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Friday, 20 July 2012

भारत-पाक क्रिकेट मैचों का विवादास्पद फैसला

केंद्र सरकार ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को पाकिस्तान के साथ तीन एक दिवसीय व दो टी-20 मैच आयोजित करने की हरी झंडी दे दी है। भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट संबंध बहाल करने का फैसला सोमवार को बीसीसीआई की कार्यकारी समिति ने लिया। बोर्ड ने एक बयान में बताया कि पाकिस्तानी क्रिकेट टीम को दिसम्बर 2012 से जनवरी 2013 के बीच तीन एक दिवसीय व दो टी-20 मैचों की सीरीज खेलने के लिए आमंत्रित करने का निर्णय लिया गया है। कोलकाता, चेन्नई और दिल्ली में एक दिवसीय जबकि बेंगलुरु और अहमदाबाद में टी-20 के मुकाबले होंगे। बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य राजीव शुक्ला के मुताबिक पी. चिदम्बरम ने गृह मंत्रालय की तरफ से इस सीरीज पर किसी तरह की आपत्ति न होने की बात कही है। हालांकि मंत्रालय ने इस निर्णय के प्रति कोई खास उत्साह नहीं दिखाया है। इतना ही नहीं, विदेश मंत्रालय से भी हरी झंडी मिलने की जानकारी है। केंद्र सरकार व बीसीसीआई का यह फैसला चकित और साथ ही सवाल खड़ा करने वाला जरूर है। देश की जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि आखिर इस बीच ऐसा क्या सकारात्मक हुआ है जिससे भारत सरकार ने पाकिस्तान की क्रिकेट टीम को देश में खेलने की अनुमति प्रदान कर दी? अभी-अभी तो नए सिरे से यह सामने आया है कि मुंबई हमले में पाकिस्तान की सरकारी एजेंसियों की भागीदारी थी। चौंकाने वाली बात यह है कि कसाब, डेविड हेडली और अबू जिंदाल के खुलासों के बाद भी पाक सरकार ने 26/11 के गुनहगारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। इस फैसले का सुनील गावस्कर ने भी खुलकर विरोध किया है। गावस्कर ने कहा कि मुंबई का होने के नाते मुझे लगता है कि जब मुंबई हमले की जांच में पाकिस्तान से सहयोग नहीं मिल रहा है तो आयोजन में जल्दबाजी क्यों की गई? भाजपा प्रवक्ता शहनवाज हुसैन की टिप्पणी दिलचस्प थी। वे कहते हैं कि पाकिस्तानी क्रिकेट टीम विश्व कप मैच के लिए पहले भी भारत आ चुकी है। अब मुंबई हमले के गुनहगार आतंकियों की टीम को भी भारत बुलाया जाना चाहिए। सपा नेता अबू आजमी का कहना था कि मुंबई हमले के जिम्मेदार देश के साथ हम कैसे खेल संबंध रख सकते हैं। मैंने इसी कॉलम में आईपीएल मैचों के दौरान सुझाव दिया था कि जब पाकिस्तानी अम्पायर आ सकते हैं, अजहर महमूद लंदन के जरिए आ सकते हैं तो पाकिस्तानी खिलाड़ियों के आईपीएल खेलने पर पाबंदी क्यों? आईपीएल में पाक खिलाड़ियों का खेलना समझ आता है, क्योंकि वह भारत सरकार का टूर्नामेंट नहीं है पर भारत-पाक श्रृंखला वह भी भारत सरकार के आमंत्रण पर खेली जाए तो वह और बात बन जाती है। आज भारत सहित सभी सभ्य दुनिया का पाकिस्तानी आतंक पर अंकुश लगाने का दबाव बढ़ रहा है। ऐसे समय पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद पर नकारात्मक रुख दिखाने के बावजूद उन्हें अपने देश में बुलाना क्या उचित होगा? हमें नहीं मालूम कि इस फैसले के पीछे केंद्र सरकार की क्या सोच है पर संदेश यही जाता है कि पाकिस्तान के प्रति उसकी नीति पहले की तरह ढुलमुल बनी हुई है। बेशक भारत सरकार की नीति ढुलमुल हो पर पाकिस्तान का रवैया आतंक के प्रति वही पुराना है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया। इससे अधिक निराशाजनक और कुछ नहीं हो सकता कि पाकिस्तान की क्रिकेट टीम को भारत आकर खेलने की अनुमति देने के 24 घंटे के अन्दर वहीं की एक अदालत ने मुंबई हमले की जांच के लिए गठित एक आयोग की रिपोर्ट को अवैध बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया। इससे यह पुराना सवाल नए सिरे से उठना स्वाभाविक है कि क्या पाकिस्तान मुंबई हमले की साजिश रचने वालों को दंडित करने के लिए तनिक भी इच्छुक है? यह सवाल इसलिए और भी गंभीर हो जाता है, क्योंकि मुंबई हमले की साजिश रचने के सात आरोपियों के खिलाफ सुनवाई शुरू होने का नाम ही नहीं ले रही है।

Wednesday, 4 July 2012

तालिबान, अलकायदा से भी बड़ा खतरा भारत!


