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Tuesday, 21 February 2012

अमेरिकी संसद को उड़ाने की साजिश नाकाम कर दी गई

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th February  2012
अनिल नरेन्द्र
अमेरिका ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि वह 9/11 आतंकी हमले के बाद कितनी चौकस है। उसका आतंक विरोधी अभियान तब रंग लाया जब एफबीआई ने अमेरिकी संसद (कैपिटल हिल) को उड़ाने की साजिश को नाकाम कर दिया। अमेरिका के न्याय विभाग के मुताबिक आत्मघाती हमला करके अमेरिकी संसद को उड़ाने की साजिश रचने वाले मोरक्को के एक शख्स को गिरफ्तार किया है। 29 वर्षीय अमीन अल खलीफी के तौर पर की गई है। खलीफी को शुक्रवार अमेरिकी संसद के पार्किंग लॉट से गिरफ्तार किया गया। खलीफी एक बमों से भरी बैल्ट पहनकर व हाथ में सब-मशीनगन लेकर अमेरिकी संसद को उड़ाना चाहता था। उसे यह नहीं मालूम था कि जो बमों से लदी बैल्ट उसको दी गई और जो हथियार दिए गए वह सब नकली थे। दरअसल एफबीआई ने एक स्टिंग ऑपरेशन के तहत बहुत पहले से ही अपने एक एजेंट को अलकायदा के उस गिरोह में शामिल करने में सफलता पा ली थी। वही अंडर कवर एजेंट अलकायदा का कार्यकर्ता बनकर खलीफी की गतिविधियों पर नजर रखता रहा। उसी ने खलीफी को यह नकली हथियार दिए और जब वह अपने प्लान के मुताबिक कैपिटल हिल की पार्किंग एरिया में पहुंचा तो उसे रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। अमेरिका की एफबीआई और ज्वाइंट टैरेरिज्म टास्क फोर्स का यह संयुक्त अभियान सफल रहा। खलीफी को सामूहिक विनाश के हथियार का इस्तेमाल करके जन सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने और आम जनता पर गोलीबारी करने की कोशिश का आरोपी बनाया गया है। अमेरिकी अटार्नी नील मैक्ब्राइड ने कहा कि खलीफी को लग रहा था कि वह अलकायदा के लिए काम कर रहा है लेकिन वह अलकायदा का छद्म अभियान चला रही एफबीआई के शिकंजे में फंस चुका था। खलीफी का आरोप सिद्ध हो जाता है तो उसे आजीवन कारावास की सजा मिल सकती है। अदालती दस्तावेजों के अनुसार खलीफी 1999 में वीजा पर अमेरिका आया था लेकिन वीजा की अवधि समाप्त होने के बावजूद वह यहां टिका रहा और उसने कभी भी अमेरिका की नागरिकता हासिल करने के लिए आवेदन नहीं दिया था। एफबीआई के जनवरी 2011 के हलफनामे में बताया गया कि एक विश्वसनीय सूत्र ने उसे बताया कि खलीफी ने वर्जीनिया के एक घर पर कुछ लोगों से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान एक व्यक्ति ने उसे एके 47 और दो रिवाल्वर तथा कुछ विस्फोटक दिए। खलीफी ने हथियार लेते हुए कहा कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध दरअसल मुसलमानों के खिलाफ युद्ध है और हमें युद्ध के लिए तैयार हो जाना चाहिए। खलीफी को एक रेस्तरां पर हमला करना था लेकिन पिछले माह उसने अपनी योजना बदली दी और उसने संसद भवन पर हमला करने की मंशा जताई थी। उसने पश्चिम वर्जीनिया में बाकायदा हमले का अभ्यास भी किया था। संसद पर हमला करने के लिए उसने 17 फरवरी का दिन चुना था। पिछले माह उसने कैपिटल हिल के आसपास चक्कर लगाकर उपयुक्त स्थान की तलाश भी कर ली थी। लेकिन उसे हमले से पहले ही धर लिया गया। अमेरिका की सुरक्षा और गुप्त व्यवस्था इतनी मजबूत है, यह एक बार फिर साबित हो गया।
9/11, America, Anil Narendra, Daily Pratap, Terrorist, USA, Vir Arjun

