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Wednesday, 4 July 2012

तालिबान, अलकायदा से भी बड़ा खतरा भारत!


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

Published on 4 July 2012
अनिल नरेन्द्र
न्यू रिसर्च सेंटर के ग्लोबल एटीट्यूड्स प्रजेक्ट ने पाकिस्तान में एक सर्वेक्षण किया है। सव्रेक्षण में बताया गया है कि पाकिस्तान में 10 में से केवल पांच नागरिक ही भारत को अपने लिए फायदेमंद मानते हैं वहीं बहुमत यानी हर 10 व्यक्तियों में से छह पाकिस्तानी भारत को अपने देश के लिए तालिबान या अलकायदा से भी बड़ा खतरा मानते हैं। इसमें यह भी पता चला है कि साल 2009 में जब पहली बार पाकिस्तानियों से उनके सबसे बड़े खतरे का प्राश्न पूछा गया था तब से वे इसके लिए लगातार भारत का नाम लेते रहे हैं।
तब से भारत से डरने वालों की संख्या 11 बिन्दु से बढ़कर 59 फीसदी हो गईं है। दूसरी ओर तालिबान को सबसे बड़ा खतरा बताने वालों का प्रातिशत नौ बिन्दु कम हो गया है। सव्रेक्षण के मुताबिक भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जहां पाकिस्तान के प्राति नकारात्मक दृष्टिकोण है। जिन सात देशों में यह प्राश्न पूछा गया, उनमें से छह में पाकिस्तान के प्राति नकारात्मक रुख देखा गया। चीन, जापान और मुस्लिम बहुल मिरत्र, जार्डन व ट्यूनीशिया में यह सवाल पूछा गया।
जनरल जिया उल हक ने मुल्क की शिक्षा में जो जहर भरा, उसे बाद की सरकारों ने दूर नहीं किया। कराची में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि यह शहर हिन्दुओं, पारसियों और ईंसाइयों का साझा शहर था। वे सभी अब चले गए हैं। हदू भाईं ने इस स्थिति के लिए मदरसों को आंशिक रूप से जिम्मेदार ठहराया और अफसोस प्राकट किया कि मुशर्रफ के शासनकाल के दौरान सुधार के लिए शुरू किए गए प्रायासों को ज्यादा दूर नहीं ले जाया गया। हदू भाईं की बातों पर हमें आार्यं नहीं हुआ। यूं ही नहीं पाकिस्तानी भारत से नफरत करते।
हमें इस सव्रेक्षण के नतीजों पर आर्यं नहीं हुआ। पाकिस्तान में छोटे बच्चों को ही भारत से नफरत करनी सिखाईं जाती है। इसकी पुष्टि एक पाकिस्तान के नामी विद्वान ने भी की है। पाकिस्तान के नामी विद्वान ने अपने मुल्क के स्वूलों में पढ़ाईं जा रही किताबों के जरिए वुछ चौंकाने वाली बातें दुनिया के सामने रखी हैं। न्यूक्लियर साइंटिस्ट और ताजा मुद्दों पर लिखने वाले हदू भाईं ने कहा है कि पाकिस्तान के स्वूलों में बच्चों के जहन में कट्टरपंथी और भारत विरोधी विचार डाले जा रहे हैं। इससे एक ओर पाकिस्तान में कट्टरपंथ मजबूत हो रहा है वहीं दूसरी ओर भारत के प्राति नफरत बढ़ रही है। हदू भाईं ने ब्रिटेन के किग्स कॉलेज में एक सेमिनार के दौरान आतंकवाद से लड़ाईं में शिक्षा की भूमिका से जुड़े उदाहरण पेश किए। हदू भाईं ने एक प्राइमर (प्राथमिक पाठ्य पुस्तक) से वुछ तस्वीरें और पाठ्य सामग्री पेश की। इसमें उर्दू में से अल्लाह, से बन्दूक, से टकराव, ज से जेहाद, से हिजाब, से खंजर और से जुदूब पढ़ाया जाता है। परवेज ने पाक में कक्षा पांच में पढ़ाईं जाने वाली किताबों से भी वुछ उदाहरण पेश किए। इनमें हिन्दुओं और मुस्लिमों में अन्तर को समझना और पाकिस्तान की जरूरत ‘पाकिस्तान के खिलाफ भारत के नापाक इरादे और शहादत और जिहाद पर भाषण’ तैयार करने जैसे विषयों पर चर्चा शामिल है। हदू भाईं ने कहा कि बीते 60 बरसों में पाकिस्तान में बड़ा बदलाव आया है।

Wednesday, 18 April 2012

तालिबानी हमले से कांपा अफगानिस्तान

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18 April 2012
अनिल नरेन्द्र
तालिबान ने काबुल में अफगानिस्तानी संसद और कई देशों के दूतावासों पर हमला कर यह संकेत दे रहा है कि तालिबान पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो चुका है। यह हमला तालिबान की ताकत का तो अहसास कराता ही है पर साथ-साथ यह भी बताता है कि अफगानिस्तान का भविष्य अंधकार में है, तालिबान के निहायत खतरनाक इरादे हैं। ओसामा बिन लादेन की बरसी से 17 दिन पहले तालिबान ने दुनिया को चुनौती दी है। आत्मघाती हमलावरों ने रविवार को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और रूस के दूतावासों पर हमले किए। साथ ही नेशनल असेम्बली में घुसने की भी कोशिश की। इसके अलावा तीन और शहरों में भी हमले हुए। कुल 11 जगहों पर हुए हमलों में 48 लोग मारे गए हैं। इनमें 19 आतंकी भी शामिल हैं। आतंकियों ने राकेट, ग्रेनेड और मशीनगनों से फायरिंग की। दिन के तीन बजे शुरू हुई गोलीबारी कुछ जगहों पर देर शाम तक चलती रही। 2001 के बाद से इसे काबुल पर अब तक का सबसे भीषण हमला बताया जा रहा है। तालिबान प्रवक्ता जबीउल्ला मुजाहिद ने हमलों की जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि यह महज शुरुआत है। हमले की तैयारी एक माह से चल रही थी। आने वाले समय में और हमले होंगे। इस हमले के पीछे हक्कानी गुट का हाथ होने की आशंका जताई जा रही है। 1994 से सक्रिय इस समूह का संचालन पाकिस्तान से होता है। अमेरिका कई बार पाक को हक्कानी पर लगाम लगाने की हिदायत दे चुका है। गुट की कमान मौलवी जियाउद्दीन हक्कानी और उसके बेटे सिराजुद्दीन हक्कानी के हाथों में है। संगठन तालिबान से मिला हुआ है। हक्कानी गुट पर इसलिए शक जाता है क्योंकि विगत सितम्बर में अमेरिकी दूतावास को इसी ने निशाना बनाया था। दरअसल पिछले दिनों अमेरिकी अधिकारियों की तालिबान के साथ बातचीत के पटरी से उतर जाने के बाद से ही अफगानिस्तान में आतंकवादी हिंसा की आशंका जताई जा रही थी। 2014 में अमेरिका और उसके सहयोगी अफगानिस्तान से कूच करने की तैयारी में हैं। यह चिन्ता का विषय है कि लगभग 1,25,000 नाटो सैनिकों की उपस्थिति के बावजूद हामिद करजई सरकार राजधानी काबुल की सुरक्षा में भी सक्षम नहीं दिखती। जाहिर है कि तालिबान का मनोबल इसलिए भी बढ़ा हुआ है, क्योंकि उन्हें मालूम है कि अमेरिका और उसके सहयोगी अब अफगानिस्तान में चन्द दिनों के ही मेहमान हैं। जाते-जाते अमेरिकी सैनिक भी ऐसी हरकतें कर रहे हैं जिससे आग और ज्यादा भड़के। कुरान को जलाना, एक अमेरिकी सैनिक द्वारा 16 निर्दोष अफगानियों को मौत के घाट उतारने से भी तालिबान को बल और जन समर्थक बढ़ा है। पिछले ही दिनों में हामिद करजई ने विदेशी सैनिकों को ग्रामीण इलाकों को छोड़ शहरी क्षेत्र में मुख्य कैम्पों में लौट जाने को कहा था। काबुल की मांग यह भी है कि अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से वापसी की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर दें। समझ नहीं आता कि करजई किस बिनाह पर ऐसा कह रहे हैं। अफगानिस्तान के मौजूदा परिदृश्य से हमें भी चिंतित होना चाहिए। यह राहतकारी है कि ताजा कार्रवाई से भारतीय दूतावास अछूता रहा, लेकिन यह सही समय है जब भारत सरकार इस पर गम्भीरता से विचार करे कि अफगानिस्तान के पुनरुत्थान में वह जो अरबों रुपये खर्च कर रही है उससे भारत को क्या हाथ लगने वाला है?
Afghanistan, Anil Narendra, Daily Pratap, Taliban, Vir Arjun