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

Published on 4 July 2012
अनिल नरेन्द्र
न्यू रिसर्च सेंटर के ग्लोबल एटीट्यूड्स प्रजेक्ट ने पाकिस्तान में एक सर्वेक्षण किया है। सव्रेक्षण में बताया गया है कि पाकिस्तान में 10 में से केवल पांच नागरिक ही भारत को अपने लिए फायदेमंद मानते हैं वहीं बहुमत यानी हर 10 व्यक्तियों में से छह पाकिस्तानी भारत को अपने देश के लिए तालिबान या अलकायदा से भी बड़ा खतरा मानते हैं। इसमें यह भी पता चला है कि साल 2009 में जब पहली बार पाकिस्तानियों से उनके सबसे बड़े खतरे का प्राश्न पूछा गया था तब से वे इसके लिए लगातार भारत का नाम लेते रहे हैं।
तब से भारत से डरने वालों की संख्या 11 बिन्दु से बढ़कर 59 फीसदी हो गईं है। दूसरी ओर तालिबान को सबसे बड़ा खतरा बताने वालों का प्रातिशत नौ बिन्दु कम हो गया है। सव्रेक्षण के मुताबिक भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जहां पाकिस्तान के प्राति नकारात्मक दृष्टिकोण है। जिन सात देशों में यह प्राश्न पूछा गया, उनमें से छह में पाकिस्तान के प्राति नकारात्मक रुख देखा गया। चीन, जापान और मुस्लिम बहुल मिरत्र, जार्डन व ट्यूनीशिया में यह सवाल पूछा गया।
जनरल जिया उल हक ने मुल्क की शिक्षा में जो जहर भरा, उसे बाद की सरकारों ने दूर नहीं किया। कराची में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि यह शहर हिन्दुओं, पारसियों और ईंसाइयों का साझा शहर था। वे सभी अब चले गए हैं। हदू भाईं ने इस स्थिति के लिए मदरसों को आंशिक रूप से जिम्मेदार ठहराया और अफसोस प्राकट किया कि मुशर्रफ के शासनकाल के दौरान सुधार के लिए शुरू किए गए प्रायासों को ज्यादा दूर नहीं ले जाया गया। हदू भाईं की बातों पर हमें आार्यं नहीं हुआ। यूं ही नहीं पाकिस्तानी भारत से नफरत करते।
हमें इस सव्रेक्षण के नतीजों पर आर्यं नहीं हुआ। पाकिस्तान में छोटे बच्चों को ही भारत से नफरत करनी सिखाईं जाती है। इसकी पुष्टि एक पाकिस्तान के नामी विद्वान ने भी की है। पाकिस्तान के नामी विद्वान ने अपने मुल्क के स्वूलों में पढ़ाईं जा रही किताबों के जरिए वुछ चौंकाने वाली बातें दुनिया के सामने रखी हैं। न्यूक्लियर साइंटिस्ट और ताजा मुद्दों पर लिखने वाले हदू भाईं ने कहा है कि पाकिस्तान के स्वूलों में बच्चों के जहन में कट्टरपंथी और भारत विरोधी विचार डाले जा रहे हैं। इससे एक ओर पाकिस्तान में कट्टरपंथ मजबूत हो रहा है वहीं दूसरी ओर भारत के प्राति नफरत बढ़ रही है। हदू भाईं ने ब्रिटेन के किग्स कॉलेज में एक सेमिनार के दौरान आतंकवाद से लड़ाईं में शिक्षा की भूमिका से जुड़े उदाहरण पेश किए। हदू भाईं ने एक प्राइमर (प्राथमिक पाठ्य पुस्तक) से वुछ तस्वीरें और पाठ्य सामग्री पेश की। इसमें उर्दू में से अल्लाह, से बन्दूक, से टकराव, ज से जेहाद, से हिजाब, से खंजर और से जुदूब पढ़ाया जाता है। परवेज ने पाक में कक्षा पांच में पढ़ाईं जाने वाली किताबों से भी वुछ उदाहरण पेश किए। इनमें हिन्दुओं और मुस्लिमों में अन्तर को समझना और पाकिस्तान की जरूरत ‘पाकिस्तान के खिलाफ भारत के नापाक इरादे और शहादत और जिहाद पर भाषण’ तैयार करने जैसे विषयों पर चर्चा शामिल है। हदू भाईं ने कहा कि बीते 60 बरसों में पाकिस्तान में बड़ा बदलाव आया है।