Tuesday, 4 October 2011

अमेरिका का अलकायदा को दोहरा झटका


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th October 2011
अनिल नरेन्द्र
अमेरिका और अलकायदा, लश्कर-ए-तोयबा के बीच लड़ाई जारी है। लश्कर और अलकायदा ने मिलकर अमेरिका के रक्षा मुख्यालय पेंटागन को उड़ाने की एक साजिश रची तो उधर यमन के पहाड़ों पर अमेरिका ने एक हवाई हमला करके अलकायदा की यमन शाखा के खूंखार आतंकवादी अनवर अल-अवलाकी को मार गिराया। पहले बात करते हैं पेंटागन पर हमले की साजिश की। अमेरिकी न्याय विभाग ने बताया है कि एक 26 वर्षीय अमेरिकी नागरिक रिजवान फिरदौस पर विदेशी आतंकवादी संगठन विशेषकर अलकायदा को विदेशों में अमेरिकी सैनिकों पर हमले करने के लिए विस्फोटक सामग्री तथा संसाधन मुहैया करने के प्रयास का आरोप भी लगाया गया है। रिजवान फिरदौस को मैसायुसरस के फ्रैमिंघम में गिरफ्तार किया गया है। एक हलफनामे के मुताबिक 2011 के जनवरी की शुरुआत में सहयोग करने वाले गवाहों की रिकार्ड की गई बातचीत में फिरदौस ने बताया था कि उसने पेंटागन पर छोटे ड्रोन विमानों से हमला करने की साजिश रची थी। इसमें विस्फोटक होते और विमान को जेपीसी सिस्टम द्वारा निर्देशित किया जाना था। अप्रैल 2011 में फिरदौस ने अपनी साजिश का विस्तार कर उसमें एक अन्य स्थान पर हमले को शामिल किया। 2011 के मई और जून में फिरदौस ने छिपाकर दो पेन ड्राइवर सौंपे जिसमें पेंटागन और कैपिटल पर हमले की साजिश का कदम दर कदम निर्देश सहित ब्यौरा था। साजिश के मुताबिक इस हमले के लिए रिमोट कंट्रोल से चलने वाले तीन विमानों और छह व्यक्तियों का इस्तेमाल किया जाना था जिसमें वह व्यक्ति भी शामिल था जिसने खुद को `आमिर' बताया है। अरबी भाषा में आमिर का मतलब नेतृत्व करने वाला होता है। फिरदौस की गिरफ्तारी अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों की एक शानदार सफलता है। समय रहते एक खतरनाक साजिश को पर्दाफाश करके उन्होंने एक बड़ा आतंकी हमला होने से बचा लिया।
उधर ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद अमेरिका ने अलकायदा को एक और तगड़ा झटका दिया है। यह झटका अलकायदा की यमन शाखा के खूंखार आतंकी अनवर अल-अवलाकी का मारा जाना है। अवलाकी अमेरिकी मूल का आतंकवादी था। धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने और इंटरनेट के जरिये अमेरिका में हमलों के लिए आतंकवादियों की भर्ती करने के चलते उसने अलकायदा में अहम दर्जा हासिल कर लिया था। एक बार फिर अमेरिका की गुप्तचर एजेंसियों ने उल्लेखनीय कार्य कर दिखाया। जिस कार में अवलाकी सफर कर रहा था, उस पर ड्रोन और जेट विमानों से हमला किया गया। इस कार में अवलाकी सफर कर रहा था। माना जा रहा है कि वह हमले में मारा गया। यमन की सरकार ने कहा कि पहाड़ी प्रांत जाफ के काशेफ शहर के बाहर सुबह 9ः55 पर  अनवर अल-अवलाकी को निशाना बनाया गया और वह मारा गया। जाफ राजधानी साना से 140 किलोमीटर पूर्व में स्थित है। स्थानीय कबायलियों और सुरक्षा एजेंसियों ने कहा कि अवलाकी दो कारों में सफर कर रहा था। उसके साथ अलकायदा की यमन शाखा के दो और आतंकी भी थे। जिस समय उन पर हवाई हमला हुआ वह अल-जाफ के पास स्थित मारिव प्रांत जा रहा था। अवलाकी मैक्सिको में पैदा हुआ। उसके माता-पिता यमन के थे। उसने अपनी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई अमेरिका में की। अवलाकी का सेनेडियागो में सम्पर्प दो ऐसे लोगों से हुआ जिन्होंने 9/11 के हमले में सुसाइड हाइजैर्क्स की भूमिका निभाई। एफबीआई ने उससे पूछताछ की थी लेकिन एजेंसी को उसे हिरासत में लेने का कोई कारण नहीं मिला और उसे छोड़ दिया गया। 2004 में अवलाकी यमन आया। वह एक धर्मोपदेशक बन गया और उसने बरसों से इंटरनेट पर अपने उपदेशों में अमेरिका का विरोध किया और जिहाद की अपीलें करता रहा। अमेरिका की यह दोहरी सफलता उसकी आतंकविरोधी अलर्टनैस के कारण मिली। उसका गुप्त जानकारी हासिल करने का यंत्र एक बार फिर एक तरफ तो अपने देश में खतरनाक हमले को रोकने में सफल रहा, दूसरी ओर एक कट्टर अमेरिका विरोधी आतंकवादी को भी साफ करने में सफल रहा। भारत की गुप्तचर और जांच एजेंसियों को अमेरिकी सिस्टम से कुछ सीखना चाहिए। हम आज तक किसी भी जांच में सफल नहीं हुए। न ही हमें हमले से पहले कोई सूचना ही मिलती है। यूं ही नहीं अमेरिका की धरती पर 9/11 के बाद से एक भी हमला नहीं हो सका।
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Wednesday, 22 June 2011