Friday, 25 November 2011

शराबियों को खम्भे से बांधकर पीटा जाना चाहिए ः अन्ना


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25th November 2011
अनिल नरेन्द्र
अन्ना हजारे का एक ताजा बयान विवादों के घेरे में आ गया है। समाज सुधार अपने एजेंडे के तहत गांधीवादी अन्ना हजारे ने शराबियों की शराब की लत छुड़ाने के लिए उनकी पिटाई की हिमायत की है। एक टीवी चैनल से बात करते हुए अन्ना ने हालांकि पिटाई को अंतिम उपाय बताया है। अन्ना से जब पूछा गया कि शराबियों की लत छुड़ाने के लिए वह क्या तरीका अख्तियार करने की सलाह देते हैं तो उन्होंने कहा कि पहले शराबियों को तीन बार बातचीत से समझाओ। अगर नहीं मानते तो उसे मंदिर ले जाकर शराब नहीं पीने की शपथ दिलाओ। इसके बाद भी नहीं सुधरें तो मंदिर के सामने खम्भे से बांधकर उसकी सार्वजनिक पिटाई करो। यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने यह तरीका अपने गांव में आजमाया है तो उन्होंने कहा कि हां, कभी-कभी ऐसा करना पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके गांव के कुछ लोग जो अब शराब छोड़ चुके हैं, अब भी उनसे कहते हैं कि यदि उन्हें खम्भे से नहीं बांधा गया होता तो वह बर्बाद हो चुके होते। हजारे के इस बयान की तीखी आलोचना हो रही है। इस बारे में प्रतिक्रिया मांगे जाने पर कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि हजारे का सुझाव तालिबान के फरमान की तरह है, यह तालिबानी तरीके से मेल खाता है जो शरिया कानून का पालन नहीं करने वाले को दंडित करने के लिए करते थे। कांग्रेस नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी कहते हैं कि हजारे का लक्ष्य इस मामले में भी बेहद पवित्र है मगर तरीका गलत है। भाजपा प्रवक्ता निर्मला सीतारमण और शाहनवाज हुसैन ने भी अन्ना की टिप्पणी को सही नहीं माना और कहा कि उनकी पार्टी अन्ना के इस तरीके से शराब छुड़ाने का समर्थन नहीं करती। शराबखोरी से लड़ने के प्रति 74 वर्षीय गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता के इस नजरिये ने साइबर जगत में भी एक बहस की शुरुआत कर दी है। ब्लॉग पर अन्ना की टिप्पणी की निन्दा की गई है। हालांकि कुछ ब्लॉगर अन्ना के दृष्टिकोण को सही मानते हैं। कुछ ब्लॉगरों ने कहा कि गांधीवादी अन्ना हजारे अपनी हदें पार कर रहे हैं। हमारा मानना है कि शराब पीना या न पीना आदमी का व्यक्तिगत फैसला है। आप शराब पीने वालों को इससे उत्पन्न होने वाली समस्याओं से अवगत करा सकते हैं पर उसे मजबूर करना शायद ठीक नहीं होगा। सरकारों ने प्रोहिबिशन करके भी देख लिया। उल्टा जितने पाबंदी लगाओगे उतनी ही इसकी डिमांड बढ़ेगी। अन्ना का यह सुझाव उनके गांव में तो चल सकता है पर शेष दुनिया में शायद ही प्रैक्टिकल माना जाए।
Anil Narendra, Anna Hazare, Daily Pratap, Mahatma Gandhi, Taliban, Vir Arjun

Tuesday, 27 September 2011

पाकिस्तान की अमेरिका को धमकी व चुनौती

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 27th September 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान और अमेरिका के बीच तल्खी बढ़ती जा रही है और अब तक चल रहा वाप्युद्ध अब सामरिक रिश्तों में दरार के रूप में सामने आने लगा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में शिरकत करने आई पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी ने अपने भाषण में कहा कि अमेरिका पाकिस्तान या पाकिस्तानी आवाम को अलग-थलग करने का खतरा नहीं उठा सकता। पाक विदेश मंत्री के मुताबिक अगर वह ऐसा करता है तो इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। रब्बानी का यह बयान अमेरिका के शीर्ष सैन्य अधिकारी एडमिरल माइक मुलेन के उस आरोप के बाद आया जिसमें बीते सप्ताह काबुल में अमेरिकी दूतावास पर हुए हमले के पीछे आईएसआई को जिम्मेदार बताया गया था। मुलेन का कहना है कि हमले के पीछे मौजूद हक्कानी नेटवर्प को आईएसआई की शह हासिल है। वैसे अमेरिका लम्बे समय से मानता रहा है कि अफगानिस्तान में अपनी पैठ मजबूत करने के लिए पाकिस्तान हक्कानी नेटवर्प का सहारा ले रहा है। अफगानिस्तान से 2014 तक सैनिकों की वापसी और वहां एक स्थिर और लोकतांत्रिक सरकार के गठन के अमेरिकी सपने में हक्कानी नेटवर्प सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है। समस्या यह है कि इन विशाल और प्रशिक्षित नेटवर्प के खात्मे में अमेरिका को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में उसे अपने सबसे मजबूत `सहयोगी' पाकिस्तान की तरफ से ही कोई मदद नहीं मिली। हक्कानी नेटवर्प को पाकिस्तान और तालिबान अपनी रणनीतिक सम्पत्ति मानते हैं जो अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने के बाद वहां पाकिस्तानी हितों की हिफाजत करेगा। अमेरिका की मुश्किल यह है कि वह तमाम कोशिशों के बावजूद अलकायदा को जिस तरह उसने तहस-नहस किया था वैसे हक्कानी नेटवर्प को नहीं कर सका। अलकायदा सरगना जहां ड्रोन हमलों से अनपी जान बचा रहे हैं, वहीं हक्कानी नेटवर्प एक के बाद एक दुस्साहसी हमलों को अंजाम दे रहा है। ऐसे में आखिरकार अमेरिका अब जलालुद्दीन व सिराजुद्दीन हक्कानी को ओसामा बिन लादेन व अलकायदा जितना ही खतरनाक मानने लगा है। अमेरिका हक्कानी नेटवर्प का हर कीमत पर सफाया चाहता है। दरअसल ओबामा प्रशासन काबुल में अमेरिकी दूतावास पर हुए आतंकवादी हमले से बौखला गया है। 12 सितम्बर को हुए इस हमले में जलालुद्दीन हक्कानी के बेटे सिराजुद्दीन हक्कानी का हाथ था। इस हमले में चार पुलिसकर्मी व चार नागरिक मारे गए थे। 19 घंटे तक चली इस लड़ाई में 11 आतंकवादियों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इससे दो दिन पहले ही हक्कानी के आतंकवादियों ने वरदाक राज्य स्थित नॉटो के ठिकाने पर हमला किया था जिसमें चार अफगानी नागरिक मारे गए थे व 77 अमेरिकी घायल हो गए थे।
आखिरकार अमेरिका को वह सच्चाई समझ में आने लगी है कि पाकिस्तान इस आतंकी संगठनों से न केवल मिला हुआ है बल्कि इनकी हर तरह से मदद करता है, इन्हें संरक्षण देता है। भारत ने यह बात अमेरिका को कई बार समझाने की कोशिश की पर अमेरिका सब कुछ समझते हुए भी अनजान बना रहा था शायद उसने इसमें इसलिए दिलचस्पी नहीं दिखाई, क्योंकि पाक प्रायोजित आतंकवाद का शिकार भारत था। अब जब खुद अमेरिका इसका निशाना बन रहा है, अमेरिका को कुछ-कुछ समझ आने लगा है। हालांकि भारत के साथ-साथ कई अमेरिकी विशेषज्ञ भी बार-बार यह कह रहे थे कि पाकिस्तान ने आतंकवाद को बढ़ावा देने को अपनी राष्ट्र नीति का अंग बना लिया है, लेकिन अमेरिकी शीर्ष नेतृत्व इसे जानबूझ कर ठुकराता रहा है। अमेरिका की मुश्किल और कमजोरी का पाकिस्तान पूरा फायदा उठा रहा है और उठाएगा। उन्हें मालूम है कि अमेरिका 2014 तक अफगानिस्तान से हटना चाहता है। पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान में अमेरिका के हटने के बाद भी उसका वर्चस्व कायम रहे। पाकिस्तान हमेशा अमेरिका को ब्लैकमेल करता रहा है और अब भी कर रहा है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति तक यह प्रकट करने में लगे हैं कि इस्लामाबाद से ज्यादा वाशिंगटन को उनके समर्थन की जरूरत है। इन वक्तव्यों में एक तरह की धमकी भी छिपी हुई है। देखना यह है कि अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान की इस चालबाजी को भांप पाता है या नहीं और उसके सन्दर्भ में अपनी नीति में कोई ठोस बदलाव करता है या नहीं? पाकिस्तान के संदर्भ में अमेरिका की भावी नीति भले ही कुछ हो, ओबामा प्रशासन को यह समझने की जरूरत है कि वह और लम्बे समय तक बिना अपने हितों से समझौता किए पाकिस्तान से सबसे मजबूत सहयोगी मानने वाली नीति पर चल नहीं सकता। अमेरिका को यह भी समझना होगा कि पाकिस्तान की पूरी मदद और समर्थन चीन भी कर रहा है। मामला केवल अमेरिका-पाकिस्तान का नहीं रह जाता। चीन के बीच में आने से सारे समीकरण बदल जाते हैं। हमारा मानना है कि पाकिस्तान से ज्यादा आज अमेरिका संकट में है। देखें आगे क्या होता है।
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Saturday, 24 September 2011

