी जिससे 26/11 में पाकिस्तान की सीधी इन्वालमेंट साबित होगी। चूंकि यह अमेरिकी अदालत में होगा इसलिए पाकिस्तान इतनी आसानी से इससे अपना पल्ला झाड़ भी नहीं पाएगा। अब तो पाकिस्तान भी यह मानने लगा है कि 2008 के मुंबई हमलों में इन आतंकियों का हाथ था। पाक गृहमंत्री रहमान मलिक ने कहा है कि उनके देश की जांच एजेंसियों ने कहा है कि वर्ष 2008 के मुंबई हमले के साजिशकर्ताओं को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त सबूत हैं और उन्हें विश्वास है कि कोर्ट इन्हें जरूर दोषी ठहराएगी। मलिक ने कहा, `मुझे इन मामलों में इसलिए भी यकीन है, क्योंकि सबूतों को एकत्र कर कोर्ट में पेश किया जा चुका है।' पाक अदालत में तो केस चल ही रहा है पर ज्यादा जरूरी शिकागो अदालत का मुकदमा है। यह पाकिस्तान और आईएसआई को पूरी तरह बेनकाब कर देगा।

Friday, 29 April 2011

आईएसआई एक आतंकवादी संगठन है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 29 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

भारत तो हमेशा से कहता आया है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई एक सही एजेंसी नहीं है और यह आतंकवाद को बतौर एक हथियार इस्तेमाल करती है पर अमेरिका सहित अधिकतर पश्चिमी देश हमारी बात से सहमत नहीं थे। अमेरिका ने तो आतंकवाद के खिलाफ जंग में पाकिस्तान को अपना स्ट्रेटेजिक पार्टनर तक बना रखा है पर जब खुद पर बीतती है तो अमेरिका भी बोलने  में मजबूर हो जाता है कि आईएसआई एक आतंकवादी संगठन है। द गार्डियन जैसे प्रतिष्ठित ब्रिटिश अखबार ने अमेरिकी गुप्तचर फाइलों का हवाला देते हुए कहा है कि गुआंतानामो-वे के जांचकर्ताओं को की गई सिफारिश में इंटरसर्विसेज महानिदेशालय के साथ-साथ अलकायदा, हमास और हिजबुल्ला को एक चुनौती करार दिया गया है। सितम्बर 2007 के इन दस्तावेजों में कहा गया है, इन समूहों में से किसी से भी संबंधित होने का अर्थ आतंकवादी या विद्रोही गतिविधि है। दस्तावेज में कहा गया है, `इन संगठनों के साथ संबंध रखने का अर्थ है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति ने अलकायदा या तालिबान को समर्थन दिया है या वह अमेरिका पर गठबंधन बलों के खिलाफ कार्रवाइयों में लिप्त रहा है।' हाल ही में अमेरिका की गुप्तचर सेवाओं को खबरें मिली थीं कि आईएसआई तालिबान को अफगानिस्तान में कई वर्षों से समर्थन दे रही है। इस खबर के प्रकाशित होने के कुछ समय बाद ही यह नया खुलासा हुआ है। अमेरिकी अधिकारियों की ओर से तैयार खुफिया दस्तावेज में आईएसआई का जिन तीन दर्जन आतंकी संगठनों के साथ उल्लेख किया गया है उनमें अलकायदा, तालिबान के अलावा भारत को खासतौर पर आतंकित करते रहने वाले लश्कर-ए-तोयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन भी हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि यह दस्तावेज 2007 में तैयार किया गया हो लेकिन माना जा रहा है कि अमेरिका को चुनौती देने वाले संगठनों की सूची में से आईएसआई को अभी हटाया नहीं गया है। इसका सीधा अर्थ है कि जिस तरह पाकिस्तान ने आतंकवाद को लेकर दोहरे मानदंड अपना रखे हैं उसी तरह अमेरिका ने भी। पाकिस्तान यह दावा करता है कि वह भी आतंकवाद  के खिलाफ है और अपने दावे को सही ठहराने के लिए खुद के आतंकवाद से त्रस्त होने का रोना रोता है, लेकिन सच्चाई यह है कि वह एक बड़ी संख्या में आतंकी संगठनों का परोक्ष-प्रत्यक्ष रूप से समर्थन करता है। समय-समय पर अमेरिकी विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और यहां तक कि राष्ट्रपति बराक ओबामा यह कह चुके हैं कि आतंकवाद के खिलाफ अपेक्षित कदम उठाने से पाकिस्तान इंकार कर रहा है।
सारी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान दुनिया में एक मात्र देश है जो अपनी नीति और रणनीति के तहत आतंकवाद को प्रश्रय देता है। पाकिस्तान को आज इसीलिए आतंकवाद की नर्सरी कहा जाता है और आईएसआई की विभिन्न आतंकी कार्रवाइयों में संलिप्तता बार-बार उजागर भी होती रही है। मुंबई हमले में भी उसकी भूमिका से अब अमेरिका पूरी तरह वाकिफ हो चुका है। यही नहीं अमेरिका में 9/11 हमलों में भी आईएसआई की भूमिका थी। अमेरिका अन्दरखाते यह सब जानता है पर चूंकि अफगानिस्तान में उसे आईएसआई का साथ चाहिए इसलिए भी सब कुछ जानते हुए भी अनजान बन जाता है। ताजा खुलासे से अमेरिका का पाक की ओर शायद ही नजरिया बदले पर भारत को यह संतोष जरूर होगा कि आज सारी दुनिया मानने लगी है कि आईएसआई एक आतंकी संगठन है।