अफगानिस्तान में 10 साल पहले अमेरिका घुसा क्यों था?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
अफगानिस्तान में तेजी से राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं। अमेरिका ने अब वहां से भागने के उपायों पर अमल करना आरम्भ कर दिया है। हाल के दिनों में दो ऐसी खबरें आई हैं जिनसे यह साफ होता है कि वहां कुछ खेल चल रहा है। पहली खबर जो आई वह यह थी कि भारत सहित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी 15 सदस्य देशों ने प्रतिबंधों के लिहाज से एक ऐसी सूची को मंजूरी दी है जिसमें तालिबान और अलकायदा को अलग-अलग नजरिये से देखा जाएगा। इसका मकसद तालिबान और अफगानिस्तान में सुलह के प्रयासों में शामिल करने से जुड़ा है। इस संबंध में सुरक्षा परिषद ने गत शुक्रवार रात पूर्ण बहुमत से दो प्रस्ताव पारित किए। इनमें प्रतिबंधों को लेकर तालिबान के लिए अलकायदा से एक अलग सूची की बात की गई है। इस कदम के बाद अब अलकायदा और तालिबान आतंकवादियों को अलग-अलग पैमानों पर तोला जाएगा। दूसरी घटना है अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई का यह कहना कि अमेरिका तालिबान से बातचीत कर रहा है। इस सम्पर्प के बारे में यह सम्भवत पहली आधिकारिक पुष्टि है। करजई ने काबुल में एक सम्मेलन में कहा कि तालिबान के साथ बातचीत शुरू हो गई है। बातचीत अच्छी चल रही है। विदेशी सेनाएं विशेषकर अमेरिका खुद ही बातचीत कर रहा है। अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान में चल रहा युद्ध 10वें साल में प्रवेश कर गया है और वहां पर इस संघर्ष के राजनीतिक समाधान की आवाज तेज होती जा रही है।
अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने जो खुलासा किया है वह अफगानिस्तान के लिए जितना खतरनाक है, उतना ही अमेरिका की स्वार्थपरता और दोहरेपन का एक और सबूत भी है। अफगानिस्तान के खिलाफ अमेरिका ने आखिर युद्ध क्यों छेड़ा था? जहां तक हम समझ सके हैं कि 9/11 हमलों के लिए अमेरिका अलकायदा और तालिबान को जिम्मेदार मानते हुए उन्हें सबक सिखाने के लिए यह युद्ध छेड़ा गया था। पिछले 10 सालों में पहले तो अमेरिका ने इसी तालिबान हुकूमत को सत्ता से हटाया और अब वही तालिबान अच्छा हो गया है और उसे दोबारा सत्ता सम्भालने की तैयारी हो रही है। हम राष्ट्रपति बराक ओबामा और अमेरिका की मजबूरी समझ सकते हैं। उन्होंने घोषणा कर रखी है कि 2014 तक अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की पूरी वापसी होनी है इसलिए वह आनन-फानन में समस्या का हल निकालना चाहते हैं। इसी के तहत तालिबान से बातचीत शुरू की है, जो हालांकि अभी शुरुआती दौर में है। अमेरिका के जेबी संगठन संयुक्त राष्ट्र ने तालिबान और अलकायदा पर इसीलिए पुरानी व्यवस्था तोड़ते हुए जो संदेश दिया है उसका लब्बोलुआब यही है कि अगर अलकायदा का साथ छोड़कर तालिबान अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में सहयोगी बनता है तो उसे `माफी' दे दी जाएगी।
हमें थोड़ा आश्चर्य इस बात पर भी है कि आखिर भारत ने क्या सोचकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी? क्या भारत की नजरों में भी तालिबान एक अच्छा संगठन बन गया है जिससे भारत को अब कोई खतरा नहीं है? सवाल यह नहीं कि तालिबान कैसा है, सवाल यह है कि एक आतंकी संगठन जिसने अपना एजेंडा सार्वजनिक किया हो उससे आप समझौते की बात कर रहे हो, वह भी बकवास शर्तों पर? मामला तो यह है कि एक आतंकी संगठन से बातचीत कर अमेरिका ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसके तमाम फैसलों के पीछे सिर्प उसका अपना स्वार्थ होता है, उसे इस बात की कतई परवाह नहीं कि इस फैसले का भारत-पाकिस्तान-ईरान मुल्कों पर क्या असर पड़ेगा? न ही उसे अब वैश्विक आतंकवाद से कोई लेना-देना है। विद्रुप तो यह है कि इस बातचीत में अफगान सरकार को भी शामिल नहीं किया गया। खुद अफगान मानते हैं कि यह अत्यंत घातक कदम होगा और मुल्क फिर 2001 से पहले की स्थिति में पहुंच जाएगा। अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा नुकसान भारत को भी होगा। भारत द्वारा अफगानिस्तान में चल रही विभिन्न पुनर्निर्माण योजनाओं को भारी झटका लगेगा। इससे करजई सरकार की छवि, कार्यक्षमता और भविष्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा पर अमेरिका को इन सबसे क्या लेना-देना है। इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी कि एक दशक पहले जिस अमेरिका ने `वॉर ऑन टेरर' का नारा देकर अफगानिस्तान में इसलिए प्रवेश किया था कि अलकायदा और तालिबान को समाप्त कर सके, आज वह उसे उन्हीं आतंकियों के हवाले करने के बारे में सोच रहा है ताकि उसे अफगानिस्तान से भागने का रास्ता मिल जाए?
Tag: 9/11, Afghanistan, Al Qaida, America, Anil Narendra, Daily Pratap, India, Iran, Osama Bin Ladin, Pakistan, Security Council, Taliban, UNO, USA, Vir Arjun