Rabbani's killing, a cause of concern to all

Rabbani's killing, a cause of concern to all

- Anil Narendra

It is a big blow to US peace efforts in Afghanistan. The former Afghan President, Burhanuddin Rabbani has been killed in a suicide bomb attack. The attacker had kept explosive concealed in his turban. Four security personnel were also killed in this attack. The killing of Rabbani (71) is a big blow to the peace process in the strife-torn Afghanistan. Following his killing, President Hamid Karzai decided to cut short his US tour and return home. According to the Kabul Police, the attacker had been invited to the Kabul residence of Rabbani on Tuesday evening as he was considered to be a special envoy bringing some special message from Taliban. While embracing Rabbani, the attacker triggered the explosive, kept in his turban.
The gravity of the challenge posed by Taliban after the withdrawal of US-led NATO forces from Afghanistan can be easily gauged from the killing of Rabbani. Rabbani was living in a high security zone area, close to the US Embassy. The Hamid Karzai government had appointed Rabbani as the Chief of its high-level Peace Council and he was continuing on this post for last one year. But now, with his killing, the possibilities of negotiations have weakened. A few months ago, Taliban had executed a plan to kill the half brother of the President Karzai, Wali Karzai,  who was also killed deceitfully by one of his colleagues in the same manner as Rabbani was killed this time. Then, the Taliban gunan had killed the former Governor Jan Mohammed Khan. Taliban have been attacking the Karzai government since its establishment with the help of US and Western Countries. Killings one after the others have made it clear that Taliban are not in favour of negotiations. Long back, Taliban were created in the Pak Madrassas and even today a number of Taliban groups are under the influence of Pakistan Army and its intelligence agency ISI. In case of Taliban rule in Afghanistan, Pakistan could get the much-talked strategic depth, in case of a war with India. That is why Pakistan does not want an India-friendly government in Afghanistan. Rabbani was considered to be a friend of India. Taliban would never like a person, who is friendly to America, India and Western Countries.
It is natural for India to be concerned over the killing of Rabbani and also over the instability in the neighbouring country. New Delhi is more concerned over the efforts to dispose off leaders in Afghanistan, who are trying hard for peace and confidence building measures. Dr. Manmohan Singh has called this incident as a big blow and has assured the people of Afghanistan of India's full support in this hour of crisis. In a letter to Karzai, the Prime Minister has said that the best way to remember Rabbani would be to carry forward the work left unfinished by him. The killing of Rabbani has added to the anxiety of US and NATO forces also. Condoling the death of Rabbani, the US President said that the peace process in Afghanistan would continue. The suicide bomber, killing the former Afghan President Rabbani has been identified as Ismatullah and for quite some time he was waiting for an opportunity to kill Rabbani. One thing is clear from this Taliban suicide attack that US and NATO alliance would have to talk directly to Taliban if they want to withdraw from Afghanistan, but the problem is that there are so many groups among the Taliban. It would be very difficult to decide as whom to talk with and through whom? Then, there is ISI also. It has its own interests. It would favour such a government in Afghanistan that will toe Pakistan's line. The path for Obama is strewn with thorns and US is in tight corner. It has to decide between the devil and the deep sea. 

रब्बानी की हत्या ने सभी की चिन्ताएं बढ़ाईं


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24th September 2011
अनिल नरेन्द्र
अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा शांति प्रयासों को भारी धक्का लगा है। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन रब्बानी की एक आत्मघाती हमलावर ने हत्या कर दी। इस हमलावर ने अपनी पगड़ी में विस्फोटक रखा था। रब्बानी की हत्या करने वाले हमलावर के इस घटना में रब्बानी के चार सुरक्षाकर्मी भी मारे गए। रब्बानी (71) की हत्या युद्ध जैसे हालात से गुजर रहे अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया के लिए एक बड़ा झटका है। उनकी हत्या के बाद राष्ट्रपति हामिद करजई ने अपनी अमेरिकी यात्रा बीच में ही छोड़कर वतन लौटने का फैसला किया। काबुल पुलिस के मुताबिक हमलावर को रब्बानी के काबुल स्थित निवास में मंगलवार शाम को बुलाया गया था, समझा जा रहा था कि वह विशेष दूत है, जो तालिबान का खास संदेश लेकर आया है। रब्बानी से गले मिलते ही हमलावर ने पगड़ी में रखे विस्फोटक में धमाका कर दिया।
श्री रब्बानी की हत्या से साफ है कि अमेरिका के नेतृत्व वाली नॉटो सेनाओं के अफगानिस्तान से विदा होने के बाद तालिबानी और कितनी बड़ी चुनौती उपस्थित कर सकते हैं। रब्बानी राजधानी काबुल के अति सुरक्षित इलाके में रहते थे जहां अमेरिका का दूतावास भी पास में स्थित है। रब्बानी को हामिद करजई सरकार ने पिछले करीब एक साल से अपनी उच्चस्तरीय शांति परिषद का प्रमुख बनाया था। उन्हें शांति प्रयासों में कोई खास कामयाबी नहीं मिली। अब उनकी हत्या से तो मेल-मिलाप की रही-सही संभावनाएं भी क्षीण होने लगी हैं। जिस तरह तालिबान ने छल कर रब्बानी की हत्या की, उसी तरह कुछ महीने पहले राष्ट्रपति हामिद करजई के सौतेले भाई वली करजई की उनके ही एक सहयोगी से छलपूर्वक हत्या कराई गई थी। इसके बाद तालिबानी बन्दूकधारियों ने एक पूर्व गवर्नर जान मोहम्मद खान की हत्या की थी। जब से अमेरिका और पश्चिमी देशों की मदद से करजई सरकार बनी है। तालिबानी उस पर हमले कर रहे हैं। एक के बाद एक होती हत्याओं से साफ है कि तालिबान मेल-मिलाप के पक्ष में नहीं है। तालिबान का निर्माण कभी पाकिस्तानी मदरसों में हुआ था और आज भी पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई का तालिबान के अनेक गुटों पर नियंत्रण है। अफगानिस्तान में तालिबानी शासन होने से पाकिस्तान को भारत के साथ युद्ध की स्थिति में सामरिक गहराई मिलती है। इसलिए पाकिस्तान नहीं चाहता कि अफगानिस्तान में ऐसी कोई सरकार हो, जो भारत की मित्र हो। रब्बानी को भारत का मित्र माना जाता था। तालिबान को ऐसा भी कोई शख्स पसंद नहीं है जो अमेरिका, भारत और पश्चिमी देशों का मित्र हो।
श्री रब्बानी की हत्या के साथ अस्थिर हालात से गुजर रहे पड़ोसी मुल्क के हालात को लेकर भारत की चिन्ता बढ़नी स्वभाविक ही है। नई दिल्ली की चिन्ता अफगानिस्तान में शांति और विश्वास बहाली का परचम थामने वालों नेताओं को ठिकाने लगाने की कोशिशों को लेकर है। मनमोहन सिंह ने कहा कि इस घटना से गहरा धक्का पहुंचा है और भारत मुश्किल की इस घड़ी में अफगानिस्तान के लोगों के साथ खड़ा है। करजई को लिखे पत्र में पीएम ने कहा कि अफगानिस्तान में विभिन्न गुटों के बीच शांति प्रक्रिया की अगुवाई कर रहे रब्बानी को याद रखने का सबसे अच्छा तरीका यही होगा कि हम उनके काम को आगे बढ़ाएं। रब्बानी की हत्या ने अमेरिका और नॉटो सेना की चिन्ता भी बढ़ा दी है। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने रब्बानी की हत्या पर शोक प्रकट करते हुए कहा कि शांति प्रक्रिया जारी रहेगी। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति रब्बानी की हत्या करने वाले आत्मघाती हमलावर की पहचान एस्मातुल्ला के रूप में की गई है। वह लम्बे समय से रब्बानी की हत्या का मौका तलाश कर रहा था। तालिबान के इस आत्मघाती हमले से एक बात तो साफ है कि अगर अमेरिका व नॉटो गठबंधन को अफगानिस्तान से बाहर निकलना है तो उन्हें तालिबान से सीधी बातचीत करनी ही होगी पर मुश्किल यह भी है कि तालिबान के अन्दर कई गुट हैं। किस से किसके माध्यम से यह बात हो? फिर आईएसआई भी है। उनके अपने हित हैं। वह अफगानिस्तान में ऐसी सरकार चाहेंगे जो पाकिस्तान का पिट्ठू बनने को तैयार हो। ओबामा का आगे का रास्ता कांटों भरा है पर फिर अमेरिका तो बुरी तरह फंसा हुआ है, इधर कुआं तो उधर खाई।
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Tuesday, 9 August 2011