Tuesday, 20 September 2011

सलीम शहजाद की हत्या जनरल कयानी के इशारे पर हुई



Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th September 2011
अनिल नरेन्द्र

अमेरिका की प्रमुख खोजी पत्रिका `न्यू यार्पर' ने सनसनीखेज खुलासा किया है कि पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी के इशारे पर ही वहां के खोजी पत्रकार सलीम शहजाद की हत्या की गई थी। पत्रिका के नवीन अंक में शहजाद की मौत के बारे में प्रकाशित आलेख में कहा गया है कि जनरल कयानी के स्टाफ के एक बड़े अधिकारी ने अपने आका के इशारे पर इस खोजी पत्रकार की हत्या का आदेश दिया। पत्रिका ने अमेरिका के खुफिया सूत्रों के हवाले से कहा कि पाक सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई शहजाद की रिपोर्टों से खफा थी। पत्रिका के अनुसार सेना और आईएसआई का गुस्सा उस समय सातवें आसमान पर चढ़ गया जब शहजाद ने `एशिया टाइम्स' में अपनी एक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया कि कराची के मेहरान नौसैनिक अड्डे पर गत 22 मई को आतंकवादी हमला नौसेना और अलकायदा के बीच साठगांठ के कारण हुआ। इस हमले में सेना के अत्याधुनिक टोही विमान नष्ट कर दिए गए थे। `न्यू यार्पर' के अनुसार सुरक्षा बलों ने शहजाद का 29 मई को अपहरण किया। शुरुआत में अपहरणकर्ताओं को इस पत्रकार को सबक सिखाने का निर्देश दिया। लेकिन बाद में किसी समय ऊपर से आदेश आया कि शहजाद को मौत के घाट उतार दिया जाए। शहजाद का शव पंजाब सूबे में एक नहर के किनारे पड़ा मिला जिस पर गम्भीर यातनाओं के निशान थे। पत्रिका में यह भी कयास लगाया है कि पाक सेना को यह संदेह था कि शहजाद खोजी पत्रिकारिता के सिलसिले में ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी एमआई सिक्स और भारत की खुफिया एजेंसी रॉ से भी सम्पर्प में था।
पोलिटजर विजेता पत्रकार डेक्सटर फिलविन्स ने अपने लेख में कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए लिखा है कि इलियास कश्मीरी की हत्या शहजाद की हत्या के बाद हुई थी। इसमें आशंका जताई गई है कि आईएसआई  ने शहजाद का टार्चर किया और इलियास का अता-पता बतलाने पर मजबूर किया। शहजाद से मिली जानकारी उसने अमेरिका को दे दी। इस्लामाबाद के इंस्पैक्टर जनरल पुलिस ने रहस्योद्घाटन किया कि शहजाद के फोन से पता चला कि उसने एक महीने के वक्फे में इलियास कश्मीरी से 258 बार बात की थी। लेख में बताया गया है कि शहजाद आईएसआई के राडार पर महीनों से था। आईएसआई ने उस पर इस बात का दबाव भी बनाया था कि वह उनका सम्पर्प तालिबान नेताओं से स्थगित करवाए। शहजाद ने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया था। लेख में आगे बताया गया कि पिछले साल शहजाद नई दिल्ली में एक कांफ्रेंस अटैंड करने आया था उस समय भारतीय खुफिया एजेंसी ने उसे रॉ में शामिल करने का प्रस्ताव रखा था पर शहजाद इसके लिए तैयार नहीं हुआ था। इस किस्से से पता चलता है कि आज की तारीख में पाकिस्तानी पत्रकार कितने खौफनाक माहौल में अपना काम कर रहे हैं।
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Tuesday, 7 June 2011