Wednesday, 11 May 2011

ऑपरेशन बिन लादेन की सफलता ने सीआईए के सारे पाप धोए

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 11 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
अमेरिका की खुफिया एजेंसी सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी उर्प सीआईए ने ऑपरेशन जेरोनिमो ईकेआईएस (यानि एनिमी किल्ड इन एक्शन) करके न केवल अमेरिका के सबसे खतरनाक अंडर कवर ऑपरेशन को सफल अंजाम दिया बल्कि पिछले सारे कलंक एक ही झटके में धो डाले। ओसामा बिन लादेन को पहली बात तो ढूंढना आसान नहीं था, फिर ढूंढने के बाद उसे ठिकाने लगाना वह भी एक दूसरे देश के अन्दर और भी मुश्किल था पर सीआईए ने ह्यूमन इंटेलीजेंस और इलैक्ट्रॉनिक इंटेलीजेंस के बीच जो समन्वय बनाया वह शीत युद्ध के बाद उसकी सबसे बड़ी सफलता है। सीआईए ने यह साबित कर दिया कि वह विश्व की अतिसक्षम खुफिया एजेंसियों में से एक है। 11 सितम्बर, 2001 के बाद से ही इस एजेंसी की क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगाए जा रहे थे कि विश्व के सर्वाधिक समृद्ध और शक्तिशाली देश के मुंह पर करारा तमाचा रसीद करने वाले ओसामा का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाई। जाने-माने विशेषज्ञों को लगने लगा था कि सीआईए भी दुनिया की अन्य खुफिया एजेंसियों की तरह नौकरशाहों और लालफीताशाही की शिकार हो गई है और यह भी कि उसकी क्षमता का प्रचार ज्यादा है, जिसमें किवंदतियां अधिक और असलियत कम है पर ऑपरेशन जेरोनिमो (ओसामा अभियान का सांकेतिक कूटनाम) ने न केवल अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, सीआईए के निदेशक लियोन पनेटा, सीआईए और अमेरिकी खुफिया तंत्र की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाए हैं बल्कि आज की तारीख में खुफिया जानकारी के एकत्रीकरण और विश्लेषण के बारे में कुछ कीमती सबक भी मुहैया करवाए हैं।
सीआईए के लिए यह जानकारी काफी महत्वपूर्ण साबित हुई कि लादेन अलकायदा के अभियान को संदेश वाहकों के जरिये चला रहा है। इनमें से दो अभियान चालक अमेरिका की गिरफ्त में आ चुके थे। वर्ष 2004 में अलकायदा के एक कार्यकता की गिरफ्तारी से ओसामा के संदेश वाहक अबू अहमद अल कुवैती की पहचान हुई। कुवैतों उस फराज-उल-लिबी का सहयोगी था, जिसने अलकायदा के अभियान संचालक और 9/11 के सूत्रदार खालिद शेख मोहम्मद की जगह ली थी। वर्ष 2005 में लिबी को पकड़े जाने के बाद इस बात की पुष्टि हो गई कि कुवैती बिन लादेन का तभी से संदेश वाहक बना हुआ था। गौरतलब है कि इंटेलीजेंस का यह महत्वपूर्ण टुकड़ा गिरफ्तारशुदा लोगों से की गई पूछताछ से उभरा है। एक बार जब कुवैती की पहचान हो गई तो अगला सुराग सिग्नल इंटेलीजेंस के जरिये तब मिला जब सीआईए ने कुवैती और एक अन्य व्यक्ति के बीच टेलीफोन पर हो रही बातचीत को इंटरसेप्ट किया। इससे कुवैती को खोजने में मदद मिली, जिसका वाहन एबटाबाद के उस संदिग्ध परिसर में पाया गया। हवाई निगरानी के जरिये उस इमारत पर लगातार नजर रखी गई। अमेरिकी विशेषज्ञों ने सारे इंटेलीजेंस को अच्छी तरह परखते हुए परिसर में ओसामा की मौजूदगी की तार्पिक संभावनाओं की गहन जांच की। बाद की कहानी तो सबको मालूम ही है। पूरे प्रकरण से साफ है सीआईए ने ह्यूमन और इलैक्ट्रॉनिक इंटेलीजेंस दोनों का इस्तेमाल किया और अमेरिका के अब तक के सबसे सफल और कठिन ऑपरेशन को अंजाम दिया। भारत की खुफिया एजेंसियों को इससे कई सबक मिलते हैं। अगर वह लेना चाहे तो?

Saturday, 7 May 2011

For India, Lashkar is more dangerous than Laden

Anil Narendra
US might have felt relieved with the death of Osama bin Laden, but so far India is concerned, we are least affected by his death. For us, Lashkar-e-Toiba is more dangerous than Al Qaeda. Even the terrorist infrastructure in Pakistan is not going to be affected by the killing of bin Laden. A number of terror camps of dozens of outfits like Lashkar, Jaish-e-Mohammed, Hizb-ul- Mujahideen, Harkat-ul-Ansar are still operating in Pakistan. At present, about 37 terror camps are active in Pakistan. About 2,300 hardcore terrorists are operating in Jammu and Kashmir. Besides, about 900 foreign mercenaries are also present there. Foreign mercenaries from Pakistan, PoK, Afghanistan, Egypt, Sudan, Yemen, Bahrain, Bangladesh, Iran and Iraq are also present in J&K.
In fact, Indian Intelligence Agencies see no difference between Al Qaeda of Osama and Lashkar-e-Toiba. Indian dossier on Lashkar says that this terror outfit has close relations with Al Qaeda and Taliban. These terror organizations in Islamic Pakistan nation, fulfill their expansion needs out of the revenue received from the sale of hides of slaughtered animals on Eid and other religious celebrations, besides from donations and levies collected from people. According to sources, the Lashkar training camp at Pawanodheri in Manshera of Pakistan has the capacity to train 500 persons at a time. Lashkar also has more than 2,000 recruiting centers and offices spread in a number of big cities including Muzaffarabad, Lahore, Peshawar, Islamabad, Rawalpindi, Karachi, Multan, Quetta, Gujaranwala, Sialkot, Gilgit. Beside modern weapons, they have advanced communication equipment. According to intelligence sources, terrorists of Lashkar use voice internet protocol for ransom and communication in the Valley.
In spite of UN sanctions, the power of this terror outfit, working under different 19 names including Jamat-ud-Dawa and Lashkar-e-Toiba can be gauged from the operations of the organization. Even though the Lashkar has been banned by UN since 2005 and by Pakistan since 2002, its chief Hafiz Saeed did not refrain from organizing condolence meetings on the death of Osama bin Laden. In India, with the support of outfits like Indian Mujahideen SIMI has developed a model for outsourcing terrorism. In Bangladesh, Jamaat-ul-Mujahideen and Harkat-ul-Jihad al-Islami (HuJI) has direct links with Lashkar. Mumbai terror attack has, now forced US to acknowledge the fact that expansion of Lashkar and targeting Western countries are a cause of serious concern. Lashkar terrorists have proved this point by targeting Khasad House, an important place for Israelis and Hotel Taj, a preferred stay-destination for Western tourists in Mumbai. India must fight its fight against terrorism on its own. We, however, can pressurize US in destroying terror factories in Pakistan or help us in destroying them.