तालिबान ने लिया लादेन की हत्या का बदला


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th August 2011
अनिल नरेन्द्र
अफगानिस्तान में तालिबान ने अमेरिका से ओसामा बिन लादेन की हत्या का बदला ले लिया है। गत शुक्रवार को तालिबान ने एक अमेरिकी चिनूक हेलीकाप्टर को मार गिराया। इस कार्रवाई में 31 अमेरिकी सैनिक मारे गए हैं। यह साधारण सैनिक नहीं थे। इस हेलीकाप्टर में 31 अमेरिकी सैनिकों में नेवी सील कमांडों, तीन एयर फोर्स के कंट्रोलर, सात अफगानी सैनिक मौजूद थे, जो 22 नेवी सील कमांडो इस हेलीकाप्टर कैश में मारे गए। यह उस सील टीम सिक्स का दस्ता था जो 160वें स्पेशल ऑपरेशन एविएशन रेजीमेंट का था जिसने पाकिस्तान में एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन को मारने के अभियान में हिस्सा लिया था। ओसामा को मारने के बाद से ही अमेरिकी बलों का यह यूनिट तालिबान के निशाने पर था। वर्ष 2001 में अफगानिस्तान में जंग शुरू होने के बाद विदेशी सैनिकों के लिए यह सबसे बड़ी सिंगल क्षति थी। इस हेलीकाप्टर को अफगानिस्तान के पूर्वी वारदाक प्रांत के आतंकवाद प्रभावित एक जिले में शुक्रवार को तालिबान विरोधी अभियान के दौरान निशाना बनाया गया। घटना के बाद वारदाक प्रांत के गवर्नर के प्रवक्ता शाहीदुल्लाह शाहिद ने कहा कि तालिबान की ओर से दागे रॉकेट ने हेलीकाप्टर को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। यह घटना वारदाक प्रांत के सामद आबाद जिले में हुई। हमले के बाद हेलीकाप्टर के कई टुकड़े हुए और यह पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने सैनिकों की मौत पर खेद जताते हुए कहा कि यह हमारे सुरक्षा बलों के सर्वोच्च बलिदान का एक और उदाहरण है। अफगानी राष्ट्रपति हामिद करजई ने भी ओबामा को फोन कर इस घटना पर अफसोस जताया। इस कार्रवाई के एक प्रत्यक्षदर्शी मोहम्मद साबिर ने बताया कि उसके गांव में देर को हुई कार्रवाई के दौरान एक हेलीकाप्टर अचानक गिर गया। उसने कहा कि करीब रात 10 बजे हमने अपने ऊपर हेलीकाप्टर उड़ते देखे। हम घर में थे। एक हेलीकाप्टर एक तालिबान कमांडर के घर पर उतरा और ताबड़तोड़ गोलीबारी शुरू हो गई। हेलीकाप्टर ने फिर उड़ान भरी लेकिन उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद वह गिर गया। वहीं एक अन्य हेलीकाप्टर भी उड़ रहा था। इस बीच नॉटो के एक प्रवक्ता ने कहा कि दरअसल क्या हुआ, इस संबंध में वह उपयुक्त समय में बयान देंगे। उधर तालिबान प्रवक्ता नबी उल्लाह मुजाहिद ने कहा कि उसका संगठन हेलीकाप्टर को मार गिराने के लिए जिम्मेवार है। उसने कहा कि यह अमेरिकी चिनूक (हेलीकाप्टर) था। उसने अमेरिकी कार्रवाई में आठ आतंकियों के मरने की बात भी कही है। हालांकि पश्चिमी सेना के एक सूत्र ने इस बात की पुष्टि की है कि वह कैसा हेलीकाप्टर था। चिनूक विशेषज्ञ हेलीकाप्टर है जिसका इस्तेमाल अफगानिस्तान में नॉटो गठबंधन सेना के सैनिकों और आपूर्ति के लिए किया जाता है। तालिबान ने ओसामा बिन लादेन की दो मई को पाकिस्तान के एबटाबाद में की गई हत्या का एक तरह से बदला ले लिया है। इसी 160वें स्पेशल ऑपरेशन एविएशन रेजीमेंट के नेवी सील सैनिकों ने लादेन को मार गिराया था। ओसामा को मारने वाले स्क्वाड्रन का नाम गोल्ड स्क्वाड्रन और सील टीम छह भी रखा हुआ था। कहा जा रहा था कि यह चिनूक हेलीकाप्टर किसी विशेष मिशन पर गया था। इसीलिए इसमें अमेरिकी सेना के सबसे प्रतिष्ठित सैनिक यूनिट के नेवी सील्स शामिल थे। तालिबान ने इसे रॉकेटों से उड़ाया। अमेरिका के लिए यह एक बहुत बड़ी क्षति है। सन् 2001 से अब तक यह सिंगल सबसे बड़ी त्रासदी कहा जाए तो शायद गलत न होगा।
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Tuesday, 12 July 2011

कराची में शूट एट साइट का आर्डर


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 12th July 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान के कराची शहर में स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई है। पाकिस्तान की वाणिज्यिक माने जाने वाली राजधानी में पिछले पांच-छह दिनों से जारी हिंसा में हजारों परिवार फंस गए हैं। कई स्थानों पर फंसे लोगों को अर्द्धसैनिक बलों की मदद से बाहर निकाला गया है। हालात इतने खराब हो गए हैं कि शुक्रवार को सरकार ने शूट ऑन साइट का हुक्म जारी कर दिया यानि दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश। बावजूद इसके हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही। अब तक मरने वालों की संख्या 100 के पार पहुंच चुकी है। हिंसाग्रस्त इलाकों में हजारों लोग अपने घरों में बन्द हैं और वे सुरक्षित स्थानों के लिए बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। उपद्रवियों द्वारा रॉकेट दागने और गोलाबारी से देश की वाणिज्यिक राजधानी पांच दिनों से ठप है। कई स्थानों पर फंसे हुए लोगों ने स्थानीय टेलीविजन चैनलों को बताया कि उन्होंने चार दिनों से कुछ नहीं खाया है और सड़कें बन्द होने से, लगातार गोलीबारी होने से वे सुरक्षित स्थानों की ओर नहीं जा पा रहे हैं। पुलिस ने कहा कि एमक्यूएम (मुहाजिर कौमी मूवमेंट) ने हिंसा के विरोध में एक दिन का शोक दिवस की घोषणा की थी। इसके बावजूद अधिकतर दुकानें बन्द रहीं और लोग घरों से नहीं निकले। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की हाल की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस वर्ष जून तक कराची में 1138 लोग मारे गए हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने हिंसा को नियंत्रित कर पाने में विफल रहने के लिए पाक सरकार की निन्दा की है।
कराची में ताजा हिंसा के कई कारण हैं। एमक्यूएम द्वारा सत्तारूढ़ गठबंधन छोड़ने के बाद सत्ताऱूढ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के साथ तनाव बढ़ गया है। इसके बाद सत्ता में शामिल पश्तोभाषी एएनपी समर्थकों और उर्दूभाषी एमक्यूएम समर्थकों में जातीय संघर्ष शुरू हो गया। 1947 में भारत से शरणार्थी के रूप में पाकिस्तान गए उर्दूभाषी मुसलमानों को पाक में मुहाजिर कहा जाता है। इतने वर्ष होने के बावजूद आज भी उन्हें मुहाजिर ही कहा जाता है। मुहाजिरों का नेतृत्व एमक्यूएम करता है। मुहाजिर अपने साथ दोहरे बर्ताव के कारण शुरू से ही पख्तूनों और पंजाबियों के साथ संघर्ष कर रहे हैं। उधर पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने पिछले पांच दिनों से कराची को दहला देने वाली हिंसा की घटनाओं के लिए तालिबान को जिम्मेदार ठहराया है। इन घटनाओं में कम से कम 108 लोग मारे जा चुके हैं। मलिक ने खुफिया सूचनाओं के आधार पर कहा कि लोगों को दहशत और तनाव में पहुंचाने वाली हिंसा के लिए कम से कम तालिबान जिम्मेदार है। उन्होंने कहा, `तालिबान ने अपने खिलाफ सुरक्षा बलों के अभियान के दौरान कुछ स्थानों को खाली करा दिया लेकिन पुलिस और कानून प्रवर्तन एजेंसियां उनकी तलाश कर रही हैं।' मलिक ने दावा किया कि कराची के उत्तरी हिस्से में तालिबान का नेटवर्प सक्रिय है। वह देश के सबसे बड़े शहर में आतंकवाद की गतिविधियों में शामिल है। आज अगर कराची जल रहा है तो इसके लिए पाक सरकार और उसकी नीतियां हैं। हिंसा के चलते पाकिस्तान के सबसे बड़े कारोबारी शहर कराची को जबरदस्त आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। जियो न्यूज ने खबर दी है कि कराची में व्यावसायिक प्रतिष्ठान बन्द रहने से हर दिन 10 अरब रुपये का घाटा हो रहा है। जैसे बीज बोओगे वैसी ही फसल काटोगे। अगर कराची का हाल बद से बदतर होता जा रहा है तो इसके लिए खुद पाकिस्तान जिम्मेदार है।
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Friday, 24 June 2011