भारत को अमेरिका का शुकिया करना चाहिए कि कश्मीरी को मार गिराया


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th June 2011
अनिल नरेन्द्र
ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद अमेरिका को दूसरी उल्लेखनीय सफलता मिली है। अमेरिका की पांच मोस्ट वांटेड टेरोरिस्ट की सूची में शामिल इलियास कश्मीरी मारा गया है। अमेरिका ने उस पर 50 लाख डालर का इनाम घोषित कर रखा था। शुकवार लगभग 11.15 रात दक्षिण वजीरिस्तान में एक ड्रोन हमले में इलियास अपने कुछ साथियों के साथ ड्रोन मिसाइलों का शिकार हो गया। इसकी पुष्टि हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी के कुख्यात `313 ब्रिगेड' ने एक फैक्स जो पेशावर में कुछ पत्रकारों को भेजा गया उससे होती है। भारत को अमेरिका का शुकगुजार होना चाहिए कि उसने भारत के एक बहुत बड़े दुश्मन को हटा दिया है। हम तो उसका कुछ नहीं बिगाड़ सके। हालांकि इलियास अमेरिका से ज्यादा भारत का बड़ा गुनहगार था। भारत ने इस खूंखार दहशतगर्द की कई खतरनाक साजिशों के दंश झेले। ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद उसके उत्तराधिकारी के रूप में भी कश्मीरी का नाम चल रहा था। पाक अधिकृत कश्मीर में जन्मा इलियास की एक आंख और एक उंगली नहीं थी। उसने 26 नवम्बर, 2008 को मुंबई को दहलाने के लिए रची गई साजिश में अहम भूमिका निभाई।
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद अगर इतना बढ़ा तो इसके पीछे इलियास कश्मीरी भी एक बहुत बड़ा कारण था। चूंकि यह खुद पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के कोटली में पैदा हुआ था, तो इस वजह से उसका हमेशा ध्यान कश्मीर में लगा रहा। इलियास पर आरोप है कि इसने कई भारतीय फौजियों के सर कलम किए और इसी के इनाम के रूप में पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने इसे बाकायदा सम्मानित भी किया। बाद में यही इलियासी उसी मुशर्रफ को मारने की साजिश में शामिल था। दहशत की दुनिया में कश्मीरी ने सबसे पहले लश्कर-ए-तैयबा का साथ चुना। एक वक्त ऐसा भी आया जब कश्मीरी ने अपने खुद के आतंकी संगठन की बुनियाद रखी। इस संगठन को हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी (हूजी) नाम दिया गया। यह आतंकी संगठन बीते कई साल से भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्त था। गत दिनों सैयद सलीम शहजाद का कत्ल हुआ था।
शहजाद ने इसी इलियास के बारे में दो लेख लिखे थे। अपने एक लेख में उन्होंने बताया कि 23 जुलाई, 2003 को भारतीय सेना के सखनूर कैम्प पर एक हमला हुआ था। इसमें नौ आर्मी के अफसर मारे गए थे जिसमें ब्रिगेडियर वीके गोविल मारे गए थे और उत्तरी कमान के पमुख ले. जनरल हरि पसाद घायल हो गए थे। इलियास 1994 में दिल्ली में भी अपनी गतिविधियां चला रहा था। उमर शेख के साथ इलियास भी वाल स्ट्रीट जरनल के पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या में शामिल था।
भारत को अमेरिका का शुकगुजार होना चाहिए कि उसने वह काम कर दिया जो शायद हम कभी नहीं कर सकते। हमने तो इसी इलियास को एक नहीं दो बार पकड़कर भागने का मौका दिया। पहली बार सेना ने और दूसरी बार 1994 में गाजियाबाद के मसूरी थाना क्षेत्र से। पुलिस के साथ मुठभेड़ में वह घायल भी हुआ था, उसके दो साथी मारे गए थे। इनके कब्जे से एक अमेरिकी मूल के एक विदेशी नागरिक को छुड़ाया भी गया था। इलियास कश्मीरी जो मिशन पूरा करने भारत आया था वह भले ही पूरा कर लिया हो मगर पाप के घड़े का कोई लम्बा समय नहीं होता वह एक न एक दिन फूट ही जाता है। आखिरकार इलियास कश्मीरी पाकिस्तान में मारा गया। अमेरिका को इस उल्लेखनीय सफलता पर बधाई। ओसामा के बाद यह अमेरिका को दूसरी बड़ी सफलता मिली है।
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Sunday, 5 June 2011