Thursday, 5 May 2011

क्या जवाहिरी और मुल्ला उमर भी पाक सेना के संरक्षण में हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 05 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र

अमेरिका ने पाकिस्तान के इस दावे को मानने से इंकार कर दिया है कि वह अपनी धरती पर ओसामा बिन लादेन की मौजूदगी से अनजान था। अमेरिका के डिप्टी नेशनल सिक्यूरिटी एडवाइजर जॉन ब्रेनन ने मंगलवार को कहा कि लादेन जिस देश में लम्बे समय से छुपा था, वहां उसका कोई सपोर्ट सिस्टम ने हो, यह बात कुछ हजम नहीं होती। मैं यह आंकलन नहीं लगाना चाहता कि सपोर्ट सिस्टम किस तरह का हो सकता है, लेकिन अमेरिका मानता है कि वह पाकिस्तान  में छह साल से ज्यादा समय से रह रहा था। लादेन का पाकिस्तान की राजधानी के इतने नजदीक पाया जाना सवाल खड़ा करता है। सीआईए प्रमुख  लियोन पैनेटा ने साफ कहा कि अमेरिकी अधिकारियों को शक था कि पाकिस्तान के साथ काम करने से ऑपरेशन को लीक कर देते। अमेरिका के प्रमुख सांसदों ने पाकिस्तान पर अमेरिका से डबल गेम खेलने का आरोप लगाया है और उन्होंने पाक के लिए अमेरिकी सहायता पर कटौती चाही है। सीनेटर सूसन कालिंस ने कहा कि इस्लामाबाद से सिर्प 120 किलोमीटर दूर लादेन का मारा जाना यह दिखाता है कि पाक हमारा सुनिश्चित सहयोगी नहीं है। उधर पाकिस्तान का कहना है कि लादेन के खिलाफ अमेरिकी ऑपरेशन हमारी जानकारी के बिना अवैध था। उसका यह भी कहना है कि लादेन के खिलाफ ऑपरेशन में सफलता हमारे सहयोग से मिली। मंगलवार रात को जारी पाक सरकार के बयान में कहा गया है कि एबटाबाद और आसपास का इलाका खुफिया एजेंसियों की नजरों में 2003 से था, तभी 2004 में अलकायदा का अहम टारगेट पकड़ा गया। लादेन के परिसर के बारे में आईएसआई ने 2009 में सीआईए को सूचना दी थी। यह बात अलग है कि सीआईए की टेक्नोलॉजी एडवांस थी सो उसने हमसे मिले सुरागों के आधार पर लादेन तक पहुंचने में सफलता पाई। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय का कहना है कि सरकार को अमेरिकी ऑपरेशन की जानकारी नहीं थी। अमेरिकी हेलीकॉप्टर पाकिस्तानी रॉडार की नजरों से बचकर पाकिस्तानी एयरस्पेस में आए थे। सूचना मिलने पर पाकिस्तानी जेटों ने भी उड़ान भरी थी। पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने कहा है कि रविवार को ऑपरेशन में पाक शामिल नहीं था, लेकिन उसके सहयोग से ही लादेन का खात्मा हो सका। उन्होंने कहा कि लादेन की मौजूदगी का पाक अधिकारियों को पता नहीं था। अमेरिका में पाक के राजदूत हुसैन हक्कानी ने माना है कि हमारे देश में लादेन का सपोर्ट सिस्टम था, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार ने लादेन को बचाने में कोई भूमिका नहीं निभाई थी।
लादेन के पाकिस्तान में ही छुपे होने के बाद यह बात भी साफ हो गई है कि अलकायदा की दूसरी पंक्ति के नेता अल जवाहिरी और तालिबानी नेता मुल्ला उमर भी पाकिस्तानी सेना की शरण में छिपे हैं। ओसामा के मारे जाने के बाद पाकिस्तान पर अब इन नेताओं को भी जिन्दा या मुर्दा पकड़ने का अमेरिकी दबाव बढ़ेगा। इन नेताओं की गिरफ्तारी या मौत के बाद ही आतंकवाद की रीढ़ तोड़ी जा सकती है। इसके साथ ही अफगानिस्तान में अमेरिकी नेतृत्व वाली अंतर्राष्ट्रीय सेना का मुकाबला कर रहे तालिबान लड़ाकों को भी पाकिस्तानी सेना की मदद बन्द करवानी होगी। ओसामा के मारे जाने के बाद अब आतंकवाद और पाकिस्तानी सांठगांठ पूरी तरह उजागर हो गई। भारत यह बात वर्षों से कहता आ रहा है पर अमेरिका की दोहरी नीति के कारण अमेरिकनों को समझ नहीं आई।