पाक सेना में आतंकी समर्थक अफसर

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 24nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
हाल ही में जब कराची के मेहरान एयरबेस पर हमला हुआ था तभी मैंने इस कॉलम में लिखा था कि जरूर पाक सेना के कुछ आदमी आतंकवादियों से मिले हुए हैं। दरअसल पाक सेना और आईएसआई में एक धड़ा आतंकी समर्थक है। इसके कई सबूत पहले भी मिल चुके हैं। आईएसआई, पुलिस मुख्यालय, सेना की छावनियों पर हमलों यहां तक कि भूतपूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ पर कातिलाना हमले ये सभी साबित करते हैं कि पाक सेना के कुछ अफसर इन आतंकी संगठनों के सम्पर्प में हैं जो उन्हें महत्वपूर्ण जानकारियां देते रहते हैं। ताजा सबूत अब स्वयं पाकिस्तानी सेना ने दे दिया है। सेना के एक ब्रिगेडियर रैंक के वरिष्ठ अधिकारी को आतंकी संगठन से संबंध रखने के संदेह में गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तार ब्रिगेडियर अब तक के सबसे सीनियर अफसर हैं जिन्हें आतंकियों से सांठगांठ के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। इससे पहले कई छोटे रैंक के अफसरों को पकड़ा जा चुका है। गिरफ्तार ब्रिगेडियर अली खान रावलपिण्डी स्थित सेना मुख्यालय में तैनात था। सेना के मुख्य प्रवक्ता मेजर जनरल अतहर अब्बास ने मंगलवार को बताया कि ब्रिगेडियर खान को प्रतिबंधित कट्टरपंथी इस्लामी संगठन हिज्ब उत तहरीर (आजादी की जमात) के साथ सम्पर्प रखने के कारण हिरासत में लिया है। ब्रिगेडियर खान आतंकियों से सम्पर्प रखने के आरोप में गिरफ्तार किए गए अब तक के सबसे बड़े सैन्य अफसर हैं। बीबीसी ने आधिकारिक सूत्रों के हवाले से खबर दी है कि सेना प्रमुख जनरल अशफाक कयानी ने खुद खान की गिरफ्तारी के आदेश दिए थे। अब्बास ने बताया कि फिलहाल खान से सेना पूछताछ कर रही है। हालांकि अभी तक खान के खिलाफ कोई औपचारिक आरोप पत्र नहीं तैयार किया गया है। लेकिन सेना की विशेष शाखा इस मामले की जांच कर रही है। गौरतलब है कि पत्रकार सलीम शहजाद ने मेहरान नौसैनिक अड्डे पर आतंकी हमले के बाद खुलासा किया था कि पाकिस्तानी सेना में आतंकी ताकतें सक्रिय हैं। बाद में शहजाद की हत्या कर दी गई थी।
उल्लेखनीय है कि हिज्ब उत तहरीर ने मुस्लिम जगत में खलीफाशाही की स्थापना के लिए मुहिम चला रखी है। वह पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अमेरिका के नेतृत्व वाली विदेशी सेनाओं की कार्रवाई के भी खिलाफ हैं। संगठन की ओर से पाकिस्तानी सेना में घुसपैठ करने की भी कोशिशें की जाती रही हैं। ब्लूचिस्तान के शम्सी हवाई ठिकाने पर हमले के लिए भी इसी संगठन को जिम्मेदार माना जाता है। पिछले साल ही दो अफसरों का कोर्ट मॉर्शल इसलिए किया गया था, क्योंकि इनके इस संगठन से संबंध थे। 2004 में कई छोटे औहदे के अफसरों को परवेज मुशर्रफ पर हमले में शामिल होने के आरोप में सजा भी दी गई थी। ब्रिगेडियर खान की गिरफ्तारी से साबित होता है कि आतंकियों ने किस हद तक पाक सेना व आईएसआई में घुसपैठ कर ली है।
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Wednesday, 22 June 2011

अफगानिस्तान में 10 साल पहले अमेरिका घुसा क्यों था?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22nd June 2011
अनिल नरेन्द्र
अफगानिस्तान में तेजी से राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं। अमेरिका ने अब वहां से भागने के उपायों पर अमल करना आरम्भ कर दिया है। हाल के दिनों में दो ऐसी खबरें आई हैं जिनसे यह साफ होता है कि वहां कुछ खेल चल रहा है। पहली खबर जो आई वह यह थी कि भारत सहित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी 15 सदस्य देशों ने प्रतिबंधों के लिहाज से एक ऐसी सूची को मंजूरी दी है जिसमें तालिबान और अलकायदा को अलग-अलग नजरिये से देखा जाएगा। इसका मकसद तालिबान और अफगानिस्तान में सुलह के प्रयासों में शामिल करने से जुड़ा है। इस संबंध में सुरक्षा परिषद ने गत शुक्रवार रात पूर्ण बहुमत से दो प्रस्ताव पारित किए। इनमें प्रतिबंधों को लेकर तालिबान के लिए अलकायदा से एक अलग सूची की बात की गई है। इस कदम के बाद अब अलकायदा और तालिबान आतंकवादियों को अलग-अलग पैमानों पर तोला जाएगा। दूसरी घटना है अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई का यह कहना कि अमेरिका तालिबान से बातचीत कर रहा है। इस सम्पर्प के बारे में यह सम्भवत पहली आधिकारिक पुष्टि है। करजई ने काबुल में एक सम्मेलन में कहा कि तालिबान के साथ बातचीत शुरू हो गई है। बातचीत अच्छी चल रही है। विदेशी सेनाएं विशेषकर अमेरिका खुद ही बातचीत कर रहा है। अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान में चल रहा युद्ध 10वें साल में प्रवेश कर गया है और वहां पर इस संघर्ष के राजनीतिक समाधान की आवाज तेज होती जा रही है।
अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने जो खुलासा किया है वह अफगानिस्तान के लिए जितना खतरनाक है, उतना ही अमेरिका की स्वार्थपरता और दोहरेपन का एक और सबूत भी है। अफगानिस्तान के खिलाफ अमेरिका ने आखिर युद्ध क्यों छेड़ा था? जहां तक हम समझ सके हैं कि 9/11 हमलों के लिए अमेरिका अलकायदा और तालिबान को जिम्मेदार मानते हुए उन्हें सबक सिखाने के लिए यह युद्ध छेड़ा गया था। पिछले 10 सालों में पहले तो अमेरिका ने इसी तालिबान हुकूमत को सत्ता से हटाया और अब वही तालिबान अच्छा हो गया है और उसे दोबारा सत्ता सम्भालने की तैयारी हो रही है। हम राष्ट्रपति बराक ओबामा और अमेरिका की मजबूरी समझ सकते हैं। उन्होंने घोषणा कर रखी है कि 2014 तक अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की पूरी वापसी होनी है इसलिए वह आनन-फानन में समस्या का हल निकालना चाहते हैं। इसी के तहत तालिबान से बातचीत शुरू की है, जो हालांकि अभी शुरुआती दौर में है। अमेरिका के जेबी संगठन संयुक्त राष्ट्र ने तालिबान और अलकायदा पर इसीलिए पुरानी व्यवस्था तोड़ते हुए जो संदेश दिया है उसका लब्बोलुआब यही है कि अगर अलकायदा का साथ छोड़कर तालिबान अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में सहयोगी बनता है तो उसे `माफी' दे दी जाएगी।
हमें थोड़ा आश्चर्य इस बात पर भी है कि आखिर भारत ने क्या सोचकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी? क्या भारत की नजरों में भी तालिबान एक अच्छा संगठन बन गया है जिससे भारत को अब कोई खतरा नहीं है? सवाल यह नहीं कि तालिबान कैसा है, सवाल यह है कि एक आतंकी संगठन जिसने अपना एजेंडा सार्वजनिक किया हो उससे आप समझौते की बात कर रहे हो, वह भी बकवास शर्तों पर? मामला तो यह है कि एक आतंकी संगठन से बातचीत कर अमेरिका ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसके तमाम फैसलों के पीछे सिर्प उसका अपना स्वार्थ होता है, उसे इस बात की कतई परवाह नहीं कि इस फैसले का भारत-पाकिस्तान-ईरान मुल्कों पर क्या असर पड़ेगा? न ही उसे अब वैश्विक आतंकवाद से कोई लेना-देना है। विद्रुप तो यह है कि इस बातचीत में अफगान सरकार को भी शामिल नहीं किया गया। खुद अफगान मानते हैं कि यह अत्यंत घातक कदम होगा और मुल्क फिर 2001 से पहले की स्थिति में पहुंच जाएगा। अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा नुकसान भारत को भी होगा। भारत द्वारा अफगानिस्तान में चल रही विभिन्न पुनर्निर्माण योजनाओं को भारी झटका लगेगा। इससे करजई सरकार की छवि, कार्यक्षमता और भविष्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा पर अमेरिका को इन सबसे क्या लेना-देना है। इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी कि एक दशक पहले जिस अमेरिका ने `वॉर ऑन टेरर' का नारा देकर अफगानिस्तान में इसलिए प्रवेश किया था कि अलकायदा और तालिबान को समाप्त कर सके, आज वह उसे उन्हीं आतंकियों के हवाले करने के बारे में सोच रहा है ताकि उसे अफगानिस्तान से भागने का रास्ता मिल जाए?
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Wednesday, 1 June 2011