26/11 हमले की साजिश आईएसआई ने रची थी : शहजाद


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 5th June 2011
अनिल नरेन्द्र
पाकिस्तानी पत्रकार सैयद सलीम शहजाद की निर्मम हत्या ने पाकिस्तान में भी हड़कम्प मचा दिया है। तमाम मुल्क में उसकी हत्या की निंदा की जा रही है।
पाक मीडिया खुलकर लिख रहा है कि पाकिस्तान पत्रकारों के लिए कितना खतरनाक देश बन चुका है। एक तरफ जहां पाकिस्तानियत डॉट काम के ब्लागर अदील नजाम ने शहजाद की मौत को देश के लिए चेतावनी बताया है वहीं `ए केस ऑफ एक्सप्लोडिंग मैंगोज' के लेखक मोहम्मद हनीफ ने ट्विटर पर लिखा है। क्या यहां कोई ऐसा पत्रकार है जो यह मानता है कि इसके पीछे खुफियों का हाथ नहीं है? नजाम ने अपने ब्लाग में लिखा है कि पाकिस्तानियों को असुरक्षित और भयभीत रहने की आदत सी हो गई है। आज वे और ज्यादा असुरक्षित और भयभीत महसूस कर रहे हैं। डेली टाइम्स ने अपने सम्पादकीय में लिखा ः पत्रकार की हत्या पत्रकारों के लिए एक चेतावनी की तरह है कि अगर वे ईमानदारी से पत्रकारिता करेंगे तो उनका यही अंजाम होगा। डॉन अखबार लिखता है कि यदि दुनिया पाकिस्तान को पत्रकारों के लिए एक जान लेवा मुल्क कहती है, तो इस तोहमत से छुटकारा पाना उसके लिए वाकई मुश्किल है।
शहजाद ने एक किताब `इन साइड अलकायदा एंड तालिबान ः बियोड़ बिन लादेन एं 9/11 लिखी थी। गत बीस मई को पकाशित इस किताब को डॉन अखबार ने पकाशित किया है। किताब में 40 वर्षीय लेखक शहजाद ने मुंबई हमले की पृष्ठ भूमि का विस्तार से वर्णन किया है। इसमें शहजाद ने बताया है कि किस तरह वर्ष 2008 में मुंबई हमले को अंजाम दिया गया। भारत के खिलाफ अभियान में इलियास कश्मीरी को विशेषज्ञता हासिल है। उसने यह सुझाव देकर अलकायदा के नेताओं को स्तब्ध कर दिया था कि वर्तमान गतिरोध को समाप्त करने का एक मात्र रास्ता युद्ध का विस्तार है। उसने भारत में ऐसा बड़ा अभियान चलाने का सुझाव दिया जिससे भारत और पाक में युद्ध छिड़ जाए और उससे अलकायदा के खिलाफ सभी पस्तावित अभियान रुक जाएं। इससे रोमांचित हो अलकायदा ने भारत पर आतंकी हमले के पस्ताव को मंजूरी दे दी। शहजाद ने कहा कि कश्मीरी ने तय हमले की पूरी साजिश का खाका सेना के पूर्व मेजर हारुन आशिफ को सौंपा।
किताब में शहजाद ने कहा है कि सेना के पूर्व मेजर ने इलियास कश्मीरी के गुर्गों की सहायता से आईएसआई की साजिश को हड़प कर उसे 26 नवम्बर 2008 को मुंबई के विनाशकारी हमले के रूप में बदल दिया।
दरअसल शहजाद आईएसआई और अलकायदा के बारे में जरूरत से ज्यादा जानकारी पा चुका था। यदि खोजी पत्रकारिता शहजाद की मौत का सबब बनी। शहजाद ने आशंका व्यक्त की कि आईएसआई देश के अधिकारिक परमाणु हथियार कार्यकम के अलावा एक गुप्त कार्यकम भी चला रही है। इसके तहत कायमलाऊ परमाणु बम तैयार किए जा रहे हैं। आईएसआई के कुछ अधिकारी महाविनाश के इन हथियारों को आतंकी गुटों तक पहुंचा सकते हैं। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में आतंकवाद के बारे में शहजाद बहुत कुछ जान चुके थे जो आईएसआई को बहुत सता रहा था। सैयद सलीम शहजाद को शायद अलकायदा के पास एटमी हथियार हेने और भारत या इस्राइल के खिलाफ उनके इस्तेमाल की साजिश की जानकारी थी। इससे पहले कि वह ऐसी गतिविधियों का और खुलासा करते उनका मुंह हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। मुंह तो बंद कर दिया पर उनकी लेखनी अमर हो गई है।
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Friday, 3 June 2011