जेरोनिमो ईकेआईए सुनने को थे बेकरार ओबामा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 05 मई 2011
अनिल नरेन्द्र
एक बार जब यह सुनिश्चित हो गया कि एबटाबाद के एक घर में ओसामा बिन लादेन छिपा हुआ है तो अमेरिकी सुरक्षा विभाग ने राष्ट्रपति बराक ओबामा को दो विकल्प दिए। पहला कि इमारत परिसर को बमों से उड़ा दिया जाए, दूसरा कि जमीनी हमला करके उसे तबाह कर अन्दर सभी लोगों को मार दिया जाए या गिरफ्तार किया जाए। बराक ओबामा ने दूसरा  विकल्प चुना। उन्होंने कहा कि जमीनी हमला करो ताकि हम सब और सारी दुनिया में यह निश्चित रूप से निर्णायक रूप से तय हो जाए कि ओसामा बिन लादेन ही छिपा है और हमला उसी पर किया गया है। इस काम के लिए प्रतिष्ठित नेवी सील की एक विशेष टीम चुनी गई। अफगानिस्तान के अमेरिकी बैस से हेलीकॉप्टरों ने उड़ान भरी। भारतीय समयानुसार रात दो बजे चार हेलीकॉप्टरों ने हवेली की घेराबंदी शुरू कर दी और यह सारी कार्रवाई राष्ट्रपति ओबामा, विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और टॉप कमांडर व्हाइट हाउस के बेसमेंट में सिचुएशन रूम में बन्द होकर खुफिया वीडियो क्रीन पर देख रहे थे। यूएस नेवी सील्स के जवानों के हेलमेट पर कैमरे लगे थे। ओबामा बेसब्री के साथ लादेन के मारे जाने से संबंधित कोड मैसेज मिलने का इंतजार कर रहे थे। यह मैसेज था, जेरोनिमो ईकेआईए। सीआईए के डायरेक्टर लियोन ई. पैनेटा ने कहा कि हमें जेरोनिमो दिखाई दिया है। इसके कुछ ही मिनट बाद उन्होंने कहा कि जेरोनिमो ईकेआईएस यानि एनिमी किल्ड इन एक्शन। लादेन की बाईं आंख पर गोली मारी जा चुकी थी। ओबामा ने कहा वी गाट हिम।
दरअसल राष्ट्रपति ओबामा ने राष्ट्रपति का पद्भार सम्भालते ही सीआईए के डायरेक्टर लियोन पैनेटा को आदेश दिया था कि मुझे 30 दिन के अन्दर एक ऐसा प्लान चाहिए जिसमें ओसामा लादेन को या तो जिन्दा पकड़ा जाए या फिर मुर्दा। सीआईए ने अगस्त 2010 में प्लान तैयार कर लिया था। आतंक का दूसरा नाम बन चुका बिन लादेन कहां रहता है, यह जानकारी अमेरिकी खुफिया अधिकारियों को एक कार का पीछा करते हुए मिली। सफेद रंग की सुजुकी कार को पिछले साल जुलाई में पेशावर के निकट देखा गया था। कार में बैठा था अलकायदा प्रमुख लादेन का सबसे विश्वस्त संदेशवाहक, जिसका अमेरिकी खुफिया अधिकारी कई महीनों से पीछा कर रहे थे। समाचार चैनल सीएनएन के मुताबिक संदेशवाहक का नाम अबू अहमद था और वह कुवैती नागरिक था। उसकी जानकारी हालांकि अमेरिकी खुफिया अधिकारियों को 2007 में ही मिल चुकी थी। न्यूयार्प टाइम्स के मुताबिक सीआईए के लिए काम करने वाले पाकिस्तानी जासूस ने पिछले साल जुलाई में पेशावर के निकट अहमद की सफेद कार देखी थी और उसका पीछा किया था। कई सप्ताह तक कार का पीछा करने पर जासूस को एबटाबाद के एक बंगले का पता चला। यह बंगला अभी चार दिवारियों से घिरा हुआ था। यह स्थान इस्लामाबाद से 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जब कमांडो कार्रवाई हुई उस समय अहमद भी एबटाबाद की इस इमारत में मौजूद था और मारा गया। बिन लादेन सबसे छोटी पत्नी और बेटे सहित दो संदेशवाहकों के साथ रह रहा था। इस हवेली की 18 फीट ऊंची दीवारें थीं जिसमें आने-जाने के लिए कम रास्ते थे और सड़क कच्ची थी। 4.4 करोड़ रुपये कीमत की हवेली थी लेकिन उसमें फोन या इंटरनेट नहीं था। मोबाइल तक भी नहीं था। इस तरह हुआ ओसामा बिन लादेन का अन्त।