Pakistan’s Existence in Danger

Anil Narendra
Pakistan’s very existence has now become a big question mark. Taliban has said that Pakistan’s nuclear arsenal is no longer their target. Taliban’s target, now is not only to capture the nuclear bombs but also Pakistan. As we all are aware after the death of Osama Bin Laden, Taliban has un-leashed the campaign of terrorists in Pakistan. Taliban’s spokesman Ahsaan Ullah had the guts to say that our objective is now to capture power in Pakistan. A reporter of the Wall Street Journal spoke to Ahsaan over phone wherein Ahsaan told him that Pakistan is the only Muslim Country which has the atomic bomb and hence we want to capture it.
 Taliban’s threat cannot be taken lightly. Few days back when the Naval Base Mehran was attacked by a handful of Al-Qaeda militants, they were successful in their objective to a very large extent. This was also because a section of the Pakistani military sympathizers of Al-Qaeda provided these militants with vital information of the airbase. The place where the Al-Qaeda militants struck was hardly 24 km away from the Nuclear Arsenal Depot. P.N.S. Mehran is one of the most important and well guarded naval airbases of Pakistan. Without the active support of a section of the Pakistani Army and Defense Establishment, success in this attack could not be guaranteed. The way these militants fought for hours with the Pakistani commandos goes to prove that not only were they fully equipped for the job but were well armed with prior strategic information about the base. 
There is virtually a civil war kind of situation going on in Pakistan today and in these circumstances we can not afford to talk the Taliban’s threat lightly. I can not imagine the catastrophic situation wherein Taliban succeeds in their attempt. Behind the facade of political leadership the real force is the Pakistan’s army and the way Al-Qaeda and Taliban element are succeeding in their strike day after day proves that even the Pakistan Army is unable to contain these terrorists elements. The writ of the Government of Asif Ali Zardari and Yusuf Raza Gilani hardly extends beyond the metros of Pakistan. The situation is so grave that even Indian Prime Minister Man Mohan Singh who is well known for his peaceful co-existence thesis is now asking for caution vis-à-vis Pakistan. India cannot prevent the Talibani’s from taking over Pakistan but the United States is definitely in a position to do so. The US can ensure that Al-Qaeda and Taliban do not succeed in their extremely dangerous plan. The least the Americans can do for the time being is to take control of this nuclear arsenal of Pakistan. This will at least prevent a very grave danger, the rest can be looked into later on.
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पाकिस्तान का तो अस्तित्व ही खतरे में आ गया है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on  1st June 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान का तो वजूद ही खतरे में आ गया है। तालिबान ने कह दिया है कि पाकिस्तान के परमाणु आयुधों पर हमले की उसकी कोई योजना नहीं है। उसका तो लक्ष्य पाकिस्तान के परमाणु हथियार सहित पाकिस्तान पर कब्जा करना है। तालिबान ने ओसामा बिन लादेन के मारे जाने का बदला लेने के लिए पाक में हिंसक अभियान छेड़ रखा है। तालिबान पवक्ता एहसानुल्ला एहसान ने कहा कि तालिबान का अब लक्ष्य पाकिस्तान और उसके परमाणु हथियारों पर कब्जा करने का है। पाकिस्तान के कराची स्थित नौसेना के पमुख अड्डे पर तालिबान ने पूरे समन्वय के साथ हमला किया था। द वाल स्ट्रीट जनरल की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने इस मुद्दे पर तालिबान पवक्ता से टेलीफोन पर बात की। फोन पर एहसान ने कहा कि पाकिस्तान परमाणु क्षमता वाला अकेला मुस्लिम देश है और तालिबान का इरादा हथियारों को नष्ट करने का नहीं बल्कि पूरे देश और परमाणु हथियारों पर कब्जा करने का है।
तालिबान की धमकी को हल्के से नहीं लिया जा सकता। पिछले दिनों जब कराची के नौ सैनिक अड्डे मेहरान पर मुट्ठी भर आतंकियों को सफलता इसलिए भी मिली क्योंकि पाकिस्तानी सेना में तालिबान समर्थक अधिकारी बैठे हुए हैं। पाकिस्तानी नौसेना के साथ, असैनिक विश्लेषक आइशा सिद्दीकी ने डान अखबार के साथ एक बातचीत में कहा नौसेना संवदेनशील है क्योंकि नौ सेना और वायुसेना दोनों में उग्रवादियों की घुसपैठ है। वह कहती हैं ः नौसेना में आतंकवादियों की घुसपैठ एक पुरानी दास्तान है। आइशा की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब रक्षा विशेषज्ञों का आंकलन है कि पाकिस्तानी नौसेना, वायु सेना और थल सेना तीनों में तालिबान की घुसपैठ हो चुकी है। मेहरान हवाई बेस पर इनकी मदद से ही तालिबान ने सफल हमला किया। जिस जगह हमला हुआ था उससे मुश्किल से 24 किलोमीटर दूर परमाणु हथियारों का डिपो था। पीएनएस मेहरान पाक के सबसे अहम नेवल एयरबेसों में से एक है। बिना भीतरी शख्स की मदद के आतंकवादियों को नेवल बेस में एयरकाफ्ट की मौजूदगी का पता नहीं लग सकता था। जिस तरह से वे घंटों डटे रहे। उससे मालूम होता है कि वे पुख्ता जानकारी के साथ आए थे।
आज जब पाकिस्तान में गृह युद्ध जैसे हालात बन गए हैं, तालिबान की धमकी एक डरावनी हकीकत में न बदल जाए? पर्दे के पीछे से पाक में असल सत्ता चला रही पाक सेना आतंकियों के मुकाबले पस्त दिख रही है। आम पाकिस्तानी न तो अब पाक फौज पर विश्वास करता है और न ही पाक राजनीतिज्ञों पर। आसिफ अली जरदारी और यूसुफ रजा गिलानी की सरकार बस इस्लामाबाद सहित मुट्ठीभर बड़े शहरों तक ही सीमित रह गई है। हालात कितने भयावह हो चुके हैं इसका अंदाजा पधानमंत्री मनमोहन सिंह की चेतावनी से लगाया जा सकता है। हमेशा बातचीत से समस्याओं को सुलझाने की पहल करने वाले मनमोहन सिंह को भी पड़ोसी देश को संभलकर चलने की चेतावनी देनी पड़ी है। पाकिस्तान को तालिबानी हाथों में जाने से फिलहाल केवल अमेरिका ही रोक सकता है। अमेरिका की दोनों पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मौजूदगी है। इससे पहले कि तालिबान के हाथ पाक एटमी हथियार लगे, अमेरिका को अविलम्ब इन पाक परमाणु हथियारों को अपने कब्जे में ले लेना चाहिए। ऐसा करने के बाद कम से कम एक बहुत भारी खतरा तो टलेगा, बाकी देखा जाएगा।
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Wednesday, 25 May 2011

जैसे बीज बोओगे वैसी ही फसल काटोगे

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25th May 2011
अनिल नरेन्द्र

पाकिस्तान के अंदरुनी हालत बद से बदतर होते जा रहे हैं। शायद ही अब कोई दिन ऐसा जाता हो जब वहां आतंकी हिंसा न होती हो। रविवार रात को पाकिस्तानी तटीय शहर में अति सुरक्षित माने जाने वाला एक नौसेना बेस मेहरान हवाई ठिकाने पर आतंकियों ने जबरदस्त हमला किया। सुरक्षाबलों से 16 घंटे तक मुठभेड़ चली और तभी जाकर आतंकियों पर काबू पाया जा सका। इस हमले में 10 सुरक्षाकर्मी और 14 आतंकी मारे गए। मुठभेड़ के बीच ही चार आतंकवादियों ने खुद को उड़ा लिया। कराची का यह हमला मुंबई 26/11 हमले की तरह का ही था। फर्प सिर्प इतना था कि वह बहुत बड़ा था और लम्बा चला था, यह हमला छोटा था और जल्द खत्म हो गया पर यह हमला इसलिए गम्भीर है क्योंकि यह एक फौजी ठिकाने पर हुआ है और यहां घुसकर लगभग 15 घंटे तक सुरक्षाबलों का मुकाबला करके तालिबान ने पाकिस्तानी सत्ता सत्र व सेना को गम्भीर चुनौती दी है। पाकिस्तान में सेना, आईएसआई मुख्यालय, पुलिस ठिकाने, मिलिट्री कॉलेज लगभग सभी सुरक्षा ठिकाने आतंकवादी हमलों के शिकार हो चुके हैं। रावलपिण्डी स्थित सेना मुख्यालय पर अक्तूबर 2009 में हुए हमलों के बाद यह सबसे भयानक हमला था।
यह हमला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह ठिकाना उन चुनिन्दा महत्वपूर्ण ठिकानों में से एक है, जहां सुरक्षा इंतजाम चाक-चौबंद रहते हैं क्योंकि यहां पाक फौज से जुड़े कुछ अहम संस्थान हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि पीएनएस मेहरान जहां आतंकियों ने हमले को अंजाम दिया वहां पाक नेवी और एयरफोर्स का आसपास ही मजबूत बेस है। यह पाक नौसेना का पहला नेवल एयर स्टेशन है यानि यह पाकिस्तानी नेवी के हवाई दस्ते का ठिकाना है। यही नहीं, इससे बिल्कुल पास में ही स्थित है पाकिस्तान का फैजल एयरबेस। यहीं पर पाकिस्तानी एयरफोर्स का साउदर्न एयर कमांड मौजूद है। इस हमले ने अमेरिका को भी हिलाकर रख दिया है। पाक में सबसे महफूज माने जाने वाले कराची के मेहरान नौसैनिक अड्डे की सुरक्षा व्यवस्था को भेदते हुए आतंकवादियों ने जिस तरह से यह वारदात की उससे अमेरिका व पश्चिमी देशों में यह आशंका बलवती हो गई है कि पाक के एटमी हथियार सुरक्षित नहीं हैं। पाक के एटमी हथियारों का एक बड़ा हिस्सा कराची के इन बेसों में ही सुरक्षित रखा गया है। अमेरिका को अब यह डर सताने लगा है कि कहीं पाकिस्तान के एटमी हथियार आतंकियों के हाथ न लग जाएं। कराची का यह हमला पाक एटमी हथियारों को अपने कब्जे में लेने के लिए ड्रेस रिहर्सल भी तो हो सकता है। आतंकियों ने सोचा हो कि क्यों न हम इस बेस पर हमला करके तजुर्बा करें कि क्या अगली बार हम एटमी हथियारों को अपने कब्जे में ले सकते हैं?
हमारे बड़े बूढ़े कहते हैं कि जैसा बीज बाओगे वैसी ही फसल काटोगे। पाकिस्तान आज दुनिया की सबसे बड़ी टेरर फैक्टरी है। यहां बच्चों तक को जिहादी बनाया जा रहा है और इस काम के लिए धन दे रहे हैं सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात। पाकिस्तान के प्रमुख पत्र डॉन ने विकीलीक्स के हवाले से रविवार को यह खबर दी कि खाड़ी देशों से इन संगठनों को हर साल करीब 10 करोड़ डालर की मदद मिल रही है। इस राशि से पाकिस्तान के जेहादी संगठन अपने शिविर चला रहे हैं। आज पाकिस्तान अपने बुने हुए जाल में ही फंस गया है। उसे समझ नहीं आ रहा कि वह करे तो क्या करे? इधर कुआं है तो उधर खाई।
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Thursday, 12 May 2011