एक और बहादुर कलम का सिपाही आतंक की बलि चढ़ा

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3rd June 2011
अनिल नरेन्द्र
एक और कलम का सिपाही आतंकवाद की बलि चढ़ गया। पाकिस्तान का एक बहादुर पत्रकार सैयद सलीम शहजाद हफ्ते भर से लापता था। मंगलवार को पंजाब पांत से उसका शव बरामद हुआ। शव की हालत देखकर स्पष्ट हो रहा है कि हत्या से पहले उन्हें बुरी तरह से पताड़ित किया गया। लापता होने से दो दिन पहले शहजाद ने एक लेख में पाकिस्तान की नौसेना के कुछ अफसरों और आतंकी संगठन अलकायदा की साठगांठ का जिक किया था। सैयद सलीम शहजाद 40 वर्ष के थे। वह अपने पीछे बीवी अनिला, दो लड़के फहाद (14) और सैयद (8) व एक बेटी अमीना (12) को छोड़कर आतंकवाद की बलि चढ़ गए। शहजाद एशिया टाइम्स (आनलाइन) अखबार हांगकांग के पाकिस्तान ब्यूरो चीफ थे। शहजाद ने दो पुस्तकें इनसाइड अलकायदा एंड तालिबान द बियौंड बिन लादेन एंड 9/11 भी लिखी थी। शहजाद ने कुछ समय के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए भी रिपोर्टिंग की थी।
सैयद सलीम शहजाद का शव मंगलवार सुबह लाहौर से करीब दो सौ किलोमीटर झेलम कस्बे के सराय आलमगीर इलाके में एक नगर से मिला। पास ही में उनकी कार भी लावारिस हालत में खड़ी मिली। शव पर टार्चर के निशान साफ थे। इतालवी न्यूज एजेंसी के लिए भी काम करने वाले शहजाद अकसर अपनी रिपोर्टिंग में पाकिस्तान व अफगानिस्तान के आतंकवादियों और पाकिस्तानी पतिष्ठानों के साथ उनके सम्पर्कों के बारे में लिखते रहते थे। लापता होने से दो दिन पहले शहजाद ने एक लेख में पाकिस्तान की नौसेना के कुछ अफसरों और आतंकी संगठन अलकायदा की साठगांठ का जिक किया था। शहजाद आईएसआई की हिट लिस्ट पर काफी समय से थे और उन्हें जान से मारने की धमकी भी आईएसआई दे चुका था। जियो टीवी ने एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर दिखाई जिसमें शहजाद के चेहरे पर पताड़ना की झलक साफ नजर आ रही थी। 27 मई को शहजाद ने एक लेख जिसका शीर्षक था अलकायदा हैड वार्नड आफ पाकिस्तान स्ट्राइक एशिया टाइम्स ऑन लाइन में लिखा था। इस लेख में उन्होंने बताया था कि पीएनएस मेहरान नेवल बेस पर 22 मई को अलकायदा का जो हमला हुआ वह तब हुआ जब अलकायदा और नेवी के अफसरों के बीच बातचीत के दौर टूटने के बाद हुआ था। अलकायदा चाहता था कि पाकिस्तानी नेवी अफसर उनके कुछ समर्थक जो पाक नौसेना के कब्जे में हैं को रिहा किया जाए। अलकायदा आतंकी सम्पर्कों के चलते गिरफ्तार किए गए नौसेना कर्मियों की रिहाई चाहता था। रविवार शाम को इस्लामाबाद स्थित अपने घर से निकलने के बाद लापता हो गए थे। वह नौसेना के मेहरान नेवल बेस पर आतंकी हमले से संबंधित एक टीवी कार्यकम में हिस्सा लेने के लिए `दुनिया' न्यूज चैनल के दफ्तर जा रहे थे। पाकिस्तानी मीडिया में ऐसी खबरें आई थीं कि मुल्क की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने उन्हें अगवा कर लिया है। कई अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार संगठनों व मानवाधिकार संगठनों ने पाक सरकार से शहजाद का पता लगाने की अपील भी की थी। शहजाद की हत्या की जिम्मेदारी अभी तक किसी आतंकी संगठन ने नहीं ली है। शहजाद की मौत से पता चलता है कि पाकिस्तान में कलम के सिपाही अपनी जान हथेली पर लेकर जी रहे हैं। हम श्री सैयद सलीम शहजाद को सलाम करते हैं और उनके परिवार वालों को कहना चाहते हैं कि दुख की इस बेला में वह अकेले नहीं हैं।
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