Wednesday, 4 May 2011

दुनिया का सबसे मोस्ट वांटेड ओसामा बिन लादेन मारा गया

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

प्रकाशित: 04 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
पूरी दुनिया को इस्लाम के रंग में रंगने का खूंरेजी ख्वाब देखने वाले और अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का पर्याय बन चुके मोस्ट वांटेड आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को अमेरिका ने मौत के घाट उतारकर अमेरिका ने यह साबित कर दिया कि वह अपने इरादों के प्रति अटल है और अपने शत्रुओं का सफाया करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। रविवार की देर रात अमेरिकी सैनिकों ने एक अत्यंत गोपनीय ऑपरेशन में उसे एक ऐसी इमारत के अन्दर मार गिराया जो पाकिस्तान की मिलिट्री अकादमी से कुछ ही दूर स्थित है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से 60 किलोमीटर दूर एबटाबाद शहर में स्थानीय समयानुसार रात डेढ़ बजे अमेरिकी सेना के विशेष बल को लेकर चार हेलीकॉप्टर उस इमारत के कम्पाउंड में उतरे जहां ओसामा के छिपे होने की सूचना थी। सोमवार को टीवी पर जो फुटेज दिखाए गए, उनमें खेतों के बीच एक कम्पाउंड दिख रहा था, जो 12 फीट ऊंची दीवारों से घिरा हुआ था। किलेनुमा इस इमारत के परिसर में हेलीकॉप्टरों के उतरने के बाद उन पर ओसामा के गार्डों ने फायरिंग की। अमेरिकी सैनिकों की जवाबी कार्रवाई में 54 वर्षीय ओसामा की मौत हो गई। उसके बेटे और एक महिला के मारे जाने की भी खबर है। इस अभियान में एक हेलीकॉप्टर को क्षति पहुंची। मालूम हो कि अमेरिका ने ओसामा पर ढाई करोड़ डालर (लगभग 111 करोड़ रुपये) का इनाम घोषित किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने राष्ट्र के नाम संबोधन में ओसामा के मारे जाने की पुष्टि की। लादेन के मारे जाने के  बाद उसकी दो पत्नियों तथा चार बच्चों को हिरासत में ले लिया गया है। अमेरिका का कहना है कि इस्लामी रीति-रिवाज के साथ ओसामा बिन लादेन के शव को समुद्र में दफन किया गया है। समझा जाता है कि उसके अपने देश सऊदी अरब द्वारा शव लेने से इंकार करने पर ऐसा किया गया। हालांकि उसे समुद्र में दफनाने पर इस्लामी विद्वानों ने सवाल उठाए हैं। उसे समुद्र में दफनाने के पीछे अमेरिका की मंशा उसकी कब्रगाह को आस्था का केंद्र बनने से रोकने की रही है। लादेन की पहचान की पुष्टि के लिए अमेरिका ने उसके शव का डीएनए परीक्षण कराया है। यह डीएनए टेस्ट लादेन की बहन के डीएनए से मिलने से किया गया, जिसमें शव लादेन का होने की 99.9 फीसदी पुष्टि हो गई है। बहन का डीएनए सैम्पल 9/11 के हमलों के बाद लिया गया था। लादेन के बारे में किसी भी तरह का शक दूर करने के लिए चेहरे का मिलान करने वाली अत्याधुनिक फेशियल रिकाग्निशन तकनीक का भी सहारा लिया गया। सन 2001 में 9/11 के हमले के बाद अमेरिका लगभग दस साल से अलकायदा सरगना को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने की कोशिश में था। जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने लादेन के मारे जाने की खबर की पुष्टि की तो सारे अमेरिका में जश्न का माहौल बन गया। रात के अंधेरे होने के बावजूद व्हाइट हाउस के बाहर खुशी से झूमती भीड़ एकत्र हो गई।
हालांकि अमेरिका ने लादेन ऑपरेशन को काफी खुफिया रखा और आईएसआई और अलकायदा को इसकी हवा नहीं लगने दी पर इस कार्रवाई से कुछ ही दिन पहले अलकायदा की धमकी का महत्व बढ़ जाता है। क्या यह सम्भव है कि ओसामा के सम्भावित अमेरिकी कार्रवाई का आभास हो गया था? इस कार्रवाई के कुछ ही दिन पहले चर्चित विकीलीक्स की ओर से जारी गोपनीय दस्तावेज में कहा गया, अलकायदा के एक वरिष्ठ स्वयंभू कमांडर ने दावा किया है कि उसके संगठन ने यूरोप में एक परमाणु बम छिपा रखा है। अगर लादेन को पकड़ा गया या मारा गया तो वह इसमें विस्फोट कर देंगे? गुआतांनामो कारागार में 780 पकड़े गए लोगों की पृष्ठभूमि और पूछताछ के दौरान उनकी ओर से दिए बयान के आधार पर यह गोपनीय दस्तावेज तैयार किए गए हैं। ओसामा के मारे जाने से दुनिया में हो रही आतंकवादी गतिविधियों पर शायद ही कोई लम्बा-चौड़ा असर पड़े। क्योंकि आज सारी दुनिया में इतने अलकायदा टाइप के सेल स्थापित हो चुके हैं जो स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं कि इनकी गतिविधियों पर कोई असर न पड़े। फिर इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पिछले एक दशक में अलकायदा ने विचारधारा का रूप ले लिया है। आतंकवाद को खाद-पानी देने वाली इस विचारधारा  का अन्त नहीं दिखता। इसलिए और भी नहीं, क्योंकि अलकायदा ने अमेरिका के नेतृत्व में छेड़े गए आतंकवाद विरोधी अभियान को इस्लाम पर हमले का रूप दे दिया है।
अमेरिकी विशेष बल के हाथों इस्लामाबाद के करीब एबटाबाद में एक शानदार बंगले में ओसामा की मौत और इससे पहले अनेक अलकायदा नेताओं की पाकिस्तानी शहरों में हुई गिरफ्तारी से यह स्पष्ट हो जाता है कि आतंकवादियों की सुरक्षित पनाहगाह अफगान-पाक सीमा या भारत सीमा पर नहीं बल्कि पाकिस्तान के बीचोबीच है। इससे एक और मूलभूत सच्चाई रेखांकित होती है कि पाकिस्तान में सेना का वर्चस्व समाप्त किए बिना तथा वहां कट्टरपंथ को समाप्त किए बगैर अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ जंग नहीं जीती  जा सकती। 9/11 हमले के बाद पाकिस्तान से पकड़े गए अन्य आतंकवादी नेताओं में अलकायदा के तीसरे नम्बर का नेता शालिद शेक मुहम्मद, नेटवर्प व्यवस्था का प्रमुख अबु जुबैदिया, आसुर जजीरी शामिल है। इन तमाम गिरफ्तारियों में एक समान कड़ी यह है कि ये सब पाकिस्तानी शहरों में पकड़े गए हैं। इस आलोक में यह हैरानी की बात नहीं है कि बिन लादेन कबाइली इलाकों के बजाय पाकिस्तान की राजधानी के निकट शहर में मारा गया। अगर हैरानी है तो इस बात की कि लादेन इस्लामाबाद के बगल में एबटाबाद में रह रहा था। यहां पाकिस्तानी सेना का बड़ा आधार शिविर, सैन्य अकादमी, सैन्य अस्पताल और अनेक वरिष्ठ सैन्य व खुफिया अधिकारी व पूर्व अधिकारियों के आवास हैं। अमेरिका को लादेन को पकड़ने में दस साल इसलिए भी लगे, क्योंकि लादेन को पाकिस्तानी रक्षा प्रतिष्ठान के कुछ तत्वों का संरक्षण प्राप्त था। याद रहे कि ओसामा डायलासिस पर था और डायलसिस हर स्थान पर नहीं हो सकता। कटु सत्य तो यह है कि अमेरिका बेशक जितना प्रयास करे जब तक पाकिस्तानी सेना और आईएसआई नहीं सुधरती तब तक न तो आतंकवाद ही खत्म होगा और न ही पाकिस्तान का राष्ट्र निर्माण सम्भव है। बहरहाल अमेरिका को यह खुशी व संतोष जरूर होगा कि उसने 9/11 का बदला ले लिया है।