यूसुफ रजा गिलानी ने अमेरिका को खरी-खोटी सुनाईं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 12 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने सोमवार को अमेरिका के `किल ओसामा' ऑपरेशन के मसले पर संसद में सफाई देते हुए उल्टे अमेरिका को कटघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने साफ पूछा कि ओसामा किसकी देन है? ओसामा न तो हमारी देन है और न ही हमने ओसामा को बढ़ावा ही दिया। यह आपने (अमेरिका) ने किया है। गिलानी ने ओसामा बिन लादेन के दुर्दांत आतंकी बनने पर सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर ओसामा को तैयार किसने किया? 90 के दशक में तालिबान और अलकायदा के उभरने पर सवाल उठाते हुए गिलानी ने कहा कि ओसामा बिन लादेन के लिए अकेले पाकिस्तान को दोष नहीं दिया जा सकता। अमेरिका पर परोक्ष हमला बोलते हुए गिलानी ने कहा कि अलकायदा सरगना को इतना बड़ा आतंकी किसने बनाया यह भी जानना जरूरी है। उन्होंने कहा कि हमें अन्य देशों की नीतियों और गलतियों का जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। अलकायदा का जन्म स्थान पाकिस्तान नहीं है। हमें इतिहास से सीख लेते हुए चीजों को सामने रखना होगा। गिलानी नेशनल असेम्बली (संसद) को संबोधित कर रहे थे। गिलानी ने कहा कि हमने लादेन को पाकिस्तान या अफगानिस्तान में आमंत्रित नहीं किया। गिलानी ने आईएसआई की सराहना करते हुए कहा कि आईएसआई हमारी राष्ट्रीय सम्पदा है। मुझे आतंक विरोधी गतिविधियों के लिए आईएसआई की भूमिका पर गर्व है। गिलानी ने यह भी कहा कि अमेरिका हमारी आईएसआई की मदद के बिना आतंकी सरगना लादेन तक पहुंच नहीं सकता था। गिलानी ने पाक में लादेन के पाए जाने के बाद पाक सेना और आईएसआई की आलोचनाओं को खारिज कर दिया। गिलानी ने अमेरिका की दोहरी चाल का हवाला देते हुए कहा कि 80 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत सेना के खिलाफ जेहादियों को तैयार करने में अमेरिका ने मुख्य भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा कि पाक निश्चित तौर पर पूरे प्रकरण की तह में जाएगा। उन्होंने यहां तक कह दिया कि अमेरिकी नीति का दुष्परिणाम पाकिस्तान आज भी भुगत रहा है। गिलानी ने अन्त में यह चेतावनी दे डाली कि अब किसी ने ऐसा दुस्साहस किया तो मुंहतोड़ जवाब देंगे।
निश्चित रूप से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने अमेरिका को खरी-खरी सुनाई हैं। यह सत्य है कि ओसामा बिन लादेन अमेरिका की देन है पर पुराना इतिहास दोहरा कर पाकिस्तान अपनी जिम्मेवारियों से नहीं बच सकता। दरअसल पाकिस्तान इसलिए भी अमेरिका से पंगा लेने का जोखिम उठा रहा है, क्योंकि वह अमेरिका की मजबूरियों से परिचित है। अमेरिका सब कुछ होने के बावजूद पाकिस्तान के तलवे चाटेगा उन्हें अरबों डालर देगा। पाकिस्तान आज भी अमेरिका की वॉर ऑन टेरर में सबसे बड़ा सहयोगी है। फिर चीन पूरी तरह से पाकिस्तान के साथ है। ऑपरेशन किल ओसामा के बाद जब सारी दुनिया पाक को कोस रही थी तो चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जियांग यू ने कहा, `पाकिस्तान आतंकवाद निरोधक प्रयासों में आगे है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को आतंकवाद के विरुद्ध पाकिस्तान की ओर से दिए जाने वाले सहयोग को समझना चाहिए और उसका समर्थन करना चाहिए।' आज भी अमेरिका को पाकिस्तान की ज्यादा जरूरत है बनिस्पत पाक को अमेरिका की। वैसे अमेरिका को इतनी खरी-खोटी सुनाने के लिए गिलानी की हिम्मत की दाद देनी होगी।

Wednesday, 4 May 2011

दुनिया का सबसे मोस्ट वांटेड ओसामा बिन लादेन मारा गया

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

प्रकाशित: 04 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
पूरी दुनिया को इस्लाम के रंग में रंगने का खूंरेजी ख्वाब देखने वाले और अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का पर्याय बन चुके मोस्ट वांटेड आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को अमेरिका ने मौत के घाट उतारकर अमेरिका ने यह साबित कर दिया कि वह अपने इरादों के प्रति अटल है और अपने शत्रुओं का सफाया करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। रविवार की देर रात अमेरिकी सैनिकों ने एक अत्यंत गोपनीय ऑपरेशन में उसे एक ऐसी इमारत के अन्दर मार गिराया जो पाकिस्तान की मिलिट्री अकादमी से कुछ ही दूर स्थित है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से 60 किलोमीटर दूर एबटाबाद शहर में स्थानीय समयानुसार रात डेढ़ बजे अमेरिकी सेना के विशेष बल को लेकर चार हेलीकॉप्टर उस इमारत के कम्पाउंड में उतरे जहां ओसामा के छिपे होने की सूचना थी। सोमवार को टीवी पर जो फुटेज दिखाए गए, उनमें खेतों के बीच एक कम्पाउंड दिख रहा था, जो 12 फीट ऊंची दीवारों से घिरा हुआ था। किलेनुमा इस इमारत के परिसर में हेलीकॉप्टरों के उतरने के बाद उन पर ओसामा के गार्डों ने फायरिंग की। अमेरिकी सैनिकों की जवाबी कार्रवाई में 54 वर्षीय ओसामा की मौत हो गई। उसके बेटे और एक महिला के मारे जाने की भी खबर है। इस अभियान में एक हेलीकॉप्टर को क्षति पहुंची। मालूम हो कि अमेरिका ने ओसामा पर ढाई करोड़ डालर (लगभग 111 करोड़ रुपये) का इनाम घोषित किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने राष्ट्र के नाम संबोधन में ओसामा के मारे जाने की पुष्टि की। लादेन के मारे जाने के  बाद उसकी दो पत्नियों तथा चार बच्चों को हिरासत में ले लिया गया है। अमेरिका का कहना है कि इस्लामी रीति-रिवाज के साथ ओसामा बिन लादेन के शव को समुद्र में दफन किया गया है। समझा जाता है कि उसके अपने देश सऊदी अरब द्वारा शव लेने से इंकार करने पर ऐसा किया गया। हालांकि उसे समुद्र में दफनाने पर इस्लामी विद्वानों ने सवाल उठाए हैं। उसे समुद्र में दफनाने के पीछे अमेरिका की मंशा उसकी कब्रगाह को आस्था का केंद्र बनने से रोकने की रही है। लादेन की पहचान की पुष्टि के लिए अमेरिका ने उसके शव का डीएनए परीक्षण कराया है। यह डीएनए टेस्ट लादेन की बहन के डीएनए से मिलने से किया गया, जिसमें शव लादेन का होने की 99.9 फीसदी पुष्टि हो गई है। बहन का डीएनए सैम्पल 9/11 के हमलों के बाद लिया गया था। लादेन के बारे में किसी भी तरह का शक दूर करने के लिए चेहरे का मिलान करने वाली अत्याधुनिक फेशियल रिकाग्निशन तकनीक का भी सहारा लिया गया। सन 2001 में 9/11 के हमले के बाद अमेरिका लगभग दस साल से अलकायदा सरगना को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने की कोशिश में था। जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने लादेन के मारे जाने की खबर की पुष्टि की तो सारे अमेरिका में जश्न का माहौल बन गया। रात के अंधेरे होने के बावजूद व्हाइट हाउस के बाहर खुशी से झूमती भीड़ एकत्र हो गई।
हालांकि अमेरिका ने लादेन ऑपरेशन को काफी खुफिया रखा और आईएसआई और अलकायदा को इसकी हवा नहीं लगने दी पर इस कार्रवाई से कुछ ही दिन पहले अलकायदा की धमकी का महत्व बढ़ जाता है। क्या यह सम्भव है कि ओसामा के सम्भावित अमेरिकी कार्रवाई का आभास हो गया था? इस कार्रवाई के कुछ ही दिन पहले चर्चित विकीलीक्स की ओर से जारी गोपनीय दस्तावेज में कहा गया, अलकायदा के एक वरिष्ठ स्वयंभू कमांडर ने दावा किया है कि उसके संगठन ने यूरोप में एक परमाणु बम छिपा रखा है। अगर लादेन को पकड़ा गया या मारा गया तो वह इसमें विस्फोट कर देंगे? गुआतांनामो कारागार में 780 पकड़े गए लोगों की पृष्ठभूमि और पूछताछ के दौरान उनकी ओर से दिए बयान के आधार पर यह गोपनीय दस्तावेज तैयार किए गए हैं। ओसामा के मारे जाने से दुनिया में हो रही आतंकवादी गतिविधियों पर शायद ही कोई लम्बा-चौड़ा असर पड़े। क्योंकि आज सारी दुनिया में इतने अलकायदा टाइप के सेल स्थापित हो चुके हैं जो स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं कि इनकी गतिविधियों पर कोई असर न पड़े। फिर इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पिछले एक दशक में अलकायदा ने विचारधारा का रूप ले लिया है। आतंकवाद को खाद-पानी देने वाली इस विचारधारा  का अन्त नहीं दिखता। इसलिए और भी नहीं, क्योंकि अलकायदा ने अमेरिका के नेतृत्व में छेड़े गए आतंकवाद विरोधी अभियान को इस्लाम पर हमले का रूप दे दिया है।
अमेरिकी विशेष बल के हाथों इस्लामाबाद के करीब एबटाबाद में एक शानदार बंगले में ओसामा की मौत और इससे पहले अनेक अलकायदा नेताओं की पाकिस्तानी शहरों में हुई गिरफ्तारी से यह स्पष्ट हो जाता है कि आतंकवादियों की सुरक्षित पनाहगाह अफगान-पाक सीमा या भारत सीमा पर नहीं बल्कि पाकिस्तान के बीचोबीच है। इससे एक और मूलभूत सच्चाई रेखांकित होती है कि पाकिस्तान में सेना का वर्चस्व समाप्त किए बिना तथा वहां कट्टरपंथ को समाप्त किए बगैर अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ जंग नहीं जीती  जा सकती। 9/11 हमले के बाद पाकिस्तान से पकड़े गए अन्य आतंकवादी नेताओं में अलकायदा के तीसरे नम्बर का नेता शालिद शेक मुहम्मद, नेटवर्प व्यवस्था का प्रमुख अबु जुबैदिया, आसुर जजीरी शामिल है। इन तमाम गिरफ्तारियों में एक समान कड़ी यह है कि ये सब पाकिस्तानी शहरों में पकड़े गए हैं। इस आलोक में यह हैरानी की बात नहीं है कि बिन लादेन कबाइली इलाकों के बजाय पाकिस्तान की राजधानी के निकट शहर में मारा गया। अगर हैरानी है तो इस बात की कि लादेन इस्लामाबाद के बगल में एबटाबाद में रह रहा था। यहां पाकिस्तानी सेना का बड़ा आधार शिविर, सैन्य अकादमी, सैन्य अस्पताल और अनेक वरिष्ठ सैन्य व खुफिया अधिकारी व पूर्व अधिकारियों के आवास हैं। अमेरिका को लादेन को पकड़ने में दस साल इसलिए भी लगे, क्योंकि लादेन को पाकिस्तानी रक्षा प्रतिष्ठान के कुछ तत्वों का संरक्षण प्राप्त था। याद रहे कि ओसामा डायलासिस पर था और डायलसिस हर स्थान पर नहीं हो सकता। कटु सत्य तो यह है कि अमेरिका बेशक जितना प्रयास करे जब तक पाकिस्तानी सेना और आईएसआई नहीं सुधरती तब तक न तो आतंकवाद ही खत्म होगा और न ही पाकिस्तान का राष्ट्र निर्माण सम्भव है। बहरहाल अमेरिका को यह खुशी व संतोष जरूर होगा कि उसने 9/11 का बदला ले लिया है।

Friday, 29 April 2011

आईएसआई एक आतंकवादी संगठन है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 29 अप्रैल 2011
-अनिल नरेन्द्र

भारत तो हमेशा से कहता आया है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई एक सही एजेंसी नहीं है और यह आतंकवाद को बतौर एक हथियार इस्तेमाल करती है पर अमेरिका सहित अधिकतर पश्चिमी देश हमारी बात से सहमत नहीं थे। अमेरिका ने तो आतंकवाद के खिलाफ जंग में पाकिस्तान को अपना स्ट्रेटेजिक पार्टनर तक बना रखा है पर जब खुद पर बीतती है तो अमेरिका भी बोलने  में मजबूर हो जाता है कि आईएसआई एक आतंकवादी संगठन है। द गार्डियन जैसे प्रतिष्ठित ब्रिटिश अखबार ने अमेरिकी गुप्तचर फाइलों का हवाला देते हुए कहा है कि गुआंतानामो-वे के जांचकर्ताओं को की गई सिफारिश में इंटरसर्विसेज महानिदेशालय के साथ-साथ अलकायदा, हमास और हिजबुल्ला को एक चुनौती करार दिया गया है। सितम्बर 2007 के इन दस्तावेजों में कहा गया है, इन समूहों में से किसी से भी संबंधित होने का अर्थ आतंकवादी या विद्रोही गतिविधि है। दस्तावेज में कहा गया है, `इन संगठनों के साथ संबंध रखने का अर्थ है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति ने अलकायदा या तालिबान को समर्थन दिया है या वह अमेरिका पर गठबंधन बलों के खिलाफ कार्रवाइयों में लिप्त रहा है।' हाल ही में अमेरिका की गुप्तचर सेवाओं को खबरें मिली थीं कि आईएसआई तालिबान को अफगानिस्तान में कई वर्षों से समर्थन दे रही है। इस खबर के प्रकाशित होने के कुछ समय बाद ही यह नया खुलासा हुआ है। अमेरिकी अधिकारियों की ओर से तैयार खुफिया दस्तावेज में आईएसआई का जिन तीन दर्जन आतंकी संगठनों के साथ उल्लेख किया गया है उनमें अलकायदा, तालिबान के अलावा भारत को खासतौर पर आतंकित करते रहने वाले लश्कर-ए-तोयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन भी हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि यह दस्तावेज 2007 में तैयार किया गया हो लेकिन माना जा रहा है कि अमेरिका को चुनौती देने वाले संगठनों की सूची में से आईएसआई को अभी हटाया नहीं गया है। इसका सीधा अर्थ है कि जिस तरह पाकिस्तान ने आतंकवाद को लेकर दोहरे मानदंड अपना रखे हैं उसी तरह अमेरिका ने भी। पाकिस्तान यह दावा करता है कि वह भी आतंकवाद  के खिलाफ है और अपने दावे को सही ठहराने के लिए खुद के आतंकवाद से त्रस्त होने का रोना रोता है, लेकिन सच्चाई यह है कि वह एक बड़ी संख्या में आतंकी संगठनों का परोक्ष-प्रत्यक्ष रूप से समर्थन करता है। समय-समय पर अमेरिकी विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और यहां तक कि राष्ट्रपति बराक ओबामा यह कह चुके हैं कि आतंकवाद के खिलाफ अपेक्षित कदम उठाने से पाकिस्तान इंकार कर रहा है।
सारी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान दुनिया में एक मात्र देश है जो अपनी नीति और रणनीति के तहत आतंकवाद को प्रश्रय देता है। पाकिस्तान को आज इसीलिए आतंकवाद की नर्सरी कहा जाता है और आईएसआई की विभिन्न आतंकी कार्रवाइयों में संलिप्तता बार-बार उजागर भी होती रही है। मुंबई हमले में भी उसकी भूमिका से अब अमेरिका पूरी तरह वाकिफ हो चुका है। यही नहीं अमेरिका में 9/11 हमलों में भी आईएसआई की भूमिका थी। अमेरिका अन्दरखाते यह सब जानता है पर चूंकि अफगानिस्तान में उसे आईएसआई का साथ चाहिए इसलिए भी सब कुछ जानते हुए भी अनजान बन जाता है। ताजा खुलासे से अमेरिका का पाक की ओर शायद ही नजरिया बदले पर भारत को यह संतोष जरूर होगा कि आज सारी दुनिया मानने लगी है कि आईएसआई एक आतंकी संगठन है।