Friday, 29 April 2011

आईएसआई एक आतंकवादी संगठन है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 29 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

भारत तो हमेशा से कहता आया है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई एक सही एजेंसी नहीं है और यह आतंकवाद को बतौर एक हथियार इस्तेमाल करती है पर अमेरिका सहित अधिकतर पश्चिमी देश हमारी बात से सहमत नहीं थे। अमेरिका ने तो आतंकवाद के खिलाफ जंग में पाकिस्तान को अपना स्ट्रेटेजिक पार्टनर तक बना रखा है पर जब खुद पर बीतती है तो अमेरिका भी बोलने  में मजबूर हो जाता है कि आईएसआई एक आतंकवादी संगठन है। द गार्डियन जैसे प्रतिष्ठित ब्रिटिश अखबार ने अमेरिकी गुप्तचर फाइलों का हवाला देते हुए कहा है कि गुआंतानामो-वे के जांचकर्ताओं को की गई सिफारिश में इंटरसर्विसेज महानिदेशालय के साथ-साथ अलकायदा, हमास और हिजबुल्ला को एक चुनौती करार दिया गया है। सितम्बर 2007 के इन दस्तावेजों में कहा गया है, इन समूहों में से किसी से भी संबंधित होने का अर्थ आतंकवादी या विद्रोही गतिविधि है। दस्तावेज में कहा गया है, `इन संगठनों के साथ संबंध रखने का अर्थ है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति ने अलकायदा या तालिबान को समर्थन दिया है या वह अमेरिका पर गठबंधन बलों के खिलाफ कार्रवाइयों में लिप्त रहा है।' हाल ही में अमेरिका की गुप्तचर सेवाओं को खबरें मिली थीं कि आईएसआई तालिबान को अफगानिस्तान में कई वर्षों से समर्थन दे रही है। इस खबर के प्रकाशित होने के कुछ समय बाद ही यह नया खुलासा हुआ है। अमेरिकी अधिकारियों की ओर से तैयार खुफिया दस्तावेज में आईएसआई का जिन तीन दर्जन आतंकी संगठनों के साथ उल्लेख किया गया है उनमें अलकायदा, तालिबान के अलावा भारत को खासतौर पर आतंकित करते रहने वाले लश्कर-ए-तोयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन भी हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि यह दस्तावेज 2007 में तैयार किया गया हो लेकिन माना जा रहा है कि अमेरिका को चुनौती देने वाले संगठनों की सूची में से आईएसआई को अभी हटाया नहीं गया है। इसका सीधा अर्थ है कि जिस तरह पाकिस्तान ने आतंकवाद को लेकर दोहरे मानदंड अपना रखे हैं उसी तरह अमेरिका ने भी। पाकिस्तान यह दावा करता है कि वह भी आतंकवाद  के खिलाफ है और अपने दावे को सही ठहराने के लिए खुद के आतंकवाद से त्रस्त होने का रोना रोता है, लेकिन सच्चाई यह है कि वह एक बड़ी संख्या में आतंकी संगठनों का परोक्ष-प्रत्यक्ष रूप से समर्थन करता है। समय-समय पर अमेरिकी विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और यहां तक कि राष्ट्रपति बराक ओबामा यह कह चुके हैं कि आतंकवाद के खिलाफ अपेक्षित कदम उठाने से पाकिस्तान इंकार कर रहा है।
सारी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान दुनिया में एक मात्र देश है जो अपनी नीति और रणनीति के तहत आतंकवाद को प्रश्रय देता है। पाकिस्तान को आज इसीलिए आतंकवाद की नर्सरी कहा जाता है और आईएसआई की विभिन्न आतंकी कार्रवाइयों में संलिप्तता बार-बार उजागर भी होती रही है। मुंबई हमले में भी उसकी भूमिका से अब अमेरिका पूरी तरह वाकिफ हो चुका है। यही नहीं अमेरिका में 9/11 हमलों में भी आईएसआई की भूमिका थी। अमेरिका अन्दरखाते यह सब जानता है पर चूंकि अफगानिस्तान में उसे आईएसआई का साथ चाहिए इसलिए भी सब कुछ जानते हुए भी अनजान बन जाता है। ताजा खुलासे से अमेरिका का पाक की ओर शायद ही नजरिया बदले पर भारत को यह संतोष जरूर होगा कि आज सारी दुनिया मानने लगी है कि आईएसआई एक आतंकी संगठन है।